Hindi Story: नाक – रूपबाई के साथ आखिर क्या हुआ

Hindi Story: मां की बात सुन कर रूपबाई ठगी सी खड़ी रह गई. उसे अपने पैरों के नीचे से धरती खिसकती नजर आई. उस के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. रूपबाई ने तो समझा था कि यह बात सुन कर मां उस की मदद करेगी, समाज में फैली गंदी बातों से, लोगों से लड़ने के लिए उस का हौसला बढ़ाएगी और जो एक नई परेशानी उस के पेट में पल रहे बच्चे की है, उस का कोई सही हल निकालेगी. पर मां ने तो उस से सीधे मुंह बात तक नहीं की. उलटे लाललाल आंखें निकाल कर वे चीखीं, ‘‘किसी कुएं में ही डूब मरती. बापदादा की नाक कटा कर इस पाप को पेट में ले आई है, नासपीटी.’’

मां की बातें सुन कर रूपबाई जमीन पर बैठ गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए. उसे केवल मां का ही सहारा था और मां ही उस से इस तरह नफरत करने लगेंगी, तो फिर कौन उस का अपना होगा इस घर में.

पिताजी तो उसी रामेश्वर के रिश्तेदार हैं, जिस ने जबरदस्ती रूपबाई की यह हालत कर दी. अगर पिताजी को पता चल गया, तो न जाने उस के साथ क्या सुलूक करेंगे. रूपबाई की मां सोनबाई जलावन लेने खेत में चली गई. रूपबाई अकेली घर के आंगन में बैठी आगे की बातों से डर रही थी. हर पल उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उस की आंखों में आंसू भर आए थे. मन हो रहा था कि वह आज जोरजोर से रो कर खुद को हलका कर ले.

रामेश्वर रूपबाई का चाचा था. वह और रामेश्वर चारा लाने रोज सरसों के खेत में जाते थे. रामेश्वर चाचा की नीयत अपनी भतीजी पर बिगड़ गई और वह मौके की तलाश में रहने लगा.

एक दिन सचमुच रामेश्वर को मौका मिल गया. उस दिन आसपास के खेतों में कोई नहीं था. रामेश्वर ने मौका देख कर सरसों के पत्ते तोड़ती रूपबाई को जबरदस्ती खेत में पटक दिया. वह गिड़गिड़ाती रही और सुबकती रही, पर वह नहीं माना और उसे अपनी हवस का शिकार बना कर ही छोड़ा. घर आने के बाद रूपबाई के मन में तो आया कि वह मां और पिताजी को साफसाफ सारी बातें बता दे, पर बदनामी के डर से चुप रह गई.

इस के बाद रामेश्वर रोज जबरदस्ती उस के साथ मुंह काला करने लगा. इस तरह चाचा का पाप रूपबाई के पेट में आ गया.

कुछ दिन बाद रूपबाई ने महसूस किया कि उस का पेट बढ़ने लगा है. मशीन से चारा काटते समय उस ने यह बात रामेश्वर को भी बताई, ‘‘तू ने जो किया सो किया, पर अब कुछ इलाज भी कर.’’

‘‘क्या हो गया?’’ रामेश्वर चौंका. ‘‘मेरे पेट में तेरा बच्चा है.’’

‘‘क्या…?’’ ‘‘हां…’’

‘‘मैं तो कोई दवा नहीं जानता, अपनी किसी सहेली से पूछ ले.’’ अपनी किसी सहेली को ऐसी बात बताना रूपबाई के लिए खतरे से खाली नहीं था. हार कर उस ने यह बात अपनी मां को ही बता दी, पर मां उसे हिम्मत देने के बजाय उलटा डांटने लगीं.

शाम को रूपबाई का पिता रतन सिंह काम से वापस आ गया. वह दूर पहाड़ी पर काम करने जाता था. आते ही वह चारपाई पर बैठ गया. उसे देख कर रूपबाई का पूरा शरीर डर के मारे कांप रहा था. खाना खाने के बाद सोनबाई ने सारी बातें अपने पति को बता दीं.

यह सुन कर रतन सिंह की आंखें अंगारों की तरह दहक उठीं. वह चिल्लाया, ‘‘किस का पाप है तेरे पेट में?’’

‘‘तुम्हारे भाई का.’’ ‘‘रामेश्वर का?’’

‘‘हां, रामेश्वर का. तुम्हारे सगे भाई का,’’ सोनबाई दबी जबान में बोली. ‘‘अब तक क्यों नहीं बताया?’’

‘‘शर्म से नहीं बताया होगा, पर अब तो बताना जरूरी हो गया है.’’ इस बात पर रतन सिंह का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ, फिर उस ने पूछा, ‘‘अब…?’’

‘‘अब क्या… किसी को पता चल गया, तो पुरखों की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी.’’ ‘‘फिर…?’’

‘‘फिर क्या, इसे जहर दे कर मार डालो. गोली मेरे पास रखी हुई है.’’ ‘‘और रामेश्वर…’’

‘‘उस से कुछ मत कहो. वह तो मर्द है. लड़की मर जाए, तो क्या जाता है? ‘‘अगर दोनों को जहर दोगे, तो सब को पता चल जाएगा कि दाल में कुछ काला है.’’

‘‘तो बुला उसे.’’ सोनबाई उठी और दूसरे कमरे में सो रही रूपबाई को बुला लाई. वह आंखें झुकाए चुपचाप बाप की चारपाई के पास आ कर खड़ी हो गई.

रतन सिंह चारपाई पर बैठ गया. रूपबाई उस के पैरों पर गिर कर फफक कर रो पड़ी. रतन सिंह ने उस की कनपटी पर जोर से एक थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘अब घडि़याली आंसू मत बहा. एकदम चुप हो जा और चुपचाप जहर की इस गोली को खा ले.’’

यह सुन कर रूपबाई का गला सूख गया. उसे अपने पिता से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह थरथर कांप उठी और अपने बाएं हाथ को कनपटी पर फेरती रह गई. झन्नाटेदार थप्पड़ से उस का सिर चकरा गया था. रात का समय था. सारा गांव सन्नाटे में डूबा हुआ था. अपनेअपने कामों से थकेहारे लोग नींद के आगोश में समाए हुए थे.

गांव में सिर्फ उन तीनों के अलावा एक रामेश्वर ही था, जो जाग रहा था. वह दूसरे कमरे में चुपचाप सारी बातें सुन रहा था. पिता की बात सुन कर कुछ देर तक तो रूपबाई चुप रही, फिर बोली, ‘‘जहर की गोली?’’

तभी उस की मां चीखी, ‘‘हां… और क्या कुंआरी ही बच्चा जनेगी? तू ने नाक काट कर रख दी हमारी. अगर ऐसा काम हो गया था, तो किसी कुएं में ही कूद जाती.’’ ‘‘मगर इस में मेरी क्या गलती है? गलती तो रामेश्वर चाचा की है. मैं उस के पैर पड़ी थी, खूब आंसू रोई थी, लेकिन वह कहां माना. उस ने तो जबरदस्ती…’’

‘‘अब ज्यादा बातें मत बना…’’ रतन सिंह गरजा, ‘‘ले पकड़ इस गोली को और खा जा चुपचाप, वरना गरदन दबा कर मार डालूंगा.’’ रूपबाई समझ गई कि अब उस का आखिरी समय नजदीक है. फिर शर्म या झिझक किस बात की? क्यों न हिम्मत से काम ले?

वह जी कड़ा कर के बोली, ‘‘मैं नहीं खाऊंगी जहर की गोली. खिलानी है, तो अपने भाई को खिलाओ. तुम्हारी नाक तो उसी ने काटी है. उस ने जबरदस्ती की थी मेरे साथ, फिर उस के किए की सजा मैं क्यों भुगतूं?’’ ‘‘अच्छा, तू हमारे सामने बोलना भी सीख गई है?’’ कह कर रतन सिंह ने उस के दोनों हाथ पकड़ कर उसे चारपाई पर पटक दिया.

सोनबाई रस्सी से उस के हाथपैर बांधने लगी. रूपबाई ने इधरउधर भागने की कोशिश की, चीखीचिल्लाई, पर सब बेकार गया. उस बंद कोठरी में उस की कोई सुनने वाला नहीं था. जब रूपबाई के हाथपैर बंध गए, तो वह अपने पिता से गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे मत मारिए पिताजी, मैं आप के पैर पड़ती हूं. मेरी कोई गलती नहीं है.’’

मगर रतन सिंह पर इस का कोई असर नहीं हुआ. रूपबाई छटपटाती रही. रस्सी से छिल कर उस की कलाई लहूलुहान हो गई थी. वह भीगी आंखों से कभी मां की ओर देखती, तो कभी पिता की ओर.

अचानक रतन सिंह ने रूपबाई के मुंह में जहर की गोली डाल दी. लेकिन उस ने जोर लगा कर गोली मुंह से बाहर फेंक दी. गोली सीधी रतन सिंह की नाक से जा टकराई. वह गुस्से से तमतमा गया. उस ने रूपबाई के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया. रूपबाई के गाल पर हाथ का निशान छप गया. उस का सिर भन्ना उठा. वह सोचने लगी, ‘आदमी इतना निर्दयी क्यों हो जाता है? वहां मेरे साथ जबरदस्ती बलात्कार किया गया और यहां इस पाप को छिपाने के लिए जबरदस्ती मारा जा रहा है. अब तो मर जाना ही ठीक रहेगा.’

मरने की बात सोचते ही रूपबाई की आंखों में आंसू भर आए. आंसुओं पर काबू पाते हुए वह चिल्लाई, ‘‘पिताजी, डाल दो गोली मेरे मुंह में, ताकि मेरे मरने से तुम्हारी नाक तो बच जाए.’’ रतन सिंह ने उस के मुंह में गोली डाल दी. वह उसे तुरंत निगल गई. पहले उसे नशा सा आया और फिर जल्दी ही वह हमेशा के लिए गहरी नींद में सो गई.

रतन सिंह और सोनबाई ने उस के हाथपैर खोले और उस की लाश को दूसरे कमरे में रख दिया. सारी रात खामोशी रही. रामेश्वर बगल के कमरे में अपने किए के लिए खुद से माफी मांगता रहा.

सुबह होते ही रतन सिंह और सोनबाई चुपके से रूपबाई के कमरे में गए और दहाड़ें मार कर रोने लगे. रामेश्वर भी अपने कमरे से निकल आया. फिर वे तीनों रोने लगे. रोनेधोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए कि क्या हो गया?

‘‘कोई सांप डस गया मेरी बच्ची को,’’ सोनबाई ने छाती पीटते हुए कहा और फिर वह दहाड़ें मार कर रो पड़ी. Hindi Story

Best Hindi Kahani: मैं भूखी हूं – पंचायत के सामने आया एक अनोखा मामला

Best Hindi Kahani: ‘‘तू मानती क्यों नहीं बुढि़या? समझ में नहीं आता क्या? बारबार गेट के पास आ कर खड़ी हो जाती है. चल किनारे हट, वरना उठा कर सड़क के उस पार फेंक दूंगा,’’ मुख्यमंत्री आवास के मेन गेट पर तैनात एक पुलिस जवान शैतान सिंह 75 साल की उस बुढि़या पर बरस पड़ा.

‘‘मैं बहुत दूर से आई हूं बेटा. मु  झे एक बार तो मुख्यमंत्री से मिल लेने दो,’’ बुढि़या गिड़गिड़ाई.

‘‘सीएम साहब से अगर मिलना है, तो 4 दिन के बाद ‘जनदर्शन’ में आना. अभी तुम्हारी कोई सुनवाई नहीं होगी. गांव के लिए कोई गाड़ी हो, तो निकल लो या फिर कहीं रात काट लो. यहां न खड़ी रहो,’’ दूसरे पुलिस जवान जंगबहादुर ने जरा नरमी दिखाई.

‘‘मुख्यमंत्रीजी तो गुदड़ी के लाल हैं. वे गरीबों के मसीहा हैं. वे मु  झ जैसी गरीब बूढ़ी औरतों के भी पैर छू कर आशीर्वाद लेते हैं.

‘‘चुनाव के समय जब वे हमारे गांव गए थे, तो उन्होंने मु  झ से भी आशीर्वाद लिया था. मैं ने तो उन्हें राजा बनने का आशीर्वाद दिया था.

‘‘वे मु  झे देखते ही पहचान जाएंगे. वे कहेंगे, ‘माई, तुम यहां क्यों आईं? बताओ, क्या तकलीफ है तुम्हें? किस की मजाल है कि जिस ने तुम्हें राजधानी आने के लिए मजबूर किया?’

