Women’s Day: मर्द की मार सहे या घर छोड़ दे औरत?

लेखक- धीरज कुमार

माला का पति महेश रोज शराब पी कर घर आता है. वह बातबात पर अपनी पत्नी से झगड़ा करता है, लेकिन जब शराब का नशा उतरता है, तो माला से खूब प्यारभरी बातें करता है

माला भी उस की प्यार भरी बातों में पिघल जाती है. वह अपने पति की मार और दुत्कार को भूल जाती है.

जब माला महेश को अपनी कसम दे कर शराब छोड़ने की बात करती है, तो वह जल्दी ही मान जाता है. लेकिन शाम होतेहोते वह फिर पुरानी बातों पर आ जाता है. वह अपनी पत्नी की कसम को भूल जाता है और फिर से शराब पी कर आ जाता है. फिर वह रोज की तरह अपनी पत्नी और बच्चों को गालियां देता है और मारपीट करता है.

महेश और माला के 2 बच्चे हैं. माला घरेलू औरत है और खुद बाहर काम नहीं कर पाती है. उस के मायके में कोई उसे सहारा देने वाला भी नहीं है. वह चाह कर भी अपने पति महेश को छोड़ नहीं पा रही है. वह किसी तरह अपने बच्चों की ठीक से परवरिश करना चाहती है. वह चाहती है कि उस के बच्चे पढ़लिख कर अच्छे इनसान बनें.

लेकिन माला के पति के शराब पीने की लत के चलते घर में हमेशा पैसे की तंगी बनी रहती है. उस का पति मोटरगैराज में काम करता है. वहां वह अच्छा कमा लेता है, पर शाम होतेहोते आधे से ज्यादा पैसे की शराब पी जाता है. उसे बाकी चीजों पर तो काबू है, पर वह खुद को शराब पीने से नहीं रोक पाता है.
आज भी देशभर में औरतों के साथ घरेलू हिंसा की घटनाएं हो रही हैं. भले ही हमारे देश में पढ़ाईलिखाई का लैवल बढ़ा हो, लेकिन इन घटनाओं में कमी नहीं आई है. आज भी औरतों को मर्दों से कमतर आंका जाता है. उन्हें कमजोर समझा जाता है. वे भोगने की चीज समझी जाती हैं, इसलिए उन के साथ आज भी घरेलू हिंसा बरकरार है.

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जब कोई मर्द अपनी औरत के साथ झगड़ा करता है, तब वह उस का मुंह बंद करने के लिए हाथ उठाने से भी गुरेज नहीं करता है, जबकि औरतें ऐसा नहीं कर पाती हैं. आज भी औरतें पति को काफी इज्जत देती हैं. पति को बड़ा समझती हैं और खुद को उन के पैर की जूती मानती हैं, इसी सोच का पति नाजायज फायदा उठाते हैं.

कई बार औरतें घरेलू हिंसा सहती रहती हैं, पर कानून की मदद नहीं ले पाती हैं, क्योंकि उन का मानना है कि ऐसा करने पर उन के घरपरिवार की इज्जत नीलाम हो जाती है. वहीं दूसरी तरफ वे खुद को कोर्टकचहरी के चक्कर से भी बचाना चाहती हैं, क्योंकि घरेलू हिंसा की शिकार औरत के पास इतनी ताकत नहीं बचती है कि वह अलग से कोर्टकचहरी और थाने के चक्कर लगा सके.
आज भी हिंसा की शिकार औरतें घुटघुट कर जीती हैं. वे चाह कर भी अपने पति से अलग नहीं हो पाती हैं. पति उन पर कितना भी जुल्म करता रहे, वे उस के साथ जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होती हैं.

इस की बड़ी वजह यह है कि अकेली औरत को कई परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. मसलन, किराए का मकान नहीं मिलना, लोगों के नजरिए में बदलाव. अकेली औरत को देख कर लोग तरहतरह की कहानियां गढ़ने लगते हैं. छोटे शहरों, गांवकसबों में तो और भी कई तरह की परेशानियां हैं.

दरअसल, इस के पीछे मायके से मिली सीख का भी गहरा असर होता है. शादी से पहले हर लड़की को यह सीख दी जाती है कि शादी के बाद पति ही सबकुछ होता है. उस की जायज और नाजायज बातों को हर हाल में मानना चाहिए. ससुराल ही सबकुछ होता है. वहीं तुम्हें मरना है, वहीं तुम्हें जीना है. शादी के बाद हर लड़की की ससुराल से ही अर्थी निकलती है यानी उस का अपने मातापिता के घर से नाता टूट जाता है.

इन बातों के चलते लड़की खुद को कमजोर समझने लगती है. वह बुरे से बुरे हालात में भी पति के साथ रहने को मजबूर हो जाती है, इसीलिए कुछ मर्द औरतों के साथ कई तरह के जुल्म करते रहते हैं. ऐसी औरतें ही हिंसा की ज्यादा शिकार होती हैं.

रंजना देखने में खूबसूरत नहीं थी. वह सांवली और छोटे कद की थी. उस के मातापिता ने अपनी हैसियत के मुताबिक दहेज दे कर खातेपीते परिवार में उस का ब्याह किया था.

पर शादी के बाद से ही रंजना का पति उसे नापसंद करने लगा था, क्योंकि यह शादी अरेंज मैरिज थी, इसलिए वह रंजना को पहले नहीं देख पाया था.

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इस का नतीजा यह था कि पति बातबात पर रंजना के साथ झगड़ा और मारपीट करता था. फिर भी रंजना अपने इस रिश्ते को ढोने की कोशिश कर रही थी. उसे उम्मीद थी कि अपने रंगरूप से तो वह पति को आकर्षित नहीं कर पाई, लेकिन अपने अच्छे गुणों से एक न एक दिन उन्हें आकर्षित जरूर कर पाएगी, इसीलिए वह अपने पति और सासससुर की दिनरात सेवा करती रहती थी, फिर भी उन लोगों में कोई बदलाव नहीं हुआ.

रंजना 12वीं जमात तक पढ़ी थी. जब उस के राज्य में प्राथमिक शिक्षक की बहाली निकली, तो उस ने भी अर्जी दे दी. शिक्षक बहाली में 35 फीसदी महिला आरक्षण होने के चलते रंजना को अपने गांव के ही एक स्कूल में नौकरी मिल गई. इस तरह वह आत्मनिर्भर बन गई.

अब रंजना अपना फैसला लेने के लिए आजाद थी. वह सालों से अपने पति, सास, ननद के उलाहने सहती आ रही थी. अब वह सोच रही थी कि अपने पति से अलग हो कर बाकी की जिंदगी अपने बच्चों के साथ गुजारेगी.

लेकिन उस की ससुराल वालों ने परिवार का माली नुकसान देख कर उसे साथ रखने को मना लिया. अब उस के सासससुर और पति कमाऊ पत्नी होने के चलते सबकुछ सहने को तैयार हैं. कल तक रंजना अपने पति और सासससुर के उलाहने झेलती थी, लेकिन अब वह उस परिवार में शान से रहती है.

