भटका मन वापस आया – भाग 2

फिर अनुराधा सोचने लगी थी कि क्या सासससुर एक छोटा सा त्याग नहीं कर सकते थे? वे बेटे के साथ आगरा में नहीं रह सकते थे? क्या शहर में बुजुर्ग नहीं रहते हैं? उस ने तो कई बुजुर्गों को आपस में बैठ कर गपें मारते देखा है. अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो केवल बहू ही ऐसा त्याग क्यों करे? हां, क्यों करे ऐसा त्याग…?

फिर अनुराधा का मन विद्रोही हो गया था. अगर सासससुर को उस का खयाल नहीं तो उस को भी उन का खयाल करने की जरूरत नहीं. मन फिर गुस्से से भरने लगा था. मलय के मातापिता हैं वे, मलय त्याग करे. अगर इतनी ही फिक्र है, तो नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाए. वह कुछ नहीं बोलेगी.

पर, सासूजी के चेहरे पर अपनी तकलीफों का तो दूरदूर तक अतापता नहीं था. उस के अचानक आगरा जाने के प्लान से लगता था कि सासूजी पर कोई फर्क ही नहीं पड़ा था.

सामान भी बहुत भारी नहीं है,’’ अनुराधा ने धीरे से सिर झुका कर कहा था.

सासससुर के प्रति मन के अंदर का विद्रोह और गुस्सा अचानक जाने कहां गायब हो गए थे.

फिर अनुराधा ने घर के अंदर बिखरे सामान को देखा. ससुरजी अब भी इन सब से बेपरवाह सो रहे थे.

अनुराधा सोचने लगी कि उस के जाने के बाद घर में झाड़ू कौन लगाएगा? यहां कोई नौकरानी तो है नहीं. सुबह उठते ही उस के सासससुर को चाय की तलब होती है. घर में झाड़ू देने के बाद उस का पहला काम यही होता था, दोनों को चाय देना. किचन के सिंक में रात से ही जूठे बरतन पड़े थे. अपने सामान को ही सहेजने में काफी रात हो गई थी और वह उन्हें साफ न कर पाई थी.

देर रात तक जागने के चलते आज सुबह अनुराधा की नींद ही न टूट रही थी. अगर उस ने अलार्म न लगाया होता, तो ट्रेन के समय तक वह रेलवे स्टेशन ही न पहुंच पाती.

अनुराधा को मलय की नाराजगी की भी चिंता सता रही थी. मलय ने अगर बुरा मान लिया तो क्या वह उस के साथ रह कर अपने इम्तिहान की तैयार कर पाएगी? इस से उस की नींद तक उड़ गई थी.

सब से मुश्किल बात यह थी कि अनुराधा अब तक मलय को ठीक से समझ नहीं पाई थी. उसे याद आया कि शादी के बाद जब वह पहली बार अपनी ससुराल आई थी, तो सासससुर के चेहरे खुशी से दमक उठे थे, पर मलय के चेहरे पर कोई जोश नहीं था. उस ने अनमने तरीके से सारी रस्मों को पूरा किया था.

जब वे दोनों अपना हनीमून मनाने गोवा गए थे, तब समुद्र के तट पर कई नए शादीशुदा जोड़े आए हुए थे. यह तो अनुराधा नहीं जानती थी कि किस जोड़े के मन में क्या चल रहा था, लेकिन सभी के चेहरे खुशी का इजहार कर रहे थे. लेकिन ऐसा लग रहा था कि मलय वह हनीमून को भी एक रस्म जैसा निबटा रहा था.

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उस समय अनुराधा ने इस बात को महसूस तो किया था, लेकिन इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. उसे लगा था कि उस का ऐसा ही स्वभाव होगा, लेकिन जब मलय ने उस से कहा था कि वह मांबाबूजी के साथ गांव में रह कर उन की देखभाल करे, तब उस का मन उस से विद्रोह करने लगा था, किंतु वह एक तो नई थी, दूसरे उस के सासससुर बूढ़े और बीमार थे, इसलिए मन मसोस कर गांव में रहना स्वीकार कर लिया था.

मलय उसे आगरा नहीं ले जाना चाहता था, कभीकभी खुद ही गांव आ जाता और उस से वैसे ही संबंध बनाता, जैसे कोई दैनिक काम कर रहा हो. मन में न कोई उत्साह, न उमंग. उस ने कभी जाना ही नहीं कि शादीशुदा जिंदगी में नए जोड़ों की उमंग कैसी होती है, इसलिए जब मां ने उस को आगरा जाने से नहीं रोका और उस के जाने के बाद उन को होने वाली तकलीफ की ओर ध्यान गया तो उस ने अपना फैसला बदल दिया.

फिर अनुराधा मलय से फोन कर के बोली कि आगरा अभी नहीं आ पाएगी और तब तक नहीं आएगी, जब तक कि सासससुर की देखरेख का कोई उचित इंतजाम नहीं हो जाता.

जब अनुराधा ने सामान को अनपैक करना शुरू किया, तो सासूजी ने पूछा, ‘‘क्यों बहू, सामान क्यों निकाल रही हो?’’

‘‘मांजी, अब आप लोगों को अकेले छोड़ कर मैं नहीं जा सकती. मेरी गैरहाजिरी में आप लोगों की कौन देखभाल करेगा? मुझ से गलती हो रही थी. माफ कीजिएगा मांजी, मैं यहीं रहूंगी.’’ रही हो?’’

‘‘मांजी, अब आप लोगों को अकेले छोड़ कर मैं नहीं जा सकती. मेरी गैरहाजिरी में आप लोगों की कौन देखभाल करेगा? मुझ से गलती हो रही थी. माफ कीजिएगा मांजी, मैं यहीं रहूंगी.’’

उधर मलय की अपनी ही जिंदगी थी. एक लड़की थी अर्पणा. वह भी मलय के ही बैक में काम करती थी.

मलय का अर्पणा से परिचय नौकरी के पहले से था. दोनों बैंकिंग की तैयारी के समय एक ही जगह से कोचिंग करते थे. उस का अर्पणा से परिचय भी एक इत्तिफाक था.

अर्पणा को किसी ने बताया था कि मलय गणित की कई ट्रिक जानता है, जिन से कई मुश्किल सवाल बहुत कम समय में ही हल हो जाते हैं. उन्हीं ट्रिकों को जानने के लिए अर्पणा

मलय से मिली थी. इस मुलाकात ने उन के संबंधों को ऐसा बढ़ाया कि वह नौकरी के बाद भी कायम रहा.

मलय अनुराधा से शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन वह खुल कर बाबूजी से अपने मन की बात कह भी नहीं पाया.

इधर अर्पणा मन की भी बात वह नहीं जानता था. उन के बीच संबंध जरूर था, लेकिन वे अपनी जिंदगी भी एकसाथ बिताएंगे, इस सवाल को किसी ने न उठाया था, फिर अर्पणा का एक दूसरे लड़के से भी संबंध था, जिस के साथ वह डेट पर जाती थी, इसलिए मलय की जब शादी की बात चल रही थी, तब उस ने उस को बधाई दी. तब मलय का मन उदास हो गया था और उस ने अनुराधा से शादी कर ली थी.

मलय की शादी के बाद अर्पणा की अपने प्रेमी से किसी बात को ले कर अनबन हो गई और उन का संबंध टूट गया. इसी बीच उस के प्रेमी की नौकरी देहरादून में लग गई और अर्पणा से उस की बातचीत भी बंद हो गई.

अब मलय और अर्पणा अकेले रहते थे, इसलिए उन दोनों के बीच यह जानते हुए भी कि मलय शादीशुदा है, प्रेम का अंकुरण होने लगा.

मलय ने अब तक अनुराधा को अर्पणा के बारे में कुछ नहीं बताया था. वैसे वह खुद ही इस बारे में बताता भी क्यों. ऐसे संबंधों को अकसर पतिपत्नी एकदूसरे से छिपा ही लेते हैं.

मलय यह जानता था कि अर्पणा से उस के प्यार की पेंगे बढ़ाना गलत है, अर्पणा भी इस बात से वाकिफ थी, लेकिन दोनों का मिलना बंद नहीं हो रहा था, जिसे अब बैंक के दूसरे मुलाजिम भी जान गए थे.

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एक दिन अनुराधा ने मलय को फोन किया. उस समय रात के 11 बज रहे थे. उस रात अर्पणा के जन्मदिन की पार्टी थी. मलय भी उस पार्टी में शामिल हुआ था. अचानक उस के मोबाइल पर घंटी बजने पर अर्पणा ने देखा कि यह मलय का फोन है, जिसे छोड़ कर वह बाथरूम में चला गया है.

अर्पणा ने फोन रिसीव किया… ‘हैलो.’

किसी लड़की की आवाज सुन कर अनुराधा चौंक गई. वह बोली, ‘‘क्या यह मलय का फोन नहीं है?’’

‘मलय का ही फोन है. आप कौन बोल रही हैं?’

‘‘मैं, अनुराधा… मलय की पत्नी.’’

ऐसी सहेलियों से बच कर रहें

 लेखक-  धीरज कुमार

सलोनी कालेज में पढ़ती थी. वह पढ़नेलिखने में साधारण थी. कालेज में उस की कई सहेलियां बन चुकी थीं. कालेज कैंपस में भी वह अपनी सहेलियों से घिरी रहती थी.

कालेज आतेजाते 1-2 लड़कों से भी सलोनी की दोस्ती हो गई थी. समय मिलने पर वह उन लड़कों से भी बातें करती थी. उन के साथ पार्क और होटलों में घूमती थी. उस की सहेलियां यह सब देख कर जलनेभुनने लगी थीं.

सलोनी अपनी सहेलियों को सफाई दे चुकी थी कि उन लड़कों से सिर्फ दोस्ती है. उस की सहेलियां दिखावे के लिए मान गई थीं, लेकिन पीठ पीछे तरहतरह की बातें करती रहती थीं. धीरेधीरे सलोनी की सहेलियों से ये बातें उस के घर तक भी पहुंच गई थीं.

अभी जमाना इतना नहीं बदला था, इसलिए सलोनी के घर वालों ने भी उसे लड़कों से बातें करने से मना किया. जब वह नहीं मानी तो उस के कालेज जाने पर रोक लगा दी गई.