‘‘मैं उन्हें अपनी तकलीफ बताऊंगी, तो वे फौरन कलक्टर को फोन लगाएंगे. फोन के घनघनाते ही कलक्टर साहब सरपंच और पंचायत सचिव की नाक में नकेल डाल देंगे. अगले ही दिन मेरा नाम गरीबों की लिस्ट में जुड़ जाएगा और मु  झे अनाज मिलने लगेगा. मैं भूखी हूं बेटा, इस से मु  झे भरपेट खाना मिलने लगेगा.’’

‘‘ठीक है. फिलहाल तो तुम किनारे हो जाओ. जब सीएम साहब आएंगे, तो कोशिश करना. शायद तुम्हारा काम हो जाए…’’ यह कह कर जंगबहादुर ने पूछा, ‘‘तुम अकेली आई हो?’’

‘‘हां बेटा. मेरा आदमी बहुत पहले गुजर गया था. मैं मजदूरी कर के अपना और बेटी का पेट पालती थी. किसी तरह बेटी की शादी कर दी और वह ससुराल चली गई.

‘‘जब तक मेरा तन चला, मैं काम करती रही, लेकिन अब मुझ से काम नहीं होता…’’ बुढि़या बता रही थी, ‘‘जब बीपीएल लिस्ट में मेरा नाम था, तब मुझे अनाज मिल जाता था. लेकिन सचिव ने मु  झे मरा बता कर मेरा नाम काट दिया.’’

‘‘हां, अखबार में मैं ने पढ़ी थी यह खबर. तो वह औरत तुम्हीं हो?’’ पुलिस वाले ने कुछ और जानने की इच्छा दिखाई, ‘‘सचिव ने ऐसा क्यों किया?’’

‘‘सचिव लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए पैसा और दारूमुरगा मांगता है. जो उस की मांग पूरी कर देता है, उस का काम हो जाता है. जो उसे खुश नहीं करता, वह मेरी तरह भटकता है.

‘‘कई अनाथों के नाम काट दिए गए हैं, लेकिन कहीं कोई सुनने वाला नहीं है. कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई, तो मैं हिम्मत कर के यहां मुख्यमंत्री के पास आई हूं,’’ बुढि़या ने बताया.

कुछ देर बाद मुख्यमंत्री का काफिला आ गया. लग रहा था कि वह बुढि़या किसी गाड़ी के नीचे आ जाएगी. वह अपनी कमजोर आंखों पर जोर डाल कर यह देखने की कोशिश कर रही थी कि किस कार में उस का गुदड़ी का लाल है.

आखिरकार उस बुढि़या ने मुख्यमंत्री की एक  झलक पा ही ली. वह सुरक्षा घेरा तोड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगी. पता नहीं कहां से उस की सूखी हड्डियों में ताकत आ गई थी. वह दौड़ती हुई वहां जा पहुंची, जहां कार से मुख्यमंत्री उतरे थे.

‘‘तुम आ गए बेटा… मैं कई घंटे से तुम्हारा इंतजार कर रही थी…’’ यह कह कर वह बुढि़या मुख्यमंत्री की ओर दौड़ी, ‘‘मु  झे पहचान गए न? मैं तुम्हारी दुखिया माई.’’

‘‘यह कौन है? भगाओ इसे यहां से,’’ मुख्यमंत्री ने बौडीगार्ड से यह कह कर अंदर की ओर कदम बढ़ा दिए.

बुढि़या रोतीगिड़गिड़ाती रही. पुलिस के जवानों ने खींचतान कर के उसे गेट के बाहर फेंक दिया. वह देर तक कराहती हुई सड़क पर पड़ी रही. धक्कामुक्की में वह बुरी तरह घायल हो गई थी.

देर रात घर लौटे मुख्यमंत्री के शराबी बेटे ने उस बुढि़या के ऊपर से कार गुजार दी.

बुरी तरह घायल बुढि़या की चीख निकल गई. एक तरफ उस की लाश लुढ़की थी और दूसरी तरफ उस के हाथ से छूट कर एक तख्ती पड़ी थी, जिस

पर लिखा हुआ था, ‘मैं मरी नहीं, जिंदा हूं. मैं भूखी हूं, मु  झे खाना दो.’

मुख्यमंत्री को यह जानकारी हुई, तो उन्होंने अपने भरोसे के लोगों को हुक्म दिया, ‘‘चुनाव सिर पर हैं. फौरन इस तख्ती को तोड़ो और बुढि़या की लाश को इस तरह ठिकाने लगाओ कि किसी को कुछ पता न लगे. यह सब काम जल्दी से करो, वरना विपक्ष बेवजह हंगामा खड़ा कर देगा.’’

बुढि़या की लाश तक का पता नहीं चला. उस के गांव के उन लोगों की आंखें पथरा गईं, जिन्होंने उम्मीद लगा रखी थी कि ‘मुख्यमंत्री की माई’ उन का भी नाम गरीबों की सूची में जुड़वा कर रहेगी.

पंचायत उसी तरह चल रही थी. सचिव अंधेरगर्दी कर रहा था और सरपंच के मुंह से परमेश्वर नहीं शैतान बोल रहा था. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: बेइज्जती – क्या जिस्म का भूखा था अजीत

Story In Hindi: करिश्मा और रसिया भैरव गांव से शहर के एक कालेज में साथसाथ पढ़ने जाती थीं. साथसाथ रहने से उन दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी. उन का एकदूसरे के घरों में आनाजाना भी शुरू हो गया था.

करिश्मा के छोटे भाई अजीत ने रसिया को पहली बार देखा, तो उस की खूबसूरती को देखता रह गया. रसिया के कसे हुए उभार, सांचे में ढला बदन और रस भरे गुलाबी होंठ मदहोश करने वाले थे.

रसिया ने एक दिन महसूस किया कि कोई लड़का छिपछिप कर उसे देखता है. उस ने करिश्मा से पूछा, ‘‘वह लड़का कौन है, जो मुझे घूरता है?’’

‘‘वह…’’ कह कर करिश्मा हंसी और बोली, ‘‘वह तो मेरा छोटा भाई अजीत है. तुम इतनी खूबसूरत हो कि तुम्हें कोई भी देखता रह जाए…

‘‘ठहरो, मैं उसे बुलाती हूं,’’ इतना कह कर उस ने अजीत को पुकारा, जो दूसरे कमरे में खड़ा सब सुन रहा था.

‘‘आता हूं…’’ कहते हुए अजीत करिश्मा और रसिया के सामने ऐसा भोला बन कर आया, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो.

करिश्मा ने बनावटी गुस्सा करते हुए पूछा, ‘‘अजीत, तुम मेरी सहेली रसिया को घूरघूर कर देखते हो क्या?’’

‘‘घूरघूर कर तो नहीं, पर मैं जानने की कोशिश जरूर करता हूं कि ये कौन हैं, जो अकसर तुम से मिलने आया करती हैं,’’ अजीत ने कहा.

‘‘यह बात तो तुम मुझ से भी पूछ सकते थे. लो, अभी बता देती हूं. यह मेरी सहेली रसिया है.’’

‘‘रसिया… बड़ा प्यारा नाम है,’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा, तो करिश्मा ने रसिया से अपने भाई का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘रसिया, यह मेरा छोटा भाई अजीत है. इसे अच्छी तरह पहचान लो, फिर न कहना कि तुम्हें घूर रहा था.’’

‘‘ओ हो अजीत… मैं हूं रसिया. क्या तुम मुझ से दोस्ती करोगे?’’ रसिया ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं…’’ कहते हुए अजीत ने जोश के साथ अपना हाथ उस की ओर बढ़ाया.

रसिया ने उस से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘‘अजीत, तुम से मिल कर खुशी हुई. वैसे, तुम करते क्या हो?’’

‘‘मैं कालेज में पढ़ता हूं. जल्दी पढ़ाई खत्म कर के नौकरी करूंगा, ताकि अपनी बहन की शादी कर सकूं.’’

रसिया जोर से हंस पड़ी. उस के हंसने से उस के उभार कांपने लगे. यह देख कर अजीत के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

तभी रसिया ने कहा, ‘‘वाह अजीत, वाह, तुम तो जरूरत से ज्यादा समझदार हो गए हो. सिर्फ बहन की शादी करने का इरादा है या अपनी भी शादी करोगे?’’

‘‘अपनी भी शादी कर लूंगा, अगर तुम्हारी जैसी खूबसूरत लड़की मिली तो…’’ कहते हुए अजीत वहां से चला गया.

रात में जब अजीत अपने बिस्तर पर लेटा, तो रसिया के खयालों में खोने लगा. उसे बारबार रसिया के दोनों उभार कांपते दिखाई दे रहे थे. वह सिहर उठा.

2 दिन बाद अजीत रसिया से फिर अपने घर पर मिला. हंसीहंसी में रसिया ने उस से कह दिया, ‘‘अजीत, तुम मुझे बहुत प्यारे और अच्छे लगते हो.’’

अजीत को ऐसा लगा, मानो रसिया उस की ओर खिंच रही है. अजीत बोला, ‘‘रसिया, तुम भी मुझे बहुत अच्छी लगती हो. तुम मुझ से शादी करोगी?’’

यह सुन कर रसिया को हैरानी हुई. उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘तुम ने मेरे कहने का गलत मतलब लगाया है. तुम नहीं जानते कि मैं निचली जाति की हूं? ऐसा खयाल भी अपने मन में मत लाना. तुम्हारा समाज मुझे नफरत की निगाह से देखेगा. वेसे भी तुम मुझ से उम्र में बहुत छोटे हो. करिश्मा के नाते मैं भी तुम्हें अपना भाई समझने लगी थी.’’

अजीत कुछ नहीं बोला और बात आईगई हो गई.

समय तेजी से आगे बढ़ता गया. एक दिन करिश्मा ने अपने जन्मदिन पर अपनी सहेलियों को घर पर बुलाया. काफी चहलपहल में देर रात हो गई, तो रसिया घबराने लगी. उसे अपने घर जाना था. उस ने करिश्मा से कहा, ‘‘अजीत से कह दो कि वह मुझे मेरे घर छोड़ दे.’’

करिश्मा ने अजीत को पुकार कर कहा, ‘‘अजीत, जरा इधर आना. तुम रसिया को अपनी मोटरसाइकिल से उस के घर तक छोड़ आओ. आसमान में बादल घिर आए हैं. तेज बारिश हो सकती है.’’

‘‘इन से कह दो कि रात को यहीं रुक जाएं,’’ अजीत ने सुझाया.

‘‘नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. मेरे घर वाले परेशान होंगे. अगर तुम नहीं चल सकते, तो मैं अकेले ही चली जाऊंगी,’’ रसिया ने कहा.

‘‘नहीं, मैं आप को छोड़ दूंगा,’’ कह कर अजीत ने अपनी मोटरसाइकिल निकाली, तभी हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई. कुछ फासला पार करने पर तूफानी हवा के साथ खूब तेज बारिश और ओले गिरने लगे. ठंड भी बढ़ गई थी.

रसिया ने कहा, ‘‘अजीत, तेज बारिश हो रही है. क्यों न हम लोग कुछ देर के लिए किसी महफूज जगह पर रुक कर बारिश के बंद होने का इंतजार कर लें?’’

‘‘तुम्हारा कहना सही है रसिया. आगे कोई जगह मिल जाएगी, तो जरूर रुकेंगे.’’

बिजली की चमक में अजीत को एक सुनसान झोंपड़ी दिखाई दी. अजीत ने वहां पहुंच कर मोटरसाइकिल रोकी और दोनों झोंपड़ी के अंदर चले गए.

अजीत की नजर रसिया के भीगे कपड़ों पर पड़ी. वह एक पतली साड़ी पहन कर सजधज कर करिश्मा के जन्मदिन की पार्टी में गई थी. उसे क्या मालूम था कि ऐसे हालात का सामना करना पड़ेगा. पानी से भीगी साड़ी में उस का अंगअंग दिखाई दे रहा था.

रसिया का भीगा बदन अजीत को बेसब्र कर रहा था. वह बारबार सोचता कि ऐसे समय में रसिया उस की बांहों में समा जाए, तो उस के जिस्म में गरमी भर जाए,

कांपती हुई रसिया ने अजीत से कुछ कहना चाहा, लेकिन उस की जबान नहीं खुल सकी. लेकिन ठंड इतनी बढ़ गई थी कि उस से रहा नहीं गया. वह बोली, ‘‘भाई अजीत, मुझे बहुत ठंड लग रही है. कुछ देर मुझे अपने बदन से चिपका लो, ताकि थोड़ी गरमी मिल जाए.’’

