फोर्ब्स ने जारी की 2018 के सबसे अमीर सेलेब्स की लिस्ट

फोर्ब्स ने 2018 के 100 सबसे अमीर सेलिब्रिटीज की लिस्ट जारी की है. इस लिस्ट में साल भर में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले सितारों को जगह मिली है. इस लिस्ट में बौलीवुड के दबंग सलमान खान पहले नंबर पर हैं. सलमान ने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली को पछाड़ कर टौप पर जगह बनाई है. इस लिस्ट में अक्षय, दीपिका और अमिताभ जैसे दिग्गज शामिल हैं. लिस्ट में शाहरुख को 13वां पायदान मिला. बताया जा रहा है कि पिछले साल की तुलना में शाहरुख की कमाई 33 फीसदी कम हुई है. हम आपको बताने वाले हैं साल में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले टौप 10 सितारों के नाम.

  1. सलमान खान

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इस लिस्ट में सलमान पहले पायदान पर हैं. इनकी सलाना कमाई 253.25 करोड़ है.

  1. विराट कोहली

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दूसरे पायदान पर क्रिकेट कप्तान विराट कोहली हैं. इनकी सलाना कमाई 228.09 करोड़ रुपये है.

  1. अक्षय कुमार

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तीसरे पर बौलीवुड के खिलाड़ी अक्षय कुमार हैं. अक्षय की कमाई 185 करोड़ है.

  1. दीपिका पादुकोण

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इस लिस्ट में शीर्ष 10 में अकेली महिला सदस्य दीपिका हैं. इनकी सलाना कमाई 112.8 करोड़ है. वहीं पिछले साल यानि 2017 में इनकी कमाई 59.45 करोड़ थी.

  1. महेंद्र सिंह धोनी

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क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान ‘कैप्टन कूल’ 101.77 करोड़ के साथ पांचवें पायदान पर हैं.

  1. आमिर खान

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साल की 97.50 करोड़ की कमाई के साथ आमिर छठे पायदान पर हैं.

  1. अमिताभ बच्चन

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बौलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन की साल की कमाई 96.17 करोड़ है. ये सातवें पायदान पर हैं.

  1. रणवीर सिंह

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रणवीर की सलाना कमाई 84.7 करोड़ है.

  1. सचिन तेंदुलकर

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क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर सलाना 80 करोड़ की कमाई के साथ नौवें स्थान पर हैं.

  1. अजय देवगन

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बौलीवुड के सिंघम अजय देवगन 74.5 करोड़ की सालाना कमाई के साथ 10वें नंबर पर हैं.

 

मौनी राय का कातिलाना अंदाज

एक्ट्रेस मौनी राय सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. समय-समय पर उनका ग्लैमर और बोल्ड अंदाज  फेैन्स को देखने को मिलता रहता है. पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अपने इंस्टाग्राम के औफिशियल अकाउंट पर कुछ फोटो अपलोड किए जो उनके फैंस को काफी पसंद आए. इनमें मौनी बेहद हौट नजर आ रही हैं.

छोटे परदे पर ‘नागिन’ बन कर उन्होंने लोकप्रियता हासिल की. इस वर्ष उन्होंने बौलीवुड में ‘गोल्ड’ फिल्म से अपनी शुरुआत की जिसमें वे अक्षय कुमार जैसे स्टार की हीरोइन बनीं.

“गोल्ड’ फिल्म ने बौक्स औफिस पर अच्छी सफलता हासिल करते हुए सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का कलेक्शन किया.

मौनी इस समय ‘ब्रह्मास्त्र’ नामक बड़ी फिल्म कर रही हैं. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, रणबीर कपूर और आलिया भट्ट जैसे सितारे हैं. सुनने में आया है कि आलिया इसमें नकारात्मक किरदार निभा रही हैं.

संस्कार आश्रम से लापता हुईं 9 लड़कियां

संस्कार आश्रम में मंगलवार को भी दिल्ली सरकार से पेंशन लेने वाले बुजुर्गों की लाइन लगी हुई थी. मीडिया के जमावड़े को देखकर सब हैरान थे और बार-बार पूछ रहे थे कि आज क्या हो गया. जब उन्हें बताया गया कि यहां के शेल्टर होम से नौ लड़कियां फरार हो गई हैं तो सभी भौचक्के रह गए. हर कोई एक ही बात कर रहा था कि आखिरकार नौ लड़कियां एकसाथ कैसे भाग सकती हैं.

दिल्ली सरकार के समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग, अनुसूचित जाति, जनजाति, अति पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के ऑफिस हैं. बॉयज और गर्ल्स हॉस्टल भी यहां हैं, जिनमें दिल्ली के कॉलेज और इंस्टिट्यूट में पढ़ रहे स्टूडेंट्स रहते हैं. यहां वोकेशनल इंस्टिट्यूट और टेक्निकल सर्विस सेंटर भी चलते हैं. इसलिए यहां पर दोपहर के समय भीड़-भाड़ भी रहती है. आम जनता की एंट्री ज्यादातर गेट नंबर तीन से रहती है, जो ग्रीन फील्ड स्कूल वाले रोड पर पड़ता है.

