सिद्धू मूसेवाला मर्डर: शांत पंजाब में गोलियों की गूंज

पिछले कुछ समय से पंजाब सुर्खियों में रहा है. 3 कृषि कानूनों का विरोध सब से पहले इसी राज्य में हुआ था, जो एक किसान से दूसरे किसान तक होते हुए देशभर में फैल गया था. बाद में किसानों की जिद और जुनून के आगे नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार का अडि़यल रवैया घुटने टेक गया था और उस ने वे तीनों कृषि कानून वापस ले लिए थे.

पंजाब में तो कांग्रेस सरकार की चूलें तक हिल गई थीं. नतीजतन, हालिया विधानसभा चुनाव में प्रदेश से तो कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने वहां ऐतिहासिक जीत हासिल की और फिर भगवंत मान की नई सरकार ने कई वीआईपी लोगों की सिक्योरिटी में कटौती करनी शुरू कर दी.

पंजाबी गायक और कांग्रेस से जुड़े सिद्धू मूसेवाला को भी सरकार के इस फैसले का शिकार होना पड़ा था, पर उन्हें इस बात की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, यह तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था.

शनिवार, 28 मई, 2022 को सिद्धू मूसेवाला की सरकारी सिक्योरिटी हटाई गई थी या कम कर दी गई थी और अगले ही दिन रविवार, 29 मई, 2022 को सरेआम की गई फायरिंग में सिद्धू मूसेवाला को मौत के घाट उतार दिया गया. यह वारदात मानसा जिले के गांव जवाहरके में हुई थी.

खबरों के मुताबिक, सिद्धू मूसेवाला अपने 2 साथियों के साथ गाड़ी से कहीं जा रहे थे. इसी बीच काले रंग की गाड़ी में आए 2 हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं. 30 राउंड फायरिंग में से 20 से ज्यादा गोलियां उन्हें लगी थीं.

अगर सिद्धू मूसेवाला के रुतबे की बात करें, तो साल 2020 में उन्हें ‘द गार्जियन’ द्वारा 50 नए कलाकारों में नौमिनेशन मिला था. पर उन का यह सफर इतना आसान भी नहीं रहा. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत मशहूर गाने ‘लाइसैंस’ में बतौर लिरिक्स राइटर से की थी. इस गाने को निंजा ने गाया था.

सिद्धू मूसेवाला ने बतौर गायक अपने कैरियर की शुरुआत ‘जी वेगन’ से की थी. इस के बाद उन्होंने ब्राउन बौयज संग कई गानों पर काम किया था.

विवादित रहे मूसेवाला

सिद्धू मूसेवाला का असली नाम शुभदीप सिंह सिद्धू है. उन का जन्म 11 जून, 1993 को हुआ था. चूंकि वे मानसा जिले के मूसा गांव के रहने वाले थे, इसलिए उन का नाम सिद्धू मूसेवाला पड़ गया.

नौजवान तबके में मशहूर सिद्धू मूसेवाला अपने गानों में गन कल्चर को बढ़ावा देने के चलते विवादों में रहे थे. मई, 2020 में उन के 2 वीडियो वायरल हुए थे, जिन में वे बंदूक के साथ नजर आए थे. इन में से एक वीडियो में वे एके-47 राइफल के साथ ट्रेनिंग लेते नजर आए थे.

सिद्धू मूसेवाला का एक गाना ‘पंज गोलियां’ आया था. विवाद के बाद पंजाब पुलिस ने उन के खिलाफ आर्म्स ऐक्ट में हिंसा व बंदूक संस्कृति को बढ़ावा देने के मामले में केस दर्ज किया था.

खालिस्तान का समर्थन करने के मामले में भी सिद्धू मूसेवाला विवादों में रहे. दिसंबर, 2020 में उन का गाना ‘पंजाब : माय मदरलैंड’ आया था, जिस में वे खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले का समर्थन करते दिखे थे.

हत्या की वजह

पंजाब सरकार इस हत्याकांड को गैंगवार का नतीजा बता रही है. साथ ही, यह भी कह रही है कि उस ने उन की सिक्योरिटी हटाई नहीं, बल्कि कम की थी. सवाल उठता है कि कोई गायक किसी गैंगवार से कैसे जुड़ा हो सकता है?

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ की छात्र राजनीति में उभरे गैंगस्टर लौरैंस बिश्नोई की पंजाब में दविंदर बंबीहा ग्रुप से गैंगवार चल रही है. लौरैंस बिश्नोई ग्रुप ने ही इस हत्याकांड की जिम्मेदारी ली है.

बता दें कि लौरैंस बिश्नोई फिलहाल जेल में बंद है और जेल से ही अपने गैंग को चला कर रहा है.

अफवाहों की सुनें, तो सिद्धू मूसेवाला बिश्नोई गैंग के विरोधी कैंप को सपोर्ट कर रहा था. याद रहे कि 8 अगस्त, 2021 को मोहाली में दिनदहाड़े उस विक्की मिद्दुखेड़ा की हत्या की गई थी, जो लौरैंस बिश्नोई का बेहद करीबी था. इस हत्याकांड में सिद्धू मूसेवाला के मैनेजर शगनप्रीत सिंह का नाम सामने आया था.

पुलिस मैनेजर शगनप्रीत सिंह तक पहुंच पाती, उस के पहले ही वह भारत से फरार हो कर आस्ट्रेलिया पहुंच गया था. पंजाब पुलिस ने उस के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया हुआ है.

कनाडा में बैठे लौरैंस बिश्नोई के करीबी गोल्डी बराड़ ने दावा किया है कि विक्की मिद्दुखेड़ा के अलावा उस के खुद के भाई गुरुलाल बराड़ की हत्या के पीछे भी सिद्धू मूसेवाला था, लेकिन अपने रसूख के दम पर वह बच गया था.

इन पर भी हुआ हमला

साल 2018 में पंजाब के मशहूर गायक परमीश वर्मा पर हमला हुआ था. उन पर मोहाली में गोली चली थी, जो उन के घुटने में लगी थी. यह जानलेवा हमला फिरौती के लिए किया गया था और इस का आरोप गैंगस्टर दिलप्रीत बावा पर लगा था, जिस पर केस भी चल रहा है.

साल 1996 में उस दौर के मशहूर गायक दिलशाद अख्तर को भी पंजाब में अपराधियों ने अपना निशाना बनाया था. ऐसा माना जाता है कि एक कार्यक्रम के दौरान एक शख्स ने उन से पंजाबी गायक हंसराज ‘हंस’ का गाना ‘नची जो साड्डे नाल’ गाने को कह दिया, पर दिलशाद ने इसे गाने से मना कर दिया, क्योंकि यह गीत उन का गाया हुआ नहीं था.

दिलशाद अख्तर के मना करने पर वह शख्स नाराज हो गया और उस ने एक बौडीगार्ड से बंदूक छीन कर दिलशाद को गोली मार दी, जिस से दिलशाद की मौके पर ही मौत हो गई थी.

90 के दशक में पंजाब में बेहद चर्चित गायक, गीतकार, संगीतकार अमर सिंह ‘चमकीला’ और उन की पत्नी अमरजोत 8 मार्च, 1988 को अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे कि उस वक्त उन पर हमला हो गया था और अपराधियों ने उन्हें गोली मार दी थी.

पैसा और पावर

सिद्धू मूसेवाला की बात करें, तो फिलहाल वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे और पैसे से भी ताकतवर थे. उन का लाइफ स्टाइल चकाचौंध कर देने वाला था. हाल ही में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में सिद्धू मूसेवाला ने जो हलफनामा दायर किया था, उस में उन्होंने बताया था कि उन के पास जीप, एसयूवी और टोयोटा फौर्च्यूनर जैसी गाडि़यां हैं. इस के अलावा उन के पास काले और सफेद रंग की रेंज रोवर गाड़ी भी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, सिद्धू मूसेवाला नाइट क्लब में एक शो के लिए बतौर फीस 6-8 लाख रुपए लेते थे, वहीं लाइव शो के लिए उन की फीस 15 से 20 लाख रुपए थी.

इतनी दौलत पाने के लिए सिद्धू मूसेवाला ने यकीनन काफी मेहनत की होगी, पर अगर वे सच में किसी गैंगवार का हिस्सा थे तो यह चिंता की बात है.

इस तरह की वारदातें उस पंजाब के लिए भी खतरे की घंटी हैं, जो पिछले कई सालों से शांत बना हुआ था. ड्रग्स और खालिस्तान की जड़ें अभी वहां से उखड़ी नहीं हैं, उस पर किसी नामी कलाकार की हत्या होना देश और समाज के लिए कोई अच्छा संदेश नहीं है.

यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब सिद्धू मूसेवाला की हत्या के कुछ घंटे बाद ही खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख्स फार जस्टिस के प्रमुख गुरुपतवंत सिंह पन्नू द्वारा पंजाबी गायकों को धमकी दी जाती है और उन से ‘खालिस्तानी मूवमैंट’ का समर्थन करने को कहा जाता है.

आईपीएल, 2022: खिलाड़ी हों या दर्शक सब पैसे के यार

आईपीएल, 2022; खिलाड़ी हों या दर्शक सब पैसे के यार इंडियन प्रीमियर लीग में इस साल 2 नई टीमों की ऐंट्री हुई थी, गुजरात टाइटंस और लखनऊ सुपर जाइंट्स. दोनों टीमों ने उम्दा खेल दिखाया, पर गुजरात टाइटंस ने तो नया इतिहास ही रच दिया. रविवार, 29 मई, 2022 की शाम को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में उस ने राजस्थान रौयल्स को हरा कर खिताब अपने नाम कर लिया. पैसे की बरसात इस जीत के साथ खिलाडि़यों के साथसाथ टीमों की भी बल्लेबल्ले हो गई.

इस जीत के साथ गुजरात टाइटंस को चमचमाती ट्रौफी के अलावा 20 करोड़ रुपए मिले, तो उपविजेता राजस्थान रौयल्स को साढ़े 12 करोड़ रुपए मिले. तीसरे नंबर पर रहने वाली रौयल चैलेंजर्स बैंगलोर के हाथ 7 करोड़ रुपए आए, तो चौथे नंबर की लखनऊ सुपर जाइंट्स को साढ़े 6 करोड़ रुपए मिले. खिलाडि़यों की बात करें, तो ‘इमर्जिंग प्लेयर औफ द सीजन’ उमरान मलिक को 10 लाख रुपए का इनाम मिला. ‘सिक्सेज औफ द सीजन’ का खिताब जीतने वाले जोस बटलर ने भी 10 लाख रुपए बटोरे. ‘सुपर स्ट्राइकर औफ द सीजन’ बने दिनेश कार्तिक ने टाटा कंपनी की ‘पंच’ कार जीती. इस आईपीएल में 157.3 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गेंद फेंक कर ‘फास्टैस्ट डिलीवरी औफ द सीजन’ का खिताब जीतने वाले लौकी फर्गुसन को भी 10 लाख रुपए मिले.