‘‘क्यों नहीं, भाई का फर्ज है ऐसी हालत में मदद करना,’’ कह कर अजीत ने रसिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया. धीरेधीरे वह रसिया की पीठ को सहलाने लगा. रसिया को राहत मिली.

लेकिन अब अजीत के हाथ फिसलतेफिसलते रसिया के उभारों पर पड़ने लगे और उस ने समझा कि रसिया को एतराज नहीं है. तभी उस ने उस के उभारों को दबाना शुरू किया, तो रसिया ने अजीत की नीयत को भांप लिया.

रसिया उस से अलग होते हुए बोली, ‘‘अजीत, ऐसे नाजुक समय में क्या तुम करिश्मा के साथ भी ऐसी ही हरकत करते? तुम्हें शर्म नही आई?’’ कहते हुए रसिया ने अजीत के गाल पर कस कर चांटा मारा.

यह देख कर अजीत तिलमिला उठा. उस ने भी उसी तरह चांटा मारना चाहा, पर कुछ सोच कर रुक गया.

उस ने रसिया की पीठ सहलाते हुए जो सपने देखे थे, वे उस के वहम थे. रसिया उसे बिलकुल नहीं चाहती थी. जल्दबाजी में उस ने सारा खेल ही खत्म कर दिया. अगर रसिया ने उस की शिकायत करिश्मा से कर दी, तो गड़बड़ हो जाएगी.

अजीत झट से शर्मिंदगी दिखाते हुए बोला, ‘‘रसिया, मुझे माफ कर दो. मेरी शिकायत करिश्मा से मत करना.’’

‘‘ठीक है, नहीं करूंगी, लेकिन इस शर्त पर कि तुम यह सब बिलकुल भूल जाओगे,’’ रसिया ने कहा.

‘‘जरूरजरूर. दोबारा मैं ऐसा नहीं करूंगा. मैं ने समझा था कि दूसरी निचली जाति की लड़कियों की तरह शायद तुम भी कहीं दिलफेंक न हो.’’

‘‘तुम्हारे जैसे बड़े लोग ही हम निचली जाति की लड़कियों से गलत फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. सभी लड़कियां कमजोर नहीं होतीं. अब यहां रुकना ठीक नहीं है. बारिश भी कम हो गई है. अब हमें चलना चाहिए,’’ रसिया ने कहा.

दोनों मोटरसाइकिल से रसिया के घर पहुंचे. रसिया ने बारिश बंद होने तक अजीत को रोकना चाहा, लेकिन वह नहीं रुका.

उस दिन के बाद से अजीत अपने गाल पर हाथ फेरता, तो गुस्से में उस के रोंगटे खड़े हो जाते.

अजीत रसिया के चांटे को याद करता और तड़प उठता. सोचता कि रसिया ने चांटा मार कर उस की जो बेइज्जती की है, वह उसे जिंदगीभर भूल नहीं सकता. उस चांटे का जवाब वह जरूर देगा.

उस दिन करिश्मा के यहां खूब चहलपहल थी, क्योंकि उस की सगाई होने वाली थी. उस की सहेलियां नाचनेगाने में मस्त थीं. रसिया भी उस जश्न में शामिल थी, क्योंकि वह करिश्मा की खास सहेली जो थी. वह खूब सजधज  कर आई थी.

अजीत भी लड़कियों के साथ नाचने लगा. उस की नजर जब रसिया से टकराई, तो दोनों मुसकरा दिए. अजीत ने उसी समय मौके का फायदा उठाना चाहा.

अजीत ने झूमते हुए आगे बढ़ कर रसिया की कमर में हाथ डाला और अपनी बांहों में कस लिया. फिर उस के गालों को ऐसे चूमा कि उस के दांतों के निशान रसिया के गालों पर पड़ गए.

यह देख रसिया तिलमिला उठी और धक्का दे कर उस की बांहों से अलग हो गई. रसिया ने उस के गाल पर कई चांटे रसीद कर दिए. जश्न में खलबली मच गई. पहले तो लोग समझ ही नहीं पाए कि माजरा क्या है, लेकिन तुरंत रसिया की कठोर आवाज गूंजी, ‘‘अजीत, तुम ने आज इस भरी महफिल में केवल मेरा ही नहीं, बल्कि अपनी बहन औेर सगेसंबंधियों की बेइज्जती की है. मैं तुम पर थूकती हूं.

‘‘मैं सोचती थी कि शायद तुम उस दिन के चांटे को भूल गए हो, पर मुझे ऐसा लगता है कि तुम यही हरकतें अपनी बहन करिश्मा के साथ भी करते होगे.

‘‘अगर मैं जानती कि तुम्हारे दिल में बहनों की इसी तरह इज्जत होती है, तो यहां कभी न आती. ’’

रसिया ने करिश्मा के पास जा कर उस रात की घटना के बारे में बताया और यह भी बताया कि अजीत ने उस से भविष्य में ऐसा न होने के लिए माफी भी मांगी थी.

करिश्मा का सिर शर्म से झुक गया. उस की आखों से आंसू गिर पड़े. करिश्मा की दूसरी सहेलियों ने भी अजीत की थूथू की और वहां से बिना कुछ खाए रसिया के साथ वापस चली गईं.

नासमझ अजीत ने रसिया को जलील नहीं किया था, बल्कि अपने परिवार की बेइज्जती की थी. Story In Hindi

Hindi Family Story: नमक हलाल – कैसे उस ने नमक का फर्ज अदा किया

Hindi Family Story: बैठक की मेज पर रखा मोबाइल फोन बारबार बज रहा था. मनोहरा ने इधरउधर झांका. शायद उस के मालिक बाबू बंका सिंह गलती से मोबाइल फोन छोड़ कर गांव में ही कहीं जा चुके थे.

मनोहरा ने दौड़ कर मोबाइल फोन उठाया और कान से लगा लिया.

उधर से रोबदार जनाना आवाज आई, ‘हैलो, मैं निक्की की मां बोल रही हूं.’

अपनी मालकिन की मां का फोन पा कर मनोहरा घबराते हुए बोला, ‘‘जी, मालिक घर से बाहर गए हुए हैं.’’

‘अरे, तू उन का नौकर मनोहरा बोल रहा है क्या?’

‘‘जी…जी, मालकिन.’’

‘‘ठीक है, मुझे तुम से ही बात करनी है. कल निक्की बता रही थी कि तू जितना खयाल भैंस का रखता है, उतना खयाल निक्की का नहीं रखता. क्या यह बात सच है?’’

मनोहरा और घबरा उठा. वह अपनी सफाई में बोला, ‘‘नहीं… नहीं मालकिन, यह झूठ है. मैं निक्की मालकिन का हर हुक्म मानता हूं.’’

‘ठीक है, आइंदा उन की सेवा में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए,’ इतना कह कर मोबाइल फोन कट गया.

मनोहरा ने ठंडी सांस ली. उस का दिमाग दौड़ने लगा. फोन की आवाज जानीपहचानी सी लग रही थी. निक्की मालकिन जब से इस घर में आई हैं, तब से वे कई बार उसे बेवकूफ बना चुकी हैं. उस ने ओट ले कर आंगन में झांका. निक्की मालकिन हाथ में मोबाइल फोन लिए हंसी के मारे लोटपोट हो रही थीं.

मनोहरा सारा माजरा समझ गया. वह मुसकराता हुआ भैंस दुहने निकल पड़ा.

निक्की बाबू बंका सिंह की दूसरी पत्नी थीं. पहली पत्नी के बारे में गांव के लोगों का कहना था कि बच्चा नहीं जनने के चलते बाबू बंका सिंह ने उन्हें मारपीट कर घर से निकाल दिया था. बाद में वे मर गई थीं.

निक्की पढ़ीलिखी खूबसूरत थीं. वे इस बेमेल शादी के लिए बिलकुल तैयार नहीं थीं, लेकिन मांबाप की गरीबी और उन के आंसुओं ने उन्हें समझौता करने को मजबूर कर दिया था.

शादी के कई महीनों तक निक्की बिलकुल गुमसुम बनी रहीं. उन की जिंदगी सोने के पिंजरे में कैद तोते की तरह हो गई थी.

हालांकि बाबू बंका सिंह निक्की की सुखसुविधा का काफी ध्यान रखते थे, इस के बावजूद उम्र का फासला निक्की को खुलने नहीं दे रहा था.

मनोहरा घर का नौकर था. हमउम्र मनोहरा से बतियाने में निक्की को अच्छा लगता था. समय गुजरने के साथसाथ निक्की का जख्म भरता गया और वे खुल कर मनोहरा से हंसीठिठोली करने लगीं.

उस दिन बाबू बंका सिंह गांव की पंचायत में गए हुए थे. निक्की गपशप के मूड में थीं. सो, उन्होंने मनोहरा को अंदर बुला लिया.

निक्की मनोहरा की आंखों में आंखें डाल कर बोलीं, ‘‘अच्छा, बता उस दिन मोबाइल फोन पर मेरी मां से क्या बातें हुई थीं?’’

मनोहरा मन ही मन मुसकराया, फिर अनजान बनते हुए कहने लगा, ‘‘कह रही थीं कि मैं आप का जरा भी खयाल नहीं रखता.’’

‘‘हांहां, मेरी मां ठीक ही कह रही थीं. मेरे सामने तुम शरमाए से खड़े रहते हो. तुम्हीं बताओ, मैं किस से बातें करूं? बाबू बंका सिंह की मूंछें और लाललाल आंखें देख कर ही मैं डर जाती हूं. उन की कदकाठी देख कर मुझे अपने काका की याद आने लगती है. एक तुम्हीं हो, जो मुझे हमदर्द लगते हो…’’

इस बेमेल शादी पर गांव वाले तो थूथू कर ही रहे थे. खुद मनोहरा को भी नहीं सुहाया था, पर उस की हैसियत हमदर्दी जताने की नहीं थी. सो, वह चुपचाप निक्की की बात सुनता रहा.

मनोहरा को चुप देख कर निक्की बोल पड़ीं, ‘‘मनोहरा, तुम्हारी शादी के लिए मैं ने अपने मायके में 60 साल की खूबसूरत औरत पसंद की है…’’

‘‘60 साल,’’ कहते हुए मनोहरा की आंखें चौड़ी हो गईं.

‘‘इस में क्या हर्ज है? जब मेरी शादी 60 साल के मर्द के साथ हो सकती है, तो तुम्हारी क्यों नहीं?’’

‘‘नहीं मालकिन, शादी बराबर की उम्र वालों के बीच ही अच्छी लगती है.’’

‘‘तो तुम ने अपने मालिक को समझाया क्यों नहीं? उन्होंने एक लड़की की खुशहाल जिंदगी क्यों बरबाद कर दी?’’ कहते हुए निक्की की आंखें आंसुओं से भर आईं.

समय बीतता गया. निक्की की शादी के 5 साल गुजर गए, फिर भी आंगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूंज पाई. निक्की को ओझा, गुनी, संतमहात्मा सब को दिखाया गया, लेकिन नतीजा सिफर रहा. गांवसमाज में निक्की को ‘बांझ’ कहा जाने लगा.

निक्की मालकिन दिलेर थीं. उन्हें ओझागुनी के यहां चक्कर लगाना अच्छा नहीं लग रहा था. उन्होंने शहर के बड़े डाक्टर से अपने पति और खुद का चैकअप कराने की ठानी.

शहर के माहिर डाक्टर ने दोनों के नमूने जांच लिए और बोला, ‘‘देखिए बंका सिंह, 10 दिन बाद निक्की की एक और जांच होगी. फिर सारी रिपोर्टें सौंप दी जाएंगी.’’

देखतेदेखते 10 दिन गुजर गए. उन दिनों गेहूं की कटाई जोरों पर थी. आकाश में बादल उमड़घुमड़ रहे थे.

सो, किसानों में गेहूं समेटने की होड़ सी लगी थी.

बाबू बंका सिंह को भी दम मारने की फुरसत नहीं थी. वे दोबारा निक्की को चैकअप कराने में आनाकानी करने लगे. लेकिन निक्की की जिद के आगे उन की एक न चली. आखिर में मनोहरा को साथ ले कर जाने की बात तय हो गई.

दूसरे दिन निक्की मनोहरा को साथ ले कर सुबह वाली बस से डाक्टर के यहां चल पड़ीं. उस दिन डाक्टर के यहां ज्यादा भीड़ थी.

निक्की का नंबर आने पर डाक्टर ने चैकअप किया, फिर रिपोर्ट देते हुए बोला, ‘‘मैडम, आप बिलकुल ठीक हैं. फिर भी आप मां नहीं बन सकतीं, क्योंकि आप के पति की सारी रिपोर्टें ठीक नहीं हैं. आप के पति की उम्र काफी हो चुकी है, इसलिए उन्हें दवा से नहीं ठीक किया जा सकता है.’’

