पवन सिंह के दीवाने हुए भोजपुरी दर्शक

आखिरकार भोजपुरी दर्शकों का इंतजार खत्म हुआ. जी हां, सही सुना आपने लंबे समय बाद भोजपुरिया सुपरस्टार पवन सिंह और काजल राघवानी फिल्‍म ‘मैंने उनको सजन चुन लिया’ में स्‍क्रीन शेयर करते नजर आएंगे. इस फिल्‍म में पवन सिंह एक बार फिर से काजल राघवानी के साथ रोमांस करते नजर आएंगे.

इस फिल्‍म में काजल के अलावा आम्रपाली दुबे, अंजना सिंह, प्रीति विस्‍वास भी नजर आएंगी, लेकिन सबकी नजर पवन सिंह और काजल की केमेस्‍ट्री पर होगी, जो ट्रेलर में बेजोड़ लग रही है.

ये फिल्‍म ‘मैंने उनको सजन चुन लिया’ को लेकर पवन सिंह काफी उत्‍साहित हैं और कहते हैं कि डीआरजे रिकौर्डस भोजपुरी पर फिल्‍म के ट्रेलर को दर्शकों ने खूब प्‍यार दिया है.

pawan singh kajal raghwani

आपको बता दें कि इन दोनों का गाना ‘छलकत हमरो जवनियां’ भोजपुरी की सबसे बड़ी हिट रह चुकी है, जिसके बाद अब पवन और काजल फिल्‍म ‘मैंने उनको सजन चुन लिया’ से बौक्‍स औफिस पर धमाल मचाने को तैयार हैं.

सिद्धू ‘कपिल शर्मा शो’ से हुए बाहर? जानिए सच्चाई

पुलवामा हमले पर कपिल शर्मा शो के जज नवजोत सिंह सिद्धू के एक बयान के बाद जिस तरह से देश भर में हो हल्ला हुआ उसके बाद खबर आई कि प्रोड्यूसर ने सिद्धू को शो से बाहर कर दिया है. बीते शनिवार-रविवार को सिद्धू शो में आये तो सोशल मीडिया पर बवाल मच गया लेकिन बाद में लोगों का गुस्सा शांत हुआ जब अर्चना के शो में एंट्री का वीडियो आया. पर अर्चना के हालिया बयान को सुनकर आपको इस खबर की सत्यता पर भी शक होगा.

सिद्धू को शो से हटाया गया है इसका कोई भी आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. ना कपिल की ओर से, ना प्रोड्यूसर की ओर से और ना ही चैनल की ओर से. पर एक समाचार एजेंसी की खबर की माने तो अर्चना ने कहा कि वो सिद्धू की जगह शो में नहीं आई हैं. वो सिद्धू की परमानेंट रिप्लेसमेंट नहीं हैं. अर्चना ने बताया है कि उन्होंने पुलवामा अटैक के पहले ही दो एपिसोड शूट कर लिए थे जो सोन चिड़िया स्टारकास्ट और सेलेब्रिटी क्रिकेट लीग प्रमोशन के लिए आने वाले सितारों के साथ थे. इस दौरान सिद्धू किसी काम के कारण शो में नहीं आ सके जिसके बाद टेंप्रोरी तौर पर दो एपिसोड्स के लिए अर्चना ने कुर्सी संभाली है. सोशल मीडिया पर सिद्धू के खिलाफ विरोध का माहौल तैयार है. लोग सोनी टीवी के बहिस्कार का आवाह्न कर रहे हैं.

तो 5 मार्च को ‘यूट्यूब’ पर आएगी नितिन गड़करी पर फिल्म

लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टियां और नेता अपने आपको चमकाने में लग गए हैं.एक तरफ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक नहीं कई फिल्में बन रही हैं.तो दूसरी तरफ कई अन्य राजनेताओ पर फिल्मों के बनने की चर्चाएं हो रही हैं. मगर इन सब के बीच केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता नितिन गड़करी पर फिल्म बन गयी है, जो कि पांच मार्च को ‘‘यूट्यूब’’ पर आ जाएगी. बौलीवुड के साथ-साथ देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं कि नितिन गड़करी अपरोक्ष रूप से खुद को प्रधानमंत्री पद के रूप में पेश करने में लगे हुए हैं. यूं भी महाराष्ट्र की राजनीतिक पार्टी शिवसेना ने ऐलान कर दिया है कि वह महाराष्ट्रियन को ही प्रधानमंत्री पद के रूप में देखना चाहती है.

नागपुर में कार्यरत फिल्मकार अनुराग भुसारी ने केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी पर ‘‘गड़करी’’ नामक फिल्म का निर्माण व निर्देशन किया है.यह फिल्म 5 मार्च को ‘यू ट्यूब’पर रिलीज की जाएगी.फिल्मकार अनुराग भुसारी का दावा है कि उनकी यह फिल्म नितिन गड़करी की प्रचारात्मक फिल्म नहीं है, बल्कि तथ्यों पर आधारित फिल्म है. फिल्म पूरी तरह से उनके जीवन पर आधारित है. फिल्म का ट्रेलर ‘‘यूट्यूब’’ पर धूम मचा रहा है. इस फिल्म में नितिन गड़करी का किरदार राहुल चोपड़ा ने निभाया है.

अनुराग भुसारी कहते हैं- ‘‘अब तक कई नेताओं पर बायोपिक फिल्में बन चुकी है, और उन पर प्रचारात्मक फिल्म होने का ठप्पा लगा मगर हमारी फिल्म के साथ ऐसा नही है. मैं दर्शकों को आशवस्त करना चाहता हूं कि मैने सिर्फ सच दिखाया है. इस फिल्म को बनाने के पीछे मेरा मकसद नितिन गड़करी को एक अच्छा व बेहतर इंसान साबित करना नहीं रहा. मैंने उनके संघर्ष का चित्रण किया है. मेरी फिल्म में 2014 में उनके केंद्रीय मंत्री बनने तक की कहानी है.’’

