Best of Manohar Kahaniya: लिवइन पार्टनर की मौत का राज

सौजन्य-मनोहर कहानियां

9 सितंबर, 2019 को अनीता अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. अगले दिन अपराह्न 2 बजे जब वह दिल्ली के लाजपत नगर में स्थित अपने फ्लैट में पहुंची तो वहां का खौफनाक मंजर देखते ही उस के मुंह से चीख निकल गई. उस के पैर दरवाजे पर ही ठिठक गए.

उस के लिवइन पार्टनर सुनील तमांग की लहूलुहान लाश फर्श पर पड़ी थी. उस की गरदन से खून निकल कर पूरे फर्श पर फैल चुका था, जो अब जम चुका था. अनीता ने सब से पहले अपने फ्लैट के मालिक ए.के. दत्ता को फोन कर इस घटना की जानकारी दी. ए.के. दत्ता पास की ही एक दूसरी कालोनी में रहते थे. लिहाजा कुछ देर में वह अपने लाजपत नगर वाले फ्लैट पर पहुंचे, जहां बुरी तरह घबराई अनीता उन का इंतजार कर रही थी.

सुनील की खून से सनी लाश देखने के बाद उन्होंने घटना की जानकारी दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को दी तो कुछ ही देर के बाद थाना अमर कालोनी के थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और घटनास्थल की जांच में जुट गए. उन्होंने डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

घटनास्थल की फोटोग्राफी और वहां पर मौजूद खून के धब्बों के नमूने एकत्र करने के बाद थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने तहकीकात शुरू की. मृतक सुनील की गरदन पर पीछे की तरफ से किसी तेज धारदार हथियार से जोरदार वार किया गया था, जिस से ढेर सारा खून निकल कर फर्श पर फैल गया था.

कमरे के सभी कीमती सामान अपनी जगह मौजूद थे, जिसे देख कर लगता था कि यह हत्या लूटपाट के लिए नहीं बल्कि रंजिशन की गई होगी. उन्होंने अनीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह और सुनील पिछले एक साल से इस फ्लैट में लिवइन पार्टनर के रूप में रह रहे थे. वह एक ब्यूटीपार्लर में काम करती थी, जबकि सुनील एक रेस्टोरेंट में कुक था. लेकिन कई महीने पहले किसी वजह से उस की नौकरी छूट गई थी.

कल रात साढ़े 11 बजे किसी जरूरी काम से वह अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी. रात को वह वहीं रुक गई थी. रात में उस ने फोन पर काफी देर तक सुनील से बातें की थीं.

आज दोपहर को वह यहां पहुंची तो देखा फ्लैट का दरवाजा खुला था और अंदर प्रवेश करते ही उस की नजर सुनील की लाश पर पड़ी थी. इस के बाद उस ने अपने मकान मालिक को फोन कर इस घटना के बारे में बताया तो उन्होंने यहां पहुंचने के बाद इस घटना की सूचना पुलिस को दी.

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थानाप्रभारी ने मकान मालिक ए.के. दत्ता से भी पूछताछ की तो उन्होंने भी वही बातें बताईं जो अनीता ने बताई थीं.

सारी काररवाई से निपटने के बाद थानाप्रभारी ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और थाने लौट कर सुनील की हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

इस केस की गुत्थी सुलझाने के लिए दक्षिणपूर्वी दिल्ली के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल ने कालकाजी के एसीपी गोविंद शर्मा की देखरेख में एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन, एसआई अभिषेक शर्मा, ईश्वर, आर.एस. डागर, एएसआई जगदीश, कांस्टेबल राजेश राय, मनोज, सज्जन आदि शामिल थे.

विरोधाभासी बयानों से हुआ शक

अगले दिन थानाप्रभारी ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई, ताकि वारदात की रात फ्लैट के आसपास घटने वाली सभी गतिविधियों की बारीकी से जांच की जा सके. साथ ही मृतक सुनील तमांग और अनीता के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स और सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांचपड़ताल करने के बाद थानाप्रभारी ने गौर किया कि अनीता के बयान विरोधाभासी थे. इसलिए अनीता को पुन: पूछताछ के लिए अमर कालोनी थाने बुलाया गया. उस से सघन पूछताछ की गई तो अनीता यही कहती रही कि वह रात साढ़े 11 बजे अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा गई थी, लेकिन वह वहां देर रात को क्यों गई, इस की वजह नहीं बता पाई.

पुलिस को लग रहा था कि वह झूठ पर झूठ बोल रही है. उस ने उस रात जिनजिन नंबरों पर बात की थी, उन के बारे में भी वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई और सुनील तमांग की हत्या में खुद के शामिल होने का जुर्म स्वीकार कर लिया.

उस ने बताया कि इस हत्याकांड में उस का भाई विजय छेत्री तथा जीजा राजेंद्र छेत्री भी शामिल थे. ये दोनों पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग शहर के रहने वाले थे. अनीता द्वारा अपने लिवइन पार्टनर की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकार करने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

बाकी आरोपियों विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार करने के लिए थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने एसआई अभिषेक शर्मा के नेतृत्व में एक टीम गठित की. यह टीम 13 सितंबर, 2019 को वेस्ट बंगाल के कालिंपोंग शहर पहुंच गई. स्थानीय पुलिस के सहयोग से दिल्ली पुलिस ने विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों से जब सुनील तमांग की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उन दोनों ने पुलिस को बरगलाने की काफी कोशिश की लेकिन बाद में जब उन्हें बताया गया कि अनीता गिरफ्तार हो चुकी है और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है, तो उन दोनों ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

वेस्ट बंगाल की स्थानीय कोर्ट में पेश करने के बाद दिल्ली पुलिस दोनों आरोपियों को ट्रांजिट रिमांड पर ले कर दिल्ली लौट आई.

अनीता, विजय और राजेंद्र से की गई पूछताछ तथा पुलिस की जांच के आधार पर इस हत्याकांड के पीछे की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है –

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अनीता मूलरूप से पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग की रहने वाली थी. करीब 5 साल पहले वह अपने पति से अनबन होने पर उसे छोड़ कर अपने सपनों को पंख लगाने के मकसद से दिल्ली आ गई थी. यहां उस की एक सहेली थी, जो बहुत शानोशौकत से रहती थी. वह सहेली जरूरत पड़ने पर उस की मदद भी कर दिया करती थी.

दरअसल, अनीता स्कूली दिनों से ही खुले विचारों वाली एक बिंदास लड़की थी. वह जिंदगी को अपनी ही शर्तों पर जीना चाहती थी, जबकि उस का पति एक सीधासादा युवक था. उसे अनीता का ज्यादा फैशनेबल होना तथा लड़कों से ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं था.

विपरीत स्वभाव होने के कारण शादी के थोड़े दिनों बाद ही वे एकदूसरे को नापसंद करने लगे थे. बाद में जब बात काफी बढ़ गई तो एक दिन अनीता ने पति को छोड़ दिया और वापस अपने मायके चली आई. कुछ दिन तो वह मायके में रही, फिर बाद में उस ने अपने पैरों पर खडे़ होने का फैसला कर लिया. और वह दिल्ली आ गई.

वह ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, महज 8वीं पास थी. छोटे शहर की होने और कम शिक्षित होने के बावजूद उस का रहने का स्टाइल ऐसा था, जिसे देख कर लगता था कि वह काफी मौडर्न है.

दिल्ली पहुंचने के बाद अनीता ने अपनी उसी सहेली की मदद से ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग ली. इस के बाद वह एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी करने लगी. नौकरी करने से उस की माली हालत अच्छी हो गई और जिंदगी पटरी पर आ गई.

इसी दौरान एक दिन उस की मुलाकात सुनील तमांग नाम के युवक से हुई जो नेपाल का रहने वाला था. उस की मां कुल्लू हिमाचल प्रदेश की थी. 28 वर्षीय सुनील दक्षिणी दिल्ली के साकेत में स्थित एक रेस्टोरेंट में कुक था.

दोनों एकदूसरे को चाहने लगे

कुछ दिनों तक दोस्ती के बाद वह सुनील को अपना दिल दे बैठी. सुनील अनीता की खूबसूरती पर पहले से ही फिदा था. एक दिन सुनील ने अनीता को अपने दिल की बात बता दी और कहा कि वह उसे दिलोजान से प्यार करता है. इतना ही नहीं, वह उस से शादी रचाना चाहता है.

अनीता उस के दिल की बात जान कर खुशी से झूम उठी. उस ने सुनील से कहा कि पहले कुछ दिनों तक हम लोग साथ रह लेते हैं. फिर घर वालों की रजामंदी से शादी कर लेंगे. इस की एक वजह यह भी थी कि अभी पहले पति से अनीता का तलाक नहीं हुआ था. तलाक के बाद ही दूसरी शादी संभव हो सकती थी.

कोई 4 साल पहले अनीता ने सुनील तमांग के साथ चिराग दिल्ली में किराए का मकान ले कर रहना शुरू कर दिया. दोनों एकदूसरे को पा कर बेहद खुश थे. सुनील अनीता का काफी खयाल रखता था. अनीता भी सुनील के साथ लिवइन में रह कर खुद को भाग्यशाली समझती थी.

सुनील न केवल देखने में स्मार्ट था, बल्कि एक अच्छे पार्टनर की तरह उस की प्रत्येक छोटीछोटी बात का विशेष ध्यान रखता था. अनीता भी सुनील की खुशियों का खूब खयाल रखती थी. वह अपनी तरफ से कोई ऐसा काम नहीं करती थी, जिस से सुनील की कोई भावना आहत हो.

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अनीता और सुनील 3 सालों तक चिराग दिल्ली स्थित इस मकान में रहे. इस बीच जब अनीता की पगार अच्छी हो गई तो वह चिराग दिल्ली से लाजपत नगर आ गई. यहां वह ए.के. दत्ता के फ्लैट में किराए पर रहने लगी. यहां उस का फ्लैट तीसरी मंजिल पर था.

इतने दिनों तक लिवइन रिलेशन में रहने के कारण दोनों के परिवार वाले भी उन के संबंधों से परिचित हो गए थे. अनीता का भाई विजय छेत्री जबतब कालिंपोंग से दिल्ली में उस के पास आता रहता था. उसे सुनील का व्यवहार पसंद नहीं था.

विजय ने अनीता की पसंद पर ऐतराज तो नहीं जताया लेकिन एक दिन उस ने सुनील की गैरमौजूदगी में अपने मन की बात अनीता को बता दी. चूंकि अनीता सुनील से प्यार करती थी, इसलिए उस ने भाई से सुनील का पक्ष लेते हुए कहा कि सुनील दिल का बुरा नहीं है लेकिन फिर भी अगर सुनील की कोई बात उसे अच्छी नहीं लगती है तो वह उसे कह कर इस में सुधार लाने का प्रयास करेगी.

विजय ने जब देखा कि उस की बहन ने उस की बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है तो उस ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी. सुनील और अनीता को विजय की बातों से जरा भी फर्क नहीं पड़ा था.

लेकिन कहते हैं कि हर आदमी का वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है. सुनील तमांग के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. किसी बात को ले कर सुनील की रेस्टोरेंट से नौकरी छूट गई. नौकरी छूट जाने की वजह से वह परेशान तो हुआ लेकिन अनीता अच्छा कमा रही थी, इसलिए घर का खर्च आराम से चल जाता था.

हालांकि कुछ दिन बाद अनीता सुनील को समझाबुझा कर जल्दी कहीं नौकरी खोजने का दबाव बना रही थी, मगर 6 महीने तक सुनील को उस के मनमुताबिक नौकरी नहीं मिली.

धीरेधीरे अनीता को ऐसा लगने लगा जैसे सुनील जानबूझ कर नौकरी नहीं करना चाहता है और अब वह उस के ही पैसों पर मौज करना चाहता है. ऐसा विचार मन में आते ही उस ने एक दिन तीखे स्वर में सुनील से कहा, ‘‘सुनील, या तो तुम जल्दी कहीं पर नौकरी ढूंढ लो अन्यथा मेरा साथ छोड़ कर यहां से कहीं और चले जाओ.’’

हालांकि अनीता ने यह बात सुनील को समझाने के लिए कही थी, लेकिन उस दिन के बाद सुनील के तेवर बदल गए. उस ने अनीता से कहा कि वह उसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा और फिर भी अगर वह उसे जबरन खुद से दूर करने की कोशिश करेगी तो उस के पास अंतरंग क्षणों के कई फोटो मोबाइल पर पड़े हैं, जिन्हें वह उस के सगेसंबंधियों के मोबाइल पर भेज देगा, जिस के बाद वह कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी.

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रुपयों की तंगी तथा सुनील की धमकी को सुन कर अनीता कांप उठी. इस घटना के कुछ दिनों बाद तक अनीता ने सुनील को नौकरी ढूंढने पर जोर देती रही, लेकिन सुनील पर इस का कोई फर्क नहीं पड़ा.

अंत में अनीता ने कालिंपोंग स्थित अपने भाई विजय को अपनी मुसीबत के बारे में बताया तो विजय गुस्से से भर उठा. उस ने अनीता से कहा कि वह जल्द ही सुनील नाम के इस कांटे को उस की जिंदगी से निकाल फेंकेगा.

भाई ने बनाया हत्या का प्लान

भाई की बात सुन कर अनीता को राहत महसूस हुई. विजय को सुनील पहले से नापसंद था. अब जब अनीता खुद ही उस से छुटकारा पाना चाहती थी तो उस ने अपने रिश्ते के बहनोई राजेंद्र के साथ मिल कर सुनील को मौत की नींद सुलाने की योजना तैयार कर ली. इस के बाद उस ने अनीता को अपनी योजना के बारे में बताया तो अनीता ने दोनों को दिल्ली पहुंचने के लिए कह दिया.

7 सितंबर, 2019 को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पश्चिम बंगाल के कालिंपोंग से नई दिल्ली पहुंचे और पहाड़गंज के एक होटल में रुके. अनीता फोन से बराबर भाई के संपर्क में थी. लेकिन सुनील अनीता और विजय के षडयंत्र से अनजान था. उसे सपने में भी गुमान नहीं था कि अनीता उस की ज्यादतियों से तंग आ कर उस का कत्ल भी करवा सकती है.

