पति ने दिया बेवफा पत्नी और उसके लवर को अंजाम

मंगलवार की शाम लगभग 4 बजे का समय था. उसी समय आगरा जिले के थाना मनसुखपुरा में खून से सने हाथ और कपड़ों में एक युवक पहुंचा. पहरे की ड्यूटी पर तैनात सिपाही के पास जा कर वह बोला, ‘‘स…स…साहब, बड़े साहब कहां हैं, मुझे उन से कुछ बात कहनी है.’’

थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस समय थाना प्रांगण में धूप में बैठे कामकाज निपटा रहे थे. उन्होंने उस युवक की बात सुन ली थी, नजरें उठा कर उन्होंने उस की ओर देखा और सिपाही से अपने पास लाने को कहा. सिपाही उस शख्स को थानाप्रभारी के पास ले गया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस से कुछ पूछते, इस से पहले ही वह शख्स बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम ऋषि तोमर है. मैं गांव बड़ापुरा में रहता हूं. मैं अपनी पत्नी और उस के प्रेमी की हत्या कर के आया हूं. दोनों की लाशें मेरे घर में पड़ी हुई हैं.’’

ऋषि तोमर के मुंह से 2 हत्याओं की बात सुन कर ओमप्रकाश सिंह दंग रह गए. युवक की बात सुन कर थानाप्रभारी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन ही खिसक गई. वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी ऋषि को हैरानी से देखने लगे.

थानाप्रभारी के इशारे पर एक सिपाही ने उसे हिरासत में ले लिया. ओमप्रकाश सिंह ने टेबल पर रखे कागजों व डायरी को समेटा और ऋषि को अपनी जीप में बैठा कर मौकाएवारदात पर निकल गए.

हत्यारोपी ऋषि तोमर के साथ पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां का मंजर देख होश उड़ गए. कमरे में घुसते ही फर्श पर एक युवती व एक युवक के रक्तरंजित शव पड़े दिखाई दिए. कमरे के अंदर ही चारपाई के पास फावड़ा पड़ा था.

दोनों मृतकों के सिर व गले पर कई घाव थे. लग रहा था कि उन के ऊपर उसी फावडे़ से प्रहार कर उन की हत्या की गई थी. कमरे का फर्श खून से लाल था. थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना से अवगत कराया.

डबल मर्डर की जानकारी मिलते ही मौके पर एसपी (पश्चिमी) अखिलेश नारायण सिंह, सीओ (पिनाहट) सत्यम कुमार पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह से घटना की जानकारी ली. वहीं पुलिस द्वारा मृतक युवक दीपक के घर वालों को भी सूचना दी गई.

कुछ ही देर में दीपक के घर वाले रोतेबिलखते घटनास्थल पर आ गए थे. इस बीच मौके पर भीड़ एकत्र हो गई. ग्रामीणों को पुलिस के आने के बाद ही पता चला था कि घर में 2 मर्डर हो गए हैं. इस से गांव में सनसनी फैल गई. जिस ने भी घटना के बारे में सुना, दंग रह गया.

दोहरे हत्याकांड ने लोगों का दिल दहला दिया. पुलिस ने आला कत्ल फावड़ा और दोनों लाशों को कब्जे में लेने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. इस के बाद थानाप्रभारी ने हत्यारोपी ऋषि तोमर से पूछताछ की तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला आगरा के थाना मनसुखपुरा के गांव बड़ापुरा के रहने वाले ऋषि तोमर की शादी लक्ष्मी से हुई थी. लक्ष्मी से शादी कर के ऋषि तो खुश था, लेकिन लक्ष्मी उस से खुश नहीं थी. क्योंकि ऋषि उस की चाहत के अनुरूप नहीं था.

ऋषि मेहनती तो था, लेकिन उस में कमी यह थी कि वह सीधासादा युवक था. वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था. बड़ापुरा में कोई अच्छा काम न मिलने पर वह दिल्ली जा कर नौकरी करने लगा.

करीब 2 साल पहले की बात है. ससुराल में ही लक्ष्मी की मुलाकात यहीं के रहने वाले दीपक से हो गई. दोनों की नजरें मिलीं तो उन्होंने एकदूसरे के दिलों में जगह बना ली.

पहली ही नजर में खूबसूरत लक्ष्मी पर दीपक मर मिटा था तो गबरू जवान दीपक को देख कर लक्ष्मी भी बेचैन हो उठी थी. एकदूसरे को पाने की चाहत में उन के मन में हिलोरें उठने लगीं. पर भीड़ के चलते वे आपस में कोई बात नहीं कर सके थे, लेकिन आंखों में झांक कर वे एकदूसरे के दिल की बातें जरूर जान गए थे.

बाजार में मुलाकातों का सिलसिला चलने लगा. मौका मिलने पर वे बात भी करने लगे. दीपक लक्ष्मी के पति ऋषि से स्मार्ट भी था और तेजतर्रार भी. बलिष्ठ शरीर का दीपक बातें भी मजेदार करता था. भले ही लक्ष्मी के 3 बच्चे हो गए थे, लेकिन शुरू से ही उस के मन में पति के प्रति कोई भावनात्मक लगाव पैदा नहीं हुआ था.

लक्ष्मी दीपक को चाहने लगी थी. दीपक हर हाल में उसे पाना चाहता था. लक्ष्मी ने दीपक को बता दिया था कि उस का पति दिल्ली में नौकरी करता है और वह बड़ापुरा में अपनी बेटी के साथ अकेली रहती है, जबकि उस के 2 बच्चे अपने दादादादी के पास रहते थे.

मौका मिलने पर लक्ष्मी ने एक दिन दीपक को फोन कर अपने गांव बुला लिया. वहां पहुंच कर इधरउधर की बातों और हंसीमजाक के बीच दीपक ने लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले लिया. लक्ष्मी ने इस का विरोध नहीं किया.

दीपक के हाथों का स्पर्श कुछ अलग था. लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर दीपक सुधबुध खो कर एकटक उस के चेहरे पर निगाहें टिकाए रहा. फिर लक्ष्मी भी सीमाएं लांघने लगी. इस के बाद दोनों ने मर्यादा की दीवार तोड़ डाली.

एक बार हसरतें पूरी होने के बाद उन की हिम्मत बढ़ गई. अब दीपक को जब भी मौका मिलता, उस के घर पहुंच जाता था. ऋषि के दिल्ली जाते ही लक्ष्मी उसे बुला लेती फिर दोनों ऐश करते. अवैध संबंधों का यह सिलसिला करीब 2 सालों तक ऐसे ही चलता रहा.

लेकिन उन का यह खेल ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिप नहीं सका. किसी तरह पड़ोसियों को लक्ष्मी और दीपक के अवैध संबंधों की भनक लग गई. ऋषि के परिचितों ने कई बार उसे उस की पत्नी और दीपक के संबंधों की बात बताई.

लेकिन वह इतना सीधासादा था कि उस ने परिचितों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उसे अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास था, जबकि सच्चाई यह थी कि लक्ष्मी पति की आंखों में धूल झोंक कर हसरतें पूरी कर रही थी.

4 फरवरी, 2019 को ऋषि जब दिल्ली से अपने गांव आया तो उस ने अपनी पत्नी और दीपक को ले कर लोगों से तरहतरह की बातें सुनीं. अब ऋषि का धैर्य जवाब देने लगा. अब उस से पत्नी की बेवफाई और बेहयाई बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह पत्नी की सच्चाई का पता लगा कर रहेगा.

ऋषि के दिल्ली जाने के बाद उस की बड़ी बेटी अपनी मां लक्ष्मी के साथ रहती थी और एक बेटा और एक बेटी दादादादी के पास गांव राजाखेड़ा, जिला धौलपुर, राजस्थान में रहते थे.

ऋषि के दिमाग में पत्नी के चरित्र को ले कर शक पूरी तरह बैठ गया था. वह इस बारे में लक्ष्मी से पूछता तो घर में क्लेश हो जाता था. पत्नी हर बार उस की कसम खा कर यह भरोसा दिला देती थी कि वह गलत नहीं है बल्कि लोग उसे बेवजह बदनाम कर रहे हैं.

घटना से एक दिन पूर्व 4 फरवरी, 2019 को ऋषि दिल्ली से गांव आया था. दूसरे दिन उस ने जरूरी काम से रिश्तेदारी में जाने तथा वहां 2 दिन रुक कर घर लौटने की बात लक्ष्मी से कही थी. बेटी स्कूल गई थी. इत्तफाक से ऋषि अपना मोबाइल घर भूल गया था, लेकिन लक्ष्मी को यह पता नहीं था. करीब 2 घंटे बाद मोबाइल लेने जब घर आया तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था.

उस ने दरवाजा थपथपाया. पत्नी न तो दरवाजा खोलने के लिए आई और न ही उस ने अंदर से कोई जवाब दिया. तो ऋषि को गुस्सा आ गया और उस ने जोर से धक्का दिया तो कुंडी खुल गई.

जब वह कमरे के अंदर पहुंचा तो पत्नी और उस का प्रेमी दीपक आपत्तिजनक स्थिति में थे. यह देख कर उस का खून खौल उठा. पत्नी की बेवफाई पर ऋषि तड़प कर रह गया. वह अपना आपा खो बैठा. अचानक दरवाजा खुलने से प्रेमी दीपक सकपका गया था.

ऋषि ने सोच लिया कि वह आज दोनों को सबक सिखा कर ही रहेगा. गुस्से में आगबबूला हुए ऋषि कमरे से बाहर आया.

वहां रखा फावड़ा उठा कर उस ने दीपक पर ताबड़तोड़ प्रहार किए. पत्नी लक्ष्मी उसे बचाने के लिए आई तो फावड़े से प्रहार कर उस की भी हत्या कर दी. इस के बाद दोनों की लाशें कमरे में बंद कर वह थाने पहुंच गया.

ऋषि ने पुलिस को बताया कि उसे दोनों की हत्या पर कोई पछतावा नहीं है. यह कदम उसे बहुत पहले ही उठा लेना चाहिए था. पत्नी ने उस का भरोसा तोड़ा था. उस ने तो पत्नी पर कई साल भरोसा किया.

उधर दीपक के परिजन इस घटना को साजिश बता रहे थे. उन का आरोप था कि दीपक को फोन कर के ऋषि ने अपने यहां बहाने से बुलाया था. घर में बंधक बना कर उस की हत्या कर दी गई. उन्होंने शक जताया कि इस हत्याकांड में अकेला ऋषि शामिल नहीं है, उस के साथ अन्य लोग भी जरूर शामिल रहे होंगे.

मृतक दीपक के चाचा राजेंद्र ने ऋषि तोमर एवं अज्ञात के खिलाफ तहरीर दे कर हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई.

पुलिस ने हत्यारोपी ऋषि से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया.

उधर पोस्टमार्टम के बाद लक्ष्मी के शव को लेने उस के परिवार के लोग नहीं पहुंचे, जबकि दीपक के शव को उस के घर वाले ले गए.

हालांकि मृतका लक्ष्मी के परिजनों से पुलिस ने संपर्क भी किया, लेकिन उन्होंने अनसुनी कर दी. इस के बाद पुलिस ने लक्ष्मी के शव का अंतिम संस्कार कर दिया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह मामले की तफ्तीश कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

दो चूक पर, पति बना खूनी, अपनी ही पत्नी की कर दी हत्या

उत्तर प्रदेश के महानगर मुरादाबाद का एक इलाका है लाइनपार. समय के साथ अब यह इलाका काफी विकसित हो चुका है, जिस के चलते अब यहां की आबादी काफी बढ़ गई है. बात 9 मई, 2019 की है. रात के करीब साढ़े 11 बजे थे. दुर्गानगर, लाइनपार के अधिकांश लोग उस समय अपनेअपने घरों में सो चुके थे. तभी अचानक हुए एक फायर की आवाज ने कुछ लोगों की नींद उड़ा दी.

गोली की आवाज सुनते ही कुछ लोग अपनेअपने घरों से बाहर निकल आए और जानने की कोशिश करने लगे कि आवाज कहां से आई. पता चला कि गोली चलने की आवाज विष्णु शर्मा के घर से आई थी. उस के घर का दरवाजा भी खुला हुआ था.

लोगों ने जिज्ञासावश उस के घर में झांक कर देखा तो एक महिला फर्श पर गिरी पड़ी थी और फर्श पर काफी खून भी फैला हुआ था. यह देख कर किसी की भी उस के घर के अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई. मामले की गंभीरता को देखते हुए किसी ने फोन द्वारा सूचना थाना मझोला को दे दी. थानाप्रभारी विकास सक्सेना रात की गश्त पर निकलने वाले थे. उन्हें यह सूचना मिली तो पुलिस टीम के साथ वह दुर्गानगर के लिए रवाना हो गए.

दुर्गानगर में लोगों से पूछताछ करते हुए पुलिस विष्णु शर्मा के घर पहुंच गई. उस समय वहां खड़े पड़ोस के लोग कानाफूसी कर रहे थे. विष्णु शर्मा के घर का दरवाजा खुला हुआ था. थानाप्रभारी टीम के साथ उस के घर में घुस गए. उन के पीछेपीछे मोहल्ले के लोग भी आ गए. तभी उन्होंने देखा कि फर्श पर एक महिला लहूलुहान पड़ी हुई थी. वहीं पर एक शख्स खड़ा था. उस ने अपना नाम विष्णु शर्मा बताया. वहीं बिछी चारपाई पर एक देशी तमंचा भी रखा हुआ था.

पुलिस ने सब से पहले वह तमंचा अपने कब्जे में लिया. इस के बाद थानाप्रभारी और मोहल्ले के लोगों ने घायलावस्था में पड़ी महिला की नब्ज टटोली तो पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. विष्णु शर्मा ने बताया कि मृतका उस की पत्नी आशु है. विष्णु ने बताया कि इस ने आत्महत्या कर ली है. तमंचा यह साथ लाई थी.
विष्णु की बात सुन कर थानाप्रभारी चौंकते हुए बोले, ‘‘क्या यह तुम्हारे साथ नहीं रहती थी?’’

