Sushmita Sen जल्द करेंगी शादी? 16 साल छोटे बौयफ्रेंड Rohman Shawl संग बसाएंगी घर!

बौलीवुड इंडस्ट्री की मशहूर एक्ट्रेस सुष्मिता सेन सभी के दिलों पर छाई हुई है. उनकी हाल में आई वेब सीरीज आर्या 3 को लेकर उन्होंने काफी सुर्खियां बंटोरी है. सुष्मिता सेन अपनी प्रोफेशनल लाइफ के साथ ही अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर भी खूब चर्चा में रहती है. जी हां, और एक बार फिर वो अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में है.

 

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आपको बता दें कि सुष्मिता सेन काफी समय से अपने से 16 छोटे मॉडल रोहमन शॉल को डेट कर रही हैं. हालांकि, बीच में सुष्मिता सेन और रोहमन शॉल के ब्रेकअप की खबरें आई थीं लेकिन कुछ समय के बाद दोनों फिर साथ नजर आने लगे थे. बता दें कि इन दोनों की शादी की खबरें अक्सर आती रहती हैं. अब सुष्मिता सेन ने एक इंटरव्यू के दौरान शादी को लेकर बात की है.

‘फिल्म कंपेनियन’ को दिए इंटरव्यू में सुष्मिता सेन ने शादी को लेकर खुलकर बात की है. सुष्मिता सेन ने कहा है, ‘मुझे पता है कि पूरी दुनिया सोचती है कि इस स्टेज पर आकर सेटल हो जाना चाहिए लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करती. ऐसा नहीं कि मैं इसे रिश्ते का सम्मान नहीं करती. मैं शादी पर विश्वास करती हूं.’ सुष्मिता से ने आगे कहा, ‘मुझे कुछ अविश्वसनीय लोगों का जानने का सौभाग्य मिला है, जिनमें मेरी आर्या के निर्देशक राम माधवानी और मेरे निर्माता अमिता माधवानी शामिल हूं जो उन सबसे खूबसूरत जोड़ों में से एक हैं जिन्हें मैं जानती हूं, लेकिन मैं दोस्ती में बड़ा विश्वास करती हूं और यदि वह अस्तित्व में हैं, तो चीजें घटित हो सकती हैं लेकिन, वह सम्मान और दोस्ती बहुत-बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए मैं आजादी परवाह करती हूं.

गौरतलब है कि सुष्मिता सेन ने रोहमन शॉल को काफी समय तक डेट किया था और इस दौरान दोनों के रोमांटिक फोटोज और वीडियोज जमकर वायरल होते रहते थे. रोहमन शॉल की सुष्मिता सेन की बेटियों के साथ अच्छी बॉन्डिंग है.

 

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बताते चलें कि सुष्मिता सेन और रोहमन शॉल के ब्रेकअप हो गया था. आईपीएल के चेयरमैन रहे ललित मोदी ने एक बार सोशल मीडिया पर सुष्मिता सेन के डेट करने की पोस्ट शेयर किया था. इसके बाद लोग हैरान रह गए थे. सुष्मिता सेन ने ललित मोदी का बिना नाम लिए इस बात को खारिज कर दिया था.

 

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ फेम करिश्मा सावंत ने बिकनी में ढाया कहर, देखें फोटोज

टीवी सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है में करिश्मा सावंत ‘आरोही’ के रोल में आप सभी ने देखीं होगी. स सीरियल में करिश्मा का किरदार हर ट्विस्ट के साथ बदल जाता था. मेकर्स कभी आरोही को निगेटिव बना देते हैं, तो कभी वह परिवार की सबसे अच्छी बेटी और बहू बन जाती थी. शो को अलविदा कहने के बाद एक्ट्रेस एक बार सोशल मीडिया पर नजर आई है. एक्ट्रेस ने अपना नया लुक दिखाया है.

 

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करिश्मा सावंत ने सोशल मीडिया पर अपना बिकिनी लुक शेयर कर इंटरनेट पर आग लगाई है. करिश्मा सावंत सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है और सोशल मीडिया पर अपनी ढेर सारी फोटोज शेयर करती रहती हैं. इस बार एक्ट्रेस ने अपना बिकिनी लुक दिखाकर फैंस को हैरान कर दिया है. फोटोज में देखा जा सकता है कि एक्ट्रेस करिश्मा सावंत समंदर किनारे ब्लैक एंड ग्रीन कलर की बिकिनी पहनकर खूब मजे कर रही हैं. इस फोटो में एक्ट्रेस बिकिनी में पोज देती दिख रही हैं.

करिश्म सावंत ने अपनी मस्ती भरी फोटोज भी दिखाई हैं. इस फोटो में एक्ट्रेस का चेहरा तो पूरा नहीं दिख रहा है, लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह फुल ऑन मजे में हैं और अपने इस टाइम को एंजॉय कर रही हैं. इस फोटो में करिश्मा सावंत अपनी एक दोस्त के साथ नजर आ रही हैं. बिकिनी लुक में दोनों ही कहर ढा रही हैं. बता दें कि करिश्मा सावंत की ये फोटोज वेकेशन की हैं.

करिश्मा सावंत की इन फोटोज को सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है. लोग करिश्मा के इस लुक पर खूब फिदा हो रहे है. कुछ लोग करिश्मा सावंत को ट्रोल भी कर रहे है. एक यूजर ने लिखा है, ‘आप मुझे आरोही के रोल में अच्छी लगती थी, लेकिन अब नजरों से उतर गईं.’ इसी तरह एक और यूजर ने लिखा, ‘शर्म नाम की कोई चीज नहीं है.’

 

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हालांकि, करिश्मा सावंत ने इस ट्रोलिंग पर लोगों को इग्नोर कर दिया है. एक्ट्रेस ने सामने आकर कोई जवाब नहीं दिया है. बल्कि बिकिनी फोटोज के बाद और भी कई पोस्ट किए हैं. बता दें कि ये रिश्ता क्या कहलाता है के बाद करिश्मा सावंत किसी दूसरे प्रोजेक्ट में नहीं दिखी है. दावा किया जा रहा था कि करिश्मा के हाथ एक बड़ा प्रोजेक्ट लगा है. इस पर एक्ट्रेस ने चुप्पी तोड़ी है. करिश्मा सावंत ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि उन्होंने अब तक कई नया प्रोजेक्ट साइन नहीं किया है. एक्ट्रेस इन दिनों अपना सारा वक्त परिवार और दोस्तों के साथ बिता रही हैं.

मैं अपने घर की गरीबी दूर करने के लिए कोई नौकरी करना चाहता हूं, क्या करूं?

सवाल

मैं 18 साल का हूं और दिल्ली में रहता हूं. अभी मैं 12वीं क्लास में पढ़ रहा हूं. मैं पढ़ाई में अच्छा हूं और आगे चल कर बड़ा अफसर बनना चाहता हूं. पर फिलहाल अपने घर की गरीबी दूर करने के लिए कोई नौकरी करना चाहता हूं. पर मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है. मैं क्या करूं?

जवाब

आप को कोई छोटीमोटी नौकरी कर लेनी चाहिए, लेकिन अपनी मंजिल को भी नहीं भूलना चाहिए. अपनी उम्र के दूसरे लड़कों की तरह सुखसुविधाएं और मौजमस्ती आप के लिए हराम हैं, यह सोच कर ही जिंदगी में आगे बढ़ पाएंगे, इसलिए मेहनत कीजिए, कुछ पैसा कमाइए और खूब पढ़िए भी, जिस से बड़ा अफसर बनने का अपना सपना पूरा कर सकें.

Valentine’s Day 2024: सैक्स से पहले छेड़छाड़ है बेहद जरूरी, अपनाएं ये तरीके

प्रिया का कहना है कि उस का पति जिस्मानी रिश्ता बनाते समय बिलकुल भी छेड़छाड़ नहीं करता और न ही प्यार भरी बातें करता है. उसे तो बस अपनी तसल्ली से मतलब होता है. जब तन की आग बुझ जाती है, तो निढाल हो कर चुपचाप सो जाता है. वह बिन पानी की मछली की तरह तड़पती ही रह जाती है.

कुछ इसी तरह राजेंद्र का कहना है, ‘‘जिस्मानी रिश्ता कायम करते वक्त मेरी पत्नी बिलकुल सुस्त पड़ जाती है. वह न तो इनकार करती है और न ही प्यार में पूरी तरह हिस्सेदार बनती है. न ही छेड़छाड़ होती है और न ही रूठनामनाना. नतीजतन, सैक्स में कोई मजा ही नहीं आता.’’

इसी तरह सरिता की भी शिकायत है कि उस का पति उस के कहने पर जिस्मानी रिश्ता तो कायम करता है, पर वह सुख नहीं दे पाता, जो चरम सीमा पर पहुंचाता हो. हालांकि वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है, फिर भी सरिता को ऐसा लगता है, मानो वह अपनी मंजिल पर पहुंच कर भी नहीं पहुंची. सैक्स के दौरान वह इतनी जल्दबाजी करता है, मानो कोई ट्रेन पकड़नी हो. उसे यह भी खयाल नहीं रहता कि सोते समय और भी कई राहों से गुजरना पड़ता है. मसलन छेड़छाड़, चुंबन, सहलाना वगैरह. नतीजतन, सरिता सुख भोग कर भी प्यासी ही रह जाती है.

मनोज की हालत तो सब से अलग  है. उस का कहना है, ‘‘मेरी पत्नी इतनी शरमीली है कि जिस्मानी रिश्ता ही नहीं बनाने देती. अगर मैं उस के संग जबरदस्ती करता हूं, तो वह नाराज हो जाती है. छेड़छाड़ करता हूं, तो तुनक जाती?है, मानो मैं कोई पराया मर्द हूं. समझाने पर वह कहती है कि अभी नहीं, इस के लिए तो सारी जिंदगी पड़ी हुई है.’’

इसी तरह और भी अनगिनत पतिपत्नी हैं, जो एकदूसरे की दिली चाहत को बिलकुल नहीं समझते और न ही समझने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि शादीशुदा जिंदगी कच्चे धागे की तरह होती है. इस में जरा सी खरोंच लग जाए, तो वह पलभर में टूट सकती है.

पतिपत्नी में छेड़छाड़ तो बहुत जरूरी है, इस के बिना तो जिंदगी में कोई रस ही नहीं, इसलिए यह जरूरी है कि पति की छेड़छाड़ का जवाब पत्नी पूरे जोश से दे और पत्नी की छेड़छाड़ का जवाब पति भी दोगुने मजे से दे. इस से जिंदगी में हमेशा नएपन का एहसास होता है.

अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने के दौरान या किसी दूसरे समय पर भी पति अपनी पत्नी को सहलाए और उस के जवाब में पत्नी पूरे जोश के साथ प्यार से पति के गालों को चूमते हुए अपने दांत गड़ा दे, तो उस मजे की कोई सीमा नहीं होती. पति तुरंत सैक्स सुख के सागर में डूबनेउतराने लगता है.