रंजना के माली हालात बदलते ही पति के परिवार का रवैया बदल गया. कल तक रंजना अपने परिवार से दूर रहना चाहती थी, लेकिन अब वह परिवार के लिए जरूरत बन गई थी, इसलिए उस के परिवार के लोग अब उस के नखरे सहने के लिए तैयार थे.

लिहाजा, जरूरी है कि जो अपनेअपने घरपरिवार, सासससुर, पति द्वारा सताई जा रही हों, तो सब से पहले उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए सोचना चाहिए. कोई जरूरी नहीं है कि सरकारी नौकरी ही मिले. सब से पहले अपने माली हालात ठीक करने के लिए सोचना चाहिए. अपने पैरों पर खड़ी औरत अपना रास्ता खुद बना सकती है. जरूरत पड़ने पर अपने घरपरिवार, ससुराल और पति से अलग भी हो सकती है.

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Women’s Day: परवाज़ की उड़ान

लेखक- शोभा रानी गोएल

बिजनैस मीटिंग मे भाग लेने के लिए वह 15 दिनों पहले न्यूयौर्क आया. मीटिंग बहुत अच्छी रही. कंपनी को नया प्रोजैक्ट मिल गया. वह बहुत खुश था. उसे अपनी कामयाबी पर बहुत फख्र हो रहा था. खुशी का एक कारण यह भी कि वह अपने वतन लौटा लौट रहा था. हिंदुस्तान जैसा दूसरा इस जहां में कहां.

हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू ही अलग है, जिस में रिश्ते पनपते हैं. अमेरिका ने बहुत तरक्की की है, इस में शक नहीं लेकिन संस्कृति में अपने हिंदुस्तान का सानी नहीं. उसे आन्या की याद आई. आन्या उस की पत्नी, साक्षात अन्नपूर्णा है. सभ्य, सुसंस्कृत और मृदुभाषी…22 घंटे के सफर की थकान आन्या के हाथ की एक कप चाय पलभर में छूमंतर कर देगी. बेटे आदित्य के साथ फुटबौल खेलते हुए वह खुद को दुनिया का सब से खुश इंसान समझने लगता है. वह यह सब सोचसोच कर मुसकरा रहा था.

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जब वह अपने देश में आया तो यहां का नजारा बदल चुका था. कोरोना वायरस हिंदुस्तान में कहर बरपा रहा था. दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते ही एयरपोर्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन ने चश्मे जैसे यंत्र से उस की स्क्रीनिंग कर जांच की. उसे बताया गया कि उसे बुखार है.‌ उस ने अधिकारियों और स्वास्थ्य कर्मचारियों से कहा कि थकावट के कारण थोड़ी सी हरारत है. पर, उसे कोरोना संदिग्ध मानते हुए उस से अस्पताल चल कर चैकअप कराने को कहा गया. उस ने कितनी बार मिन्नतें कीं, पर उस की एक न सुनी गई. उसे आश्वासन दिया गया कि उस के परिवार को सूचित कर दिया जाएगा, साथ ही, उस के परिवार का पूरा ध्यान भी रखा जाएगा.

अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में रहने व जरूरी जांच के लिए उसे भरती किया गया. वहां उसे डाक्टर और मैडिकल स्टाफ के सिवा किसी से भी मिलने की इजाजत नहीं थी. डाक्टर व नर्स आते, उस का चैकअप करते, दवाई देते. वार्डबौय पलंग की चादर बदलता, सफाईकर्मी अपना कार्य करते, साथ ही, हाल चाल पूछ लेते. कमरे में टीवी भी लगा हुआ था.

इन सब के बावजूद वह अकेलापन महसूस करता. वह‌ बारबार बाहर की दुनिया में जाना चाहता. पर यह संभव नहीं था. ‌एक बार उस ने वहां से निकलने की कोशिश की, तो पकडा गया. उसे सख्त हिदायत दी गई, यदि उस ने दोबारा ऐसा किया तो उस पर गैरइरादतन हत्या का केस दर्ज किया जाएगा. जब तक उस की रिपोर्ट नहीं आती, और वह कोरोना नैगेटिव नहीं पाया जाता, तब तक उसे यहीं रहना है. उस पर कड़ी निगरानी रखी जाती. वैसे, अस्पताल प्रशासन और कर्मचारी उस के साथ अच्छा व्यवहार करते. डाक्टर व नर्स उस से प्यार से बातें करते, उस की काउंसलिंग करते, उस की बातें धैर्य से सुनते. फिर भी, उसे कैद जैसा महसूस होता. अभी उसे यहां आए 5 दिन ही हुए थे, उस की रिपोर्ट पैंडिंग थी. वह बाहर की दुनिया में जाने के लिए छटपटाने लगा. वह रातदिन सोचता रहता.

सोचतेसोचते वह आन्या को याद करने लगा. आन्या से उस के विवाह को 10 वर्ष होने को आए. शादी से पहले आन्या नौकरी करती थी. उस ने घर की देखभाल करने के कारण नौकरी करने से मना कर दिया. उस ने जिद करनी चाही पर उसे दृढ़ देख कर मान गई. जब भी वह घर से बाहर जाना चाहती, वह हमेशा मना कर देता. घर का सौदा वगरह वह ही लाता. पानी व बिजली के बिल खुद जा कर भर देता. आन्या कभी घूमने के लिए जाना चाहती, तो वह साथ में जाता. मायके भी साथ जाता, साथ ही ले आता. उसे अकेला कभी कहीं जाने न देता. उस की फिक्र करतेकरते उस की ऐसी फितरत बन गई.

उस ने आन्या को घर से बाहर निकलने से सख्त मना कर दिया था. दूधसब्जी से ले कर घर की सभी जरूरी चीजें वह खुद ला कर देता. कभीकभी आन्या जिद करती, तो वह उसे डांट देता, बुराभला कहता. धीरेधीरे उस ने कहना ही छोड़ दिया. शादी के 2 वर्षों बाद उन की जिंदगी में आदी आया. लेकिन उस की सोच नहीं बदली. उस की मानसिकता वही रही कि बाहर की दुनिया स्त्री के लिए सुरक्षित नहीं है. महिलाएं बाहर जा कर आफत को निमंत्रण देती हैं.

उस के औफिस में महिलाएं काम करती थीं. अकसर सहकर्मी उन के कपड़े और उन के कार्यों पर छींटाकशी करते. वह यह सब देखता था. महिला बौस का तो सहकर्मी पीछे मजाक बनाते, उन की मिमक्री करते. आतेजाते राह में असामाजिक तत्त्वों द्वारा लड़कियों को छेड़ते उस ने कई बार देखा था. अखवार मे आएदिन वह रेप की‌ खबरें पढ़ता. तो मन दहल जाता. इसीलिए वह आन्या के बाहर जाने पर रोक लगाने लगा. आन्या ने अब उस से कुछ कहना ही छोड़ दिया. वह आदी के साथ ज्यादा समय गुजारती, उस के साथ खेलती व बातें करती.

ऐसे मना उसे धीरेधीरे यह एहसास होने लगा था कि आन्या उस से दूर जा रही है. अब वह उस से जरूरतभर बात ही करती. जब कभी आत्मिक क्षणों में उस के पास आता. वह स्थिर बनी रहती. वह अब न शिक़ायत करती और न ही अपनी इच्छा व्यक्त करती.

