Story In Hindi: जुम्मन के मन की बात – दर्द ए दिल

Story In Hindi: अब्बू और अम्मी के राज में भी सभी तरह की बातें करते थे, पर कभी मन की बात नहीं कर सके. वैसे भी बाप के होटल में गुजारा करने वालों की कोई  सुनता नहीं. जवानी फूटी तो बगल और नाक के नीचे वाले हिस्सों में छोटेछोटे बाल उगने शुरू हुए, तो स्कूल और कालेज की लड़की सहपाठी से ईलू टाइप मन की बात कहने की इच्छा बलवती हुई, पर बेरोजगारों की जब ऊपर वाला नहीं सुनता तो लड़की सहपाठी क्या खाक सुनेगी. यह विचार मन में आते ही जुम्मन चचा के मन के उपवन में मन की बात दफन हो कर रह गई.

डिगरी हासिल होने पर घर वालों से यूपीएससी की तैयारी करने की मन की बात शेयर करना चाहते थे, कम आमदनी वाले पिता सुलेमान दर्जी के सामने मन की मरजी वाली अर्जी दायर नहीं कर पाए. नतीजतन, सरकारी दफ्तर में चपरासी बन कर रह गए.

आप को पता ही है कि मुलाजिम से अफसर तक सब की सुनने वाले की बात भला कोई सुनता है क्या?

हालत और हालात के चलते बातों की खेती करने वाले जुम्मन चचा के अंदर का हुनर मरने सा लगा. नौकरी लगी नहीं कि निकाह के लिए रिश्ते आने शुरू हो गए.

पतली, कमसिन और हसीन बेगम की इच्छा पालने वाले जुम्मन मियां शर्म और हया के चलते इस बार भी घर वालों से मन की बात कह सकने में नाकाम रहे. नतीजतन, भारीभरकम दहेज के साथ पौने 3 गुना भारीभरकम वजन वाली बेगम से उन का कबूलनामा पढ़वा दिया गया.

निकाह के बाद मन की बात करना तो दूर मन की बात सोचना भी चचा जुम्मन के लिए दूभर हो गया. दफ्तर और घरेलू कामों की दोहरी जिम्मेदारी जो मिल गई थी. पिछले 22 साल से जुम्मन की घरगृहस्थी में एमन बेगम की बात ही कही, सुनी और मानी जाने लगी.

एक दिन की बात है. चचा जुम्मन सूजे हुए चेहरे के साथ लंगड़ाते हुए ‘अल्प संसद’ के उपनाम से मशहूर असलम की चाय दुकान पर पहुंचे. ढुलमुल अर्थव्यवस्था की तरह चचा की अवस्था को देख कर ‘कब, कहां, कैसे’ के संबोधन के साथ मुफ्त का अखबार पढ़ने और चाय की चुसकी के बीच खबरों का स्थानीय पोस्टमार्टम करने वाले बुद्धिजीवी पूछ बैठे, ‘‘अरे, यह क्या हो गया चचाजान?’’

जुम्मन चचा ने गहरी सांस लेते हुए जवाब दिया, ‘‘अब क्या बताऊं भाई, कल दोपहर में तुम्हारी चाचीजान के लिए चाय बनाई थी…’’

‘‘तो क्या चाय सही नहीं बनने के चलते चाची ने खातिरदारी कर डाली?’’ भीड़ में से किसी ने चुटकी ली.

जुम्मन चचा खीजते हुए बोले, ‘‘बिना बात के बेतिया मत बनो यार. पूरी बात सुनते नहीं कि लहेरिया सराय बन बीच में लहराने लगते हो.’’

‘‘मोकामा की तरह मौन हो कर चुपचाप सुन नहीं सकते क्या भाई…’’ मामले की गंभीरता देखते हुए असलम चाय वाले ने अपनी बात रखी.

असलम की बात सुन कर सभी खामोशी से जुम्मन चचा की ओर मुखातिब हुए.

‘‘हां तो मैं बची हुई चाय को सुड़क रहा था कि घर की दीवार पर टंगे ससुराल से मदद से मिले 24 इंच वाले एलईडी पर अचानक छप्पन इंच वाले सज्जन प्रकट हो गए यानी न्यूज चैनल पर संयुक्त राष्ट्र में पीएम के मन की बात का लाइव प्रसारण होने लगा.

‘‘कार्यक्रम देख कर मेरे मन के अंदर भी कई बातें एकसाथ उफान मारने लगीं. यह सोच कर मेरा मन मुझे धिक्कारने लगा कि एक हमारे पीएम साहब हैं, जो संयुक्त राष्ट्र से अपने मन की बात कर रहे हैं. और एक मैं हूं, जो खुद के घर में भी मन बात नहीं कर सकता. कार्यक्रम देखते हुए मुझे प्रेरणा और हौसले का बूस्टर डोज मिला.

‘‘चाय की आखिरी चुसकी के साथ मन ही मन प्रण किया कि आज मैं भी हर हाल में मन की बात कह कर रहूंगा. फिर क्या, टीवी बंद कर बेगम के सामने मैं मन की बात करने लगा. उस के 22 साल के इमोशनल अत्याचार और ससुराल वालों की दखलअंदाजी वाली ट्रैजिडी पर खुल कर मन की बात कहने लगा.

‘‘अभी मेरे मन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि तुम्हारी चाची ने जम कर मेरी सुताई कर दी… कल दोबारा मुझे घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा…’’

चाय के गिलास से निकल रही भाप को चेहरे के सूजन क्षेत्र की ओर ले जाते हुए जुम्मन चचा ने अपना पूरा दर्द सुनाया.

‘ओह…’ एकसाथ हमदर्दी के कई स्वर चाय दुकान पर गूंज उठे.

‘‘लेकिन भाई, कल का कार्यक्रम देख कर मुझे एक बात की सीख जरूर मिल गई… यही कि पीएम की नकल नहीं करनी चाहिए…’’ जुम्मन चचा की बात पूरी होने से पहले ही बैंच पर बैठे उस्मान ने जोश में आ कर अपनी बात कही.

‘‘अरे नहीं मियां…’’ लंबी सांस लेते हुए जुम्मन चचा बोले, ‘‘अगर बेगम साथ न हो, तो बंदा संयुक्त राष्ट्र में भी मन की बात कर सकता है और अगर बेगम साथ हो, तो घर के अंदर भी मन की बात करना मयस्सर नहीं…’’ Story In Hindi

Romantic Story In Hindi: विसाल ए यार – इश्क की अंगड़ाई

Romantic Story In Hindi: दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद किसी बीमारी के चलते आयशा की मां चल बसी थीं. पिता ने दोनों को बड़े लाड़प्यार से पाला था.

आयशा बेशक अमीर लड़की थी, पर उसे पैसे का घमंड छू तक नहीं गया था. लेकिन हां, जिद की पक्की थी वह. जो कह दिया या सोच लिया वह तो कर के ही रहना है, फिर चाहे उस में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं.

आयशा की इसी जिंदादिली पर रोहित मरमिटा था, मगर वह यह नहीं जानता था कि आयशा इतने बड़े घराने से है. आखिरकार दोनों का इश्क अंगड़ाई लेने लगा.

‘‘आयशा, हमारा ग्रेजुएशन का यह आखिरी साल है. तुम ने आगे के बारे में क्या सोचा है? क्या तुम आगे पढ़ोगी या कुछ और?’’

‘‘रोहित, मैं तो अभी आगे पढ़ने की सोच रही हूं, मगर मैं तुम्हारे सिवा किसी और को अपना लाइफ पार्टनर नहीं बना सकती. अगर तुम्हें शादी की जल्दी हो तो मैं अपना प्लान बदल भी सकती हूं. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं, मगर तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. तुम न मिले तो मैं मर जाऊंगी.’’

‘‘आयशा, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा, लेकिन अभी मैं इस लायक भी नहीं कि अपने परिवार का बोझ उठा सकूं. मुझे अभी आगे और पढ़ना है, ताकि मैं किसी अच्छी पोस्ट पर जौब कर सकूं और तुम्हें और अपने परिवार को हर वह खुशी दे सकूं, जिस के तुम सब हकदार हो. तुम्हें इंतजार करना होगा.’’

‘‘मैं मरते दम तक भी इंतजार करूंगी, लेकिन एक बार तुम्हें मेरे पापा से मिल लेना चाहिए. तब तक मेरी भी पढ़ाई पूरी हो जाएगी, फिर हम दोनों मिल कर अपना परिवार संभाल लेंगे.’’

‘‘ठीक है. मैं कल ही तुम्हारे पापा से मिलता हूं.’’

अगले दिन रोहित आयशा के पापा से मिलने गया, तो आयशा के पापा ने उस से कहा, ‘‘अरे रोहित, आओ बेटा. मुझे तुम्हारे बारे में आयशा ने सब बता दिया है. बेटा, तुम ने बहुत सही फैसला लिया कि एक बार सैट हो कर ही शादी के बारे में सोचना है.’’

‘‘जी हां अंकल, पहले इनसान को परिवार पालने लायक बनना चाहिए, उस के बाद ही परिवार को आगे बढ़ाने का सोचना चाहिए. आप से मुझे यही उम्मीद थी. आयशा… अब मेरी अमानत है आप के पास. ठीक है तो मैं चलता हूं.’’

जैसे ही रोहित जाने के लिए उठा, आयशा के पापा ने उस के हाथ पर

50 लाख रुपए का चैक रख दिया, जिसे रोहित हैरानी से देखते हुए बोला, ‘‘अंकल, यह सब क्या है?’’

‘‘बेटा, यह मेरी तरफ से एक छोटी सी मदद है, जो तुम्हारा भविष्य बनाने में काम आएगी. और अब मेरी बेटी को भूलने की कोशिश करो, ताकि मैं उस की शादी किसी अच्छे और ऊंचे घराने में कर सकूं.’’

