प्रश्न – भाग 3

लेखक-उषा किरण सोनी

मैं मदन की प्रतीक्षा में थी पर आया उन का मात्र 2 पंक्तियों का पत्र, ‘रीतू, मैं युद्ध में कश्मीर जा रहा हूं, मेरी कीर्ति को संभाल कर रखना. तुम्हारा मदन.’

इस समाचार के पाते ही मेरे सास- ससुर मुझे लेने आ गए पर मेरे पिता के अनुरोध पर प्रसव तक यहीं रहने की अनुमति दे चले गए.

मेरे भीतर जीवन कुलबुलाने लगा था. मैं उस सुख को जी रही थी. आखिर वह प्रतीक्षित क्षण भी आ गया. कीर्ति का संसार में पदार्पण मांपापा और अम्मांबाबूजी के आनंद को सीमित नहीं कर पा रहा था पर मेरी खुशी तो मदन के बिना अधूरी थी. नन्हे मदन के रूप में बगल में सोई बेटी को देख मैं सुख से अभिभूत हो गई.

कुदरत ने यहां भी मेरी व राज की जीवन जिंदगी की जीवनी एक ही लेखनी से, एक ही स्याही से लिखी थी. अस्पताल से आए अभी 15 दिन ही हुए थे कि कश्मीर में गिरे बम के टुकड़े मेरी छाती पर आ गिरे और मेरा सिंदूर पोंछ, चूडि़यां तोड़ गए. मैं हतबुद्धि हो कल्पना में मदन को देखती रही. मांपापा का कं्रदन और कीर्ति की चीखें भी मेरा ध्यान विचलित न कर सकीं.

मां ने चीखती कीर्ति को मेरी गोद में डाल दिया. बच्ची के दूध पीने के उपक्रम में दर्द मेरी छाती में रेंग उठा. जड़ता टूट चली और बांध टूट गया. पापा ने कहा, ‘इसे रो लेने दो, जितना रोएगी उतनी ही शांति पाएगी और बच्ची से जुड़ती चली जाएगी.’

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कालरात्रि मेरा सबकुछ समेट कर बीत गई. समय चलता गया. कीर्ति मुझे अपनी तोतली बोली से बांधने का प्रयास करती. मैं अपने दुख में यह भी भूल गई थी कि अम्मांबाबूजी ने भी अपना इकलौता बेटा खोया था. मूल गंवा ब्याज के रूप में वे मेरा और कीर्ति का मुख देखा करते.

मैं ने खुद को समेटना शुरू किया. ज्योंज्यों मेरा बिखरना कम होता गया, कीर्ति निखरती चली गई. मैं ने अम्मां- बाबूजी से कहा कि मैं आप को मदन की कमी नहीं खलने दूंगी. मैं अब रीता नहीं, रीतामदन हूं. बाबूजी के साथ मैं ससुराल चली आई. मदन की पेंशन और बाबूजी की बचत से घरखर्च आराम से चल रहा था पर आगे कीर्ति का पूरा जीवन पड़ा था.

मैं ने मन ही मन एक निश्चय किया और बाबूजी से आगे पढ़ने की अनुमति मांगी. वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, तुरंत ‘हां’ कह दिया. उन की बात पूरी होने से पहले ही अम्मांजी बोल पड़ीं, ‘घर का जरा सा तो काम है, मैं बेकार ही बैठी रहती हूं, सब कर लूंगी. तुम जरूर पढ़ो. तुम्हारा दिल भी लग जाएगा तथा कीर्ति का भविष्य भी बना सकोगी.’

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जीवन का अब एक नया दौर शुरू हुआ. मैं ने पहले एम.ए. फिर बी.एड. किया. युद्ध में मारे गए सैनिक की पत्नी होने के कारण नौकरी मिलने में सुविधा हुई. कालिज में प्राध्यापिका बनी. मुझे व्यस्त रहने का बहाना मिला. अम्मांबाबूजी के चेहरों पर संतोष झलक आया. उन्हें लगा मानो उन का मदन लौट आया हो.

हमारी आंखों की ज्योति कीर्ति कब नर्सरी से कालिज पहुंच गई, पता ही नहीं चला. अम्मांबाबूजी हमेशा यही ढूंढ़ते रहते कि कीर्ति के चेहरे पर किसी असुविधा की शिकन तो नहीं? कीर्ति के रूप में मानो वे एक बार फिर मदन को जवान कर रहे हों.

अचानक मुझे जोर का झटका लगा तो यादों का सिलसिला टूट गया. खिड़की से बाहर झांका तो गाड़ी कोटा स्टेशन पर रुक रही थी. यात्री अपना सामान ले कर उतरने की तैयारी में थे. मैं भी अपना सूटकेस ले लड़कियों को संभल कर उतरने का निर्देश देने लगी. स्टेशन पर सभी लड़कियों के मातापिता उन्हें लेने आए थे. चारों ओर शोर बरपा था. चहकती लड़कियां अपने मातापिता को इस टूर की पूरी रिपोर्ट स्टेशन पर ही दे डालना चाहती थीं.

रीता और कीर्ति रिकशा ले कर घर की ओर चल पड़ीं. रीता के विचारों में फिर राज आ बैठी.  सोचने लगी, कैसा संयोग था. दोनों सहेलियों को पति सुख से वंचित होना पड़ा, पर क्या सचमुच ही नियति ने दोनों की जिंदगी का लेखा- जोखा एक सा लिखा था.

शायद नहीं. एक सा होते हुए भी एक सा नहीं.

राज को सभी ने सती की संज्ञा दी. सभी उस का नाम आदर से लेते. सभी कहते, ‘वह सती थी, उस ने पति के साथ ही देह त्याग दी.’

घर आ गया था और मैं अपनी सोच से बाहर निकल आई थी पर मन में एक अनुत्तरित प्रश्न ले कर कि राज को तो सती की संज्ञा दी गई और मुझे. क्या मैं इस संज्ञा की अधिकारी नहीं?