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एक दिन औफिस से लौटते समय रैडलाइट होने पर कार रोकी. एक बहेलिया इक प्यारी सी चिड़िया को पिंजरे में कैद कर उसे पिंजड़ासहित बेच रहा था. वह आदी के लिए उसे खरीद लाया. पिंजरे में दानापानी रखते हुए आन्या उस चिड़िया से कह रही थी, ‘तेरीमेरी एक ही नियती, जिंदगी बनी कैद मुसाफिर.’

वह नहीं समझ पाया था कि आन्या किस यंत्रणा से गुजर रही है. उस ने समझना ही नहीं चाहा. वह अपने अहं में चूर रहा. चिड़िया से वह उसे अकसर बातें करते देखता, तो हंसने लगता, कहता, ‘यह मूक प्राणी तुम्हारी बातें क्या समझेगा, और क्या जबाव देगा?’ ‘कुछ बातों के लिए जवाब नहीं, जज़्बातों की जरूरत होती है, वह तुम नहीं समझोगे,’ आन्या ने कहा था.

एक मीटिंग के सिलसिले में जब अमेरिका के प्रसिद्ध शहर न्यूयौर्क आने का मौका मिला तो वह खुशीखुशी पैकिंग करने लगा. तब दबी जबान में आन्या ने उसे साथ ले जाने का आग्रह किया. तो, वह बिफर पड़ा था. ‘मैं घूमने के लिए नहीं, काम करने के लिए जा रहा हूं. तुम्हारी मोटी बुद्धि तो हमेशा ही मौजमस्ती की ही बातें जानती है. घर का जरूरी सामान ला कर रख दिया है, बाहर निकलने की जरूरत नहीं है. जब भी फुरसत मिलेगी, वीडियो कौल करूंगा. आन्या का मन बुझ गया.

आज जब उसे अस्पताल में रखा गया तब उसे आन्या की तकलीफ़ समझ आई, उस का दर्द दिखाई दिया. वह कितना बेदर्द था और आन्या कितनी बेबस. कितना निष्ढुर हो गया था वह. अब समझ गया कि हजार सुविधाएं भी आजादी के अभाव में कांटें बन जाती हैं. किसी को कैद कर उसे सुखी समझना जीवन की सब से बड़ी भूल होती है, अन्याय है यह.

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जब कांटों से डर कर गुलाब खिलना नहीं छोडते, तो फिर हम उन पर क्यों बंदिशें लगाएं. यहां से ठीक होने के बाद अब वह सब से पहले आन्यारुपी अपनी चिड़िया को आजाद करेगा खुले आसमां में, उस की ऊंची उड़ान देखेगा. फिर, आन्या से माफी मांग कर उसे खुद के जीवन जीने के लिए लगी बंदिशें हटा देगा. अब कोई कैद नहीं, जीवन फिर से खिलखिलाएगा.

Women’s Day- नपुंसक: भाग 1

आरुषी ने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली तो देखा साढ़े 8 बज चुके थे. उस का शरीर थक कर चूर हो गया था. उस ने हाल की दीवारों पर नजर डाली, तो पाया केवल 5 पेंटिंग्स बची थीं. उन में से भी 3 अनिरुद्ध के चाचाजी अपने फार्म हाउस पर ले जाएंगे. मन ही मन खुश होती आरुषी की नजर अनिरुद्ध पर पड़ी जो उस की तरफ पीठ किए हुए खड़ा था, पर तन, मन, धन से उस का साथ दे रहा था.

उस के मन ने खुद से सवाल किया, कैसे चुका पाऊंगी इस आदमी का उपकार? क्या नहीं किया इस ने मेरे लिए? उस के मन में अनिरुद्ध को ले कर जाने कैसेकैसे विचार आ रहे थे. तभी अनिरुद्ध का फोन बज उठा और आरुषी की विचार तंद्र्रा टूट गई. जैसे ही फोन पर बात समाप्त हुई, अनिरुद्ध उस के करीब आया और आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘कैसा लग रहा है आरुषी, पहली प्रदर्शनी में ही तुम ने झंडे गाड़ दिए. एक ही हफ्ते में तुम ने लाखों कमा लिए.’’

अनिरुद्ध का आप से तुम पर आना, आरुषी को अच्छा लगा. वह बोली, ‘‘अनिरुद्ध, यह तो तुम्हारी मेहनत का नतीजा है वरना मैं जिस परिवार से हूं उस के लिए तो यह सबकुछ करना संभव नहीं था.’’

आरुषी की आंखों के आगे चुटकी बजाते हुए अनिरुद्ध ने कहा, ‘‘आरुषी, कहां खो जाती हो तुम? कोई परेशानी है क्या? इस तरह उदास रहोगी तो मैं तुम्हें पार्टी कैसे दे पाऊंगा. कल मैं तुम्हें तुम्हारी सफलता पर एक पार्टी दूंगा.’’

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‘‘सर, कल किस ने देखा है?’’ आरुषी बोली, ‘‘चलिए, आज ही मैं आप को पार्टी दे देती हूं.’’

‘‘पर तुम अपने घर खबर तो कर दो,’’ अनिरुद्ध अचकचा कर हैरानी से बोला.

‘‘मैं घर पर बता कर आई थी कि आज मुझे देर हो जाएगी,’’ आरुषी के चेहरे से साफ लग रहा था कि वह झूठ बोल रही है.

अनिरुद्ध ने फौरन आर्ट गैलरी से आरुषी की बनाई पेंटिंग्स सावधानी से उतरवा कर अपने आफिस में रखवा दीं. उस के बाद जेब से चाबी निकाल कर आर्ट गैलरी का ताला लगाया और आरुषी के साथ रेस्टोरेंट की ओर चल दिया.

कार में बैठी आरुषी मन ही मन सोच रही थी कि काश, रेस्टोरेंट और दूर हो जाए ताकि अनिरुद्ध के साथ यह सफर समाप्त न हो. उस के चेहरे पर रहरह कर मुसकराहट आ रही थी, पर उस ने खुद को परंपरा और आदर्शवाद के आवरण से ढक रखा था.

‘‘आरुषी, तुम्हें रात के 9 बजे मेरे साथ आते हुए डर नहीं लगा?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं, शायद डरने की उम्र को मैं बहुत पीछे छोड़ आई हूं.’’

‘‘तो क्या अब तुम्हें बिलकुल डर नहीं लगता?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात भी नहीं है, डर लगता है पर अभी तुम से नहीं लग रहा है,’’ अचानक आरुषी भी आप से तुम पर आ गई थी, उसे इस का आभास भी नहीं हुआ था. ऐसी ही बातें करते दोनों रेस्टोरेंट पहुंच गए.

पार्किंग में कार खड़ी कर के अनिरुद्ध आगे बढ़ा तो अचानक ही उस ने आरुषी का हाथ अपने हाथ में ले लिया. उस ने भी इस का विरोध नहीं किया बल्कि जो आवरण आरुषी ने ओढ़ रखा था, उसे उतार फेंका. उस की पकड़ को उस ने और कस कर पकड़ लिया.