इसी तरह ‘फोर्स औफ द सीजन’ बने जोस बटलर को 10 लाख रुपए, ‘पर्पल कैप’ अपने नाम करने वाले यजुवेंद्र चहल को 10 लाख रुपए, ‘औरेंज कैप’ पहनने वाले जोस बटलर को 10 लाख रुपए, ‘बैस्ट कैच औफ द सीजन’ पकड़ने वाले एविन लुइस को 10 लाख रुपए के अलावा ‘मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर’ बने जोस बटलर को 10 लाख रुपए बतौर इनाम दिए गए. खेल नहीं तमाशा आज से तकरीबन 15 साल पहले साल 2008 में जब पहली बार क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग को भारत में कराया गया था,

तब इसे खेल के नाम पर तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं समझा गया था और साथ ही यह शक भी जताया गया था कि क्रिकेट खेलने वाले देशों के खिलाडि़यों की बोली लगा कर उन के जमावड़े से खेल या किसी और को कोई फायदा होगा भी या नहीं? पर, आज जब साल 2022 में आईपीएल का 15वां सीजन खत्म हो चुका है, तो यही बात पल्ले पड़ी है कि बाजार भी अब क्रिकेट को पूरी तरह निगल चुका है. दुनिया भले ही कोरोना की महामारी या रूसयूक्रेन की भीषण लड़ाई से जूझ रही हो, भारत में हिंदूमुसलिम के नाम पर नफरत फैलाई जा रही हो, महंगाई अपनी हद पर हो,

पर मजाल है कि सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के दलदल में सने इस खेल पर जरा सी भी आंच आई हो. हालिया सीजन पर बात करते हैं. अगर 2 दिग्गज टीमों मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपर किंग्स के आंकड़ों पर नजर डालें, तो इन दोनों टीमों ने इस सीजन में जबरदस्त तरीके से निराश किया. दोनों पौइंट टेबल पर सब से निचले पायदान पर रहीं. चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान रविंद्र जडेजा को भी बीच में कप्तानी से हटा कर उन की जगह महेंद्र सिंह धौनी को कमान सौंपी गई थी. मुंबई इंडियंस को ले कर तो खूब मीम बने. एक जनाब ने तो यह तक कह दिया कि अंबानी की टीम को किसानों की हाय लग गई. हाय तो उन लोगों की भी लगी होगी, जो आईपीएल मैचों पर सट्टा लगा कर राजा से रंक हो गए. अब तो हद यह हो गई है कि टैलीविजन और दूसरे मीडिया में इस तरह के गेमिंग एप के इश्तिहार आ रहे हैं, जो सीधेसीधे कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की बात करते हैं.

इन में अपनी टीम बनाओ, खेलो और खूब इनाम जीतो. यहां एक दिन में लखपति बनने के सपने दिखाए जाते हैं, जहां कई तरह के गेम खेल कर लोग अपनी किस्मत आजमाते हैं और जब लत लग जाती है, तो खुद को लुटापिटा महसूस करते हैं. सट्टेबाजी हावी है सट्टेबाजी तो इस खेल को दीमक की तरह चाट रही है. 29 मई, 2022 को गुजरात के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में आईपीएल फाइनल मैच को ले कर जबलपुर में आईजी उमेश जोगा ने पुलिस अधीक्षकों को अलर्ट मोड में रहने के निर्देश दिए थे. इसी के तहत शनिवार, 28 मई, 2022 की दोपहर को ओमती पुलिस ने मुसकान हाइट्स पर छापेमारी की और वहां से तकरीबन 70 लाख रुपए की नकदी जब्त की गई. इस के साथ ही वहां से अनेक डायरियां, बैंक की पासबुक और मोबाइल फोन मिले. बताया जा रहा है कि वहां से पकड़े गए इंदर सिंह और आकाश गोगिया बड़े लैवल पर आईपीएल का सट्टा चला रहे थे.

हरियाणा के करनाल जिले में शुक्रवार, 27 मई, 2022 को रौयल चैलेंजर्स बैंगलोर और राजस्थान रौयल्स के बीच चल रहे मैच पर लाइव सट्टा खिलाने वाले एक शख्स को पुलिस ने पकड़ा था. पुलिस ने बताया कि धीरज उर्फ हन्नी करनाल के सैक्टर 32 में साथियों के साथ मिल कर अपने ही मकान में डैल्टा ऐक्सचेंज एप पर औनलाइन आईपीएल क्रिकेट मैच पर सट्टा लगवाने का काम कर रहा था. ये तो महज 2 राज्यों की 2 खबरें बताई गई हैं. सच तो यह है कि सट्टेबाजी की आग पूरे देश या कहें सारी दुनिया में लगी हुई है. हैरानी की बात यह है कि आग लगाने वाले सट्टेबाज अपने हाथ और जेबें दोनों सेंक रहे हैं, जबकि सट्टेबाजी में पैसा लगाने वाले झुलस रहे हैं.

भगवा रंग में रंगे मध्य प्रदेश की एक खबर को खंगालते हैं. वहां आईपीएल क्रिकेट मैचों पर सट्टा लगाते हुए एक पोस्टमास्टर ने एक करोड़ रुपए गंवा दिए. आरोप है कि उस पोस्टमास्टर ने सट्टेबाजी के लिए 2 दर्जन परिवारों की एक करोड़ रुपए की सेविंग को दांव पर लगाया था. इन परिवारों का फिक्स्ड डिपौजिट का पैसा सागर जिले के एक उपडाकघर में जमा किया जाना था. बीना उपडाकघर के पोस्टमास्टर विशाल अहिरवार को 20 मई, 2022 को बीना राजकीय रेलवे पुलिस ने गिरफ्तार किया था. लत है गलत पैसा कमाने की यह लत नशे की लत से भी ज्यादा खतरनाक होती है. नशे की जद में कोई एक आ कर अपनी सेहत और पैसे का नुकसान करता है,

जबकि पैसे की लत दूसरे अपराधों के रास्ते भी खोल देती है, फिर वह कोई नामी खिलाड़ी हो या दर्शक गर्त में गिरता चला जाता है. आप को आईपीएल का छठा सीजन तो याद होगा, जब उस में मैच फिक्सिंग का बम फूटा था. राजस्थान रौयल्स टीम के 3 खिलाड़ी एस. श्रीसंत, अंकित चह्वाण और अजीत चंदीला इस में फंसे थे और दिल्ली पुलिस ने इन तीनों को सट्टेबाजों से मिले होने के चलते गिरफ्तार किया था. बीसीसीआई के तब के अध्यक्ष और चेन्नई सुपर किंग्स टीम के प्रिंसिपल एन. श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मरियप्पन को भी धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

राजस्थान रौयल्स के मालिक और बौलीवुड हीरोइन शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा ने भी उस दौरान आईपीएल मैचों में सट्टेबाजी की बात कबूल की थी. इसी के चलते राजस्थान रौयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स को 2 साल के लिए आईपीएल से बैन कर दिया था. लेकिन जब कोई आम आदमी अपनी जमापूंजी सट्टे में लगा देता है और सबकुछ गंवा बैठता है, तो पूरे परिवार को उस का नुकसान भुगतना पड़ता है. लिहाजा, ऐसे नाजायज पैसों की यारी से बचें. खिलाड़ी हों या दर्शक, खेल को खेल ही रहने दें, पैसों का तालाब न बनाएं, क्योंकि वह तालाब कब दलदल बन जाएगा, आप को खबर तक नहीं लगेगी.

मैं शादी के बाद सैक्स को ले कर डरी हुई हूं. क्या महिलाओं में सैक्स संबंधी समस्याएं होती हैं?

सवाल…

मेरी उम्र 21 साल है और जल्द ही शादी होने वाली है. मैं शादी के बाद सैक्स को ले कर डरी हुई हूं. क्या महिलाओं में सैक्स संबंधी समस्याएं होती हैं? क्या इन का उपचार संभव है?

जवाब…

शादी के बाद सैक्स को ले कर आप नाहक डरी हुई हैं. सैक्स संबंध कुदरती प्रक्रिया है. महिलाओं में भी सैक्स समस्याएं हो सकती हैं जैसे सैक्स संबंध के समय योनि में दर्द, चरमसुख का अभाव, उत्तेजना में कमी आदि. मगर पुरुषों की ही तरह महिलाओं की सैक्स समस्याओं का भी निदान संभव है. आप के लिए बेहतर यही है कि इन सब बातों से डरे बगैर खुद को शादी के लिए तैयार करें

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मैं 23 साल की हूं. मेरे पति सेक्स करना चाहते हैं पर मैं नहीं कर पा रही, क्या करूं?

सवाल…

मैं 23 साल की महिला हूं. मेरा डेढ़ साल का एक बच्चा है. शादी के बाद से ही पति मेरे साथ सैक्स संबंध को ले कर संतुष्ट नहीं रहते हैं. वे नियमित सैक्स करना चाहते हैं जबकि घर और बच्चे की देखभाल से मैं बेहद थक जाती हूं और रात में जल्द ही मुझे नींद आ जाती है. पति मुझे बहुत प्यार करते हैं, इसलिए मैं उन्हें नाराज भी नहीं देख सकती. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब…

बच्चे पैदा होने के बाद सैक्स संबंध को ले कर महिलाएं आमतौर पर उदासीन हो जाती हैं, जबकि बच्चों की परवरिश के साथसाथ पति के साथ सैक्स संबंध दांपत्य जीवन को खुशहाल बनाता है. इस में कोई दोराय नहीं कि एक गृहिणी घर और बच्चों की देखभाल में इतनी व्यस्त रहती है कि खुद के लिए भी समय नहीं निकाल पाती. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आप घर के कामों को पति के साथ बांट लें. घर की साफसफाई, कपड़े धोना आदि कार्य प्यार से पति से करा सकती हैं. इस से आप पर काम का बोझ ज्यादा नहीं पड़ेगा. इस से न केवल आप खुद के लिए वक्त निकाल पाएंगी, बल्कि पति के साथ भी ज्यादा समय बिताने को मिलेगा. फिर जैसाकि आप ने बताया कि आप का बच्चा अब डेढ़ साल का हो चुका है और अब आप शारीरिक रूप से फिट भी हो चुकी हैं, तो ऐसे में सैक्स संबंध का लुत्फ उठा सकती हैं.