इसी तरह पत्नी भी अगर जिस्मानी रिश्ता कायम करने से पहले या उस दौरान पति से छेड़छाड़ करते हुए उस के अंगों को सहला दे, तो कुदरती बात है कि पति जोश से भर उठेगा और उस के जोश की सीमा भी बढ़ जाएगी.

कभीकभी यह सवाल भी उठता है कि क्या जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए कायम किया जाता है? क्या दिमागी सुकून से उस का कोई लेनादेना नहीं होता? क्या जिस्मानी रिश्ते के दौरान छेड़छाड़ करना जरूरी है? क्या छेड़छाड़ सैक्स सुख में बढ़ोतरी करती है? क्या छेड़छाड़ से पतिपत्नी को सच्चा सुख मिलता है?

इसी तरह और भी कई सवाल हैं, जो पतिपत्नी को बेचैन किए रहते हैं. जवाब यह है कि जिस्मानी रिश्तों के दौरान छेड़छाड़ व कुछ रोमांटिक बातें बहुत जरूरी हैं. इस के बिना तो सैक्स सुख का मजा बिलकुल अधूरा है. जिस्मानी रिश्ता सिर्फ सैक्स सुख के लिए ही नहीं, बल्कि दिमागी सुकून के लिए भी किया जाता है.

कुछ पति ऐसे होते हैं, जो पत्नी की मरजी की बिलकुल भी परवाह नहीं करते, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. पत्नी की चाहत का भी पूरा खयाल रखना चाहिए, नहीं तो आप की पत्नी जिंदगीभर तड़पती ही रह जाएगी.

कुछ औरतें बिलकुल ही सुस्त होती हैं. वे पति को अपना जिस्म सौंप कर फर्ज अदायगी कर लेती हैं. उन्हें यह भी एहसास नहीं होता कि इस तरह वे अपने पति को अपने से दूर कर रही हैं.

कुछ पति जिस्मानी रिश्ता तो कायम करते हैं और जल्दबाजी में अपनी मंजिल पर पहुंच भी जाते हैं, परंतु उन्हें इतना भी पता नहीं होता कि इस के पहले भी और कई काम होते हैं, जो उन के मजे को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

कुछ औरतें शरमीली होती हैं. वे जिस्मानी रिश्तों से दूर तो होती ही हैं, छेड़छाड़ को भी बुरा मानती हैं.

अब आप ही बताइए कि ऐसे हालात में क्या पत्नी पति से और पति पत्नी से खुश रह सकता है?

नहीं न… तो फिर ऐसे हालात ही क्यों पैदा किए जाएं, जिन से पतिपत्नी एकदूसरे से नाखुश रहें?

इसलिए प्यार के सुनहरे पलों को छेड़छाड़, हंसीखुशी व रोमांटिक बातों में बिताइए, ताकि आने वाला कल आप के लिए और ज्यादा मजेदार बन जाए.

10 महीने के बेटे ने खोला मां की हत्या का राज, सब रह गए हैरान

रात के 9 बज रहे थे. गुजरात के गांधीनगर के पीथापुर में स्वामिनारायण गौशाला के बाहर एक बच्चे के तेज रोने की आवाज सुन कर गौशाला के कर्मचारी बाहर आए. देखा गौशाला के गेट के बाहर सड़क पर एक मासूम रो रहा है. बच्चे के आसपास कोई नहीं था.

मासूम पैरों से अभी चल भी नहीं पाता था. एक कर्मचारी ने बच्चे को गोद में उठाने के बाद उसे चुप कराने की कोशिश की और उस के मांबाप की तलाश आसपास की गई. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. रात के अंधेरे में वहां कोई नहीं दिखाई दिया.

गौशाला के कर्मचारी बच्चे को ले कर अंदर आ गए. रात में ही गांधीनगर पुलिस को इस की सूचना दी गई. इस बीच जानकारी होने पर आसपास के लोग एकत्र हो गए. जिस ने भी यह बात सुनी, वही दांतों तले अंगुली दबाने लगा. सभी बच्चे के पत्थर दिल मांबाप को कोस रहे थे. पुलिस ने भी उस समय अपने स्तर से छानबीन की लेकिन कुछ पता नहीं चला.

बच्चा 10-11 महीने का था. वह अभी अपने पैरों से चल भी नहीं सकता था. इस समय इस मासूम को मां के आंचल में होना चाहिए था, लेकिन वह रात के अंध्ेरे में सड़क पर लावारिस हालत में था.

पुलिस ने उस मासूम को क्षेत्र की पार्षद दीप्ति पटेल के सुपुर्द कर दिया और सुबह बच्चे के बारे में जानकारी जुटाने की बात कही. दीप्ति पटेल ने मासूम को अपने पास रखा और रात में उसे खिलायापिलाया और पूरा ध्यान रखा.

यह बात 8 अक्तूबर, 2021 की है. पुलिस सुबह बच्चे को मैडिकल चैकअप के लिए सिविल अस्पताल ले गई. जहां जांच के बाद बच्चे को स्वस्थ बताया गया.

सोशल मीडिया पर जिस किसी ने इस खबर को पढ़ा व देखा, वह सन्न रह गया. जितने मुंह उतनी बातें. कोई इतना बेदर्द कैसे हो सकता है, जो अपने कलेजे के टुकड़े को रात के अंधेरे में इस तरह गौशाला के बाहर सड़क पर लावारिस छोड़ गया. उस मां के साथ ऐसी क्या मजबूरी थी, जो उसे कलेजे पर पत्थर रख कर यह काम करना पड़ा.

दूसरे दिन 9 अक्तूबर को अखबारों में जब मासूम की फोटो सहित समाचार छपा तो हर किसी का कलेजा फट रहा था. बात गुजरात के गृहमंत्री हर्ष सांगवी के कानों तक पहुंची. गृहमंत्री भी अस्पताल पहुंचे और बच्चे के बारे में जानकारी की. बच्चे को गोदी में ले कर दुलारा. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बच्चे के मांबाप का शीघ्र पता लगाने के निर्देश दिए.

50 पुलिसकर्मी जुटे जांच में गांधीनगर के एसपी मयूर चावड़ा ने बच्चे के परिजनों का पता लगाने के लिए 50 पुलिसकर्मियों की 7 टीमें लगा दीं.

पुलिस ने गौशाला के बाहर लगे एक सीसीटीवी कैमरे की फुटेज को चैक किया. फुटेज में रात 9 बज कर 20 मिनट पर एक व्यक्ति बच्चे को गोद में ले कर आता हुआ दिखाई दे रहा था. वह बच्चे को गौशाला के गेट के बाहर सड़क पर छोड़ कर तेजी से भागता हुआ अंधेरे में गायब हो गया. इस पर पुलिस ने गौशाला आनेजाने वाले रास्तों पर लगे सीसीटीवी कैमरों को चैक करने का निर्णय लिया.

पुलिस ने लगभग 150 सीसीटीवी कैमरों को चैक किया. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई. एक फुटेज में एक सैंट्रो कार दिखाई दे रही थी. कार में एक व्यक्ति इसी बच्चे के साथ बैठा हुआ गौशाला की ओर जाता दिखाई दे रहा था.

यहीं से पुलिस को कार का नंबर भी मिल गया. तब पुलिस ने इस कार के रजिस्ट्रेशन नंबर से कार के मालिक का पता किया.

पता चला कि यह सैंट्रो कार सचिन दीक्षित के नाम रजिस्टर्ड है. 30 साल के सचिन का पता अहमदाबाद का लिखा हुआ था. पुलिस पते पर पहुंची तो पता चला कि सचिन दीक्षित अहमदाबाद में नहीं बल्कि अब गांधीनगर में रहता है.

पुलिस जब गांधीनगर स्थित सचिन के घर पहुंची तो वहां ताला लगा हुआ था. तब तक पुलिस को सचिन का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने सचिन के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

इस से पता चला कि सचिन राजस्थान के कोटा के आसपास है. सचिन की लोकेशन मिलते ही पुलिस ने सचिन को फोन कर बच्चा मिलने के बारे में जानकारी दी. इस पर सचिन ने पुलिस को बताया कि वह बच्चा उसी का है और उस का नाम शिवांश है.

रविवार 10 अक्तूबर, 2021 की सुबह राजस्थान पुलिस की मदद से कोटा में ही सचिन को रोक कर हिरासत में ले लिया गया. जिस समय सचिन को हिरासत में लिया गया, उस समय वह अपनी पत्नी अनुराधा और 3 साल के बेटे तथा अपने मातापिता के साथ था. वह फुटेज में दिखाई दे रही उसी सैंट्रो कार से दशहरा मनाने उत्तर प्रदेश जा रहा था.

गुजरात पुलिस व क्राइम ब्रांच ने 11 अक्तूबर को राजस्थान पहुंचने के बाद जब सचिन से बच्चे को गौशाला के बाहर लावारिस छोड़ने की वजह पूछी. इस पर सचिन ने चुप्पी साथ ली.

इस के बाद पत्नी अनुराधा से पुलिस ने पूछा, ‘‘आप ने अपने बेटे को रात में सड़क पर क्यों छोड़ा?’’

यह सुन कर अनुराधा हैरान रह गई. उस ने पुलिस को बताया कि उस का 3 साल का एक ही बेटा है, जो इस समय उस के साथ है.

पुलिस ने अनुराधा को शिवांश की फोटो दिखाई तो उस ने पहचानने से इंकार कर दिया. उस ने बताया कि वह इस बच्चे को पहली बार देख रही है वह उसे नहीं जानती.

सचिन कह रहा था कि 10 महीने का शिवांश उस का बेटा है और उसी ने उसे गौशाला के बाहर छोड़ा था. जबकि उस की पत्नी इस बात से इंकार कर रही थी. पुलिस उलझन में पड़ गई. पुलिस ने एक बार फिर सचिन से पूछताछ करने का फैसला किया.

सचिन से लंबी पूछताछ के बाद गांधीनगर पुलिस ने बड़ोदरा पुलिस को फोन किया और एक घर का पता बताया. इस मकान पर पहुंच कर उस की किचन में रखे बैग की तलाशी लेने को कहा.

किचन में मिली लाश

गांधीनगर पुलिस के कहने पर बड़ोदरा पुलिस बताए गए मकान जो बड़ोदरा में जी-102 दर्शनम ओएसिस सोसायटी में स्थित था, पर पहुंची.

सीढि़यां चढ़ कर पुलिस जब उस फ्लैट पर पहुंची तो ताला लगा था. पुलिस ताला तोड़ कर किचन में दाखिल हुई. वहां सचमुच एक बैग रखा हुआ मिला.

पुलिस ने जब बैग को खोला तो उस में एक महिला की लाश मिली. लाश देखते ही पुलिस हैरान रह गई. बैग में बंद होने के कारण लाश से दुर्गंध आ रही थी. बड़ोदरा पुलिस ने तत्काल गांधीनगर पुलिस को बताया कि बैग में 27-28 साल की एक महिला की लाश है.

पुलिस के सामने प्रश्न था कि बैग में बंद महिला कौन थी? उस की हत्या कब और क्यों की गई थी? लाश की भनक सचिन को कैसे लगी?

