मां की याद में रोने लगी इमली तो ऑनस्क्रीन सास ने ऐसे दिया सहारा

स्टार प्लस का नया शो रविवार विद स्टार परिवार ने कम समय में ही लोगों का दिल जीत लिया है. इस शो का प्रोमो लगातार फैंस का ध्यान अपनी तरफ खींच रहे हैं.

इस शो के प्रोमो में अनुपमा , इमली, साथ निभाना साथिया के कलाकार धमाल मचाते दिख रहे हैं. इसी बीच रविवार विद स्टार परिवार का एक प्रोमो जमकर वायरल हो रहा है जिसमें इसमी यानि सुंबुल तौसिर खान शो के दौरान स्टेज पर अपनी मां को याद करके रोने लगी. शो में वह अपने को स्टार फहमान तौसिर खान के साथ रोमांस करती नजर आ रही हैं.

जिसके बाद से शो के दौरान इमली को अपनी असली मां की याद आ गई जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. सुंबुल तौसिर खान अपनी मां को याद कर स्टेज पर ही रोने लगी जिसके बाद से उन्हें ऑस्क्रिन सास निलिमा नेे कहा कि हम भी तुम्हारे मां जैसे ही हैं. जब भी तुम्हें लगे हमें याद कर लेना.

 

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इमली ने स्टेज पर कहा कि मुझे कई बार लगता है कि मेरे पास भी मां होनी चाहिए इस पर स्टेज पर मौजूद सभी लोग रोने लगें. इस बात पर निलिमा और नर्मदा ने इमली को गले से लगा लिया और कहा कि अब तु्म्हारी 2 मां है.

इस प्रोमो ने फैंस के धड़कन को बढ़ा दिया है. इमली का ये अंदाज देखकर फैंस की आंखे भर आई.गौरतलब है कि सुंबुल तौसिर खान ने बचपन में ही अपनी मां को खो दिया था. अपनी पिता की मदद करने के लिए कम समय में ही काम शुरू कर दिया था.

ई. एम. आई. – भाग 1: क्या लोन चुका पाए सोम और समिधा?

रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म की एक बेंच पर सोम और समिधा बैठे हुए अम्मां बाबूजी की गाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे. कुहरे के कारण गाड़ी 4 घंटे लेट थी. सोम गहरे सोच में था.

वह मन ही मन बढ़ने वाले खर्च को सोच कर गुणाभाग में लगा हुआ था.

‘‘समिधा, इस ई.एम.आई. के कारण हम लोगों के हाथ हमेशा बंधे रहते हैं.’’

‘‘तुम भी सोम न जाने क्याक्या सोचते रहते हो. इसी के जरिए तो हम लोगों ने सुखसुविधा की चीजें जोड़ ली हैं, नहीं तो भला क्या मुमकिन था?’’

‘‘समिधा, अम्मांबाबूजी पहली बार अपने घर आ रहे हैं. ध्यान रखना, अम्मां नाराज न होने पाएं.’’

‘‘सोम, तुम यह बात कम से कम 15 बार कह चुके हो. तुम्हारी अम्मां तुनकमिजाज हैं, यह मुझे अच्छी तरह मालूम है.’’

सोम चुप हो कर बैठ गया.

उस के मन में डर था कि अम्मां और समिधा की कैसे निभेगी, क्योंकि अम्मां को उस के हर काम में मीनमेख निकालने की आदत है. समिधा भी बहुत जिद्दी है. सोम उसे 2 साल तक मां न बनने की बात कह रहा था, लेकिन उस ने चुपचाप अपनी मनमानी कर ली. यह राज तो तब खुला जब एक दिन उस ने समिधा से कहा कि उस का प्रमोशन हुआ है, उस की तनख्वाह भी बढ़ जाएगी. तभी हंस कर बोली थी वह, ‘‘आप का एक प्रमोशन और हुआ है.

‘‘वह क्या?’’ पूछने पर समिधा शरमाते हुए बोली थी, ‘‘आप पापा बनने वाले हैं.’’

सुन कर वह घबरा गया था, ‘‘नहींनहीं, अभी यह सब नहीं. अभी मेरे लिए तुम्हारी नौकरी बहुत जरूरी है. तुम औफिस जाओगी तो बच्चे को कौन रखेगा?’’

निश्चिंत हो कर वह बोली थी, ‘‘मैं ने अम्मां से बात कर ली है, वे अब यहीं रहेंगी. बच्चे को वे ही संभालेंगी.’’

दोनों में अच्छीखासी बहस हो गई थी. सोम का कहना था कि उस की और अम्मां की पटेगी नहीं.

समिधा का कहना था कि वह अम्मां को अच्छी तरह समझती है, वे उसे अकेला छोड़ कर गांव कभी नहीं जाएंगी.

सोम गंभीर हो कर अपनी और समिधा की मुलाकात और शादी के बारे में सोचने लगा. उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे कल की ही बात हो.

समिधा सोम के औफिस में ही काम करती थी. वह गोरे रंग एवं तीखे नैननक्श वाली लड़की थी. काम के सिलसिले में उसे सोम के पास बारबार जाना पड़ता था. दोनों ही साधारण परिवार से थे. मिलतेजुलते कब एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए, उन्हें पता ही नहीं लगा.

6 महीने से मैं अपने पड़ोस की एक भाभी से प्यार करने लगा हूं लेकिन वह अब नाराज है क्या करुं?

सवाल

मैं 25 साल का शादीशुदा मर्द हूं. मेरी पत्नी में कोई कमी नहीं है लेकिन पिछले 6 महीने से मैं अपने पड़ोस की एक भाभी से प्यार करने लगा हूं. हमारा जिस्मानी रिश्ता भी बन चुका है. भाभी चाहती हैं कि हम दोनों तलाक ले कर एकदूसरे से शादी कर लें. हमें क्या करना चाहिए?

जवाब
आप की बीवी ने भी अगर किसी पड़ोसी से प्यार किया होता, रिश्ते बनाए होते और आप को तलाक देने पर उतारू हो आती, तब आप पर क्या गुजरती. पड़ोसन भाभी से यह सब कर के आप एक गलती कर चुके हैं, अब दूसरी से बचें. अपनी गलती, हवस या नाजायज रिश्ते की सजा पत्नी को न दें. तलाक लेना आसान नहीं है. अगर पत्नी उस पर एतराज करे तो सालों तलाक नहीं मिलेगा.
बेहतर होगा कि भाभी को सख्ती से तलाक के लिए मना कर दें. जिस्मानी रिश्ता बनाने के खतरे भी जेहन में रखें और जो चल रहा है, उसे चलने देने में हर्ज भी नहीं है.