कंगना राणावत : ‘धाकड़ गर्ल’ से कहीं ‘धड़ाम गर्ल’ न हो जाए

यह पंगेबाज हीरोइन कुछ समय पहले (साल 2021 में) कंगना राणावत ने फिल्म ‘थलाइवी’ में अपने जमाने की मशहूर दक्षिण भारतीय हीरोइन जे. जयललिता का किरदार निभाया था. वही जे. जयललिता, जिन्हें उन के गुरु एमजी रामचंद्रन ने राजनीति में शामिल होने के लिए बढ़ावा दिया था. पर, यह कोई तेज रफ्तार वाला खाली हाईवे नहीं था कि उस पर दौड़ कर जे.

जयललिता को मर्दों के दबदबे वाली राजनीति की मंजिल आसानी से मिल गई थी, बल्कि उन्हें अपनी दमदार इमेज बनाने के लिए बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. कंगना राणावत और जे. जयललिता में बहुत सारी खूबियां मिलतीजुलती हैं. वे दोनों परदे पर और परदे के पीछे मर्दों से लोहा लेने वाली महिलाएं मानी जाती हैं. कंगना राणावत तो इतनी ज्यादा बोल्ड और मुंहफट हैं कि वे किसी को नहीं बख्शती हैं, फिर वह कोई नेता हो या फिल्म कलाकार. लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ है, बल्कि अगर हम कंगना राणावत के फिल्मों में आने के पहले की जिंदगी पर नजर डालेंगे तो पता चल जाएगा कि वे शुरू से ही विद्रोही किस्म की लड़की रही हैं.

कंगना राणावत का जन्म 23 मार्च, 1987 को हिमाचल प्रदेश के भांभला इलाके में एक राजपूत परिवार में हुआ था. उन के पिता का नाम अमरदीप और मां का नाम आशा है. उन की एक बड़ी बहन भी हैं, जिन का नाम रंगोली है और वे ही कंगना का सारा कामकाज भी संभालती हैं. एक छोटा भाई है, जिस का नाम अक्षत है. कंगना राणावत डीएवी स्कूल, चंडीगढ़ से पढ़ी हैं. पिता उन्हें डाक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन कंगना को पढ़ाईलिखाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी, बल्कि उन्हें तो ऐक्टिंग करना पसंद था. 12वीं क्लास में एक सब्जैक्ट में फेल होने के बाद वे अपने परिवार की मरजी के खिलाफ हिमाचल प्रदेश से दिल्ली आ गई थीं. पर कंगना राणावत के सामने यह सवाल भी था कि दिल्ली में आगे करना क्या है? चूंकि ऐक्टिंग में नाम कमाना था.

लिहाजा, कंगना ने एक थिएटर ग्रुप जौइन कर लिया. पर यह समय काफी जद्दोजेहद भरा था, क्योंकि उन के पास न रहने के लिए घर था और न ही पैसे थे. अपने मुफलिसी के दिनों के बारे में कंगना राणावत ने एक इंटरव्यू में कहा था कि स्ट्रगल के दौर में उन्होंने कई बार सिर्फ ब्रैड या रोटीअचार खा कर ही दिन गुजारे हैं, क्योंकि उन्हें अपने पिता से पैसे से जुड़ी कोई मदद नहीं मिलती थी. पिता नहीं चाहते थे कि कंगना फिल्मों में काम करे. इस के बाद उन दोनों के रिश्ते में खटास आ गई थी. ऐसे मिली पहली फिल्म ‘गैंगस्टर’ किसी मशहूर कलाकार का मानना है कि मुंबई में अगर मेहमान बन कर आओगे,

तो वह तुम्हें अच्छे से खिलापिला कर विदा कर देगी, पर अगर वहां अपने नाम का डंका बजवाना है, तो खूंटा गाड़ कर बैठना होगा खासकर फिल्म लाइन में तो यही करना पड़ता है. कंगना राणावत के सामने भी यही चुनौती थी. साल 2006 में कंगना राणावत की पहली फिल्म ‘गैंगस्टर’ रिलीज हुई थी. इस फिल्म के लिए उन्हें ‘बैस्ट डैब्यू ऐक्ट्रैस’ का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था. इतना ही नहीं, इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी की तरह ‘ट्रैजिडी क्वीन’ कहा जाने लगा था. पर यह कोई ड्रीम शुरुआत नहीं थी, क्योंकि कंगना राणावत को फिल्म ‘गैंगस्टर’ में सिमरन का रोल इतनी आसानी से नहीं मिला था.

कई साल पहले उन्होंने फिल्म कलाकार अनुपम खेर के चैट शो ‘कुछ भी हो सकता है’ में फिल्म ‘गैंगस्टर’ उन्हें कैसे मिली, इस बात का जिक्र किया था. तब कंगना राणावत ने कहा था, ‘‘मैं ने सोचा था कि मुंबई में एक महीने का समय स्ट्रगल के लिए काफी होगा और मैं फिल्मों के लिए आडिशन दे दूंगी, जिस से मेरे लिए कुछ रास्ते खुलेंगे. ‘‘मैं एक बार 10-15 लड़कियों के साथ एक शूट पर बैठी थी, तभी मेरी मुलाकात एक एजेंट से हुई जो मुझे महेश भट्ट के औफिस ले गया. मैं मोहित सूरी से मिली और अनुराग बसु ने मेरी तसवीरें देखीं. इस के बाद मैं ने ‘गैंगस्टर’ के रोल के लिए आडिशन दिया. ‘‘लेकिन भट्ट साहब (महेश भट्ट) ने कहा, ‘यह लड़की बहुत यंग है,

शायद 17-18 साल की. हमें एक मैच्योर लेडी की जरूरत है, जिस की उम्र 28-29 साल की होनी चाहिए.’ ‘‘इस के बाद सुनने में आया कि उन्होंने फिल्म के लिए शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह को साइन कर लिया है. ‘‘पर अचानक 2 महीने के बाद अनुराग बसु ने मुझे फोन किया और कहा कि हमें एक आउटडोर शूट के लिए तुरंत तुम्हारी जरूरत है, क्योंकि हम चित्रांगदा सिंह से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. हम तुम्हारा मेकअप ऐसे करेंगे, जिस से तुम थोड़ी मैच्योर लगो. अब केवल तुम ही हमारी फिल्म कर सकती हो और इस तरह मुझे ‘गैंगस्टर’ मिली.’’ ‘कंट्रोवर्सी क्वीन’ बनती गईं आज भले ही कंगना राणावत को कला के क्षेत्र में भारत के चौथे सब से सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जा चुका है और वे 3 बार फिल्मों का नैशनल अवार्ड अपने नाम कर चुकी हैं,

पर उन का नाता विवादों से भी खूब रहा है. अपने फिल्म कैरियर के शुरुआती दिनों में ही कंगना राणावत अपने से 20 साल बड़े और शादीशुदा आदित्य पंचोली के साथ रिश्ते में आ गई थीं. वही आदित्य पंचोली, जिन का बेटा सूरज पंचोली हीरोइन जिया खान की संदिग्ध मौत के मामले में बदनाम हुआ था. कंगना राणावत आदित्य पंचोली के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रही थीं. पर बाद में उन्होंने आदित्य पंचोली पर मारपीट और गालीगलौज करने के आरोप लगाए थे और उन से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया था, जबकि आदित्य पंचोली ने खुद पर लगे आरोपों को पूरी तरह से बेबुनियाद बताया था. साल 2009 में शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन ने फिल्म ‘राज-द मिस्ट्री कंटीन्यूज’ में काम किया था, जिस में कंगना राणावत भी थीं. फिल्म तो ज्यादा नहीं चली थी, पर इन दोनों का प्यार तब सुर्खियां बनाते हुए परवान चढ़ने लगा था. तब कंगना राणावत ने अध्ययन सुमन की तुलना अपने जमाने के हैंडसम हीरो शशि कपूर से की थी.

पर जल्दी ही इस रिश्ते में तल्खियां आ गई थीं और ब्रेकअप के बाद अध्ययन सुमन ने कंगना राणावत पर कई सनसनीखेज आरोप लगाए थे. उन्होंने बताया था कि कंगना उन के साथ मारपीट और बदतमीजी करती थीं. एक फिल्मफेयर नाइट से पहले कंगना ने उन्हें गंजा करा दिया था और बोली थीं कि तुम्हें नए स्टाइल की जरूरत है. बात यहीं तक नहीं थमी थी. अध्ययन सुमन ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘‘एक बार कंगना मुझे एक ज्योतिषी के पास ले गई. उस ने मुझे कमरे में बंद कर के कुछ मंत्र पढ़ने को कहा. ‘‘मुंबईलंदनन्यूयौर्क में पलाबढ़ा मैं इन सब बातों को नहीं मानता था. बाद में एक टैरो कार्ड रीडर ने बताया कि मैं किसी पहाड़ी इलाके के काले जादू के असर में हूं..

