Yeh Rishta Kya Kehlata Hai: कैरव को देखकर इमोशनल हुई सीरत, मां बनने का लिया फैसला

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) में इन दिनों दर्शकों को महाट्विस्ट देखने को मिल रहा है. कहानी के ट्रैक में एक नया मोड़ दिखाया जा रहा है. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. तो आइए जानते है इस सीरियल के करेंट ट्रैक के बारे में.

शो के बीते एपिसोड में आपने देखा कि कार्तिक और कैरव सीरत से मिल चुके हैं.  और कार्तिक को ये बात समझ आ गई है कि सीरत,  नायरा (Shivangi Joshi) नहीं है. लेकिन कैरव को अभी भी लगता है कि सीरत ही उसकी मां है.

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि नायरा गोयनका हाउस पहुंची है और कार्तिक, सीरत को अपने घर पर देखकर उस पर खूब चिल्लाया.

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तो उधर कैरव को रोता हुआ देखकर सीरत काफी इमोशनल हो गई. और ऐसे में वो कुछ दिन के लिए कैरव की मां बनकर रहने का फैसला करती नजर आई.

तो दूसरी तरफ गायु, सीरत को देखकर परेशान हो जाएगी. और सीरत को गोयनका हाउस में देखकर,  रिया को भी झटका लगेगा. और वह परेशान हो जाएगी. रिया को ये लगेगा कि सीरत के आसपास भी रहने से उसका पूरा गेम खराब जाएगा. वह सीरत को गोयनका हाउस से आउट करने की प्लानिंग करने लगेगी.

 

अब सीरियल के अपकमिंग एपिसोड में दर्शकों को हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिलने वाला है. जी हां, देखना ये होगा कि कार्तिक सीरत को रिया की प्लानिंग से नजर से बचाएगा? या फिर वह खुद सीरत से दूर होना जाएगा.

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Bigg Boss 14: अली गोनी को मात देकर तीसरे फाइनलिस्ट बनेेंगे Rahul Vaidya?

टीवी का सबसे विवादित शो ‘बिग बॉस 14’ जल्द ही  खत्म होने वाला है. अगले हफ्ते ही शो के विनर का नाम अनाउंस होने वाला है.  और ऐसे में घर में मौजूद कंटेस्टेंट टिकिट टू फिनाले टास्क को जीतने के लिए पूरी लगन से गेम खेलते नजर आए.

बता दें कि इस टास्क के दौरान राखी सावंत (Rakhi Sawant) और निक्की तम्बोली (Nikki Tamboli) ने फिनाले में अपनी जगह बना ली है. तो वहीं फिनाले में जगह बनाने के लिए अली गोनी (Aly Gony) और राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) के बीच कम्पटिशन अभी जारी है.

खबर यह आ रही है ‘बिग बॉस 14’ वीकेंड के वार में राहुल वैद्य फिनाले में पहुंच जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार आज होने वाले मुकाबले में राहुल वैद्य अली गोनी को हराने वाले हैं.

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शो के लेटेस्ट एपिसोड में राखी सावंत ने खुद को फिनाले में पहुंचाने के लिए विनिंग अमाउंट में से 14 लाख रुपए खर्च कर दिए थे. आज वीकेंड के वार में होस्ट सलमान खान राहुल वैद्य और अली गोनी की क्लास लगाने वाले हैं. जबकि राहुल वैद्य और अली गोनी, राखी सावंत के इस फैसले के खिलाफ थे.

नये प्रोमो में आप देख सकते हैं कि राखी सावंत पर राहुल वैद्य का गुस्सा फूट पड़ा है. और इसी वजह से दोनों को सलमान खान डांट लगाते हुए नजर आ रहे हैं.

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Crime Story: 28 साल बाद

28 साल बाद: भाग 1

सौजन्य-  सत्यकथा

केरल के तिरुवनंतपुरम की सीबीआई कोर्ट में चल रहे सिस्टर अभया की हत्या के मुकदमे में पूरे 28 साल बाद सीबीआई के स्पैशल न्यायाधीश के. सनिल कुमार ने बुधवार 23 दिसंबर, 2020 को अपना फैसला सुनाया.

इतनी देर से फैसला आने की वजह यह थी कि इस मामले की जांच बहुत लंबी चली. मामले की जांच पहले स्थानीय थाना पुलिस ने की. उस के बाद क्राइम ब्रांच ने की और जब मामला नहीं सुलझा तो जांच सीबीआई को सौंपी गई थी.

सीबीआई की भी 4 अलगअलग टीमों ने जांच की. इस तरह कुल मिला कर 6 जांच एजेंसियों ने इस केस की जांच की. इस बीच कई सीबीआई अफसर भी बदले गए.

सीबीआई ने 3 बार क्लोजर रिपोर्ट लगाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने उसे स्वीकर नहीं किया. सीबीआई की चौथी टीम ने इस मामले में एक चोर की गवाही पर जो चार्जशीट दाखिल की, उसी चोर की गवाही पर कोर्ट इस मामले में अंतिम नतीजे पर पहुंचा और हत्यारों को सजा सुनाई.

इतनी लंबी जांच होने की वजह से ही हत्या के इस मामले को केरल की हत्या की सब से लंबी जांच का मामला कहा जा सकता है. सिस्टर अभया हत्याकांड में क्या फैसला आया, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि सिस्टर अभया कौन थी, उन की हत्या क्यों हुई और हत्या के इस मामले में इतनी लंबी जांच क्यों करनी पड़ी.

19 साल की सिस्टर अभया कोट्टायम के पायस टेन कौन्वेंट में प्री कोर्स की पढ़ाई कर रही थीं. पिता थौमस और मां लीला ने उन का नाम बीना थौमस रखा था. पढ़ाई के लिए जब वह नन बनीं तो उन का नाम बदल कर अभया रख दिया गया. वह सेंट जोसेफ कौन्ग्रीगेशन औफ रिलीजियस सिस्टर्स की सदस्य थीं.

27 मार्च, 1992 की सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पढ़ने के लिए उठीं. क्योंकि उस दिन उन की परीक्षा थी, जिस की तैयारी करनी थी. उन्होंने 4 बजे का अलार्म लगा रखा था. उन्हें प्यास लगी थी. वह पानी लेने के लिए किचन में गईं. लेकिन वापस अपने कमरे में नहीं आईं.

किचन में गईं सिस्टर अभया कमरे में नहीं लौटीं. उन के साथ रहने वाली अन्य ननें भी पढ़ने के लिए उठीं तो सिस्टर अभया कमरे में नहीं थीं. जबकि उस समय उन्हें कमरे में ही होना चाहिए था.

उन लोगों को अभया की चिंता हुई. उन्होंने उन की तलाश शुरू की. सिस्टर अभया को ढूंढते हुए वे किचन में पहुंची तो देखा फ्रिज का दरवाजा खुला हुआ था. उसी के पास पानी की एक बोतल खुली पड़ी थी और बोतल का पानी फर्श पर फैला था. उसी के पास अभया की एक चप्पल पड़ी थी. सिस्टर अभया की काफी तलाश की गई, पर उन का कुछ पता नहीं चला.

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जल्दी ही यह बात पूरे कंपाउंड में फैल गई कि सिस्टर अभया गायब हैं. सवेरा हो चुका था. उजाला होने पर किसी की नजर कौन्वेंट के ही कंपाउंड में बने कुएं के पास पड़ी अभया की दूसरी चप्पल पर पड़ी.

कुएं के पास चप्पल पड़ी होने से अंदाजा लगाया गया कि कहीं सिस्टर अभया कुएं में तो नहीं गिर गईं. इस के बाद स्कूल प्रशासन ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी. पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कुएं को खंगाला तो सिस्टर अभया की लाश मिली. अब तक सुबह के लगभग 10 बज चुके थे.

पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. जांच में सिस्टर अभया की एक चप्पल फ्रिज के पास पड़ी मिली. फ्रिज का दरवाजा खुला था. पानी की खुली बोतल फर्श पर पड़ी थी और उस के पास पानी फैला था, जो यह बताता था कि फ्रिज से पानी की बोतल निकाली गई थी.

सिस्टर अभया की दूसरी चप्पल कुएं के पास पड़ी मिली थी. सोचने की बात यह थी कि सिस्टर अभया कुएं के पास कैसे पहुंचीं? पुलिस ने कुछ लोगोें से पूछताछ भी की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. अंत में सब ने यही सोचा कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की होगी. क्योंकि वहां हत्या करने वाला कोई नहीं आ सकता था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में स्पष्ट लिखा था कि सिस्टर अभया की मौत पानी में डूबने से हुई है. उन के शरीर पर जो चोट लगी थी, उस के बारे में कहा गया कि वह चोट उन के कुएं में गिरने पर लगी है.

स्थानीय पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सबूत मान कर अपनी फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की है. पुलिस और स्कूल प्रशासन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सच मान कर बात खत्म कर दी. पर स्कूल के हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को न तो पुलिस जांच पर भरोसा था और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर.

इस की एक वजह यह थी कि एक नन ने उसी सुबह किचन के पास हौस्टल की प्रभारी सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य फादर जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. वह ननों का हौस्टल था, इसलिए वहां फादर का जाना वर्जित था.

इस के अलावा सिस्टर अभया की एक चप्पल किचन में मिली थी तो दूसरी कुएं के पास. फ्रिज खोल कर उन्होंने पीने के लिए पानी की बोतल निकाल कर खोली तो थी, पर शायद पानी पी नहीं पाई थीं. क्योंकि अगर वह पानी पीतीं तो बोतल का ढक्कन लगा कर उसे साथ ले जातीं या फिर फ्रिज में रख देतीं. फ्रिज का दरवाजा भी खुला पड़ा था.

अगर उन्हें कुएं में कूद कर आत्महत्या ही करनी थी तो वह फ्रिज का दरवाजा बंद कर के जा सकती थीं. एक चप्पल किचन में और दूसरी कुएं के पास क्यों छोड़तीं. चप्पल पहन कर भी तो कुएं में कूद सकती थीं. इस के अलावा किचन का कुछ सामान भी अस्तव्यस्त था. उसे देख कर लग रहा था कि जैसे वहां हाथापाई हुई थी.

इन्हीं वजहों से हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भरोसा नहीं हुआ. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्हें लगता था कि उस रात वहां कुछ तो गड़बड़ हुई थी, जिस ने सिस्टर अभया के साथ कुछ उल्टासीधा किया था.

परिणामस्वरूप हौस्टल की 67 ननोें ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन को एक पत्र लिख कर अपील की कि उन्हें पुलिस जांच पर भरोसा नहीं है, इसलिए सिस्टर अभया की मौत के मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए.

ननों की इस अपील के बावजूद केरल सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को देने के बजाय केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी.

क्राइम ब्रांच ने पूछताछ शुरू की तो उस नन ने बताया कि उस रात उस रात उस ने हौस्टल के किचन में सिस्टर सेफी के अलावा 2 फादर, थौमस कोट्टूर और जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. इस के अलावा क्राइम ब्रांच को एक गवाह भी मिल गया था.

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वह गवाह था एक चोर, जिस का नाम था अदक्का राजा. उस रात वह कौन्वेंट में चोरी करने आया था. दरअसल वह चोर आकाशीय बिजली को रोकने के लिए छत पर लगे तांबे के तार को चुराने आया था.

चोर अदक्का राजा छत पर चढ़ कर जब तार चोरी करने जा रहा था, उसी समय उस ने सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और फादर जोस पुथुरुक्कयिल को टार्च लिए किचन के दरवाजे पर देखा था. जब उस ने सिस्टर अभया की पूरी कहानी अखबारों में पढ़ी तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उस रात सिस्टर अभया ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि इन्हीं तीनों ने उस की हत्या की थी.

अगले भाग में पढ़ें- डा. मालिनी ने अपने बर्थ सार्टिफिकेट को ले कर कुछ गलत काम किया था

28 साल बाद: भाग 2

सौजन्य-  सत्यकथा

उस ने खुद क्राइम ब्रांच के औफिस जा कर यह बात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों से बताई. लेकिन पुलिस ने उस की गवाही मानने के बजाय उसे चोरी के आरोप में जेल भेज दिया और क्राइम ब्रांच पुलिस ने भी वही रिपोर्ट दी, जो स्थानीय थाना पुलिस ने दी थी. क्राइम ब्रांच का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत कुएं में डूबने से हुई थी यानी उन्होंने आत्महत्या की थी.

पर कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था. यही वजह थी कि जेमोन पुथेनपुरक्कल जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस जांच के खिलाफ न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस मामले को ले कर विधानसभा में भी काफी हंगामा हुआ.

अंतत: जब यह मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी. यह सन 1993 की बात है. जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई की टीम सिस्टर अभया की मौत के रहस्य का पता लगाने में लग गई.

सीबीआई ने भी अपनी जांच के बाद वही कहा, जो पुलिस और क्राइम ब्रांच ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. उस का कहना था कि उसे इस तरह का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला कि वह इसे हत्या का मामला माने. सीबीआई की इस टीम का ध्यान न तो उस नन की बात पर गया था, न चोर अदक्का राजा की बात पर.

सीबीआई ने यह रिपोर्ट सन 1996 में दी थी. लेकिन हाईकोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की दूसरी टीम इस मामले की जांच में लगाई गई.

दूसरी टीम ने भी जांच कर के सन 1999 में रिपोर्ट दी कि उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि सिस्टर अभया की हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की है. पर इस टीम ने इस मामले को संदिग्ध जरूर माना था.

इस टीम का कहना था कि मामला है तो संदिग्ध, पर सबूत के अभाव में वह निश्चित रूप से कुछ कह नहीं सकती. हाईकोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगा कर फिर से ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए.

इस के बाद सीबीआई की तीसरी टीम जांच में लगाई गई. इस तीसरी टीम ने जांच करने के बाद कोर्ट को बताया कि जांच में यह तो पता चल गया है कि मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का है. लेकिन उन के पास ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि वह किसी को दोषी मान कर जांच आगे बढ़ाए. उस का कहना था कि इस मामले में अब तक सारे सबूत मिटाए जा चुके हैं.

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कोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया और एक बार फिर से डांट कर ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए.

इस बार सीबीआई ने किसी भी तरह का सबूत या सुराग देने वाले को 3 लाख रुपए ईनाम देने की घोषणा भी की थी. फिर भी सीबीआई के हाथ ऐसा कोई सबूत या सुराग नहीं लगा कि वह कोर्ट में यह साबित कर सके कि यह हत्या का मामला है.

इसी बीच सीबीआई के एक अफसर वर्गीज पी. थौमस, जो इस मामले की जांच कर रहे थे और काफी तेजतर्रार अफसर माने जाते थे, ने एक दिन अचानक उन्होंने प्रैस कौन्फ्रैंस बुलाई.

19 जनवरी, 1994 को जब यह रिपोर्ट आई थी, तब उन्होंने कहा था कि वह समय से पहले अपनी नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस मामले में ईमानदारी से जांच करने की इजाजत नहीं दी जा रही है.

केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के सुपरिटेंडेंट वी. त्यागराजन उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सिस्टर अभया के मामले में अपनी जांच रिपोर्ट को सुसाइड में तब्दील कर के कोर्ट में सुसाइड ही दिखाएं.

यह खुलासा होने के बाद तो हंगामा मच गया. सीबीआई पर काफी दबाव पड़ा तो वी. त्यागराजन को कोच्चि से हटा दिया गया. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर सीबीआई की चौथी टीम को जांच पर लगाया गया. यह टीम केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के अफसरों की थी.