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मेरे और पड़ोस की भाभी के बीच जिस्मानी संबंध हैं. एक दिन उन के पति ने हम दोनों को रंगेहाथ पकड़ भी लिया. भाभी मुझे छोड़ना नहीं चाहती. क्या करूं.

सवाल
मैं 21 साल का हूं. पड़ोस वाली भाभी 32 साल की हैं और उन के 3 बच्चे भी हैं. एक बार उन के पति गांव गए थे, तो मेरे और उन के बीच जिस्मानी संबंध बन गए, जो लगातार चल रहे हैं. एक दिन उन के पति ने हम दोनों को रंगेहाथ पकड़ भी लिया. इस के बावजूद वे अपनी बीवी को साथ ले जाने को तैयार हैं, पर वह मुझे छोड़ना नहीं चाहती. क्या करूं?

जवाब
3 बच्चों की मां को तलाक दिला कर उस से शादी करना आसान काम नहीं है. लिहाजा, आप उसे समझा कर पति के साथ जाने को कहें. उस का पति बेहद भला है, वरना कोई भी ऐसी हरकत बरदाश्त नहीं कर सकता. आप ने मुफ्त की मलाई खूब चाट ली, अब उस से किनारा करने में ही भलाई है.

ई. एम. आई. – भाग 2 : क्या लोन चुका पाए सोम और समिधा?

समिधा का पहले शरमाना, फिर मुसकराना, फिर साथ में कौफी पीना और फिर बाइक पर लिफ्ट… चूंकि दोनों की पृष्ठभूमि लगभग एक सी थी, अत: प्यार परवान चढ़ने लगा. औफिस में दोनों के बारे में चर्चा होने लगी थी. कुछ दिन बाद अचानक समिधा ने औफिस आना बंद कर दिया, तो सोम परेशान हो उठा. उस ने समिधा के घर का पता लगाया और बेचैन हालत में उस के घर पहुंच गया. वह एक कालोनी में अपनी बूआ के साथ रहती थी. उस के मांबाप बचपन में ही गुजर गए थे. बूआ ने ही उसे पढ़ाया लिखाया था. बूआ एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थीं. समिधा और बूआ दोनों एकदूसरे का सहारा थीं. मेवा मिठाई, पकवान तो उन के पास नहीं था, परंतु दाल रोटी अच्छी तरह से चल रही थी.

सोम को देखते ही समिधा की बूआ सरिताजी की त्योरियां चढ़ गई थीं. छूटते ही उन्होंने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी कि कहां रहते हो? घर पर कौनकौन है? समिधा से क्यों मिलने आए हो? तुम्हारी तनख्वाह कितनी है? आदिआदि.

सोम के माथे पर पसीना आ गया था. वह उस घड़ी को कोसने लगा था, जब उस ने समिधा के घर की ओर रुख किया था. परंतु वह अपनी अम्मां के ऐसे तेवरों से वाकिफ था, इसलिए उस ने धैर्यपूर्वक उन्हें उत्तर दिए.

जब सरिताजी थोड़ी आश्वस्त हुईं तो बोलीं, ‘‘इसे तो 1 हफ्ते से बुखार आ रहा था. इसीलिए औफिस नहीं जा रही थी. अब बुखार ठीक हो गया है, इसलिए कल से यह औफिस जाएगी,’’ फिर चेतावनी भरे स्वर में बोलीं, ‘‘मुझे लड़के लड़कियों की दोस्ती पसंद नहीं है. लड़के कुछ दिन तो लड़कियों से प्यार का नाटक करते हैं, फिर जब दूसरी पर दिल आ जाता है तो पहले वाली की ओर मुड़ कर भी नहीं देखते.’’

सोम की तो स्पष्टवादी सरिताजी के सामने बोलती ही बंद हो गई थी. सरिताजी उठ कर अंदर चली गईं तब समिधा ने फुसफुसा कर उस से कहा, ‘‘आप को यहां आने की क्या जरूरत थी? बूआ ने इतनी बातें कह डालीं आप से, मैं उन की ओर से क्षमा मांगती हूं.’’

सोम ने दबे स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारा मोबाइल बंद था, इसलिए मैं घबरा गया था. अच्छा अब मैं चलता हूं.’’ वह खड़ा ही हुआ था कि तभी बूआ चायनाश्ता ले कर आ गईं. बोलीं, ‘‘क्यों बेटा, तुम मेरी बात का बुरा मान गए क्या? मेरी जवान बेटी है, सुंदर भी है इसलिए डरती हूं, कहीं किसी गलत लड़के के चक्कर में न पड़ जाए. लंबाचौड़ा दहेज देने की हैसियत तो मेरी है नहीं कि यह राजकुमार का ख्वाब देखे. कोई पढ़ालिखा, खाताकमाता लड़का मिल जाए, जो इस का ध्यान रखे, इस को इज्जत दे, बस यही चाहती हूं मैं. पढ़ालिखा कर काबिल बना दिया है मैं ने इसे, अपने पैरों पर खड़ी हो गई है यह.’’

सोम ने उन लोगों से विदा ली. सरिताजी की स्पष्टवादिता से वह उन का कायल हो गया. एक मां के दर्द को उस ने गहराई से अनुभव किया था. उसी क्षण उस ने मन ही मन समिधा से शादी का निर्णय कर लिया था. अम्मांबाबूजी से आज्ञा लेना तो मात्र औपचारिकता थी.

अगले दिन वह औफिस गई तो सोम से आंखें मिलाने में सकुचा रही थी, परंतु वह उस को देखते ही खुश हो गया. लंच के समय समिधा ने पुन: उस से बूआ की बातों के लिए माफी मांगी, परंतु सोम ने तो उस के समक्ष शादी का प्रस्ताव ही रख दिया. वह खुशी से झूम उठी, उसे अपने पर विश्वास नहीं हो रहा था.

एक हफ्ते बाद ही सोम छुट्टी ले कर अपने गांव गया. वहां उस ने अम्मांबाबूजी को उस का फोटो दिखा कर पूछा, ‘‘यह लड़की कैसी है?’’ दोनों ने फोटो देखा फिर एकसाथ बोल पड़े, ‘‘दहेज कितना मिलेगा?’’

