दिलजले बौस की करतूत : जिस्म की चाहत में हत्या

अगस्त, 2017 की शाम को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के राजनगर स्थित गौड़ मौल में काफी भीड़ थी. इस भीड़ में शिवानी और आसिफ उर्फ आशू भी शामिल थे. दोनों काफी खुश थे, लेकिन किस की खुशियां कब गम में तब्दील हो जाएं, कोई नहीं जानता. साढ़े 6 बजे के करीब दोनों टहलते हुए मौल के बाहर आ गए. मौल के बाहर पार्किंग में शिवानी की स्कूटी खड़ी थी, जबकि आसिफ की एसयूवी कार सड़क के उस पार खड़ी थी. आसिफ ने शिवानी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अच्छा शिवानी, मैं चलता हूं.’’

‘‘चलो, मैं आप को कार तक छोड़ देती हूं.’’

‘‘नहीं, मैं चला जाऊंगा. क्यों बेकार में परेशान हो रही हो?’’

‘‘परेशान होने की क्या बात है, मैं चलती हूं.’’ शिवानी ने हंसते हुए कहा.

आसिफ अपनी कार के पास पहुंचा और बैठने से पहले शिवानी से थोड़ी बात की. शिवानी लौटने लगी तो आसिफ ने बैठने के लिए कार का दरवाजा खोला. वह कार में बैठ पाता, तभी 2 लड़के स्कूटी से आए और उस की कार की दूसरी ओर रुक गए. उन में से पीछे बैठा युवक मुंह पर सफेद अंगौछा बांधे था. दूसरा स्कूटी स्टार्ट किए खड़ा रहा. पीछे बैठा युवक तेजी से उतरा और आसिफ के सामने जा खड़ा हुआ. उस के हाथ में पिस्टल थी, जिसे देख कर आसिफ घबरा गया.

आसिफ कुछ समझ पाता, इस से पहले ही उस युवक ने आसिफ पर गोली चला दी. वह चिल्लाते हुए जान बचा कर भागा, तभी उस ने उस पर एक और गोली दाग दी. इस के बाद वह स्कूटी पर बैठ गया तो उस का साथी उसे ले कर भाग निकला.

गोली लगने से आसिफ सड़क पर ही लहूलुहान हो कर गिर पड़ा था. गोलियों के चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. शिवानी ने भी गोलियों के चलने की आवाज सुनी थी. वह भाग कर आसिफ के पास पहुंची. आसिफ की हालत देख कर उस की हालत पागलों जैसी हो गई.

पुलिस को घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर स्थानीय थाना कविनगर के इंसपेक्टर नीरज सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. उन्होंने तुरंत आसिफ को अस्पताल पहुंचाया, लेकिन डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

सरेआम हुई इस वारदात से घटनास्थल और उस के आसपास सनसनी फैल गई. एसपी (सिटी) आकाश तोमर और सीओ रूपेश सिंह भी मौके पर पहुंच गए. इन्होंने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया. पुलिस ने घटनास्थल से पिस्टल के 2 कारतूसों के खोखे बरामद किए. शुरुआती पूछताछ में पता चला कि मृतक आसिफ उर्फ आशू शहर की चमन विहार कालोनी का रहने वाला था. उस का सबमर्सिबल के इलैक्ट्रिक पैनल बनाने का बड़ा कारोबार था.

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शिवानी पर आसिफ को मरवाने का आरोप

आसिफ के साथ मौल आई शिवानी शहर की ही रहने वाली थी. दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. घटना की खबर पा कर मृतक के घर वाले आ गए थे. उन का कहना था कि आसिफ की हत्या शिवानी और उस के साथियों ने की है. शिवानी पर उन लोगों ने हत्या का सीधा आरोप लगाया था, क्योंकि आसिफ उसी के साथ मौल आया था.

इस हमले में शिवानी को खरोंच तक नहीं आई थी, जबकि वह काफी डरीसहमी थी. अस्पताल में उस का भी प्राथमिक इलाज किया गया. एसएसपी एच.एन. सिंह ने पुलिस को इस मामले का जल्द खुलासा करने के निर्देश दिए. आसिफ के घर वालों के आरोपों के आधार पर पुलिस ने शिवानी को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया, जबकि वह हत्या में अपना हाथ होने से मना कर रही थी. उस का कहना था कि आसिफ उस का अच्छा दोस्त था. वह भला उस की हत्या क्यों कराएगी? यह हत्या उस के बौस ने कराई है, क्योंकि उसे उस की यह दोस्ती पसंद नहीं थी.

शिवानी भले ही हत्या की बात से मना कर रही थी, लेकिन मृतक के पिता खालिद की तहरीर के आधार पर पुलिस ने शिवानी, उस के बौस व 2 अन्य लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसपी सिटी के निर्देशन में एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में थानाप्रभारी और उन के सहयोगियों के अलावा अपराध शाखा के पुलिसकर्मियों को भी शामिल किया गया.

संदेह के दायरे में शिवानी का बौस

पुलिस ने मौल के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की रिकौर्डिंग चैक की तो उस में घटना कैद थी. हमलावर एक स्कूटी से आए थे, जिन में पीछे बैठे युवक ने गोली चलाई थी. लेकिन उन के चेहरे स्पष्ट नहीं थे. गोली चलने के बाद जिस तरह शिवानी ने पलट कर देखा था और आसिफ को बचाने के लिए दौड़ी थी, उस से लगता नहीं था कि उस की कोई मिलीभगत थी. पुलिस ने शिवानी को वह रिकौर्डिंग दिखाई तो उस ने हमलावर की शारीरिक कदकाठी देख कर उसे अपना बौस बताया.

अगले दिन पुलिस ने शिवानी से काफी घुमाफिरा कर पूछताछ की. उस के और आसिफ के मोबाइल की काल डिटेल्स हासिल कर उस का गहराई से अध्ययन किया, लेकिन इस से कोई सुराग हासिल नहीं हुआ. शिवानी का कहना था कि हत्या उस के बौस ने ही की है. क्योंकि वह उस से बेहद नाराज था. उस ने यह भी बताया कि घटना के बाद उस ने बौस को 2 बार फोन मिलाया था, लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की थी. ऐसा पहली बार हुआ था.

शिवानी के बौस का नाम दिनेश था और वह शहर से लगे गांव चिपियाना का रहने वाला था. उस का प्रौपर्टी का कारोबार था. उस का औफिस एक इंस्टीट्यूट के पास था. शिवानी वहीं काम करती थी. पुलिस ने दिनेश के घर और औफिस पर छापा मारा तो दोनों जगह ताला लगा मिला. वह परिवार सहित फरार हो गया था. इस से पुलिस का शक और मजबूत हो गया.

पुलिस ने उस के नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई तो पता चला कि वारदात के समय उस के फोन की लोकेशन औफिस की ही थी. इस का मतलब उस ने यह वारदात बदमाशों से कराई थी या फिर जानबूझ कर अपना मोबाइल फोन औफिस में छोड़ दिया था. क्योंकि शिवानी उसी पर हत्या का आरोप लगा रही थी. शायद इसीलिए उस ने शिवानी का फोन रिसीव नहीं किया था.

दिनेश के यहां काम करने वाले दोनों लड़कों लकी और राजीव के मोबाइल फोन की लोकेशन पता की गई तो वह गौड़ मौल की पाई गई. इस से साफ हो गया कि आसिफ की हत्या में दिनेश का ही हाथ है. इस जानकारी के बाद पुलिस ने शिवानी को घर जाने दिया, लेकिन उसे शहर छोड़ कर जाने से मना कर दिया था. पुलिस ने उस के नंबर को भी सर्विलांस पर लगा दिया था.

पुलिस खुद भी दिनेश के बारे में पता करने लगी, साथ ही मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया. परिणामस्वरूप 8 अगस्त की रात पुलिस ने दिनेश को उस के एक साथी सहित गाजियाबाद के लालकुआं से रात साढ़े 12 बजे गिरफ्तार कर लिया. बाद में पता चला कि उस के साथ पकड़ा गया युवक लकी था. तलाशी में उन के पास से एक पिस्टल और कारतूस बरामद हुए. पुलिस ने उन्हें थाने ला कर पूछताछ की तो आसिफ की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

हकीकत आई सामने

दरअसल, आसिफ और शिवानी की दोस्ती बहुत गहरी थी. वह शिवानी के घर भी आताजाता था. दोनों की जानपहचान और अपनत्व का यह रिश्ता उन के घर वालों से भी नहीं छिपा था. आसिफ एक तरह से शिवानी के घर के सदस्य की तरह था, इसलिए उन के रिश्ते को कोई शक की नजरों से नहीं देखता था. करीब 2 साल पहले शिवानी ने दिनेश के औफिस में नौकरी कर ली. शिवानी खूबसूरत और समझदार लड़की थी. उस ने बहुत जल्द दिनेश के औफिस का सारा काम संभाल लिया. भरोसा हुआ तो वह एकाउंट का काम भी देखने लगी. वक्त के साथ दिनेश उस की ओर आकर्षित होने लगा. वह मन ही मन शिवानी को प्यार करने लगा. लेकिन उस की और शिवानी की उम्र में काफी फासला था.