9 सितंबर को विजय छेत्री और राजेंद्र छेत्री पूर्वनियोजित योजना के अनुसार रात के 10 बजे अनीता के फ्लैट पर पहुंचे. अनीता दोनों से ऐसे मिली जैसे उन्हें पहली बार देखा हो. सुनील भी उन से घुलमिल कर बातें करने लगा.

साढ़े 11 बजे उस ने अचानक सब को बताया कि उसे अभी इसी वक्त अपनी सहेली से मिलने ग्रेटर नोएडा जाना है. इस के बाद वह तैयार हो कर फ्लैट से बाहर निकल गई.  रात में अनीता सुनील के मोबाइल पर काल कर के उस से 2-3 घंटे तक मीठीमीठी बातें करती रही.

तड़के करीब 4 बजे जैसे ही सुनील सोया, तभी विजय ने राजेंद्र के साथ मिल कर उस की गरदन पर चाकू से वार किया. थोड़ी देर तड़पने के बाद जब उस का शरीर ठंडा पड़ गया तो दोनों वहां से आनंद विहार के लिए निकल गए, क्योंकि वहां से उन्हें कालिंपोंग के लिए ट्रेन पकड़नी थी.

आनंद विहार जाने के दौरान रास्ते में विजय ने खून से सना चाकू एक सुनसान जगह पर फेंक दिया. आनंद विहार स्टेशन से रेलगाड़ी द्वारा वे कालिंपोंग पहुंच गए.

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इन से विस्तार से पूछताछ करने के बाद अगले दिन 16 सितंबर, 2019 को थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन ने सुनील तमांग की हत्या के आरोप में उस की लिवइन पार्टनर अनीता, विजय छेत्री तथा राजेंद्र छेत्री को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से तीनों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

मामले की जांच थानाप्रभारी अनंत कुमार गुंजन कर रहे थे.

Romantic Story in Hindi: भोर- भाग 2: क्यों पति का मजाक उड़ाती थी राजवी?

Writer- Kalpana Mehta

कई दिन दोनों खूब घूमे. शौपिंग, पार्टी जो भी राजवी का मन किया अक्षय ने उसे पूरा किया. फिर शुरू हुई दोनों की रूटीन लाइफ. वैसे भी सपनों की दुनिया में सब कुछ सुंदर सा, मनभावन ही होता है. जिंदगी की हकीकत तो वास्तविकता के धरातल पर आ कर ही पता चलती है. एक दिन अक्षय ने फरमाइश की, ‘‘आज मेरा इंडियन डिश खाने को मन कर रहा है.’’

‘‘इंडियन डिश? यू मीन दालचावल और रोटीसब्जी? इश… मुझे ये सब बनाना नहीं आता. मैं तो अपने घर में भी खाना कभी नहीं बनाती थी. मां बोलती थीं तब भी नहीं. और वैसे भी पूरा दिन रसोई में सिर फोड़ना मेरे बस की बात नहीं. मैं उन लड़कियों में नहीं, जो अपनी जिंदगी, अपनी खुशियां घरेलू कामकाज के जंजालों में फंस कर बरबाद कर देती हैं.’’

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चौंक उठा अक्षय. फिर भी संभलते हुए बोला, ‘‘अब मजाक छोड़ो, देखो मैं ये सब्जियां ले कर आया हूं. तुम रसोई में जाओ. तुम्हारी हैल्प करने मैं आता हूं.’’

दालसब्जी वगैरह मुझे तो भाती भी नहीं और बनाना भी मुझे आता नहीं

‘‘तुम्हें ये सब आता है तो प्लीज तुम ही बना लो न… दालसब्जी वगैरह मुझे तो भाती भी नहीं और बनाना भी मुझे आता नहीं. और हां, 2 दिनों के बाद तो मेरी स्टडी शुरू होने वाली है, क्या तुम भूल गए? फिर मुझे टाइम ही कहां मिलेगा इन सब झंझटों के लिए. अच्छा यही रहेगा कि तुम किसी इंडियन लेडी को कुक के तौर पर रख लो.’’

अक्षय का दिमाग सन्न रह गया. राजवी को हर रोज सुबह की चाय बनाने में भी नखरे करती थी और ठीक से कोई नाश्ता भी नहीं बना पाती थी. लेकिन आज तो उस ने हद ही कर दी थी. तो क्या यही है राजवी का असली रूप? लेकिन कुछ भी बोले बिना अक्षय औफिस के लिए निकल गया. पर यह सब तो जैसे शुरुआत ही थी. राजवी के उस नए रंग के साथ जब नया ढंग भी सामने आने लगा अक्षय के तो होश ही उड़ गए. एक दिन राजवी बिलकुल शौर्ट और पतले से कपड़े पहन कर कालेज के लिए निकलने लगी.

अक्षय ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘यह क्या पहना है राजवी? यह तुम्हें शोभा नहीं देता. तुम पढ़ने जा रही हो तो ढंग के कपड़े पहन कर जाओगी तो अच्छा रहेगा…’’

‘‘ये अमेरिका है मिस्टर अक्षय. और फिर तुम ने ही तो कहा था न कि तुम मौडर्न सोच रखते हो, तो फिर ऐसी पुरानी सोच क्यों?’’

‘‘हां कहा था मैं ने पर पराए देश में तुम्हारी सुरक्षा की भी चिंता है मुझे. मौडर्न होने की भी हद होती है, जिसे मैं समझता हूं और चाहता हूं कि तुम भी समझ लो.’’

‘‘मुझे न तो कुछ समझना है और न ही तुम्हारी सोच और चिंता मुझे वाजिब लगती है. और यह मेरी निजी लाइफ है. मैं अभी उतनी बूढ़ी भी नहीं हो गई कि सिर पर पल्लू रख कर व साड़ी लपेट कर रहूं. और बाई द वे तुम्हें भी तो सुंदर पत्नी चाहिए थी न? तो मैं जब सुंदर हूं तो दुनिया को क्यों न दिखाऊं?’’

अक्षय को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

राजवी के इस क्यों का कोई जवाब नहीं था अक्षय के पास. फिर जैसेजैसे दिन बीतते गए, दोनों के बीच छोटीमोटी बातों पर झगड़े बढ़ते गए. अक्षय को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे? भूल कहां हो रही है और इस स्थिति में क्या हो सकता है, क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर शुरू हो चुका था. राजवी ने जो गु्रप बनाया था उस में अमेरिकन युवकों के साथ इंडियन लड़के भी थे. शर्म और मर्यादा की सीमाएं तोड़ कर राजवी उन के साथ कभी फिल्म देखने तो कभी क्लब चली जाती. ज्यादातर वह उन के साथ लंच या डिनर कर के ही घर आती. कई बार तो रात भर वह घर नहीं आती. अक्षय के पूछने पर वह किसी सहेली या प्रोजैक्ट का बहाना बना देती.

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अक्षय बहुत दुखी होता, उसे समझाने की कोशिश करता पर राजवी उस के साथ बात करने से भी कतराती. अक्षय को ज्यादा परेशानी तो तब हुई जब राजवी अपने बौयफ्रैंड्स को ले कर घर आने लगी. अक्षय उन के साथ मिक्स होने या उन्हें कंपनी देने की कोशिश करता तो राजवी सब के बीच उस के सांवले रंग और चश्मे को मजाक का विषय बना देती और अपमानित करती रहती. एक दिन इस सब से तंग आ कर अक्षय ने नीतू आंटी को फोन लगाया. उस ने ये सब बातें बताना शुरू ही किया था कि राजवी उस से फोन छीन कर रोने जैसी आवाज में बोलने लगी, ‘‘आंटी, आप ने तो कहा था कि तुम वहां राज करोगी. जैसे चाहोगी रह सकोगी. पर आप का यह भतीजा तो मुझे अपने घर की कुक और नौकरानी बना कर रखना चाहता है. मेरी फ्रीडम उसे रास नहीं आती.’’

अक्षय आश्चर्यचकित रह गया. उस ने तब तय कर लिया कि अब से वह न तो किसी बात के लिए राजवी को रोकेगा, न ही टोकेगा. उस ने राजवी को बोल दिया कि तुम अपनी मरजी से जी सकती हो. अब मैं कुछ नहीं बोलूंगा. पर थोड़े दिनों के बाद अक्षय ने नोटिस किया कि राजवी उस के साथ शारीरिक संबंध भी नहीं बनाना चाहती. उसे अचानक चक्कर भी आ जाता था. चेहरे की चमक पर भी न जाने कौन सा ग्रहण लगने लगा था.

अब वह न तो अपने खाने का ध्यान रखती थी न ही ढंग से आराम करती थी. देर रात तक दोस्तों और अनजान लोगों के साथ भटकते रहने की आदत से उस की जिंदगी अव्यवस्थित बन चुकी थी. एक दिन रात को 3 बजे किसी अनजान आदमी ने राजवी के मोबाइल से अक्षय को फोन किया, ‘‘आप की वाइफ ने हैवी ड्रिंक ले लिया है और यह भी लगता है कि किसी ने उस के साथ रेप करने की कोशिश…’’

अक्षय सहम गया. फिर वह वहां पहुंचा तो देखा कि अस्तव्यस्त कपड़ों में बेसुध पड़ी राजवी बड़बड़ा रही थी, ‘‘प्लीज हैल्प मी…’

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पास में खड़े कुछ लोगों में से कोई बोला, ‘‘इस होटल में पार्टी चल रही थी. शायद इस के दोस्तों ने ही… बाद में सब भाग गए. अगर आप चाहो तो पुलिस…’’

‘‘नहींनहीं…,’’ अक्षय अच्छी तरह जानता था कि पुलिस को बुलाने से क्या होगा. उस ने जल्दी से राजवी को उठा कर गाड़ी में लिटा दिया और घर की ओर रवाना हो गया. राजवी की ऐसी हालत देख कर उस कलेजा दहल गया था. आखिर वह पत्नी थी उस की. जैसी भी थी वह प्यार करता था उस को. घर पहुंचते ही उस ने अपने फ्रैंड व फैमिली डाक्टर को बुलाया और फर्स्ट ऐड करवाया. उस के चेहरे और शरीर पर जख्म के निशान पड़ चुके थे. दूसरे दिन बेहोशी टूटने के बाद होश में आते ही राजवी पिछली रात उस के साथ जो भी घटना घटी थी, उसे याद कर रोने लगी. अक्षय ने उसे रोने दिया. ‘जल्दी ही अच्छी हो जाओगी’ कह कर वह उसे तसल्ली देता रहा पर क्या हुआ था, उस के बारे में कुछ भी नहीं पूछा. खाना बनाने वाली माया बहन की हैल्प से उसे नहलाया, खिलाया फिर उसे अस्पताल ले जाने की सोची.

‘‘नहींनहीं, मुझे अस्पताल नहीं जाना. मैं ठीक हो जाऊंगी,’’ राजवी बोली.

दूरियां- भाग 3: क्यों अपने बेटे को दोषी मानता था उमाशंकर

वह कुछ अलग नहीं कर रही थी, ऐसा तो वह अपने मायके में भी करती थी. केवल रिश्ते का नाम यहां अलग था, पर रिश्ता तो वही था, पिता का. उस से गलतियां होती थीं, स्वाभाविक ही है, तो क्या हुआ, नेहा कहती, ‘‘ज्यादा मत सोचो भाभी, बहुत गड़बड़ हुई तो मैं अपनी जिम्मेदारी से भागूंगी नहीं.

“यह मत सोचना कि मैं ने अपनी आजादी पाने के लिए यह कदम उठाया… मैं तो केवल आप को उस घर में आप का अधिकार दिलाना चाहती हूं.

“पापा को थोड़ा सक्रिय भी होना पड़ेगा, वरना जंग लग जाएगी उन के शरीर में और फिर मन में. असहाय और अकेले होने की भावना से खुद को ही आहत करते रहेंगे और दूसरे पर निर्भर हो जाएंगे हर काम के लिए. उन्हें मन की उदासी से निकल कर पहले खुद के लिए और फिर दूसरों के लिए जीना सीखना होगा.

“अपने को दोषी मान कर और आत्मप्रताड़ना और स्वयं पर दया करते रहना, उन का स्वभाव सा बन गया है. हम केवल मदद कर सकते हैं, पर निकलना उन्हें खुद ही होगा…फिर चाहे उन्हें कुछ झटके ही क्यों न देने पड़ें.

“आसान नहीं है. पर भाभी, अब तो मुझे भी वह फोन पर बहुतकुछ सुना देते हैं. मजा आता है, कम से मुझे पैडस्टल से तो उतार रहे हैं.

“अब थोड़ी कम थकान महसूस करती हूं. पर, आप को थकाने के लिए सौरी. चलो भैया से थकान उतरवा लेना,’’ हंसी थी वह जोर से, तो अनुभा के चेहरे पर लाली छा गई थी.

जब रोज एक ही स्थिति से गुजरना पड़े तो वह आदत बन जाती है और फिर खलती नहीं है. उमाशंकर के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था. देख रहे थे कि बेटाबहू उन का कितना ध्यान रखते हैं. बेटे के साथ संवाद बढ़ गया था, क्योंकि अनुभा ने सेतु बनने से साफ मना कर दिया था. फिर नाराजगी करें तो भी किस बात पर, कब तक बेवजह नुक्स निकालते रहेंगे.

जब वह पार्क में सैर करने जाते हैं तो देखतेसुनते तो हैं कि बूढ़े मांबाप के साथ कितना बुरा व्यवहार करते हैं बेटाबहू… कुछ तो खाने के लिए तरसते रहते हैं. न समय पर खाना मिलता है, न दवा. और पैसे के लिए भी हाथ फैलाते रहो. महानगरीय जीवन की त्रासदी से अवगत हैं वह… भाग्यशाली हैं कि उन की दशा सुखद है. पेंशन का पैसा बैंक में ही पड़ा रहता है. जब जो चाहे खरीद लेते हैं, खर्च कर लेते हैं. तरुण तो एक बार कहने पर ही सारी चीजें जुटा देता है.

नेहा नहीं है तब भी जिंदगी मजे से कट रही है उन की. जब इनसान आत्ममंथन करने लगता है तो दिमाग में लगे जाले साफ होने लगते हैं.