गेट नंबर 3 से करीब 100 मीटर की दूरी पर वह शेल्टर होम बना हुआ है, जहां से 9 लड़कियों के भागने की बात कही जा रही है. इसका कैंपस अलग बना हुआ है. इसकी दीवार के एक तरफ डीडीए का खाली ग्राउंड है, दूसरी तरफ संस्कार आश्रम के बॉयज और गर्ल्स हॉस्टल हैं. पीछे की तरफ जीटीबी एन्क्लेव ‘ई’ पॉकेट के फ्लैट्स की रोड है. इस सड़क पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं रहता है, क्योंकि इसके बाहर गेट लगा हुआ है और वह ज्यादातर बंद रहता है.

दिलचस्प ये है कि हॉस्टल के भीतर कई जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं, जिसमें शेल्टर होम के भीतर भी कैमरे लगे होने की बात कही जा रही है. संस्कार आश्रम की चारदीवारी पर नजर डालें तो वह करीब छह से साढ़े छह फुट तक है, उसके ऊपर करीब तीन फुट की लोहे की रेलिंग है और फिर करीब दो फुट गोल-गोल घुमावदार कांटे वाले तार लगाए गए हैं. शेल्टर होम के फ्रंट गेट से निकलने के बाद फिर से संस्कार आश्रम की इतनी बड़ी और कांटेदार दीवार फिर से है.

ऐसे में सवाल ये है कि नौ लड़कियों कैसे एक साथ इतने घेरे को पार कर भाग गईं. ऐसे में संस्कार आश्रम के सूत्र आशंका जता रहे हैं कि इन लड़कियों को बड़े आराम से किसी गाड़ी में बिठाकर गेट से ले जाया गया होगा. इसमें निश्चित रूप से भीतर के लोगों की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता है. संस्कार आश्रम के सूत्रों ने बताया कि 11 लड़कियां यहां एक साथ लाई गई थीं, जो तीन महीने तक जीटीबी अस्पताल में ट्रेनिंग/नौकरी के लिए गईं. रोजाना सुबह दो वैन ले जाती थी और फिर वापस ले आती थीं.

इस गाने में इश्कबाजी करते दिखे शाहरुख-सलमान

शाहरुख खान की आने वाली फिल्म ‘जीरो’ का नया गाना रिलीज हो गया है. इस गाने में शाहरुख खान के साथ सलमान खान भी जबरदस्त डांस और मस्ती करते दिख रहे हैं. इस गाने के बोल हैं ‘इशकबाजी’. इस गाने के बोल इरशाद कामिल ने लिखे हैं वहीं, सुखविंदर सिंह ने दिव्या कुमार के साथ इसे गाया है.

इस गाने में शाहरुख खान और सलमान खान की जबरदस्त कैमेस्ट्री दिखाई दे रही है. शाहरुख खान इस गाने में यूपी के लड़के के अंदाज में डांस करते नजर आ रहे हैं तो वहीं सलमान खान भी गमछा ओढ़े डांस करते नजर आ रहे हैं. शाहरुख -सलमान की ये कैमेस्ट्री फैंस को खूब पसंद आ रही है. यूट्यूब पर रिलीज होते ही गाना वायरल हो गया है और इसे कई लाख व्यूज मिल चुके हैं.

इससे पहले भी फिल्म के कई गाने रिलीज हो चुके हैं. फैंस को फिल्म के गाने फैंस को खूब पसंद आ रहे हैं. इससे पहले फिल्म का गाना ‘मेरे नाम तू’ रिलीज किया गया था. इस गाने को शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा पर फिल्माया गया है. इस गाने के बोल, वीडियो और शाहरुख की एक्टिंग देखने के बाद किंग खान ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि उन्हें यूं ही नहीं किंग औफ रोमांस कहा जाता है. इस गाने में शाहरुख और अनुष्का के बीच बेहद खूबसूरत केमिस्ट्री देखने को मिल रही है.

बुलंदशहर हिंसा : एफआईआर से बड़ा खुलासा

गोकशी के शक में बुलंदशहर की चिंगरावठी चौकी पर उपद्रव और इंस्पेक्टर सुबोध कुमार समेत दो लोगों की हत्या के मामले में चार आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं. मुख्य आरोपी योगेश राज नाम का शख्स है, जो सोशल मीडिया में खुद को एक भगवा संगठन का नेता होने का दावा करता है. सोमवार को उसी ने गोकशी की FIR दर्ज करवाई थी, हालांकि पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी है.

इस मामले में 27 नामजद और 60 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज हुआ है. बलवे में मारे गए छात्र सुमित का नाम भी आरोपियों में दर्ज है. उपद्रवियों पर हत्या, उपद्रव, सरकारी संपत्ति लूटने जैसी धाराएं लगी हैं. पुलिस ने कहा कि विडियो फुटेज जांच कर आरोपियों की पहचान की जा रही है. तलाश में 6 टीमें लगी हैं.

सोमवार रात घटनास्थल पर पहुंचे विशेष जांच दल ने आरोपियों को पकड़ने के लिए दबिश डाली. ज्यादातर आरोपी महाव और चिंगरावठी गांव के हैं, जो फरार हैं. वहां गलियां सूनी दिख रही हैं. पुलिस पर आरोप है कि उसने आरोपियों की तलाश में कई घरों में तोड़फोड़ की और महिलाओं के साथ मारपीट की.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पूरे मामले में यूपी सरकार और डीजीपी को नोटिस जारी किया है. मवेशियों के मारे जाने का आरोप लगाकर सोमवार को 400 लोगों की भीड़ ने बवाल काटा था. उपद्रवियों ने इंस्पेक्टर की लाइसेंसी पिस्टल, फोन लूट लिए और वायरलेस तोड़ दिया था. सीओ ने चौकी में बंद होकर जान बचाई.