मैं ने जो त्यागा, यह मैं जानती थी. पति का सुख, शरीर की चाहत, हंसनाबोलना, चहचहाना जो किशोरा- वस्था में मेरा और राज का अभिन्न अंग था, सभी तो त्यागा मैं ने. राज के देह त्याग से कहीं ज्यादा. रातदिन एक कर के मैं ने घर को संभाला, कीर्ति को बड़ा किया, मदन के मातापिता की बेटे की तरह सेवा की और लोग कहते हैं, ‘राज सती थी.’ क्या यह सही है. धर्म के चक्करों में पड़े समाज से मैं यह प्रश्न पूछना चाहती हूं पर किसकिस से पूछूं.

रिश्वतखोरी की दुकान में जान की कीमत – भाग 1

सौजन्य : सत्यकथा

उत्तर प्रदेश का महोबा शहर कई मायनों में पूरे भारत में चर्चित है. यह शहर जहां वीर योद्धा आल्हाऊदल की कर्मभूमि रहा, जिन्होंने अपनी वीरता से 52 किलों को फतह किया था, तो दूसरी तरफ यह शहर प्राकृतिक संपदा से भी परिपूर्ण है. यहां के पहाड़ों से निकला ग्रेनाइट पत्थर दूरदूर तक प्रसिद्ध है. महोबा जिले का मुख्य व्यवसाय पत्थर गिट्टी है. जो सड़क व भवन निर्माण में काम आता है.

महोबा जिले का एक व्यवसायिक कस्बा है कबरई. इस कस्बे को स्टोन सिटी के नाम से भी जाना जाता है. कस्बे के बाहर दर्जनों क्रशर कारखाने हैं, जहां पत्थर से गिट्टी बनाई जाती है. पहाड़ तोड़ने का ठेका लेने वाले ठेकेदारों और क्रशर संचालकों का पुलिस के साथ चोलीदामन का साथ रहता है.

क्रशर संचालकों की कई कमजोरियां है. पुलिस इन का भरपूर फायदा उठाती है. कबरई की पत्थर मंडी और क्रशर कारखाने पूरे प्रदेश में अव्वल माने जाते हैं.

कबरई मंडी से रोजाना पूरे प्रदेश के विभिन्न शहरों में गिट्टी के सैकड़ों ट्रक जाते है. गिट्टी की रायल्टी दर 160 रुपया घन मीटर है. क्रशर संचालकों की पुलिस से सांठगांठ इसलिए मजबूरी है कि ट्रक में 12 से 14 घन मीटर तक की गिट्टी भरने का खन्ना जारी होता है, जबकि ट्रकों में इस से 2 गुना 30 घन मीटर तक गिट्टी लोड की जाती है. ऐसे में पुलिस ओवरलोड ट्रकों को रोक कर चालान कर सकती है, जो होते नहीं हैं, पैसे से काम चल जाता है.

अधिकांश क्रशर संचालक ही पहाड़ों के पट्टे लेते हैं. पहाड़ों में चट्टान तोड़ने के लिए विस्फोट का लाइसैंस कम क्षमता का होता है, लेकिन विस्फोट कई गुना ज्यादा करते हैं.

अकसर पहाड़ों में काम करने वाले मजदूर घायल या मौत के शिकार हो जाते हैं. ऐसे में मजदूर और बस्तियों के बाशिंदे हंगामा करते हैं. इस संकट में पुलिस ही क्रशर संचालकों की मदद करती है. फरजी खन्नों से भी पत्थर गिट्टी की ढुलाई होती है. खफा होने पर पुलिस फरजी खन्ने फाड़ कर चालान कर देती है.

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इंद्रकांत त्रिपाठी इसी कबरई कस्बे के जवाहर नगर मोहल्ले में परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रंजना के अलावा बेटा कृष्णा तथा बेटी गुनगुन थी. इंद्रकांत त्रिपाठी क्रशर संचालक थे. उन की कंपनी आरजेएस ग्रेनाइट नाम से थी.

वह गिट्टीपत्थर के बड़े व्यवसाई थे. उन के पास विस्फोटक व मैगजीन का लाइसैंस था. उन के 2 अन्य भाई रविकांत व विजयकांत भी इसी व्यवसाय से जुड़े थे. कबरई पत्थर मंडी में इंद्रकांत की अच्छी प्रतिष्ठा थी.

इंद्रकांत त्रिपाठी पत्थरगिट्टी के बड़े सप्लायर थे. बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे निर्माण में उन के 4 दरजन से अधिक ट्रक गिट्टी सप्लाई में लगे थे. उन का कारोबार वैसे तो ठीक से चल रहा था, लेकिन जब से मणिलाल पाटीदार ने महोबा के एसपी का चार्ज संभाला था, तब से कारोबार में परेशानियां बढ़ने लगी थीं. एसपी मणिलाल पाटीदार ने रिश्वत की रकम में बढ़ोत्तरी कर दी थी और रकम न देने पर ट्रकों का चालान करवाने लगे थे.

एक रोज एसपी मणिलाल पाटीदार ने कबरई थानाप्रभारी देवेंद्र शुक्ल के मार्फत इंद्रकांत के पार्टनर बालकिशोर द्विवेदी व पुरुषोत्तम सोनी को थाना कबरई बुलाया और कहा कि यदि कारोबार करना है तो 6 लाख रुपया प्रतिमाह देना होगा अन्यथा जेल जाओगे.

जेल जाने के भय से दोनों पार्टनर डर गए और सारी बात इंद्रकांत त्रिपाठी को बताई. इस के बाद इंद्रकांत त्रिपाठी ने एसपी मणिलाल पाटीदार से मुलाकात की और बताया कि लौकडाउन में पत्थरमंडी बंद पड़ी है. कारोबार में घाटा हो रहा है. ऐसे में व्यवस्था नहीं हो सकती.

यह सुनते ही पाटीदार नाराज हो कर बोले, ‘‘व्यवस्था नहीं होगी तो जेल जाओगे. मुझे सब पता है. तुम्हारी 50 गाडि़यां है. गाडि़यां चलानी हैं तो हर माह रकम देनी होगी.’’

पुलिस कप्तान की धमकी से इंद्रकांत घबरा गए. उन्होंने भयवश जून व जुलाई 2020 में मणिलाल पाटीदार को 6-6 लाख रुपए भिजवा दिए. इस के बाद उन्होंने पूर्व विधायक (चरखारी) बृजभूषण को अपनी व्यथा बताई और कप्तान की ज्यादतियों की शिकायत की. उन्होंने कहा कि उस की शिकायत शासन स्तर पर की गई है. काररवाई का इंतजार है.