वह बोला, ‘‘दहेज. लेकिन मैं तो बिना दहेज लिए ही शादी करूंगा.’’

बाबूजी भड़क उठे, ‘‘तुम्हारा तो दिमाग खराब हो गया है. मेरे पास क्या रकम गड़ी है, जो मैं शादी में खर्च करूंगा? अभी तक सुनंदा के विवाह का कर्ज चुका रहा हूं. ब्याज बढ़ता जा रहा है. मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा रुपया. तुम्हें जो नकद मिले उस से तुम शहर में अपने लिए घर ले लेना.’’

‘‘आप मेरे घर की चिंता न करें. किस्तों में फ्लैट मैं ले चुका हूं. आप दहेज की बात करते हैं, वह तो नौकरी कर रही है, सारी जिंदगी कमा कर दहेज देती रहेगी.’’

बाबूजी चीखते हुए बोले, ‘‘जब तुम ने सब तय कर लिया है, तो मुझ से हामी भरवाने की क्या जरूरत है. भाड़ में जाओ, जो चाहे वह करो.’’

सोम ने अगली सुबह की ट्रेन पकड़ी और दिल्ली लौट आया. उस के बाद 3-4 बार वह जल्दीजल्दी फिर गांव गया. अम्मां बाबूजी को तरहतरह से समझाने का प्रयास करता रहा, परंतु हठी बाबूजी का मन नहीं पसीजा.

 

सेना ही क्यों

सेना ही क्यों जज्बा और हिम्मत कहीं भी काम आ सकते हैं मैंसुबह कसरत करने अपने लोकल पार्क में जाता हूं. वहां कुछ लड़के दौड़ लगाने आते हैं. उन में से ज्यादातर गरीब घर के नौजवान होते हैं और वे बनियान, निक्कर और ‘सैगा’ ब्रांड के जूते पहने हुए होते हैं. पंजाब की इस कंपनी के जूते इसलिए, क्योंकि इतने सस्ते और टिकाऊ रनिंग जूते शायद ही कोई कंपनी बना कर देती होगी. भार में भले ही ये जूते बहुत हलके होते हैं, पर इन्हें पहनने वाले गरीब घरों के लड़कों पर रोजगार पाने का बोझ बहुत ज्यादा होता है. कम जमीन, आमदनी न के बराबर, पर फिर भी ऐसे लड़कों की मेहनत में कोई कमी नहीं होती है और इस बात की गवाही उन के बदन से बहता पसीना दे देता है.

पर चूंकि एक तो भारत में सरकारी नौकरियां वैसे ही कम हैं, ऊपर से बेरोजगारी की हद. लिहाजा, 1-1 सरकारी नौकरी पाने में कंपीटिशन काफी तगड़ा हो जाता है. और जब कोई नौजवान इस कंपीटिशन में लास्ट स्टेज पर चूक जाता है, तो वह कई बार इतने कड़े और दुखदायी कदम उठा लेता है कि देशभर में सुर्खियां बन जाता है. हाल ही में एक 23 साल के लड़के ने इस बात के चलते तनाव में आ कर अपनी जान दे दी कि चूंकि अब वह ओवर एज हो गया है तो सेना में नहीं जा पाएगा, तो फिर जीने से क्या फायदा और उस ने फांसी लगा ली.

यह घटना हरियाणा के भिवानी जिले की है, जहां गांव तालु का रहने वाला 23 साल का नौजवान पवन कुमार पिछले 9 साल से भारतीय सेना में भरती होने के लिए तैयारी कर रहा था, पर सरकार द्वारा भरतियां न निकालने से हताश हो कर उस ने अपनी जान दे दी. पवन कुमार ने खुदकुशी करने से पहले एक हैरान कर देने वाला सुसाइड नोट लिखा, जो किसी कागज पर नहीं, बल्कि रनिंग ट्रैक पर लिखा था. उस सुसाइड नोट में पवन कुमार ने अपने पिताजी से कहा कि इस बार सेना में भरती नहीं हुआ, लेकिन पिताजी अगले जन्म में मैं फौजी जरूर बनूंगा, क्योंकि सेना में भरती न निकलने पर मेरी उम्र भी निकल गई… फिर अपने प्रैक्टिस वाले मैदान में एक पेड़ पर रस्सी का फंदा लगा कर उस ने जान दे दी.

इसी मुद्दे पर तालु गांव में एक सामाजिक संगठन चला रहे इंजीनियर कुलदीप पंघाल ने बताया, ‘‘पवन को सब गांव में ‘पौना’ कहते थे. उस के पिता का नाम जसवंत उर्फ ‘लीला’ है. जब पवन 5 साल का था, तब उस की मां का देहांत हो गया था. परिवार की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी. पिता ने ही किसी तरह दोनों बेटों की परवरिश की थी. पवन दोनों भाइयों में बड़ा था. ‘‘इस बात में कोई दोराय नहीं है कि पवन को सेना में जाने का जुनून था. उसी जुनून को पूरा करने के लिए वह दिन में 3 टाइम ट्रैक पर रेस लगाता था और उस ने क्षेत्रीय लैवल पर रेस में कई बार मैडल भी जीते थे.

वह 3 बार टीए की भरती क्लियर कर चुका था, पर फाइनल रिजल्ट में उस का नाम नहीं आ पाया था. ‘‘साल 2018 में पवन मेरे पास पढ़ने आता था, तब उस की बातों से गहरा सेना प्रेम झलकता था. उस के परिवार के सदस्य बताते हैं कि उन्होंने कई बार प्राइवेट नौकरी लगवाने के लिए उस से पूछा था, पर वह मना करता रहा. ‘‘हरियाणा के तकरीबन हर गांव में पवन जैसे सैकड़ों नौजवान मिल जाएंगे, जिन का सपना केवल भारतीय सेना में जाने का है.

