Hindi Family Story: मुझे यकीन है – शौहर को तरसती गुलशन

Hindi Family Story: पढ़ीलिखी गुलशन की शादी मसजिद के मुअज्जिन हबीब अली के बेटे परवेज अली से धूमधाम से हुई. लड़का कपड़े का कारोबार करता था. घर में जमीनजायदाद सबकुछ था.

गुलशन ब्याह कर आई तो पहली रात ही उसे अपने मर्द की असलियत का पता चल गया. बादल गरजे जरूर, पर ठीक से बरस नहीं पाए और जमीन पानी की बूंदों के लिए तरसती रह गई. वलीमा के बाद गुलशन ससुराल दिल में मायूसी का दर्द ले कर लौटी.

खानदानी घर की पढ़ीलिखी लड़की होने के बावजूद सीधीसादी गुलशन को एक ऐसे आदमी को सौंप दिया गया, जो सिर्फ चारापानी का इंतजाम तो करता, पर उस का इस्तेमाल नहीं कर पाता था.

गुलशन को एक हफ्ते बाद हबीब अली ससुराल ले कर आए. उस ने सोचा कि अब शायद जिंदगी में बहार आए, पर उस के अरमान अब भी अधूरे ही रहे.

मौका पा कर एक रात को गुलशन ने अपने शौहर परवेज को छेड़ा, ‘‘आप अपना इलाज किसी अच्छे डाक्टर से क्यों नहीं कराते?’’

‘‘तुम चुपचाप सो जाओ. बहस न करो. समझी?’’ परवेज ने कहा.

गुलशन चुपचाप दूसरी तरफ मुंह कर के अपने अरमानों को दबा कर सो गई. समय बीतता गया. ससुराल से मायके आनेजाने का काम चलता रहा. इस बात को दोनों समझ रहे थे, पर कहते किसी से कुछ नहीं थे. दोनों परिवार उन्हें देखदेख कर खुश होते कि उन के बीच आज तक तूतूमैंमैं नहीं हुई है.

इसी बीच एक ऐसी घटना घटी, जिस ने गुलशन की जिंदगी बदल दी. मसजिद में एक मौलाना आ कर रुके. उन की बातचीत से मुअज्जिन हबीब अली को ऐसा नशा छाया कि वे उन के मुरीद हो गए. झाड़फूंक व गंडेतावीज दे कर मौलाना ने तमाम लोगों का मन जीत लिया था. वे हबीब अली के घर के एक कमरे में रहने लगे.

‘‘बेटी, तुम्हारी शादी के  2 साल हो गए, पर मुझे दादा बनने का सुख नहीं मिला. कहो तो मौलाना से तावीज डलवा दूं, ताकि इस घर को एक औलाद मिल जाए?’’ हबीब अली ने अपनी बहू गुलशन से कहा.

गुलशन समझदार थी. वह ससुर से उन के बेटे की कमी बताने में हिचक रही थी. चूंकि घर में ससुर, बेटे, बहू के सिवा कोई नहीं रहता था, इसलिए वह बोली, ‘‘बाद में देखेंगे अब्बूजी, अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

हबीब अली ने कुछ नहीं कहा.

मुअज्जिन हबीब अली के घर में रहते मौलाना को 2 महीने बीत गए, पर उन्होंने गुलशन को देखा तक नहीं था. उन के लिए सुबहशाम का खाना खुद हबीब अली लाते थे.

दिनभर मौलाना मसजिद में इबादत करते. झाड़फूंक के लिए आने वालों को ले कर वे घर आते, जो मसजिद के करीब था. हबीब अली अपने बेटे परवेज के साथ दुकान में रहते थे. वे सिर्फ नमाज के वक्त घर या मसजिद आते थे.

मौलाना की कमाई खूब हो रही थी. इसी बहाने हबीब अली के कपड़ों की बिक्री भी बढ़ गई थी. वे जीजान से मौलाना को चाहते थे और उन की बात नहीं टालते थे.

एक दिन दोपहर के वक्त मौलाना घर आए और दरवाजे पर दस्तक दी.

‘‘जी, कौन है?’’ गुलशन ने अंदर से ही पूछा.

‘‘मैं मौलाना… पानी चाहिए.’’

‘‘जी, अभी लाई.’’

गुलशन पानी ले कर जैसे ही दरवाजा खोल कर बाहर निकली, गुलशन के जवां हुस्न को देख कर मौलाना के होश उड़ गए. लाजवाब हुस्न, हिरनी सी आंखें, सफेद संगमरमर सा जिस्म…

मौलाना गुलशन को एकटक देखते रहे. वे पानी लेना भूल गए.

‘‘जी पानी,’’ गुलशन ने कहा.

‘‘लाइए,’’ मौलाना ने मुसकराते हुए कहा.

पानी ले कर मौलाना अपने कमरे में लौट आए, पर दिल गुलशन के कदमों में दे कर. इधर गुलशन के दिल में पहली बार किसी पराए मर्द ने दस्तक दी थी. मौलाना अब कोई न कोई बहाना बना कर गुलशन को आवाज दे कर बुलाने लगे. इधर गुलशन भी राह ताकती कि कब मौलाना उसे आवाज दें.

एक दिन पानी देने के बहाने गुलशन का हाथ मौलाना के हाथ से टकरा गया, उस के बाद जिस्म में सनसनी सी फैल गई. मुहब्बत ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था.

ऊपरी मन से मौलाना ने कहा, ‘‘सुनो मियां हबीब, मैं कब तक तुम्हारा खाना मुफ्त में खाऊंगा. कल से मेरी जिम्मेदारी सब्जी लाने की. आखिर जैसा वह तुम्हारा बेटा, वैसा मेरा भी बेटा हुआ. उस की बहू मेरी बहू हुई. सोच कर कल तक बताओ, नहीं तो मैं दूसरी जगह जा कर रहूंगा.’’

मुअज्जिन हबीब अली ने सोचा कि अगर मौलाना चले गए, तो इस का असर उन की कमाई पर होगा. जो ग्राहक दुकान पर आ रहे हैं, वे नहीं आएंगे. उन को जो इज्जत मौलाना की वजह से मिल रही है, वह नहीं मिलेगी.

इस समय पूरा गांव मौलाना के अंधविश्वास की गिरफ्त में था और वे जबरदस्ती तावीज, गंडे, अंगरेजी दवाओं को पीस कर उस में राख मिला कर इलाज कर रहे थे. हड्डियों को चुपचाप हाथों में रख कर भूतप्रेत निकालने का काम कर रहे थे.

बापबेटे दोनों ने मौलाना से घर छोड़ कर न जाने की गुजारिश की. अब मौलाना दिखाऊ ‘बेटाबेटी’ कह कर मुअज्जिन हबीब अली का दिल जीतने की कोशिश करने लगे.

नमाज के बाद घर लौटते हुए हबीब अली ने मौलाना से कहा, ‘‘जनाब, आप इसे अपना ही घर समझिए. आप की जैसी मरजी हो वैसे रहें. आज से आप घर पर ही खाना खाएंगे, मुझे गैर न समझें.’’

मौलाना के दिल की मुराद पूरी हो गई. अब वे ज्यादा वक्त घर पर गुजारने लगे. बाहर के मरीजों को जल्दी से तावीज दे कर भेज देते. इस काम में अब गुलशन भी चुपकेचुपके हाथ बंटाने लगी थी. तकरीबन 6 महीने का समय बीत चुका था. गुलशन और मौलाना के बीच मुहब्बत ने जड़ें जमा ली थीं.

एक दिन मौलाना ने सोचा कि आज अच्छा मौका है, गुलशन की चाहत का इम्तिहान ले लिया जाए और वे बिस्तर पर पेट दर्द का बहाना बना कर लेट गए.

‘‘मेरा आज पेट दर्द कर रहा है. बहुत तकलीफ हो रही है. तुम जरा सा गरम पानी से सेंक दो,’’ गुलशन के सामने कराहते हुए मौलाना ने कहा.

‘‘जी,’’ कह कर वह पानी गरम करने चली गई. थोड़ी देर बाद वह नजदीक बैठ कर मौलाना का पेट सेंकने लगी. मौलाना कभीकभी उस का हाथ पकड़ कर अपने पेट पर घुमाने लगे.

थोड़ा सा झिझक कर गुलशन मौलाना के पेट पर हाथ फिराने लगी. तभी मौलाना ने जोश में गुलशन का चुंबन ले कर अपने पास लिटा लिया. मौलाना के हाथ अब उस के नाजुक जिस्म के उस हिस्से को सहला रहे थे, जहां पर इनसान अपना सबकुछ भूल जाता है.

आज बरसों बाद गुलशन को जवानी का वह मजा मिल रहा था, जिस के सपने उस ने संजो रखे थे. सांसों के तूफान से 2 जिस्म भड़की आग को शांत करने में लगे थे. जब तूफान शांत हुआ, तो गुलशन उठ कर अपने कमरे में पहुंच गई.

‘‘अब्बू, मुझे यकीन है कि मौलाना के तावीज से जरूर कामयाबी मिलेगी,’’ गुलशन ने अपने ससुर हबीब अली से कहा.

‘‘हां बेटी, मुझे भी यकीन है.’’

अब हबीब अली काफी मालदार हो गए थे. दिन काफी हंसीखुशी से गुजर रहे थे. तभी वक्त ने ऐसी करवट बदली कि मुअज्जिन हबीब अली की जिंदगी में अंधेरा छा गया.

एक दिन हबीब अली अचानक किसी जरूरी काम से घर आए. दरवाजे पर दस्तक देने के काफी देर बाद गुलशन ने आ कर दरवाजा खोला और पीछे हट गई. उस का चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. बदन में कंपकंपी आ गई थी.

हबीब अली ने अंदर जा कर देखा, तो गुलशन के बिस्तर पर मौलाना सोने का बहाना बना कर चुपचाप मुंह ढक कर लेटे थे.

यह देख कर हबीब अली के हाथपैर फूल गए, पर वे चुपचाप दुकान लौट आए.

‘‘अब क्या होगा? मुझे डर लग रहा है,’’ कहते हुए गुलशन मौलाना के सीने से लिपट गई.

‘‘कुछ नहीं होगा. हम आज ही रात में घर छोड़ कर नई दुनिया बसाने निकल जाएंगे. मैं शहर से गाड़ी का इंतजाम कर के आता हूं. तुम तैयार हो न?’’

‘‘मैं तैयार हूं. जैसा आप मुनासिब समझें.’’

मौलाना चुपचाप शहर चले गए. मौलाना को न पा कर हबीब अली ने समझा कि उन के डर की वजह से वह भाग गया है.

सुबह हबीब अली के बेटे परवेज ने बताया, ‘‘अब्बू, गुलशन भी घर पर नहीं है. मैं ने तमाम जगह खोज लिया, पर कहीं उस का पता नहीं है. वह बक्सा भी नहीं है, जिस में गहने रखे हैं.’’