‘‘नहीं सर, यह पिछले काफी दिनों से दोनों बच्चों को ले कर अपने प्रेमी सनी के साथ कांशीराम नगर में रह रही थी.’’ विष्णु ने बताया. थानाप्रभारी ने इस बिंदु पर फिलहाल विस्तार से जांच करना जरूरी नहीं समझा. उन्होंने हत्या के इस मामले की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर रात में ही सीओ (सिविल लाइंस) राजेश कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने अगले दिन जरूरी काररवाई कर के आशु की लाश पोस्टमार्टम हाउस पहुंचा दी. चूंकि घटना के संबंध में पुलिस को विष्णु शर्मा से पूछताछ करनी थी, इसलिए वह उसे थाना मझोला ले गई. सीओ राजेश कुमार भी मझोला थाने पहुंच गए.

सीओ राजेश कुमार की मौजूदगी में थानाप्रभारी विकास सक्सेना ने विष्णु शर्मा से पूछताछ की. उस ने बताया, ‘‘करीब 8-9 महीने पहले आशु अपने पुराने प्रेमी सनी नागपाल के साथ भाग गई थी. अपनी दोनों बेटियों को भी वह साथ ले गई थी. पिछले कई दिनों से आशु मेरे ऊपर काफी दबाव बना रही थी कि मैं दोनों बेटियों को अपने पास रख लूं. लेकिन मैं ने उन्हें पास रखने से मना कर दिया था.

‘‘कल रात साढ़े 11 बजे उस ने आ कर दरवाजा पीटना शुरू कर दिया. जैसे ही मैं ने किवाड़ खोले, आशु अंदर आ गई. बाहर उस का प्रेमी सनी नागपाल और दोनों बेटियां खड़ी थीं. घर में घुसते ही वह मुझ से इस बात पर झगड़ने लगी कि मैं बेटियों को अपने पास रख लूं. जिद में मैं ने भी मना कर दिया.

‘‘तभी उस ने अपने साथ लाए तमंचे से खुद को गोली मार ली. मैं ने उसे रोकना भी चाहा लेकिन तब तक वह गोली चला चुकी थी. आशु के नीचे गिरते ही सनी नागपाल दोनों बच्चों को अपने साथ ले कर भाग गया.’’

पूछताछ के दौरान थानाप्रभारी को विष्णु शर्मा के मुंह से शराब की दुर्गंध आती महसूस हुई तो उन्होंने पूछा, ‘‘तुम ने शराब पी रखी है?’’
‘‘हां सर, मैं ने कल रात पी थी.’’ विष्णु शर्मा ने कहा.

दोनों पुलिस अधिकारियों को विष्णु की बातों में झोल नजर आ रहा था. इस की वजह यह थी कि जिस तमंचे से आशु को गोली लगी थी, वह उस की लाश से दूर चारपाई पर रखा था. ऐसा संभव नहीं था कि खुद को गोली मारने के बाद वह चारपाई पर तमंचा रखने जाए. अगर आशु ने खुद को गोली मारी होती तो तमंचा उस की लाश के नजदीक ही पड़ा होता.

सीओ राजेश कुमार के निर्देश पर थानाप्रभारी ने विष्णु शर्मा से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने कहा कि आशु की हत्या उस के हाथों ही हुई है. पत्नी की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह हैरान कर देने वाली निकली—

आशु शर्मा का प्रेमी सनी नागपाल मूलरूप से मुरादाबाद के लाजपतनगर का रहने वाला था. उस के पिता कोयला कारोबारी हैं. उन्होंने कोयले का डिपो गोविंदनगर सरस्वती विहार में बना रखा था. डिपो के पास में ही आशु का घर था.

सनी नागपाल कारोबार के सिलसिले में अकसर कोयले की डिपो पर आता रहता था. वहीं पर उस की मुलाकात आशु से हुई थी. यह करीब 10 साल पुरानी बात है. यह मुलाकात पहले दोस्ती में बदली और फिर प्यार में. सनी नागपाल पैसे वाला था, इसलिए वह आशु पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था.

इसी दौरान आशु के घर वालों ने उस का रिश्ता शहर के ही दुर्गानगर निवासी विष्णु शर्मा से कर दिया. विष्णु उस समय बीए में पढ़ रहा था. सन 2009 में विष्णु शर्मा और आशु का सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह हो गया.

विष्णु के पिता अशोक शर्मा थाना हयातनगर, संभल के कस्बा एंचोली के रहने वाले थे. वह खेतीकिसानी करते थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. विष्णु पत्नी के साथ मुरादाबाद में रहता था. आटा, दाल, चावल आदि सामान उस के गांव से आ जाता था. विष्णु व आशु दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे.

इसी दौरान आशु ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की. आशु अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी. लिहाजा विष्णु ने अपने खर्च से आशु को अंगरेजी विषय से एमए कराया. इसी दौरान आशु 2 बेटियों की मां बन गई. ग्रैजुएशन के बाद भी विष्णु बेरोजगार था. उस की सास कृष्णा शर्मा समाजवादी पार्टी की नेता थीं, उन्होंने पार्षद का चुनाव भी लड़ा था.

सास ने दिलाई नौकरी

अपनी पहुंच के चलते उन्होंने दामाद विष्णु की भारतीय खाद्य निगम में संविदा के आधार पर मुंशी के पद पर नौकरी लगवा दी. एफसीआई का गोदाम मुरादाबाद के लाइनपार में ही था, विष्णु के घर के एकदम पास था. वह मन लगा कर नौकरी करने लगा.

आशु शर्मा शुरू से ही जिद्दी और महत्त्वाकांक्षी थी. उस के शौक महंगे थे. मौल में शौपिंग करना, स्टाइलिश कपड़े पहनना उस का शगल था. शुरुआती सालों में विष्णु पत्नी की हर जरूरत पूरी करता रहा. लेकिन बाद में वह पत्नी की बढ़ती महत्त्वाकांक्षाओं और खर्च को पूरा करने में असफल हो गया तो उस ने पत्नी को मौल में शौपिंग करानी बंद कर दी.

घटना से करीब एक साल पहले आशु अचानक बिना बताए दोनों बेटियों को साथ ले कर घर से गायब हो गई. विष्णु व आशु के मायके वालों ने उसे बहुत तलाश किया, पर वह नहीं मिली. इस पर विष्णु ने पत्नी की गुमशुदगी थाना मझोला में दर्ज करवा दी.
बाद में पता चला कि वह अपने पुराने प्रेमी सनी नागपाल के साथ कांशीराम नगर में किराए का कमरा ले कर लिवइन रिलेशन में रह रही है. जब यह बात विष्णु और आशु के मायके वालों को पता चली तो उन्होंने आशु को समझाया और घर चलने को कहा. लेकिन आशु अपने प्रेमी सनी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई.

आशु की शादी विष्णु से होने के बाद भी उस का प्रेमी सनी नागपाल उसे भूला नहीं था. 2 बच्चों की मां बनने के बाद भी आशु बनठन कर रहती थी. लगता ही नहीं था कि वह 2 बच्चों की मां है.

आशु जानती थी कि उस का प्रेमी सनी पैसे वाला है. उस की कभीकभी सनी से फोन पर बात होती रहती थी. सनी नागपाल उसे पहले की तरह ही चाहता था. साथसाथ गुजारे पुराने पलों को दोनों भूले नहीं थे. फलस्वरूप दोनों में फिर से नजदीकियां बढ़ने लगी.

आशु को लग रहा था कि विष्णु के साथ रह कर उस के सपने पूरे नहीं हो सकेंगे, लिहाजा वह पति को छोड़ कर प्रेमी सनी नागपाल के पास पहुंच गई.
इस के बाद दोनों तरफ के रिश्तेदारों ने कई बार पंचायत की लेकिन आशु की जिद की वजह से यह कोशिश भी नाकाम साबित हुई. करीब 10 महीने से आशु अपने प्रेमी सनी नागपाल के साथ रह रही थी.

उधर सनी नागपाल भी शादीशुदा था. उस की पत्नी का नाम सिमरन था और वह 2 बच्चों की मां थी. उस की बड़ी बेटी 9 साल की और बेटा 5 साल का था.
जब सनी नागपाल की पत्नी सिमरन को पता चला कि उस का पति अपनी प्रेमिका आशु के साथ कांशीराम नगर में रह रहा है, तो उस ने मार्च 2019 में महिला थाने में पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा दी.

रिपोर्ट दर्ज हो जाने के बाद महिला थाने की पुलिस ने सनी नागपाल को गिरफ्तार कर लिया. उस के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला दे कर कहा कि जब ये दोनों बालिग हैं तो दोनों को साथ रहने की आजादी है.

आशु जब अपनी मरजी से विष्णु के साथ रह रही है तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. इस के बाद पुलिस ने सनी नागपाल को 41ए का नोटिस दे कर थाने से ही जमानत पर रिहा कर दिया.

आशु को पति से प्रेमी लगा प्यारा

आशु शर्मा खुले हाथ खर्च करना चाहती थी, जो उस के पति विष्णु के बूते की बात नहीं थी, इसलिए वह पति को छोड़ कर प्रेमी सनी के साथ रह रही थी.

उधर सनी नागपाल ने आशु से कहा, ‘‘आशु, देखो मैं ने तुम्हारी खातिर अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को छोड़ दिया है. इसलिए अब तुम भी अपनी दोनों बेटियों को विष्णु के पास छोड़ आओ. उन की परवरिश विष्णु करेगा. फिर हम दोनों आराम से रहेंगे.’’

घटना से एक दिन पहले आशु ने अपनी बड़ी बहन नीरज शर्मा से फोन पर बात की. तब उस ने कहा कि दीदी मैं अब बहुत परेशान हो गई हूं. अपनी दोनों बेटियों को विष्णु को सौंप कर सेटल होना चाहती हूं.उधर विष्णु को जब अपनी पत्नी की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने शराब पीनी शुरू कर दी. आशु भी आए दिन विष्णु को फोन करती रहती थी कि बच्चे याद कर रहे हैं. वे अब तुम्हारे पास ही रहेंगे. क्योंकि बच्चों के असली पिता तुम ही हो.

आशु वाट्सऐप से बच्चों की तसवीरें विष्णु के फोन पर भेजती रहती थी. कई बार उस ने विष्णु को नानवेज खाते हुए भी फोटो भेजे थे. विष्णु पूरी तरह से शाकाहारी था, इसलिए उसे आशु पर बहुत गुस्सा आया कि उस ने बच्चों को नानवेज खाना सिखा दिया. उस ने पत्नी को बहुत समझाया कि वह बच्चों को नानवेज न खिलाए और उन्हें ले कर आ जाए, लेकिन वह नहीं मानी.

घटना वाले दिन 9 मई, 2019 की रात में आशु व सनी नागपाल ने दोनों बेटियों के साथ एक होटल में खाना खाया. वहीं पर दोनों ने प्लान बनाया कि दोनों बेटियों को विष्णु के हवाले कर आएंगे. आशु बोली, ‘‘रात घिरने दो. मैं जब विष्णु के पास जाऊंगी तो वह मेरी बात नहीं टालेगा. वैसे भी वह रात में ड्रिंक किए होगा. मेरी बात मान लेगा.’’

आशु की दोनों बेटियों ने मना किया कि हमें पापा के पास क्यों ले जा रहे हो. हम वहां पर क्या करेंगे. घर पर वह अकेले रहते हैं, खुद जब पापा ड्यूटी पर चले जाया करेंगे तो हमें कौन देखेगा. हम वहां बोर हो जाएंगे. पर आशु ने उन की बातों को अनसुना कर दिया.

योजना के अनुसार सनी नागपाल व आशु अपनी दोनों बेटियों के साथ 9 मई की रात करीब साढ़े 11 बजे विष्णु के दुर्गानगर स्थित घर पहुंचे. उस समय विष्णु गहरी नींद में सोया हुआ था. वहां पहुंच कर आशु ने दरवाजा पीटना शुरू किया. इस से विष्णु की नींद टूट गई. वह उठा और अपनी सुरक्षा के लिए अंटी में .315 बोर का तमंचा लोड करके रख लिया. उस समय वह शराब के नशे में था.
दरवाजे पर पहुंच कर विष्णु ने आवाज लगाई, ‘‘कौन है?’’

तो बाहर से आवाज आई, ‘‘मैं तुम्हारी पत्नी आशु हूं. कुंडी खोलो, कुछ बात करनी है.’’
‘‘बात करनी है तो कल दिन में आना.’’ विष्णु ने कहा.
तब आशु ने जोर दे कर कहा, ‘‘देखो कोई जरूरी बात करनी है. दरवाजा तो खोलो.’’
विष्णु ने दरवाजा खोला तो देखा, बाहर उस का सनी, जिस ने उस का घर उजाड़ दिया था, दोनों बेटियों को लिए खड़ा था.
विष्णु बोला, ‘‘बताओ, क्या काम है?’’

‘‘देखो, मुझे सेटल होना है. बच्चियां तुम्हारी हैं इसलिए इन्हें तुम्हारे हवाले करने आई हूं. आज से तुम इन दोनों की परवरिश करना.’’ आशु बोली.विष्णु ने साफ मना कर दिया कि जो लोग मांस खाते हैं, उन से उस का कोई संबंध नहीं है, ‘‘तुम ही बेटियों को मांस खिलाती हो.’’
इस बात को ले कर आशु व विष्णु में बहस होने लगी. बात मारपीट तक पहुंच गई. दोनों में मारपीट व गुत्थमगुत्था होने लगी. तभी विष्णु ने अंटी में लगा तमंचा निकाल लिया. तमंचा देख कर आशु पहले तो घबरा गई फिर उस ने तमंचा छीनने की कोशिश की. इसी दौरान विष्णु ने फायर कर दिया. गोली लगते ही आशु जमीन पर गिर पड़ी. कुछ देर छटपटाने के बाद उस की मृत्यु हो गई.

फायर की आवाज सुन कर मकान के बाहर खड़ा सनी उस की दोनों बेटियों को ले कर भाग खड़ा हुआ. विष्णु ने तमंचा वहीं चारपाई पर रख दिया.
विष्णु शर्मा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर मुरादाबाद की जेल भेज दिया. उधर आशु का प्रेमी उस की दोनों बेटियों को ले कर रात में ही आशु की बहन नीरज शर्मा के घर पीतल बस्ती पहुंचा.
वह बोला, ‘‘आशु का विष्णु से झगड़ा हो गया है. तुम इन लड़कियों को अपने पास रख लो.’’