इस बात को सच साबित करने के लिए आप सोशल मीडिया पर ऐसे नौजवानों द्वारा डाली जाने वाली पोस्टों को देख सकते हैं. ‘‘इस के बावजूद अगर सरकार नौकरियां नहीं दे पर रही है तो उसे भी कठघरे में खड़ा करना चाहिए. क्या सरकारी भरतियां समय पर निकाली जा रही हैं? क्या हर सरकारी महकमे में पद खाली नहीं हैं? सेना की भरती में छूट क्यों नहीं दी जाती है,

जबकि हर साल 2.5 लाख नौजवान भरती की उम्र खो देते हैं? सरकार को अपनी इस उदासीनता पर जवाबदेह होना चाहिए.’’ इंजीनियर कुलदीप पंघाल की बात में दम है, क्योंकि अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो सेना का हर 10वां जवान हरियाणा से आता है. रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, भिवानी और रोहतक जिले से सब से ज्यादा नौजवान भारतीय सेना में भरती होते हैं. सेना में जाने और देश के लिए अपनी सेवाएं देने में कोई बुराई नहीं है, पर क्या कुछ करगुजरने का जज्बा और हिम्मत सिर्फ सेना में ही जा कर दिखाए जा सकते हैं? ऐसा नहीं है.

पवन एक होनहार, लगनशील और मेहनती लड़का था. सब से बड़ी बात तो यह कि उस में जुनून की भी कोई कमी नहीं थी. पर सिर्फ सेना में भरती न हो पाने की हताशा से वह पार नहीं पा सका, जबकि अगर वह किसी भी फील्ड में मन लगा कर उतरता, तो यकीनन उसे कामयाबी ही मिलती, क्योंकि वह तन और मन से सेहतमंद था. बस, पवन में इस बात की कमी रह गई कि उस ने अपने मन की पीड़ा किसी से शेयर नहीं की और जिस रनिंग ट्रैक पर वह रोज दौड़ता था,

वहीं अपनी जिंदगी की रेस भी हार गया. लेकिन क्या एक मनचाही नौकरी न मिलने से किसी को अपनी जिंदगी ही दांव पर लगा देनी चाहिए? बिलकुल नहीं. तालु गांव के ही एक चार्टर्ड अकाउंटैंट नरेश शर्मा की मिसाल लेते हैं, जो आज एक प्राइवेट कंपनी में चीफ फाइनैंशियल औफिसर हैं. नरेश शर्मा ने बताया, ‘‘मुझे इस घटना के बारे में जान कर बहुत बुरा लगा. हमारे गांव में हमेशा से आपसी सहयोग का माहौल रहा है. सब एकदूसरे को बढ़ावा देते हैं और ढांढस भी बंधाते हैं.

‘‘मैं जब पढ़ाई कर रहा था तो पड़ोस में सब ने लाउडस्पीकर बजाना बंद कर दिया था कि लड़के की पढ़ाई में बाधा न आए. गांव में किसी के नाकाम होने पर बड़ेबूढ़े दिलासा देते थे कि कोई बात नहीं हारजीत तो होती रहती है. ‘‘लेकिन, समय के साथसाथ नई पीढ़ी में नाकामी को झेलने की ताकत कम हो रही है. बच्चों में डिप्रैशन आ जाता है. यह समस्या शहरों में और भी ज्यादा है. लगता है कि इस बच्चे ने भी बस हताशा में ही यह कदम उठा लिया. ‘‘एक बात तो साफ है कि बढ़ते औटोमेशन के चलते सरकारी नौकरियों में कमी आएगी. प्राइवेट क्षेत्र में भी औटोमेशन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, जिस से अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव हो रहे हैं. पारंपरिक दक्षता की जगह नई कुशलता ले रही है.

ऐसे में नौजवानों पर भविष्य की अनिश्चितताओं को ले कर बहुत दबाव है. कोरोना ने जो 2 साल बरबाद कर दिए हैं, उस से भी नौजवानों और छात्रों पर बहुत गहरा मानसिक दबाव पड़ा है. ‘‘पर, जब एक रास्ता बंद होता है, तो और भी कई रास्ते खुल जाते हैं. आगे चल कर लगता है कि वह दरवाजा सही बंद हुआ था. मेरा 10वीं क्लास के बाद एयरफोर्स में सिलैक्शन हो गया था, बस मैडिकल में यह कह कर निकाल दिया था कि तुम्हारे दांत व कान साफ नहीं हैं. ‘‘तब मुझे बहुत दुख हुआ था, लेकिन आज मैं सोचता हूं कि अगर तब नाकाम नहीं हुआ होता तो शायद और ज्यादा पढ़ाई नहीं करता. ‘‘याद रखें कि यह जिंदगी अनमोल है. कामयाबी और नाकामी का फैसला तो जिंदगी जी लेने के बाद ही पता लगेगा कि कौन सी घटना कामयाबी की तरफ ले गई और कौन सी सबक दे गई.’’

हकीकत तो यह है कि पूरे भारत में पवन की खुदकुशी के तूल पकड़ने की वजह देश के हर उस नौजवान की उम्मीद है, जो पवन में अपनेआप को देखता है. फर्क बस इतना है कि उस ने अभी तक खुदकुशी नहीं की है. यह उस की समझदारी कहेंगे या मजबूरी, यह आप को तय करना है. द्य क्या है सरकार की ‘टूर औफ ड्यूटी’ योजना सेना में जवानों की तादाद बढ़ाने और अपना खर्च कम करने के लिए सरकार एक ऐसी ‘टूर औफ ड्यूटी’ योजना पर काम कर रही है, जिस के तहत नौजवान 3 से 5 साल के लिए सेना में अपनी सेवाएं दे सकते हैं. इसे ‘अग्निपथ एंट्री स्कीम’ का नाम दिया जाएगा. बताया जा रहा है कि जो भी लोग इस योजना के तहत सेना में शामिल होंगे, उन में से कुछ को 3 साल के बाद भी सेवा जारी रखने का रास्ता खुला रहेगा. इस योजना के तहत नौजवानों को बतौर सैनिक शौर्ट टर्म करार पर शामिल कर ट्रेनिंग दी जाएगी और अलगअलग इलाकों में तैनात किया जाएगा. साथ ही, बता दें कि उम्मीदवारों को चयन प्रक्रिया में किसी तरह की कोई रियायत नहीं मिलेगी और उन की हर महीने तनख्वाह 80,000 से 90,000 रुपए हो सकती है. इस योजना के तहत सेना में सेवा पूरी करने के बाद नौजवानों को दूसरी नौकरी के लिए सेना मदद करेगी. लिहाजा,