.’’ साल 2016 में एक इंटरव्यू में अध्ययन सुमन ने कहा था, ‘‘साल 2008 के मार्च में होटल ‘द लीला’ में की गई अपनी बर्थडे पार्टी में कंगना ने अपने सभी कलीग्स को बुलाया था. उस ने कहा था, ‘चलो, आज रात कोकीन लेते हैं.’ ‘‘मैं ने इस से पहले उस के साथ कुछेक बार हैश पीया था और मुझे वह पसंद नहीं आया था, इसलिए मैं ने मना कर दिया था. मुझे याद है कि उस रात इसी बात को ले कर मेरा उस से काफी झगड़ा हुआ था.’’ रितिक के साथ तगड़ा झमेला साल 2010 में रितिक रोशन और कंगना राणावत की फिल्म ‘काइट’ आई थी, जो सुपर फ्लौप हुई थी. पर इन दोनों के प्यार की पतंग तो शायद साल 2009 से आसमान में उड़ चुकी थी, जो मुंबई के बादलों में किसी को ज्यादा दिखाई नहीं दी थी,

लेकिन साल 2013 में जब रितिक रोशन की सुपरहिट फिल्म ‘क्रिश 3’ आई और जिस में कंगना राणावत का भी एक दमदार किरदार था, उस दौर में इन दोनों के लीक हुए कुछ फोटो ने इन के रिश्ते में खटास पैदा कर दी थी. खबरों के मुताबिक, ये लीक हुए फोटो 4 दिसंबर, 2010 को फिल्म कलाकार अर्जुन रामपाल के घर पर हुई एक पार्टी के बताए गए थे. इस पार्टी में रितिक रोशन अपनी पत्नी सुजैन खान के साथ पहुंचे थे. कंगना राणावत भी वहां बतौर मेहमान थीं. बताया जाता है कि सुजैन खान पार्टी से बच्चों को साथ ले कर जल्दी घर चली गई थीं, जबकि रितिक रोशन देर रात तक पार्टी में रहे थे. इस दौरान वे कंगना के साथ इंटीमेट हुए थे. जब इस सब की खबर सुजैन खान को लगी,

तो रितिक से उन की खटपट शुरू हो गई. बाद में इस का नतीजा दोनों के तलाक के रूप में सामने आया. इस के बाद रितिक रोशन और कंगना राणावत में कुछ सही नहीं रहा. इन दोनों का झगड़ा सब के सामने तब आया, जब कंगना ने रितिक को अपना ‘सिली ऐक्स’ कह दिया था. दरअसल, कंगना राणावत फिल्म ‘आशिकी 3’ कर रही थीं, लेकिन तभी खबर आई कि रितिक रोशन ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्हें फिल्म से निकलवा दिया. जब कंगना से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने रितिक को अपना ‘सिली ऐक्स’ कह कर संबोधित किया. रितिक ने इस पर एतराज जताया और दोनों का विवाद बढ़ता ही चला गया. इस झगड़े पर कंगना राणावत के वकील रिजवान सिद्दीकी ने कहा था, ‘‘आप उस फोटो की बात कर रहे हैं, जिस में एक पार्टी में रितिक कंगना को थामे खड़े हैं. मैं यह देख कर हैरान हूं कि उन्होंने कंगना को किस तरह पकड़ा है, जबकि उन के कानूनी नोटिस के मुताबिक,

वे कंगना को सोशली जानते ही नहीं थे, तो फिर उन्होंने कंगना को इस तरह क्यों पकड़ रखा था? रक्षाबंधन के दिन का लगता है क्या यह? लगता है, वे राखी बंधवाने आए थे…’’ हालांकि, उन विवादित फोटो के बारे में सुजैन खान ने रितिक रोशन का बचाव करते हुए साल 2016 में अपने एक ट्वीट में लिखा था, ‘ये तसवीरें फोटोशौप्ड हैं. इस मामले से जुड़ी कहानियों को ज्यादा ही तवज्जुह दी जा रही है.’ पर अगर कंगना राणावत के दावे को सच मानें तो उन के मुताबिक, रितिक ने पत्नी सुजैन खान से तलाक लेने के बाद शादी का वादा किया था, लेकिन बाद में उन्हें पहचानने से भी इनकार कर दिया था. कंगना राणावत ने इस मुद्दे पर एक टैलीविजन शो में कहा था, ‘‘जब इनसान प्यार में होता है, तो अलग जोन में होता है और वह जो सोचता है, उसे अपने प्रेमी से साझा करता है.

‘‘मुझे रितिक रोशन ने बहलाया या फुसलाया नहीं था. उन्होंने मुझ से कहा था कि देखो कंगना, मैं एक रिश्ते में हूं और मैं तुम्हें कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाऊंगा. हम दोनों की कभी शादी नहीं हो पाएगी. उन्होंने कहा कि वे अपनी पत्नी को नहीं छोड़ पाएंगे. ‘‘मैं ने कहा कि आप फिर मुझे छोड़ दो. हम उसी कशमकश में थे, तभी उन की पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया. तब वे बिलकुल तिलमिला गए थे. इस के बाद उन की सर्जरी हुई और तभी उन्होंने मुझ से शादी की बात की…’’ कंगना राणावत और रितिक रोशन का यह मामला इतना ज्यादा उछला था कि कंगना के मुताबिक, ‘‘रितिक ने सैकड़ों मेल मेरे ही (कंगना राणावत के) अकाउंट से खुद को मेल किए. ऐसे मेल में लिखा होता था, ‘मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है. मैं तो मर गई. मेरे दिमाग में समस्या है. मेरा इलाज करा दो..

.’ ‘‘रितिक दुनिया को दिखाना चाहता था कि लड़की (कंगना) की दिमागी हालत ठीक नहीं है, क्योंकि आने वाले दिनों में मैं उस के शादी के वादे की बात कहूं तो वह कह सके कि मेरी मानसिक हालत ठीक नहीं है, इसलिए ऐसी बातें कर रही हूं. मैं कहूं कि रितिक से मेरे संबंध थे, तो वह कह सके कि मैं पागल हूं.’’ नैपोटिज्म पर मचाया बवाल ऐसा नहीं है कि कंगना राणावत ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में केवल दूसरों से पंगे ले कर अपना फिल्म कैरियर आगे बढ़ाया है, बल्कि अगर उन की अदाकारी की बात करें तो वे आज की हिट हीरोइनों में शुमार हैं और कई फिल्मों जैसे ‘तनु वैड्स मनु’, ‘तनु वैड्स मनु रिटर्न्स’, ‘क्वीन’, ‘लाइफ इन ए मैट्रो’, ‘पंगा’ और ‘मणिकर्णिका : द क्वीन औफ झांसी’ में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुकी हैं. वे अपने दम पर सिनेमाघरों में भीड़ खींचने की हिम्मत रखती हैं, पर अब उन की इमेज एक ऐसी फिल्म हीरोइन की बन चुकी है, जो सुर्खियों में बने रहने के लिए कुछ भी कर सकती हैं. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में नैपोटिज्म यानी भाईभतीजावाद पर कंगना राणावत का हमला इसी बात को पुख्ता करता है. उन्होंने करण जौहर के टैलीविजन शो ‘कौफी विद करण’ में उन को मूवी माफिया और नैपोटिजम का ‘फ्लैग बियरर’ तक बता दिया था. इतना ही नहीं,

जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ‘मीटू’ मुद्दे पर करण जौहर ने ज्यादा कमैंट नहीं किए थे, तब भी कंगना राणावत ने करण जौहर की फिल्मों में महिलाओं की भूमिका पर अपने एक बयान में कहा था, ‘‘लड़कियों को बार्बी डौल की तरह से दिखाना सही नहीं है. और जो मर्द लड़कियों को कपड़ों की तरह बदलते हैं, उन्हें हीरो बना कर क्यों पेश किया जाता है? क्या इस तरह से कभी किसी महिला किरदार को ग्लोरिफाई किया गया है?’’ हाल ही में एक इंटरव्यू में कंगना राणावत से जब यह पूछा गया कि साउथ सिनेमा को हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की तुलना में क्या ज्यादा कामयाब बनाता है, तो उन्होंने जवाब दिया था, ‘‘जिस तरह से उन का अपने दर्शकों के साथ जुड़ाव है,

वह बहुत मजबूत है. हमारे साथ क्या होता है कि उन के बच्चे पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेश चले जाते हैं. ‘‘वे अंगरेजी में बात करते हैं, केवल हौलीवुड फिल्में देखते हैं. वे केवल चाकू और कांटे से खाते हैं और अलग तरह से बात करते हैं, तो वे कैसे जुड़ेंगे? ‘‘देखने में भी अजीब से ऐसे लगते हैं जैसे उबले हुए अंडे. उन का पूरा लुक बदल गया है, इसलिए लोग रिलेट नहीं कर सकते. मेरा मतलब किसी को ट्रोल करना नहीं है.’’ कहने का मतलब है कि कंगना राणावत ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शायद ही किसी को छोड़ा होगा, फिर वे तापसी पन्नू हों या स्वरा भास्कर, जावेद अख्तर हों या शबाना आजमी. उन के बिगड़े बोल लोगों के दिलों पर नश्तर की तरह चले और जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है, तब से कंगना राणावत ने अपना दक्षिणपंथी रूप सब को बिंदास हो कर दिखाया है. उन्होंने किसान आंदोलन, हिंदूमुसलिम, संस्कृत भाषा, हिजाब वगैरह मुद्दों पर बिना मांगे अपनी कंट्रोवर्शियल राय दी.

पर नुकसान भी उठाया पर इस का यह मतलब नहीं है कि कंगना को हर जगह जीत ही मिली या वे ऐसी करतूतों से और ज्यादा हिट हो गईं, बल्कि कई बार तो उन का वार मिसफायर करता नजर आया. सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में जब कंगना राणावत ने उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को घसीटा था, उस के बाद तो शिव सेना और कंगना में सीध सी बंध गई थी. नतीजतन, साल 2021 में कंगना के मुंबई के दफ्तर में बीएमसी की तोड़फोड़ को ले कर खूब हंगामा मचा था. इस बात से कंगना राणावत तिलमिला गई थीं और उन्होंने तोड़फोड़ की तसवीरें ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा था, ‘आज फिर इतिहास दोहराया जा रहा है. बाबर की सेना राम मंदिर गिरा रही है… मेरे लिए यह दफ्तर कोई इमारत नहीं, बल्कि राम मंदिर है और यह मंदिर एक दिन फिर खड़ा होगा.’ सत्ता पक्ष का साथ देने के एवज में कंगना राणावत को वाई प्लस की सिक्योरिटी दी गई थी.

इस के बाद तो वे और ज्यादा खुल कर बोलने लगी थीं. उन्होंने ऐसा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा, जिस पर अपने बोल बचन नहीं दिए हों और सोशल मीडिया पर सुर्खियां न बनाई हों. कंगना राणावत ने तब तो हद कर दी, जब उन्होंने देश की आजादी पर अपना बेतुका कमैंट किया. एक इवैंट में उन्होंने कहा था, ‘‘हमें जो आजादी 1947 में मिली, वह भीख में मिली थी. भारत को असली आजादी साल 2014 में मिली है.’’ कंगना राणावत का यह बयान तेजी से वायरल हुआ और इस की खूब खिंचाई भी हुई. लोगों ने इसे स्वतंत्रता सेनानियों की सरासर बेइज्जती बताया. नतीजतन, उत्तराखंड के हरिद्वार में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कंगना राणावत के खिलाफ 2 जगहों पर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. रुड़की और ज्वालापुर में दर्ज शिकायतों में उन के ऊपर स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की बेइज्जती करने का आरोप लगाया गया है. इसी मामले में महिला कांग्रेस की ओर से राजस्थान के 4 शहरों जोधपुर, जयपुर, उदयपुर और चूरू में कंगना राणावत के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई.

