दीपवीर के रिसेप्शन में फिसला ऐश्वर्या का पैर

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के रिसेप्शन में बौलीवुड के कई बड़े सितारें शिरकत करते नजर आएं.  पार्टी में दीपिका और रणवीर ने रेड और ब्लैक लुक में ड्रेसअप किया था. इस पार्टी की सबसे खास बात आपको बता दें, पूरी पार्टी में अपने स्टाइलिश लुक के लिए सबसे ज्यादा चर्चा में बच्चन फैमिली रही.

इस पार्टी की एक दूसरी खबर सामने आ रही है. कहा जा रहा है कि पार्टी में ऐश्वर्या राय गिरते-गिरते बच गईं,  उन्हें श्वेता बच्चन ने मौके पर संभाल लिया. इस मोमेंट का एक वीडियो सोशल मी‍डिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

 

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दरअसल, ऐश्वर्या अपने परिवार के साथ फोटोशूट के लिए आईं तभी फ्लोर पर उनका पैर लड़खड़ा गया. ठीक इसी वक्त श्वेता बच्चन ने फौरन अपना हाथ देकर ऐश्वर्या को संभाल लिया. ऐश्वर्या पार्टी में लहंगा पहनकर पहुंची थीं. उनके साथ श्वेता बच्चन, जया बच्चन, अमिताभ बच्चन भी नजर आए.

 

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दीपवीर के रिसेप्शन में अमिताभ बच्चन का डांस वीडियो भी वायरल हो रहा है. अमिताभ और रणवीर ने वेडिंग पार्टी में जमकर डांस किया. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में रणवीर की  रिक्वेस्ट पर अमिताभ आइकौनिक सॉन्ग ‘जुम्मा चुम्मा’  पर डांस करते दिखे.

कलियुग, काला धन और कौआ

यह कहा जाता है कि 3 चीजें जाने के बाद कभी वापस नहीं आतीं. मुंह से निकली हुई बात, कमान से निकला हुआ तीर और गुजरा हुआ वक्त. इस में चौथी चीज और जोड़ सकते हैं, जो है देश से बाहर गया हुआ काला धन.

अब तकनीक ने काफी तरक्की कर ली है तो पुराने वाले जो 3 ‘आइटम’ हैं, उन के वापस आने या अपना असर खत्म करने की काफी ज्यादा संभावनाएं पैदा हुई हैं. पर जो चौथा वाला जुड़ा है, उस का तोड़ किसी तांत्रिक तो क्या उस के फूफा के पास भी नहीं है.

कलियुग के कारनामों से यह सच निकल कर आया है कि एक बार देश से बाहर गया हुआ काला धन वापस नहीं आ सकता तो नहीं आ सकता.

हालांकि बड़े कौओं ने देश की मुंड़ेर पर बैठ कर काले धन के आने की सूचना दी है पर सूचना देने से क्या होता है? वह भी काले धन की सूचना. जमाना भी काला, कौआ भी काला और धन भी काला. ‘काला’ गुण समान है तीनों में. अंगरेजी में कहें तो ‘कौमन फैक्टर’ है.

इतिहास गवाह है कि जहांजहां गुण समान होते हैं वहां कोई भी असामान्य सी घटना नहीं घटती है. सब जुड़ा ही रहता है. वैरविरोध खत्म हो जाता है, चोरसिपाही का खेल नहीं रहता. हां, कभीकभार एकदूसरे के खिलाफ विरोध जरूर दिख जाता है. यह महज एक ही परिवार की अंदरूनी नोकझोंक सी होती है और कुछ नहीं. आप ही बताइए कि ऊपर से कई फांकों में दिखने वाला तरबूज अंदर से अलगअलग होता है क्या? पूरे का ‘ब्लड ग्रुप’ एक ही होता है. एक ही गुणधर्म.

वैसे तो हर एक का अपनाअपना गुणधर्म होता है. बिच्छू का डंक मारना, सांप का डसना, कुत्ते का भूंकना वगैरह. इसी तरह काले धन का गुणधर्म देश के बाहर जा कर न आना और कौओं का कांवकांव करना होता है. कौआ धीरे बोलेगा या कम बोलेगा तो भी कोयल जैसी ‘कुहूकुहू’ की आवाज तो आएगी नहीं. कांवकांव ही करेगा.