अनुराग भुसारी आगे बताते हैं-‘‘हमने बीस लोगों का एक दल बनाकर नितिन गड़करी पर शोधकार्य करना शुरू किया था. पूरे छह माह तक शोध कार्य करने के बाद दो माह के अंदर पूरी फिल्म की शूटिंग नागपुर में ही खत्म की.’’

अनुराग भुसारी का दावा है कि फिल्म ‘‘गड़करी’’ का निर्माण करने से पहले उन्होने नितिन गड़करी से कोई इजाजत नहीं ली. मगर शोध कार्य करते हुए उन्होने नितिन गड़करी की पत्नी कंचन गड़करी और नितिन गड़करी के कुछ बचपन के दोस्तों से जरूर बात की.’’

पैसे के बल पर होता नशे और सैक्स का खेल  

मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 4 ऐसे आरोपियों को गिरफ्तार किया है जो मुंबई व देश की कई जगहों पर घूमते रहते थे. साथ ही, विदेशों में देह धंधे से जुड़े थे. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में इन आरोपियों ने कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं.

दरअसल, जब से मुंबई में डांस बार बंद हुए हैं, बेरोजगार हो गईं बार डांसरों को होटल मालिक आरकैस्ट्रा के बहाने बुलाते रहते हैं.

वजह, यहां काम कर रही लड़कियों के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है. कइयों ने या तो घरवापसी कर ली है या फिर कहीं और ठिकाना ढूंढ़ लिया है. आमतौर पर ये बार डांसर पश्चिम बंगाल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश वगैरह राज्यों की होती हैं.

सैक्स का नया कारोबार मुंबई के होटलों में नौकरी के बहाने कई लड़कियों के फोटो खींच लिए गए थे, जिन्हें गिरफ्तार आरोपियों को फौरवर्ड किया गया था. यहीं से शुरू हुआ सैक्स का नया कारोबार जिस की गिरफ्त में कई लड़कियां फंसती चली गईं.

गिरफ्तार आरोपियों ने इन फोटो को खाड़ी देशों के कई बड़े शहरों के होटल मालिकों को भेज दिया. वहां से चुनी गई लड़कियों की लिस्ट आई जिन से मुंबई में बात की गई. जिन लड़कियों ने खाड़ी देश जाने के लिए सहमति दे दी. उन्हें बतौर एडवांस 20,000 रुपए दे दिए गए.

एडवांस देने के बाद दलालों के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई. पैसे तो लड़कियों को दिए जा चुके थे, पर इन में से कई लड़कियों के पास पासपोर्ट नहीं थे. जिन के पास पहले से ही थे उन की डिमांड भी ज्यादा थी. फिर इन के लिए पासपोर्ट बनवाए गए.

पुलिस ने बिछाया जाल

इस गंदे कारोबार के घटिया खेल का परदाफाश करने वाले क्राइम ब्रांच के सीनियर इंस्पैक्टर अजय सावंत, सुशील बंजारी, राजू सुर्वे, सुनील पवार की जांच टीम ने मीडिया को बताया कि इन लड़कियों से उन के परिवार या परिवार के किसी करीबी आदमी के बैंक अकाउंट नंबर भी मांगे गए. कई खातों में एडवांस में 3 महीने की डेढ़ लाख रुपए तनख्वाह भी दी गई.

पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के लिए मुखबिरों का जाल बिछा दिया. पकड़ में आने के बाद सख्ती से पूछताछ की गई तो कई सनसनीखेज खुलासे हुए.

खाड़ी देशों के डांस बार

मुंबई के डांस बारों में आमतौर पर ग्राहक नोट बरसाते थे और नशे के साथसाथ सैक्स की डिमांड करते थे. जिन लड़कियों से सौदा पट जाता था, ग्राहक उन्हें या तो अपने साथ ले जाते थे या फिर होटल में ही इंतजाम होता था. पर खाड़ी देश के शहरों के डांस बारों में ग्राहकों को डांस बार में जान से पहले काउंटर पर एक कार्ड दिया जाता है. इस कार्ड की कीमत एक बार में 50-60 दिरहम होती है.

सैक्स का खुला खेल

डांस बार में आए ग्राहकों को जो लड़की पसंद होती है उस के नाम से मशीन में कार्ड स्वाइप करना होता है. वह जितनी बार कार्ड को स्वाइप करता है उस की पूरी डिटेल कंप्यूटर में सेव हो जाती है. फिर काउंटर छोड़ने से पहले उसे पूरी पेमेंट करनी होती है.

अजीबोगरीब शर्त वहां के होटलों में एक लड़की को 3 महीने के अंदर कम से कम 400 बार कार्ड स्वाइप कराना जरूरी होता है वरना लड़कियों को पासपोर्ट नहीं लौटाए जाते हैं.

कोई भी लड़की सिर्फ डांस से ग्राहकों को कार्ड स्वाइप कराने के लिए राजी नहीं कर पाती थी. लिहाजा, उसे कईकई ग्राहकों के साथ सैक्स करना होता था.

ग्राहक उसे फिर अपने साथ होटल ले जाते थे और वहां उस के साथ शुरू होता था सैक्स का खुला खेल. इस खेल में भी किसी लड़की को ग्राहक को पूरी तरह संतुष्टि देनी होती थी यानी ग्राहक की सैक्स के दौरान जो भी डिमांड होती थी उसे लड़की को पूरा करना होता था. यहां तक कि अप्राकृतिक सैक्स भी.

तारतार इनसानियत

दरअसल, खाड़ी देशों में पैसे कमाने को ले कर जितने सब्जबाग दिखाए जाते हैं, वहां होता इस के ठीक उलटा ही है. कबूतरबाजी के जरीए या फिर कानूनी तरीके से भेजी गई लड़कियों की जिंदगी वहां इतनी बदहाल हो जाती है जो एक भुक्तभोगी लड़की ही समझ सकती है.

आएदिन खाड़ी देशों में काम करने गई लड़कियों के साथ की गई हैवानियत की खबरों से इनसानियत कांप उठती है. हाल ही के सालों में कई नर्सों ने भी वहां काम छोड़ कर भारत लौटना ही ज्यादा मुनासिब समझा है.