जोधपुर महिला कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष मनीषा पंवार ने अपनी शिकायत में कहा कि कंगना राणावत ने अपने बयान के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों और देश के लोगों का अपमान किया है, जो ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में आता है. कहने का मतलब है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ‘गैंगस्टर’ के ठप्पे से शुरुआत करने वाली कंगना राणावत आज अपने बयानों से ‘देशद्रोही’ का तमगा तक पहन चुकी हैं. बहुत से लोग यह मानते हैं कि खुद को किसी भी तरह सुर्खियों में बनाए रखने की वजह यह है कि कंगना अब राजनीति में कदम रखना चाहती हैं. राजनीति में आना अपनेआप में कोई गलत सोच नहीं है, पर कंगना राणावत का यह पैतरा उन्हें हिंदी पट्टी की ‘थलाइवी’ बना पाएगा, इस बारे में तो अभी सवालिया निशान ही लगा है, क्योंकि वहां पर यह पंगेबाज हीरोइन कब ‘धाकड़ गर्ल’ से ‘धड़ाम गर्ल’ हो जाएगी, पता भी नहीं चलेगा.

बंधन टूट गए

बंधन टूट गए : भाग 3

पर कालिंदी उस की बात ही नहीं मान रही थी, मानो वह अपने बाड़े से निकलना ही नहीं चाह रही हो. सुहानी देवी कुछ देर तक यह सब देखती रही, पर जब उस से नहीं रहा गया तो खुद उस नौजवान के पास गई और बोली, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है और इसे क्यों घसीट रहे हो?’’ ‘‘मालकिन, मेरा नाम बातुल है. मालिक ने मुझे जानवरों की साफसफाई के लिए रखा है.’’ ‘‘यह क्या कर रहे हो?’’ उस नौजवान ने बड़े अदब से जवाब दिया, ‘‘दरअसल, कालिंदी ने इस रस्सी को अपने गले में उलझा लिया है. हम इसे बाहर ला कर इस के बंधन को सुलझाना चाहते हैं, पर यह है कि अपने फंदे में ही फंसी रहना चाह रही है. यह खुद भी परेशान है, पर फिर भी निकलना नहीं चाहती.’’ बातुल की बातें सुहानी देवी के कानों से टकराईं और सीधा उस के मन में उतरती चली गईं. ‘‘ठीक है, ठीक है… पर यह नाम बड़ा अजीब सा है, बातुल…’’ बोलते हुए हंस पड़ी थी सुहानी. बातुल ने बताया कि उसे बचपन से ही बहुत बोलने की आदत है,

इसलिए गांव में सब उसे ‘बातुल’ कह कर ही बुलाते हैं. बातोंबातों में बातुल ने यह भी बताया कि गांव वापस आने से पहले वह शहर में भी काम कर चुका है. बातुल के मुंह से शहर का नाम सुन कर सुहानी देवी के मन में जैसे कुछ जाग उठा था. बातुल के रूप में ठकुराइन को बात करने वाला कोई मिल गया था. ठाकुर भवानी सिंह के जाने के बाद सुहानी देवी अपनी सास से कुछ बहाना कर के हवेली की छत पर चली जाती और बातुल को काम करते देखती रहती और फिर खुद ही बातुल से कुछ न कुछ काम बताती. आज ठाकुर साहब सुबहसुबह ही शहर चले गए और बातुल को शाम के लिए मछली लाने को बोल गए. दोपहर में बातुल अपने कंधे पर मछली पकड़ने वाला जाल ले कर आता दिखा. उस में कई सारी मछलियां फंसी हुई थीं और तड़प रही थीं. बातुल ने जाल जमीन पर पटक दिया और सभी मछलियों को निकाल कर पास ही बने एक कच्चे गड्ढे में डाल दिया और उस में ऊपर तक पानी भर दिया, ताकि वे सब शाम तक जिंदा रहें और ठाकुर साहब के आने पर उन्हें पकाया जा सके.

सुहानी देवी ने देखा कि जो मछलियां अब तक पानी के बिना तड़प रही थीं, वे पानी पाते ही कितनी तेज तैर रही थीं मानो उन्होंने जिंदगी ही पा ली हो. सुहानी देवी अभी मछलियों को देख ही रही थी कि तेज बारिश शुरू हो गई. सुहानी देवी ने आवाज लगा कर बातुल को हवेली के अंदर आने को कहा और खुद बारिश का मजा लेने लगी. बारिश मूसलाधार हो रही थी. चारों तरफ पानी भर गया था और उस मछली वाले गड्ढे और बाहर आंगन में पानी का लैवल बराबर हो जाने के चलते गड्ढे की मछलियां जलधारा के साथ बाहर बह चली थी. यह सीन देख कर सुहानी देवी भूल गई थी कि वह एक ठकुराइन है. वह खुश हो कर ताली बजाने लगी और बातुल के कंधे पर हाथ रख दिया. एक ठकुराइन के छुए जाने के चलते एकसाथ कई सवाल बातुल की आंखों में तैर गए थे और उस की नसों में दौड़ते खून की तेजी में उतारचढ़ाव आने लगा था. बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

सुहानी देवी का मन किया कि वह बाहर आंगन में जा कर भीगे, अपने सारे गहने उतार कर नहाए, पर ठकुराइन की मर्यादा ने उसे रोके रखा था. ठाकुर शहर से वापस नहीं लौटेंगे, क्योंकि बारिश तेज है और बातुल को भी इसी वजह से आज हवेली में ही रुकना होगा. सास सो गई थीं. बातुल खाना खा कर हवेली के नीचे वाले हिस्से में सोने चला गया था. सुहानी देवी ने सोने से पहले अपने कमरे का दरवाजा जानबूझ कर क्यों खुला छोड़ दिया था, इस का जवाब खुद उस के पास भी नहीं था. उसी दरवाजे से दबे पैर कोई आया और सीधा सुहानी देवी से लिपट गया. वह भी किसी लता की तरह लिपट गई और फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘कौन हो तुम?’’ ‘‘हां, जैसे तुम जानती नहीं…’’ उस की यह बात सुन कर सुहानी देवी ने बातुल का सिर अपने सीने के बीचोंबीच भींच लिया और दोनों सैक्स का मजा लेने लगे. एक बार, 2 बार… 3 बार… न जाने कितनी बार हवेली के उस कमरे में ज्वालामुखी का उबाल आया था. आज वहां ऊंचनीच और जातिधर्म की दीवार गिर गई थी. सुहानी देवी को बातुल से प्यार हो गया था. उस दिन के बाद से तो न जाने कितनी बार बातुल और सुहानी देवी ने अपने इस प्यार को भोगा था. अगले दिन सुहानी देवी फिर से भारी गहनों और कपड़ों में लदी हुई थी. बातुल आया, तो उस के एक हाथ में सांप की केंचुली थी.

‘‘यह क्या है?’’ सुहानी ने पूछा. ‘‘केंचुली है ठकुराइन… जब यह पुरानी हो जाती है, तो सांप इस में एक बंधन महसूस करता है और ठीक समय पर वह पुरानी केंचुली को उतार फेंक छुटकारे का अहसास करता है.’’ सुहानी देवी बातुल की बातों को सुन रही थी. उस के दिमाग में बंधन, मुक्ति जैसे शब्द लगातार गूंज रहे थे. 2 दिन बाद ठाकुर भवानी सिंह शहर से लौटे थे. वे सुहानी देवी के लिए सच्चे मोतियों का एक हार लाए थे. उन्होंने वह हार सुहानी देवी के गले में डाल दिया, पर उस के चेहरे को देखा तक नहीं. ठाकुर भवानी सिंह अपने चमचों के बीच बैठ कर रैडलाइट एरिया की बातें करते रहते. इस बार उन के मुंह से कुछ औरतों के नाम भी निकल रहे थे. एक अनजाने सौतिया डाह में जल उठी थी सुहानी देवी. ‘‘अगर गंदे एरिया में जा कर रासरंग ही करना था ठाकुर को तो फिर मुझ से ब्याह ही क्यों रचाया? मैं परंपरा निभाने और दिखावे के लिए मात्र एक गुडि़या की तरह हूं,’’ गुस्से की ज्वाला धधक उठी थी सुहानी देवी के मन में.

ठाकुर भवानी सिंह का शहर जा कर रैडलाइट एरिया में मजे करना बदस्तूर जारी रहा, पर अब सुहानी देवी को भी इस बात की कोई चिंता नहीं थी. उसे तो बातुल के रूप में एक प्यार करने वाला मिल गया था, जिस से वह अपने मन का हर दर्द कह सकती थी और उस की बांहों में अपने अंदर की औरत को महसूस कर सकती थी. पर, आज पूरे 3 दिन बीत गए थे, बातुल हवेली की दहलीज पर सलाम बजाने भी नहीं आया था. ‘कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया बातुल के साथ?’ सुहानी देवी का बेचैन मन बारबार हवेली के दरवाजे की तरफ देख रहा था. रात हो चली थी.

ठाकुर को तो आज आना नहीं था. बातुल से बात करने का मन कर रहा था, उस की खैरियत की भी चिंता हो रही थी. लिहाजा, सास के सो जाने के बाद सुहानी देवी पिछले दरवाजे से बाहर निकली और सीधा बातुल के घर के बाहर जा पहुंची. दरवाजा अंदर से बंद था, पर भीतर से बातुल की आवाज बाहर तक आ रही थी. सुहानी देवी ने दरवाजे की झिर्री से आंख सटा दी. अंदर का सीन देख कर वह दंग रह गई थी. बातुल किसी दूसरी औरत से मजे ले रहा था. ‘‘ठकुराइन ने मुझे बहुत मजा दिया, बहुत मस्त थी उस की जवानी… ठाकुर की रैडलाइट एरिया में मुंह मारने की आदत का मैं ने खूब फायदा उठाया…’’ ‘‘इस का मतलब… तुम नमकहराम हो. जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया,’’ बातुल की बांहों में लेटी औरत ने कहा. ‘‘नहीं, मैं एक व्यापारी हूं… जिसे जो चाहिए था, मैं ने उसे वह दिया और फिर ठाकुर भी तो शहर में जा कर मुंह मारता है, तो मैं नमकहराम कैसे?’’

 

सफर कुछ थम सा गया- भाग 3 : क्या जया के पतझड़ रूपी जीवन में फिर बहारें आ पाईं

जया कह उठती, ‘‘बताओ तो, तुम्हारी अनदेखी कब की? सूरज, बाकी सब बाद  में… मेरे दिल में पहला स्थान तो सिर्फ तुम्हारा है.’’

सूरज उसे बांहों में भींच कह उठता, ‘‘क्या मैं यह जानता नहीं?’’