नीरज ने लड़कियों को रखने से मना कर दिया. आशु का फोन सनी नागपाल के पास था. पुलिस ने फोन किया तो फोन सनी नागपाल ने उठाया. पुलिस ने पूछा कि लड़कियां कहां हैं. उस ने बताया कि लड़कियां मेरे पास हैं. पर उस ने पुलिस को जगह नहीं बताई कि वह कहां है.

थानाप्रभारी विकास सक्सेना के नेतृत्व में एक टीम सनी नागपाल को उस के फोन की लोकेशन के आधार पर तलाशने लगी लेकिन उस के फोन की लोकेशन बारबार बदलती रही. इस के अलावा टीम उस के संभावित ठिकानों पर दबिश देने लगी.
सनी गिरफ्तारी से बचने के लिए साईं अस्पताल के सामने कांशीराम गेट के पास पहुंच गया. वहां से वह दिल्ली भागने की फिराक में था.

वह दिल्ली जाने वाली बस का इंतजार कर रहा था. तभी मुखबिर की सूचना पर पुलिस टीम ने उसे हिरासत में ले लिया. यह 19 मई, 2019 की बात है. पुलिस ने सनी नागपाल से पूछताछ कर उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

सौजन्य- मनोहर कहानियां, जुलाई 2019

टीम इंडिया के कैप्‍टन Rohit Sharma दोबारा बने पापा, नन्‍हे हिटमैन की फोटो वायरल

कुछ महीने पहले यह चर्चा काफी तेज थे क‍ि रोहित(Rohit) की पत्‍नी रितिका(Ritika) प्रैग्‍नेंट है लेकिन इस पर कपल में से किसी ने खुल कर कुछ कहा नहीं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार रोहित की वाइफ रितिका ने 15 नवंबर की देर रात को बेटे को जन्‍म दिया है. ऐसा कहा जा रहा है कि रोहित ने इसी वजह से स्‍पोर्ट्स से थोड़ा ब्रेक लिया था और टीम के साथ आष्‍ट्रेलिया (Australia) नहीं पहुंचे. अब ऐसा कहा जा रहा है कि वे 22 नवंबर से आष्‍ट्रेलिया के पर्थ में टेस्‍ट मैच खेल सकते हैं. रोहित और रीतिका साल 2015 में शादी के बंधन में बंधे थे. साल 2018 में उनकी बेटी सायरा का जन्‍म हुआ. यह कपल अकसर अपनी बेटी के साथ सैरसपाटे करते देखा जाता है. सोशल मीडिया पर एक फोटो वायरल हो रहा है, जो न्‍यू बौर्न बेबी और उनके पैरेंट्स का बताया जा रहा है.

केएल राहुल भी इस लाइन ने

इन दिनों इंडियन क्रिकेट टीम (Indian Cricket team)से केवल गुड न्‍यूज ही आ रही है. पिछले दिनों यह खबर आई कि टीम इंडिया के बैट्समैन केएल राहुल भी पापा बनने वाले हैं. केएल राहुल की शादी एक्‍टर सुनील शेट्टी(Sunil Shetty) की बिटिया अथिया शेट्टी के साथ हुई है. जनवरी 2025 में अथिया बच्‍चे को जन्‍म दे सकती हैं. टीम इंडिया के फैंस को पता है कि साल 2024 में ही विराट कोहली(Virat Kohli) भी दोबारा पिता बने. कुछ दिन पहले उनके जन्‍मदिन पर उनकी पत्‍नी अनुष्‍का शर्मा (Anushka Sharma) ने उनकी एक फोटो पोस्‍ट की थी, जिसमें वह अपने बेटे और बेटी के साथ दिखे. विराट ने अपने बेटे का नाम अकाय रखा है.

टीम इंडिया का अगला टारगेट आष्‍ट्रेलिया

आष्‍ट्रेलिया के पर्थ में 22 नवंबर से मैच खेला जाएगा. इसके बाद 6 दिसंबर से एडीलेड में भी डेनाइट टेस्‍ट मैच होगा. कहा जा रहा है कि 32 साल बाद टीम इंडिया आष्‍ट्रैलिया में 5 टेस्‍ट मैचों की सीरीज खेलने पहुंची है. उम्‍मीद है कि इस साल पूरी टीम उसी देश में न्‍यू ईयर पार्टी के जश्‍न का आनंद ले क्‍योंकि सीरीज का पांचवा और आखिरी टेस्‍ट मैच 3 जनवरी को खेला जाएगा, जो सिडनी में होगा. वर्ल्‍ड टेस्‍ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने के लिए भारत को वहां पर 4 टेस्‍ट मैच जीतने होंगे इसलिए यह कहा जा सकता है कि टीम को पूरी तरह तैयार रहना होगा.

‘गजबन’ छोरी ने फिर किया कमाल, सपना चौधरी दूसरी बार बनीं बेटे की मां

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी (Sapna Choudhary) ने एक बार फिर से फैंस को सरप्राइज किया है. एक्ट्रेस दोबारा मां बन गई हैं जिसका खुलासा उन्होंने खुद एक स्टेज शो में किया. एक्ट्रेस का ये दूसरा बेटा है. पहले बेटे का नाम सपना ने पोरस रखा था और दूसरे बेटे के नाम का भी खुलासा पंजाबी सिंगर बब्बू मान ने सपना और उनके पति वीर साहू की मौजूदगी में किया.

 

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हरियाणवी डांसर सपना चौधरी अपने गानें, अदाओं और हरियाणी फिल्मों के लिए काफी मशहूर है. सपना चौधरी एक समय पर स्टेज डांसर हुआ करती थी, जहां लाखों की भीड़ उमड़ जाती थी. लेकिन ज्यादा पौपुलर सपना चौधरी तब हुई जब उनके सुसाइड केस की खबरे मीडिया में छा गई थी. इसके बाद सपना चौधरी को बिग बौस में एंट्री मिली थी. सपना चौधरी शो जीत तो नहीं पाई लेकिन शो से पौपुलेरिटी खूब हासिल की और आज भी उनके चाहने वालो की कमी नहीं है.

सपना चौधरी ने अपने फैंस को खुश खबरी दे दी है और अब उनकी दूसरी बार मां बनने की खबर वायरल हो रही है. एक्ट्रेस दोबारा मां बन गई हैं जिसका खुलासा उन्होंने खुद एक स्टेज शो में किया. एक्ट्रेस का ये दूसरा बेटा है. पहले बेटे का नाम सपना ने पोरस रखा था और दूसरे बेटे के नाम का भी खुलासा पंजाबी सिंगर बब्बू मान ने सपना और उनके पति वीर साहू की मौजूदगी में किया गया.

दूसरे बेटे का ये है नाम

सपना चौधरी ने पहली प्रेग्नेंसी के बाद अब दोबारी प्रेग्नेंसी भी फैंस से छिपाई. पहले बेटे के चार साल के होने के बाद अब सपना चौधरी दूसरी बार मां बन गई हैं और उनके बेटे का नाम शाह वीर है. जो एक मुस्लिम नाम है और मराठी क्लचर में काफी पौपुलर नाम है.

बब्बू मान ने किया खुलासा

सपना चौधरी और वीर साहू के दोबारा पेरेंट्स बनने की जानकारी पंजाबी सिंगर बब्बू मान (Babbu Maan) ने स्टेज पर दी. इसमें सपना चौधरी सूट पहने और सिर पर दुपट्टा डाले खड़ी दिखीं तो वहीं वीर साहू व्हाइट कलर का कुर्ता पायजामा पहने नजर आए. सामने हजारों की भीड़ है. तभी बब्बू मान अनाउंस करते हैं कि सपना और वीर के दूसरा बेटा हुआ है. बब्बू मान का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

नवंबर को हुआ था नामकरण

सपना और वीर ने दूसरे बच्चे नामकरण 11 नवंबर को किया. बब्बू मान का ये जो इवेंट था वो हरियाणा के मदनहेड़ी गांव में रखा गया था. जहां पर पंजाब और हरियाणवी इंडस्ट्री के कई सितारे मेहमान बनकर आए थे. रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समारोह में 30 हजार लोग आए थे. जिसमें बब्बू मान ने लाइव परफौर्मेंस दी थी. लोगों ने जैसे ही सपना के दूसरे बेटे का नाम शाह वीर बताया तो वहां मौजूद लोगों ने खूब तालियां और सीटी बजाईं.

आपको बता दें, सपना चौधरी और वीर साहू ने साल 2020 में सीक्रेट वेडिंग की थी और उसके बाद ही पहले बच्चे के जन्म का ऐलान कर दिया था. हालांकि उस वक्त भी सपना ने प्रेग्नेंसी को छिपाकर रखा था और इस बार भी ऐसा ही किया था. लेकिन आपको बता दें, कि एक समय पर जब सपना चौधरी ऊंचाई की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो उनका हमेशा यही कहना था कि वे शादी जैसे बंधन में नहीं बंधेगी

 जाने कौन है सपना चौधरी का पति

सपना चौधरी का दिल चुराने वाले वीर साहू है जो मूल रूप से हांसी से संबंध रखते हैं. वीर साहू पेशे से एक सिंगर, कंपोजर, लिरिसिस्ट और हरियाणवी एक्टर हैं. हरियाणवी इंडस्ट्री का वो जाना माना चेहरा हैं, जिन्हें बब्बू मान के नाम से भी जाना जाता है. वीर साहू कई हरियाणवी एल्बम में भी काम कर चुके है. उनके लुक्स और गानें के हरियाणवी लड़कियां फैंस है. दोनों का लंबे समय तक अफेयर रहा. फिर सपना और वीर साहू ने एक दूसरे से पहले सगाई कर ली. फिर बात शादी तक पहुंची औऱ अब दोनों दो बच्चे के पैरेंट्स बन चुके है.

सपना चौधरी के सुपरहिट गानें

मशहूर हरियाणवी डांसर सपना चौधरी किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. सपना चौधरी और उनके गाने बहुत पौपुलर हैं सपना चौधरी अक्सर अपने खूबसूरत लुक्स से लोगों का दिल जीत लेती हैं. तो वहीं सपना के गानों के बिना कोई भी शादी- पार्टी पूरी नहीं होती है. इन गानों की लिस्ट में सपना चौधरी का पहला मशहूर गाना है.

  • ‘गजबन’ जो साल 2019 में आया है. इस गाने को खूब पसंद किया गया. ये गाना आज भी हर शादी- पार्टी की शान है.
  • सपना चौधरी का हरियाणवी गाना ‘दरोगा जी’ भी सुपरहिट गाना है.
  • सपना चौधरी का गाना ‘तू चीज लाजवाब’ भी अक्सर शादी- पार्टी में बजाया जाता है।
  • सपना चौधरी का गाना ‘सौलिड बाडी’ भी काफी पसंद किया जाता है, जो साल 2017 में आया.
  • सपना चौधरी का गाना ‘छोरी बिंदास’ भी साल 2017 में रिलीज हुआ था
  • सपना का गाना ‘मेहंदी वाली रात’ में सपना दुल्हन बनी हुई नजर आई थीं.

सपना चौधरी के ये सभी गानें शादियों की जान है जो हरियाणा, दिल्ली, फरीदाबाद की शान है.

दिव्या आर्यन : जब आर्यन से डिसूजा बनीं दिव्या

‘पता नहीं गाड़ियों में रात में भी एसी क्यों चलाया जाता है. माना कि गरमी से नजात पाने के लिए एसी का चलाया जाना बहुत जरूरी है, पर ऐसी भी क्या जरूरत, जो बेवजह भी इसे इस्तेमाल किया जाए,’ बस की खिड़की से बाहर देखते हुए दिव्या सोच रही थी.

मन नहीं माना तो दिव्या ने खिड़की को जरा सा खिसका भर दिया. एक हवा का तीखा कतरा आया और उस की जुल्फों से अठखेलियां करता हुआ गुजर गया. कोई टोक न दे, इसलिए दिव्या ने धीरे से खिड़की को वापस बंद कर दिया.

दिव्या आज अपने कसबे लालपुर से शहर को जा रही थी, जहां उसे कुछ दिन रुकना था, इसलिए उस ने शहर के एक होटल में एक सिंगल रूम की बुकिंग पहले से ही करा रखी थी.

‘चर्रचर्र…’ की आवाज के साथ बस रुकी. दिव्या ने बाहर की ओर देखा तो पाया कि पुलिस की चैकिंग थी.

पुलिस की सघन चैकिंग के बाद बस आगे बढ़ी. यहां से अब भी आधा सफर बाकी था.

‘अब तो लगता है कि मुझे पहुंचते हुए काफी रात हो जाएगी. और अगर ऐसा हुआ तो बसस्टैंड से होटल तक तो मुझे जाने में बड़ी परेशानी होगी,’ दिव्या सोच रही थी.

और वाकई जो दिव्या सोच रही थी, वैसा ही हुआ. बस को शहर पहुंचे हुए काफी रात हो गई. दिव्या ने अपना सामान उठाया और किसी रिकशे या कैब वाले को देखने लगी.

कई आटोरिकशे वाले खड़े थे, पर उन में से कुछ ने होटल तक जाने से ही मना कर दिया, तो कुछ सो रहे थे. कुछ में ड्राइवर थे ही नहीं.

तभी दिव्या की नजर कोने में खड़े एक आटोरिकशा पर पड़ी. वह लपक कर वहां गई तो देखा कि उस का ड्राइवर उस के अंदर बैठा हुआ सो रहा है.

‘‘ऐ आटो वाले… खाली हो… होटल रीगल तक चलोगे क्या?’’ दिव्या की आवाज पता नहीं क्यों तेज हो गई थी.

दिव्या की आवाज सुन कर आटोरिकशा वाला चौंक कर उठ गया और इधरउधर देखने लगा.

‘‘ज… जी… वह आखिरी बस आ गई क्या… मैं जरा सो गया था… हां, बताइए मैडम… कहां जाना है आप को?’’ आटोरिकशा वाले ने पूछा.

‘‘होटल रीगल जाना है मुझे,’’ दिव्या झुंझला उठी थी.

