पंजाब, हरियाणा के किसानों के साथ बाकि राज्य के किसान आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हैं?

लेखिका- सोनाली ठाकुर

कृषि कानूनों के विरोध में किसानों के आंदोलन के बीच एक प्रश्न अक्सर पूछा जा रहा है कि कृषि क़ानूनों को लेकर सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानों की ही इतनी नाराजगी क्यों दिख रही है? बाकि राज्य के किसान आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हो रहे?

पंजाब की स्थिती अलग क्यों?

एपीएमसी (कृषि उत्पाद बाजार समिति) के अंतर्गत सरकार की तरफ़ से पहले से तय हुए दाम में ख़रीददारी का राष्ट्रीय औसत 10 प्रतिशत से कम है, लेकिन इसका उलट पंजाब में 90 प्रतिशत से अधिक है.

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ ज़मीनों पर उगने वाले अनाज को राज्य सरकारें एपीएमसी की मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस) देकर किसानों से ख़रीद लेती हैं. इसका मतलब खुले बाज़ार में केवल 10 प्रतिशत उत्पादन की बिक्री की ही गुंजाइश रह जाती है.

देश के 6,000 एपीएमसी मंडियों में से 2,000 से अधिक केवल पंजाब में है. इस सिस्टम के अंतर्गत यहाँ के किसानों को गेहूं और चावल के दाम बिहार, मध्य प्रदेश और दूसरे कई राज्यों से कहीं अधिक मिलते है. इस सिस्टम के अंतर्गत सरकार किसानों को न्यूनतम सपोर्ट दाम देने के लिए बाध्य है.

नए कृषि क़ानून के तहत पंजाब का कोई किसान अपने उत्पादन को खुली मंडी में अपने राज्य या राज्य से बाहर कहीं भी बेच सकता है. लेकिन विरोध करने वाले छोटे किसान कहते हैं कि वो एपीएमसी के सिस्टम से बाहर जा कर अपना माल बेचेंगे तो प्राइवेट व्यापारी उनका शोषण कर सकते हैं.

इसीलिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान एपीएमसी को हटाना नहीं चाहते.

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बिहार का किसान चुप क्यों?

इस प्रश्न का जवाब आपको हम चार पॉइंट में समझाते है:-

1- वर्ष 2011 की समाजार्थिक जाति जनगणना के आँकड़ों के अनुसार, बिहार के ग्रामीण बिहार में 65.58% परिवारों के पास भूमि नहीं है. बिहार की 38% भूमि असिंचित है. तिपहिया-चौपहिया कृषि वाहन केवल 2.49% परिवारों के पास हैं. सिंचाई की मशीनें केवल 5.15 परिवारों के पास हैं. बिहार के 70.88% ग्रामीण परिवारों की आमदनी का मुख्य स्रोत अनियमित मज़दूरी है.

2- विधानसभा चुनाव 2020 से पहले CSDS-लोकनीति ने सर्वे किया था. हालांकि सर्वे 37 विधानसभाओं में 37 सौ लोगों के बीच कराया गया था, लेकिन इससे एक अच्छा अनुमान लगता है. हालिया पारित कृषि क़ानूनों के बारे में पूछे जाने पर 69% लोगों ने कहा था कि उन्होंने इन क़ानूनों के बारे में नहीं सुना है, जबकि 31% ने सुना हुआ था. इनमें अगर किसानों की बात करें, तो 64% किसानों ने इन क़ानूनों के बारे में नहीं सुना था.

3- यह पूछे जाने पर कि क्या इन नये कानूनों की वजह से किसानों को ऊपज का अधिक दाम मिलेगा या कम दाम मिलेगा, तो 29% लोगों ने कहा कि किसानों को अधिक दाम मिलेगा, 26% ने कहा कि कम दाम मिलेगा, 18% ने कहा कि पहले जैसा रहेगा और 17% ने कोई उत्तर नहीं दिया. वहीं 39% किसानों ने कहा कि अधिक दाम मिलेगा, 19% ने कहा कि कम दाम मिलेगा, 20% ने कहा कि पहले जैसा मिलेगा, 22% ने कोई उत्तर नहीं दिया.

4- किसानों से पूछा गया कि आप अपनी ऊपज कहाँ बेचते हैं, तो जवाब इस तरह रहा- गांव/शहर में सेठ/साहूकार को 39%, खुले बाजार में खुद ले जाकर 18%, सरकारी मंडी में 06%, अन्यत्र 5%, 29% नहीं बेचते और 03% ने कोई उत्तर नहीं दिया.

कहां है महाराष्ट्र के किसान?

महाराष्ट्र में किसान बड़ा वोटबैंक है लेकिन यहां गन्ना किसान अधिक हैं और गन्ने की ख़रीद के लिए फेयर एंड रीमुनरेटिव सिस्टम (एफ़आरपी) मौजूद है और उसका मूल्य तय करने के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर अभी भी पहले से मौजूद है. उत्तर प्रदेश में भी काफी ज़मीन हॉर्टिकल्चर के लिए इस्तेमाल होने लगी है जिसका एमएसपी से कोई लेना-देना नहीं है.

आपको बता दें कि किसानों से सरकार जो अनाज सबसे ज्यादा खरीदती है उनमें गेहूं और चावल शामिल है और अगर अनाज की ख़रीद के आंकड़ों के देखा जाए तो ये साफ होता है कि राज्य के कुल उत्पादन और ख़रीद के मामले में पंजाब और हरियाणा की स्थिति दूसरों से काफी बेहतर है.

खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की रिपोर्ट के अनुसार बीते कुछ सालों में पंजाब और हरियाणा में हुए कुल धान उत्पादन का 80 फीसदी सरकार ने खरीदा, जबकि गेंहू के मामले में इन दो राज्यों से कुल उत्पादन का 70 फीसदी से अधिक सरकार ने खरीदा. लेकिन दूसरे राज्यों की स्थिति ऐसी नहीं है. दूसरे राज्यों में कुल उत्पादन का छोटा हिस्सा सरकार ख़रीदती रही है और किसान वहां पहले से ही बाज़ार पर निर्भर करते रहे हैं.

अब ये समझने की ज़रूरत है कि जिस पर सीधा असर होगा वो सबसे पहले विरोध करेगा. एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है. लेकिन 94 फीसदी किसानों को तो पहले ही एमएसपी नहीं मिलता और वो बाज़ार पर निर्भर हैं. ऐसे में ये समझा जा सकता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध क्यों कर रहे हैं.

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क्या है वो तीनों कानून जिनका विरोध कर रहे हैं किसान?

पहला है ”कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020”. इसमें सरकार कह रही है कि वह किसानों की उपज को बेचने के लिए विकल्प को बढ़ाना चाहती है. किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे. निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे. लेकिन, सरकार ने इस कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है. इसके जरिये बड़े कॉरपोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है. बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए वे किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं.

दूसरा कानून है- ”कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020”. इस कानून के संदर्भ में सरकार का कहना है कि वह किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती का रास्ता खोल रही है. इसे सामान्य भाषा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कहते है

तीसरा कानून है ”आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक, 2020”. यह न सिर्फ किसानों के लिए बल्कि आम जन के लिए भी खतरनाक है. अब कृषि उपज जुटाने की कोई सीमा नहीं होगी. उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी. सरकार को पता नहीं चलेगा कि किसके पास कितना स्टॉक है और कहां है? खुली छूट. यह तो जमाखोरी और कालाबाजारी को कानूनी मान्यता देने जैसा है. सरकार कानून में साफ लिखती है कि वह सिर्फ युद्ध या भुखमरी या किसी बहुत विषम परिस्थिति में रेगुलेट करेगी.