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अगस्त माह में जब इंद्रकांत त्रिपाठी से पुन: रिश्वत का 6 लाख रुपया मांगा गया तो वह परेशान हो उठे. उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि कारोबार ठप होने से वह पैसा नहीं दे पाएंगे. तब उन्हें एसपी की तरफ से धमकी दी गई कि फरजी मामलों में फंसा कर उन्हें जेल भेज दिया जाएगा. यही नहीं उन्हें हत्या तक की धमकी दी गई.

आखिर पुलिस कप्तान पाटीदार की धमकियों से आजिज आ कर 7 सितंबर को इंद्रकांत ने एसपी मणिलाल पाटीदार के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल कर दिया. साथ ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री तथा जिलाधिकारी को भी शिकायती पत्र भेज दिए.

वायरल वीडियो में इंद्रकांत ने एसपी पर 6 लाख रुपया प्रतिमाह उगाही का आरोप लगाया. साथ ही कहा कि अगर उन की हत्या होती है तो इस के जिम्मेदार एसपी पाटीदार होंगे.

7 सितंबर को ही इंद्रकांत ने एक फेसबुक पोस्ट भी लिखी, जिस में उन्होंने लिखा, ‘मेरे प्रिय मित्रों व मेरे प्रिय आदरणीय जनों, हो सकता है मैं कल आप सब के बीच न रहूं, क्योंकि एसपी महोबा किसी भी वक्त मेरी हत्या करवा सकते हैं. वह मुझ से 6 लाख रुपया प्रतिमाह की मांग कर रहे हैं. जिसे मैं देने में असमर्थ हूं.’

प्रश्न – भाग 2

लेखक-उषा किरण सोनी

लेकिन क्या पति की मौत के बाद भी दोनों का जिंदगी जीने का नजरिया एक रहा या अलगअलग? स्टेशन से ट्रेन के चलते ही लड़कियां अपने दुपट्टे को संभालती दोनों ओर की सीटों पर आमनेसामने बैठ कर अपनी चुहलबाजी में व्यस्त हो गईं. मैं देख रही थी कि उन के चेहरे प्रसन्नता से दमक रहे थे. सभी हमउम्र थीं और अपने ऊपर कोई बंधन नहीं महसूस कर रही थीं. मेरी अपनी बेटी कीर्ति भी उन के बीच में खिलीखिली लग रही थी. बंधन के नाम पर मैं थी और मुझे वे अपनी मार्गदर्शिका कम सहेली की मां के रूप में अधिक ले रही थीं.

गजाला ने किसी से कुछ सुनाने को कहा तो बड़ीबड़ी आंखों वाली चंचल कणिका बोल पड़ी, ‘‘अच्छा सुनो, मैं तुम सब को एक चुटकुला सुनाती हूं.’’

मैं भी हाथ में पकड़ी पत्रिका रख चुटकुले का आनंद लेने को उन्मुख हो गई.

‘‘एक बार 3 औरतें मृत्यु के बाद यमलोक पहुंचीं. उन के कर्म के अनुसार फैसले के लिए यमराज ने चित्रगुप्त की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली. वह अपनी बही संभालते हुए बोले, ‘देवाधिदेव, इन्हें कहें कि ये खुद अपने कर्मों का बखान करें. मैं बही में दर्ज कर्मों से मिलान करूंगा.’

‘‘यह सुन कर पहली महिला बोली, ‘मैं ने सारा जीवन धर्मकर्म करते, सास- ससुर व पति की सेवा में बिताया. बच्चों को पालापोसा और उन्हें उचित शिक्षा दी. मेरी क्या गति होगी, महाराज बताइए?’

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यमराज ने सिर हिलाते हुए कहा, ‘हूं,’ और दृष्टि दूसरी महिला पर टिका दी.

‘‘वह थोड़ा मुसकराई फिर बोली, ‘मैं ने सासससुर को तो कुछ नहीं समझा और न ही उन की सेवा की, पर पति की खूब सेवा की. मरते दम तक उन की सेवा को अपना धर्म समझा. अब आप के हाथ में है कि मुझे स्वर्ग दें या नरक.’

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‘‘यमराज ने फिर कहा, ‘हूं,’ और दृष्टि तीसरी महिला की ओर घुमा दी.’’

मैं देख रही थी कि कई जोड़ी निगाहें बिना हिले इस चुटकुले के अंतिम भाग को सुनने के लिए उत्सुक थीं. कणिका ने कहना जारी रखा :

‘‘तीसरी महिला ने लटें संवारीं, थोड़ा इठलाई, कमर को झटका दिया फिर यमराज पर बंकिम कटाक्ष किया और लिपस्टिक लगे अधर संपुट खोल अदा से बोली, ‘देखोजी, यमराजजी, मैं ने न तो सासससुर को कुछ समझा न पति को. मैं ने तो जी खूब मौजमस्ती की, क्लब गई, नाचीगाई, मैं तो जी दोस्तों की जान बनी रही.’

‘‘‘बसबस,’ उसे बीच में ही टोक कर यमराज बोले, ‘योर केस इज इंट्रेस्टिंग. चित्रगुप्त, पहली दोनों औरतों को स्वर्ग में भेज दो और (तीसरी औरत की ओर इशारा कर) तुम मेरे कक्ष में आओ.’’’

चुटकुला समाप्त होने से पहले ही डब्बे में हंसी का तूफान आ गया था. खिलखिलाहटें ही खिलखिलाहटें. लड़कियां पेट पकड़पकड़ कर हंस रही थीं. मैं भी अपनी हंसी न रोक सकी.

मुझे अपनी किशोरावस्था याद आ गई. सचमुच वे भी क्या दिन थे? जिंदगी और रंग दोनों एकदूसरे के पर्याय थे उन दिनों. वह प्यारी खूबसूरत आंखों वाली राजकंवर, लगता था नारीत्व और सौंदर्य का अनुपम उदाहरण बना कर ही कुदरत ने उसे धरती पर उतारा था. और मैं, हिरनी सी कुलांचें भरती राजकंवर की अंतरंग सखी.