निक्की का चेहरा सफेद पड़ गया. डाक्टर उन की हालत को समझते हुए बोला, ‘‘घबराएं मत. विज्ञान काफी तरक्की कर चुका है. आप चाहें तो और भी रास्ते हैं.’’

निक्की डाक्टर के चैंबर से थके पैर निकली. बाहर मनोहरा उन का इंतजार कर रहा था. वह निक्की को सहारा देते हुए बोला, ‘‘मालकिन, सब ठीकठाक

तो है?’’

‘‘मनोहरा, मुझे कुछ चक्कर सा आ रहा है. शाम हो चुकी है. चलो, किसी रैस्टहाउस में रुक जाते हैं. कल सुबह वाली बस से गांव चलेंगे.’’

आटोरिकशा में बैठते हुए मनोहरा बोला, ‘‘मालकिन, गांव से हो कर निकलने वाली एक बस का समय होने वाला है. उस से हम लोग निकल चलते हैं. हम लोगों के आज नहीं पहुंचने पर कहीं मालिक नाराज नहीं हो जाएं.’’

‘‘भाड़ में जाए तुम्हारा मालिक. उन्होंने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा,’’ निक्की बिफर उठीं.

आटोरिकशा एक रैस्टहाउस में रुका. निक्की ने 2 बैड वाला कमरा बुक कराया और कमरे में जा कर निढाल पड़ गईं. उन के दिमाग में विचारों का पहिया घूमने लगा, ‘मेरे पति ने अपनी पहली पत्नी को बच्चा नहीं जनने के कारण ही घर से निकाला था, लेकिन खोट मेरे पति में है, यह कोई नहीं जान पाया. अगर इस बात को मैं ने उजागर किया, तो यह समाज मुझे बेहया कहने लगेगा. हो सकता है कि मेरा भी वही हाल हो, जो पहली पत्नी का हुआ था.’

निक्की के दिमाग के एक कोने

से आवाज आई, ‘डाक्टर ने बताया है

कि बच्चा पाने के और भी वैज्ञानिक रास्ते हैं…’

लेकिन दिमाग के दूसरे कोने ने इस सलाह को काट दिया, ‘क्या बाबू बंका सिंह अपनी झूठी शान के चलते ऐसा करने देंगे?’

सवालजवाब की चल रही इस आंधी में अपने को बेबस पा कर निक्की सुबकने लगीं.

मनोहरा को भी नींद नहीं आ रही थी. मालकिन के सुबकने से उस के होश उड़ गए. वह पास आ कर बोला, ‘‘मालकिन, आप रो क्यों रही हैं? क्या आप को कुछ हो रहा है?’’

निक्की का सुबकना बंद हो गया. उन्होंने जैसे फैसला कर लिया था. वे मनोहरा का हाथ पकड़ कर बोलीं, ‘‘मनोहरा, जो काम बाबू बंका सिंह

5 साल में नहीं कर पाए, वह काम तुझे करना है. बोलो, मेरा साथ दोगे?’’

मनोहरा निक्की की बातों का मतलब समझे बिना ही फटाक से बोल पड़ा,

‘‘मालकिन, मैं तो आप के लिए जान भी दे सकता हूं.’’

निक्की मालकिन मनोहरा के गले लग गईं. उन का बदन तवे की तरह जल रहा था. मनोहरा हैरान रह गया. वह निक्की से अलग होता हुआ बोला, ‘‘नहीं मालकिन, यह मुझ से नहीं होगा.’’

‘‘मनोहरा, डाक्टर का कहना है कि तुम्हारे मालिक में वह ताकत नहीं है, जिस से मैं मां बन सकूं. मैं तुम से बच्चा पाना चाहती हूं…’’

‘‘नहीं, यह नमक हरामी होगी.’’

‘‘मनोहरा, यह वक्त नमक हरामी या नमक हलाली का नहीं है. मेरे पास सिर्फ एक रास्ता बचा है और वह तुम हो. सोच लो, अगर मैं ने देहरी से बाहर पैर रखा, तो तुम्हारे मालिक की मूंछें नीची हो जाएंगी…’’ कहते हुए निक्की ने मनोहरा को अपनी बांहों में समेट लिया.

कोमल बदन की छुअन ने मनोहरा को मदहोश बना डाला. उस ने निक्की को अपनी बांहों में ऐसा जकड़ा कि उन के मुंह से आह निकल पड़ी.

घर आने के बाद भी लुकछिप कर यह सिलसिला चलता रहा. आखिरकार निक्की ने वह मंजिल पा ली, जिस की उन्हें दरकार थी.

गोदभराई रस्म के दिन बाबू बंका सिंह चहकते फिर रहे थे. निक्की दिल से मनोहरा की आभारी थीं, जिस ने एक उजड़ते घर को बचा लिया था. Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: मुझे बेबस न समझो – वजूद तलाशती नेहा

Best Hindi Kahani: नेहा शूटिंग के उस सीन को याद कर सिहर उठती थी. वह ओलिशा की बौडी डबल थी, सो सारे रेप सीन या उघड़े बदन वाले सीन उस पर ही फिल्माए जाते थे. वैसे तो अब उसे इन सब की आदत पड़ चुकी थी पर आज रेप सीन को विभिन्न कोणों से फिल्माने के चक्कर में वह काफी टूटी व थकी महसूस कर रही थी.

फिर देर रात तक नींद उस से कोसों दूर रही. अपनी ही चीखें, चाहे डायलौग ही थे, उस के कानों में गूंज कर उस के अपने ही अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे थे जिस के कारण उसे शारीरिक थकावट से ज्यादा दिमागी थकावट महसूस हो रही थी.

कब तक वह ऐसे दृश्यों पर अभिनय करती रहेगी, यह सवाल उस के सिर पर हथौड़े की तरह वार कर रहा था. विचारों के भंवर से बाहर निकलने के लिए वह कौफी का मग हाथ में पकड़ खिड़की के पास आ खड़ी हुई. बाहर आसपास की दुनिया देख उसे कुछ सुकून मिला ही था कि उसे देख 1-2 लोगों ने हाथ हिलाया और फिर आपस में कोई भद्दा मजाक कर खीखी कर हंसने लगे.

सब को पता है कि वह छोटीमोटी फिल्मी कलाकार है. पर शुक्र है यह नहीं पता कि वह किसी का बौडी डबल करती है. नहीं तो उसे वेश्या ही समझ लेते. खैर, दिमाग से यह कीड़ा बाहर फेंक वह कालेज जाने की तैयारी करने लगी. बस पकड़ने के लिए स्टौप पर खड़ी थी तो देखा कि 2-4 आवारा कुत्ते एक कुतिया के पीछे लार टपकाते उसे झपटने जा रहे थे. वह कुतिया जान बचा उस के पैरों के आसपास चक्कर लगाने लगी. तभी, एक पत्थर उठा उस ने कुत्तों को भगाया. कुतिया भाग कर एक नाले में छिप गई.

बाहर आवारा कुत्ते उस कुतिया के आने का इंतजार करने लगे. किसी ने भी कुत्तों को वहां से नहीं भगाया. शायद मन ही मन इस कुतिया का तमाशा देखने की चाह रही होगी भीड़ की. तभी उस की बस आ गई और वह अपना बसपास दिखा सीट खाली होने का इंतजार करने लगी.

सीट का इंतजार करतेकरते आत्ममंथन भी करने लगी. शूटिंग के समय तो वह भी इस निरीह कुतिया की तरह लार टपकाते साथी सदस्यों से इसी तरह बचती फिरती रहती है क्योंकि उन की निगाह में ऐसे सीन देने वाली युवती का अपना कोई चरित्र नहीं होता. तभी तो सीन फिल्माते समय जानबूझ कर एक ही सीन को बीसियों बार रीटेक करवाया जाता है.

कभी ऐंगल की बात तो कभी कपड़े ज्यादा नहीं उघड़े, क्याक्या बहाने नहीं बनाए जाते उस की बेचारगी का फायदा उठाने के लिए. इसी कारण वह भी हर सीन के बाद चुपचाप एक कोने में बैठ जाती है. एक बार उस ने छूट दे दी तो गरीब की जोरु बन रह जाएगी.

उस की अपनी बेबसी, शूटिंग पर उपस्थित लोगों की कुटिल मुसकान भेदती निगाहें व अश्लील इशारे उस के अंतर्मन को क्षतविक्षत कर देते हैं पर वह भी क्या करे. बड़ेबड़े सपने ले कर वह चंडीगढ़ आई थी. उच्च शिक्षा के साथसाथ मौडलिंग व फिल्मों में काम करने के लिए. सब कहते थे कि वह फिल्मी सितारा लगती है, एकदम परफैक्ट फिगर है, कोई भी डायरैक्टर उसे देखते ही फिल्मों में हीरोईन साइन कर लेगा.

उच्च शिक्षा का सपना ले कर चंडीगढ़ आई नेहा की मुंबई तो अकेले जाने की व रहने की हिम्मत न पड़ी. पर यहां पढ़ाई के दौरान ही चंडीगढ़ में थोड़ी जानपहचान के बलबूते पर उसे मौडलिंग के काम मिलने लगे थे. मांबाप के मना करने के बावजूद वह इस आग के दरिया में कूद पड़ी. मौडलिंग से संपर्क बने तो इक्कादुक्का टीवी सीरियल में काम भी मिल गया.

उसे इतनी जल्दी मिलती शोहरत कुछ नामीगिरामी कलाकारों को रास नहीं आई. पालीवुड में उन को नेहा का आना खतरे की घंटी लगने लगा. उन्होंने उस की छोटीछोटी कमियों को बढ़ाचढ़ा कर दिखा उस के यहां पैर ही न टिकने दिए. मांबाप ने भी सहारा देने की जगह खरीखोटी सुना दी. वह तो भला हो उस के पत्रकार मित्र साहिल का जिस ने उसे फिल्मों में ओलिशा का बौडी डबल बनने की सलाह दी और फिल्मों में काम दिलवा उसे आर्थिक व मानसिक संकट से उबार लिया. अब तो यही काम उस की रोजीरोटी है.

आज कोई रिश्तेदार उस का अपना नहीं, सभी ने उस से मुंह मोड़ लिया है. इसी वजह से पढ़ाई दोबारा शुरू कर वह कुछ बनना चाहती है ताकि इस से छुटकारा पा सके. पर क्या करे, कहां जाए, मांबाप तो स्वीकारने से रहे. ‘नहीं, नहीं, ऐसे बेचारगी वाले नैगेटिव विचारों को वह फन नहीं उठाने देगी. यही कमजोरी औरों को फायदा उठाने का मौका देगी और वह उस बसस्टौप वाली निरीह कुतिया की तरह किसी के पैरों पर गिड़गिड़ाएगी नहीं.’ इस सोच ने उसे संबल प्रदान किया.

वर्तमान से रूबरू होते ही वह समझ गई कि आज भीड़ से भरी बस में उसे सीट मिलने से तो रही, इसलिए यूनिवर्सिटी तक खड़े हो कर ही जाना पड़ेगा. चलो, केवल 20 मिनट का ही सफर रह गया है, वह भी बस आराम से कट जाए. वैसे भी गली के आवारा कुत्तों से ज्यादा अश्लील व खूंखार तो कई बार सहयात्री होते हैं. सीट मिली तो विचारों की तंद्रा भी टूटी और नेहा को चैन भी आया क्योंकि आज नकारात्मक विचारों की कड़ी टूट ही नहीं रही थी.

बगल की सीट खाली हुई तो लाठी पकड़े बूढ़े ने जानबूझ कर उस पर अपना भार डाल दिया. वह किनारे खिसकी तो वृद्ध व्यक्ति ने हद ही कर दी. बैठतेबैठते उस के हिप्स पर च्यूंटी काट दी. उस ने घूर कर देखा तो खींसे निपोर सौरीसौरी बोलने लगा कि गलती से हाथ लग गया था.

जैसे ही बस रुकी, सीट बदल ली. पर यह तो दिन की शुरुआत थी. तभी अचानक बस रुकी और पीछे खड़ा व्यक्ति उस पर झूल पड़ा. वह झटके से उस वृद्ध के ऊपर लुढ़क गई. उस ने खड़े हो कर बाकी सफर करना तय करना ही सही समझा. और अपनी सीट से खड़ी हो आगे दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी. अभी वह खड़ी ही हुई थी कि तभी उसे पीछे कुछ गड़ता सा महसूस हुआ.