बिहार पर पड़ेगा पश्चिम बंगाल चुनाव का असर

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल और असम चुनाव में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया है. मुसलिम वर्ग वहां असर वाला माना जाता है. वहां रहने वालों में बड़ी तादाद में बिहार के लोग भी शामिल हैं. ऐसे में भाजपा ने 17 साल बाद शाहनवाज हुसैन को प्रमुखता देने का काम किया है. इस के जरीए वह पश्चिम बंगाल और असम के मुसलिमों को बताना चाहती है कि उन की चिंता भी उसे है.

दूसरी तरफ बिहार में नीतीश कुमार पर राष्ट्रीय जनता दल हमलावर है. उन को ‘निर्लज्ज कुमार’ का नाम दे कर 5 साल तक विधासभा के बौयकौट का नारा दिया गया है. कमजोर पड़ते नीतीश कुमार को भाजपा भी बिहार से दूर करना चाहती है. इस के लिए भाजपा की बहुतकुछ रणनीति पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों पर निर्भर करती है. असम और पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बिहार में भी राजनीतिक दंगल देखने को मिलेगा.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नया नाम ‘निर्लज्ज कुमार’ रख दिया है. तेजस्वी यादव का कहना है कि बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक की चर्चा के दौरान विधानसभा में मौजूद विधायकों को जिस बुरी तरह से मारापीटा गया और उन की बेइज्जती की गई, उसे शब्दों में बताया नहीं जा सकता है.

तेजस्वी यादव ने ये बातें अपने ट्विटर हैडिंल पर बताईं. उन्होंने लिखा, ‘महिला विधायक अनीता देवी नौनिया के पैर में चोट लगी. उन का ब्लाउज पकड़ कर घसीटा गया. उन के साथ बताई न जा सकने वाली बदसुलूकी की गई. जिस समय विधानसभा में यह हो रहा था, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के चरणों में बैठ कर आनंद ले रहे थे.’

तेजस्वी यादव ही नहीं, दूसरे कई विधायकों ने भी इस बात की शिकायत की. विधायक सत्येंद्र कुमार ने कहा, ‘एसपी ने मेरी छाती पर पैर रख कर मारा.’

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इस घटना के विरोध में तेजस्वी यादव ने कहा, ‘अगर सीएम नीतीश कुमार ने घटना पर माफी नहीं मांगी तो वे 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट करेंगे.’

किसी विरोधी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा के बौयकौट का यह पहला मामला है. वैसे, पिछले कुछ सालों में विधानसभा में मारपीट की तमाम घटनाएं हुई हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, पर किसी विपक्षी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट पहली बार हो रहा है.

राजद और बिहार सरकार के बीच विधानसभा में मारपीट का मामला नाक का सवाल बन गया है. राजद के नेता तेजस्वी यादव ही नहीं, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी इस घटना को ले कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए अपने ट्विटर पर लिखते हैं, ‘लोहिया जयंती के दिन कुकर्मी आदमी कुकर्म नहीं करेगा तो कुकर्मी कैसे कहलाएगा?’

लालू प्रसाद यादव अपने ट्विटर पर आगे लिखते है, ‘जब पुलिस विधानसभा में घुस कर विधायकों को मार सकती है, तो सोचिए जब उन के घर पर जाएगी तो क्या करेगी.’

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी अपने ट्विटर पर लिखा, ‘तुम ने आज जो चिनगारी भड़काई है, वह कल तुम्हारे काले सुशासन को जला कर राख कर देगी.’

इस घटना को ले कर तमाम ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखे, जिन में पुलिस महिला विधायक को घसीट कर ले जा रही थी. सरकार की तरफ से दावा किया गया कि राजद के विधायक विधानसभा अध्यक्ष को विधानसभा में आने से रोक रहे थे. विधायकों के हमले से उन्हें बचाने के लिए यह किया गया.

तेजस्वी यादव और लालू परिवार के विरोध पर बिहार के मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. नीतीश कुमार की खामोशी की वजह यह है कि वे इस घटना को तूल नहीं देना चाहते हैं, जबकि तेजस्वी यादव इस बात को मुद्दा बनाना चाहते हैं. आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार में राजनीति का नया अखाड़ा बनेगा.

क्या है बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021

बिहार विधानसभा में मारपीट की घटना का कारण राजद के विधायकों द्वारा बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 का विरोध किया जाना था. राजद और बाकी विपक्ष जैसे कांग्रेस और वाम दलों का कहना है कि नीतीश सरकार इस विधेयक की आड़ में पुलिस को विशेष अधिकार दे रही है, जिस के बाद पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. विधायक इस बात का विरोध कर रहे थे, जिस की वजह से विधानसभा में पुलिस बुलानी पड़ी और मारपीट की यह घटना घट गई, जिसे बिहार की राजनीति में एक काला अध्याय माना जा रहा है. यह केवल काला अध्याय ही नहीं है, विपक्षी दलों को एकजुट करने का जरीया भी बन गया है.

बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को ले कर राजद, कांग्रेस और वाम दल नीतीश सरकार पर हमलावर हैं. नीतीश कुमार की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी भी अलग से पूरे प्रकरण को देख रही है. उस के लिए भी यह अवसर की तरह से है. जैसेजैसे विपक्षियों द्वारा नीतीश कुमार पर हमले होंगे, उन की पकड़ बिहार से कम होगी. इस से भाजपा को नीतीश कुमार को हाशिए पर धकेलना आसान होता जाएगा.

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे के बाद बिहार की राजनीति में नए गुल खिलने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं. बिहार में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत करने की फिराक में है, जिस से नीतीश कुमार की ताकत को कम किया जा सके. भाजपा बिहार में नीतीश कुमार को इस कदर मजबूर करना चाह रही है कि वे भाजपा की हर बात मान लें. वे अपने मन से मुख्यमंत्री की कुरसी से हट जाएं, जिस से भाजपा वहां अपना आदमी बैठा सके.

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शाहनवाज बन सकते हैं भाजपा का नया चेहरा

बिहार की राजनीति में शाहनवाज हुसैन को ले कर अटकलों का दौर चल रहा है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शाहनवाज हुसैन बिहार में भाजपा का नया चेहरा होंगे. इन के जरीए वह मुसलिम वर्ग में अपनी पैठ बनाने का काम करेगी.

मुसलिम वर्ग बिहार में यादव समाज के साथ मिल कर भाजपा को विस्तार नहीं करने दे रहा है. राजद को कमजोर करने के लिए भी जरूरी है कि मुसलिम वर्ग को उस से अलग किया जाए. शाहनवाज हुसैन ऐसे नेता हैं जिन से यह काम हो सकता है.

साल 2001 में 32 साल की उम्र में केंद्र की अटल सरकार में शाहनवाज हुसैन को उड्डयन मंत्री बनाया गया था और साल 2003 में उन को कपड़ा मंत्री बना दिया गया था. तब वे भाजपा के ‘पोस्टर बौय’ कहे जाते थे.