‘‘अंकल, आप मेरी मदद कर रहे हैं या मेरे प्यार का सौदा?’’

‘‘कुछ भी समझ लो. अभी मैं तुम्हें प्यार से समझा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो कि मुझे सख्ती से काम लेना पड़े.’’

रोहित चैक ठुकरा कर चला गया और जातेजाते कह गया, ‘‘अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो कोई भी हमें मिलने से नहीं रोक सकता.’’

‘‘पहले इस लायक बन कर दिखाओ,’’ आयशा के पापा को भी अब गुस्सा आने लगा.

आयशा ने लाख कहा कि वह रोहित के बिना जिंदा नहीं रह सकती, पर उस के पापा ने उस की एक न सुनी और फरमान सुना दिया कि अगले महीने आयशा की शादी उन के दोस्त के बेटे आशीष से कर दी जाएगी.

अगले महीने आयशा की शादी बिजनैस टायकून सुरेश मेहता के बेटे आशीष मेहता से करा दी गई. लेकिन जब आयशा विदा होने लगी, तब उस ने पापा को एक नजर देख कर कहा, ‘‘पापा, अब तक मैं आप के साए तले थी, आप का हर हुक्म मानने को मजबूर थी, लेकिन अब मैं अपना हर फैसला लेने के लिए आजाद हूं.’’

‘‘आशीष, मैं किसी और से प्यार करती हूं, इसलिए मैं आप के साथ पत्नी धर्म नहीं निभा सकती,’’ आयशा ने सुहागरात पर ही अपने पति से साफ लफ्जों में कह दिया.

‘‘अगर ऐसा है, तो तुम ने अपने पापा से क्यों नहीं कहा? अब मुझे कहने से क्या फायदा? अब कानूनन तुम मेरी पत्नी हो और तुम पर मेरा हक है.’’

‘‘मगर, किसी की मरजी के खिलाफ उस का शरीर पाना भी कानूनन जुर्म है, यह तो आप जानते ही होंगे, इसलिए आप मुझे तलाक दे दें, ताकि मैं भी अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकूं और आप भी.’’

‘‘मैं तुम्हें तलाक नहीं दे सकता. यह सब तुम्हें पहले सोचना था. हमारी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएंगी… क्या कहेंगे लोग कि बिजनैस टायकून मेहता का बेटा बीवी को नहीं संभाल सका. मैं तुम्हें किसी कीमत पर तलाक नहीं दूंगा.’’

‘‘तो ठीक है, इस के जिम्मेदार आप खुद होंगे, मैं उसे नहीं छोड़ सकती.’’

और वही हुआ, जो एक पत्नी को नहीं करना चाहिए था. आयशा अकसर रोहित से मिलती, उस पर अपने हुस्न का जाल बिछाती, मगर रोहित खुद पर काबू पा लेता.

आग भला घी से कितना दूर रहेगी. जब घी और आग पासपास होंगे, तो आग बढ़ेगी भी, भड़केगी भी. एक दिन रोहित भी बहक गया और दोनों के जिस्मानी संबंध बन गए.

अब आयशा रोहित को कहती कि वह उस से जिस्मानी संबंध बनाए रखे, ताकि किसी तरह उस का पति उसे तलाक दे दे. अगर रोहित कहता कि ऐसा करना गलत है, तो आयशा बीमार होने का नाटक करती. एक बार उस ने कार से जानबूझ कर अपना ऐक्सिडैंट भी किया, ताकि रोहित की हमदर्दी उसे मिल सके… और उधर अपने पति आशीष से भी कुछ न छिपाती, ताकि वह परेशान हो कर उसे तलाक दे दे.

लेकिन आयशा का पति अपने खानदान और अपने स्टेटस की वजह से उसे तलाक नहीं देना चाहता था. उस ने आयशा को बहुत समझाया कि वह गलत काम न करे.

जैसेजैसे समय बीतता गया, रोहित को भी आयशा के जिस्म का चसका लगता गया. साथ ही, आयशा के पति के पैसे पर ऐश करने का भी वह आदी हो गया था. वह अब आयशा को किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहता था, यहां तक कि उस की पढ़ाई का खर्च भी आयशा ही उठाती थी.

अचानक रोहित के पिता की मौत हो गई और इधर आयशा के पति ने भी आयशा के सारे बैंक अकाउंट सील करवा दिए. आयशा का घर से निकलना भी बंद कर दिया.

अब न तो आयशा के पास पैसा था और न ही रोहित के पापा की कमाई. सारी जिम्मेदारी रोहित पर आ गई. रोहित और आयशा का मिलना बंद हो गया.

इत्तिफाक से एक अच्छेखासे परिवार की एकलौती लड़की का रिश्ता रोहित के लिए आया और मां के समझाने पर रोहित ने शादी कर ली और ससुर का सारा बिजनैस संभालने लगा, जिस से रोहित का परिवार सैटल हो गया.

कुछ समय तक तो आयशा चुप रही, मगर उसे तन की भूख जब हद से बढ़ कर सताने लगी और रोहित से मिलने भी न दिया गया, तो उस ने खुदकुशी करने की कोशिश की.

आयशा के खुदकुशी करने वाले मुद्दे पर भी ससुराल वालों के लिए ही मुसीबत खड़ी होगी, इसलिए उस के पति आशीष ने अब अपने मातापिता से कुछ भी छिपाना ठीक नहीं समझा.

सारी बात जान कर आशीष के मातापिता ने आशीष को आयशा से तलाक के लिए राजी कर लिया.

इधर आयशा का तलाक हुआ और जैसे ही खुशीखुशी वह रोहित से मिलने उस के घर गई, सामने ही रोहित अपनी पत्नी के साथ नजर आया.

‘‘अरे आयशा, आओ… बड़े अच्छे मौके पर आई हो. आज मेरे बेटे का नामकरण है. आओ, तुम भी मेरे बेटे को आशीर्वाद दो.’’

आयशा हैरान सी खड़ी कभी रोहित को देखती, तो कभी उस के साथ खड़ी उस की पत्नी को, जिस की गोद में प्यारा सा बच्चा था. दूर कहीं से ‘मिर्जा गालिब’ फिल्म का सुरैया का गाना चल रहा था… ‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल ए यार होता…’ Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: गुनाहों का रिश्ता – सुदीप का किरण के लिए प्यार

Hindi Romantic Story: ‘‘किरण, क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’

‘‘नहीं तो.’’

‘‘तो फिर तुम ने मुझसे अचानक बोलना क्यों बंद कर दिया?’’

‘‘यों ही.’’

‘‘मुझ से कोई गलती हो गई हो, तो बताओ… मैं माफी मांग लूंगा.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है सुदीप. अब मैं सयानी हो गई हूं न, इसलिए लोगों को मुझ पर शक होने लगा है कि कहीं मैं गलत रास्ता न पकड़ लूं,’’ किरण ने उदास मन से कहा.

‘‘जब से तुम ने मुझे अपने से अलग किया है, तब से मेरा मन बेचैन रहने लगा है.’’

सुदीप की बातें सुन कर किरण बोली, ‘‘अभी तक हम दोनों में लड़कपन था, बढ़ती उम्र में जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं. दूसरों के कहने पर यह सब समझ में आया.’’

‘‘तुम ने कभी मेरे बारे में सोचा है कि मैं कितना बेचैन रहता हूं?’’

‘‘घर का काम निबटा कर जब मैं अकेले में बैठती हूं, तो दूसरे दोस्तों की यादों के साथसाथ तुम्हारी भी याद आती है. हम दोनों बचपन के साथी हैं. अब बड़े हो कर भी लगता है कि हम एकदूसरे के हमजोली बने रहेंगे.’’

‘‘तो दूरियां मत बनाए रखो किरण,’’ सुदीप ने कहा.

यह सुन कर किरण चुप हो गई.

जब सुदीप ने अपने दिल की बात कही, तो किरण का खिंचाव उस की ओर ज्यादा बढ़ने लगा.

दोनों अपने शुरुआती प्यार को दुनिया की नजरों से छिपाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जब दोनों के मिलने की खबर किरण की मां रामदुलारी को लगी, तो उस ने चेतावनी देते हुए कहा कि वह अपनी हद में ही रहे.

उसी दिन से सुदीप का किरण के घर आनाजाना बंद हो गया.

लेकिन मौका पा कर सुदीप किरण के घर पहुंच गया. किरण ने बहुत कहा कि वह यहां से चला जाए, लेकिन सुदीप नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम से दिल लगाया, तुम डरती क्यों हो? मैं  तुम से शादी करूंगा, मु?ा पर भरोसा करो.’’

‘‘सुदीप, प्यार तो मैं भी तुम से करती हूं, लेकिन… जैसे अमीर और गरीब का रिश्ता नहीं होता, इसी तरह से ब्राह्मण और नीची जाति का रिश्ता भी मुमकिन नहीं, इसलिए हम दोनों दूर ही रहें तो अच्छा होगा.’’

सुदीप पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा.

वह आगे बढ़ा और किरण को बांहों में भर कर चूमने लगा. पहले तो किरण को अच्छा लगा, लेकिन जब सुदीप हद से ज्यादा बढ़ने लगा, तो वह छिटक कर अलग हो गई.

‘‘बस सुदीप, बस. ऐसी हरकतें जब बढ़ती हैं, तो अनर्थ होते देर नहीं लगती. अब तुम यहां से चले जाओ,’’ नाखुश होते हुए किरण बोली.

‘‘इस में बुरा मानने की क्या बात है किरण, प्यार में यही सब तो होता है.’’