सीबीआई की टीम ने इस केस में फादर कोट्टूर, फादर जोस पुथुरुक्कयिल और नन सिस्टर सेफी को संदिग्ध माना. साथ ही उन लोगों का नारको टेस्ट कराने का फैसला किया. जब इस बात की जानकारी कौन्वेंट को हुई तो उस ने हौस्टल की रसोइया की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करा कर नारको टेस्ट रोकवाने का भी प्रयास किया. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोक लगाने से मना कर दिया.

इस के बाद बेंगलुरु में इन तीनों का नारको टेस्ट कराया गया. तीनों का नारको टेस्ट डा. मालिनी ने किया. नारको टेस्ट के दौरान इन तीनों का जो इकबालिया बयान था, वह एक सीडी के तौर पर सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसे सीबीआई ने कोर्ट में पेश किया.

लेकिन बाद में पता चला कि सीबीआई ने तीनों के नारको टेस्ट की जो सीडी अदालत में पेश की थी, उस के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इस का मतलब यह था कि फादर और नन सेफी ने नारको टेस्ट के दौरान जो कुछ भी कहा था, छेड़छाड़ कर के उसे बदल दिया गया था. इस के बाद कोर्ट ने सीधे डा. मालिनी से संपर्क कर उन से कहा कि इस मामले की जो ओरिजनल रिकौर्डिंग है, वह उन्हें भेजें.

पर डा. मालिनी ने अपने बर्थ सार्टिफिकेट को ले कर कुछ गलत काम किया था, इसलिए उसी समय उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. इस के बाद यह मामला यहीं लटक गया. अब वह सीडी सही है या गलत, कोई जानकारी देने वाला नहीं था.

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लेकिन एक दिन अचानक वही सीडी केरल के एक लोकल चैनल पर चल गई. वह सीडी चैनल को कहां से और कैसे मिली, यह तो पता नहीं चल सका. जबकि कोर्ट ने कहा कि यह सीडी सीलबंद लिफाफे में हमें दो.

उस सीडी में दोनों फादर और नन अपनी पूरी कहानी सुना रहे थे, जो नारको टेस्ट के दौरान उन्होंने बताई थी. इस के बाद सीबीआई की इस चौथी टीम का ध्यान चोर अदक्का राजा पर गया.

अगले भाग में पढ़ें- सिस्टर अभया जिंदा थीं या मर चुकी थीं

28 साल बाद: भाग 3

सौजन्य-  सत्यकथा

पहली बार सन 2008 में सीबीआई ने उसी अदक्का राजा की गवाही के आधार पर चार्जशीट दाखिल की. जिस के बाद पहली बार सन 2008 में सिस्टर अभया की हत्या के आरोप में दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथुरुक्कयिल और नन सेफी को गिरफ्तार किया गया.

हालांकि गिरफ्तारी के बाद ये तीनों साल भर भी जेल में नहीं रहे और 2009 में हाईकोर्ट ने इन्हें जमानत पर छोड़ दिया था. इस के बाद यह मामला फिर रुक गया. सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की थी और सीडी में तीनों ने जो कहानी सुनाई थी, वह कुल मिला कर कुछ इस तरह थी.

उस रात सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पानी पीने के लिए किचन में गईं और पानी पीने के लिए फ्रिज से बोतल निकाल कर जैसे ही बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पीना चाहा, तभी उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी.

उन्होंने पलट कर देखा तो दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथरुक्कयिल, जिन्हें कोर्ट ने 2 साल पहले सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था और सिस्टर सेफी आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए. उन लोगों को उस स्थिति में देख कर सिस्टर अभया सन्न रह गईं.

इसी के साथ दोनों फादर और सिस्टर सेफी ने भी सिस्टर अभया को देख लिया था. अभया को देख कर तीनों घबरा गए. क्योंकि उन की चोरी पकड़ी गई थी. चोरी भी ऐसी कि अगर बात खुल जाती तो तीनों की बदनामी तो होती ही, उन्हें वहां से निकाल भी दिया जाता. इस के बाद वे कहीं के न रहते. इसलिए उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि क्यों न सिस्टर अभया की हत्या कर उन का मुंह हमेशाहमेशा के लिए बंद कर दिया जाए.

यह निर्णय लेते ही फादर थौमस कोट्टूर ने आगे बढ़ कर हैरानपरेशान खड़ी सिस्टर अभया का एक हाथ से गला और दूसरे हाथ से उन का मुंह दबोच लिया तो सिस्टर सेफी ने किचन में रखी कुल्हाड़ी उठा कर पूरी ताकत से सिस्टर अभया के सिर पर वार कर दिया.

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उसी एक वार में सिस्टर अभया बेहोश हो कर गिर पड़ीं तो उन्हें लगा कि वह मर चुकी हैं. और यही सोच कर फादर थौमस और सिस्टर सेफी ने बेहोश पड़ी अभया को घसीट कर कौन्वेंट के कंपाउंड में बने कुएं में ले जा कर डाल दिया.

उस समय यह किसी को पता नहीं था कि सिस्टर अभया जिंदा थीं या मर चुकी थीं. इस के बाद किचन में आ कर वहां फैले खून को साफ कर दिया. लेकिन सिस्टर अभया की चप्पल, फ्रिज के दरवाजे, फर्श पर पड़ी बोतल और वहां अस्तव्यस्त हुए सामान की ओर उन का ध्यान नहीं गया.

बाद में इन्हीं चीजों से लोगों कोे अभया के साथ कोई हादसा होने का शक हुआ. उसी समय चोर अदक्का राजा चोरी करने के इरादे से छत पर चढ़ा था. तभी उस ने इन तीनों को वहां देख लिया था. उस समय उस ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को पहचान भी लिया था. बाद में उस ने दोनों की शिनाख्त भी कर दी थी. फादर जोस अंधेरे में थे, इसलिए वह उन्हें पहचान नहीं पाया था.

यह पूरी बातें नारको टेस्ट में सामने आई थीं. कोर्ट नारको टेस्ट को सबूत नहीं मानता, क्योंकि इस में आदमी जो भी बताता है, वह नशे की हालत में यानी अर्द्धबेहोशी की हालत में बताता है, इसलिए कोर्ट इसे पुख्ता सबूत नहीं मानता. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ.

कोर्ट ने नारको टेस्ट में दिए गए बयान को सही नहीं माना और तीनों को सन 2009 में जमानत पर रिहा कर दिया था. इस मामले की जिस पुलिस अधिकारी ने जांच की थी, उस पर भी संदेह था. बाद में पता चला कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी छेड़छाड़ की गई थी. उस रात सिस्टर अभया ने जो कपड़े पहने थे, वे भी गायब कर दिए गए थे. उन के  शरीर पर जो चोट के निशान थे, वे भी छिपाए गए थे.

इस तरह इस मामले में हर कदम पर साक्ष्य और सबूत छिपाए और नष्ट किए गए. शायद इसीलिए सीबीआई ने इस मामले में एक पुलिस अधिकारी को भी साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोपी बनाया था, लेकिन बाद में वह हाईकोर्ट से बरी हो गए थे.

सन 2018 में फादर जोस पुथुरुक्कयिल इस केस में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए. इस के बाद सन 2019 में हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.जी. अरुण की बेंच ने इस मामले में हो रही देरी की ओर ध्यान दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि इस केस को जल्द से जल्द निपटाया जाए.

इस के बाद सीबीआई कोर्ट में इस केस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई, जिस की वजह से घटना के 28 साल बाद कोर्ट किसी नतीजे पर पहुंच सका और न्यायाधीश के. सनिल कुमार के फैसले के साथ इस मामले का पटाक्षेप हुआ. श्री सनिल कुमार ने अपने फैसले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर को उद्धृत करते हुए अपना जो फैसला सुनाया वह इस प्रकार था.