एक समय था जब अम्मां छत पर गेहूं सुखाते समय एक आईना रख देती थीं. कौआ जब आता तो अपना अक्स आईने में देख कर डर जाता. वह गेहूं को चोंच लगाए बिना ही उड़ कर चला जाता. अम्मां, बाबा और उन का पूरा परिवार भूखा नहीं रहता था.

अब धीरेधीरे कौओं ने आईने के पीछे से आ कर उस की पौलिश हटा दी है. इधरउधर उसे गेहूं ही गेहूं दिखता है. हमारीआप की रोटियों का एकमात्र आसरा.

अब कौआ इस आईने में अपनेआप को नहीं देख पाता तो डरता भी नहीं. आराम से अपने कौलर जैसे पंखों को ऊपर उठा कर खुश होता है और गेहूं के दानों को अपने दूसरे साथियों के साथ चोंच में भरता जाता है. अम्मां, बाबूजी और उन के बच्चे भूखे रह जाते हैं.

खैर, उदास होने की बात नहीं है. काला धन और काले कौए हमारे गौरवशाली इतिहास से सजेधजे देश पर काले टीके के समान हैं. देश पर नजर नहीं लगती. वह साफसुथरा रहता है.

अरे भई, घर की सफाई करने के बाद गंदगी बाहर ही तो डालते हैं, अंदर तो नहीं लाते? दाल साफ करते हैं तो भी कंकड़ों को बाहर निकाल दिया जाता है. उन्हें फिर थाली में तो नहीं डालते? शरीर की रोज की पाचन क्रियाओं से गंदगी बाहर ही तो निकलती है. इस से शरीर साफ रहता है.

तो मित्रो, देश की आर्थिक क्रियाओं से काला धन बाहर निकलता है तो देश भी सेहतमंद रहता है, खुशहाल रहता है, इसलिए कलियुग में कौओं को कोसना व काले धन की वापसी के बारे में सोचना बंद कर देना चाहिए. इस से देश की सेहत खराब होने का डर रहता है. देशद्रोही का आरोप लगेगा, सो अलग. ठीक कहा न…?

धूमिल होता पाखंड

कर्नाटक में हुए उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस के पक्ष में जाने से यह बात सिद्ध हो गई है कि भ्रष्टाचारमुक्त और अच्छे दिनों के सपनों के पीछे धार्मिक धंधे के प्रचारप्रसार के एजेंडे की राजनीति का एकाधिकार नहीं रह गया है. कांग्रेस को 5 सीटों में से 4 पर भारी जीत मिली है. भाजपा का गढ़ बेल्लारी भी उस के हाथ से निकल गया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मिजोरम के विधानसभा चुनावों में चाहे जो भी हो, पर 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में किसी की भी सरकार बने, अब बात एकतरफा नहीं होगी.

हिंदू धर्म के स्पष्ट और छिपे दोनों उद्देश्यों का लक्ष्य एक ही है, वर्णव्यवस्था को कायम रखना और सर्वोच्च वर्ण का एकाधिकार रखना. धर्म का काम भगवान की शरण में ले जाना नहीं, बल्कि मंदिर की शरण में ले जाना है जहां भक्त अपनी जेबें अघोषित टैक्स के रूप में खाली कर, राज जैसा है, अच्छा है, को मान लें.

धर्म ने हमेशा यही कहा है कि जो राजा दान करता है, यज्ञ कराता है, गोदान करता है, ऋषिमुनियों को औरतें उपलब्ध कराता है, वही श्रेष्ठ है. पुराणों, महाभारत, रामायण की कथाएं इन प्रसंगों से भरी पड़ी हैं. इन में पुरोहितों को पैसा देना और औरतों का दान किया जाना ही मुख्य है. आज भाजपा सरकारें यही करने में लगी हुई हैं.

