नुसरत जहां- निखिल जैन मामला लव, मैरिज और तलाक

टौलीवुड की मशहूर अभिनेत्री और तृणमूल कांग्रेस की सांसद नुसरत जहां को शायद विवादों में रहना पसंद है. बिजनैसमैन निखिल जैन से शादी कर के जिस तरह वह चर्चा में आई थीं, उसी तरह उन के गर्भवती होने के बाद अब इस बात की लोगों में चर्चा है कि जब वह लंबे समय से पति से अलग रह रही थीं तो उन के गर्भ में पल रहा बच्चा किस का है?

वास्तविकता कभीकभी कल्पना की अपेक्षा बहुत ही मजेदार और विचित्र होती है. कभीकभी हमारे सामने कुछऐसे मामले आ जाते हैं, जिन के बारे में सुन कर, पढ़ कर या देख कर हमें ऐसा लगता है कि भला ऐसा कैसे हो सकता है. वे हमारे न कुछ लगते हैं और न हमारा उन से कुछ बनताबिगड़ता है, फिर भी हम उन में बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं.

नुसरत जहां और निखिल जैन के लव, मैरिज और डिवोर्स की बात भी कुछ ऐसी ही है. इस समय यह चर्चा का विषय बनी हुई है.

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नुसरत जहां खूबसूरत हैं, हीरोइन हैं, सांसद हैं, अमीर हैं और पहले से ही चर्चाओं में रही हैं. 8 जनवरी, 1990 को कोलकाता में जन्मी नुसरत जहां की प्रारंभिक शिक्षा अवर लेडी क्वीन औफ द मिशन स्कूल में हुई. इस के बाद भवानीपुर कालेज से उन्होंने कौमर्स में स्नातक किया. 2010 में ‘मिस कोलकाता फेवर वन’ ब्यूटी कौंटैस्ट जीतने के बाद मौडलिंग में अपना कैरियर शुरू किया.

इस के बाद ‘शोत्रू’ उन की पहली बांग्ला फिल्म आई. उस समय उन्होंने औडिशन में 50 लोगों के बीच अपनी जगह बनाई थी. एक साल बाद उन्होंने देव और सुभोश्री के साथ ‘खोका-420’ में काम किया. उसी साल वह अंकुश हजारा के साथ ‘वो खिलाड़ी’ में भी दिखाई दी थीं. फिर उन्होंने ‘ऐक्शन के चिकन तंदूरी’ और ‘के देशी छोरी’ में काम किया. उन की ये दोनों ही फिल्में हिट रही हैं.

नुसरत ने राहुल बोस के साथ ‘सीधे नमार आगे’ में भी काम किया था. 2015 में उन्होंने कौमेडी कार्यक्रम ‘जमाई-420’ में हिस्सा लिया, जिस में उन के साथ अंकुश हजारा, पायल सरकार, मिमी चक्रवर्ती, सोहम चक्रवर्ती और हिरन थे.

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जानीमानी अभिनेत्री हैं नुसरत

नुसरत सेलिब्रिटी लीग थीम सांग का भी हिस्सा रह चुकी हैं. वर्ष 2015 में उन की ‘हरहर व्योमकेश’ फिल्म आई थी, जिस ने बौक्स औफिस पर बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की थी. इस के बाद फिल्म ‘पावर’, कौमेडी फिल्म ‘कीर्ति’, ‘लव एक्सप्रेस’, ‘जुल्फिकार’, ‘हरीपड़ा बंडवाला’, ‘आमी जो तोमार’ और ‘बोलो दुग्गा माई की’ तथा ‘ओएसएस कोलाता’ आदि फिल्मों में काम किया है.

वह बांग्ला की जानीमानी हीरोइन हैं, पर इस समय वह पर्सनल लाइफ, प्रैग्नेंसी और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर को ले कर सुर्खियों में हैं. नुसरत अकसर विवादों की ही वजह से सुर्खियों में आती हैं.

इस बार भी जब उन के प्रैग्नेंट होने की खबर आई तो पता चला कि इस के बारे में उन के पति निखिल जैन को कुछ पता ही नहीं है. दोनों काफी दिनों से अलग रह रहे हैं. 2017 में उन की उम्मीदवारी की घोषणा के बाद उन पर अश्लील टिप्पणी करने के आरोप में बीजेपी के आईटी सेल के एक कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया गया था.

30 सितंबर, 2016 को नुसरत के बौयफ्रैंड कादिर खान को घटना के 4 साल बाद सामूहिक दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार किया गया था. नुसरत उस से शादी करने वाली थीं. उस समय नुसरत पर एक अपराधी को पनाह देने का आरोप लगा था.