उन का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत का मामला निश्चय ही ऐसा था, जिस पर मलयाली भाषी केरल की पूरी एक पीढ़ी ने अपने जीवनकाल के दौरान घरघर खूब चर्चा सुनी. झूठ, फरेब, अपराध को छिपाना, राजनीतिक प्रभाव, अदालती काररवाई और बीचबीच में मामला बंद करने की रिपोर्ट सहित सब कुछ देखासुना था. न्यायाधीश जाते रहे, पर मुकदमा जस का तस रहा.

रिकौर्ड में उपलब्ध साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इतने अधिक हैं कि परिस्थितियों की तारतम्यता की कड़ी कुल मिला कर आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करती है और इस नतीजे पर पहुंचाती है कि आरोपियोें ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया है.

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गवाहोें और प्राप्त सबूतों से साबित होता है कि सिस्टर अभया की मौत सिर में लगी चोट और पानी में डूबने से हुई. अभया के शव परीक्षण से पता चला कि उस की गरदन के दोनों ओर नाखूनों की खरोंच के निशान थे, उन की गरदन पर जख्म भी था और सिर के पिछले हिस्से में भी जख्म था, मैडिकल विशेषज्ञों के अनुसार ये जख्म मौत से पहले के थे.

गवाहों के बयानों और प्राप्त सबूतों के आधार पता चला कि अभया ने फादर थौमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और संभवत: एक दूसरे आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. अपने बचाव के लिए उन्होंने उस के सिर पर कुल्हाड़ी से हमला किया और उस की हत्या कर अपनी करतूतों पर परदा डालने के इरादे से उसे कुएं में फेंक दिया.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अपना जीवन खत्म करने पर तुला व्यक्ति जो अपना जीवन तत्काल खत्म कर रहा हो, वह अपने साथी छात्रों के साथ मिल कर पढ़ाई करने की बात तो दूर वह अपने भविष्य को ले कर क्यों चिंता करेगा? अपनी परीक्षा को अच्छी तरह देने के बारे में सोच कर अच्छी नींद भी नहीं लेगा और न मन लगा कर पढ़ाई करेगा.

ये सारी बातें आत्महत्या करने की बात को झुठलाती हैं. अदालत का कहना था कि अभया एक बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ, ईमानदार, सादगी पसंद, दृढ़निश्चयी और अति शिष्टाचारी लड़की थी, जो हर तरह से कुशल थी और परोपकारी जीवन व्यतीत कर रही थी. उस के लिए खुद ही अपने जीवन का अंत कर लेना पूरी तरह से असंभव था, जैसी दलीलें बचाव पक्ष पेश कर रहा है.

इस मामले में गवाही देने वाला अदक्का राजू या अंडासू राजू जिसे ज्यादातर लोग इसी नाम से बुलाते थे, एक मामूली चोर था, वह आकाशीय बिजली रोकने के लिए कौन्वेंट की छत में लगी तांबे की छड़ की चोरी किया करता था.

अगले भाग में पढ़ें- आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया

28 साल बाद: भाग 4

सौजन्य-  सत्यकथा

न्यायाधीश ने इस तथ्य का भी जिक्र किया है कि वह अपने बयान पर अडिग रहा कि उस ने फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य व्यक्ति को टौर्च के साथ किचन के पास खड़े देखा था. जबकि बचाव पक्ष ने राजू की पृष्ठभूमि के आधार पर उस की गवाही पर ही सवाल खड़े किए.

लेकिन 2 वकीलों द्वारा जिरह करने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहा. फैसले में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि किस तरह से गवाह राजू को अपने बयान से मुकरने और सिस्टर अभया की हत्या कबूल करने के लिए धमकियां मिलीं, यातना दी गई और मोटी रकम देने का प्रलोभन दिया गया, पर वह अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ.

अदालत ने इस तथ्य को रिकौर्ड किया कि सिस्टर अभया की मौत वाली रात सिस्टर सेफी अकेली थीं. क्योंकि उन की साथिन रिट्रीट सेंटर गई थीं. उस रात और सवेरे रसोई घर में सामान्य स्थिति नहीं थी, जिस के बारे में अदालत को कौन्वेंट में रहने वाले अन्य लोगों ने, जो बाद में मुकर गए थे, की गवाही से पता चला था.

एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी कि सिस्टर सेफी ने अपने यौनाचार में लिप्त रहने के तथ्य को छिपाने के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से अपनी हाईमेनोप्लास्टी कराई थी. अदालत ने पाया कि सेफी ने यह प्रक्रिया सीबीआई द्वारा गिरफ्तार करने के बाद कराई थी.

अदालत ने इस मामले के गवाहों में से एक गवाह कलारकोडे वेणुगोपाल को दिए गए फादर थौमस कोट्टूर के बयान का संज्ञान लिया. इस मामले में वेणुगोपाल ने कोट्टूर का नारको टेस्ट कराए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिलने पर थौमस कोट्टूर से संपर्क किया था.

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तब उन्होंने भावावेश में वेणुगोपाल से कहा था कि वह लोहे या पत्थर से नहीं बने, वह भी मनुष्य हैं, जो एक समय पर सिस्टर सेफी के साथ पतिपत्नी की तरह रहे थे, अब उन्हें क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है.

बचाव पक्ष ने अदालत से वेणुगोपाल के बयान को भरोसेमंद न मानने का आग्रह किया था. पर अदालत ने कहा कि आरोपी का बर्ताव, उस की गवाही के दौरान उस की भावभंगिमाएं औैर अपनी गवाही के बुनियादी तथ्यों से टस से मस नहीं होने का तथ्य गवाह की विश्वसनीयता बता रहा था.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अचानक बगैर किसी वजह से पूरा कौन्वेंट सामूहिक रूप से मुकर गया, सबूत भी गायब हो गए और कौन्वेंट की रसोइया अचम्मा ने नारको टेस्ट को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी.

अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उस ने स्वीकार किया कि उच्चतम न्यायालय में देश के महानतम वकीलों में शामिल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उस की ओर से पेश हुए थे. अदालत ने फैसले में कहा कि उस ने यह भी स्वीकार किया कि उस के मुकदमे का खर्च कौन्वेंट ने उठाया था. जबकि उसे मुकदमे के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी.

अदालत ने कहा कि इस से यह साबित होता है कि इस मुकदमे को किस अंतिम नतीजे पर पहुंचने से रोकने तथा अभियोजन के मामले की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए प्रभावशाली लोगों ने व्यवस्थित और संगठित तरीके से प्रयास किए.

न्यायाधीश श्री के. सनिल कुमार ने इस मामले के जांच अधिकारियों, डीएसपी के. सैमुअल और तत्कालीन एसपी केटी माइकल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन की इस मामले में दिलचस्पी की वजह से साक्ष्य नष्ट हुए, मनगढ़ंत सबूत तैयार किए गए.

यहां तक कि मुख्य गवाह अदक्का राजू को सिखायापढ़ाया गया और अन्य गवाहों पर दबाव डाले गए. अदालत ने भविष्य में इस तरह से हस्तक्षेप के खिलाफ सख्त चेतावनी देते हुए इस फैसले की प्रति राज्य पुलिस के मुखिया को भी देने का आदेश दिया.

अंत में न्यायाधीश सनिल कुमार ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को सिस्टर अभया की हत्या, अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास यानी जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई. साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया.

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थौमस कोट्टूर पर घर में बिना अनुमति घुस जाने का भी आरोप लगा. सिस्टर सेफी अब नन वाले कपड़े नहीं पहन सकेंगी. सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों में अकेले जीवित बचे मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया.