सरदार पटेल की मूर्ति बनाना, राममंदिर का मुद्दा उठाना, इलाहाबाद, फैजाबाद का नाम बदलना, कुंभ की महान तैयारी करना, देशभर के तीर्थस्थलों को सुधारना भाजपाई सरकारों की प्राथमिकता बन गई है. पिछली सरकार द्वारा शुरू किए गए काम, जो अब पूरे हो रहे हैं, का श्रेय ले कर मौजूदा सरकार चाहे कह दे कि यह हो गया, वह हो गया पर 5 सालों में कुछ नया दिखा नहीं है.

यह न भूलें कि यह देश हमेशा से ही कुछ न कुछ करता रहा है. तभी विदेशी सदियों से यहां आते रहे. अच्छी भूमि, अच्छा मौसम होने के कारण यह भूभाग दुनिया में अद्भुत है. पर इस का सदुपयोग तकनीकी तरक्की के बावजूद नहीं हो रहा है.

250 वर्षों में अमेरिका ने बंजर, खाली जमीन पर शहर, फैक्टरियां उगा लीं.

50 वर्षों में चीन ने 89 डौलर प्रतिव्यक्ति आय बढ़ा कर 9,000 डौलर कर ली, अमेरिका ने 3,000 से बढ़ा कर 60,000 डौलर कर ली जबकि भारत ने 81 से बढ़ा कर सिर्फ 1,900 डौलर ही की. हमारी क्षमता आसानी से 20,000 डौलर करने की थी पर पहले कांग्रेस सरकारों के समाजवादी ढोंग और अब धार्मिक सरकारों के धर्म के ढोंग के चलते देश पिछड़ता जा रहा है.

दुनिया की दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था चाहे हम बन जाएं और चाहे सब से तेज गति से बढ़ने का दावा कर लें, लेकिन हाल उस गरीब का सा होगा ही जिस के हाथ में एक लोटे की जगह 3 लोटे हो गए. इस से ज्यादा कुछ नहीं. इन उपचुनावों के परिणामों से लगा है कि कम से कम एक और पाखंड का मोह कुछ फीका पड़ा है.

चुनाव परिणाम तय करेंगे योगी का कद

तेलंगाना से लेकर छत्तीसगढ़ तक 5 राज्यों मध्य प्रदेश, मणिपुर और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पार्टी ने प्रमुखता दी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद मुख्यमंत्री योगी ने पार्टी का प्रचार अभियान संभाला. 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ इतना व्यस्त हो गये कि उत्तर प्रदेश का राजकाज चलने में दिक्कतें आने लगी. मुख्यमंत्री को रात में अपने औफिस को खुलवाना पड़ा. सरकारी अफसर भी रात में फाइलों को पास कराने के लिये आने लगे. राष्ट्रीय स्तर के चुनाव प्रचार में प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री को पहली बार इतना महत्व दिया गया है. इसके पीछे का सबसे बडा कारण योगी पर हिन्दुत्व की छाप और उनका आक्रामक बोलना है.

5 राज्यों में से 3 राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की सरकार है. यहां पर प्रदेश सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी मतदान का जबरदस्त खतरा था. केंन्द्र की किसी योजना का इतना प्रभाव नहीं था कि राज्य सरकारों को उसके काम पर वोट मिल सके. ऐसे में भाजपा ने 5 राज्यों के चुनाव में धर्म के नाम पर वोट लेने के लिये अयोध्या मंदिर को मुद्दा बनाया. इसके साथ ही साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनाव प्रचार में आगे किया. इस बहाने भाजपा केन्द्र सरकार की नाकामी को छिपाना चाहती है. अपनी बोली, पहनावा और पहचान के कारण योगी धर्म का सबसे बड़ा चेहरा बन गये.

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव को 2019 के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है. ऐसे में यह चुनाव भाजपा के लिये बेहद महत्वपूर्ण है. अगर इन चुनावों में भाजपा को मात मिली तो आम चुनाव में योगी पार्टी का चुनाव करते कम नजर आयेंगे. पिछले चुनाव की तरह भाजपा हिन्दुत्व को किनारे कर सकती है. अगर चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में रहे तो हिन्दुत्व और योगी आम चुनाव में प्रचार का सबसे बड़ा फेस होंगे.