उदय 4 साल का होने को आया. सूरज अकसर कहने लगा, ‘‘घर में तुम्हारे जैसी गुडि़या आनी चाहिए अब तो.’’

एक दिन घर में घुसते ही सूरज चहका, ‘‘भेलपूरी,’’ फिर सूंघते हुए किचन में चला आया, ‘‘जल्दी से चखा दो.’’

भेलपूरी सूरज की बहुत बड़ी कमजोरी थी. सुबह, दोपहर, शाम, रात भेलपूरी खाने को वह हमेशा तैयार रहता.

सूरज की आतुरता देख जया हंस दी, ‘‘डाक्टर हो, औरों को तो कहते हो बाहर से आए हो, पहले हाथमुंह धो लो फिर कुछ खाना और खुद गंदे हाथ चले आए.’’

सूरज ने जया के सामने जा कर मुंह खोल दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ तो साफ हैं. तुम खिला दो.’’

‘‘तुम बच्चों से बढ़ कर हो,’’ हंसती जया ने चम्मच भर भेलपूरी उस के मुंह में डाल दी.

‘‘कमाल की बनी है. मेज पर लगाओ. मैं हाथमुंह धो कर अभी हाजिर हुआ.’’

‘‘एक प्लेट से मेरा क्या होगा. और दो भई,’’ मेज पर आते ही सूरज ने एक प्लेट फटाफट चट कर ली.

तभी फोन की घंटी टनटना उठी. फोन सुन सूरज गंभीर हो गया, ‘‘मुझे अभी जाना होगा. हमारा एक ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया. हमारे कुछ अफसर, कुछ जवान घायल हैं.’’

जया भेलपूरी की एक और प्लेट ले आई और सूरज की प्लेट में डालने लगी तो ‘‘जानू, अब तो आ कर ही खाऊंगा. मेरे लिए बचा कर रखना,’’ कह सूरज बाहर जीप में जा बैठा.

ट्रक दुर्घटना जया की जिंदगी की भयंकर दुर्घटना बन गई. फुल स्पीड से जीप भगाता सूरज एक मोड़ के दूसरी तरफ से आते ट्रक को नहीं देख सका. हैड औन भिडंत. जीप के परखचे उड़ गए. जीप में सवार चारों लोगों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

जया की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती. वह 3 दिन बेहोश रही. घर मेहमानों से भर गया. पर चारों ओर मरघट सा सन्नाटा. घर ही क्यों, पूरी कालोनी स्तब्ध.

जया की ससुराल, मायके से लोग आए. उन्होंने जया से अपने साथ चलने की बात भी कही. लेकिन उस ने कहीं भी जाने से इनकार कर दिया. सासससुर कुछ दिन ठहर चले गए.

जया एकदम गुमसुम हो गई. बुत बन गई. बेटे उदय की बातों तक का जवाब नहीं. वह इस सचाई को बरदाश्त नहीं कर पा रही थी कि सूरज चला गया है, उसे अकेला छोड़. जीप की आवाज सुनते ही आंखें दरवाजे की ओर उठ जातीं.

इंसान चला जाता है पर पीछे कितने काम छोड़ जाता है. मृत्यु भी अपना हिसाब मांगती है. डैथ सर्टिफिकेट, पैंशन, बीमे का काम, दफ्तर के काम. जया ने सब कुछ ससुर पर छोड़ दिया. दफ्तर वालों ने पूरी मदद की. आननफानन सब फौर्मैलिटीज पूरी हो गईं.

इस वक्त 2 बातें एकसाथ हुईं, जिन्होंने जया को झंझोड़ कर चैतन्य कर दिया. सूरज के बीमे के क्व5 लाख का चैक जया के नाम से आया. जया ने अनमने भाव से दस्तखत कर ससुर को जमा कराने के लिए दे दिया.

एक दिन उस ने धीमी सी फुसफुसाहट सुनी, ‘‘बेटे को पालपोस कर हम ने बड़ा किया, ये 5 लाख बहू के कैसे हुए?’’ सास का स्वर था.

‘‘सरकारी नियम है. शादी के बाद हकदार पत्नी हो जाती है,’’ सास ने कहा.

‘‘बेटे की पत्नी हमारी बहू है. हम जैसा चाहेंगे, उसे वैसा करना होगा. जया हमारे साथ जाएगी. वहां देख लेंगे.’’

जया की सांस थम गई. एक झटके में उस की आंख खुल गई. ऐसी मन:स्थिति में उस ने उदय को अपने दोस्त से कहते सुना, ‘‘सब कहते हैं पापा मर गए. कभी नहीं आएंगे. मुझ से तो मेरी मम्मी भी छिन गईं… मुझ से बोलती नहीं, खेलती नहीं, प्यार भी नहीं करतीं. दादीजी कह रही थीं हमें अपने साथ ले जाएंगी. तब तो तू भी मुझ से छिन जाएगा…’’

पाषाण बनी जया फूटफूट कर रो पड़ी. उसे क्या हो गया था? अपने उदय के प्रति इतनी बेपरवाह कैसे हो गई? 4 साल के बच्चे पर क्या गुजर रही होगी? उस के पापा चले गए तो मुझे लगा मेरा दुख सब से बड़ा है. मैं बच्चे को भूल गई. यह तो मुरझा जाएगा.

उसी दिन एक बात और हुई. शाम को मेजर देशपांडे की मां जया से मिलने आईं. वे जया को बेटी समान मानती थीं. वे जया के कमरे में ही आ कर बैठीं. फिर इधरउधर की बातों के बाद बोलीं, ‘‘खबर है कि तुम सासससुर के साथ जा रही हो? मैं तुम्हारीकोई नहीं होती पर तुम से सगी बेटी सा स्नेह हो गया है, इसलिए कहती हूं वहां जा कर तुम और उदय क्या खुश रह सकोगे? सोच कर देखो, तुम्हारी जिंदगी की शक्ल क्या होगी? तुम खुल कर जी पाओगी? बच्चा भी मुरझा जाएगा.

‘‘तुम पढ़ीलिखी समझदार हो. पति चला गया, यह कड़वा सच है. पर क्या तुम में इतनी योग्यता नहीं है कि अपनी व बच्चे की जिंदगी संभाल सको? अभी पैसा तुम्हारा है, कल भी तुम्हारे पास रहेगा, यह भरोसा मत रखना. पैसा है तो कुछ काम भी शुरू कर सकती हो. काम करो, जिंदगी नए सिरे से शुरू करो.’’

जया ने सोचा, ‘दुख जीवन भर का है. उस से हार मान लेना कायरता है. सूरज ने हमेशा अपने फैसले खुद करने का मंत्र मुझे दिया. मुझे उदय की जिंदगी बनानी है. आज के बाद अपने फैसले मैं खुद करूंगी.’

4 साल बीत गए. जया खुश है. उस दिन उस ने हिम्मत से काम लिया. जया का नया आत्मविश्वासी रूप देख सासससुर दोनों हैरान थे. उन की मिन्नत, समझाना, उग्र रूप दिखाना सब बेकार गया. जया ने दोटूक फैसला सुना दिया कि वह यहीं रहेगी. सासससुर खूब भलाबुरा कह वहां से चले गए.

जया ने वहीं आर्मी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से उसे घर भी नहीं छोड़ना पड़ा. जड़ों से उखड़ना न पड़े तो जीना आसान हो जाता है. अपने ही घर में रहते, अपने परिचित दोस्तों के साथ पढ़तेखेलते उदय पुराने चंचल रूप में लौट आया.

मेजर शांतनु देशपांडे ने उसे सूरज की कमी महसूस नहीं होने दी. स्कूल का

होमवर्क, तैरना सिखाना, क्रिकेट के दांवपेच, शांतनु ने सब संभाला. उदय खिलने लगा. उदय को खुश देख जया के होंठों की हंसी भी लौटने लगी.

शाम का समय था. उदय खेलने चला गया था. जया बैठी जिंदगी के उतारचढ़ाव के बारे में सोच रही थी. जिंदगी में कब, कहां, क्या हो जाए, उसे क्या पहले जाना जा सकता है? मैं सूरज के बगैर जी पाऊंगी, सोच भी नहीं सकती थी. लेकिन जी तो रही हूं. छोटे उदय को मैं ने चलना सिखाया था. अब लगता है उस ने मुझे चलना सिखाया. देशपांडे ने सच कहा था जीवन को नष्ट करने का अधिकार मानव को नहीं है. इसे संभाल कर रखने में ही समझदारी है.

शुरू के दिनों को याद कर के जया आज भी सिहर उठी. वैधव्य का बोझ, कुछ करने का मन ही नहीं होता था. पर काम तो सभी करने थे. घर चलाना, उदय का स्कूल, स्कूल में पेरैंट टीचर मीटिंग, घर की छोटीबड़ी जिम्मेदारियां, कभी उदय बीमार तो कभी कोई और परेशानी. आई और शांतनु का सहारा न होता तो बहुत मुश्किल होती.

शांतनु का नाम याद आते ही मन में सवाल उठा, ‘पता नहीं उन्होंने अब तक शादी क्यों नहीं की? हो सकता है प्रेम में चोट खाई हो. आई से पूछूंगी.’

जया उठ कर अपने कमरे में चली आई पर उस का सोचना बंद नहीं हुआ. ‘मैं शांतनु पर कितनी निर्भर हो गई हूं, अनायास ही, बिना सोचेसमझे. वे भी आगे बढ़ सब संभाल लेते हैं. पिछले कुछ समय से उन के व्यवहार में हलकी सी मुलायमियत महसूस करने लगी हूं. ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे जख्मों पर मरहम लगा रहा है. उदय का तो कोई काम अंकल के बिना पूरा नहीं होता. क्यों कर रहे हैं वे इतना सब?’

शाम को जया बगीचे में पानी दे रही थी. उदय साथसाथ सूखे पत्ते, सूखी घास निकालता जाता. अचानक वह जया की ओर देखने लगा.

‘‘ऐसे क्या देख रहा है? मेरे सिर पर क्या सींग उग आए हैं?’’

उदय उत्तेजित सा उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘मम्मी, मुझे पापा चाहिए.’’

जया स्तब्ध रह गई.

उस के कुछ कहने से पहले ही उदय कह उठा, ‘‘अब मैं शांतनु अंकल को अंकल नहीं पापा कहूंगा,’’ और फिर वह घर के भीतर चला गया.

उस रात जया सो नहीं पाई. उदय के मन में आम बच्चों की तरह पापा की कमी कितनी खटक रही है, क्या वह जानती नहीं. जब सूरज को खोया था उदय छोटा था, तो भी जो छवि उस के नन्हे से दिल पर अंकित थी, वह प्यार करने, हर बात का ध्यान रखने वाले पुरुष की थी. उस की बढ़ती उम्र की हर जरूरत का ध्यान शांतनु रख रहे थे. उन की भी वैसी ही छवि उदय के मन में घर करती जा रही थी.