इस तरह सलोनी की पढ़ाई बीच में ही छूट गई. इसलिए वह इस तरह की बातों से काफी आहत हो गई थी. अब वह सोच रही थी कि काश, मैं इन लड़कियों से शुरू से ही दूरी बना कर रखती, तो यहां तक नौबत नहीं आती.

वहीं दूसरी तरफ रंजना कालेज में पढ़ती थी. उस के क्लास की कुछ लड़कियां उसे घमंडी कहती थीं. यही वजह थी कि उस की किसी लड़की से नहीं पटती थी. वह लड़कियों के साथ दोस्ती से बिदकती थी. वह रोज अकेले ही कालेज जाती थी. लेकिन उस के लड़के दोस्तों की तादाद बढ़ती ही जा रही थी. उस के लड़के दोस्त मौल घुमाते थे, होटल में खिलाते थे. कुछ दोस्त उस के मोबाइल में पैसे भी डलवा देते थे. कुछ दोस्त समयसमय पर गिफ्ट दिया करते थे. कुछ लड़के बाइक से उसे कालेज भी छोड़ देते थे.

इसीलिए वह कालेज जाती तो लेक्चर के बाद कालेज कैंपस में रुकती भी नहीं थी. अपने दोस्तों को अलगअलग जगहों पर मिलने के लिए समय दे रखती थी. उस के मोबाइल कान पर ही लगे रहते थे. जब मोबाइल पर बातें करती, कोई दोस्त पूछता, तुम कहां हो?

किसी भी दोस्त को सही पताठिकाना नहीं बताती. वह अगर होटल में होती, तो किसी सहेली के घर बताती. वह अपने यारदोस्तों के साथ होती, तो अपने रिश्तेदार के घर बताती.

रंजना को लड़कों को बेवकूफ बनाने में मजा आता था. वह खुद को काफी होशियार समझती थी. कुछ लड़कों से जिस्मानी संबंध भी बना चुकी थी. लेकिन पेट से न हो जाए, इस के लिए काफी सावधान रहती थी.

रंजना अपने महल्ले और घर के लोगों के बीच सीधीसादी बनी रहती थी. बाहर भले ही गुलछर्रे उड़ाती, मगर घर में अलग इमेज बना कर रखती थी.

उस का मानना है, जिंदगी के मजे लेने हैं तो दुनिया से असली रूप छुपा कर रखना जरूरी है, वरना लोगों की नजरें लगते देर नहीं लगती है.

रंजना का असली मकसद पढ़ाई करना नहीं, बल्कि जिंदगी के मजे लेना था, इसीलिए पढ़ाई कम करती थी. लेकिन जीवन का भरपूर आनंद उठा रही थी.

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सलोनी जैसी लड़कियां पढ़ाई के साथसाथ लड़कों से भी मेलजोल रखना चाहती हैं, लेकिन वे भूल जाती हैं कि आजकल की लड़कियों को खुद अगर जो चीजें नहीं मिलती हैं, तो दूसरों को देख कर वे जलनेभुनने लगती हैं, क्योंकि कुछ लड़कियों में जलन की आदत जन्मजात होती है. इस से वे पीठ पीछे तरहतरह की अफवाह फैलाने लगती हैं. उन अफवाहों से खुद का नुकसान तो नहीं होता है, लेकिन जिस के बारे में फैलाया जाता है, उस का नुकसान जरूर हो जाता है.

कोई भी मातापिता ऐसी बातों से परेशान हो जाते हैं, इसीलिए कुछ लोग आननफानन ही लड़की की पढ़ाई बंद करवा देते हैं. कुछ मातापिता अपनी लड़की को जल्दीजल्दी शादी तक करवा देते हैं.

आज कोई भी लड़कालड़कियों के साथ घूमताफिरता है, तो मातापिता को कोई परेशानी नहीं होती है. कभीकभी तो कुछ मातापिता गर्व का अनुभव भी करते हैं, लेकिन यही बात लड़की पर लागू नहीं होती है. लड़की के लिए आज भी समाज दोयम दर्जे की सोच रखता है. यही काम जब लड़की करती है, तो समाज तरहतरह की अफवाहें फैलाने लगता है. लड़की को चरित्रहीन तक कहा जाने लगता है.

लड़कियों के किरदार के बारे में झूठी बातें फैलाने में लड़कियां ही आगे रहती हैं, जबकि लड़के ऐसा कम ही कर पाते हैं, इसलिए लड़कियां सहेलियों से परहेज रखना उचित समझती हैं.

सहमति से सैक्स संबंध बनाने वाली लड़कियां सहेलियों से दूर रहने में ही अपनी भलाई सम?ाती हैं. कई बार सहेलियों के चलते उन्हें लेने के देने पड़ जाते हैं. कभीकभी उन की सहेलियां उन्हीं लड़कों पर डोरे डालने लगती हैं, जिन से इन का इश्क चल रहा होता है. ऐसे हालात में बौयफ्रैंड छिन जाने का भी डर बना रहता है.

कल तक लड़केलड़कियों के बीच जिस्मानी संबंध बनाना नैतिकता से जोड़ कर देखा जाता था, लेकिन आज नैतिकता की बातें पुरानी हो गई हैं. अब जीवन का उद्देश्य सिर्फ जिंदगी के मजे लेना रह गया है. अब लोग सम?ाने लगे हैं कि ये सब बातें दकियानूसी हैं, इसलिए विवाह के पहले जिस्मानी संबंध बनाना व अपनी मरजी से शादी के बाद दूसरों से संबंध रखना किसी अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, बल्कि अब यह सब आधुनिक युग की मांग बताई जाती है. लोग भागदौड़ की जिंदगी में हर कोई खुशियां तलाशने की कोशिश कर रहा है. उसी कोशिश का नतीजा है यह.

ऐसे ही एक लड़की थी नव्या. वह अपनी सहेली किरण के बौयफ्रैंड पर डोरे डाल रही थी. जब उस की सहेली को यह बात पता चली, तो वह सड़क पर ही ? झगड़ा करने लगी थी. वहां काफी भीड़ जमा हो गई. दोनों के झगड़े से लोगों को यह सम?ाते देर नहीं लगी कि यह लड़ाई एक ही बौयफ्रैंड को ले कर हो रही है. दोनों ‘तूतूमैंमैं’ करतेकरते हाथापाई पर आ गई थी, जिसे बीचबचाव करने के लिए कुछ लोगों को आना पड़ा था. दोनों एकदूसरे को खूब गंदीगंदी गालियां दे रही थीं. काफी समझाने के बाद दोनों अलग हुई थीं.

चांदनी एक बच्चे की मां थी. अपने महल्ले में ही एक आदमी से उस का इश्क चल रहा था. चांदनी अपने घर में सलीके से रहती थी. उस का पति उसे बहुत प्यार करता था. वह पति की हर बात मानती थी. लेकिन इश्क के मामले में उसे अपनेआप पर कंट्रोल नहीं था, इसलिए वह बहक जाती थी. वह अपने महल्ले में किसी भी औरत के पास नहीं बैठती थी. अपने काम से मतलब रखती थी.

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चांदनी का कहना है, ‘‘मैं कम से कम औरतों से मेलजोल रखती हूं. जितनी ज्यादा औरतों से संपर्क होगा, वे मेरे बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहेंगी. औरतों को कुछ बातें हजम नहीं होतीं. कभी गुप्त बातें निकल गईं, तो सार्वजनिक होते देर नहीं लगती है. फिर यही औरतें खापी कर रायता इधरउधर फैलाती रहेंगी. कभीकभी तो ये औरतें आपस में ? गड़ाफसाद भी करा देती हैं, इसलिए इन से दूर रहना ठीक रहता है. मैं अपने काम में बिजी रहती हूं.’’

साफ है कि ऐसी लड़कियों और औरतों से दूरी बना कर रखना ही फायदेमंद है, ताकि बेवजह के लफड़े से बचा जा सके. कभीकभी सहेलियों के चलते निजी जिंदगी में भी रुकावट आने लगाती है. कुछ लड़कियों और औरतों को दूसरों की जिंदगी में दखलअंदाजी करना ज्यादा ही रास आता है. वे अपनी तकलीफों से कम परेशान रहती हैं, बल्कि दूसरों की खुशियों से ज्यादा दुखी रहती हैं.

भटका मन वापस आया – भाग 3

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था : मलय अकेला आगरा में रहता था. उस की पत्नी अनुराधा अपने बूढ़े सासससुर के साथ गांव में रहती थी, पर वह आगरा जाने को बेताब थी. वहां आगरा में मलय एक लड़की अर्पणा के नजदीक हो गया था. अर्पणा के जन्मदिन की पार्टी थी. अनुराधा ने मलय को फोन किया. फोन अर्पणा ने उठाया. अब पढि़ए आगे…

‘अच्छा, अब समझी. आप की शादी में मैं नहीं आ सकी थी, इसलिए आप से भेंट नहीं हुई. मलय आप को यहां कभी लाया भी नहीं. मैं उस की कलीग अर्पणा बोल रही हूं. आज मेरा जन्मदिन था. अभी वह मेरे यहां ही है. जरा बाथरूम में गया है. आता है तो आप को फोन करने के लिए बोलती हूं. वैसे, आप कैसी हैं?’ अर्पणा ने अनुराधा से पूछा.

‘‘अच्छी हूं. आप को जन्मदिन की बधाई. बाथरूम से लौटने पर मलय से फोन करने के लिए जरूर कहिएगा,’’ अनुराधा बोली.

‘जी जरूर,’ अर्पणा ने कहा और इस के कुछ देर बाद डिस्चार्ज हो कर फोन स्विच औफ हो गया.

बर्थडे फंक्शन के बाद खानेपीने का दौर शुरू हुआ, तो अर्पणा उसी में उलझ गई. उसे याद ही न रहा कि मलय को फोन के बारे में बताना था.

स्विच औफ हो जाने से अनुराधा के फोन के बारे में उसे पता ही न चला. उस के फोन का चार्जर न होने के चलते वह अपना मोबाइल भी चार्ज न कर पाया.

उधर अनुराधा ने मलय द्वारा फोन न करने पर फिर से फोन किया, पर जब उस का फोन स्विच औफ बताने लगा, तब उस की घबराहट और भी बढ़ गई. कई तरह के शक उस के मन में पैदा  होने लगे.

जल्दी में अनुराधा उस लड़की का नाम भी पूछना भूल गई थी, जिस ने मलय का फोन रिसीव किया था.