शाहनवाज हुसैन की इमेज कट्टर मुसलिम की नहीं है. उन का प्रेम विवाह रेनू नामक लड़की से हुआ था, जो उन के साथ पढ़ती थी. साल 2004 में जब वे किशनगंज सीट से अपना चुनाव हार गए तो भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए. साल 2009 में वे सांसद बने, पर भाजपा में उन के महत्व को कम कर दिया गया.

तकरीबन 17 साल के बाद शाहनवाज हुसैन को केंद्र की राजनीति से बिहार भेजा गया. यहां नीतीश सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया.

भाजपा की मुख्यधारा में शाहनवाज हुसैन की वापसी को नए अर्थों में देखा जा रहा है. बिहार में शाहनवाज हुसैन को मंत्री बनाने के लिए विधानपरिषद का सदस्य बनाया गया. इस के बाद वे उद्योग मंत्री बनाए गए. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया.

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शाहनवाज हुसैन के बहाने भाजपा मुसलिमों को यह संदेश देने का काम कर रही है कि वह उन की चिंता करती है. दिल्ली में मोदीशाह की जोड़ी बनने के बाद शाहनवाज हुसैन को पहली बार महत्व दिया जा रहा है. शाहनवाज हुसैन के बारे में एक आकलन यह भी लगाया जा रहा है कि केंद्र में उन की उपयोगिता दिख नहीं रही थी, जिस कारण उन्हें बिहार भेजा गया है.

भाजपा उन के नाम पर कोई बड़ा दांव नहीं लगाएगी. भाजपा की रणनीति पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है. ये नतीजे बिहार में भी उथलपुथल मचा सकते हैं. इस में शाहनवाज हुसैन की भूमिका भी चर्चा में है. नीतीश कुमार का राजद द्वारा किया जा रहा विरोध भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिस की आड़ में भाजपा नीतीश कुमार पर दबाव बढ़ाने का काम करेगी.

74 साल की उम्र में महाभारत के ‘इंद्र’ ने दुनिया को कहा अलविदा, पढ़ें खबर

दूरदर्शन का चर्चित सीरियल महाभारत (Mahabharat) में इंद्र का किरदार निभाने वाले सतीश कौल (Satish Kaul) ने दुनिया को अलविदा कह दिया. 74 साल की उम्र में उनका निधन हुआ.

बताया जा रहा है कि उन्हें कोरोना वायरस के लक्षण थे. जिसके बाद उनका निघन हो गया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सतीश कौल ने बताया था कि वो लुधियाना में एक किराए के घर में रहते थे.

उन्होंने ये भी बताया था कि वे वृद्धाश्रम में भी रहे थे. इसके बाद वो अपनी एक साथी सत्या देवी की मदद से किराए के घर में रहने लगे. खबरों के अनुसार सतीश कौल ने बताया था कि उन्हें पैसों की किल्लत तो है ही साथ ही देश में लगे लॉकडाउन ने उनकी स्थिति और भी बदतर कर दी है.

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आपको बता दें कि सतीश कौल टीवी शो महाभारत में इंद्र के किरदार से काफी मशहूर हुए. इसके अलावा वो सुपरहिट टीवी शो विक्रम और बेताल में भी नजर आए थे. उन्होंने कई पंजाबी और हिंदी फिल्मों में भी काम किया था.

उन्हें पंजाब का अमिताभ बच्चन भी कहा जाता था. उन्होंने कई फिल्मों और टीवी सीरियल्स के जरिए अपनी एक्टिंग के जरिए दर्शकों के दिलों पर छाप छोड़ी थी.

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Yeh Rishta Kya Kehlata hai: कार्तिक की जिंदगी में वापस लौटेगी नायरा, आएगा नया ट्विस्ट

स्टार प्लस का फेमस सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. कहानी में  शानदार ट्विस्ट एंड टर्न्स आने के कारण कहानी में एक बार फिर दिलचस्प मोड़ आया है जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है.

शो के लेटेस्ट ट्रैक में ये दिखाया जा रहा है कि सीरत (Shivangi Joshi) और कार्तिक (Mohsin Khan) की जिंदगी में रणवीर (Karan Kundrra) नाम के तूफान की एंट्री हुई है. रणवीर और सीरत का रिश्ता धीरे-धीरे गोयनका परिवार के सामने खुल रहा है, जिससे कार्तिक दुखी है.

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तो वहीं कार्तिक जल्द ही सीरत के साथ शादी करने को तैयार था ताकि कैरव को उसकी मां का प्यार मिल सके लेकिन रणवीर के आने से कार्तिक की खुशियां बिखरने वाली है.

खबरों की माने तो सीरियल के लेटेस्ट ट्रैक में ये दिखाया जाएगा कि सीरत की विदाई के साथ मेकर्स शो में नायरा की एंट्री कराएंगे. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा था कि नायरा अचानक से कार्तिक और गोयनका परिवार से दूर हो गई है, जिसके बाद सभी मान रहे हैं कि वो मर चुकी है. लेकिन सीरियल में नया ट्विस्ट आने वाला है, सीरियल में नायारल की एंट्री से कहानी एक नया मोड़ लेगी.

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मिली जानकारी के अनुसार सीरियल में ये भी दिखाया जाएगा कि कार्तिक कहेगा कि वह सीरत से प्यार नहीं करता है बल्कि कैरव की खुशी के लिए वो उससे शादी कर रहा था. कार्तिक अपने बेटे कैरव को भी यह समझाएगा कि सीरत को उसकी जिंदगी जीने का पूरा हक है.

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नौसेना दिवस: दुश्मन के हर हमले का करारा जवाब देता है- भारतीय नौ सेना

विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी नौसेना ( भारतीय नौ सेना) के सम्मान में हर साल 04 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता है. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय 04 दिसंबर के दिन ही ऑपरेशन ट्राइडेंट नाम अभियान शुरू करके पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर भारी बमबारी कर उसे तबाह कर दिया था . तब से हर वर्ष उस कामयाबी कों याद करते हुए हर साल 04 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता है.

हमारी नौ सेना ने जंग-ए-आजादी से आज तक कई बहादुरी के कारनामों कों अंजाम दिया है.

1965 की लड़ाई में नौसेना ने बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए दुश्मन के सारे तटीय कुटनीतिक कों तोड़ने में कामयाबी हासिल किया.  इसके साथ ही 1971 की लड़ाई में नौसेना ने अपने समुद्री क्षेत्र में काफी आगे बढ़ते हुए दुश्मन कों मुह तोड़ जवाब दिया, पाकिस्तान के कराची बंदरगाह को तबाह करने के साथ पाकिस्तानी पनडुब्बी  गाजी कों जलमग्न कर दिया.

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भारतीय नौ सेना का इतिहास काफी पुराना है, मुस्लिम शासको के समय में कई महान शासको  ने अपने तटीय इलाकों के रक्षा एवं समुद्री व्यापार की रक्षा के लिए समुद्री सेना की स्थापना किया था. फिर  ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान इस समुद्री सेना के स्वरूप में आधुनिकता का समावेश हुआ और धीरे-धीरे रायल इंडियन नेवी के  नाम से पुरे विश्व में प्रसिद्ध हुआ. आजादी के बाद  रायल इंडियन नेवी का नाम बदलकर भारतीय नौसेना कर दिया गया. तब से आज तक भारतीय नौसेना पूरी लगन से दुश्मन कों करार जवाब देने के लिए हर पल तैयार रहता है.

