मेरा कुसूर क्या है: भाग 3

लेखक- एस भाग्यम शर्मा

जब तक मैं ने बीएड किया. मम्मी पूरे साल इन्हीं चक्करों में पड़ी रहीं और रुपयों को बरबाद करती रहीं. पापा बहुत नाराज होते. मम्मी कभीकभी उन से छिप कर ऐसे काम करने लगीं कि मेरे मम्मीपापा में भी तकरार होने लगी.

पंडितों और ज्योतिषियों ने मम्मी से कह दिया कि इन का डाइवोर्स कभी नहीं होगा. ये दोनों हमेशा साथ रहेंगे, तो मम्मी को विश्वास हो गया कि सब ठीक हो जाएगा.

मु झे लगता कि इन सब का कारण मैं ही हूं. मु झे खुद पर शर्म महसूस होती.

फिर भी मैं राजीव के साथ जाने को तैयार नहीं थी. पर ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान…’ कुछ लोग भी बीच में पड़ कर मु झे सम झौता करने के लिए मजबूर करने लगे.

मेरे पापा की हालत भी ठीक नहीं थी. उस का दोष भी मेरा भाई मु झ पर ही मढ़ना चाहता था.

मेरा बीएड पूरा हो चुका था और राजीव ने अपना ट्रांसफर दूसरे प्रदेश में करा लिया था ताकि दोनों फैमिली का हस्तक्षेप न रहे.

मु झे नौकरी करने की परमिशन मिल गई थी. शहर भी बड़ा था तो मैं ज्यादा कुछ बोल नहीं पाई.

वहां पर मु झे तुरंत नौकरी मिल गई. अच्छी नौकरी थी. मेरा बेटा भी मेरे साथ ही जाने लगा. पर राजीव अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. हरेक बात पर लड़ाई झगड़ा करना, बातबात पर हाथ उठाना उन के लिए बड़ी बात नहीं थी.

अब मैं मां को पत्र लिख सकती थी. स्कूल जाने से मेरा मन भी बदल गया था. इन बातों को मैं ने बड़ा नहीं लिया. मैं ने भी सोचा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा.

इस बीच, मैं फिर प्रैग्नैंट हो गई. एक बार तो गर्भपात करा दिया. जब दूसरी बार प्रैग्नैंट हुई तो गर्भपात कराने के लिए मैं ने ही मना कर दिया.

पापा को लगता कि मम्मी मु झे ससुराल में रहने नहीं देतीं. पर ऐसी बात नहीं थी. पापा और मम्मी के बीच में तकरारें होने लगीं. मम्मी मेरी बहुत चिंता करतीं.

मु झे सर्विस करने की परमिशन तो दे दी पर जौइंट अकाउंट में पैसा जमा होता था, जिस में से मैं निकाल नहीं सकती. राजीव सब ले कर खर्च कर देते. मैं कुछ नहीं कर पाती.

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मु झे अपने खर्चे के लिए उन के आगे हाथ फैलाना पड़ता. घर की सारी जरूरतें मेरी सैलरी से ही पूरी करते. कह दूं तो लड़ाई झगड़ा होता.

जब डिलीवरी कराने की बात आई, फिर पीहर ही गई. मांबाप तो मजबूर थे. एक बच्चा और पैदा हो गया. अब हम 4 लोग हो गए.

इस बीच, पापा का देहांत हो गया. मम्मी पढ़ीलिखी, सक्षम थीं. पर भैया ने घर की बागडोर अपने हाथों में ले ली. मम्मी ऐसी परिस्थिति में डिप्रैशन में रहने लगीं.

मु झे लगा ऐसी परिस्थिति में मैं यहां से चली जाऊं तो ज्यादा ठीक है. राजीव तो बुला ही रहे थे.

मैं ने मम्मी से कहा, ‘मम्मी, आप मेरी प्रेरणास्रोत हो. आप सम झदार हो. मैं भी पढ़ीलिखी हूं. मैं अपनेआप को संभाल लूंगी. आप मेरी चिंता मत करो. मैं जा रही हूं. आप अपनेआप को संभालो.’

मम्मी धीरेधीरे अपनेआप को संभालने लगीं. पर मैं ने कोई भी शिकायत राजीव की मम्मी से नहीं की.

मेरी तकलीफें दिनप्रतिदिन बढ़ती रहीं. राजीव का ट्रांसफर अलगअलग जगहों पर होता रहा. मु झे कई बोल्ड स्टैप उठाने पड़े. मैं जहां जाती थी, मु झे नौकरी आराम से मिल जाती थी. सो, नौकरी को ही अपना मनोरंजन सम झ कर मैं बराबर काम करती रही.

राजीव तो वैसे ही रहे, ‘अभी तक  झाड़ ू नहीं लगी. आज सिर क्यों नहीं धोया? आज तो चौथ का व्रत है. तुम्हारे संस्कार ठीक नहीं. तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया, सुबह उठते ही पहले नहाना चाहिए, फिर रसोई में जाना चाहिए…’

अब मैं स्वयं 40 साल की हो गई थी. वे मेरी मम्मी के बारे में ही बोलते रहते हैं कि उन्होंने मु झे कुछ नहीं सिखाया. अब  तो मेरी बहू आने के दिन आ रहे हैं. पर क्या करूं…

मु झे 6:30 बजे सुबह स्कूल के लिए रवाना होना होता है. मैं नहाधो कर खाना बनाती तो पसीने से तरबतर हो जाती. ऐसी स्थिति में स्कूल जाना मुश्किल हो जाता. मगर यह बात उन के दिमाग में नहीं आती. घर में चाय के लिए दूध भले ही न हो, बच्चे के लिए दूध न हो पर एक लिटर दूध सोमवार को शिवमंदिर में चढ़ाने का ढकोसला जरूर करना है.

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पहले तो राजीव मु झे और बच्चों को भी साथ ले कर मंदिर जाते थे. वहां करीब एक घंटा लगता. हम बुरी तरह थक जाते. फिर बहुत कह कर मना किया.

मैं ने कहा, ‘आप को जो करना है करो, मैं मंदिर नहीं जाऊंगी.’

फिर ससुरजी ने कहा कि उस को नहीं जाना तो छोड़ दे. फिर इस से तो मु झे मुक्ति ही मिली.

राजीव तो अब भी, जब मेरे बच्चे बड़ेबड़े हो गए, यही कहते हैं, ‘‘मेरा दिया खाती हो, शर्म नहीं आती? निकल जा मेरे घर से.’’

अब निकल कर कहां जाऊंगी. मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं. उन को बीच म झधार में छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूं.  बच्चों को तो मम्मी की आवश्यकता है न, मेरे भी अपने कर्तव्य हैं न.