अब पुलिस ने इस हत्या के बारे में सचिन से कड़ाई से पूछताछ की. आखिर पुलिस ने सचिन से सच उगलवा ही लिया. सचिन ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. जो कहानी सामने आई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस घटना का 24 घंटे में ही पुलिस ने कड़ी मेहनत कर परदाफाश कर दिया था.

गांधीनगर के एसपी मयूर चावड़ा ने प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया कि मृतका सचिन की प्रेमिका थी. दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. उन का एक बच्चा शिवांश था.

प्रेमिका शादी करने के लिए सचिन पर जोर दे रही थी. उस से व बच्चे से छुटकारा पाने के लिए सचिन ने षडयंत्र रच इस कृत्य को अंजाम दिया था.

लेकिन तीसरी आंख से वह अपने गुनाह को छिपा नहीं सका. आखिर पुलिस की 7 टीमों ने दिनरात मेहनत कर बेरहम गुनहगार को गिरफ्तार कर लिया था.

पत्नी अनुराधा को अपने पति सचिन के गुमनाम रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं था. उसे नहीं मालूम था कि पति की प्रेमिका व उस से बेटा भी है. यह बात तो उसे घटनाक्रम के सामने आने के बाद पता चली.

सचिन के राज से पत्नी थी अनभिज्ञ

सचिन 3 साल से इस राज को अपनी पत्नी से छिपाए हुए था. उस ने अपनी पत्नी को भी इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि उस की कोई प्रेमिका और उस से पैदा कोई बच्चा भी है.प्रेमिका की हत्या करने और जिगर के टुकड़े को रात के अंधेरे में सड़क पर छोड़ने की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी—

4 साल पहले सचिन दीक्षित के मातापिता ने उस की शादी अनुराधा के साथ कर दी थी. इस समय अनुराधा के 3 साल का एक बेटा है. सचिन गांधीनगर की एक कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत था.

वर्ष 2018 में अहमदाबाद के एक शोरूम में उस की मुलाकात हिना पेथाणी उर्फ मेहंदी नाम की युवती से हुई. हिना मूलरूप से जूनागढ़ जिले के केशोद की रहने वाली थी. उस की मां की मौत हो चुकी थी. मां की मौत के बाद पिता महबूब पेथाणी ने दूसरी शादी कर ली. इस के बाद हिना अपने मौसामौसी के साथ अहमदाबाद में आ कर उन के साथ रहने लगी थी.

हिना उसी शोरूम में काम करती थी. धीरेधीरे दोनों के बीच मुलाकातें बढ़ने लगीं. इन मुलाकातों के चलते दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. दोनों दिलोजान से एकदूसरे को प्यार करने लगे. इस के बाद साल 2019 में दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे.

लिवइन रिलेशन के दौरान साल 2020 में शिवांश पैदा हुआ, जो घटना के समय लगभग 10 महीने का था. घटना से 2 महीने पहले सचिन का बड़ोदरा ट्रांसफर हो गया. तब सचिन ने दर्शनम ओएसिस सोसायटी में एक फ्लैट किराए पर ले लिया.

वह इसी फ्लैट में हिना और बेटे शिवांश के साथ रहने लगा. सचिन सप्ताह में 5 दिन बच्चे व प्रेमिका हिना के साथ तथा 2 दिन शनिवार और रविवार को गांधीनगर में मातापिता व पत्नी अनुराधा के साथ रहता था.

प्रेमिका हिना डाल रही थी शादी का दबाव

पिछले 3 साल से सब कुछ ठीक चल रहा था. पिछले कुछ दिनों से हिना शादी करने के लिए सचिन पर दबाव डाल रही थी. सचिन कोई न कोई बहाना बना कर टालमटोल कर देता था.

8 अक्तूबर की दोपहर सचिन ने हिना को बताया कि वह एक सप्ताह के लिए अपने घर गांधीनगर मातापिता के पास जा रहा है. वहां से सभी लोग दशहरा मनाने के लिए उत्तर प्रदेश जाएंगे.

यह बात हिना को नागवार गुजरी. उस ने सचिन को दशहरा मनाने के लिए जाने से मना करते हुए अपने साथ ही रहने की बात कही. उस ने सचिन से कहा, ‘‘हम लोग लिवइन रिलेशन में कब तक रहेंगे? अब तो हमारे एक बेटा भी हो चुका है. तुम जल्द ही पत्नी अनुराधा को तलाक दे दो, ताकि हम जल्द शादी कर सकें.’’

इस बात को ले कर दोनों के बीच सुबहसुबह झगड़ा हुआ. शाम के समय भी दोनों में फिर से झगड़ा हुआ. हिना शादी के लिए सचिन पर दबाव डाल रही थी. वहीं सचिन उस से शादी करने से आनाकानी करने के साथ ही परिवार के साथ दशहरा मनाने के लिए जाने की बात कह रहा था.

बात बढ़ गई. दोनों के बीच कहासुनी, फिर हाथापाई हुई. गुस्से में सचिन ने हिना का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद घर में ही रखे एक सूटकेस में उस की लाश ठूंस कर भर दी और सूटकेस को किचन में रख दिया.

उस समय रात घिर आई थी. सचिन ने घर को ताला लगाया और बेटे शिवांश को ले कर अपनी सैंट्रो कार से निकल गया. सचिन सीधे गांधीनगर पहुंचा. प्रेमिका की हत्या कर परिवार के साथ सामान्य हो गया सचिन.

वह गांधीनगर के पीथापुर की स्वामिनारायण गौशाला को जानता था, क्योंकि वह गांधीनगर में रहने के दौरान इसी गौशाला से दूध, घी लेने जाता था. सचिन रात में उसी गौशाला के पास पहुंचा. उस समय रात होने से सड़क सुनसान थी.

गौशाला से कुछ दूरी पर उस ने अपनी कार खड़ी कर दी. फिर मासूम बेटे शिवांश को गोद में ले कर वह दबेपांव गौशाला के गेट पर पहुंचा. उस समय रात के 9 बज कर 20 मिनट का समय था. उस ने शिवांश को गौशाला के गेट के सामने सड़क पर बैठाया और तेजी से उलटे पांव अपनी कार में बैठ कर रफूचक्कर हो गया.

सचिन अपनी प्रेमिका की हत्या करने और अपने बच्चे को लावारिस छोड़ने के बाद अपने घर पहुंचा और पत्नी, बच्चे व मातापिता के साथ सैंट्रो कार से दशहरा मनाने के लिए उत्तर प्रदेश के लिए निकल पड़ा.

सचिन अपने परिवार में ऐसा व्यवहार कर रहा था कि कुछ हुआ ही नहीं है. उस ने अपनी पत्नी व मातापिता पर भी कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

जानकारी होने पर गांधीनगर पुलिस ने कोटा में सचिन को गिरफ्तार कर लिया. संतान प्राप्ति के लिए लोग देवीदेवताओं की पूजा करते हैं. लेकिन एक पत्थरदिल पिता की जो शर्मनाक करतूत सामने आई, उस से मजबूत दिल वाले भी कांप गए.

उस ने पहले उस की मां का कत्ल किया और फिर अपने ही मासूम बेटे से छुटकारा पाने के लिए रात के अंधेरे में सुनसान सड़क पर छोड़ दिया. आवारा कुत्ते या अन्य कोई हिंसक पशु उसे कोई नुकसान पहुंचाता, उस से पहले ही वह सुरक्षित हाथों में पहुंच गया.

जांच के दौरान सचिन के पड़ोसियों ने बताया कि सचिन के घर का दरवाजा केवल कचरा वाले के लिए खुलता था. सभी उन्हें पतिपत्नी समझते थे. शिवांश का जन्म 10 दिसंबर, 2020 को अहमदाबाद के बोपल स्थित एक अस्पताल में हुआ था.

मृतका के पिता महबूब पेथानी सोमवार 11 अक्तूबर को एसएसजी हौस्पिटल में बेटी का शव लेने पहुंचे.

सचिन के खिलाफ बड़ोदरा के बापोद थाने में हत्या की रिपोर्ट गांधीनगर के इंसपेक्टर की शिकायत पर दर्ज की गई. जिस की जांच बापोद के थानाप्रभारी यू.जे. जोशी कर रहे हैं. जबकि सचिन पर पहले ही अपहरण भादंवि की धारा 363 और बच्चे को छोड़ने की धारा 317 के तहत मामला दर्ज है.

गांधीनगर पुलिस ने आरोपी सचिन को 11 अक्तूबर को न्यायालय के समक्ष पेश किया. जहां से उसे 14 अक्तूबर तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया.

गांधीनगर के पुलिस उपाधीक्षक एम.के. राणा के अनुसार सोमवार को अदालत में पेश किए जाने से पहले फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी के विशेषज्ञों ने आरोपी सचिन के फिंगरप्रिंट व नाखूनों के नमूने के साथ ही डीएनए का नमूना लिए, ताकि पता लगाया जा सके कि वह बच्चे का पिता है या नहीं. इस के अलावा अन्य फोरैंसिक एविडेंस जुटाने का कार्य किया गया. शिवांश को फिलहाल शिशुगृह में रखा गया है.

10 दिसंबर, 2021 को शिशुगृह में शिवांश का पहला जन्मदिन मनाया गया. इस अवसर पर बच्चे से केक भी कटवाया गया.

सचिन ने अपना हंसताखेलता परिवार उजाड़ने के साथ ही एक मासूम की जिंदगी दांव पर लगा दी. बच्चे से मां की गोद उस का आंचल और बचपन छीन लिया. उस मासूम को इस की कीमत ताउम्र चुकानी पड़ेगी.

इंसानियत को शर्मसार करने और 2 नावों में सवार होने पर सचिन को आखिर डूबना तो था ही. अब अपने कृत्यों के लिए उसे सलाखों के पीछे जिंदगी बितानी होगी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Valentine’s Day 2024: क्यों कम हाइट की लड़कियों को पसंद करते हैं लड़के, जानें 7 कारण

शादी के लिये रिश्ते करते समय लड़के-लड़की के रंग-रूप और कद-काठी पर भी ध्यान दिया जाता है. कोशिश होती है कि लड़के-लड़की के कद में अधिक अंतर न हो. लेकिन दक्षिण कोरिया में हुई एक रिसर्च के मुताबिक कद का अंतर प्यार बढ़ाता है.

7850 महिलाओं पर किए गए सर्वे में यह सामने आया कि जिन पतियों की लंबाई पत्नी की तुलना में बहुत ज्यादा होती है, वह पुरुष अच्छे पति साबित होते हैं और ऐसी बीवियां भविष्य में बहुत ही खुशहाल जीवन बिताती हैं.

हम यहां बता रहे हैं 7 कारण जिसकी वजह से पुरुष छोटे कद की महिला को पसंद करते हैं.

1-पुरुष खुद को ताकतवर महसूस करते हैं

किसी रिश्ते का सही तरह से आगे बढ़ना या न बढ़ना काफी हद तक एक-दूसरे की सोच पर निर्भर करता है. अपने से कम हाइट की महिलाओं पार्टनर को पाकर पुरुष ताकतवर मेहसूस करने लगता है. उन्हें लगता है कि वो अपने कद की वजह महिलाओं से अपनी बात आसानी से मनवा सकते हैं. ऐसे मामलों में पुरुष न चाहते हुए भी धीरे-धीरे डोमिनेटिंग नेचर के बन जाते हैं.