मुझ में तो मानो स्वयं चपलता ही मूर्तिमान हो उठी थी. क्या एक क्षण भी मैं स्थिर रह पाती थी. सारे खेलकूद, नृत्यनाटक, शायद ही किसी प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया हो. उधर राजकंवर के कोकिल कंठ की गूंज के बिना कालिज का कोई समारोह पूरा ही नहीं होता था. वह गाती तो लगता मानो साक्षात सरस्वती ही कंठ में आ बैठी हो.

हर शरारत की योजना बनाना और फिर उसे अंजाम देना हम दोनों का काम था. याद आ गई प्रिंसिपल मैडम की सूरत, जब हम ने होली खेलते समय साइंस ब्लाक का शीशा तोड़ा था. मैडम लाख कोशिशों के बाद भी यह पता नहीं लगा सकी थीं. सारी की सारी 13 लड़कियां सिर झुकाए एक कतार में खड़ी डांट खाने के साथसाथ एकदूसरे को कनखियों से देख खुकखुक हंसती रही थीं. हार कर बिना दंड दिए उन्होंने हमें भगा दिया था और हम पूरे एक सप्ताह तक अपनी जीत का मजा लेते रहे थे.

आज इन गिलहरियों की तरह फुदकती लड़कियों को संभालते समय लगा कि सचमुच इन्हें संभालना हवा के झोंके को आंचल में बांध लेने से भी मुश्किल है, अगर किसी तरह हवा को बांध भी लो तो आंचल के झीने आवरण से वह रिस के निकल जाती है न.

गाड़ी की रफ्तार के बीच लड़कियों की ओर नजर घूमी तो पाया कि वे मूंगफलियां खाती पटरपटर बतिया रही थीं और मुद्दा था कि शाहरुख खान ज्यादा स्मार्ट है या आमिर खान. मैं ने हंसते हुए पत्रिका फिर हाथ में उठा ली. आंखें पत्रिका के एक पन्ने पर टिकी थीं पर देख तो शायद पीछे अतीत को रही थी.

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मैं और राज अब बी.ए. फाइनल में आ गए थे और हमारी बातों का विषय भी धर्मेंद्र, जितेंद्र से शुरू हो कर अपने जीवन के हीरो की ओर मुड़ जाता कि कैसा होगा?

मैं कहती, ‘राज, क्यों न हम एक ही घर में शादी करें? मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती.’

राज ने लंबी आह भर कर कहा, ‘काश, ऐसा हो सकता. मैं राजपूत और तुम ब्राह्मण. एक घर में हम दोनों की शादी हो ही नहीं सकती. ऐसी बेसिरपैर की बातें करते कब साल बीता और परीक्षाएं भी हो गईं, पता ही नहीं चला.’

घड़ी आ गई बिछड़ने की. पूरे 3 साल हम साथ रहे थे. अब बिछड़ने की कल्पना से ही हम कांप उठे, पर जाना तो था. मेरे पिता ट्रांसफर हो कर उत्तरकाशी चले गए और परीक्षा समाप्त होते ही मुझे तुरंत बुलाया था.

‘‘आप का टिकट?’’ कानों से आवाज टकराई तो सोच की दुनिया से मैं बाहर निकल आई.  सभी के  टिकट चेकर को दे कर अपने चेहरे पर आए बालों को समेट कर पीछे किया तो चेहरे और बालों का रूखापन उंगलियों से टकराया. विचार उठा, कहां खो गई वह लुनाई. शायद बीता समय चुरा ले गया, साथ ही ले गया राज को जिसे मैं चाह कर भी नहीं पा सकती.

मैं फिर अतीत के पन्ने पलटने लगी.

उत्तरकाशी अपने घर पहुंची तो पापामम्मी और भैया ने प्यार से मुझे नहला दिया. उत्तरकाशी के पहाड़ी सौंदर्य ने मुझे अभिभूत कर दिया पर राज को हर रोज पत्र लिखने का क्रम मैं ने टूटने नहीं दिया. वह भी नियमित उत्तर देती. हम दोनों के पत्रों में जिंदगी के हीरो का ही जिक्र होता.

राज ने एक पत्र में लिखा था कि उस के पिता ने उस के लिए एक डाक्टर वर चुना है, जो किसी रियासत का अकेला चिराग है. भरापूरा गबरू जवान और एक बड़ी जागीर का अकेला वारिस, शिक्षित और संस्कारी पूर्ण पुरुष.

राजकंवर के फोटो को देखते ही वह लट्टू हो गया था… उसे साक्षात देखा तो अपनी सुधबुध ही खो बैठा. और राजकंवर? अनंग सा रूप ले कर घर आए डा. राजेंद्र सिंह को देखते ही दिल दे बैठी थी. उसे लगा जैसे छाती से कुछ निकल गया हो. अपने पत्र में उस ने अपनी बेचैनी निकाल कर रख दी थी.

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घर में मेरी शादी की चर्चा भी होने लगी थी. राज के पत्रों को पढ़ मैं भी उस की भांति किसी अनिरुद्ध की कल्पना से अपना मन रंगने लगी थी. राज के पत्रों से पता लगा कि उस का विवाह नवंबर में होगा. मजे की बात कि उस के विवाह के दिन ही मेरा अनिरुद्ध मुझे देखने आने वाला था.

राज की शादी के बाद उस के पत्रों की संख्या घटने लगी. उसे अपने मन की बातें बांटने को एक नया साथी जो मिल गया था.

अब मेरे मन पर भी लेफ्टिनेंट मदन शर्मा छाने लगे थे. जब वे अपने मातापिता के साथ मुझे देखने आए थे तो मैं खिड़की की झिरी से उन के पुरुषोचित सौंदर्य को देख अवाक् रह गई थी, दिल धड़क उठा और याद आ गई पत्र में लिखी राज की पंक्ति, ‘क्या सचमुच कामदेव ही धरा पर उतर आए हैं या मेरा यह दृष्टि दोष है?

मां जब मुझे उन लोगों के सामने लाईं तो मेरी आंखें ऊपर उठ ही नहीं रही थीं. कब उन्होंने अंगूठी पहनाई याद नहीं पर वह स्पर्श मेरे रोमरोम में बिजली दौड़ाता चला गया था. मुझ पर एक नशा सा छा गया था और उसी में उन के मातापिता के पैर छू कर मैं भीतर चली गई थी.