मैं एक बच्चे का खर्चा स्वयं वहन करती हूं. इस के बाद भी मेरी इंसल्ट करता रहता है.

मैं समाज से नहीं डरती. उसे जो कहना है कहे. मु झे अपने बच्चों की चिंता है. कोर्टकेस, तलाक… इन सब के बीच में जो होशियार और होनहार बच्चे हैं उन का भविष्य मैं खराब नहीं करना चाहती. यही सोच कर मैं साथ रह रही हूं. जैसे ही मेरे बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे, तो सोचती हूं मैं अलग हो जाऊंगी. उस समय भी मेरे लिए संभव होगा, यह मैं वक्त पर छोड़ती हूं…

बहुत से लोग कहते हैं कि आजकल ऐसा नहीं होता. पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर लड़कियों के साथ ऐसा नहीं होता. अब मैं उन्हें क्या कहूं?

आज भी समाज में ऐसी बहुत लड़कियां हैं जो खून के आंसू रोती हैं पर दुनिया में अपने को प्रसन्न दिखाती हैं. उसी में से मैं भी एक हूं. जब तक पितृसत्तात्मक समाज रहेगा, लड़कियों के साथ ऐसा होता रहेगा.

‘नमस्ते बिहार’ फेम राजन कुमार ने भोजपुरी फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ उठाया बड़ा कदम, पढ़ें खबर

भोजपुरी फिल्मों के साथ ही भोजपुरी गीत संगीत में बढ़ती अश्लीलता व फूहड़ता ने अब कई बिहार पुत्रों के इसके खिलाफ जंग छेड़ने के लिए उद्वेलित कर दिया है.इसी के चलते बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी सफलतम फिल्म ‘‘नमस्ते बिहार‘‘फेम और चार्ली चैप्लिन द्वितीय के रूप में मशहूर अभिनेता तथा  बिहार पुत्र हीरो राजन कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर,बिहार प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिख कर भोजपुरी सिनेमा व भोजपुरी गीत संगीत में जिस तरह से लोकगीतों के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है,उसे रोकने के लिए दिल्ली,मुंबई,कलकत्ता ,चेनई, हैदराबाद की तरह बिहार राज्य के पटना शहर में ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रसारण बोर्ड’ का दफ्तर खोलने की मांग की  है. जिससे भोजपुरी व मैथिली भाषा के जानकार लोग अश्लीलता रोकने में मददगार साबित हो सकें.

पिछले कुछ वर्षों में बिहार में लोक गीत संगीत और भोजपुरी गाने के नाम पर धड़ल्ले से अश्लीलता परोसी जा रही है. आज अश्लीलता, द्विअर्थी गीतों और भड़काऊ अलबम का बहुत बड़ा भयावह बाजार बन गया है. भोजपुरी गीत के नाम पर बहन, चाची, लईकी, भउजी, साली जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए रिश्तों को भी बदनाम किया जा रहा है.पिछले दिनों कई  भोजपुरी कलाकारों द्वारा परोसी गई अश्लीलता पर सोशल मीडिया पर काफी हंगामा भी हुआ, बात मीडिया में भी आई मगर इस समस्या पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया,जिससे लोग ऐसे भद्दे गाने बनाने या इसे रिलीज करने से पहले सोचें.

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यूं तो हाल ही में सांसद रवि किशन शुक्ला ने भी भोजपुरी फिल्मों और गानों के जरिए समाज में फैलाई जा रही अश्लीलता पर रोक लगाए जाने के लिए सख्त कानून बनाने की मांग की थी. लेकिन उनकी इस मांग पर कुछ लोगों ने तंज कसते हुए कहा कि,‘क्या रवि किशन ने जिन भोजपुरी फिल्मों में अभिनय किया, वह साफ सुथरी फिल्मों की श्रेणी में आती हैं?’’ खैर, अब बिहार पुत्र, ‘बिहार फिल्म एंड टीवी आर्टिस्ट एयसोसएिशन’ के संस्थापक अध्यक्ष और फिल्म ‘‘नमस्ते बिहार‘‘ के  हीरो राजन कुमार ने बिहार में सेंसर बोर्ड स्थापित करने की मांग की है.

हीरो राजन कुमार ने बिहार फिल्म एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष की हैसियत से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर,बिहार राज्य के मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार को पत्र लिखकर  उनका ध्यान समाज की इस गंदगी की तरफ देने की गुहार लगाई है. उन्होंने इस पत्र में लिखा है कि बिहार में भोजपूरी गानों और फुहड़ फिल्मो के द्वारा अश्लीलता का बाजार गरम है,जो समाज और हमारी सांस्कृतिक विरासत को एक बड़ा खतरा है. उन्होने अपने इस पत्र में अश्लील गीत संगीत और फूहड़ता फैलाने वाली फिल्मों पर अंकुश लगाने के लिए बिहार के पटना शहर में सेंसर बोर्ड की स्थापना की अपील की है.

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राजन कुमार ने अपने पत्र में लिखा है कि बिहार अपनी कला संस्कृति, गीत संगीत और लोकगीत की महत्ता और खूबसूरती की वजह से सारी दुनिया मे मशहूर है. बिहार के पारम्परिक लोकगीतों को सुनते ही दिल दिमाग को बहुत सुखद अनुभव होता है परन्तु, दुःख की बात यह है कि आज लोकगीत के नाम पर अश्लील गीत संगीत तैयार किए जा है जिन पर लड़कियों से उत्तेजक डांस करवाए जा रहे हैं. जिसका दुष्परिणाम ये हो रहा है कि आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है और हमारा युवा भटकता जा रहा है. अब तो, शादी-व्याह, तिलक, जन्मदिन और छोटे-छोटे उत्सवों पर भी अश्लील गीत संगीत बजाकर और इस तरह के कार्यक्रम कर इनको फलीभूत किया जा रहा है.निजी सवारी, सामान ढोने वाले वाहन, चैक-चैराहा, ऑटो-टेम्पो, बस और ट्रैक्टर में धड़ल्ले से ऐसे द्विअर्थी गाने बज रहे है.जिन्हें सुनकर कुछ मनचले युवक रास्ते पर, सफर में अकेले चल रही बहु-बेटियो पर छींटाकशी करते हैं. इसलिए बिहार कला संस्कृति के सम्मान हेतु इस पर जल्द से जल्द अंकुश लगाने की जरुरत है.