योगेश ने ही भीड़ को उकसाया

एक विडियो में मुख्य आरोपी योगेश राज इंस्पेक्टर सुबोध से बहस करता दिखा रहा है. तहरीर में बताया गया कि योगेश ही भीड़ को भड़का रहा था. हालांकि हालांकि एडीजी (कानून-व्यवस्था) प्रेस कॉन्फ्रेंस में उसका नाम लेने से बचते दिखे, जबकि तहरीर में योगेश का तीन बार नाम है. एडीजी किसी भी संगठन का नाम लेने से भी बचे.

पत्नी-बहन बोलीं, बिसाहड़ा की जांच ने ली जान

इंस्पेक्टर की पत्नी और बहन का आरोप है कि सुबोध बिसाहड़ा में अखलाक केस की जांच कर रहे थे, इसलिए उन्हें मारा गया है. हत्या में पुलिस की साजिश है. पूर्व डीजीपी एके जैन ने कहा कि बिसाहड़ा कांड के कई आरोपियों की गिरफ्तारी सुबोध ने कराई थी. ऐसे में इससे इनकार नहीं कि हिंदू संगठन नाराज रहे हों. लेकिन एडीजी प्रशांत कुमार ने साजिश से इनकार करते हुए कहा कि सुबोध ने डेढ़ महीने ही इस केस की जांच की थी. ऐसे में इसे बिसाहड़ा की जांच से जोड़ना ठीक नहीं होगा.

गमगीन बेटे ने पूछा, अब किसके पिता की बारी

शहीद इंस्पेक्टर के बेटे अभिषेक ने कहा कि जिस पिता ने मुझे ऐसा इंसान बनने की सलाह दी जो समाज में धर्म के नाम पर हिंसा न फैलाए, आज उस पिता की हिंदू-मुस्लिम के नाम पर हुई लड़ाई में ही मौत हो गई. अब कल किसके पिता अपनी जान गंवाएंगे/ इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की बहन ने नाराजगी जताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री सिर्फ गऊ, गऊ, गऊ चिल्लाते रहते हैं. उसी गऊ माता के लिए मेरे भाई ने जान दे दी. अब सीएम कुछ करेंगे/ उनके पास हमसे मिलने की फुर्सत नहीं है. पुलिस पर हमले हो रहे हैं और वह अभी तक चुप्पी साधे बैठे हुए हैं.

परिणीति ने चुराए निक के जूते, जानिए कितने रूपये मिले

हाल में बौलीवुड के सबसे ज्यादा ट्रेंड हो रहे कपल, निक जोनास और प्रियंका चोपड़ा शादी के बंधन में बंध चुके हैं. तकरीबन एक साल तक डेट करने के बाद दोनों ने शादी कर ली है. शाही शादी को लेकर कपल के फैन्स बेहद उत्साहित थे. सोमवार को प्रियंका और निक शादी के बाद पहली बार मीडिया के सामने आए और फैन्स को धन्यवाद कहा.

priyanka and nick jonas wedding

हाई प्रोफाइल शादी को मीडिया कवरेज से दूर रखा गया था, पर अब धीरे धीरे इससे जुड़ी बातें सामने आ रही हैं. हालिया जानकारी के मुताबिक, प्रियंका की चचेरी बहन और अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा जूता चुराई की रस्म पूरी की. बताया जा रहा है कि जूते वापसी के लिए परिणीति ने निक से मोटी रकम की डिमांड रखी थी. पर निक ने मुंह मांगी रकम दी नहीं. हम आपको बताएंगे कि इस रस्म के लिए निक ने परिणीति को कितने पैसे दिए. बताया जा रहा है कि परिणीति ने निक से जूते वापसी के लिए करीब 3 करोड़ 50 लाख रुपए की मांग की थी. जबकि निक ने साली परिणीति को पांच लाख रुपए जूते वापसी के लिए दिए.

खबरों की मानें तो दोनों ही परिवारों ने एक-दूसरे के रीति-रिवाजों को पूरा किया. चोपड़ा और जोनास परिवार आज दिल्ली में एक रिसेप्शन पार्टी को होस्ट करेंगे. कयास लगाए जा रहे हैं कि इनकी रिसेप्शन पार्टी में प्रधानमन्त्री मोदी भी शरीक होंगे.

मूर्ति के माने

मोदी सरकार ने 2,989 करोड़ रुपए खर्च कर के सरदार वल्लभभाई पटेल की जो विशाल मूर्ति बनवाई है, उस का एक परोक्ष लाभ होगा. अब तक देशभर में जो विशाल मूर्तियां बनती रही हैं, वे पूजास्थल बन जाती हैं और उन के इर्दगिर्द पंडों की दुकानें खुल जाती हैं. जो विशाल अक्षरधाम मंदिर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी बने हैं, वहां जम कर धर्म और पाखंड का व्यापार होता है. शिरडी के फकीर की स्वर्णमंडित मूर्तियों को पंडे जम कर बेच रहे हैं.