मैं ने तुरंत अपनी इस अवस्था का विस्तृत वर्णन राज को लिख डाला, पर उत्तर नहीं आया. सोचा मगन होगी. अब मेरी कल्पना के साथी थे मदन. मिलन और सान्निध्य की कल्पना से मैं सिहर उठती.

फरवरी की गुलाबी सर्दी में मेरा जीवनसाथी मुझे पल्लू से गांठ बांध कर अपने घर ले आया और मुझे अपने प्रेम सागर में आकंठ डुबो दिया. अनुशासन भरा सैनिक जीवन जीतेजीते मदन ने अब तक अपने मन को भी चाबुक मारमार कर साध रखा था. इसीलिए मेरा प्रवेश होने पर मुझे संपूर्ण पे्रम से नहला दिया उन्होंने.

मदन अपनी ओर से ढेरों उपहार ला कर देते और उन की मां और बाबूजी ने तो अपनी इकलौती बहू की प्यार और उपहारों से झोली ही भर दी थी. मदन इकलौती संतान जो थे.

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रिश्वतखोरी की दुकान में जान की कीमत – भाग 2

सौजन्य : सत्यकथा

सोशल मीडिया पर इंद्रकांत का वीडियो वायरल हुआ तो एसपी मणिलाल पाटीदार का पारा चढ़ गया, उन्होंने आननफानन में प्रैसवार्ता की और बताया कि इंद्रकांत त्रिपाठी जुआ व सट्टे का बड़ा व्यापारी है.

उस का नाम ग्राम रिवई में पकड़े गए जुए में आया था. काररवाई से बचने के लिए वीडियो वायरल कर अनर्गल आरोप लगा रहा है. इसी के साथ उन्होंने जिले के थानेदारों को इंद्रकांत की खोज में लगा दिया.

इंद्रकांत त्रिपाठी को भय था कि पुलिस कप्तान कुछ भी करा सकते हैं. अत: वह बांदा की ओर निकल गए. दूसरे दिन सुबह उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट लिखी, जिस में उन्होंने लिखा, ‘प्रिय पत्रकार बंधुओं, मैं कल यानी 9 सितंबर को एक प्रैसवार्ता करने जा रहा हूं, जिस का स्थान मेरा क्रशर यानी आरजेएस ग्रेनाइट होगा.

समय सुबह 11 बजे. कप्तान मणिलाल पाटीदार, कबरई थाना इंचार्ज देवेंद्र शुक्ला, खन्ना थाना इंचार्ज राकेश कुमार सरोज, खरेला इंसपेक्टर राजू सिंह तथा सिपाही अरुण कुमार के भ्रष्टाचार के एकएक सबूत दिए जाएंगे.’

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दोपहर बाद इंद्रकांत त्रिपाठी अपनी औडी कार से बांदा से कबरई के लिए रवाना हुए. जब वह बधवाखेड़ा गांव के पास पहुंचे, तभी उन्हें गोली मार दी गई. गोली उन के गले में लगी, जिस से उन की गाड़ी एक पत्थर से टकरा कर झाडि़यों में पलट गई. घायल अवस्था में ही उन्होंने मोबाइल फोन पर यह सूचना अपने मित्र सत्यम को दी.

सूचना पाते ही सत्यम अपने पिता अर्जुन के साथ अपनी कार से बंधवाखेड़ा गांव पहुंचा और खून से लथपथ इंद्रकांत को महोबा के जिला अस्पताल पहुंचाया. इस के बाद सत्यम ने यहसूचना इंद्रकांत के घर वालों को दी.

इंद्रकांत को गोली लगने की खबर घर वालों को मिली तो सब घबरा गए. इंद्रकांत की पत्नी रंजना, भाई रविकांत, विजयकांत तथा दर्जनों मित्र अस्पताल पहुंच गए. पति की नाजुक हालत देख कर रंजना फफक पड़ी. चूंकि इंद्रकांत की हालत गंभीर थी. अत: घर वाले उन्हें कानपुर ले आए और सर्वोदय नगर स्थित रीजेंसी अस्पताल में भरती करा दिया.

इधर गोलीकांड की सूचना पुलिस प्रशासन को लगी तो सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी (कबरई) देवेंद्र शुक्ला, एएसपी विनोद कुमार तथा डीएसपी राजकुमार पांडेय घटनास्थल पर पहुंचे और बारीकी से निरीक्षण किया.

कुछ देर बाद आईजीपी (चित्रकूटधाम मंडल) के. सत्यनारायण तथा एडीजी (प्रयागराज) प्रेमप्रकाश ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया तथा घरवालों से जानकारी हासिल की.

इंद्रकांत के भाई रविकांत ने पुलिस अधिकारियों के समक्ष कहा कि उन के भाई पर जानलेवा हमला पुलिस कप्तान मणिलाल पाटीदार तथा कबरई के थानाप्रभारी देवेंद्र शुक्ला ने कराया है.

इस षडयंत्र में विस्फोटक सप्लायर सुरेश सोनी तथा बृहम दत्त भी शामिल हैं. रविकांत ने कई अन्य पुलिसकर्मियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तथा रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करने की गुहार लगाई.

क्रशर व्यापारी गोलीकांड की गूंज लखनऊ तक पहुंची तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तुरंत काररवाई करते हुए एसपी मणिलाल पाटीदार को निलंबित कर दिया तथा उन के स्थान पर नए एसपी अरुण कुमार श्रीवास्तव को नियुक्त कर दिया. अरुण कुमार ने पद संभालते ही भ्रष्टाचार में लिप्त कबरई थानाप्रभारी देवेंद्र शुक्ला, थाना खन्ना के इंसपेक्टर राकेश कुमार सरोज, खरेला के थानाप्रभारी राजू सिंह तथा सिपाही अरुण यादव व राजकुमार को निलंबित कर दिया.

दोनों सिपाही पुलिस अधिकारियों के खासमखास थे. क्रशर व्यापारियों से डीलिंग और पैसा वसूलने में इन की अहम भूमिका थी.