देश के कई हिस्सों में सामाजिक संस्थाओं ने खाड़ी देशों में लड़कियों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ मुहिम चलाई है. इस के बावजूद अभी भी बड़ी तादाद में भारतीय लड़कियों को वहां गैरकानूनी तरीके से पहुंचाया जाता है.

सख्त हो कानून

बार डांसरों को पहले डांस से दिल जीतने की बात कह कर भेजा जाता है, पर वहां शुरू होता है सैक्स का खुला खेल. वह भी ऐसा कि 24 घंटे में एक लड़की को कईकई ग्राहकों के साथ सैक्स करने पर मजबूर किया जाता है?

सैक्स वर्करों के लिए खाड़ी देश उस नरक के समान है जहां पलपल जिंदगी बदतर होती जाती है. ऐसे में मुंबई पुलिस ने जिन आरोपियों को पकड़ा है और जो खुलासे हुए हैं, उस की तारीफ तो की ही जानी चाहिए, पर साथ ही सरकार को भी चाहिए कि वह इस मामले को गंभीरता से ले और सख्त कानून बनाए ताकि दरिंदगी की इंतिहा पर लगाम लगाई जा सके.

‘जिंदगी मिलेगी ना दोबारा-2’ पर जोया ने क्या कहा

2011 में एक फिल्म आई थी जिसने दोस्ती और ट्रैवलिंग के रोमांच को एक बेहतरीन ठंग से पर्दे पर उतारा, नाम था जिंदगी मिलेगी ना दोबारा. जोया अख्तर की निर्देशित इस फिल्म में हृतिक रोशन, अभय देओल, फरहान अख्तर और कटरीना कैफ मुख्य भूमिका में थे. ये फिल्म साल की चुनिंदा सफलतम फिल्मों में से  एक थी. फिल्म ने ना सिर्फ बौक्स औफिस पर जोरदार कलेक्शन कियी, बल्कि दर्शकों को भी बेहद पसंद आई.

इस फिल्म से जुड़ी एक जरूरी अपडेट आने वाला है. खबरों की माने तो डायरेक्टर जोया अख्तर ‘जिंदगी मिलेगी ना दोबारा’ का सिक्वल जल्दी ही बड़े पर्दे पर ला सकती हैं. जोया ने एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि वो ऋतिक के साथ दोबारा काम करना चाहती हैं. जोया ने कहा कि, “मैं उनके संग काम करने को लेकर काफी उत्साहित हूं और इसलिए मैं जिंदगी ना मिलेगी दोबारा का सीक्वल बनाने की सोच रही हूं. मगर मैं इस प्रोजेक्ट पर काम तब ही शुरू करूंगी जब मुझे एक अच्छी स्क्रिप्ट मिलेगी. ऋतिक रोशन, कटरीना कैफ, कल्कि कोचलिन और फरहान अख्तर मेरे लिए काफी स्पेशल हैं. मैं उनके साथ अच्छी बौन्डिंग शेयर करती हूं. मैं सिर्फ पैसों के लिए इस फिल्म का सीक्वल बनाने के बारे में नहीं सोच सकती.”

‘दिल चाहता है’ के बाद ‘जिंदगी मिलेगी ना दोबारा’ ही वो फिल्म है जिसने दोस्ती और ट्रैवेलिंग को बेहतरीन ढंग से बड़े पर्दे पर उतारा. इस फिल्म के सिक्वल का दर्शकों को लंबे समय से इंतजार था. अब जब खुद जोया अख्तर ने इसे बनाने की मंशा नेशनल टेलीविजन पर जाहिर की है, तो स्पष्ट है कि इसके पीछे कुछ पुख्ता तैयारी भी जरूर होगी. अब देखने वाली बात है कि जिंदगी मिलेगी ना दोबारा के सिक्वल को बड़े पर्दे पर देखने की दर्शकों की हसरत कब पूरी होती है.

सांवली लड़कियों की सफलता

समाज में यह सोच बनी हुई है कि सांवले रंग के लोग कामयाब नहीं होते हैं. इस रंग की लड़कियों के शादीब्याह में भी परेशानियां आती हैं. गांवदेहात में तो इस तरह की परेशानियां ज्यादा आती हैं.

यह पूरा सच नहीं है. सांवला रंग अब तरक्की की राह में रोड़ा नहीं है. तमाम ऐसी लड़कियां हैं जो सांवले रंग की होने के बाद भी कामयाब हैं.

केवल नौकरी में ही नहीं, बल्कि फिल्म और टैलीविजन पर वे अपनी ऐक्टिंग या गायकी से कमाल दिखा रही हैं. इन में केवल शहरी लड़कियां ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों और गांवदेहात की लड़कियां भी शामिल हैं.

बड़े शहरों में रहने वाली लड़कियों के लिए बहुत तरह के मौके आते हैं और उन्हें अपने परिवार से भी सपोर्ट मिलता है. छोटे शहरों और गांवदेहात की रहने वाली लड़कियों के साथ सब से बड़ी परेशानी वहां का माहौल होता है.

छोटे शहरों और गांवदेहात में आज भी सांवले रंग की लड़कियों को अलग नजर से देखा जाता है. लोगों को लगता है कि सांवले रंग की लड़कियां उतनी कामयाब नहीं होती हैं.

बचपन से ही ऐसी लड़कियों को अलग निगाह से देखा जाता है. ऐसे में सांवले रंग की लड़कियों के खुद पर यकीन में कमी होने लगती है.

समाज में बहुत सारी ऐसी लड़कियां भी हैं जो सांवले रंग को दरकिनार कर आगे बढ़ी हैं और कामयाब हुई हैं. अब इन लड़कियों की कामयाबी को देख कर कहा जा सकता है कि जमाना सांवली लड़कियों का है. जरूरत इस बात की है कि इन को सही बढ़ावा मिले और इन के रंग को ले कर बचपन से यह बात समझाई जाए कि सांवला रंग किसी भी तरह से कामयाबी में रुकावट नहीं है.

मीठी आवाज से दी मात

कल्पना और खुशबू उत्तम जैसी लड़कियों ने अपनी मीठी आवाज से सांवलेपन को मात दी है. असम की रहने वाली कल्पना कहती हैं कि सांवले रंग का अंदाज सब से जुदा होता है. अच्छे रंग के बजाय अच्छी सेहत ज्यादा अहम होती है.