5 राज्यों के विधान सभा चुनाव में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी की छवि को दांव पर नहीं लगाना चाहती थी इस कारण योगी और हिन्दुत्व को आगे किया गया. चुनावी हार के बाद भाजपा का प्रचार तंत्र प्रधनमंत्री और उनके कामकाज को मुद्दा बनाने की जगह पर योगी और हिन्दुत्व के उपर ठीकरा फोड़ेगा. ऐसे में साफ है कि योगी को मोदी की ढाल बनाया जा रहा है. अगर भाजपा जीती तो श्रेय केन्द्र सरकार के कामकाज को जायेगा और चुनाव हारी तो हिन्दुत्व और योगी इसके जिम्मेदार होंगे.

जानिए रजनी और अक्षय की 2.0 का बौक्स औफिस कलेक्शन

रजनीकांत और अक्षय कुमार की सुपर हिट फिल्म 2.0 ने अपने पहले विकेंड में हिंदी डब वर्जन में जबरदस्त कमाई की. इस वर्जन में फिल्म ने 97 करोड़ रुपये की कमाई की है.

शंकर के निर्देशन में 2.0 गुरूवार को रिलीज हुई थी. इसे चार दिनों का ओपनिंग विकेंड मिला. इतने दिनों में फिल्म ने 97 करोड़ 25 लाख रूपये का कलेक्शन कर लिया है. केवल इस रविवार को फिल्म ने 34 करोड़ की कमाई की. जबकि शनिवार को 2.0 ने 24 करोड़ की कमाई की. रिलीज वाले दिन यानि गुरूवार को फिल्म ने 20 करोड़ 25 लाख रूपये से ओपनिंग ली थी.

जिस रफ्तार से फिल्म कमाई कर रही है, जल्दी ही वो 150 करोड़ क्लब में शामिल हो जायेगी. आपको बता दे कि ये इस साल आई आई 12वीं फिल्म होगी जिसने 100 करोड़ या उससे अधिक का कलेक्शन किया है.

अभी भी टौप पर है बाहुबली

हिंदी डब फिल्मों में अभी भी बाहुबली- दी कनक्लूजन टौप पर है. इस फिल्म ने पहले विकेंड पर 128 करोड़ की कमाई की थी. वहीं वर्ल्ड वाइट कलेक्शन में फिल्म ने 51. 14 मिलियन डौलर यानि करीब 400 करोड़ रूपये बटोर लिए हैं.इस कलेक्शन के साथ रजनीकांत और अक्षय कुमार की इस फिल्म ने हौलीवुड की फिल्म फैनटास्टिक बिस्ट्स को पीछे छोड़ दिया है.

तंत्रमंत्र के मकड़जाल में फंसे लोग

यह बिहार के बांका जिले के तहत आने वाले बेलहर ब्लौक की घटना है. वहां के टेंगरा गांव में एक तथाकथित तांत्रिक जोड़े ने दुर्गा पूजा के मौके पर महाष्टमी पूजा करने के दौरान अपने 4 साला बेटे के सिर में कील ठोंक कर उस की बलि दे दी.

तांत्रिक योगेंद्र पंडित और उस की पत्नी मुनिया देवी पिछले कई सालों से तंत्र विद्या की सिद्धि में लगे हुए थे. इसी सिलसिले में उन दोनों ने अपने मासूम बेटे गुलिया की बलि दे दी.

तांत्रिक विधि से इलाज करने के लिए योगेंद्र पंडित पिछले 10-15 सालों से लगातार तांत्रिक क्रिया करता आ रहा था और बिहार, झारखंड व उत्तर प्रदेश के जिलों में जाता था.

इसी तरह राजस्थान की एक घटना है. 4 साल की रिजवाना की उस के ही पिता ने रमजान महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए कुरबानी दे दी.

रिजवाना अपने ननिहाल में थी. रिजवाना के पिता को धार्मिक लोगों से जो जानकारी मिली उस से उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि अगर कोई आदमी अपने सब से प्रिय की कुरबानी देता है तो उसे ज्यादा सवाब मिलेगा. इस भरम में उस ने अपनी बेटी की ही कुरबानी दे दी.