दिनेश शादीशुदा था, इस के बावजूद वह दिल के हाथों हार गया. यह बात अलग थी कि शिवानी उस की चाहत से बेखबर थी. चूंकि दिनेश शिवानी को चाहने लगा था, इसलिए उस का खास खयाल रखने लगा. शिवानी उस के इस खयाल रखने को अपनत्व और बौस का प्यार समझती थी. दिनेश के दिल में शिवानी के लिए जो सोच थी, उसे उस ने उस पर कभी जाहिर नहीं किया. उसे पूरी उम्मीद थी कि एक दिन ऐसा आएगा, जब शिवानी उस की चाहत को समझ जाएगी और उसे जी भर कर खुशियां देगी. इसी उम्मीद में वह उसे एकतरफा प्यार करता रहा.

सामने आई शिवानी की दोस्ती

दिनेश को पता नहीं था कि शिवानी की आसिफ से दोस्ती है. यह राज उस पर तब खुला, जब वह शिवानी के औफिस भी आने लगा. उस का आनाजाना बढ़ा तो दिनेश का ध्यान उस की ओर गया. उसे यह नागवार गुजरा. वक्त के साथ आसिफ का आनाजाना बढ़ा तो दिनेश को शक हुआ. तब उस ने एक दिन शिवानी से पूछा, ‘‘शिवानी, एक बात पूछूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’

‘‘पूछिए सर.’’

‘‘यह जो लड़का तुम से मिलने आता है, यह कौन है?’’

दिनेश की इस बात पर पहले तो शिवानी चौंकी, उस के बाद बताया, ‘‘सर, उस का नाम आसिफ है. वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त है.’’

दिनेश को लगा, शिवानी का आसिफ से गहरा रिश्ता है. वह खामोश हो गया. शिवानी ने दिनेश की इस बात को सामान्य ढंग से लिया था, जबकि उस के दिमाग में शिवानी और आसिफ के रिश्तों को ले कर उथलपुथल मची थी. शिवानी को ले कर उस ने जो ख्वाब देखे थे, उसे बिखरते नजर आ रहे थे.

शिवानी की निगरानी

दिनेश के औफिस में राजीव और लकी भी काम करते थे. लकी गाजियाबाद के ही दुहाई गांव का रहने वाला था, जबकि राजीव दिल्ली के वजीराबाद का रहने वाला था. ये दोनों ही दिनेश के विश्वासपात्र थे. दिनेश ने दोनों को शिवानी की निगरानी पर लगा दिया. उन्होंने दिनेश को बताया कि शिवानी आसिफ के साथ अकसर घूमती है.

एक साल पहले की बात है. शिवानी के पिता की मौत हो गई थी. उन की तेरहवीं पर दिनेश उस के घर गया तो उस ने आसिफ को भी वहां पाया. वह वहां शिवानी के घर के सदस्य की तरह काम कर रहा था. कहां उस ने सोचा था कि शिवानी उस की खुशियों में चार चांद लगा देगी, लेकिन यहां तो आसिफ उस की खुशियों में ग्रहण बन गया था. अब उस का सब्र जवाब दे गया. एक दिन उस ने शिवानी से कहा, ‘‘मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं शिवानी.’’

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‘‘कहिए सर, क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि तुम आसिफ का साथ छोड़ दो.’’

‘‘सर, यह आप क्या कह रहे हैं? अगर आसिफ से मेरी दोस्ती है तो इस में बुराई क्या है?’’ शिवानी ने पूछा.

दिनेश ने उसे समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘शिवानी, मैं तुम्हारा बेहतर भविष्य चाहता हूं. मैं ने उस के बारे में पता कराया है, वह अच्छा लड़का नहीं है. उस के चक्कर में तुम कहीं किसी मुसीबत में न फंस जाओ. वैसे भी वह दूसरे मजहब का है.’’

‘‘बात मजहब की नहीं है सर. वह मेरा पुराना दोस्त है. उस के और मेरे घरेलू संबंध हैं.’’

अच्छा नहीं लगा शिवानी का जवाब

दिनेश को शिवानी की यह बात नागवार गुजरी. उस ने कहा, ‘‘क्या मेरी बात की तुम्हारे लिए कोई अहमियत नहीं है?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है सर, मैं आप के यहां नौकरी करती हूं. लेकिन मेरे निजी मामले में आप जिस तरह दखलंदाजी कर रहे हैं, यह ठीक नहीं है.’’

‘‘मैं तुम्हारा भला चाहता हूं, इसीलिए उस से दूर रहने की सलाह दे रहा हूं.’’

‘‘आसिफ को मैं कई सालों से जानती हूं. मुझे उस में कोई बुराई नजर नहीं आती. वैसे भी मैं अपना अच्छाबुरा समझती हूं.’’ शिवानी ने बेरुखी से कहा.

शिवानी के इस जवाब से दिनेश खामोश हो गया. यह बात अलग थी कि शिवानी की बातें उस के दिल को लग गई थीं. शिवानी तो इन बातों को भूल गई, लेकिन दिनेश नहीं भूला था. उस ने शिवानी से कह भी दिया था कि आसिफ अब उस से मिलने औफिस में नहीं आना चाहिए.

आसिफ दिनेश के औफिस भले ही नहीं आता था, लेकिन औफिस के बाहर शिवानी से उस का मिलनाजुलना लगातार जारी रहा. इन बातों से दिनेश चिढ़ गया. एक दिन उस ने शिवानी को चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘शिवानी, आसिफ से दूर हो जाओ वरना कहीं ऐसा न हो कि मेरे हाथों उस का कुछ बुरा हो जाए.’’

दिनेश दबंग किस्म का आदमी था. शिवानी जानती थी कि वह कुछ भी कर सकता है. उस की चेतावनी से डर कर शिवानी ने वादा करते हुए कहा, ‘‘ठीक है सर, अगर आप को अच्छा नहीं लगता तो मैं उस से दूर रहूंगी.’’

रिश्तों के अपने मायने होते हैं, लेकिन कुछ रिश्ते मजबूरियां भी बन जाते हैं. शिवानी के साथ भी दिनेश का रिश्ता कुछ ऐसा ही हो गया था. पिता के मरने के बाद उस की जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं. दिनेश ने न सिर्फ उसे रोजगार दिया था, बल्कि उस पर उस के कई एहसान भी थे, इसलिए वहां नौकरी करना उस की मजबूरी थी.

दिनेश की चेतावनी से डर कर कुछ दिनों के लिए शिवानी ने आसिफ से मिलनाजुलना बंद कर दिया. उसे अपनी जिंदगी जीने का पूरा हक था. उस के रिश्ते किस से हों, यह तय करना भी उस का काम था. लेकिन दिनेश जबरन दखलंदाजी कर रहा था. सही बात तो यह थी कि शिवानी आसिफ से रिश्ता नहीं तोड़ना चाहती थी, इसीलिए वह आसिफ से फिर मिलनेजुलने लगी.

दोस्ती के लिए शिवानी का झूठ

दिनेश जब भी इस बारे में पूछता, वह झूठ बोल देती. दिनेश का सोचना था कि आसिफ से दूर होने के बाद शिवानी उस के पहलू में आ गिरेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. दिनेश ने अपने आदमी फिर शिवानी के पीछे लगा दिए. पता चला कि शिवानी ने आसिफ से मिलनाजुलना बंद नहीं किया था.

दिनेश किसी भी कीमत पर शिवानी को खोना नहीं चाहता था. यही वजह थी कि आसिफ को वह फूटी आंख नहीं देखता था. वह चाहता था कि शिवानी आसिफ से किसी तरह अलग हो जाए. यह बात जुनून की हद तक उस के दिमाग पर हावी हो गई थी. वह दिनरात इसी बारे में सोचने लगा. उसे लगा कि शिवानी आसिफ का साथ छोड़ने वाली नहीं है. अगर उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब शिवानी दबाव पड़ने पर नौकरी छोड़ देगी. वह उसे दिल से चाहता था, इसलिए नहीं चाहता था कि शिवानी उस से दूर हो.

कई दिनों की दिमागी उथलपुथल के बाद दिनेश ने सितंबर महीने में आसिफ को ही रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. आसिफ के लिए उस के दिल में यह सोच कर और भी नफरत पैदा हो गई कि उसी की वजह से शिवानी उस की नहीं हो पा रही थी.

उस ने सोचा कि अगर आसिफ को ही हमेशा के लिए हटा दिया जाए तो शिवानी का ध्यान पूरी तरह उस की ओर हो जाएगा. वेतन बढ़ाने और भविष्य में बड़ी जरूरतों को पूरा करने का वादा कर के उस ने इस साजिश में अपने कर्मचारियों राजीव और लकी को भी शामिल कर लिया. इस के बाद हत्या के लिए उस ने एक अवैध पिस्टल भी खरीद ली.