इन ऐसे नौजवानों को कारपोरेट सैक्टर के लिए तैयार करने की योजना भी सेना बना रही है. पर चूंकि फिलहाल यह योजना अभी कागजों पर है, तो यह कब अमल में लाई जाएगी और कितनी कारगर साबित होगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, पर भारत में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, खासकर सरकारी सैक्टर में नौकरियां कम होने की वजह से, यहां के नौजवानों में इतना सब्र नहीं है कि वे ‘टूर औफ ड्यूटी’ जैसी योजना का इंतजार करें. सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी की जारी रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर, 2021 तक भारत में बेरोजगार लोगों की तादाद 5.3 करोड़ रही. इन में महिलाओं की तादाद 1.7 करोड़ है. घर बैठे लोगों में उन की तादाद ज्यादा है,

जो लगातार काम खोजने की कोशिश कर रहे हैं. सीएमआईई के मुताबिक, लगातार काम की तलाश करने के बाद भी बेरोजगार बैठे लोगों का बड़ा आंकड़ा चिंताजनक है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 5.3 करोड़ बेरोजगार लोगों में से 3.5 करोड़ लोग लगातार काम खोज रहे हैं. इन में तकरीबन 80 लाख महिलाएं शामिल हैं. बाकी के 1.7 करोड़ बेरोजगार काम तो करना चाहते हैं, पर वे ऐक्टिव हो कर काम की तलाश नहीं कर रहे हैं. ऐसे बेरोजगारों में 53 फीसदी यानी 90 लाख महिलाएं शामिल हैं. सीएमआईई का कहना है कि भारत में रोजगार मिलने की दर बहुत ही कम है और यह ज्यादा बड़ी समस्या है.

प्यार की तलाश- भाग 1 : अतीत के पन्नों में खोई क्या थी नीतू की प्रेम कहानी?

मेरी कक्षा में पढ़ने वाली नीतू मेरे बैंच से दाईं वाली पंक्ति में, 2 बैंच आगे बैठती थी. वह दिखने में साधारण थी पर उस में दूसरों से हट कर कुछ ऐसा आकर्षण था कि जब मैं ने पहली बार उसे देखा तो बस देखता ही रह गया… वह अपनी सहेलियों के साथ हंसतीखिलखिलाती रहती और मैं उसे चोरीछिपे देखता रहता.

नीतू मेरी जिंदगी में, उम्र के उस मोड़ पर जिसे किशोरावस्था कहते हैं और जो जवानी की पहली सुबह के समान होती है, उस सुबह की रोशनी बन कर आई थी वह. उस सुखद परिवर्तन ने मेरे जीवन में जैसे रंग भर दिया था. मैं हमेशा अपने में मस्त रहता. पढ़ाई में भी मेरा ध्यान पहले से अधिक रहता. मम्मीपापा टोकते, उस से पहले ही मैं पढ़ने बैठ जाता और सुबहसुबह स्कूल जाने के लिए हड़बड़ा उठता.

आज सोचता हूं तो लगता है, काश, वक्त वहीं ठहर जाता. नीतू मुझ से कभी जुदा न होती, पर जीवन के सुनहरे दिन, कितने जल्दी बीत जाते हैं. मेरा स्कूली जीवन कब पीछे छूट गया, पता ही नहीं चला.

मैट्रिक की परीक्षा के बाद, नीतू जैसे हमेशा के लिए मुझ से जुदा हो गई. मैं उस के घर का पता जानता था, लेकिन जब यह पता चला कि नीतू कालेज की पढ़ाई के लिए अपने मामा के यहां चली गई है तो मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया. मेरे पास कुछ था तो बस उस की यादें, उस के लिखे खत और स्कूल में मिली वह तसवीर, जिस में साथ पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी और शिक्षक एक कतार में खड़े थे और नीतू एक कोने में खड़ी मुसकरा रही थी.

मैं नीतू की यादों में खोया, डायरी के पन्ने पलटता जा रहा था, तभी दरवाजे पर दस्तक सुन कर चौंक गया. नजरें उठा कर देखा तो सामने सुनयना खड़ी थी. अचानक उसे देख कर मैं हड़बड़ा गया, ‘‘कहिए, क्या बात है?’’ मैं ने डायरी बंद करते हुए कहा.

‘‘क्या मैं अंदर आ सकती हूं…’’ सुनयना मेरी मनस्थिति भांप कर मुसकराते हुए बोली.

‘‘हां… हां, आइए न बैठिए,’’ मैं ने जैसे शरमा कर कहा.

‘‘मैं ने आप को डिस्टर्ब कर दिया. शायद आप कुछ लिख रहे थे…’’ सुनयना डायरी की ओर देख रही थी.

‘‘बस डायरी है…’’ मैं ने डायरी पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘अरे वाह, आप डायरी लिखते हैं, क्या मैं देख सकती हूं?’’ सुनयना की आंखों में पता नहीं क्यों चमक आ गईर् थी.

‘‘किसी की पर्सनल डायरी नहीं देखनी चाहिए,’’ मैं ने मुसकरा कर मना करने के उद्देश्य से कहा क्योंकि वैसे भी वह डायरी मैं उसे नहीं दिखा सकता था.

‘‘क्या हम इतने गैर हैं?’’ सुनयना नाराज तो नहीं लग रही थी पर अपने चिरपरिचित अंदाज में मुंह बना कर बोली.

‘‘मैं ने ऐसा तो नहीं कहा,’’ मैं ने फिर मुसकराने का प्रयास किया.

‘‘खैर, छोडि़ए. पर कभी तो मैं आप की डायरी पढ़ कर ही रहूंगी,’’ सुनयना के चेहरे पर अब बनावटी नाराजगी थी. उस ने अपनी झील जैसी बड़ीबड़ी आंखों से मुझे घूरते हुए कहा, ‘‘…अभी चलिए, आप को बुलाया जा रहा है.‘‘

बैठक में भैयाभाभी सभी बैठे हुए थे. अंत्याक्षरी खेलने का कार्यक्रम बनाया गया था पर मेरा मन तो कहीं दूर था, लेकिन मना कैसे करता? न चाह कर भी खेलने बैठ गया. सुनयना पूरे खेल के दौरान, अपने गीतों से मुझे छेड़ने का प्रयास करती रही.