‘‘होता होगा. तुम ने इतनी जल्दी कैसे सम?ा लिया कि मैं इस के लिए राजी हो जाऊंगी?’’

‘‘बस, एक बार मेरी प्यास बुझ दो. मैं दोबारा नहीं कहूंगा. शादी से पहले ऐसा सबकुछ होता है.’’

‘‘नहीं सुदीप, कभी नहीं.’’

इस तरह सुदीप ने किरण से कई बार छेड़खानी की कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली.

कुछ दिन बाद किरण के मातापिता  दूसरे गांव में एक शादी में जातेजाते किरण को कह गए थे कि वह घर से बाहर नहीं निकलेगी और न ही किसी को घर में आने देगी.

उस दिन अकेली पा कर सुदीप चुपके से किरण के घर में घुसा और अंदर

से किवाड़ बंद कर किरण को बांहों में कस लिया.

अपने होंठ किरण के होंठों पर रख कर वह देर तक जबरदस्ती करता रहा, जिस से दोनों के जिस्म में सिहरन पैदा हो गई, दोनों मदहोश होने लगे.

किरण के पूरे बदन को धीरेधीरे सहलाते हुए सुदीप उस की साड़ी ढीली कर के तन से अलग करने की कोशिश करने लगा.

किरण का ध्यान टूटा, तो उस ने जोर से धक्का दे कर सुदीप को चारपाई से अलग किया और अपनी साड़ी ठीक करते हुए गरजी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की. चले जाओ यहां से.’’

‘‘चला तो जाऊंगा, लेकिन याद रखना कि तुम ने आज मेरी इच्छा पूरी नहीं होने दी,’’ सुदीप गुस्से में चला गया.

उस के जाने के बाद किरण की आंखों से आंसू निकल आए.

मां के लौटने पर किरण ने सारी सचाई बता दी. रामदुलारी ने उसे चुप रहने को कहा.

किरण के पिता सुंदर लाल से रामदुलारी ने कहा, ‘‘लड़की सयानी हो गई है, कुछ तो फिक्र करो.’’

‘‘तुम इसे मामूली बात सम?ाती हो? आजकल लड़की निबटाने के लिए गांठ भरी न हो, तो कोई बात नहीं करेगा. भले ही उस लड़के वाले के घर में कुछ न हो.’’

‘‘तो क्या यही सोच कर हाथ पर हाथ धर बैठे रहोगे?’’

‘‘भरोसा रखो. वह कोई गलत काम नहीं करेगी.’’

सुंदर लाल की दौड़धूप रंग लाई और एक जगह किरण का रिश्ता पक्का हो गया.

किरण की शादी की बात जब सुदीप के कानों में पहुंची, तो वह तड़प उठा.

एक रात किरण अपने 8 साला भाई के साथ मकान की छत पर सोई थी. उस के बदन पर महज एक साड़ी थी.

किरण और सुदीप के मकानों के बीच दूसरे पड़ोसी का मकान था, जिसे पार करता हुआ सुदीप उस की छत पर चला गया.

सुदीप किरण की बगल में जा कर लेट गया. किरण की नींद खुल गई. देखा कि वह सुदीप की बांहों में थी. पहले तो उस ने सपना सम?ा, पर कुछ देर में ही चेतना लौटी. वह सबकुछ सम?ा गई. उस ने सुदीप की बेजा हरकतों पर ललकारा.

‘‘चुप रहो किरण. शोर करोगी, तो सब को पता चल जाएगा. बदनामी तुम्हारी होगी. मैं तो कह दूंगा कि तुम ने रात में मु?ो मिलने के लिए बुलाया था,’’ कहते हुए सुदीप ने किरण का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

इस के बाद सुदीप किरण के साथ जोरजबरदस्ती करता रहा और वह चुपचाप लेटी रही.

किरण की आंखें डबडबा गईं. उस ने कहा, ‘‘सुदीप, आज तुम ने मेरी सारी उम्मीदों को खाक में मिला दिया. आज तुम ने मेरे अरमानों पर गहरी चोट पहुंचाई है. मैं तुम से प्यार करती हूं, करती रहूंगी, लेकिन अब मेरी नजरों से दूर हो जाओ,’’ कह कर वह रोने लगी.

उसी समय पास में सोए किरण के छोटे भाई की नींद खुली.

‘मांमां’ का शोर करते हुए वह छत से नीचे चला गया और वहां का देखा हाल मां को  सुनाया. सुंदर लाल भी जाग गया. दोनों चिल्लाते हुए सीढ़ी से छत की ओर भागे. उन की आवाज सुन कर सुदीप किरण को छोड़ कर भाग गया.

दोनों ने ऊपर पहुंच कर जो नजारा देखा, तो दोनों के रोंगटे खड़े हो गए. मां ने बेटी को संभाला. बाप छत पर से सुदीप को गालियां देता रहा.

दूसरे दिन पंचायत बैठाने के लिए किरण के पिता सुंदर लाल ने ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद से गुजारिश करते हुए पूरा मामला बतलाया और पूछा, ‘‘हम लोग पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं. आप हमारे साथ चलेंगे, तो पुलिस कार्यवाही करेगी, वरना हमें टाल दिया जाएगा.’’

‘‘सुंदर लाल, मैं थाने चलने के लिए तैयार हूं, लेकिन सोचो, क्या इस से तुम्हारी बेटी की गई इज्जत वापस लौट आएगी?’’

‘‘फिर हम क्या करें प्रधानजी?’’

‘‘तुम चाहो, तो मैं पंचायत बैठवा दूं. मुमकिन है, कोई रास्ता दिखाई पड़े.’’

‘‘आप जैसा ठीक सम?ों वैसा करें,’’ कहते हुए सुंदर लाल रोने लगा.

दूसरे दिन गांव की पंचायत बैठी.

गांव के कुछ लोग ब्राह्मणों के पक्ष में थे, तो कुछ दलितों के पक्ष में.

कुछ लोगों ने सुदीप को जेल भिजवाने की बात कही, तो कुछ ने सुदीप से किरण की शादी पर जोर डाला.

शादी की बात पर सुदीप के पिता बिफर पड़े, ‘‘कैसी बातें कहते हो?

कहीं हम ब्राह्मणों के यहां दलित

ब्याही जाएगी.’’

कुछ नौजवान शोर मचाने लगे, ‘जब तुम्हारे बेटे ने दलित से बलात्कार किया, तब तुम्हारा धर्म कहां था?’

‘‘ऐसा नहीं होगा. पहली बात तो यह कि सुदीप ने ऐसा किया ही नहीं. अगर गलती से किया होगा, तो धर्म नहीं बदल जाता,’’ सुदीप की मां बोली.

‘‘तो मुखियाजी, आप सुदीप को जेल भिजवा दें, वहीं फैसला होगा,’’ किरण की मां रामदुलारी ने कहा.

ग्राम प्रधान राजेंद्र प्रसाद ने पंचों की राय जानी, तो बोले, ‘पंचों की राय है कि सुदीप ने जब गलत काम किया है, तो अपनी लाज बचाने के लिए किरण से शादी कर ले, वरना जेल जाने के लिए तैयार रहे.’

यह सुन कर ब्राह्मण परिवार सन्न रह गया.

पंचायत ने किरण की इच्छा जानने की कोशिश की. किरण ने भरी पंचायत में कहा, ‘‘मेरी इज्जत सुदीप ने लूटी है. इस वजह से अब मु?ो उसी के पास अपनी जिंदगी महफूज नजर आती है.

‘‘गंदे बरताव की वजह से मैं सुदीप से शादी नहीं करना चाहती थी, लेकिन अब मैं मजबूर हूं, क्योंकि इस घटना को जानने के बाद अब मु?ा से कोई शादी नहीं करना चाहेगा.’’

सुदीप के पिता ने दुखी मन से कहा, ‘‘मेरी इच्छा तो किरण की शादी वहशी दरिंदे सुदीप के साथ करने की नहीं थी, फिर भी मैं किरण की शादी सुदीप से करने को तैयार हूं.’’

किरण व सुदीप के घरपरिवार में शादी पर रजामंदी हो जाने पर पंचायत ने भी यह गुनाहों का रिश्ता मान लिया. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: कुछ ऐसे बंधन होते हैं – दोस्ती का मतलब

Hindi Family Story: ‘‘दोस्ती वह इमारत है जो विश्वास की नींव पर खड़ी होती है… यह नदी के किनारों को जोड़ने वाला वह पुल है, जिस में यह माने नहीं रखता कि किनारे स्त्री है या पुरुष,’’ व्हाट्सऐप पर आया मैसेज प्रेरणा ने जरा ऊंचे स्वर में पति सोमेश को सुनाते हुए पढ़ा.

‘‘एक स्त्री और पुरुष आपस में कभी दोस्त नहीं हो सकते… यह सिर्फ और सिर्फ अपनी वासना को शराफत का खोल पहनाने की गंदी मानसिकता से ज्यादा कुछ नहीं…’’ सुनते ही हमेशा की तरह सोमेश उस दिन भी बिदक गया.

प्रेरणा का मुंह उतर गया. उस ने फोन चार्जर में लगाया और बाथरूम की तरफ बढ़ गई.

प्रेरणा और सोमेश की शादी को 5 वर्ष होने को आए थे. देह के फासले जरूर उन के बीच पहली रात को ही खत्म हो गए थे, लेकिन दिलों के बीच की दूरी आज तक तय नहीं हो सकी थी. यों तो दोनों के बीच खास मतभेद नहीं थे, लेकिन स्त्रीपुरुष के बीच संबंधों को ले कर सोमेश के खयालात आज भी सामंती युग वाले ही थे. जब भी प्रेरणा स्त्रीपुरुष के बीच खालिस दोस्ती की पैरवी करती, सोमेश इसी तरह भड़क जाता था.