दोनों ने मन ही मन इस रिश्ते पर स्वीकृति की मुहर लगा दी. आरुषी के चेहरे पर वही भाव थे जो अब से 15 साल पहले तब आए थे जब राघव ने उसे 3 अक्षर के साथ प्रेम का इजहार किया था. वैसे ही आज उस का चेहरा खुशी से दमक उठा था, कनपटी लाल हो चुकी थी, कांपती उंगलियां बारबार चेहरे पर आ रही जुल्फों को पीछे कर रही थीं.

उस की जुल्फों को अनिरुद्ध ने कान के पीछे करते हुए कहा, ‘‘लो, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दे रहा हूं.’’

तब आरुषी को लगा, काश, उस का हाथ चेहरे पर ही रुक जाए, ऐसा सोचते हुए आरुषी ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

‘‘अरु, अपनी आंखें खोलो. मुझे यह सब सपना लग रहा है. क्या तुम्हें भी कुछ ऐसा ही लग रहा है?’’

अनिरुद्ध की आवाज सुन कर मानो वह आकाश से उड़ती हुई जमीन पर आ लगी. उस की आंखें एक झटके में खुल गईं. वास्तविकता के धरातल पर आते ही उसे अपने से जुड़ी सभी बातें याद आने लगीं. अतीत की बातें याद आते ही आरुषी के माथे पर पसीने की छोटीछोटी बूंदें उभरने लगीं. उसे लगा उस के परिवार के बारे में जान कर अनिरुद्ध उसे तुरंत छोड़ देगा.

आरुषी की आंखों के आगे चुटकी बजाते हुए अनिरुद्ध बोला, ‘‘कहां खो जाती हो तुम?’’

‘‘सर, मैं आप को अपने बारे में कुछ बताना चाहती हूं,’’ आरुषी के चेहरे पर गंभीरता देख कर वह भी कुछ गंभीर हो गया और बोला, ‘‘कहो, क्या कहना चाहती हो?’’

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फीकी सी मुसकराहट के साथ आरुषी ने अपनी बात कहनी शुरू की :

‘‘मेरे पापा का नाम करण राजनाथ है. वह रिटायर सिविल इंजीनियर हैं. करीब 40 साल पहले उन का विवाह कनकलता नाम की एक लड़की से हुआ था. वह लड़की रूपरंग में बेहद साधारण थी. विवाह के कुछ समय बाद ही उस ने एक लड़की को जन्म दिया और उस के ठीक 1 साल बाद दूसरी लड़की को जन्म दिया. चूंकि कनकलता रूपरंग में साधारण थी और गंवार भी थी इसलिए करण राजनाथ का मन उस औरत से बिलकुल हट गया. जब वह तीसरी बार गर्भवती हुई तो करण ने उसे अपने गांव छोड़ दिया. गांव में तीसरे प्रसव के दौरान जच्चाबच्चा दोनों की मृत्यु हो गई.

‘‘अब करण राजनाथ की दोनों बेटियां अकेली रह गईं. करण राजनाथ की दोनों बेटियों में बड़ी बेटी मैं हूं और छोटी बेटी मेरी बहन है. मेरी मां को गुजरे अभी कुछ महीने ही बीते थे कि मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली. उन का नाम अर्चना है और हम उन्हें मौसी कह कर बुलाते हैं. पहले तो उन्होंने हमें प्यार नहीं किया पर जब पता चला कि वह मां नहीं बन सकतीं तो उन्होंने हमें प्यार देना शुरू कर दिया.

Women’s Day- अपना घर: भाग 3

चाह कर भी अभिषेक जिया के व्यवहार में जो बदलाव आया है उसे समझ नहीं पा रहा था. वह रात को भी घंटों लैपटौप पर बैठ कर न जाने क्या करती रहती. अभिषेक जैसे ही उसे आवाज देता, वह घबरा कर लैपटौप बंद कर देती. अभिषेक जितना उस के करीब जाने की कोशिश करता वह उतना ही उस से दूर जा रही थी.

न जाने वह क्या था जिस के पीछे जिया पागल हो रही थी. जिया के भाई ने भी उस दिन अभिषेक को फोन पर कहा, ‘‘आजकल जिया घर पर फोन ही नहीं करती. सब ठीक है न?’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘नहीं आजकल औफिस में बहुत काम है.’’

देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब अभिषेक और जिया दोनों के मातापिता की इच्छा थी कि वे अपने परिवार को आगे बढ़ाएं.

आज फिर से उन की शादी की सालगिरह का जश्न था पर आज लीला ने खुद दावत रखी थी. जिया ने एक बहुत ही खूबसूरत प्याजी रंग की स्कर्ट और कुरती पहनी हुई थी. अभिषेक की नजरें उस से हट ही नहीं रही थी. सब लोग उन्हें छेड़ रहे थे कि वे खुशखबरी कब दे रहे हैं.

रात को एकांत में जब अभिषेक ने जिया से कहा कि जिया मेरा भी मन है, तो जिया ने अनमने ढंग से कहा कि वह तैयार नहीं है.

रात में भी अभिषेक को ऐसा लगा जैसे उस के पास बस जिया का शरीर है. अभिषेक रातभर सो नहीं पाया.

आज वह हर हाल में जिया से बात करना चाहता था, पर जब वह सुबह उठा, जिया औफिस के लिए निकल चुकी थी. अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. ऐसा लगता था, जिया उस के साथ हो कर भी उस के साथ नहीं है, वह हर हफ्ते उस के साथ कोई न कोई प्लान बनाता पर जिया को तो रविवार में भी कोई न कोई औफिस का काम हो जाता था. उन दोनों के बीच एक मौन था, जिसे वह चाह कर भी नहीं तोड़ पा रहा था. अभिषेक को अपनी वह पुरानी जिया चाहिए थी पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.

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देखते ही देखते फिर दीवाली आ गई. पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा था. आज अभिषेक को बहुत दिनों बाद जिया का चेहरा रोशनी से खिला दिखा.

जिया ने अभिषेक से कहा, ‘‘अभिषेक, आज मुझे तुम से कुछ कहना है और कुछ दिखाना भी है.’’

अभिषेक उस की तरफ प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘जिया, कुछ भी बोलना बस यह मत बोलना तुम्हें मुझ से प्यार नहीं है.’’

जिया खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर बोली, ‘‘तुम पागल हो क्या, तुम ने ऐसा सोचा भी कैसे?’’

अभिषेक मुसकरा दिया. बोला, ‘‘लेकिन तुम मुझे पिछले 1 साल से नैगलैक्ट कर रही हो, हम एकसाथ कहीं भी नहीं गए.’’

जिया बोली, ‘‘पता नहीं तुम्हें समझ आएगा या नहीं पर मैं पिछले 1 साल से अपनी पहचान और अपने वजूद, अपनी जड़ें ढूंढ़ रही थी?’’

अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. जिया ने गुलाबी और नारंगी चंदेरी सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी. साथ में कुंदन का मेल खाता सैट, हीरे के कड़े और ढेर सारी चूडि़यां. आज उस के चेहरे पर ऐसी आभा थी कि सब लोग उस के आगे फीके लग रहे थे. रंगोली बनाने के बाद जिया ने अभिषेक को उस के साथ चलने को कहा, तो अभिषेक कार की चाबी उठा चल पड़ा.