आई और शांतनु भी यही चाहते हैं.

इशारों में अपनी बात कई बार कह चुके हैं. वही कोई फैसला करने से बचती रही है.

क्या करूं? नई जिंदगी शुरू करना गलत तो नहीं. शांतनु एक अच्छे व सुलझे इंसान हैं.

उदय को बेहद चाहते हैं. आई और शांतनु दोनों मेरा अतीत जानते हैं. शादी के बाद जब यहां आई थी, तब से जानते हैं. अभी दोनों परिवार बिखरे, अधूरेअधूरे से हैं. मिल जाएं तो पूर्ण हो जाएंगे.

वसंतपंचमी के दिन आई ने जया व उदय को खाने पर बुलाया. उदय जल्दी मचा कर शाम को ही जया को ले वहां पहुंच गया. जया ने सोचा, जल्दी पहुंच मैं आई का हाथ बंटा दूंगी.

आई सब काम पहले से ही निबटा चुकी थीं. दोनों महिलाएं बाहर बरामदे में आ बैठीं. सामने लौन में उदय व शांतनु बैडमिंटन खेल रहे थे. खेल खत्म हुआ तो उदय भागता

बरामदे में चला आया और आते ही बोला,

‘‘मैं अंकल को पापा कह सकता हूं? बोलो

न मम्मी, प्लीज?’’

जया शर्म से पानीपानी. उठ कर एकदम घर के भीतर चली आई. पीछेपीछे आई भी आ गईं. जया को अपने कमरे में ला बैठाया.

‘‘बिटिया, जो बात हम मां बेटा न कह सके, उदय ने कह दी. शांतनु तुम्हें बहुत

चाहता है. तुम्हारे सामने सारी जिंदगी पड़ी है. उदय को भी पिता की जरूरत है और मुझे भी तो बहू चाहिए,’’ आई ने जया के दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘मना मत करना.’’

जया के सामने नया संसार बांहें पसारे खड़ा था. उस ने लजा कर सिर झुका लिया.

आई को जवाब मिल गया. उन्होंने अलमारी खोल सुनहरी साड़ी निकाल जया

को ओढ़ा दी और डब्बे में से कंगन निकाल पहना दिए.

जया मोम की गुडि़या सी बैठी थी.

उसी समय उदय अंदर आया. वहां का नजारा देख वह चकित रह गया.

आई ने कहा, ‘‘कौन, उदय है न? जा तो बेटा, अपने पापा को बुला ला.’’

‘‘पापा,’’ खुशी से चिल्लाता उदय बाहर भागा.

जया की आंखें लाज से उठ नहीं रही थीं. आई ने शांतनु से कहा, ‘‘मैं ने अपने

लिए बहू ढूंढ़ ली है. ले, बहू को अंगूठी पहना दे.’’

शांतनु पलक झपकते सब समझ गया. यही तो वह चाह रहा था.

मां से अंगूठी ले उस ने जया की कांपती उंगली में पहना दी.

‘‘पापा, अब आप मेरे पापा हैं. मैं आप को पापा कहूंगा,’’ कहता उदय लपक कर शांतनु के सीने से जा लगा.

बंधन टूट गए : भाग 1

यह जोड़ी बहुत ही बेमेल थी. 50 साल के ठाकुर भवानी सिंह तो 25 साल की ठकुराइन सुहानी देवी. बेमेल भले ही हो, पर लोगों की नजरों में तो यही जोड़ी सब से बेजोड़ थी, क्योंकि ठाकुर भवानी सिंह 50 साल के हो कर भी दमखम के मामले में किसी जवान लड़के को मात देते थे और ठकुराइन सुहानी देवी का रूप अपनी हद पर था. ठाकुर भवानी सिंह की पहली पत्नी 5 साल पहले ही चल बसी थीं. उन के पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं थी. रिश्तेदारों के कहने पर उन्होंने दूसरी शादी के लिए हां कर दी थी और अपने मुकाबले थोड़े कम पैसे वाले ठाकुरों के यहां से सुहानी देवी को ब्याह लाए थे.

भवानी सिंह सुहानी देवी के सामने बड़े ही गर्व से अपनी ठकुराई का बखान करते और अपने खानदान की तलवार दिखाते थे. शान के साथ अपनी खानदानी बातें बताते और हर रीतिरिवाज का बखान करते थे. हर महीने सुहानी देवी के लिए 4-5 जोड़े कपड़े और गहने लाना तो ठाकुर भवानी सिंह के लिए आम बात थी. उन का मानना था कि गहनेकपड़े औरतों के लिए ठीक उसी तरह जरूरी हैं, जैसे मर्दों के लिए शराब और मांस. उन्हें इस के लालच में फंसाओ और खुद चाहे जो भी करो. औरतें घर की चारदीवारों में नियमों, परंपराओ में फंसी रह कर भी अपनेआप को धन्यभागी समझती रहेंगी. जब सुहानी देवी नईनई ब्याह कर आई थी, तो उस की सास उसे बताती थीं कि तुम ठकुराइन हो…

फलां काम तुम्हें इस तरह से करना है और फलां काम कुछ इस तरह से… हम ठकुराइनों के खांसने और छींकने में भी एक शालीनता और एक अदा होती है और अगर घर में कोई शोक हो तो भी हमें चीखचीख कर नहीं रोना… रोने के लिए एक अलग जाति की औरतें होती हैं, जो इन्हीं मौकों पर बुलाई जाती हैं. न जाने और क्याक्या बताया गया था सुहानी देवी को, पर उसे इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. ठकुराइन होने का भार उस के लिए कुछ ज्यादा ही था. एक बार जब जेठ की दोपहरी में गरमी से परेशान हो कर सुहानी देवी ने अपने बदन के गहने उतार दिए और एक हलके कपड़े वाली साड़ी पहन ली, तो उस की सास ने कितना डांटा था उसे, ‘‘ये भारी कपड़ेलत्ते तो हम ठकुराइनों की शान हैं. इन्हें जीतेजी अपने बदन से अलग नहीं करते… दोष होता है.’’

सुहानी देवी अब इन भारी गहनों और कपड़ों को हमेशा ही ढोती रहती, पर ये भारीभारी गहने और सोने के तार वाली साडि़यों से भी ज्यादा कीमती कुछ और भी था, जिसे सुहानी ढूंढ़ रही थी. अभी तो सुहानी देवी का जवान दिल प्यार चाहता था… घंटों अपने पति के बाहुपाश में लिपटने की चाहत थी उस की. उस का मन अभी आकाश में बिना किसी बंधन के उड़ना चाहता था. ठाकुर भवानी सिंह कभीकभी तो पूरी रात घर से बाहर रहते, तो कभीकभार देर रात ही आते और आते ही औंधे मुंह बिस्तर पर गिर जाते. पूरे महीने में 4-5 ही ऐसे दिन होते, जब वे घर में रुकते, नहीं तो उन की हर रात बाहर ही गुजरती थी. कभीकभार दबी जबान से सुहानी देवी ने पूछने की कोशिश भी की, तो ठाकुर साहब ने खुद के ठाकुर होने का दावा कर के बात आईगई कर दी. ठाकुर भवानी सिंह सुहानी देवी को बिस्तर पर प्यार करना भी जानते थे, पर उन के लिए सिर्फ अपनी संतुष्टि ही माने रखती थी. सुहानी देवी को मजा मिला या नहीं,

इस बात से उन को कोई मतलब नहीं होता था. वे तो बिस्तर पर भी ठाकुर ही बने रहते थे. सुहानी देवी अपने पति से बात करना चाहती थी और आने वाले भविष्य को ले कर कुछ योजनाएं भी बनाना चाहती थी, पर कड़क स्वभाव वाले ठाकुर के साथ ऐसा हो नहीं पाता था. यों तो हवेली में नौकरचाकर भी थे, पर वे सब सुहानी देवी की सास की चमचागीरी और तीमारदारी में ही लगे रहते थे. सुहानी देवी किसी से बात करने को भी तरसती थी. एक रात को जब ठाकुर भवानी सिंह वापस लौटे तो काफी नशे में थे और मूड भी अच्छा लग रहा था, तो सुहानी देवी ने उन से पूछ ही लिया, ‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि रोज इतनी रात तक आप बाहर रहते हो… आखिर आप जाते कहां हो?’’ सुहानी देवी की बात सुन कर ठाकुर मुसकराने लगे और बोले, ‘‘देखो सुहानी, हमारे बापदादा की किसी जमाने में तूती बोलती थी और हमारी हवेली पर औरतों का नाच होता था, हमारे बापदादा जिस औरत पर उंगली रखते वही औरत उन के बिस्तर पर बिछ जाती थी,

पर अब हमारी ठकुराई तो रही नहीं, हम बस नाम के ठाकुर हैं, पर हमारे शौक तो वही पुराने हैं,’’ ठाकुर भवानी सिंह ने पानी का एक बड़ा घूंट भरा और फिर से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘हम अपने उसी शौक को पूरा करने के लिए शहर में जाते हैं.’’ ‘‘तो क्या आप औरतों का नाच देखने जाते हैं?’’ सुहानी देवी ने पूछा. ‘‘नहीं रे पगली, शहर में रैडलाइट एरिया नाम की एक जगह है, जहां पर पैसे दे कर औरतों के साथ मजे किए जाते हैं. हम वहीं पर मन बहलाने के लिए जाते हैं,’’ आखिरी शब्द कहतेकहते ठाकुर साहब पर नींद हावी हो गई थी और वे सोने लगे, पर सुहानी देवी की आंखों से तो नींद कोसों दूर जा चुकी थी. ‘‘तो इस का मतलब है कि ठाकुर की नजर में मेरी कोई अहमियत नहीं है… मैं बस उन की झूठी परंपराओं और सड़ेगले रीतिरिवाजों को निभाने के लिए यहां लाई गई हूं…’’ सुहानी देवी अपनेआप से ही कई सवाल करने लगी थी. वह सारी रात करवट बदलती रही थी. अगले दिन सुहानी देवी का सिर भारी सा था और मन भी उचटा सा लग रहा था. वह अपनी छत के कोने पर खड़ी दूर तक निहारने लगी थी कि उस की नजर घर के आंगन में खड़े एक नौजवान पर पड़ी, जिस की उम्र 22-23 साल की रही होगी. वह नौजवान ठाकुर साहब की पसंदीदा गाय कालिंदी को पकड़ कर खींच रहा था,

करमवती- भाग 3 : राजपाल प्लंबर कहा गिरा था

उस ने ओपन यूनिवर्सिटी से 2 साल में बीऐड भी कर लिया. जिस दिन उस का बीऐड का नतीजा आया, उस दिन मैं ने खुशी से महल्ले में मिठाई बांटी. उस की कामयाबी मेरी कामयाबी थी. ‘‘करमवती के स्कूल की प्रबंधन समिति ने उस से पहले ही बोल दिया था कि अगर उस ने बीऐड कर लिया, तो वे उस की नियुक्ति प्रवक्ता के पद पर कर देंगे और इंटर की क्लास पढ़ाने के लिए दे देंगे.