दोनों अलगअलग मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते थे. सुबह का वक्त दोनों के लिए ही भागमभाग वाला होता था और शाम को घर लौटने में अकसर दोनों को ही रात हो जाती थी. सप्ताहांत पर जरूर उन्हें कुछ लमहे फुरसत के मिलते, लेकिन वे भी सप्ताहभर के छूटे हुए कामों की भेंट चढ़ जाते. ऐसे में सोमेश को तो कोई खास परेशानी नहीं होती थी, क्योंकि वह तो शुरू से ही अंतर्मुखी स्वभाव का रहा है, लेकिन मनमीत के अभाव में प्रेरणा अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने के लिए तड़प उठती थी.

प्रेरणा को हमेशा एक ऐसे पुरुष मित्र की तलाश थी जो दिल के बेहद करीब हो… जिस से हर राज शेयर किया जा सके… हर मुश्किल वक्त में सलाह ली जा सके… जिस के साथ बिंदास खिलखिलाया जा सके और दुख की घड़ी में जिस के कंधे पर सिर टिका कर रोया भी जा सके.

ऐसे दोस्त की कल्पना जब प्रेरणा सोमेश के साथ साझा करती थी, तो वह आगबबूला हो उठता था.

‘‘पति है न… सुखदुख में साथ निभाने के लिए… फिर अलग से पुरुष की क्या जरूरत हो सकती है और फिर मित्र भी हो तो कोई स्त्री क्यों नहीं? मां या बहन से अच्छी कोई सहेली नहीं हो सकती?’’ कह कर सोमेश उसे चुप करा दिया करता.

‘‘पति कभी दोस्त नहीं हो सकता, क्योंकि उस के प्रेम में अधिकार की भावना होती है… पत्नी को ले कर स्वामित्व का भाव होता है… और स्त्री उस में तो स्वाभाविक ईर्ष्या होती ही है… फिर चाहे बहन ही क्यों न हो… रही बात मां की तो उन की बातें तो हमेशा नैतिकता का जामा पहने होती हैं… वे दिल की नहीं दिमाग की बातें करती हैं… मुझे ऐसा मित्र चाहिए जिस के साथ बंधन में भी आजादी का एहसास हो…’’

प्रेरणा लाख कोशिश कर के भी सोमेश को समझा नहीं सकती थी कि किसी भी महिला के लिए पुरुष मित्र शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक जरूरत है.

इन्हीं दिनों रवीश ने प्रेरणा की जिंदगी में दस्तक दी. मार्केटिंग विभाग में ट्रेनी के रूप में जौइन करने वाला रवीश दिखने में जितना आकर्षक था व्यवहार में भी उतना ही शालीन और हंसमुख था. उसे देख प्रेरणा को लगता जैसे वह अपने आधे संवाद तो अपनी आंखों और मुसकराहट से ही कर लेता है.

धीरेधीरे रवीश पूरे औफिस का चहेता बन गया था और फिर कब वह प्रेरणा के दिल के बंद दरवाजे पर दस्तक देने लगा था खुद प्रेरणा भी कहां जान पाई थी. हां, रवीश की इस हिमाकत पर उसे आश्चर्य अवश्य हुआ था. सोमेश के स्वभाव से भलीभांति परिचित प्रेरणा ने रवीश के लिए अपने दिल का दरवाजा कस कर बंद कर लिया था, लेकिन रवीश कोई फूल नहीं था जिसे रोका जा सके… वह तो खुशबू था और खुशबू कभी रोकने से रुकी है भला?

और फिर शुरुआत हुई स्त्रीपुरुष के बीच उस खालिस दोस्ती के रिश्ते की जिसे जीने के लिए प्रेरणा ने न जाने कितनी बार अपने मन को मारा था… जिस के कोमल एहसास को महसूस करने के लिए न जाने कितनी ही बार सोमेश के तानों से अपनेआप को छलनी किया था…

प्रेरणा अपने जीवन की किताब के अनछुए पन्ने को पढ़ने लगी. कितना सुंदर था यह बंद पन्ना… इंद्रधनुषी रंगों में ढला… खुशबुओं से तरबतर… पंखों से हलका… सूर्य की किरण सा सुनहरा… बर्फ सा शीतल… और मिस्री सा मीठा… रवीश का साथ जैसे पिता का वात्सल्य… मां की ममता… भाई सा प्रेम… बहन सा स्नेह और प्रेमी सा नाज उठाने वाला… प्रेम का हर रूप उस में समाया था… नहीं था तो बस एकाधिकार का भाव… आधिपत्य की भावना…

प्रेरणा रवीश की आदी होने लगी थी. उस से बात किए बिना तो उस के दिन की शुरुआत ही नहीं होती थी. हर काम में रवीश की सलाह प्रेरणा के लिए जरूरी हो जाती थी. वह रवीश के साथ फिल्मों से ले कर खेल… सामाजिक से ले कर राजनीति और व्यक्तिगत से ले कर सार्वजनिक तक हर विषय पर खुल कर बात करती थी.

उन के बीच स्त्री और पुरुष होने का भेद कहीं दिखाई नहीं देता था. अब वे मात्र 2 इंसान थे जो एक पवित्र रिश्ते को जी रहे थे. जब दोनों फोन पर होते थे तो मिनट कब घंटों में बदल जाते थे दोनों को ही खबर नहीं होती थी. सोशल मीडिया पर भी दोनों के बीच संदेशों का आदानप्रदान अनवरत होता था. लेकिन दोनों ही अपनीअपनी मर्यादा में बंधे होते थे. उन की बातचीत या संदेशों में अश्लीलता का अंशमात्र भी नहीं होता था.

बेशक यह मित्रता पूरी तरह 2 इंसानों के बीच थी, लेकिन सोमेश का स्वभाव भला प्रेरणा कैसे भूल सकती थी. कहा जाता है कि सभ्य कहलाने के लिए व्यक्ति अपनी आदतें बदल सकता है, मगर अपने मूल स्वभाव को बदलना उस के लिए संभव नहीं. सोमेश के बारे में सोचते ही रवीश की दोस्ती को खोने का डर प्रेरणा को सताने लगता था. इसीलिए वह अब तक रवीश के साथ अपनी दोस्ती को सोमेश से छिपाए हुए थी.

रात देर तक लैपटौप पर काम निबटाती प्रेरणा की आंख सुबह देर से खुली. फटाफट चायनाश्ता और दोनों का टिफिन पैक कर के वह भागती सी बाथरूम में घुस गई. फिर किसी तरह 2 ब्रैड पीस चाय के साथ निगल कर अपना पर्स संभालने लगी.

‘‘उफ, कहीं देर न हो जाए…’’ हड़बड़ाती प्रेरणा सोमेश को बाय कहती हुए घर से निकल गई.

सोमेश आज थोड़ी देर से औफिस जाने वाला था, इसलिए आराम से नाश्ता कर रहा था.

मोड़ पर ही औटो मिल गया तो प्रेरणा ने राहत की सांस ली. फिर बोली, ‘‘भैया, जरा तेज चलाओ न… मेरी ट्रेन न मिस हो जाए… मेरा प्रेजैंटेशन है… अगर टाइम पर औफिस न पहुंची तो बौस बहुत नाराज होंगे…’’

पता नहीं प्रेरणा औटो वाले से कह रही थी या अपनेआप से, लेकिन उस की बड़बड़ाहट सुन कर औटो वाले ने स्पीड जरा बढ़ा दी. मैट्रो स्टेशन पहुंचते ही उसे ट्रेन मिल गई और उस में सीट भी.

तसल्ली से बैठते ही प्रेरणा को रवीश की याद आ गई. उस ने मुसकराते हुए मोबाइल निकालने के लिए पर्स में हाथ डाला. पूरा पर्स खंगाल लिया, मगर मोबाइल हाथ में नहीं आया. अपनी तसल्ली के लिए उस ने एक बार फिर से पर्स को अच्छी तरह खंगाला, मगर मोबाइल उस में होता तो उसे मिलता न…

‘उफ, यह क्या हो गया… मोबाइल तो चार्जर में लगा हुआ ही छोड़ आई… इतनी बड़ी भूल मैं कैसे कर सकती हूं?’ सोच प्रेरणा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं…

‘अब क्या करूं? यदि सोमेश ने उत्सुकतावश मेरा फोन चैक कर लिया तो? रवीश के मैसेज पढ़ लिए तो? तो… तो… क्या? यह तो मानव स्वभाव है कि हर छिपी हुई चीज उसे आकर्षित करती है… सोमेश भी अवश्य उस का मोबाइल चैक करेगा… काश, उस ने अपने मोबाइल की स्क्रीन को अनलौक करने का पैटर्न सोमेश से साझा न किया होता…’

‘क्या करूं… क्या वापस जा कर अपना फोन ले कर आऊं? लेकिन अब तक तो उस ने फोन देख ही लिया होगा… यदि उस ने रवीश के मैसेज पढ़ लिए होंगे तो वह उस का सामना कैसे कर पाएगी…’

प्रेरणा कुछ भी तय नहीं कर पा रही थी. हार कर उस ने आने वाली स्थिति को वक्त के हवाले कर दिया और खुद को उस का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने लगी.

‘रवीश भी टूर पर गया है. वह अवश्य उसे फोन करेगा… बस, फटाफट औफिस पहुंच कर उसे मोबाइल भूलने की सूचना दे दूं ताकि वह कौल न करे…’ प्रेरणा का दिमाग बिजली की सी तेज गति से दौड़ रहा था.