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जिया हंस कर बोली, ‘‘आज मैं तुम्हें अपने साथ अपनी कार में ले कर चलना चाहती हूं.’’

अभिषेक चल पड़ा. थोड़ी ही देर में कार हवा से बातें करने लगी और कुछ देर बाद कार नई बस्ती की तरफ चलने लगी. कार ड्राइव करते हुए जिया बोली, ‘‘अभिषेक, आज मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम ने हमेशा हर तरह से मेरा खयाल रखा पर बचपन से मेरा एक सपना था जो मेरी आंखों में पलता रहा. मांपापा ने कहा कि तुम्हारा घर वह होगा, जहां तुम जा कर एक घर बनाओगी. तुम मिले, तो लगा मेरा सपना पूरा हो गया, पर अभिषेक कुछ दिनों बाद समझ आ गया कि कुछ सपने होते हैं जो साझा नहीं होते. शादी का मतलब यह नहीं कि तुम्हारे सपनों का बोझ तुम्हारा जीवनसाथी भी उठाए. मुझे तुम से या किसी से भी कोई शिकायत नहीं है. पर अभिषेक आज मेरा एक सपना पूरा हुआ है,’’ यह कह उस ने एक नई बनी सोसाइटी के सामने कार रोक दी. अभिषेक चुपचाप उस के पीछे चल पड़ा. एक नए फ्लैट के दरवाजे पर उस के नाम की नेमप्लेट लगी थी.

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अभिषेक हैरानी से देख रहा था. छोटा पर बेहद खूबसूरती से सजा हुआ प्लैट. तभी हवा का झोंका आया तो चंदेरी के फीरोजी परदे जिया के अपने घर में लहराने लगे, जहां पर उस का अधिकार घर पर ही नहीं वरन उस की आबोहवा पर भी था.

Video: कपिल के शो में रवीना टंडन का टिप-टिप डांस

बॉलीवुड फिल्म स्टार रवीना टंडन ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया है. इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है.  रवीना टंडन अक्सर डांस वीडियो अपने फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं. लेकिन इस बार जो वीडियो रवीना ने शेयर किया है वो कुछ ज्यादा ही ख़ास है. एक्ट्रेस के फैंस उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे और लगातार अपने खूबसूरत कमेंट्स कर रहे हैं.

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क्या ख़ास है वीडियो में

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दरअसल ये वीडियो बीते दिनों का है जब रवीना टंडन और कोरियोग्राफर -डायरेक्टर फराह खान ने ‘दोस्ती स्पेशल’ एपिसोड में गेस्ट बनकर ‘The Kapil Sharma Show’ शो में शिरकत की.

बता दें कि रवीना और फराह खान दोनों एक दूसरे के बेस्ट फ्रेंड हैं और एक दूसरे के काफी क्लोज़ भी हैं.
इस एपिसोड में कपिल ने रवीना और फराह के साथ खूब मस्ती की थी. वीडियो में कॉमेडी स्टार कपिल शर्मा और फराह खान रवीना टंडन के सुपरहिट गाने टिप-टिप बरसा पानी पर डांस करते दिख रहे हैं. जिसके बाद पीछे से अदाकारा रवीना टंडन उन्हें बीच में ज्वॉइन कर लेती है. इस दौरान अदाकारा रवीना टंडन अपने ही सुपरहिट गाने पर जमकर डांस करती दिखती हैं. ये वीडियो देखकर रवीना के फैंस भी झूमने पर मजबूर हो जाएंगे.

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रवीना के मूव्स देखकर उनके फैंस उनकी तारीफ करते हुए कमेंट्स कर रहे हैं कि ‘रवीना को कोई भी रिप्लेस नहीं कर सकता.’

सुधांशु सरिया की फिल्म ‘सना’ मुख्य भूमिका निभायेंगी  राधिका मदान 

भारतीय सिनेमा में महिला प्रधान फिल्मों का सिलसिला चल रहा है और इसी में अगली कड़ी जोड़ते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म मेकर सुधांशु सरिया के प्रोडक्शन हाउस ‘फोर लाइन एंटरटेनमेंट’ ने अपनी आने वाली अगली फीचर फिल्म ‘सना’ की घोषणा की है.

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सुधांशु सरिया अपनी आगामी फिल्म के निर्माता, निर्देशक और लेखक भी है, जिसमें मुख्य रूप से राधिका मदान होगी. सरिया का यह पहला आत्मनिरीक्षण ड्रामा फिल्म है. राधिका मदान अभिनीत इस फिल्म का प्री-प्रोडक्शन काम अब पूरे जोरों से चालु है और जल्द ही फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाएँगी.

निर्माता-निर्देशक-लेखक सुधांशु सरिया कहते है कि  “मैं हमेशा ऐसी फिल्में बनाने में विश्वास करता हूँ, जो गुणवत्ता में महत्वाकांक्षी और अपने दमदार कहानी से लोगों में कुछ अच्छा संदेश फैलाए. मैंने इस सपने को सात साल से संजो कर रखा है. मेरे लिए बहुत ही खुशी की बात है मेरे द्वारा रचे गए किरदार में राधिका मदान जान डालेगी. फिल्म एक शक्तिशाली विषय पर है और मुझे उम्मीद है कि यह दुनिया भर के दर्शकों को अपने आप से जोड़ पाएंगी. मुझे पूरा विश्वास  है कि यह फिल्म उन लोगों को सोचने पर मजबूर कर देगी जो बहुत ही आसानी से महिलाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा देते है.”

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इस पर राधिका मदान कहती है कि , “एक कलाकार  के रूप में मैं हमेशा से प्रभावशाली किरदार निभाने की तलाश में रहती हूं, जो थोड़ा अलग हो. ‘सना’ आज के मुंबई में स्थापित एक मजबूत और महत्वाकांक्षी महिला की यात्रा पर आधारित है. वह एक दमदार प्रोटॅगनिस्ट है जो कि बहुत ही जटिल है और लोग उससे जुड़ा हुआ महसूस करेंगे. फिल्म की विचारधाराएं मेरे अपने विचारों को बहुत अधिक दर्शाती है, बस यही बात थी जिसके वजह से मैंने इस फिल्म को करने के लिए हाँ कह दिया.”

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फोर लाइन एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित, सुधांशु सरिया द्वारा निर्देशित और लिखित और राधिका मदान अभिनीत, ‘सना’ की शूटिंग जल्द ही शुरू हो जाएँगी. हाल ही में सरिया की जंगली पिक्चर्स के साथ एक महिला-नेतृत्व वाली जासूसी ‘उलज’ का निर्देशन करेंगे इसकी घोषणा हुई .अमेज़ॅन प्राइम के लिए एक सीरीज  ‘मासूम’ का लेखन, सह-निर्देशन और शो रनिंग भी कर रहे है, इसके अलावा वे नेटफ्लिक्स के लिए ‘दिल्ली क्राइम सीजन 3’ का सह-निर्माण और लेखन कर रहे है.

उतरन- भाग -2: पुनर्विवाह के बाद क्या हुआ रूपा के साथ?