2-खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं

लंबे पुरुषों को लगता है कि उनकी कम कद की पार्टनर को हर वक्त उनके प्रोटेक्शन की जरूरत है जिससे वो उन्हें एक्स्ट्रा केयर और प्रोटेक्शन देते हैं. ऐसी महिला  के साथ वो किसी भी तरह से असुरक्षित महसूस नहीं करते. कई मामलों में देखा गया है कि कम हाइट की महिलाएं भले ही दिखने में ज्यादा सुंदर हों लेकिन पुरुष अपने लंबे कद की वजह से इसे बैलेंस कर देते हैं.

3-झप्पी देना लगता है अच्छा

ज्यादातर पुरुषों को कम हाइट की महिलाओं को गले लगाना अच्छा लगता है. ऐसी महिलाओं को गले लगाने से उन्हें अपनेपन का अहसास होता है जिसका मौका वो कभी नहीं चूकते.

4- महिलाओं के लंबे कद से लगता है डर

लंबी महिलाएं अपनी हर बात को लेकर बहुत ही कॉन्फिडेंट होती हैं लेकिन उनका कॉन्फिडेंस इगो और घमंड का भरा होता है. पुरुषों में भी इगो वाला नेचर देखा जा सकता है लेकिन वो इसे शो नहीं करते. इसीलिये लंबे कद वाली महिलाओं को पुरुष पसंद नहीं करते.

5-खास होती हैं छोटे कद की महिलाएं

अपने कद को अपने व्यक्तित्व की कमी मानने वाली महिलाएं कई बार इस बात से अंजान होती हैं कि उनके बाकी फीचर्स कितने अलग हैं जो दूसरों को अट्रैक्ट करने के लिए काफी हैं. सरल, मासूम और काइन्ड नेचर होने के साथ कम हाइट की महिलाएं अक्सर रोमांटिक नेचर की होती हैं.

6-करती हैं सेक्स लाइफ को एन्जॉय

पुरुषों को कम हाइट की महिलाएं इसलिए भी ज्यादा पसंद आती हैं क्योंकि वो सेक्स को अच्छे से एन्जॉय करती हैं. कम हाइट की वजह से उनका वजन भी उतना ज्यादा नहीं होता जो पुरुषों के लिए अच्छा होता है. अपनी सेक्सुअल लाइफ को एन्जॉय करने में लिए खासतौर से पुरुष ऐसी महिलाओं को पसंद करते हैं.

7-साथ घूमना-फिरना है आसान

पुरुषों के रोमांटिक नेचर को असल में कम हाइट की महिलाओं के साथ देखा जा सकता है. उन्हें बहुत ही अच्छा लगता है ऐसी महिलाओं को उठाकर घूमना. हनीमून ट्रिप हो या डेट वो ऐसे किसी मौके को हाथ से जाने नहीं देते.

ममता : नवजात शिशु का मोह

दिनेश और महेश अपने घर के सूरजचांद थे. मांबाप ने उन्हीं की रोशनी से अपनी जिंदगी को रोशन करना चाहा. दोनों को कालेज में पढ़ने के लिए लखनऊ भेजा गया.

नवाबों की नगरी को देख कर वे दोनों दंग रह गए. लखनऊ की हवा लगते ही वे पढ़ाईलिखाई भूल गए. वे कभीकभार ही कालेज जाते, बाकी समय मीना बाजार की हवाखोरी में बिताते, जहां हमेशा सुंदरियों का बाजार सा लगा रहता.

उन दोनों के पिताजी फौज में कर्नल थे. वे हर महीने मोटी रकम भेजते और हमेशा चिट्ठियों में लिखते कि पढ़ाई में किसी तरह की लापरवाही न करना, पर लाड़ले तो ऐश कर रहे थे.

उन्होंने 2 कमरे का मकान किराए पर लिया हुआ था. छोटा भाई महेश शुरू में कुछ पढ़तालिखता रहा, पर जब उस ने बड़े भाई को मस्ती करते देखा, तो वह भी उसी रास्ते पर चल पड़ा. वे दोनों अपनीअपनी प्रेमिकाओं को ले कर शहीद पार्क में गपशप करते रहते.

कुछ समय बाद उन के पिता का तबादला जम्मू हो गया. वे दोनों चिट्ठी में ?ाठ लिखते रहते कि उन की पढ़ाई ठीकठाक चल रही है. साथ ही, महंगाई का रोना रोते हुए वे ज्यादा पैसे भेजने को लिखते. उन के पिता अब पहले से भी ज्यादा रुपए भेजने लगे थे.

दिनेश के यहां एक लड़की ममता का काफी दखल रहता था, जो अपनी छोटी बहन के साथ पढ़ने आई थी. वे दोनों खूब सैरसपाटा करते. आखिर में दोनों ने शादी कर ली.

फिर ममता की छोटी बहन की मुहिम भी शुरू हो गई. महेश को लगा कि वह दौड़ में पीछे छूटा जा रहा है. उस ने भी हाथपैर मारे और छोटी बहन के साथ कोर्ट मैरिज कर ली.

प्रेमिकाएं अब पत्नियां बन चुकी थीं. पत्नियों को लिए वे दोनों अपनेअपने कमरों में पड़े रहते. बहाना पढ़ाई का था, सो खर्च के लिए मोटी रकम भी आ रही थी.

एक बार उन के पिता अचानक लखनऊ आ पहुंचे. दोपहर के 2 बजे वे लाड़लों के यहां दाखिल हुए. सब खाना खा कर सो रहे थे.

पिताजी ने दरवाजा खटखटाया, तो ममता ने नाइटी पहने ही दरवाजा खोला.

कर्नल साहब कमरे के अंदर पैर रखते हुए बोले, ‘‘दिनेश नहीं है क्या?’’

पिताजी की आवाज सुनते ही दिनेश पहचान गया. उस की नींद हवा हो गई कि अब आफत आ गई है.

उस ने दौड़ कर पिता के पैर छुए. पिताजी उस लड़की का सिंदूर देख कर सब समझ गए.

दिनेश पैर छू कर सीधा हो ही रहा था कि कर्नल साहब ने उस के गाल पर जोरदार थप्पड़ दे मारा.

थप्पड़ पड़ते ही दिनेश तिलमिला गया और उस ने पिता का हाथ पकड़ लिया. अब कर्नल साहब के गुस्से का पारावार न था. उन्होंने फौजी हाथ दिखाए, तो बेटे की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

इस हादसे के बारे में सुन कर छोटा लड़का भी दौड़ कर आया. पीछेपीछे उस की पत्नी भी आ रही थी.

कर्नल साहब ने इस जोड़े को देखा, तो गुस्से की बची आग उन की सारी देह को धधकाने लगी. बड़े बेटे को छोड़ कर वे छोटे बेटे पर टूट पड़े. उसे इतना मारा कि खुद की सांस फूल गई.

अब वे लड़कों को छोड़ बहुओं की ओर बढ़े. वे दोनों पलंगों के नीचे जा घुसी थीं. इस नजारे को देखने के लिए पड़ोसियों की अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी.

कुरसी का एक पाया निकाल कर कर्नल साहब उन दोनों बहुओं पर गरजे, ‘‘बताओ, कौन हो तुम दोनों?’’

दोनों बहुओं की हवा निकल चुकी थी. दोनों ने कोर्ट मैरिज की बात दोहराई. कर्नल साहब के डंडे पड़ने से सुकोमल लड़कियां कठोर होती जा रही थीं. ऊपर से नीचे तक कोई जगह बाकी नहीं थी, जहां डंडा न पड़ा हो.

लड़के तो पहले ही भाग गए थे, अब बहुएं भी रोतीबिलखती वहां से भागीं. कर्नल साहब डंडा लिए उन्हें दौड़ाए चले जा रहे थे.

फिर कर्नल साहब लौट कर आए और सारा सामान सड़क पर फेंक दिया. ताला बंद कर उन्होंने चाबी मकान मालिक को दे दी. साथ ही, यह भी कहते गए कि उन में से किसी को अंदर मत घुसने देना.

घर पहुंच कर कर्नल साहब पत्नी पर भी खूब बिगड़े, ‘‘तुम तो मेरी जान खा गई कि बच्चों को पैसों की कमी न पड़े. दोनों नालायक तो वहां स्वयंवर रचाए बैठे हैं. खबरदार, उन निकम्मों को घर के अंदर भी पैर रखने दिया… अगर रखने दिया, तो इस बार तुम्हारा नंबर आएगा.’’

वे बेचारे चारों कुछ दिनों तक यों ही इधरउधर भटकते रहे. पर महेश का बंधन अभी ढीला था, सो उस ने हाथ झटकना ही सही समझ. एक दिन उस की पत्नी भाग खड़ी हुई. बाकी तीनों के सामने खाने के लाले पड़े थे. जैसतैसे 2 महीने काटे, पर अब काम नहीं चल रहा था.

आखिर महेश घर के लिए चल पड़ा. उस ने अपनी गलती कबूल कर ली. माफी मांगने के बाद उसे घर के भीतर जाने की इजाजत मिल गई.

लेकिन बड़ा भाई दूसरी ही मिट्टी का बना था. उस ने घर का खयाल छोड़ ममता के साथ रहने का इरादा किया. उस ने ममता को प्राइवेट स्कूल में नौकरी दिलवाई और खुद ट्यूशन पढ़ाने लगा.

जैसे पानी के मिलने से सीमेंट मजबूत हो जाता है, वैसे ही कंगाली ने दोनों के संबंधों को और भी मजबूत बनाया.

किसी तरह 2 साल बीत गए, पर अभी भी उन दोनों के तन पर पिताजी के दिए कपड़े ही थे. ममता को बच्चा हुआ, तो दिनेश की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई. वह सुबह 5 बजे उठता और रात 11 बजे सोने का मौका मिलता. सुबह से शाम तक काम ही काम था.

काम की मार ने संबंधों में खटास लानी शुरू कर दी, पर नवजात शिशु का मोह दोनों को बंधन में बांधे रहा.

हाय री ममता, दुनिया चाहे भूल जाए, पर मां अपने जाए को कभी नहीं भूलती. मां अपने बेटे का मुंह देखने के लिए बेचैन हो उठी. उस ने चोरी से दिनेश के नाम एक चिट्ठी लिखी.

चिट्ठी पा कर दिनेश घर जाने के लिए तैयार हुआ, तो ममता बोली, ‘‘मैं अकेली यहां क्या करूंगी?’’

‘‘तो तुम भी चलो,’’ वह बोला.

ममता को गांव के बाहर बैठा कर महेश घर पहुंचा. दरवाजे पर मां मिली, जो उसे देखते ही फूटफूट कर रोने लगी. फिर पूछा कि और कोई साथ में है?

दिनेश ने ‘हां’ में सिर हिलाया और गांव के बाहर चल पड़ा. साथ में मां भी चली. ममता और बच्चे को देख कर उस का दिल खुशियों से भर उठा.