हत्या के बाद कोई उस पर शक न कर सके, इसलिए दिनेश ने योजना के तहत 2 नए मोबाइल फोन व उन के लिए सिमकार्ड खरीद लिए. इन में से एक मोबाइल फोन उस ने अपने पास रख लिया और दूसरा राजीव को दे दिया. शिवानी के औफिस से निकलते ही दिनेश राजीव को उस के पीछे लगा देता था. वह जहांजहां जाती थी, राजीव सारी खबर उसे देता रहता था. शिवानी आसिफ के साथ कभी मौल में घूमती तो कभी फिल्म देखने चली जाती. इस से दिनेश को विश्वास हो गया कि शिवानी किसी भी हालत में आसिफ को छोड़ने वाली नहीं है. अब वह आसिफ को निपटाने की फिराक में रहने लगा.

बेगुनाह के खून से रंगे हाथ

4 अगस्त की शाम शिवानी औफिस से टाइम से पहले ही निकल गई. इस से दिनेश को लगा कि आज वह आसिफ से मिलने जा रही है. उस ने राजीव को उस के पीछे भेज दिया. शिवानी गौड़ मौल में आसिफ से मिलने गई थी. यह बात राजीव ने दिनेश को बता दी.

दिनेश ने लकी से साथ चलने को कहा. उस पर पुलिस को शक न हो, इस के लिए उस ने सबूत के तौर पर अपना मोबाइल फोन औफिस में ही छोड़ दिया. वह लकी के साथ स्कूटी से गौड़ मौल पहुंचा. थोड़ी दूर पर खड़े हो कर दोनों आसिफ के बाहर आने का इंतजार करने लगे.

आसिफ बाहर निकला तो राजीव ने फोन कर के बता दिया. इस के बाद दिनेश ने स्कूटी से जा कर आसिफ को गोली मार दी और वहां से भाग गया. अगले दिन अखबारों में दिनेश ने पढ़ा कि शिवानी ने उस के खिलाफ बयान दिया है तो वह जयपुर भाग गया. मामला थोड़ा शांत हुआ तो वापस आ कर वह लकी से मिला. इस के बाद पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया. दिनेश के पास जो पिस्टल मिली थी, आसिफ की हत्या में उसी का उपयोग किया गया था.

अगले दिन पुलिस ने दिनेश और लकी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीसरे हत्यारोपी राजीव की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी. पुलिस उस की सरगर्मी से तलाश कर रही थी.

जांच के बाद शिवानी की कोई संदिग्ध भूमिका नहीं पाई गई. शिवानी को हासिल करने की दिनेश की ललक का आसिफ बेवजह शिकार हो गया. आखिर दिनेश को ही क्या मिला? आसिफ की हत्या के आरोप में वह जेल जरूर चला गया. उस ने विवेक से काम ले कर अगर अपने जुनून से किनारा कर लिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी न आती.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

ट्रोलर पर भड़कीं मीरा राजपूत ने ये कहा

बौलिवुड अभिनेता शाहिद कपूर की पत्नी मीरा राजपूत  ने कहा है कि हर बात को लेकर गंभीर होने का कोई मतलब नहीं बनता. दरअसल मीरा ने अपनी बेटी मीशा के बालों पर कलर करने वाले फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर किया था. इस तस्वीर को साझा करने के बाद मीरा काफी ट्रोल हुई है. हेल्पिंग हैंड एक्जीबीशन सह फंडरेजर कार्यक्रम के दौरान बुधवार को मीरा ने मीडिया को बताया, ‘वह कलर नहीं था. वह रेगुलर पेंट था.’

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उन्होंने बताया, ‘मीशा का समय अच्छा बीता और मुझे लगता है कि अपने बच्चों को क्रिएटिव होने देना चाहिए, उन्हें आजाद कर देना चाहिए और उन्हें अच्छा समय बिताने देना चाहिए. हर बात को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए.’ पिछले सप्ताह मीरा ने एक तस्वीर साझा की थी, जिसमें उनकी दो साल की बेटी मीशा के बाल लाल थे. उन्होंने तस्वीर को शीर्षक देते हुए लिखा था, “मैं रेगुलर माम नहीं, कूल माम हूं.”

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लेकिन, यह तस्वीर लोगों को पसंद नहीं आई और उन्होंने मीरा की आलोचना शुरू कर दी. इस तस्वीर पर ट्रोल होने के बाद मीरा ने मीशा की दूसरी तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “रिलैक्स, यह टेम्परेरी है. मेरे पांच साल के होने तक इंतजार कीजिए.”

ठुमकों पर ठुमकते दर्शक

भोजपुरी फिल्मों के आइटम डांसरों में सीमा सिंह और संभावना सेठ का नाम सब से ऊपर लिया जाता है. सीमा सिंह सब से मशहूर आइटम डांसर हैं, जो भोजपुरी फिल्मों में 2,00 से ज्यादा गानों पर आइटम डांस कर चुकी हैं. वैसे, अब कई हीरोइनें खुद भी आइटम डांस करती हैं. हीरोइन मोनालिसा, अक्षरा सिंह और अंजना ने फिल्मों में कई आइटम डांस किए हैं.

भोजपुरी फिल्मों में हर गाना ही एक आइटम डांस होता है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि इन फिल्मों में सीरियस किस्म के गाने कम से कम होते हैं. ज्यादातर गाने ‘ठुमका लगा के…’ टाइप ही होते हैं जिन को सुनते ही दर्शक सिनेमाघरों में ही नाचने पर मजबूर हो जाते हैं.

भोजपुरी फिल्मों के धूमधाम वाले म्यूजिक से गाने तैयार होते हैं, जिन पर डांस करना आसान हो जाता है. गानों के बोल थोड़े सैक्सीटाइप होते हैं जो सुनने में अलग किस्म का मजा देते हैं.

कुछ फिल्मों के हिट गाने अलग तरह के कैरियर के रास्ते खोल देते हैं. ऐसे गानों पर डांस करने वाली डांसर या फिर इन को गाने वाले कलाकारों को फिल्मों के बाहर स्टेज शो वगैरह में भी खूब काम और दाम मिलने लगता है.

स्टेज शो की जान

पिछले कुछ सालों में भारत के बाहर अरब देशों में भी भोजपुरी फिल्मों के कलाकारों के स्टेज शो तेजी से पसंद किए जाने लगे हैं. डांस शो के लिए हीरो, हीरोइन, डांसर और गायक सब विदेश जाते हैं. वहां पर फिल्मों से ज्यादा पैसा मिल जाता है.

ऐसे डांस शो के आयोजक कहते हैं कि विदेशों में रहने वाले ज्यादातर लोग भोजपुरी बोली के हैं. वे अपनी बोली की धुनों पर डांस और गाने पसंद करते हैं.

विदेशों में बड़ी तादाद में ऐसे लोग अरब देशों में बसे हैं. यहां उन कलाकारों की सब से ज्यादा डिमांड होती है जो भोजपुरी फिल्मों में कामयाब कलाकार होते हैं.

विदेशों में अब हर 2 से 3 महीने पर ऐसे शो होने लगे हैं. कतर की राजधानी दोहा में ऐसे शो बहुत चलते हैं. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अब इस के नाम पर ही गाना तैयार हो गया है.

भोजपुरी फिल्म ‘महाभारत’ के निर्माता सचिन यादव ने एक वीडियो अलबम तैयार किया, जिस में एक

गाना ‘तोहरे ठुमके पर दोहाकतर हिलेला…’ है.

भोजपुरी फिल्मों के दर्शक ‘ठुमका लगा के’ टाइप गानों के इतने दीवाने है कि वे फिल्मों के साथसाथ वीडियो अलबम भी खूब पसंद करते हैं.

दरअसल, ऐसे गाने अब यूट्यूब और दूसरी जगहों पर खूब मिलते हैं. दर्शक इन को अपने मोबाइल फोन में भी डाउनलोड कर के गानों को वीडियो समेत देखते हैं.

फिल्मों में ऐसे गानों को फिल्माते समय सीमा का बहुत ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है. पर वीडियो अलबम की शूटिंग करते समय किसी तरह की समय सीमा नहीं रहती. ठुमकों के साथ सैक्स और खुलापन भी गानों पर हावी हो जाता है.

लुभाता है खुलापन

फिल्म और वीडियो के इन दर्शकों को सैक्स और खुलापन खूब पसंद आता है. गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि कई बार तो हिट गानों के नाम से ही फिल्मों के नाम तक तय हो जाते हैं.

भोजपुरी गायन में मर्द और औरत कलाकारों की सब से बड़ी अहमियत होती है. मर्द गायक सब से कामयाब माने जाते हैं. इन के चाहने वाले ज्यादा होते हैं. यही वजह है कि गानों में हिट रहने वाले कलाकार बड़े हीरो भी बन जाते हैं.

मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ जैसे कई नाम इस के उदाहरण हैं. इन दोनों ही कलाकारों के गानों के बोल को ले कर बाद में फिल्में बनीं. इन में ‘निरहुआ सटल रहे’ खास फिल्म रही.

भोजपुरी फिल्म बनाने वाले मुस्तफा कहते हैं, ‘‘भोजपुरी दर्शकों में लंबे समय से गायक को ही हीरो के रूप में देखने की आदत रही है. ऐसे में यहां पर कई गायक हीरो बनने के बाद हिट रहे हैं.

इस से साफ हो जाता है कि भोजपुरी फिल्मों के दर्शक गानों के कितने शौकीन होते हैं.’’

भोजपुरी फिल्मों की नंबर वन गायिका कल्पना कहती हैं, ‘‘गानों के बोल इस कदर भड़काऊ होते जा रहे हैं कि उन को गाने में शर्म आने लगती है. कई बार जब बड़े गायक इस के लिए मना करते हैं तो गानों को डब करते समय भड़काऊ बोल दूसरे गायकों से गवा कर गानों में शामिल कर लिया जाता है. इन गानों की ऐडिटिंग ऐसी होती है कि सुनने वाले को पता ही नहीं चलता कि ये बोल बाद में मिलाए गए हैं.’’

फिल्म या वीडियो बनाने वालों की अपनी मजबूरी होती है. उन को पता होता?है कि एक हिट देने के बाद कैरियर के कई रास्ते अपनेआप खुल जाते हैं. ऐसे में गायक से ले कर नायक तक सब इस के दीवाने होते हैं. वे ठुमका लगाने वाले गानों के बल पर अपनी फिल्म को हिट कराने की सोचते हैं. ऐसा काफी हद तक कामयाब भी रहता है. यही वजह है कि ‘ठुमका’ भोजपुरी फिल्मों को हिट बनाने का ‘शौर्टकट’ बन गया है.

जब भाई का दोस्त छेड़ रहा हो  

दीपक अपनी बहन गीता से 3 साल बड़ा था. वह कालेज के पहले साल में पढ़ रहा था. उस के दोस्त कभीकभार घर भी आ जाते थे. उन में से एक दोस्त का नाम मोहन था जो घर आ कर गीता पर डोरे डालने लगा था.

पहले तो गीता ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन एक दिन जब मौका पा कर मोहन ने गीता का हाथ पकड़ लिया तो वह सावधान हो गई, क्योंकि मोहन की हरकतें उसे पहले से ही अच्छी नहीं लगती थीं, पर गांव के माहौल में वह चुप्पी साध कर बैठ गई.

मोहन को लगा कि गीता की तरफ से हरी झंडी मिल गई है और एक दिन खेत के कच्चे रास्ते पर उस ने गीता को दबोच कर अपनी मनमानी कर दी.

गीता इस कांड से इतनी दुखी हुई कि उस ने गले में चुन्नी लपेट कर खुदकुशी कर ली.

यह कोई एक वारदात नहीं है जब किसी लड़के के दोस्त ने उसी की घर की इज्जत पर डाका डाला हो. हिंदी फिल्मों में तो अकसर अपनी बहन को छेड़ने वाले से लड़ाई दिखाई जाती है, चाहे वह उस का दोस्त ही क्यों न हो.

हां, भाई के दोस्त से प्यार करने में कोई बुराई नहीं है पर असली मुसीबत तो तब होती है जब वह दोस्त छिछोरा निकलता है और उसे लड़की के प्यार से कोई मतलब नहीं होता है.

गीता के मामले में प्यार की कोई गुंजाइश नहीं थी. मोहन के इरादे साफ थे जिन्हें गीता समय रहते नहीं समझ पाई.

तो क्या इस में गीता की गलती थी? नहीं, क्योंकि उसे कुछ कहने या समझने का मौका नहीं मिला था. हां, उस ने इस बारे में अपने भाई को नहीं बताया, जो उस की नादानी या चूक कही जाएगी, जो उस की जिंदगी की सब से बड़ी गलती बन गई.

क्या करें ऐसे छिछोरों का

बहुत से दोस्त अपनी दोस्ती की आड़ में ऐसे गुल खिलाते हैं. ऐसे में भाइयों को भी ध्यान रखना चाहिए कि वे किस तरह के दोस्त बना रहे हैं. मनचले दोस्त पीठ पीछे अपने खास दोस्तों की बहनों को भी नहीं छोड़ते हैं.

अगर कोई लड़का आप के सामने किसी की बहन के बारे में उलटासीधा बोलता है तो वह आप की बहन के बारे में भी ऐसी ही घटिया सोच रखता होगा.

गांवदेहात और छोटे कसबों में तो यह सब करना और भी आसान हो जाता?है, जबकि लड़कियां भाई की इज्जत की खातिर या समाज क्या कहेगा, यह सोच कर चुप रह जाती हैं. पर जब बात बहुत आगे बढ़ जाती है तो वे गीता जैसे बचकाने फैसले ले लेती हैं.

अपनी आवाज उठाएं

इस तरह के मामलों में लड़कियों को खुद आवाज उठानी चाहिए. पहले भाई के दोस्त को समझाएं कि आप को उस की ऐसी बेहूदा हरकतें पसंद नहीं हैं. अगर वह मान जाए तो अच्छा नहीं तो अगली बार भाई को ही बता दें कि तुम्हारा दोस्त कैसी गिरी हुई हरकत कर रहा?है.

बहुत बार तो खुद के धमकाने से ही बात बन जाती है क्योंकि ऐसे मनचले दिल के कमजोर होते हैं. पर कुछ ढीठ भी होते हैं जिन्हें पुलिस की धमकी दे कर शांत कराने की जरूरत पड़ जाती है.

इन बातों का रखें ध्यान

* अगर भाई का दोस्त तंग करता है तो कड़े शब्दों में उस को मना कर दें.

* डरें तो बिलकुल भी नहीं, क्योंकि ऐसे ज्यादातर लड़के बुजदिल होते हैं.

* वह नहीं माने तो सब से पहले अपने भाई को बताएं और उस के बाद उस लड़के के घर में भी यह खबर भिजवा दें.

* अपनी सहेलियों को भी इस बात की जानकारी दें ताकि वे सावधान हो जाएं.

* पुलिस के पास जाने में न झिझकें.

* डर के मारे कोई गलत कदम न उठाएं.

कानून क्या बोले

लड़कियों या औरतों के साथ होने वाली छेड़छाड़ के मामले जब भी कानूनी तौर पर दर्ज होते हैं तो पुलिस अकसर आरोपी के खिलाफ धारा 354 के तहत मुकदमा दर्ज करती है. भारतीय दंड संहिता की धारा 354 का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जाता है जहां लड़की या औरत की इज्जत को नुकसान पहुंचाने के लिए उस पर हमला किया गया हो या उस के साथ गलत सोच के साथ जोरजबरदस्ती की गई हो.

भारतीय दंड संहिता के मुताबिक, अगर कोई शख्स ऐसा करने का कुसूरवार पाया जाता है तो उसे2 साल तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है.

बजट में भटकाव

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के 2019 के बजट पर भाजपा चाहे जितना शोर मचा ले, वोटकैचर नहीं है. देश की जो हालत है उस में इस बजट से कुछ सुधार होगा, यह नहीं दिखता. सरकार ने अपने घाटे के बजट को बनाए रख कर छोटीमोटी कुछ छूटें दी हैं जो अगले

2-3 महीनों में  सरकार का खर्च बढ़ाएंगी जबकि जनता की जेब में कुछ ज्यादा नहीं डालेंगी. हां, यह भ्रम रहेगा कि जनता की जेब काटी नहीं जाएगी.

सरकार के पास अब जेब काटने की गुजांइश भी नहीं. नोटबंदी कर के सरकार कालाधन पहले ही निकाल चुकी है- कम से कम नोटबंदी के समय यही कहा गया था-और अब टैक्स लगाने की कहीं गुजांइश नहीं है. टैक्स तो कालेधन को बटोरने के लिए ही लगाया जाता था न.

उधर, जीएसटी से सरकार ने पहले ही हर चीज को टैक्स के दायरे में ला दिया है. जीएसटी का कानून ही ऐसा है कि हर व्यापारी चोर समझा जाता है और चोरों को जब जीएसटी से पकड़ा जा चुका हो तो उन से और क्या वसूला जा सकता है? व्यापारी वर्ग, जो अब भी हिंदूहिंदू के नारे लगा रहा है, भूल रहा है कि हिंदूहिंदू के नारे के पीछे चंदाटैक्स चंदाटैक्स का नारा छिपा है जो जीएसटी के माध्यम से सरकार के हाथों में जा रहा है.

आयकर के दायरे में आने की सीमा बढ़ाना तो महज औपचारिकता है. उस से सरकार का काम घटेगा और जो थोड़ाबहुत राजस्व का नुकसान होगा वह रिटर्नों के साथ सिर न खपाने से बच जाएगा.