सरकारों, खासतौर पर भाजपा सरकारों को करोड़ों रुपए इन सब मंदिरों के रखरखाव, प्रबंध, वहां तक पहुंचने वाली सड़कों, बिजली, पानी, सीवर पर खर्च करने पड़ते हैं. ये सब मूर्तियां सरदार पटेल की मूर्ति से चाहे छोटी हों पर खर्च बहुत कराती हैं.

सरदार पटेल की मूर्ति से ये सब मूर्तियां बच जाएंगी. पटेल कांग्रेसी नेता थे, इसलिए मोदी के बाद भाजपाई उन से ऊब जाएंगे और सिवा गुजरात सरकार के, यदि भाजपा की रही तो, कोई परिंदा तक वहां न जाएगा. कुछ भूलेबिसरे यात्री वहां तक जाने की जहमत उठाएंगे वह भी इसलिए कि मूर्ति की लिफ्ट में चढ़ कर कुछ आनंद ले सकें. पर चाहे जितना गुणगान किया जाए, वहां का दृश्य कुछ अजूबा नहीं है. दिल्ली की कुतुबमीनार पर जब तक चढ़ने दिया जाता था, तब भी लोग कतारों में नहीं लगते थे.

इस मूर्ति का महत्त्व महज एक और कुतुबमीनार की तरह का रह जाएगा. आसपास केवल उस की देखभाल करने वाले होंगे. जैसे अहमदाबाद में साबरमती के किनारे महात्मा गांधी का आश्रम सुनसान पड़ा रहता है वैसा ही सरदार पटेल की मूर्ति के साथ होगा. मोदी के बाद न भाजपा, न कांग्रेस, न आम गुजराती, न औसत भारतीय इस मूर्ति में रुचि दिखाएंगे.

मूर्तियां बनाने का पागलपन अब कम होगा, क्योंकि इस से छोटी मूर्तियां बना कर अब कोई विशालता का सुबूत तो नहीं दे सकता. नरेंद्र मोदी ने यदि यह सोच कर पटेल की मूर्ति बनाई हो कि कभी इस से ऊंची उन की खुद की मूर्ति बनेगी, तो बात दूसरी है.

गनीमत है कांग्रेस ने गांधी, नेहरू, इंदिरा और राजीव की बड़ी मूर्तियां नहीं बनवाईं. हां, अंबेडकर एक ऐसे उम्मीदवार अभी अवश्य हैं. उन के समर्थकों को यदि सत्ता मिली तो वे अवश्य 300 मीटर ऊंची मूर्ति बनाएंगे चाहे लखनऊ में अंबेडकर व कांशीराम की मूर्तियों को देखने कोई जाता हो या न हो.

सिर्फ बदन चाहिए प्यार नहीं

मैं एक ट्रांसजैंडर सैक्स वर्कर हूं. यह मेरी अपनी खुद की कहानी है. 12 जून, 1992 को आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के एक मिडिल क्लास परिवार में मेरा जन्म हुआ. हमारा बड़ा सा परिवार था. प्यार करने वाली मां और रोब दिखाने वाले पिता. चाचा, ताऊ, बूआ और ढेर सारे भाईबहन.

मैं पैदा हुआ तो सब ने यही समझा कि घर में लड़का पैदा हुआ है. मुझे लड़कों की तरह पाला गया, लड़कों जैसे बाल कटवाए, लड़कों जैसे कपड़े पहनाए, बहनों ने भाई मान कर ही राखियां बांधीं और मां ने बेटा समझ कर हमेशा बेटियों से ज्यादा प्यार दिया.

हमारे घरों में ऐसा ही होता है. बेटा आंखों का तारा होता है और बेटी आंख की किरकिरी.

सबकुछ ठीक ही चल रहा था कि अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि कुछ भी ठीक नहीं रहा. मैं जैसेजैसे बड़ा हो रहा था, वैसेवैसे मेरे भीतर एक दूसरी दुनिया जन्म ले रही थी.

घर में ढेर सारी बहनें थीं. बहनें सजतींसंवरतीं, लड़कियों वाले काम करतीं तो मैं भी उन की नकल करता. चुपके से बहन की लिपस्टिक लगाता, उस का दुपट्टा ओढ़ कर नाचता.

मेरा मन करता कि मैं भी उन की ही तरह सजूं, उन की ही तरह दिखूं, उन की तरह रहूं. लेकिन हर बार एक मजबूत थप्पड़ मेरी ओर बढ़ता.

छोटा था तो बचपना समझ कर माफ कर दिया जाता. थोड़ा बड़ा हुआ तो कभी थप्पड़ पड़ जाता तो कभी बहनें मार खाने से बचा लेतीं. बहनें सब के सामने बचातीं और अकेले में समझातीं कि मैं लड़का हूं. मुझे लड़कों के बीच रहना चाहिए, घर से बाहर जा कर उन के साथ खेलना चाहिए.

लेकिन मुझे तो बहनों के बीच रहना अच्छा लगता था. बाहर मैदान में जहां सारे लड़के खेलते थे, वहां जाने में मुझे बहुत डर लगता. पता नहीं, क्यों वे भी मुझे अजीब नजरों से देखते और तंग करते थे. उन की अजीब नजरें वक्त के साथसाथ और भी डरावनी होती गईं.

मैं स्कूल में ही था, जब वह घटना घटी. दिसंबर की शाम थी. अंधेरा घिर रहा था. तभी उस दिन स्कूल के पास एक खाली मैदान में कुछ लड़कों ने मुझे घेर लिया. उन्हें लगता था कि मैं लड़की हूं. वे जबरदस्ती मुझे पकड़ रहे थे और मैं रो रहा था.