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राजन कुमार ने सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर व  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निवेदन के साथ कुछ बेहद महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए हैं.उनकी अपील है कि बिहार में केद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की स्थापना हो, जो म्यूजिक वीडियो और फिल्म को सेंसर करके पारित करे. कला संस्कृति विभाग के अधिकारिक वेबसाइट पर सभी कलाकारों,फिल्मकारों,गीतकारों,  संगीतकारों और फिल्म निर्देशकों का  सरकारी पहचान पत्र के साथ ऑनलाइन पंजीकरण हो. बिहार में एक राज्य और प्रमंडलवार गीत,संगीत और फिल्म परामर्शी समिति का गठन हो, जो भोजपुरी व मैथिली सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं पर आधारित गीत संगीत को देखकर कर अनुमति दे. सभी रिकॉर्डिंग स्टूडियोको गीत-संगीत रिकॉर्डिंग मार्गदर्शिका प्रदान किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि इसका अनुपालन कड़ाई से हो. जिससे कोई भी कलाकार अश्लील गीत@संगीत और फूहड़ फिल्म बनाने की कल्पना भी न करे.

बादशाह के नए गाने पर अक्षरा सिंह हुईं ‘पानी-पानी’, देखें Viral Video

भोजपुरी इंडस्ट्री की मशहूर एक्ट्रेस अक्षरा सिंह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह आए दिन फैंस के साथ फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती हैं. फैंस को भी उनके पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहता है.

अब हाल ही में अक्षरा सिंह के लेटेस्ट वीडियो ने फैंस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है. जी हां, अक्षरा सिंह बॉलीवुड के मशहूर रैपर बादशाह के लेटेस्ट गाने ‘पानी-पानी’  पर डांस करती हुई नजर आ रही है.

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यह वीडियो फैंस के बीच जमकर वायरल हो रहा है. इस वीडियो में अक्षरा लाल साड़ी में ठुमका लगा रही हैं. अक्षरा सिंह के इस गाने को देखने के बाद फैंस जमकर तारीफ कर रहे हैं.

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आपको बता दें कि बादशाह के इस गाने में बॉलीवुड एक्ट्रेस जैकलीन फर्नांडिस नजर आई थीं.

 

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Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin: पाखी की मां सई की करेगी बेइज्जती, अब क्या करेगा विराट

स्टार प्लस का  सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. शो के बिते एपिसोड में दिखाया गया कि पाखी अपने मां-पाप की वेडिंग एनिवर्सरी पार्टी में सई को छोड़कर घर के पूरे परिवार को इनवाइट करती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए जानते हैं शो के लेटेस्ट ट्रैक के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि विराट, पाखी कहता है कि अगर सई नहीं गई तो वो भी उस पार्टी में नहीं जा पाएगा. जिसके बाद पाखी सई को पार्टी में आने के लिए कहती है. सई पार्टी में जाने के लिए तैयार होती है. इस दौरान विराट सई की जमकर तारीफ करता है.

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शो में यह भी दिखाया जा रहा है कि  विराट सई को बताएगा कि वह पार्टी के बाद अपने मिशन पर निकल जाएगा. ये बात सुनकर सई परेशान हो जाती है. सई और विराट पाखी के घर जाते हैं.

 

शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे पाखी की मां कहेगी कि सई एक मिडिल क्लास फैमिली से है. सई ने एक अमीर आदमी से शादी करके अपने सपने पूरे किए हैं.

तो दूसरी तरफ सई पाखी की मां को साड़ी तोहफे में देगी. पाखी की मां ये तोहफा लेने से मना कर देगी. पाखी की मां कहेगी कि वो सस्ती साड़ियां नहीं पहनती. ये बात सुनकर विराट और सई को बहुत बुरा लगेगा.

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तो  वहीं  विराट सई की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं करेगा. वह पाखी को सबके सामने खरीखोटी सुनाएगा. शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि पाखी का अगला प्लान क्या होगा?

‘अनुपमा’ असल जिंदगी में है Sarabhai Vs Sarabhai की नटखट मोनिशा, देखें Video

छोटे पर्दे का फेमस सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) फेम रुपाली गांगुली इन दिनों अक्सर सुर्खियों में छायी रहती है. शो में वह अपने किरदार से दर्शकों का दिल जीत रही हैं. रुपाली गांगुली को अनुपमा के किरदार में दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं. इस किरदार के कारण वह घर-घर में मशहूर हैं.

कुछ फैंस का मनना है कि रुपाली गांगुली अपने किरदार ‘अनुपमा’  की तरह ही रियल में भी होंगी लेकिन एक्ट्रेस ने वीडियो शेयर कर बताया कि रियल लाइफ में वह कैसी हैं.

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जी हां, हाल ही में ‘अनुपमा’ यानी रुपाली गांगुली ने एक वीडियो शेयर किया है जिसे देखकर आप हैरान हो जाएंगे. रुपाली ने बताया है कि वो रियल लाइफ में बिलकुल अलग हैं. रुपाली गांगुली ने अपने पुराने शो ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ (Sarabhai Vs Sarabhai) का एक वीडियो पोस्ट किया है, जिसमें उन्हें कई अवतार में देखा जा सकता है.

 

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इस वीडियो को शेयर करते हुए बताया है कि वह रियल लाइफ में ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ की मोनिशा की तरह हैं. आपको बता दें कि इस शो में रुपाली ने मोनिशा का किरदार निभाया था. इस शो में रुपाली यानी मोनिशा एक चुलबुली और बेबाक लड़की नजर आती थी. रुपाली गांगुली ने आगे बताया कि मोनिशा करैक्टर को देखने के बाद उनके पापा पूछते थे, घर में कैमरा तो नहीं लगा है!

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‘अनुपमा’ के बीते एपिसोड में दिखाया गया कि वनराज को ज्यादा उम्र होने की वजह से नौकरी नहीं मिलती है. तो वहीं वनराज निराश नहीं होता और वह कहता है कि वह एक 46 वर्षीय महिला को जानता है जो इस उम्र में एक नए करियर की प्लानिंग कर रही है, ऑनलाइन डांस क्लासेज चला रही है और एक नई डांस अकादमी शुरू करने जा रही है.

देश में पढ़े लिखे बेरोजगारों की है भरमार!

देशभर में मोदी सरकार की नीतियों की वजह से पढ़ेलिखे बेरोजगारों की गिनती हर साल बढ़ती जा रही है. कोराना के चक्कर में लाखों छोटे व्यापार व कारखाने बंद हुए हैं और उन की जगह विशाल कारखानों ने ले ली या बाहरी देशों के सामान ने ले ली है. इन में काम कर रहे औसत समझ के पढ़ेलिखे युवा अब बेकार हो गए हैं. ये ऐसे हैं जो अब खेतों में जा कर काम भी नहीं कर सकते.

खेतों में भी अब काम कम रह गया है. इन युवा बेरोजगारों को लूटने के लिए सैकड़ों वैबसाइटें बन गई हैं और धड़ाधड़ ह्वाट्सएप मैसेज भेजे जाते हैं कि साइट पर आओ, औनलाइन फार्म भरो. बहुत बार तो औनलाइन फार्म भरतेभरते बैंक अकाउंट का नंबर व पिन भी ले लिया जाता है, जो बचेखुचे पैसे होते हैं, वे हड़प लिए जाते हैं.