सुनयना मेरी भाभी की छोटी बहन थी. अपने नाम के अनुरूप ही उस की गहरी नीली झील सी आंखें थीं. वह थी भी बहुत खूबसूरत. उस के चेहरे से हमेशा एक आभा सी फूटती नजर आती. उस के काले, घने, चमकदार बाल कमर तक अठखेलियां करते रहते. वह हमेशा चंचल हिरनी के समान फुदकती फिरती. वह बहुत मिलनसार और बिलकुल खुले दिल की लड़की थी. यही वजह थी कि उसे सब बहुत पसंद करते थे और मजाक में ही सही, पर सभी ये कहते, इस घर की छोटी बहू कोई बनेगी तो सिर्फ सुनयना ही बनेगी. मैं सुन कर बिना किसी प्रतिक्रिया के चुपचाप रह जाता पर कभीकभार ऐसा लगता जैसे मेरी इच्छा, मेरी भावनाओं से किसी को कोईर् लेनादेना नहीं है पर मैं दोष देता तो किसे देता. किसी को तो पता ही नहीं था कि मेरे दिल में जो लड़की बसी है, वह सुनयना नहीं नीतू है.

प्यार की तलाश- भाग 3 : अतीत के पन्नों में खोई क्या थी नीतू की प्रेम कहानी?

मेरा मन घृणा और दुख से भर उठा. मैं किसी तरह खुद को संभालते हुए अखबार को कुरसी पर ही रख कर, धीरेधीरे उठा और अपने कमरे में जा कर फिर बिस्तर पर लुढ़क गया. ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मेरे अंदर थोड़ी सी भी जिजीविषा शेष न हो, जैसे मैं दुनिया का सब से दीन आदमी हूं, आंखों से अपनेआप आंसू छलके जा रहे थे.

सामने टेबल पर वही तसवीर थी. जिस में नीतू अब भी मेरी ओर देख कर मुसकरा रही थी, जैसे मेरे जज्बातों से मेरे दिल के दर्द से, उसे कोईर् लेनादेना न हो. जी में आया तसवीर को उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दूं कि तभी मां चाय ले कर आ गईं, ‘’अरे, तू फिर सो रहा है क्या? अभी तो पेपर पढ़ रहा था.‘’

मैं ने झटपट अपने चेहरे पर हाथ रख कर पलकों पर उंगलियां फिराते हुए अपने आंसू छिपाते हुए कहा, ‘’नहीं, सिर थोड़ा भारी लग रहा है.‘’

‘‘रात को देर से सोया होगा. पता नहीं रातरात भर जाग कर क्या लिखता रहता है? ले, चाय पी ले, इस से थोड़ी राहत मिलेगी,‘‘ चाय का कप हाथ में थमा कर

मेरे माथे पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरते हुए मां ने कहा, ‘‘तेल ला कर थोड़ी मालिश कर देती हूं.’

‘‘नहीं ठीक है, मां, वैसा दर्द नहीं है. शायद देर से सोया था. इसलिए ऐसा लग रहा है,‘‘ मैं ने फिर बात बना कर कहा.

मां जब कमरे से निकल गईं तो मैं किसी तरह अपनेआप को समझाने की कोशिश करने लगा. पर दिल में उठ रही टीस, जैसे बढ़ती ही जा रही थी. मन कह रहा था, जा कर एक बार उस बेवफा से मिल आओ. आखिर उस ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? क्या वह इंतजार नहीं कर सकती थी? उन वादों, कसमों को वह कैसे भूल गई, जो हम ने स्कूल से विदाई की उस आखिरी घड़ी में, एकदूसरे के सामने खाई थीं.

न चाहते हुए भी मेरे मन में, रहरह कर सवाल उठ रहे थे. अपनेआप को समझाना जैसे मुश्किल होता जा रहा था. मन की पीड़ा जब बरदाश्त से बाहर होने लगी तो मैं फिर से बिस्तर पर लेट गया. उसी वक्त अचानक भाभी मेरे कमरे में आईं. उन्हें अचानक सामने देख कर मैं घबरा गया. किसी तरह अपने मनोभाव छिपा कर मैं बिस्तर से उठा.

कुछ देर पहले भाभी के मायके से फोन आया था. सुनयना की तबीयत बहुत खराब थी. वह कल ही तो यहां से गई थी. अचानक पता नहीं उसे क्या हो गया? भाभी काफी चिंतित थीं. भैया को औफिस के जरूरी काम से कहीं बाहर जाना था इसलिए मुझे भाभी के साथ सुनयना को देखने जाना पड़ा.

सुनयना बिस्तर पर पड़ी हुई थी. कुछ देर पहले डाक्टर दवा दे गया था. वह अभी भी बुखार से तप रही थी. उस की आंखें सूजी हुई थीं, देख कर ही लग रहा था, जैसे वह रातभर रोई हो.

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मैं सामने कुरसी पर चुपचाप बैठा था. भाभी उस के पास बैठीं, उस के बालों को सहला रही थीं. सुनयना बोली तो कुछ नहीं, पर उस की आंखों से छलछला रहे आंसू पूरी कहानी बयान कर रहे थे. सारा माजरा समझ कर भाभी मुझे किसी अपराधी की तरह घूरने लगीं. मैं सिर झुकाए चुपचाप बैठा था. कुछ देर बाद, भाभी कमरे से निकल गईं.

कमरे में सिर्फ हम दोनों थे. सुनयना जैसे शून्य में कुछ तलाश रही थी. उसे देख कर मेरी आंखों में भी आंसू आ गए. अचानक महसूस हुआ कि यदि अब भी मैं ने सामने स्थित जलाशय को ठुकरा कर मृगमरीचिका के पीछे भागने का प्रयास किया तो शायद अंत में पछतावे के सिवा मेरे हाथ कुछ नहीं लगेगा. मैं ने बिना देर किए सुनयना के पास जा कर, याचना भरे स्वर में कहा, ‘‘सुनयनाजी, मैं ने आप से जो कहा था, वह मेरा भ्रम था. मैं ने बचपन के खेल को प्यार समझ लिया था. मुझे आज ही पता चला कि उस लड़की ने एक दूसरे लड़के से प्रेम विवाह कर लिया है. मैं नादानी में आप से पता नहीं क्याक्या कह गया…‘’

सुनयना अपनी डबडबाई आंखों से अब भी शून्य में निहार रही थी. कुछ देर रुक कर, मैं ने फिर कहा, ‘‘कुदरत जिंदगी में सब को सच्चा हमदर्द देती है पर अकसर हम उसे ठुकरा देते हैं. मैं ने भी शायद, ऐसा ही किया है. लड़कपन से अब तक ख्वाबों के पीछे भागता रहा,’’ मेरा गला भर आया था.