यह इस बात का उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उस के पास पैसा और बाहुबल है तो वह न्याय से खिलवाड़ कर लेगा.

जिस चोर अदक्का राजा की गवाही पर दोनों को सजा हुई, फैसला आने के बाद उस ने कहा कि उसे मुकरने के लिए बहुत प्रताडि़त किया गया. उस पर दबाव डाला गया, 3 करोड़ रुपए का लालच दिया गया. पर वह अपनी बात पर अडिग रहा. आखिर उस की भी तो बेटियां हैं. इस मामले में कुल 167 गवाह थे, जिन में से लगभग सब मुकर गए थे.

Short Story: गुलाब यूं ही खिले रहें

शादी की शहनाइयां बज रही थीं. सभी मंडप के बाहर खड़े बरात का इंतजार कर रहे थे. शिखा अपने दोनों बच्चों को सजेधजे और मस्ती करते देख कर बहुत खुश हो रही थी और शादी के मजे लेते हुए उन पर नजर रखे हुए थी. तभी उस की नजर रिया पर पड़ी जो एक कोने में गुमसुम सी अपनी मां के साथ चिपकी खड़ी थी. रिया और शिखा दूर के रिश्ते की चचेरी बहनें थीं. दोनों बचपन से ही अकसर शादीब्याह जैसे पारिवारिक कार्यक्रमों में मिलती थीं. रिया को देख शिखा ने वहीं से आवाज लगाई, ‘‘रिया…रिया…’’

शायद रिया अपनेआप में ही खोई हुई थी. उसे शिखा की आवाज सुनाई भी न दी. शिखा स्वयं ही उस के पास पहुंची और चहक कर बोली, ‘‘कैसी है रिया?’’

रिया ने जैसे ही शिखा को देखा, मुसकरा कर बोली, ‘‘ठीक हूं, तू कैसी है?’’

‘‘बिलकुल ठीक हूं, कितने साल हुए न हम दोनों को मिले, शादी क्या हुई बस, ससुराल के ही हो कर रह गए.’’

शिखा ने कहा, ‘‘आओ, मैं तुम्हें अपने बच्चे से मिलवाती हूं.’’

रिया उन्हें देख कर बस मुसकरा दी. शिखा को लगा रिया कुछ बदलीबदली है. पहले तो वह चिडि़या सी फुदकती और चहकती रहती थी, अब इसे क्या हो गया? मायके में है, फिर भी गम की घटाएं चेहरे पर क्यों?

जब वह सभी रिश्तेदारों से मिली तो उसे मालूम हुआ कि रिया की उस के पति से तलाक की बात चल रही है. वह सोचने लगी, ‘ऐसा क्या हो गया, शादी को इतने वर्ष हो गए और अब तलाक?’ उस से रहा न गया इसलिए मौका ढूंढ़ने लगी कि कब रिया अकेले में मिले और कब वह इस बारे में बात करे.

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शिखा ने देखा कि शादी में फेरों के समय रिया अपने कमरे में गई है तो वह भी उस के पीछेपीछे चली गई. शिखा ने कुछ औपचारिक बातें कर कहा, ‘‘मेरी प्यारी बहना, बदलीबदली सी क्यों लगती है? कोई बात है तो मुझे बता.’’

पहले तो रिया नानुकर करती रही, लेकिन जब शिखा ने उसे बचपन में साथ बिताए पलों की याद दिलाई तो उस की रुलाई फूट पड़ी. उसे रोते देख शिखा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, पति से तलाक क्यों ले रही है, तुझे परेशान करता है क्या?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं, वे तो बहुत नेक इंसान हैं.,’’ रिया ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर क्या बात है रिया, तलाक क्यों?’’ शिखा ने पूछा.

रिया के नयनों की शांत धारा सिसकियों में बदल गई, ‘‘कमी मुझ में है, मैं ही अपने पति को वैवाहिक सुख नहीं दे पाती.’’ मुझे पति के पास जाना भी अच्छा नहीं लगता. मुझे उन से कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेरा अतीत मेरा पीछा ही नहीं छोड़ता.’’

‘‘कौन सा अतीत?’’

आज रिया सबकुछ बता देना चाहती थी, वह राज, जो बरसों से घुन की मानिंद उसे अंदर से खोखला कर रहा था. जब उस ने अपनी मां को बताया था तो उन्होंने भी उसे कितना डांटा था. उस की आधीअधूरी सी बात सुन कर शिखा कुछ समझ न पाई और बोली, ‘‘रिया, मैं तुम्हारी मदद करूंगी, मुझे सचसच बताओ, क्या बात है?’’

रिया उस के गले लग खूब रोई और बोली, ‘‘वे हमारे दूर के रिश्ते के दादा हैं न गांव वाले, किसी शादी में हमारे शहर आए थे और एक दिन हमारे घर भी रुके थे. मां को उस दिन डाक्टर के पास जाना था. मां को लगा कि दादा हैं इसलिए मुझे भाई के भरोसे घर में छोड़ गईं. जब भैया खेलने गए तो दादा मुझे छत पर ले गए और…’’ कह कर वह रोने लगी.

उस की बात सुन कर शिखा की आंखों में मानो खून उतर आया. उस के मुंह से अनायास ही निकला, ‘‘राक्षस, वहशी, दरिंदा और न जाने कितनी युवतियों को उस ने अपना शिकार बनाया होगा. तुम्हें मालूम है वह बुड्ढा तो मर चुका है. उस ने सिर्फ तुम्हें ही नहीं मुझे भी अपना शिकार बनाया था. मैं एक शादी में गई थी. वह भी वहां आया हुआ था. मेरी मां मुझे शादी के फेरों के समय कमरे में अकेली छोड़ गई थीं. सभी लोग फेरों की रस्म में व्यस्त थे. उस ने मौका देख मेरे साथ बलात्कार किया. मात्र 15 वर्ष की थी मैं उस वक्त, जब मेरे चीखने की आवाज सुनाई दी तो मेरी मां दौड़ कर आईं और पिताजी ने उन दादाजी को खूब भलाबुरा कहा, लेकिन रिश्तेदारों और समाज में बदनामी के डर से यह बात छिपाई गईं.’’

‘‘वही तो,’’ रिया कहने लगी, ‘‘मेरी मां ने तो उलटा मुझे ही डांटा और कहा कि यह तो बड़ा अनर्थ हो गया. बिन ब्याहे ही यह संबंध. न जाने अब कोई मुझ से विवाह करेगा भी या नहीं.

‘‘जैसे कुसूर मेरा ही हो, मैं क्या करती. उस समय सिर्फ 15 वर्ष की थी, इस लिए समझती भी नहीं थी कि बलात्कार क्या होता है, लेकिन शादी के बाद जब भी मेरे पति नजदीक आए तो मुझे बारबार वही हादसा याद आया और मैं उन से दूर जा खड़ी हुई. जब वे मेरे नजदीक आते हैं तो मुझे लगता है एक और बलात्कार होने वाला है.’’

शिखा ने पूछा, ‘‘तो फिर वे तुम से जबरदस्ती तो नहीं करते?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं,’’ रिया बोली.

‘‘तब तो तुम्हारे पति सच में बहुत नेक इंसान हैं.’’

‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण वे दुख की जिंदगी जिएं इसलिए मैं ने ही उन से तलाक मांगा है. मैं तो उन्हें वैवाहिक सुख नहीं दे पाती पर उन्हें तो आजाद करूं इस बंधन से.’’

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‘‘ओह, तो यह बात है. मतलब तुम मन ही मन उन्हें पसंद तो करती हो?’’

‘‘हां,’’ रिया बोली, ‘‘मुझे अच्छे लगते हैं वे, किंतु मैं मजबूर हूं.’’