जानकारों एवं इतिहासकारो का कहना है कि आजादी प्राप्ति के बाद भारत की नौसेना में तेजी से शक्ति भरा गया, क्यों कि विभाजन के समय बाद लगभग एक तिहाई सेना के साथ कई महत्वपूर्ण  नौ सैनिक संस्थान पाकिस्तान को चली गई थी .

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आजादी प्राप्ति के बाद  भारत सरकार ने नौसेना के विस्तार की तत्काल योजना बनाई और एक वर्ष बीतने के पहले ही ग्रेट ब्रिटेन कई टन क्रूजर कों खरीदा .

आजादी के 17 साल बाद  1964 ई. तक भारतीय नौ सेना में कई भारी बेड़े शामिल कर लिए गये थे, जिनमे  वायुयान वाहक विक्रांत, क्रूजर दिल्ली एवं मैसूर के साथ  अनेक फ्रिगेट स्कवाड्रन शामिल था .

1965  और 1971  के युद्ध के बाद इसके शक्ति में और बढ़ोतरी की गई. आज के समय में भारतीय नौ सेना अति आधुनिक तकनीको से लैस है, आधुनिक पनडुब्बीनाशक तथा वायुयाननाशक फ्रिगेट के साथ कई  नए फ्रिगेट हैं . इसके साथ ही आई एन एस अरिहन्त जैसे आधुनिक पनडुब्बी भारतीय नौ सेना की शक्ति में चार चाँद लगा रहा  है . छोटे नौसैनिक जहाजों के नवनिर्माण का कार्य भी तेजी से चल रहा है, जबकि  तीन सागरमुख प्रतिरक्षा नौकाएँ अजय,अक्षय तथा अभय हर पल समुद्री हमलावरों कों मुह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार रहता है .

नक्सल बनाम भूपेश बघेल: “छाया युद्ध” जारी आहे

हाल ही में बीजापुर में 24 जवानों की नृशंस हत्या ने छत्तीसगढ़ सहित देश को झकझोर दिया है. ऊपर से “एक जवान” को अगवा करने के बाद “सरकार को नरम”  करने में भी नक्सली  सफल हो गए हैं. अब केंद्र सरकार भी पहले से ज्यादा छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद पर अपनी पैनी नजर रख रही है.  केंद्रीय गृह मंत्री एवं अमित शाह के छत्तीसगढ़ दौरे और अगुआ जवान की रिहाई में ली गई  रूचि से यह  साफ है.

छत्तीसगढ़ सरकार और नक्सलियों के घात प्रतिघात पर  अगर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में नक्सली लगातार हमलावर हुए चले जा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की  भूपेश बघेल सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं. ऐसी परिस्थितियों में अखिर लाख टके का सवाल यह है कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ से कब और कैसे  खत्म होगा.

पिछले सप्ताह नक्सलियों के घटनाक्रम का जो ड्रामेटिक घटनाक्रम चला. उसे संपूर्ण देश ने देखा है. जो नई परिस्थितियां  आई है उनके अनुसार-

बीजापुर में नक्सली हमले के बाद अगवा किए गए “कोबरा कमाण्डो” राकेश्वर सिंह को 8 अप्रेल को देर शाम  नक्सलियों ने छोड़ दिया . मगर यह अभी साफ नहीं हुआ  कि जवान को छोड़ने के बदले नक्सलियों ने क्या शर्ते रखी? और क्या क्या समझौता हुआ है.

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बीजापुर हमले 24 जवानों की शहादत के बाद जो  घटनाक्रम हुआ .उसमें दो स्थानीय पत्रकारों को एक  कॉल आई थी. कॉल में कहा गया था कि सीआरपीएफ जवान उनके कब्जे में है. महत्वपूर्ण यह है कि पत्रकारों के दावों का तब बीजापुर  पुलिस अधीक्षक ने खंडन कर दिया था.

बात धीरे-धीरे उजागर हुई तथ्य सामने आया कि नक्सलियों ने राकेश्वर की फोटो जारी करके साबित कर दिया कि कोबरा जवान उन्हीं की गिरफ्त में है. नक्सलियों ने फोटो जारी करने के साथ माँग की, कि सरकार बातचीत के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति करे.इसके बाद राकेश्वर को छोड़  जाएगा. अखिर सरकार अगवा जवान को 6 दिन तक छुड़ाने के लिए गंभीर क्यों नहीं थी…?

किस तरह अगवा जवान की पत्नी और परिजनों ने जम्मू में सड़क पर हंगामा किया,  केंद्र सरकार से सवाल पूछे, छत्तीसगढ़ सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. यह सब घटनाक्रम बताता है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद और सरकार अब आमने-सामने हैं. बस्तर में एक छाया युद्ध चल रहा है

सोनी सोरी और पत्रकार!

कमांडो जवान राकेश्वर की रिहाई और सरकार से बातचीत के लिए स्थानीय पत्रकार सामने आए और साथ ही बस्तर में नक्सलियों के समर्थक माने जाने वाली सोनी सोरी ने प्रयास शुरू किया. लेकिन उन्हें नक्सलियों ने  खाली हाथ लौटा दिया. वहीं घटना के बाद से कोबरा बटालियन का जवान राकेश्वर लापता था… समय बीता चला जा रहा था.

यही नहीं नक्सलियों से वार्ता करने के लिए कुछ सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए. इनमें पद्मश्री धरमपाल सैनी, गोंडवाना समन्वय समिति के अध्यक्ष तेलम बोरैया के साथ कुछ और लोग शामिल थे. चर्चा है कि इनसे बातचीत के बाद ही जवान को छोड़ा गया है.मगर छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी तक अधिकृत रूप से  इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. यह भी सार्वजनिक नहीं है कि जवान को छोड़ने के बदले नक्सलियों ने कोई शर्त रखी है या नहीं. मगर यह माना जा रहा है कि नक्सली कुछ महत्वपूर्ण मांगों को सामने रख चुके हैं अगर सरकार उन्हें मान लेती है तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद निर्मूल हो जाएगा.

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कैसे खत्म होगा नक्सलवाद?

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार केंद्र सरकार की सहायता से नक्सलवाद को खत्म करना चाहती है यह तथ्य आज सामने है. यही कारण है कि अप्रैल के प्रारंभिक दिनों में दो हजार जवानों की  बटालियन नक्सलियों को खत्म करने आगे बढ़ी थी मगर नक्सलियों ने उन्हें घेरकर ऐसा हमला किया कि 24 जवान शहीद हो गए. घटना के बाद  जवान जो वहां उपस्थित थे पीछे हट गए. भूपेश बघेल सरकार के सत्ता काल का यह एक ऐसा समय है जब नक्सली खतरनाक ढंग से हमलावर हुए हैं. नक्सलियों ने हमेशा की तरह सरकार को बैकफुट  पर लाने के लिए एक जवान का अगवा भी कर लिया. संपूर्ण घटनाक्रम के पश्चात जहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जवान की रिहाई पर प्रसन्नता व्यक्त की वहीं पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तंज कसा है कि 6 दिन तक जवान को अगवा रखा गया और सरकार सोती रही.