‘‘हां जी… अंदर बैठिए…’’ कह

कर आटोरिकशा वाले ने आटोरिकशा स्टार्ट कर के आगे बढ़ा दिया.

‘‘होटल रीगल यहां से कितनी दूर होगा?’’ दिव्या ने पूछा.

‘‘मैडम, कुछ नहीं तो कम से कम 16 किलोमीटर तो पड़ ही जाएगा… बात ऐसी है न मैडम कि यह बसस्टैंड शहर के काफी बाहर और सुनसान जगह पर बनवा दिया गया है, इसीलिए यहां से हर चीज दूर पड़ती है. पर, आप घबराइए मत. हम अभी आप को पहुंचाए देते हैं,’’ आटोरिकशा वाले ने कहा.

आटोरिकशा वाले का चेहरा तो नहीं दिख रहा था पर उस के कान में एक चेन में पिरोया हुआ कोई बुंदा पहना हुआ था उस ने, जो बारबार बाहर की चमक पड़ने पर रोशनी बिखेर देता था.

अचानक से आटोरिकशा के अंदर रोशनी सी भर गई. आटो वाले लड़के और दिव्या दोनों का ध्यान उस रोशनी पर गया. ये 4 लड़के थे, जो अपनी बाइक की हैडलाइट को जानबूझ कर आटोरिकशा के अंदर तक पहुंचा रहे थे.

अचानक से उस आटोरिकशा वाले ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी, जितनी वह बढ़ा सकता था और मुख्य सड़क से हट कर किसी और सड़क पर आटोरिकशा चलाने लगा.

‘‘क्या हुआ… तुम इतनी तेज क्यों चला रहे हो… और आटोरिकशा को किस तरफ ले जा रहे हो… बात क्या है आखिर?’’ दिव्या ने कई सवाल दाग दिए.

‘‘जी… कुछ नहीं मैडम… आप डरिए नहीं… दरअसल, इस शहर में

कुछ भेडि़ए इनसानी भेष में रोज रात

को लड़कियों का मांस नोंचने के लिए निकल पड़ते हैं. और आज इन लोगों ने आप को अकेले देख लिया है… पर, आप डरिए नहीं. मैं इन के इरादे कामयाब नहीं होने दूंगा,’’ आंखों को रास्ते और साइड मिरर पर जमाए हुए आटोरिकशा वाला बोल रहा था.

पीछे आती हुई बाइकों ने अपनी रफ्तार और बढ़ा दी और वे आटोरिकशा के बराबर में आने लगे.

आटोरिकशा वाले ने अचानक आटो को एक दिशा में लहरा दिया और आटोरिकशा के लहराने से बाइक वाला संभल नहीं पाया और उस की बाइक कंट्रोल से बाहर हो गई और वह सड़क के किनारे लहराता हुआ गिर गया.

अपने साथी को इस तरह गिरा देख कर उस का दूसरा साथी गुस्से में भर गया और बाइक चलाते हुए अंदर बैठी दिव्या के बराबर पहुंच गया, वैसे ही दिव्या ने अपने साथ में लाए हुए लेडीज छाते का एक जोरदार वार उस के हैलमैट पर किया. दूसरा सवार भी चारों खाने चित हो गया.

अपने 2 साथियों को इस तरह से चोटिल देख कर बाकी के दोनों सवारों का हौसला टूट सा गया और उन दोनों ने पीछे आना छोड़ कर अपनी बाइकों को मोड़ लिया.

उन गुंडों से पीछा छुड़ाने के चक्कर में आटोरिकशा मुख्य सड़क से भटक कर पास में छोटी सड़क पर चलने लगा था और आटोरिकशा वाला आटोरिकशा भगाता जा रहा था.

आटोरिकशा चला जा रहा था कि तभी अचानक आटोरिकशा से कुछ खटाक की आवाज आई और आटोरिकशा जहां का तहां खड़ा हो गया, जितना उस आटोरिकशा ड्राइवर को तकनीक के बारे में पता था, वह सबकुछ उस ने कर के देख लिया पर कुछ न हो सका.

‘‘मैडम, अफसोस की बात है कि हम शहर के किसी बाहरी हिस्से में आ गए हैं और वापसी का कोई उपाय नहीं है. अब हमें रात यहींकहीं काटनी होगी.’’

‘‘क्या मतलब… यहां कहां… और कैसे?’’

‘‘अब क्या करें मैडम मजबूरी है,’’ आटोरिकशा वाला बोला.

‘‘वह सामने आसमान में ऊंचाई पर एक लाल बल्ब चमक रहा है… वहां चलते हैं. जरूर वहां हमें सिर छिपाने लायक जगह मिल जाएगी,’’ अपनी उंगली दिखाते हुए आटोरिकशा वाले ने कहा और एक झटके से दिव्या का बैग उठा लिया और तेजी से चल पड़ा.

और उस का अंदाजा सही था. ये एक नई बन रही बहुमंजिला इमारत थी, जिस के एक हिस्से में कुछ मजदूर सो रहे थे और बाकी की इमारत पूरी तरह से खाली थी.

दोनों चलते हुए ऊपर वाले फ्लोर पर पहुंचे और एक कोने में सामान रख दिया.

यह सब दिव्या को बड़ा अजीब सा लग रहा था और वह यह भी सोच रही थी एक अजनबी के साथ वह इतनी देर से है, फिर भी उसे कोई असुरक्षा का भाव क्यों नहीं आ रहा है?

‘‘इधर आ जाइए मैडम… हवा अच्छी आ रही?है,’’ उस नौजवान ने बालकनी में आवाज देते हुए कहा.

‘‘वैसे, तुम्हारा नाम क्या है?’’ अचानक ही दिव्या ने पूछा.

‘‘जी… मेरा नाम आर्यन है,’’ नौजवान ने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया.

‘‘वाह, क्या नाम है तुम्हारा… वैरी गुड,’’ दिव्या ने पर्स में रखे हुए बिसकुट आर्यन की ओर बढ़ाते हुए कहा.

‘‘जी मैडम… बात ऐसी है कि मेरी मां शाहरुख खान की बहुत बड़ी फैन थीं और जब फिल्म ‘मोहब्बतें’ रिलीज हुई न, तब मैं उन के पेट में था और तभी उस ने सोच लिया था कि अगर बेटा पैदा हुआ तो उस का नाम आर्यन रखेंगी.’’

आर्यन की सरल बातें सुन कर बिना मुसकराए नहीं रह सकी दिव्या.

‘‘दिखने में तो खूबसूरत लगते

हो और पढ़ेलिखे भी… फिर यह आटोरिकशा के अलावा कोई और नौकरी क्यों नहीं करते?’’ दिव्या ने पूछा.

‘‘मैडम, मैं ने एमए किया है, वह भी इंगलिश में… पर, आजकल इस पढ़ाई से कुछ नहीं होता. या तो बड़ीबड़ी डिगरी हो या फिर किसी की सिफारिश… और अपने पास दोनों ही नहीं थे, मरता क्या न करता, इसलिए आटोरिकशा ही चलाने लगा.’’

‘‘हम्म, मोहब्बतें… तो कुछ अपनी मोहब्बत के बारे में भी बताओ… किसी लड़की से प्यारव्यार भी हुआ है… या फिर,’’ दिव्या ने पूछा.

‘‘हां मैडम, मुझे भी प्यार हुआ तो था… पर अफसोस, लड़की ने धोखा दे दिया…

‘‘एक दिन की बात है, जब मैं आटोरिकशा ले कर घर वापस जा रहा था तभी सड़क के किनारे मैं ने देखा कि एक लड़का पड़ा हुआ है और उस के सिर से खून बह रहा है और भीड़ चारों तरफ खड़ी मोबाइल फोन से वीडियो बना रही है. कोई भी उस लड़के को अस्पताल ले कर नहीं जा रहा है.

‘‘उस लड़के के साथ में एक बदहवास सी लड़की भी थी, मुझे उन दोनों पर दया आई और इनसानियत के नाते मैं ने उन दोनों को अस्पताल पहुंचाया, वहां पर उस लड़के को जब खून की जरूरत पड़ी तो उस लड़की ने फिर मुझ से मदद मांगी और मुझ से कहा कि वह लड़का उस का भाई है.

‘‘मैं क्या करता, मैं ने अपना खून उस लड़के को दिया और उस की जान बचाई. उस लड़की ने मुझे खूब शुक्रिया कहा और बदले में मेरे को अपने घर का पता और अपना मोबाइल नंबर भी दिया और बदले में मेरा नंबर भी लिया, और फिर रोज सुबह ही उस लड़की का ह्वाट्सएप पर मैसेज आता और चैटिंग भी करती और मुझ से पूछती कि मैं उसे कैसी लगती हूं.

‘‘एक दिन मेरे मोबाइल पर उसी लड़की का फोन आया और उस ने मुझे अपने घर बुलाया. मैं भी उस से मिलने के लिए उतावला था, इसलिए उस के घर खूब तैयार हो कर पहुंच गया. पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा था कि वह लड़की मुझ से प्यार करने लगी है, इसलिए मैं उस के लिए एक लाल गुलाब भी ले कर गया था.

‘‘जब मैं वहां पहुंचा तो उस ने मेरा खूब स्वागत भी किया, उस के घर में सिर्फ उस की मां ही रहती थीं, पर उस दिन वे कहीं गई हुई थीं.

‘‘जब मैं ने उस लड़की से पूछा कि उस का वह भाई कहां है, तो उस ने बताया कि वह भी मां के साथ कहीं गया है.

‘‘मैं ने मौका देख उस लड़की को शादी का प्रस्ताव दे डाला, अभी तक उस लड़की ने मेरा नाम नहीं पूछा था.

नाम पूछने पर जब मैं ने उसे अपना नाम आर्यन डिसूजा बताया, तब उस ने मेरे ईसाई होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया. वह निराश हो कर कहने लगी कि मुझे भूल जाओ, मैं अब शादी तुम से नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे मम्मीपापा कट्टर हिंदू हैं और वे किसी गैरधर्म वाले लड़के से मेरी शादी कभी नहीं करेंगे…

‘‘हालांकि उस के भाई को खून देने को ले कर किसी को कोई एतराज नहीं था, पर शादी की बात आते ही जातिधर्म सब आ गया…

‘‘बस मैडम, मेरी तो पहली और आखिरी कहानी यही थी,’’ इतना कह कर आर्यन चुप हो गया.

‘‘काफी अजीब कहानी है तुम्हारे प्यार की… पर है बहुत ही इमोशनल और नई सी… इस पर कोई फिल्म वाला एक फिल्म बना सकता है,’’ दिव्या ने हंसते हुए कहा.

‘‘हां जी, हो सकता है, पर आप ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया… मसलन, आप के मांबाप…’’ आर्यन भी दिव्या की प्रेम कथा ही जानना चाहता था, पर वह बात कहने की हिम्मत नहीं कर पाया, इसलिए मांबाप के बारे में ही पूछ लिया.

‘‘मेरे पापा एक फार्मा कंपनी में काम करते थे, सेल्स का काम था तो अकसर ही घर के बाहर रहते… घर में सबकुछ था… ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं और जब घर आते तो हम सब को खूब समय और तोहफे भी देते…’’ कहतेकहते हुए चुप हो गई दिव्या.

‘‘जी… और आप की मां?’’

‘‘मां… अब उस के बारे में क्या बताऊं… उस का पेट हर तरह से भरा हुआ था, रुपए से, पैसे से… पर, कुछ औरतों को अपने जिस्म की भूख मिटाने के लिए रोज एक नया मर्द चाहिए होता है न… कुछ ऐसी ही थी मेरी मां… वे कहीं भी जाती, तो अपने लिए मुरगा तलाश ही लेतीं और उसे अपना फोन नंबर देतीं और जब वह आदमी घर तक आ जाता, तो मुझे किसी बहाने से घर के बाहर भेज देतीं और उस आदमी के साथ जिस्मानी ताल्लुकात बनातीं.

‘‘उन की ये हरकतें पापा को पता चलीं तो उन्होंने तुरंत ही उन्हें तलाक दे दिया और मुझे मां के पास ही छोड़ दिया.

‘‘तलाक के बाद जहां मां को संभल जाना चाहिए था, वहां वे और भी आजाद हो गईं… अब तो आदमी आते और दिनदिन भर घर पर ही पड़े रहते, बल्कि अब तो आदमी लोग शिफ्टों में आने लगे थे और मेरी मां जी भर कर सैक्स का मजा लेती थीं.

‘‘मां की हरकतें देख कर मैं ने अपने घर की छत पर जा कर खुदकुशी करने की कोशिश की… पर तभी मेरे पड़ोस में रहने वाले लड़के ने अपनी जान पर खेलते हुए मेरी जान बचाई.

‘‘मुझे भी किसी का सहारा चाहिए था, मैं उस लड़के के कंधे पर सिर रख कर खूब रोई.

‘‘उस लड़के ने मुझे ऐसे वक्त में सहारा दिया कि मुझे उस से प्यार हो जाना लाजिमी ही था, प्यार तो उस को भी मुझ से हो गया था, पर हमारी शादी के बीच मेरी मां का किरदार आ गया और उस लड़के ने मुझ से साफ कह दिया कि उस के मांबाप किसी ऐसी लड़की से उस की शादी नहीं करना चाहते, जिस की तलाकशुदा मां कई मर्दों से संबंध रखती हो…’’ इतना कह कर चुप हो गई थी दिव्या.

दोनों लोग चुप थे, रात का सन्नाटा भी बखूबी उन का साथ दे रहा था, हवा आ कर अब भी कभीकभी दिव्या की जुल्फों को उड़ा दे रही थी, जिन्हें वह परेशान हो कर बारबार संभालती थी.

‘‘पर मैडम… मेरी कहानी कुछ नई लग सकती है आप को… पर, आप की कहानी में तो सिर्फ दर्द के अलावा कुछ भी नहीं है,’’ आर्यन ने कहा.

दिव्या का कोई जवाब नहीं आया, सिर्फ एक छोटी सी सिसकी ही आई जिसे चाह कर भी वह छिपा न सकी.

‘‘तुम रो रही हो?’’ आर्यन ने पूछा.

बिना कोई जवाब दिए ही वह आर्यन के सीने से लिपट गई.