उस का यह सपना भी पूरा हो गया. उसी दिन हम ने अपने मकान की बुनियाद रख दी और कुछ महीने बाद उस में शिफ्ट हो गए.’’ ‘‘बड़े कमाल की कहानी है राजपाल तुम्हारी. शराब पीते रहते तो कहीं गटर में होते या फिर किसी हादसे का शिकार हो जाते. करमवती ने तुम्हें दोनों ही चीजों से बचा लिया.’’ ‘‘बाबूजी, अभी मैं ने आप को नाली में पड़े होने से ले कर अब तक 13 साल की कहानी सुनाई है. अभी और भी साल बाकी हैं. कहो तो वह भी सुना दूं.’’ मैं ने कहा, ‘‘जरूर सुनाओ. ऐसी कामयाबी की कहानी कौन नहीं सुनना चाहेगा.’’ ‘‘बाबूजी, करमवती ने निश्चय किया कि वह सरकारी नौकरी करेगी.

2 साल उस ने कड़ी मेहनत की. किताब बाद में लाती, चट पहले कर जाती. फिर पता क्या हुआ बाबूजी?’’ ‘‘क्या हुआ राजपाल? बताओ.’’ ‘‘पिछले महीने उसे सरकारी नौकरी का नियुक्तिपत्र मिला. धामपुर के बालिका कालेज में वह प्रवक्ता हो गई. बाबूजी, 30,000 की पगार से 70,000 की पगार पर,’’ यह कहतेकहते राजपाल भावुक हो गया. उस के औजार रुक गए. वह अपने आंसू पोंछने लगा, ‘‘पता है बाबूजी, अब वह क्या कहती है?’’ राजपाल की बात सुन कर अब मैं असमंजस में पड़ गया. किसी फिल्मी कहानी की तरह मैं उस की कहानी सुन रहा था.

मुझे लगा कि किसी फिल्मी कहानी की तरह करमवती कामयाबी के शिखर पर चढ़ कर राजपाल को अपने लायक न समझ कर उसे छोड़ने की बात करने लगी होगी. मैं अब राजपाल के मुंह से बद से बदतर बात सुनने को तैयार था. करमवती मुझे कहानी की खलनायिका नजर आने लगी. मेरी पूरी हमदर्दी राजपाल के साथ थी. मुझे लगा कि उस के आंसू खुशी के नहीं दुख के थे. मैं ने पूछा, ‘‘क्या कहती है अब करमवती? क्या तुम अब उस के लायक नहीं रहे?’’ ‘‘नहीं बाबूजी, आप यहां गलत सोच रहे हैं.’’ फिर उस ने बड़े गर्व से आगे की कहानी सुनाई, ‘‘अब करमवती कहती है कि मुझे अब इन औजारों का थैला उठाने की जरूरत नहीं है. वह कहती है कि वह जल्दी ही मुझे प्लंबरी के सामान की बड़ी सी दुकान खुलवाएगी. उस दुकान से भी बड़ी, जिस दुकान के लालाजी ने आप को मेरे पास भेजा था.

‘‘वह कहती है कि यह तो अभी हमारी नई जिंदगी की शुरुआत?है, आगेआगे देखो क्या होता?है.’’ राजपाल का काम लगभग खत्म होने को था, तभी उस के घर से फोन आया. उस ने बताया कि उस का काम खत्म होने ही वाला है. जब राजपाल का काम खत्म हो गया, तो मैं ने उस का हिसाब कर दिया. तभी घर के सामने एक कार आ कर रुकी. ड्राइविंग सीट पर कोई औरत बैठी थी और पिछली सीट पर 2 बड़े बच्चे. मुझे लगा कि कोई मेहमान आया है. तभी पिछली सीट से बड़ा लड़का नीचे उतरा. उस ने मुझे नमस्ते की और राजपाल का औजारों का थैला हाथ से पकड़ते हुए कहा, ‘‘लाओ पापा, यह मुझे दो.’’ मुझे समझते देर न लगी कि कार किस की है. तभी राजपाल बोला,

‘‘बाबूजी, यही है मेरी करमवती. और ये हैं हमारे बच्चे.’’ करमवती ने कार से उतर कर मुझे नमस्ते की. उस की आंखों में अथाह आत्मविश्वास था. ‘‘करमवती, ये वही बाबूजी हैं, जिन्होंने मुझे नाली में से खींचा था.’’ ‘‘मैं उस बात के लिए आज भी बाबूजी की एहसानमंद हूं,’’ करमवती ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुका कर कहा. ‘‘अच्छा बाबूजी नमस्ते,’’ राजपाल ने कार की अगली सीट पर बैठते हुए कहा. ‘‘नमस्ते,’’ मैं ने कहा. उस के बाद करमवती ने कार आगे बढ़ा दी. मैं हैरानी से उस कार को तब तक आगे बढ़ते देखता रहा, जब तक वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गई. मैं सोच रहा था, ‘समझदारी और हौसला हो, तो आदमी आसमान छू सकता है. करमवती कामयाबी की मिसाल है.’

नामर्द भी बना सकता है तंबाकू

तंबाकू सभी जानते हैं कि हमारे देश में नौजवानों की आबादी ज्यादा है, पर आज के मौडर्न लाइफस्टाइल और बेफिक्रे स्वभाव का उन पर बहुत ज्यादा असर दिखता है. ऐसे में उन में तंबाकू का सेवन और बीड़ीसिगरेट पीने का चलन ज्यादा दिखता है. इस की लत इतनी ज्यादा खराब होती है कि चाह कर भी इस के चंगुल से बाहर निकल पाना मुश्किल होता है. इस से इन का शरीर और घरपरिवार धीरेधीरे सब खत्म हो जाता है. इस बारे में एसआरवी हौस्पिटल, चैंबूर, मुंबई की हैड और नैकओरल औंकोसर्जन डाक्टर खोजेमा फतेही कहते हैं कि तंबाकू के लगातार सेवन से कैंसर जैसी बीमारी होने के साथसाथ इनसान नामर्द भी बन सकता है,

क्योंकि तंबाकू के सेवन से दिमाग और नर्वस सिस्टम कमजोर हो जाता है. इस से इनसान के दिमाग से ले कर उस की सैक्स लाइफ पर बुरा असर पड़ता है. अगर इन बीमारियों से बचना है, तो इस की लत छोड़ने की जरूरत है. मुंह के कैंसर में बढ़ोतरी एक सर्वे में यह पाया गया है कि भारत में तंबाकू के सेवन से मुंह के कैंसर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिस में 90 फीसदी फेफड़ों के कैंसर और दूसरे कैंसर की वजह बीड़ीसिगरेट पीना ही है. दरअसल, ज्यादा बीड़ीसिगरेट पीने से हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि ऐसा करने के चलते ब्लड प्रैशर में अचानक बढ़ोतरी होने से दिल को खून की सप्लाई में कमी हो जाती है. इस से दिल का दौरा या स्ट्रोक हो सकता है. इस के अलावा तंबाकू और बीड़ीसिगरेट के सेवन की वजह से औरतों और लड़कियों में पेट गिरने का खतरा बढ़ जाता है,

जबकि मर्दों में यह सब नामर्दी की वजह बनता है. तंबाकू है क्या दरअसल, तंबाकू में 4,000 से ज्यादा रसायन होते हैं. इन रसायनों में निकोटिन एक ऐसा रसायन है, जो इनसान को थोड़ी देर के लिए अच्छा महसूस करवाता है, इसलिए इनसान तंबाकू का सेवन करता है. निकोटिन के अलावा फिनाइल, नाइटोअमाइड, कार्बनमोनोऔक्साइड, डेनजिन वगैरह भी होते हैं, जिन का इनसान के शरीर पर बुरा असर पड़ता है, जिस में मुंह, होंठ, जबड़े, फेफड़े, गले, पेट, गुरदे और मूत्राशय का कैंसर होने का डर बना रहता है. खतरनाक होते हैं रसायन डाक्टर खोजेमा फतेही आगे कहते हैं कि तंबाकू एक ऐसा पदार्थ है, जिस में कई ऐसे रसायन हैं, जिन का इनसान की सेहत पर बुरा असर पड़ता है और जो उन्हें कई बीमारियों का शिकार बनाने के अलावा नामर्दी की ओर धकेलते हैं, खासकर नौजवान तबके को इस से बचना होगा, क्योंकि 80 फीसदी नौजवान तबका इस दलदल में फंस चुका है.

होता है बांझपन तंबाकू का सेवन करने वालों को इस का सेवन न करने वालों की तुलना में ज्यादा बांझपन का सामना करना पड़ता है. तंबाकू की वजह से अंडे और शुक्राणु का डीएनए खराब हो जाता है. प्रजनन समस्याओं का सामना करने वाले मर्दों के अलावा नशे की लत वाली औरतों और लड़कियों में भी पेट से होने की उम्मीद कम हो जाती है, क्योंकि अंडे के खराब होने के पीछे निकोटिन, कार्बनमोनोऔक्साइड और साइनाइड खास वजह होते हैं. शीघ्रपतन की समस्या ज्यादा बीड़ीसिगरेट पीने या तंबाकू के सेवन के चलते मर्दों में नामर्दी बढ़ती है. साथ ही, उन की सैक्सुअल लाइफ पर बुरा असर पड़ता है. उन में शीघ्रपतन की समस्या भी शुरू हो जाती है. ज्यादा मात्रा में तंबाकू का सेवन करने से धीरेधीरे उन की सैक्स ताकत में कमी आ जाती है. इलाज करें ऐसे इस तरह के नशे से खुद को छुड़ाने के लिए किसी संस्था या डाक्टर की सलाह लेना जरूरी है. किसी भी तरह के झाड़फूंक और पूजापाठ से बचें, ताकि आप को सही सलाह मिले और आप इस बुराई से दूर रह सकें.

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