मां ने बच्चे को अपनी गोद में ले लिया. लेकिन कर्नल साहब के डर से वह उन्हें घर चलने को न कह सकी.

थोड़ी देर बाद दिनेश अपनी पत्नी और बच्चे के साथ लौट गया. कुछ समय बाद कर्नल साहब घर लौटे, पर दिनेश के आने की बात उन्हें पता न चली.

आखिर मां को एक उपाय सूझ.

उस ने बड़े पोस्ट औफिस से ममता के नाम से अपने घर के पते पर एक तार कर दिया.

अगले दिन वह तार कर्नल साहब को मिला. उन्होंने जब उसे पढ़ा, तो उन के हाथ कांपने लगे, दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

तार में लिखा था, ‘आप का लड़का कई दिनों से बीमार था. उस के सिर में तेज दर्द हो रहा था. पर अब दर्द ठंडा हो गया है और आज वह दुनिया से कूच कर गया?है. मैं ने लाश को 2 दिन के लिए रोक रखा है. अगर आप चाहें, तो उस के आखिरी दर्शन कर सकते हैं.’

कर्नल साहब ने घबरा कर पत्नी को बताया, लेकिन वह तो सब जानती थी. उसी का रचा खेल था. मगर रोना भी जरूरी था, सो वह गला फाड़फाड़ कर रोने लगी.

जल्दी ही कर्नल साहब बीवी को साथ ले कर बेटे का दाह संस्कार करने चल दिए. पूछताछ करते हुए एक तंग गली की सीलन भरी कोठरी के सामने जा पहुंचे. फिर खुद ही दरवाजा ठेल कर अंदर पहुंचे.

दिनेश ने उन्हें देखा, तो कलेजा धक से रह गया कि इस बला ने हमारा पीछा यहां भी नहीं छोड़ा. ममता भी उन्हें देख कर कांप उठी, पर फौलादी कर्नल अब मोम बन चुके थे और अपने ही ताप से पिघल रहे थे.

कहां तो वे बेटे के लिए कफन साथ ले कर आए थे, लेकिन जब वह जिंदा हालत में मिला, तो खुशी की सीमा न रही. ऐसा लगा, मानो अंधे को दोनों आंखें मिल गई हों.

दिनेश ने डरतेडरते पिता के पैर छुए. कर्नल साहब उसे गले से लगा कर रोने लगे. उन्हें रोते देख सभी रोने लगे. ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि मिलन के थे.

कर्नल साहब हाथ में लिए कफन को फाड़ते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी गलती कबूल करता हूं. तुम्हें सबकुछ करने की छूट है, पर पहले घर चलो.’’

जल्दी ही सब घर की ओर चल दिए. आगेआगे पिताजी चल रहे थे, मां बच्चे को गोदी में लिए थी. दिनेश और ममता सामान लिए पीछेपीछे जा रहे थे.

कर्नल साहब मुड़े कि बच्चे को धूप लग रही होगी. उन्होंने अपने सिर से तौलिया उतार कर बच्चे को ढक दिया.

पर कर्नल साहब का जी इतने से नहीं भरा, उन्होंने खुद बच्चे को अपनी गोद में ले लिया और उसे धूप से बचाने के लिए अपनी रफ्तार तेज कर दी.

तभी दिनेश धीरे से बोला, ‘‘मां, पिताजी में अचानक बदलाव कैसे हो गया?’’

‘‘क्या करूं, मैं तुम्हारे बिना बहुत बेचैन थी. तुम्हें पाने के लिए पहले मैं ने तुम को मरा बताया, तब कहीं जा कर जिंदा पाया.’’

मौत पर मौज : रघू के दर्द पर किसकी बांछें खिली

रघु का बापू मर गया. गांव के सब लोग आ कर रघु को धीरज बंधा रहे थे.  गांव का सेठ दीनदयाल भी आया. वह रघु से 20 हजार रुपए मांगने लगा.

रघु के बाप ने एक बार रघु के इलाज के लिए पैसे लिए थे. ब्याज दर ब्याज बढ़ कर अब वे 20 हजार रुपए हो गए थे.

बैठते ही सेठ दीनदयाल ने कहा, ‘‘रघु, यह दिन सभी को देखना पड़ता?है… इस में रोने की क्या बात है. जग की रीत तो सभी को निभानी पड़ती है.’’

‘‘सेठजी, मगर बापू की उम्र ज्यादा नहीं थी. अगर वे थोड़े दिन और जीते, तो आप का कर्ज उतार जाते.’’

‘‘होनी को कौन टाल सकता है. जो होना था, हो गया. अब तो उन का क्रियाकर्म करना बाकी है और फिर मेरा कर्ज भी उतर जाएगा.’’

‘‘मगर सेठजी, क्रियाकर्म और आप के कर्ज के लिए रुपया आएगा कहां से?’’ रघु ने अपनी चिंता जताई.

‘‘इस में चिंता की क्या बात?है… तेरे पास जमीन है.’’

‘‘3 बीघा जमीन से क्या होता है…’’ रघु ने कहा, ‘‘आप तो जानते?हैं, घर में 6 लोग हैं… उन का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से होता है… उस पर यह क्रियाकर्म…’’

‘‘रघु, चिंता करने से कुछ नहीं होगा. तेरे बापू ने कभी चिंता नहीं की, जबकि उस ने तेरे लिए बहुत दुख देखे हैं…’’ सेठजी ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘क्या तू उन का अच्छी तरह क्रियाकर्म भी नहीं कर सकता? ऐसे में उन की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी? आत्मा बेचारी इधरउधर भटकती रहेगी.

‘‘इस से तू भी परेशान रहेगा और तेरे बालबच्चों समेत पूरे गांव वाले भी परेशान होंगे…’’ सेठजी ने रघु की नीयत भांपते हुए कहा, ‘‘रुपए की परवाह मत करना, मु?ो से बन पड़ा तो मैं ही दे दूंगा.’’

रघु सेठजी की बात सम?ा गया. वह उस की जमीन हड़पना चाहता था, ताकि वह जमीन ले कर उसी से उस जमीन में खेती करवा कर अच्छाखासा मुनाफा कमाए.

इसलिए रघु ने पूछा, ‘‘मगर आप मु?ो रुपए किस शर्त पर देंगे? मेरे पास तो कुछ भी देने को नहीं है?’’

‘‘अरे, रघु कैसी बात करता है, तेरे पास सबकुछ है. फिर तेरा बाप तेरे लिए 3 बीघा जमीन छोड़ गया है, उसे गिरवी रख कर रुपए ले जाना. जब रुपए आ जाएं, तो जमीन छुड़ा लेना,’’ सेठजी ने कहा, तो रघु सम?ा गया कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जिस दिन वह अपनी जमीन सेठ दीनदयाल से छुड़ा पाएगा.

वह सोच में डूब गया कि क्रियाकर्म करना जरूरी है. अगर वह ऐसा नहीं करेगा, तो गांव में कोई उस की मदद नहीं करेगा. यहां तक कि उसे गांव या जाति से बाहर कर दिया जाएगा.

रघु को खेतीबारी के लिए सभी का सहयोग चाहिए था. बिना सहयोग के खेतीबारी नहीं होती?है. बीज, पानी, मजदूर और रुपएपैसे, ये सब गांव से ही मिल सकते हैं.

यदि वह क्रियाकर्म करता है, तो उस की एकमात्र पूंजी वह जमीन सेठ के पास चली जाती है. तब वह एक मजदूर बन कर रह जाएगा. तब वह अपनी माली हालत कैसे सुधार पाएगा, क्योंकि उस पर कर्ज चुकाना और खेती करना कैसे मुमकिन है, यह बात वह अच्छी तरह जानता था.

वह सोच रहा था कि किसी तरह क्रियाकर्म टल जाता, तो उसे फायदा था. वह चाहता था कि मौत पर मौज न मनाई जाए. इस से गरीब आदमी मर जाता है. यह बात उस ने अपने कई दोस्तों को सम?ाई कि एक तो मरने वाले का दुख, ऊपर से कर्ज की मार. एक गरीब कैसे यह सह सकता है. मगर किसी ने उस की बात न मानी.

इस बारे में वह देर तक सोचता रहा, तो उसे लगा कि क्रियाकर्म न करना ही अच्छा है. मगर वह गांव वालों को नाराज भी नहीं करना चाहता था, इसलिए उस ने कोई बीच का रास्ता निकालने की सोची.

आखिरकार रघु को एक उपाय सूझ गया. वह बहुत खुश हुआ. उस ने पंडित रामसुख से बात की. फिर उन से अस्थि विसर्जन का मुहूर्त निकलवाया और तब हरिद्वार जाने की तैयारी करने लगा.

यह बात सुन कर गांव वाले बड़े खुश हुए कि चलो, रघु अपने बापू की अस्थियां गंगा में बहाने ले जा रहा है, इसलिए सभी ने उसे धूमधाम से विदाई दी. जिस से जो बन पड़ा, वह दिया, क्योंकि वह पहला आदमी था, जो पिता की अस्थियां मरने के तुरंत बाद हरिद्वार ले जा रहा था.

रघु बस में बैठ कर हरिद्वार चला गया. इस बात को तकरीबन 8 दिन हो गए, मगर रघु लौट कर न आया, जबकि उस के बापू के क्रियाकर्म का एक दिन बाकी रह गया था. इस वजह से सेठ दीनदयाल और पंडित रामसुख बहुत चिंता में थे.

उन्होंने बहुत सोचसम?ा कर चौपाल पर गांव वालों की एक बैठक बुलाई, जहां पर यह फैसला होना था कि रघु के बाप के क्रियाकर्म का क्या होगा? अगर रघु नहीं आया, तो क्या किया जाएगा?

पंडितजी अपनी दानदक्षिणा की चिंता में थे. उन्हें क्रियाकर्म के दिन पलंग, बिस्तर वगैरह मिलना था, जबकि सेठ दीनदयाल की निगाह रघु की 3 बीघा जमीन पर थी.

गांव वाले इसलिए चिंता में डूबे थे कि अगर रघु ने बापू का क्रियाकर्म न किया, तो गांव में उस की आत्मा कहर ढा सकती है, इसलिए गांव में चौपाल पर बैठक जमा थी.

तभी सामने से डाकिया आता दिखाई दिया. उस ने सेठजी, पंडित रामसुख और सभी गांव वालों के लिए 3 निमंत्रणपत्र दिए.

निमंत्रणपत्र में लिखा था, ‘गांव दैपालपुर को बड़ी खुशी के साथ सूचित किया जाता है कि मेरे बापू किसनाजी की आत्मा की शांति के लिए हरिद्वार के सर्वसिद्ध परम योगेश्वरजी महाराज की इच्छानुसार हरिद्वार में 18 जून, 2013 को क्रियाकर्म संपन्न होना तय हुआ है.

आप सब महानुभावों से करबद्ध निवेदन है कि यहां पधार कर मेरे बापू की आत्मा को मोक्ष प्रदान करने में सहयोग करें.

एक शोकाकुल पुत्र का निवेदन.