हर सरकार हर बजट में लोगों या व्यापारियों के दबाव में कुछ बदलाव करती है. अब की बार किसान भी इस में जोड़ लिए गए हैं. जो थोड़ा परिवर्तन किया गया है वह उसी दबाव के कारण है. इस में सरकार की दूरदर्शिता या आर्थिक विकास का दर्शन नहीं है. मीडिया में इस बजट की तारीफ हो रही है तो सिर्फ इसलिए कि इस में जेबकटौती नहीं है. जब जेब पहले ही खाली है, तो काट कर क्या करेंगे?

बजट कहीं से भी देश को दूरगामी रास्ते पर ले जाने वाला नहीं है. उलटे, गौशालाओं के लिए पैसे देना यह पक्का करता है कि सरकार तो अभी भी संतोंमहंतों को पैसा देने में जुटी है और जनता की मेहनत का पैसा व्यर्थ के तीर्थों व मूर्ति स्थलों पर खर्च किया जाता रहेगा. यह भाजपाई चुनावी बजट नहीं है, यह सरकारी बजट है जो हर सरकार पेश करती है, पार्टी चाहे कोई भी हो.

चमत्कारों के पीछे भागते दलित-पिछड़े 

मध्य प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री रह चुकी ललिता यादव द्वारा बुंदेलखंड में बारिश कराने के लिए मेढकमेढकी का ब्याह रचाने का मामला यह साबित करता है कि आज भी हम अंधविश्वास की बेडि़यों में कितने जकड़े हुए हैं.

धार्मिक आस्था के नाम पर आज भी सोशल मीडिया पर आने वाले बहुत सारे मैसेज और देवीदेवताओं की इमेज भेज कर लोगों से यह अपील की जाती है कि ये मैसेज 5 लोगों या समूह को भेजने पर मन की मुराद पूरी हो जाएगी.

तकरीबन हर टैलीविजन चैनल पर अपनी दुकान सजा कर बैठे बाबा और तांत्रिक अलगअलग तरह के यंत्र बेचने के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाने और समाज को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं. कभी जादू के नाम पर तो कभी टोनेटोटकों के जरीए गाहेबगाहे लोग अंधविश्वास को नकार नहीं पा रहे हैं.

आज भी न ठीक होने वाली बीमारियों के इलाज के नाम पर तो कभी दिमागी परेशानी से जूझ रहे मरीजों को भूतप्रेत या बाधा वगैरह से छुटकारा दिलाने के नाम पर बेवकूफ बना कर लूटा जा रहा?है.

अंधविश्वास के सब से ज्यादा शिकार आज दलित और पिछड़े तबके के लोग हैं, जो ऊंची जाति के पंडेपुजारियों और तांत्रिकों के पाखंड में पड़ कर अपना समय और पैसा बरबाद कर रहे हैं.

दलित और पिछड़े तबके के लोगों को अगड़ों द्वारा आज भी गांवों व कसबों में हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है. उन की अनपढ़ता और गरीबी का फायदा उठाया जाता है. कथा, पुराण, प्रवचन द्वारा उन के दिमाग में अंधविश्वास से भरी कहानियां भर दी गई हैं.

सोलह सोमवार की कथा, एकादशी व्रत कथा, संतोषी माता की व्रत कथा, भूतप्रेत भगाएं, मंत्रों से सांपबिच्छू का जहर उतारने की जानकारी देने वाली सैकड़ों किताबें आज भी फुटपाथ पर धड़ल्ले से बिक रही हैं.

इन सुनीसुनाई कहानियों के रचने वाले पंडित और मौलाना अपने निजी फायदे के लिए धर्म और मजहब का डर दिखा कर इन भोलेभाले दलितों और पिछड़ों को बकवास रीतिरिवाजों के जाल से बाहर नहीं निकलने देते हैं.

क्यों पड़ते हैं इस चक्कर में

देश की ज्यादातर आबादी गरीब, दलित व पिछड़े लोगों की है. सरकार की दम तोड़ती योजनाएं इन्हें पढ़ालिखा और मालीतौर पर मजबूत बनाने के बजाय सरकारों के रहमोकरम पर जिंदा रहने की सीख दे रही हैं.

एक रुपया किलो गेहूंचावल बांटने की योजनाएं गरीबों को नकारा बना रही हैं. सरकारी अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं. निजी अस्पतालों की भारीभरकम फीस न चुका पाने की मजबूरी में ये दलितपिछड़े कभी बीमार पड़ते हैं तो मजबूरी में सस्ते इलाज के चक्कर में अंधविश्वास की ओर खिंचते चले जाते हैं.

देश के गांवदेहात में आज भी लोग पीलिया, मलेरिया, छोटी माता, सर्दी, खांसी के साथ गंभीर बीमारियों का इलाज भी झाड़फूंक के जरीए कराते हैं.

आमतौर पर छोटीछोटी समस्याओं के आने पर उन से 2-2 हाथ न कर पाने के चलते ऐसे लोग ज्योतिष, धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास, ढोंगी बाबाओं व धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के चंगुल में फंस जाते हैं.

ढोंगी बाबाओं के चक्कर में अपना पैसा और समय गंवाने वाले रायसेन जिले के एक पढ़ेलिखे देहाती दलित नौजवान की कहानी भी यही कहती है.

अपने कैंसर पीडि़त पिता के इलाज के लिए बड़ेबड़े अस्पतालों में इलाज पर लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद भी फायदा न मिलने पर उस नौजवान के घर के लोग परेशान रहने लगे. पिताजी को देखने आने वाले रिश्तेदार झाड़फूंक से इलाज करने वाली जगहों पर जाने की सलाह देने लगे.

आखिरकार एक दिन वह नौजवान सागर जिले के एक गांव में बने मंदिर में अपने पिताजी को ले गया.

मंदिर के अंदर बैठे एक बाबाजी को जब अपनी परेशानी बताई, तो उन्होंने गेहूं के कुछ दाने हाथ में लिए और पिताजी के सिर पर से 7 बार घुमा कर उन्हें एक पानी से भरे बरतन में डाल दिया. सभी दाने लाल हो गए.

इस के बाद बाबाजी ने एक नीबू हाथ में ले कर कुछ मंत्र पढ़े और पिताजी के सिर पर से घुमा कर उसे चाकू से काटा तो उस में से खून जैसा लाल रंग निकला.

उन्होंने बताया कि पिताजी को प्रेत बाधा है. प्रेत बाधा को भगाने के लिए पूजापाठ और हवन करना पड़ेगा. हवन के लिए जो सामग्री लाने को कहा गया उन में से अनेक चीजों के नाम बेटे ने पहली बार सुने थे.

परेशान हो कर परिवार वालों ने बाबाजी से पूछा कि यह सामग्री कहां मिलेगी तो उन्होंने पास ही बैठे एक आदमी की ओर इशारा कर दिया.

बाबाजी के साथ रहने वाले उस शख्स ने उन्हें मंदिर के बाहर ले जा कर पूजापाठ और हवन सामग्री का पूरा इंतजाम करने के लिए 10,000 रुपए जमा करने को कहा.

उस दलित नौजवान ने सोचा कि डाक्टरी इलाज में लाखों रुपए खर्च किए हैं, जब 10,000 रुपए में फायदा हो रहा है तो इस में कोई बुराई नहीं है.

10,000 रुपए जमा करने के बाद अगले शनिवार को पिताजी को साथ ले कर आने को कहा गया.

तय दिन और तय समय पर वह नौजवान अपने पिताजी को ले कर वहां पहुंचा तो बाबाजी ने पिताजी के हाथ में एक नारियल पकड़ाया और कुछ मंत्र बुदबुदा कर पिताजी के सिर से एक लोटे में रखे पानी को उतार कर नारियल के ऊपर छिड़क दिया. जटाओं पर पानी छिड़कते ही नारियल में आग लग गई.

फिर उन के चेले हवन सामग्री ले कर आए. बाबाजी ने मंत्र पढ़ कर पिताजी से बिना अग्नि के हवन कुंड में आहुतियां छोड़ने को कहा. तकरीबन 5 से 10 मिनट के समय में हवन के खत्म होते ही हवन कुंड में अपनेआप आग जल गई.

बाबाजी ने बताया कि प्रेत बाधा शरीर को छोड़ कर जा चुकी है. अब आप जल्द ही ठीक हो जाएंगे.

वह नौजवान बाबाजी के चमत्कार के आगे नतमस्तक हो कर उन्हें दानदक्षिणा दे कर घर आ गया.

बाबाजी के इस चमत्कार को हर आनेजाने वाले को बताया जाने लगा. तकरीबन एक हफ्ते का समय बीत जाने के बाद भी उस नौजवान के पिता को फायदा नहीं मिला. वे महीनाभर दर्द से कराहते रहे और एक दिन उन की जिंदगी अंधविश्वास की भेंट चढ़ गई.