पितापुत्र के बीच खिंची दीवार धीरेधीरे ही सही दरकने लगी थी. बहू बेटी नहीं बन सकती, यह मानने वाले उमाशंकर उसे  बहू का दर्जा देने लगे थे, उस के विजातीय होने के बावजूद.

नेहा ने जो दूरियां बनाई थीं, वे अनुभा को, तरुण को उन के पास ला रही थीं.

‘‘नेहा…’’ उमाशंकर ने जैसे ही आवाज लगाई तो उसे गले में ही रोक लिया. कमरे के भीतर ही सिमट गया नेहा का नाम.

‘‘अनुभा, मैं आज शाम को खिचड़ी ही खाऊंगा, साथ में सूप बना देना, अगर दिक्कत न हो तो…’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े उमाशंकर ने धीमे स्वर में कहा. झिझक थी उन के स्वर में. समझती है अनुभा, वक्त लगेगा दूरियां खत्म होने में. एकएक कदम की दूरी ही बेशक तय हो, पर शुरुआत तो हो गई है.

वह इंतजार करेगी, जब पापा उसे बहू नहीं बेटी समझेंगे.

नेहा भी तो कब से उस दिन का इंतजार कर रही है. वह जानबूझ कर आती नहीं है मिलने भी कि कहीं पापा उसे देख फिर अनुभा के प्रति कठोर न हो जाएं.

‘‘बहुत ग्लानि होती है कई बार भाभी, मेरी वजह से आप को इतना सब झेलना पड़ रहा है,’’ कल जब अनुभा से बात हुई थी, तो नेहा ने कहा था.

‘‘गिल्टफीलिंग से बाहर निकलो, नेहा. सब ठीक हो जाएगा. आ जाओ थोड़े दिनों के लिए. तरुण भी मिस कर रहे हैं तुम्हें.’’

अनुभा ने सोचा कल ही नेहा को फोन कर के कहेगी कि उसे आ जाना चाहिए मिलने, बेटी है वह घर की. अनुभा को अधिकार दिलाने के चक्कर में अपना हक और अपने हिस्से के प्यार को क्यों छोड़ रही है वह…वह तो कितना तड़प रही है सब से मिलने के लिए. फोन पर चाहे जितनी बात कर लो, पर आमनेसामने बैठ कर बात करने का मजा ही कुछ और होता है. सारी भावनाएं चेहरे पर दिखती हैं तब.

‘‘अरे पापा बिलकुल बन जाएगा, मैं भी आज खिचड़ी ही खाऊंगा और साथ में सूप… वाह मजा आ जाएगा,’’ तरुण उन के साथ आ कर खड़ा हो गया था. दोनों साथसाथ खड़े थे. अपनेपन की एक सोंधी खुशबू खिचड़ी के लिए बनाए तड़के के साथ उठी और अनुभा को लगा जैसे आज देहरी पार कर उस ने सचमुच अपने घर में प्रवेश किया है.

Best of Manohar Kahaniya: बेईमानी की चाहत का नतीजा

सौजन्य- मनोहर कहानियां

5 नवंबर, 2017 की सुबह 9 बजे नवी मुंबई के उपनगर एवं थाना खांदेश्वर में ड्यूटी पर तैनात एआई गजानंद घाड़गे को बालासाहेब माने ने फोन कर के बताया कि साईंलीला हाउसिंग सोसायटी की इमारत के कमरा नंबर 12 से बहुत तेज दुर्गंध आ रही है. कमरे में बाहर से ताला बंद है. दुर्गंध से लगता है कि अंदर कोई लाश सड़ रही है.

गजानंद घाड़गे ने यह बात थानाप्रभारी अमर देसाई और इंसपेक्टर विजय वाघमारे को बताई. उन्होंने तत्काल इस मामले की डायरी तैयार कराई और एआई संतोष जाधव, गजानंद घाड़गे, सिपाही पांडुरंग सूर्यवंशी, अबू जाधव, सोमनाथ रणदिवे, संजय पाटिल और अभय जाधव को साथ ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे.

जिस कमरे से दुर्गंध आ रही थी, उस के सामने भीड़ लगी थी. पुलिस को देखते ही भीड़ एक किनारे हो गई. कमरे के सामने पहुंच कर पुलिस ने सूचना देने वाले उस कमरे के मालिक बालासाहब माने से पूछताछ की. पता चला कि उस कमरे में अंजलि पवार रहती थी. वह 5 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. उसे यह कमरा उस की सहेली माया ने एक प्रौपर्टी डीलर के मार्फत दिलाया था. माया उस के सामने वाले 10 नंबर के कमरे में अपने एक पुरुष मित्र के साथ रहती थी. लेकिन वह 3-4 दिन से बाहर गई हुई थी.

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चूंकि उस कमरे की चाबी किसी के पास नहीं थी. इसलिए मजबूर हो कर दरवाजा तोड़ा गया. दरवाजा टूटते ही अंदर से बदबू का ऐसा झोंका आया, जिस से वहां खड़े लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया. पुलिस कमरे में घुसी तो फर्श पर जगहजगह खून के धब्बे नजर आए. बाथरूम का दरवाजा खुला था. उसी में बैडशीट में लपेट कर लाश रखी थी, जो कमरे के अंदर आते ही दिखाई दे गई थी. उसे कमरे में ला कर खोला गया तो उस में जो लाश निकली, वह उस कमरे में रहने वाली अंजलि पवार की थी. उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था. शरीर पर कई गहरे घाव थे, दोनों हाथों की नसें भी कटी थीं.

लाश देख कर यही लगता था कि मृतका की हत्या 3-4 दिन पहले की गई थी. मामला हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी अमर देसाई ने इस बात की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को देने के साथसाथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी सूचना दी गई. सूचना पा कर थोड़ी ही देर में क्राइम टीम के साथ नवी मुंबई के डीसीपी विश्वास पांढरे और एसीपी प्रकाश निलेवाड़ घटनास्थल पर पहुंच गए.

क्राइम टीम का काम निपट गया तो अमर देसाई ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए पनवेल के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र भिजवा दिया. इस के बाद थाने लौट कर हत्या के इस मामले की जांच इंसपेक्टर विजय वाघमारे को सौंप दी.

विजय वाघमारे ने थानाप्रभारी अमर देसाई से सलाहमशविरा कर के जांच की रूपरेखा तैयार की और अपनी एक टीम बना कर हत्यारों तक पहुंचने की कोशिश शुरू कर दी. दूसरी ओर नवी मुंबई के सीपी हेमंत नगराले और जौइंट सीपी मधुकर पांडेय के निर्देश पर नवी मुंबई क्राइम ब्रांच-2 की टीम भी हत्या के इस मामले की जांच में लग गई.

जांच का निर्देश मिलते ही क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर एस.पी. कोल्हटकर ने भी घटनास्थल का निरीक्षण कर के मामले की जानकारियां जुटाईं. कोल्हटकर की नजर मृतका की सहेली माया पर थी, इसलिए माया को क्राइम ब्रांच ने अपने औफिस बुला लिया. उस से की गई पूछताछ में जो पता चला, उस से क्राइम ब्रांच को उस के प्रेमी राजकुमार उर्फ राज पर शक हुआ. क्योंकि पुलिस को माया की बातों से राजकुमार शातिर प्रवृत्ति का लगा था. शंका की एक वजह यह भी थी कि वह उसी दिन से गायब था, जिस दिन अंजलि की हत्या हुई थी.

पुलिस ने माया से राजकुमार का मोबाइल नंबर ले कर सर्विलांस पर लगा दिया. इस का परिणाम भी मनचाहा मिला. सर्विलांस की मदद से राजकुमार को 14 नवंबर, 2016 को तलौजा के नावड़ा फाटक के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.

28 साल का राजकुमार उत्तर प्रदेश के जिला आजमगढ़ के रहने वाले आदिनाथ पांडेय का बेटा था. आदिनाथ पांडेय काफी पहले रोजीरोटी के चक्कर में महाराष्ट्र के जिला रायपुर आ कर वहां की तहसील खालापुर के गांव शिवनगर में रहने लगे थे. गुजरबसर के लिए उन्होंने शिवनगर के बसस्टौप पर पान का खोखा रख लिया था. राजकुमार उन की एकलौती संतान था.

अधिक लाड़प्यार की वजह से वह बिगड़ गया था. आदिनाथ घर से सुबह जल्दी निकल जाते थे और देर रात लौटते थे, इसलिए वह बेटे पर ध्यान नहीं दे पाते थे. यही वजह थी कि जैसेजैसे वह बड़ा होता गया, वैसेवैसे उस की आदतें बिगड़ती गईं. पिता को समय नहीं मिलता था, मां कुछ कह नहीं पाती थी, इसलिए उसे न किसी का डर था न लिहाज. वह अपनी मनमरजी करने लगा. उस ने दोस्ती भी अपने जैसे लड़कों से कर ली, जिन्होंने उसे और बिगाड़ दिया.

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कमउम्र में ही वह शराब के साथसाथ शबाब का भी शौकीन हो गया. बाप की इतनी कमाई नहीं थी कि वह उस के जायजनाजायज खर्च पूरे करते, इसलिए अपने नाजायज खर्चे पूरे करने के लिए वह चोरियां और लूट करने लगा. लड़कियों के शौक ने ही उस की मुलाकात माया से करा दी. माया उस अड्डे की सब से खूबसूरत युवती थी, इसलिए उस की कीमत भी सब से ज्यादा थी. वह कभीकभी ही धंधे के लिए अड्डे पर आती थी. उस की ज्यादातर बुकिंग उन ग्राहकों के साथ ही होती थी, जो उसे होटल या गेस्टहाउस ले जाते थे.

माया का भाव बहुत ज्यादा था, जिसे अदा करना राजकुमार के वश में नहीं था. माया उसे भा जरूर गई थी, पर उस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह उस के पास जा पाता. ऐसे में उस की दाल कहां गलने वाली थी. पर उस ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि एक न एक दिन वह माया को अपनी बना कर रहेगा.

समय अपनी गति से चलता रहा. राजकुमार ने जब से माया को देखा था, तब से उस का दीवाना हो चुका था. माया उस के दिमाग में कुछ इस तरह छा गई थी कि सोतेजागते वह उसी के बारे में सोचा करता था. इस बीच उस ने कई बार माया के पास जाने की कोशिश की, लेकिन माया ने बिना पैसे के उसे भाव नहीं दिया, क्योंकि वह आदमी की नहीं, पैसों की कद्र करती थी.

राजकुमार को जब लगा कि बिना पैसों के वह माया तक नहीं पहुंच सकता तो पैसों के लिए उस ने एक बड़ी योजना बनाई. उस ने ज्वैलथीफ विनोद सिंह की तरह काम किया, जिस में वह सफल भी रहा. विनोद ने अकेले ही मुंबई और बंगलुरु की गहनों की कई दुकानों में सेंधमारी की थी. आजकल वह जेल में बंद है.

विनोद सिंह की तर्ज पर राजकुमार के पास पैसा आया तो उसे माया के पास पहुंचने में देर नहीं लगी. वह आए दिन माया के पास जाने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच की दूरियां खत्म हुईं तो दोनों एकदूसरे से अपना दुखदर्द बांटने लगे. राजकुमार माया को पहले से प्यार करता था, अब वह उस से विवाह के बारे में सोचने लगा. माया जिस मजबूरी के तहत उस अंधेरी गली में आई थी, उस मजबूरी को हल कर के वह उसे उजाले में लाने की कोशिश करने लगा.

दरअसल, माया यवतमाल के एक छोटे से गांव की रहने वाली थी. उस की पारिवारिक स्थिति काफी खराब थी. भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. उस के पिता को टीबी हो गई थी, जिस के इलाज के लिए उसे पैसों की जरूरत थी. वह जिस के भी पास नौकरी या पैसों के लिए गई, उसी ने उसे काम देने के बजाय उस की सुंदरता पर ज्यादा ध्यान दिया.

मजबूर हो कर उस ने सोचा कि लोग उस की सुंदरता का फ्री में लाभ उठाएं, उस से अच्छा है कि वही क्यों न अपनी सुंदरता का लाभ उठाए. इस के बाद माया गांव के बिगड़े शरीफजादों के पास खुद ही जाने लगी. उन्हें वह अपना तन सौंपती और बदले में उन से अच्छा पैसा लेती. धीरेधीरे उस के देहव्यापार की बात गांव में फैलने लगी तो वह गांव छोड़ कर मुंबई आ गई.

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माया खुद अपनी मरजी से देहव्यापार में आई थी, इसलिए कोठा मालकिन ने उसे अपना धंधा स्वतंत्र रूप से करने की इजाजत दे दी. उस से वह सिर्फ अपने कोठे का किराया लिया करती थी. पहले तो माया ने राजकुमार की ओर ध्यान नहीं दिया. वह उसे अपना शरीर सौंप कर बदले में उस से कीमत लेती रही. लेकिन जब उसे लगा कि राजकुमार उसे सचमुच प्यार करता है तो उस का भी झुकाव उस की ओर होने लगा. वह भी उस से प्यार करने लगी.

अब दोनों के बीच शरीर और पैसों की बात खत्म हो गई. उन्हें जब भी मौका मिलता, वे शहर से बाहर घूमने निकल जाते, राजकुमार चोरी के पैसे से माया की जरूरतें पूरी कर रहा था.

जब राजकुमार को विश्वास हो गया कि माया भी उस से प्यार करने लगी है तो उस ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया. लेकिन यह बात माया को उचित नहीं लगी, इसलिए उस ने इंतजार करने को कहा.

माया ने राजकुमार को शादी के लिए भले ही इंतजार करने के लिए कहा था, लेकिन वह उस के साथ लिवइन में रहने लगी. रहते भले ही दोनों साथ थे, लेकिन दोनों किसी के काम में हस्तक्षेप नहीं करते थे. जबकि दोनों को परिणामों के बारे में अच्छी तरह पता था.

आखिर एक दिन मुंबई क्राइम ब्रांच ने राजकुमार को सेंधमारी की योजना बनाते हुए पकड़ लिया. इस मामले में उसे 6 महीने की सजा हुई. कुछ दिनों जेल में रहने के बाद 28 अक्तूबर, 2016 को वह पैरोल पर बाहर आया तो फिर लौट कर जेल नहीं गया. अंजलि और माया सहेलियां थीं. माया की तरह वह भी देह के धंधे में लिप्त थी. राजकुमार के जेल जाने के बाद अंजलि की माया से मुलाकात एक पिकनिक पौइंट पर हुई तो जल्दी ही दोनों में गहरी दोस्ती हो गई.