सपनों के साये तले रात और दिन बीतते रहे. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. पर उस के दिमाग में रहरह कर यही सवाल कौंधता कि कौनकौन होगा उस के घर में… सोचती… पूछूं या नहीं?

परएक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘रचित, हम एकदूसरे के इतने करीब आ गए हैं, पर अभी तक मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानती. अपने परिवार के बारे में कुछ बताओ न?’’

‘‘क्या जानना चाहती हो? यही न कि मैं शादीशुदा हूं या नहीं, बच्चे हैं या नहीं…? हां बच्चे हैं. पर शादीशुदा होते हुए भी मैं अकेला हूं, क्योंकि पत्नी अब इस दुनिया में नहीं है. मेरे साथ मेरी मां और मेरा बेटा रहता है.’’

रूपा ने आंखें बंद कर लीं. यह सुख का क्षण था. सपने अभी जिंदा हैं… कुछ देर की मौन के बाद रचित ने पूछा, ‘‘क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

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‘‘क्या तुम्हें पता है कि मेरी भी एक बेटी है? मैं एक तलाकशुदा हूं. क्या तुम्हारी फैमिली मुझे और मेरी बेटी को स्वीकार करेगी? सपनों की दुनिया बहुत कोमल होती है रचित. पर वास्तविकता का धरातल बहुत कठोर. अच्छी तरह सोच लो. फिर कोई निर्णय लेना,’’ इतना कहती गई, पर मन के किसी कोने में कुछ नया जन्म लेती महसूस कर रही थी रूपा.

कुछ तेरी कहानी है, कुछ मेरी कहानी है

हर बात खयाली है, हर बात रूहानी है

मिल जाए कभी जो हम, तो हर बात सुहानी है…

रूपा के गोरे से मुखड़े पर अठखेलियां करती लटों को हाथों हटाते हुए रचित ने उस के गालों को अपनी हथेलियों में समेट लिया और उस की मदभरी आंखों में झांकते हुए कहा, ‘‘मैं अब तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता रूपा. मैं सब ठीक कर दूंगा. बस तुम हां कर दो.’’

महीनों से चल रही मुलाकातों की फुहारें रूपा को आश्वासन की मधुर चासनी में सराबोर कर चुकी थीं. वह अपनेआप से अजनबी होती जा रही थी. कभी तो मन मचलता कि बारिश की बूंदों को अपनी हथेली में समेट ले. और कभी समंदर की लहरों के साथ विलीन हो जाने की विकलता. भावनाएं तूफान की तरह प्रचंड, उद्वेलित अंतर्मन की छटपटाहट ने आंखों में पानी का उबाल ला दिया. सामान्य गति से बीतते वक्त की चाल बहुत धीमी लग रही थी रूपा को, और सांसें धौंकनी की तरह तेज.

सांसों में बसे हो तुम

आंखों में बसे हो तुम

छूओ तो मुझे एकबार

धड़कन में बसे हो तुम…

समय गुजरते देर नहीं लगती. दोनों ने शादी कर ली. हालांकि रचित की मां बहुत मानमनुहार के बाद राजी हुई थीं और इस शर्त पर कि रूपा की बेटी कभी इस घर में नहीं आएगी. रूपा को बहुत बड़ा झटका लगा था. एक बार फिर से पुराने घावों का दर्द हरा हो गया था.

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अचानक ही आए इस झंझावात ने रूपा के सपनों को चकनाचूर कर दिया. विचलित सी वह सन्न रह गई. पर रचित ने यह समझा कर शांत कर दिया कि वक्त के साथ सब बदल जाते हैं. मां को हम दोनों मिल कर मना लेंगे. रूपा ने गहरी सांस ली. उस ने बड़ी मुश्किल से दिल को समझाया, होस्टल से तो बच्ची महफूज है ही. जब मन करेगा जा कर उस से मिल लूंगी. सुखद भविष्य की कामना लिए रूपा को क्या पता था कि नियति क्याक्या रंग दिखाने वाली है.

डूबता हुआ सुर्ख लाल सूरज उसे माथे की बिंदिया सी लग रही थी. एक बार फिर से सब भूल कर उस ने रचित के प्यार भरोसा कर लिया. सुख की अनुभूतियां वक्त का पता ही नहीं चलने देती. सपनों के हिंडोले में झूलते 10 दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला.

‘‘कल घर लौटने का दिन है रूपा,’’ रचित ने उस की आंखों में झांकते हुए कहा.

‘‘प्यार ने हम दोनों को बांध रखा है, वरना हम तो नदी के दो किनारे थे.’’

रूपा आसमान की ओर देखती हुई बुदबुदाई. रचित उस की आंखों में देखता कुछ पढ़ने की कोशिश करता रहा. फिर उस ने मन में अंदर चल रहे द्वंद्व को परे झटक कर रूपा की खूबसूरती को निहारने लगा. पलभर के लिए तो लगा कि काश, यह वक्त यही ठहर जाता. पर वक्त भी कभी ठहरता है भला.

साथ तुम्हारे चल कर यह अहसास हुआ

दरमियां हमारे सिर्फ प्यार, और कुछ नहीं…

अंधेरा चढ़ता गया और दोनों महकते एहसास के साथ सपनों सरीखे पलों की नशीली मादकता में विलीन. थकान से चूर कब दोनों की आगोश में समा गए, महसूस भी न हुआ. सुबह का सूरज नया दिन ले कर हाजिर हो गया. जल्दीजल्दी तैयार हो कर दोनों गाड़ी में बैठ गए और चल दिए घर की ओर.

घर पहुंचते ही सब से पहला सामना रचित के बेटे प्रथम से हुआ. उस की नजरें क्रोध और हिकारत से भरी हुई थीं. दोनों को देखते ही वह अंदर के कमरे में चला गया. रूपा के चेहरे पर सोच की लकीरें उभर आईं. तो क्या प्रथम की रजामंदी के बगैर शादी हुई है? जबकि मैं ने तो अपनी बेटी को बताया था कि रचित की मम्मी शादी के लिए तैयार हैं, पर शर्त रखी है कि तुम मेरे साथ उन लोगों के साथ नहीं रहोगी. ये सुन कर भी मेरी बेटी ने तो नाराजगी नहीं जताई. बल्कि उम्मीद से कहीं आगे बढ़ कर बोली, ‘‘मां, अभी भी तो हम साथ नहीं रहते. तुम मुझ से मिलने होस्टल तो वैसे भी आती रहती हो.’’

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बच्ची को याद कर के रूपा की आंखें भर आईं. धीरेधीरे खुद को सामान्य कर सास के पास गई. लेकिन सास की बेरुखी ने तो दिल ही बैठा दिया. एक बार फिर से रूपा ने दिल को बहलाया. कोई बात नहीं. रचित तो समझता है न मुझे. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

रूपा एक सपना देख रही है. वह है, उस की बच्ची है, रचित और प्रथम है. एक बहुत ही प्यारा सा, रंगीन सा प्रथम और बच्ची गोद में सोई है. रचित और मां उस के बगल में बैठे हैं. सभी बहुत खुश हैं.

अचानक नींद से जग जाती है रूपा. चारों तरफ देखती है…

ऐसा सपना, जिस का जाग्रत अवस्था से कोई संबंध नहीं. लेकिन सपने की खुशी उस के चेहरे पर झलक आती है. कभी न कभी यह सपना भी सच होगा, जरूर होगा.