ऐसे जलती है आग

बीमारी के इलाज और प्रेत बाधा दूर करने के नाम पर पाखंडी बाबाओं द्वारा किए जाने वाले चमत्कार रासायनिक चीजों की कुछ ऐसी क्रियाएं होती हैं, जिन्हें समाज के आम लोग चमत्कार समझ कर उन बाबाओं के भक्त बन जाते हैं. ढोंगी लोग पहले से ही नारियल की जटाओं में सोडियम धातु के छोटेछोटे टुकड़े छिपा कर रख देते हैं और जब नारियल की जटाओं पर मंत्र पढ़ कर पानी छिड़का जाता है तो आग लग जाती है.

सोडियम धातु बहुत ही ज्वलनशील धातु है और पानी के साथ क्रिया करके हाइड्रोजन गैस बनाती है. इस क्रिया में ऊष्मा निकलती है जिस के चलते आग लग जाती है.

सोडियम धातु के इन टुकड़ों को अगर महीन कपास या रूई में लपेट कर किसी बरतन में रखे पानी में डाला जाता है तो पानी में आग जलने लगती है.

हवन कुंड में समिधा के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली लकडि़यों पर या हवन सामग्री में पोटैशियम परमैगनेट को बारीक पीस कर मिला दिया जाता है.

हवन के दौरान मंत्रों को नाटकीय ढंग से बोला जाता है और शुद्ध घी के नाम पर ग्लिसरीन नामक गाढ़े तरल को जैसे ही आहुति के नाम पर डाला जाता है तो हवन कुंड में आग जल उठती है.

पोटैशियम परमैगनेट और ग्लिसरीन की आपस की क्रिया से ऊष्मा निकलने के चलते आग जल उठती?है.

खून भरा नीबू

दैवी शक्तियों को खुश करने के नाम पर भी नीबू चढ़ाने या शरीर के अंदर से दैवी शक्तियों को दूर भगाने के नाम पर नीबू में से खून निकालने की घटनाओं को ढोंगी तांत्रिकों द्वारा अंजाम दिया

जाता?है. इस के लिए नीबू में फेरिक क्लोराइड को इंजैक्शन से भर दिया जाता है और चाकू को अमोनियम थायोसायनेट रसायन में डुबा कर जैसे ही नीबू को काटा जाता है उस में से खून जैसा तरल पदार्थ गिरने लगता है. यह खून जैसा लाल रंग भी दोनों रसायनों के मिलने के चलते ही बनता है.

कई बार करतब दिखाने वाले कलाकार द्वारा शरीर के किसी भी भाग को चाकू से काट कर खून निकालने का नाटक किया जाता है. इस में फेरिक क्लोराइड को शरीर के किसी भाग यानी हाथ या गरदन पर पहले से ही लगा लिया जाता है जो कुछ ही देर में सूख कर दिखाई नहीं देता है और जैसे ही रंगहीन द्रव अमोनियम थायोसायनेट में चाकू को डुबो कर शरीर के किसी भाग पर चलाया जाता है तो उस जगह पर खून के रंग की रेखाएं ऐसे दिखती हैं जैसे काटने पर खून निकलता है.

गेहूं के दानों का लाल होना

कई बार झाड़फूंक के नाम पर  गुनिया, तांत्रिकों या ओझाओं द्वारा दिमागी परेशानी से जूझ रहे किसी मरीज के घर से लाए हुए गेहूं के दानों को उस के सिर पर से उतार कर उन्हें लाल या गुलाबी कर भोलेभाले लोगों को प्रेत बाधा बता कर ठगा जाता है.

इस काम के लिए ऐसे ठगों द्वारा फिनाफथलीन व सोडियम हाइड्रौक्साइड नामक रसायन इस्तेमाल में लाए जाते हैं. फिनाफथलीन रंगहीन होता है जिस को ये ढोंगी हाथों में पहले से लगा कर रखते हैं और दिमागी मरीज द्वारा लाए गए गेहूं के दानों को हाथ में ले कर ये मरीज के सिर पर से घुमाते हैं तो फिनाफथलीन गेहूं के दानों पर लग जाता है.

मरीज के हाथ को जब सोडियम हाइड्रौक्साइड के घोल में धुलाया जाता है और जब गेहूं के दाने उस के हाथ पर रखे जाते हैं तो वे फिनाफथलीन और सोडियम हाइडौक्साइड की रासायनिक क्रिया से लाल या गुलाबी रंग के हो जाते हैं.

इसी रासायनिक क्रिया के अपनाए जाने पर ही रिश्वतखोर को रंगे हाथ पकड़ा जाता है. रिश्वत में दिए जाने वाले नोटों को फिनाफथलीन के रंगहीन घोल में डुबो दिया जाता?है जो चंद मिनट में ही सूख जाते हैं. यही नोट जब रिश्वत

के रूप में लिए जाते हैं तो रिश्वतखोर अफसर के हाथों में फिनाफथलीन लग जाता है और जैसे ही पुलिस द्वारा दबिश दी जाती है और भ्रष्टाचारी के हाथ सोडियम हाइड्रौक्साइड में धुलाए जाते हैं, तो वे हाथ लाल रंग के हो जाते हैं.

बहुत सी ऐसी रासायनिक क्रियाएं होती हैं जिन्हें चमत्कार बता कर लोगों को ठगा जाता है. गरीब, दलित और दूसरे कमजोर तबके के लोगों को तालीम देने की सख्त जरूरत है, ताकि वे ऐसे अंधविश्वासों से बच कर रहें. स्कूलों में छात्रों को विज्ञान की बातें समझा कर उन्हें बचपन से ही ऐसे तथाकथित चमत्कारों से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए.

मसूद अजहर को छोड़ना भारत की सबसे बड़ी गलती थी

पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर आतंकी हमले के बाद पूरा देश आक्रोशित है, 38 जवानो के शवों को देखकर हर आंख भीगी है. हर जुबान से बस यही निकल रहा है कि बस अब बहुत हुआ… अब इन्हे छोड़ना नहीं है. जिस वक़्त देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद जवान के ताबूत को कंधा दिया वो पल पूरे देश को रुला गया. पुलवामा की घटना और इससे पहले हुई कई घटनाएं ना घटतीं अगर हमने मसूद अज़हर जैसे खूंखार आतंकी को अपने चंगुल से ना निकलने दिया होता. बहुत बड़ी गलती हो गई जब कंधार विमान हाईजैक के दौरान आतंकी मसूद अजहर को छोड़ा गया. अगर उसको उस वक़्त शूट कर दिया जाता तो शायद संसद, उरी, पठानकोट और अब पुलवामा में आतंकी हमले न होते.

पुलवाम की साजिश रचने वाला जैश-ए-मुहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर वही आतंकी है, जिसे कंधार विमान हाईजैक के दौरान रिहा करना पड़ा था. मसूद अजहर की रिहाई के बाद पाकिस्तान चौड़ा हो गया और उसकी शह पाकर ही मसूद ने आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद को जन्म दिया. इसमें कोई शक नहीं कि मसूद के आतंकी संगठन को जहां पाकिस्तानी सेना का पूरा सपोर्ट है वहीं चीन भी उसको पूरा सपोर्ट करता है और उसका इस्तेमाल भारत को परेशान करने के लिए करता है.

मसूद अजहर को साल 1994 में पहली बार गिरफ्तार किया गया था. कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का सदस्य होने के आरोप में उस वक्त उसकी श्रीनगर से गिरफ्तारी हुई. मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी के बाद, जो कुछ हुआ उसका शायद किसी को अंदाजा भी नहीं था. अज़हर को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 को 180 यात्रियों से भरे एक भारतीय विमान को नेपाल से अगवा कर लिया और विमान को कंधार ले गए. भारतीय इतिहास में यह घटना ‘कंधार विमान कांड’ के नाम से दर्ज है. कंधार विमान कांड के बाद भारतीय जेलों में बंद आतंकी मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक जरगर और शेख अहमद उमर सईद की रिहाई की मांग की गई और यात्रियों की जान बचाने के लिए छह दिन बाद 31 दिसंबर को आतंकियों की शर्त मानते हुए भारत सरकार ने मसूद अजहर समेत तीनों आतंकियों को छोड़ दिया. इसके बदले में कंधार एयरपोर्ट पर अगवा रखे गए विमान के बंधकों समेत सभी को छोड़ दिया गया.

यहीं से शुरू हुई जैश की कहानी 

जेल से छूटने के बाद मसूद अजहर ने फरवरी 2000 में जैश-ए-मुहम्मद आतंकी संगठन की नींव रखी, जिसका मकसद था भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना और कश्मीर को भारत से अलग करना. उस वक्त सक्रिय हरकत-उल-मुदाहिददीन और हरकत-उल-अंजाम जैसे कई आतंकी संगठन जैश-ए-मुहम्मद में शामिल हो गए. खुद मसूद अजहर भी हरकत-उल-अंसार का महासचिव रह चुका है. साथ ही हरकत-उल-मुजाहिदीन से भी उसके संपर्क थे.