शायद बचपन से ले कर अब तक कोई कंधा नहीं मिला था उसे, जिस पर वह अपना सिर रख सके…

और आर्यन ने भी अपनी मजबूत बांहों का घेरा दिव्या के इर्दगिर्द डाल दिया था. अब वह खामोश बिल्डिंग उन के मिलन की गवाह बन रही थी.

सूरज की पहली किरण फूटी, पर वे दोनों अब भी किसी लता की तरह एकदूसरे से लिपटे हुए थे.

तभी दूर से एक दूध की गाड़ी आती दिखाई दी. दिव्या ने आर्यन का हाथ पकड़ा और आर्यन ने बैग उठाया. दोनों ने दौड़ कर उस गाड़ी में लिफ्ट मांगी.

‘‘हम कहां जा रहे हैं… और मेरा आटोरिकशा तो वहीं रह गया मैडम?’’ आर्यन ने पूछा.

‘‘अगर तुम्हें कोई दूसरा काम मिले तो करोगे?’’ दिव्या ने आर्यन से पूछा.

‘‘हां मैडम, क्यों नहीं करूंगा.’’

‘‘पर, हो सकता है कि तुम्हें उम्रभर मेरा साथ देना पड़े?’’

‘‘हां, पर तुम्हें साथ देना होगा तो ही करूंगा मैडम.’’

‘‘मैडम नहीं, दिव्या नाम है मेरा,’’ दिव्या ने कहा. बदले में आर्यन सिर्फ मुसकरा कर रह गया.

शहर आ गया था. वे दोनों पूछतेपाछते होटल रीगल पहुंच गए.

रिसैप्शन पर जा कर दिव्या ने मैनेजर से कहा, ‘‘मैं ने एक सिंगल बैडरूम बुक कराया था. मुझे आने में थोड़ी देर हो गई… पर ,अब मुझे एक सिंगल नहीं, बल्कि डबल बैडरूम चाहिए.’’

‘‘जी मैडम, किस नाम से रूम बुक था?’’ मैनेजर ने पूछा.

‘‘मेरा कमरा दिव्या नाम से बुक था, पर अब आप रजिस्टर में मेरे पति आर्यन डिसूजा और दिव्या डिसूजा का नाम लिख सकते हैं,’’ दिव्या ने आर्यन की तरफ देखते हुए कहा.

हम लोग सैक्स के दौरान कोई सावधानी नहीं बरत रहे, इस के बावजूद मैं गर्भवती नहीं हो पा रही, क्या करूं?

सवाल
मैं 25 वर्षीय युवती हूं. विवाह को 4 महीने हो चुके हैं. हम लोग सहवास के दौरान कोई सावधानी नहीं बरत रहे, इस के बावजूद मैं गर्भवती नहीं हो पा रही. मेरे पति जल्द बच्चा चाहते हैं. कृपया बताएं कि क्या हमें किसी डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए?

जवाब

अभी आप के विवाह को बहुत कम समय हुआ है. मौजमस्ती करें, जिंदगी का भरपूर लुत्फ उठाएं, क्योंकि इस तरह का समय दोबारा (परिवार की जिम्मेदारी पड़ने पर) नहीं मिलेगा. अभी संतानोत्पत्ति के लिए चिंतित नहीं होना चाहिए. कई बार गर्भ ठहरने में थोड़ा वक्त लगता है. यदि कुछ और समय बीतने पर भी आप गर्भधारण नहीं कर पातीं, तब आप दोनों किसी डाक्टर से परामर्श ले सकते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल नंबर : 08826099608.

दोस्त न होता तो : क्या माया को मिल पाया पृथ्वीपाल जैसा दोस्त

कोरोना काल में पृथ्वीपाल का परिवार कई तरह की मुश्किलों का सामना बड़ी हिम्मत से कर रहा था. उस का गांव बहादुरपुर राजधानी लखनऊ से महज 5 किलोमीटर दूर है. वहां सिर्फ 6-7 परिवार अमीर हैं. 20-25 गरीब परिवार मजदूरी से गुजरबसर करते हैं, वहीं 60-70 परिवार पृथ्वीपाल के परिवार जैसे हैं.

ये परिवार न पूरी तरह से गरीब हैं, न अमीर ही. ये लोग ‘रोज कुआं खोदो रोज पानी पीयो’ वाली हालत में हैं. इन सब की आमदनी मजदूरों से थोड़ी सी ज्यादा है.

पृथ्वीपाल के पास 2 बीघा जमीन थी, लेकिन पत्नी रामरती के इलाज की खातिर जमीन बेच डाली थी. रामरती को 6 साल पहले कैंसर हो गया था. सारे जेवर और जमीन बेचने के बाद भी रामरती की मौत हो गई थी.

अब पृथ्वीपाल के परिवार में उस की 3 बेटियां और एक छोटा बेटा बचा था. उस ने परिवार को चलाने के लिए बैंक से कर्ज ले कर एक आटोरिकशा खरीदा था. वह पिछले 3 साल से लखनऊ में आटोरिकशा चला रहा था.

पृथ्वीपाल की बड़ी बेटी माया बीए करने के बाद एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगी थी. बापबेटी की कमाई से परिवार ठीकठाक चलने लगा था.

माया ने अपनी दोनों छोटी बहनों और भाई का नाम उसी स्कूल में लिखवा दिया था. पृथ्वीपाल को अब माया की शादी की चिंता रहती थी.

पृथ्वीपाल आटोरिकशा की अदायगी अच्छे ढंग से कर रहा था.

3 महीने की ही किसतें बाकी रह गई थीं. बैंक ने उसे मई में दूसरा आटोरिकशा लेने की सलाह दी थी.

पृथ्वीपाल ने भी सोच लिया था कि इस रिकशे की अदायगी होते ही वह दूसरा रिकशा निकाल लेगा. नया वाला खुद चलाएगा, पुराना किसी को किराए पर दे देगा. इस से उस की आमदनी और बढ़ जाएगी. पर उसे क्या पता था कि मार्च आते ही कोरोना महामारी आ जाएगी. आमदनी बढ़ना तो दूर की बात, खानेपीने के भी लाले पड़ जाएंगे.

देश में कोरोना महामारी के चलते 5वां लौकडाउन चल रहा था. कोरोना के मरीज बढ़ रहे थे. सरकार नए नियमकानून और पैकेज का ऐलान कर रही थी. इसी बीच लाखों मजदूरों का पलायन जारी था.

सत्ता पक्ष कोरोना से निबट लेने के दावे पेश कर रहा था. सरकार द्वारा हर महीने किसानों, मजदूरों और दूसरे गरीबों को मुफ्त में राशन, गैस सिलैंडर और नकद रुपए भी दिए जा रहे थे. वहीं, विपक्ष कोरोना से हो रही बदहाली पर अपनी राजनीति चमका रहा था.

समाजसेवी मजदूरों की सेवा में जुटे थे. कोई मजदूरों को भोजनपानी बांट रहा था, कोई गरीबों को राशन, कपड़े, जूतेचप्पल दे रहा था.

ये सारी खबरें टैलीविजन पर सुबह से रात तक चल रही थीं. सुबह अखबार भी इन्हीं खबरों से रंगे होते थे.

पृथ्वीपाल इन खबरों को देख कर भी अनदेखी करने लगा था. ढाई महीने की बंदी के बाद भी उस की खबर लेने वाला कोई नहीं था, क्योंकि वह सरकार और समाज की नजर में गरीब नहीं था. उस का परिवार मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखता था, इसलिए उसे न सरकार से और न ही समाजसेवियों से कोई मदद मिलनी थी.

पृथ्वीपाल ढाई महीने से घर में ही कैद था. आटोरिकशा दरवाजे पर धूल खा रहा था. पृथ्वीपाल ने लंबे समय से एक रुपया नहीं कमाया था. आटोरिकशा की किस्तें भी उस पर चढ़ती जा रही थीं.

वहीं, माया का भी स्कूल बंद हो गया था. पर वह स्कूल के बच्चों को रोज 4 घंटे औनलाइन पढ़ाती थी. स्कूल वालों ने बिना कुछ बताए उस की तनख्वाह आधी कर दी. अब उसे महज 3,500 रुपए मिल रहे थे. इस से घर का राशनपानी व खर्च नहीं चल पा रहा था.

बीते 3 महीने में चारों बच्चों की गुल्लक तोड़ी जा चुकी थी. अब घर में एक रुपया किसी के पास नहीं था. सारा राशन, तेल, मसाला और घरेलू गैस खत्म हो चुकी थी.

आज दूसरा दिन था, जब घर में चूल्हा नहीं जला था. माया गांव की दुकान से चीनी, चाय पत्ती, बिसकुट व दालमोठ उधार लाई थी. सुबहशाम पांचों प्राणी सिर्फ चाय पीते थे.

स्कूल ने इस महीने आधी तनख्वाह भी अब तक नहीं दी थी. दूध वाला और सब्जी वाला आज सुबह पैसों के लिए तगादा कर के गए थे. दोनों का 2 महीने से बकाया चल रहा था.

पृथ्वीपाल के बेटे की तबीयत भी खराब थी. उसे बुखार और दस्त की शिकायत थी. राशनपानी से ज्यादा जरूरी उस की दवा थी. पृथ्वीलाल किसी से कुछ ले भी नहीं सकता था. इस में उस का स्वाभिमान आड़े आ रहा था.

घर की इस दर्दनाक हालत को देख कर माया ने स्कूल के प्रिंसिपल को फोन लगाया. उस ने प्रिंसिपल से 2,000 रुपए एडवांस देने की गुहार लगाई, लेकिन प्रिंसिपल ने साफ इनकार कर दिया.

प्रिंसिपल फोन पर बोले, ‘‘माया, तुम जानती हो कि 3 महीने से स्कूल बंद है. किसी बच्चे की फीस जमा नहीं हो रही है. बड़ी मुश्किल से तुम लोगों को तनख्वाह दी जा रही हैं.’’

इतना सुन कर माया की आंखों से आंसू बहने लगे.

तभी माया के एक सहपाठी माधव का फोन आ गया. उस ने अपने को संभाला और फोन ले कर छत पर चली गई. तब वह रुंधे गले से ‘हैलो’ बोली.

माधव हैलो सुन कर बहुतकुछ समझ गया. उस ने माया से पूछा, ‘क्यों रो रही है? क्या मुझे नहीं बताओगी? आंसू पोंछो और मुझे बताओ कि क्या हुआ…?’

माया ने न चाहते हुए भी एक सांस में घर की पूरी कहानी बता डाली.

उस ने माधव को बता दिया कि घर में कई दिनों से एक रुपया नहीं है. 2 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला है. भाई

की तबीयत खराब है. उस की दवा भी लानी है.

यह सुनते ही माधव आगबबूला हो गया. वह गुस्सा हो कर बोला, ‘जाओ, आज के बाद मैं तुम से कभी बात नहीं करूंगा. तुम ने मुझे कुछ नहीं समझ. अगर मुझे कुछ मानती तो बहुत पहले फोन करती.’

माया बोली, ‘‘गुस्सा न करो यार. तुम घर से इतनी दूर लौकडाउन में फंसे हो. ऐसे में तुम को क्या बताती.’’

माधव ने कहा, ‘चलो ठीक, कोई बात नहीं. तुम तुरंत अंकल के साथ आटोरिकशा से कसबे में जाओ. भाई को भी साथ ले जाओ. मैं तुम्हारे बैंक खाते में 5,000 रुपए ट्रांसफर कर रहा हूं. पहले बैंक से रकम निकालो, फिर भाई की दवा लो. उस के बाद घर का सारा राशनपानी खरीदो.’’

माधव की बात पूरी होते ही माया बोली, ‘‘नहीं माधव, ऐसा मत करो. मु?ो 2-3 दिन में स्कूल से तनख्वाह मिल जाएगी. तब यहां सब हो जाएगा. तुम परदेश में हो. तुम को अपने पास रुपए रखने चाहिए.’’

लेकिन माधव ने दोस्ती की कसम दे कर माया को रुपए लेने पर मजबूर कर दिया.

पृथ्वीपाल बरामदे में लेटा राशन न होने और बेटे की खराब तबीयत के बारे में सोच रहा था. उसे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. वह गांव में किसी से रुपए उधार नहीं लेना चाहता था.

तभी माया वहां आ कर बोली, ‘‘पापा तुरंत तैयार हो जाइए, कसबे में चलते हैं. छोटू को डाक्टर को दिखा कर दवा ले आएं. साथ ही, घर का राशनपानी और गैस सिलैंडर भी ले आएंगे. कल सुबह दूध वाले, सब्जी वाले और गांव की दुकान का बकाया भी चुका देंगे.’’

इतना सुन कर पृथ्वीपाल ने पूछा, ‘‘माया, क्या इस बार तुम्हें पूरी तनख्वाह मिल गई है?’’

माया ने ठंडी सांस भरी और बोली, ‘‘अरे, नहीं पापा. माधव ने मेरे बैंक खाते में जबरदस्ती 5,000 रुपए डाल दिए हैं. वह बाद में अपने रुपए ले लेगा.’’

पृथ्वीपाल ने कहा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन तुम ने घर की परेशानी उसे क्यों बताई? वह बेचारा खुद लौकडाउन की वजह से बाहर फंसा है.’’

माया ने कहा, ‘‘पापा, अब कसबे में चलो, बाकी बातें बाद में करना.’’

पृथ्वीपाल आटोरिकशा से माया और छोटू को ले कर कसबे की ओर निकल पड़े. रास्ते में माया बारबार यही सोच रही थी कि अगर दोस्त न होता तो…

भाभी: क्यों बरसों से अपना दर्द छिपाए बैठी थी वह

अपनी सहेली के बेटे के विवाह में शामिल हो कर पटना से पुणे लौट रही थी कि रास्ते में बनारस में रहने वाली भाभी, चाची की बहू से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. बचपन की कुछ यादों से वे इतनी जुड़ी थीं जो कि भुलाए नहीं भूल सकती. सो, बिना किसी पूर्वयोजना के, पूर्वसूचना के रास्ते में ही उतर गई. पटना में ट्रेन में बैठने के बाद ही भाभी से मिलने का मन बनाया था. घर का पता तो मुझे मालूम ही था, आखिर जन्म के बाद 19 साल मैं ने वहीं गुजारे थे. हमारा संयुक्त परिवार था. पिताजी की नौकरी के कारण बाद में हम दिल्ली आ गए थे. उस के बाद, इधर उधर से उन के बारे में सूचना मिलती रही, लेकिन मेरा कभी उन से मिलना नहीं हुआ था. आज 25 साल बाद उसी घर में जाते हुए अजीब सा लग रहा था, इतने सालों में भाभी में बहुत परिवर्तन आ गया होगा, पता नहीं हम एकदूसरे को पहचानेंगे भी या नहीं, यही सोच कर उन से मिलने की उत्सुकता बढ़ती जा  रही थी. अचानक पहुंच कर मैं उन को हैरान कर देना चाह रही थी.