‘पता नहीं, कौन थी वह…? उस का जन्मदिन था भी या झूठ बोल रही थी. दाल में कुछ काला तो नहीं. आखिर मलय ने इस के बाद फोन स्विच औफ क्यों कर दिया? ऐसा तो नहीं कि मलय का उस लड़की से नाजायज रिश्ता हो और उस ने जानबूझ कर मोबाइल स्विच औफ कर दिया हो?

‘आखिर इतनी देर तक जाड़े की रात में मलय को उस लड़की के घर जाने की क्या जरूरत पड़ गई? अगर वह लड़की सच भी कहती हो, तब भी इतनी रात को बर्थडे में रहने की क्या जरूरत? इस मौसम में रात 9 बजे तक बर्थडे फंक्शन खत्म हो ही जाता है.’

अनुराधा ने सोचा कि अब वह दूसरे दिन सुबह फोन करेगी. वह सोने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. मन बेचैन था.

ऐसा तो होना ही था. आखिर मलय उस का पति था. पति रात में किसी अनजान औरत के घर में हो, तो नईनवेली पत्नी के दिल पर क्या बीतेगी?

अब अनुराधा के मन में यह भी बात घर करने लगी कि यह सब उस के मलय से दूर रहने का नतीजा है. अगर वह मलय के साथ रहती तो ऐसा नहीं होता. उस ने सोचा कि अब उसे आगरा जाना ही होगा. सासससुर की सेवा के लिए वह अपने कैरियर का नुकसान तो कर ही रही थी, अब अपनी शादीशुदा जिंदगी को दांव पर नहीं लगा सकती.

किसी तरह रात कटी. सुबह उठते ही अनुराधा ने मलय को फोन लगाया. उस समय मलय गहरी नींद में सो रहा था. उस ने अर्पणा के घर से आते ही फोन को चार्ज में लगा दिया था, लेकिन उसे औन करना भूल गया था, इसलिए अभी भी मोबाइल स्विच औफ बता रहा था.

अब तो अनुराधा का शक पक्का होने लगा. जरूर मलय उस लड़की के साथ रात बिता रहा होगा और कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे, इसलिए फोन को स्विच औफ कर दिया होगा.

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यह तो सच था कि मलय की दोस्ती अर्पणा से बढ़ रही थी और यह भी सही था कि इस को हवा देने का काम अनुराधा का उस के साथ न रहना था, लेकिन यह बिलकुल गलत था कि मलय ने जानबूझ कर अपना मोबाइल स्विच औफ कर दिया था और वह अर्पणा के घर रात में था.

अब मलय फोन रिसीव करता और इस बारे में सफाई भी देता तो अनुराधा शायद उस की बात का यकीन नहीं करती.

हुआ भी यही. जब मलय जगा और उस ने अनुराधा को बताने की कोशिश की कि वह मोबाइल डिस्चार्ज होने के चलते रात में उस से बात नहीं कर पाया, तो उस ने उस की बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं किया और बोली कि वह भी अब आगरा आएगी और सासससुर के लिए कोई न कोई इंतजाम जरूर कर देगी.

मलय उस को मना नहीं कर पाया. हां, इतना जरूर कहा कि वह अगले हफ्ते घर आ रहा है, फिर इस बारे में बात करेगा.

जब मलय ने कह दिया कि वह अगले हफ्ते घर आ रहा है, तब अनुराधा को इस बीच आगरा जाने की कोई जरूरत नहीं थी.

सासससुर गांव छोड़ना नहीं चाहते थे और गांव छोड़ना उन के लिए मुफीद भी नहीं था. अनुराधा जानती थी कि  ऐसा करने से दोनों की जिंदगी आसान न रहेगी.

उन्हीं के पड़ोस में एक अधेड़ विधवा माधवी रहती थी. उसे परिवार वालों ने छोड़ दिया था. वह कम उम्र में ही विधवा हो गई थी और घर वाले समझते थे कि उस के घर में आने के बाद से ही उस के पति की तबीयत खराब रहने लगी थी और आखिर में वह बीमारी से ही मर गया, जबकि सचाई यह थी कि उसे दिल की बीमारी थी, जिस का समय पर उचित ढंग से इलाज न होने के चलते उस की मौत हुई थी.

माधवी अकसर अनुराधा के घर आती थी और उस के काम में हाथ बंटाती थी. अनुराधा के सासससुर भी उस का बहुत खयाल रखते थे और उस को खाना खिलाने के लिए अनुराधा से कहते थे. उस की पैसे से मदद भी किया करते थे.

अनुराधा ने माधवी से बात की, तो वह सासससुर की सेवा और देखभाल करने के लिए तैयार हो गई. इस तरह अनुराधा ने मलय के आने से पहले ही उस की गैरहाजिरी में सासससुर की देखभाल का इंतजाम कर दिया.

अब अनुराधा तय कर चुकी थी कि वह मलय के पास आगरा जाएगी.

अपने वादे के मुताबिक मलय घर आया. अनुराधा के मन में उस के प्रति कई सवाल थे, लेकिन जब तय समय पर मलय आ गया और उसे उम्मीद बंध गई कि अब वह भी उस के साथ आगरा जाएगी, तब उस का डर खत्म हो गया.

अनुराधा ने सासससुर के रहने का इंतजाम तो कर दिया था, लेकिन मलय उसे आगरा ले जाने के पक्ष में नहीं था. उस का कहना था कि माधवी उस के मांबाबूजी का वैसा ध्यान न रख पाएगी, जैसा उन्हें इस उम्र में जरूरत है. लेकिन अनुराधा ने जिद पकड़ ली, तो उसे आगरा ले जाने के लिए तैयार होना  ही पड़ा.

सासससुर की जिम्मेदारी माधवी पर डाल दी गई. यह तय हुआ कि उसे हर महीने एक तय रकम दे दी जाएगी. माधवी को इस से ज्यादा चाहिए भी क्या था. रहने का ठौर और खाने का इंतजाम तो यहां था ही, हर महीने खर्चे के लिए कुछ पैसे भी, और वह भी जब तक माधवी चाहे.

अनुराधा आज पहली बार आगरा आई थी. मलय जिस घर में रहता था, वह एक बिजी महल्ले में था और उस के बैंक से काफी दूरी पर था.

गांव में रहने की आदी अनुराधा को यह भीड़भाड़ वाला महल्ला काफी दमघोंटू लगा. उसे समझ नहीं आया कि बैंक से इतनी दूरी पर मलय ने यह मकान किराए पर क्यों लिया है.

जब अनुराधा ने इस बारे में मलय से पूछा, तो उस ने यह कह कर टाल दिया कि बैंक के नजदीक कोई ढंग का किराए का मकान नहीं मिला, लेकिन इस बात पर अनुराधा को यकीन नहीं हुआ, क्योंकि मलय का बैंक किसी पौश इलाके में नहीं था, जहां किराए पर कोई मकान ही न मिले या इतना महंगा हो कि उस का किराया वह दे न पाए.

पर इस की वजह का पता उसे तब लगा, जब उसी शाम अर्पणा उस से मिलने आई.

‘‘जानती हो भाभी, आज जब तुम्हारे बारे में मलय ने बताया तो तुम से मिलने चली आई. मेरी नानी का एक मकान इसी महल्ले में है. नाना आगरा में ही पहले बिजली महकमे में थे. उन्होंने एक बनाबनाया मकान इसी महल्ले में बड़े ही सस्ते में खरीद लिया था. जब तक नाना जिंदा रहे, उन्होंने आगरा नहीं छोड़ा.

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‘‘कई सालों तक रहने के चलते इस शहर से उन का लगाव ही नहीं हो गया था, बल्कि कई लोगों से पारिवारिक संबंध भी बन गए थे.

‘‘नानाजी हमेशा कहते थे कि अपनी जिंदगी की शाम हमेशा परिचितों के बीच ही बितानी चाहिए, वरना अकेलेपन का दंश हमेशा झेलना पड़ेगा.

‘‘लेकिन, नानाजी के मरने के बाद नानी कोलकाता चली गईं, क्योंकि वहीं मामाजी एक कालेज में प्रोफैसर थे. इस के बाद मेरी नौकरी यहीं लग गई, तो मैं उन के ही मकान में रहने लगी,’’ अर्पणा एक ही सांस में सबकुछ कह गई.

‘‘अच्छा तो उस दिन शायद मेरा फोन तुम ने ही रिसीव किया था, जन्मदिन था न तुम्हारा?’’

‘‘हां भाभी, तुम ठीक कहती हो, उस दिन मेरा ही जन्मदिन था. तुम से पहले कभी भेंट नहीं हुई थी, इसलिए तुम मेरी आवाज नहीं पहचान पाई थीं.’’

‘‘तुम से मिल कर खुशी हुई. लेकिन अर्पणा, तुम्हारा तो यहां मकान है, पर मलय इतनी घनी और दमघोंटू जगह में क्यों रहता है?’’

अर्पणा मुसकराई और बोली, ‘‘इसलिए भाभी कि हम दोनों कालेज में एकसाथ पढ़ते थे. यहां रहने से हम लोगों का आपस में मिलनाजुलना होता है और अब तो मैं मलय की ही मोटरसाइकिल से बैंक जाती हूं.’’

यह सुन कर अनुराधा को अच्छा नहीं लगा. अब अच्छा लग भी कैसे सकता था. कौन पत्नी यह चाहेगी कि उस का पति किसी जवान और खूबसूरत लड़की को अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा कर रोज औफिस ले जाए.

यह सुन कर अनुराधा के दिल पर सांप लोट गया, फिर भी वह बनावटी मुसकराहट चेहरे पर लाते हुए बोली, ‘‘अच्छा है, जब अगलबगल ही मकान हैं और दोनों को एक ही औफिस में जाना है, तो एकसाथ जाने में कोई हर्ज नहीं है.’’

लेकिन, अंदर से अनुराधा को मलय पर गुस्सा आ रहा था. यह कोई बात हुई… एक तो बैंक से इतनी दूर किराए का मकान लिया, ऊपर से एक कुंआरी लड़की को लिफ्ट भी देने लगा. क्या अर्पणा उसे पीछे से पकड़ कर नहीं बैठती होगी? लोग क्या कहते होंगे? लेकिन उसे तो मजा मिल रहा है, इस के लिए उसे शर्म क्यों आएगी?