‘अब जो भी होगा देखा जाएगा… यदि उस की निजता का सम्मान करते हुए सोमेश ने उस का मोबाइल चैक नहीं किया होगा तब तो कोई फिक्र ही नहीं और यदि उस ने मोबाइल चैक कर भी लिया और रवीश को ले कर सवालजवाब किए तो उसे हिम्मत दिखानी होगी… वह रवीश के साथ अपनी दोस्ती कुबूल कर लेगी, परिणाम चाहे जो हो. लेकिन रवीश का साथ नहीं छोड़ेगी…’ प्रेरणा ने मन ही मन निश्चय कर लिया था. अब वह काफी हलका महसूस कर रही थी.

लाख हिम्मत बनाए रखने के बावजूद घर में पसरे अंधेरे ने प्रेरणा के हौसला पस्त कर दिया. आखिर वही हुआ जिस का डर था.

‘‘कब से चल रहा है ये सब… उस दो टके के इंसान की हिम्मत कैसे हुई तुम्हें इस तरह के व्यक्तिगत मैसेज भेजने की… जरूर तुम ने ही उसे बढ़ावा दिया होगा… जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरे को दोष कैसे दिया जा सकता है…’’ सोमेश के स्वर में क्षोभ, नफरत, गुस्से और निराशा के मिलेजुले भाव थे.

‘‘हमारे बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं है जिस पर तुम उंगली उठा रहे हो… रवीश मेरा दोस्त है… अंतरंग मित्र… लेकिन छोड़ो… दोस्ती के माने तुम नहीं समझोगे…’’ प्रेरणा ने बहस को विराम देने की मंशा से कहा.

लेकिन इतना बड़ा मुद्दा इतनी आसानी से कहां सुलझ सकता है. प्रेरणा की स्वीकारोक्ति ने आग में घी का काम किया. सोमेश के पुरुषोचित अहम को ठेस लगी. वह लगातार जहर उगलता रहा और प्रेरणा उसे अपने भीतर उतारती रही. दोनों के बीच एक शून्य पसर गया. उस रात खाना नहीं बना.

इस घटना के बाद हालांकि सोमेश ने उस से अपने व्यवहार के लिए माफी मांग ली थी, लेकिन प्रेरणा ने खुद को खुद में समेट लिया. वह जितनी देर घर में सोमेश के साथ रहती, एक मशीन की तरह अपने सारे काम निबटाती… खानापीना हो या पहननाओढ़ना, घूमनाफिरना हो या किसी से मिलनाजुलना… यहां तक कि बिस्तर में भी वह न अपनी कोई इच्छा जाहिर करती और न ही किसी बात पर प्रतिवाद करती. बस, चुपचाप अपने हिस्से के कर्तव्य निभाती रहती.

हर सुबह वह घर से औफिस के लिए इस तरह निकलती मानो कोई पंछी कैद से छूट कर खुले आकाश में आया हो… और शाम को घर वापस लौटते ही फिर से कछुए की तरह अपनेआप में सिमट जाती.

सोमेश के साथ रिश्ते में ठंडापन आने से प्रेरणा के मन की घुटन और भी अधिक बढ़ने लगी थी. उस के अंदर ऐसा बहुत कुछ उमड़ताघुमड़ता रहता था जिसे अभिव्यक्ति की चाह होती… उसे बहुत बेचैनी होती थी जब वह ये सब रवीश के साथ बांटना चाहती और रवीश उपलब्ध नहीं होता.

वह रवीश की मजबूरी समझती थी… आखिर उस की अपनी जिंदगी… अपनी प्राथमिकताएं हैं… लेकिन दिल का क्या करे? उसे तो हर समय एक साथी चाहिए जो बिना किसी शर्त के उसे उपलब्ध हो… कई बार सोमेश की तरफ भी हाथ बढ़े, लेकिन हर बार स्वाभिमान पांवों में बेडि़यां डाल देता. रवीश और सोमेश के बीच झूलती प्रेरणा की निराशा अवसाद में बदलती जा रही थी.

देर रात तक जागती प्रेरणा आज सुबह उठी तो सिर में भारीपन था. उठने की कोशिश में गिर पड़ी. सोमेश लपक कर पास आया, लेकिन फिर न जाने क्या सोच कर रुक गया. पे्ररणा ने फिर से उठने की कोशिश की, लेकिन इस बार भी कामयाब नहीं हुई तो उस ने निरीहता से सोमेश की तरफ देखा. सोमेश ने बिना एक पल गंवाए उसे बांहों में थाम लिया.

‘अरे, तुम्हें तो तेज बुखार है,’ सोमेश की फिक्र उसे अच्छी लगी.

‘काश, इस वक्त रवीश मेरे पास होता,’ सोच प्रेरणा ने आह भरी. अब तक सोमेश उस के लिए उस की मनपसंद गरमगरम अदरक वाली चाय बना लाया था. प्रेरणा ने कृतज्ञता से उस की ओर देखा.  सोमेश ने फोन कर डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने उसे आवश्यक दवा और आराम करने की सलाह दी.

सोमेश ने प्रेरणा के औफिस फोन कर उस के लिए 1 सप्ताह की छुट्टी मांग ली और खुद भी औफिस से छुट्टी ले ली. सोमेश प्रेरणा का एक छोटे बच्चे की तरह खयाल रख रहा था. लेकिन प्रेरणा को रहरह कर रवीश की अनुपस्थिति अखर रही थी… उस का ध्यान बारबार अपने मोबाइल की तरफ जा रहा था. उसे रवीश के फोन का इंतजार था.

फिर सोचने लगी कि शायद रवीश सोच रहा हो कि सोमेश उस के पास है, इसलिए फोन नहीं कर रहा… लेकिन व्हाट्सऐप पर मैसेज तो कर ही सकता है…

प्रेरणा बारबार मोबाइल चैक करती और हर बार उस की निराशा कुछ और बढ़ जाती… दोपहर होतेहोते उसे रवीश की बुजदिली पर गुस्सा आने लगा कि क्या उन का रिश्ता इतना कमजोर है? जब हमारा रिश्ता पाकसाफ है तो फिर यह डर कैसा? ऐसे रिश्ते का क्या फायदा जो जरूरत पड़ने पर साथ न निभा सके? तो क्या उन का रिश्ता सिर्फ सतही था? उस में कोई गहराई नहीं थी? क्या यह सिर्फ टाइमपास था? प्रेरणा ऐसे अनेक प्रश्नों के जाल में उलझ कर कसमसा उठी.

फिर अचानक उस के सोचने की दिशा बदल गई कि सोमेश जब साथ होता है तो वह कितने आत्मविश्वास से भरी होती हूं जबकि रवीश के साथ खालिस दोस्ती का रिश्ता होते हुए भी एक अनजाना डर मन को घेरे रहता है कि कहीं कोई देख न ले… किसकिस को सफाई देती रहेगी… सोमेश उस की हर जरूरत के समय साथ खड़ा रहता जबकि रवीश चाहते हुए भी ऐसा नहीं कर पाता… आखिर सामाजिक मजबूरियां भी एक तरह का बंधन ही तो हैं…

फिर प्रेरणा अनजाने ही दोनों के साथ अपने रिश्ते की तुलना करने लगी. हर बार उसे सोमेश का पलड़ा ही भारी लगा.

अब सोचने लगी कि सैक्स और साथ के अलावा भी विवाह में बहुत कुछ ऐसा होता है जिसे शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता. रवीश उस की मानसिक जरूरत है, लेकिन उस के साथ उस के रिश्ते को सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती तो क्या वह रवीश से रिश्ता खत्म कर ले? क्या अपने मन की हत्या कर दे? फिर जीएगी कैसे?

प्रेरणा का मानसिक द्वंद्व खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

तभी सोमेश कमरे में आया. पूछा, ‘‘कैसा लग रहा है अब? सूप बना कर लाया हूं… गरमगरम पी लो. तुम्हें अच्छा लगेगा,’’ और फिर उसे सहारा दे कर उठाया.

प्रेरणा ने गौर से उस की आंखों में देखा. कहीं कोई छलकपट या दिखावा नहीं था… खुद के लिए परवाह और प्यार देख कर वह पुलक उठी. लेकिन इस परवाह के पीछे से अब भी स्वामित्व का भाव झलक रहा था.

‘मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रेम… रवीश से उतना ही रिश्ता रखूंगी जितना हम दोनों के बीच की झिर्री को भरने के लिए पर्याप्त हो… हमारा रिश्ता शाश्वत सत्य है, लेकिन हरेक रिश्ता जरूरी होता है… दोस्ती का भी… इस रिश्ते में तुम्हारे अधिकारों का अतिक्रमण कभी नहीं होगा, यह मेरा वादा है तुम से… तुम भी मुझे समझने की कोशिश करोगे न,’ मन ही मन निश्चय करते हुए प्रेरणा ने सोमेश के कंधे पर सिर टिका लिया.

‘‘मैं ने शायद प्रेम के बंधन जरा ज्यादा ही कस लिए थे… तुम घुटने लगी थी… मैं अपने पाश को ढीला करता हूं… मुझे माफ कर सकोगी न…’’ कह सोमेश ने उसे बांहों में कस लिया. Hindi Family Story

Sexual Addiction: मुझे और मेरे भाई को एकदूसरे के साथ सैक्स करने की आदत लग चुकी है

Sexual Addiction: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 22 साल है और मैं मध्य प्रदेश की रहने वाली हूं. मेरा एक भाई है जिस की उम्र 20 साल है. मैं शुरू से ही गर्ल्स स्कूल में पढ़ी हूं, तो ऐसे में लड़कों से मैं ने कभी ज्यादा बात तक नहीं की. मेरी कुछ फ्रैंड्स हैं जिन के बौयफ्रैंड हैं और जब वे अपने बौयफ्रेंड के साथ सैक्स के किस्से सुनाती थीं तो मेरा भी वही सब करने का बहुत मन करता था, लेकिन डर लगता था कि कहीं मेरे घर वालों को इस बारे में पता चल गया और किसी ने मेरा फायदा उठा लिया, तो मैं क्या करूंगी. इस के लिए मैं ने एक आसान रास्ता अपनाया. मैं और मेरा भाई एकसाथ सोते हैं तो मैं ने पहले अपने भाई को रिझाया और छोटे कपड़े पहन उस के साथ सोने लगी. धीरेधीरे हम दोनों में नजदीकियां बढ़ीं और हम दोनों के बीच सैक्स होने लगा. हमें पता ही नहीं चला कि कब हम दोनों को सैक्स की आदत लग गई और हम अब हर रोज सैक्स करने लगे हैं. मुझे अब लगता है कि कहीं हम दोनों गलत तो नहीं कर रहे, आखिरकार मैं उस की सगी बहन हूं. हमें कुछ समझ नहीं आ रहा. आप ही बताइए हमें क्या करना चाहिए?