कुछ मामलों में युवाओं को सिक्योरिटी के नाम पर थोड़ा सा पैसा किसी अकाउंट में भेजने को कहा जाता है. इन को चलाने वाले शातिर कुछ दिन अपना सिम बंद रखते हैं और फिर दूसरे फोन में लगा कर इस्तेमाल करने लगते हैं. पुलिस के पास शिकायत करने वालों की सुनने की फुरसत नहीं होती.

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आज 20 से 25 साल का हर चौथा युवा यदि पढ़ नहीं रहा तो बेरोजगार है. जो काम कर भी रहे हैं वे आधाअधूराकाम कर रहे हैं. उन की योग्यता का लाभ उठाया नहीं जा रहा. मांबाप पर बोझ बने ये युवा आज की पढ़ाई का कमाल है कि अपने को फिर भी शहंशाह से कम नहीं समझते और स्मार्ट फोन लिए टिकटौक जैसे वीडियो बना कर सफल समझ रहे हैं.

यह समस्या बहुत खतरनाक हो सकती है. आज से पहले युवाओं को कहीं न कहीं कुछ काम मिल जाता था. किसी को सेना में, किसी को ट्रक में क्लीनर का, किसी को खेत पर. पढ़ने के बाद इन सब नौकरियों को अछूत माना जाने लगा है. यह और परेशानी की बात है. घर वालों से लड़झगड़ कर झटके पैसों को खर्च कर के आज काम चल रहा है पर कल जब मांबाप खुद रिटायर होने लगेंगे तब क्या होगा पता नहीं. आज जब बच्चे होते हैं तो पिता की आयु वैसे ही 25-30 की होती है और जब तक बच्चा बड़ा होता है, पिता 50 के आसपास हो जाता है और वह जो भी काम कर रहा होता है उस में आधाअधूरा रह जाता है. वह अपना और बच्चों का बोझ नहीं संभाल सकता.

बहुत मामलों में तो दकियानूसी मांबाप बेरोजगार बेटेबेटी की शादी भी कर देते हैं. कहीं से भी पैसों का जुगाड़ कर मोटा पैसा शादी में खर्च कर दिया जाता है और यदि कोई काम नहीं मिले तो रातदिन रोना ही रोना रहता है. मोदी सरकार ने 2-4 साल इस फौज को भगवा दुपट्टे पहना कर वसूली का अच्छा काम दिया था पर वह भी अब फीका पड़ने लगा है.

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मंदिरों के बंद होने से तो एक बड़े अधपढ़े युवाओं के हिस्से में बेकारी छा गई है. औनलाइन व्यापार ने थोड़ी सी नौकरियां दी हैं पर उस में इतना कंपीटिशन है कि हर रोज आमदनी कम हो रही है और जोखिम बढ़ रहा है. दिक्कत यह है कि देश में ऐसे कारखाने न के बराबर लग रहे हैं जिन में बेरोजगारों की खपत हो. जो भी काम हो रहा है वह विदेशी मशीनों से हो रहा है जहां बेरोजगारी की परेशानी कम है. भारत सरकार जल्दी ही कुंभ जैसे और प्रोग्राम करवाए जहां लोगों को नंगे रह कर जीना सिखाया जाए क्योंकि अब बड़ी गिनती में पढ़ेलिखे नौजवानों और लड़कियों के लिए जानवरों की तरह ही रहना सीखना होगा.

भूपेश बघेल के ढाई साल बनाम बीस साल!

बहुत समय से लोगों को इस पल का इंतजार था क्यों और कैसे हम आगे बताएंगे. मगर यहां यह बताना जरूरी है कि भूपेश बघेल के ढाई साल की सरकार ने जो जमीनी कार्य किए हैं वह अपने आप में मील के पत्थर सिद्ध हुए  हैं, सबसे महत्वपूर्ण कार्य है गरवा नरवा और बाड़ी का, जिसकी प्रशंसा सिर्फ कांग्रेस और हाईकमान ने ही नहीं बल्कि कांग्रेस के घोर विरोधी संघ अर्थात भारतीय जनता पार्टी की पितृ संस्था ने भूपेश बघेल से मुलाकात कर  की है.

भूपेश बघेल का मुख्यमंत्रित्व  काल इसलिए भी  रेखांकित करने योग्य है क्योंकि अल्प समय में ही उन्होंने जो विकास के कार्य किए हैं वे महत्वपूर्ण हैं यही नहीं उन्होंने आम लोगों से भिन्न लगातार आम जन से मुलाकात का सिलसिला बनाए रखा. भूपेश बघेल कोरोना कोविड 19 के समय काल में भी छत्तीसगढ़ की जनता से वर्चुअल ही सही लेकिन लगातार मुलाकात करते रहे और लोगों के दुख दर्द को समझ कर के दूर करने का निरंतर प्रयास किया. आमतौर पर जब कोई सत्ता के सिंहासन पर बैठ जाता है तो उसमें एक मद दिखाई देता है मगर छत्तीसगढ़ इस संदर्भ में आज सौभाग्यशाली है कि भूपेश बघेल आज भी अपने आप को एक सामान्य साधारण सादगीपूर्ण गांधी वादी जीवन शैली अपनाते हुए लोगों के साथ सीधे जुड़े हुए दिखाई देते हैं.

रही बात ढाई साल के कार्यकाल पर उठे सवाल की तो यह अपने आप में आज एक जवाब है …. आगे इस पर हम विस्तार से चर्चा कर रहे हैं.

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किसानों, गरीब आदमी,जन हितैषी सरकार

भूपेश बघेल सरकार ने इन ढाई वर्ष  में लगातार केंद्र की उपेक्षा सही है अगर  यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा. हर पल  हर रास्ते पर केंद्र ने रोड़ा अटकाने का ही प्रयास किया. यह भूपेश बघेल सरकार के लिए एक ऐसा अंधेरा पक्ष है जिसे छत्तीसगढ़ के लोग ने देखा है. किसानों के बोनस का  मामला हो या धान खरीदी का हो केंद्र सरकार को  जैसे जिम्मेदार तरीके से एक संघीय ढांचे के तहत राज्य सरकार को मुक्त हस्त मदद करनी चाहिए थी वह मदद भूपेश बघेल को नहीं मिली. इसके लिए बावजूद किसानों के लिए जो कल्याणकारी कार्य भूपेश बघेल सरकार ने किए हैं वह अपने आप में ऐतिहासिक कहे जा सकते हैं. 25 00 रूपए में प्रति कुंतल धान खरीदी ऐसा काम है जो देश में और कहीं नहीं हुआ, इस तरह भूपेश बघेल ने जहां किसानों को अपने पैरों पर खड़े करने के लिए काम किया है.