रघु,

गांव दैपालपुर,

हाल मुकाम,

हर की पौड़ी,

हरिद्वार.’

निमंत्रणपत्र पढ़ कर सेठजी और पंडितजी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. मगर गांव वाले खुश थे कि चलो, रघु अपने पिता का क्रियाकर्म भी हरिद्वार में कर रहा है.

इधर रघु खुश था कि मौत पर मौज मनाने वालों की इच्छा पूरी नहीं हो पाई, क्योंकि वे 8 सौ किलोमीटर दूर आने से तो रहे. साथ ही, उस की जिंदगीभर की कमाई देने वाली जमीन भी लुटने से बच गई.

मुहिम : जमींदार बाबू का घोड़ा

देश में बदलाव की नई बयार बह रही थी और जाहिर है कि हर नई हवा का असर पहलेपहल शहरों और उन के नजदीक के गांवों तक आता है. इसी तरह यह असर समोहा गांव तक भी आया और जहां पहले जमींदार और उन के चुनिंदा कारिंदे ही थोड़ेबहुत पढ़ेलिखे थे, वहां अब आबादी का 60 फीसदी हिस्सा पढ़लिख गया था.

अब तो गांव की लड़कियां भी पढ़नेलिखने में काफी आगे निकल गई थीं. यहां तक कि बैजू मास्टर की बेटी कांती पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी काफी आगे निकल गई. उसे लंबी दौड़ में कमिश्नरी लैवल पर इनाम मिला. जब वह सवेरे सड़क पर दौड़ लगाती, तो साथ में 3-4 और लड़कियां भी होतीं.

लड़कियों की देखादेखी एक महीने बाद लड़कों ने भी इसी उछलकूद में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी.

गांव के बाहर मैदान में 2 खंभे गाड़े गए, जिन में सांझ को वौलीबौल का नैट बांधा जाता और खेल चालू हो जाता. छोटेछोटे बच्चे जमा हो कर ताली पीटते. गांव की सारी रौनक ही जैसे वहां जमा हो जाती.

पुराने जमींदार शिवधर सिंह का पोता अनिल इस आयोजन की जान होता था. लंबा, छरहरा, गोरा, सलोने चेहरे वाला अनिल पढ़ाई के मामले में भी किसी से पीछे नहीं था.

पहले तो लड़कियों की दौड़ वगैरह पर गांव वालों ने नाकभौं चढ़ाई और कहा, ‘यह उलटा नाच किसी भले काम के लिए नहीं हो रहा है.’

मगर जब लड़कों का खेल क्लब तैयार हो गया और उस क्लब की अगुआई अनिल करने लगा, तब जमींदार साहब को भी मजबूरन कहना पड़ा, ‘खेलकूद से तंदुरुस्ती बनती है और नौकरी वगैरह में भी काफी सहूलियत हो जाती?है.

‘हमारा अनिल तो शुरू से ही पुलिस अफसर बनने लायक लगता है. अब खेलकूद की वजह से तो वह सीधे कप्तानी करेगा.’

हालांकि जब केवल लड़कियां ही खेलकूद में दिलचस्पी लेती थीं, तब उन का कहना था कि यह सब लड़कियां बिगड़ कर रहेंगी. सालभर में भागमभाग न लग जाए, तो देखना.

गांव के बहुतेरे लोगों की भी यही राय थी. वे लड़कियों को घर की दहलीज से बाहर नहीं देखना चाहते थे. मगर खुलेआम राय जाहिर करना उन के बस की बात नहीं थी और छिप कर चलने वाली चर्चा भला कहीं रुक पाती है? यहां भी कैसे रुकती? ऐसे लोगों का हालांकि खेलकूद से कोई वास्ता नहीं था, मगर कुढ़ने से तो था.

यह कुढ़न तब और बढ़ गई, जब एक ही मैदान में लड़कियों का भी खेल का अभ्यास शुरू हो गया.

अनिल ने घर आ कर बैजू मास्टर की बेटी कांती को उसी मैदान में खेल के अभ्यास का न्योता देते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी देखादेखी लड़कों में भी खेल भावना जागी है. अगर तुम सभी वहां खेलो, तो खेल का लैवल उठ सकेगा. हर तरफ लड़केलड़कियों की बराबरी की बात होती है, इसलिए बराबरी के जमाने में भेदभाव की क्या जरूरत?’’

मास्टर हो जाने के बावजूद बैजू मास्टर पुराने समय के असर वाले और जमींदार का दबदबा देखे हुए इनसान थे. यह बात और थी कि उन्होंने नए जमाने की हवा को पहचाना था.

गांव में पहलेपहल बेटी को ऊंची तालीम दी थी और नई हवा को वे दकियानूसी निगाह से न देख कर समाज के लिए कल्याणकारी मानते थे.

उन्होंने अनिल की बात मान ली. कांती ने भी खुशीखुशी अनिल की पेशकश का स्वागत किया. उस के बाद कांती के हाथ की बनी चाय पी कर जब अनिल चला गया, तो दलित तबके के बैजू मास्टर का रोमरोम पुलक रहा था. उन्हें लग रहा था कि सचमुच नई हवा में दम है, वरना उन की छुअन से भी परहेज बरतने वाले जमींदार का पोता यहां चाय कैसे पीता?

बैजू मास्टर को कई लोग आगाह कर चुके थे कि लड़कों के साथ लड़की का इतना घुलनामिलना, मेलमुहब्बत ठीक नहीं है. लड़के का कुछ बिगड़ता नहीं, जबकि लड़की बरबाद हो जाती है. मगर मास्टर साहब को कांती पर भरोसा था. उन्हें अनिल की शराफत पर भी पूरा यकीन था.

अनिल और कांती दोनों ने एकसाथ फर्स्ट डिवीजन में एमए का इम्तिहान पास किया. दोनों एकदूसरे को गहराइयों से चाहने लगे. लेकिन उन की चाहत में छिछोरापन न था.

वे थके पंछी की तरह अब जैसे अलसा कर एक डाल पर ही बैठने को अधीर हो उठे. आंखों की भाषा कब अधरों तक आई, यह तो नहीं कहा जा सकता, मगर जब कांती का नाम पीसीएस में आ गया, तो उस ने अनिल से शादी करने का बाकायदा ऐलान कर दिया.

गांव में कांती के पीसीएस बनने की खबर फैलने से पहले जमींदार परिवार के साथ एक दलित लड़की के ब्याह की बात गांवभर में गूंज गई.

जिसे देखो, उस के मुंह से यही चर्चा, लेकिन इतने नए विचार अभी गांव वालों के गले नहीं उतर पा रहे थे.

यह खबर जमींदार बाबू शिवधर सिंह तक पहुंची. उन्हें लगा कि जन्मभर की ठकुरा शान एक ही बार में जिबह हुई जा रही है.

उन्होंने कहा, ‘‘अनिल की यह हैसियत नहीं कि वह मेरी इच्छा के खिलाफ चूं तक कर सके. जिस दिन ऐसी नौबत आएगी, उस दिन मेरी बंदूक में 2 गोलियां मौजूद होंगी.’’

इन गोलियों की चर्चा बैजू मास्टर तक पहुंची और उन्होंने अनिल से ब्याह की दिली इच्छा रखते हुए भी खूनखराबे के डर के चलते कांती से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा. पर न तो कांती अपने फैसले से टस से मस हुई और न ही अनिल.

अनिल से उस के दादा शिवधर सिंह ने कहा, ‘‘अभी तू मेरी जायदाद की बदौलत अंगरेजी बोलता है. अगर तू ने यह जिद न छोड़ी, तो मैं तुझे दानेदाने को मुहताज कर दूंगा.

‘‘वह भुक्खड़ परिवार की बेटी, जो जायदाद के चलते ही तेरे पीछे पड़ी है, खुद तुझ से बात करना बंद कर देगी. कुछ समझ? लाठी भी नहीं टूटेगी, सांप भी मर जाएगा. 2 गोलियां बरबाद करने से क्या फायदा?’’

तब अनिल ने पक्के इरादे के साथ कहा, ‘‘दादाजी, अब तो आप समझदारी की बात करने लगे हैं. गोली से चल कर जतन पर उतर आए हैं.

‘‘मेरी एक बात सुन लीजिए… न तो मुझे और न कांती को आप की जायदाद से एक पैसा चाहिए. दुनिया में इतने सारे लोग क्या जायदाद ले कर ही पैदा होते हैं? अपने हाथपांव का भरोसा ही सब से बड़ा भरोसा होता है.

‘‘फिर भी आप की जानकारी के लिए बता दूं कि कांती डिप्टी कलक्टरी पास कर चुकी?है और मुझे भी कहीं न कहीं दो रोटियों का जुगाड़ हो ही जाएगा. मैं ऐसी जगह को दूर से ही सलाम करता हूं,’’ यह कह कर वह वहां से तीर की तरह से निकल आया.

अनिल जाने को तो चला गया, पर जमींदार बाबू के दिल को हिला गया.

जमींदार के साथसाथ वे ममता से भरे दादा भी थे, जिन्होंने बेटे के न रहने पर पोते की परवरिश की थी. उन का दिल पोते के प्रेम और मर्यादा दोनों की तुलना बन गया.

लेकिन थोड़ी ही देर में वे एक निश्चय पर पहुंच गए. उन्होंने अपनी राइफल कंधे पर टांगी. उन के सिर पर पगड़ी थी और पैर घोड़े की रकाब पर थे.

इधर बैजू मास्टर के घर में अनिल कह रहा था, ‘‘मुझे दादाजी ने जायदाद से बेदखल कर दिया है. मैं इस समय केवल अनिल हूं, जो कांती को प्यार और विश्वास की छांव जरूर दे सकता?हूं, लेकिन जायदाद नहीं.

‘‘आप लोग इस मुगालते में भी न रहिएगा कि मैं कांती के डिप्टी कलक्टरी में आ जाने की वजह से शादी के लिए तैयार हूं. दरअसल, यह बात महीनों पहले हम दोनों में तय थी. आज अफसरी पाने की खुशी में इस के मुंह से निकल गई.’’

बैजू मास्टर मुसकराते हुए बोले, ‘‘यह पीसीएस में आई है, तो तुम आईएएस में आओगे. जब तुम्हारे साथ जायदाद थी, तब जरूर मुझे हिचक हो रही थी कि लोग कहेंगे, मास्टर ने जायदाद के लोभ में लड़की का संबंध अनिल के साथ करना चाहा. मगर अब मुझे इस रिश्ते पर कोई एतराज नहीं है.

‘‘जमींदार बाबू बड़े आदमी हैं, उन के पास जायदाद है, पर मेरे पास भी तुम्हारे लिए नमक, रोटी की कमी नहीं है. उन्हें ठसक ज्यादा प्यारी है और मुझे औलाद की खुशी.’’

तभी जमींदार बाबू का घोड़ा सामने से आता दिखाई पड़ा. उन की फरफराती हुई सफेद मूंछें एक दहशत सी पैदा कर रही थीं.