जवाब –

आप ने जो रास्ता आसान समझ कर अपनाया वह काफी गलत रास्ता था. आप ने अपने सगे भाई के साथ ही यह सब कर के अपने ही रिश्ते की कोई मर्यादा नहीं रखी. आप को समझना चाहिए था कि अगर आप को ऐसी फीलिंग्स आ भी रही थीं, तो कोई अच्छा सा लड़का पसंद कर उस से शादी कर लेतीं और फिर संबंध बनातीं.

अकसर इस उम्र में ऐसी फीलिंग्स आती हैं जहां हमें सहीगलत की पहचान नहीं रहती, तो ऐसे अब तक आप ने जो भी किया उसे भूल जाइए और अपने भाई को भी बोलिए कि ऐसा करना आप दोनों की सब से बड़ी गलती थी. जरा सोचिए, इसी बीच अगर आप प्रैग्नेंट हो जातीं तो पूरे समाज में आप दोनों तो क्या आप के घर वाले किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहते.

सब से पहले एक बात समझ लीजिए कि आप दोनों अब बड़े हो चुके हैं और अब जब आप के बीच सबकुछ हो ही चुका है तो अगर संभव हो तो अलगअलग सोना शुरू कीजिए. अपने घर में बात कर या तो शादी की बात चलाइए या फिर कोई अच्छा सा लड़का पसंद कर अपने घर वालों से मिलवा दीजिए. इस बारे में आप और आप का भाई किसी से भी जिक्र न कीजिएगा वरना आप दोनों के लिए काफी मुश्किल खड़ी हो सकती है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Sexual Addiction

Akshay Khanna Viral Dance: ‘धुरंधर’ की सबसे बड़ी हाइलाइट बने अक्षय खन्ना

Akshay Khanna Viral Dance Step: हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘धुरंधर’ इन दिनों खूब धमाल मचा रही है. फिल्म में कई बड़े एक्टर्स शामिल हैं जैसे कि, रणवीर सिंह, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल, आर. माधवन और अक्षय खन्ना. जहां फिल्म रिलीज से पहले रणवीर सिंह का लुक लगातार सुर्खियों में था, वहीं फिल्म आने के बाद सबसे ज्यादा जिसने सबका ध्यान खींचा, वह बने अक्षय खन्ना.

उम्मीद से परे बड़े-बड़े सितारों के बीच अक्षय का एंट्री सीन और उनका जबरदस्त डांस स्टेप इंटरनेट पर तहलका मचा रहा है. अरबी ट्रैक FA9LA पर किया गया उनका फ्रीस्टाइल डांस फैन्स को इतना पसंद आया कि बिना किसी कोरियोग्राफर की मदद से बनाया गया यह स्टेप हर प्लेटफौर्म पर वायरल हो गया है.

दिलचस्प बात यह है कि अक्षय खन्ना के इस स्टेप की तुलना उनके पिता विनोद खन्ना के पुराने डांस मूव्स से की जा रही है. इंटरनेट पर विनोद खन्ना का एक पुराना वीडियो भी तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जिसमें वे बिल्कुल ऐसा ही अंदाज दिखाते नजर आ रहे हैं. धुरंधर में अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत का रोल निभाया है, और दर्शकों का कहना है कि अक्षय हर फिल्म के साथ खुद को और भी ज्यादा बेहतर साबित कर रहे हैं. Akshay Khanna Viral Dance Step

Hindi Story: कई कई रावण से रुबरु

Hindi Story: रोहरानंद से रहा नहीं गया दशानन के पास पहुंच हाथ जोड़कर पूछा,- महात्मन क्या इस नाचीज को एक प्रश्न का जवाब मिलेगा ? हे मनीषी! ज्ञान के सागर!! कृपया, मेरी जिज्ञासा को शांत करें .

दशानन ने सर नीचे कर कहा,- अब अंतिम वक्त में, क्या पूछना चाहते हो .अच्छा होता,  दो-चार दिन पूर्व आते.

रोहरानंद ने नम्र स्वर में कहा,- हे वीर, दशानन! प्लीज… अगर आप मेरी जिज्ञासा शांत नहीं करेंगे तो मेरा दिल टूट जाएगा…

रावण के मुखड़े पर स्मित हास्य तैरने लगी-

-‘अच्छा ! अपनी जिज्ञासा शांत करो । पूछो वत्स…’

दशानन की मधुर वाणी से रोहरानंद को आत्म संबल मिला और उसने खुलकर प्रश्न किया, हे रिपुदमन!कृपया मुझे यह बताएं,  कि आपके चेहरे पर इतनी सौम्यता कहां से आई, इस आभा का रहस्य क्या है ? आपको देखने मात्र से हृदय को बड़ी ठंडक महसूस होने लगी है.

दशानन – ( हंसते हुए ) बस.हम तो तुम्हारे प्रश्न पूछने के अंदाज से भयभीत हो गए थे.जाने क्या जानना चाहता है… हम यही सोच रहे थे.

रोहरानंद,- महात्मा रावण! मैं ने जो महसूस किया उसी जिज्ञासा का शमन चाहता हूं.

दशानन- ( सकुचाते हुए ) वत्स! संभवत: इसका कारण मेरे निर्माता आयोजको का मन है. तुम नहीं जानते,रावण दहन कमेटी के पदाधिकारी स्वच्छ, सरल हृदय के लोग हैं उनकी प्रतिछाया में मैं भी सरल और सादगी को अंगीकार किए हुए हूं.

रोहरानंद प्रसन्न हुआ,दशानन ने आत्मीयता से हाथ मिलाया उसे गर्माहट महसूस हुई.

कहा,-दशानन ! क्या मैं आपका सेल्फी प्राप्त कर सकता हूं.

दशानन मुस्कुराए  – क्यों नहीं. हमारी मित्रता की यह अविस्मरणीय स्मृति होगी.

रोहरानंद पुरानी बस्ती पहुंचा. एक निरीह रावण खड़ा था, देखते ही दया आने लगी. रोहरानंद ने पास पहुंच विनम्र  स्वर में कहा,- मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं ?

आदमकद के साधारण से दशानन ने  भावविहीन चेहरा लिए कहा क्या, सचमुच,  आप मेरी मदद करेंगे ?

रोहरानंद – हां वाकई ! मगर मेरी क्षमता के भीतर.अगर आप आधुनिक सीता हरण में मारीच सृदश्य मदद मांगेंगे, तो मैं कहाँ  कर पाऊंगा.

दशानन- नहीं नहीं,  मुझे तो आपका सिर्फ मारंल सपोर्ट चाहिए.

रोहरानंद- उसके लिए तो मैं हर क्षण तत्पर हूं .

दशानन-( हाथ जोड़कर ) सिर्फ इतनी कृपया करो, समिति वालों को कुछ  जरा चंदा वगैरह करवा दो. कैसे फटे पुराने कागज,  मेरे देह पर चिपका दिए हैं. मुझे बड़ी शर्म आ रही है । लंकाधिपति  रावण की इज्जत का कुछ तो ख्याल रखना चाहिए.

रावण के दु:खी वाणी को सुनकर रोहरानंद का दिल भर आया. उसने समिति वालों की भरसक मदद करने का आश्वासन देकर, आगे बढ़ने मे भलाई समझी.

आगे रोहरानंद बाल्को पहुंच गया,स्टेडियम मैं विराट रावण अट्टाहास लगाता खड़ा था. ऐश्वर्य उसके रोएं रोएं से टपक रहा था. दशानन को देखते ही लोगों के हृदय में एक आंतक, एक सम्मान की भावना स्वमेव जागृत हो जाती थी.

दशानन ने अपनी विशाल गोल- गोल आंखें घुमाते हुए पुराने जमाने के खलनायक की भांति हुंकारा,-ओह कैसा है रे तू. बडी देर कर दी, कहां था अभी तक.

रोहरानंद ने हिचकिचाते हुए ससम्मान कहा,- क्षमा चाहता हूं एक-दो पुराने मित्र मिल गए थे,बस देर हो गई.

दशानन- समय की कीमत किया करो .अपने काम से काम रखो. दोस्त यार काम नहीं आएंगे. खुद को बुलंद करना सीखो. देखो! वेदांता, बाल्को कंपनी किस तरह सतत आगे बढ़ रही है.

रोहरानंद- सर ! कंपनी और मुझ जैसे अदने से व्यक्ति में अंतर तो रहेगा. कहां मैं कहां वेदांता.

दशानन- कंपनी को कौन चलाता है ?तुम जैसा इंसान ही न .अगर इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता ? चिमनी गिर गई थी- गिरी थी न .मगर देखो, कैसे आज लोग उस भीषण त्रासदी को भूल गए हैं.

रोहरानंद – वाकई आप सही हैं. मुझे बहुत कुछ सीखना है. मैं वेदांता से यह सब सीखूगां.