पीछे खड़ा 17-18 साल का भारी सा लड़का उस के साथ सट कर गंदी हरकत करने लगा. उस ने उसे धकियाते हुए लताड़ा तो खींसें निपोरते उस ने नेहा पर कटाक्ष किया, ‘‘इतनी ही नाजुक है तो अपनी सवारी पर आया कर.’’

वह मुंह फेर खड़ी हो गई. कौन इन कुत्तों के मुंह लगे. इन कुत्तों का शिकार नहीं बनना उसे. उस के जवाब न देने के कारण उस लड़के की हिम्मत बढ़ गई. वह कभी पीठ पर हाथ फेरता तो कभी उस के हिप्स पर. उस की घुटन देख एक बुजुर्ग सरदारजी ने उसे अपनी सीट सौंप दी. वैसे तो उस का स्टौप आने ही वाला था फिर भी उस ने बैठने में ही भलाई समझी और सिमट कर अपनी सीट पर बैठ गई.

पता नहीं, उस की इस बात को उस लड़के ने कैसे लिया क्योंकि स्टौप आने पर जैसे ही वह उठी तो उस लड़के ने उस के रास्ते में पैर अड़ा दिया. वह गिरतेगिरते बची. इस हरकत से जब उस बुजुर्ग सरदारजी ने उस लड़के को टोका तो उस ने भरी बस में उन्हें 2 मुक्के मार, पीछे सीट पर धकेल दिया. उन्हें बचाने के लिए कोई न उठा. ड्राइवर, कंडक्टर व सारी सवारियां मूकदर्शक बन तमाशा देखती रहीं जिस से उस लड़के की हिम्मत और बढ़ गई.

इस सब तमाशे की वजह से नेहा अपने स्टौप पर उतर ही नहीं पाई. लगा कौरवों की सभा में फंस कर रह गई है. तभी लालबत्ती पर बस रुकी. नेहा ने वहीं उतरने में भलाई समझी. पर यहां भी मुसीबत ही हाथ लगी. सोचने और कूदने में समय लग गया और उस के कूदतेकूदते ही बस चल पड़ी और वह सीधा सड़क पर गिरी. ज्यादा चोट नहीं लगी. हां, कुछ गाड़ी वालों ने गालियां जरूर सुना दीं.

तभी, जैसे ही वह खड़ी हुई तो 2 मजबूत हाथों ने उसे घुमा कर अपनी तरफ कर लिया और फुटपाथ की तरफ खींच कर ले आए.

जैसे ही उस अनाम व्यक्ति को धन्यवाद करने के लिए उस ने उस की तरफ देखा तो उस की चीख गले में ही घुट कर रह गई. यह तो वही दुष्ट था और भरी सड़क से किनारे ला उस की इज्जत पर हमला करना चाहता था. चलतीदौड़ती सड़क को देख नेहा ने हिम्मत जुटाई और 2 करारे थप्पड़ उस दुष्ट के मुंह पर जड़ दिए.

नेहा ने कड़क लहजे में पूछा, ‘‘क्या बदतमीजी है, तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’

‘‘ओ मेरी रानी, तुम्हें तो पा कर ही रहूंगा. पहले मेरे इन गालों पर चुंबन दे, इन्हें सहलाओ, तभी तुम्हें जाने दूंगा. कब तक तड़पाओगी, मेरी जान.’’ वह वहशी ठहाका मार कर हंसा और उसे अपनी तरफ खींचने लगा. नेहा समझ गई कि कोई बड़ी मुसीबत आन पड़ी है,

अपनी रक्षा स्वयं ही करनी होगी. सो, उस ने कस कर पकड़े अपने बैग में से अपने सुरक्षा कवच लालमिर्च पाउडर और मोबाइल को निकालने के लिए जद्दोजेहद शुरू की. आज तक कभी जरूरत नहीं पड़ी थी मिर्चपाउडर की.

इस मुसीबत में हड़बड़ाहट में न तो उसे मिर्चपाउडर मिल रहा था और न ही मोबाइल. बेबस हो उस ने बढ़ती भीड़ की तरफ झांका. कई लोग उस की सहायता करने के बजाय अपनेअपने मोबाइल से इस सारे कांड का वीडियो बना रहे थे.

उस ने सहायता के लिए गुहार लगाई. इक्कादुक्का लोग उस की सहायता को आगे बढ़े भी तो भीड़ ने उन के कदम थाम लिए, यह कह कर कि ‘देखते नहीं, शूटिंग चल रही है. कल भी यहीं एक शूटिंग चल रही थी, किसी ने ऐसे ही हस्तक्षेप करने की कोशिश की तो बाउंसरों ने उस की खासी पिटाई कर दी थी.’

सारी भीड़ शूटिंग का मजा लेने के लिए घेरा बना खड़ी हो गई. यह सब सुनदेख नेहा का दिमाग पलभर के लिए सुन्न हो गया. क्या करे? वहां कोई भी मौके की नजाकत नहीं समझ रहा था. लगता था सभी बहती गंगा में हाथ धोना चाहते थे.

वैसे भी आजकल तो सजा बलात्कारी नहीं, बलात्कार होने वाली नारी को भुगतनी पड़ती है. लोगबाग तो बलात्कारी, आतंकवादी और हत्यारों के साथ सैल्फी ले हर्षित महसूस करते हैं. नहीं, वह दूसरी ‘निर्भया’ नहीं बनेगी. निर्बल नहीं, निर्भय होना है उसे, इस सोच के साथ जैसे ही वह अपने बैग में हाथ डाल अपने ‘हथियार’ निकालने लगी तो उस शख्स ने मौका पाते ही उसे जमीन पर गिरा दिया. स्वयं नेहा की छाती पर बैठ गया और बोला, ‘‘करती है, किस या नहीं. मैं चंडीगढ़ का किसर बौय हूं. देखता हूं तुम मुझे कैसे इनकार करती हो.’’

उस की इस हरकत पर भीड़ ने तालियां बजानी शुरू कर दीं. एक ने फिकरा कसा, ‘‘क्या बढि़या डायलौग है. पिक्चर सुपरहिट है, मेरे भाई. जारी रखो. बिलकुल असली सा मजा आ रहा है.’’

एक के बाद दूसरी आवाजें आ रही थीं. तब तक वह लड़का अपने होंठों को उस के होंठों तक ले आया. नेहा ने हिम्मत जुटा उसे परे धकेला. जैसे ही वह पीछे हटा तो दूर गिरा नेहा का बैग उस लड़के के पैरों से लग कर नेहा के हाथों पर आ गिरा. आननफानन नेहा ने लालमिर्च का पैकेट ढूंढ़ने की कोशिश की. उस के हाथ में पैकेट आता, उस से पहले ही वह लड़का अपनी जींस की जिप खोल उस की तरफ बढ़ा और…

भीड़ इस सब का पूरा लुत्फ उठा रही थी. लोगों के हाथ मोबाइल पर और आंखें उन दोनों पर टिकी थीं ताकि कोई भी पल ‘मिस’ न हो जाए.

भीड़ में से कोई चिल्लाया, ‘अजी, वाह, यह तो ब्लू फिल्म की शूटिंग चल रही है.’ नेहा समझ गई वासना से लिप्त भीड़ उस की कोई सहायता नहीं करेगी. क्या पता 1-2 लोग और इस मौके का फायदा उठाने को आ जाएं. उसे अपनी रक्षा खुद करनी होगी. हिम्मत जुटा उस ने हाथ में आए मिर्च के पैकेट को बाहर निकाला और उस दुष्ट की आंखों में झोंक दिया.

जब तक वह आंखें मलता तब तक नेहा ने अपने मिर्च वाले हाथों से उस का ‘वही’ अंग जिप में से निकाल कर दांतों में भींच लिया. खून का फौआरा फूट पड़ा. लड़का दर्द से बिलबिला, सड़क पर लोटने लगा.

सारी भीड़ हक्कीबक्की रह गई. वीरांगना के समान नेहा उठ खड़ी हुई. कपड़े झाड़ उस ने मिर्च का पैकेट हाथ में ले नपुंसक भीड़ पर छिड़क दिया, ‘‘लो, अब खींचों फोटो अपना व अपने इस साथी दरिंदे का.’’ और पिच्च से भीड़ पर थूक दिया. वह आगे बढ़ गई. भीड़ ने उस के लिए खुद ही रास्ता बना दिया. Best Hindi Kahani

Bihar Elections 2025 में बौलीवुड एक्ट्रेस की एंट्री, सामने आई सच्चाई

Bihar Elections 2025: जैसे-जैसे बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राज्य का सियासी माहौल भी लगातार गरमाता जा रहा है. इस चुनावी माहौल के बीच भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े कई नाम चर्चा में बने हुए हैं. खासकर भोजपुरी पावर स्टार पवन सिंह और उनकी पत्नी ज्योति सिंह के बीच चल रहे विवाद ने सोशल मीडिया पर खूब हलचल मचा रखी है. दोनों के सपोर्टर्स एक-दूसरे के पक्ष में खुलकर पोस्ट कर रहे हैं, जिससे यह मामला और ज्यादा सुर्खियों में आ गया है. इसी बीच, इस मुद्दे पर भोजपुरी सुपरस्टार खेसारीलाल यादव का भी बयान सामने आया था जिसमें उन्होनें पवन सिंह को गलत ठहराया था.

इसी बीच सोशल मीडिया पर एक तस्वीर ने सबका ध्यान खींच लिया है, जिसमें बौलिवुड एक्ट्रेस रवीना टंडन और राजद नेता तेजस्वी यादव एक साथ नजर आ रहे हैं. इस तस्वीर के वायरल होते ही अफवाहें उड़ने लगीं कि रवीना टंडन अब राजनीति में कदम रख रही हैं और राजद के लिए प्रचार करने वाली हैं. हालांकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है.

जांच में पता चला कि यह पोस्ट नया नहीं बल्कि 16 नवंबर 2024 का है, जिसे तेजस्वी यादव ने अपने फेसबुक अकाउंट से शेयर किया था. उस समय उन्होंने कैप्शन में लिखा था – “सुप्रसिद्ध अभिनेत्री रवीना टंडन जी से आज एयरपोर्ट पर मुलाकात हुई.”

आपको बता दें, हाल ही में एक्ट्रेस अक्षरा सिंह की एक फोटो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती दिखी. इस फोटो में वे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के साथ नजर आ रही हैं. अक्षरा ने फोटो शेयर करते हुए लिखा था, “आज बिहार के केंद्रीय मंत्री माननीय गिरिराज सिंह जी से शिष्टाचार और आशीर्वाद प्राप्त किया.” अक्षरा की इस पोस्ट के सामने आते ही फैंस और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है कि क्या अब वे भी राजनीति में कदम रखने की तैयारी कर रही हैं. Bihar Elections 2025

Hindi Kahani: पाखंड का अंत – बिंदु ने खोली ढोंगी बाबा की पोल

Hindi Kahani: बिंदु के मातापिता बचपन में ही गुजर गए थे, पर मरने से पहले वे बिंदु का रिश्ता भमुआपुर के चौधरी हरिहर के बेटे बिरजू से कर गए थे.

उस समय बिंदु 2 साल की थी और बिरजू 5 साल का. बिंदु के मातापिता के मरने के बाद उसे उस के चाचा ने पालापोसा था.

बिंदु के चाचा बहुत ही नेकदिल इनसान थे. उन्होंने बिंदु को शहर में रख कर पढ़ायालिखाया था. यही वजह थी कि 17वें साल में कदम रख चुकी बिंदु 12वीं पास कर चुकी थी.

बिरजू के घर से गौने के लिए कई प्रस्ताव आए, लेकिन बिंदु के चाचा ने उन्हें साफ मना कर दिया था कि वे गौना उस के बालिग होने के बाद ही करेंगे.

उधर बिरजू भी जवान हो गया था. उस का गठीला बदन देख कर गांव की कई लड़कियां ठंडी आहें भरती थीं. पर  बिरजू उन्हें घास तक नहीं डालता था.

‘‘अरे, हम पर भले ही नजर न डाल, पर शहर जा कर अपनी जोरू को तो ले आ,’’ एक दिन चमेली ने बिरजू का रास्ता रोकते हुए कहा.

‘‘ले आऊंगा. तुझे क्या? चल, हट मेरे रास्ते से.’’

‘‘क्या तेरी औरत के संग रहने की इच्छा नहीं होती? कहीं वो तो नहीं है तू…?’’ चमेली ने एक आंख दबा कर कहा, तो उस की हमउम्र सहेलियां खिलखिला कर हंस पड़ीं.