कल्पना फिल्मों की बड़ी कलाकार हैं. हिंदी के साथसाथ वे कई भाषाओं में गाने गाती हैं. कई फिल्मों में दर्शकों ने उन की अच्छी ऐक्टिंग को भी देखा है.

कल्पना ने हिंदी फिल्म ‘मेम साहब’, ‘चांद के पार चलो’, ‘अब बस’ और ‘सोनियो आई लव यू’ में अपनी आवाज का जादू दिखाया है. उन्होंने भोजपुरी फिल्म ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे’, ‘गब्बर सिंह’, ‘यूपी बिहार मुंबई ऐक्सप्रैस’ और ‘दुलहनिया नाच नचाए’ में काम किया है. वे देश की बहुत सी बोलियों में गाने गा चुकी हैं. एमटीवी पर उन के बिरहा गायन ने जबरदस्त धमाल मचाया है.

कल्पना ने वैस्टर्न गानों से अपना कैरियर शुरू किया था. आज वे 18 बोलियों में गाने गा रही हैं. उन्हें स्कूलकालेज के दौरान ही गानों के लिए इनाम दिया जाता था. इस से उन्होंने गायकी में ही कैरियर बनाने के बारे में विचार किया. इस के बाद वे मुंबई आ गईं.

कल्पना कहती हैं कि सांवले रंग का अपना अलग आकर्षण होता है. फैशन जगत के तमाम जानकार मानते हैं कि सांवले रंग में सहज आकर्षण होता है. शायद इसीलिए जमाना आज सांवले लोगों का है. हर क्षेत्र में ये लोग कामयाब हो रहे हैं.

बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली भोजपुरी की मशहूर सांवलीसलोनी गायिका खुशबू उत्तम का मानना है, ‘‘रंगरूप से पहचान नहीं बनती है, बल्कि अच्छे काम और पढ़ाई से पहचान बनती है. मैं ने जब फिल्मों में कैरियर बनाने की योजना बनाई तो लोगों ने काफी मजाक बनाया. कुछ लोगों ने कहा कि गाना अलग बात है लेकिन परदे पर दिखने के लिए सुंदर होना जरूरी होता है.

‘‘मैं ने लोगों की बातों को चुनौती के रूप में लिया. मेरे गानों के औडियो कैसेट तो धूम मचा ही चुके थे, इस के बाद वीडियो में और यूट्यूब पर भी मेरे गाने सुने और देखे जाने लगे.

‘‘आज मेरे लिए मेरा रंग कोई बाधा नहीं रह गया है. मैं दूसरी लड़कियों से भी यही कहती हूं कि वे सांवले रंग को ले कर परेशान न हों.’’

खुशबू उत्तम आगे कहती हैं, ‘‘मैं बचपन से ही यह सोचती थी कि जो भी काम करूं वह ऐसा करूं जो सब से अच्छा हो. मैं ने न्यूज रीडिंग, मौडलिंग, ड्रामा जैसे तमाम कामों में भाग लिया. मेरी मौडलिंग को बहुत पसंद किया था.’’

खुशबू उत्तम को म्यूजिक बहुत पसंद है और उन्होंने इस को ही अपना कैरियर बना लिया. वे कहती हैं, ‘‘मुझे कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि किसी ने सांवले रंग का होने के चलते मुझे कोई काम न करने दिया हो. अपने सांवलेपन के बाद भी मैं घरघर पहुंच गई. आज मुझे अपने रंग पर फख्र है.

‘‘मैं दूसरी लड़कियों को भी कहती हूं कि केवल मैं ही नहीं, बल्कि फिल्मों में तमाम ऐसी लड़कियां हैं जो मुझ से भी ज्यादा कामयाब हैं.

‘‘बिपाशा बसु के अलावा बहुत से ऐसे नाम हैं जिन का रंग कभी उन की कामयाबी में बाधा नहीं बना. ऐसे में रंग की फिक्र छोड़ कर अपने काम पर फोकस करें, तब कामयाब होने से कोई रोक नहीं पाएगा.’’

खुद पर करें यकीन

उत्तर प्रदेश के बहाराइच जिले की गिनती पिछड़े शहरों में की जाती है. वहां की रहने वाली सामान्य परिवार की देवयानी अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बैंगलुरु में ‘मास्टर इन डवलपमैंट’ में रिसर्च कर रही हैं.

देवयानी ने 5वीं जमात के बाद 12वीं जमात तक नवोदय स्कूल में पढ़ाई की है. वहां से उन का चयन दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कालेज में हो गया. वहां से राजनीति शास्त्र में बीए करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे अंबेडकर यूनिवर्सिटी चली गईं.

देवयानी ने आगे की पढ़ाई के पहले सोशल वर्क करने की दिशा में काम किया. ‘देहात’ संस्था के साथ श्रावस्ती जिले के भिनगा इलाके के सब से खराब हालात वाले 129 सरकारी स्कूलों में काम किया. वहां पर वनवासी लड़कियों को स्कूल तक लाने की दिशा में भी काम किया.

देवयानी ने अपने स्कूल के समय से डांस, कोरियोग्राफी और गायकी पर भी फोकस किया था. इस के साथ ही एनसीसी के साथ रायफल शूटिंग में भी कामयाबी हासिल की थी.

देवयानी भारत की उन 2 लड़कियों में से एक हैं जिन का चयन संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘ग्लोबल एशिया अफ्रीका’ प्रोग्राम में हुआ. इस में पूरी दुनिया से केवल 20 लड़कियों को शामिल किया गया था.

देवयानी का मानना है कि रंग नहीं बल्कि आत्मविश्वास जिंदगी को कामयाब बनाता है. रंग से कोई सुंदर नहीं दिखता. समय के साथ लोगों को पता चल गया है कि सांवले रंग वाले लोग भी बहुत कामयाब होते हैं.