हबीब अली घबरा कर अपनी जिंदगी की कमाई और बहू गुलशन को खोजने में लग गए. पर गुलशन उन की पहुंच से काफी दूर जा चुकी थी, मौलाना के साथ अपना नया घर बसाने. Hindi Family Story

Social Story In Hindi: काशी वाले पंडाजी – अंधविश्वास का कुचक्र

Social Story In Hindi: रबी की फसल तैयार होने के बाद काशी वाले पंडाजी का इलाके में आना हुआ. लेकिन इस बार पंडाजी के साथ एक पहलवान चेला भी था, जिस की उम्र तकरीबन 35 साल के आसपास थी. पर देखने में वह 21-22 साल का ही लगता था.

हाथ में कई अंगूठियां, छोटेछोटे काले बाल, प्रैस

की हुई खादी की धोती और पैर में कोल्हापुरी चप्पल उस पर खूब फबती थी.

पंडाजी बांस की बनी एक छोटी डोलची ले कर चलते थे. डोलची के हैंडिल के सहारे 2 छोटीछोटी गोल रंगीन शीशियां बंधी रहती थीं.

पंडाजी बड़ी सावधानी से शीशी खोलते और बहुत ही थोड़ा जल निकाल कर यजमान के बरतन में डालते. इस के बाद पहलवान चेला शुरू हो जाता, ‘‘यह प्रयाग का गंगाजल है. पंडाजी ने नवरात्र के समय मंदिर में इसे कठिन साधना के साथ मंत्रों से पढ़ा है.

‘‘इस गंगाजल में शुद्ध जल मिला कर घर के चारों तरफ छिड़क दें. इस के बाद सारा उपद्रव शांत हो जाएगा. बालबच्चे खुश रहेंगे और यजमान का कल्याण होगा.’’

उस पहलवान चेले की बात खत्म होते ही लाल और पीले धागे वाले

2 तावीज वह पंडाजी की ओर बढ़ा देता और कुछ क्षण बाद तावीजों को ले कर यजमान के हाथों में रखते हुए कहता, ‘‘पंडाजी बता रहे हैं कि लाल धागे वाला तावीज यजमान बाएं हाथ में मंगलवार को पहनें और पीले धागे वाला तावीज बुधवार को यजमान दाहिने हाथ में पहनें. इस के बाद सब तरह की बाधा दूर हो जाएगी और हर काम में तरक्की होगी.’’

यजमान दोनों हथेलियों पर 2 रंगों वाले तावीजों को इस तरह देखने लगता, मानो वह तावीज नहीं, कुबेर के खजाने की कुंजी और दवा हो.

चेला दक्षिणा उठा कर गिनता. अगर वह 51 रुपए होती, तो चुपचाप पंडाजी की दाहिनी जेब से पर्स निकाल कर उस में रख देता और अगर पैसा इस से कम होता, तो कहता, ‘‘यह तो नवरात्र का खर्च भी नहीं है. लौट कर भी तो अनुष्ठान करना होगा.’’

तब यजमान कुछ रुपए निकाल कर चेले को बढ़ा देता. चेला नोटों की गिनती किए बिना पर्स के हवाले कर देता.

पंडाजी यजमानों द्वारा दी गई दक्षिणा के हिसाब से ही अपना कीमती समय देते थे. पर वे माई के घर पर घंटों आसन जमाते. माई बहुत दिनों तक परदेश में रही थीं और उन की तीनों कुंआरी बेटियां भी देखने में खूबसूरत थीं.

पंडाजी के गांव में पधारते ही माई के दरवाजे पर उन के आसन का इंतजाम हो गया था. तीनों बेटियां भी अच्छी तरह सजसंवर कर तैयार हो चुकी थीं.

पंडाजी के पहुंचते ही माई ने उन की आवभगत की. पंडाजी आसन पर बैठने ही वाले थे कि एक लड़की ने आ कर उन के पैर छुए. उन्होंने पूछा, ‘‘हां, क्या नाम है?’’

‘‘जी… संजू.’’

‘‘कुंभ राशि. कन्या के लक्षण तो अति विलक्षण हैं. यह तो पिछले जन्म में राजकन्या थी. कुछ चूक हो जाने के चलते इसे इस कुल में आना पड़ा, तभी तो यह इतनी सुंदर और चंचला है.’’

सुंदर और चंचला शब्द सुनते ही संजू के गाल और भी लाल हो उठे और वह रोमांचित हो कर पंडाजी के और करीब होने लगी.

तभी दूसरी लड़की रंजू ने कहा, ‘‘पंडाजी, इस को घरवर कैसा मिलेगा? इस की शादी कब तक होगी? हम तो इसी चिंता में परेशान रहते हैं. इस साल ही इस के हाथ पीले होने का कोई जतन बताइए न.’’

रंजू की बातें सुन कर पंडाजी चेले की ओर देखने लगे. संजू के यौवन में भटकता चेला अचकचा कर पंडाजी की ओर देखता हुआ कुछ पल चुप रहने के बाद बोला, ‘‘बीते सावन में इस के हाथ से जो सांप मर गया, वह कुलदेवता था. कुलदेवता इस पर बहुत गुस्सा हैं. इस के लिए मंत्र और तंत्र दोनों की साधनाएं करनी होंगी.

‘‘अच्छा है कि आज मंगलवार है. आज रात यह अनुष्ठान हो जाए, तो सब बिगड़ा काम बन सकता है.’’

चेले का यह सु?ाव माई को डूबते को तिनके का सहारा जैसा लगा.

सभी समस्याओं का समाधान निकल आने से माई की जान में जान आई. ठीक 5 बजे अनुष्ठान शुरू करने की बात कह कर पंडाजी चेले के साथ कैथीटोला गांव की ओर चल पड़े.

रात 9 बजे से माई के आंगन में अनुष्ठान का काम पंडाजी और चेले ने शुरू किया. हर तरह से सजीसंवरी तीनों बहनें भी आ कर लाइन से बैठ गईं.

कुछ देर तक मंत्र पढ़ने के बाद आग जला कर उन्होंने माई के साथसाथ संजू, रंजू और मंजू को भभूत मिला प्रसाद खाने को दिया. इस के बाद चेले ने वहां मौजूद पासपड़ोस के लोगों को बाहर जाने का इशारा किया.

इशारा पाते ही सभी वहां से चले गए. फिर उस के बाद रात में क्या हुआ, गांव वालों को इस का क्या पता…

अगली सुबह माई के घर में हाहाकार मचा हुआ था. माई और उस की छोटी बेटी मंजू छाती पीटपीट कर चिल्ला रही थीं, ‘‘कोई हमारी संजू… रंजू को वापस ला दो. वह पंडा पुरोहित नहीं, ठग था.

‘‘हम दोनों को बेहोश कर के पंडा और चेला मेरी दोनों बेटियों को उठा

कर कहां ले गए… कुछ मालूम नहीं. हमारी बेटियों को वापस ला दो. उन्हें बचा लो.’’

गांव वालों को माजरा समझते देर नहीं लगी.

राजमणि काका ने तुरंत रेलवे स्टेशन और बसस्टैंड के लिए कुछ लोगों को भेजा, लेकिन वे सभी खाली हाथ निराश लौट आए. तब पुलिस में मामले को ले जाया गया. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.

माई के पास कलेजे पर पत्थर रख कर संजू और रंजू को भूलने के अलावा कोई चारा नहीं था.

इधर उन दोनों बहनों ने समझदारी से काम लिया. पंडा और चेले की गलत मंसा भांपते हुए चालाकी से संजू ने पंडाजी से और रंजू ने चेले से ब्याह कर मौजमस्ती से जिंदगी बिताने का प्रस्ताव रखा.

पंडा और चेला इस प्रस्ताव को सुन कर बहुत खुश हुए. रंजू ने कहा, ‘‘लेकिन, इस के लिए जरूरी है कि हमारे घरपरिवार, गांव के लोग आगे आएं. कोई कानूनी दांवपेंच नहीं लगाएं और हमें पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना पड़े, सो हम लोग बिना समय गंवाए कोर्ट मैरिज कर लें.’’

संजू और रंजू के रूपजाल में फंसे पंडा और चेला कोर्ट मैरिज के कागजात के साथ अदालत में जज के सामने हाजिर हुए.

जब जज ने संजू और रंजू से उन की रजामंदी के बारे में पूछा, तो संजू कहने लगी, ‘‘जज साहब, ये दोनों हमारे गांव में पंडापुजारी बन कर आए थे. भोलेभाले गांव वालों के सामने तंत्रमंत्र का मायाजाल फैला कर इन ढोंगियों ने उन्हें खूब लूटा.

‘‘हम तीनों बहनों पर तो ये लट्टू बने थे. माई को घरपरिवार पर देवी का प्रकोप बता कर तांत्रिक अनुष्ठान कराने के लिए इन दोनों ने इसलिए मजबूर किया, ताकि उस की आड़ में हमें भोग सकें.

‘‘इन की खराब नीयत को भांप कर हम दोनों बहनों ने आपस में विचार किया और इन दोनों को कानून के हवाले करने के लिए यह नाटक खेला है, ताकि कानून इन ढोंगियों को ऐसी सजा दे, ताकि फिर कभी इस तरह की घटना न होने पाए.’’

संजू और रंजू के बयान को दर्ज करते हुए अदालत ने पंडा और चेले को जेल भेजने का आदेश दिया.

संजू और रंजू ने जब गांव वालों को यह दास्तान सुनाई, तो सभी कहने लगे, ‘सचमुच, तुम्हारी दोनों बेटियां बड़ी बहादुर हैं माई. इन दोनों ने वह कर दिखाया है, जो बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. पूरे गांव को इन पर नाज है.’

माई की आंखों में भी खुशी और संतोष के आंसू छलछला रहे थे. Social Story In Hindi

Tanya Mittal पर लगे गंभीर आरोप, इस शख्स ने की एफआईआर की मांग

‘बिग बौस 19’ की कंटेस्टेंट Tanya Mittal इन दिनों फिर से चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल या शोहरत नहीं, बल्कि उनके खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोप हैं. Tanya Mittal अक्सर अपनी रौयल जिंदगी और सफलता के किस्सों को लेकर चर्चा में रहती हैं, लेकिन अब वही बातें उनके लिए परेशानी का सबब बनती दिख रही हैं.

कभी शो में कोई स्टैंड-अप कौमेडियन उन्हें रोस्ट करता है, तो कभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर उनकी असलियत उजागर करने का दावा करते नजर आते हैं. हाल ही में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर फैजान अंसारी ने Tanya Mittal के खिलाफ ग्वालियर के एसएसपी औफिस में शिकायत दर्ज कराई है.

फैजान का आरोप है कि Tanya Mittal ने कई लोगों से पैसों की ठगी की है और यहां तक कि अपने ही बौयफ्रेंड को जेल भिजवाने की साजिश रची. उन्होंने कहा कि ‘बिग बौस 19’ में Tanya Mittal ने अपनी पर्सनल लाइफ और परिवार को लेकर कई झूठ बोले थे. फैजान ने Tanya Mittal के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की मांग भी की है.