मैं खुद को छुड़ाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था. उन्होंने जबरदस्ती मेरे कपड़े उतारे और यह देख कर छोड़ दिया कि मेरे शरीर का निचला हिस्सा तो लड़कों जैसा ही था.

इस हाथापाई में मेरे पेट में एक सरिया लग गया. मेरी पैंट खुली थी और पेट से खून बह रहा था. वे लड़के मुझे उसी हालत में अंधेरे में छोड़ कर भाग गए.

मैं पता नहीं, कितनी देर तक वहां पड़ा रहा. फिर किसी तरह हिम्मत जुटा कर घर आया. मैं ने किसी को कुछ नहीं बताया. चोट के लिए कुछ बहाना बना दिया. घर वाले मुझे अस्पताल ले गए. मैं ठीक हो कर घर आ गया.

दुनिया से अलग मेरे भीतर जो दुनिया बन रही थी, वह वक्त के साथ और गहरी होती चली गई. मेरी दुनिया में मैं अकेला था. सब से अपना सच छिपाता, कई बार तो अपनेआप से भी. मैं अंदर से डरा हुआ था और बाहर से जिद्दी होता जा रहा था.

घर में सब मुझे प्यार करते थे, मां और बहन सब से ज्यादा. लेकिन जब बड़ा हो रहा था तो लगा कि उन का प्यार काफी नहीं है. स्कूल में एक लड़का था सनी. वह मेरा पहला बौयफ्रैंड था, मेरा पहला प्यार.

लेकिन बचपन का प्यार बचपन के साथ ही गुम हो गया. जैसेजैसे हम बड़े होते हैं, दुनिया देखते हैं, हमें लगता है कि हम इस से ज्यादा के हकदार हैं, इस से ज्यादा पैसे के, इस से ज्यादा खुशी के, इस से ज्यादा प्यार के. जब साइकिल थी तो मैं उस में ही खुश था. स्कूटी आई तो लगा कि स्कूटी की खुशी इस के आगे कुछ नहीं. साइकिल से मैं कुछ ही किलोमीटर जाता था और स्कूटी से दसियों किलोमीटर. लगा कि आगे भी रास्ते में और प्यार मिलेगा और खुशी.

मैं दौड़ता चला गया. लेकिन जब आंख खुली तो देखा कि रास्ता तो बहुत तय कर लिया था, पर न तो प्यार मिला, न खुशी. मेरे 9 बौयफ्रैंड रहे. हर बार मुझे लगता था कि यह प्यार ही मेरी मंजिल है, लेकिन हर बार मंजिल साथ छोड़ देती. सब ने मेरा इस्तेमाल किया, शरीर से, पैसों से, मन से. लेकिन हाथ किसी ने नहीं थामा.

सब को मुझ से सिर्फ सैक्स चाहिए था. सब ने शरीर को छुआ, मन को नहीं. सब ने कमर में हाथ डाला, सिर पर किसी ने नहीं रखा.

फिर एक दिन मैं ने फैसला किया कि अगर यही करना है तो पैसे ले कर ही क्यों न किया जाए.

मैं बाकी लड़कों की तरह पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था, अपना कैरियर बनाना चाहता था. मैं ने कानपुर यूनिवर्सिटी से एमकौम किया और सीए का इम्तिहान भी दिया.

अब तक जिंदगी उस मुकाम पर पहुंच चुकी थी कि मैं घर वालों और आसपास के लोगों के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गया था. मैं समाज में, कालेज में मिसफिट था.

मैं लड़का था, लेकिन लड़कियों जैसा दिखता था. मर्द था, लेकिन औरत जैसा महसूस करता था. मेरा दिल औरत का था, लेकिन उस में बहुत सारी कड़वाहट भर गई थी.

प्यार की तलाश मुझे जिंदगी के सब से अंधेरे कोनों में ले गई. बदले में मिली कड़वाहट और गुस्सा.

अपनी पहचान छिपाने के लिए मैं दिल्ली आ गया. नौकरी ढूंढ़ने की कोशिश की, लेकिन मिली नहीं. शायद उस के लिए भी डिगरी से ज्यादा यह पहचान जरूरी थी कि तुम औरत हो या मर्द. मुझे यह खुद भी नहीं पता कि मैं क्या था.

यहां मैं कुछ ऐसे लोगों से मिला, जो मेरे जैसे थे. उन्हें भी नहीं पता था कि वे औरत हैं या मर्द. अजनबी शहर में रास्ता भूल गए मुसाफिर को मानो एक नया घर मिल गया.

कोई तो मिला, जिसे पता है कि मेरे जैसा होने का मतलब क्या होता है. कोई तो मिला, जो सैक्स नहीं करना चाहता था, लेकिन उस ने सिर पर हाथ रखा. थोड़ी करुणा मिली तो मन की सारी कड़वाहट आंखों के रास्ते बह निकली.

इन नए दोस्तों ने मुझे खुद को स्वीकार करना सिखाया, शर्म से नहीं सिर उठा कर. मैं ने उन के साथ एनजीओ में काम किया, अपने जैसे लोगों की काउंसिलिंग की, उन के मांबाप की काउंसिलिंग की.