‘‘चमेली, ज्यादा मत बन. मैं ने कह तो दिया, मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं हैं,’’ कहते हुए बिरजू ने आंखें तरेरीं, तो वे सब भाग गईं.

उधर बिंदु की गदराई जवानी व अदाएं देख कर स्कूल के लड़के उस के आसपास मंडराते रहते थे.

गोरा बदन, आंखें बड़ीबड़ी, उभरी हुई छाती… जब बिंदु अपने बालों को झटकती, तो कई मजनू आहें भरने लगते.

बिंदु को भी सजनासंवरना भाने लगा था. जब कोई लड़का उसे प्यासी नजरों से देखता, तो वह भी तिरछी नजरों से उसे निहार लेती.

बिंदु के रंगढंग और बिरजू के घर वालों के बढ़ते दबाव के चलते उस के चाचा ने गौने की तारीख तय कर दी और उसी दिन बिरजू आ कर अपनी दुलहन को ले गया.

शहर में पलबढ़ी बिंदु को गांव में आ कर थोड़ा अजीब तो लगा, पर बिरजू को पा कर वह सबकुछ भूल गई.

बिंदु को बहुत चाहने वाला पति मिला था. दिनभर खेत में जीतोड़ मेहनत कर के जब शाम को बिरजू घर आता, तो बिंदु उस का इंतजार करती मिलती.

रात होते ही मौका पाकर बिरजू बिंदु को अपनी मजबूत बांहों में कस कर अपने तपते होंठ उस के नरम गुलाबी होंठों पर रख देता था.

कब 2 साल बीत गए, पता ही नहीं चला. बिंदु और बिरजू अपनी हसीन दुनिया में खोए हुए थे कि एक दिन बिंदु की सास अपने पति से पोते की चाहत जताते हुए बोलीं, ‘‘बहू के पैर अभी तक भारी क्यों नहीं हुए?’’

सचाई तो यह थी कि यह बात घर में सभी को चुभ रही थी.

‘‘सुनो,’’ एक दिन बिरजू ने बिंदु के लंबे बालों को सहलाते हुए पूछा, ‘‘हमारा बच्चा कब आएगा?’’

‘‘मुझे क्या मालूम… यह तो तुम जानो,’’ कहते हुए बिंदु शरमा गई.

‘‘मां को पोते का मुंह देखने की बड़ी तमन्ना है.’’

‘‘और तुम्हारी?’’

‘‘वह तो है ही, मेरी जान,’’ बिरजू ने बिंदु को खुद से सटाते हुए कहा और बत्ती बुझा दी.

‘‘मुझे लगता है, बहू में कोई कमी है. 3 साल हो गए ब्याह हुए और अभी तक गोद सूनी है. जबकि अपने बिरजू के साथ ही गोपाल का गौना हुआ था, वह तो 2 बच्चों का बाप भी बन गया है,’’ एक दिन पड़ोस की काकी घर आईं और बोलीं.

बिंदु के कानों तक जब ऐसी बातें पहुंचतीं, तो वह दुखी हो जाती. वह भी यह सोचने पर मजबूर हो जाती कि आखिर हम पतिपत्नी तो कोई ‘बचाव’ भी नहीं करते, फिर क्या वजह है कि

3 साल होने पर भी मैं मां नहीं बन पाई?

इस बार जब वह अपने मायके गई, तो उस ने लेडी डाक्टर से अपनी जांच कराई. पता चला कि उस की बच्चेदानी की दोनों नलियां बंद हैं. इस वजह से बच्चा ठहर नहीं रहा है.

यह जान कर बिंदु घबरा गई.

‘‘क्या अब मैं कभी मां नहीं बन पाऊंगी?’’ डाक्टर से पूछने पर बिंदु का गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया.

‘‘ऐसी बात नहीं है. आजकल विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है. तुम जैसी औरतें भी मां बन सकती हैं,’’ डाक्टर ने कहा, तो बिंदु को चेहरा खिल उठा.

गांव आ कर उस ने बिरजू को सारी बात बताई और कहा, ‘‘तुम्हें मेरे साथ कुछ दिनों के लिए शहर चलना होगा.’’

‘‘शहर तो हम लोग बाद में जाएंगे, पहले तुम आज शाम को बंगाली बाबा के आश्रम में जा कर चमत्कारी भभूत का प्रसाद ले आना. सुना है कि उस के प्रसाद से कई बांझ औरतों के बच्चे हो गए हैं,’’ बिरजू बोला.

‘‘यह तुम कैसी अनपढ़ों वाली बातें कर रहे हो? तुम्हें ऐसा करने को किस

ने कहा?’’

‘‘मां ने.’’

बिंदु ने कहा, ‘‘देखिए, मांजी तो पुराने जमाने की हैं, इसलिए वे इन बातों पर भरोसा कर सकती हैं, पर हम तो जानते हैं कि ये बाबा वगैरह एक नंबर के बदमाश होते हैं. भोलीभाली औरतों को चमत्कार के जाल में फंसा कर…

‘‘नहीं, मैं तो नहीं जाऊंगी किसी के पास,’’ बिंदु ने बहुत आनाकानी की, पर उस की एक न सुनी गई.

बिंदु समझ गई कि अगर उस ने सूझबूझ से काम नहीं लिया, तो उस का घरसंसार उजड़ जाएगा. उस ने मजबूती से हालात का सामना करने की ठान ली.

बाबा के आश्रम में पहुंच कर बिंदु ने 2-3 औरतों से बात की, तो उस का शक सचाई में बदल गया.

उन औरतों में से एक ने उसे बताया, ‘‘बाबा मुझे अपने आश्रम के अंदरूनी हिस्से में ले गया, जहां घना अंधेरा था.’’

‘‘फिर क्या हुआ तुम्हारे साथ?’’

‘‘पहले तो बाबा ने मुझे शरबत जैसा कुछ पीने को दिया. शरबत पी कर मैं बेहोश हो गई और जब मैं होश में आई, तो ऐसा लगा जैसे मैं ने बहुत मेहनत का काम किया हो.’’

‘‘और भभूत?’’

‘‘वह पुडि़या यह रही,’’ कहते हुए महिला ने हाथ आगे बढ़ा कर भभूत की पुडि़या दिखाई, तो बिंदु पहचान गई कि वह केवल राख ही है.

अगले दिन बिंदु फिर आश्रम में गई, तभी एक सास अपनी जवान बहू को ले कर वहां आई. उसे भी बच्चा नहीं ठहर रहा था.

बाबा ने उसे अंदर आने को कहा. उस के बाद बिंदु की बारी थी, पर जैसे ही वह औरत बाबा के साथ अंदर गई, बिंदु भी नजर बचा कर अंदर घुस गई.

बाबा ने उस औरत को कुछ पीने को दिया. जब वह बेहोश हो गई, तो बाबा ने उस के कपड़े हटा कर…

बिंदु यह सब देख कर हैरान रह गई. उस ने इरादे के मुताबिक अपने कपड़ों में छिपाया हुआ कैमरा निकाला और कई फोटो खींच लिए.

वह औरत तो बेहोश थी और बाबा वासना के खेल में मदहोश था. भला कैमरे की फ्लैश पर किस का ध्यान जाता.

कुछ दिनों बाद बिंदु ने भरी पंचायत में थानेदार के सामने वे फोटो दिखाए. इस से पंचायत में खलबली मच गई.

बाबा को उस के चेलों समेत हवालात में बंद कर दिया गया, पर तब तक अपने झूठे चमत्कार के बहाने वह न जाने कितनी ही औरतों की इज्जत लूट चुका था. खुद संरपच की बेटी विमला भी

उस पाखंडी के हाथों अपनी इज्जत लुटा चुकी थी.

पूरे गांव में बिंदु के हौसले और उस की सूझबूझ की चर्चा हो रही थी. जिस ने न केवल अपनी इज्जत बचा ली थी, बल्कि गांव की बाकी मासूम युवतियों की जिंदगी बरबाद होने से बचा ली थी.

शहर जा कर बिंदु ने डाक्टर से अपना इलाज कराया और महीनेभर बाद गांव लौटी.

तीसरे महीने जब वह उलटी करने के लिए गुसलखाने की तरफ दौड़ी, तो बिरजू की मां व पूरे घर वालों का चेहरा खुशी से खिल उठा. Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: बंद किताब – रत्ना के लिए क्या करना चाहता था अभिषेक

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‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

‘‘10 साल पहले किन हालात में तुम्हारी शादी हुई थी, वह भी मैं जानता हूं. उस समय तुम 20 साल की थीं और प्रोफैसर साहब 50 के थे. शादी से ले कर आज तक मैं ने तुम्हारी आंखों में खुशी नहीं देखी है. तुम्हारी हर मुसकराहट में मजबूरी होती है.’’

‘‘वह तो अपनाअपना नसीब है.’’

‘‘देखो, नसीब, किस्मत, भाग्य का कोई मतलब नहीं होता. 2 विश्व युद्ध हुए, जिन में करोड़ों आदमी मार दिए गए. इस देश ने 4 युद्ध झेले हैं. उन में भी लाखों लोग मारे गए. बंगलादेश की आजादी की लड़ाई में 20 लाख बेगुनाह लोगों की हत्याएं हुईं. क्या यह मान लिया जाए कि सब की किस्मत

खराब थी?

‘‘उन में से हजारों तो भगवान पर भरोसा करने वाले भी होंगे, लेकिन कोई भगवान या खुदा उन्हें बचाने नहीं आया. इसलिए इन बातों को भूल जाओ. ये बातें सिर्फ कहने और सुनने में अच्छी लगती हैं. मैं सिर्फ 25 हजार रुपए लूंगा और बड़ी सफाई से तुम्हारे बूढ़े पति को रास्ते से हटा दूंगा.’’

अभिषेक की बातें सुन कर रत्ना चीख पड़ी, ‘‘चले जाओ यहां से. दोबारा अपना मुंह मत दिखाना. तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं इतनी नीचता पर उतर आऊंगी?’’

‘‘अभी जाता हूं, लेकिन 2 दिन के बाद फिर आऊंगा. शायद तब तक मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाए,’’ इतना कह कर अभिषेक लौट गया.

रत्ना अपने बैडरूम में जा कर फफकफफक कर रोने लगी. अभिषेक ने जोकुछ कहा था, वह बिलकुल सही था.

रत्ना को ताज्जुब हो रहा था कि वह उस के बारे में इतनी सारी बातें कैसे जानता था. हो सकता है कि उस का कोई दोस्त रत्ना के कालेज में पढ़ता रहा हो, क्योंकि वह तो रत्ना के साथ कालेज में था नहीं. वह उस की कालोनी में भी नहीं रहता था.

रत्ना के पति बीमारी के पहले रोज सुबह टहलने जाया करते थे. हो सकता है कि अभिषेक भी उन के साथ टहलने जाता रहा हो. वहीं उस का उस के पति से परिचय हुआ हो और उन्होंने ही ये सारी बातें उसे बता दी हों. उस के लिए अभिषेक इतना बड़ा जोखिम क्यों उठाना चाहता है. आखिर यह तो एक तरह की हत्या ही हुई. बात खुल भी सकती है. कहीं अभिषेक का यह पेशा तो नहीं है? बेमेल शादी केवल उसी की तो नहीं हुई है. इस तरह के बहुत सारे मामले हैं. अभिषेक के चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता कि वह अपराधी किस्म का आदमी है. कहीं उस के दिल में उस के लिए प्यार तो नहीं पैदा हो गया है.

रत्ना को किसी भी तरह के सुख की कमी नहीं थी. प्रोफैसर साहब अच्छीखासी तनख्वाह पाते थे. उस के लिए काफीकुछ कर रखा था. 5 कमरों का मकान, 3 लाख के जेवर, 5 लाख बैंक बैलेंस, सबकुछ उस के हाथ में था. 50 हजार रुपए सालाना तो प्रोफैसर साहब की किताबों की रौयल्टी आती थी. इन सब बातों के बावजूद रत्ना को जिस्मानी सुख कभी नहीं मिल सका. प्रोफैसर साहब की पहली बीवी बिना किसी बालबच्चे के मरी थी. रत्ना को भी कोई बच्चा नहीं था. कसबाई माहौल में पलीबढ़ी रत्ना पति को मारने का कलंक अपने सिर लेने की हिम्मत नहीं कर सकती थी.

रत्ना ने अभिषेक से चले जाने के लिए कह तो दिया था, लेकिन बाद में उसे लगने लगा था कि उस की बात को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था. रत्ना अपनेआप को तोलने लगी थी कि 2 दिन के बाद अभिषेक आएगा, तो वह उस को क्या जवाब देगी. इस योजना में शामिल होने की उस की हिम्मत नहीं हो पा रही थी.