संसद, पठानकोट, उरी से लेकर पुलवामा हमले में जैश का हाथ

यह कोई पहली बार नहीं है, जब जैश ने भारत को दहलाने की कोशिश की हो. साल 2001 में संसद हमले से लेकर उरी और पुलवामा हमले में जैश का हाथ रहा है. अपनी रिहाई और आतंकी संगठन की स्थापना के दो महीने के भीतर ही जैश ने श्रीनगर में बदामी बाग स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर आत्मघाती हमले की जिम्मेदारी ली थी.

बड़े आतंकी हमले में जैश का हाथ

28 जून, 2000:

जम्मू कश्मीर सचिवालय की इमारत पर हमला. जैश ने ली हमले की जिम्मेदारी.

14 मई, 2002:

जम्मू-कश्मीर के कालूचक में हुए हमले में 36 जवान शहीद हो गए, जबकि तीन आतंकी मारे गए.

1, अक्टूबर 2008:

जैश के तीन आत्मघाती आतंकी विस्फोटक पदार्थों से भरी कार लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा परिसर में घुस गए. इस घटना में 38 लोग मारे गए.

26/11 मुंबई हमला:

26/11 मुंबई आतंकी हमले को भी जैश ने अंजाम दिया था. 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में समुद्र के रास्ते आए 10 आतंकियों ने 72 घंटे तक खूनी तांडव किया था. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे, जबकि कई घायल हो गए थे. इस हमले का मास्टर माइंड भी मसूद अजहर रहा है. मुंबई हमले में 9 आतंकी भी मारे गए थे. इस में एक जिंदा आतंकी आमिर अजमल कसाब को भी पकड़ा गया था, जिसे बाद में फांसी की सजा दी गई.

संसद हमला

13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले के पीछे भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद के आतंकियों का हाथ. इस हमले में 6 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे, जबकि तीन संसद भवन कर्मी भी मारे गए. संसद हमले का दोषी अफजल गुरु भी जैश से जुड़ा था. उसे 10 फरवरी 2013 में फांसी दी गई थी.

पठानकोट हमला

जनवरी 2016 को पंजाब के पठानकोट स्थित वायु सेना ठिकाने पर हमले के लिए भी ज़िम्मेदार. इस हमले में वायुसेना और एनएसजी के कुल सात सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे. दो दिनों की मुठभेड़ के बाद सभी आतंकियों को मार गिराया गया था.

उरी हमला

18 सितंबर, 2016 में कश्मीर के उरी स्थित सैन्य ठिकाने पर हुए हमले में भी जैश का हाथ रहा है. उरी हमले में 18 सैनिक शहीद हो गए थे. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी और पीओके में घुसकर कई आतंकी ठिकानों का खात्मा कर दिया था.

आतंकी संगठनों की सूची में शामिल ‘जैश’

जैश-ए-मुहम्मद को भारत ने ही नहीं बल्कि ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र भी आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर चुका है. हालांकि अमेरिका के दबाव के बाद पाकिस्तान ने भी साल 2002 में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर अंदर ही अंदर सेना का पूरा सपोर्ट जैश को मिलता रहा. भारत मसूद अज़हर के प्रत्यर्पण की पाकिस्तान से कई बार मांग कर चुका है, लेकिन पाकिस्तान हर बार सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए इस मांग को नामंजूर कर देता है. इसके लिए उसे चीन की मदद भी बराबर मिल रही है. चीन ने तो मसूद अज़हर को आतंकी मानने तक से इंकार कर दिया है.

भारत को अब अपने पड़ोसी देशों – पकिस्तान और चीन से टक्कर लेने और और उनको कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. सांप को दूध पिलाने से वो अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ देगा, पुलवामा के बाद तो हमें ये बाद अच्छी तरह समझ में आ जानी चाहिए.

बीमारियों की आड़ में खेला गया लूट का खेल

उस का असली नाम नीना नहीं, अंजलि कपलिश था. पढ़लिख कर वह विवाह के लायक हुई तो 24 फरवरी, 1996 को सामाजिक रीतिरिवाज से उस का विवाह कैमिकल इंजीनियर मंगतराम शर्मा से कर दिया गया था. मंगतराम एक निजी संस्था में बढि़या नौकरी करते थे. उन के घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने अंजलि को न केवल हर सुखसुविधा के साथ भरपूर प्यार दिया था, उस का नाम भी बदल कर नीना रख दिया था. समय अपनी गति से गुजरता रहा और इस बीच नीना एक बेटे और एक बेटी की मां बन गई थी. बीए एवं एमलिब (मास्टर औफ लाइब्रेरी साइंस) की डिग्रियां हासिल करने वाली नीना शादी के पहले रोपड़ के एक स्कूल में नौकरी करती थी. शादी के बाद भी वह 2 सालों तक नौकरी करती रही. लेकिन बाद में पति ने उसे घर संभालने की सलाह देते हुए नौकरी करने को मना कर दिया.

नीना नौकरी नहीं छोड़ना चाहती थी, पर पति की वजह से उसे नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा. पति से इस फैसले के बारे में वह ज्यादा कुछ कह तो नहीं सकी, पर अच्छीभली नौकरी छोड़ने का उसे काफी अफसोस था. पति का यह फैसला उसे सही नहीं लगा.

वजहें कुछ भी रही हों, शादी के 6 साल बाद उन के वैवाहिक रिश्ते में खटास पैदा होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि सन 2004 में नीना ने पति से तलाक ले लिया. नीना के इस फैसले से मंगतराम काफी आहत हुए. कुछ समय बाद वह इंडिया छोड़ कर आस्ट्रेलिया चले गए.

नीना के मायके वाले भी तलाक के लिए नीना को ही दोषी मान रहे थे, इसलिए उन्होंने भी उस से नाता तोड़ लिया. नीना अब बेसहारा हो चुकी थी. ऐसी हालत में उस ने हिम्मत से काम लिया. किसी की परवाह न कर के उस ने आने वाली संभावित स्थितियों से मुकाबला करने के लिए कमर कस ली.

रोपड़ के दशमेशनगर में किराए का मकान ले कर वह अपने दोनों बच्चों के साथ रहने लगी और फिर से नौकरी हासिल करने की कोशिश करने लगी. पर काफी मेहनत के बाद भी नौकरी हाथ नहीं लगी. इस के बाद उस ने घर से ही ट्रेडिंग का काम करना शुरू कर दिया. थोक में दालें वगैरह खरीद कर लाती और उन के एक किलोग्राम और आधा किलोग्राम के पैकेट तैयार कर के वह उन्हें राशन की दुकानों पर सप्लाई करने लगी.

देखने में काम छोटा था, मगर अच्छा चल निकला. पैसों के लिए नीना अब किसी की मोहताज नहीं रही. इस के बावजूद ज्यादा कमाई वाला काम करने की उथलपुथल उसे बेचैन किए रहती थी. उसी बीच वह कई बीमारियों की चपेट में आ गई, जिन में हाई ब्लडपै्रशर, गौलब्लैडर में ट्यूमर व ब्लडकैंसर सरीखी बीमारियां थीं. वह अपनी इन बीमारियों का लगातार इलाज करवा रही थी.

दुख और बीमारी में जो काम दवा नहीं कर पाती, वह किसी अपने की प्यारभरी हमदर्दी और मीठे बोल कर जाते हैं. नीना भी इसी तरह के प्यार और हमदर्दी को तरस रही थी. इस दुख को वह अपने बच्चों से भी साझा नहीं करती थी. ऐसे में उसे यह बात बारबार कचोटती थी कि मंगतराम को तलाक दे कर उस ने भारी भूल की थी. उसे यह भी भरोसा था कि अगर वह मंगतराम के पास जा कर अपनी गलती मान ले तो वह निश्चित ही उसे माफ कर के फिर से अपना लेगा.

आखिर नीना आस्ट्रेलिया जाने की तैयारी करने लगी. पासपोर्ट उस के पास था ही. वह वीजा हासिल करने की कोशिश में लग गई, पर लाख कोशिशों के बावजूद भी उसे वीजा नहीं मिल सका. ट्रैवल एजेंटों ने उसे खासा परेशान किया. उस का वक्त तो बरबाद हुआ ही, वे लोग उस से पैसा भी खूब वसूलते रहे. यानी वह ठगी गई.

मंगतराम से समझौता करने नीना आस्ट्रेलिया तो नहीं जा पाई, अलबत्ता इन कोशिशों का एक फायदा उसे यह हुआ कि वह ट्रैवल एजेंटों द्वारा झांसा दे कर ठगी करने के कई गुर सीख गई. लिहाजा उस ने खुद भी यही सब कर के पैसा कमाने का निश्चय किया. उस की तमन्ना बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर लेने का था.

पूरी योजना बना कर नीना ने एक मैटर तैयार किया. ‘आप स्टूडेंट हो, घरपरिवार वाली औरत हो, पढ़ेलिखे हो या फिर मामूली पढ़ाईलिखाई व सीमित अनुभव के साथ छोटीमोटी नौकरी करने को मजबूर हो. विदेशों में मोटी तनख्वाह वाली एक से एक बढि़या नौकरी आप के इंतजार में है. दिशानिर्देशन व वर्क परमिट के लिए संपर्क करें.’