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उतरन- भाग 1: पुनर्विवाह के बाद क्या हुआ रूपा के साथ?

लेखिका- कात्यायनी सिंह

रहरहकर उस का दिल धड़क रहा था. मन में उठते कई सवाल उस के सिर पर हथौड़े की तरह चोट कर रहे थे. यह क्या हो गया? भूल किस से हुई? या भूल हुई भी तो क्यों हुई? मन में उभरते इन सवालों का दंश झेल पाना मुश्किल हो रहा था. अभी बेटी के होस्टल में पहुंचने में तकरीबन 3 घंटे का समय था. बस का झेलाऊ सफर और उस पर होस्टल से किया गया फोन कि आप की बेटी ने आत्महत्या करने की कोशिश की है…

अपने अंदर झांकने की हिम्मत नहीं हुई. स्मृति पटल पर जमी कई परतें, परत दर परत सामने आने और ओझल होने लगीं. दिल बैठा जा रहा था. अवसाद गहरा होता जा रहा था. तन का बोझ भी सहना मुश्किल और आंखों से बहती अविरल धारा…

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वह खिड़की के सहारे आंखें मूंदे, दिल और दिमाग को शांत करने की कोशिश करने लगी. पर एकएक स्मृति आंखों में चहलकदमी करती हुई सजीव होने लगी. वह घबरा कर खिड़की से बाहर देखने लगी. आंखों की कोरों पर बांधा गया बांध एकाएक टूट कर प्रचंड धारा बन गया. यों तो जिंदगी करवट लेती है, पर इस तरह की उस का पूरा वजूद दूसरी शादी के नाम पर स्वाह हो जाए. क्योंकि उस ने दूसरी शादी? क्या मिला उसे? स्वतंत्र वजूद की चाहत भी तो अस्तित्वहीन हो गई?

पर समाज का तो एक अलग ही नजरिया होता है. तलाकशुदा स्त्री को देख लोगों की आंखों में हिकारत का कांटा चुभ सा जाता है. और उस कांटे को निकालने के लिए ही तो रूपा ने दूसरी शादी की.

पहली शादी और तलाक को याद कर मन कसैला नहीं करना चाहती अब. पर न चाहने से क्या होता है. तलाक के 10 साल पहले ही बेटी उस की गोद में आ चुकी थी. शादी के 2 दिन बाद ही सपने बिखरने की आहट सुनाई देने लगी थी. सुनहरे दिन और सपनों में नहाई रात, सब इतनी भयावह कैसे हो गई? वह आज तक समझ नहीं पाई.

हर रोज की मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना उसे जिंदगी से बेजार करने लगी थी और उस के नीचे कराहता उमंगों भरा मन. पहलेपहल भरपूर विरोध किया रूपा ने. पर दिन, महीने और 7 साल बीतते चले गए और उस का धैर्य क्षीण होता रहा. पर एक दिन… उसी विरोध के महीन परतों के नीचे ज्वालामुखी के असंख्य कण फूट पड़े. और अंतत: उसे तलाक की पहल भी करनी पड़ गई…

2 साल लगे इस अनचाही पीड़ादायी परिस्थिति से नजात पाने में. तलाक के बाद बेटी को साथ ले कर वो एक अनजान सफर पर निकल गई. मंजिल उस को पता नहीं थी. इस असमंजस की स्थिति के बावजूद वह तनावमुक्त महसूस कर रही थी खुद को. आखिर 2 सालों के संघर्ष ने नारकीय जीवन से मुक्ति जो दिलाई थी. कुदरत ने मेहरबानी दिखाई और 1 हफ्ते में ही रेडियो स्टेशन में नौकरी लग जाने के कारण उसे कोई आर्थिक तंगी का एहसास नहीं हुआ. और फिर मायके का सहारा भी संबल बना.

उगते सूरज की लालिमा उस के गालों पर उतरने लगती थी, जब रेडियो स्टेशन में उसे एक पुरुष प्यार से देखता था. अच्छा लगता था उसे यों किसी का देखना. 2 वर्ष का अकेलापन ही था, जो अनजान पुरुष को देख कर पिघलने लगा.

पिछली यादों में तड़पता उस का मन कहता कि मुझे इस सुख की आशा नहीं करनी चाहिए अब. मेरे हिस्से में कहां है सुख… और अजीब सी उदासी मन को उद्वेलित करने लगती.

उफ्फ, यह अचानक आज मुझे क्या हो रहा है? 2 सालों के अकेलेपन में कभी भी इस तरह का खयाल नहीं आया. अकेलापन, उदासी, सबकुछ अपनी बेटी की मुसकान तले दब चुकी थी. फिर आज क्यों? जबकि उस ने तलाक के बाद किसी भी पुरुष को अपने दायरे के बाहर ही रखा. अंदर आने की इजाजत नहीं दी किसी को. पर आज इस पुरुष को देख कर क्यों तपते रेगिस्तान में बारिश की बूंदों जैसा महसूस हो रहा है.

‘क्या ये कोई स्वप्न है या फिर पिछले जन्म का साथ. क्यों मेरी नजरें बारबार उस की ओर उठ रही हैं? क्यों वह उसे अनदेखा नहीं कर पा रही है? मन में एक सवाल- क्या कुदरत को कुछ और खेल खेलना है? इसी उधेड़बुन में शाम हो गई,’ उस ने अपने बैग को कंधे पर लटकाया और बाहर निकल आई.

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पूस की सर्दी में भी उस के माथे पर पसीने की बूंदें झिलमिला रही थीं. चेहरे पर शर्म भरी मुसकराहट खिल उठी. तो क्या उसे प्यार हो गया है? एकाएक उस की मुद्रा ने गंभीरता का आवरण ओढ़ लिया. सोचने लगी, ‘उस का मकसद तो सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी का भविष्य बनाना है. नहींनहीं, वह इन फालतू के बातों में नहीं पड़ेगी.’

तभी उसे एक आवाज ने चौंका दिया, ‘‘चलिए मैं आप को घर छोड़ देता हूं. कब तक यहां खड़ी रह कर रिकशे का इंतजार करेंगी. अंधेरा भी तो गहरा रहा है.’’

पलट कर देखा तो वही पुरुष था, जो उस के दिलोदिमाग पर छाया हुआ था. वैसे अंधेरे की आशंका तो उस के मन में भी थी. वह बिना कुछ जवाब दिए उस की कार में बैठ गई. मध्यम स्वर में गाना बज रहा था-

धीरेधीरे से मेरी जिंदगी में आना

धीरेधीरे से दिल को चुराना…

वह चुपचाप बैठ बाहर के अंधेरे में झांकने की असफल कोशिश रही थी. तभी उस ने हंस कर पूछा, ‘‘अंधेरे से लड़ रही हैं या मुझे अनदेखा कर रही हैं?’’

वह भी मुसकरा दी, ‘‘अपने वजूद को तलाश रही हूं. आप घुसपैठिए की तरह

जबरदस्ती घुस आए हैं, इसी समस्या के निवारण में जुटी हूं.’’