इस के लिए धार्मिक मौलाना भी कुसूरवार हैं जो अपनी तकरीर में कहते फिरते हैं कि जो अपने सब से ज्यादा प्यारे की कुरबानी देता है उसे सवाब ज्यादा मिलता है.

समाज में इस तरह का भरम फैलाने वाले और थोथी दलील देने वाले लोग सब से बड़े गुनाहगार हैं जो इस तरह की बातें लोगों के बीच फैलाते रहते हैं.

यह बहुत ज्यादा धार्मिक होने का नतीजा है. इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा देने का काम मुल्ले, पंडित और धार्मिक गुरु कर रहे हैं.

जब कोई मुसलिम अपनी मौत के बाद अंग दान करने की इच्छा जाहिर करता है तो धार्मिक कठमुल्ला बताने लगते हैं कि धार्मिक नजरिए से यह जायज नहीं है. इन धार्मिक कठमुल्लों को खुद कोई जानकारी नहीं है और इनसानियत की बात करने वाले, समाज में फैले अंधविश्वास के खिलाफ

बोलने वाले और सच को सच कहने वाले लोगों के ऊपर ये मौत का फतवा जारी करते हैं.

राजस्थान वाली इस घटना में धार्मिक मौलवीमौलाना खामोश हैं. अगर इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाना चाहते हैं तो सब से पहले अंधविश्वास फैलाने वाले लोगों को समाज के बाहर करना होगा. विज्ञान से जुड़ी बातों को सब को बताना होगा.

पिछले साल झारखंड के रजरप्पा मंदिर में एक सिपाही ने अपने परिवार की मनोकामना पूरी करने के लिए अपना ही सिर काट कर बलि दे दी थी.

जब इस तरह की कोई घटना घटती है तो धर्मगुरु चुप्पी साधे रहते हैं. देशभर से बलि देने की घटनाओं की खबरें गाहेबगाहे मिलती रहती हैं. हम विकास और डिजिटल इंडिया के सपने का जितना भी ढिंढोरा पीट लें, आज भी आदिम युग में ही जी रहे हैं.

ऐसी घटनाओं पर टैलीविजन चैनल वाले बहस नहीं कराते हैं. वहां सिर्फ ऊलजलूल मुद्दों पर ही बहस चलती रहती है.

कुछ दिन पहले बिहार के औरंगाबाद जिले में इस तरह की 2 घटनाएं सामने आई थीं. जिले के हसपुरा ब्लौक के तहत गांव गहना में एक पिता ने मंत्र सिद्धि करने के लिए अपने ही 6 साला बेटे की बलि दे दी थी.

इस आदमी का गुरु, जो खुद तथाकथित ओझागुनी था, ने उसे बताया कि अगर तुम अपने बेटे की बलि दे दोगे तो तुम्हें पूरी तरह मंत्र सिद्धि हासिल हो जाएगी और तुम जिस की भी झाड़फूंक करोगे वह ठीक हो जाएगा.

पुलिस ने तो उस आदमी को पकड़ कर जेल में डाल दिया लेकिन जिस के कहने पर उस ने अपने बेटे की बलि दी थी, उस पाखंडी तक पुलिस नहीं पहुंच सकी है.

जिन की वजह से इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है, वे कभी कुसूरवार साबित नहीं होते हैं. जरूरत इस बात की है कि उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए.

औरंगाबाद जिले के तहत देव ब्लौक में एक चिमनी भट्ठे पर अच्छी तरह से आग नहीं सुलग रही थी और ईंटें किसी वजह से सही ढंग से नहीं पक रही थीं. तब एक ओझा ने ईंटभट्ठे वाले को बता दिया कि अगर किसी आदमी की बलि दोगे तो ईंटें बहुत ही अच्छी पकेंगीं और कोई परेशानी भी नहीं आएगी.