अर्पणा के जाने के बाद अनुराधा ने मलय से पूछा, ‘‘तुम्हारा अर्पणा से क्या संबंध है?’’

‘‘अचानक यह सवाल क्यों पूछ रही हो? पहले तो ऐसा कभी नहीं पूछा?’’ मलय अनुराधा के अचानक हुए इस हमले से घबरा गया.

‘‘इसलिए कि तुम इस महल्ले में सिर्फ अर्पणा के चलते रहते हो. जानते हो, यहां बहुत गंदगी है, फिर भी बैंक से इतनी दूर रहने की क्या वजह है? तुम उसे रोज अपनी मोटरसाइकिल से बैंक ले जाते हो. न तुम्हें अपनी सेहत का खयाल है, न बदनामी का,’’ अनुराधा चाहते हुए भी अपनी भावनाओं को न रोक पाई.

‘‘तुम बहुत ही  ज्यादा गलतफहमी की शिकार हो. ऐसी कोई बात नहीं है. बैंक के नजदीक कोई किराए का अच्छा सा मकान नहीं मिल रहा था.’’

‘‘तुम्हारे बैंक का कोई साथी बैंक के अगलबगल नहीं रहता क्या…?’’

‘‘रहता है, लेकिन किसी का मकान अच्छा नहीं है,’’ मलय ने बहाना बनाने की कोशिश की, पर उस की बात भरोसा करने लायक नहीं थी.

अब अनुराधा क्या कहती और कहती भी तो इस से मलय पर क्या फर्क पड़ता, लेकिन उसे यह बात तो समझ में आ ही गई थी कि मलय और अर्पणा के बीच कोई न कोई संबंध जरूर है.

अर्पणा और मलय का संबंध ऐसे ही नहीं बना था और यह 1-2 दिन में नहीं बना था. इस के पीछे हालात भी कम दोषी नहीं थे. हालात ऐसे बने कि अनुराधा को मलय को अकेला छोड़ कर गांव में रहना पड़ा और इस बीच कुंआरी होने के चलते अर्पणा मलय से चिपकती चली गई.

मलय के अकेले होने का फायदा अर्पणा ने बखूबी उठाया और उसी की नजदीकियों के चलते मलय ने अनुराधा को कभी आगरा लाने पर जोर नहीं दिया.

मलय को क्या फर्क पड़ता. उसे गांव आने पर उस की जिस्मानी भूख मिट ही जाती थी. आगरा में रोमांस करने के लिए अर्पणा थी ही, मारी तो अनुराधा जा रही थी. मशीन बन कर रह गई थी वह.

गांव में रातदिन सासससुर की सेवा का फर्ज अनुराधा पर थोप कर मलय निश्चिंत हो गया था. सासससुर भी अनुराधा के सामने ही किसी के आने पर बहू की तारीफ के पुल बांध कर उस के त्याग की जैसे कीमत चुका देना चाहते थे. अनुराधा की भावनाओं का खयाल न मलय को था, न सासससुर को.

अब आगरा में अनुराधा का कोई नहीं था. उसे अकेले ही सारे फैसले लेने थे. सब से पहले तो किसी भी हालत में मलय को अर्पणा से अलग करना था.

इस की शुरुआत क्वार्टर बदलने से करनी थी और इस के लिए मलय तो कोशिश करता नहीं, इसलिए अनुराधा ने उस के साथ औफिस जाने का फैसला किया, ताकि खुद ही उस इलाके में कोई अच्छा सा मकान खोज सके.

भटका मन वापस आया – भाग 4

शुरू में तो मलय अनुराधा के इस प्रस्ताव से बहुत खीझा. वह बोला, ‘‘तुम बैंक में जा कर क्या करोगी,’’ लेकिन जब अनुराधा ने कहा कि एक बार वह उस के बैंक को देखना चाहती है, पता नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए, तो वह इनकार न कर सका.

मलय ने फोन कर के अर्पणा को बताया, ‘‘मैं अनुराधा के साथ बैंक जाऊंगा, इसलिए तुम किसी आटोरिकशा से बैंक चली जाना.’’

‘अरे यार, यह बात पहले ही बता देते. इस समय मुझे आटोरिकशा के लिए एक किलोमीटर पैदल जाना पड़ेगा.’

‘‘आज थोड़ी तकलीफ उठा लो. पता नहीं, अनुराधा को क्या हो गया है, मुझ पर तुम्हारे साथ संबंधों को ले कर शक करने लगी है,’’ मलय छत पर जा कर बोला. वह नहीं चाहता था कि अनुराधा उस की बातें सुन ले.

अनुराधा ने भी मलय को यह नहीं बताया था कि वह उस के साथ इसलिए जा रही है, ताकि उस के बैंक के आसपास कोई किराए का मकान खोज सके.

अनुराधा बैंक पहुंच कर बोली कि वह अगलबगल कोई किराए का मकान खोजने जा रही है, तब मलय घबराया. वह बोला, ‘‘इस के लिए तुम्हें यहां आने की क्या जरूरत थी. मैं यह काम खुद भी कर सकता था. अगर तुम्हें इसी काम के लिए आना था, तो रविवार तक का इंतजार करना चाहिए था. मैं भी तुम्हारा साथ देता. क्या अनजान जगह में अकेले तुम्हें गलीगली मकान के लिए भटकना अच्छा लगता है?’’

तब अनुराधा को लगा कि उस ने मलय पर अविश्वास कर और उस से झूठ बोल कर गलत किया है. वह शर्मिंदगी से भर उठी. उस ने कहा, ‘‘मैं थोड़ी देर के लिए अर्पणा को साथ ले लेती हूं.’’

‘‘देखो अनुराधा, यह बैंक है. यहां स्टाफ की ऐसे भी कमी है. अगर तुम अर्पणा को साथ ले जाओगी, तो यहां का अकाउंट सैक्शन कौन संभालेगा? बैंक में कस्टमर तुरंत हल्ला मचाना शुरू कर देंगे.’’

उस दिन चाह कर भी अनुराधा  बैंक से बाहर नहीं निकल पाई और दिनभर बैठेबैठे बोर होती रही. बैंक में उस का अर्पणा के अलावा किसी से परिचय नहीं था, इसलिए वह उसी के पास बैठी रही.

अर्पणा काम में इतनी बिजी थी कि उसे उस से भी बात करने की फुरसत नहीं थी, फिर भी उस ने उस का काफी खयाल रखा.

मलय अनुराधा के इस बरताव से काफी दुखी था. अर्पणा भी अब जान गई थी कि अनुराधा मलय को उस से अलग करने के लिए उस के साथ बैंक तक आई थी, पर उस ने अपने मन की बात उस से नहीं की.

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अर्पणा के इस अच्छे बदलाव ने अनुराधा के मन में उस के प्रति विचार को बदल दिया. अब उसे इस बात का अफसोस था कि उसी के कारण अर्पणा को उस दिन आटोरिकशा से आना पड़ा. अब बैंक से घर लौटने का समय हो रहा था. अनुराधा उस समय अर्पणा के टेबल के पास बैठी थी. मलय किसी जरूरी काम से चीफ ब्रांच मैनेजर के चैंबर में गया हुआ था.

तभी अर्पणा मुसकरा कर बोली, ‘‘मैं कल से अपनी स्कूटी से बैंक आऊंगी. अब तो आप खुश हैं?’’

यह सुन कर अनुराधा को लगा, जैसे किसी ने चाबुक मार कर पीठ पर नीला कर दिया हो. उस से इस का जवाब देते नहीं बना. तभी मलय आता हुआ दिखाई दिया.

‘‘अभी मुझे कुछ काम है, इसलिए घर लौटने में देरी होगी. तुम अर्पणा के साथ घर लौट जाओ,’’ मलय ने अनुराधा से कहा.

‘‘चलो भाभी, इसी बहाने तुम मेरा भी मकान देख लोगी,’’ अर्पणा ने खुशी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘लेकिन अर्पणा, मैं तुम से एक बात बताना भूल गई थी. वह कोने में बैठी हुई जो दुबली सी लड़की दिखाई पड़ रही है न, उस से मैं दोपहर में मिली थी. वह बहुत कम उम्र की लग रही थी और मलय के साथ तुम भी काम में लगी थी, तब उस के पास चली गई थी. उस समय वह अपने केबिन में अकेली थी. मैं उस से जानना चाह रही थी कि वह इतनी कम उम्र में सर्विस में कैसे आ गई.

‘‘मैं ने जब उस को अपना परिचय दिया, तब वह बहुत खुश हुई और औफिस के बाद चाय पर अपने घर चलने का न्योता दिया. जब मैं ने उस से किराए के मकान के बारे में पूछा, तब वह बोली कि उस के मकान में 2 कमरे खाली हैं. अब हमें 2 कमरे से ज्यादा की जरूरत तो है नहीं, क्यों न चल कर बात कर लूं.’’

‘‘हां शायद तुम लूसी के बारे में बात कर रही हो. वह ईसाई है और यहां से थोड़ी ही दूरी पर उस के किसी रिश्तेदार का मकान है, वह वहीं रहती है.’’

अभी वे दोनों बातें कर ही रही थीं कि लूसी आ गई. अब वह भी घर जाने की तैयारी कर रही थी.

‘‘आप भैया को भी साथ ले लीजिएगा भाभी. मैं ने अपने रिश्तेदार से बात कर ली है, वे उस फ्लैट को किराए पर देने के लिए तैयार हैं. अभी आप मेरे साथ चल कर देख लीजिए. आप को मकान पसंद आएगा,’’ लूसी मुसकराते हुए बोली

‘‘लेकिन आज तो मुझे बैंक से निकलने में देर हो जाएगी,’’ मलय ने कहा, तो अनुराधा बोली, ‘‘उस से क्या फर्क पड़ता है. आज होटल में डिनर कर लेंगे. रोजरोज इतनी दूर आने से तो फुरसत मिलेगी.’’

मलय ने कहा, ‘‘तुम लूसी के साथ बैठो, मैं थोड़ी देर में अपना काम निबटा कर आता हूं,’’ और वह अपने केबिन में चला गया.

तभी अर्पणा ने कहा, ‘‘आज डिनर मेरे यहां रहेगा भाभी. मैं घर जा कर इस का इंतजाम करती हूं, जब तक तुम लोग लौटोगे, डिनर तैयार मिलेगा.’’