राइफल देख कर एकबारगी तो बैजू मास्टर सिर से पैर तक कांप गए. मगर दूसरे ही पल उन्होंने सोचा कि मैं पत्नी समेत कांती और अनिल के आगे आकर उन की हिफाजत करूंगा. अपने जीतेजी औलाद की तमन्नाओं का खून नहीं होने दूंगा.

जमींदार बाबू ने पास आ कर घोड़े पर बैठेबैठे ही कहा, ‘‘मैं और मेरी जायदाद दोनों से ही तो सब को चिढ़ है. मेरे दिल में जैसे औलाद का दर्द ही नहीं है… और मेरी जायदाद जैसे तुम लोगों की है ही नहीं. मुझे कौन छाती पर लाद कर ले जानी है… आज मरा कल दूसरा दिन… 70 तो पार कर ही चुका हूं.’’

फिर कुछ पल रुक कर वे आगे बोले, ‘‘बैजू, वाकई मास्टर तो तुम्हीं

हो. हमारे पोते और बहू दोनों को अपनी ओर मिला कर मुझ बूढ़े को अकेला छोड़ दिया.

‘‘अरे, पहले कभी बात तो चलाई होती… इतनी जल्दी तो कोई अदालत भी फैसला नहीं सुना सकती. अब अपनी गलती की जिम्मेदारी मुझ पर डाल रहे हो.’’

उन्होंने जेब में हाथ डाल कर एक अशरफी निकाली और बोले, ‘‘ले बहू, अभी एक से ही सब्र कर… मेरी संदूकची की चाबी तो यही हजरत कहीं रख आए हैं. बहू की दिखाई भी ढंग की नहीं होने दी,’’ फिर वह अनिल से डपट कर बोले, ‘‘ले राइफल, और इस मुबारक मौके पर दनादन फायर कर… और घर चल कर मेरी चाबी भी दे. आज ही ब्याह होना है और सारा इंतजाम करना है.’’

अनिल ने उन के पैर छूने को हाथ बढ़ाए, तो वे रोब से बोले, ‘‘पहले फायर कर…’’

बैजू मास्टर और कांती के साथ उस की मां भी उन के पैरों पर झाकी थी. उन्हें जमींदार के दिल में उगे एक सच्चे इनसान ने बरबस झांका दिया था.

जमींदार बाबू के आंसू बह रहे थे और रुंधे गले से क्या आशीर्वाद दे रहे थे, इसे फायरों की ‘तड़तड़’ की आवाज के चलते किसी ने न सुना.

अगले पल कांती के मातापिता और जमींदार बाबू के चेहरे पर एक जंग जीतने जैसी खुशी नजर आ चुकी थी. ऐसा लग रहा था, जैसे वे एक नई मुहिम पर जाने के लिए कदमताल कर रहे हों, कुछ ही पलों में उन के कदम आगे बढ़ने वाले हों.

Valentine’s Day 2024- घरौंदा: कल्पना की ये कैसी उड़ान

विमी के यहां से लौटते ही अचला ने अपने 2 कमरों के फ्लैट का हर कोने से निरीक्षण कर डाला था.विमी का फ्लैट भी तो इतना ही बड़ा है पर कितना खूबसूरत और करीने का लगता है.

छोटी सी डाइनिंग टेबल, बेडरूम में सजा हुआ सनमाइका का डबलबेड, खिड़कियों पर झूलते भारी परदे कितने अच्छे लगते हैं. उसे भी अपने घर में कुछ तबदीली तो करनी ही होगी. फर्नीचर के नाम पर घर में पड़ी मामूली कुरसियां और खाने के लिए बरामदे में रखी तिपाई को देखते हुए उस ने निश्चय कर ही डाला था. चाहे अशोक कुछ भी कहे पर घर की आवश्यक वस्तुएं वह खुद खरीदेगी. लेकिन कैसे? यहीं पर उस के सारे मनसूबे टूट जाते थे.

तनख्वाह कटपिट कर मिली 1 हजार रुपए. उस में से 400 रुपए फ्लैट का किराया, दूध, राशन. सबकुछ इतना नपातुला कि 10-20 रुपए बचाना भी मुश्किल. क्या छोड़े, क्या जोड़े? अचला का सिर भारी हो चला था.

कालेज में गृह विज्ञान उस का प्रिय विषय था. गृहसज्जा में तो उस की विशेष रुचि थी. तब कितनी कल्पनाएं थीं उस के मन में. जब अपना एक घर होगा, तब वह उसे हर कोने से निखारेगी. पर अब…

उस दिन उस ने सजावट के लिए 2 मूर्तियां लेनी चाही थीं, पर कीमत सुनते ही हैरान रह गई, 500 रुपए.

अशोक धीमे से मुसकरा कर बोला था, ‘‘चलो, आगे बढ़ते हैं, यह तो महानगर है. यहां पानी के गिलास पर भी पैसे खर्च होते हैं, समझीं?’’

तब वह कुछ लजा गई थी. हंसी खुद पर भी आई थी.

उसे याद है, शादी से पहले यह सुन कर कि पति एक बड़ी फर्म में है, हजार रुपए तनख्वाह है, बढि़या फ्लैट है. सबकुछ मन को कितना गुदगुदा गया था. महानगर की वैभवशाली जिंदगी के स्वप्न आंखों में झिलमिला गए थे.

‘तू बड़ी भाग्यवान है, अची,’ सखियों ने छेड़ा था और वह मधुर कल्पनाओं में डूबती चली गई थी.

शादी में जो कुछ भारी सामान मिला था, उसे अशोक ने जिद कर के घर पर ही रखवा दिया था. उस ने बड़े शालीन भाव से कहा था, ‘‘इतना सब कहां ढोते रहेंगे, यहीं रहने दो. अंजु के विवाह में काम आ जाएगा. मां कहां तक खरीदेंगी. यही मदद सही.’’

सास की कृतज्ञ दृष्टि तब कुछ सजल हो आई थी. अचला को भी यही ठीक लगा था. वहां उसे कमी ही क्या है? सब नए सिरे से खरीद लेगी.

पर पति के घर आने के बाद उस के कोमल स्वप्न यथार्थ के कठोर धरातल से टकरा कर बिखरने लगे थे.

अशोक की व्यस्त दिनचर्या थी. सुबह 8 बजे निकलता तो शाम को 7 बजे ही घर लौटता. 2 कमरों में इधरउधर चहलकदमी करते हुए अचला को पूरा दिन बिताना पड़ता था. उस पूरे दिन में वह अनेक नईनई कल्पनाओं में डूबी रहती. इच्छाएं उमड़ पड़तीं. इस मामूली चारपाई के बदले यहां आधुनिक डिजाइन का डबलबेड हो, डनलप का गद्दा, ड्राइंगरूम में एक छोटा सा दीवान, जिस पर मखमली कुशन हो. रसोईघर के लिए गैस का चूल्हा तो अति आवश्यक है, स्टोव कितना असुविधा- जनक है. फिर वह बजट भी जोड़ने लगती थी, ‘कम से कम 5 हजार तो चाहिए ही इन सब के लिए, कहां से आएंगे?’

अपनी इन इच्छाओं की पूर्ति के लिए उस ने मन ही मन बहुत कुछ सोचा. फिर एक दिन अशोक से बोली, ‘‘सुनो, दिन भर घर पर बैठीबैठी बोर होती रहती हूं. कहीं नौकरी कर लूं तो कैसा रहे? दोचार महीने में ही हम अपना फ्लैट सारी सुखसुविधाओं से सज्जित कर लेंगे.’’

पर अशोक उसी प्रकार अविचलित भाव से अखबार पर नजर गड़ाए रहा. बोला कुछ नहीं.

‘‘तुम ने सुना नहीं क्या? मैं क्या दीवार से बोल रही हूं?’’ अचला का स्वर तिक्त हो गया था.

‘‘सब सुन लिया. पर क्या नौकरी मिलनी इतनी आसान है? 300-400 रुपए की मिल भी गई तो 100-50 तो आनेजाने में ही खर्च हो जाएंगे. फिर जब पस्त हो कर शाम को घर लौटोगी तो यह ताजे फूल सा खिला चेहरा चार दिन में ही कुम्हलाया नजर आने लगेगा.’’

अशोक ने अखबार हटा कर एक भाषण झाड़ डाला.

सुन कर अचला का चेहरा बुझ गया. वह चुपचाप सब्जी काटती रही. अशोक ने ही उसे मनाने के खयाल से फिर कहा, ‘‘फिर ऐसी जरूरत भी क्या है तुम्हें नौकरी की? छोटी सी हमारी गृहस्थी, उस के लिए जीतोड़ मेहनत करने को मैं तो हूं ही. फिर कम से कम कुछ दिन तो सुखचैन से रहो. अभी इतना तो सुकून है मुझे कि 8-10 घंटे की मशक्कत के बाद घर लौटता हूं तो तुम सजीसंवरी इंतजार करती मिलती हो. तुम्हें देख कर सारी थकान मिट जाती है. क्या इतनी खुशी भी तुम अब छीन लेना चाहती हो?’’

अशोक ने धीरे से अचला का हाथ थाम कर आगे फिर कहा, ‘‘बोलो, क्या झूठ कहा है मैं ने?’’

तब अचला को लगा कि उस के मन में कुछ पिघलने लगा है. वह अपना सिर अशोक के कंधों पर रख कर मधुर स्वर में बोली, ‘‘पर तुम यह क्यों नहीं सोचते कि मैं दिन भर कितनी बोर हो जाती हूं? 6 दिन तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, रविवार को कह देते हो कि आज तो आराम का दिन है. मेरा क्या जी नहीं होता कहीं घूमनेफिरने का?’’

‘‘अच्छा, तो वादा रहा, इस बार तुम्हें इतना घुमाऊंगा कि तुम घूमघूम कर थक जाओ. बस, अब तो खुश?’’

अचला हंस पड़ी. उस के कदम तेजी से रसोईघर की तरफ मुड़ गए. बातचीत में वह भूल गई थी कि स्टोव पर दूध रखा है.

‘ठीक है, न सही नौकरी. जब अशोक को बोनस के रुपए मिलेंगे तब वह एक ही झोंक में सब खरीद लेगी,’ यह सोच कर उस ने अपने मन को समझा लिया था.

तभी अशोक ने उसे आश्चर्य में डालते हुए कहा, ‘‘जानती हो, इस बार हम शादी की पहली वर्षगांठ कहां मनाएंगे?’’

‘‘कहां?’’ उस ने जिज्ञासा प्रकट की.

‘‘मसूरी में,’’ जवाब देते हुए अशोक ने कहा.

‘‘क्या सच कह रहे हो?’’ अचला ने कौतूहल भरे स्वर में पूछा.

‘‘और क्या झूठ कह रहा हूं? मुझे अब तक याद है कि हनीमून के लिए जब हम मसूरी नहीं जा पाए थे तो तुम्हारा मन उखड़ गया था. यद्यपि तुम ने मुंह से कुछ कहा नहीं था, तो भी मैं ने समझ लिया था. पर अब हम शादी के उन दिनों की याद फिर से ताजा करेंगे.’’

कह कर अशोक शरारत से मुसकरा दिया. अचला नईनवेली वधू की तरह लाज की लालिमा में डूब गई.