27 साल की स्वस्थ और सुंदर अंजलि अतिमहत्त्वाकांक्षी युवती थी. वह गुजरात के जिला बलसाड़ की रहने वाली थी. साधारण परिवार में जन्मी अंजलि के सपने काफी बड़े थे. लेकिन उस की शादी एक औटोचालक विपिन पवार से हो गई थी. वह नवी मुंबई के उपनगर खांदेश्वर में किराए पर औटो ले कर चलाता था.

इसे अपनी बदनसीबी समझ कर अंजलि विपिन के साथ रह रही थी. लेकिन उस की कमाई से वह खुश नहीं थी. क्योंकि आधी से अधिक कमाई की तो वह शराब ही पी जाता था, जो बचता था, उस से  घर का खर्च चलाना मुश्किल था.

कुछ दिनों तक तो अंजलि यह सब झेलती रही, लेकिन जब उस ने देखा कि अगर वह पति के सहारे रही तो इसी तरह घुटघुट कर मर जाएगी. इसलिए उस ने कुछ करने का विचार किया.

वह जिस बस्ती में रहती थी, वहां की कई लड़कियां और महिलाएं बीयरबारों में काम करती थीं. वे काफी सुखी थीं. अंजलि ने उन से बात की और उन के साथ जाने लगी.

बीयरबार में काम करतेकरते वह अधिक कमाई के लिए देहव्यापार भी करने लगी. इस काम में उसे अच्छी कमाई होने लगी. साथ ही वह ग्राहकों के साथ घूमने भी जाने लगी. ऐसे में ही उस की मुलाकात माया से हुई तो एक ही राह की राही होने की वजह से दोनों में दोस्ती हो गई. दोस्ती इतनी गहरी थी कि वे एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगी थीं. पैसा आने लगा तो अंजलि के रहनसहन में पूरी तरह बदलाव आ गया. इस बदलाव की असलियत की जानकारी उस के पति विपिन को हुई तो उस ने अंजलि को समझाने के साथसाथ धमकाया भी, पर अंजलि को जो सुख इस काम में मिल रहा था, वह भला उसे कैसे छोड़ती.

घर में लड़ाईझगड़ा शुरू हुआ तो रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर उस ने पति को ही छोड़ दिया. पति को छोड़ कर वह माया द्वारा दिलाए गए किराए के मकान में रहने लगी.

पैरोल पर जेल से छूट कर आया राजकुमार माया के पास पहुंचा तो अंजलि को देख कर उस पर मर मिटा. जब उसे पता चला कि अंजलि भी माया की तरह देहधंधा करती है तो उसे अपनी राह आसान नजर आई. उस ने सोचा कि वह जब चाहेगा, पैसे के बल पर या ऐसे ही उसे पा लेगा. अब वह उसे पाने का मौका ढूंढने लगा.

3 नवंबर, 2016 को माया अपने किसी ग्राहक के साथ गोवा चली गई. उसे बस पर बैठा कर राजकुमार लौट रहा था तो अपना खाना और शराब की बोतल साथ ले आया. शराब पीने के बाद उसे नशा चढ़ा तो उसे अंजलि की याद आई. उस की याद में वह खाना भूल गया.

उस समय तक रात के 12 बज चुके थे. सोसाइटी के लगभग सभी लोग सो चुके थे. धीरे से माया के घर से निकल कर उस ने अंजलि का दरवाजा खटखटाया तो उस ने दरवाजा खोल दिया. अंजलि के दरवाजा खोलते ही राजकुमार उस के कमरे में आ गया. अंजलि उस समय रात वाले आरामदायक कपड़ों में थी.

उसे उन कपड़ों में देख कर राजकुमार उत्तेजित हो उठा. उस ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘अंजलि, तुम्हारी सहेली मुझे अकेला छोड़ कर गोवा चली गई, जबकि इस समय मुझे उस की सख्त जरूरत महसूस हो रही है. सोचा, माया नहीं है तो उस की सहेली ही सही. तुम उस की कमी पूरी कर दो.’’

राजकुमार की मंशा भांप कर अंजलि ने उसे अपने कमरे में जाने को कहा तो वापस जाने के बजाए राजकुमार अंदर से दरवाजा बंद कर के उस के साथ जबरदस्ती करने लगा. अंजलि ने खुद को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन हट्टेकट्टे राजकुमार से वह खुद को बचा नहीं सकी. आखिर राजकुमार मनमानी कर के ही माना.

मनमानी कर के राजकुमार जाने लगा तो अंजलि ने कहा, ‘‘तुम ने मेरे साथ जो किया है, ठीक नहीं किया. आने दो माया को, मैं उसी से नहीं, पुलिस से भी तुम्हारी शिकायत करूंगी.’’

अंजलि की इस धमकी से राजकुमार डर गया. नशे में वह था ही, फलस्वरूप अच्छाबुरा नहीं सोच सका. वह एक खतरनाक फैसला ले कर किचन में गया और वहां से सब्जी काटने वाली छुरी ला कर यह सोच कर अंजलि पर हमला कर दिया कि न यह रहेगी और न शिकायत करेगी.

अंजलि की हत्या कर के वह बाहर आया और दरवाजे पर ताला लगा कर माया के कमरे पर आ गया. अगले दिन वह तलौजा में रहने वाले अपने एक पुराने दोस्त के यहां चला गया, जहां से क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

पूछताछ के बाद क्राइम ब्रांच पुलिस ने राजकुमार को थाना खांदेश्वर पुलिस के हवाले कर दिया, जहां इंसपेक्टर विजय वाघमारे ने उस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में ही था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Story in Hindi- खुशियों की दस्तक: भाग 1

जिंदगी के लमहे किस पल क्या रंग लेंगे, इस की किसी को खबर  नहीं होती. चंद घंटों पहले तक कौस्तुभ की जिंदगी कितनी सुहानी थी. पर इस समय तो हर तरफ सिवा अंधेरे के कुछ भी नहीं था. प्रतिभाशाली, आकर्षक और शालीन नौजवान कौस्तुभ को जो देखता था, तारीफ किए बिना नहीं रह पाता था. एम. एससी. कैमिस्ट्री में गोल्ड मैडलिस्ट कौस्तुभ पी. एच.डी करने के  साथ ही आई.ए.एस. की तैयारी भी कर रहा था. भविष्य के ऊंचे सपने थे उस के, मगर एक हादसे ने सब कुछ बदल कर रख दिया. आज सुबह की ही तो बात थी कितना खुश था वह. 9 बजे से पहले ही लैब पहुंच गया था. गौतम सर सामने खड़े थे. उन्हीं के अंडर में वह पीएच.डी. कर रहा था. अभिवादन करते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, आज मुझे जल्दी निकलना होगा. सोच रहा हूं, अपने प्रैक्टिकल्स पहले निबटा लूं.’’

‘‘जरूर कौस्तुभ, मैं क्लास लेने जा रहा हूं पर तुम अपना काम कर लो. मेरी सहायता की तो यों भी तुम्हें कोई जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन मैं यह जानना जरूर चाहूंगा कि जा कहां रहे हो, कोई खास प्लान?’’ प्रोफैसर गौतम उम्र में ज्यादा बड़े नहीं थे. विद्यार्थियों के साथ दोस्तों सा व्यवहार करते थे और उन्हें पता था कि आज कौस्तुभ अपनी गर्लफ्रैंड नैना को ले कर घूमने जाने वाला है, जहां वह उसे शादी के लिए प्रपोज भी करेगा. कौस्तुभ की मुसकराहट में प्रोफैसर गौतम के सवाल का जवाब छिपा था. उन के जाते ही  कौस्तुभ ने नैना को फोन लगाया, ‘‘माई डियर नैना, तैयार हो न? आज एक खास बात करनी है तुम से…’’

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‘‘आई नो कौस्तुभ. शायद वही बात, जिस का मुझे महीनों से इंतजार था और यह तुम भी जानते हो.’’ ‘‘हां, आज हमारी पहली मुलाकात की वर्षगांठ है. आज का यह दिन हमेशा के लिए यादगार बना दूंगा मैं.’’ लीड कानों में लगाए, बातें करतेकरते कौस्तुभ प्रैक्टिकल्स की तैयारी भी कर रहा था. उस ने परखनली में सल्फ्यूरिक ऐसिड डाला और दूसरी में वन फोर्थ पानी भर लिया. बातें करतेकरते ही कौस्तुभ ने सोडियम मैटल्स निकाल कर अलग कर लिए. इस वक्त कौस्तुभ की आंखों  के आगे सिर्फ नैना का मुसकराता चेहरा घूम रहा था और दिल में उमंगों का ज्वार हिलोरें भर रहा था.

नैना कह रही थी, ‘‘कौस्तुभ, तुम नहीं जानते, कितनी बेसब्री से मैं उस पल का इंतजार कर रही हूं, जो हमारी जिंदगी में आने वाला है. आई लव यू …’’ ‘‘आई लव यू टू…’’ कहतेकहते कौस्तुभ ने सोडियम मैटल्स परखनली में डाले, मगर भूलवश दूसरी के बजाय उस ने इन्हें पहली वाली परखनली में डाल दिया. अचानक एक धमाका हुआ और पूरा लैब कौस्तुभ की चीखों से गूंजने लगा. आननफानन लैब का स्टाफ और बगल के कमरे से 2-4 लड़के दौड़े आए. उन में से एक ने कौस्तुभ की हालत देखी, तो हड़बड़ाहट में पास रखी पानी की बोतल उस के चेहरे पर उड़ेल दी. कौस्तुभ के चेहरे से इस तरह धुआं निकलने लगा जैसे किसी ने जलते तवे पर ठंडा पानी डाल दिया हो. कौस्तुभ और भी जोर से चीखें मारने लगा.

तुरंत कौस्तुभ को अस्पताल पहुंचाया गया. उस के घर वालों को सूचना दे दी गई. इस बीच कौस्तुभ बेहोश हो चुका था. जब वह होश में आया तो सामने ही उस की गर्लफ्रैंड नैना  उस की मां के साथ खड़ी थी. पर वह नैना को देख नहीं पा रहा था. हादसे ने न सिर्फ उस का अधिकांश चेहरा, बल्कि एक आंख भी बेकार कर दी थी. दूसरी आंख भी अभी खुल नहीं सकती थी, पट्टियां जो बंधी थीं. वह नैना को छूना चाहता था, महसूस करना चाहता था, मगर आज नैना उस से बिलकुल दूर छिटक कर खड़ी थी. उस की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह कौस्तुभ के करीब आए. कौस्तुभ 6 महीनों तक अस्पताल, डाक्टर, दवाओं, पट्टियों और औपरेशन वगैरह में ही उलझा रहा. नैना एकदो दफा उस से मिलने आई पर दूर रह कर  ही वापस चली गई. कौस्तुभ की पढ़ाई, स्कौलरशिप और भविष्य के सपने सब अंधेरों में खो गए. लेकिन इतनी तकलीफों के बावजूद कौस्तुभ ने स्वयं को पूरी तरह टूटने नहीं दिया था. किसी न किसी तरह हिम्मत कर सब कुछ सहता रहा, इस सोच के साथ कि सब ठीक हो जाएगा. मगर ऐसा हुआ नहीं. न तो लौट कर नैना उस की जिंदगी में आई और न ही उस का चेहरा पहले की तरह हो सका. अब तक के अभिभावक उस पर लाखों रुपए खर्च कर चुके थे. पर अपना चेहरा देख कर वह स्वयं भी डर जाता था.

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घर आ कर एक दिन जब कौस्तुभ ने नैना को फोन कर बुलाना चाहा, तो वह साफ मुकर गई और स्पष्ट शब्दों में बोली, ‘‘देखो कौस्तुभ, वास्तविकता समझने का प्रयास करो. मेरे मांबाप अब कतई मेरी शादी तुम से नहीं होने देंगे, क्योंकि तुम्हारे साथ मेरा कोई भविष्य नहीं. और मैं स्वयं भी तुम से शादी करना नहीं चाहती क्योंकि अब मैं तुम्हें प्यार नहीं कर पाऊंगी. सौरी कौस्तुभ, मुझे माफ कर दो.’’ कौस्तुभ कुछ कह नहीं सका, मगर उस दिन वह पूरी तरह टूट गया था. उसे लगा जैसे उस की दुनिया अब पूरी तरह लुट चुकी है और कुछ भी शेष नहीं. मगर कहते हैं न कि हर किसी के लिए कोई न कोई होता जरूर है. एक दिन सुबह मां ने उसे उठाते हुए कहा, ‘‘बेटे, आज डाक्टर अंकुर से तुम्हारा अपौइंटमैंट फिक्स कराया है. उन के यहां हर तरह की नई मैडिकल सुविधाएं उपलब्ध हैं. शायद तेरी जिंदगी फिर से लौटा दे वह.’’कौस्तुभ ने एक लंबी सांस ली और तैयार होने लगा. उसे तो अब कहीं भी उम्मीद नजर नहीं आती थी, पर मां का दिल भी नहीं तोड़ सकता था.

कौस्तुभ अपने पिता के साथ डाक्टर के यहां पहुंचा और रिसैप्शन में बैठ कर अपनी बारी का इंतजार करने लगा. तभी उस के बगल में एक लड़की, जिस का नाम प्रिया था, आ कर बैठ गई. साफ दिख रहा था कि उस का चेहरा भी तेजाब से जला हुआ है. फिर भी उस ने बहुत ही करीने से अपने बाल संवारे थे और आंखों पर काला चश्मा लगा रखा था. उस ने सूट पूरी बाजू का पहन रखा था और दुपट्टे से गले तक का हिस्सा कवर्ड था. लेकिन उस के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था. न चाहते हुए भी कौस्तुभ ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप भी ऐसिड से जल गई थीं?’’उस ने कौस्तुभ की तरफ देखा फिर गौगल्स हटाती हुई बोली, ‘‘जली नहीं जला दी गई थी उस शख्स के द्वारा, जो मुझे बहुत प्यार करता था.’’ कहतेकहते उस लड़की की आंखें एक अनकहे दर्द से भर गईं, लेकिन वह आगे बोली, ‘‘वह मजे में जी रहा है और मैं हौस्पिटल्स के चक्कर लगाती पलपल मर रही हूं. मेरी शादी किसी और से हो रही है, यह खबर वह सह नहीं सका और मुझ पर तेजाब फेंक कर भाग गया. एक पल भी नहीं लगा उसे यह सब करने में और मैं सारी जिंदगी के लिए…

‘‘इस बात को हुए 1 साल हो गया. लाखों खर्च हुए पर अभी भी तकलीफ नहीं गई. मांबाप कितना करेंगे, उन की तो सारी जमापूंजी खत्म हो गई है. अपने इलाज के लिए अब मैं स्वयं कमा  रही हूं. टिफिन तैयार कर मैं उसे औफिसों में सप्लाई करती हूं.’’