नक्सलियों द्वारा घात प्रतिघात हमला और अगवा करने का खेल बहुत पुराना है कभी किसी मंत्री के रिश्तेदारों को और कभी जिलाधीश एलेक्स पॉल मेनन का अगवा किया जाना इसमें शामिल है. छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का चल रहा यह जेहाद… छाया युद्ध कब खत्म होगा, एक बड़ा सवाल है.

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Crime story- चांदी की सुरंग: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उस समय चांदी 70-75 हजार रुपए किलो से गिर कर 40-45 हजार रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास आ गई थी. शेखर का जयपुर में सोनेचांदी का बड़ा काम था. उस ने उन्हें बताया कि अब चांदी ज्यादा सस्ती नहीं होगी. इसलिए अगर खरीद कर रख ली जाए, तो कुछ महीनों में ही अच्छा रिटर्न दे देगी. डाक्टर सोनी को शेखर की बात जंच गई.

डा. सोनी ने शेखर की मदद से करोड़ों रुपए की चांदी की सिल्लियां खरीद लीं. चांदी की ये सिल्लियां शेखर ने उन्हें अपनी फर्मों से दिलवाईं. अब सवाल आया कि चांदी को रखा कहां जाए? बढ़ते हुए अपराधों को देखते हुए घर में ज्यादा सोनाचांदी रखना जोखिम का काम था.

शेखर ने डाक्टर सोनी को ऐसी तरकीब बताई कि चोरों को पता नहीं चल सके. शेखर ने डा. सोनी से कहा कि यह चांदी बक्सों में रख कर बेसमेंट में फर्श खुदवा कर जमीन में गाड़ दें.

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डा. सोनी को पसंद आया आइडिया

डा. सोनी को शेखर का यह बुलेटप्रूफ आइडिया पसंद आ गया, लेकिन उन्होंने शंका जताई कि जमीन खोद कर बक्से रखने वाले को तो इस राज का पता चल जाएगा. इस पर शेखर ने उन से यह काम अपने भरोसे के लोगों से कराने की बात कही. पूरी तरह आश्वस्त हो कर डा. सोनी ने चांदी जमीन में गाड़ने की जिम्मेदारी शेखर को ही सौंप दी.

शेखर ने अपने भांजे जतिन जैन को भी डा. सोनी के इस जिम्मेदारी वाले काम में राजदार बना लिया. शेखर व जतिन ने चांदी रखने के लिए लोहे के आधा फुट ऊंचे, 3 फुट चौड़े और 3 फुट लंबे 3-4 बक्से बनवाए. इन बक्सों में चांदी की सिल्लियां भर दी गईं. शेखर ने अपने ड्राइवर केदार जाट और अपने शोरूम के नौकर कालूराम सैनी से डा. सोनी के मकान के बेसमेंट में गड्ढा खुदवाया.

इस गड्ढे में डा. सुनीत सोनी की मौजूदगी में चांदी की सिल्लियों के बक्से रख दिए गए. केदार जाट और कालूराम सैनी ने बक्से रखने के बाद उन पर मिट्टी की मोटी परत बिछा दी. बाद में डा. सोनी ने उस जगह टाइल्स लगवा दी थीं.

इस तरह डा. सोनी के मकान के बेसमेंट में जमीन में दबाई गई चांदी की सिल्लियों का केवल डाक्टर दंपति, शेखर और उस के भांजे जतिन को ही पता था. गड्ढा खोदने और बक्से रखने वाले केदार जाट तथा कालूराम सैनी को चांदी होने का पता नहीं था. यह राज ज्यादा से ज्यादा केवल 6 लोगों को मालूम था.

बाद में शेखर ने डा. सोनी को फूलप्रूफ आइडिया बताने और उस पर अमल कराने के साथ ही अपने शातिर दिमाग से बड़ा षडयंत्र रचना शुरू कर दिया. पहले उस ने डा. सोनी के आसपास के मकानों का पता किया. पता चला कि डाक्टर के ठीक पीछे मुंबई की रहने वाली उगंती देवी का एक खाली प्लौट है. इस प्लौट में एक कमरा बना हुआ था.

उस ने बनवारी जांगिड़ के माध्यम से उगंती देवी से संपर्क किया. पहले तो उगंती देवी ने प्लौट बेचने से इनकार कर दिया, लेकिन शेखर ने हिम्मत नहीं हारी.

वह बनवारी के जरिए उगंती देवी के पीछे लगा रहा और उसे प्लौट बेचने के लिए राजी कर लिया. प्लौट का सौदा 97 लाख रुपए में हुआ. इसी साल 4 जनवरी को इस प्लौट की रजिस्ट्री बनवारी लाल जांगिड़ के नाम से करा दी गई.

दरअसल, बनवारी तो शेखर का मोहरा था. प्लौट की सारी रकम शेखर ने ही दी. यह प्लौट शेखर ने अपनी योजना को मूर्तरूप देने के लिए खरीदा था. प्लौट खरीदने के बाद कुछ दिन वहां सालों से उगी झाडि़यों और घासफूस की सफाई होती रही.

इस के बाद वहां बनवारी के अलावा शेखर अग्रवाल और उस का भांजा जतिन जैन के साथ कुछ और लोग भी गाडि़यों से आनेजाने लगे. प्लौट के चारों ओर लोहे की चादरें और ग्रीन नेट लगा दी गई ताकि आनेजाने वालों और अड़ोसपड़ोस के लोगों को कुछ नजर ना आए. बिजली का कनेक्शन भी ले लिया गया.

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योजनाबद्ध तरीके से उस प्लौट में बने कमरे का फर्श तोड़ कर सुरंग की खुदाई शुरू कराई गई. बनवारी की देखरेख में सुरंग की खुदाई के लिए शेखर ने टोंक जिले के रहने वाले 2 भाइयों मनराज मीणा और दिलखुश मीणा को बुलाया.

दोनों भाई पहले से ही शेखर के जानकार थे और उस के कहने पर उन्होंने एक बार डा. सोनी के फार्महाउस की तारबंदी का काम किया था.

सारा इंतजाम शेखर का

शेखर के बताए अनुसार दोनों भाइयों ने हैमर, ग्राइंडर, ड्रिल मशीन, गैंती, फावड़े और दूसरे औजारों से उस प्लौट से डा. सोनी के मकान के तहखाने तक सुरंग खोद ली. सुरंग खुदाई के काम में बीचबीच में शेखर, जतिन, बनवारी, केदार और कालूराम भी उन की मदद करते रहे. इस काम में उन्हें कई दिन लगे.

सुरंग तो खुद गई थी, लेकिन तहखाने में गड़े चांदी के बक्सों तक नहीं पहुंच पाई. बीच में पानी का टैंक बना हुआ था. दोनों भाइयों को जमीन धंसने और खुद के दबने का डर लगा, तो उन्होंने आगे खोदने से इनकार कर दिया.

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पूरी सुरंग खुदे बिना शेखर का सपना पूरा नहीं हो सकता था. उस ने बनवारी से किसी आदमी का इंतजाम करने को कहा. बनवारी ने अपने पड़ोसी रामकरण जांगिड़ से बात की. रामकरण पड़ोसी जिले सवाई माधोपुर के रहने वाले मोहम्मद नईमुद्दीन को अच्छी तरह जानता था. वह पहले शेखर के यहां कारपेंटर का काम कर चुका था. रामकरण ने नईमुद्दीन से बात की तो लालच में वह तैयार हो गया.