सबकुछ ठीक होने लगा था. लेकिन दिल के किसी कोने में अब भी कोई कांटा चुभा था. प्यार की तलाश अब भी जारी थी. कुछ था, जिसे सिर्फ दोस्त नहीं भर सकते थे.

प्यार किया, फिर धोखा खाया. जिस को भी चाहा, वह रात के अंधेरे में प्यार करता और दिन की रोशनी में पहचानने से इनकार कर देता. और फिर मैं ने तय किया कि यह काम अब मैं पैसों के लिए करूंगा. शरीर लो और पैसे दो.

मुझे आज भी याद है मेरा पहला काम. एक सैक्स साइट पर तन्मय राजपूत के नाम से मेरा प्रोफाइल बना था. उसी के जरीए मुझे पहला काम मिला. नोएडा सैक्टर 11 में मैट्रो अस्पताल के ठीक सामने वाली गली में मैं एक आदमी के पास गया. वह आदमी मुझ से सिर्फ 4-5 साल बड़ा था.

मैं ने पहली बार पैसों के लिए सैक्स किया. उन की भाषा में इसे सैक्स नहीं, सर्विस कहते हैं. मैं ने उसे सर्विस दी, उस ने मुझे 1,500 रुपए. तब मेरी उम्र 22 साल थी.

उस दिन वे 1,500 रुपए हाथ में ले कर मैं सोच रहा था कि जेरी, तू ने जो रास्ता चुना है, उस में हो सकता है तुझे बदनामी मिले, लेकिन पैसा खूब मिलेगा. लेकिन हुआ यह कि बदनामी और गंदगी तो मिली, लेकिन पैसा नहीं.

इस रास्ते से कमाए गए पैसों का कोई हिसाब नहीं होता. यह जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है. यह सिर उठा कर की गई कमाई नहीं होती, सिर छिपा कर अंधेरे में की गई कमाई होती है.

एक बार जो मैं उस रास्ते पर चल पड़ा तो पीछे लौटने के सारे रास्ते बंद हो गए. अब हर रात यही मेरी जिंदगी है. एक शादीशुदा आदमी की जिंदगी में कुछ दिनों या हफ्तों का अंतराल हो सकता है, लेकिन मेरी जिंदगी में नहीं. हर रात हमें तैयार रहना होता है. 15 ग्राहक हैं मेरे. कोई न कोई तो मुझे बुलाता ही है.

आप को लगता है कि सैक्स बहुत सुंदर चीज है, जैसे फिल्मों में दिखाते हैं. लेकिन मेरे लिए वह प्यार नहीं, सर्विस है. और सर्विस मेहनत और तकलीफ का काम है. हमारी लाइन में सैक्स ऐसे होता है कि जो पैसे दे रहा है, उस के लिए वह खुशी है और जो पैसे ले रहा है, उस के लिए तकलीफ.

ग्राहक जो डिमांड करे, हमें पूरी करनी होती है. जितना ज्यादा पैसा, उतनी ज्यादा तकलीफ. लोग वाइल्ड सैक्स करते हैं, डर्टी सैक्स करते हैं, मारते हैं, कट लगाते हैं. लोगों की अजीबअजीब फैंटैसी हैं. किसी को तकलीफ पहुंचा कर ही मजा मिलता है. किसी को तब तक मजा नहीं आता, जब तक सामने वाले के शरीर से खून न निकल जाए.

मैं यह सबकुछ बिना किसी नशे के पूरे होशोहवास में करता हूं. जो कर रहा हूं, उस से मेरे शरीर को काफी नुकसान हो रहा है. अगर नशा करूंगा, तो मैं अच्छी सर्विस नहीं दे पाऊंगा.

ग्राहक नशा करते हैं और मैडिकल स्टोर से सैक्स पावर बढ़ाने की दवा ले कर आते हैं और मैं पूरे होश में होता हूं. कई बार पूरीपूरी रात यह सब चलता है.

दिन के उजाले में शहर की सड़कों पर बड़ीबड़ी गाडि़यों में जो इज्जतदार चेहरे घूम रहे हैं, कोई नहीं जानता कि रात के अंधेरे में वही हमारे ग्राहक होते हैं. बड़ेबड़े अफसर, नेता, पुलिस वाले… मैं नाम गिनाने लग जाऊं तो आप की आंखें फटी की फटी रह जाएं.

क्या पता कि आप के हाईफाई दफ्तर में घूमने वाली कुरसी पर बैठा सूटबूट वाला आदती रात के अंधेरे में हमारा ग्राहक हो.

एक बार मैं कनाट प्लेस में एक औफिस में इंटरव्यू देने गया. वह एक वक्त था, जब मैं इस जिंदगी से बाहर आना चाहता था. वहां जो आदमी मेरा इंटरव्यू लेने के लिए बैठा था, वह मेरा क्लाइंट रह चुका था.

उस ने कहा, ‘‘इंटरव्यू छोड़ो, यह बताओ, फिर कब मिल रहे हो?’’

मैं कोई जवाब नहीं दे पाया. पता नहीं, मुझे क्यों इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई थी. मैं उस का सामना नहीं कर पाया या अपना. मैं बिना इंटरव्यू दिए ही वापस लौट आया.

मेरी नजर में सैक्स शरीर की भूख है. प्यार कुछ नहीं होता. जहां प्यार हो, सैक्स जरूरी नहीं. दुनिया में जो प्यार का खेल चलता है, उस का सच कभी हमारी दुनिया में आ कर देखिए. अच्छेखासे शादीशुदा इज्जतदार लोग आते हैं हमारे पास अपनी भूख मिटाने.