फैशन के क्षेत्र में जहां रंगरूप पर खास ध्यान दिया जाता?है, वहां पर भी सांवले रंग के लोगों ने अपना कमाल हमेशा दिखाया है. बिपाशा बसु हो या काजोल, सभी ने अपने ग्लैमर का लोहा मनवाया है. पढ़ाईलिखाई के क्षेत्र में छोटे शहरों की सांवली लड़कियों के आगे बढ़ने से वे दूसरों के लिए मिसाल बन रही हैं.

ऐसे निखर जाता है रंग

फिटनैस मौडल के रूप में अपने कैरियर को संवार रही आरती पाल का कहना है, ‘‘समय के हिसाब से जैसेजैसे आप कामयाबी की सीढि़यां चढ़ते जाते हैं, वैसेवैसे आप में निखार आता जाता है. जब आप कामयाब नहीं होते हैं तो आप का रंगरूप कितना ही अच्छा क्यों न हो, कोई आप से प्रभावित नहीं होता है. जब आप कामयाब हो जाते हैं तो कोई यह नहीं देखता कि आप का रंग कैसा है.

‘‘जब मैं ने मौडलिग करने का फैसला किया तो लोग कहते थे कि सांवले रंग की वजह से यह कामयाब नहीं होगी. मैं ने इन आलोचनाओं की चिंता नहीं की और खुद को आगे बढ़ाने का काम किया. ऐसे में मौडलिंग की कई प्रतियोगिताएं जीतीं. शो में हिस्सा लिया. फैशन शूट किए.

‘‘अब मैं अपनी ही कंपनी ‘एपी इवैंट’ के साथ काम कर रही हूं. खुद के साथसाथ दूसरी लड़कियों को भी फैशन की फील्ड में आगे बढ़ने का मौका दे रही हूं.’’

सांवले रंग के लोग हर क्षेत्र में कामयाब होते हैं. राजनीति में देखें तो मायावती, उमा भारती और ममता बनर्जी जैसे लोग बहुत कामयाब हुए हैं.

कामयाब शख्स में रंग को ले कर किसी तरह का कोई तनाव नहीं रहता है. समाज भी कामयाब लोगों के साथ चलना शुरू कर देता है. उस के रंगरूप को नहीं देखता है.

झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली लकी सुरीन बताती हैं, ‘‘मुझे मौडलिंग में रैंप शो करने बहुत पसंद थे. मेरी लंबाई बहुत अच्छी है. ऐसे में रैंप शो के लिए मुझे लोग पसंद करते थे.

‘‘मेरा रंग सांवला होने के चलते कई बार अनफिट कर दिया जाता था. लोगों के इस बरताव से दुखी हो कर कई बार मुझे लगा कि क्या मुझे मौडलिंग छोड़ देनी चाहिए? पर मैं ने हिम्मत से काम लिया और रैंप शो मौडलिंग में काम करती रही.

‘‘रांची में मौके कम थे, फिर मैं लखनऊ आ गई. यहां पर भी मुझे काम और तारीफ दोनों मिलनी शुरू हुई तो मेरा खुद पर यकीन लौट आया.

‘‘अब मैं अपनी इवैंट कंपनी ‘ब्लू बर्ड’ फैशन एजेंसी के जरीए कई शो करती हूं. मुझे कई तरह के अवार्ड मिल चुके हैं. अब मुझे नहीं लगता कि सांवला होने के चलते किसी को अपने मन का काम करने से समझौता करना चाहिए.’’

सोच बदलने की जरूरत

ऐस्थैटिक ऐंड लेजर कंसल्टैंट डाक्टर प्रभा सिंह कहती हैं, ‘‘सांवलापन कभी भी कामयाबी में बाधा नहीं बन सकता. जरूरत इस बात की होती है कि खुद पर भरोसा करें. यह बात जरूर है कि बचपन से ही बच्चे के मन में ऐसे भाव भर दिए जाते हैं कि रंग का असर उस के खुद पर यकीन को खत्म कर देता है.

‘‘हम देखते हैं कि बचपन में जो बच्चा गोरा होता है उस की लोग तारीफ ज्यादा करते हैं. ऐसे में सांवला बच्चा हीनभावना का शिकार हो जाता है. अब इस हीनभावना से निकलने के लिए वह कई तरह के उपाय करने लगता है.

‘‘ऐसे उपाय उस के 30 साल से 35 साल की उम्र तक और कभीकभी तो उस के बाद भी जारी रहते हैं. यह सोच गोरेपन को बढ़ाने का सब से बड़ा कारोबार हो गई है. बहुत सारी कोशिशों और जागरूकता के बाद भी सांवलेपन के शिकार लोग हीनभावना में रहते हैं.

‘‘इन की इस भावना को दूर करने के लिए हर लैवल पर कोशिश होनी चाहिए खासकर समाज को ऐसे लोगों का साथ देना चाहिए.’’

डाक्टर प्रभा सिंह आगे कहती हैं, ‘‘सुंदरता के लिए रंग नहीं आत्मविश्वास और फिटनैस की जरूरत होती है. आजकल के मौडल भी अब इस बात के समर्थक हैं. अब तो जिंदगी के तमाम मौकों की खूबसूरती को ले कर भी सामने लाने की कोशिशें हो रही हैं.

‘‘कई मौडलों ने शादी के बाद गर्भावस्था के समय पूरा काम किया. पहले इन बातों को छिपाने का रिवाज था. ऐसे में सांवलापन किसी को कामयाबी में रुकावट नहीं लगना चाहिए. इस दिशा

में काम होना चाहिए. स्कूल में भी ऐसे प्रोग्राम हों जो लड़कियों के मन में सांवलेपन की गलतफहमी को निकाल सकें, तभी लड़कियां और उन के परिवार इस सोच से बाहर आ सकेंगे.