स्टेशन से जब आटो ले कर घर की ओर चली तो बनारस का पूरा नक्शा ही बदला हुआ था. जो सड़कें उस जमाने में सूनी रहती थीं, उन में पैदल चलना तो संभव ही नहीं दिख रहा था. बड़ीबड़ी अट्टालिकाओं से शहर पटा पड़ा था. पहले जहां कारों की संख्या सीमित दिखाई पड़ती थी, अब उन की संख्या अनगिनत हो गई थी. घर को पहचानने में भी दिक्कत हुई. आसपास की खाली जमीन पर अस्पताल और मौल ने कब्जा कर रखा था. आखिर घूमतेघुमाते घर पहुंच ही गई.

घर के बाहर के नक्शे में कोई परिवर्तन नहीं था, इसलिए तुरंत पहचान गई. आगे क्या होगा, उस की अनुभूति से ही धड़कनें तेज होने लगीं. डोरबैल बजाई. दरवाजा खुला, सामने भाभी खड़ी थीं. बालों में बहुत सफेदी आ गई थी. लेकिन मुझे पहचानने में दिक्कत नहीं हुई. उन को देख कर मेरे चेहरे पर मुसकान तैर गई. लेकिन उन की प्रतिक्रिया से लग रहा था कि वे मुझे पहचानने की असफल कोशिश कर रही थीं. उन्हें अधिक समय दुविधा की स्थिति में न रख कर मैं ने कहा, ‘‘भाभी, मैं गीता.’’ थोड़ी देर वे सोच में पड़ गईं, फिर खुशी से बोलीं, ‘‘अरे, दीदी आप, अचानक कैसे? खबर क्यों नहीं की, मैं स्टेशन लेने आ जाती. कितने सालों बाद मिले हैं.’’

उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और हाथ पकड़ कर घर के अंदर ले गईं. अंदर का नक्शा पूरी तरह से बदला हुआ था. चाचा चाची तो कब के कालकवलित हो गए थे. 2 ननदें थीं, उन का विवाह हो चुका था. भाभी की बेटी की भी शादी हो गई थी. एक बेटा था, जो औफिस गया हुआ था. मेरे बैठते ही वे चाय बना कर ले आईं. चाय पीतेपीते मैं ने उन को भरपूर नजरों से देखा, मक्खन की तरह गोरा चेहरा अपनी चिकनाई खो कर पाषाण जैसा कठोर और भावहीन हो गया था. पथराई हुई आंखें, जैसे उन की चमक को ग्रहण लगे वर्षों बीत चुके हों. सलवटें पड़ी हुई सूती सफेद साड़ी, जैसे कभी उस ने कलफ के दर्शन ही न किए हों. कुल मिला कर उन की स्थिति उस समय से बिलकुल विपरीत थी जब वे ब्याह कर इस घर में आई थीं.

मैं उन्हें देखने में इतनी खो गई थी कि उन की क्या प्रतिक्रिया होगी, इस का ध्यान ही नहीं रहा. उन की आवाज से चौंकी, ‘‘दीदी, किस सोच में पड़ गई हैं, पहले मुझे देखा नहीं है क्या? नहा कर थोड़ा आराम कर लीजिए, ताकि रास्ते की थकान उतर जाए. फिर जी भर के बातें करेंगे.’’ चाय खत्म हो गई थी, मैं झेंप कर उठी और कपड़े निकाल कर बाथरूम में घुस गई.

शादी और सफर की थकान से सच में बदन बिलकुल निढाल हो रहा था. लेट तो गई लेकिन आंखों में नींद के स्थान पर 25 साल पुराने अतीत के पन्ने एकएक कर के आंखों के सामने तैरने लगे…

मेरे चचेरे भाई का विवाह इन्हीं भाभी से हुआ था. चाचा की पहली पत्नी से मेरा इकलौता भाई हुआ था. वह अन्य दोनों सौतेली बहनों से भिन्न था. देखने और स्वभाव दोनों में उस का अपनी बहनों से अधिक मुझ से स्नेह था क्योंकि उस की सौतेली बहनें उस से सौतेला व्यवहार करती थीं. उस की मां के गुण उन में कूटकूट कर भरे थे. मेरी मां की भी उस की सगी मां से बहुत आत्मीयता थी, इसलिए वे उस को अपने बड़े बेटे का दरजा देती थीं. उस जमाने में अधिकतर जैसे ही लड़का व्यवसाय में लगा कि उस के विवाह के लिए रिश्ते आने लगते थे. भाई एक तो बहुत मनमोहक व्यक्तित्व का मालिक था, दूसरा उस ने चाचा के व्यवसाय को भी संभाल लिया था. इसलिए जब भाभी के परिवार की ओर से विवाह का प्रस्ताव आया तो चाचा मना नहीं कर पाए. उन दिनों घर के पुरुष ही लड़की देखने जाते थे, इसलिए भाई के साथ चाचा और मेरे पापा लड़की देखने गए. उन को सब ठीक लगा और भाई ने भी अपने चेहरे के हावभाव से हां की मुहर लगा दी तो वे नेग कर के, शगुन के फल, मिठाई और उपहारों से लदे घर लौटे तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. भाई जब हम से मिलने आया तो बहुत शरमा रहा था. हमारे पूछने पर कि कैसी हैं भाभी, तो उस के मुंह से निकल गया, ‘बहुत सुंदर है.’ उस के चेहरे की लजीली खुशी देखते ही बन रही थी.

देखते ही देखते विवाह का दिन भी आ गया. उन दिनों औरतें बरात में नहीं जाया करती थीं. हम बेसब्री से भाभी के आने की प्रतीक्षा करने लगे. आखिर इंतजार की घडि़यां समाप्त हुईं और लंबा घूंघट काढ़े भाभी भाई के पीछेपीछे आ गईं. चाची ने  उन्हें औरतों के झुंड के बीचोंबीच बैठा दिया.

मुंहदिखाई की रस्मअदायगी शुरू हो गई. पहली बार ही जब उन का घूंघट उठाया गया तो मैं उन का चेहरा देखने का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी और जब मैं ने उन्हें देखा तो मैं देखती ही रह गई उस अद्भुत सौंदर्य की स्वामिनी को. मक्खन सा झक सफेद रंग, बेदाग और लावण्यपूर्ण चेहरा, आंखों में हजार सपने लिए सपनीली आंखें, चौड़ा माथा, कालेघने बालों का बड़ा सा जूड़ा तथा खुशी से उन का चेहरा और भी दपदपा रहा था.

वे कुल मिला कर किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थीं. सभी औरतें आपस में उन की सुंदरता की चर्चा करने लगीं. भाई विजयी मुसकान के साथ इधरउधर घूम रहा था. इस से पहले उसे कभी इतना खुश नहीं देखा था. उस को देख कर हम ने सोचा, मां तो जन्म देते ही दुनिया से विदा हो गई थीं, चलो कम से कम अपनी पत्नी का तो वह सुख देखेगा.

विवाह के समय भाभी मात्र 16 साल की थीं. मेरी हमउम्र. चाची को उन का रूप फूटी आंखों नहीं सुहाया क्योंकि अपनी बदसूरती को ले कर वे हमेशा कुंठित रहती थीं. अपना आक्रोश जबतब भाभी के क्रियाकलापों में मीनमेख निकाल कर शांत करती थीं. कभी कोई उन के रूप की प्रशंसा करता तो छूटते ही बोले बिना नहीं रहती थीं, ‘रूप के साथ थोड़े गुण भी तो होने चाहिए थे, किसी काम के योग्य नहीं है.’

दोनों ननदें भी कटाक्ष करने में नहीं चूकती थीं. बेचारी चुपचाप सब सुन लेती थीं. लेकिन उस की भरपाई भाई से हो जाती थी. हम भी मूकदर्शक बने सब देखते रहते थे.

कभीकभी भाभी मेरे व मां के पास आ कर अपना मन हलका कर लेती थीं. लेकिन मां भी असहाय थीं क्योंकि चाची के सामने बोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी.

मैं मन ही मन सोचती, मेरी हमउम्र भाभी और मेरे जीवन में कितना अंतर है. शादी के बाद ऐसा जीवन जीने से तो कुंआरा रहना ही अच्छा है. मेरे पिता पढ़ेलिखे होने के कारण आधुनिक विचारधारा के थे. इतनी कम उम्र में मैं अपने विवाह की कल्पना नहीं कर सकती थी. भाभी के पिता के लिए लगता है, उन के रूप की सुरक्षा करना कठिन हो गया था, जो बेटी का विवाह कर के अपने कर्तव्यों से उन्होंने छुटकारा पा लिया. भाभी ने 8वीं की परीक्षा दी ही थी अभी. उन की सपनीली आंखों में आंसू भरे रहते थे अब, चेहरे की चमक भी फीकी पड़ गई थी.

विवाह को अभी 3 महीने भी नहीं बीते होंगे कि भाभी गर्भवती हो गईं. मेरी भोली भाभी, जो स्वयं एक बच्ची थीं, अचानक अपने मां बनने की खबर सुन कर हक्कीबक्की रह गईं और आंखों में आंसू उमड़ आए. अभी तो वे विवाह का अर्थ भी अच्छी तरह समझ नहीं पाई थीं. वे रिश्तों को ही पहचानने में लगी हुई थीं, मातृत्व का बोझ कैसे वहन करेंगी. लेकिन परिस्थितियां सबकुछ सिखा देती हैं. उन्होंने भी स्थिति से समझौता कर लिया. भाई पितृत्व के लिए मानसिक रूप से तैयार तो हो गया, लेकिन उस के चेहरे पर अपराधभावना साफ झलकती थी कि जागरूकता की कमी होने के कारण भाभी को इस स्थिति में लाने का दोषी वही है. मेरी मां कभीकभी भाभी से पूछ कर कि उन्हें क्या पसंद है, बना कर चुपचाप उन के कमरे में पहुंचा देती थीं. बाकी किसी को तो उन से कोई हमदर्दी न थी.

प्रसव का समय आ पहुंचा. भाभी ने चांद सी बेटी को जन्म दिया. नन्हीं परी को देख कर, वे अपना सारा दुखदर्द भूल गईं और मैं तो खुशी से नाचने लगी. लेकिन यह क्या, बाकी लोगों के चेहरों पर लड़की पैदा होने की खबर सुन कर मातम छा गया था. भाभी की ननदें और चाची सभी तो स्त्री हैं और उन की अपनी भी तो 2 बेटियां ही हैं, फिर ऐसा क्यों? मेरी समझ से परे की बात थी. लेकिन एक बात तो तय थी कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है. मेरे जन्म पर तो मेरे पिताजी ने शहरभर में लड्डू बांटे थे. कितना अंतर था मेरे चाचा और पिताजी में. वे केवल एक साल ही तो छोटे थे उन से. एक ही मां से पैदा हुए दोनों. लेकिन पढ़ेलिखे होने के कारण दोनों की सोच में जमीनआसमान का अंतर था.

मातृत्व से गौरवान्वित हो कर भाभी और भी सुडौल व सुंदर दिखने लगी थीं. बेटी तो जैसे उन को मन बहलाने का खिलौना मिल गई थी. कई बार तो वे उसे खिलातेखिलाते गुनगुनाने लगती थीं. अब उन के ऊपर किसी के तानों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था. मां बनते ही औरत कितनी आत्मविश्वास और आत्मसम्मान से पूर्ण हो जाती है, उस का उदाहरण भाभी के रूप में मेरे सामने था. अब वे अपने प्रति गलत व्यवहार की प्रतिक्रियास्वरूप प्रतिरोध भी करने लगी थीं. इस में मेरे भाई का भी सहयोग था, जिस से हमें बहुत सुखद अनुभूति होती थी.

इसी तरह समय बीतने लगा और भाभी की बेटी 3 साल की हो गई तो फिर से उन के गर्भवती होने का पता चला और इस बार भाभी की प्रतिक्रिया पिछली बार से एकदम विपरीत थी. परिस्थितियों ने और समय ने उन को काफी परिपक्व बना दिया था.

गर्भ को 7 महीने बीत गए और अचानक हृदयविदारक सूचना मिली कि भाई की घर लौटते हुए सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. यह अनहोनी सुन कर सभी लोग स्तंभित रह गए. कोई भाभी को मनहूस बता रहा था तो कोई अजन्मे बच्चे को कोस रहा था कि पैदा होने से पहले ही बाप को खा गया. यह किसी ने नहीं सोचा कि पतिविहीन भाभी और बाप के बिना बच्चे की जिंदगी में कितना अंधेरा हो गया है. उन से किसी को सहानुभूति नहीं थी.

समाज का यह रूप देख कर मैं कांप उठी और सोच में पड़ गई कि यदि भाई कमउम्र लिखवा कर लाए हैं या किसी की गलती से दुर्घटना में वे मारे गए हैं तो इस में भाभी का क्या दोष? इस दोष से पुरुष जाति क्यों वंचित रहती है?

एकएक कर के उन के सारे सुहाग चिह्न धोपोंछ दिए गए. उन के सुंदर कोमल हाथ, जो हर समय मीनाकारी वाली चूडि़यों से सजे रहते थे, वे खाली कर दिए गए. उन्हें सफेद साड़ी पहनने को दी गई. भाभी के विवाह की कुछ साडि़यों की तो अभी तह भी नहीं खुल पाई थी. वे तो जैसे पत्थर सी बेजान हो गई थीं. और जड़वत सभी क्रियाकलापों को निशब्द देखती रहीं. वे स्वीकार ही नहीं कर पा रही थीं कि उन की दुनिया उजड़ चुकी थी.