एक बार एक आदमी मेरे पास आया और बोला, ‘‘मेरी बीवी पेट से है. मुझे रिलीज होना है.’’

मैं ने उस आदमी के साथ ओरल सैक्स किया था. यह सब क्या है? एक औरत जो तुम्हारी पत्नी है, उस के पेट में तुम्हारा ही बच्चा पल रहा है, वह तुम्हें सैक्स नहीं दे सकती तो तुम सैक्स वर्कर के पास जाओगे?

ज्यादातर मर्दों के लिए औरत के सिर्फ 2 ही काम हैं कि वह उन के साथ सोए और उन के मां बाप की सेवा करे. 90 फीसदी मर्दों की यही हकीकत है. ज्यादातर लोग अपनी बीवी से प्यार नहीं करते हैं.

विदेश भेजने के नाम पर लूटने का धंधा

आजकल बेरोजगारी की समस्या सचमुच बहुत भयंकर है. ऐसे में बहुत से लोग दूसरे देशों में जा कर कामधंधा करना चाहते हैं. बेशक वहां काम मिल सकता है, लेकिन विदेश जा कर बहुत से लोग शोषण के भी शिकार होते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय प्रवास संगठन के मुताबिक, दुनियाभर में नाजायज तरीके से विदेश भेजने का कारोबार तकरीबन 45,000 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का है. हमारे देश के बहुत से इलाके इस तरह की ठगी की चपेट में हैं. सब से ज्यादा ठगी पंजाब व उस के आसपास के इलाकों में हो रही है.

ठगी का जाल

पंजाब और उस के आसपास के इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोग विदेश जाने की इतनी गहरी चाहत रखते हैं कि वे उसे अपनी जिंदगी का मकसद बना लेते हैं. जिन लोगों के बच्चे विदेशों में हैं उन की अमीरी और रुतबा देख कर ज्यादातर मांबाप अपना सबकुछ दांव पर लगा कर अपने बच्चों को विदेश भेजने की कोशिशों में लगे रहते हैं.

पूरे देश से बाहर जाने वालों में से एकचौथाई से भी ज्यादा लोग अकेले पंजाब से होते हैं. वहां से हर साल 2 लाख से भी ज्यादा वीजा की अर्जियां कनाडा, अमेरिका, इंगलैंड, अरब, आस्टे्रलिया वगैरह देशों के लिए लगती हैं.

यह बात दीगर है कि तयशुदा कोटे के मुताबिक इन में से तकरीबन 50,000 यानी 25 फीसदी लोगों को ही विदेश जाने के लिए वीजा मिल पाता है बाकी के 75 फीसदी यानी तकरीबन डेढ़ लाख लोग वीजा न मिलने से मायूस रह जाते हैं.

बस, असली समस्या यहीं से शुरू होती है. जिन लोगों को वीजा नहीं मिल पाता, वे आसानी से हिम्मत नहीं हारते हैं और किसी न किसी तरह बाहर जाने की जुगत में लगे रहते हैं और अपना काम कराने की गरज से मददगार एजेंट तलाशते रहते हैं.

यों फंसते हैं लोग

नामंजूर हुए वीजा के लिए नए सिरे से दोबारा कोशिश करने के नाम पर फर्जी किस्म के एजेंट भोलेभाले लोगों को अपनी लुभावनी बातों के जाल में फंसा लेते हैं.

ट्रैवल एजेंट रोब गांठने के लिए अपनी कंपनी का दफ्तर दूर के किसी बड़े शहर में बताते हैं. फिर उन्हें हवाईजहाज से वहां ले जाते हैं. कागजात व लाखों रुपए की रकम जमा कराते हैं. रकम हाथ में आते ही एजेंट व दलालों का कमीशन बंट जाता है, शिकार को पता तक नहीं चलता.

ट्रैवल एजेंट और उन के दलाल स्कूलकालेजों से पासआउट होने वाले  छात्रों पर खासा नजर रखते हैं. उन्हें उन की तालीम व काबिलीयत से बेहतर काम विदेश में दिलवाने का झांसा देते हैं. पंजाब में कबूतरबाजी यानी नाजायज तरीके से विदेश ले जाने के चक्कर में पंजाब का एक नामी गायक जेल गया था व उस के खिलाफ चले केस में 2 साल सजा हुई थी.

ज्यादातर बेरोजगार नौजवान तो जागरूक न होने से चालाक एजेंटों के झांसे में आ जाते हैं व 5 लाख से 20 लाख रुपए तक जेब से गंवा देते हैं. कई लोग अपनी जमीन वगैरह बेच कर या कर्ज ले कर यह रकम जुटाते हैं, लेकिन उन का मकसद पूरा नहीं हो पाता है.

कुसूरवारों को सजा नहीं

फर्जी एजेंट इतने शातिर होते हैं कि वे बहुत ही सफाई के साथ अपनी चाल चलते हैं इसलिए पीडि़तों के पास उन के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं होता. इसी वजह से उन के खिलाफ सख्त कार्यवाही नहीं हो पाती है. नतीजतन, विदेश भेजने के नाम पर ठगी का यह कारोबार धड़ल्ले से फलफूल रहा है.