दशानन- ( स्निग्ध मुस्कान बिखेर कर ) बहुत अच्छा चलो,  इंजॉय करो…

रोहरानंद गरीब बस्ती पहुंचा. दशानन जी खड़े, मानो उसी का इंतजार कर रहे थे .रोहरानंद को देखा तो अपने पास बुलाया फुसफुसा कर कहा,- भूख लगी है कुछ जुगाड़ करो न .

रोहरानंद- हे वीर! यहां तो खाने को कुछ भी नहीं है.

दशानन – अरे भाई! ऐसा अनर्थ ना करो, सच ! बड़ी भूख लगी है .अगर मुझे भोजन नहीं दिया गया तो ठीक नहीं होगा.

रोहरानंद- हे लंका नरेश! सच यहां भोज्य सामग्री एक रत्ती भर नहीं है । एक बात मानोगे .वैसे भी अभी आपको अग्नि के सुपुर्द करेंगे ही, जरा धैर्य धारण करो.

दशानन की छोटी- छोटी गोल आंखें घूमने लगी, – देखो मैं यहां एक मिनट भी नहीं रुकूगां. मैं जा रहा हूं.और देखते-देखते दशानन गधे के सिंग की तरह गायब हो गया. Hindi Story

Hindi Funny Story: सबके अच्छे दिन आ गए

Hindi Funny Story: इस देश में बहुत अच्छे दिन आ चुके हैं. चारों ओर विकास की गंगा बहुत जोरों से बहती जा रही है. यह भी कह सकते हैं कि चारों ओर विकास ही विकास पैदा होता जा रहा है और बहुत तेजी से आगे भी पैदा होता रहेगा.

देश में व्यापारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. कर्मचारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. किसानों के अच्छे दिन आ चुके हैं. खूब महंगा आलूप्याज बेचबेच कर वे खूब मालामाल होते जा रहे हैं.

चोरउचक्कों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. सभी चोरउचक्के अपनीअपनी ड्यूटी समय से बजा कर अपना और देश का विकास अंधाधुंध करते जा रहे हैं.

देश में दुराचार और सदाचार के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. एक तरफ दुराचार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐनकाउंटर कर के सदाचार का श्रीगणेश हो रहा है. ऐसा विकास क्या आप ने कहीं देखा होगा? मेरा दावा है, कहीं नहीं देखा होगा.

देश से करोड़ोंअरबों रुपए ले कर भागने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं. काला धन गोरा करने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं.

नेताओं के बाथरूम में नहाते हुए, मालिश कराते हुए मनोरंजक वीडियो के अच्छे दिन आ चुके हैं.

सत्ता के गलियारों और अधिकारियों के अहातों में भटकती विषकन्याओं के अच्छे दिन आ चुके हैं. हनी ट्रैप के सजीव प्रसारण से यह हम जान चुके हैं.

नोटबंदी के बाद नकली करंसी धड़ाधड़ पैदा करने वाली मशीनों के अच्छे दिन आ चुके हैं. चोरउचक्कों, उठाईगीरों, डकैतोंहत्यारों के संसदविधानसभाओं में पहुंचने के अच्छे दिन आ चुके हैं.

हम दुनिया का सब से बड़ा मंदिर बनाने जा रहे हैं, अब पंडेपुजारियों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

भूमाफिया, शिक्षा माफिया, किडनी चोरों, गरीब औरतों की बच्चेदानी निकाल, बां झ बना कर चांदी कूटने वाले डाक्टरों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

पिछड़ों के अच्छे दिन आ चुके हैं, इसीलिए उन के आरक्षण को खत्म करने की मांग जोर पकड़ रही है.

दलितों के भी अच्छे दिन आ गए हैं. उन्हें घोडि़यों पर बैठ कर शादियां करने की जरूरत नहीं रही है.

डायन, कुलटा, निगोड़ी, करमजली, बढ़ती महंगाई के अच्छे दिन आ चुके हैं.

मैं ऐसी विकास की गंगा बहाते हुए देश के हर घर को बिलकुल पवित्र कर दूंगा. देश में सभी खुश हैं. सभी अमीर हैं. कोई दुखी नहीं है. कोई परेशान नहीं है. कोई पीडि़त नहीं है, कोई पीडि़ता नहीं है. किसी को कोई तकलीफ नहीं है.

गीता में भी कहा गया है, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है. जो होगा अच्छा होगा. जो होने वाला है, वह भी अच्छा होगा. और दोस्तो, हमें इस देश पर गर्व है कि सब से अच्छे दिन आ चुके हैं. आए कि नहीं आए…

हमारे अच्छे दिनों की तारीफ दुनियाभर में हो रही है, इसलिए दुनियाभर में यह फकीर  झोला उठा कर घूमते हुए सब की बधाइयां ले रहा है. आप भी हमें अपनी बधाइयां हमारी ओर  झोंकते रहें और कहते रहें, अच्छे दिन आ गए, अच्छे दिन आ गए. Hindi Funny Story

Hindi Kahani: पति की नीति निर्देशक

Hindi Kahani: पत्नी को तरहतरह से संबोधन दिया जाता है. कोई जीवनसंगिनी कहता है, कोई जीवनसहचरी, कोई हमसफर तो कोई अर्धांगिनी. कई तो उसे स्वीटहार्ट कहते हैं, ऐसे लोगों को धोखा हो जाता होगा, वे पत्नी की जगह प्रेयसी को देख रहे होते होंगे. आखिर जिस के साथ समय सुहाना लगता है वही तो खयालों के आकाश में ज्यादा आच्छादित रहती है.

कुछ सयाने पतिजन कहते हैं कि उन की पत्नी, पत्नी नहीं बल्कि पथप्रदर्शक है. गोया कि वे जीवनपथ के भटके हुए राहगीर हैं और पत्नी यातायात के सिपाही की तरह उन की मार्गप्रदर्शक.

चमचागीरी केवल राजनीतिक या प्रशासनिक क्षेत्र में नहीं होती है. दांपत्य में भी इस का काफी महत्त्व व आधिपत्य है. पति नामक जीव भी पत्नी की चमचागीरी में स्वार्थवश या भयवश अव्वल बना रहता है.

और भी पति हैं जो कहते हैं कि उन का यदि सब से बड़ा मित्र कोई दुनिया में है तो वह उन की पत्नी है. वाह भाई वाह, विवाह होने तक न जाने कितने मित्र बनाए, उन के साथ जीनेमरने की कसमें खाईं, कितनी खट्टीमीठी यादें साथ बिताए पलों की उन के साथ जुड़ी हैं, लेकिन, एक अनजान सी लड़की से शादी क्या हो गई कि सारे मित्रों को जोर का झटका धीरे से दे यादों की भूलभुलैया में छोड़ दिया. और ताल ठोक कर कह रहे हैं कि यदि कोई मित्र है तो वह पत्नी है. अच्छा हुआ कि ऐसा कहते समय कोई पुराना जिगरी दोस्त सामने नहीं था, वरना दोस्ती की इतनी किरकिरी होते देख उसी समय वह किसी चट्टान से कूदने के लिए रवानगी डाल देता.

कुल मिला कर जितने तरह के पति हैं उतनी तरह की बातें व उपमाएं वे पत्नियों की शोभा में पेश करते हैं. पत्नी के सामने वैसे भी एक पति की औकात शोभा की सुपारी से अधिक होती नहीं है. ऐसे नमूने भी हैं जो पत्नी को अपना गुरु तक कहते हैं. हो सकता है कि रोज सुबह उठ कर उस के पैर छू आशीर्वाद भी लेते हों. वैसे, इस मामले में गंगू का कहना है कि आज के पाखंडी बाबाओं, गुरुओं की तुलना में तो पत्नी को ही किसी ने यदि गुरु मान लिया है तो यह एक अच्छा दौर शुरू हुआ मान सकते हैं.

और भी पति हैं जोकि एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं कि उन की पत्नी उन के पिता व मां से भी बढ़ कर है.

गंगू ने उपरोक्त सारी उपमाओं पर गंभीरता से विचारमंथन किया और यह पाया कि अलगअलग पति अपनेअपने अनुभवों के आधार पर अलगअलग तरह से पत्नी का अलंकरण कर्म करते रहते हैं. कुछ विशेष स्वार्थवश पत्नी का यश बढ़ाने वाली बात तात्कालिक रूप से अपने मुखश्री से उगल दते हैं. लेकिन सही व खरी बात यह है कि पत्नी, पति की जीवनरूपी फिल्म की निर्देशक है, जैसे कि किसी मूवी को बनाने में निर्देशक का अहम योगदान होता है. वह कलाकारों को छोटीछोटी बारीकियों के बारे में समझाइश व निर्देश देता रहता है और वे कलाकार उस की बात को मगन हो कर एक निष्ठावान व समर्पित शिष्य की तरह गगन की ओर देखते हुए सुनते हैं.

निर्देशक के निर्देश के बिना कलाकार एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और यदि मूवी को बौक्सऔफिस पर करोड़ों का व्यापार करने लायक दमदार व सफल बनाना है तो उसे इग्नोर तो कर ही नहीं सकते. उसी तरह पति की जिंदगीरूपी मूवी सफल हो, वह निरंतर तरक्की के पथ पर अग्रसर रहे, वह दाएंबाएं जाने की जुर्रत भी न करे, इस के लिए पत्नीरूपी एक निर्देशक के निरंतर निर्देश उस के दिनप्रतिदिन के कार्यकलापरूपी अभिनय के लिए आवश्यक हैं. वह सुबह से रात तक, देररात तक पति को निर्देश देती रहती है और पति मुंडी नीची कर के सुनता रहता है. सिर ऊपर करने की सुविधा यहां नहीं है.