एक भाई ही तो थे जिन के कारण वे सबकुछ सह कर भी खुश रहती थीं. उन के बिना वे कैसे जीवित रहेंगी? मेरा हृदय तो चीत्कार करने लगा कि भाभी की ऐसी दशा क्यों की जा रही थी. उन का कुसूर क्या था? पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष पर न तो लांछन लगाए जाते हैं, न ही उन के स्वरूप में कोई बदलाव आता है. भाभी के मायके वाले भाई की तेरहवीं पर आए और उन्हें साथ ले गए कि वे यहां के वातावरण में भाई को याद कर के तनाव में और दुखी रहेंगी, जिस से आने वाले बच्चे और भाभी के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा. सब ने सहर्ष उन को भेज दिया यह सोच कर कि जिम्मेदारी से मुक्ति मिली. कुछ दिनों बाद उन के पिताजी का पत्र आया कि वे भाभी का प्रसव वहीं करवाना चाहते हैं. किसी ने कोई एतराज नहीं किया. और फिर यह खबर आई कि भाभी के बेटा हुआ है.

हमारे यहां से उन को बुलाने का कोई संकेत दिखाई नहीं पड़ रहा था. लेकिन उन्होंने बुलावे का इंतजार नहीं किया और बेटे के 2 महीने का होते ही अपने भाई के साथ वापस आ गईं. कितना बदल गई थीं भाभी, सफेद साड़ी में लिपटी हुई, सूना माथा, हाथ में सोने की एकएक चूड़ी, बस. उन्होंने हमें बताया कि उन के मातापिता उन को आने नहीं दे रहे थे कि जब उस का पति ही नहीं रहा तो वहां जा कर क्या करेगी लेकिन वे नहीं मानीं. उन्होंने सोचा कि वे अपने मांबाप पर बोझ नहीं बनेंगी और जिस घर में ब्याह कर गई हैं, वहीं से उन की अर्थी उठेगी.

मैं ने मन में सोचा, जाने किस मिट्टी की बनी हैं वे. परिस्थितियों ने उन्हें कितना दृढ़निश्चयी और सहनशील बना दिया है. समय बीतते हुए मैं ने पाया कि उन का पहले वाला आत्मसम्मान समाप्त हो चुका है. अंदर से जैसे वे टूट गई थीं. जिस डाली का सहारा था, जब वह ही नहीं रही तो वे किस के सहारे हिम्मत रखतीं. उन को परिस्थितियों से समझौता करने के अतिरिक्त कोई चारा दिखाई नहीं पड़ रहा था. फूल खिलने से पहले ही मुरझा गया था. सारा दिन सब की सेवा में लगी रहती थीं.

उन की ननद का विवाह तय हो गया और तारीख भी निश्चित हो गई थी. लेकिन किसी भी शुभकार्य के संपन्न होते समय वे कमरे में बंद हो जाती थीं. लोगों का कहना था कि वे विधवा हैं, इसलिए उन की परछाईं भी नहीं पड़नी चाहिए. यह औरतों के लिए विडंबना ही तो है कि बिना कुसूर के हमारा समाज विधवा के प्रति ऐसा दृष्टिकोण रखता है. उन के दूसरे विवाह के बारे में सोचना तो बहुत दूर की बात थी. उन की हर गतिविधि पर तीखी आलोचना होती थी. जबकि चाचा का दूसरा विवाह, चाची के जाने के बाद एक साल के अंदर ही कर दिया गया. लड़का, लड़की दोनों मां के कोख से पैदा होते हैं, फिर समाज की यह दोहरी मानसिकता देख कर मेरा मन आक्रोश से भर जाता था, लेकिन कुछ कर नहीं सकती थी.

मेरे पिताजी पुश्तैनी व्यवसाय छोड़ कर दिल्ली में नौकरी करने का मन बना रहे थे. भाभी को जब पता चला तो वे फूटफूट कर रोईं. मेरा तो बिलकुल मन नहीं था उन से इतनी दूर जाने का, लेकिन मेरे न चाहने से क्या होना था और हम दिल्ली चले गए. वहां मैं ने 2 साल में एमए पास किया और मेरा विवाह हो गया. उस के बाद भाभी से कभी संपर्क ही नहीं हुआ. ससुराल वालों का कहना था कि विवाह के बाद जब तक मायके के रिश्तेदारों का निमंत्रण नहीं आता तब तक वे नहीं जातीं. मेरा अपनी चाची  से ऐसी उम्मीद करना बेमानी था. ये सब सोचतेसोचते कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला.

‘‘उठो दीदी, सांझ पड़े नहीं सोते. चाय तैयार है,’’ भाभी की आवाज से मेरी नींद खुली और मैं उठ कर बैठ गई. पुरानी बातें याद करतेकरते सोने के बाद सिर भारी हो रहा था, चाय पीने से थोड़ा आराम मिला. भाभी का बेटा, प्रतीक भी औफिस से आ गया था. मेरी दृष्टि उस पर टिक गई, बिलकुल भाई पर गया था. उसी की तरह मनमोहक व्यक्तित्व का स्वामी, उसी तरह बोलती आंखें और गोरा रंग.

इतने वर्षों बाद मिली थी भाभी से, समझ ही नहीं आ रहा था कि बात कहां से शुरू करूं. समय कितना बीत गया था, उन का बेटा सालभर का भी नहीं था जब हम बिछुड़े थे. आज इतना बड़ा हो गया है. पूछना चाह रही थी उन से कि इतने अंतराल तक उन का वक्त कैसे बीता, बहुतकुछ तो उन के बाहरी आवरण ने बता दिया था कि वे उसी में जी रही हैं, जिस में मैं उन को छोड़ कर गई थी. इस से पहले कि मैं बातों का सिलसिला शुरू करूं, भाभी का स्वर सुनाई दिया, ‘‘दामादजी क्यों नहीं आए? क्या नाम है बेटी का? क्या कर रही है आजकल? उसे क्यों नहीं लाईं?’’ इतने सारे प्रश्न उन्होंने एकसाथ पूछ डाले.

मैं ने सिलसिलेवार उत्तर दिया, ‘‘इन को तो अपने काम से फुरसत नहीं है. मीनू के इम्तिहान चल रहे थे, इसलिए भी इन का आना नहीं हुआ. वैसे भी, मेरी सहेली के बेटे की शादी थी, इन का आना जरूरी भी नहीं था. और भाभी, आप कैसी हो? इतने साल मिले नहीं, लेकिन आप की याद बराबर आती रही. आप की बेटी के विवाह में भी चाची ने नहीं बुलाया. मेरा बहुत मन था आने का, कैसी है वह?’’ मैं ने सोचने में और समय बरबाद न करते हुए पूछा.

‘‘क्या करती मैं, अपनी बेटी की शादी में भी औरों पर आश्रित थी. मैं चाहती तो बहुत थी…’’ कह कर वे शून्य में खो गईं.’’

‘‘चलो, अब चाचाचाची तो रहे नहीं, प्रतीक के विवाह में आप नहीं बुलाएंगी तो भी आऊंगी. अब तो विवाह के लायक वह भी हो गया है.’’

‘‘मैं भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाह रही हूं,’’ उन्होंने संक्षिप्त उत्तर देते हुए लंबी सांस ली.

‘‘एक बात पूछूं, भाभी, आप को भाई की याद तो बहुत आती होगी?’’ मैं ने सकुचाते हुए उन्हें टटोला.

‘‘हां दीदी, लेकिन यादों के सहारे कब तक जी सकते हैं. जीवन की कड़वी सचाइयां यादों के सहारे तो नहीं झेली जातीं. अकेली औरत का जीवन कितना दूभर होता है. बिना किसी के सहारे के जीना भी तो बहुत कठिन है. वे तो चले गए लेकिन मुझे तो सारी जिम्मेदारी अकेले संभालनी पड़ी. अंदर से रोती थी और बच्चों के सामने हंसती थी कि उन का मन दुखी न हो. वे अपने को अनाथ न समझें,’’ एक सांस में वे बोलीं, जैसे उन्हें कोई अपना मिला, दिल हलका करने के लिए.

‘‘हां भाभी, आप सही हैं, जब भी ये औफिस टूर पर चले जाते हैं तब अपने को असहाय महसूस करती हूं मैं भी. एक बात पूछूं, बुरा तो नहीं मानेंगी? कभी आप को किसी पुरुषसाथी की आवश्यकता नहीं पड़ी?’’ मेरी हिम्मत उन की बातों से बढ़ गई थी.

‘‘क्या बताऊं दीदी, जब मन बहुत उदास होता था तो लगता था किसी के कंधे पर सिर रख कर खूब रोऊं और वह कंधा पुरुष का हो तभी हम सुरक्षित महसूस कर सकते हैं. उस के बिना औरत बहुत अकेली है,’’ उन्होंने बिना संकोच के कहा.

‘‘आप ने कभी दूसरे विवाह के बारे में नहीं सोचा?’’ मेरी हिम्मत बढ़ती जा रही थी.

‘‘कुछ सोचते हुए वे बोलीं,  ‘‘क्यों नहीं दीदी, पुरुषों की तरह औरतों की भी तो तन की भूख होती है बल्कि उन को तो मानसिक, आर्थिक सहारे के साथसाथ सामाजिक सुरक्षा की भी बहुत जरूरत होती है. मेरी उम्र ही क्या थी उस समय. लेकिन जब मैं पढ़ीलिखी न होने के कारण आर्थिक रूप से दूसरों पर आश्रित थी तो कर भी क्या सकती थी. इसीलिए मैं ने सब के विरुद्ध हो कर, अपने गहने बेच कर आस्था को पढ़ाया, जिस से वह आत्मनिर्भर हो कर अपने निर्णय स्वयं ले सके. समय का कुछ भी भरोसा नहीं, कब करवट बदले.’’

उन का बेबाक उत्तर सुन कर मैं अचंभित रह गई और मेरा मन करुणा से भर आया, सच में जिस उम्र में वे विधवा हुई थीं उस उम्र में तो आजकल कोई विवाह के बारे में सोचता भी नहीं है. उन्होंने इतना समय अपनी इच्छाओं का दमन कर के कैसे काटा होगा, सोच कर ही मैं सिहर उठी थी.

‘‘हां भाभी, आजकल तो पति की मृत्यु के बाद भी उन के बाहरी आवरण में और क्रियाकलापों में विशेष परिवर्तन नहीं आता और पुनर्विवाह में भी कोई अड़चन नहीं डालता, पढ़ीलिखी होने के कारण आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ जीती हैं, होना भी यही चाहिए, आखिर उन को किस गलती की सजा दी जाए.’’

‘‘बस, अब तो मैं थक गई हूं. मुझे अकेली देख कर लोग वासनाभरी नजरों से देखते हैं. कुछ अपने खास रिश्तेदारों के भी मैं ने असली चेहरे देख लिए तुम्हारे भाई के जाने के बाद. अब तो प्रतीक के विवाह के बाद मैं संसार से मुक्ति पाना चाहती हूं,’’ कहतेकहते भाभी की आंखों से आंसू बहने लगे. समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा न करने के लिए कह कर उन का दुख बढ़ाऊंगी या सांत्वना दूंगी, मैं शब्दहीन उन से लिपट गई और वे अपना दुख आंसुओं के सहारे हलका करती रहीं. ऐसा लग रहा था कि बरसों से रुके हुए आंसू मेरे कंधे का सहारा पा कर निर्बाध गति से बह रहे थे और मैं ने भी उन के आंसू बहने दिए.

अगले दिन ही मुझे लौटना था, भाभी से जल्दी ही मिलने का तथा अधिक दिन उन के साथ रहने का वादा कर के मैं भारी मन से ट्रेन में बैठ गई. वे प्रतीक के साथ मुझे छोड़ने के लिए स्टेशन आई थीं. ट्रेन के दरवाजे पर खड़े हो कर हाथ हिलाते हुए, उन के चेहरे की चमक देख कर मुझे सुकून मिला कि चलो, मैं ने उन से मिल कर उन के मन का बोझ तो हलका किया.

मिशन पूरा हुआ : जगह-जगह रावण है

‘‘अ रे ओ लक्ष्मी…’’ अखबार पढ़ते हुए जब लक्ष्मी ने ध्यान हटा कर अपने पिता मोड़ीराम की तरफ देखा, तब वह बोली, ‘‘क्या है बापू, क्यों चिल्ला रहे हो?’’

‘‘अखबार की खबरें पढ़ कर सुना न,’’ पास आ कर मोड़ीराम बोले.

‘‘मैं तुम्हें नहीं सुनाऊंगी बापू?’’ चिढ़ाते हुए लक्ष्मी अपने बापू से बोली.

‘‘क्यों नहीं सुनाएगी तू? अरे, मैं अंगूठाछाप हूं न, इसीलिए ज्यादा भाव खा रही है.’’

‘‘जाओ बापू, मैं तुम से नहीं बोलती.’’

‘‘अरे लक्ष्मी, तू तो नाराज हो गई…’’ मनाते हुए मोड़ीराम बोले, ‘‘तुझे हम ने पढ़ाया, मगर मेरे मांबाप ने मुझे नहीं पढ़ाया और बचपन से ही खेतीबारी में लगा दिया, इसलिए तुझसे कहना पड़ रहा है.’’

‘‘कह दिया न बापू, मैं नहीं सुनाऊंगी.’’

‘‘ऐ लक्ष्मी, सुना दे न… देख, दिनेश की खबर आई होगी.’’

‘‘वही खबर तो पढ़ रही थी. तुम ने मेरा ध्यान भंग कर दिया.’’

‘‘अच्छा लक्ष्मी, पुलिस ने उस के ऊपर क्या कार्यवाही की?’’

‘‘अरे बापू, पुलिस भी तो बिकी हुई है. अखबार में ऐसा कुछ नहीं लिखा है. सब लीपापोती है.’’

‘‘पैसे वालों का कुछ नहीं बिगड़ता है बेटी,’’ कह कर मोड़ीराम ने अफसोस जताया, फिर पलभर रुक कर बोला, ‘‘अरे, मरना तो अपने जैसे गरीब का होता है.’’