अभिषेक अपने वादे के मुताबिक 2 दिन बाद आया. इस बार रत्ना उसे चले जाने को नहीं कह सकी. उस की आवाज में पहले वाली कठोरता भी नहीं थी. रत्ना को देखते ही अभिषेक मुसकराया, ‘‘हां बताओ, तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘कहीं बात खुल गई तो…’’

‘‘वह सब मेरे ऊपर छोड़ दो. मैं सारी बातें इतनी खूबसूरती के साथ करूंगा कि किसी को भी पता नहीं चलेगा. हां, इस काम के लिए 10 हजार रुपए बतौर पेशगी देनी होगी. यह मत समझो कि यह मेरा पेशा है. मैं यह सब तुम्हारे लिए करूंगा.’’

‘‘मेरे लिए क्यों?’’

‘‘सही बात यह है कि मैं तुम्हें  पिछले 15 साल से जानता हूं. तुम्हारे पिता ने मुझे प्राइमरी स्कूल में पढ़ाया था. मैं जानता हूं कि किन मजबूरियों में गुरुजी ने तुम्हारी शादी इस बूढ़े प्रोफैसर से की थी.’’

‘‘मेरी इज्जत तो इन्हीं की वजह से है. इन के न रहने पर तो मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘जब से तुम्हारी शादी हुई है, तभी से तुम अकेली हो गई रत्ना, और आज तक अकेली हो.’’

‘‘मुझे भीतर से बहुत डर लग रहा है.’’

‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. अगर भेद खुल भी जाता है, तो मैं सबकुछ अपने ऊपर ले लूंगा, तुम्हारा नाम कहीं भी नहीं आने पाएगा. मैं तुम्हें सुखी देखना चाहता हूं रत्ना. मेरा और कोई दूसरा मकसद नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, तुम्हें पेशगी के रुपए मिल जाएंगे,’’ कह कर रत्ना भीतर गई और 10 हजार रुपए की एक गड्डी ला कर अभिषेक के हाथों पर रख दी. रुपए ले कर अभिषेक वापस लौट गया.

तय समय पर रत्ना के पति को नर्सिंग होम में भरती करवा दिया गया. सभी तरह की जांच होने के बाद प्रोफैसर साहब का आपरेशन किया गया, जो पूरी तरह से कामयाब रहा. बाद में उन्हें खून चढ़ाया जाना था. अभिषेक सर्जन राजेश की पूरी मदद करता रहा. डाक्टर साहब आपरेशन के बाद अपने बंगले पर चले गए थे. खून चढ़ाने वगैरह की सारी जिम्मेदारी अभिषेक पर थी. सारा इंतजाम कर के अभिषेक अपनी जगह पर आ कर बैठ गया था. रत्ना भी पास ही कुरसी पर बैठी हुई थी. अभिषेक ने उसे आराम करने को कह दिया था.

रत्ना ने आंखें मूंद ली थीं, पर उस के भीतर उथलपुथल मची हुई थी. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था. दिमाग में अनेकअनेक तरह के विचार पैदा हो रहे थे. अभिषेक ड्रिप में बूंदबूंद गिर कर प्रोफैसर के शरीर में जाते हुए खून को देख रहा था. अचानक वह उठा. अब तक रात काफी गहरी हो गई थी. वह मरीज के पास आया और ड्रिप से शरीर में जाते हुए खून को तेज करना चाहा, ताकि प्रोफैसर का कमजोर दिल उसे बरदाश्त न कर सके. तभी अचानक रत्ना झटके से अपनी सीट से उठी और उस ने अभिषेक को वैसा करने से रोक दिया.

वह उसे ले कर एकांत में गई और फुसफुसा कर कहा, ‘‘तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, रुपए भले ही अपने पास रख लो. मैं अपने पति को मौत के पहले मरते नहीं देख सकती. जैसे इतने साल उन के साथ गुजारे हैं, बाकी समय भी गुजर जाएगा.’’ अभिषेक ने उस की आंखों में झांका. थोड़ी देर तक वह चुप रहा, फिर बोला, ‘‘तुम बड़ी कमजोर हो रत्ना. तुम जैसी औरतों की यही कमजोरी है. जिंदगीभर घुटघुट कर मरती रहेंगी, पर उस से उबरने का कोई उपाय नहीं करेंगी. खैर, जैसी तुम्हारी मरजी,’’ इतना कह कर अभिषेक ने पेशगी के रुपए उसे वापस कर दिए. इस के बाद वह आगे कहने लगा, ‘‘जिस बात को मैं ने इतने सालों से छिपा रखा था, आज उसे साफसाफ कहना पड़ रहा है.

‘‘रत्ना, जिस दिन मैं ने तुम्हें देखा था, उसी दिन से तुम्हें ले कर मेरे दिल में प्यार फूट पड़ा था, जो आज बढ़तेबढ़ते यहां तक पहुंच गया है. ‘‘इस बात को मैं कभी तुम से कह नहीं पाया. प्यार शादी में ही बदल जाए, ऐसा मैं ने कभी नहीं माना.

‘‘मैं उम्मीद में था कि तुम अपनी बेमेल शादी के खिलाफ एक न एक दिन बगावत करोगी. मेरी भावनाओं को खुदबखुद समझ जाओगी या मैं ही हिम्मत कर के तुम से अपनी बात कह दूंगा.

‘‘इसी जद्दोजेहद में मैं ने 15 साल गुजार दिए. आज तक मैं तुम्हारा ही इंतजार करता रहा. जब बरदाश्त की हद हो गई, तब मौका पा कर तुम्हारे पति को खत्म करने की योजना बना डाली. रुपए की बात मैं ने बीच में इसलिए रखी थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझ न सको.

‘‘तुम ने इस घिनौने काम में मेरी मदद न कर मुझे एक अपराध से बचा लिया. वैसे, मैं तुम्हारे लिए जेल भी जाने को तैयार था, फांसी का फंदा भी चूमने को तैयार था.

‘‘मैं तुम्हें तिलतिल मरते हुए नहीं देख सकता था रत्ना, इसलिए मैं ने इतना बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया था.’’

अपनी बात कह कर अभिषेक ने चुप्पी साध ली. रत्ना उसे एकटक देखती रह गई. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: मजदूर की सच्ची मुहब्बत – डिग्गी का दर्द

Story In Hindi: सोन नदी पर पुल बन रहा था. सैकड़ों मजदूर और कई इंजीनियर लगे हुए थे. मजदूरों में मर्दऔरत दोनों थे. वे सब दूरदराज से आए थे, इसीलिए ठेकेदार ने उन के रहने के लिए साइट पर ही कच्चे मकान बनवा दिए थे.

मजदूरों में एक रोहित नाम का लड़का ठेकेदार का बहुत चहेता था. 6 फुट लंबा कद, गोराचिट्टा रंग, चौड़ा सीना, लंबे बालों वाले रोहित की पर्सनैलिटी गजब की थी. उस में कमी थी तो सिर्फ यही कि वह किसी की झूठी तारीफ नहीं कर पाता था, इसीलिए 25 साल की उम्र होने के बावजूद वह अकेला था.

एक दिन रोहित की नजर डिग्गी नाम की एक मजदूर लड़की पर पड़ी. डिग्गी का असली नाम क्या था, किसी को नहीं मालूम था, पर वहां ठेकेदार से ले कर इंजीनियर और मजदूर सभी उसे डिग्गी कह कर ही बुलाते थे.

20 साल की डिग्गी बहुत ही मेहनती लड़की थी. वह देखने में बहुत ही खूबसूरत थी, पर हालात की मारी वह बचपन में ही अनाथ हो गई थी और मजदूरी कर के अपना गुजारा करती थी.

डिग्गी चरित्र की बिलकुल साफ थी. बहुत से इंजीनियर और मजदूर उस की भरीपूरी देह देख कर उस पर फिदा हो गए थे. कुछ लोग तो पैसे का भी लालच देते थे, पर वह जिस्म का सौदा करने के बजाय मजदूरी करना ठीक समझी थी. उसे मालूम था कि जिस्म का सौदा कर के वह जवानी में तो ऐशोआराम की जिंदगी जी सकती है, पर उस सुख का अंत बहुत कष्टकारी होता है.

रोहित ने डिग्गी के बारे में सबकुछ पता लगा लिया था और उसे अच्छे से मालूम था कि डिग्गी को सिर्फ प्यार की ताकत से ही अपनाया जा सकता है.

रोहित ने अपने दिल की बात ठेकेदार को बता दी, जिस से ठेकेदार उसे उसी जगह रहने को बोलता जहां डिग्गी काम कर रही होती थी, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा समय उस के साथ बिता सके और एक दिन उस के दिल में अपनी जगह बना ले.

डिग्गी का शरीर बहुत आकर्षक और कामवासना से भरपूर था, पर दिनभर मेहनत करने के बाद वह रात को गहरी नींद में सो जाती थी. अकेले रहते हुए भी तनहाई उस से कोसों दूर थी.

इधर रोहित के सिर पर प्यार का भूत सवार था, इसलिए वह दिनभर काम करता, शरीर उस का भी थका रहता था, पर रात की तनहाई उसे काट खाने को दौड़ती थी, क्योंकि उस ने अपनी आंखों में डिग्गी को पाने का ख्वाब जो सजा रखा था.

एक दिन रोहित ने डिग्गी की तरफ देखा, पर जब डिग्गी उस की ओर देखने लगी तो उस ने नजरें घुमा लीं. पर धीरेधीरे डिग्गी समझ गई कि रोहित उस से प्यार करता है, क्योंकि यह लड़कियों का स्वभाव होता है कि वे मर्द की पहली नजर देख कर ही भांप लेती हैं कि सामने वाला उस से क्या चाहता है.

रोहित का जमीर इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि वह सामने से अपने दिल की बात डिग्गी से कह दे, पर एक शाम को ठेकेदार ने डिग्गी से बोल दिया, ‘‘डिग्गी, रोहित तुझे बहुत पसंद करता है, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता है. तुम दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी जमेगी. क्या खयाल है तुम्हारा रोहित के बारे में?’’

इतना सुन कर डिग्गी शरमाते हुए वहां से चली गई. ठेकेदार समझ गया कि डिग्गी के दिल में भी रोहित के प्रति प्रेम है, नहीं तो वह उस की बातों का बुरा मान गई होती.

अब डिग्गी रोहित के चालचलन पर ध्यान देने लगी. सीधासादा लड़का किसी और मजदूर औरत से किसी तरह का लगाव नहीं रखता था, इसलिए डिग्गी मन ही मन उस से प्यार करने लगी. वह रोजाना सुबह उठ कर नहा लेती और साफसुथरे कपड़े पहनती. जिस दिन रोहित को नहीं देखती तो बेचैन हो जाती.

रोहित को भी एहसास हो चुका था कि डिग्गी के दिल में उस की ऐंट्री हो चुकी है. अब रोहित हर उस इनसान से झगड़ जाता था, जो डिग्गी के बारे में गलत बोलता था.

जाति से रोहित दलित था. वह ठेकेदार का चहेता और विश्वासपात्र मजदूर था. ठेकेदार ने उस के नाम से भी ठेकेदारी का लाइसैंस बनवा दिया था, ताकि जो टैंडर अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व्ड होता था, वह उस के हाथ से न जाने पाए.

ठेकेदार उस टैंडर को रोहित के नाम से ले लेता था. रोहित के खाते में पैसा आता और वह ईमानदारी से ठेकेदार को दे देता था. काम ठेकेदार अपने हिसाब से करवाता था, इसीलिए इंजीनियर और बाकी के मजदूर रोहित का कुछ नहीं बिगाड़ पाते थे.

एक दिन रोहित फावड़े से मिट्टी खोद रहा था कि अचानक फावड़ा उस के पैर में लग गया. चोट लगने से खून निकलने लगा. वहीं पर डिग्गी काम कर रही थी. वह तुरंत कपड़े से घाव को बांधने लगी और रोने लगी, ‘‘ध्यान कहां रहता है तुम्हारा, कितना खून निकल रहा है.’’

यह सुन कर बाकी मजदूर हैरान रह गए कि रोहित को चोट लगी है तो डिग्गी इतना परेशान क्यों हो गई? रोहित की आंखें भर आई थीं. वे दोनों सब के सामने एकदूसरे के गले लग गए.

रोहित से लिपट कर डिग्गी रोरो कर सुनाने लगी, ‘‘बरसों पहले मैं ने अपने मातापिता को खो दिया था, अब तुम मेरी जिंदगी में आए हो. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो फिर मेरा जीने का कोई मकसद ही नहीं रहेगा.’’