पुलिस के पास जब ठगी की कोई शिकायत आती है तो वे फर्जी एजेंटों से अपनी मुट्ठी गरम कर के उन के खिलाफ जल्दी से केस ही दर्ज नहीं करते इसलिए ज्यादातर मामले कोर्टकचहरी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. अगर कभीकभार कोई केस दर्ज करते भी हैं तो उन का चालान जल्दी से नहीं करते, केस को पुख्ता नहीं बनाते.

अदालत में साबित ही नहीं हो पाता कि ठगी की गई है, इसलिए ज्यादातर मामलों में कुसूरवारों को कोर्ट से सजा नहीं हो पाती. इस तरह फर्जी एजेंट चांदी काट कर मौज मारते रहते हैं इसलिए विदेश जाने की तैयारी करते वक्त बहुत चौकस रहना लाजिमी है.

जंजाल है सब

वीजा, पासपोर्ट व टिकट वगैरह का सारा काम अब औनलाइन होता है, लेकिन गंवई इलाकों में रहने वाले कमपढ़े लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए उन्हें एकमुश्त रकम दे कर सारा ठेका एजेंटों को ही देना आसान लगता है. लिहाजा, ट्रै्रवल एजेंटों का धंधा फलफूल रहा है.

लोगों को यूरोपीय देशों में भेजने के लिए एजेंट हर आदमी से अमूमन 20 लाख रुपए लेते हैं, लेकिन अमेरिका, कनाडा व आस्टे्रलिया जाने वालों की लंबी कतार व सख्त नियमों के चलते वे 35 लाख रुपए तक मांगते हैं.

विदेशी वर्क परमिट आसानी से नहीं मिलता इसलिए एजेंट टूरिस्ट वीजा पर भेज कर बाद में सैटल करने का झांसा देते हैं, जो कभी पूरा नहीं होता. इसलिए लाखों रुपए गंवाने के बाद भी विदेश जाने का सपना पूरा नहीं होता.

दरअसल, ज्यादातर एजेंट फ्लाइट पकड़ने, वीजा व टिकट वगैरह के कागजात जाने वाले को नहीं देते. वे बराबर यह कह कर टरकाते रहते हैं कि कागज अभी नहीं मिले हैं. बस, वे आने वाले हैं इसलिए देखे बिना सचाई का पता ही नहीं चल पाता कि उन्हें कहां भेजा जा रहा है.

गांव मझौट के एक नौजवान मनजिंदर यूनान जाना चाहता था. उसे नाजायज तरीके से नाव द्वारा तुर्की भेजा जा रहा था, इसलिए वह वापस आ गया.

गांव बोघनी के रूपिंदर को कनाडा जाना था. एजेंट ने उसे पहले मुंबई, फिर बैंगलुरु भेज दिया. वहां बंधक बना कर पीटा व बंदूक की नोक पर घर वालों को फोन कराया कि वह कनाडा पहुंच गया, इसलिए आप एजेंट को बाकी के 25 लाख रुपए दे दो. इस के बाद लड़के को छोड़ा गया, लेकिन तब से उस एजेंट का कहीं कोई अतापता नहीं है. अकेले पंजाब में कुल 21,181 ट्रैवल एजेंट हैं. इन में से सिर्फ 1,181 ही सही हैं, बाकी 20,000 का पताठिकाना सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं है.

विदेशों में काम दिलाने वाले महज 38 एजेंट हैं, लेकिन जनता के जागरूक न होने की वहज से हजारों दलालों का धंधा बदस्तूर चल रहा है. वैसे, ट्रैवल एजेंटों का लाइसैंस जिलाधिकारी देते हैं.

एक एजेंट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ज्यादातर लोग खुद कायदेकानून के खिलाफ विदेश जाना चाहते हैं इसलिए वे खुद आ कर मदद मांगते हैं. ऐसे में एजेंट के साथसाथ जाने वाला भी बराबर का कुसूरवार है. उधर सरकारी लाइसैंस फीस के अलावा उस के बाद की सेवाओं के हिसाब से 5 लाख रुपए तक का खर्च है.

सावधानी बरतें

खुद कोई गलत तरीका न अपनाएं. जहां तक मुमकिन हो आप अपना काम खुद करें, घर के पढ़ेलिखे आदमी से कराएं या रजिस्टर्ड, अच्छी साख वाले, भरोसेमंद एजेंट से मदद लें. रजिस्टर्ड एजेंट का नाम जिला प्रशासन की वैबसाइट पर दर्ज लिस्ट से चैक करें.

विदेशों में काम दिलाने वाले एजेंट से शर्तें पढ़ें व लिखित में करार करें. क्रौस चैक से भुगतान करें. दी गई रकम व दिए गए असल दस्तावेजों की पक्की रसीद जरूर लें व उन्हें संभाल कर रखें.

वीजा में दर्ज अपना ब्योरा बहुत ही सावधानी से देखें. टूरिस्ट या स्टडी वीजा पर विदेश जा कर बाद में सैटल कराने की बातों पर भूल कर भी भरोसा न करें. अपने एजेंट की फोटो आईडी व नामपते का पूरा ब्योरा ले कर घर में महफूज रखें, ताकि वक्त पर काम आ सके.

पुख्ता जानकारी के लिए भारत सरकार की हैल्पलाइन 1800113090 व पुलिस की हैल्पलाइन 181 पर बातचीत की जा सकती है.

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