फैजान के मुताबिक, बलराज सिंह नाम का एक व्यक्ति जिसे तान्या का बौयफ्रेंड बताया जा रहा है ने ही सबसे पहले सोशल मीडिया पर तान्या की पोल खोली थी. हालांकि, इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह फिलहाल कहना मुश्किल है, लेकिन इतना जरूर है कि तान्या इन दिनों एक बड़ी मुश्किल में घिरती नजर आ रही हैं.

Indian Constitution: सनातन के लिए संविधान पर चलाया जूता

Indian Constitution: भारत का सुप्रीम कोर्ट वह जगह है, जहां संविधान की आत्मा बसती है. जहां शब्द नहीं, व्यवस्था बोलती है. जहां न्याय की मर्यादा सब से ऊपर मानी जाती है. वहीं ऐसा सीन सामने आया, जिस ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया.

सुनवाई के दौरान, 71 साल के एक वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. यह न केवल एक अदालत की इज्जत को भंग करना था, बल्कि यह घोर पौराणिक और सनातन सोच का प्रदर्शन था, जो आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट की कुरसी पर एक एससी बैठा है और दूसरे एससीएसटी, पढ़ेलिखे लोगों की तरह पुराणवादियों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं है.

चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस घटना को शांत भाव से लिया. उन्होंने कहा, ‘इस से मैं विचलित नहीं हुआ, कृपया कार्यवाही जारी रखिए.’

सामाजिक सोच

सवाल सीधा है कि अगर वही जूता किसी एससीएसटी ने ऊंची जाति के चीफ जस्टिस की ओर फेंका होता, तो क्या वही सहिष्णुता दिखाई जाती? क्या तब यह मामला भी माफ कर देने जितना हलका होता? वह वकील है, 71 साल का है और यह किसी किशोर का गुस्सा नहीं था. उस की हरकत में अनुभव, शिक्षा और विचार का मिश्रण था और यही उसे भयावह बनाता है.

किसी एससी चीफ जस्टिस पर इस तरह का हमला यह दिखाता है कि भारतीय समाज का एक हिस्सा अब भी उस ‘मनुस्मृति’ को भीतर दबाए बैठा है, जो कहती है कि शूद्र ज्ञान या न्याय पाने का अधिकारी नहीं है और उस से भी नीचे का अछूत एससी तो कतई नहीं, चाहे संविधान कुछ भी कहता रहे.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना उस व्यवस्था पर चोट है, जिस ने हमेशा सत्ता और न्याय को ऊंची जातियों के दायरे में सीमित रखा. एक एससीएसटी का सर्वोच्च न्यायासन पर बैठना उस सोच के लिए असहनीय है, जो अपने वर्चस्व को ईश्वरीय व्यवस्था मानती है. हां, ऐसा जना चुपचाप अगर ऊंची जातियों को माईबाप मानता रहे, तो ठीक है.

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर कुछ पोस्टें आईं. किसी ने लिखा, ‘गवई तो बैचलर हैं, मास्टर नहीं’. यह तंज नहीं, जातिगत ईष्या का प्रदर्शन था. असलियत यह है कि चीफ जस्टिस बीआर गवई मास्टर इन ला में गोल्ड मैडलिस्ट हैं. लेकिन फिर भी सवाल उठे. ‘वह कैसे मुख्य न्यायाधीश बन गया और वह सनातनी वकील वकील ही क्यों रह गया?’

यह सवाल पढ़ाईलिखाई या काबिलीयत का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच का है, जो यह नहीं स्वीकार कर पाती कि कभी ‘अछूत’ कहे जाने वाले लोग अब न्याय और सत्ता के केंद्र में पहुंच चुके हैं.

संविधान बनाम ‘मनुस्मृति’

भारत का संविधान कहता है कि सभी नागरिक समान हैं. किसी के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, जबकि ‘मनुस्मृति’ का मानना है कि ब्राह्मण ही ईश्वर का मुख है, शूद्र उस के पैर हैं. ‘मनुस्मृति’ अछूतों की बात ही नहीं करती जो शूद्रों से भी नीचे हैं और जिन को कंट्रोल करने के लिए शूद्रों को डंडाभाला दिया गया है.

इन दोनों विचारों के बीच टकराव सिर्फ इतिहास का नहीं है, बल्कि यह वर्तमान भारत का सच है. चीफ जस्टिस बीआर गवई का वजूद ही इस टकराव की याद दिलाता है. वे संविधान के उस वादे के प्रतीक हैं, जिस में हर भारतीय को समान अवसर का अधिकार दिया गया है, पर यह समानता सिर्फ कागज पर नहीं टिक सकती, अगर समाज की मानसिकता बदलने को तैयार न हो.

जूता फेंकने वाला वकील संविधान से नहीं, उस के समानता के सिद्धांत से चिढ़ा हुआ था. वह यह नहीं सह सकता था कि एक दलित किसी ऊंची जाति की याचिका को नामंजूर कर दे. उस की मूर्ति को दोबारा स्थापित करने की मांग खारिज हुई, तो वह धर्म के नाम पर संविधान पर चोट करने निकल पड़ा.

कोर्ट में धर्म की दखलअंदाजी

यह पूरा मामला खजुराहो मंदिर परिसर से जुड़ा था. वकील ने एक याचिका दायर की थी कि वहां भगवान विष्णु की 7 फुट ऊंची मूर्ति को दोबारा स्थापित करने का आदेश दिया जाए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी पीठ से यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह धार्मिक मामला है, इसे अदालत नहीं, बल्कि भगवान पर छोड़ दीजिए.

यह संविधानिक नजरिए से सही टिप्पणी थी, क्योंकि कोर्ट धर्म का निर्णायक नहीं है. वह कानून का व्याख्याता है, लेकिन मनुवादियों के लिए यह बेइज्जती बन गया, क्योंकि उन का लक्ष्य भगवान नहीं, बल्कि अपने धार्मिक वर्चस्व का प्रदर्शन था. और इस बात को मनुवादी मानने के लिए तैयार नही थे. इसी का नतीजा यह हुआ कि जूता फेंकने की कोशिश की गई. यह जूता धर्म के नाम पर संविधान के चेहरे पर मारा गया.

भाजपा सरकार की चुप्पी

इस घटना के बाद जो सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही, वह थी भाजपा सरकार की चुप्पी. न प्रधानमंत्री ने प्रतिक्रिया दी, न गृह मंत्री ने और न ही कानून मंत्री ने.

सवाल यह है कि क्या यह चुप्पी सहमति की भाषा थी? जब किसी मंदिर पर पत्थर फेंका जाता है, तो पूरा राष्ट्रवादी तंत्र जाग उठता है. फिर जब न्याय के मंदिर पर हमला हुआ, तो वही लोग खामोश क्यों रहे?

सुप्रीम कोर्ट अकसर छोटीछोटी बातों पर खुद से संज्ञान लेता है, तो फिर संविधान के सम्मान पर हुए इस हमले पर चुप क्यों रहा? क्या यह इसलिए कि हमला करने वाला ‘हमारा’ था या इसलिए कि जिस पर हमला हुआ, वह ‘दलित’ था?

न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व की असमानता

भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकट नया नहीं है. देश की बड़ी अदालतों में बहाल जजों में 80 फीसदी से ज्यादा सवर्ण बैकग्राउंड के होते हैं. सुप्रीम कोर्ट में दलित, पिछड़े या आदिवासी वर्गों से आने वाले जजों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है.

बीआर गवई का चीफ जस्टिस बनना इसलिए ऐतिहासिक था. वे यह प्रमाण हैं कि संविधान ने कम से कम एक शख्स को वह अवसर दिया जो ‘मनुस्मृति’ ने कभी नहीं दिया था. लेकिन इसी वजह से उन की उपस्थिति कई लोगों के लिए चुनौती बन गई, क्योंकि बीआर गवई का नाम यह साबित करता है कि भारत में न्याय केवल ब्राह्मण नहीं कर सकता, दलित भी कर सकता है.

सनातनी सोच की जड़ें बहुत गहरी

ब्राह्मणवाद कोई धर्म नहीं, एक विचार प्रणाली है जो श्रेष्ठता के भरम पर टिकी है. यह उस समय की देन है, जब समाज को जातियों में बांट कर सत्ता और ज्ञान कुछ हाथों में कैद कर दिया गया था. आज वही सोच नए रूपों में फिर से उभर रही है. कभी यह काबिलीयत के नाम पर कभी मैरिट के नाम पर, कभी संस्कृति के नाम पर समानता का विरोध करती है. जूता फेंकने वाला शख्स उसी सोच का प्रतिनिधि था, जो यह मानती है कि दलितों को सम्मान देना सामाजिक व्यवस्था का अपमान है.

मीडिया की भूमिका और चुप्पी

सब से गलत पहलू यह रहा कि मुख्यधारा मीडिया ने इस घटना को ‘बड़ी खबर’ की तरह नहीं उठाया, जहां मनोरंजन की छोटी घटनाएं घंटों तक चलती हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट की इस शर्मनाक घटना पर कुछ सैकंड की खबर, कुछ कौलम की रिपोर्ट बस इतना ही.

मीडिया की यह चुप्पी सिर्फ पत्रकारिता की नाकामी नहीं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कमजोरी भी है, क्योंकि यह घटना केवल जूता फेंकने की नहीं थी, बल्कि यह संविधान की आत्मा पर पुराणवाद द्वारा किया गया प्रतीकात्मक प्रहार था.

संविधान की ताकत

जस्टिस बीआर गवई ने जो किया, वह न्याय का नहीं, संस्कार का उदाहरण था. उन्होंने कहा कि ‘मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता’. यह वाक्य साधारण नहीं है. यह उस शख्स का कहना है, जिस ने जाति के कांटों के बीच चल कर न्याय के मंदिर तक पहुंचने का सफर तय किया.

उन्होंने उसे माफ किया, लेकिन यह माफी उन की नहीं, संविधान की गरिमा की थी. वे जानते थे कि अगर वे प्रतिशोध लेंगे, तो लोग कहेंगे कि देखो, दलित जज भावनात्मक है, इसलिए उन्होंने माफी को हथियार बनाया.

पर इस माफी को समाज बुजदिली न सम झे, चेतावनी सम झे. यह पक्का है कि अगर उलटा होता तो जूता फेंकने वाले का पूरा परिवार और उस के दोस्त थानों में बैठे बयान दर्ज करा रहे होते.

आत्ममंथन की जरूरत

यह घटना न्यायपालिका के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है. क्या हमारी अदालतें वास्तव में हर नागरिक के लिए समान हैं? क्या न्याय की कुरसी पर बैठने वालों का चयन सिर्फ काबिलीयत से होता है या उस में सामाजिक ढांचे की झलक भी है?

समानता का मतलब केवल अवसर देना नहीं, सम्मान की रक्षा करना भी है. जब किसी चीफ जस्टिस पर इस तरह हमला होता है, तो यह केवल उस शख्स का नहीं, पूरे संस्थान का अपमान है.