‘‘तुम ने मुझे अपना सब से बड़ा राज बताया है, तो क्या तुम मुझे एक मौका नहीं दोगी कि मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं. देखो रिया, मेरे साथ भी यह हादसा हुआ लेकिन मांपिताजी ने मुझे समझा दिया कि मेरी कोई गलती नहीं, पर तुम्हें तो उलटा तुम्हारी मां ने ही कुसूरवार ठहरा दिया. शायद इसलिए तुम अपनेआप को गुनाहगार समझती हो,’’ शिखा बोली.

‘‘तुम कहो तो मैं तुम्हारे पति से बात करूं इस बारे में?’’

‘‘नहींनहीं, तुम ऐसा कभी न करना,’’ रिया ने कहा.

‘‘अच्छा नहीं करूंगी, लेकिन अभी हम 3-4 दिन तो हैं यहां शादी में, तो चलो, मैं तुम्हें काउंसलर के पास ले चलती हूं.’’

‘‘वह, क्यों?’’ रिया ने पूछा

‘‘तुम मेरा विश्वास करती हो न, तो सवाल मत पूछो. बस, सुबह तैयार रहना.’’

अगले दिन शिखा सुबह ही रिया को एक जानेमाने काउंसलर के पास ले गई. काउंसलर ने बड़े प्यार से रिया से सारी बात पूछी. एक बार तो रिया झिझकी, लेकिन शिखा के कहने पर उस ने सारी बात काउंसलर को बता दी. यह सुन कर काउंसलर ने रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘देखो बेटी, तुम बहुत अच्छी हो, जो तुम ने अपनी मां की बात मान कर यह राज छिपाए रखा, लेकिन इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं. तुम अपनेआप को दोषी क्यों समझती हो? क्या हो गया अगर किसी ने जोरजबरदस्ती से तुम से संबंध बना भी लिए तो?’’

रिया बोली, ‘‘मां ने कहा, मैं अपवित्र हो गई, अब मुझे अपनेआप से ही घिन आती है. इसलिए मुझे अपने पति के नजदीक आना भी अच्छा नहीं लगता.’’

काउंसलर ने समझाते हुए कहा, ‘‘लेकिन इस में अपवित्र जैसी तो कोईर् बात ही नहीं और इस काम में कुछ गलत भी नहीं. यह तो हमारे समाज के नियम हैं कि ये संबंध हम विवाह बाद ही बनाते हैं.

‘‘लेकिन समाज में बलात्कार के लिए तो कोई कठोर नियम व सजा नहीं. इसलिए पुरुष इस का फायदा उठा लेते हैं और दोषी लड़कियों को माना जाता है. बेचारी अनखिली कली सी लड़कियां फूल बनने से पहले ही मुरझा जाती हैं. अब तुम मेरी बात मानो और यह बात बिलकुल दिमाग से निकाल दो कि तुम्हारा कोई दोष है और तुम अपवित्र हो. चलो, अब मुसकराओ.’’

रिया मुसकरा उठी. शिखा उसे अपने साथ घर लाई और बोली, ‘‘अब तलाक की बात दिमाग से निकाल दो और अपने पति के पास जाने की पहल तुम खुद करो, इतने वर्ष बहुत सताया तुम ने अपने पति को. अब चलो, प्रायश्चित्त भी तुम ही करो.’’

रिया विवाह संपन्न होते ही ससुराल चली गई. उस ने अपने पति के पास जाने की पहल की और साथ ही साथ काउंसलर ने भी उस का फोन पर मार्गदर्शन किया. उस के व्यवहार में बदलाव देख उस के पति भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने रिया को एक दिन अपनी बांहों में भर कर पूछा, ‘‘क्या बात है रिया, आजकल तुम्हारा चेहरा गुलाब सा खिला रहता है?’’

वह जवाब में सिर्फ मुसकरा दी और बोली, ‘‘अब मैं सदा के लिए तुम्हारे साथ खिली रहना चाहती हूं, मैं तुम से तलाक नहीं चाहती.’’

उस के पति ने कहा, ‘‘थैंक्स रिया, लेकिन यह मैजिक कैसे?’’

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वह बोली, ‘‘थैंक्स शिखा को कहो. अभी फोन मिलाती हूं उसे,’’ कह कर उस ने शिखा का फोन मिला दिया.

उधर से शिखा ने रिया के पति से कहा, ‘‘थैंक्स की बात नहीं. बस, यह ध्यान रखना कि गुलाब यों ही खिले रहें. ’’

महाराष्ट्र की पहली लेडी सुपरकौप मर्दानी आईपीएस

मामला 26 साल पुराना जरूर है. लेकिन आज भी इस घिनौने अपराध को जानसुन कर रूह कांप जाती है. जलगांव का सैक्स स्कैंडल उस दौर का सब से बड़ा सैक्स स्कैंडल था, जिस ने राजनीति में भूचाल ला दिया था. और महिला आईपीएस अधिकारी मीरा बोरवंकर के नाम का डंका बज गया था.

1994 के उस दौर में महाराष्ट्र स्टेट सीआईडी के हैड अरविंद ईनामदार थे. मीरा बोरवंकर सीआईडी में क्राइम ब्रांच की इंचार्ज थीं. उन दिनों क्राइम ब्रांच का काम  संगठित अपराध और गैंगस्टरों को खत्म करना था. मीरा बोरवंकर तब तक महाराष्ट्र के कई जिलों में चर्चित पुलिस अधीक्षक रह चुकी थीं. उन्होंने कई कुख्यात अपराधियों की नाक में नकेल डाली थी.

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आकर्षक और सौम्य व्यक्तित्व की मीरा इसलिए भी चर्चाओं में थीं, क्योंकि वह महाराष्ट्र की पहली और उन दिनों की एकलौती महिला आईपीएस अफसर थीं. आमतौर पर तब महिलाओं की छवि घर परिवार का पालनपोषण करने और घर की रसोई संभालने वाली नारी के रूप में होती थी. लेकिन मीरा ने आईपीएस बनने के बाद अपराधियों की कमर तोड़ कर इस छवि को बदलने का काम किया था.

दरअसल, सीआईडी को लगातार शिकायत मिल रही थी कि जलगांव में प्रभावशाली लोगों का एक ऐसा गिरोह सक्रिय है जो स्कूली लड़कियों व कामकाजी महिलाओं को अपने जाल में फंसा कर उन का शारीरिक शोषण करता है.

इसी दौरान लड़कियों की वीडियो भी तैयार कर ली जाती है, जिस से लड़कियों को ब्लैकमेल कर के उन्हें बड़ेबड़े कारोबारियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के बिस्तर की शोभा बनने को मजबूर किया जा सके.

लेकिन बदनामी के डर से कोई भी पीडि़त लड़की न तो पुलिस के सामने आ रही थी और न ही सीआईडी को किसी तरह का सबूत मिल रहा था.

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अरविंद ईनामदार ने अपनी टीम के एसपी स्तर के 2 अफसरों दीपक जोग और मीरा बोरवंकर को इस सैक्स  स्कैंडल के आरोपियों को पकड़ने का जिम्मा सौंपा.

दीपक जोग को इस मामले में बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिल सकी. लेकिन मीरा ने महिला होने के नाते इस अपराध को बेहद गंभीरता से लिया और खुद इस केस की छानबीन में जुट गईं.

मीरा ने एक तेजतर्रार टीम का गठन किया और शहर में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले लोगों के बीच में टीम के लोगों की घुसपैठ करवा दी. अपराध ऐसा था जिस में न तो कोई शिकायत करने वाला था, न ही किसी अपराधी का चेहरा सामने था.

लेकिन मीरा ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी टीम के लोगों को उस वक्त तक इस प्रयास में लगे रहने के लिए कहा, जब तक असल अपराधियों के चेहरे सामने नहीं आ जाते.