मोदी और विपक्ष

वर्ष 2018 में कांग्रेस द्वारा बेंगलुरु में गैरभाजपाई दलों को इकट्ठा करना और अब तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा कोलकाता में दोगुने जोश में लगभग सभी गैरभाजपाई दलों के नेताओं को जमा कर लेने की सफलता ने भाजपा को हिला दिया है. बेंगलुरु में जब कांग्रेस और जनता दल (सैक्युलर) ने मिल कर सरकार बनाई थी तो लगा था कि 2014 के बाद यह महज दिल्ली की अरविंद केजरीवाल की जीत जैसी फ्लूक घटना है पर 5 विधानसभा चुनावों के नतीजों, जिन में भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार करने के बावजूद हारी है, ने साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार से मतदाता संतुष्ट नहीं हैं. कोलकाता की रैली में विपक्षियों का मिलन होने से साफ हो गया है कि मोदी की तानाशाही के खिलाफ विपक्षी एकजुट हैं. विपक्षी दलों की मजबूत होती एकता से भाजपा चिंता में है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीमार मंत्री, अस्पतालों से चाहे जो भी कहते रहें और नरेंद्र मोदी चाहे जितना मखौल उड़ाने की शैली में, बचाव करते नजर आएं, उन की परेशानियां बढ़ रही हैं, यह पक्का है.

गलती भाजपा की साफसाफ है. सब से बड़ी बात यह है कि हिंदू धर्म के पाखंड को देश से ऊपर मानने की भाजपा की गलती विपक्षी पार्टियों को फिर से जान दे रही है जिन्हें जनता ने पिछले आम चुनावों में इतिहास के कचरे में डाल सा दिया था. नरेंद्र मोदी की सरकार अपने कार्यकाल के दौरान हिंदू धर्म को चलाने में ज्यादा उत्सुक रही बजाय देश को गरीबी, गंदगी और गहरे गड्ढे से निकालने के.

बहुत लंबे समय बाद 2014 में नरेंद्र मोदी को एक ऐसी सरकार का मुखिया होने का मौका मिला था जिस में उन के पास पूर्ण से ज्यादा बहुमत था. फिर राज्यों के चुनावों ने इस उपलब्धि को और ज्यादा बेहतर कर दिया. लेकिन बजाय देश व समाज के पुनर्निर्माण में लगने के, नरेंद्र मोदी ने पौराणिक हिंदू राजाओं की तरह धार्मिक कर्मकांडों में अपना समय देना शुरू कर दिया.

नोटबंदी और जीएसटी भी धार्मिक काम बन कर रह गए. नोटबंदी पर नरेंद्र मोदी के भाषण की तुलना महाभारत के पात्र युधिष्ठिर से की जा सकती है जिस ने प्रण ले रखा था कि जब भी कोई उन्हें जुए में चुनौती देगा, तो जुआ खेल लेंगे. कालाधन निकालने के लिए उन्होंने जुआ खेला और पूरे देश की संपत्ति को बाहर कर दिया. गनीमत यह रही कि अज्ञात वनवास कुछ महीनों का ही रहा. लेकिन आखिरकार इसी जुए के कारण पांडवों को महाभारत का युद्ध करना पड़ा. महाभारत में भी भाजपा के आराध्य विष्णु के अवतार कृष्ण ने उसी तरह दुष्ट कौरवों के खिलाफ इधरउधर से एक धर्मसेना जमा की थी जैसी बेंगलुरु और कोलकाता में हुई है.

नरेंद्र मोदी की सरकार ने कट्टर हिंदुओं को फिर से पौराणिक राज स्थापित करने की छूट दे रखी है. ऊंचे ब्राह्मणों और सवर्णों के लिए उन्होंने 10 फीसदी आरक्षण का तोहफा दिया है जबकि गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों की हत्याओं, किसानों की फसलों को बरबाद, और चमड़े के काम को नष्ट करने के आतंक के चलते उन्हें दंड देना था. ब्राह्मणपुत्र की मृत्यु के लिए वेदपाठी शंबूक की हत्या करने दी गई है. दलितों को मारने के लिए किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. दलितों और गरीबों का साथ देने वालों को देशद्रोही, अरबन नक्सलाइट कह कर जेलों में बंद कर रखा है.

निश्चित है कि जनआक्रोश अब पैदा होगा ही क्योंकि आज का समाज और आज की सरकार पौराणिक कहानियों के आधार पर नहीं चल सकती. वर्तमान की चुनौतियां कुछ और हैं. ममता बनर्जी और राहुल गांधी में मतभेद हैं पर, फिलहाल, उन को किसी और से मुकाबला करना है, इसीलिए कोलकाता पुलिस अफसर पर सीबीआई हमले पर सारा विपक्ष एकजुट हो गया है.

चाची की यारी में कर दिया चाचा का कत्ल

17 अक्तूबर, 2016 की सुबह जिला गोरखपुर के चिलुआताल के महेसरा पुल के नजदीक जंगल में एक पेड़ के सहारे एक साइकिल खड़ी देखी गई, जिस के कैरियर पर एक बोरा बंधा था. बोरा खून से लथपथ था, इसलिए देखने वालों को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बोरे में लाश हो सकती है. लाश  होने की संभावना पर ही इस बात की सूचना थाना चिलुआताल पुलिस को दे दी गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर रामबेलास यादव पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. बोरे से उस समय भी खून टपक रहा था.

इस का मतलब था कि बोरा कुछ देर पहले ही साइकिल से वहां लाया गया था. उन्होंने बोरा खुलवाया तो उस में से एक आदमी की लाश निकली. मृतक की उम्र 35-36 साल रही होगी. उस के सिर पर किसी वजनदार चीज से वार किया गया था. वह रंगीन सैंडो बनियान और लुंगी पहने था. शायद रात को सोते समय उस की हत्या की गई थी.

पुलिस को लाश की शिनाख्त कराने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. वहां जमा भीड़ ने मृतक की शिनाख्त प्रौपर्टी डीलर सुरेश सिंह के रूप में कर दी थी. वह चिलुआताल गांव का ही रहने वाला था.

शिनाख्त होने के बाद रामबेलास यादव ने मृतक के घर वालों को सूचना देने के लिए 2 सिपाहियों को भेजा. दोनों सिपाही मृतक के घर पहुंचे तो घर पर कोई नहीं मिला. पड़ोसियों से पता चला कि सुरेश सिंह के बिस्तर पर भारी मात्रा में खून मिलने और उस के बिस्तर से गायब होने से घर के सभी लोग उसी की खोज में निकले हुए थे.