दरअसल, आज तक देश में कहीं भी ऐसा साहसिक कार्य नहीं हुआ है.इसके साथ ही सरकार में आते ही किसानों का सारा कर्ज माफ कर देना भी भूपेश बघेल सरकार का महत्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है. जबकि मध्य प्रदेश में ही कमलनाथ की कांग्रेस की सरकार ने बहुत कम राशि ही माफ की. जबकि भूपेश भगत सरकार ने सारी की सारी किसानों को दिये गए ऋण की राशि को माफ कर दिया. किसानों के लिए हृदय से जो काम छत्तीसगढ़ में हुआ है, वह देश के लिए एक नजीर है. यही नहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हों या फिर शिक्षक हों, इस  सरकार ने अल्प समय में ही ठोस काम करके दिखाया है कि सरकार को किस तरीके से जनहितकारी होना चाहिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हाल ही में कोरोना वायरस के कारण ड्यूटी पर काल कवलित हुए शिक्षकों के एक परिजन को शासकीय नौकरी की पहल.

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भूपेश बघेल की कुर्सी पर संकट!

अगर यह कहा जाए भूपेश बघेल सरकार  के ढाई साल बनाम 20 वर्ष तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. क्योंकि इतने अल्प समय में ही छत्तीसगढ़ के जमीन से जुड़े हुए जो काम भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री के रूप में किए हैं वह कभी भुलाया नहीं जा सकते और जिनकी जमीनी स्तर पर बहुत आवश्यकता थी.  डॉ रमन सिंह की 15 वर्ष की सरकार से तुलना करें तो साफ है पहले सिर्फ हवा हवाई बन कर रह गई  थी सरकारें.  जैसे  एक सरकार को आम गरीब लोगों का हितेषी होना चाहिए यह भावना भूपेश बघेल की सरकार में दिखाई दी है चाहे वह राजस्व के साधारण से मामले हों, डॉ रमन सरकार ने 5 डिसमिल तक की भूमि के रजिस्ट्री पर  प्रतिबंध लगा दिया था.मगर भूपेश बघेल सरकार ने शपथ के साथ ही यह प्रतिबंध उठा लिया. ग्राम पंचायतों पर टैक्स लादा जाने वाला था. इसी तरह छोटी-छोटी और महत्वपूर्ण चीजों को भूपेश बघेल सरकार ने लागू किया और लोगों को बड़ी राहत दी.

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सरकार की लोकप्रियता के साथ ही यह अफवाह भी बाजार गर्म कर रही थी कि भूपेश बघेल तो सिर्फ ढाई साल के मुख्यमंत्री हैं! क्योंकि इसके बाद ढाई साल का कार्यकाल की एस सिंह देव संभालेंगे, मगर ढाई साल होते होते इस अफवाह के गुब्बारे से भी हवा निकल गई और लोगों ने देखा कि ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है.

MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इस बारे में मधेपुरा पुलिस ने कहा कि मुरलीगंज थाने में दर्ज केस संख्या 9/89 में इसी साल 22 मार्च को मधेपुरा कोर्ट ने पप्पू यादव के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया था. उन के खिलाफ इश्तहार और कुर्की का वारंट भी निकला था.

वहां पप्पू यादव को गिरफ्तार करने के बाद उन्हें स्थानीय अदालत में 12 मई की शाम को पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

दरअसल, पूर्व सांसद पप्पू यादव बिहार की जन अधिकार पार्टी के संरक्षक हैं. बिहार में उन की छवि एक दबंग बाहुबली के तौर पर रही है. लेकिन बिहार से ले कर दिल्ली की तिहाड़ में काटी गई सजा के 17 सालों ने उन्हें बाहुबली से एक रौबिनहुड के रूप में बदल दिया है. पप्पू यादव की जिंदगी का सफरनामा किसी रोमांचक फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. इस के लिए हमें उन के अतीत में जाना होगा.

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लालू यादव ने दी शह

नब्बे के दशक में जिन दिनों लालू यादव राजनीति की दुनिया में अपना पैर जमा रहे थे और बिहार विधानसभा में विरोधी दल का नेता बनना चाहते थे. उसी समय उत्तर बिहार में अपराध की दुनिया में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का बोलबाला था. उस दौरान लालू यादव की पप्पू यादव ने काफी मदद की थी.

लालू यादव से अपनी बढ़ती नजदीकी के कारण पप्पू खुद को उन का उत्तराधिकारी तक मानने लगे थे. उन का ऐसा सोचना भी गलत नहीं था, क्योंकि वह लालू यादव के हर काम को सफल बनाने के लिए बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते थे.

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लेकिन जब लालू यादव की तरफ से पप्पू यादव को मनमाफिक फायदा नहीं मिला तो उन्होंने लालू पर खुले मंच से यह आरोप लगाते हुए अपना रास्ता अलग कर लिया कि लालू यादव ने सिर्फ अपने फायदे के लिए उन का इस्तेमाल किया.

जून, 1991 में बाहुबली पप्पू की दबंगई परवान पर थी. उन के ऊपर हत्या के 3 मामले दर्ज हो चुके थे. कोसी इलाके में उन का आतंक फैला था. उन पर अपहरण और हत्या के आरोप लगे. कोसी इलाके में आतंक फैलाने को ले कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून दर्ज हो गया और उन्हें जेल की सींखचों के पीछे भेज दिया गया.

जेल से बाहर आने के बाद वह पूर्णिया की सड़कों पर खुलेआम घूमते थे. लेकिन पुलिस वाले उन्हें हाथ लगाने से डरते थे. एक बार उन्होंने एक डीएसपी को चलती गाड़ी के आगे धकेल दिया था. इतना ही नहीं, उन्होंने बिहार पुलिस के चालक रामप्रवेश पासवान को जीप से नीचे उतार कर उसे बुरी तरह पीटा और उस की मूंछें तक उखाड़ लीं.

जेल में ही हो गया था इश्क

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जब पप्पू यादव बांकीपुर जेल में सजा काट रहे थे. तब जेल अधीक्षक के लौन में कुछ बच्चे टेनिस खेलते थे. उन में से विक्की नाम के एक बच्चे से पप्पू यादव की दोस्ती हो गई. जब पप्पू यादव की विक्की से नजदीकी ज्यादा बढ़ गई तो एक दिन विक्की ने उन्हें अपने घर का एलबम दिखाया, जिस में उस की बहन रंजीत की फोटो थी.