सुनयना मुझे टुकुरटुकुर देख रही थी. उस की आंखों से टपकते आंसू उस के गालों पर लुढ़क रहे थे. मुझे पहली बार उस की आंखों में अपने लिए प्यार नजर आ रहा था.

मैं ने किसी छोटे बच्चे की तरह भावुक हो कर कहा, ‘‘देखो, मुझे मत ठुकराना, वरना मैं जी नहीं पाऊंगा,’’ और हाथ बढा़ कर उस के गालों को छू रहे आंसुओं को पोंछने लगा.

सुनयना के होंठ कुछ कहने के प्रयास में थरथरा उठे. पर जब वह कुछ बोल न पाई तो अचानक मुझ से लिपट कर जोरजोर से सुबकने लगी. मैं ने भी उसे कस कर अपनी बांहों में भर लिया. हम दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे. मैं सोच रहा था, ‘मुझे अब तक क्यों पता नहीं चला कि हमेशा चंचल, बेफिक्र और नादान सी दिखने वाली इस लड़की के दिल में मेरे लिए इतना प्यार छिपा था.’

भाभी दरवाजे के पास खड़ीं मुसकरा रही थीं. पर उन की आंखों में भी खुशी के आंसू थे.

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प्यार की तलाश- भाग 2 : अतीत के पन्नों में खोई क्या थी नीतू की प्रेम कहानी?

दूसरे दिन सुनयना वापस जा रही थी. भाभी ने आ कर मुझे उसे घर तक छोड़ने को कहा. मैं जान रहा था, यह मेरे और सुनयना को ले कर घर वालों के मन में जो खिचड़ी पक रही है, उसी साजिश का हिस्सा है पर अंदर ही अंदर मैं खुश भी था… मैं मन ही मन सोच रहा था, ’आज रास्ते में सुनयना के सामने सारी बातें स्पष्ट कर दूंगा.’

सुनयना मेरे पीछे चिपक कर बैठी हुई थी. मैं आदतन सामान्य गति से मोटरसाइकिल चला रहा था. वह अपनी हरकतों से मुझे बारबार छेड़ने का प्रयास कर रही थी. मैं चाह कर भी उसे टोक नहीं पा रहा था. वह बीचबीच में ‘नदिया के पार’ फिल्म का गाना गुनगुनाने लगती और रास्तेभर तरहतरह की बातों से मुझे उकसाने का प्रयास करती रही. पर मैं थोड़ाबहुत जवाब देने के अलावा बस, कभीकभार मुसकरा देता.

जब हम शहर की भीड़भाड़ से बाहर, खुली सड़क पर निकले तो दृश्य भी ‘नदिया के पार’ फिल्म के जैसा ही था, बस अंतर इतना था कि मेरे पास ‘बैलगाड़ी’ की जगह मोटरसाइकिल थी. सड़क के दोनों किनारे कतार में खड़े बड़ेबड़े पेड़ थे. सामने दोनों तरफ खेतों में लहलहाती फसलें और वनों से आच्छादित पहाडि़यों की शृंखलाएं नजर आ रही थीं.

बड़ा ही मनोरम दृश्य था. मेरा मन अनायास ही उमंग से भर उठा. लगा जैसे सुनयना का साथ दे कर मैं भी कोई गीत गुनगुनाऊं. पर अचानक नीतू का खयाल आते ही मैं फिर से गंभीर हो उठा. मैं ने मन ही मन सोचा कि मुझे नीतू के बारे में सुनयना को स्पष्ट बता देना चाहिए. पर पता नहीं क्यों मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा. बहुत कोशिश के बाद, किसी तरह खुद को संयत करते हुए मैं ने कहा, ‘‘सुनयनाजी, मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘जी…’’ शायद सुनयना ठीक से सुन नहीं पाई थी.

मैं ने मोटरसाइकिल की गति, धीमी करने के बाद, फिर से कहा, ‘‘मैं आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कोई सीरियस बात है?’’ सुनयना कुछ इस तरह मजाकभरे लहजे में बोली, जैसे मेरे जज्बातों से वह अच्छी तरह वाकिफ हो.

मगर मैं जो कहने जा रहा था, शायद उस से उस का दिल टूट जाने वाला था. सो मैं ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘मैं आप को जो बताने जा रहा हूं, मैं ने आज तक किसी से नहीं कहा है. दरअसल, मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. उस लड़की का नाम नीतू है. वह मेरे साथ पढ़ती थी. हम दोनों एकदूसरे को बहुत चाहते हैं और मैं उसी से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘आप कहीं मजाक, तो नहीं कर रहे…’’ सुनयना को मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ.

‘‘यह मजाक नहीं, सच है,’’ मैं ने फिर गंभीर हो कर कहा, ‘‘मैं यह बात बहुत पहले सब को बता देना चाहता था पर कभी हिम्मत नहीं कर पाया. दरअसल, मैं इस बात से डर जाता था कि कहीं घर वाले यह न समझ लें कि मैं पढ़नेलिखने की उम्र में भटक गया हूं. पर अब मेरे सामने कोई मजबूरी नहीं है. मैं अपने पैरों पर खड़ा हो चुका हूं.‘‘

‘‘शशिजी, आप सचमुच बहुत भोले हैं,’’ इस बार सुनयना के लहजे में भी गंभीरता थी, वह मुसकराने का प्रयास करती हुई बोली, ‘‘एक तरफ आप प्यार की बातें करते हैं और दूसरी तरफ रिऐक्शन के बारे में भी सोचते हैं. ये बात आप को बहुत पहले सब को बता देनी चाहिए थी. मुझे पूरी उम्मीद है कि आप की पसंद सब को पसंद आएगी. फिर बात जब शादी की हो तो मेरे विचार से अपने दिल की ही बात सुननी चाहिए. चूंकि यह पल दो पल का खेल नहीं, जिंदगीभर का सवाल होता है.’’ सुनयना सहजता से बोल गई. ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे मन की बात जान कर उसे कोई खास फर्क न पड़ा हो.

इस तरह उस के सहयोगात्मक भाव से मेरे दिल का बोझ जो एक तरह से उस को ले कर था, उतरता चला गया.