इस के नीचे अपने घर का पता देते हुए नीना ने कई अखबारों में विज्ञापन दे दिए. इस के बाद तो विदेश जाने के इच्छुक लोगों की नीना के यहां लाइनें लगनी शुरू हो गईं. वैसे भी विदेश जा कर पैसा कमाने का पंजाब में कुछ ज्यादा ही क्रेज है. नीना ने खुद को एक विदेशी कंसल्टैंट कंपनी की एजेंट बताया.

जो लोग उस के पास पूछताछ करने आते थे, वह उन्हें बताती कि जो लोग विदेश जाना चाहते हैं, उन का पहले रजिस्ट्रेशन होगा, उस के बाद विदेश से आ कर कंपनी के अधिकारी उन लोगों का इंटरव्यू लेंगे, जो लोग सफल होंगे, उन्हें पौने 2 लाख रुपए महीने की तनख्वाह पर रख लिया जाएगा. उस तनख्वाह से कंपनी 2 सालों तक हर महीने 50 हजार रुपए अपने पास कमीशन के रूप में रखेगी. 2 साल बाद यह समझौता खुद ब खुद खत्म हो जाएगा.

नीना ने यह भी बताया कि रजिस्टे्रशन फीस के रूप में हर आदमी को 25 हजार रुपए जमा करवाने होंगे. सिलैक्ट हुए उम्मीदवारों को वाजिब हवाई किराया व कुछ अन्य खर्चे भी देने होंगे. किसी वजह से जो लोग सिलेक्ट नहीं हो पाएंगे, उन्हें उन की रजिस्ट्रेशन फीस वापस कर दी जाएगी. बाद में नौकरियों की रिक्तियां निकलने पर फिर से रजिस्ट्रेशन करवाना होगा.

रजिस्ट्रेशन फीस 25 हजार तय करते समय नीना को लगा था कि उस ने जल्दबाजी में फीस शायद ज्यादा रख दी है. पर कमाल की बात यह हुई कि पहले ही झटके में 20 लोगों ने 25-25 हजार रुपए दे कर नीना की झोली में 5 लाख रुपए डाल दिए.

इस के बाद तो नीना के जैसे पंख निकल आए. चंडीगढ़ के सेक्टर-35 में उस ने इमीग्रेशन कंसल्टैंट्स का अपना शानदार औफिस खोल कर बडे़ पैमाने पर लोगों को ठगना शुरू कर दिया.

नीना को कमाई का यह नया तरीका सूझ गया था. वह भी मोटी कमाई का. उस की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर कई लोगों ने अपनी जमीनजायदाद तक गिरवी रख कर उसे मुंहमांगी रकम दे दी. पैसा देने वाले का मुंह बंद रहे, इस के लिए वह कभी मैडिकल का तो कभी कोई अन्य फार्म भरवा लेती.

देखतेदेखते नीना ने करीब 500 लोगों से 4 करोड़ रुपए की रकम इकट्ठी कर ली. इन लोगों का काम वह तभी करवा पाती, जब उस के हाथ में कुछ होता. उसे तो इस ठगी से अधिक से अधिक मोटी रकम बटोरनी थी. जिस रफ्तार से उस के पास पैसा आ रहा था, 4 करोड़ की रकम भी उसे छोटी लग रही थी.

उसे उम्मीद थी कि आने वाले कुछ समय में उस के पास इस से कई गुना ज्यादा रकम इकट्ठी हो जाएगी. तब वह यहां से इतनी दूर चली जाएगी कि कोई भी उसे ढूंढ नहीं पाएगा. मगर उसी बीच परिस्थिति बदल गई. फातियाबाद, हरियाणा के 2 भाई कुलविंदर सिंह और हरमिंदर सिंह भी आस्ट्रेलिया व कनाडा में नौकरी लगवाने के लिए नीना से मिले.

नीना ने इन दोनों भाइयों से मोटी रकम ऐंठ ली. काफी दिनों बाद भी जब इन का काम नहीं हुआ तो इन्होंने नीना के खिलाफ चंडीगढ़ पुलिस में शिकायत कर दी. चंडीगढ़ पुलिस ने काररवाई करते हुए 28 नवंबर, 2005 को नीना को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने नीना को कोर्ट में पेश कर के उस का 4 दिनों का पुलिस रिमांड लिया. पुलिस को पता चला कि वह पहले से ही गंभीर बीमारियों से ग्रस्त है. इस वजह से पूछताछ के वक्त उस से ज्यादा सख्ती नहीं की जा सकी. मनोवैज्ञानिक तरीके से की गई पूछताछ मे वह करोडों रुपयों की ठगी करने की बात तो कबूलती रही, पर उस ने पैसा कहां छिपा कर रखा है, यह नहीं बताया.

पुलिस ने उस के बैंक खातों व लौकरों की जांच की तो वहां कुछ हजार रुपए ही मिले. 4 दिनों के कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर जब पुलिस नीना को अदालत में पेश करने ले जा रही थी, तभी ठगी का शिकार हुए लोगों  ने उस का रास्ता रोक लिया.

वह उस से अपने पैसों को मांग करने लगे. तब नीना ने उन से सपाट लहजे में कहा, ‘‘हां, मैं कसूरवार हूं, लेकिन मेरी भी अपनी मजबूरियां हैं, मैं गंभीर रूप से बीमार हूं, मुझे अपना इलाज करवाना है. इस के  अलावा मैं मानती हूं कि मैं ने आप लोगों से ठगी की है. मगर मैं यह पैसा लौटा नहीं सकती. आप लोगों से ज्यादा मुझे इस पैसे की जरूरत है. अदालत मुझे मेरे किए की सजा जरूर देगी. शायद मैं सजा भुगतते हुए जेल के भीतर मर ही जाऊं.’’

लेकिन वह न मरी और न ही जमानत पर छूटने के बाद उस ने ठगी का अपना कारोबार बंद किया. उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होते रहे, पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने के अलावा उस के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर अदालत में दाखिल करती रही.

16 दिसंबर, 2006 को नीना ने बलविंदर शर्मा नामक शख्स से दूसरा विवाह रचा लिया. उस के साथ मिल कर उस ने मोहाली में ‘एलीवेशन प्लेसमेंट सर्विस’ के नाम से अपना एक आलीशान औफिस खोला. इसी तरह के कई औफिस उस ने अलगअलग जगहों पर खोले और अपने धंधे को पहले की तरह ही अंजाम देती रही. उस के खिलाफ आपराधिक मामले भी लगातार दर्ज होते रहे. देखते ही देखते उस के ऊपर 50 से अधिक मुकदमे दर्ज हो गए.

विभिन्न केसों में बारबार रिमांड पर ले कर पुलिस उस से सिवाय सौफ्ट इंटेरोगेशन के और कुछ नहीं कर सकती थी. और तो और पुलिस उस से ठगी की रकम का भी पता नहीं लगा पाई कि उस ने कहां छिपा रखी है. वह सीधे कह देती थी कि बीमारी पर खर्च कर दी है.

नीना के खिलाफ भले ही कितने ही केस क्यों न चल रहे थे, पर उन में से तमाम अधर में ही लटके थे. कुछ केसों में वह बरी भी हो गई थी. मैडिकल आधारों पर उसे अदालत से जल्दी जमानत मिल जाती थी. इसी बात का वह फायदा उठा रही थी. ठगे गए लोग तो पुलिस पर भी उस के साथ सांठगांठ का आरोप लगा रहे थे.

अभी हाल ही में नीना को उस के खिलाफ दर्ज एक मामले में पहली बार सजा हुई है. करीब 4 साल पहले हिमाचल प्रदेश के कस्बा बरनी निवासी अशोक कुमार की शिकायत पर नीना के खिलाफ भादंवि की धारा 406 एवं 420 का यह केस मोहाली के थाना मटौर में दर्ज हुआ था.

शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसे कनाडा भेजने के नाम पर नीना ने उस से 1 लाख 10 हजार रुपए ठगे थे. इस केस में मटोर थाना के थानाप्रभारी धर्मपाल ने नीना को गिरफ्तार कर के जेल भिजवाते हुए उस के खिलाफ चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी.

सुनवाई करते हुए 16 दिसंबर, 2016 को मोहाली के विद्वान प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी हरप्रीत सिंह ने नीना को ठगी की कसूरवार मान कर 2 साल 10 महीने की कैद के अलावा 5 हजार रुपए के जुरमाने की सजा सुनाई थी. जुरमाना अदा न करने पर उसे 6 महीनों की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

सजा सुनने के बाद भी नीना मुसकुराती रही. फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कह कर उस ने पूरे आत्मविश्वास से कहा,  ‘कोई बात नहीं, मैं इस कदर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हूं कि जल्दी ही मुझे जमानत मिल जाएगी.’

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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