‘‘हां बापू, तुम ठीक कहते हो. मगर यह क्यों भूल रहे हो, रावण और कंस जैसे अत्याचारियों का भी अंत हुआ, फिर दिनेश जैसा आदमी किस खेत की मूली है,’’ बड़े जोश से लक्ष्मी बोली.

मगर मोड़ीराम ने कहा, ‘‘वह जमाना गया लक्ष्मी. अब तो जगहजगह रावण और कंस आ गए हैं.’’

‘‘अरे बापू, निराश मत होना. दिनेश जैसे कंस को मारने के लिए भी किसी न किसी ने जन्म ले लिया है.’’

‘‘यह तू नहीं, तेरी पढ़ाई बोल रही है. तू पढ़ीलिखी है न, इसलिए ऐसी बातें कर रही है. मगर यह इतना आसान नहीं है. जो तू सोच रही है. आजकल जमाना बहुत खराब हो गया है.’’

‘‘देखते जाओ बापू, आगेआगे क्या होता है,’’ कह कर लक्ष्मी ने अपनी बात कह दी, मगर मोड़ीराम की सम?ा में कुछ नहीं आया, इसलिए बोला, ‘‘ठीक है लक्ष्मी, तू पढ़ीलिखी है, इसलिए

तू सोचती भी ऊंचा है. मैं खेत पर जा

रहा हूं. तू थोड़ी देर बाद रोटी ले कर वहीं आ जाना.’’

‘‘ठीक है बापू, जाओ. मैं आ जाऊंगी,’’ लक्ष्मी ने बेमन से कह कर बात को खत्म कर दिया.

मोड़ीराम खेत पर चला गया. लक्ष्मी फिर से अखबार पढ़ने लगी. मगर उस का ध्यान अब पढ़ने में नहीं लगा. उस का सारा ध्यान दिनेश पर चला गया. दिनेश आज का रावण है. इसे कैसे मारा जाए? इस बात पर उस का सारा ध्यान चलने लगा. उस ने खूब घोड़े दौड़ाए, मगर कहीं से हल मिलता नहीं दिखा.

काफी सोचने के बाद आखिरकार लक्ष्मी ने हल निकाल लिया. तब उस के चेहरे पर कुटिल मुसकान फैल गई.

दिनेश और कोई नहीं, इस गांव का अमीर किसान है. उस के पास ढेर सारी खेतीबारी है. गांव में उस की बहुत बड़ी हवेली है. उस के यहां नौकरचाकर हैं. खेत नौकरों के भरोसे ही चलता है. रकम ले कर ब्याज पर पैसे देना उस का मुख्य पेशा है.

गांव के जितने गरीब किसान हैं, उन को अपना गुलाम बना रखा है. गांव की बहूबेटियों की इज्जत से खेलना उस का काम है. पूरे गांव में उस की इतनी धाक है कि कोई भी उस के खिलाफ नहीं बोलता है.

इस तरह इस गांव में दिनेश नाम के रावण का राज चल रहा था. उस के कहर से हर कोई दुखी था.

‘‘लक्ष्मी, रोटियां बन गई हैं, बापू को खेत पर दे आ,’’ मां कौशल्या ने जब आवाज लगाई, तब वह अखबार एक तरफ रख कर मां के पास रसोईघर में चली गई.

लक्ष्मी बापू की रोटियां ले कर खेत पर जा रही थी, मगर विचार उस के सारे दिनेश पर टिके थे. आज के अखबार में यहीं खबर खास थी कि उस ने अपने फार्म पर गांव के मांगीलाल की लड़की चमेली की इज्जत लूटी थी. गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई थी, मगर ऊपरी जबान से कोई कुछ नहीं कह रहा था कि चमेली की इज्जत दिनेश ने ही लूटी है.

जब लक्ष्मी खेत पर पहुंची, तब बापू खेत में बने एक कमरे की छत पर खड़े हो कर पक्षी भगा रहे थे, वह भी ऊपर चढ़ गई. देखा कि वहां से उस की पूरी फसल दिख रही थी.

लक्ष्मी बोली, ‘‘बापू, रोटी खाओ. लाओ, गुलेल मुझे दो, मैं पक्षी भगाती हूं.’’

‘‘ले बेटी संभाल गुलेल, मगर किसी पक्षी को मार मत देना,’’ कह कर मोड़ीराम ने गुलेल लक्ष्मी के हाथों में थमा दी और खुद वहीं पर बैठ कर रोटी खाने लगा.

लक्ष्मी थोड़ी देर तक पक्षियों को भगाती रही, फिर बोली, ‘‘बापू, आप ने यह कमरा बहुत अच्छा बनाया है. अब मैं यहां पढ़ाई करूंगी.’’

‘‘क्या कह रही है लक्ष्मी? यहां तू पढ़ाई करेगी? क्या यह पढ़ाई करने की जगह है?’’

‘‘हां बापू, जंगल की ताजा हवा जब मिलती है, उस हवा में दिमाग अच्छा चलेगा. अरे बापू, मना मत करना.’’

‘‘अरे लक्ष्मी, मैं ने आज तक मना किया है, जो अब करूंगा. अच्छा पढ़ लेना यहां. तेरी जो इच्छा है वह कर,’’ हार मानते हुए मोड़ीराम बोला.

लक्ष्मी खुश हो गई. उस का कमरा इतना बड़ा है कि वहां वह अपनी योजना को अंजाम दे सकती है. इस मकान के चारों ओर मिट्टी की दीवारें हैं और दरवाजा भी है. एक खाट भीतर है. रस्सी और बिजली का इंतजाम भी है. फसलें जब भरपूर होती हैं, तब बापू कभीकभी यहां पर सोते हैं. मतलब वह सबकुछ है, जो वह चाहती है.

इस तरह दिन गुजरने लगे. लक्ष्मी दिन में आ कर अपने खेत वाले कमरे में पढ़ाई करने लगी, क्योंकि इस समय फसल में अंकुर फूट रहे थे, इसलिए बापू भी खेत पर बहुत कम आते थे. पढ़ाई का तो बहाना था, वह रोजाना अपने काम को अंजाम देने के लिए काम करती थी.

अब लक्ष्मी सारी तैयारियां कर चुकी थी, फिर मौके का इंतजार करने लगी. इसी दौरान बापू का उस ने पूरा भरोसा जीत लिया था. इसी बीच एक घटना हो गई.

बापू के गहरे दोस्त, जो उज्जैन में रहते थे, उन की अचानक मौत हो गई. तब बापू 13 दिन के लिए उज्जैन चले गए. तब लक्ष्मी का मिशन और आसान हो गया.

लक्ष्मी का खेत ऐसी जगह पर था, जहां कोई भी बाहरी शख्स आसानी से नहीं देख सकता था. अब वह आजाद हो गई, इसलिए इंतजार करने लगी दिनेश का. बापू के न होने के चलते लक्ष्मी अपना ज्यादा समय खेत में बने कमरे पर बिताने लगी. सुबह कालेज जाती थी, दोपहर को वापस गांव में आ जाती थी. और फिर खेत में फसल की हिफाजत के बहाने पक्षियों को भगाती और खुद अपने शिकार का इंतजार करती.

अचानक लक्ष्मी का शिकार खुद ही उस के बुने जाल में आ गया. वह कमरे की छत पर बैठ कर गुलेल से पक्षियों को भगा रही थी, तभी गुलेल का पत्थर उधर से गुजर रहे दिनेश को जा लगा.

दिनेश तिलमिलाता हुआ पास आ कर बोला, ‘‘अरे लड़की, तू ने पत्थर क्यों मारा?’’

‘‘अरे बाबू, मैं ने तुम पर जानबूझकर पत्थर नहीं मारा. खेत में बैठे पक्षियों को भगा रही थी, अब आप को लग गया, तो इस में मेरी क्या गलती है?’’

‘‘चल, नीचे उतर. अभी बताता हूं कि तेरी क्या गलती है?’’

‘‘मैं कोई डरने वाली नहीं हूं आप से. आती हूं, आती हूं नीचे,’’ पलभर में लक्ष्मी कमरे की छत से नीचे उतर

गई, फिर बोली, ‘‘हां बाबू, बोलो. कहां चोट लगी है तुम्हें? मैं उस जगह को सहला दूंगी.’’

‘‘मेरे दिल पर,’’ दिनेश उस का हाथ पकड़ कर बोला.

‘‘हाथ छोड़ बाबू, किसी पराई लड़की का हाथ पकड़ना अच्छा नहीं होता है,’’ लक्ष्मी ने हाथ छुड़ाने की नाकाम कोशिश की.

‘‘हम जिस का एक बार हाथ पकड़ लेते हैं, फिर छोड़ते नहीं,’’ दिनेश ने उस का हाथ और मजबूती से पकड़ लिया.

लक्ष्मी ने देखा कि उस ने खूब शराब पी रखी है. उस के मुंह से शराब का भभका आ रहा था.

लक्ष्मी बोली, ‘‘यह फिल्मी डायलौग मत बोल बाबू, सीधेसीधे मेरा हाथ छोड़ दे.’’

‘‘यह हाथ तो अब हवेली जा कर ही छूटेगा… चल हवेली.’’

‘‘अरे, हवेली में क्या रखा है? आज इस गरीब की कुटिया में चल,’’ लक्ष्मी ने जब यह कहा, तो दिनेश खुद ही कमरे के भीतर चला आया. उस ने खुद दरवाजा बंद किया और पलंग पर बैठ गया. ज्यादा नशा होने के चलते उस की आंखों में वासना के डोरे तैर रहे थे.

लक्ष्मी बोली, ‘‘जल्दी मत कर. मेरी झोपड़ी भी तेरे महल से कम नहीं है. देख, अब तक तो तू ने हवेली की शराब पी, आज तू झोपड़ी की शराब पी कर देख. इतना मजा आएगा कि तू आज मस्त हो जाएगा.’’

इस के बाद लक्ष्मी ने पूरा गिलास उस के मुंह में उड़ेल दिया. हलक में शराब जाने के बाद वह बोला, ‘‘तू सही कहती है. क्या नाम है तेरा?’’

‘‘लक्ष्मी. ले, एक गिलास और पी,’’ लक्ष्मी ने उसे एक गिलास और शराब पिला दी. इस बार शराब के साथ नशीली दवा थी. वह चाहती थी कि दिनेश शराब पी कर बेहोश हो जाए, फिर उस ने

2-3 गिलास शराब और पिला दी. थोड़ी देर में वह बेहोश हो गया.

जब लक्ष्मी ने अच्छी तरह देख लिया कि अब पूरी तरह से दिनेश बेहोश है, इस को होश में आने में कई घंटे लगेंगे, तब उस ने रस्सी उठाई, उस का फंदा बनाया और दिनेश के गले में बांध कर खींच दिया. थोड़ी देर बाद ही वह मौत के  आगोश में सो गया.

लक्ष्मी ने पलंग के नीचे पहले से एक गड्ढा खोद रखा था. उस ने पलंग को उठाया और लाश को गड्ढे में फेंक दिया.

लक्ष्मी ने गड्ढे में रस्सी और शराब की खाली बोतलें भी हवाले कर दीं. फिर फावड़ा ले कर वह मिट्टी डालने लगी.

मिट्टी डालते समय लक्ष्मी के हाथ कांप रहे थे. कहीं दिनेश की लाश जिंदा हो कर उस पर हमला न कर दे. जब गड्ढा मिट्टी से पूरा भर गया, तब उस ने उस जगह पर पलंग को बिछा दिया. फिर कमरे पर ताला लगा कर वह जीत की मुसकान लिए बाहर निकल गई.

पुरुषों को नीम खाना पड़ सकता है महंगा, जानें क्यों?

नीम एक ऐसा पेड़ जिसकी आयुर्वेद काफी मान्यता है. इसके पत्तो के खाने से आप  कई बीमारियों से बच सकते है साथ ही इसकी दातून आपके दांत को हमेशा स्वस्थ रखने में काफी असरकारक होती है. नीम के इतने फायदों के बीच क्या आप जानते है की नीम पुरुष बांझपन की समस्या भी बन सकता है.

एक रिसर्च के मुताबिक पता चला है कि रोजाना नीम के पत्तों के जलीय सत्त की 3 ग्राम या इससे अधिक खुराक शुक्राणुनाशक गतिविधि दर्शाती है. पुराने नीम की पतितयों का जलीय सत्त न सिर्फ वीर्य को स्थिर करता है, बल्कि 20 सोकंड के भीतर ही 100 प्रतिशत तक मानव शुक्राणुओं को मार भी देता है. इसके साथ ही गया कि नीम के पत्तों की न्यूनतम प्रभावी शुक्राणुनाशक सांद्रता कम से कम 2.9 मिलीग्राम / मिलियन शुक्राणु होती है. इसके अलावा शुक्राणुओं की आकृति विज्ञान पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है.

नीम के फायदे के साथ-साथ नुकसान भी

यदि आप डायबिटीज़ से पीड़ित हैं और डीटॉक्स डाइट ले रहे हैं तो ऐसे में दिमाग में रोज़ तड़के एक गिलास नीम के पत्तों का जूस पीने की बात ज़रूर आती है। और हो भी क्यों ना, अभी तक नीम के जूस के सेवन से जुड़े लाभों के बारे में ही बात होती रही है और लोग भी इसका सेवन कर लाभान्वित होते रहे हैं। लेकिन हर चीज़ के दो पहलू होते हैं और कुछ गुणों के साथ अवगुण भी होते हैं। ये बात नीम के रस पर भी लागू होती है और इसके भी कुछ नुकसान होते हैं। यदि आप भी रोज़ाना सुबह नीम के पत्तों का रस पी रहे हैं तो इसके एंटी-फर्टीलिटी साइडइफेक्ट (पुरुष प्रजनन क्षमता पर दुष्प्रभाव) के बारे में भी ज़रूर पढ़ लें.

कैसे है सबसे ज्यादा खतरा

किसी भी व्यक्ति के लिए नीम की पत्तियों के सत्त की प्रति दिन 2 मिली ग्राम मात्रा तक ही लेनी चाहिए और अगर आप इसका सेवन करना चाहते हैं तो इसके लिए पहले अपने डाक्टर से जरुर सलाह ले लें, क्योंकि अधिक मात्रा में इसका सेवन आपके यौन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और बांझपन का कारण भी बन सकता है.

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