रंजीत को देखते ही पप्पू यादव के दिल में हलचल मच गई. उसी समय उन्होंने उसे अपने दिल में बसा लिया. इतना ही नहीं, वह उस पर मर मिटे और मन में रंजीत से शादी के मंसूबे पालने लगे. बांकीपुर जेल से रिहा होने के बाद भी पप्पू यादव ने वहां जाना नहीं छोड़ा. शुरुआत में रंजीत पप्पू यादव को जरा भी पसंद नहीं करती थी. लेकिन बाद में पप्पू रंजीत के दिल में जगह बनाने में कामयाब हो गए.

लेकिन दोनों की शादी आसान नहीं थी. रंजीत सिख धर्म से थी और पप्पू यादव परिवार से थे. काफी प्रयासों के बाद आखिर फरवरी, 1994 में पप्पू यादव की शादी रंजीत से हो गई.

लालू यादव की तरफ से मोह भंग होने के बाद पप्पू यादव ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत विधायक बनने से की. सन 1990 में उन्होंने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ा और पहली बार में ही चुन लिए गए. इस के अगले ही साल वह दसवीं लोकसभा चुनाव में पूर्णिया से खड़े हुए और सांसद बन गए. इस के बाद उन्होंने 1996 में लोकसभा का चुनाव जीता.

100 से ज्यादा गोलियां मारी थीं सीपीआई नेता अजीत सरकार को 14 जून, 1998 को सीपीआई नेता अजीत सरकार की दिनदहाड़े उस समय हत्या कर दी गई, जब वह एक पंचायत कर के वापस पूर्णिया लौट रहे थे. एके 47 से कुछ शातिर अपराधियों ने कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अजीत सरकार, उन के कार चालक तथा कुछ लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया था.

पोस्टमार्टम में अजीत सरकार के शरीर से 107 गोलियां निकली थीं. इस हत्याकांड का आरोप बाहुबली नेता राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव पर लगा था.

इस सनसनीखेज हत्याकांड में पप्पू यादव के साथ गोरखपुर के बदमाश राजन तिवारी और अनिल यादव भी शामिल थे. इस के बाद भी पप्पू यादव पर हत्या के कई अन्य आरोप लगे थे.

मई, 1999 में पप्पू यादव को अजीत सरकार की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. इस से पहले भी पप्पू यादव के ऊपर हत्या के 3 मामलों में वारंट जारी हो चुके थे, मगर वह अग्रिम जमानत ले कर कानून की जद में आने से बचते रहे.

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मौत के मुंह में पहुंचे लोग, लूटने में शामिल धोखेबाज नेता, व्यापारी और सेवक

सौजन्य- मनोहर कहानियां

पिछले साल कोरोना त्रासदी से सबक लेते हुए दुनिया के अधिकांश देशों ने इस बीमारी से भविष्य में निपटने के पुख्ता इंतजाम कर लिए थे. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबक लेने के बजाए विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी को जिताने की योजनाएं बनाते रहे. इस से लोगों के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर में बरती गई उन की उदासीनता उन की किसी योजना का हिस्सा तो नहीं है…

इस साल कोरोना की दूसरी लहर ने पूरे देश में कहर ढहाया. मरीजों को न दवाएं मिलीं न ही अस्पताल में बैड. चिकित्सा उपकरण भी नसीब नहीं हुए. इलाज नहीं मिलने से मरीज तड़प कर दम तोड़ते रहे. लाशों की कतारें लग गईं. कोरोना काल का यह संकट आजादी के बाद का सब से भयावह था.

21वीं सदी के इस सब से भयावह संकट काल में इस साल मार्चअप्रैल के महीने में जब देश में कोरोना वायरस अपना फन फैला रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा नीत सरकार 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सत्ता हासिल करने की कोशिशों में जुटी थी. मोदीजी का सब से बड़ा सपना पश्चिम बंगाल में भगवा झंडा फहराने का था. इस के लिए प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री अमित शाह और तमाम दूसरे प्रमुख नेता बंगाल में डेरा डाल कर रैलियां और चुनावी सभाएं कर रहे थे.

कोरोना का वायरस फलफूल रहा था. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस महामारी का भयानक रूप नजर नहीं आ रहा था. इस का नतीजा यह हुआ कि जिम्मेदार नौकरशाही भी लापरवाह हो गई. सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. मरीजों की जान बचाने के संसाधन कम पड़ते गए. हालात यह हो गए कि अस्पतालों में मरीजों के लिए बैड ही नहीं मिल रहे थे. आईसीयू बैड, वेंटिलेटर और औक्सीजन तो दूर की बात थी. मरीज अस्पतालों के बाहर और फर्श पर भी दम तोड़ रहे थे.

मोदी सरकार इस भयावह दौर में राजनीति करती रही. प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी चुनावी रैलियां तब रोकीं, जब बंगाल में चौथे चरण के मतदान हो रहे थे. केवल पांचवें चरण के मतदान बाकी थे. इस बीच पूरे देश में हालात बेकाबू हो चुके थे. विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार से चिकित्सा संसाधनों की गुहार लगाते रहे, लेकिन केंद्र सरकार को यह सुनने की फुरसत ही नहीं थी.

देश में इस बीच सांसों के सौदागरों की नई फौज खड़ी हो गई. कोरोना मरीजों के लिए जीवनरक्षक समझे जाने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शनों और औक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी शुरू हो गई. संकट के दौर में धंधेबाजों ने पैसा कमाने के नएनए तरीके खोज निकाले. मरीजों के परिजनों से जालसाजी और धोखाधड़ी होती रही. लोगों ने नकली इंजेक्शन बनाने की फैक्ट्रियां लगा लीं. कोरोना से बचाव के काम आने वाली पीपीई किट, सैनेटाइजर, मास्क और ग्लव्ज भी निम्न गुणवत्ता के आ गए.

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कोरोना मरीजों के लिए औक्सीजन मिलनी मुश्किल हो गई. देशभर में औक्सीजन वितरण का जिम्मा मोदी सरकार ने अपने हाथ में ले लिया. औक्सीजन बांटने में भी राजनीति की गई. भाजपाशासित राज्यों को जरूरत से ज्यादा औक्सीजन आवंटित की जाती रही और कांग्रेस व दूसरे दलों के शासन वाले राज्यों से भेदभाव किया जाता रहा. इस का नतीजा यह हुआ कि औक्सीजन का संकट पैदा होने से मरीजों की जानें जाती रहीं.

वैक्सीन पर चली राजनीति

वैक्सीन को लेकर अभी तक राजनीति चल रही है. 45 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए केंद्र सरकार ने इस साल की शुरुआत में राज्यों को टीका देने की हामी भर ली, लेकिन राज्यों को पर्याप्त टीका ही नहीं मिला. लोगों की जान बचाने के लिए 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को भी टीके लगाने का फैसला केंद्र सरकार ने ले लिया, लेकिन केंद्र सरकार ने इन टीकों के खर्च की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी.