ठेकेदार ने उस शाम दोनों को अपने केबिन में बुलाया और बोला, ‘‘तुम दोनों की शादी मैं करा दूंगा, फिलहाल एकसाथ रहो.’’

डिग्गी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उस रात रोहित हिम्मत कर के डिग्गी के कमरे पर गया. डिग्गी से जितना हो पाया था, वह उतना सजसंवर कर बैठी थी.

रोहित को अपने कमरे पर देख कर डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘रोटीसब्जी बनाई है, खा लो.’’

रोहित बोला, ‘‘मुझे तुम्हारे प्यार की भूख है. मैं तुम से प्यार करने आया हूं.’’

डिग्गी शरमाते हुए बोली, ‘‘मैं आप को अपना सबकुछ मानती हूं. मेरे जिस्म के एकएक हिस्से पर सिर्फ तुम्हारा ही हक है. आप मुझे कभी छोड़ कर मत जाना, नहीं तो मै एक पल भी जिंदा नहीं रह पाऊंगी.’’

रोहित बोला, ‘‘हम दोनों को अब सिर्फ मौत ही जुदा कर सकती है.’’

इतना सुन कर डिग्गी रोहित से लिपट गई. दोनों ने एकदूसरे पर चुंबनों की बौछार कर दी. नदी के किनारे बने उस छोटे से कमरे में डिग्गी की सिसकारियों के साथ दोनों की कामवासना शांत हो गई.

उस दिन से डिग्गी रोहित का भी खाना बनाती थी. काम खत्म होने के बाद रोहित मार्केट से सब्जीराशन जैसा घर का सामान खरीद लाता था.

धीरेधीरे समय बीतता गया. 8वीं तक पढ़ा रोहित ठेकेदारी के सारे दांवपेंच

जान चुका था. अब डिग्गी मजदूरी नहीं करती थी. वह रोहित के साथ साइट पर रहती और औरत मजदूरों की देखरेख करती थी.

एक बार सड़क पुल का टैंडर रोहित के नाम से लिया गया. काम शुरू हो गया था कि अचानक उस के मालिक की सड़क हादसे में मौत हो गई. रोहित को बहुत दुख हुआ. उस के ऊपर पुल बनवाने की सारी जिम्मेदारी आ गई.

इस के पहले भी कई टैंडर रोहित के नाम से कंप्लीट हो चुके थे, जिस से सारे अफसर और इंजीनियर रोहित को ही जानते थे. उस ने भी अपनी सूझबूझ का परिचय दिया और उस पुल को अपने हिसाब से कंप्लीट करवाया, जिस में बहुत सारा पैसा बचा लिया. इस के बाद उस ने अपने लिए एक फ्लैट खरीदा

और डिग्गी को साइट पर ले जाना बंद कर दिया.

रोहित दूसरे ठेकेदारों की तुलना में ज्यादा कमीशन देता था. सारे नेताओं और अफसरों से उस की पहचान हो चुकी थी, इसलिए उसे टैंडर मिलते गए और वह एक कुशल ठेकेदार बन गया. इधर डिग्गी भी अपने रोहित की तरक्की देख कर बहुत खुश थी.

एक बार साइट पर रोहित की मुलाकात नीलू नाम की एक इंजीनियर से हुई. नीलू रोहित की पर्सनैलिटी और पैसा देख कर आकर्षित हो गई और 8वीं जमात तक पढ़ा रोहित नीलू की खूबसूरती और इंगलिश बोलने की कला देख कर उस पर फिदा हो गया.

रोहित टैंडर की दुनिया में राज करना चाहता था, इसलिए सोचा कि अगर नीलू जैसी पढ़ीलिखी लड़की उस के साथ रहेगी तो उस का सपना पूरा हो जाएगा.

रोहित डिग्गी को भूल कर नीलू के प्रेमजाल में फंस गया. दोनों एकदूसरे को डेट करने लगे. 2-2 दिन तक रोहित घर नहीं जाता था. डिग्गी के फोन करने पर साइट पर होने का बहाना बनाता, लेकिन हकीकत में वह नीलू के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा होता था.

एक रात जब रोहित घर नहीं आया तो डिग्गी साइट पर गई. वहां मजदूरों से पता चला कि ठेकेदार साहब तो नीलू मैडम के साथ गाड़ी में बैठ कर शाम को ही चले गए थे.

डिग्गी को बहुत दुख हुआ. उस रात उसे नींद नहीं आई. सुबह होते ही वह साइट पर आई और रोहित से लिपट कर रोने लगी. वह बोली, ‘‘रोहित, मेरे साथ ऐसा मत करो. तुम्हारे अलावा इस दुनिया में कोई नहीं है मेरा.’’

इस बात पर रोहित ने उसे कुछ पैसे दे कर बोला, ‘‘घर जाओ, आज शाम को आऊंगा. नीलू को ले कर ज्यादा चिंता मत करना. उस के आने से मुझे फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं.’’

डिग्गी बोली, ‘‘अगर आज शाम को नहीं आओगे, तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा, सोच लेना.’’

इधर नीलू को जब पता चला कि साइट पर डिग्गी आई थी, तो वह रोहित से नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘‘उसे इतना सिर पर मत चढ़ाओ और आज शाम को घर जाने के लिए क्यों बोले हो? आज शाम हम ने फिल्म देखने का प्लान बनाया है न…’’

रोहित नीलू को खोना नहीं चाहता था, इसलिए वह रात को घर नहीं गया और नीलू के साथ फिल्म देखने चला गया. इस बात को डिग्गी ने दिल पर ले लिया. अब वह समझ गई थी कि रोहित उस की जिंदगी में कभी वापस नहीं आएगा, इसलिए जिद में आ कर उस ने पंखे से लटक कर फांसी लगा ली.

सुबह रोहित जब घर गया, तो डिग्गी को पंखे से लटकता देख कर उस का सिर चकरा गया. वह तुरंत जमीन पर गिर गया और चिल्लाचिल्ला कर रोने लगा.

डिग्गी इतना बड़ा कदम उठा लेगी, रोहित ने शायद सपने में भी नहीं सोचा था. डिग्गी सही बोलती थी कि उस के बिना उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. सब से बड़ा दुख रोहित को तब हुआ, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह पता चला कि डिग्गी 3 महीने के पेट से थी.

डिग्गी और उस के पेट में पल रहे बच्चे की मौत का जिम्मेदार रोहित था. झूठे प्यार के चक्कर में एक मजदूर से ठेकेदार बना रोहित अपना सच्चा प्यार और बसाबसाया घरपरिवार खो बैठा. Story In Hindi

Hindi Family Story: पाबंदी – एक जवान विधवा का दर्द

Hindi Family Story: मेरा नाम आरती है. मेरे औफिस में केशवजी की फेयरवैल पार्टी थी. सुबहसुबह ही सरलाजी का फोन आया था, जो मेरे औफिस में ही सीनियर स्टाफ थीं. वे कह रही थीं, ‘‘आज केशवजी की फेयरवैल पार्टी है, अच्छे से तैयार हो कर आना.’’

मैं इस बात के लिए मना कर रही थी, लेकिन सरलाजी की बात को टाल भी नहीं सकती थी, क्योंकि वे मु?ो अपनी बेटी की तरह प्यार देती थीं और मैं भी उन्हें मां जैसी इज्जत देती थी. एक वे ही थीं, जिन से मैं अपना हर सुखदुख साझ करती थी.

जब मैं पार्टी में पहुंची और अपनी नजर दौड़ा कर देखा, तो लगा कि शायद सरलाजी अभी तक आई नहीं थीं.

मैं एक तरफ सोफे पर जा कर बैठ गई, पर मुझे बड़ा अजीब लग रहा था कि पार्टी में आए कुछ लोगों की नजरें सिर्फ मुझे ही घूर रही थीं.

मैं अपनेआप को असहज महसूस कर रही थी और सोच रही थी कि इतनी जल्दी यहां नहीं आना चाहिए था.

तभी मेरे करीब विनोद आ कर बैठ गया, जो मेरा ही कलीग था. वह कहने लगा, ‘‘अरे वाह, आज तो आप गजब ढा रही हैं इस नीले रंग की साड़ी में. ऊपर से ये बिंदी, चूड़ी… पहना कीजिए, अच्छी लग रही हैं… अब यह सब कौन मानता है.’’

तभी उधर से माधवजी कहने लगे, जो औफिस के ही सीनियर स्टाफ थे, ‘‘सच में आप को देख कर कोई नहीं कह सकता कि अभी 2 साल पहले ही आप के पति का देहांत हो चुका है.’’

जब मैं ने अपनी कड़ी नजर उन पर डाली, तो वे हकलाते हुए कहने लगे, ‘‘म… मेरा मतलब है कि आप अच्छी लग रही हैं.’’

पार्टी में आए सब लोग मुझे ऐसे देखने लगे, जैसे मैं ने कितना बड़ा अपराध कर डाला हो. सब की खा जाने वाली नजरों और बातों को झेलना अब मेरे नए नामुमकिन हो गया था. फफक कर मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े. मुझे लगा कि अब यहां रुकना सही नहीं है.

मैं पलट कर जाने लगी कि तभी पीछे से सरलाजी के स्पर्श ने मुझे चौंका दिया. शायद वे सब सुन चकी थीं.

‘‘अरे आंटी, आप आ गईं,’’ मुझे जैसे बल मिल गया.

सरलाजी बोलीं, ‘‘हां, मैं जाम में फंस गई थी. पर तुम कहां जा रही हो… घर?’’

मैं बोली, ‘‘जी आंटी, वे बच्चे घर पर अकेले हैं, तो…’’

‘‘पर बेटा, पार्टी तो अभी शुरू ही हुई है. एंजौय करो न, घर ही तो जाना है. कहीं तुम इन सब की बातों से डर कर तो घर नहीं जा रही हो? अगर ऐसी बात है तो जाओ, लेकिन एक बात सुनती जाओ. ऐसे टुच्चे और बेशर्म लोग तो तुम्हें हर जगह मिल जाएंगे, फिर कहांकहां और किसकिस से भागती फिरोगी. अरे, भागना तो इन्हें चाहिए यहां से, क्योंकि ये सब दिल और दिमाग दोनों से बीमार हैं…

‘‘शर्म नहीं आती आप लोगों को ऐसी बातें करते हुए. और विनोद आप, क्या मुझे पता नहीं कि आप की नजर कितनी गंदी है इस को ले कर. घर में बीवी होते हुए भी बाहर की औरतों को कैसी गंदी नजरों से देखते हैं आप, क्या यह मुझे बताना पड़ेगा.

‘‘और माधवजी आप, कम से कम अपनी उम्र का तो लिहाज कर लिया होता. अरे, यह तो आप की बेटी जैसी है. बड़े समाज के ठेकेदार बनते फिरते हैं आप, तो फिर वह औरत कौन है, जिसे को आप ने अपने घर में रखा हुआ है, क्योंकि जहां तक मुझे पता है, आप की पत्नी को तो मरे हुए सालों हो चुके हैं.

‘‘क्यों, मैं सच बोल रही हूं न? बोलती बंद हो गई आप की…. घटिया इनसान, खुद में हजारों छेद हैं और ?झांक रहे हैं दूसरे की जिंदगी में…’’

सरलाजी आगे कहने लगीं, ‘‘ऐसा क्या गुनाह कर दिया इस ने, जो सब मिल कर इस की खिल्ली उड़ा रहे हैं. कल तक तो आप सब को कोई एतराज नहीं था इस के पहननेओढ़ने से, तो फिर आज क्या हो गया? क्योंकि अब इस का पति नहीं रहा इसलिए? इसलिए अब यह अपने मन का पहनओढ़ नहीं सकती? हंसबोल नहीं सकती? अपनी पसंद का खा नहीं सकती?

‘‘क्या इस के पति के साथ इस के अरमान भी मर गए? और अब इसे वही सबकुछ करना चाहिए, जो आप सब को ठीक लगे?

‘‘कहने को तो यह हमारी दुनिया, हमारा समाज, हमारा परिवार है, पर जब एक पति न हो तो यही दुनिया, समाज और परिवार एक अकेली औरत के लिए पराया हो जाता है.

‘‘कल तक जो औरत अपने मनमुताबिक जीती रही, आज उसी औरत की खुशियों पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं, क्योंकि अब उस का पति नहीं रहा इसलिए. तो क्या इस की सजा उन मातापिता, भाईबहन और रिश्तेदारों को नहीं देनी चाहिए, जो उस के पति के रिश्ते में हैं? पत्नी को ही इस की सजा क्यों दी जाती है?’’यह सुन कर सभी लोगों के सिर शर्म से झक गए. Hindi Family Story

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