इस भट्ठे के मालिक ने गांव के एक गरीब बच्चे की बलि दे दी. उस बच्चे के मातापिता जब अपने बेटे को खोजने लगे तब कुछ दिनों के बाद यह पता चला कि उस की तो बलि दे दी गई है.

विधायक रह चुके राजाराम सिंह ने जब इस घटना पर बड़ा आंदोलन चलाया तब जा कर उस भट्ठा मालिक पर कार्यवाही हुई. हालांकि, कुछ राजनीतिक दलों के नेता उस के पक्ष में भी खड़े हो गए थे.

इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों के पक्ष में भी जातपांत और धर्म के नाम पर लोग उसे मदद करने लगते हैं, जो बड़े ही शर्म की बात है.

औरंगाबाद जिले के देव ब्लौक के ही एक गांव की लड़की ने रात में सपना देखा कि उस की शादी नाग देवता से होगी और वे नाग देवता एक खेत के बिल से निकलेंगे.

सुबह होने पर लड़की ने अपने मातापिता को यह बात बताई. इस के बाद लड़की दुलहन की तरह सजधज कर उस जगह तक पहुंच गई. वहां लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा.

लड़की को इंतजार करतेकरते शाम हो गई पर नाग देवता नहीं निकले. लड़की अपनी जिद पर अड़ी हुई थी. आखिर में उस लड़की को पुलिस ने वहां से हटाया.

इसी तरह झारखंड की राजधानी रांची से 50 किलोमीटर दूर एक गांव में 18 साल की लड़की मांगली मुंडा की शादी शेरू नामक कुत्ते से करा दी गई क्योंकि गांव के एक बाबा ने लड़की के परिवार वालों को बताया कि लड़की के अंदर प्रेत बाधा है और कुत्ते के साथ शादी नहीं कराई गई तो पूरा परिवार तबाह और बरबाद हो जाएगा.

इस शादी में पूरे गांव के लोगों ने नाचगाने के साथ सारी रस्में निभाईं और उस के बाद कुत्ता को बाकायदा दूल्हा बना कर आम दूल्हे की तरह कार में बिठा कर घर लाया गया और पूरे गांव में उस का स्वागत किया गया.

वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने वाले सामाजिक सरोकारों से जुड़े सुनील कुमार और देवनंदन शर्मा का कहना है कि समाज की तरक्की के लिए वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना ही कारगर हथियार है. हम चंद्रमा की सैर कर आए और मंगल ग्रह पर उतरने की तैयारी में हैं पर आज भी जनसाधारण को वैज्ञानिक सोच से लैस करने का काम नहीं कर पाए हैं.

अगर हम ने ऐसा किया होता तो देश में नरबलि, भूतप्रेतों और अंधविश्वास का बाजार इतना फलताफूलता नजर नहीं आता.

शराब पीने का बहाना चाहिए

कहते हैं कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए. चाहे सुख हो या दुख, शादीब्याह हो या जन्मदिन की दावत, शराब पीने वालों को पीने का बहाना मिल ही जाता है.

आजकल तो यह अकसर ही देखने को मिलता है कि होलीदीवाली जैसे तीजत्योहारों या दूसरी तरह के उत्सवों में कुछ लोग शराब पी कर नशे में धुत्त हो जाते हैं.

यहां आदतन शराब पीने वालों की चर्चा नहीं की जा रही है, बल्कि उन नौसिखियों या बहानेबाजों की बात हो रही है जो हर तरह के मौकों को शराब से जोड़ देते हैं.

हमारे समाज में आजकल किसी न किसी बहाने शराब पीनेपिलाने का चलन जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, वह ठीक नहीं है.

पुराने समय से है चलन

हमारे समाज में एक दंतकथा सुनीसुनाई जाती है कि शराब (मदिरा) समुद्र मंथन से देवों और असुरों द्वारा निकाली गई थी और उस समय इस का नाम ‘सुरा’ रखा गया था. तब से लोग इस का सेवन करते आ रहे हैं.

कुछ प्राचीन ग्रंथों में देवों द्वारा ‘सोम’ नामक नशीले पेय का सेवन करने और असुरों द्वारा ‘सुरा’ का सेवन किए जाने की बात लिखी हुई है यानी शराब दोनों वर्गों में अलगअलग नाम से पसंदीदा रही है.