नईमुद्दीन ने अधूरी सुरंग की खुदाई का काम आगे बढ़ाया. उस ने लोहे के बक्सों तक सुरंग खोद दी. इस के बाद कटर और ग्राइंडर की मदद से बौक्स काट कर चांदी की सिल्लियां निकाल ली गईं.

पुलिस की जांच और आरोपियों से पूछताछ में सामने आया कि डा. सुनीत सोनी के मकान से सुरंग के जरिए चांदी की 540 किलो वजन की 18 सिल्लियां चुराई गईं. एक सिल्ली का वजन 30 किलो था. मौजूदा बाजार भाव से इस चांदी की कीमत 3 करोड़ रुपए से ज्यादा थी. पुलिस का कहना है कि डा. सोनी के मकान से चुराई चांदी की सिल्लियां शेखर अग्रवाल और उस के भांजे ने बाजार में जौहरियों को बेच दी थीं.

पूछताछ में पता चला कि नईमुद्दीन ने अपने मेहनताने के रूप में चांदी की एक सिल्ली ली थी. चांदी की यह सिल्ली 2 दिन बाद शेखर ने उसे 20 लाख 73 हजार रुपए नकद दे कर वापस ले ली. पुलिस ने नईमुद्दीन से 18 लाख रुपए बरामद किए हैं.

अगले भाग में पढ़ें- पुलिस को जांच में एक कटा हुआ बक्सा मिला

Crime story- चांदी की सुरंग: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

रामकरण जांगिड़ ने मैनपावर मुहैया कराने, सुरंग खोदने, कटर व ग्राइंडर से लोहे का बक्सा काटने और चांदी की सिल्लियां निकाल कर शेखर व जतिन की कार में रखवाने के बदले साढ़े 5 लाख रुपए लिए थे.

बनवारी लाल जांगिड़ ने पुलिस को बताया कि मकान की डील में तय हुआ था कि शेखर जब कहेगा, तब वह मकान उस के नाम कर देगा और शेखर इस के बदले उसे 15 लाख रुपए देगा. इस के अलावा चांदी में हिस्सेदारी की बात भी तय हुई थी.

पुलिस ने भले ही इस मामले में 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन चांदी चोरी के मास्टरमाइंड शेखर अग्रवाल और जतिन जैन फरार थे. चोरी गई चांदी की 30 सिल्लियों में से एक टुकड़ा भी बरामद नहीं हो पाया था. इस से जयपुर कमिश्नरेट पुलिस विवादों में आ गई.

आरोप यह भी लगा कि शेखर के सब से विश्वस्त केदार जाट और कालूराम सैनी ने उन ज्वैलर्स के नाम पुलिस को बताए थे, जिन्हें चांदी की सिल्लियां बेची गई थीं. पुलिस ने कई ज्वैलरों को पूछताछ के लिए बुलाया जरूर, लेकिन गिरफ्तारी किसी की नहीं की गई. चांदी की 3 सिल्लियां बरामद होने की चर्चा भी रही, लेकिन पुलिस इस से इनकार करती रही.

कहा यह भी जा रहा है कि बनवारी लाल जांगिड़ को पुलिस ने 25 फरवरी को ही हिरासत में ले लिया था. उस ने शेखर अग्रवाल का सारा भांडा भी फोड़ दिया था. लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया. इस से उसे फरार होने का मौका मिल गया. हालांकि पुलिस ने शेखर का पासपोर्ट जब्त कर लिया है.

जयपुर कमिश्नरेट पुलिस की जांच पर उठे विवादों को देखते हुए राजस्थान के पुलिस महानिदेशक एम.एल. लाठर ने 9 मार्च को चांदी चोरी के इस मामले की जांच स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) को सौंप दी.

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एसओजी खोलेगी सारी परतें

एसओजी के एडिशनल डीजी अशोक राठौड़ ने 10 मार्च को तेजतर्रार आईपीएस अफसर राजेश सिंह के नेतृत्व में 4 अफसरों की एसआईटी गठित कर दी.

एसओजी के डीआईजी शरत कविराज, एसपी राजेश सिंह और अन्य अफसरों की टीम ने 11 मार्च को मौके पर पहुंच कर सुरंग का निरीक्षण किया. इस के बाद अदालत से प्रोडक्शन वारंट ले कर जेल में बंद बनवारी जांगिड़, केदार जाट और कालूराम सैनी को अपनी कस्टडी में ले लिया.

एसओजी का मानना है कि ये तीनों ही शेखर अग्रवाल के असली राजदार और कामगार हैं. इन से पूछताछ में शेखर और जतिन के सारे राज खुलेंगे. चांदी खरीदने वाले भी पकड़े जाएंगे. शेखर और जतिन भी ज्यादा दिनों तक पुलिस से नहीं भाग सकेंगे, क्योंकि उन के विदेश भागने के रास्ते बंद कर दिए गए हैं.

नेपाल में जतिन जैन बैंकाक से सोने की तस्करी के मामले में अपनी मां सरिता जैन के साथ गिरफ्तार हुआ था. कहा जाता है कि करीब 5 साल पहले शेखर बाजार का 5-6 करोड़ रुपए का कर्ज हो जाने पर विदेश चला गया था. वह करीब एक साल बाद जयपुर लौटा था.

शेखर का नाम जोधपुर में सितंबर 2020 में सोने की तस्करी के मामले में डीआरआई की काररवाई में भी सामने आया था. डा. सोनी को इस बात का दुख है कि दोस्त ही उन्हें दगा दे गया. हालांकि डा. सोनी ने कथा लिखे जाने तक पुलिस को यह नहीं बताया था कि कितनी चांदी चोरी हुई, लेकिन चर्चा है कि उन के मकान के तहखाने में जमीन में 3 बक्से गड़े हुए थे.

पुलिस को जांच में एक बक्सा कटा हुआ और 2 खाली मिले. डा. सोनी ने पुलिस को बताया कि ये बक्से खाली ही थे. सवाल यह है कि खाली बक्से जमीन में दबाने की वजह क्या थी?

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चर्चा यह भी है कि डा. सोनी ने जब चांदी निकाली तो 2 बक्सों में चांदी सुरक्षित मिली. इसे निकाल लिया गया. लेकिन इस बात का खुलासा न डाक्टर सुनीत सोनी ने किया और न ही पुलिस ने.

एसओजी ने बनवारी, केदार और कालू से रिमांड अवधि में पूछताछ कर यह पता लगाया कि शेखर और जतिन ने डाक्टर के घर से चुराई गई चांदी की सिल्लियां किनकिन लोगों को बेची थीं. इन से पूछताछ के आधार पर एसओजी ने कुछ ज्वैलर्स को नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया.

बाद में 16 मार्च तक जयपुर की ज्वैलर्स फर्म प्रदीप आर्ट्स, सरिता सिल्वर पैलेस, धनंजय कारपोरेशन, आर.के. ज्वैलर्स और सत्यनारायण मातादीन आदि से चांदी की 11 सिल्लियां बरामद कर लीं. इन का कुल वजन लगभग 300 किलो है. पुलिस ने ज्वैलर्स को गिरफ्तार नहीं किया लेकिन उन्हें मुकदमा दर्ज कराने की छूट दे दी.