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Best of Manohar Kahaniya: मिल ही गई गुनाहों की सजा

सौजन्य- मनोहर कहानियां

चंडीगढ़ के एडीशनल सेशन जज एस.के. सचदेवा ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की सूची पर नजर  डाली, 16 गवाह थे. इन में पुलिस वालों के बयान तो लगभग एक जैसे थे कि लाश मिलने पर उन्होंने कौनकौन सी काररवाई की थी. अभियुक्तों की निशानदेही पर कैसे क्या बरामद किया गया था.

इस के अलावा गवाह के रूप में पेश हुए जनकदेव ने अजीब सा बयान दिया तो उसे मुकरा हुआ गवाह घोषित कर दिया गया. गुरमेल सिंह ने अपने बयान में बताया था कि सेक्टर-56 स्थित उस की दुकान पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जिन की फुटेज उस ने पुलिस वालों को मुहैया करवाई थी.

संतोष कुमार का कहना था कि वह बद्दी (हिमाचल प्रदेश) की एक फैक्ट्री में मैकेनिक था और रिश्ते में अजय कुमार का साला था. 14 मई, 2016 को उसे उस की मौसी ने फोन कर के अजय की लाश मिलने की बात बताई थी. वह अगले दिन चंडीगढ़ के सिविल अस्पताल की मोर्चरी में अजय की लाश देखने गया था. तब पुलिस ने उस से लाश की लिखित शिनाख्त करवाई थी.

डा. ज्योति बरवा ने डा. रिशु जिंदल के साथ मिल कर लाश का पोस्टमार्टम किया था. डा. संजीव ने अदालत के सामने पेश हो कर मृतक की ब्लड ग्रुप संबंधी रिपोर्ट पेश की थी.

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अभियोजन पक्ष के गवाहों को निपटाने में अदालत को कई महीने का समय लग गया था. उस के बाद बचावपक्ष के गवाहों की बारी थी, जो 5 थे. दिनेश सिंह, बृजेश कुमार यादव, बलविंदर सिंह, किरन तथा खुशबू.

इन लोगों ने अपने बयान में क्या कहा, यह जानने से पहले इस मामले के बारे में जान लेना ठीक रहेगा.

रूबी कुमारी मूलरूप से बिहार की रहने वाली थी. जब वह 16 साल की थी, तभी उस की शादी अजय कुमार से हो गई थी. वह भी बिहार का ही रहने वाला था. लेकिन नौकरी की वजह से वह चंडीगढ़ में रहता था. शादी के बाद उस ने रूबी को गांव में ही मांबाप के पास छोड़ दिया था.

चंडीगढ़ से सटे मोहाली में वह गत्ता बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी करता था और चंडीगढ़ के सेक्टर-56 में छोटा सा मकान ले कर अकेला ही रहता था. साल में 2 बार 10-10 दिनों की छुट्टी ले कर वह गांव जाया करता था.

देखतेदेखते 13 साल का लंबा अरसा गुजर गया. इस बीच वह 3 बच्चों का पिता बन गया था. सन 2015 में अजय बीवीबच्चों को चंडीगढ़ ले आया. उस ने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करवा दिया.

रूबी शरीर से चुस्तदुरुस्त थी. गांव में उस के पास साइकिल थी. चंडीगढ़ आ कर उस ने स्कूटर चलाना सीख लिया तो अजय ने उसे एक्टिवा स्कूटी दिलवा दी. अजय सुबह लोकल बस से नौकरी पर चला जाता. रूबी तीनों बच्चों को स्कूल पहुंचाती. इस के बाद खाना बना कर दोपहर को टिफिन ले कर वह स्कूटी से पति को फैक्ट्री में दे आती. शाम को छुट्टी के बाद अजय बस से घर आ जाता.

रूबी ने पति को कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं दिया था. अजय पत्नी से बहुत खुश था. वह अकसर कहता रहता था कि उस की जैसी पत्नी खुशनसीब इंसान को ही मिलती है. रूबी सुंदर भी थी, पति को रिझाने की उसे हर कला आती थी. पासपड़ोस की बुजुर्ग महिलाएं अपनी बहुओं को रूबी की मिसाल दिया करती थीं.

खैर, अजय का समय परिवार के साथ बहुत अच्छे से बीत रहा था. बुरे वक्त की उस ने कल्पना भी नहीं की थी, पर अचानक उस का बुरा वक्त आ गया.

14 मई, 2016 की सुबह एक बुजुर्ग सैर करते हुए सैक्टर-56 के सरकारी स्कूल के पास से गुजरे तो उन की नजर एक जगह वीराने में सीवरेज गटर के पास पड़े सफेद रंग के बोरे पर पड़ी. बोरे के पास पहुंच कर उन्होंने उसे टटोला तो उस में लाश होने की आशंका हुई.

उन्होंने तुरंत इस बात की सूचना 100 नंबर पर दे दी. थोड़ी ही देर में एक पीसीआर वैन वहां आ पहुंची. पुलिसकर्मियों ने उस बुजुर्ग से बात कर के इस बात की सूचना पलसौरा चौकी को दे दी. थोड़ी ही देर में हवलदार कुलदीप सिंह, 2 सिपाही परवीन कुमार और दविंदर सिंह के साथ इंसपेक्टर अमराओ सिंह मौके पर आ पहुंचे.

बोरा खोला गया तो उस में से एक लाश निकली, जिस की शिनाख्त अजय कुमार के रूप में हुई. अमराओ सिंह की तहरीर पर थाना सेक्टर-39 में इस मामले में भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. थानाप्रभारी इंसपेक्टर दिलशेर सिंह ने भी मौके पर जा कर मामले की जांच की.

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लाश की पहचान मोहाली की गत्ता फैक्ट्री में काम करने वाले अजय कुमार के रूप में हुई थी. वहां संपर्क करने पर पता चला कि वह चंडीगढ़ के सेक्टर-56 के मकान नंबर 589 में रहता था और पिछले 2 दिनों से ड्यूटी पर नहीं आया था.

पुलिस ने पंचनामा तैयार कर लाश मोर्चरी में रखवा दी. इस के बाद इंसपेक्टर दिलशेर के नेतृत्व में एक पुलिस टीम मृतक के पते पर पहुंची. वहां उन की मुलाकात अजय की पत्नी रूबी से हुई. उस के तीनों बच्चे भी घर पर थे. अजय के बारे में पूछने पर रूबी ने बताया कि उस के पति 12 मई की सुबह तैयार हो कर ड्यूटी पर जाने के लिए घर से निकले थे लेकिन अभी तक वापस नहीं आए.

पुलिस के यह पूछने पर कि उस ने इस बारे में पति की फैक्ट्री में पता किया था या फिर पुलिस चौकी में मिसिंग रिपोर्ट लिखाई थी, तो उस ने मना करते हुए कहा कि किसी बात पर उस का पति से झगड़ा हो गया था. नाराज हो कर वह पैदल ही घर से चले गए थे. उस ने सोचा कि गुस्सा ठंडा हो जाएगा तो खुद ही वापस आ जाएंगे.

‘‘वह 2 दिनों तक घर नहीं लौटे तो तुम्हें उन की कोई फिक्र नहीं हुई?’’ इंसपेक्टर दिलशेर सिंह ने पूछा.

‘‘फिक्र करने से क्या होता. वैसे भी वह कोई बच्चे तो थे नहीं. न मैं ने उन से झगड़ा किया था. झगड़ा उन्होंने ही शुरू किया था.’’ रूबी ने कहा.

तभी पास खड़ी उस की बड़ी बेटी ने कहा, ‘‘पापा तो मम्मी को समझा रहे थे, झगड़ा मम्मी ने ही शुरू किया था. पहले भी मम्मी पापा से लड़ती रहती थी.’’

पुलिस वालों का ध्यान उस लड़की की ओर गया. दिलशेर सिंह ने उस से प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारी मम्मी पापा से किस बात के लिए लड़ती थी?’’

‘‘सुमन भैया की वजह से. पापा उन्हें पसंद नहीं करते थे, जबकि मम्मी ने उन्हें सिर चढ़ा रखा था.’’ लड़की ने बताया.

वह कुछ और कहती, इस से पहले रूबी ने उस के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘सुमन रिश्ते में हमारा भतीजा है सर. कभीकभार हम लोगों से वह मिलने आ जाता था जबकि मेरे पति को उस का यहां आना पसंद नहीं था. बस, इसी बात को ले कर हमारा कभीकभार झगड़ा हो जाता था. जब भी झगड़ा होता, वह नाराज हो कर चले जाते थे, फिर 2-3 दिनों बाद खुद ही वापस आ जाते थे.’’

‘‘पर इस बार वह नहीं लौटेंगे,’’ दिलशेर सिंह ने कहा. इस के बाद वह रूबी को अपने साथ जनरल अस्पताल ले गए, जहां मोर्चरी में रखा शव निकलवा कर उसे दिखाया तो वह उस की पहचान अपने पति के रूप में कर के छाती पीटपीट कर रोने लगी.

इस के बाद वह बेहोश सी हो कर जमीन पर लेट गई. अब तक सारा मामला दिलशेर सिंह की समझ में आ चुका था. मगर बिना किसी पुख्ता सबूत के वह किसी पर हाथ डालना नहीं चाहते थे. उन्होंने रूबी को अस्पताल से दवा दिलवा कर वापस घर भिजवा दिया.

इस के बाद उन्होंने रूबी के घर के आसपास की दुकानों के बाहर लगे सीसीटीवी फुटेज की जांच की. इन में रूबी 13 व 14 मई की रात में 12 बज कर 14 मिनट 16 सेकेंड पर एक आदमी को अपनी स्कूटी पर बिठा कर ले जाती दिखाई दी. स्कूटी के पीछे बैठे व्यक्ति ने अपने हाथों से गोल सी कोई चीज संभाल रखी थी.

इस सबूत के मिलते ही पुलिस ने उसी शाम रूबी को उस के घर से उठा लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू की गई तो उस ने अपना गुनाह मानते हुए इस अपराध में 2 और लोगों के शामिल होने की बात बताई.

उस की निशानदेही पर पुलिस ने उसी रात सुमन कुमार और कुलप्रकाश नाम के लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया.

अगले दिन तीनों आरोपियों को अदालत में पेश कर के पुलिस ने उन का पुलिस रिमांड ले लिया. इस के बाद उन से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में यह बात सामने आई कि रूबी जब बिहार में अपनी ससुराल में पति के बिना रहती थी तो उस के अपने से 6 साल छोटे सुमन कुमार से अवैध संबंध बन गए थे. दूर की रिश्तेदारी में सुमन अजय कुमार का भतीजा लगता था. लिहाजा इन दोनों के संबंधों पर कभी किसी को शक नहीं हुआ. इस बात का दोनों ही फायदा उठाते रहे.

अजय जब रूबी को अपने साथ चंडीगढ़ ले आया तो दोनों प्रेमी बिछुड़ गए. लिहाजा दोनों को ही एकदूसरे की याद सताने लगी. सुमन का जीजा कुलप्रकाश भी चंडीगढ़ में नौकरी करता था. वह उसी मकान की ऊपरी मंजिल में रहता था, जिस में रूबी अपने पति व बच्चों के साथ रह रही थी. नौकरी तलाश करने के बहाने सुमन अपने जीजा के पास आ गया.

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इस तरह वह और रूबी फिर से एकदूसरे के करीब हो गए. जब बच्चे स्कूल और बड़े अपने काम पर चले जाते तो सुमन और रूबी को मिलने का मौका मिल जाता था. रूबी चालाक और बातूनी थी. वह पति को खुश रखने का हरसंभव प्रयास करती. इस के अलावा उस ने पासपड़ोस में भी अपना अच्छा प्रभाव बना रखा था.

वैसे तो दोनों ही मिलने में बड़ी होशियारी दिखाते थे लेकिन एक दिन अजय घर पर जल्दी आ गया. उस दिन अजय ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ लिया. सुमन को डांट कर भगाने के बाद उस ने रूबी की खूब खबर ली. पतिपत्नी के बीच शुरू हुआ यह झगड़ा उन के बच्चों के स्कूल से आने के बाद तक चलता रहा.

अजय को पत्नी की हकीकत पता लग चुकी थी इसलिए अब वह टाइमबेटाइम घर आने लगा. घर पर उसे सुमन भले ही न मिलता लेकिन पतिपत्नी के बीच झगड़ा फिर से शुरू हो जाता. अजय के सक्रिय हो जाने पर रूबी और सुमन की मुलाकातों पर पहरा लग गया था. ऊपर से रोजरोज के झगड़े से रूबी भी आजिज आ गई थी. एक दिन रूबी ने सुमन से मुलाकात कर के इस समस्या का हल निकालने को कहा.

उस ने रूबी को बताया कि अजय को रास्ते से हटाने के अलावा दूसरा कोई हल नहीं है. इस के बाद दोनों ने अजय को मौत के घाट उतारने की योजना बना ली. योजना के अनुसार, 12 मई, 2016 की छुट्टी के बाद रूबी तीनों बच्चों को कोई बहाना कर के अपने एक परिचित के यहां छोड़ आई.

दरअसल, उस दिन अजय को बुखार था. दवा दिलवाने के बाद रूबी ने उसे सुला दिया. उसी रात सुमन चाकू ले कर उन के यहां आ पहुंचा. उस वक्त अजय गहरी नींद में था. रूबी ने नींद में सोए पति के गले पर चाकू से वार किए.