सचाई क्या है, यह अलग बात है, पर इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ‘सुरा’ या ‘सोम’ के नाम से शराब का सेवन पुराने समय में भी होता था, लेकिन उस समय भी इस का सेवन अच्छा नहीं माना जाता था. प्राचीन ग्रंथों में इन के सेवन से बचने की बातों के जिक्र से इस बात की तसदीक होती है.

स्टेटस सिंबल है पीना

वर्तमान समय में शराब एक फैशन की तरह समाज में अपनी हैसियत बना चुकी है. बस, इस हैसियत को और हवा देने के लिए कोई बहाना मिलना चाहिए. बात तो यहां तक आ पहुंची है कि कुछ लोगों को कोई महफिल, जश्न या गम शराब के बिना अधूरा या फीकाफीका सा महसूस होता है.

अब तो ‘कौकटेल पार्टी’ भी हमारे समाज में अपनी अच्छीखासी जगह बना चुकी है. इस पार्टी की अपनी एक अलग खासीयत है. यह अमीरी की निशानी मानी जा रही है.

क्या शराब का इस तरह समाज पर हावी होना इनसान और समाज के लिए अच्छा है? यकीनन, इस सोच को अच्छा नहीं माना जा सकता.

लोग शादीब्याह में शराब पीते हैं. दावतों व त्योहारों पर शराब पीते हैं. यहां तक कि बहुत से अपने बड़ेबुजुर्गों व मातापिता का भी लिहाज नहीं करते हैं.

शराब अपने शबाब पर आते ही माहौल को बड़ा दुखद या मजेदार बना देती है. पीने वालों की हरकतों को देख कर हंसी के साथ गुस्सा भी आता है, वे कैसीकैसी गैरवाजिब हरकतें करते हैं और नशा हिरन होते ही दो लफ्जों में बड़ी बेशर्मी से ‘सौरी’ या ‘ज्यादा हो गई’ कह कर अपनी घटिया हरकतों से नजात पा लेते हैं.

लेकिन क्या चंद लोगों की बुरी आदत की वजह से औरों का भी मजा किरकिरा कर दिया जाए? अगर ‘अंगूर की बेटी’ की चाहत वालों का यह मानना है कि शराब के बिना कोई जश्न या त्योहार फीका है, तो उन्हें चाहिए कि वे किसी शराबखाने में बैठें और जी भर कर शराब पीएं.

होती हैं बीमारियां

आज पहले के बजाय लोग ज्यादा पढ़ेलिखे और समझदार हो गए हैं. उन्हें मालूम है कि शराब जहां हमारा माली नुकसान करती है, वहीं इस के सेवन से अनेक घातक रोग भी होते हैं.

शराब पीने से इनसान का नैतिक पतन तो होता ही है, साथ ही आने वाली पीढ़ी उन से अच्छी प्रेरणा के बजाय गलत आदतें सीखती है.

आज की नौजवान पीढ़ी व किशोरों में शराब फैशन की तरह अपनाई जा रही है. शादीब्याह में तो लोग शराब के नशे में घंटों नाचते देखे जा सकते हैं.

यह ठीक है कि शादीब्याह खुशी के मौके होते हैं. उन में नाचनागाना और खुशी का इजहार करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन बिना शराब के यह मुमकिन है क्या?

शौकिया पीने वालों में एक अफवाह और प्रचलित है कि शराब भूख अच्छी लगाती है, सेहत बनाती है, इस से सर्दीजुकाम दूर होता है. ये सब तर्कसंगत बातें नहीं हैं, बल्कि शेखचिल्ली वाली बातों से मिलतीजुलती भ्रांतियां हैं.

त्योहार या उत्सव ऐसे मौके होते हैं, जब हर आदमी अपने परिचितों से मिलताजुलता है. ऐसे में कोई शराब जैसी घटिया चीज पी कर ‘कार्टून’ बन कर ऊधम मचाए, क्या यह अच्छा लगेगा? कभी नहीं.

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