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इसी प्रयास के दौरान उन की टीम ने एक लड़की को पेश किया जो देह व्यापार की दलदल में फंस चुकी थी. जब लड़की को मीरा के सामने लाया गया तो उन्होंने बड़े प्यार और चतुराई से उन लोगों के नाम उगलवा लिए जिन के कारण वह देह व्यापार के धंधे में आई थी.

नाम, पते सब हासिल हो गए थे. लेकिन लड़की के बयान के अलावा कोई ऐसा सबूत नहीं था कि उन प्रभावशाली लोगों पर हाथ डाल कर उन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सके. मीरा ने सीआईडी के मुखिया अरविंद ईनामदार से मशविरा किया तो उन्होंने सलाह दी कि पहले ठोस सबूत इकट्ठा करो फिर उन लोगों पर हाथ डालना.

इस के बाद मीरा ने छद्मवेश में महिला पुलिसकर्मियों को उस गिरोह के भीतर शामिल करा दिया. धीरेधीरे गिरोह के खिलाफ सबूत एकत्र होने लगे. जल्दी ही गिरोह के चंगुल में फंसी लड़कियों की लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई. उन तमाम प्रभावशाली लोगों के चेहरे भी सामने आ गए जो सैक्स रैकेट के इस बड़े सिंडीकेट में शामिल थे.

फिर शुरू हुआ इन की धरपकड़ के बाद सफेदपोशों के चेहरों को बेनकाब करने का अभियान. मीरा बोरवंकर ने जैसे ही बड़ेबड़े कारोबारियों, सरकारी अफसरों, राजनीति से जुडे़ लोगों के साथ जरायम की दुनिया से जुड़े लोगों पर हाथ डालना शुरू किया तो पूरे देश में हड़कंप मच गया.

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मीरा पर लोगों को छोड़ने की सिफारिशों का दबाव बढ़ने लगा. और तो और अपने खुद के विभाग के बड़े अफसरों ने भी मीरा पर धमकी भरा दबाव बना कर कहा कि इतने प्रभावशाली लोगों पर हाथ डाल कर वह अपने लिए दुश्मन पैदा कर रही हैं. वे सब तो अपने प्रभाव से छूट जाएंगे, लेकिन इस की कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है.

लेकिन मीरा किरण बेदी को अपना आदर्श मान कर पुलिस महकमे में आई थीं, जिन्होंने देश की लौह महिला कही जाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कारवां में शामिल गाड़ी तक का चालान कर दिया था.

मीरा ने कोई दबाव नहीं माना. क्योंकि जलगांव में यह धंधा कई दशकों से चला आ रहा था. खास बात यह कि गिरोह के लोग 10 से 12 साल तक की लड़कियों का यौनशोषण कर रहे थे. शिकार महिलाओं की संख्या भी 300 के लगभग थी.

ब्लैकमेलिंग के डर से लड़कियां उन की शिकायत भी नहीं करती थीं. इस गिरोह ने स्कूल और कालेज की लड़कियों को देह व्यापार के व्यवसाय में ढकेला था. जानेमाने राजनीतिज्ञ, बिजनैसमैन और अपराधियों द्वारा महिलाओं से बलात्कार किया जाता था. साथ ही ये लोग उन की फिल्म बना कर उन्हें ब्लैकमेल किया करते थे.

मीरा ने अपने अधिकारियों को विश्वास में ले कर जलगांव में सैक्स रैकेट चलाने वाले करीब 2 दरजन से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें मीडिया के सामने बेनकाब किया. इन में कई बड़े व्यापारी, सरकारी अफसर, बड़े नेता और जुर्म की दुनिया से जुड़े बड़ेबड़े लोग शामिल थे.

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इस गिरोह का खुलासा होने के बाद पूरे देश में हंगामा हो गया. मीरा बोरवंकर अचानक इस ताकतवर गिरोह का भंडाफोड़ करने के बाद मीडिया की सुर्खियों में छा गईं. देश के लोग खासतौर से महिलाओं के लिए वह ऐसी सुपरकौप बन गईं जिन्हें कोई भी मुश्किल नहीं डिगा पाई थी.

जलगांव सैक्स स्कैंडल को हुए 26 साल से अधिक का समय बीत चुका है. मीरा बोरवंकर भी अब पुलिस महकमे से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, लेकिन आज भी वह देश में पुलिस विभाग की लेडी सुपरकौप के नाम से मशहूर हैं और रहेंगी.

सब से बड़ी बात यह थी कि जिस समय उन्होंने देश के इस बहुचर्चित केस का खुलासा किया था उस समय वह गर्भवती थीं. इस स्कैंडल का खुलासा करने में मीरा ने अहम रोल निभाया था. वह देश भर की मीडिया की सुर्खियों में छाई रहीं.

कई लोगों ने साल 2014 में आई रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म ‘मर्दानी’ देखी होगी. लोगों को शायद यह बात पता नहीं होगी यह फिल्म मीरा बोरवंकर के जीवन से ही प्रेरित थी.

देश की बागडोर असल मायने में उन ईमानदार अफसरों के हाथों में ही होती है जो पूरी निष्ठा के साथ अपना फर्ज निभाते हुए कानूनव्यवस्था चाकचौबंद रखते हैं. जिस तरह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी नौकरशाही से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. ऐसे में मीरा जैसे कुछ अफसर ऐसा काम कर जाते हैं, जो लोगों के लिए मिसाल बन जाता है.

महाराष्ट्र में ‘लेडी सुपरकौप’ के नाम से मशहूर आईपीएस अफसर मीरा बोरवंकर की कहानी पुलिस विभाग में कुछ ऐसी ही मिसाल पेश करती है.

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पिता से मिली बहादुरी की सीख

मीरा बोरवंकर के पिता ओ.पी. चड्ढा बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स में थे. उन का जन्म और पढ़ाई पंजाब के फाजिल्का जिले में हुआ. उन्होंने अपनी पढ़ाई डीसी मौडल स्कूल फाजिल्का में की थी. मीरा के पिता ओ.पी. चड्ढा की पोस्टिंग फाजिल्का में ही थी. इसी दरमियान मीरा ने मैट्रिक तक शिक्षा फाजिल्का में पाई.

इस के बाद 1971 में उन के पिता का तबादला हुआ तो उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई जालंधर से की. लायलपुर खालसा कालेज से उन्होंने अंगरेजी साहित्य में एमए किया. वह बहुमुखी प्रतिभा की छात्रा थीं. वह नीति विश्लेषण कानून प्रवर्तन में मिनेसोटा, अमेरिका के विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए गईं.

1971-72 के दौरान जब मीरा कालेज में थीं, तब किरण बेदी आईपीएस बन चुकी थीं और देश भर में उन के कारनामों का डंका बज रहा था.

मीरा पढ़ाई के साथ स्पोर्ट्स, म्यूजिक और दूसरी गतिविधियों में भी अव्वल थीं. यही कारण था कि एक दिन उन की एक शिक्षिका ने उन से कहा कि मीरा तुम किरण बेदी की इतनी बड़ी फैन हो, उन की तारीफ करती नहीं थकतीं. तुम्हारे भीतर भी आईपीएस बनने के सारे गुण हैं. तुम यूपीएससी की तैयारी क्यों नहीं करतीं.

बस मीरा के भीतर टीचर की यह बात घर कर गई. उन्होंने आईपीएस बनने की ठान ली और पुलिस की सेवा में जाने का मन बना लिया. मीरा ने यूपीएससी की तैयारियां शुरू कर दीं. पहली बार में ही मीरा ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.

मीरा ने फिर से यूपीएससी की परीक्षा दी और सफल रहीं, लेकिन इस बार उन्होंने आईपीएस को चुना. ट्रेनिंग के समय वह अकेली महिला थीं. यह उन के लिए कठिन था, क्योंकि उन्हें ट्रेनिंग में कोई रियायत नहीं मिलती थी.