‘‘ठीक है,’’ अनुराधा ने कहा. सुबह जिस अर्पणा को ले कर उसे चिंता सता रही थी, वह भी अब नहीं रही. जिस तरह अर्पणा उस का सहयोग कर रही थी, उस से तो यही लग रहा था कि वह बेवजह उस के और मलय के संबंधों को ले कर इतनी चिंतित थी.

अर्पणा आटोरिकशा से घर लौट गई और डिनर की तैयारी में जुट गई.

इधर मलय ने अपना काम झटपट निबटाया और मोटरसाइकिल को बैंक परिसर में ही गार्ड के हवाले कर अनुराधा और लूसी के साथ उस के मकान पर पहुंचा.

लूसी वहां अपनी मां के साथ रहती थी. उस के पिता एक बीमारी में गुजर गए थे. एक बहन थी जिस की शादी हो गई थी. चेन्नई में उन का एक पुश्तैनी घर था, जिसे उस की मां ने बेच कर रुपए बैंक में जमा करा दिए थे.

अब उस की मां उसी पैसे से आगरा में ही एक फ्लैट खरीदने का मन बना रही थी, लेकिन लूसी का कहना था कि बैंक से उसे बहुत ही कम ब्याज पर लोन मिल जाएगा, इसलिए अब फ्लैट लूसी के नाम से लोन ले कर खरीदने का मन था. ईएमआई बैंक में जमा पैसे के ब्याज से देना था.

मलय लूसी से काफी सीनियर था, इसलिए लूसी उस की काफी इज्जत कर रही थी. आज तो उस की पत्नी भी आई थी. मकान मालिक लूसी का रिश्तेदार ही था, इसलिए मलय को किराए पर मकान देने के लिए राजी करने में उन्हें दिक्कत नहीं हुई.

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मलय और अनुराधा को मकान बहुत पसंद आया. यह न हवादार था, बल्कि काफी साफसुथरा भी था. किराए का एडवांस दे कर और चायनाश्ता करने के बाद मलय और अनुराधा सीधे अर्पणा के घर पहुंचे, क्योंकि अब काफी समय हो गया था और अपने क्वार्टर जा कर लौटने में काफी रात हो जाती.

‘‘अगर आप फ्रेश होना चाहते हो तो हो लो, डिनर तैयार है,’’ अर्पणा बोली, तो अनुराधा बाथरूम में चली गई.

मलय ने कहा, ‘‘मुझे बाथरूम जाने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘मकान ठीक लगा?’’ अर्पणा ने पूछा.

‘‘हां, कमरे तो 2 ही हैं, लेकिन बड़ेबड़े हैं, हवादार भी.’’

‘‘अच्छा है, भाभी की चिंता खत्म हुई.’’

‘‘लेकिन, अब तुम्हें परेशानी हो गई.’’

अर्पणा कुछ न बोली. तभी अनुराधा आ गई. खाने की मेज पर तीनों बैठे.

‘‘कब तक नए मकान में शिफ्ट होना है?’’ अर्पणा ने पूछा.

‘‘अगले हफ्ते तक. इस बीच मकान में सफाई का काम करवाऊंगा, क्योंकि पिछले 6 महीने से मकान बंद था और पिछले किराएदार ने उस में जगहजगह कीलें गाड़ रखी?हैं. बाथरूम और किचन दोनों गंदे हैं.’’

‘‘जब तक हम नए मकान में शिफ्ट नहीं हो जाते, अर्पणा को अपने साथ ही ले जाना मलय,’’ अनुराधा ने कहा, तो मलय चुप हो गया.

‘‘पर, अब मैं खुद ही मलय के साथ न जाऊंगी भाभी,’’ अर्पणा ने कहा, तो अनुराधा को कुछ कहते न बना. सच तो यही था कि उसी के चलते मलय को दूसरा मकान लेना पड़ा था, वरना जैसे चल रहा था, वैसे ही चलने देती वह, लेकिन औरत सबकुछ बरदाश्त कर सकती है किसी पराई औरत की अपनी शादीशुदा जिंदगी में दखलअंदाजी नहीं.

‘‘भाभी, अब तुम मलय को संभालो. उसे तुम्हारे प्यार की जरूरत है. मैं तुम्हारी जिंदगी में दखल देना नहीं चाहती.

‘‘अब मैं अपने दिल की बात छिपाऊं, तो तुम्हारे प्रति नाइंसाफी होगी. यह सच है कि मैं मलय से प्यार करने लगी थी. कई बार दिमाग हमें सलाह देता है, क्या करना चाहिए, क्या नहीं, हिदायत देता है, लेकिन दिल उसे अनसुना कर देता है, लेकिन भाभी, जीवन सिर्फ भावनाओं से नहीं चलता. मैं भूल गई थी अपनी हैसियत को, बेवजह मलय की जिंदगी में दखल दे रही थी. माफ कर देना मुझे,’’ यह कहते हुए अर्पणा रो पड़ी.

‘‘ऐसा कुछ भी गलत नहीं हुआ था अर्पणा, जिन हालात में मलय और तुम रह रहे थे, उन में ऐसा होना कोई अजूबा नहीं था. पर मैं भी क्या करती, सासससुर को गांव में बिना किसी सही इंतजाम के छोड़ भी तो नहीं सकती थी.

‘‘एक बार जिद कर यहां आना चाहती थी, लेकिन जानती हो, दिल ने मेरी बात नहीं सुनी और मैं ने अपना विचार बदल दिया.

‘‘पर, बर्थडे के दिन जब मलय के बदले तुम ने फोन रिसीव किया था, तब मैं रातभर न सो पाई. मन किसी डर से बेचैन था और उसी दिन मैं सासससुर की देखभाल के लिए किसी को खोजने लगी.

‘‘और जब कल मैं यहां आई और जाना कि मलय तुम्हें मोटरसाइकिल से बैंक ले जाता है और तुम्हारा साथ पाने के लिए ही वह इतनी दूर इस दमघोंटू महल्ले में रहता है, तब मुझे सच ही बरदाश्त नहीं हुआ और मैं ने तुरंत तय कर लिया कि मलय को इस महल्ले से बाहर निकालना है.’’

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‘‘और तुम अपने मिशन में कामयाब हो गई,’’ कह कर मलय मुसकराया.

कुछ तनावग्रस्त हो रहे वातावरण में हलकापन आ गया और जब अर्पणा के आंसू अनुराधा ने अपने रूमाल से पोंछे तब दोनों के दिल स्नेह से भर गए.

जब मलय और अनुराधा अर्पणा से विदा लेने लगे, तब दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया. भटका मन अब वापस आ गया था.

Bigg Boss 14 : घर की नई कैप्टन रूबिना दिलाइक हुई ट्रोल, फैंस ने कहा ये कैप्टेंसी खैरात में मिली है!

बिग बौस 14 (Bigg Boss 14) के लेटेस्ट एपिसोड के अनुसार घर की नई कैप्टन रूबिना दिलाइक बनी हैं. घर में इस बात को लेकर राहुल वैद्य और जैस्मिन भसीन ने विरोध किया था.

तो वहीं अब इस शो के मेकर्स ने भी रूबिना दिलाइक को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है. बीते वीकेंड के वार में एक से बढ़कर एक धमाका हुआ. विकेंड के वार में सलमान खान, अर्शी खान पर जमकर बरसे. साथ ही उन्होंने उन्होंने अली गोनी को भी जमकर लताड़ा.

दरअसल शो के बीते एपिसोड में कैप्टेंसी टास्क में घरवालों ने खूब मस्ती की थी और किसी ने भी इस टास्क को जीतने के लिहाज से नहीं खेला था.

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इस विकेंड के वार में सलमान खान, अली गोनी (Aly Goni) की कैप्टेंसी को उनसे छीनकर ये जिम्मेदारी रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik) को दे दी.

तो ऐसे में सोशल मीडिया पर फैंस अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं. फैंस ये भी कह रहे हैं कि रुबीना दिलाइक को ये कैप्टेंसी खैरात में मिली है. साथ ही लोगों का ये भी कहना है कि मेकर्स रुबीना और एजाज के ही फेवर में नजर आते हैं.

इस शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि रूबिना दिलाइक के कैप्टन बनने से घर में क्या क्या बदलाव देखने को मिलने वाला है.

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किसान आंदोलन में ‘पिज्जा’ की तलाश

लेखक-रोहित और शाहनवाज

दिल्ली की बढ़ती ठंड में ईंटों की दीवारों वाले गरम कमरे में रजाई में पैर डाले आराम फरमाते हुए शहरी अमीर लोग अपने लैपटौप पर इंटरनैट के जरीए किसान आंदोलन की लेटेस्ट अपडेट जान रहे थे. यूट्यूब पर अलगअलग चैनलों की लेटेस्ट खबरें देखीं तो कुछ और ही तरह के नैरेटिव चल रहे थे.

किसान आंदोलन मजे में… आखिर पिज्जा, फुट मसाजर, गीजर, वाशिंग मशीन वाले इन किसानों को फंड कहां से आ रहा है? क्या इतनी सहूलियत वाले ये किसान गरीब हैं? आंदोलन या पिकनिक… आखिर चल क्या रहा है?

ऐसे न जाने कितनी सुर्खियां खबरिया चैनलों की हैडलाइंस बनी हुई थीं. सिर्फ न्यूज चैनलों में ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसी के संबंध में मैसेज फौरवर्ड हो रहे थे.

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एक पल के लिए सोचा कि क्या सही में किसान मजे में यह आंदोलन कर रहे हैं? क्या सच में ये किसान नहीं, बल्कि आढ़ती और बिचौलिए हैं? हमारे मन में इन सवालों के उठने के बावजूद इस के काउंटर में कुछ और सवाल भी खड़े हो रहे थे. हम ने खुद को कहीं न कहीं असमंजस में पाया, जिसे खत्म करने का एक ही रास्ता था कि एक बार फिर से सिंघु बौर्डर पर जा कर माहौल का जायजा लिया जाए और देखा जाए कि न्यूज चैनल और सरकार के मंत्री जो दावा कर रहे हैं, उस में कितना दम है.