सामाजिक न्याय का अधूरा सपना

डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक स्वतंत्रता बेकार है, अगर सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है. आज वही बात सही साबित होती है. हम ने संविधान बना लिया, आरक्षण दे दिया, कानून बना दिए लेकिन समाज का सोचने का ढंग अभी भी वही है. दलितों को न्याय, पिछड़ों को समान अवसर और स्त्रियों को सम्मान ये सब आज भी सिद्धांत हैं, असलियत नहीं.

ब्राह्मणवाद चाहे जितना भी सिर उठाए, संविधान का उजाला उस की छाया को मिटाने के लिए काफी है. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने माफ कर दिया, पर भारत को यह भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह माफी नहीं, एक संदेश है कि समानता की राह अभी लंबी है, पर जब तक संविधान है, आशा भी है. Indian Constitution

Cricket News: खेल पर भारी रहा बेतुका विवाद

Cricket News: क्रिकेट के एशिया कप की शुरुआत इसलिए हुई थी कि एशिया में क्रिकेट खेलने वाली टीमों को एकदूसरे के साथ भिड़ने का मौका मिले और वे मजबूत बनें. वैसे भी कोई भी खेल इसीलिए खेला जाता है कि खिलाडि़यों में खेल भावना पनपे और वे हरजीत से ऊपर उठ कर खेल परंपरा को आगे बढ़ाएं.

पर इस बार क्रिकेट के एशिया कप, 2025 में भारतपाकिस्तान का आपसी विवाद पूरे टूर्नामैंट पर भारी पड़ गया. दूसरी टीमों का जैसे कोई वजूद ही नहीं था. ऐसा लग रहा था कि खेल का मैदान लड़ाई का मैदान बन गया है. हाल ही में भारतपाकिस्तान की सरहद पर हुई झड़प खेल के मैदान पर भी अपना गलत असर दिखाती नजर आई.

28 सितंबर, 2025 को भारत और पाकिस्तान के बीच यूएई में फाइनल मुकाबला हुआ और भारत ने इस रोमांचक मैच को 5 विकेट से जीत भी लिया, पर इन दोनों देशों के बीच खेले गए 3 मैचों में खिलाड़ी गेंदबल्ले से ज्यादा अपनी जबान और इशारों से एकदूसरे से जू झते नजर आए.

फाइनल मुकाबला जीतने के बाद तो विवाद और ज्यादा गहरा गया था. रात को 12 बजे भारत की जीत के बाद प्रैजेंटेशन सैरेमनी तकरीबन सवा घंटे देरी से शुरू हुई, क्योंकि भारतीय टीम ने एशियाई क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष मोहसिन नकवी से एशिया कप ट्रौफी लेने से साफ इनकार कर दिया था. इस से पहले पाकिस्तान टीम के साथ भी हाथ नहीं मिलाया था. मोहसिन नकवी पुरस्कार वितरण समारोह शुरू होने से पहले एक तरफ खड़े थे और भारतीय खिलाड़ी 15 गज के भीतर खड़े थे. उन्होंने अपनी जगहों से हटने से इनकार कर दिया और समारोह में देरी होती गई.

भारतीय टीम मैनेजमैंट ने पहले ही तय कर लिया था कि खिलाड़ी मोहसिन नकवी से ट्रौफी नहीं लेंगे. मोहसिन नकवी जैसे ही स्टेज पर आए तो दर्शकों की ओर से भारतीय फैंस ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाने शुरू कर दिए.

इतना ही नहीं, मोहसिन नकवी जैसे ही स्टेज पर आए, उन्हें बताया गया कि भारतीय टीम उन से ट्रौफी नहीं लेगी और वे जबरदस्ती करेंगे तो आधिकारिक विरोध दर्ज किया जाएगा.

मोहसिन नकवी इंतजार करते रहे और अचानक आयोजकों में से कोई ट्रौफी ड्रैसिंग रूम के भीतर ले गया.

मैच खत्म होने के बाद पाकिस्तानी टीम एक घंटे बाद तक ड्रैसिंग रूम से बाहर नहीं आई. सिर्फ पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन नकवी अकेले खड़े हो कर शर्मिंदगी झेलते रहे.

तकरीबन 55 मिनट बाद जब पाकिस्तानी टीम बाहर आई, तो दर्शकों ने ‘इंडिया इंडिया’ के नारे लगाए. भारत के ट्रौफी लेने से इनकार के बाद एसीसी हैड मोहसिन नकवी एशिया कप की ट्रौफी अपने साथ ले कर चलते बने.

चैंपियन बनने के बाद भारतीय टीम को ट्रौफी न मिलने से बीसीसीआई काफी नाराज दिखी और कहा गया कि नवंबर में होने वाली अगली आईसीसी मीटिंग में मोहसिन नकवी के खिलाफ नाराजगी जताई जाएगी.

बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने टीम के इनकार को सही ठहराते हुए कहा कि ऐसे किसी शख्स से भारतीय टीम ट्रौफी नहीं ले सकती जिस के देश ने हमारे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ रहा हो. याद रहे कि मोहसिन नकवी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष होने के साथसाथ अपने देश के गृह मंत्री भी हैं.

एशियन क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष और पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी से ट्रौफी लेने से इनकार के बाद भारतीय टीम को एशिया कप नहीं दिए जाने पर कप्तान सूर्यकुमार यादव ने कहा, ‘मैं ने ऐसा पहले कभी नहीं देखा कि विजयी टीम को ट्रौफी नहीं दी गई हो. लेकिन मेरे लिए मेरे खिलाड़ी और सहयोगी स्टाफ ही असली ट्रौफी है.’ Cricket News

Exclusive Interview: खिलाड़ी की बायोपिक करना चाहती हूं – सिमरत कौर

Exclusive Interview: साल 2017 में आई एक तेलुगु फिल्म ‘प्रेमथो मी कार्तिक परिचयम’ से अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत करने वाली सिमरत कौर पंजाबी हैं और उन की परवरिश मुंबई में हुई है.

तेलुगु में 4 फिल्में करने के बाद उन्हें साल 2023 में अनिल शर्मा के डायरैक्शन में बनी हिंदी फिल्म ‘गदर 2’ में मुसकान का किरदार निभाने का मौका मिला था.

साल 2024 में वे अनिल शर्मा की ही फिल्म ‘वनवास’ में नजर आई थीं और अब वे विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में भारती बनर्जी के किरदार में दिखाई दी हैं.

पेश हैं, सिमरत कौर से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

आप अपने अब तक के फिल्म सफर को ले कर क्या कहना चाहेंगी?

मेरी परवरिश मुंबई में हुई है और मैं ने कंप्यूटर से बीएससी किया है. मैं कराटे में ब्लैक बैल्ट हूं और गोल्ड मैडलिस्ट भी हूं. सच कहूं तो मैं मन से एक खिलाड़ी हूं और अचानक न चाहते हुए भी ग्लमैर वर्ल्ड यानी ऐक्टिंग जगत में आ गई हूं.

मैं अब तक 4 तेलुगु और 3 हिंदी फिल्में कर चुकी हूं. बीच में कोविड काल के चलते मेरे कैरियर की रफ्तार धीमी रही थी, पर पिछले 2 साल के अंदर मेरी 3 हिंदी फिल्में रिलीज हुई हैं और तीनों फिल्मों को दर्शकों ने अपना प्यार दिया है. ये तीनों फिल्में मैं ने बड़े कलाकारों के साथ की हैं.

आप के कराटे सीखने के पीछे मूल वजह क्या थी?

मैं ने 7 साल की उम्र से कराटे सीखना शुरू किया था. उस वक्त मुझे ज्यादा समझ नहीं थी, पर मां ने कहा तो सीखना पड़ा. 11 साल की उम्र में मैं ने नेपाल जा कर पहली बार कराटे प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. इस प्रतियोगिता में भारत से 23 बच्चे गए थे. हम वहां से ब्रौंज मैडल जीत कर आए थे. मैं भारत की एकमात्र लड़की थी, जो जीत कर आई थी, बाकी 22 बच्चे हार गए थे.

मुझे लगता है कि कराटे सीखने पर आप को अपने शरीर पर कंट्रोल करना आ जाता है. गुस्सा आने पर आप उस पर काबू कर सकते हैं. अपने जज्बात पर कंट्रोल कर सकते है. जिंदगी में अनुशासन आ जाता है. इसी के साथ कराटे से आप अपनी हिफाजत कर सकते हैं. वैसे, मैं ने तो कत्थक डांस भी सीखा है.

आप को कत्थक डांस की क्या उपयोगिता नजर आई?

कत्थक डांस सीखने से चाल में एक लचक आ जाती है, जो हर लड़की में होनी चाहिए. मैं ने अब तक जिस दौर के किरदार निभाए हैं, उस दौर की लड़कियों में यह खूबी कुदरती थी.

फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ के अपने किरदार को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

मैं ने इस फिल्म में यंग भारती का किरदार निभाया है, जबकि पल्लवी जोशी ने मां भारती का किरदार निभाया है. इस तरह का किरदार निभाना आसान नहीं था. भारती के किरदार की शुरुआत ही गर्वनर को गोली मारने से होती है. मुझे असली बंदूक पकड़ाई गई थी, जिस में ब्लैंक बुलेट थी यानी खाली बुलेट, जिस में से आवाज तो पूरी आती है, पर बुलेट निकलती नहीं है.

मैं ठहरी पंजाबी, जबकि भारती बनर्जी तो बंगाली है. तो मुझे भाषा से ले कर रहनसहन, चालढाल, पहनावे पर काम करना पड़ा. मुझे सीखना पड़ा कि बंगाल की लड़कियां किस तरह से साड़ी पहनती हैं.

इस फिल्म में आप का भारती बनर्जी का किरदार कहीं न कहीं बंगाल के एक रियल किरदार से प्रेरित है, जिस ने साल 1936 में गर्वनर को गोली मार दी थी. इस पर आप क्या कहेंगी?

माफ कीजिए, पर यह फिल्म उस लड़की की बायोपिक नहीं है. भारती का किरदार उस लड़की से थोड़ा सा प्रेरित मात्र है. फिल्म के डायरैक्टर विवेक अग्निहोत्री सर ने कहा था कि यह लड़की क्रांतिकारी है और भगत सिंह के विचारों पर यकीन करती है.

अब भगत सिंह के बारे में तो हम सभी जानते ही हैं. मैं ने तो उन पर बनी हुई फिल्में भी देखी हैं. डायरैक्टर ने मुझे बताया था कि भारती के किरदार की शुरुआत भगत सिंह की तरह होगी, जो क्रांतिकारी है, इसलिए वह गर्वनर को गोली मारने से पहले सोचेगी नहीं. मुझे बताया गया था कि भारती पहले भगत सिंह की तरह क्रांति करेगी, उस के बाद वह गांधीजी के रास्ते पर चलेगी.

क्या आप को लगता है कि फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ में जोकुछ भी दिखाया है, वह सब सच है?