खिलखिला कर हंस पड़ा वह. लगा जैसे चारों तरफ हरियाली बिखर गई हो. इन्हीं बातों के दरमियान घर आ गया और वह बिना कुछ कहे गाड़ी से उतर कर जाने लगी. तभी उस ने विनती भरे स्वर में उस का मोबाइल नंबर मांगा. पहले तो वह झिझकी, लेकिन फिर कुछ सोच कर नंबर दे दिया.

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दिन बीतने के साथ बातों का और फिर मिलने का सिलसिला शुरू हो गया. वह नहीं चाहती थी कि रचित हर शाम उस से मिलने आए. क्योंकि एक तो बदनामी का डर और दूसरी तरफ बेटी जिस की नजरों का सामना करना मुश्किल होता. मन की आशंकाएं उसे परेशान करती कि उस के जानने के बाद, क्या वह बेझिझक उस के सामने जा पाएगी? पर दफ्तर के बाद का खाली समय उसे काटने दौड़ता. झिझक और असमंजस के बीच वह मिलने का समय होते ही उस के आने की राह भी देखती.

तेरे वादों पर हम एतबार कर बैठे

ये क्या कर बैठे, हाय क्या कर बैठे

एक बार मुसकरा कर देख क्या लिए

सारी जिंदगी हम तेरे नाम कर बैठे…

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उतरन- भाग 3: पुनर्विवाह के बाद क्या हुआ रूपा के साथ?

देखती है पलट कर रचित को. नींद में बच्चों सा मासूम, प्यार से अपने गुलाबी होंठ उस के माथे पर टिका देती है. रचित के माथे पर भावनाओं का गुलाबी अंकन देख कर खुद शरमा भी जाती है रूपा. फिर उठ कर चल देती है किचन की ओर. नजदीक पहुंचते ही बरतनों की आवाज सुन कर चौंक गई. अंदर घुसते ही देखती है कि रचित की मां नाश्ता बना रही हैं.

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‘‘मां, मैं बना देती हूं न…’’ सुनते ही सास किचन से बाहर निकल गई. सब समझते हुए भी रूपा ने खुद को संयत रख कर बाकी काम निबटाया और नाश्ता ले कर प्रथम के कमरे में दाखिल हुई. बेखबर सो रहे प्रथम को कुछ देर अपलक देखती रही. फिर बड़े प्यार से धीरेधीरे बाल सहलाते हुए बोली, ‘‘उठो प्रथम बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या आज?’’ रूपा की आवाज कानों में पड़ते ही वह घबरा कर जाग गया और अजीब सी नजरों से घूरने लगा. पता नहीं क्यों इतना असहज कर रहा था उस का इस तरह घूरना? नफरत ऐसी कि आंखों में अंगारे दहक रहे हों.

‘‘आप फिर से मेरे कमरे में आ गईं? एक बात हमेशा याद रखिए कि आप सिर्फ पापा की पत्नी हैं, मेरी मम्मी नहीं. मेरी मम्मी की जगह कोई नहीं ले सकता. कोई भी नहीं.’’

स्तब्ध रह गई थी रूपा. रात का सुनहरा सपना ताश के पत्तों की तरह बिखरता नजर आ रहा था उसे. लगभग दौड़ती हुई वह कमरे से बाहर निकल गई.

ऊपर से सब कुछ सामान्य दिख रहा था, पर समय के साथ रचित में भी बदलाव आने लगा. दिनभर औफिस और घर के काम से थक कर चूर हो जाने के बावजूद रात में बिस्तर पर नींद का नामोनिशान तक नहीं. रचित से भी वो अब कुछ नहीं कहती. बस अपनी एक बात उसे अचंभित कर जाती थी. जिस घुटन और प्रताड़ना के विरुद्ध वह महीनों लड़ी, वह घुटन और प्रताड़ना अब उसे उतना विचलित नहीं करती थी. समय और उम्र समझौता करना सिखा देता है शायद.

आज सुबह से मन उद्विग्न हो रहा था बारबार. रहरह कर दिल में एक अजीब सी टीस महसूस हो रही थी. जैसेतैसे काम खत्म कर के चाय पीने बैठी ही थी कि दीया के होस्टल से फोन आ गया. चकोर को चांद मिल जाने खुशी मिल गई हो जैसे.

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लेकिन यह क्या, मोबाइल से बात करते हुए उस के चेहरे पर दर्द का प्रहार महसूस कर सकता था कोई भी. कुछ देर के लिए तो वह मोबाइल लिए हतप्रभ सी बैठी रही. फिर अचानक बदहवास सी उठी और निकल गई बस स्टैंड की ओर.

होस्टल के गेट पर पहुंची तो काफी भीड़ दिखी. अनहोनी की आशंका उस के दिलोदिमाग को आतंकित करने लगी. अंदर जा कर देखा तो बेटी को जमीन पर लिटाया गया था. बेसब्री के साथ पास में बैठ गई और बड़े प्यार से पुकारी,

‘‘दीया बेटे.’’

कोई जवाब नहीं…

शरीर पकड़ कर हिलाया.

रूपा को तो जैसे करंट लग गया हो. इतना ठंडा और अकड़ा हुआ क्यों लग रहा है दीया का बदन. तो क्या?

नहीं…

ऐसा कैसे हो सकता है?

क्यों…?

किंतु अशांत धड़कता दिल आश्वस्त नहीं हो पा रहा था. वह निर्निमेष भाव से अपनी प्यारी परी को देखे जा रही थी. वही मोहक चेहरा…

तभी किसी ने उस के हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया. यह कह कर कि आप की बेटी ने आप के नाम पत्र लिखा है.

डबडबाई आंखों से पत्र पढ़ने लगी-

‘दुनिया की सब से प्यारी ममा…’

आप को खूब सारा प्यार

आप को खूब सारी खुशियां मिले. सौरी ममा, मैं आप से मिले बगैर जा रही हूं. ये दुनिया बहुत खराब है ममा. तुम्हारे तलाक और शादी को ले कर बहुत गंदीगंदी बातें करते थे स्कूल के स्टूडैंट्स. कहते थे तेरी मां… छोड़ न मां.

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मैं जानती हूं तुम्हारे बारे में. लेकिन मां, मैं तंग आ गई थी उन के तानों से.

तुझ से नहीं बताया कि तू इतनी खुश है, परेशान हो जाओगी ये सब जान कर. मां, अब मुझे कोई परेशान नहीं करेगा. और तुम भी शांति से रह पाओगी.

हमेशा खुश रहना मां.

‘-तुम्हारी परी दीया.’

वह अपनेआप को रोक नहीं पाई. अचेत हो कर लुढ़क गई रूपा. पर उस अर्ध चेतनावस्था में भी वह मंदमंद मुसकरा रही थी.

वह अचानक उठ कर बैठ गई और खूब जोर से हंस पड़ी. उसे लगा वह तो न नए पति और उस के बच्चे की बन पाई न ही अपनी वाली को संभाल पाई. मां बनने की इतनी बड़ी कीमत देनी होगी इस का अंदाजा नहीं था.

दिल चिथड़े कर डालने वाली हंसी…

अगला दिन…

दुनिया के लिए एक सामान्य दिन जैसा ही सवेरा था.

सिवाय रूपा के…

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