जब वह तड़पने लगा तो उस ने और सुमन ने उस के गले में दुपट्टा डाल कर कस दिया. जब उन्हें इत्मीनान हो गया कि यह मर चुका है तो उन्होंने उस के शव को मोटे कपड़े में लपेट कर घर में पड़े सफेद रंग के बोरे में ठूंस दिया. इस के बाद दोनों मौजमस्ती में डूब गए.

वे शव को ठिकाने लगाने का मौका ढूंढते रहे. पूरे दिन शव उन के घर में ही पड़ा रहा. 13 मई की रात में चंडीगढ़ में जबरदस्त आंधीतूफान आया था.

इस भयावह मौसम की परवाह न कर के रूबी ने आधी रात में अपनी स्कूटी नंबर सीएच04 6538 निकाली और पति के शव वाले बोरे के साथ सुमन को ले कर घर से निकल गई. एक गटर के पास उस ने स्कूटी रोक दी.

उन की योजना शव को गटर में फेंकने की थी मगर उन दोनों से उस का ढक्कन नहीं खुल पाया. तब वे उस बोरे को वहीं छोड़ कर वापस घर आ गए. घर लौट कर उन्होंने अपनी रासलीला रचाई.

कुलप्रकाश का कसूर यह था कि उसे सुमन और रूबी के संबंधों की जानकारी थी. अजय की हत्या के बाद सुमन उसे बुला कर लाया था तो उस ने न केवल शव को पैक करने में मदद की थी, बल्कि खूनआलूदा कपडे़ व चाकू वगैरह भी ले जा कर अलगअलग जगहों पर छिपा दिए थे, जो बाद में पुलिस ने उस की निशानदेही पर बरामद कर लिए थे.

पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त होने पर तीनों को फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

निर्धारित समयावधि में दिलशेर सिंह ने केस का चालान तैयार कर निचली अदालत में पेश कर दिया, जहां से सेशन कमिट हो कर यह केस अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.के. सचदेवा की अदालत में पहुंचा. अदालत में इस की विधिवत सुनवाई शुरू हुई. अभियोजन पक्ष के गवाहों को सुनने के बाद विद्वान जज ने बचाव पक्ष के गवाहों को सुनना शुरू किया.

दिनेश एक ठेकेदार था. कुलप्रकाश उस का मातहत था. बचावपक्ष के गवाह के रूप में दिनेश ने अदालत को बताया कि 14 मई, 2016 को वह कुलप्रकाश व 2 अन्य लोगों के साथ चंडीगढ़ के सेक्टर-9डी के शोरूम नंबर 26, 27 में काम कर रहा था कि दिन के साढ़े 10-पौने 11 बजे पल्सौरा चौकी की पुलिस आ कर कुलप्रकाश को पकड़ ले गई थी.

एक गवाह बृजेश कुमार यादव ने बताया कि वह मोहाली की उस गत्ता फैक्ट्री में नौकरी करता था, जहां मृतक काम करता था. 14 मई, 2016 को पुलिस ने गत्ता फैक्ट्री में पहुंच कर अजय के बारे में बृजेश से औपचारिक पूछताछ की थी.

बलविंदर मृतक अजय का पड़ोसी था, किरण कुलप्रकाश की पत्नी थी और खुशबू अजय की बेटी. कोर्ट में इन सभी के बयान दर्ज हुए. इन के बयानों में भी ऐसा कुछ खास नहीं था जो आरोपियों के बचाव के लिए कुछ करता.

इस के बाद दोनों पक्षों में बहस का दौर चला. इस जिरह में भाग लिया था पब्लिक प्रौसीक्यूटर मनिंदर कौर, सुमन के वकील विशाल गर्ग नरवाना, रूबी कुमारी की वकील प्रतिभा भंडारी एवं कुलप्रकाश के वकील पी.सी. राना ने.

विद्वान जज ने दोनों पक्षों को पूरी तवज्जो दे कर सुना. तमाम साक्ष्यों का निरीक्षण कर के अजय कुमार की हत्या में उक्त तीनों अभियुक्तों को दोषी पाते हुए न्यायाधीश ने 18 सितंबर, 2017 को अपना फैसला सुना दिया.

उन्होंने अपने फैसले में सुमन कुमार और रूबी कुमारी को भादंवि की धारा 302, 34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद के अलावा डेढ़ लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. उन्होंने कहा कि जुरमाना अदा न करने की सूरत में 6 महीने की सश्रम कैद और बढ़ा दी जाएगी.

इन दोनों को भादंवि की धारा 201 के तहत 3 साल की सश्रम कैद और 50 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. जुरमाना अदा न कर पाने की स्थिति में एक महीने की अतिरिक्त सश्रम कैद की सजा भुगतने का आदेश दिया.

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न्यायाधीश ने कुलप्रकाश को भादंवि की धारा 302, 34 के अंतर्गत बामशक्कत उम्रकैद की सजा के अलावा डेढ़ लाख रुपए का जुरमाना अथवा 6 महीने की सश्रम कैद का फैसला सुनाया. सजा सुनाने के बाद तीनों दोषियों को चंडीगढ़ की बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

कथा तैयार करने तक तीनों दोषी बुड़ैल जेल में बंद थे.

 -कथा अदालत के फैसले पर आधारित

उलझे रिश्ते- भाग 1: क्या प्रेमी से बिछड़कर खुश रह पाई रश्मि

Writer- Ravi

दिन भर की भागदौड़. फिर घर लौटने पर पति और बच्चों को डिनर करवा कर रश्मि जब बैडरूम में पहुंची तब तक 10 बज चुके थे. उस ने फटाफट नाइट ड्रैस पहनी और फ्रैश हो कर बिस्तर पर आ गई. वह थक कर चूर हो चुकी थी. उसे लगा कि नींद जल्दी ही आ घेरेगी. लेकिन नींद न आई तो उस ने अनमने मन से लेटेलेटे ही टीवी का रिमोट दबाया. कोई न्यूज चैनल चल रहा था. उस पर अचानक एक न्यूज ने उसे चौंका दिया. वह स्तब्ध रह गई. यह क्या हुआ?

सुधीर ने मैट्रो के आगे कूद कर सुसाइड कर लिया. उस की आंखों से अश्रुधारा बह निकली. उस का मन किया कि वह जोरजोर से रोए. लेकिन उसे लगा कि कहीं उस का रोना सुन कर पास के कमरे में सो रहे बच्चे जाग न जाएं. पति संभव भी तो दूसरे कमरे में अपने कारोबार का काम निबटाने में लगे थे. रश्मि ने रुलाई रोकने के लिए अपने मुंह पर हाथ रख लिया, लेकिन काफी देर तक रोती रही. शादी से पूर्व का पूरा जीवन उस की आंखों के सामने घूम गया.

बचपन से ही रश्मि काफी बिंदास, चंचल और खुले मिजाज की लड़की थी. आधुनिकता और फैशन पर वह सब से ज्यादा खर्च करती थी. पिता बड़े उद्योगपति थे. इसलिए घर में रुपयोंपैसों की कमी नहीं थी. तीखे नैननक्श वाली रश्मि ने जब कालेज में प्रवेश लिया तो पहले ही दिन सुधीर से उस की आंखें चार हो गईं.

‘‘हैलो आई एम रश्मि,’’ रश्मि ने खुद आगे बढ़ कर सुधीर की तरफ हाथ बढ़ाया. किसी लड़की को यों अचानक हाथ आगे बढ़ाता देख सुधीर अचकचा गया. शर्माते हुए उस ने कहा, ‘‘हैलो, मैं सुधीर हूं.’’

‘‘कहां रहते हो, कौन सी क्लास में हो?’’ रश्मि ने पूछा.

‘‘अभी इस शहर में नया आया हूं. पापा आर्मी में हैं. बी.कौम प्रथम वर्ष का छात्र हूं.’’ सुधीर ने एक सांस में जवाब दिया.

‘‘ओह तो तुम भी मेरे साथ ही हो. मेरा मतलब हम एक ही क्लास में हैं,’’ रश्मि ने चहकते हुए कहा. उस दिन दोनों क्लास में फ्रंट लाइन में एकदूसरे के आसपास ही बैठे. प्रोफैसर ने पूरी क्लास के विद्यार्थियों का परिचय लिया तो पता चला कि रश्मि पढ़ाई में अव्वल है. कालेज टाइम के बाद सुधीर और रश्मि साथसाथ बाहर निकले तो पता चला कि सुधीर को पापा का ड्राइवर कालेज छोड़ गया था. रश्मि ने अपनी मोपेड बाहर निकाली और कहा, ‘‘चलो मैं तुम्हें घर छोड़ती हूं.’’

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‘‘नहीं नहीं ड्राइवर आने ही वाला है.’’

‘‘अरे, चलो भई रश्मि खा नहीं जाएगी,’’ रश्मि के कहने का अंदाज कुछ ऐसा था कि सुधीर उस की मोपेड पर बैठ गया. पूरे रास्ते रश्मि की चपरचपर चलती रही. उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि वह सुधीर से पूछे कि कहां जाना है. बातोंबातों में रश्मि अपने घर की गली में पहुंची, तो सुधीर ने कहा, ‘‘बस यही छोड़ दो.’’

‘‘ओह सौरी, मैं तो पूछना ही भूल गई कि आप को कहां छोड़ना है. मैं तो बातोंबातों में अपने घर की गली में आ गई.’’

‘‘बस यहीं तो छोड़ना है. वह सामने वाला मकान हमारा है. अभी कुछ दिन पहले ही किराए पर लिया है पापा ने.’’

‘‘अच्छा तो आप लोग आए हो हमारे पड़ोस में,’’ रश्मि ने कहा

‘‘जी हां.’’

‘‘चलो, फिर तो हम दोनों साथसाथ कालेज जायाआया करेंगे.’’ रश्मि और सुधीर के बाद के दिन यों ही गुजरते गए. पहली मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में जाने कब बदल गई पता ही न चला. रश्मि का सुधीर के घर यों आनाजाना होता जैसे वह घर की ही सदस्य हो. सुधीर की मम्मी रश्मि से खूब प्यार करती थीं. कहती थीं कि तुझे तो अपनी बहू बनाऊंगी. इस प्यार को पा कर रश्मि के मन में भी नई उमंगें पैदा हो गईं. वह सुधीर को अपने जीवनसाथी के रूप में देख कर कल्पनाएं करती. एक दिन सुधीर घर में अकेला था, तो उस ने रश्मि को फोन कर कहा, ‘‘घर आ जाओ कुछ काम है.’’

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जब रश्मि पहुंची तो दरवाजे पर मिल गया सुधीर. बोला, ‘‘मैं एक टौपिक पढ़ रहा था, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था. सोचा तुम से पूछ लेता हूं.’’

‘‘तो दरवाजा क्यों बंद कर रहे हो? आंटी कहां है?’’

‘‘यहीं हैं, क्यों चिंता कर रही हो? ऐसे डर रही हो जैसे अकेला हूं तो खा जाऊंगा,’’ यह कहते हुए सुधीर ने रश्मि का हाथ थाम उसे अपनी ओर खींच लिया. सुधीर के अचानक इस बरताव से रश्मि सहम गई. वह छुइमुई सी सुधीर की बांहों में समाती चली गई.

‘‘क्या कर रहे हो सुधीर, छोड़ो मुझे,’’ वह बोली लेकिन सुधीर ने एक न सुनी. वह बोला,  ‘‘आई लव यू रश्मि.’’

Satyakatha- सूदखोरों के जाल में फंसा डॉक्टर: भाग 1

22अप्रैल, 2021 की शाम लगभग 5 बजे की बात है. मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर शहर की कोतवाली के टीआई उमेश दुबे को सूचना मिली कि नरसिंहपुर-करेली रेलमार्ग पर स्थित टट्टा पुल के पास रेल पटरियों पर एक आदमी की लाश पड़ी है.

सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो रेल पटरियों के बीच में एक आदमी की लाश क्षतविक्षत हालत में पड़ी थी. लग रहा था जैसे उस ने जानबूझ कर आत्महत्या की हो. वह अचानक दुर्घटना का मामला नहीं लग रहा था. उस आदमी का चेहरा पहचानने में नहीं आ रहा था.

पुलिस ने सब से पहले वह शव रेल लाइनों  के बीच से हटवा कर साइड में रखवा दिया ताकि उस लाइन पर ट्रेनों का आवागमन सुचारू रूप से हो सके. इस के बाद उस के कपड़ों की तलाशी ली तो पैंट की जेब में एक मोबाइल फोन और एक चाबी मिली. तब तक कई लोग वहां इकट्ठे हो चुके थे. पुलिस ने उन से लाश की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका.

पुलिस जांच कर ही रही थी कि तभी किसी ने पुलिस को रेल लाइन के नजदीक  सड़क पर खड़ी एक लावारिस स्कूटी के बारे में जानकारी दी. जांच में वह स्कूटी वहां जमा भीड़ में से किसी की नहीं थी. एक पुलिसकर्मी ने स्कूटी की डिक्की खोली तो उस में शादी का निमंत्रण कार्ड मिला, जिस के आधार पर पता चला कि वह शादी का कार्ड डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के नाम का था.

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कोतवाली पुलिस ने लाश का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए वह जिला अस्पताल भेज दी. इस के बाद भादंवि की धारा 174 (संदिग्ध मृत्यु) का मामला दर्ज कर लिया.

सिद्धार्थ तिगनाथ कोई मामूली इंसान नहीं थे. वह शहर के एक जानेमाने डाक्टर थे. इसलिए पुलिस ने मोबाइल फोन के जरिए डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के घर वालों की सूचना दी. उस समय सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ अपने ही रेवाश्री हौस्पिटल में मरीजों का इलाज कर रहे थे.

जैसे ही उन्हें सिद्धार्थ के रेल से कटने की सूचना मिली, वे अपना होश खो बैठे. आननफानन में अस्पताल का स्टाफ डा. दीपक तिगनाथ और घर वालों को ले कर जिला अस्पताल पहुंच गए.

अस्पताल में सिद्धार्थ का शव देख कर घर वालों का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. सिद्धार्थ की पत्नी अपने 5 साल के बेटे को सीने से चिपकाए बिलख रही थी. घर वालों को यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार सिद्धार्थ ने इस तरह का आत्मघाती कदम क्यों उठा लिया.