सुनयना को घर छोड़ कर लौटते वक्त मेरे मन में हलकापन था. लेकिन अंदर कहीं एक खामोशी भी छाई हुई थी. पता नहीं क्यों? सुनयना की आंखों से जो दर्द, विदा लेते वक्त झलका था, मुझे बारबार अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

रात को खाना खा कर मैं जल्दी ही बिस्तर पर लेट गया क्योंकि सुबह किसी भी हालत में मुझे नीतू के  पास जाना था. लेकिन नींद आ ही नहीं रही थी. बस करवटें बदलता रहा. मन में तरहतरह के विचार आजा रहे थे. इसी उधेड़बुन में कब नींद आ गई, पता ही न चला.

सुबह घर के सामने स्थित पीपल के पेड़ से आ रही चिडि़यों की चहचहाट से मेरी नींद खुली. चादर हटा कर देखा, प्र्रभात की लाली खिड़की में लगे कांच से छन कर कमरे के अंदर आ रही है. आज शायद मैं देर से सोने के बावजूद जल्दी उठ गया था क्योंकि देर होने पर मां जगाने जरूर आती थीं. मैं उठ कर चेहरे पर पानी छिड़क कर, कुल्ला कर के अपने कमरे से निकला.

बैठक में मेज पर अखबार पड़ा हुआ था. आदतन अखबार ले कर कुरसी पर बैठ गया और हमेशा की तरह खबरों की हैडलाइन पढ़ते हुए अखबार के पन्ने पलटने लगा. तभी अचानक मेरी नजर अखबार में छपी एक खबर पर अटक गई. मोटेमोटे अक्षरों में लिखा था, ‘थाना परिसर में प्रेमीप्रेमिका परिणयसूत्र में बंधे.’ हैडलाइन पढ़ कर मेरा दिल धक से रह गया, ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,‘ मैं ने सोचा.

खबर कोई अनोखी या विचित्र थी, ऐसी बात न थी, लेकिन जो तसवीर छपी थी मैं ने एक दीर्घ श्वास ले कर पढ़ना शुरू किया. वह नीतू ही थी. खबर में उस के घर का पताठिकाना स्पष्ट रूप से लिखा था. यहां तक कि वह लड़का भी उस के मामा  के महल्ले का ही था. दोनों के बीच 2 साल से प्रेम चल रहा था. घर वालों के विरोध के चलते दोनों भाग कर थाने आ गए थे.

खबर पढ़ कर मैं सन्न रह गया. मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि नीतू ऐसा कर सकती है. मैं ने मन ही मन अपनेआप से ही प्रश्न किया, ‘अगर इस लड़के के साथ, यह उस का प्रेम है तो 4-5 साल पहले मेरे साथ जो हुआ था, वह क्या था? क्या 4-5 साल का अंतराल किसी के दिल से किसी की याद, किसी का प्यार भुला सकता है? मैं उसे हर दिन, हर पल याद करता रहा, उस की तसवीर अपने सीने से लगाए रहा और उस ने मेरे बारे में तनिक भी न सोचा. क्या प्यार के मामले में भी किसी का स्वभाव ऐसा हो सकता है कि उस पर विश्वास करने वाला अंत में बेवकूफ बन कर रह जाए? मैं ने तो अब तक सुना था, प्यार का दूसरा नाम, इंतजार भी होता है पर उस ने मेरा इंतजार नहीं किया.’

 

ई. एम. आई

भरम न पालें, लक्षदीप है आदिवासियों का गढ़

जब से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अगले राष्ट्रपति पद के लिए द्रौपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार बनाया है, तब से सोशल मीडिया पर आदिवासियों के बारे में तमाम तरह की जानकारियां सामने आने लगी हैं. ऐसा होना जायज भी है, क्योंकि द्रौपदी मुर्मू देश की ऐसी पहली महिला राष्ट्रपति होंगी, जिन का जन्म भारत की आजादी के बाद हुआ है.

64 साल की द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून, 1958 को ओडिशा में हुआ था. एक आदिवासी परिवार में जनमी द्रौपदी मुर्मू एक जीवट महिला हैं और उन्होंने अपने पारिवारिक कष्टों को बड़ी हिम्मत से झेलते हुए देश और समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है.

चूंकि द्रौपदी मुर्मू के साथ ‘आदिवासी’ शब्द जुड़ा है और वे आदिवासी बहुल राज्य ओडिशा से आती हैं, तो देश के आम लोगों के मन में यह जिज्ञासा पैदा होना स्वाभाविक है कि देश के किस राज्य में कितने प्रतिशत आदिवासी रहते हैं या वे मूल निवासी हैं? वैसे, लोगों की यह भी आम धारणा है कि ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य ही आदिवासी बहुल हैं, पर अगर आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो आप चौंक जाएंगे.

साल 2011 की जनसंख्या गणना के आधार पर देश में आदिवासियों की आबादी के प्रतिशत की बात करें तो लक्षदीप पहले नंबर पर है. वहां 94.8 प्रतिशत आदिवासी आबादी रहती है. दूसरे नंबर पर मिजोरम है जहां 94.4 प्रतिशत ऐसी आबादी वहां की रहवासी है. फिर नगालैंड में 86.5, मेघालय में 86.1 और अरुणाचल प्रदेश में 68.8 प्रतिशत आबादी आदिवासी समाज की है.

इस के बाद नंबर आता है दादर नगर हवेली का जहां 52 प्रतिशत आदिवासियों का घर है. फिर मणिपुर में 35.1, सिक्किम में 33.8 और त्रिपुरा में 31.8 प्रतिशत आदिवासी आबादी बसी हुई है. मतलब टौप 10 में पूर्वोत्तर राज्यों का दबदबा है. आगे बारी आती है छत्तीसगढ़ की जहां 30.6 प्रतिशत आदिवासी रहते हैं, जबकि झारखंड में 26.2 और ओडिशा में 22.8 प्रतिशत इस जमात के लोग रहते हैं.

इस के बाद मध्य प्रदेश में 21.1, गुजरात में 14.8, राजस्थान में 13.5, असम में 12.4, जम्मूकश्मीर में 11.9, महाराष्ट्र में 9.4, अंडमान निकोबार में 7.5, आंध्र प्रदेश में 7 और हिमाचल प्रदेश में 5.7 प्रतिशत आबादी आदिवासी समाज की है.

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