इस दौरान ज्वैलर्स प्रदीप गुप्ता, देवेंद्र अग्रवाल, सर्वती, अंशुल सोनी और भंवरलाल कपूरिया आदि ने शेखर और जतिन के खिलाफ चांदी की सिल्लियां धोखाधड़ी से बेचने के 6 मुकदमे पुलिस में दर्ज करा दिए थे. एसओजी चांदी की बाकी सिल्लियों को बरामद करने और मुख्य आरोपी शेखर व जतिन की तलाश में जुटी हुई थी.

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Crime story- चांदी की सुरंग: भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

जिस तरह सुरंग खोद कर डा. सुनीत सोनी के तहखाने से 540 किलोग्राम चांदी की 18 सिल्लियां चुराई गईं, वह हैरतंगेज था. लेकिन इस से भी हैरतंगेज बात यह थी कि यह काम डा. सुनीत के उसी दोस्त शेखर ने कराया था, जिस ने इतनी चांदी खरीदवाई  और बक्सों में भर कर डाक्टर के क्लीनिक के फर्श में दबवाई. कैसे  हुआ यह सब…

इसी साल फरवरी के महीने में जब चांदी के भावों में भारी उतारचढ़ाव चल रहा था, तो डा. सुनीत सोनी ने अपने घर में रखी चांदी की सिल्लियों को बेचने

का मन बनाया. बेचने के लिए पहले किसी सुनार या ज्वैलर्स को चांदी की सिल्ली या उस का छोटा टुकड़ा दिखाना जरूरी था ताकि खरीदार इस बात से संतुष्ट हो जाए कि चांदी में कोई खोट नहीं है.

चांदी बेचने का विचार मन में आने पर डा. सोनी ने भरोसे के लोगों से अपने मकान के बेसमेंट के फर्श को खुदवाया. क्योंकि चांदी जमीन खोद कर दबाए गए 2 बक्सों में सुरक्षित थी. फर्श खुदने पर डा. सोनी के होश उड़ गए. फर्श के नीचे दबाए गए दोनों बक्से कटे हुए थे और उन में रखी चांदी की सिल्लियां लापता थीं.

डाक्टर सोनी समझ नहीं पाए कि जमीन में गड़े बक्सों में से चांदी की सिल्लियां कहां गायब हो गईं. उन सिल्लियों को जमीन निगल गई या लोहे के बक्से खा गए. चांदी भी कोई कम नहीं 5 क्विंटल 40 किलो थी. पूरी 18 सिल्लियों में बंटी हुई.

डा. सोनी ने कटे हुए लोहे के बक्से निकलवाए तो देखा, वहां बड़े सुराखनुमा सुरंग बनी हुई थी. वह समझ गए कि इसी सुरंग के रास्ते से चांदी निकाली गई है. इसीलिए बाकायदा सुरंग बनाई गई थी. उन्होंने अपने एक कर्मचारी को टौर्च दे कर उस सुरंग में उतारा. वह कर्मचारी रेंगता हुआ सुरंग के अंदर घुसा. 5-7 फुट के बाद वह सुरंग बंद थी. यानी चांदी की चोरी के बाद सुरंग बंद कर दी गई थी.

डा. सुनीत सोनी राजस्थान की राजधानी जयपुर में रहते हैं. वैशाली नगर के आम्रपाली सर्किल के डी ब्लौक में उन का आलीशान मकान है. इसी मकान में उन्होंने मेडिस्पा नाम से अपना हौस्पिटल खोल रखा है. सोनी जयपुर के नामी हेयर ट्रांसप्लांट सर्जन हैं.

कटे हुए और खाली बक्से देख कर डा. सोनी समझ गए कि किसी ने बहुत शातिराना अंदाज में चांदी की सिल्लियां चुराई हैं. यह किसी एक आदमी का काम नहीं था. चोर आगेपीछे या ऊपर से नहीं आए, बल्कि जमीन के नीचे सुरंग के रास्ते आए थे.

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डाक्टर ने बेसमेंट सहित पांच मंजिला मकान में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे. मकान के भूतल से ऊपर की मंजिल तक लोहे का मजबूत जाल लगा हुआ था. अच्छी गुणवत्ता वाले सीसीटीवी कैमरे लगे थे.

मकान में नीचे की मंजिल पर उन का क्लीनिक था और ऊपर की मंजिल पर परिवार रहता था. मकान में आनेजाने वाले हरेक आदमी का नाम, पता रजिस्टर में लिखा जाता था.

डा. सोनी के मकान के बेसमेंट की जमीन में गाड़ कर रखी गई चांदी की सिल्लियों की जानकारी केवल 6 लोगों को थी. इन लोगों में डा. सोनी और उन की पत्नी के अलावा परिवार से बाहर के केवल 4 लोगों को यह राज पता था कि डाक्टर साहब ने सुरक्षा के लिहाज से अपने मकान में फर्श के नीचे 2 बक्सों में चांदी की सिल्लियां रख कर गड़वाई थीं.

इस का मतलब चांदी की चोरी उन लोगों में से किसी ने की थी, या फिर उन चारों में से किसी ने कभी यह राज किसी पांचवें आदमी को बता दिया था और उस आदमी ने इस वारदात को अंजाम दिया था.

सुरंग के रहस्य का पता लगाने के लिए उन्होंने खुद आसपास के मकानों पर जा कर अपने तरीके से देखा, लेकिन कहीं भी ऐसी कोई बात नजर नहीं आई जिस से यह पता चले कि सुरंग वहां से बनाई गई थी.

डा. सोनी के मकान के पीछे वाले प्लौट में एक महीने से जरूर कुछ काम चल रहा था. उस प्लौट के चारों ओर लोहे की चादरें और हरे रंग का नेट लगा रखा था. डा. सोनी उस प्लौट पर भी गए, लेकिन उन्हें ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया, जिस से पता चलता कि सुरंग उस प्लौट में से खोदी गई थी.

चोरी हुई चांदी की कीमत करोड़ों रुपए थी. डाक्टर सोनी ने चांदी निवेश के लिहाज से खरीदी थी. इस में कुछ चांदी उन के पुरखों की भी थी. सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने चांदी की सिल्लियां जमीन में गाड़ कर उस पर फर्श बनवा कर टाइल्स लगवा दी थीं.

डा. सोनी समझ नहीं पा रहे थे कि जमीन में दबी चांदी की बात बाहर कैसे निकली? यह तय था कि जिस ने भी चांदी चोरी की योजना बनाई, वह बहुत शातिर था.

काफी सोचविचार के बाद डा. सोनी ने पुलिस को सूचना देने का फैसला किया. उन्होंने 24 फरवरी, 2021 को वैशाली नगर थाने में चांदी चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने मकान के बेसमेंट के फर्श में सुरक्षा के लिए चांदी की सिल्लियां रखी हुई थीं. जरूरत पड़ने पर फर्श तुड़वा कर देखा, तो लोहे के 2 बक्सों में रखी चांदी गायब मिली.

दोनों बक्से बाहर निकाल कर देखे, तो उन्हें कटर से काटा गया था. मकान की उत्तर दिशा में एक सुरंग भी बनी हुई है. सोनी ने रिपोर्ट में केवल चांदी चोरी होने की बात बताई थी. चांदी की कीमत या वजन वगैरह बाद में बताने की बात कही. बहरहाल, पुलिस ने धारा 457 और 380 में मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस अफसरों ने मौके के हालात देखे, तो हैरान रह गए. चांदी चोरी की वारदात करने के लिए पीछे के प्लौट से डा. सोनी के मकान के बेसमेंट तक सुरंग खोदी गई थी. इसी सुरंग के रास्ते चांदी की चोरी की गई.