घर पर पुलिस के आने की सूचना मिलने पर मृतक सुरेश सिंह के बड़े भाई दिनेश सिंह घर आए तो जंगल में एक लाश मिलने की बात बता कर दोनों सिपाही उन्हें अपने साथ ले आए. लाश देखते ही दिनेश सिंह फफक कर रो पड़े. इस से साफ हो गया कि मृतक उन का भाई सुरेश सिंह ही था.

इस के बाद पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज भिजवा दिया और उस साइकिल को जब्त कर लिया, जिस पर लाश बोरे में भर कर वहां लाई गई थी.

थाने लौट कर रामबेलास यादव ने मृतक के बडे़ भाई दिनेश सिंह की तहरीर पर सुरेश सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया. मृतक सुरेश सिंह प्रौपटी डीलिंग का काम करता था. विवादित जमीनों को खरीदनाबेचना उस का मुख्य धंधा था. पुलिस ने इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई, लेकिन उस का ऐसा कोई दुश्मन नजर नहीं आया, जिस से लगे कि हत्या उस ने कराई है.

यह हत्याकांड अखबारों की सुर्खियां बना तो एसएसपी रामलाल वर्मा ने एसपी (सिटी) हेमराज मीणा को आदेश दिया कि वह जल्द से जल्द इस मामले का खुलासा कराएं. उन्होंने सीओ देवेंद्रनाथ शुक्ला और थानाप्रभारी रामबेलास यादव को सुरेश सिंह तथा उस के घरपरिवार के आसपास जांच का घेरा बढ़ाने को कहा.

क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह हत्या दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि अवैधसंबंधों की वजह से हुई है. क्योंकि मृतक को जिस तरह बेरहमी से मारा गया था, इस तरह लोग अवैध संबंधों में ही नफरत में मारे जाते हैं. इसी बात को ध्यान में रख कर जांच आगे बढ़ाई गई तो जल्दी ही नतीजा निकलता नजर आया.

किसी मुखबिर ने बताया कि पिछले कई सालों से सुरेश सिंह की अपनी पत्नी से पटती नहीं थी. दोनों में अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था और इस की वजह सुरेश सिंह का सगा भतीजा राहुल चौधरी था. क्योंकि उस के अपनी चाची राधिका से अवैध संबंध थे.

घटना से सप्ताह भर पहले भी इसी बात को ले कर सुरेश और राधिका के बीच काफी झगड़ा हुआ था. तब सुरेश ने पत्नी की पिटाई कर दी थी, जिस से नाराज हो कर वह बच्चे को ले कर मायके चली गई थी. रामबेलास यादव को हत्या की वजह का पता चल गया था. राहुल से पूछताछ करने के लिए वह उस के घर पहुंचा तो उस के पिता दिनेश सिंह ने बताया कि वह तो लखनऊ में है.

लखनऊ में राहुल गोमतीनगर में किराए का कमरा ले कर रहता है और सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा है. पिता का कहना था कि हत्या वाले दिन के एक दिन पहले वह लखनऊ चला गया था. जबकि मुखबिर ने उन्हें बताया था कि घटना वाले दिन सुबह वह चिलुआताल में दिखाई दिया था.

पिता का कहना था कि घटना से एक दिन पहले यानी 16 अक्तूबर, 2016 को राहुल लखनऊ चला गया था, जबकि मुखबिर का कहना था कि घटना वाले दिन वह चिलुआताल में दिखाई दिया था. मुखबिर की बात पर विश्वास कर के रामबेलास यादव ने राहुल को लखनऊ से लाने के लिए 2 सिपाहियों को भेज दिया.

लखनऊ पुलिस की मदद से गोरखपुर पुलिस 22 अक्तूबर, 2016 को लखनऊ के गोमतीनगर से राहुल चौधरी को गिरफ्तार कर गोरखपुर ले आई. थाने ला कर उस से सुरेश सिंह की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के चाची से अवैध संबंधों की वजह से चाचा सुरेश सिंह की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. राहुल ने चाची के प्रेम में पड़ कर चाचा की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना चिलुआताल में सुरेश सिंह पत्नी राधिका सिंह और 6 साल के बेटे के साथ रहता था. उस का बड़ा भाई था दिनेश सिंह. राहुल उसी का बेटा था. दोनों भाइयों के परिवार भले ही अलगअलग रहते थे, लेकिन रहते एक ही मकान में थे. सुखदुख में भी एकदूसरे की मदद भी करते थे.

गांव वाले भाइयों के इस प्रेम को देख मन ही मन जलते थे. सुरेश सिंह चेन्नई में किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन पत्नी राधिका बेटे के साथ गांव में रहती थी. वह साल में एक या 2 बार ही घर आता था. उस के न रहने पर जरूरत पड़ने पर घर के छोटेमोटे काम उस के बड़े भाई का बेटा राहुल कर दिया करता था.

राहुल और राधिका थे तो चाचीभतीजा, लेकिन हमउम्र होने की वजह से दोनों दोस्तों की तरह रहते थे, बातचीत भी वे दोस्तों की ही तरह करते थे. इस का नतीजा यह निकला कि धीरेधीरे उन के बीच मधुर संबंध बन गए. उन के मन में एकदूसरे के लिए चाहत के फूल खिले तो एकदूसरे के स्पर्श मात्र से उन का रोमरोम खिल उठने लगा.

राहुल चाची राधिका से जुनून के हद तक प्यार करने लगा तो राधिका ने भी उस के प्यार पर अपने समर्पण की मोहर लगा दी. एक बार मर्यादा टूटी तो उन्हें जब भी मौका मिलता, जिस्म की भूख मिटाने लगे. दोनों ने अपने इस अनैतिक रिश्ते पर परदा डालने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन पाप के इस रिश्ते को वे छिपा नहीं सके.

लोग राधिका और राहुल को ले कर तरहतरह की चर्चाएं भी करने लगे, पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया. जब सुरेश सिंह के किसी शुभचिंतक ने उसे फोन कर के चाचीभतीजे के बीच पक रही खिचड़ी की जानकारी दी तो वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. यह सन 2014 की बात है.