हजारों करोड़ रुपए का बोझ बढ़ने से राज्य सरकारों की आर्थिक हालत पतली होने लगी है. खास बात यह रही कि देश की जनता से टैक्स के रूप में वसूले गए पैसों से वैक्सीनेशन हो रहा है और सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फोटो लगी हुई है.

अफसोस की बात यह भी रही कि मोदीजी ने अपनी दोस्ती निभाने और अपना नाम चमकाने और वाहवाही लूटने के लिए भारत के लोगों के हिस्से की वैक्सीन दूसरे देशों को भेज दी. लेकिन जब देश में त्राहित्राहि होने लगी तो सरकार को दूसरे देशों से मदद लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. अब पूरे देश में टीके का टोटा हो रहा है. लोगों को समय पर टीका नहीं लगने से कोरोना का खतरा कम नहीं हो रहा है.

अभी कोरोना की तीसरी लहर की चेतावनी दी जा रही है. अगर तीसरी लहर आई, तो बच्चों पर इस का सब से ज्यादा असर होने की आशंका जताई जा रही है. इस बीच, मई के पहले सप्ताह से उत्तर प्रदेश में गंगा और यमुना सहित दूसरी नदियों के तटों पर सैकड़ों की संख्या में लाशें मिलने लगीं. इन लाशों को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोरोना से दम तोड़ने वालों की लाशें जमीन में दफन कर दी गई या नदियों में बहा दी गई.

पिछले साल कोरोना से पहली बार भारत सहित पूरी दुनिया के लोगों का परिचय हुआ. कोरोना की इस पहली लहर को उस समय लौकडाउन कर के कुछ हद तक काबू कर लिया गया. हालांकि इस से देश की जनता के आर्थिक हालात बिगड़ गए.

ये हालात ठीक होते, इस से पहले ही कोरोना की दूसरी लहर आ गई. इस बीच, एक साल के दौरान मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया. चिकित्सा संसाधन नहीं बढ़ाए गए. इस बार मोदी सरकार लापरवाह बनी रही. इस का नतीजा सब के सामने है.

इस से ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि केंद्र सरकार का मंत्री सोशल मीडिया पर अपने रिश्तेदार के लिए किसी अस्पताल में बैड दिलाने की गुहार करता रहा. मंत्रियों और सांसदों के कहने पर भी अस्पतालों में मरीजों को बैड नहीं मिले. मोदी सरकार कोरोना पर काबू पाने के लिए अब कुएं खोदने की तैयारी कर रही है, लेकिन अब क्या फायदा, चिडि़या तो खेत चुग चुकी. क्योंकि देश में हजारोंलाखों लोग अपने परिजनों को खो चुके.

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कोरोना संकट के बीच, मई के महीने में ब्लैक फंगस के मामले एकाएक बढ़ गए. इस ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी थी. महामारी के दौर में सामने आई केंद्र सरकार की लापरवाही को ले कर पूरी दुनिया में भारत की किरकिरी होने लगी थी. और तो और मोदी के कट्टर समर्थक भी विरोध में उतर आए थे.

लुटेरे हो गए सक्रिय

खतरा अभी टला नहीं था. लुटेरों के रूप में सामने आए सांसों के सौदागरों ने ऐसी लूटखसोट शुरू कर दी, जिन से लोग भी परेशान हो गए. दिल्ली से जयपुर तक और लखनऊ से अहमदाबाद तक, सभी जगह इन सौदागरों ने कोरोना मरीजों से ठगी के नएनए हथकंडे अपनाए थे.

दिल्ली में कोरोना के नाम पर सब से ज्यादा ठगी की वारदातें हुईं. देश का आम आदमी सोचता है कि दिल्ली में बड़ेबड़े और नामी अस्पताल हैं. इन में अच्छा इलाज होता होगा, लेकिन कोरोना काल में हालात बिलकुल उलट रहे. सरकारी अस्पतालों में तो सामान्य मरीजों को छोडि़ए, मंत्रियों और अफसरों को भी कोरोना मरीजों के लिए बैड नहीं मिले, अस्पतालों में सुविधाओं की बातें तो दूर रहीं.

अस्पताल वालों के अलावा ठगों और जालसाजों ने कोरोना से जूझ रहे मरीजों के परिवार वालों से पैसे ठगने के नए से नए तरीके निकाल लिए थे. मरीजों के लिए जरूरी उपकरणों की कालाबाजारी करने वालों ने लोगों को जम कर लूटा.

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने अप्रैल के आखिरी सप्ताह में नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने वाली एक फैक्ट्री पकड़ी. यह फैक्ट्री उत्तराखंड के कोटद्वार में चल रही थी. इसे सील कर दिया गया. इस मामले में एक महिला सहित 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन से बड़ी संख्या में नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन की भरी और खाली शीशियां, पैकिंग मशीन, पैकिंग मटीरियल, स्कौर्पियो गाड़ी सहित दूसरे वाहन जब्त किए गए.

इस फैक्ट्री का पता भी मुश्किल से चला. कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप के बीच अप्रैल में जब जीवन रक्षक दवा के तौर पर रेमडेसिविर इंजेक्शन की मांग पूरे देश में तेजी से बढ़ी, तो इस की कालाबाजारी की सूचनाएं पुलिस को मिलने लगी थीं.

क्राइम ब्रांच की टीम ने महरौली बदरपुर रोड पर स्थित संगम विहार से 23 अप्रैल को 2 लोगों मोहम्मद शोएब खान और मोहन कुमार झा को पकड़ा. इन के पास कुछ इंजेक्शन मिले. इन से पता चला कि बड़े शहरों में ये इंजेक्शन 40 से 50 हजार रुपए तक में बेचे जा रहे हैं.

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दिल्ली पुलिस ने की गिरफ्तारियां

इन से पूछताछ के आधार पर 25 अप्रैल को यमुना विहार से मनीष गोयल और पुष्कर चंदरकांत को पकड़ा गया. इन से पता चलने पर एक इवेंट मैनेजर साधना शर्मा को गिरफ्तार किया. इन तीनों से भी बड़ी संख्या में ये इंजेक्शन बरामद हुए. फिर 27 अप्रैल को हरिद्वार से वतन कुमार सैनी को पकड़ा. वतन बीफार्मा और एमबीए डिग्रीधारी है. उस के घर से पैकिंग मशीन, खाली शीशियां, पैकिंग मटीरियल आदि सामान मिला. वतन कुमार से पूछताछ के बाद रुड़की से आदित्य गौतम को गिरफ्तार किया गया.

कौमर्स ग्रैजुएट आदित्य गौतम फार्मेसी से जुड़ा काम करता है. उस ने हजारों की संख्या में बायोटिक इंजेक्शन की शीशियां खरीदीं. इन इंजेक्शनों की शीशियों पर कोटद्वार की फैक्ट्री में रेमडेसिविर के लेबल लगवाए.