डा. सोनी ने हालांकि पुलिस रिपोर्ट में चांदी की कीमत या वजन नहीं बताया था, लेकिन चांदी रखने के लिए बनवाए लोहे के बक्सों को देख कर पुलिस अधिकारियों को यह अंदाज हो गया कि चोरी गई चांदी करोड़ों रुपए की रही होगी.

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एडिशनल पुलिस कमिश्नर अजयपाल लांबा के निर्देशन में एसीपी रायसिंह बेनीवाल, वैशाली नगर थानाप्रभारी अनिल जैमिनी और डीएसटी (पश्चिम) इंसपेक्टर नरेंद्र खींचड़ के नेतृत्व में चांदी चोरी की जांचपड़ताल शुरू की गई. फोरैंसिक टीम ने भी मौके पर पहुंच कर जांच की और साक्ष्य जुटाए.

सब से पहले डा. सोनी के पड़ोस का प्लौट खरीदने वाले का पता लगाया गया. 20 साल से खाली पड़ा यह प्लौट इसी 4 जनवरी को 97 लाख रुपए में बनवारी लाल जांगिड़ ने खरीदा था. इस प्लौट में केवल एक कमरा बना हुआ था.

बनवारी जयपुर जिले के जमवा रामगढ़ थाना इलाके के गांव टोडा मीणा का रहने वाला था. पेशे से कारपेंटर बनवारी आजकल जयपुर में बालाजी विहार फूलवाड़ी आमेर कुंडा में रहता था.

मौके की हालत देखने से पता चला कि इस प्लौट में बने कमरे का फर्श खोद कर डा. सोनी के मकान के बेसमेंट तक सुरंग बनाई गई थी. चांदी चोरी के बाद गड्ढे में मिट्टी डलवा कर सुरंग को बंद कर दिया गया था और फर्श पर टाइल्स लगवा दी गई थीं.

पुलिस ने मजदूरों को बुला कर वह बंद सुरंग खुदवाई. इस काम में 2 दिन लग गए. बाद में पुलिस अधिकारियों और एफएसएल टीम ने सुरंग की नापतौल की. सुरंग 26 फुट लंबी, 10 फुट गहरी और 3 फुट चौड़ी थी. इस बीच पुलिस जांचपड़ताल कर लोगों से पूछताछ करती रही.

प्लौट खरीदार बनवारी लाल जांगिड़ को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. पूछताछ में उस ने बताया कि प्लौट बेशक उस के नाम से खरीदा गया है, लेकिन सारे पैसे शेखर अग्रवाल ने दिए थे. शेखर अग्रवाल के डा. सोनी से घनिष्ठ पारिवारिक और व्यावसायिक संबंध थे.

बड़ा खिलाड़ी निकला शेखर

जयपुर में राम मार्ग श्याम नगर में रहने वाले शेखर की बड़ी चौपड़ पर एन.जे. बुलियन और नारायण लाल जग्गीलाल सर्राफ और सिटी पल्स में बोरला के नाम से सोनेचांदी के आभूषणों के शोरूम हैं. पुलिस ने शेखर की तलाश की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला.

पुलिस ने एक मार्च को बनवारी लाल जांगिड़ के अलावा कालूराम सैनी, केदार जाट और रामकरण जांगिड़ को चांदी चोरी के मामले में गिरफ्तार कर लिया.

बनवारी जांगिड़ ने कुछ साल पहले शेखर के मकान पर फरनीचर का काम किया था. इस बीच वह शेखर का इतना विश्वासपात्र बन गया था कि उस ने उस के नाम से 97 लाख रुपए का प्लौट खरीद दिया था.

कालूराम जयपुर के कानोता थाना इलाके के पुराना बगराना माली की कोठी आगरा रोड का रहने वाला था. वह कई साल से शेखर अग्रवाल की बड़ी चौपड़ स्थित फर्म एन.जे. बुलियन और नारायण दास जग्गीलाल सर्राफ शोरूम पर काम करता था.

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केदार जाट मूलरूप से टोंक जिले में निवाई के गांव लुहारा का रहने वाला था. वह शेखर अग्रवाल का ड्राइवर था. वह रहता भी शेखर के घर पर ही था. रामकरण जांगिड़ जयपुर में बालाजी विहार (प्रथम) फूलबाड़ी पीली तलाई आमेर का रहने वाला था. वह भी पेशे से कारपेंटर था.

बाद में पुलिस ने 3 मार्च को इस मामले में मनराज मीणा, दिलखुश मीणा और मोहम्मद नईमुद्दीन को गिरफ्तार किया. इन में मनराज और दिलखुश सगे भाई थे.

टोंक जिले के दत्तवास थाना इलाके के गांव तुकिया के रहने वाले दोनों भाई मजदूरी और हलवाई का काम करते थे. कुछ समय पहले दोनों ने शेखर के कहने पर डा. सोनी के फार्महाउस पर तारबंदी का काम किया था. मोहम्मद नईमुद्दीन सवाई माधोपुर जिले के मलारना डूंगर थाना इलाके के गांव पीलवा नदी का रहने वाला था. वह जयपुर में रहता था. वह पहले इस मामले में एक मार्च को गिरफ्तार रामकरण जांगिड़ के पास कारपेंटर का काम करता था.

चांदी चोरी के मामले में ही बाद में पुलिस ने 3 आरोपियों को और गिरफ्तार किया. इस तरह 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया.

पुलिस की पूछताछ में चांदी चोरी की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह फिल्मी कहानियों से भी एक कदम आगे थी.

डा. सुनीत सोनी जयपुर के नामी हेयर ट्रांसप्लांट सर्जन हैं. उन की पत्नी अनुपमा सोनी भी डाक्टर हैं. डा. अनुपमा सोनी मिसेज एशिया इंटरनैशनल-2018 रह चुकी थीं. डाक्टर दंपति का अच्छा कामकाज होने से आमदनी भी अच्छी थी.

डा. सोनी को 3-4 साल पहले एक युवती ने अपने प्यार के जाल में फंसा लिया था. वह युवती उन्हें ब्लैकमेल कर लाखों रुपए मांग रही थी. उस ने डाक्टर के खिलाफ पुलिस में भी मामला दर्ज करा दिया था. बाद में डा. सोनी ने उस युवती के ही खिलाफ हनीट्रैप का मामला दर्ज कराया था. इस मामले में वह युवती और उस के गिरोह की कई अन्य युवतियों को जयपुर पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था.

डाक्टर सोनी के शेखर से कई सालों से घनिष्ठ संबंध थे. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. डाक्टर साहब शेखर से घरपरिवार और दुखसुख की बात करते थे. जिस के पास पैसा होता है, वह अपने पैसों को बढ़ाने की सोचता है. इसीलिए कभीकभार डा. सोनी शेखर से पैसों के निवेश के बारे में भी सलाह ले लेते थे.

कुछ महीने पहले जब चांदी के भाव घट रहे थे, तब शेखर ने डा. सोनी को आयकर के छापों का डर दिखा कर चांदी में पैसा लगाने की सलाह दी.

अगले भाग में पढ़ें- डा. सोनी को पसंद आया आइडिया क्यों पसंद आया

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