डा. सिद्धार्थ तिगनाथ नगर के प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता एवं पेशे से दंत चिकित्सक थे. सोशल मीडिया पर यह खबर पूरे जिले में जब वायरल हुई तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि एक हाईप्रोफाइल डाक्टर फैमिली का सदस्य आत्महत्या जैसा कदम उठा सकता है. लौकडाउन के बावजूद देखते ही देखते जिला अस्पताल में डा. तिगनाथ के रिश्तेदार और उन के प्रशंसकों की भीड़ जमा होने लगी.

सिद्धार्थ की एकलौती बहन गार्गी रीवा में थी. दूसरे दिन जब वह नरसिंहपुर पहुंची तो पोस्टमार्टम के बाद सिद्धार्थ का अंतिम संस्कार किया गया. जब 5 साल के बेटे ने डा. सिद्धार्थ की चिता को मुखाग्नि दी तो उपस्थित घर वालों एवं अन्य लोगों की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गई.

प्रारंभिक जांच में पुलिस ने डा. सिद्धार्थ तिगनाथ के कुछ मित्र और परिजनों के बयान दर्ज किए. मामले की तहकीकात के लिए पुलिस ने सिद्धार्थ के पिता डा. दीपक तिगनाथ, मां ज्योति तिगनाथ, पत्नी नेहा के अलावा नरसिंहपुर के सुरेश नेमा, शेख रियाज, प्रसन्न तिगनाथ, घनश्याम पटेल कुंजीलाल गोविंद पटेल के बयान दर्ज किए. इस के बाद पुलिस टीम ने रेलवे स्टेशन नरसिंहपुर के स्टाफ के बयान दर्ज किए. इस से पता चला कि डा. सिद्धार्थ ने ट्रेन से कट कर अपनी जीवनलीला समाप्त की थी. रेलवे स्टाफ ने पुलिस को बताया कि ट्रेन के ड्राइवर के हौर्न बजाने के बाद भी सिद्धार्थ रेल पटरियों से दूर नहीं हुए थे.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर मुख्यालय में  रेवाश्री हौस्पिटल एक बड़ा प्राइवेट हौस्पिटल है, जिस के डायरेक्टर डा. दीपक तिगनाथ हैं.  मैडिसिन में एमडी डिग्रीधारी कार्डियोलौजिस्ट डा. दीपक तिगनाथ पिछले 4 दशकों से पूरे जिले में अपनी चिकित्सा सेवाएं दे रहे हैं. डा. दीपक तिगनाथ के परिवार में एक बेटा सिद्धार्थ और एक बेटी गार्गी है. गार्गी की  रीवा के रहने वाले अजय शुक्ला से शादी हो चुकी है.

डा. दीपक तिगनाथ का बेटा सिद्धार्थ दंत चिकित्सक के रूप में रेवाश्री हौस्पिटल में ही अपने पिता की तरह लोगों का इलाज करते थे. परिवार में डा. सिद्धार्थ की पत्नी नेहा और उन का 5 साल का एक बेटा है.

सिद्धार्थ की शुरुआती शिक्षा रीवा के सैनिक स्कूल में हुई. उन के दादाजी गणित के शिक्षक थे, इसलिए गणित उन का पसंदीदा विषय था. क्रिकेट में भी उन की बेहद दिलचस्पी रहती थी.

स्कूली पढ़ाई के बाद सिद्धार्थ बीडीएस की डिग्री ले कर दंत चिकित्सक बने, उन की इंटर्नशिप देख उन के सीनियर ने उन्हें सफल सर्जन बनने की सलाह दी. पिता भी एक सफल डाक्टर थे, वही सब अच्छे गुण विरासत में उन्हें भी मिले.

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चिकित्सा के साथ राजनीति को वह समाज सेवा का एक सफल माध्यम मानते थे. इसी कारण से वह राजनीति एवं प्रशासनिक की पढ़ाई के लिए पुणे स्थित पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के संस्थान में गए.

इसी संस्थान में पढ़ाई के दौरान ‘चिकित्सा पद्धति एवं उस का क्रियान्वयन कैसा हो’ विषय पर अपनी थीसिस के माध्यम से अपने विचार जब टी.एन. शेषन के सामने रखे तो शेषन डा. सिद्धार्थ से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने कहा था कि राष्ट्र को ऐसे ही परिपक्व और उत्कृष्टता दे सकने वाले तुम्हारे जैसे नौजवानों की जरूरत है.

डा. सिद्धार्थ तिगनाथ एक समय जिले की राजनीति में कांग्रेसी नेता के रूप में सक्रिय रहे थे. सन 2011 में उन्हें प्रदेश के 2 बड़े नेता कमलनाथ और सुरेश पचौरी ने होशंगाबाद लोकसभा क्षेत्र के उपाध्यक्ष की कमान सौंपी थी. लोकसभा क्षेत्र में संगठन की मजबूती के लिए उन्होंने रातदिन काम किया. किसान आंदोलन हो या उन की फसलों का मुआवजा, जहां प्रशासनिक व्यवस्था धराशाई हो जाती थी, वे किसानों को बातचीत के लिए तैयार करते.

किसी कैंसर पेशेंट को क्या सहायता मिल सकती है, वह उसे पूरी मदद अपने माध्यमों से करते. चिलचिलाती गरमी में स्टेशन पर पानी के पाउच बांटते, ऐसी नेतागिरी वह अपने दम पर तन मन धन से करते थे. तिगनाथ फैमिली को पूरे इलाके में उन की दौलत और शोहरत के कारण जाना जाता था. हर किसी के सुखदुख में तिगनाथ फेमिली हमेशा साथ रहती. डा. सिद्धार्थ अपने व्यवहार एवं शैली के चलते थोड़े से समय में ही सब के चहेते बन चुके थे.

कहते हैं कि जीवन में यदि खुशियां हैं तो दुखों के पहाड़ भी हैं. कुछ लोग इन पहाड़ों को काट कर रास्ता बना लेते हैं तो कुछ लोग एक चट्टान के आगे अपनी हार मान कर निराश हो जाते हैं. डा. सिद्धार्थ ने भी 41 साल की उम्र में एक गलत फैसला ले कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली और अपने भरेपूरे परिवार को यादों के सहारे छोड़ गए.

डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के बनाए चक्रव्यूह में इस कदर फंस चुके थे कि उस से बच कर  निकलना नामुमकिन था. उन के पिता भी अपनी दौलत बेटे के कर्ज की रकम चुकाने में कुरबान कर चुके थे, फिर भी सूदखोरों का कर्जा जस का तस बना हुआ था.

डा. सिद्धार्थ की सोच थी कि जिले के नौजवानों को रोजगार के उचित अवसर नहीं मिलते. इसलिए उन्होंने सन 2016 में ‘विश्वभावन पालीमर’ नाम की फैक्ट्री की शुरुआत की और बेरोजगार जरूरतमंद नौजवानों को उस में रोजगार दिया.

इसी दौरान उन्होंने ‘रेवाश्री इंस्टीट्यूट औफ पैरामैडिकल साइंसेस’ कालेज की शुरुआत की, जिस में स्थानीय युवकयुवतियों को मैडिकल की पढ़ाई के साथसाथ रोजगार दे कर उन्हें पगार देनी शुरू की थी.

अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए वह पैसे की व्यवस्था में लग गए. 2016 की नोटबंदी से कोई अछूता नहीं बचा था. कारोबार में पैसे की जरूरत ने उन्हें स्थानीय सूदखोरों की तरफ धकेला. इसी दौरान सूदखोर आशीष नेमा से उन का संपर्क हुआ.

अगले भाग में पढ़ें-  डा. सिद्धार्थ को सूदखोरों से मिलवाने का काम किसने किया

Manohar Kahaniya: जॉइनिंग से पहले DSP को जेल- भाग 3

नशे की हालत में होते हुए भी निखिल सौरभ को आगाह करते हुए बोला, ‘‘भाई थोड़ा संभाल कर. अगर चल गई तो हम आए 4 थे लेकिन जाएंगे 3.’’

निखिल की इस बात पर सब हंस पड़े और एकएक कर सब पिस्तौल के साथ अपनी सेल्फी लेने लगे. यह देख कर सूरज बोल पड़ा, ‘‘भाई, सेल्फी क्यों ले रहा है, हम मर गए हैं क्या फोटो खींचने के लिए.’’

यह कहते हुए सूरज ने अपनी जेब से फोन निकाला और निखिल और सौरभ की फोटो खींचने लगा. उस समय तक आशुतोष चुपचाप बैठ कर अपने दोस्तों को फोटो खींचते खिंचवाते हुए देख रहा था.

अचानक से उसे महसूस हुआ कि वो अपने दोस्तों के साथ इस खेल में कहीं पीछे न रह जाए. इसलिए वह भी अपनी जगह से उठा और सूरज के हाथों से पिस्तौल ले कर निखिल पर तान कर खड़ा हो गया.

फोटो खिंचवाने में चली गोली

आशुतोष ने इस पोज में 2-3 फोटो खिंचवाईं और उस ने सूरज के फोन में अपनी खींची हुई फोटो देखीं. वह फोटो उसे कुछ खास पसंद नहीं आईं तो उस ने सौरभ को अपना फोन जेब से निकाल कर दिया और उसे फोटो खींचने के लिए कहा.

सौरभ ने अपने दोस्त की बात न टालते हुए उस के हाथों से फोन लिया और आशुतोष और निखिल की फोटो खींचने लगा.

इस बार जब आशुतोष के हाथों में पिस्तौल थी और सौरभ के हाथों में उस का फोन तो आशुतोष ने सोचा कि क्यों न निखिल को थोड़ा डराया जाए.

यह सोच कर उस ने पिस्तौल के ट्रिगर पर उंगली रख दी, जिसे देख कर निखिल जो कि नशे की हालत में था, अचानक से होश में आ गया. उस के मुंह से निकला ही था कि, ‘‘ये क्या कर रहा है?’’ इतने में आशुतोष से ट्रिगर दब गया.

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अब बहुत देर हो चुकी थी. गोली पिस्तौल से निकल चुकी थी और सामने खड़े निखिल की छाती में जा कर धंस चुकी थी. गोली की आवाज से दूरदूर तक पेड़पौधों में बैठे पक्षी उड़ गए. छाती पर गोली लगने के साथ ही निखिल जमीन पर गिर पड़ा.

आशुतोष जो कुछ मिनटों के लिए स्तब्ध हो गया था, वह अचानक से हरकत में आया. उस की पी हुई दारू का नशा तो एकदम से जादू की तरह गायब हो गया था. उस के हाथपैर सुन्न पड़ गए थे. उस की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

सामने अपने दोस्त को खून से लहुलुहान देख उस ने इधरउधर नजर घुमाई और अपने दोस्त निखिल के पास दौड़ पड़ा.

फोन हाथ में लिए सौरभ भी अपनी जगह पर स्तब्ध खड़ा था. उसे उस की आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था कि यह क्या हो गया. उस के हाथों से आशुतोष का फोन छुट कर जमीन पर गिर गया.

सौरभ भी अपने दोस्त निखिल के पास दौड़ पड़ा. दोनों की आंखों में आंसू लगातार बह रहे थे. उस जगह से उस समय तक सूरज वहां से गायब हो गया था.

रंज में बदल गई पार्टी

इतने में आशुतोष ने महसूस किया कि निखिल की धड़कनें अभी तक चल रही हैं. वह सौरभ से बिना कुछ बोले निखिल को अपने हाथों के सहारे उठाने लगा.

सौरभ जैसे मानो उस का इशारा समझ गया था. उस ने निखिल को उठाने में आशुतोष की मदद की और दोनों ने निखिल को उठा कर आशुतोष की गाड़ी में पिछली सीट पर लिटा दिया.

आशुतोष ने बिना देरी के गाड़ी चलाई और निखिल को ले कर इलाके के सदर अस्पताल पहुंचा. लेकिन अस्पताल के डाक्टर ने निखिल को मृत घोषित कर दिया. निखिल को मृत घोषित किए जाने के बाद निखिल को कुछ और सूझा ही नहीं. उस ने फिर से निखिल को गाड़ी की पिछली सीट पर लिटाया और शव को ले कर वे दोनों सीधे कोडरमा थाने पहुंच गए.

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थाने पहुंच कर इस मामले की जानकारी आशुतोष ने खुद दी. घटना की सूचना पा कर एसपी डा. एहतेशाम वकारीब कोडरमा थाने पहुंचे. उन्होंने शुक्रवार की रात करीब साढ़े 11 बजे आरोपी ट्रेनी डीएसपी आशुतोष कुमार और उस के दोस्त सौरभ से अलगअलग पूछताछ की. इस के बाद उन्होंने डीएसपी की कार में पड़े निखिल रंजन के शव को भी देखा.

एसपी डा. एहतेशाम वकारीब ने बिना किसी देरी के आरोपी आशुतोष कुमार और उस के दोस्त सौरभ कुमार को हिरासत में ले लिया. आशुतोष ने स्थानीय पुलिस की मदद करते हुए सूरज कुमार को भी पकड़वाने में सहायता की. 20 घंटों की लगातार खोजबीन के बाद सूरज कुमार को भी कोडरमा से हिरासत में ले लिया गया.

इस बीच पुलिस ने मृतक निखिल रंजन के घर वालों को इस की सूचना दी और पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार के हवाले कर दिया है.

मृतक निखिल रंजन के पिता ऋषिदेव प्रसाद सिंह ने आरोपी आशुतोष पर आरोप लगाया कि उन के बेटे के साथ जो हुआ वह कोई घटना नहीं है बल्कि सोची समझी साजिश के तहत उस की हत्या की गई.

उन का आरोप था कि आशुतोष सटोरियों से पैसों की उगाही कराता था और पैसों के चक्कर में ही उस ने निखिल की हत्या की. उन्होंने इस की जांच सीबीआई से कराने की मांग की.

आशुतोष के पिता भी रिटायर्ड जज हैं. वह भी इस घटना पर हैरान हैं. आशुतोष कुमार का कहना है कि उस ने यह सब जानबूझ कर नहीं किया, बल्कि शराब के नशे में गलती से गोली चल गई. उसे अपने दोस्त के मरने का बहुत दुख है.

बहरहाल, पुलिस ने ट्रेनी डीएसपी आशुतोष कुमार, सौरभ कुमार और सूरज कुमार को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया.