सुरेश ने खूब पैसे कमाए थे. उन्हीं पैसों से उस ने गांव में रह कर प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया, जो थोड़ी मेहनत के बाद अच्छा चल निकला. कामधंधे की वजह से अकसर उसे दिन भर घर से बाहर रहना पड़ता था, इसलिए राहुल और राधिका को मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. लेकिन एक दिन अचानक वह दोपहर में घर आ गया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया.

फिर क्या था, सुरेश ने न पत्नी को छोड़ा और न भतीजे को. उस ने इस बात को ले कर भाई से बात की तो बेटे की हरकत से वह काफी शर्मिंदा हुए. समाज और रिश्तों की दुहाई दे कर उन्होंने बेटे को घर से निकाल दिया तो वह लखनऊ आ गया और गोमतीनगर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

यहां वह सरकारी नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. सुरेश की वजह से गांव में राहुल और उस की चाची की काफी बदनामी हुई थी. यही नहीं, उसे घर से भी निकाल दिया गया था. राधिका की खूब थूथू हुई थी. गांव से ले कर नातेरिश्तेदारों तक ने उस की खूब फजीहत की थी.

धीरेधीरे बात थमती गई. मांबाप से मांफी मांग कर राहुल फिर घर लौट आया. मांबाप ने उसे माफ जरूर कर दिया था, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखी जा रही थी. राधिका से उसे मिलने की सख्त मनाही थी. जबकि वह चाची से मिलने के लिए तड़प रहा था. लेकिन सख्त पहरेदारी की वजह से दोनों का मिलन संभव नहीं हो पा रहा था.

चाचा सुरेश की वजह से राहुल प्रेमिका चाची से मिल नहीं पा रहा था. उसे लग रहा था कि जब तक चाचा रहेगा, वह चाची से कभी मिल नहीं पाएगा. चाचा प्यार की राह का कांटा लगा तो वह उसे हटाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने उसे हटाने का निश्चय कर लिया.

अब वह ऐसी राह खोजने लगा, जिस पर चल कर उस का काम भी हो जाए और वह फंसे भी न. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह अपना मोबाइल फोन औन कर के बाइब्रेशन पर लखनऊ वाले कमरे पर ही छोड़ देगा और रात में गोरखपुर पहुंच कर चाचा की हत्या कर के लखनऊ अपने कमरे पर आ जाएगा.

पुलिस उस पर शक करेगी तो मोबाइल लोकेशन के सहारे वह बच जाएगा. तब वह शायद यह भूल गया था कि कातिल कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से उस का बचना आसान नहीं है.

राहुल जब से घर आ कर रहने लगा था, सुरेश और उस की पत्नी राधिका के बीच उसे ले कर अकसर झगड़ा होता रहता था. जबकि इस बीच राहुल एक बार भी चाची से नहीं मिला था.

रोजरोज के झगड़े से परेशान हो कर राधिका नाराज हो कर बेटे को ले कर मायके चली गई थी. राधिका के चली जाने से राहुल काफी दुखी था. उस का मन घर में नहीं लगा तो 16 अक्तूबर को मांबाप से कह कर वह लखनऊ चला गया.

चाची से न मिल पाने की वजह से राहुल तड़प रहा था. तड़प की वेदना से आहत हो कर उस ने योजना को अमलीजामा पहना दिया. योजना के अनुसार 17 अक्तूबर की शाम 4 बजे इंटरसिटी ट्रेन से वह गोरखपुर के लिए चल पड़ा. रात 11 बजे के करीब वह गोरखुपर पहुंचा. स्टेशन से टैंपो ले कर वह चिलुआताल के बरगदवां चौराहे पर पहुंचा और वहां से पैदल ही घर पहुंच गया.

उसे घर तो जाना नहीं था, इसलिए सब से पहले उस ने पिता के कमरे के दरवाजे की सिटकनी बाहर से बंद कर दी, ताकि शोर होने पर वह बाहर न निकल सकें.

इस के बाद पीछे की दीवार के सहारे वह सुरेश सिंह के कमरे में पहुंचा, जहां वह गहरी नींद सो रहा था. उसे देखते ही नफरत से राहुल का खून खौल उठा. उसे पता था कि चाचा के घर में लोहे की रौड कहां रखी है. उस ने लोहे की रौड उठाई और पूरी ताकत से सुरेश के सिर पर 3 वार कर के उसे मौत के घाट उतर दिया.

राहुल को विश्वास हो गया कि सुरेश की मौत हो चुकी है तो उस ने घर में रखा बोरा उठाया और उसी में उस की लाश भर कर रात के 4 बजे के करीब बाहर झांक कर देखा कि कोई देख तो नहीं रहा. जब उसे लगा कि कोई नहीं देख रहा है तो उस ने सुरेश की ही साइकिल घर उस की लाश वाले बोरे को कैरियर पर रख कर जंगल की ओर चल पड़ा.

लेकिन जब वह झील की ओर जा रहा था, तभी एक ट्रैक्टर आता दिखाई दिया. उसे देख कर वह घबरा गया और साइकिल को एक पेड़ से टिका कर भागा. ट्रैक्टर पर बैठे एक मजदूर ने उसे भागते देख लिया तो उस ने उस का नाम ले कर पुकारा भी, लेकिन रुकने के बजाए राहुल बरगदवां चौराहे की ओर भाग गया.

वहां से उस ने टैंपो पकड़ी और गोरखपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ स्थित अपने कमरे पर चला गया. उस ने चालाकी तो बहुत दिखाई, लेकिन वह काम न आई और पकड़ा गया. राहुल चौधरी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड बरामद कर ली थी.

पूछताछ के बाद राहुल को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. राधिका के पति की हत्या की खबर पा कर ससुराल आ गई थी. राहुल ने जो किया था, उस से उसे काफी दुख पहुंचा. क्योंकि उस ने राहुल से कभी नहीं कहा था कि वह उस के पति की हत्या कर उसे विधवा बना दे.

राहुल के मांबाप भी काफी दुखी हैं. उन्होंने राहुल से अपना नाता तोड़ कर उसे उस के हाल पर छोड़ दिया है.

– कथा में राधिका सिंह बदला नाम है. कथा पुलिस सूत्रों एवं राहुल के बयानों पर आधारित

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