सिंघु बौर्डर पर जाने के बाद हमने पाया कि पिछली बार पुलिस की जो बैरिकेडिंग 200 मीटर आगे हरियाणा की तरफ थी, वह अब 200 मीटर पीछे दिल्ली की तरफ बढ़ाई हुई थी. बैरिकेड लोहे वाले नहीं बल्कि रास्तों को बांटने के लिए पत्थर के बड़ेबड़े डिवाइडर लगाए गए थे, वह भी 10-12 लेयर में. उन के ऊपर लोहे की कंटीली जंजीरें बिछी हुई थीं.

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पुलिस की ठीकठाक चौकसी थी. बैरिकेड पर करने के बाद देखा कि बड़ी तादाद में लोगों का हुजूम बैरिकेड के बाद ही मौजूद था. पिछली बार तो एक ही स्टेज देखा था, जहां पर किसान नेताओं और दूसरे लोगों के भाषण चलते रहते थे, लेकिन इस बार गए तो 2 स्टेज लगाए गए थे, एक हरियाणा की तरफ मुंह कर के और एक दिल्ली की तरफ मुंह कर के.

प्रोटैस्ट की जगह पर अंदर की तरफ बढ़े तो देखा कि गरमागरम चाय के साथ लोगों का स्वागत किया जा रहा था. यह मेन स्टेज के पीछे का हिस्सा था जहां पर चाय बांटी जा रही थी. मेन स्टेज की तरफ बढ़े तो हमें स्टेज पर कुछ लोग गाने गाते हुए दिखाई दिए. कुछ देर खड़े हो कर गाना सुना और आगे बढ़ चले पिज्जा की तरफ.

अब हमें मालूम तो नहीं था कि पिज्जा कहां बांटा जा रहा है, इसीलिए हम बड़े ही गौर से हर जगह जहां पर कुछ भी बंटता देखते और आगे की ओर बढ़ते रहते. सिंघु बौर्डर पर डेढ़ किलोमीटर आगे तक बिना किसी से बात किए हम हर जगह का जायजा लेते रहे. कोई रोटीसब्जी बांटता तो कोई आलूपूरी, कोई दालचावल बांटता तो कोई चायबिसकुट. लेकिन एक चीज जो हम ने अभी तक नोटिस नहीं किया वह था पिज्जा का काउंटर. भला नोटिस भी कैसे करते, नोटिस करने के लिए काउंटर का होना भी तो जरूरी था.

अनोखा ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’

पिज्जा का काउंटर ढूंढ़ने का एक फायदा यह हुआ कि हम ने प्रोटैस्ट साइट को बड़े ही गौर से देखापरखा. पिज्जा का काउंटर अभी तक तो नहीं मिला था, लेकिन हमें हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले से सोनू वेरिता का ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’ जरूर दिख गया.

सोनू गांव पेहोवा में नाई हैं और वहीं पर ही अपना ब्यूटी सैलून चलाते हैं. सोनू ने हम से बात की और उन्होंने बताया, “हमारे गांव के लोग इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए यहां आए हुए हैं. जो लोग हफ्ते में 4 दिन मेरे सैलून में आया करते थे, वे लोग पिछले एक महीने से नहीं आए, इसीलिए मैं ने अपना सामान बांधा और मैं भी आ गया अपने गांव के लोगों के पास उन की सेवा करने के लिए.”

सोनू यहां पर पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि इस किसान आंदोलन में अपने तरीके से हिस्सेदारी निभाने के लिए आए हैं. सोनू और उन के साथ 2 और लोग बिना पैसों के और बिना थके लगातार लोगों के बाल काट कर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं.

इस में कोई शक नहीं कि सोनू की टीम को देख कर गोदी मीडिया यह कवरेज कर सकता है कि ‘ऐयाशी की हद तो देखिए, अपने साथ नाई भी लाए हैं’, ‘बाल भी कटवा रहे हैं’ वगैरहवगैरह. लेकिन सोनू से बात कर के महसूस हुआ कि वे लोग इस आंदोलन में किसी भी तरह की हिस्सेदारी निभाना चाहते हैं. उन्हें किसी ने यह करने के लिए रिक्वैस्ट नहीं की है और न ही किसी ने उन्हें कमांड दी है. उन्होंने खुद से इस आंदोलन में अपनी जिम्मेदारी ली और वे इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा भी रहे हैं.

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बुजुर्गों के लिए ‘फुट मसाजर’

खैर, बात पिज्जा की हो रही थी, लिहाजा ‘क्रेजी ब्यूटी सैलून’ को पीछे छोड़ हम आगे बढ़े. 200-300 मीटर ही चलें होंगे, तो देखा कि एक बड़े से तंबू के अंदर प्रदर्शन में आए लोगों के लिए ‘फुट मसाजर’ का इंतजाम किया गया था. हम ने उस तंबू की तरफ कूच किया. देखा कि उस के बाहर तकरीबन 50-60 उम्र के 20 बुजुर्गों की लाइन लगी थी, जिस के गेट पर एक वालंटियर भी खड़ा था. वालंटियर एकएक कर के लोगों को अंदर भेज रहा था. हम गए तो उन्होंने हमें रोका और पंजाबी में कहा, “वीरे, इकइक कर के सब दा नंबर आएगा.”

हम ने उन्हें बताया कि हमें मसाज नहीं करवाना है, हम मीडिया से हैं और बात करना चाहते हैं, तो उस के जवाब में भी उन्होंने हमें गेट के बाहर से ही दिखाते हुए कहा, “एक मीडिया वाले पहले से ही अंदर हैं, वे निकल जाएं तो आप का नंबर आएगा.”

उस वालंटियर की यह बात सुन कर मन में बड़ी तस्सल्ली सी हुई कि यहां किसी को भी स्पैशल ट्रीटमैंट नहीं दिया जा रहा. सब के साथ एक जैसा बरताव हो रहा है. खैर, पहले वाले मीडिया कर्मी बाहर आए और उन्होंने हमें अंदर जाने के लिए मंजूरी दे दी.

अंदर जाते ही हमारी नजर उन ‘फुट मसाजर’ मशीनों पर पड़ी जिस के लिए नैशनल मीडिया चैनल अपने ‘प्राइम टाइम शो’ पर फालतू के नैरेटिव सैट करने की कोशिश करने में लगे हैं.

अंदर हमारी बात पटियाला के शेरबाज सिंह से हुई, जो चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं और ‘खालसा एड संस्था’ से जुड़े हैं.

शेरबाज सिंह से हुई बातचीत में उन्होंने इस पूरे प्रोजैक्ट के बारे में बताया, “यहां हम ने 17-18 फुट मसाजर का इंतजाम किया है यानी एक बार में 17-18 लोगों की ऐंट्री और 10 मिनट का सैशन. यह इनीशिएटिव ‘खालसा एड एनजीओ’ का है. प्रोटैस्ट में बुजुर्गों की तादाद का ध्यान रखते हुए हम ने यहां इन का इंतजाम किया है, क्योंकि बड़े उम्र के लोग जल्दी थक जाते हैं और पैरों का आराम उन की थकान मिटाने के लिए सब से बेहतरीन उपाय है.”

शेरबाज सिंह ने आगे बताया कि यह पूरा प्रोजैक्ट तकरीबन 2 लाख रुपए के आसपास का है, जिस में मशीनों से ले कर, बिजली, कुरसियां, तंबू, तकिए वगैरह सब का खर्चा जुड़ा हुआ है. ‘खालसा एड’ एक इंटरनैशनल एनजीओ है जो मानवतावादी सिद्धांतों पर चलती है और दुनिया में कहीं भी लोगों को जरूरत हो तो वह उन की मदद के लिए हमेशा तैयार रहती है.

शेरबाज सिंह ने मीडिया में चल रही झूठी खबरों का खंडन करते हुए कहा, “हर एनजीओ के पास पैसे का एक ही सोर्स होता है और वह है लोगों का डोनेशन. डोनेशन से जो पैसा जमा होता है वह हम समाज में नेक काम के लिए खर्च करते हैं. हम ने देखा कि भारत में केंद्र सरकार ने जिन कृषि कानूनों को लागू किया है उस के खिलाफ किसान सड़कों पर आंदोलन करने पर मजबूर हुए हैं. इस आंदोलन की खास बात यह है कि जितनी तादाद यहां पर नौजवानों की संख्या हैं उतनी ही संख्या यहां पर बुजुर्गों की भी है, इसलिए इस बात पर खास हम ध्यान दे रहे हैं.”

वालंटियर की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने अपनी बात जारी रखी, “ये भाई जो गेट पर खड़े हो कर सिस्टम को मैनेज कर रहे हैं इन्हें किसी ने यह काम करने के लिए मजबूर नहीं किया है, बल्कि वे खुद ही पिछले एक हफ्ते से इस आंदोलन में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए यहां पर काम कर रहे हैं और बुजुर्गों का खयाल रखना तो हमें हमारे परिवार में ही सिखाया जाता है.

“हम ने बचपन में अपनी किताबों में भी पढ़ा है, तो जब उन्हीं बुजुर्गों के लिए ‘खालसा एड’ इन मशीनों को ले कर उन की केयर करना चाहता है तो यह मानवतावादी काम हुआ, न कि ऐयाशी.”

शेरबाज सिंह की बात तो एकदम सही थी. सरकार और मीडिया को इस आंदोलन को बदनाम करने का जुनून इतना सिर पर चढ़ा है कि बुजुर्गों के लिए किए गए इंतजाम भी उन्हें फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं.

रोटी मेकर मशीन की जरूरत

अब हम थोड़ा और आगे बढ़े, तो एक लंगर वाले काउंटर पर ‘रोटी मेकर मशीन’ नजर आई. हमारे कदम वहीं रुक गए और उस तरफ आगे बढ़ कर काउंटर पर खड़े हो चले. इतने में एक आदमी जयप्रकाश, जो मशीन में बटन दबा कर कुछ सैट करने में बिजी था, हमें आता देख वह हमारी तरफ बढ़ा.

दिल्ली के रहने वाले जयप्रकाश ने हमें इस रोटी मेकर मशीन के बारे में जानकारी दी. उस ने बताया कि यह मशीन एक घंटे में तकरीबन 1,200 रोटियां सेक सकती है. यह मशीन 30 नवंबर से यहां पर लोगों की सेवा के लिए लाई गई है. हर दिन तकरीबन 12,000 से 13,000 लोगों के लिए रोटियां सेंकी जाती हैं.