‘‘पर खर्चा?’’ वह कुछ क्षणों बाद बोली.

‘‘बस, शर्त यही है कि तुम खर्चे की बात नहीं करोगी. यह खर्चा, वह खर्चा… साल भर यही सब सुनतेसुनते मैं तंग आ गया हूं. अब कुछ क्षण तो ऐसे आएं जब हम रुपएपैसों की चिंता न कर बस एकदूसरे को देखें, जिंदगी के अन्य पहलुओं पर विचार करें.’’

‘‘ठीक है, पर तुम तनख्वाह के रुपए मत…’’

‘‘हां, बाबा, सारी तनख्वाह तुम्हें मिल जाएगी,’’ अशोक ने दोटूक निर्णय दिया.

अचला का मन एकदम हलका हो गया. अब इस बंधीबंधाई जिंदगी में बदलाव आएगा. बर्फ…पहाड़…एकदूसरे की बांहों में बांहें डाले वे जिंदगी की सारी परेशानियों से दूर कहीं अनोखी दुनिया में खो जाएंगे. स्वप्न फिर सजने लगे थे.

रेलगाड़ी का आरक्षण अशोक ने पहले से ही करा लिया था. सफर सुखद रहा. अचला को लगा, जैसे शादी अभी हुई है. पहली बार वे लोग हनीमून के लिए जा रहे हैं. रास्ते के मनोरम दृश्य, ऊंचे पहाड़, झरने…सबकुछ कितना रोमांचक था.

उन्होंने देहरादून से टैक्सी ले ली थी. होटल में कमरा पहले से ही बुक था. इसलिए उन्हें मालूम ही नहीं हुआ कि वे इतना लंबा सफर कर के आए हैं. कमरे में पहुंचते ही अचला ने खिड़की के शीशों से झांका. घाटी में सिमटा शहर, नीलीश्वेत पहाडि़यां, घने वृक्ष बड़े सुहावने दिख रहे थे. तब तक बैरा चाय की ट्रे रख गया.

‘‘खाना खा लो, फिर घूमने चलेंगे,’’ अशोक ने कहा और चाय खत्म कर के वह भी उस पहाड़ी सौंदर्य को मुग्ध दृष्टि से देखने लगा.

खाना भी कितना स्वादिष्ठ था. अचला हर व्यंजन की जी खोल कर तारीफ करती रही. फिर वे दोनों ऊंचीनीची पहाडि़यां चढ़ते, हंसी और ठिठोली के बीच एकदूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ते, कलकल करते झरने और सुखद रमणीय दृश्य देखते हुए काफी दूर चले गए. फिर थोड़ी देर दम लेने के लिए एक ऊंची चट्टान पर कुछ क्षणों के लिए बैठ गए.

‘‘सच, मैं बहुत खुश हूं, बहुत…’’

‘‘हूं,’’ अशोक उस की बिखरी लटों को संवारता रहा.

‘‘पर, एक बात तो तुम ने बताई ही नहीं,’’ अचला को कुछ याद आया.

‘‘क्या?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘खर्चने को इतना पैसा कहां से आया? होटल भी काफी महंगा लगता है. किराया, खानापीना और घूमना, यह सब…’’

‘‘तुम्हें पसंद तो आया. खर्च की चिंता क्यों है?’’

‘‘बताओ न. क्यों छिपा रहे हो?’’

‘‘तुम्हें मैं ने बताया नहीं था. असल में बोनस के रुपए मिले थे.’’

‘‘क्या? बोनस के रुपए?’’ अचला बुरी तरह चौंक गई, ‘‘पर तुम तो कह रहे थे…’’ कहतेकहते उस का स्वर लड़खड़ा गया.

‘‘हां, 2 महीने पहले ही मिल गए थे. पर तुम इतना क्यों सोच रही हो? आराम से घूमोफिरो. बोनस के रुपए तो होते ही इसलिए हैं.’’

अचला चुप थी. उस के कदम तो अशोक के साथ चल रहे थे, पर मन कहीं दूर, बहुत दूर उड़ गया था. उस की आंखों में घूम रहा था वही 2 कमरों का फ्लैट. उस में पड़ी साधारण सी कुरसियां, मामूली फर्नीचर. ओफ, कितना सोचा था उस ने…बोनस के रुपए आएंगे तो वह घर की साजसज्जा का सब सामान खरीदेगी. दोढाई हजार में तो आसानी से पूरा घर सज्जित हो सकता था. पर अशोक ने सब यों ही उड़ा डाला. उसे खीज आने लगी अशोक पर.

अशोक ने कई बार टोका, ‘‘क्या सोच रही हो? यह देखो, बर्फ से ढकी पहाडि़यां. यही तो यहां की खासीयत है. जानती हो, इसीलिए मसूरी को पहाड़ों की रानी कहा जाता है.’’

पर अचला कुछ भी नहीं सुन पा रही थी. वह विचारों में डूबी थी, ‘अशोक ने उस के साथ यह धोखा क्यों किया? यदि वहीं कह देता कि बोनस के रुपयों से घूमने जा रहे हैं तो वह वहीं मना कर देती.’ उस का मन उखड़ता जा रहा था.

रात को भी वही खाना था, दिन में जिस की उस ने जी खोल कर तारीफ की थी. पर अब सब एकदम बेस्वाद लग रहा था. वह सोचने लगी, ‘बेमतलब कितना खर्च कर दिया. 100 रुपए रोज का कमरा, 40 रुपए में एक समय का खाना. इस से अच्छा तो वह घर पर ही बना लेती है. इस में है क्या. ढंग के मसाले तक तो सब्जी में पड़े नहीं हैं.’ उसे अब हर चीज में नुक्स नजर आने लगा था.

‘‘देखो, अब खर्च तो हो ही गया, क्यों इतना सोचती हो? रुपए और कमा लेंगे. अब जब घूमने निकले हैं तो पूरा आनंद लो.’’

रात देर तक अशोक उसे मनाता रहा था. पर वह मुंह फेरे लेटी रही. मन उखड़ गया था. उस का बस चलता तो उसी क्षण उड़ कर वापस चली जाती.

गुदगुदे बिस्तर पर पासपास लेटे हुए भी वे एकदूसरे से कितनी दूर थे. क्षण भर में ही सारा माहौल बदल गया. सुबह भी अशोक ने उसे मनाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘चलो, घूम आएं. तुम्हारी तबीयत बहल जाएगी.’’

‘‘कह दिया न, मुझे अब यहां नहीं रहना है. तुम जो भी रुपए वापस मिल सकें ले लो और चलो.’’

‘‘क्या बेवकूफों की तरह बातें कर रही हो. कमरा पहले से ही बुक हो गया है. किराया अग्रिम दिया जा चुका है. अब बहुत किफायत होगी भी तो खानेपीने की होगी. क्यों सारा मूड चौपट करने पर तुली हो?’’ अशोक के सब्र का बांध टूटने लगा था.

पर अचला चाह कर भी अब सहज नहीं हो पा रही थी. वे पहाडि़यां, बर्फ, झरने, जिन्हें देखते ही वह उमंगों से भर उठी थी, अब सब निरर्थक लग रहे थे. क्यों हो गया ऐसा? शायद उस के सोचने- समझने की दृष्टि ही बदल गई थी.

‘‘ठीक है, तुम यही चाहती हो तो रात की बस से लौट चलेंगे. अब आइंदा कभी तुम्हें यह कहने की जरूरत नहीं है कि घूमने चलो. सारा मूड बिगाड़ कर रख दिया.’’

दिन भर में अशोक भी चिड़चिड़ा गया. अचला उसी तरह अनमनी सी सामान समेटती रही.

‘‘अरे, इतनी जल्दी चल दिए आप लोग?’’ पास वाले कमरे के दंपती विस्मित हो कर बोले.

पर बिना कोई जवाब दिए, अपना हैंडबैग कंधे पर लटकाए अचला आगे बढ़ती चली गई. अटैची थामे अशोक उस के पीछे था. बस तैयार खड़ी मिली. अटैची सीट पर रख अशोक धम से बैठ गया.

देहरादून पहुंच कर वे दूसरी बस में बैठ गए. अशोक को काफी देर से खयाल आया कि गुस्से में उस ने शाम का खाना भी नहीं खाया था. उस ने घड़ी देखी, 1 बज रहा था. नींद में आंखें जल रही थीं. पर सोने की इच्छा नहीं थी, वह खिड़की पर बांह रख सिर हथेलियों पर टिकाए या तो सो गया था या सोने का बहाना कर रहा था.

आते समय कितना चाव था. पर अब पूरी रात क्षण भर के लिए भी वे सो नहीं पाए थे. दोनों ही सबकुछ भूल कर अपनेअपने खयालों में गमगीन थे. इस तरह वे परस्पर कटेकटे से घर पहुंचे.

सुबह अशोक का उतरा हुआ पीला चेहरा देख कर अचला सहम गई थी. शायद वह बहुत गुस्से में था. उसे अब अपने किए पर कुछ ग्लानि अनुभव हुई. उस समय तो गुस्से में उस की सोचनेसमझने की शक्ति ही लुप्त हो गई थी. पर अब लग रहा था कि जो कुछ हुआ, ठीक नहीं हुआ. कम से कम अशोक का ही खयाल रख कर उसे सहज हो जाना चाहिए था. कितने उत्साह से उस ने घूमने का प्रोग्राम बनाया था.

कमरे में घुसते ही थकान ने शरीर को तोड़ डाला था, कुरसी पर धम से गिर कर वह कुछ भूल गई थी. कुछ देर बाद ही खयाल आया कि अशोक ने रात भर से बात नहीं की है. कहीं बिना कुछ खाए आफिस न चला गया हो, फिर उठी ही थी कि देखा अशोक चाय बना लाया है.

‘‘उठो, चाय पियोगी तो थकान दूर हो जाएगी,’’ कहते हुए अशोक ने धीरे से उस की ठुड्डी उठाई.

अपने प्रति अशोक के इस विनम्र प्यार को देख वह सबकुछ भूल कर उस के कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी, ‘‘मुझे माफ कर दो. पता नहीं क्या हो जाता है.’’

‘‘अरे, यह क्या, गलती तो मेरी ही थी. यदि मुझे पता होता कि तुम्हें घर की चीजों का इतना अधिक शौक है तो घूमने का प्रोग्राम ही नहीं बनाते. अब ध्यान रखूंगा.’’

अशोक का स्नेह भरा स्वर उसे नहलाता चला गया. अपने 2 कमरों का घर आज उसे सारे सुखसाधनों से भरापूरा प्रतीत हो रहा था. वह सोचने लगी, ‘सबकुछ तो है उस के पास. इतना अधिक प्यार करने वाला, उस के सारे गुनाहों को भुला कर इतने स्नेह से मनाने वाला विशाल हृदय का पति पा कर भी वह अब तक बेकार दुखी होती रही है.’

‘‘नहीं, अब कुछ नहीं चाहिए मुझे. कुछ भी नहीं…’’ उस के होंठ बुदबुदा उठे. फिर अशोक के कंधे पर सिर रखे वह सुखद अनुभीति में खो गई.

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