पत्नी यदि बोलेगी बैठ जाओ, तो उसे बैठना है. वह बोलेगी कि खड़े हो जाओ तो उसे तुरंत खड़े हो जाना है. बिना कारण पूछे यदि वह कहे कि उठकबैठक करो, तो वह करनी है. सवालजवाब की कोई गुंजाइश यहां नहीं होती.

आप किसी पार्टी में जा रहे हैं. आप ने पतलूनशर्टटाई सब गांठ ली है. अचानक पत्नी का सीन में प्रवेश होता है. वह कहती है कि यह क्या विदूषक जैसा वेश बना डाला है, और उस के निर्देश पर आप तुरंत पहने कपड़े बदलने को मजबूर हो जाते हो. आप को कुछ पसंद आ रहा है, उसे वह नापसंद है. जो आप को नापसंद है, वह उसे पसंद है. बात वही है कि निर्देशक के निर्देशों को आप नजरअंदाज कर ही नहीं सकते.

पत्नी के पापाजी व मम्मीजी आ रहे हैं और बौस ने एक जरूरी मीटिंग में आप को शिरकत करने को निर्देशित किया है, लेकिन घर की बौस ने आप को रेलवे स्टेशन ड्यूटी के लिए निर्देशित कर दिया है. ट्रेन का समय आप की बैठक के समय से क्लेश हो रहा है. ऐसी स्थिति में भी आप निर्देशक से क्लेश नहीं कर सकते हैं. यहां की डांट खाने व अपनी खाट खड़ी करने से अच्छा है कि बौस की डांट खा लो.

तो, आप सहमत हैं कि नहीं कि पत्नी के लिए बाकी की सारी उपमाएं अपनी जगह सही हो सकती हैं, लेकिन सब से सही उपमा जो गंगू ने निर्देशक की कही है, वही है और केवल वही है. Hindi Kahani

Story In Hindi: सवाल अपने बेटे की अंग्रेजी तालीम का

Story In Hindi: ‘‘बच्चे को एलकेजी में भरती करने वाला मुझे फार्म तो दीजिए,’’ मैं ने अंगरेजी स्कूल के क्लर्क से कहा.

पहले तो उस ने मुझे घूरा, फिर पूछा, ‘‘किसे भरती कराना है?’’

‘‘कहा न, बच्चे को,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘कहां है आप का बच्चा?’’ मेरे आसपास नजर दौड़ाते हुए उस ने पूछा.

‘‘घर में,’’ मैं ने बताया.

‘‘जिसे भरती होना है, उसे घर छोड़ आए. जाइए, उसे ले कर आइए.’’

‘‘भला क्यों…?’’

‘‘पहले मैं उस बच्चे का इंटरव्यू लूंगा. अगर वह भरती होने लायक होगा, तब फार्म दूंगा. यही प्रिंसिपल साहब का आर्डर है,’’ उस ने खुलासा करते हुए बताया.

‘‘भरती करना है या नहीं, यह फैसला कौन लेगा?’’

‘‘प्रिंसिपल साहब. वे आप का इंटरव्यू ले कर फैसला करेंगे.’’

‘‘बच्चे के इंटरव्यू की बात तो गले उतरती है, लेकिन मेरा इंटरव्यू… बात कुछ जमी नहीं,’’ मैं ने हैरानी जाहिर की.

‘‘देखिए, यह अंगरेजी स्कूल है, कोई खैराती या सरकारी नहीं. हमें बच्चे के साथसाथ स्कूल के भले का खयाल रखना पड़ता है, इसीलिए बच्चे के साथसाथ उस के माता पिता का भी इंटरव्यू लिया जाता है.’’

‘‘बात समझ में आई या नहीं? अब जाइए और बच्चे को ले कर आइए.’’

मैं जातेजाते धड़कते दिल से पूछ बैठा, ‘‘किस भाषा में इंटरव्यू लेते हैं प्रिंसिपल साहब?’’

‘‘अंगरेजी स्कूल में दाखिला कराने आए हो और यह भी नहीं जानते?’’

इतना सुनते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मुझे अंगरेजी नहीं आती थी. आज पता चला कि अंगरेजी स्कूल में बच्चे को भरती कराना कितना मुश्किल काम है, खासतौर पर मेरे लिए.

घर पहुंचा, तो मेरी बीवी ने पूछा, ‘‘हो गई भरती?’’

‘‘अभी नहीं,’’ मैं ने ठंडे दिल से कहा.

‘‘क्यों…’’ बीवी की आवाज में उलझन थी.

‘‘फिर बताऊंगा, फिलहाल तो बच्चे को फटाफट तैयार कर दो. उसे स्कूल ले कर जाना है,’’ मैं ने कहा.

मैं ने भी कहने को तो कह दिया, लेकिन मुझे अंगरेजी न आने का कोई हल नजर नहीं आ रहा था.

अचानक मुझे रास्ता सूझा कि मेरे पड़ोसी को अंगरेजी आती है. क्यों न उस से मदद मांगी जाए.

मैं मदद मांगने के लिए उस के पास चला गया. थोड़ी आनाकानी के बाद उस ने बात मान ली. मैं उसे और बच्चे को ले कर स्कूल पहुंचा.

‘‘क्या पढ़ते हो मुन्ना?’’ दाखिले के पहले दौर में क्लर्क ने पुचकारते हुए बच्चे से जब पूछा, तो मैं ने टोका, ‘‘अरे सरजी, अभी पढ़ कहां रहा है… पढ़ाना तो अब आप लोगों को है.’’

‘‘अरे, एबीसीडी तो पढ़ता होगा?’’ चौंकते हुए उस ने कहा.

‘‘जी नहीं,’’ अचानक मेरे मुंह से सच बात निकल गई.

‘‘तो क्या बिना तैयारी के ही दाखिला कराने चले आए?’’

मैं ने बात को बिगड़ते देख कहा, ‘‘मेरे कहने का मतलब है कि अभी स्कूल में नहीं पढ़ रहा. घर में एबीसीडी सिखा रहे हैं.’’

‘‘वही तो मैं पूछ रहा था.’’

‘‘जी हां… जी हां,’’ बात बनती देख मैं ने चैन की सांस ली.

उस ने बच्चे से और भी सवाल पूछे, जिन के माकूल जवाब वह दे नहीं पाया.

बहरहाल, बेहद खुशामद के बाद क्लर्क ने एहसान जताते हुए मुझे फार्म दे दिया.

फार्म भरने के बाद हम लोग प्रिंसिपल साहब के पास पहुंचे. पहले उन्होंने 5 मिनट तक भाषण पिलाया, जिस का मतलब यह था कि अंगरेजी स्कूल में पढ़ना कोई हंसीखेल नहीं है. यहां पढ़ाने के लिए घर का माहौल अंगरेजी वाला होना चाहिए.

फिर प्रिंसिपल साहब ने इंटरव्यू लेना शुरू किया. अंगरेजी में पूछे गए सवालों के जवाब पड़ोसी देने लगा, इसलिए प्रिंसिपल ने समझा कि बच्चे का पिता वही है. वैसे भी वह इस तरह बनठन कर गया था, जैसा अंगरेजी स्कूल में बच्चे को पढ़ाने वाले पिता का होना चाहिए.

प्रिंसिपल साहब बीचबीच में हिंदी में भी कुछ पूछ लेते थे, तब जवाब मैं दे देता था. इस से प्रिंसिपल साहब ने अंदाजा लगाया कि मैं लड़के के पिता का दोस्त हूं, इसीलिए उन्होंने पूछा भी नहीं कि हम दोनों में से लड़के का पिता कौन है?

यही मैं चाहता था, ताकि दाखिला हो जाने के बाद जब इस राज का भंडाफोड़ हो, तो मुझे यह कहने का मौका मिले कि जब पूछा ही नहीं गया, तो बताते कैसे?

खैर, किसी तरह से लड़के का दाखिला हो गया.

कुछ दिनों बाद प्रिंसिपल साहब का मेरे नाम नोटिस आया. लड़के की पढ़ाई के सिलसिले में मुझे बुलाया गया था. अब तो मेरी आंखों के आगे सचमुच अंधेरा छाने लगा.

मैं फिर पड़ोसी के पास गया, लेकिन इस बार उस ने मेरी मदद करने से साफ इनकार कर दिया. अलबत्ता, मेरी हौसलाअफजाई करते हुए उस ने कहा, ‘‘घबराओ मत, हिम्मत से काम लो. बच्चे का दाखिला हो चुका है. अब कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.

‘‘वैसे भी इतने दिनों बाद प्रिंसिपल साहब यह भूल चुके होंगे कि उस दिन लड़के का बाप बन कर मैं गया था.’’

मैं दिल मजबूत कर के प्रिंसिपल के पास चला गया. उन्होंने मुझ से शिकायत करते हुए पूछा (गनीमत थी कि हिंदी में) कि मैं लड़के को घर में पढ़ाता क्यों नहीं? मगर, मैं कैसे कह देता कि मैं अंगरेजी नहीं पढ़ पाया और उसी कमी को बच्चे के जरीए पूरा करने की कोशिश कर रहा हूं?

खैर, मैं बहाने बनाने लगा. तब वे सोच में पड़ कर बड़बड़ाने लगे कि आखिर आप के लड़के का दाखिला हो कैसे गया?

हालांकि प्रिंसिपल साहब ने खूब फटकार लगाई, लेकिन मुझे इस बात की बेहद खुशी थी कि उन की ओर से मुझे मेरे बेटे के पिता के रूप में मंजूरी मिल चुकी थी.

मैं ने मन ही मन पड़ोसी का शुक्रिया अदा किया कि उस ने आज मेरे साथ चलने से इनकार कर के अच्छा ही किया, वरना मैं स्कूल में बेटे का पिता कहलाने का हक खो देता. Story In Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें