दहशत के 11 घंटे : भाग 2

मासूमों की जिंदगी से चिंतित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को भी दी. योगी ने गृहमंत्री अमित शाह से एनएसजी कमांडो भेजने को कहा. फलस्वरूप एनएसजी कमांडोज को करथिया गांव रवाना कर दिया गया.

तब तक रात के 10 बज चुके थे. भीषण ठंड के बावजूद हजारों लोग घटनास्थल पर मौजूद थे. पुलिस की टीम तो थी ही. सब की निगाहें सुभाष के घर को ताक रही थीं. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चों को कैसे मुक्त कराया जाए. पुलिस असहज थी, लोग दहशत में थे. सब से ज्यादा वे महिलाएं बेहाल थीं, आंसू बहा रही थीं, जिन के जिगर के टुकड़े मकान में कैद थे.

जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह और एसपी डा. अनिल कुमार मिश्रा शातिर अपराधी सुभाष की गतिविधियों पर नजर गड़ाए थे. उस का ध्यान बंटाने के लिए उन्होंने गांव के 4 युवकों को लगा रखा था, जो उसे अच्छी तरह से जानते थे.

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इन्हीं में से एक युवक ने कहा कि डीएम साहब आ गए हैं, घर के बाहर आ कर अपनी बात कहो. इस पर सुभाष बोला, ‘‘मैं ने कई बार कलेक्ट्रेट के चक्कर लगाए. कालोनी मांगी, शौचालय मांगा, लेकिन कुछ नहीं मिला. अब चाहे कोई भी आ जाए, मैं दरवाजा नहीं खोलूंगा.’’

थोड़ी देर बाद सुभाष ने दीवार के छेद से एक पत्र बाहर फेंका. जिलाधिकारी को संबोधित उस पत्र में उस ने कई समस्याएं लिखीं. उस ने लिखा कि वह मेहनतमजदूरी कर के अपने परिवार को पालता है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कालोनी आई, लेकिन प्रधान शशि सिंह और उन के पति ने नहीं दी. शौचालय भी नहीं बनवाया. सेक्रेटरी के पास गया, कलेक्ट्रेट के चक्कर लगाए, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ.

प्रति बच्चा एक करोड़ मांगे

सुभाष बाथम ने एसओजी के सिपाही ललित से बात की और तमाम इलजाम लगाए. उस ने कहा कि एसओजी के सिपाही सचेंद्र व अनुज ने उसे चोरी के इलजाम में झूठा फंसाया, उसे मारापीटा, करेंट लगाया. उस ने मोहम्मदाबाद थाने के सिपाही लल्लू पर भी प्रताडि़त करने का आरोप लगाया.

मकान के अंदर से केवल सुभाष ही संवाद नहीं कर रहा था, बल्कि उस की पत्नी रूबी भी बात कर रही थी. गांव के एक युवक अमित ने जब रूबी से बात की तो उस ने धनाढ्य बनने की लालसा जाहिर की. उस ने प्रति बच्चा छोड़ने की कीमत एक करोड़ रुपया रखी.

कहा कि यदि अधिकारी 24 करोड़ रुपए देने को राजी हो जाएं तो वह सभी बच्चों को रिहा कर देगी. साथ ही उस ने सुभाष के खिलाफ चल रहे सभी मुकदमों को खत्म करने की भी शर्त रखी.

रात 11 बजे पुलिस ने भीड़ को खदेड़ कर सुभाष बाथम के घर की नाकेबंदी कर दी. इसी बीच सुभाष के एक परिचित अंशुल दुबे ने डीएम व एसपी की मौजूदगी में सुभाष से बात की. अंशुल ने सुभाष से कहा कि उस की कैद में 6 महीने की शबनम है. वह भूखीप्यासी होगी, उसे बाहर निकाल दे.

इस पर कुछ देर बाद उस ने मासूम शबनम को पीछे वाले कमरे की दीवार के छेद से अंशुल को थमा दिया. शबनम को उस की मां ने सीने से लगा लिया. उस की बेटी सोनम और बेटा लवकुमार अब भी सुभाष की कैद में थे. लगभग 7 घंटे बाद पहली बच्ची कैद से छूटी तो अधिकारियों को लगा कि शायद सुभाष और उस की पत्नी का रुख नरम पड़ रहा है.

इधर आईजी मोहित अग्रवाल लगभग 4 घंटे का सफर तय कर के रात साढ़े 12 बजे करथिया गांव पहुंचे. गांव पहुंचते ही उन्होंने औपरेशन मासूम की पहल शुरू कर दी. मोहित अग्रवाल एसओजी टीम के साथ सुभाष बाथम के मकान की छत पर पहुंचे और वहां का जायजा लिया.

फिर वह पड़ोस के मकान की छत पर पहुंचे और पूरी स्थिति को भांपा. उन्होंने छतों पर अत्याधुनिक हथियारों को लोड करा कर पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया और अलर्ट रहने को कहा. फिर उन्होंने सुभाष के घर का एक चक्कर लगा कर जायजा लिया.

इसी बीच सुभाष बाथम को महसूस हुआ कि पुलिस की गतिविधियां तेज हो रही हैं. उस ने दहशत फैलाने के लिए लगातार 2 फायर किए. दोनों फायरिंग में लगभग 10 सेकेंड का अंतराल था. आईजी मोहित अग्रवाल ने महसूस किया कि अगर सुभाष पर काबू पाना है तो औपरेशन को 10 सेकेंड में पूरा करना होगा. क्योंकि वह एक बार फायर करने के बाद 10 सेकेंड में हथियार लोड करता है.

उन्होंने यह भी देख लिया कि घर के अंदर जाने के 2 दरवाजे हैं. मुख्य दरवाजा सामने है जो लोहे का बना है, जबकि दूसरा मकान के पीछे था जो लकड़ी का था. तय हुआ कि जब सुभाष गोली चलाएगा, तभी पुलिस पीछे का दरवाजा तोड़ कर घर के अंदर दाखिल होगी और 10 सेकेंड के अंदर उसे पकड़ लेगी.

यह भी तय हुआ कि दरवाजा टूटने की भनक सुभाष और उस की पत्नी को न लगे, इसलिए कुछ स्थानीय युवकों को घर के सामने से पत्थरबाजी करने व शोर मचाने को कहा गया.

आईजी की रणनीति में फंसा सुभाष

सुभाष आईजी की इस रणनीति में फंस गया. कुछ देर बाद सुभाष ने जैसे ही गोली चलाई, पुलिस टीम ने पीछे का दरवाजा तोड़ा और घर के अंदर दाखिल हो गई. जब तक पुलिस सुभाष के सामने पहुंची, तब तक वह दोबारा गोली लोड कर चुका था. उस ने गोली चलाई जो आईजी मोहित अग्रवाल की बुलेटप्रूफ जैकेट में लगी. वार खाली जाते देख वह पत्नी रूबी के साथ गेट खोल कर बाहर की ओर भागा.

भीड़ ने रूबी को घेर लिया और मारोमारो कहते हुए उस पर टूट पड़ी. यह देख कर सुभाष घबरा गया और पीछे उसी कमरे की ओर भागा जहां बच्चे कैद थे. योजना के मुताबिक वहां पहले से ही पुलिस तैनात थी. पुलिस को देखते ही उस ने एसओजी प्रभारी दिनेश कुमार गौतम पर फायर कर दिया. इस बार भी उस की गोली बुलेटप्रूफ जैकेट में फंस गई.

सुभाष दोबारा फायर करने ही वाला था, तभी एसओजी के सिपाही नवनीत कुमार ने एके47 से सुभाष पर फायर झोंक दिया. वह घायल हो कर गिर पड़ा और मौके पर ही दम तोड़ दिया.

इधर भीड़ ने सुभाष की पत्नी रूबी को पीटपीट कर बुरी तरह घायल कर दिया. बड़ी मशक्कत के बाद पुलिस रूबी को भीड़ के चंगुल से छुड़ा पाई. उसे इलाज के लिए डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया. उस की हालत गंभीर होने के कारण डाक्टरों ने उसे सैफई रेफर कर दिया. लेकिन उस ने सैफई पहुंचने के पहले ही रास्ते में दम तोड़ दिया. पुलिस उस के शव को वापस ले आई.

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सुभाष बाथम ने कमरे के अंदर एक तहखाना बना रखा था, जिस में सभी बच्चे कैद थे. तहखाने का दरवाजा अंदर से बंद था. पुलिस ने दरवाजा पीटा और पुलिस की मौजूदगी का आभास कराया, इस पर अंजलि नाम की बालिका ने दरवाजा खोला. उस के बाद आईजी मोहित अग्रवाल ने सभी बच्चों को रिहा करा कर उन के मातापिता को सौंप दिया. अपने बच्चों को सहीसलामत पा कर उन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

पुलिस ने उस कमरे से एक मासूम को भी बरामद किया. यह मासूम औपरेशन के दौरान मारे गए सुभाष बाथम की एक वर्षीय पुत्री गौरी थी. आईजी मोहित अग्रवाल ने उसे गोद में लिया, दुलारा फिर महिला सिपाही रजनी को सौंप दिया.

अब तक एनएसजी टीम दिल्ली से आगरा पहुंच चुकी थी. टीम को औपरेशन मासूम सफल होने की जानकारी मिली तो टीम आगरा से वापस लौट गई. लखनऊ से रवाना एटीएस टीम भी औपरेशन पूरा होने के बाद ही पहुंच पाई.

आईजी (कानपुर जोन) मोहित अग्रवाल ने सभी बंधक बच्चों को सकुशल मुक्त कराने और अपराधी सुभाष बाथम के मारे जाने की जानकारी डीजीपी ओमप्रकाश सिंह, प्रमुख सचिव (गृह) तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दी, तो सभी के चेहरे खिल उठे. मुख्यमंत्री ने आईजी मोहित अग्रवाल को बधाई दी और उन की टीम को ईनामस्वरूप 10 लाख रुपए देने की घोषणा की.

31 जनवरी, 2020 की सुबह पौ फटते ही बच्चों को बंधक बनाने वाले सुभाष बाथम के मारे जाने तथा बच्चों के सकुशल मुक्त होने की खबर जंगल की आग की तरह फैली तो कई गांवों के लोग सुभाष का शव देखने के लिए उमड़ पड़े. चारों तरफ पुलिस जिंदाबाद के नारे लगने लगे.

एडीजी (कानपुर जोन) जे.एन. सिंह तथा कमिश्नर सुधीर एम. बोवडे भी घटनास्थल पर पहुंचे. उन्होंने भी पुलिस पार्टी की प्रशंसा की. इस के बाद सुभाष और उस की पत्नी रूबी के शवों को पोस्टमार्टम हाउस फर्रुखाबाद भेज दिया गया.

सुभाष बाथम के घर की तलाशी तथा विस्फोटक बरामदगी हेतु एएसपी त्रिभुवन सिंह की देखरेख में बम निरोधक टीम करथिया गांव पहुंची. बम निरोधक दस्ते ने सुभाष के घर की तलाशी ली तो तहखाने में 5 किलो के गैस सिलेंडर में विस्फोटक भरा मिला. साथ ही 4 बड़े तथा 4 छोटे बम भी मिले.

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इस के अलावा भारी मात्रा में बारूद, गंधक, पोटाश, बजरी और तार बरामद हुआ. तेज धमाके वाले 100 पटाखे व 30 अर्धनिर्मित बम भी बरामद हुए. घर में एक .315 बोर का तमंचा, एक राइफल, 20 खोखे और 2 दरजन से अधिक जिंदा कारतूस बरामद हुए. एक मोबाइल फोन भी बरामद हुआ.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दहशत के 11 घंटे : भाग 1

30 जनवरी, 2020 की शाम 4 बजे फर्रुखाबाद जिले के करथिया गांव में एक दहशतजदा खबर फैली. खबर यह थी कि गांव के ही सुभाष बाथम ने अपने घर में 2 दरजन मासूम बच्चों को बंधक बना लिया है. उस ने बच्चों को अपनी एक साल की बेटी गौरी के जन्मदिन पर खाने की चीजें देने के बहाने बुलाया था, जिस के बाद उन्हें कैद कर लिया.

जिस ने भी यह खबर सुनी, सुभाष के घर की ओर दौड़ पड़ा. कुछ ही देर में उस के घर के बाहर भीड़ जुटने लगी. सभी खौफजदा थे, लेकिन उन लोगों का हाल बेहाल था, जिन के जिगर के टुकड़े घर के अंदर कैद थे.

यह खबर तब फैली जब सुभाष बाथम के पड़ोस में रहने वाले आदेश बाथम की पत्नी बबली अपनी बेटी खुशी और बेटे आदित्य को बुलाने उस के घर पहुंची. उस ने सुभाष के घर का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उस ने दरवाजा खोलने से मना कर दिया. उस ने जब ज्यादा जिद की तो सुभाष बोला, ‘‘पहले गांव के लालू को बुला कर ला.’’

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बबली ने मना किया तो वह गालीगलौज करने लगा. बदहवास बबली अपने घर आई और अपने पति आदेश तथा अन्य घरवालों को बच्चों को बंधक बनाए जाने की जानकारी दी. उस के बाद यह खबर पूरे गांव में फैल गई.

बच्चों को बंधक बनाए जाने की खबर ग्रामप्रधान शशि सिंह और उन के पति हरवीर सिंह को मिली तो उन्होंने तत्काल डायल 112 को सूचना दी. खबर मिलते ही पीआरवी आ गई. पीआरवी के जवान जयवीर तथा अनिल ने सुभाष के घर का दरवाजा खटखटाया और कहा, ‘‘सुभाष, दरवाजा खोलो. तुम्हारी जो भी समस्या होगी, उस का निदान किया जाएगा, बच्चों को छोड़ दो.’’

लेकिन सुभाष बाथम ने दरवाजा नहीं खोला. परेशान हो कर दीवान जयवीर ने कोतवाली मोहम्मदाबाद को सूचना दी. इस पर कोतवाल राकेश कुमार पुलिस बल के साथ करथिया गांव आ गए. सुभाष के घर के बाहर ग्रामीणों की भीड़ जुटी थी. इंसपेक्टर राकेश कुमार ने अपना परिचय दे कर दरवाजा खोलने को कहा तो सुभाष बोला, ‘‘मैं ने बच्चों को बंधक बना लिया है, दरवाजा तभी खुलेगा जब डीएम, एसपी और विधायक यहां आएंगे.’’

इसी के साथ सुभाष ने गोली चलानी शुरू कर दी. इतना ही नहीं, उस ने अंदर से हैंडग्रैनेड भी फेंका, जिस से इंसपेक्टर राकेश कुमार, दरोगा संजय सिंह, दीवान जयवीर और सिपाही अनिल कुमार घायल हो गए.

इंसपेक्टर राकेश कुमार को समझते देर नहीं लगी कि मामला बेहद गंभीर है. चूंकि घर के अंदर 2 दरजन बच्चे बंधक थे, ऐसे में बिना बड़े अधिकारियों के आदेश से कोई कदम नहीं उठाया जा सकता था.

दूसरी बात बच्चों को बंधक बनाने वाला सुभाष खुद भी एसपी, डीएम और विधायक को बुलाने की मांग कर रहा था. राकेश कुमार ने तत्काल पुलिस अधिकारियों, डीएम तथा क्षेत्रीय विधायक को फोन कर के घटना की सूचना दी और तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने को अनुरोध किया.

आपात जैसी स्थिति और मासूम बच्चे

चूंकि मामला मासूम बच्चों को बंधक बनाने का था, इसलिए सूचना मिलते ही शासनप्रशासन में हड़कंप मच गया. एसपी डा. अनिल कुमार मिश्र, एएसपी त्रिभुवन प्रताप सिंह तथा सीओ (मोहम्मदाबाद) राजवीर सिंह करथिया गांव आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फर्रुखाबाद जिले के कई थानों की फोर्स बुलवा ली. जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह तथा भोजपुर विधायक नागेंद्र राठौर भी सूचना पा कर करथिया गांव आ गए.

एसपी डा. अनिल कुमार मिश्र ने गांव वालों से जानकारी जुटाई तो पता चला सुभाष के घर एक साल से ले कर 13 साल तक के 24 बच्चे बंधक हैं. सुभाष बाथम की पत्नी रूबी और उस की एक वर्षीया बेटी गौरी भी घर के अंदर थीं.

गांव के जिन मासूमों को बंधक बनाया गया था, उन में आर्बी पुत्री आनंद, रोशनी पुत्री सत्यभान, अरुण, अंजलि, लवी पुत्र नरेंद्र, भानु पुत्र मदनपाल, खुशी, मुसकान, आदित्य पुत्र आदेश विनीत पुत्र रामकिशोर, पायल, प्रिंस पुत्र नीरज, प्रशांत, नैंसी पुत्री राकेश, आकाश, लक्ष्मी पुत्री ब्रजकिशोर, अक्षय पुत्र अरुण, गौरी पुत्री लालजीत, लवकुमार, सोनम, शबनम और गुगा, जमुना पुत्री आशाराम शामिल थे.

इन बच्चों में सब से बड़ी नरेंद्र की बेटी अंजलि थी जो 13 वर्ष की थी. जबकि सब से छोटी शबनम 6 महीने की थी. पुलिस अधिकारियों ने सुभाष बाथम को समझाया, साथ ही आश्वासन दिया कि उस की जो भी डिमांड होगी, पूरी की जाएगी. वह बच्चों को रिहा कर दे, वे भूखप्यास से तड़प रहे होंगे.

इस पर सुभाष ने घर के अंदर से धमकी दी कि अगर पुलिस ने उस के घर में घुसने की जुर्रत की तो वह पूरे घर को बारूद से उड़ा देगा. सारे बच्चे मारे जाएंगे, क्योंकि उस के पास 32 किलो बारूद है. इस चेतावनी के बाद पुलिस पीछे हट गई. पुलिस अधिकारी सूझबूझ से काम ले रहे थे ताकि शातिर बाथम कोई खुराफात न कर बैठे.

इस बीच विधायक नागेंद्र सिंह राठौर आगे आए. उन्होंने पुलिस अधिकारी से माइक ले कर सुभाष से बात करने का प्रयास किया तो उस ने उन्हें निशाना बना कर फायर झोंक दिया. इस हमले में विधायक बालबाल बचे. उस ने विधायक को वापस चले जाने को कहा. इस के बाद वह पीछे हट गए.

इधर पुलिस अधिकारियों को पता चला कि गांव का अनुपम दुबे सुभाष का मित्र है. वह उस के साथ उठताबैठता है. चोरी के एक मामले में उस ने सुभाष को जमानत पर रिहा कराया था. यह भी पता चला कि सुभाष की पत्नी रूबी की पड़ोसन विनीता से पटरी बैठती है. संभव है कि इन दोनों के समझाने पर सुभाष मान जाए और बच्चों को रिहा कर दे. पुलिस अधिकारियों ने अनुपम दुबे और विनीता को मौके पर बुलवा लिया और सुभाष को समझाने का अनुरोध किया.

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अनुपम दुबे के आवाज देने पर सुभाष मुख्य दरवाजे पर आ कर उस से बात करने लगा. उस ने कहा कि गांव वालों ने उसे चोरी के झूठे इलजाम में फंसाया था, अब भुगतो. जब अनुपम दुबे उसे समझाने लगा तो सुभाष गुस्से में आ गया. उस ने दरवाजे के नीचे अनुपम पर फायर कर दिया.

गोली अनुपम के पैर में लगी और वह तड़पने लगा. उसी समय विनीता हिम्मत जुटा कर आगे बढ़ी और रूबी को ऊंची आवाज में पुकारने लगी. रूबी तो सामने नहीं आई लेकिन सुभाष ने विनीता पर भी फायर झोंक दिया. वह भी घायल हो कर तड़पने लगी. पुलिस ने तत्काल दोनों को इलाज के लिए डा. राममनोहर लोहिया अस्पताल भेजा.

अब तक क्यूआरटी और एसओजी टीम भी घटनास्थल पर आ गई थीं. फोर्स ने आते ही सुभाष के घर को चारों ओर से घेर कर मोर्चा संभाल लिया. पुलिस ने कई बार घर के अंदर घुसने का प्रयास किया, लेकिन बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए पीछे हट जाती. सुभाष घर के अंदर से संवाद भी करता जा रहा था और गोली भी चला रहा था. कभी वह बच्चों के लिए बिसकुट की डिमांड करता तो कभी मीडिया वालों को बुलाने की बात करता.

पुलिस अधिकारी बराबर सुभाष के घर की टोह ले रहे थे. लेकिन उन्हें बच्चों के रोनेचिल्लाने या बोलने की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी. जबकि घर के अंदर 1-2 नहीं बल्कि 24 बच्चे कैद थे. बच्चों की आवाज न आने से पुलिस अधिकारी परेशान थे.

डर के बावजूद तमाशा जारी था

बच्चों के बंधक बनाए जाने की खबर पा कर मीडियाकर्मियों का भी जमावड़ा शुरू हो गया था. न्यूज चैनलों ने खबर का सीधा प्रसारण शुरू कर दिया, जिस से उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में खलबली मच गई. चैनलों की बे्रकिंग न्यूज लोगों की धड़कनें बढ़ा रही थीं. सभी के मन में जिज्ञासा थी कि बंधक बनाए गए बच्चों के साथ क्या होने वाला है.

करथिया गांव के अलावा पासपड़ोस के दरजनों गांवों में भी खबर फैल गई थी, सुन कर गांवों के हजारों लोग वहां आ गए. गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था. पुलिस के लिए भीड़ को संभालना मुश्किल होता जा रहा था. भीड़ के कारण पुलिस के काम में बाधा आ रही थी. भीड़ को रोकने के लिए पुलिस बीचबीच में बल भी प्रयोग कर रही थी.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रयागराज, गोरखपुर के कार्यक्रमों में शिरकत कर लखनऊ लौटे तो उन्हें फर्रुखाबाद के करथिया गांव में 2 दरजन मासूम बच्चों के बंधक बनाए जाने की जानकारी हुई. उन्होंने फर्रुखाबाद के एसपी व डीएम को फटकार लगाई, फिर औपरेशन मासूम के नाम पर उच्चस्तरीय बैठक की.

इस बैठक में प्रमुख सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी, डीजीपी ओमप्रकाश सिंह और एडीजी (ला ऐंड और्डर) पी.वी. राम शास्त्री ने भाग लिया. योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों से बच्चों को सुरक्षित निकालने का आदेश दिया. उन्होंने कहा कि बच्चों को सुरक्षित बचाना हमारी प्राथमिकता है. किसी के शरीर पर खरोंच भी नहीं आनी चाहिए.

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मुख्यमंत्री का आदेश पाते ही डीजीपी ओमप्रकाश सिंह ने औपरेशन मासूम की कमान आईजी (कानपुर जोन) मोहित अग्रवाल को सौंपी और उन्हें तत्काल करथिया गांव रवाना कर दिया. एडीजी (ला ऐंड और्डर) पी.वी. राम शास्त्री ने एटीएस टीम को तुरंत करथिया गांव भेजा. अधिकारी डीजीपी औफिस से औपरेशन मासूम की मौनिटरिंग करने लगे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दहशत के 11 घंटे

आखिर क्यों खेसारीलाल यादव ने मुंबई पहुंच कर मांगी प्रशंसकों से माफी, देखें Video

फिल्म कलाकारों का कोई जवाब नहीं. यहां अपने हर काम में अपने प्रचार का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं. इतना ही नहीं हर कलाकार अपने प्रचार और लोगों की नजर में बने रहने के लिए कुछ भी करते रहते हैं. 2 दिन पहले सलमान खान (Salman Khan) के पद चिन्हों पर चलते हुए भोजपुरी गायक और अभिनेता खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) ने अपने गांव के खेत पर धान की रोपाई करने का वीडियो वायरल किया था. अब दो दिन बाद ही उन्होंने मुंबई पहुंच कर अपने प्रशंसकों से माफी मांगते हुए एक नया वीडियो जारी किया है.

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खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) के इस वीडियो को जारी करने के पीछे उनकी सोच यह है कि पिछले कुछ दिनों से जब अपने गांव में खेतों के तमाम प्रशंसक हर दिन उनसे मिलने उनके घर आया करते थे, आज जब खेसारी लाल यादव स्वयं मुंबई पहुंच गए हैं, तो भी उनके प्रशंसक उनके गांव के उनके घर पर उनसे मिलने के लिए आ रहे हैं और निराश होकर वापस जा रहे हैं. इसी संदर्भ में खेसारीलाल ने एक वीडियो जारी किया और कहा, ‘मैं धान रोपने के बाद एक बेहद जरूरी काम से मुंबई आ गया हूं.आपके आ रहे फोन से पता चला कि आप लोग मुझसे मिलने मेरे गांव आ रहे हैं. तो आप सभी से कहना चाहूंगा कि बिहार में लॉक डाउन है. आप लॉक डाउन के नियमों का पालन करें. अभी मेरे घर पर न आयें, क्‍योंकि आप परेशान होंगे जब मैं नहीं मिलूंगा. क्योंकि मैं अभी मुंबई आ गया हूं. मैं जब फिर गांव आउंगा, तब तक आप अपने घरों में ही रहें. इसके लिए मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूं.”

इतना ही नहीं खेसारी लाल यादव (Khesari Lal Yadav) ने इस वीडियो में अपने खेती के अनुभव को शेयर करते हुए कहा कि लोग आज खेती से दूर हैं. दूसरी जगहों पर जाकर काम कर रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि हमें अपने जड़ों को भूलना नहीं चाहिए. खेती किसानी ने ही हमें बनाया है. यह हमारे मां – बाप की तरह है. इसलिए हम कितने भी बड़े क्‍यों न हो जायें, हमें अपने से जुड़कर रहना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि जय जवान,जय किसान, जय विज्ञान  यह तीनों चीज हमारे जीवन के सूत्रधार हैं.किसान बनना सौभाग्‍य का बात है. हम आज भले ही आप लोगों के लिए एक गायक और कलाकार हों, पर मैं स्वयं को आप लोगों के बीच का इंसान मानता कलाकार व गायक बनने से पहले  मैं भी खेती किया था. इतना ही नहीं इस बार गांव में रहते हुए जब मैंने धान की रोपाई की तो आनंद की अनुभूति हुई.”

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बॉलीवुड स्टार रणबीर कपूर के हमशक्ल का हुआ निधन, पढ़ें खबर

बॉलीवुड इंडस्ट्री के जाने माने एक्ट्रेस रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor) ने कड़ी मेहनत और एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में कर अपनी कमाल की फैन फौलोविंग हासिल कर ली है और आज की तारीख में दुनिया और खासकर की लड़कियां इस चॉकलेटी बॉय यानी कि रणबीर कपूर की दीवानी हैं. हाल ही में मिली एक जानकारी के अनुसार रणबीर कपूर के हमशक्ल जुनैद शाह (Junaid Shah) अब इस दुनिया में नहीं रहे.

 

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इसी के चलते सोशल मीडिया पर एक के बाद एक जुनैद शाह (Junaid Shah) के फैंस उनको श्रधांजिली दे रहे हैं. आपको बता दें कि जुनैद शाह की मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) से हुआ है. जुनैद का निधन शुक्रवार को इलाहीबाग श्रीनगर में उनके घर पर ही हुआ. जुनैद शाह के बारे में रणबीर कपूर के पिता ऋषि कपूर (Rishi Kapoor) ने भी ट्वीट किया था.

ऋषि कपूर (Rishi Kapoor) ने अपने ट्वीट में जुनैद शाह के बारे में लिखा कि, “OMG. My own son has a double!!! Promise cannot make out. A good double”. जुनैद शाह की मौत की जानकारी कश्‍मीरी पत्रकार यूसुफ जमील ने ट्वीट के जरिए दी और कहा, “Our old neighbor Nissar Ahmed Shah’s son Junaid passed away due to massive cardiac arrest overnight. People say he was a lookalike of Bollywood actor Ranbir Kapoor.I say he was a big hope, strength & salvation of his ailing father and his mother & that of whole Kashmir. Magfirah!”

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दरिंदगी की इंतहा

फर्जी फेसबुक आईडी का “डंडा”

सोशल मीडिया के अभिनव आगाज के बाद, जहां एक तरफ लोगों को इस माध्यम के द्वारा अपनी बात कहने का मौका मिल रहा है, खुशियां मिल रही है. वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों द्वारा इसका अवैध इस्तेमाल लोगों की परेशानी का सबब बनता जा रहा है. खासकर महिलाएं,युवतियां इसका शिकार हो रही है. क्योंकि कुछ विकृत मानसिकता के लोग फर्जी आईडी बनाकर महिलाओं को परेशान हलाकान करने का काम कर रहे हैं. मगर यही हरकत उनके लिए कब पुलिस और कानून का डंडा बन जाती है, उन्हें पता ही नहीं चलता.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर चौकी अंतर्गत प्रार्थिया ने पुलिस के पास शिकायत की  कि उसका फर्जी “फेसबुक आईडी” बनाकर अज्ञात व्यक्ति बदनाम करने के लिए लोगों को मैसेंजर के माध्यम से अश्लील मैसेज व उसकी फोटो भेज रहा है. युवती ने इसके लिए ग्राम पंचायत बरती कला के सत्येंद्र नाथ पांडे पर शंका जाहिर की, क्योंकि पूर्व में उस शख्स ने उसके साथ धोखाधड़ी की थी.

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छत्तीसगढ़ में घटित कुछ ऐसी ही घटनाएं जो बताती है कि किस तरह आज समाज में या विकृति सामने आ रही है-

प्रथम मामला- राजधानी रायपुर में एक व्यक्ति ने कुछ महिलाओं के नाम से फर्जी फेसबुक बनाएं और लोगों को आकर्षित करने लगा. सामाजिक विद्वेष फैलाने का काम इतना पुरजोर हो चला कि सामाजिक विद्वेष फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया.

दूसरा मामला- राजनांदगांव में एक संभ्रांत युवती के नाम से फर्जी फेसबुक अकाउंट बनाकर अश्लील फोटो अपलोड करने के आरोप में एक शख्स जेल चला गया. पुलिस के अनुसार वह युवती से प्रेम करता था और विकृत मानसिकता का था.

तीसरा मामला- छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी बिलासपुर के करबला में एक शख्स ने एक महिला का फर्जी आईडी फेसबुक बनाया महिला को जानकारी मिलने पर पुलिस में शिकायत के पश्चात उस पर कार्रवाई की गई.

ऐसे ही कितने मामले इन दिनों प्रकाश में आ रहे हैं जो यह बताते हैं कि “सोशल मीडिया” के इस समय काल में लोग किस तरह कानून को अपने हाथों में लेने का अपराध कर रहे  हैं और “कानून का डंडा” उन पर कैसे बरस रहा है.

 बदनाम करने के ध्येय का फल

कुछ लोग स्वयं को बहुत चतुर समझते हैं और सोचते हैं कि वह कानून को अपने हाथ में लेंगे तो उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. इसी मानसिकता और नासमझी के कारण अक्सर लोग कानून को अपने हाथों में ले लेते हैं. आजकल सोशल मीडिया में इसका प्रयोग ज्यादा हो रहा है. लोग आपसी दुश्मनी- खुन्नस भांजने के लिए आमतौर पर फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे ही घटना छत्तीसगढ़  में  घटित हुई चौकी वाड्रफनगर में उपरोक्त अपराध पर विवेचना करते हुए जिला पुलिस अधीक्षक रामकृष्ण साहू के निर्देशन व एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल के नेतृत्व में टीम गठित कर साइबर सेल की मदद से पतासाजी करते हुए अंततः आरोपी सत्येंद्र नाथ पांडये को धर दबोचा.

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पुलिसिया पूछताछ मे आरोपी ने स्वीकार किया कि उसने  फर्जी आईडी बनाकर युवती को बदनाम किया. जिस पर चौकी वाड्रफनगर में अपराध क्रमांक 87 2020 धारा 354 क भादवि और 66, 67 व 67 क आईटी एक्ट के तहत मामला पंजीबद्ध कर आरोपी सतेंद्र नाथ पांडेय को जेल भेज दिया . सबसे सोचनीय बात यह है कि आरोपी के खिलाफ पूर्व में भी जिले के थानों में प्रकरण दर्ज हैं. यहां यह कहना भी समीचीन होगा कि यह अपराधिक प्रकरण बताते हैं कि लोगों को सावधान हो जाना चाहिए और सोशल मीडिया का दुरुपयोग कदापि नहीं करना चाहिए.

दरिंदगी की इंतहा : भाग 2

खैर, अगली सुबह यानी 16 दिसंबर, 2019 की सुबह रहस्यमय तरीके से जली हुई माही की लाश उस के कमरे में पाई गई थी. दरअसल, रात में उस के पिता संजीव कुमार फोन कर के उस का हालचाल लेना चाहते थे. चूंकि दिन में कालेज का रिजल्ट आ चुका था. वह कालेज तक उस के साथ गए भी थे, इसलिए वह फोन कर उसे घर आने के लिए कहना चाहते थे. लेकिन उस का फोन नहीं लग रहा था.

फोन बारबार स्विच्ड औफ बता रहा था. बेटी का फोन स्विच्ड औफ होने से वह परेशान हो गए. रात भी काफी गहरा चुकी थी, इसलिए किसी और के पास फोन भी नहीं कर सके थे, जिस से माही का हालचाल मिल पाता. अगली सुबह जब सदर थाने के थानेदार बांकेलाल का फोन उन के पास पहुंचा तो बेटी की मौत की सूचना पा कर संजीव सकते में आ गए.

केस की जांच पर निगाह रखे था राहुल

बेटी की मौत की सूचना मिलते ही घर में कोहराम मच गया था. परिवार के लोगों को साथ ले कर संजीव रांची पहुंचे. शराफत का चोला पहने दरिंदा राज भी अपने दोस्त बंटी के साथ घटनास्थल पर पहुंचा था.

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वहां पहुंच कर वह यह जानना चाहता था कि पुलिस क्या काररवाई कर रही है. तब उस के दोस्त बंटी ने उस के सामने ही अज्ञात दरिंदे को भद्दीभद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं तो राज ने बंटी को समझाया कि किसी को भी इस तरह गालियां देना ठीक नहीं है.

उस दिन के बाद से वह बंटी से पुलिस की गतिविधि पूछता था कि माही के हत्यारों तक पुलिस पहुंची या नहीं. उस के केस में क्या हो रहा है. यह बात बंटी को बड़ी अटपटी लगती थी कि राहुल उर्फ राज माही के केस में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है.

बहरहाल, पुलिस ने अपनी काररवाई कर माही की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट पढ़ कर थानाप्रभारी बांकेलाल दंग रह गए. रिपोर्ट में बताया गया था कि पहले पीडि़ता के साथ बलात्कार किया गया था, फिर किसी पतले तार से गला कस कर उस की हत्या की गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद पुलिस ने अज्ञात हत्यारे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 376, 499, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की छानबीन शुरू कर दी. घटना के करीब 6 महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस जहां की तहां खड़ी रही. न तो वह हत्या का कारण जान सकी और न ही हत्यारों का पता लगा पाई.

माही हत्याकांड को ले कर रांची समेत समूचे झारखंड में बवाल मचा हुआ था. पुलिस की कार्यप्रणाली पर लोग अंगुलियां उठा रहे थे. पीडि़ता के पिता संजीव ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की. यह आवाज प्रदेश सरकार के कान तक पहुंची तो सरकार ने जांच सीबीआई से कराने की अनुशंसा कर दी.

जब मामला सीबीआई के पास पहुंचा तो सीबीआई के तेजतर्रार इंसपेक्टर परवेज आलम के नेतृत्व में पुलिस टीम बनाई गई. टीम में एसआई नीरज कुमार यादव, कांस्टेबल प्रभात कुमार, आरिफ हुसैन, नैमन टोप्पो, अशोक कुमार, रितेश पाठक, महिला सिपाही जूही खातून आदि को शामिल किया गया.

इंसपेक्टर परवेज आलम झारखंड पुलिस में सन 1994 में एसआई पद पर भरती हुए थे. वह ड्यूटी मीट के ओवरआल चैंपियन भी रह चुके थे. झारखंड पुलिस में उन का डीएसपी पद पर प्रमोशन हो चुका था. फिर भी सीबीआई में इंसपेक्टर थे.

इंसपेक्टर परवेज आलम ने माही का केस लेने के बाद झारखंड पुलिस द्वारा दिए गए दस्तावेजों व साक्ष्यों का पूरा अध्ययन किया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों से पूरी रिपोर्ट पर चर्चा की. डाक्टरों ने सीबीआई को बताया कि मृतका के नाखूनों और वैजाइनल स्वैब राज्य विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए हैं. इंसपेक्टर परवेज आलम ने एफएसएल की रिपोर्ट में पाया कि नाखून व वैजाइनल स्वैब में केवल एक ही पुरुष होने के सबूत मिले हैं.

इस से जांच टीम आश्वस्त हो गई थी कि केवल एक ही व्यक्ति ने इस घटना को अंजाम दिया है. घटना की तह तक जाने के लिए इंसपेक्टर परवेज आलम ने अपने अधिकारियों से बूटी बस्ती में रहने की इजाजत मांगी.

सीबीआई मुख्यालय के आदेश पर परवेज आलम अपनी टीम के साथ बूटी बस्ती में किराए पर कमरा ले कर रहने लगे. वहीं रह कर वह गुप्त तरीके से हत्यारोपी के बारे में छानबीन करने में जुट गए. बूटी बस्ती की रहने वाली एक बूढ़ी महिला ने उन्हें बताया कि एक युवक यहां अकसर घूमता था, जो मंदिर परिसर के एक कमरे में रहता था. वह अब दिखाई नहीं दे रहा.

इंसपेक्टर आलम के लिए यह सुराग महत्त्वपूर्ण साबित हुआ. इसी सुराग के आधार पर उन्होंने 300 से अधिक लोगों के काल डंप डाटा के आधार पर छानबीन की. जांच में पता चला कि उन में से करीब 150 फोन नंबर घटनास्थल के आसपास के हैं, उन में कुछ नंबर मृतका के संबंधियों और दोस्तों के भी थे.

सीबीआई ने शक के आधार पर 150 संदिग्धों में से 11 लोगों के खून के नमूने ले कर जांच के लिए केंद्रीय विधिविज्ञान प्रयोगशाला, दिल्ली भेजे. इस बीच सीबीआई राहुल के दोस्त बंटी तक पहुंच गई. बंटी से उस संदिग्ध युवक यानी राज के बारे में पूछताछ की गई जो मंदिर के पास अकसर घूमता था.

बंटी ने बताया कि उस का नाम राहुल उर्फ राज है. वह बिहार के नालंदा जिले के एकंगर सराय के गांव धुर का रहने वाला है. इंसपेक्टर परवेज आलम की मेहनत रंग लाई. उन्हें संदिग्ध युवक राहुल उर्फ राज का पता मिल चुका था. वह टीम के साथ नालंदा स्थित उस के घर जा पहुंचा. वहां से पता चला कि राहुल फरार है.

परवेज आलम ने एकएक तथ्य जुटाया

वहां उन्हें एक और चौंकाने वाली बात पता चली कि राहुल दुष्कर्म के आरोप में पटना की बेउर जेल में बंद था. चाचा की मौत पर वह जेल से पैरोल पर घर आया था और चकमा दे कर पुलिस हिरासत से भाग गया था. तब से वह फरार है. इस के बाद सीबीआई की टीम ने राहुल की मां निर्मला देवी व पिता उमेश प्रसाद को बुलाया.

संदिग्ध आरोपी राहुल उर्फ राज की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने उस के मातापिता के खून के नमूने लिए और जांच के लिए केंद्रीय विधिविज्ञान प्रयोगशाला दिल्ली भेज दिए. वहां माही के नाखून व वैजाइनल स्वैब से मिले पुरुष के डीएनए से संदिग्ध आरोपी राहुल उर्फ राज की मां निर्मला देवी का डीएनए मैच कर गया. जबकि पिता उमेश प्रसाद का मैच नहीं किया.

डीएनए रिपोर्ट के आधार पर यह तय हो गया कि माही का कातिल राहुल उर्फ राज ही है. राहुल उर्फ राज की तलाश में सीबीआई ने कोलकाता, वाराणसी सहित कई जगहों पर छापेमारी की, लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं चला.

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इसी बीच 15 जून, 2019 को राहुल उर्फ राज लखनऊ में मोबाइल चोरी के एक केस में पकड़ा गया. सीबीआई इंसपेक्टर परवेज आलम राहुल के पीछे पड़े ही थे. उन्हें उस की गिरफ्तारी की सूचना मिली, तो वह लखनऊ पहुंच गए. वहां से राहुल उर्फ राज को ट्रांजिट रिमांड पर 22 जून, 2019 को रांची लाया गया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने माही हत्याकांड की पूरी कहानी बयां कर दी.

राहुल ने सीबीआई को बताया कि पटना में 11 साल की नेहा से दुष्कर्म करने के मामले में वह पकड़ा गया था. तभी उसे पता चला नेहा के अंडरगारमेंट में उस का सीमेन मिला था, जिस से वह पकड़ा गया था. सीख लेते हुए उस ने माही से दुष्कर्म के बाद उस के कपड़े जला दिए थे.

यही नहीं, उस ने फरारी के दौरान इसी जिले की अगस्त 2018 की एक घटना का भी राजफाश किया. जिस घर में वह चोरी की नीयत से घुसा तो वहां 9 वर्षीय सोनी को अकेली सोता देख कर वह उस पर टूट पड़ा. बेटी की चीख सुन कर मां के बेटी के कमरे में आ जाने से सोनी की अस्मत लुटने से तो बच गई लेकिन उस दिन की घटना के बाद से वह आज तक सदमे से उबर नहीं पाई है.

सीबीआई की पूछताछ में क्रूर दरिंदे राहुल उर्फ राज ने कबूल किया कि उस ने हर घटना में अपना नाम बदल कर अपराध किया था. अब तक उस ने 10 मासूमों की जिंदगी तबाह की थी, जिस में कई तो असमय काल का ग्रास बन गई थीं और कई विक्षिप्त अवस्था में पहुंच गई थीं.

बहन ने पहचाना दरिंदे को

राहुल उर्फ राज की शिनाख्त माही की बड़ी बहन रवीना से कराई गई तो उस ने आरोपी राहुल उर्फ राज को देख कर शिनाख्त कर ली. रवीना से इस मामले में अदालत में गवाही दर्ज कराई. रवीना ने अदालत को बताया कि घटना के कुछ दिन पहले राहुल किराए का कमरा लेने के लिए उस के घर आया था.

हम ने उसे कमरा देने से मना कर दिया था. उस दिन के बाद कई बार अहसास हुआ कि राहुल उस की बहन का पीछा करता है. घटना से पहले उसे घर के आसपास घूमते हुए भी देखा था. जबकि घटना के बाद से उसे कभी नहीं देखा गया.

इस केस के जांच अधिकारी इंसपेक्टर परवेज आलम ने सूक्ष्मता से एकएक सबूत जुटाया. फिर विशेष अदालत में चार्जशीट पेश की. जज ए.के. मिश्र ने सजा सुनाए जाने से पहले केस की फाइल पर नजर डाली. तभी शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि योर औनर, मुजरिम राहुल कुमार ने जो अपराध किया है, वह रेयरेस्ट औफ रेयर है. ऐसे व्यक्ति का समाज में रहना ठीक नहीं है. यह समाज के लिए जहर के समान है. ऐसे पेशेवर अपराधी को फांसी की सजा देनी चाहिए.

तभी बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि मुजरिम राहुल को अपने किए पर पछतावा है, इसलिए उसे सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए. उन्होंने उसे कम से कम सजा सुनाए जाने की अपील की.

दोनों वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज ए.के. मिश्र ने कहा कि कटघरे में खड़ा यह अपराधी समाज के लिए एक कलंक है. इस ने योजनाबद्ध तरीके से घटना को अंजाम दिया था. इस के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है. इस का अपराध रेयरेस्ट औफ रेयर है. इसलिए इसे मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए.

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फैसला सुनाने के बाद पुलिस ने मुजरिम राहुल कुमार को हिरासत में ले कर जेल भेज दिया. वहीं फैसला आने के बाद कोर्ट में मौजूद मृतका के पिता संजीव कुमार घटना को याद कर रोने लगे. उन्होंने कहा कि फांसी की सजा भी अपराधी के लिए कम ही है, परंतु संतोष है कि अदालत ने न्याय किया है. इस प्रकार के फैसले से समाज को शुभ संदेश जाएगा.

कथा में माही, नेहा और सोनी परिवर्तित नाम हैं.

दरिंदगी की इंतहा : भाग 1

झारखंड की राजधानी रांची स्थित सीबीआई कोर्ट के जज ए.के. मिश्र की अदालत में 22 दिसंबर, 2019 को कुछ ज्यादा ही भीड़ थी. वकीलों के अलावा कुछ अन्य लोग भी अदालत की काररवाई शुरू होने से पहले कोर्टरूम में पहुंच चुके थे. अदालत परिसर में तमाम मीडियाकर्मी भी थे.

दरअसल, उस दिन रांची के बहुचर्चित बीटेक की छात्रा माही हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. करीब 3 साल पहले हुई हत्या की यह वारदात काफी दिनों तक मीडिया की सुर्खियों में रही थी. जब थाना पुलिस इस केस को नहीं खोल सकी तो यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था.

सीबीआई इंसपेक्टर परवेज आलम की टीम ने लंबी जांच के बाद न सिर्फ इस केस का परदाफाश किया, बल्कि आरोपी राहुल कुमार उर्फ राहुल राज उर्फ आर्यन उर्फ रौकी राज उर्फ अमित उर्फ अंकित को भी गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की.

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पता चला कि रेप की वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी फरार हो जाता था या नाम बदल कर कहीं दूसरी जगह रहने लगता था. इस तरह वह एकदो नहीं, बल्कि 10 लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बना चुका था. एक तरह से वह साइको किलर बन चुका था.

इस वहशी दरिंदे के खिलाफ सीबीआई की विशेष अदालत में केस चल रहा था. सीबीआई की ओर से इस मामले में 30 गवाह पेश किए गए थे. जज ए.के. मिश्र ने तमाम गवाह और सबूतों के आधार पर 30 अक्तूबर, 2019 को छात्रा माही हत्याकांड में आरोप तय करते हुए राहुल कुमार को दोषी ठहराया. उन्होंने सजा सुनाए जाने के लिए 22 दिसंबर, 2019 का दिन निश्चित किया.

सीबीआई की विशेष अदालत में 22 दिसंबर को जितने भी लोग बैठे थे, उन सभी के दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि जज साहब साइको किलर राहुल कुमार को क्या सजा सुनाएंगे. इस वहशी दरिंदे ने जिस तरह कई लड़कियों की जिंदगी तबाह की थी, उसे देखते हुए उन्हें उम्मीद थी कि उसे फांसी की सजा दी जानी चाहिए.

राहुल कुमार कौन है और वह कामुक दरिंदा कैसे बना, यह जानने के लिए उस के अतीत को जानना होगा.

25 वर्षीय राहुल कुमार बिहार के नालंदा जिले के एकंगर सराय थाना क्षेत्र के गांव धुर का रहने वाला था. उस के पिता उमेश प्रसाद पेशे से आटो चालक थे. 3 भाईबहनों में राहुल सब से बड़ा था.

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं. ऐसा ही कुछ राहुल के साथ भी हुआ. बचपन से ही राहुल जिद्दी और झगड़ालू किस्म का था. वह एक बार जो करने की ठान लेता था, उसे पूरा कर के ही मानता था. इस दौरान वह किसी की भी नहीं सुनता था. मांबाप की डांटफटकार का भी उस पर कोई असर नहीं होता था.

राहुल जैसेजैसे बड़ा होता गया, उस की संगत आवारा किस्म के लड़कों से होती गई. घर से उस का मतलब केवल 2 वक्त की रोटी से होता था. जब उस के पिता उमेश प्रसाद आटो ले कर शहर की ओर निकलते, वह भी घर से निकल जाता था. फिर दिन भर आवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता था.

बचपन से ही जिद्दी आवारा था राहुल

मटरगश्ती करने के लिए वह मां से जबरन पैसे लिया करता था. अगर मां उसे पैसे नहीं देती तो वह लड़झगड़ कर पैसे छीन लेता था. दिन भर दोस्तों के बीच घूमनेफिरने के बाद वह शाम ढलने पर घर लौटता था.

घर का वह एक काम तक नहीं करता था, रात को जब आटो चला कर उमेश प्रसाद घर लौटता तो उस की पत्नी राहुल की दिन भर की शिकायतों की पोटली खोल कर बैठ जाती. उमेश राहुल को डांटता और समझाता, पर पिता की बातों को वह अनसुना कर देता. ऐसे में उमेश माथे पर हाथ रख कर चिंता में डूब जाता.

उमेश प्रसाद ने राहुल को समझाने और सही राह पर लाने के बहुत उपाय किए, लेकिन राहुल सुधरने के बजाए दिनबदिन जरायम की दलदल में उतारता गया. शुरुआत उस ने अपने घर के पैसे चुराने से की थी. इस के बाद उस ने औरों के घरों में भी चोरी करनी शुरू की. भेद न खुलने पर उस की हिम्मत बढ़ती गई. चोरी के साथसाथ राहुल लड़कियों को अपनी हवस का शिकार भी बनाने लगा.

बात सन 2012 की है. राहुल ने पटना के जीरो रोड पर स्थित एक घर में चोरी की. इतना ही नहीं, उस ने वहां एक युवती को अपनी हवस का शिकार भी बनाया. युवती से दुष्कर्म के मामले में 29 जून, 2012 को उसे बेउर जेल भेजा गया. जब वह जेल में था, तभी उस के चाचा की मौत हो गई. श्राद्धकर्म में शामिल होने के लिए वह 4 सितंबर, 2016 को पैरोल पर अपने गांव गया, उस समय वह पुलिस की सुरक्षा में था.

श्राद्धकर्म के बाद शातिर राहुल ने सिपाहियों को शराब पिलाई और अनुष्ठान का बहाना बना कर फरार हो गया. इस के बाद पुलिस उसे छू तक नहीं सकी. पुलिस अभिरक्षा से फरार होने के बाद उस ने जो कांड किया, उस ने समूचे झारखंड को हिला कर रख दिया.

राहुल नालंदा से भाग कर रांची आ गया था और वहां वह नाम बदल कर राज के नाम से रहने लगा. राहुल हर बार जुर्म करने के बाद अपना नाम बदल लेता था, ताकि पुलिस उस तक आसानी से न पहुंच सके. खैर, वह राहुल से राज बन कर रांची की बूटी बस्ती में पीतांबरा पैलेस के सामने वाली गली में स्थित दुर्गा मंदिर के कमरे में रहने लगा. यहां उस ने मंदिर कमेटी के पदाधिकारियों से आग्रह किया था. कमेटी के बंटी नामक युवक ने उस पर तरस खा कर वहां रखवाया था.

यहां रह कर राहुल उर्फ राज कमरा खोजने लगा. कमरे की तलाश में वह बीटेक की छात्रा माही के घर पहुंच गया. लेकिन वहां कमरा किराए पर नहीं मिला. राहुल का मुख्य पेशा चोरी था. उसे घूमतेघूमते पता चल गया कि माही के घर में सिर्फ लड़कियां रहती हैं. उस दिन के बाद से वह आतेजाते माही का पीछा करने लगा. माही इतनी खूबसूरत थी कि एक ही नजर में उस पर मर मिटा था.

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23 वर्षीया माही मूलरूप से झारखंड के बरकाकाना जिले के थाना सिल्ली क्षेत्र की रहने वाली थी. उस के पिता संजीव कुमार बरकाकाना में सेंट्रल माइन प्लानिंग ऐंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआई) में नौकरी करते थे.

संजीव कुमार की 2 बेटियां रवीना और माही थीं. दोनों पढ़ने में अव्वल थीं. इसीलिए पिता संजीव भी उन्हें उन के मनमुताबिक पढ़ाना चाहते थे. वह अपनी बेटियों पर पानी की तरह पैसे बहा रहे थे.

बच्चों के भविष्य के लिए संजीव कुमार ने सन 2005 में रांची की बूटी बस्ती में एक प्लौट खरीदा था. उस पर उन्होंने घर भी बनवा दिया था. घटना से करीब 2 साल पहले यानी 2017 में उन की दोनों बेटियां रवीना और माही वहीं रह कर पढ़ाई करती थीं. संजीव और परिवार के अन्य सदस्य बरकाकाना में रहते थे.

बड़ी बेटी रवीना रांची शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज से स्नातक कर रही थी, जबकि छोटी बेटी माही ओरमांझी के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक के चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा थी. माही का 15 दिसंबर, 2016 को रिजल्ट आने वाला था. उस के पिता रिजल्ट देखने बरकाकाना से रांची आए थे. रिजल्ट देखने के लिए वह माही के कालेज गए और वहीं से बरकाकाना वापस लौट गए.

दरिंदे ने भांप लिया था कि अकेली है माही

बहरहाल, रिजल्ट देखने के बाद माही जब कालेज से बूटी बस्ती स्थित अपने आवास जाने लगी तो पहले से घात लगाए बैठा राज पीछेपीछे उस के घर तक पहुंच गया. माही घर में बैग रख कर वापस बाहर आई. उस ने अपने घर के पास एक दुकान से मैगी खरीदी और वापस चली गई.

इस से राज आश्वस्त हो गया था कि घर में माही अकेली है. घर में अगर कोई और होता तो माही के बजाए वही सामान खरीदने आता. इत्तफाक की बात यह थी कि कुछ दिनों पहले बड़ी बहन रवीना किसी जरूरी काम से अपने गांव बरकाकाना चली गई थी. माही के घर पर अकेला होने की जानकारी शातिर राज को पहले ही मिल चुकी थी, इसलिए वह निश्चिंत हो गया और उस ने फैसला कर लिया कि आज रात माही को अपनी हवस का शिकार बना कर रहेगा.

उसी रात करीब साढ़े 10 से 11 बजे के बीच राहुल कुमार उर्फ राज माही के घर पहुंचा. उस के मुख्य दरवाजे पर लोहे का मजबूत ग्रिल लगा था. ग्रिल पर भीतर की ओर से बड़ा ताला लगा था. उस के पास मास्टर चाबी रहती थी, जिस से वह कोई भी ताला आसानी से खोल सकता था. मास्टर चाबी से उस ने माही की ग्रिल का ताला खोल लिया.

माही जिस कमरे में सो रही थी, उस में सिटकनी नहीं लगी थी. दबेपांव वह उस के कमरे में आसानी से पहुंच गया और गहरी नींद में सोई माही का गला दबाने लगा. तभी माही की आंखें खुल गईं. उसे देख कर वह डर गई.

इस से पहले कि वह शोर मचाती, राज ने उसे धमका दिया. डर की वजह से माही चुप हो गई. राहुल ने उस के साथ रेप किया. उस दौरान उस ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं. इस दरम्यान माही के नाजुक अंग से रक्तस्राव हुआ, जिस से वह बेहोश हो गई.

उस के बाद दरिंदे राहुल उर्फ राज ने मोबाइल के चार्जर वाले तार से उस का गला घोंट दिया ताकि वह किसी को कुछ बता न सके. हैवानियत पर उतरे राज ने सबूत मिटाने के लिए माही को निर्वस्त्र कर दिया, फिर उस के कपड़ों को एक जगह रख कर उस पर मोबिल औयल डाल कर आग लगा दी. आग लगाने के बाद वह वहां से फरार हो गया. दरअसल, साक्ष्य मिटाने का यह तरीका उस ने अपने ही एक जुर्म से सीखा था.

अपराध की दुनिया में कदम रखते समय राहुल पहली बार पटना में एक घर में चोरी करने की नीयत से घुसा था. यह भी इत्तफाक था कि घर के एक कमरे में 11 वर्षीय नेहा अकेली सो रही थी. बाकी के लोग दूसरे कमरे में सो रहे थे. उस समय रात के करीब 3 बज रहे थे. अकेली नेहा को देख कर उस के जिस्म में वासना की आग धधक उठी. हैवान राहुल जिस्म की आग ठंडी करने के लिए मासूम नेहा की जिंदगी तारतार कर के भाग गया.

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लेकिन कानून के लंबे हाथों से कुकर्मी राहुल ज्यादा दिनों तक नहीं बच सका. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. तब राहुल को पता चला कि नेहा के अंडरगारमेंट में उस का सीमेन (वीर्य) मिला था, जिस से वह दोषी पाया गया था. इस घटना से ही सीख लेते हुए उस ने बीटेक की छात्रा माही से दुष्कर्म के बाद उस के अंडरगारमेंट के साथ अन्य कपड़े भी जला दिए थे ताकि वह पकड़ा न जा सके.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

किराएदार नहीं मकान मालिक बन कर जिएं, कोई धर्म कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा

जब कोई आदमी किसी के घर पर पैसे दे कर रहे तो वह उस का किराएदार कहलाता है. पर अमूमन ज्यादातर किराएदार किराए के मकान में कैसे रहते हैं, यह सब जानते हैं. उन्हें घर के रखरखाव से ज्यादा मतलब नहीं होता है.

दीपक की भी यही समस्या थी. उस का किराएदार नया शादीशुदा जोड़ा अपने में ही मगन रहता था. वे दोनों प्रेम के पंछी किराया तो समय पर देते थे, पर घर की साफसफाई पर कोई ध्यान नहीं देते थे.

एक दिन दीपक की मां छत पर कपड़े सुखाने आईं. छत की साफसफाई की जिम्मेदारी उस जोड़े की थी, क्योंकि वे पहली मंजिल पर रहते थे. पर मजाल है पिछले कई दिनों से बुहारी हुई हो. मां को गुस्सा आया और वे उस जोड़े से मिलने चली गईं. पर घर के भीतर तो और भी बुरा हाल था. पोंछे की तो छोड़िए, फर्श पर झाड़ू तक नहीं लगी थी. रसोईघर का कबाड़ा कर दिया था. दीवारों पर जाले लगे थे और बाथरूम देख कर तो वे धन्य हो गईं. नल टपक रहा था और दीवार पर सीलन के चलते पपड़ी जमा थी. शायद दीवार के भीतर पानी का कोई पाइप फट गया था, लेकिन उन्हें बताया जाना जरूरी नहीं समझा गया.

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यह हाल हर उस घर का है जहां किराएदारों ने मकान मालिक के सपनों के आंगन को नरक बना दिया है. नरक से याद आया धर्म का वह बेरहम एंगल जिस में उस के ठेकेदार धर्मभीरु जनता को यह समझाने में लगे रहते हैं कि यह शरीर और दुनिया तो किराए का घर हैं, अपना असली प्लौट तो यह दुनिया और शरीर छोड़ने के बाद मोक्ष के रूप में स्वर्ग में मिलेगा, जहां मनोरंजन के लिए अप्सराएं और देवता आप के लिए 24 घंटे हाजिर रहेंगे. और अगर कहीं कोई गड़बड़ की तो नरक भी मौजूद है, जहां आप की आत्मा को इतना सताया जाएगा कि वह अगली बार किराएदार बनने के लायक भी नहीं रहेगी.

दरअसल, स्वर्ग का लालच और नरक का डर धर्म के धंधेबाजों का वह अचूक पैतरा है जो गरीबअमीर, अनपढ़ और तालीमशुदा पर एकजैसा असर करता है. यह जो भय का भगवान है, उस ने इस दुनिया में धर्म की बेहिसाब मजबूत दुकानें खोल दी हैं और उस के ठेकेदार उन दुकानों के मालिक बन बैठे हैं जो पूजापाठ कराने के बहाने हमारे जीतेजी हमें ही स्वर्ग का टिकट बांटते हैं.

दरअसल, कोई भी इनसान पूजापाठ 2 वजह से करता है, डर या लालच. लेकिन थोड़ा सा दिमाग लगा कर समझें तो हर धर्म में यह बताया जाता है कि जब कोई मरता है तो उस की आत्मा, सोल या रूह शरीर छोड़ देती है और वही उस स्वर्ग, हैवन या जन्नत में जाती है जहां मोक्ष मिलता है. पर यह आत्मा है क्या और जब यह हमारे शरीर की नहीं हुई तो इस बात की क्या गारंटी है कि यह हमें मोक्ष दिलवा देगी?

हिंदू धर्मग्रंथों में लिखा है कि आत्मा न पानी में डूब सकती है न हवा से उड़ सकती है और न ही आग में जल सकती है. मतलब आत्मा पर किसी चीज का कोई असर नहीं होता. वह तो अमर है. तो फिर लोगों को स्वर्ग का लालच और नरक की डर क्यों दिखाया जाता है?

अगर कोई किराएदार ढंग से नहीं रहता है, घर की साफसफाई में कोताही बरतता है, तो मकान मालिक उसे नोटिस दे कर घर से निकाल देता है. पर धर्म के धंधेबाज इस का उलटा करते हैं. वे तो चाहते हैं कि आप हमेशा इस दुनिया में नकारा किराएदार बन कर रहें. न इस दुनिया की खूबसूरती को समझें और न अपने शरीर की ताकत को.

ऐसे शातिर लोग आप को उन चीजों में उलझाए रखना चाहते हैं जो आप के किसी काम की नहीं हैं, जैसे रोजगार करो या न करो पर दानी पक्के बनो. स्कूल बेशक न जाओ पर धर्मस्थलों की शोभा बनो. मंदिर, मसजिद और चर्च में भजनकीर्तन, नमाज, प्रार्थना को ही अपना सब से बड़ा सुख मानो.

इस प्रपंच में कामयाब होने लिए धर्म के ठेकेदार हमारे शरीर को सब से बड़ा हथियार बनाते हैं. वे ही इसे 4 ऐसे हिस्सों में बांट देते हैं, जो जातिवाद की जहरीली जड़ है. इस में रंगभेद का तड़का लगने से मामला और ज्यादा बिगड़ जाता है. उस के बाद धर्मभीरु लोगों का एक ही मकसद होता है कि चाहे शरीर से प्राण ही क्यों न छूट जाएं, पर धर्म का झंडा हवा में लहराता रहना चाहिए.

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जबकि सच तो यह है कि यह खूबसूरत दुनिया और हमारा निरोगी व कामकाजी शरीर ही सब से बड़ा मोक्ष है और हमें जीतेजी ही उस मोक्ष का मजा लेना है. क्या किसी किसान को खेत में पसीना बहाते हुए किसी भगवान की जरूरत पड़ती है? क्या कोई सेठ दुकान पर ग्राहकों से मोलभाव में चाहेगा कि कोई भगवान उस के काम में खलल डाले? कभी नहीं. कहने का मतलब यह है कि जब हम अपने काम में मगन होते हैं तो मोक्ष में होते हैं. हमें दीनदुनिया से कोई मतलब नहीं रहता है.

लेकिन यही बात धर्म के धंधेबाजों को खटकती है,लिहाजा वे लोगों को नकारा बनाए रखना चाहते हैं. उन्हें इस डर के साए में जीने को मजबूर करते हैं कि भगवान नहीं तो कुछ नहीं.

पर एक लाख टके का सवाल यह है कि वे खुद क्यों इसी दुनिया में रह कर ऐशोआराम से मौज काट रहे हैं? अपने धर्म के रहनुमाओं पर नजर दौड़ाइए. लाल चेहरा, सुर्ख गाल, आलीशन महल जैसे आशियाने, सरकार से मिलने वाली चाकचौबंद सिक्योरिटी, पैरों में गिरते हमआप जैसों के सिर… उन की क्या मति मारी गई है जो इस दुनिया को छोड़ कर किसी अनदेखे स्वर्ग का टिकट कटाएंगे. याद रखिए, जिस दिन इनसान ने अमर होने का फार्मूला खोज लिया, तो उसे पाने की कतार में इन्हीं पाखंडियों का पहला नंबर होगा.

होना तो यह चाहिए कि आम जनता इन शातिरों के धार्मिक प्रपंचों से बाहर निकले और अपने शरीर को सेहतमंद और काम करने लायक बनाए. अपनी मेहनत को कुदरत की नेमत समझे, इसलिए खुद को इस दुनिया में बेगैरत किराएदार न बनने दें, बल्कि एक होशियार मकान मालिक की तरह इसे अपनी जायदाद समझ कर सजाएंसंवारें. फिर किसी भगवान और उस के एजेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह गारंटी है.

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