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11 सितंबर, 2020 को रविकांत त्रिपाठी की तहरीर पर थाना कबरई पुलिस ने भादंवि की धारा 307/120बी/387 के तहत निलंबित एसपी मणिलाल पाटीदार, निलंबित थानाप्रभारी देवेंद्र शुक्ला तथा विस्फोटक सप्लायर बृहम दत्त व सुरेश सोनी के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया. जांच डीएसपी राजकुमार पांडेय को सौंपी गई.

रिश्वतखोरी की दुकान में जान की कीमत

रिश्वतखोरी की दुकान में जान की कीमत – भाग 3

सौजन्य : सत्यकथा

इसी कबरई थाने में एक अन्य मुकदमा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एक्ट की धारा 7,13 के तहत दर्ज किया गया. इस में आरोपी मणिलाल पाटीदार, इंसपेक्टर देवेंद्र शुक्ला, राकेश कुमार सरोज, राजू सिंह, सिपाही अरुण यादव व राजकुमार (सभी निलंबित) को आरोपी बनाया गया. भ्रष्टाचार की जांच एसपी (विजिलेंस) हरदयाल सिंह को सौंपी गई.

मुकदमा दर्ज होते ही सभी आरोपी फरार हो गए. पुलिस दबिश देने गई तो उन के घरों पर ताले लटके मिले. उधर मणिलाल पाटीदार कोरोना पौजिटिव होने का बहाना कर कहीं जा कर छिप गए थे. कोरोना पौजिटिव की जानकारी उन के वकील मुकुल ने जांच अधिकारी को दी थी. लेकिन वे कहां क्वारंटीन थे, इस की जानकारी वे भी नहीं दे सके.

क्रशर व्यापारी इंद्रकांत 4 दिन तक कानपुर के रीजेंसी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझते रहे. आखिर 13 सितंबर को उन की मौत हो गई. उन की मौत की खबर कबरई कस्बा पहुंची तो सनसनी फैल गई. व्यापारी सड़क पर उतर आए और प्रदर्शन करने लगे. सुरक्षा की दृष्टि से कबरई में पुलिस व पीएसी लगा दी गई.

मृतक इंद्रकांत के पार्टनर पुरुषोत्तम तथा बालकिशन को एएसपी विनोद कुमार ने हिरासत में ले लिया. कानपुर में पोस्टमार्टम के बाद इंद्रकांत के शव को कड़ी पुलिस सुरक्षा में कबरई लाया गया और अंतिम संस्कार कराया गया.

क्रशर व्यापारी इंद्रकांत की मौत के बाद राजनीतिक भूचाल आ गया. सपा, कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश सरकार को कानून व्यवस्था पर घेरा तो सरकार तिलमिला उठी.

विपक्षी नेता सहानुभूति जताने मृतक के घर को रवाना हुए तो उन्हें सुरक्षा का हवाला दे कर रास्ते में ही रोक दिया गया और मृतक के घर तक नहीं पहुंचने दिया गया. इसे ले कर पुलिस से उन की झड़प भी हुई.

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विपक्षी तेवरों को ढीला करने के लिए पीडब्लूडी राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय मृतक क्रशर व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी के घर पहुंचे और घर वालों को धैर्य बंधाया. साथ ही उन्होंने हरसंभव मदद का भी आश्वासन दिया.

कारोबारी के भाई रविकांत त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन राज्यमंत्री को सौंपा, जिस में आर्थिक सहायता दिलाने और सरकारी नौकरी की मांग की गई थी. साथ ही मामले की जांच विशेष पुलिस टीम से कराने तथा परिवार की सुरक्षा की मांग भी की गई. राज्यमंत्री ने मांग पूरी करने कर भरोसा दिया.

जिलाधिकारी अवधेश कुमार तिवारी भी मृतक क्रशर व्यापारी के घर पहुंचे और उन की पत्नी रंजना, बेटे कृष्णा तथा बेटी गुनगुन से मुलाकात की. डीएम ने पत्नी व बच्चों को किसी भी समस्या पर सीधे बात करने को कहा.

एडीजी (प्रयागराज) प्रेमप्रकाश ने व्यापारी के घर वालों से मुलाकात की और उन की सुरक्षा के लिए घर पर फोर्स लगा दी गई.

क्रशर व्यापारी इंद्रकांत त्रिपाठी की मौत के बाद दर्ज मामले में हत्या की धारा 302 और जोड़ दी गई तथा मृतक के घर वालों की मांग पर शासन ने जांच एसआईटी को सौंप दी और एक सप्ताह में जांच पूरी करने का आदेश दिया.

इस के लिए शासन ने वाराणसी जोन के आईजी विजय कुमार सिंह मीणा की अध्यक्षता में 3 सदस्यीय टीम गठित की. इस टीम में डीआईजी (विशेष जांच) शलभ माथुर तथा मानवाधिकार एसपी अशोक तिवारी को शामिल किया गया.

एसआईटी ने बड़ी सावधानीपूर्वक जांच प्रारंभ की. टीम मृतक इंद्रकांत त्रिपाठी के घर पहुंची और उन के बड़े भाई रविकांत त्रिपाठी, पार्टनर पुरुषोत्तम, बालकिशन, कारोबारी के साले बृजेश शुक्ला, ड्राइवर रामहेतु तथा पूर्व विधायक अरिमर्दन सिंह आदि से पूछताछ कर बयान दर्ज किए.

वायरल वीडियो की जानकारी ली तथा जांच के लिए घर के सदस्यों के मोबाइल फोन हासिल किए. टीम के सदस्य घटनास्थल वधवाखेड़ा गए और वहां कई युवकों से पूछताछ की. फिर टीम कबरई थाने आई और वहां खड़ी व्यापारी की औडी कार की जांच की. टीम ने यहां कुछ पुलिसकर्मियों से भी जानकारी हासिल की.

टीम ने सत्यम और उस के पिता अर्जुन से भी पूछताछ की, जिन्होंने गोली लगने के बाद व्यापारी इंद्रकांत को अस्पताल पहुंचाया था. सत्यम से पूछताछ के बाद टीम ने मृतक के घर से वह पिस्टल बरामद कर ली, जिस से गोली मारी गई थी. यह पिस्टल मृतक इंद्रकांत की थी, जो लाइसैंसी थी.

इस बीच टीम के समक्ष 2 आरोपियों सुरेश सोनी व बृहम दत्त ने आत्मसमर्पण कर दिया. पूछताछ कर उन दोनों को महोबा की जिला जेल भेज दिया गया.