इतिहास तो वह है, जो घट चुका है. हर किसी ने अपनेअपने हिसाब से इतिहास में चीजें डाल दी हैं, इसलिए इतिहास में जोकुछ दर्ज है, उस के सच या झूठ होने की गारंटी देना मुश्किल है.

आज अगर मैं इंस्टाग्राम पर डाल दूं कि फलां इनसान हमारा भगवान है, तो सौ साल बाद लोग उसे भगवान मानने लगेंगे, क्योंकि उस वक्त हम तो सच बताने के लिए रहेंगे नहीं… लिहाजा, सही या गलत मैं नहीं बता सकती. किसी के लिए कुछ सही है और किसी के लिए कुछ और सही है. एक कलाकार के तौर पर मेरा फर्ज बनता है कि मैं स्क्रिप्ट के मुताबिक अपने काम को अंजाम दूं. मुझे कुछ चीजें नहीं पता थीं, जो कि अब पता चली हैं. पर वे कितनी सच हैं, उस का दावा कम से कम मैं तो नही कर सकती. मैं ही क्यों गूगल या कोई भी इनसान नहीं बता सकता, इसलिए पूरा सच आप कभी नहीं जान सकते.

भविष्य में आप किस तरह के किरदार निभाना चाहती हैं?

मैं एक खिलाड़ी का किरदार निभाना चाहती हूं, क्योंकि मैं ने कराटे चैंपियनशिप में भाग लिया है. मैं किसी बायोपिक में दमदार किरदार निभाना पसंद करूंगी. Exclusive Interview

Bollywood Updates: डिंपल पर लगे गंभीर आरोप

Bollywood Updates: डिंपल हयाती तेलुगु सिनेमा की हीरोइन हैं. वे ‘अतरंगी रे’, ‘खिलाड़ी’, ‘वीरमे वागई सूदम’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी हैं. उन्होंने 2017 में फिल्म ‘गल्फ’ से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत की थी, पर फिलहाल उन की नौकरानी ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

नौकरानी प्रियंका बिबर के मुताबिक, डिंपल हयाती और उन के पति ने मिल कर उस का निर्वस्त्र वीडियो बनाने की कोशिश की और उस के साथ मारपीट भी की. न तो उसे भरपेट खाना दिया जाता है और न ही अच्छे से बरताव किया जाता है. कपल उस से भरभर कर काम कराता है और उस के साथ कुत्तों की तरह बरताव करता है.

हैदराबाद के फिल्मनगर पुलिस स्टेशन ने इस सिलसिले में मामला दर्ज किया है.

रश्मिका मंदाना ने की गुपचुप सगाई

फिल्म ‘पुष्पा’ की हीरोइन रश्मिका मंदाना अब रणबीर कपूर की फिल्म ‘रामायण’ में सीता के किरदार में दिखाई देंगी. लेकिन हाल ही में निजी जिंदगी में उन्होंने किसी हैंडसम हीरो से अपनी उंगली में सगाई की अंगूठी पहन ली है, वह भी बड़े गुपचुप तरीके से.

सूत्रों की मानें तो साउथ फिल्मों के स्टार हीरो विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना ने सगाई कर ली है. यह सगाई उन दोनों के बेहद करीबी लोगों की मौजूदगी में हुई. सबकुछ सही रहा तो वे दोनों अगले साल फरवरी महीने में शादी के बंधन में बंध जाएंगे.

फरहान अख्तर के साथ धोखाधड़ी

हिंदी फिल्म ऐक्टर, डायरैक्टर, सिंगर… और भी न जाने क्याक्या, फरहान अख्तर को उन के किसी करीबी ने लाखों रुपए का चूना लगा दिया है.

दरअसल, हुआ यह कि फरहान अख्तर के घर में काम कर रहे एक ड्राइवर ने उन के साथ पैसों की घपलेबाजी की. बांद्रा पुलिस ने बताया कि फरहान अख्तर की मां हनी ईरानी की मैनेजर दीया भाटिया ने शिकायत दर्ज कराई और बताया कि उस ड्राइवर और पैट्रोल पंप के एक मुलाजिम ने मिल कर पैसों की घपलेबाजी की है और अब तक वे 12 लाख रुपए की धोखाधड़ी कर चुके हैं.

वह ड्राइवर हनी ईरानी की गाड़ियों में पैट्रोल भरवाने के बहाने पैट्रोल पंप जाता और फरहान अख्तर का कार्ड स्वाइप करता था, लेकिन गाड़ी में पैट्रोल भरवाता ही नहीं था. इस के एवज में वह पैट्रोल पंप पर मौजूद उस शख्स को भी उस का हिस्सा देता था.

मुंबई पुलिस ने आरोपी ड्राइवर नरेश रामविनोद सिंह और पैट्रोल पंप के स्टाफ अमर बहादुर सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया है.

ट्विंकल खन्ना का खुलासा

आजकल काजोल और ट्विंकल खन्ना अपने टौक शो ‘टू मच विद काजोल ऐंड ट्विंकल’ में कई सनसनीखेज बातों का खुलासा कर रही हैं खासकर ट्विंकल खन्ना तो अपने बारे में उड़ाई गई अफवाहों का मानो पिटारा ले कर बैठ गई हैं.

हाल ही में अपने गैस्ट वरुण धवन और आलिया भट्ट के सामने एक ऐपिसोड में ट्विंकल खन्ना ने बताया कि किस तरह एक बार ऋषि कपूर द्वारा भेजी गई जन्मदिन की शुभकामनाओं ने उन्हें ‘कपूर खानदान की नाजायज औलाद’ तक बना डाला था.

ट्विंकल खन्ना ने मुसकराते हुए बताया था, ‘‘आलिया के ससुर की वजह से मैं लगभग कपूर बन ही गई थी. एक बार उन्होंने मेरे बर्थडे पर ट्वीट किया कि अरे, पता है, जब तुम अपनी मां (डिंपल कपाड़िया) के पेट में थीं, तब मैं ने उन के लिए गाना गाया था. बस, फिर क्या था. सब को लगा कि मैं उन की नाजायज बेटी हूं. ’’ Bollywood Updates 

Bihar Elections 2025: दलितमुसलिम बनाम पुराणवादी व्यवस्था का चुनाव

Bihar Elections 2025: साल 2014 में जब बिहार की राजनीति भारी उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक अहम फैसला लेते हुए भाजपा के सहयोग से महादलित मुसहर समुदाय से आने वाले नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था.

यह कोई उदारता नहीं थी, बल्कि नीतीश कुमार की मजबूरी हो गई थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में उन की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) 40 में से केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी.

अपने खिलाफ पनप रहे चौतरफा असंतोष और विरोध को काबू करने के लिए उन का यह टोटका तात्कालिक तौर पर कामयाब रहा था, लेकिन दिक्कत उस वक्त खड़ी हो गई, जब जीतनराम मां झी अपने वादे से मुकर गए और यह तक कहने लगे थे कि मैं कोई रबर स्टांप सीएम नहीं हूं.

जीतनराम मांझी के मुख्यमंत्री बन जाने से हुआ क्या, दलितों के लिहाज से इस के कोई खास माने नहीं, क्योंकि उन्होंने भी दलितों के भले के लिए कुछ नहीं किया. 9 महीने के अपने कार्यकाल में जीतनराम मां झी ने जो बड़ी गलतियां की थीं, उन में से एक थी मंदिर जाना.

यों किसी भी मुख्यमंत्री का मंदिर जाना कोई हैरत की बात नहीं होती, लेकिन उन का जाना जरूर हैरत की बात थी, क्योंकि वे वक्तवक्त पर खुद को न केवल नास्तिक कहते रहे हैं, बल्कि मनुवाद सहित हिंदू धर्मग्रंथों की भी आलोचना करते रहे हैं.

मुख्यमंत्री रहते हुए जीतनराम मांझी ने साल 2015 में कहा था, ‘‘मैं भगवान में विश्वास नहीं करता क्योंकि अगर भगवान होते तो दलितों पर इतना अत्याचार क्यों होता? मंदिरों में अब भी दलितों को भेदभाव झेलना पड़ता है, इसलिए मु झे मंदिरों में कोई आस्था नहीं.’’

21 सितंबर को जीतनराम मांझी ने रामायण की कहानी को काल्पनिक बताया और 2 महीने बाद ही 19 दिसंबर को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘मैं राम में विश्वास नहीं करता. राम कोई व्यक्ति नहीं था.’’

अंबेडकर जयंती के मौके पर बोलते हुए जीतनराम मांझी ने दलितों को धार्मिक कर्मकांडों से दूर रहने का मशवरा भी दिया था. 17 मार्च, 2023 को उन का एक बयान था, ‘‘रामायण एक काल्पनिक कृति है. रावण राम से अधिक मेहनती और कर्मकांड में निपुण था.’’

इस पर जब हिंदूवादी संगठनों ने उन्हें घेरा तो उन का बयान था कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश न देने वाले धर्म के ठेकेदारों को भी आलोचना का सामना करना चाहिए.

जीतनराम मांझी अगर अपनी बातों और बयानों पर टिके रहते तो तय है कि बड़े राष्ट्रीय नेता होते, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा ने उन की इतनी दुर्गति कर दी है कि मौजूदा चुनाव में वे अपने मनमुताबिक सौदेबाजी भी नहीं कर पाए. उन का और उन की हम पार्टी का क्या हुआ, यह तो नतीजे बताएंगे, पर अकसर भाजपा को दलितों की बदहाली का जिम्मेदार ठहराते रहने वाले जीतनराम मां झी और उन के जैसे दलित नेता भी इस गुनाह के कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपनी खुदगर्जी के लिए जब चाहे रामनामी चादर ओढ़ लेते हैं. इन्हीं तथाकथित ‘नास्तिक’ जीतनराम मां झी की मुख्यमंत्री रहते ही एक मंदिर में जो बेइज्जती हुई थी, तो वे तिलमिला उठे थे.

बेआबरू होते दलित नेता

मामला अगस्त, 2014 का है जब जीतनराम मां झी औररंगाबाद के देव मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए चले गए थे. यह सूर्य मंदिर है जहां छठ के दिन बेतहाशा भीड़ उमड़ती है. पूजन और दर्शन की उन की मंशा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि मंदिर के पुजारियों और स्थानीय ब्राह्मण नेताओं ने उन्हें यह कहते हुए मंदिर में दाखिल होने से रोक दिया था कि भले ही वे मुख्यमंत्री हों लेकिन चूंकि दलित हैं, इसलिए सीधे मंदिर में जा कर पूजा नहीं कर सकते.

बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले की तर्ज पर मंदिर से दलित होने का ‘प्रसाद’ आम दलितों की तरह ले कर जीतनराम मां झी भुनभुना और तिलमिला कर यह कहते रह गए कि जो लोग बाहर मेरे पांव पड़ते हैं वही आज मु झे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं, लेकिन इस अपमान का बदला वे नहीं ले पाए, न ही ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों और पुराणवादियों को कोई सबक या नसीहत दे पाए, उलटे मंदिर के बाहर से ही उन्होंने पूजापाठ किया था और तरस खाने वाली एक बात यह भी थी कि उन के जाने के बाद इस मंदिर को धो कर पवित्र किया गया था.

आज उसी ब्राह्मण और बनियावादी भगवा खेमे के साथ मिल कर जीतनराम मां झी चुनाव लड़ रहे हैं, जो सदियों से दलितों को प्रताडि़त करता रहा है, भेदभाव करता रहा है और आज भी उन का शोषण बदस्तूर कर रहा है.

अब भला कौन जीतनराम मां झी और उन जैसे दोहरे चरित्र वाले दलितों से पूछे और किस को वे बताएं कि इस देश में दलित होने के माने क्या होते हैं और क्यों दलित मंदिर जा कर पूजाअर्चना करने की ख्वाहिश और जिद पर अड़े रहते हैं, जबकि शोषण, भेदभाव और जातिगत भेदभाव के उद्गम स्थल यही मंदिर हैं, जहां राज कानून संविधान या उस के आर्टिकल 17 का नहीं, बल्कि पुराणवादियों का चलता है. इस से वे कोई सम झौता किसी भी शर्त पर नहीं करते. हां, तगड़ी दक्षिणा मिले तो दलितों को भी सवर्णों की तरह पूजापाठ करने की इजाजत दे देते हैं, वह भी अहसान की शक्ल में.

प्रसंगवश यह जान लेना जरूरी है कि यही जिद कभी राष्ट्रपति रहते रामनाथ कोविंद ने भी की थी. लेकिन इन पुराणवादियों ने बख्शा उन्हें भी नहीं था.

मामला 18 अक्तूबर, 2018 का है, जब वे अपनी पत्नी सविता कोविंद सहित पुरी के जगन्नाथ मंदिर गए थे. चूंकि मामला राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का था, लेकिन उस पर बैठा व्यक्ति कोरी यानी दलित समुदाय का था, इसलिए हल्ला कम मचा, क्योंकि मामले पर लीपापोती कर दी गई थी, पर उन्हें भी प्रवेश से रोकने की कोशिश की गई थी, उन के साथ लगभग धक्कामुक्की की गई थी. सच जो भी हो लेकिन मंदिर के अंदर जाने की इजाजत उन्हें मिल गई थी.

ठीक उसी दिन यह खबर भी सुर्खियों में रही थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को एक लाख रुपए का दान दिया. मुमकिन है कि यह सौदा रहा हो.

ऐसी सौदेबाजियां समाज में अब बेहद आम हैं, जिन के तहत पंडेपुजारी पैसे वाले दलितों के घर मनमुताबिक दक्षिणा मिल जाने पर पूजापाठ करने के लिए चले जाते हैं, क्योंकि उन का सब से बड़ा भगवान यही पैसा होता है जिस के लिए सारे धार्मिक छलप्रपंच रचे गए हैं. ये वे शिक्षित और संपन्न हो गए दलित हैं जो अपना मसीहा तो भीमराव अंबेडकर को मानते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि अंबेडकर ने कई बार बहुत साफतौर पर नसीहत दलितों को दे रखी थी कि पुराणवादियों के अत्याचारों से छुटकारा चाहिए तो स्कूलकालेजों को मंदिर सम झो और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानो.

बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मंत्र यही दिया था कि मंदिर और धर्मग्रंथ छोड़ो और सीधेसीधे मनुवादियों से राजनातिक स्तर पर भिड़ो, तो जीत भी सकते हो.

ऐसा होता दिखने भी लगा था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने कैसे भाजपा के सामने हथियार डालते हुए घुटने भी टेक दिए, यह हर किसी ने देखा. यह ठीक है कि मायावती कभी मंदिर नहीं गईं लेकिन इस से उन के गुनाह पर परदा नहीं डल जाता.

बिहार में यही काम जीतनराम मांझी के बाद चिराग पासवान कर रहे हैं जिन के लिए उन के पिता रामविलास पासवान विरासत में अच्छीखासी सियासी पूंजी छोड़ गए हैं.

फिल्मों और क्रिकेट में नाकाम रहे चिराग पासवान ने अपने पिता के उसूलों को तोड़तेमरोड़ते भाजपा का हाथ थामने के लिए खुद को धार्मिक और कर्मकांडी साबित करते हुए पिता की तेरहवीं धूमधाम से की थी, अपना सिर मुंडाया था, गंगा पूजन किया, मृत्युभोज दिया और ब्राह्मण पूजन भी किया था, जबकि रामविलास पासवान का मानना था कि दलितों के पिछड़ेपन और शोषण की बड़ी वजह यही ढोंग और पाखंड हैं, इसलिए वे कभी इन चक्करों में नहीं पड़े और अपनी शर्तों पर भाजपा से सम झौता करते रहे.

लेकिन अब उलटा हो रहा है. चिराग पासवान इतने बेबस हो गए हैं कि भाजपा के इशारे पर नाचते रहने के सिवा उन के पास कोई रास्ता नहीं बचा.

बिहार के ये दोनों ही नेता भाजपा की गोद में बैठ कर मायावती की तरह वोट शिफ्टिंग वाला खेल खेलते हैं. एक तरह से देखा जाए तो सीधेसीधे पुराणवादियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

90 के दशक के लालू राज में दलितपिछड़े साथसाथ थे और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना रोल मौडल मानते थे. लालू प्रसाद यादव जानतेसम झते थे कि न केवल दलित पिछड़ों, बल्कि मुसलिमों की भी सब से बड़ी दुश्मन पार्टी भाजपा ही है. लिहाजा, उन्होंने खुलेआम भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उन के मनुवाद के चिथड़े उड़ाते हुए इन दोनों समुदायों को साध लिया था.

मुसलिम भी कम परेशान नहीं

19 फीसदी मुसलिम आबादी वाले बिहार में मुसलिमों की हालत भी दलितों सरीखी ही है. वे भी मुख्यधारा से दूर हैं और पुराणवादियों के धार्मिक तिरस्कार, प्रताड़ना और अनदेखी के शिकार हैं.

इन का भी दलितों की तरह कोई सियासी बड़ा नेता नहीं है. आजादी के बाद यह वर्ग कांग्रेस को अपना हितैषी सम झ कर उसे वोट करता रहा, लेकिन लालू युग की शुरुआत से ही राजद का हो लिया.

लालू प्रसाद यादव की तो राजनीति ही यादवों के साथसाथ मुसलिमों के कंधों पर टिकी थी जिसे पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘एमवाय’ का नारा दिया था.

साल 2024 में बिहार में 7 बड़ी सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिन में कोई दर्जनभर मुसलिम मारे गए थे. हिंदू तीजत्योहारों पर तो मुसलिमों की शामत सी आ जाती है. मुसलिम बहुल इलाकों से जब हिंदुओं के जुलूस वगैरह निकलते हैं, तो मुसलिम दुआ मांगने लगते हैं कि सब कुछ ठीकठाक निबट जाए, नहीं तो खैर नहीं.

नीतीश राज से उन्हें कोई एतराज या परेशानी नहीं होती, लेकिन जब भी नीतीश राम भक्तों की पार्टी के पहलू में जा बैठते हैं तो मुसलिम खुद को पहले से ज्यादा असुरक्षित और असहज महसूस करने लगते हैं.

मोदी राज में बंगलादेशी घुसपैठियों के नाम पर बिहार में मुसलिमों को निशाने पर अकसर लिया जाता रहा है. पूर्वी सीमांचल के जिलों कटिहार और किशनगंज में तो यह आएदिन की बात हो गई है जहां के मुसलिम खुद को पराया सम झने लगे हैं.

90 फीसदी मुसलिम रोज कमानेखाने वाले हैं, जो छोटेमोटे काम कर के जैसेतैसे गुजारा करते हैं. एसआईआर में दलितों के साथ मुसलिमों के नाम सब से ज्यादा कटे हैं, जिस पर कांग्रेस और राजद ने जम कर बबाल काटा था.

चुनाव आतेआते यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, लेकिन मुसलिम तबका मन बना चुका है कि अब भाजपा से चार हाथ दूर ही रहना है और जनता दल (यू) से भी परहेज करना है.

न केवल धर्म बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी मुसलिम और दलित एकदूसरे को नजदीक महसूस करते रहे हैं. 90 के दशक में दोनों ने दिल से लालू प्रसाद यादव को वोट किया था. इस के बाद नीतीश कुमार पर भी उन्होंने भरोसा जताया और पिछले चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी के साथ यह सोचते हो गए थे कि शायद वे हमे सुरक्षा दे पाएं. पर जल्द ही साफ हो गया कि ओवैसी बिहार में मुसलिम वोटों की फसल काटने आए थे, जिन की कोई जमीनी पकड़ या संगठन नहीं है. सभी से मोह भंग होने के बाद इस बार फिर यह तबका महागठबंधन की तरफ झुक रहा है, क्योंकि ज्यादातर दलित भी अब जद (यू) पर भरोसा नहीं कर रहे.

साथ होंगे दलितमुसलिम

मंडल कमीशन के बाद कमंडल की राजनीति बिहार में दूसरे हिंदीभाषी राज्यों की तरह परवान नहीं चढ़ पाई थी, तो लालू प्रसाद यादव इस की एक बड़ी वजह थे. उन की हरमुमकिन कोशिश भाजपा को रोकने की रही, क्योंकि इस के खतरे और नुकसान उन्हें सम झ आ रहे थे कि अगर कभी धोखे से भी भाजपा अपने दम पर बिहार की सत्ता पर काबिज हो पाई तो बिहार में भी पूरी तरह ब्राह्मण राज कायम हो जाएगा.

साल 2020 के चुनाव नतीजों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि न केवल दलित बल्कि मुसलिम वोट भी बंटे थे. इस चुनाव में राजग को 125 सीटें मिली थीं जिन में से भाजपा को 74 और 43 जनता दल (यू) के खातें में गई थीं. हम और वीआईपी के खाते में 4-4 सीट आई थीं.

महागठबंधन में राजद को 75 और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं, तो वामपंथी दल 16 सीटें ले जाने में कामयाब रहे थे. लोजपा को गिरते पड़ते एक सीट जमुई की मिल पाई थी, लेकिन ओवैसी की एआईएमआईएम को उम्मीद से ज्यादा 5 सीटें मिली थीं. हालांकि, बाद में उस के 4 विधायक राजद में चले गए थे. हैरत की बात महागठबंधन का वोट शेयर 37.5 फीसदी राजग के 37.3 फीसदी से 0.2 फीसदी ज्यादा होना रहा था.

इस चुनाव में चिराग पासवान की मंशा राजद के वोट काटने की ज्यादा थी, जिस में वे कामयाब भी रहे थे. कोई 15 सीटों पर लोजपा ने राजद के वोट काटे थे, जिन में दलितमुसलिम वोट ज्यादा थे. हालांकि, राजद से कहीं ज्यादा नुकसान जद (यू) को उठाना पड़ा था, लेकिन उस की भरपाई भाजपा ने कर दी थी.

महागठबंधन को दूसरा बड़ा नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था, क्योंकि मुसलिम बहुल सीटें जो राजद और कांग्रेस को मिलनी तय मानी जा रही थीं, उन्हें ओवैसी की पार्टी झटक ले गई थी.

इस जीत ने साफ कर दिया था कि एआईएमआईएम को मुसलिमों के साथ साथ दलित वोट भी मिले हैं. हालांकि, 4 विधायकों के पाला बदल लेने से एआईएमआईएम की साख पर बट्टा ही लगा था. मुसलिमों को सम झ आ गया था कि इस पार्टी से उन के भले की उम्मीद करना बेकार की बात है.

बिहार में मुसलिम वोट तकरीबन 18 फीसदी और दलित वोट 19 फीसदी हैं, जो निर्णायक है और महागठबंधन के पाले में जाना तय हैं, जिस की दावेदारी 14 फीसदी यादव वोटरों की भी है. इस तरह 51 फीसदी वोट अगर महागठबंधन को मिलते हैं, तो उसकी राह में कोई रोड़ा है नहीं.

लेकिन यही अंदाजा पिछले चुनाव में भी सियासी पंडितों का था जो पूरी तरह गलत नहीं निकला था, क्योंकि मामूली ही सही पर महागठबंधन का वोट फीसदी राजग से ज्यादा था. एआईएमआईएम ने 1.25 फीसदी मुसलिम वोटों और 5 सीटों को हथियाया था तो हम और लोजपा ने कोई 7 फीसदी दलित वोटों को अपने पाले में लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

इस बार इन वोटों में सेंधमारी करने की कोशिश पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी कर रही है. लेकिन दलितमुसलिम दोनों ही दूध के जले हैं, लिहाजा छाछ होंठों तक ले जाने की हिम्मत जुटा पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा.

शुरू में ऐसा लग रहा था कि भूमिहार होने के चलते पीके केवल 15 फीसदी सवर्ण वोटों में सेंध लगाएंगे, लेकिन चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही उन का दखल दलितमुसलिम बहुल बस्तियों और सीटों में बढ़ा तो साफ हो गया कि उन की असल मंशा क्या है.

वैसे भी बिहार में अनिश्चितता का माहौल है खासतौर से दलितमुसलिम ज्यादा सहमे हुए हैं, जिन्हें प्रशांत किशोर लुभाने की कोशिश कर तो रहे हैं, लेकिन उन के पास कोई ठोस आधार नहीं है सिवा बातों, वादों और आश्वासनों के. ऐसे में वे खुद को बिहार का अरविंद केजरीवाल साबित कर पाएंगे, ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि उन के पीछे न कोई अन्ना हजारे है और न ही बड़ा कोई आंदोलन है, जो लोगों का मन बदल सके.

बिहार में बहुतकुछ साफ भी है कि पुराणवादियों का दबदबा खत्म होना चाहिए और इस के लिए दलितमुसलिम एकजुट हो गए तो राजग को झटका भी लग सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार अब सिर्फ 3 फीसदी कुर्मियों के नेता रह गए हैं और सेहत भी उन का साथ नही दे रही. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने संविधान का हवाला और वास्ता दे कर आगाज तो अच्छा कर दिया है. Bihar Elections 2025

Funny Story In Hindi: साहबजी के श्री चरनन में

Funny Story In Hindi: आदरणीय… परमादरणीय सब से बड़े साहबजी, जयहिंद.

जैसे कि आप को पता ही है कि हम 4 चपरासी पिछले 15 सालों से आप के दफ्तर के दरवाजे पर बैठ कर आप के लिए काम करवाने आने वालों से आप के कहे मुताबिक रेट वसूलते रहे हैं. हम से रेट वसूलवाते हुए पता नहीं आप जैसे कितने बड़े साहब आए और आ कर चले गए, पर हम वहीं के वहीं रहे साहबजी.

हे सब से बड़े साहबजी, हमारे द्वारा वसूला गया रेट ऊपर तक जाता है, जैसा कि हमें बताया गया है. इस में हमें कोई एतराज भी नहीं कि हमारे द्वारा जनता से वसूला गया रेट कहां जाता है? जहां जाता हो, वहां जाता रहे. अपना काम तो बस, काम करवाने आयों से आप के द्वारा तय रेट वसूलने के बाद ही उसे दफ्तर में दाखिल होने की इजाजत देना है और इस काम को पिछले 15 सालों से हम पूरी ईमानदारी से निभाते भी आ रहे हैं.

हम ने बिन रेट लिए आप के दफ्तर में आज तक किसी को घुसने नहीं दिया, चाहे वह यमराज ही क्यों न हो. लेकिन हमारी इस ईमानदारी के बाद भी हम वहीं के वहीं बैठे हैं, पर उसी आप के दफ्तर के बाहर वाले स्टूल पर और हम से काम करवाने वाले पता नहीं कहां से कहां पहुंच गए.

कसम बीवीबच्चों की बड़े साहबजी, जो हम ने आज तक जनता से वसूले गए पैसों में से एक पैसा भी अपनी जेब में रखा हो. हम आप के दफ्तर के वे ईमानदार मुलाजिम हैं, जो छोटे बाबू की हथेली में 5 बजने के तुरंत बाद पूरी ईमानदारी से पाईपाई जमा करवाते रहे हैं. हम आप के दफ्तर के सींसियर बंदे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से आसानी से लगाया जा सकता है बड़े साहबजी.

बड़े साहबजी, हमें इस बात का बिलकुल दुख नहीं है कि हम गलत काम करते हैं. वैसे भी सही काम यहां कौन कर रहा है? सभी तो अपनेअपने हिसाब से जनता को खा ही रहे हैं. पैसे ले कर भी उसे उस की फाइलों पर नचा ही रहे हैं. हर दफ्तर में जनता होती ही खाने को है, नचाने को है.

बड़े साहबजी, हम चाहते तो नहीं थे कि आप से गुहार लगाएं, आप को वसूले गए धन में से अपने हिस्से का दर्द सुनाएं, पर क्या करें बड़े साहबजी, अब पानी सिर से ऊपर हो रहा है, इसलिए हम आप से गुहार लगाते हैं कि जितना आप के कहने से हम काम करवाने आने वालों से वसूलते हैं, हमें अभी भी उस में से उतना ही कमीशन मिल रहा है, जितना 15 साल पहले मिला करता था.

आप ने अपने दफ्तर में काम करवाने आने वालों के रेट में तो कमरतोड़ इजाफा कर दिया है, पर हमें आप के लिए पैसे इकट्ठे करने में से 15 साल पहले वाला रेट ही मिल रहा है. उस में से भी 2 परसैंट छोटे बाबू मार जाते हैं.

बुरा मत मानना बड़े साहबजी, पर आप की वजह से जनता की सीधी गालियां कौन सुनता है? हम सुनते हैं साहबजी… हम. जनता से पैसे वसूलने के लिए बदनाम कौन होता है? आप? नहीं बड़े साहबजी, हम होते हैं… हम.

बड़े साहबजी, आप तो जानते ही हैं कि हमारे गालियां सुनने से नीचे से ऊपर तक पता नहीं कितनों की जेबें भरती हैं. पता नहीं आप को पता हो या न हो, पर अब वसूली के इस कमीशन में अपना गुजारा होना बहुत मुश्किल हो गया है बड़े साहबजी, इसलिए आप से सादर निवेदन है कि आप सब के लिए इकट्ठे किए गए पैसों में से हमारा कमीशन भी समय के साथ बढ़ाएं.

ऐसा नहीं है कि अपनी मजबूरी हम ने आज तक किसी से न कही हो. इस बारे हम ने म झले बाबू से कई बार गुहार लगाई, उन के आगे हाथ जोड़े, पर उन्होंने हर बार हमें हड़का कर टाल दिया कि जब तक उन्होंने जो फ्लैट खरीदा है, उस की किस्तें पूरी नहीं हो जातीं, उन का बेटा कौन्वैंट स्कूल से जैंटलमैन बन
कर निकल नहीं जाता, तब तक हमारे कमीशन में कोई इजाफा नहीं किया जा सकता. वे खुद इन दिनों केवल हमारे द्वारा वसूले गए पैसों के हिस्से से रोतेबिलखते पल रहे हैं.

बड़े साहबजी, हमारा पिछले 15 बरसों से कमीशन के तौर पर शोषण हो रहा है. जितना हमें आप के द्वारा कमीशन मिलता है, जनता में हम उस से कहीं ज्यादा बदनाम हो रहे हैं. महल्ले वाले सोचते हैं कि हमारे पास पता नहीं कितनी दौलत है, पर वे यह नहीं जानते कि हमारे द्वारा इकट्ठी की गई दौलत जाती कहांकहां है.

आप से हाथ जोड़ कर निवेदन है कि आप काम करवाने आने वालों से जो हम से इकट्ठा करवाते हैं, उस में से जो हमें कमीशन के नाम पर देते हैं, उस की परसैंटेज बढ़ाई जाए. पुराने रेट में जनता से पैसा वसूलने में अब हमें बहुत शर्म आने लगी है.

आप को तो आटेदाल के भाव क्या ही पता होंगे बड़े साहबजी, क्यों पता होंगे बड़े साहबजी, आप को यही बता दें कि बाजार में जो आटा पहले 10 रुपए किलो मिलता था, अब वह 40 रुपए किलो हो गया है और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दाल पहले 50 रुपए किलो मिलती थी, अब वह 100 रुपए किलो भी नहीं मिल रही और जनता से पैसा वसूलने पर हमारा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला.

अब देखो न साहबजी, बाजार में जो दूध पहले 20 रुपए लिटर मिलता था, अब वह 50 रुपए लिटर भी नहीं मिल रहा और जनता से पैसा वसूलने पर हमरा कमीशन वही 15 साल पुराने वाला. आलूप्याज, सब्जियों के रेट तो आप से क्या ही डिसक्स करें…

बड़े साहबजी से निवेदन है कि परमानैंट सरकारी कमीशन एजेंट होने के नाते हमारे कमीशन में बैक डेट से दोगुना बढ़ोतरी की जाए. हो सके तो इस बीच जो हमारा बकाया बनता है, वह भी हमें एरियर के तौर पर एकमुश्त जारी किया जाए, ताकि हम अपने परिवार के साथ उठनेबैठने लायक बनें.

हम हैं आप के दफ्तर के दरवाजे पर सुबह के 9 बजे से ले कर शाम के 6 बजे तक बिना हिलेडुले जनता से पैसे वसूलने, जनता से 200-400 रुपल्ली लेने के बदले हजारहजार की गालियां सुनने वाले 4 कमीशनिया चपरासी. Funny Story In Hindi

Hindi Romantic Story: प्यार का धागा – कैसे धारावी की डौल बन गई डौली

Hindi Romantic Story: सांझ ढलते ही थिरकने लगते थे उस के कदम. मचने लगता था शोर, ‘डौली… डौली… डौली…’

उस के एकएक ठुमके पर बरसने लगते थे नोट. फिर गड़ जाती थीं सब की ललचाई नजरें उस के मचलते अंगों पर. लोग उसे चारों ओर घेर कर अपने अंदर का उबाल जाहिर करते थे.

…और 7 साल बाद वह फिर दिख गई. मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट. सोचा था कि जब अगली बार मुलाकात होगी, तो वह जरूर मराठी धोती पहने होगी और बालों का जूड़ा बांध कर उन में लगा दिए होंगे चमेली के फूल या पहले की तरह जींसटीशर्ट में, मेरी राह ताकती, उतनी ही हसीन… उतनी ही कमसिन…

लेकिन आज नजारा बदला हुआ था. यह क्या… मेरे बचपन की डौल यहां आ कर डौली बन गई थी.

लकड़ी की मेज, जिस पर जरमन फूलदान में रंगबिरंगे डैने सजे हुए थे, से सटे हुए गद्देदार सोफे पर हम बैठे

हुए थे. अचानक मेरी नजरें उस पर ठहर गई थीं.

वह मेरी उम्र की थी. बचपन में मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे अपने साथ स्कूल ले कर जाती थी. उन दिनों मेरा परिवार एशिया की सब से बड़ी झोपड़पट्टी में शुमार धारावी इलाके में रहता था. हम ने वहां की तंग गलियों में बचपन बिताया था.

वह मराठी परिवार से थी और मैं राजस्थानी ब्राह्मण परिवार का. उस के पिता आटोरिकशा चलाते थे और उस की मां रेलवे स्टेशन पर अंकुरित अनाज बेचती थी.

हर शुक्रवार को उस के घर में मछली बनती थी, इसलिए मेरी माताजी मुझे उस दिन उस के घर नहीं जाने देती थीं.

बड़ीबड़ी गगनचुंबी इमारतों के बीच धारावी की झोपड़पट्टी में गुजरे लमहे आज भी मुझे याद आते हैं. उगते हुए सूरज की रोशनी पहले बड़ीबड़ी इमारतों में पहुंचती थी, फिर धारावी के बाशिंदों के पास.

धारावी की झोपड़पट्टी को ‘खोली’ के नाम से जाना जाता है. उन खोलियों की छतें टिन की चादरों से ढकी रहती हैं.

जब कभी वह मेरे घर आती, तो वापस अपने घर जाने का नाम ही नहीं लेती थी. वह अकसर मेरी माताजी के साथ रसोईघर में काम करने बैठ जाती थी.

काम भी क्या… छीलतेछीलते आधा किलो मटर तो वह खुद खा जाती थी. माताजी को वह मेरे लिए बहुत पसंद थी, इसलिए वे उस से बहुत स्नेह रखती थीं.

हम कल्याण के बिड़ला कालेज में थर्ड ईयर तक साथ पढे़ थे. हम ने लोकल ट्रेनों में खूब धक्के खाए थे. कभीकभार हम कालेज से बंक मार कर खंडाला तक घूम आते थे. हर शुक्रवार को सिनेमाघर जाना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था.

इसी बीच उस की मां की मौत हो गई. कुछ दिनों बाद उस के पिता उस के लिए एक नई मां ले आए थे.

ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैं और पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चला गया था. कई दिनों तक उस के बगैर मेरा मन नहीं लगा था.

जैसेतैसे 7 साल निकल गए. एक दिन माताजी की चिट्ठी आई. उन्होंने बताया कि उस के घर वाले धारावी से मुंबई में कहीं और चले गए हैं.

7 साल बाद जब मैं लौट कर आया, तो अब उसे इतने बड़े महानगर में कहां ढूंढ़ता? मेरे पास उस का कोई पताठिकाना भी तो नहीं था. मेरे जाने के बाद उस ने माताजी के पास आना भी बंद कर दिया था.

जब वह थी… ऐसा लगता था कि शायद वह मेरे लिए ही बनी हो. और जिंदगी इस कदर खुशगवार थी कि उसे बयां करना मुमकिन नहीं.

मेरा उस से रोज ?ागड़ा होता था. गुस्से के मारे मैं कई दिनों तक उस से बात ही नहीं करता था, तो वह रोरो कर अपना बुरा हाल कर लेती थी. खानापीना छोड़ देती थी. फिर बीमार पड़ जाती थी और जब डाक्टरों के इलाज से ठीक हो कर लौटती थी, तब मुझ से कहती थी, ‘तुम कितने मतलबी हो. एक बार भी आ कर पूछा नहीं कि तुम कैसी हो?’

जब वह ऐसा कहती, तब मैं एक बार हंस भी देता था और आंखों से आंसू भी टपक पड़ते थे.

मैं उसे कई बार समझाता कि ऐसी बात मत किया कर, जिस से हमारे बीच लड़ाई हो और फिर तुम बीमार पड़ जाओ. लेकिन उस की आदत तो जंगल जलेबी की तरह थी, जो मुझे भी गोलमाल कर देती थी.

कुछ भी हो, पर मैं बहुत खुश था, सिवा पिताजी के जो हमेशा अपने ब्राह्मण होने का घमंड दिखाया करते थे.

एक दिन मेरे दोस्त नवीन ने मुझसे कहा, ‘‘यार पृथ्वी… अंधेरी वैस्ट में ‘रैडक्रौस’ नाम का बहुत शानदार बीयर बार है. वहां पर ‘डौली’ नाम की डांसर गजब का डांस करती है. तुम देखने चलोगे क्या? एकाध घूंट बीयर के भी मार लेना. मजा आ जाएगा.’’

बीयर बार के अंदर के हालात से मैं वाकिफ था. मेरा मन भी कच्चा हो रहा था कि अगर पुलिस ने रेड कर दी, तो पता नहीं क्या होगा… फिर भी मैं उस के साथ हो लिया.

रात गहराने के साथ बीयर बार में रोशनी की चमक बढ़ने लगी थी. नकली धुआं उड़ने लगा था. धमाधम तेज म्यूजिक बजने लगा था.

अब इंतजार था डौली के डांस का. अगला नजारा मुझे चौंकाने वाला था. मैं गया तो डौली का डांस देखने था, पर साथ ले आया चिंता की रेखाएं.

उसे देखते ही बार के माहौल में रूखापन दौड़ गया. इतने सालों बाद दिखी तो इस रूप में. उसे वहां देख

कर मेरे अंदर आग फूट रही थी. मेरे अंदर का उबाल तो इतना ज्यादा था कि आंखें लाल हो आई थीं.

आज वह मुझे अनजान सी आंखों से देख रही थी. इस से बड़ा दर्द मेरे लिए और क्या हो सकता था? उसे देखते ही, उस के साथ बिताई यादों के झरोखे खुल गए थे.

मु?ो याद हो आया कि जब तक उस की मां जिंदा थीं, तब तक सब ठीक था. उन के मर जाने के बाद सब धुंधला सा गया था.

उस की अल्हड़ हंसी पर आज ताले जड़े हुए थे. उस के होंठों पर दिखावे की मुसकान थी.

वह अपनेआप को इस कदर पेश कर रही थी, जैसे मुझे कुछ मालूम ही नहीं. वह रात को यहां डांसर का काम किया करती थी और रात की आखिरी लोकल ट्रेन से अपने घर चली जाती थी. उस का गाना खत्म होने तक बीयर की पूरी

2 बोतलें मेरे अंदर समा गई थीं.

मेरा सिर घूमने लगा था. मन तो हुआ उस पर हाथ उठाने का… पर एकाएक उस का बचपन का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने तैर आया.

मेरा बीयर बार में मन नहीं लग रहा था. आंखों में यादों के आंसू बह रहे थे. मैं उठ कर बाहर चला गया. नवीन तो नशे में चूर हो कर वहीं लुढ़क गया था.

मैं ने रात के 2 बजे तक रेलवे स्टेशन पर उस के आने का इंतजार किया. वह आई, तो उस का हाथ पकड़ कर मैं ने पूछा, ‘‘यह सब क्या है?’’

‘‘तुम इतने दूर चले गए. पढ़ाई छूट गई. पापी पेट के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तो करना ही था. मैं क्या करती?

‘‘सौतेली मां के ताने सुनने से तो बेहतर था… मैं यहां आ गई. फिर क्या अच्छा, क्या बुरा…’’ उस ने कहा.

‘‘एक बार माताजी से आ कर मिल तो सकती थीं तुम?’’

‘‘हां… तुम्हारे साथ जीने की चाहत मन में लिए मैं गई थी तुम्हारी देहरी पर… लेकिन तुम्हारे दर पर मुझे ठोकर खानी पड़ी.

‘‘इस के बाद मन में ही दफना दिए अनगिनत सपने. खुशियों का सैलाब, जो मन में उमड़ रहा था, तुम्हारे पिता ने शांत कर दिया और मैं बैरंग लौट आई.’’

‘‘तुम्हें एक बार भी मेरा खयाल नहीं आया. कुछ और काम भी तो कर सकती थीं?’’ मैं ने कहा.

‘‘कहां जाती? जहां भी गई, सभी ने जिस्म की नुमाइश की मांग रखी. अब तुम ही बताओ, मैं क्या करती?’’

‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हारा मन मैला नहीं है. कल से तुम यहां नहीं आओगी. किसी को कुछ कहनेसम?ाने की जरूरत नहीं है. हम दोनों कल ही दिल्ली चले जाएंगे.’’

‘‘अरे बाबू, क्यों मेरे लिए अपनी जिंदगी खराब कर रहे हो?’’

‘‘खबरदार जो आगे कुछ बोली. बस, कल मेरे घर आ जाना.’’

इतना कह कर मैं घर चला आया और वह अपने घर चली गई. रात सुबह होने के इंतजार में कटी. सुबह उठा, तो अखबार ने मेरे होश उड़ा दिए. एक खबर छपी थी, ‘रैडक्रौस बार की मशहूर डांसर डौली की नींद की ज्यादा गोलियां खाने से मौत.’

मेरा रोमरोम कांप उठा. मेरी खुशी का खजाना आज लुट गया और टूट गया प्यार का धागा.

‘‘शादी करने के लिए कहा था, मरने के लिए नहीं. मुझे इतना पराया सम?ा लिया, जो मुझे अकेला छोड़ कर चली गई? क्या मैं तुम्हारा बो?ा उठाने लायक नहीं था? तुम्हें लाल साड़ी में देखने

की मेरी इच्छा को तुम ने क्यों दफना दिया?’’ मैं चिल्लाया और अपने कानों पर हथेलियां रखते हुए मैं ने आंखें भींच लीं.

बाहर से उड़ कर कुछ टूटे हुए डैने मेरे पास आ कर गिर गए थे. हवा से अखबार के पन्ने भी इधरउधर उड़ने लगे थे. माहौल में फिर सन्नाटा था. रूखापन था. गम से भरी उगती हुई सुबह थी वह. Hindi Romantic Story

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