उन के पास तकरीबन 4 महीने का राशन मौजूद था. एक सवाल जो हम आजकल अकसर लोगों से सुन रहे हैं, वह यह है कि किसानों के पास इतना राशन आया कहां से? यह सवाल बचकाना है, अब कोई ‘मोदी के झूट की पोटली’, ‘अंबानीअडाणी के पास बढ़ती संपति’ और ‘किसानों के पास राशन कहां से आया’, यह पूछे तो उस के मन में खोट है. वह आदमी या तो बेवकूफ है या बेवकूफ बना रहा है. जो किसान अपने उगाए अनाज से पूरे देश का पेट भर रहा है उस के पास राशन नहीं होगा तो किस के पास होगा?

हमने देखा कि तकरीबन 10 लोग बड़े से पतीले पर आटा गूंद रहे थे और 10 और लोग पहले के गुंदे आटे की छोटीछोटी लोई बनाने का काम कर रहे थे. बाकी बेलने और सेंकने का काम रोटी मेकर मशीन का था.

रोटी मेकर मशीन की कीमत का तो जयप्रकाश को भी अंदाजा नहीं था, लेकिन उन्होंने बताया कि ये 2 मशीनें दिल्ली के लोगों ने आपस में चंदा जमा कर के खरीदी है. जो लोग रोटी बनाने का काम कर रहे हैं वे सब इसी आंदोलन में आए लोग हैं, जो अपने हिसाब से अपना समय दे रहे हैं और काम कर रहे हैं.

ठंड में गीजर से राहत

रोटी मेकर मशीन देखने के बाद, हम मेन स्टेज से तकरीबन 4 किलोमीटर आगे की तरफ बढ़ चुके थे, लेकिन हमें अभी तक पिज्जा का काउंटर नहीं दिखाई दिया. हमारे मन में पिज्जा की आस अभी तक खत्म नहीं हुई थी. लेकिन कदम और आगे बढ़ते ही चले जा रहे थे.

मेन स्टेज से इतनी दूर आ जाने के बाद अब हमें एक जगह पर आंदोलन करने आए किसान नहाते हुए दिखाई दिए. हम ने हमारे पास आए व्हाट्सएप फौरवर्ड पर पानी के गीजरों के बारे में भी तो पढ़ासुना था. भला इस को देखे बगैर हम कैसे वापस जा सकते थे.

वहां देखा कि पानी के जिन गीजरों के बारे में बात हो रही थी वे तो एकदम देशी किस्म के गीजर थे. यह भी सुना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात वाले किसी एडिशन में इस तरह के गीजर के बारे में लोगों को बता कर उन्हें आत्मनिर्भर भी बनने को कहा था.

अब ऐसे में एक बड़ा सवाल तो यह उठ खड़ा होता है कि जब देश के प्रधानमंत्री ही ऐसी चीजों का प्रचार कर रहे हों और किसान अपने प्रोटैस्ट में इन्ही चीजों का इस्तेमाल कर प्रधानमंत्री के भाषण को साकार बना रहे हों, तो यह चीज कैसे अमीरी की निशानी हो सकती है? अगर यह गुमराह करने वाली बात है तो क्या यह नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री ही लोगों को गुमराह करने का काम कर रहे थे?

जिस तरह का गीजर हम ने देखा वह बड़ा ही साधारण और देशी किस्म का गीजर था. जलती लकड़ियां और गोबर के बने उपले डाल कर पतीले को गरम किया जा रहा था और दूसरी तरफ कुप्पी जैसे आकार वाले बरतन में ठंडा पानी डाला जा रहा था. नल के दूसरे मुहाने से गरम पानी बाहर आ रहा था. ऐसी तकरीबन 20 के आसपास देशी मशीनों का सैटअप लगाया गया था. उसी जगह पर 6 सामूहिक वाशिंग मशीन भी रखी हुई थीं, प्रदर्शनकारियों के कपड़े धोने के लिए.

किसान अपने गंदे कपड़ों को यहां ले आते हैं और यहां मौजूद वालंटियर कपड़े धो कर किसानों को वापस कर देते हैं जिन्हें 90 फीसदी मशीनों में ही सुखा लिया जाता है और बाकि किसान बाहर ले जा कर कहीं भी टांग कर सुखा देते हैं.

इस पूरे सैटअप को लगाने के पीछे की वजह बताते हुए मनवीर सिंह, जो खालसा एड के वालंटियर हैं, ने कहा, “यह गीजर लगाने के पीछे का मकसद सिर्फ इतना था कि कोविड काल में सरकार भी लगातार यह प्रचार कर रही है कि साफसुथरा रहना कितना जरूरी है. ऐसे में अगर बड़ेबुजुर्गों या किसी भी उम्र के लोग इस बढ़ती ठंड में ठंडे पानी से नहाने लगें तो उन के बीमार पड़ने के चांस ज्यादा बढ़ जाएंगे. कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन का आयोजन इसीलिए किया गया है कि अगर वे सब लोग अपनेअपने कपड़े धोने में बिजी हो गए तो आंदोलन की जगह पर कौन मौजूद रहेगा? यह एक तरह का इंतजाम है, जो इस आंदोलन की खासीयत है, इसीलिए हमारे वालंटियर ही उन किसानों के कपड़े धो दे रहे हैं.”

मनवीर सिंह की बातें सुन कर अब तो यह पक्का हो गया था कि मीडिया में जिस तरह से प्रदर्शनकारियों के लिए मौजूद सुविधाओं के संबंध में बदनामी हो रही है वह बिलकुल फुजूल और घटिया दर्जे की है. फिर हमें याद आया कि जो मीडिया इस तरह के नैरेटिव चला रहा है उन्हें तो इस प्रदर्शन में ऐंट्री तक नहीं करने दी जा रही है. मजे की बात तो यह थी कि नैशनल मीडिया चैनलों से कहीं ज्यादा इज्जत यूट्यूब पर चैनल चला रहे स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों की थी. कम से कम उन्हें आंदोलन साइट में घुसने की इजाजत तो मिल रही थी.

पिज्जा की उम्मीद अब हमारे मन में धूमिल होती जा रही थी. हम मेन स्टेज से 4-5 किलोमीटर तक आगे जो आ गए थे. लेकिन हमें पिज्जा एक भी जगह पर बंटता हुआ नजर नहीं आया. हां, 1-2 जगहों पर खीर जरूर बांटी जा रही थी, लेकिन पिज्जा तो कहीं नहीं दिखा. शाम ढल चुकी थी और ढलती शाम के साथसाथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी.

लिहाजा, हमें हार मान कर किसी से पूछना ही पड़ा, “अंकल, यह पिज्जा कहां बंट रहा है?”

अंकल ने हमें बड़ी पैनी नजरों से देखा और अपने मुंह से मफलर हटा कर कर अपनी भारी आवाज में कहा, “पिज्जा कहां ढूंढ़ रहे हो बेटा. यहां बस एक बार ही पिज्जा बंटा था. उस के बाद तो कुछ ऐसा नहीं बंटा.”

यह सुन कर तो हमें लगा कि हम जिस उम्मीद का पीछा करते करते यहां इतनी दूर आ चुके थे, वह तो यहां मौजूद ही नहीं है. ऐसे में अपने टूटते हौसलों के साथ और ढेरों सवालों के जवाब की गठरी उठाए हम ने अपने गले में मफलर बांधा, पास में बंट रही गरम चाय का एक कप लिया, और चुसकी मारते हुए हम मेन स्टेज की तरफ से होते हुए बसस्टैंड की तरफ चल पड़े.

जवाबों की गठरी

किसान आंदोलन में आए प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं को जिस तरह से मेनस्ट्रीम मीडिया ने गलत तरीके से प्रचार करने का काम किया उस से यह समझ में आता है कि ये सभी मीडिया चैनल किसी फिक्स एजेंडा को ले कर काम कर रहे हैं. उदाहरण के लिए किसानों के नहाने के लिए गीजर का इंतजाम करना और कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन का करना करना कहीं से भी उन की ऐयाशी नहीं जाहिर करती. अब इतनी बढ़ती ठंड में कोई भी इनसान नहाने के लिए गरम पानी का ही इंतजाम करेगा न.

मीडिया चैनल वाले क्या चाहते हैं कि किसान न नहाएं? साफसुथरे किसान इन की आंखो को चुभते हैं क्या? किसानों को ले कर इन की यह सोच बस छोटी सोच को ही जाहिर करता है. ये लोग देश के किसानों को अभी भी उसी पुराने किसान की तरह समझते हैं जो फटे कपड़ों में, बदन पर चीथड़े लपेटे, अंगूठाछाप था.

वैसे तो हमें कहीं पर पिज्जा नजर नहीं आया, लेकिन वहां जा कर जब हम ने पिज्जा के बारे में पूछा तो पता चला कि जो पिज्जा बना कर लोगों के बीच बांटा जा रहा था, उस का खर्चा रोटी के खर्चे के तकरीबन बराबर ही है. जब पिज्जा की बात होती है तो शहरी लोगों को डोमिनोज या पिज्जा हट का खयालल आता है, जो एक फैंसी पिज्जा के 150 रुपए तक ले लेता है. यहां ऐसा नहीं था. 2 रोटी के बराबर की आटे की लोई, ऊपर से टमाटर की चटनी जिस के ऊपर टौपिंग के नाम पर कुछ शिमला मिर्च या मक्के के दाने और ऊपर से कोई चीज नहीं. इस के लिए मैटिरियल का इंतजाम करना किसान के लिए बड़ी बात नहीं. रोटी सादी नहीं खाई जा सकती, उस के लिए साथ में सब्जी का होना जरूरी है यानी बनाने में डबल मेहनत और खर्चा कम नहीं है. लेकिन पिज्जा में एक ही बार में बेस के ऊपर सब्जियां डाल कर सेंक दी जाती हैं यानी बनाने में एक बार की ही मेहनत और खर्चा इतना भी नहीं कि जेब ढीली हो जाए.

अब कोई अगर यह पूछ ले कि इन के पास यह सब सामान कहां से आ रहा है, तो यह लाइन फिर से कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के झूठे वादे, अंबानी अडाणी के पास बढ़ता पैसा और किसानों के पास अनाज कहां से आया, पूछना ही बेवकूफी और बेमानी है.