पुलिस ने उस की निशानदेही पर एक मशीन, लेबल तैयार करने के काम लिया कंप्यूटर और नकली इंजेक्शन की शीशियां बरामद कीं. इन लोगों ने बाकायदा अपना नेटवर्क बना रखा था, जिस के जरिए ये जरूरतमंदों से मोटी रकम ले कर उन्हें नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन देते थे.

इसी तरह दिल्ली पुलिस ने औक्सीजन कंसंट्रेटर की कालाबाजारी का बड़ा मामला पकड़ा. दक्षिणी जिला पुलिस ने मई के पहले सप्ताह में लोधी कालोनी के सेंट्रल मार्केट में एक रेस्तरां बार ‘नेगे एंड जू बार’ में छापा मार कर 32 औक्सीजन कंसंट्रेटर के बौक्स बरामद किए. एक बौक्स में थर्मल स्कैनर और एन-95 मास्क मिले. पुलिस ने वहां से 4 लोगों रेस्तरां के मैनेजर हितेश के अलावा सतीश सेठी, विक्रांत और गौरव खन्ना को पकड़ा.

मगरमच्छों तक पहुंची पुलिस

इन से पूछताछ के आधार पर छतरपुर के मांडी गांव स्थित खुल्लर फार्महाउस में एक गोदाम पर छापा मारा. यहां से 398 औक्सीजन कंसंट्रेटर बरामद हुए. पूरे देश में कोरोना मारामारी के बीच पकड़े गए करीब 4 करोड़ रुपए कीमत के ये औक्सीजन कंसंट्रेटर कालाबाजारी से बेचे जा रहे थे.

पूछताछ में पता चला कि इस रेस्टोरेंट का मालिक नवनीत कालरा है. कालरा दिल्ली का प्रसिद्ध व्यवसाई है. पेज थ्री सोसायटी से जुड़े रहने वाले दलाल के कई फिल्मी सितारों और क्रिकेटरों से अच्छे संबंध हैं. वह होटल खान चाचा, नेगे एंड जू बार, टाउनहाल रेस्ट्रो बार, मिस्टर चाऊ के अलावा दयाल आप्टिकल्स से जुड़ा हुआ है.

वह इन रेस्टोरेंट की आड़ में औक्सीजन कंसंट्रेटर की कालाबाजारी कर रहा था. गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने कालरा के खान मार्केट के मशहूर रेस्टोरेंट ‘खान चाचा’ से 96 कंसंट्रेटर और बरामद किए. पता चला कि कालरा ने ये कंसंट्रेटर लंदन में रहने वाले अपने दोस्त गगन दुग्गल की कंपनी मैट्रिक्स सेल्युलर के संपर्कों की मदद से यूरोप और चीन से मंगवाए थे. गिरफ्तार गौरव खन्ना गगन की कंपनी का सीईओ और चार्टर्ड अकाउंटेंट है.

कोरोना का कहर शुरू होने और मांग बढ़ने पर कालरा ने बड़ी संख्या में कंसंट्रेटर बेच भी दिए थे. पुलिस ने कालरा की तलाश में उस के ठिकानों पर छापे मारे, लेकिन सेंट्रल मार्केट में छापे की सूचना मिलने के बाद ही वह 2 लग्जरी गाडि़यों से परिवार के कुछ लोगों के साथ फरार हो गया.

पुलिस ने उस की तलाश में दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड में भी छापे मारे. कोई सुराग नहीं मिलने पर पुलिस ने कालरा के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिया.

पुलिस को आशंका थी कि कालरा विदेश भाग सकता है. इस बीच, कालरा ने गिरफ्तारी से बचने के लिए दिल्ली की एक अदालत में अग्रिम जमानत की अरजी लगा दी. यह अरजी खारिज हो गई. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कालरा की गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. बाद में कालरा को 17 मई, 2021 को दिल्ली पुलिस ने गुड़गांव से गिरफ्तार कर लिया.

विदेशी महिला भी हुई गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ही देश भर में औक्सीजन सिलेंडर के नाम पर लोगों से धोखाधड़ी करने वाले मेवाती गिरोह के इमरान को राजस्थान के भरतपुर जिले से गिरफ्तार किया

यूं तो दिल्ली पुलिस ने कोरोना काल में लोगों से दवाओं और इंजेक्शन के नाम पर धोखाधड़ी करने और कालाबाजारी के मामलों में सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया है. खास बात यह है कि इस में महामारी के इस दौर में अमानवीय बन कर मुनाफाखोरी करने में विदेशी भी पीछे नहीं रहे.

दिल्ली की शाहबाद डेयरी थाना पुलिस ने कैमरून की रहने वाली एक विदेशी महिला अश्विनगवा अशेलय अजेंबुह को गिरफ्तार किया. वह इंजेक्शन देने के पर दरजनों लोगों से लाखों रुपए की ठगी कर चुकी थी. पुलिस ने उस के दरजन भर बैंक खाते भी सीज करा दिए. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 16 मई, 2021 को 2 विदेशी जालसाज चीका बैनेट और जोनाथन को गिरफ्तार किया. इन में एक नाइजीरिया और दूसरा घाना का रहने वाला है. इन्होंने देश भर में करीब एक हजार लोगों से कोरोना की दवा और औक्सीजन के नाम पर 2 करोड़ रुपए की ठगी की थी. इन से 22 मोबाइल फोन, 165 सिमकार्ड, 5 लैपटौप और बड़ी मात्रा में डेबिट कार्ड बरामद हुए. इन के करीब 20 बैंक खाते भी मिले हैं.

दिल्ली पुलिस के सामने ऐसा ही एक और मामला भी आया, जिस में ठग ने देश भर में साइबर ठगी की यूनिवर्सिटी के नाम पर विख्यात झारखंड के जामताड़ा से ठगी की ट्रेनिंग ली थी.

कोरोना संकट में औक्सीजन सिलेंडर दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह के 4 बदमाशों को पुलिस ने गिरफ्तार किया. इन में यूपी के फर्रुखाबाद का रहने वाला रितिक, गुरुग्राम निवासी योगेश सिंह, मोहम्मद आरजू और रवीश शामिल थे. इन से 4 मोबाइल, 16 सिमकार्ड, एक लैपटौप, 2 बाइक, एक स्कूटर और कुछ दस्तावेज बरामद किए गए.

इस गिरोह ने देश भर के लोगों से औनलाइन ठगी की वारदात की. दिल्ली में संत नगर, करोलबाग निवासी एक शख्स ने इन के खिलाफ करोलबाग में मुकदमा दर्ज कराया था. इस में रवीश ने जामताड़ा से साइबर ठगी की ट्रेनिंग ली थी.

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