Top 10 Crime Story in Hindi: टॉप 10 बेस्ट क्राइम कहानियां हिंदी में

Crime Story in Hindi– इस लेख में हम आपके लिए लेकर आए हैं, सरस सलिल की  Top 10 Crime Story in Hindi 2021. इन क्राइम स्टोरी को आप पढ़कर ये जान पाएंगे कि समाज, परिवार और रिश्तों की आड़ में लोग किस तरह अपराध करते हैं. घटना के तह तक जाने के बाद पता चलता हेै कि कोई अपना ही आपके साथ साजिश रच रहा था. इन Crime Stories को पढ़कर आप जीवन के कई पहलुओं से परिचित होंगे. तो अगर आप भी Crime Stories पढ़ने के शौकिन हैं तो पढ़िए सरस सलिल की  Top 10 Crime Story in Hindi.

  1. Manohar Kahaniya: चूड़ियों ने खोला हत्या का राज

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना निगोहां के गांव भगवानगंज के रहने वाले सरकारी नौकरी से रिटायर सत्यनारायण ने अपनी बहू रागिनी के रंगढंग से क्षुब्ध हो कर कहा, ‘‘बहू, जब तुम्हारा पति बाहर रहता है तो मायके के ऐसे लोगों को घर में न रोका करो, जो तुम्हारे करीबी न हों. देखने वालों को यह अच्छा नहीं लगता. लोग तरहतरह की बातें करते हैं.’’

सत्यनारायण की बहू रागिनी जिला रायबरेली के थाना बछरावां के गांव भक्तिनखेड़ा की रहने वाली थी. 14 जून, 2012 को सत्यनारायण के बेटे दिलीप के साथ उस की शादी हुई थी. तब से वह ससुराल में ही रहती थी. उस का मायका ससुराल के नजदीक ही था, इसलिए अकसर उस से मिलने के लिए घर के ही नहीं, गांव के लोग भी आते रहते थे. उन में से कुछ लोगों की रिश्तेदारी उस के ससुराल के गांव में थी, इसलिए जब भी उस के मायके का कोई आता, वह रागिनी से भी मिलने चला आता.

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2. रिश्तों से बड़ी मोहब्बत

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कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर पश्चिम में थाना बिल्हौर के तहत एक गांव है अलौलापुर. ज्ञान सिंह कमल इसी गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी गीता कमल के अलावा 2 बेटे विकास, आकाश तथा 2 बेटियां शोभा व विभा थीं. ज्ञान सिंह कमल किसान थे. उन के पास 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. कृषि उपज से ही वह परिवार का भरणपोषण करते थे.

ज्ञान सिंह का बेटा विकास अपने भाईबहनों में सब से बड़ा था. इंटरमीडिएट पास करने के बाद उस ने नौकरी पाने के लिए दौड़धूप की. लेकिन जब नौकरी नहीं मिली तो वह पिता के कृषि कार्य में हाथ बंटाने लगा. उस ने ट्रैक्टर चलाना सीख लिया था. ट्रैक्टर से वह अपनी खेती तो करता ही था, दूसरे काम कर वह अतिरिक्त आमदनी भी करता था. विकास किसानी का काम जरूर करता था, लेकिन ठाटबाट से रहता था.

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3. भाई पर भारी पड़ी बहन की हवस

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गांवों में वैसे भी रात जल्दी हो जाती है और जब दिसंबर की सर्द रात हो तो गांव की गलियों में सन्नाटा पसरना आम बात है. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के कौंधियारा ब्लौक के बड़गोहना गांव में भी ऐसा ही कुछ माहौल था. ज्यादातर घरों की बत्तियां बंद थीं और लोग बिस्तरों में दुबक कर ठंड से मुकाबला कर रहे थे.

लेकिन सर्द हवा से सांयसांय करती गांव की एक गली में 16 साल की नाबालिग लड़की मोबाइल फोन से किसी से हंसहंस कर बातें कर रही थी. वह इस बात से बेखबर थी कि उस को किसी ने देख लिया है. उस लड़की की बातचीत का अंदाज बता रहा था कि दूसरी तरफ वाला शख्स उस का प्रेमी ही हो सकता है.

मांबाप की गैरमौजूदगी में उस लड़की के सिर पर इश्क का भूत सवार था. उस की उम्र 16 साल जरूर थी, लेकिन मोबाइल फोन पर मुहैया इंटरनैट से उस ने सैक्स की काफी जानकारी हासिल कर ली थी, इसीलिए उस ने सर्द रात में अपने सूने घर में प्रेमी को आने का न्योता दे दिया.

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4. पराई मोहब्बत के लिए दी जान

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अरविंद दोहरे अपने काम से शाम को घर लौटा तो उस की पत्नी सरिता के साथ दलबीर सिंह घर में मौजूद था. उस समय दोनों हंसीठिठोली कर रहे थे. उन दोनों को इस तरह करीब देख कर अरविंद का खून खौल उठा. अरविंद को देखते ही दलबीर सिंह तुरंत बाहर चला गया.

उस के जाते ही अरविंद पत्नी पर बरस पड़ा, ‘‘तुम्हारे बारे में जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसे सुन कर अपने आप पर शरम आती है मुझे. मेरी नहीं तो कम से कम परिवार की इज्जत का तो ख्याल करो.’’

‘‘तुम्हें तो लड़ने का बस बहाना चाहिए, जब भी घर आते हो, लड़ने लगते हो. मैं ने भला ऐसा क्या गलत कर दिया, जो मेरे बारे में सुनने को मिल गया.’’ सरिता ने तुनकते हुए कहा तो अरविंद ताव में बोला, ‘‘तुम्हारे और दलबीर के नाजायज रिश्तों की चर्चा पूरे गांव में हो रही है. लोग मुझे अजीब नजरों से देखते हैं. मेरा भाई मुकुंद भी कहता है कि अपनी बीवी को संभालो. सुन कर मेरा सिर शरम से झुक जाता है. आखिर मेरी जिंदगी को तुम क्यों नरक बना रही हो?’’ ‘‘नरक तो तुम ने मेरी जिंदगी बना रखी है. पत्नी को जो सुख चाहिए, तुम ने कभी दिया है मुझे? अपनी कमाई जुआ और शराब में लुटाते हो और बदनाम मुझे कर रहे हो.’’ सरिता  तुनक कर बोली.

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5. बुआ के चक्कर में भतीजे ने गंवाई जान

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वेदराम बेहद सीधासादा और मेहनती युवक था. वह उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के एक चूड़ी कारखाने में काम करता था, जबकि उस के बीवीबच्चे कासगंज जिले के नगला लालजीतगंज में रहते थे. यह वेदराम का पैतृक गांव था. वहीं पर उस का भाई मिट्ठूलाल भी परिवार के साथ रहता था.

जिला कासगंज के ही थाना सहावर का एक गांव है बीनपुर कलां. यहीं के रहने वाले आलम सिंह का बेटा नेकसे अकसर नगला लालजीतगंज में अपनी बुआ के घर आताजाता रहता था. उस की बुआ की शादी वेदराम के भाई मिट्ठूलाल के साथ हुई थी.

वेदराम की पत्नी सुनीता पति की गैरमौजूदगी में भी घर की जिम्मेदारी  ठीकठाक निभा रही थी. वह अपनी बड़ी बेटी की शादी कर चुकी थी. जिंदगी ने कब करवट ले ली, वेदराम को पता ही नहीं चला. पिछले कुछ समय से वेदराम जब भी छुट्टी पर घर जाता था, उसे पत्नी सुनीता के मिजाज में बदलाव देखने को मिलता था. उसे अकसर अपने घर में नेकसे भी बैठा मिलता था.

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6. सगे बेटे ने की साजिश

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अनीता शुक्रवार की शाम पौने 5 बजे अपनी भाभी कंचन वर्मा के घर पहुंची. उस ने दरवाजे पर लगी कालबेल बजाई. लेकिन कई बार घंटी बजाने के बाद भी जब अंदर कोई हलचल नहीं हुई तो उस ने दरवाजे को धक्का दिया. इस से दरवाजा खुल गया.

अनीता अंदर पहुंची. उस ने भाभी को आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. बैडरूम में टीवी चल रहा था और मोबाइल भी बैड पर पड़ा था. तभी उस की नजर बाथरूम की ओर गई. उस ने बाथरूम का दरवाजा खोला तो वह हैरान रह गई. वहां फर्श पर भाभी कंचन बेहोश पड़ी थीं. घर का सामान अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था.

यह सब देखते ही अनीता चीखती हुई बाहर की ओर भागी. उस ने यह जानकारी आसपास के लोगों व भाई कुलदीप वर्मा को दी. यह 19 फरवरी, 2021 की बात है.

अनीता के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास के लोग एकत्र हो गए. अनीता ने बगल में रहने वाली उस की दूसरी भाभी व भाई कुलदीप वर्मा को फोन कर बुलाया.

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7. पराई औरत से मोहब्बत

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2 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी सरिता का शारीरिक आकर्षण बरकरार था. तभी तो जब उस का पति अरविंद दोहरे काम करने कुछ दिनों के लिए घर से बाहर गया तो वह पति के दोस्त दलबीर सिंह की बांहों में चली गई. इस का खामियाजा सरिता को ही इस तरह भुगतना पड़ा कि…

अरविंद दोहरे अपने काम से शाम को घर लौटा तो उस की पत्नी सरिता के साथ दलबीर सिंह घर में मौजूद था. उस समय दोनों हंसीठिठोली कर रहे थे. उन दोनों को इस तरह करीब देख कर अरविंद का खून खौल उठा. अरविंद को देखते ही दलबीर सिंह तुरंत बाहर चला गया.

उस के जाते ही अरविंद पत्नी पर बरस पड़ा, ‘‘तुम्हारे बारे में जो कुछ सुनने को मिल रहा है, उसे सुन कर अपने आप पर शरम आती है मुझे. मेरी नहीं तो कम से कम परिवार की इज्जत का तो ख्याल करो.’’

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8. चरित्रहीन कंचन

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रामकुमार की जानकारी में अपनी पत्नी कंचन की कुछ ऐसी बातें आई थीं, जिस के बाद कंचन उस के लिए अविश्वसनीय हो गई थी. बताने वाले ने रामकुमार को यह तक कह दिया, ‘‘कैसे पति हो तुम, घर वाली पर तुम्हारा जरा भी अकुंश नहीं. इधर तुम काम पर निकले, उधर कंचन सजधज कर घर से निकल जाती है. दिन भर अपने यार के साथ ऐश करती है और शाम को तुम्हारे आने से पहले घर पहुंच जाती है.’’

रामकुमार कंचन पर अगाध भरोसा करता था. पति अगर पत्नी पर भरोसा न करे तो किस पर करे. यही कारण था कि रामकुमार को उस व्यक्ति की बात पर विश्वास नहीं हुआ. वह बोला, ‘‘हमारी तुम्हारी कोई नाराजगी या आपसी रंजिश नहीं है, मैं ने कभी तुम्हारा बुरा नहीं किया. इस के बावजूद तुम मेरी पत्नी को किसलिए बदनाम कर रहे हो, मैं नहीं जानता. हां, इतना जरूर जानता हूं कि कंचन मेकअपबाज नहीं है. शाम को जब मैं घर पहुंचता हूं तो वह सजीधजी कतई नहीं मिलती.’’

‘‘कंचन जैसी औरतें पति की आंखों में धूल झोंकने का हुनर बहुत अच्छी तरह जानती हैं.’’ उस व्यक्ति ने बताया, ‘‘तुम्हें शक न हो, इसलिए वह मेकअप धो कर घर के कपड़े पहन लेती होगी.’’

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9. जेठ के चक्कर में पति की हत्या

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राजस्थान के उदयपुर शहर को झीलों की नगरी के नाम से जाना जाता है. इसी शहर के प्रतापनगर थाने के अंतर्गत उदयसागर झील स्थित है. 17 नवंबर, 2020 को लोगों ने उदयसागर झील में एक बोरा पानी के ऊपर तैरता देखा. लग रहा था जैसे कि उस में कोई चीज बंधी हो. किसी ने इस की सूचना प्रतापनगर थाने में फोन द्वारा दे दी.

सूचना पा कर थानाप्रभारी विवेक सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे. उन्होंने झील से बोरा निकलवाया. जब बोरा खोला गया तो उस में किसी अधेड़ उम्र के व्यक्ति का शव निकला. मृतक की उम्र 45 वर्ष के आसपास लग रही थी.

मृतक ने पैंटशर्ट पहनी हुई थी. चेहरे से लग रहा था कि वह असम, मणिपुर इलाके का है. मृतक की जामातलाशी में कुछ नहीं मिला था, जिस से कि मृतक की शिनाख्त हो पाती. शव की शिनाख्त नहीं होने पर कागजी काररवाई कर शव को राजकीय अस्पताल की मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दिया.

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10. नौकर के प्यार में

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बात 26 मार्च, 2021 की सुबह 7 बजे की है. राजस्थान के बारां जिले के गांव आखाखेड़ी के रहने वाले मास्टर प्रेमनारायण मीणा के यहां उन का भतीजा राजू दूध लेने पहुंचा तो उन के घर का मुख्य गेट भिड़ा हुआ था. दरवाजा धक्का देने पर खुला तो भतीजा घर में चला गया. उस की नजर जैसे ही आंगन में चारपाई पर पड़ी तो वहां का मंजर देख कर वह कांप गया. बिस्तर पर चाचा प्रेमनारायण की खून सनी लाश पड़ी थी.

यह देख कर भतीजा चीखनेचिल्लाने लगा. आवाज सुन कर प्रेमनारायण की पत्नी रुक्मिणी (40 वर्ष) अपने कमरे से बाहर आई. बाहर आते समय वह बोली, ‘‘क्यों रो रहे हो राजू, क्या हुआ?’’

मगर जैसे ही रुक्मिणी की नजर चारपाई पर खून से लथपथ पड़े पति पर पड़ी तो वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगी. रोने की आवाज मृतक के बच्चों वैभव मीणा और ऋचा मीणा ने भी कमरे में सुनी. वह दरवाजा पीटने लगे कि क्या हुआ. क्यों रो रही हो. दरवाजा खोलो. उन भाईबहनों के दरवाजे के बाहर कुंडी लगी थी. कुंडी खोली तो भाईबहन बाहर आ कर पिता की लाश देख कर रोने लगे.

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