क्या कंगना रनौत को मिल रही हैं रेप की धमकियां, देखें ये वीडियो

पंगा क्विन कंगना रनौत (Kangana Ranaut) ने ये खुलासा किया है कि किसानों के बारे में बोलने के बाद से उन्हें रेप की धमकियां मिल रही है. उन्होंने आगे ये भी बताया कि जान से मारने की भी उन्हें धमकी दी गई है.

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दरअसल कुछ टाइम पहले ही कंगना ने एक वीडियो शेयर किया. इस वीडियो में उन्होंने कहा है कि इन पिछले 10-12 दिनों से मुझे इमोशनल और मेंटल आनलाइन लिंचिंग का सामना करना पड़ रहा हैं. मुझे रेप और जान से मारने की धमकी मिली है,  इसलिए मेरा हक बनता है कि मैं अपने देश से कुछ सवाल करूं.

 

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कंगना रनौत ने किसान आंदोलन के बारे में बात करते हुए हुए कहा, इसमें कोई शक नहीं है कि पूरा आंदोलन राजनीति से प्रेरित है. आतंकवादियों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया है. मैंने पंजाब में अपनी स्कूल की पढ़ाई की है.

उन्होंने आगे कहा, मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि पंजाब के 99 प्रतिशत लोग खालिस्तान नहीं चाहते. वे देश का टुकड़ा नहीं चाहते हैं. वे देश प्रेमी हैं. हाल ही में कंगना रनौत ने बिल्किस बानो दादी को लेकर ट्विट किया था. उन्होंने ये आरोप लगाया था कि शाहीन बाग की ‘अनपढ़ दादी’ बिना किसी जानकारी के प्रदर्शन में जुट गईं. इस तरह से लोगों को मोहरा बना लिया जाता है जिनको कुछ पता नहीं होता है. यह ट्विट काफी वायरल हुआ.

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इस पर बिल्किस दादी ने  कंगना को जवाब देते हुए कहा, वह भी हमारी बेटी है. हमे नासमझ कह रही है. जब हम बच्चे पैदा करना जानते हैं, उन्हें लिखाना-पढ़ाना जानते हैं तो वैसे ही थोड़ी बैठे हैं. जामिया में, जेएनयू में हमारे बच्चों को मारा तो हमसे बर्दाश्त नहीं हुआ. पुलिस की बर्बरता हमसे देखी नहीं गई.

 

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आपको बता दें कि बिल्किस बानो दादी दो कि एंटी सीएए प्रोटेस्ट के दौरान शाहीन बाग प्रदर्शन में मशहूर चेहरा थीं. इनके बारे में कंगना ने ट्विट किया था.

मैं किसी और लड़की से बात करता हूं तो मेरी गर्लफ्रेंड नाराज हो जाती है, ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए ?

सवाल

मैं 26 वर्षीय युवक हूं. मैं जैसी गर्लफ्रैंड चाहता था वैसी ही मुझे मिली. सबकुछ अच्छा है. वह मुझे बहुत प्यार करती है, लेकिन वह मुझे लेकर ज्यादा ही पजेसिव है. मेरा किसी और लड़की से बात करना या मैं उसे दिन में एकदो बार फोन नहीं करता तो नाराज हो जाती है. फिर उसे मनाओ, तब जाकर मानती है. सोचता हूं कि शादी के बाद भी इस का रवैया ऐसा रहा तो, बस, मैं तो इसे मनाता ही रह जाऊंगा. कृपया बताएं, मेरा सोचना क्या सही है?

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जवाब

आप की समस्या को दूसरे नजरिए से देखते हैं, तो हम यह कहेंगे कि आप लकी हैं कि आप को इतना चाहने वाली गर्लफ्रैंड मिली है. जिंदगी में सच्चा प्यार करने वाला मिले तो उस की कद्र करनी चाहिए.

इस में दोराय नहीं कि रिश्ता कोई भी हो, ट्रस्ट होना जरूरी है. आप की गलफ्रैंड आप का किसी और लड़की से बात करना पसंद नहीं करती तो इस की वजह आप का व्यवहार भी हो सकता है. गर्लफ्रैंड को यह यकीन दिलाएं कि आप सिर्फ और सिर्फ उसी के हैं. और यह यकीन आप ही उसे दिला सकते हैं. रही बात शादी की, तो शादी के बाद परिस्थिति बदल जाती है. पतिपत्नी का साथ चौबीसों घंटों का होता है.

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एकदूसरे की सभी गतिविधियों को अपने सामने देख रहे होते हैं. ऐसे में लड़की की पजैसिवनैस कम हो जाएगी. वक्त के साथ बहुतकुछ बदलता है. उस का रवैया बदलेगा, पर प्यार नहीं और पतिपत्नी के रिश्ते में तो प्यार जरूरी है. ज्यादा सोचविचार मत कीजिए. शादी कर लीजिए और प्यारभरी जिंदगी बिताइए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Serial Story- प्रश्न : क्या पति की मौत के बाद उसकी जिंदगी सवाल बनकर रह गई ?

प्रश्न – भाग 2

लेखक-उषा किरण सोनी

शायद यहां भी उस रचनाकार ने मेरी व राज की जीवनी में एक सी पंक्ति लिख दी थी. हम दोनों के पति अपनेअपने परिवार की इकलौती संतान थे. मधुयामिनी के बाद मांबाबूजी के अकेले रह जाने के भय से हम मधुमास मनाने कहीं बाहर नहीं गए. मैं और मदन, मदन और मैं, दोनों आत्मसात हो गए एकदूसरे में.

एक सप्ताह बाद जब भैया मुझे लेने आए तो बाबूजी ने कहा, ‘मदन की डेढ़ महीने की छुट्टी बाकी है इसलिए बहू को यहीं रहने दो. मदन के जाने के बाद ले जाना.’ फोन पर पापा ने भी अपनी सहमति दे दी. भैया ने वापस जाते समय राज के 2 पत्र मुझे दिए जो मेरी गैर मौजूदगी में आए थे.

बिना संबोधन के राज ने लिखा था, ‘रीता, राजेंद्र आगे की पढ़ाई करने 2 साल के लिए विदेश जा रहे हैं. मैं तो 2 दिन नहीं रह सकती राजेंद्र के बिना ये 2 साल कैसे बीतेंगे? मैं राजेंद्र में इतनी खो गई थी कि तुझे पत्र लिखने की याद ही न रही. मेरा तो सारा संसार ही राजेंद्रमय हो गया है. सच, रीता, तू शादी मत करना. जानती है, आदमी शादी के बाद पागल हो जाता है, मेरी तरह.’

मैं पढ़ कर हंसी. कैसा संयोग था कि उस की शादी के दिन मेरे मदन मुझे देखने आए थे और मेरी शादी के समय उसे ससुराल में रहने के कारण सूचना न मिल पाई थी क्योंकि कार्ड मैं ने उस की मां के घर भेजा था.

मैं ने मदन को राज के पत्र दिखा कर अपनी गहरी दोस्ती की बात बताई. पतियों संबंधी कल्पनाओं और शरारतों को सुन मदन हंसे बिना न रह सके. बोले, ‘सच ही तो है कि शादी के बाद आदमी पागल हो जाता है,’ और उन्होंने मुझे अपनी बांहों में समेट लिया…मैं राज को पत्र लिखना भूल गई.

मुट्ठी में बंधी रेत की तरह मदन की छुट्टियों के दिन खिसक गए. उन के जाने का समय निकट जान मैं घबरा उठी. क्या यह इंद्रजाल सा मोहक जीवन मेरी मुट्ठी से फिसल जाएगा. नहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी, पर क्या सोचने से ऐसा हो पाया है. क्या सचमुच मदन मुझे यहां छोड़ कर चले जाएंगे? पता नहीं मन क्यों दुश्ंिचताओं से घिरा जा रहा है. पापा मुझे लेने और मदन से मिलने आ गए थे.

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मदन सामान बांधे खड़े थे और मेरा रोरो कर बुरा हाल था. वे भीतर आ कर बोले, ‘रीतू, बस, तुम घर जा कर अपनी मां से मिल आओ तब तक मैं क्वार्टर का इंतजाम कर लूंगा और तुम्हें ले जाऊंगा फिर हम होंगे और हमारी बसंत ऋतु.’

आखिर मदन चले गए और उसी दिन शाम को मैं पापा के साथ उत्तरकाशी चली गई. मदन से दूर मन उदास और अतृप्त था, पर मां के प्यार व भैया और पापा के दुलार से तपन को थोड़ी शांति मिली.

मां मुझे सुखी देख प्रसन्न थीं. मुझे हर रोज मदन का प्यार में भीगा एक पत्र मिलता. मैं खुश हो उठती और तुरंत उत्तर देती. 3-4 दिनों बाद मैं ने मां से कहा, ‘आज मैं राज को पत्र लिखूंगी, इधर उस का कोई समाचार नहीं मिला.’

मां उदास हो कर बोलीं, ‘बेटी, मैं ने तुम्हें पत्र में नहीं लिखा. दरअसल, राज के साथ अनहोनी हो गई. राजेंद्र जिस हवाईजहाज से विदेश जा रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया और राजेंद्र नहीं रहे. राजेंद्र की मौत का समाचार सुनते ही राज की हृदयगति रुक गई और उस ने भी शरीर छोड़ दिया. वह सती थी.

‘क्या?’ मेरे मुंह से निकला और मैं चेतनाशून्य हो गिर पड़ी. मां ने घबरा कर भैया को डाक्टर बुलाने भेज दिया.

आंखें खुलने पर मैं ने पाया कि मां के चेहरे पर गंभीरता की जगह मुसकान थी. वह मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘बेटी, खुद को संभालो. जीवन में ऐसे क्षण तो आते ही हैं. उस का दुख न करो, वह सती थी. अपना ध्यान रखो. अब तुम्हारा उदास रहना ठीक नहीं. तुम अब मां और मैं नानी बनने वाली हूं.’

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मैं पुन: चौंक पड़ी. मैं मां बनने वाली हूं? इस एक शब्द ‘मां’ ने मुझे राज के दुख से उबार लिया. पलकें शर्म से झुक गईं और आंचल में अपना चेहरा छिपा लिया.

पिता बनने की सूचना पा मदन बौरा से गए थे. लगभग हर रोज उन का पत्र आता. इस पत्र में उन्होंने लिखा था, ‘मैं अति शीघ्र आ रहा हूं, तुम्हें यहां ला कर इस समय का हर पल तुम्हारे साथ जीना चाहता हूं.’

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