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एसआईटी टीम जांच करने बांदा व छतरपुर तक गई और हर सूत्र को खंगाला. टीम के सदस्यों ने आरोपी एसपी मणिलाल पाटीदार, इंसपेक्टर देवेंद्र शुक्ला आदि से भी पूछताछ की कोशिश की किंतु वह सब फरार थे.

25 सितंबर, 2020 को एसआईटी के अध्यक्ष विजय कुमार सिंह मीणा ने व्यापारी इंद्रकांत मामले की जांच पूरी कर प्रैसवार्ता की और घटना का चौंकाने वाला खुलासा किया. उन्होंने बताया कि वीडियो वायरल करने के बाद एसपी मणिलाल पाटीदार, इंद्रकांत के पीछे पड़ गया था, जिस से इंद्रकांत खौफ में थे.

उन को बचने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो खुद की पिस्तौल से खुद को गोली मार ली. उन की हत्या नहीं की गई बल्कि उन्होंने आत्महत्या की है. इंद्रकांत मामले की जांच पूरी कर एसआईटी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेज दी.

इस रिपोर्ट के बाद थाने में दर्ज रिपोर्ट में एक बार फिर बदलाव किया गया. अब हत्या की रिपोर्ट को आत्महत्या (धारा 306) में तब्दील कर दिया गया. इन सभी आरोपियों पर आत्महत्या के लिए मजबूर करने का ही मामला बनता था.

इधर जब एक महीना बीत जाने के बाद भी आरोपी एसपी मणिलाल पाटीदार व अन्य आरोपी पुलिसकर्मी पकड़ में नहीं आए तो महोबा के नए एसपी अरुण कुमार श्रीवास्तव ने शिकंजा कसा.

इस के लिए उन्होंने स्वाट टीम, क्राइम ब्रांच तथा सर्विलांस टीम की मदद ली. उन्होंने गिरफ्तारी के लिए 8 टीमें बनाई और आरोपियों की तलाश शुरू की. इस बीच उन्होंने कोर्ट से आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी प्राप्त कर लिया था.

25 नवंबर, 2020 को एसपी अरुण कुमार श्रीवास्तव को सूचना मिली कि आरोपी इंसपेक्टर देवेंद्र शुक्ला महोबा-झांसी बौर्डर पर मौजूद है. इस सूचना पर उन्होंने जाल फैलाया और स्वाट तथा सर्विलांस टीम की मदद से उसे गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद देवेंद्र से अन्य आरोपियों के विषय में पूछताछ की गई.

भ्रष्टाचार की जांच कर रहे एसपी हरदयाल सिंह ने भी उस से पूछताछ की. लेकिन उन्होंने अन्य आरोपियों के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी. 26 नवंबर, 2020 को पुलिस ने आरोपी निलंबित थानाप्रभारी देवेंद्र शुक्ला को महोबा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कथा संकलन तक उन की जमानत स्वीकृत नहीं हुई थी. निलंबित एसपी मणिलाल पाटीदार, दरोगा राकेश कुमार सरोज, राजू सिंह, सिपाही अरुण यादव व राजकुमार फरार थे.

पुलिस उन की तलाश में जुटी थी. उन की गिरफ्तारी के लिए 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है. यह पहला मामला है जब किसी आईपीएस अधिकारी की गिरफ्तारी पर 25 हजार रुपए का इनाम घोषित हुआ है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक्स मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर का हौट अंदाज देखकर फैंस हुए दीवाने

एक्स मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर (Manushi Chhillar) इन दिनों मालदीव्स में क्वालिटी टाइम स्पेन्ड कर रही है. उन्होंने कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं.

मानुषी छिल्लर ने ये तस्वीरें इंस्टाग्राम पर शेयर की है. ये तस्वीर सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. यूजर्स इन तस्वीरों को खूब पसंद कर रहे हैं.

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इन तस्वीरों में एक्स मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर अपनी टोन्स बौडी फ्लान्ट करती नजर आ रही हैं. इन तस्वीरों में आप मानुषी छिल्लर का ग्लैमरस अंदाज देख सकते हैं.

इन तस्वीरों में मानुषी छिल्लर का बेहद हौट अंदाज देखने को मिल रहा है. वह बेहद बोल्ड और सेक्सी नजर आ रही हैं.

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मानुषी छिल्लर की इन बिकिनी तस्वीरों को देखने के बाद फैंस उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. इन तस्वीरों को अब तक 5 लाख से भी ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं.

अब जल्द ही मानुषी छिल्लर  फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने वाली हैं. बताया जा रहा है कि वह यशराज की फिल्म के साथ बौलीवुड डेब्यू करेंगी.

Bigg Boss 14 :  क्या बिग बौस अर्शी खान को बाहर का रास्ता दिखाएंगे, जानिए क्या है पूरा मामला

बिग बौस 14 में विकेंड का वार काफी धमाकेदार होने वाला है. घर से इस हफ्ते किसी एक सदस्य का पत्ता साफ हो जाएगा. बता दें कि नामिनेशन टास्क हारने के बाद एजाज खान (Eijaz Khan) , अर्शी खान (Arshi Khan), कश्मीरा शाह, मनु पंजाबी, अभिनव शुक्ला पर एलिमिनेशन का खतरा मंडरा रहा है.

तो इसी बीच खबर ये आ रही है कि इस हफ्ते बिग बौस हाउस से कश्मीरा शाह बेघर होने वाली है. दरअसल इस शो के फिनाले में एक्स कंटेस्टेंट कश्मीरा शाह ने ‘बिग बौस 14’ के घर में एंट्री की थी.

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बताया जा रहा है कि कम वोटों की वजह से कश्मीरा शाह गेम से आउट हो जाएंगी. तो वहीं दूसरी तरफ अर्शी खान पर भी एलिमिनेशन का खतरा मंडरा रहा है

खबर ये आ रही है कि इस हफ्ते विकेंड के वार में ये दिखाया जाएगा कि विकास गुप्ता की वजह से सलमान खान अर्शी खान को जमकर खरीखोटी सुनाएंगे. सलमान खान का गुस्सा देखकर अर्शी खान भी भड़क जाएंगी. और वह सलमान खान के सामने से उठकर चली जाएंगी. सलमान खान से बदतमीजी करने की वजह से बिग बौस अर्शी खान के लिए घर के दरवाजे खोल देंगे.