उन की पोस्टिंग बहुत जगहों पर हुई परंतु पुरुषों को एक लेडी औफिसर के नीचे काम करना अच्छा नहीं लगता था. पुलिस सेवा में महिलाओं की उपस्थिति केवल एक या दो प्रतिशत होने के बावजूद मीरा अपने समकक्ष पुरुष अधिकारियों से कहीं ज्यादा सक्रिय और अलग तरह से काम करती थीं. उन के नेतृत्व में 300 औफिसर्स काम करते थे.

लेकिन मीरा ने कभी अपने मातहत पुरुष अधिकारियों के अहं को ठेस नहीं लगने दी, न ही उन्हें कभी छोटा होने का अहसास कराया. यही कारण रहा कि मीरा को अपने पूरे पुलिस कार्यकाल में पुरुष साथी अफसरों का भरपूर सहयोग मिला.

मीरा 1981 बैच में आईपीएस चुनी गई थीं. उन की शादी रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अभय बोरवंकर से हुई थी. अभय रिटायर होने के बाद फिलहाल अपना बिजनैस संभाल

रहे हैं, जिस में मीरा भी उन का हाथ बंटाती हैं.

मीरा बोरवंकर महाराष्ट्र पुलिस के इतिहास में पहली महिला अधिकारी रही हैं, जो मुंबई क्राइम ब्रांच की कमिश्नर बनी थीं.

1987-1991 तक मीरा डिप्टी कमिश्नर औफ पुलिस के रूप में सेवा देती रहीं. वे औरंगाबाद में डिस्ट्रिक्ट सुपरिंटेंडेंट औफ पुलिस के स्वतंत्र प्रभार में रहीं और सतारा के चार्ज में 1996-1999 तक रहीं. 1993-1995 तक उन्होंने स्टेट क्राइम ब्रांच की भी बागडोर संभाली.

मीरा मुंबई में सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा और नई दिल्ली की एंटी करप्शन ब्रांच में डीआईजी के रूप में भी तैनात रहीं. 2013 में वह पुणे की पुलिस कमिश्नर बनीं.

इस दौरान वह जहां भी रहीं, उन्होंने अंडरवर्ल्ड के खिलाफ जोरदार मुहिम चला कर उस की कमर तोड़ दी.  मुंबई में नियुक्तिके दौरान माफिया राज को खत्म करने में उन का अहम रोल रहा. उन्होंने दाऊद इब्राहिम कासकर और छोटा राजन गैंग के कई सदस्यों को सलाखों के पीछे भेजा. उन्होंने उन दिनों के बहुचर्चित तेलगी घोटाले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया था.

जांबाज अफसर थीं मीरा

मीरा ने नौकरी के शुरुआती समय में ही अपने तेवरों से साफ कर दिया था कि वह हर हाल में गुंडा राज का खात्मा कर के रहेंगी. अपनी बेहतरीन सेवाओं और जांबाजी के लिए वह लेडी सुपरकौप के नाम से मशहूर हो गई थीं. ईमानदारी, बेहतरीन सेवा और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें 1997 में राष्ट्रपति पुरस्कार तथा वर्ष 2001-02 में पुलिस कैरियर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

इस के अलावा उन्हें 2016 में पूर्ण विश्वविद्यालय का जीवन साधना गौरव पुरस्कार, 2014 में  फिक्की एफएलओ और गोल्डन महाराष्ट का वुमन अचीवर अवार्ड, 2008 में मिनेसोटा विश्वविद्यालय से यूएसए का अंतरराष्टीय नेतृत्व पुरस्कार, 2006 में बौंबे मैनेजमेंट एसोसिएशन द्वारा मैनेजमेंट वुमन अचीवर अवार्ड से सम्मानित किया था.

2004 में उन्हें उत्कृष्ट पुलिस सेवा के लिए यशवंतराव चह्वाण मुक्त विश्वविद्यालय, नासिक से रुक्मणी पुरस्कार से नवाजा गया. 2002 में उन्हें लोकसत्ता दुर्गा जीवन पुरस्कार दिया गया था. आज वह देश की अनेक युवतियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत हैं.

मीरा ने सतारा में एक ऐसे डकैती केस को सुलझाया था, जिस की उन दिनों देशभर में चर्चा हुई थी. मीरा ने इस केस का इतनी चतुराई से खुलासा किया था कि पूरा पुलिस विभाग उन के दिमाग का लोहा मान गया था. पुलिस डिपार्टमेंट में उन की छवि एक ईमानदार और बहादुर अफसर की थी.

अक्तूबर, 2017 में मीरा बोरवंकर 36 साल की पुलिस सेवा के बाद महानिदेशक एनसीआरबी और ब्यूरो औफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के पद से रिटायर हुई थीं. लेकिन इस से पहले महाराष्ट्र के एडीजीपी जेल के पद पर रहते हुए उन्होंने मुंबई में हुए 26/11 हमलों के दोषी अजमल आमिर कसाब और 1993 मुंबई अटैक के दोषी याकूब मेमन को सफलतापूर्वक फांसी दिलवाई थी.

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वह उन 5 अधिकारियों में शामिल थीं, जो मेमन की फांसी के समय जेल परिसर में मौजूद थे. मीरा की देखरेख में ही उसे फांसी दी गई थी. कसाब के मामले का जिक्र करते हुए मीरा ने बताया था कि तब इस बात का पूरा खयाल रखा गया था कि फांसी की जानकारी किसी तरह मीडिया तक न पहुंचने पाए. मीडिया की नजरों से बचने के लिए वह अपने गनर की बाइक पर बैठ कर मुंह और यूनिफार्म को छिपा कर यरवदा जेल पहुंची थीं.

भले ही मीरा पुलिस की वर्दी से दूर हो गई हों, लेकिन महाराष्ट्र के पुलिस महकमे में आज भी उन की बहादुरी और कारनामों के चर्चे जीवंत हैं.

Bigg Boss 14: क्या मेकर्स भी Abhinav Shukla के इविक्शन पर कर रहे हैं अफसोस, देखें Video

बिग बॉस 14 (Bigg Boss 14) में इसी हफ्ते अभिनव शुक्ला (Abhinav Shukla) घर से बेघर हो गए. और इससे फैंस को जबरदस्त झटका लगा था. दरअसल फैंस का ये मानना था कि अभिनव शुक्ला इस सीजन के फाइनलिस्ट तो जरूर बनेंगे.

हाल ही में ट्विटर पर #AbhinavDeservesFinale ट्रेंड कर रहा था.  और इसी हैशटैग के साथ फैंस शो के मेकर्स संग गुस्सा भी जाहिर कर रहे थे.

 

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हालांकि टीवी सेलेब्स ने भी अभिनव शुक्ला के इविक्शन को अनफेयर बताया है. तो उधर कलर्स (Colors) चैनल के ऑफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल पर अभिनव शुक्ला की जर्नी का एक ऐसा वीडियो शेयर किया गया है.

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इस वीडियो में शो के दौरान अभिनव शुक्ला के सफर को दिखाया गया है. वीडियो के कैप्शन ये लिखा गया है कि हमेशा जिसने दिखाई समझदारी उसे फिनाले के इतने करीब आकर होना पड़ा घर से बेघर. क्या आप भी कर रहे हैं अभिनव शुक्ला को मिस?

 

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इस पोस्ट को देखकर ये अंदाजा लगाया जा रहा है कि शे मेकर्स को अपने इस फैसले पर अफसोस हो रहा है कि आखिर उन्होंने अभिनव शुक्ला को शो से बेघर क्यों कर दिया?

बता दें कि ‘बिग बॉस 14’ के घर से बेघर हुए सभी कंटेस्टेंट्स के वीडियोज को इस हैंडल पर शेयर किया गया है, लेकिन वीडियो में किसी की पूरी जर्नी नहीं दिखाई गई.

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