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Serial Story : चालबाज शुभी

चालबाज शुभी – भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

“अब जाने दो मुझे… रातभर प्यार करने के बाद भी तुम्हारा मन नहीं भरा क्या?” शुभी ने नखरे दिखाते हुए कहा, तो विजय अरोड़ा ने उस का हाथ पकड़ कर फिर से उसे बिस्तर पर गिरा दिया और उस के ऊपर लेट कर पतले और रसीले अधरों का रसपान करने लगा.

“देखो… मैं तो मांस का शौकीन हूं… फिर चाहे वह मेरी खाने की प्लेट में हो या मेरे बिस्तर पर,” विजय अरोड़ा शुभी के सीने के बीच अपने चेहरे को रगड़ने लगा, दोनों ही एकसाथ शारीरिक सुख पाने की चाह में होड़ लगाने लगे और कुछ देर बाद एकदूसरे से हांफते हुए अलग हो गए.

विजय और शुभी की 18 और 20 साल की 2 बेटियां थीं, तो दूसरी तरफ विजय के बड़े भाई अजय अरोड़ा के एक बेटा था, जिस की उम्र 22 साल की थी.

अरोड़ा बंधुओं के पिता रामचंद अरोड़ा चाहते थे कि जो बिजनैस उन्होंने इतनी मेहनत से खड़ा किया है, उस का बंटवारा न करना पड़े, इसलिए वे हमेशा दोनों भाइयों को एकसाथ रहने और काम करने की सलाह देते थे, पर छोटी बहू शुभी को हमेशा लगता रहता था कि पिताजी के दिल में बड़े भाई और भाभी के लिए अधिक स्नेह है, क्योंकि उन के एक बेटा है और उस के सिर्फ बेटियां.

शुभी को यही लगता था कि वे निश्चित रूप से अपनी वसीयत में दौलत का एक बड़ा हिस्सा उस के जेठ के नाम कर जाएंगे.

‘‘भाई साहब देखिए… विजय तो कामधंधे में कोई सक्रियता नहीं दिखाते हैं, पर मुझे अपनी बेटियों को तो आगे बढ़ाना ही है, इसलिए मैं चाहती हूं कि आप मेरी बेटियों को भी अपने बिजनैस में हिस्सा दें और काम के गुर सिखाते रहें,‘‘ शुभी ने अपने जेठ अजय अरोड़ा से कहा.

इस पर अजय ने कहा, ‘‘पर शुभी, बेटियों को तो शादी कर के दूसरे घर जाना होता है… ऐसे में उन्हें अपने बिजनैस के बारे में बताने से क्या फायदा… आखिर इस पूरे बिजनैस को तो मेरे बेटे नरेश को ही संभालना है… हां, तुम्हें अपनी बेटियों को पढ़ानेलिखाने के लिए जितने पैसे की जरूरत हो, उतने पैसे ले सकती हो.”

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शुभी को तो अपने जेठ की नीयत पर पहले से ही शक था और आज उन से बात कर के वह यह जान चुकी थी कि इस पूरी दौलत पर उस के जेठ अजय अरोड़ा और उन के बेटे नरेश का ही वर्चस्व रहने वाला है और इस अरोड़ा ग्रुप का मालिक नरेश को ही बनाया जाना तय है.

शुभी दिनरात इसी उधेड़बुन में रहती कि किस तरह से पूरी दौलत और बिजनैस में बराबरी का हिस्सा लिया जाए, पर ये सब इतना आसान नहीं होने वाला था, बस एक तरीका था कि किसी तरह से नरेश को रास्ते से हटा दिया जाए तभी कुछ हो सकता है, पर एक औरत के लिए किसी को अपने रास्ते से हटा पाना बिलकुल भी आसान नहीं था.

‘मुझे अपनी लड़कियों के भविष्य के लिए कुछ भी करना पड़े मैं करूंगी, चाहे मुझे किसी भी हद तक जाना पड़े,‘ कुछ सोचते हुए शुभी बुदबुदा उठी.

शुभी की जेठानी निम्मी किचन में थी और अपनी नौकरानी को सही काम करने की ताकीद कर रही थी.

“क्या दीदी… सारा दिन आप ही काम करती रहती हो… कभी आराम भी किया करो… ये लो, मैं ने आप के लिए बादाम का शरबत बनाया है. इसे पीने से आप के बदन को ताकत मिल जाएगी,” शुभी ने अपनी जेठानी को बादाम का शरबत पिला दिया. शरबत पीने के कुछ देर बाद ही निम्मी को कुछ उलझन सी होने लगी.

“सुन शुभी… मेरी तबीयत कुछ ठीक सी नहीं लग रही है. जरा तू किचन संभाल ले,” ये कह कर निम्मी आराम करने चली गई.

उस रात अजय अरोड़ा जब अपने बेटे नरेश के साथ काम से लौटे और निम्मी के बारे में पूछा, तो शुभी ने बताया कि उन की तबीयत खराब है, इसलिए वे आराम कर रही हैं. ऐसा कह कर शुभी ने ही उन लोगों को खाना परोसा, जिसे खा कर वे दोनों अपनेअपने कमरों में चले गए.

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निम्मी और उस का बेटा अलगअलग कमरे में सोते थे, जबकि अजय अरोड़ा दूसरे कमरे में, क्योंकि उन को देर रात तक काम करने की आदत थी.

कुछ देर बाद शुभी दूध का गिलास ले कर अपने जेठ अजय अरोड़ा के कमरे में गई और उन के हाथ में गिलास देते समय उस ने बड़ी चतुराई से अपनी साड़ी का पल्लू कुछ इस अंदाज में गिरा दिया कि उस के सीने की गोरीगोरी गोलाइयां ब्लाउज से बाहर आने को बेताब हो उठीं. सहसा ही अजय अरोड़ा की नजरें उस के सीने के अंदर ही घुसती चली गईं.

जेठ अजय अरोड़ा को अपनी ओर इस तरह घूरते देख जल्दी से शुभी अपने पल्लू को सही करने लगी और मुसकराते हुए कमरे से बाहर चली आई.

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