हालांकि नुसरत ने इस बात से इनकार किया था. पर कुछ वकीलों ने उन्हें पनाह देने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार करने की मांग की थी. बाद में नुसरत जहां ने भी कहा था कि कादिर खान ने उन्हें मानसिक क्षति पहुंचाई है. उस ने उन का मानसिक बलात्कार किया है.

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तुर्की में की थी शादी

बशीरहाट से सांसद का चुनाव जीतने के बाद नुसरत जहां 17-18 जून, 2019 को सांसदों के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुई थीं. उस समय वह अपने पति निखिल जैन के साथ तुर्की में थीं. 18 नवंबर, 2019 को होने वाले शीतकालीन सत्र में वह पहुंच नहीं पाई थीं.

कहा गया था कि अस्वस्थता की वजह से वह अपोलो अस्पताल में भरती हैं. पर यह भी कहा जाता है कि वह बीमार नहीं थीं, बल्कि किसी और वजह से उन्हें परेशानी हुई थी.

नुसरत अपनी बोल्ड तसवीरों की वजह से भी अकसर चर्चाओं में रहती हैं. इस के अलावा एक बार उन्होंने दुर्गा के रूप में तसवीरें खिंचवाई थीं, जिसे ले कर काफी विवाद हुआ था. उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई थी. नुसरत ने इस की शिकायत भी दर्ज कराई थी.

शादी से लौटने के बाद संसद में चूडि़यां, मंगलसूत्र, सिंदूर और साड़ी पहन कर आने पर उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स का सामना करना पड़ा था. उन के लिपस्टिक के रंग, सनस्क्रीन, एक्सेसरीज और आउटफिट को ले कर काफी चर्चा हुई थी. उसी बीच वैवाहिक संबंधों की वैधता पवित्रता को ले कर काफी हलचल मची थी.

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गैरमजहबी शादी पर उठे थे सवाल

मुफ्ती मुकर्रम अहमद, शाही इमाम, फतेहपुरी मसजिद ने कहा था कि यह शादी नहीं दिखावा है. मुसलमान और जैन दोनों ही इस शादी को नहीं मानेंगे. वह अब न जैन हैं और न मुसलिम. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. जैन से शादी कर के उन्होंने बहुत बड़ा अपराध किया है.

दूसरी ओर नुसरत जहां ने उन सब का मुंह बंद करते हुए कहा था कि ‘मैं एक समादेशी भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं, जो जाति, पंथ और धर्म से परे है. जब वह ऐक्ट्रैस से नेता बनी थीं, तब भी मुसलिम मौलवियों ने उन की काफी आलोचना की थी. अक्तूबर, 2020 में दुर्गा पूजा में जब उन्होंने ‘ढाक’ बजाया था, तब इतहास उलेमाएहिंद के उपाध्यक्ष मुफ्ती असद कासम ने नुसरत जहां को ‘हराम’ बताया था.

नुसरत के पति निखिल जैन मारवाड़ी व्यापारी हैं. वह भी हैंडसम और काफी धनवान हैं. वह नुसरत से तब मिले थे, जब नुसरत जहां ने उन की साड़ी के ब्रांड के लिए मौडलिंग की थी. जल्द ही दोनों में प्यार हो गया था और वे डेटिंग पर जाने लगे थे. उस के बाद उन्होंने सगाई की घोषणा की थी. सगाई के तुरंत बाद उन्होंने शादी की तारीख फिक्स कर दी थी.

4 जुलाई, 2019 को उन्होंने कोलकाता में एक भव्य रिसैप्शन की मेजबानी की थी, जिस में टौलीवुड ऐक्टर्स और बंगाल की राजनीतिक बिरादरी के तमाम लोग शामिल हुए थे.

इन दोनों की प्रेम कहानी का जब खुलासा हुआ तो दोनों के धर्म को ले कर काफी बवाल मचा था. मुसलमान नुसरत जहां ने जैन निखिल के साथ शादी की तो बहुत सारे मुसलमानों ने नाराजगी व्यक्त की थी.

नुसरत पर एशिया के सब से बड़े इसलामिक स्कूल डर-उल-उलूम ने फतवा जारी किया था. उन्होंने नुसरत द्वारा निखिल जैन से शादी करने पर आपत्ति जताई थी. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के देवबंद से भी नुसरत पर फतवा जारी किया गया था. वहां से कहा गया था कि नुसरत को केवल मुसलमान से शादी करनी चाहिए. सांसद बनने के बाद उन्होंने ‘नुसरत जहां रुहू जैन’ के नाम से ईश्वर को साक्षी मानते हुए शपथ ली थी. उस के बाद उन्होंने वंदे मातरम भी कहा था. यह बात देवबंद के उलेमा मुफ्ती असद काजमी को बहुत बुरी लगी थी.

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लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद नुसरत जहां ने मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहन कर सांसद की शपथ ली थी. इस के बाद मुसलिम मौलानाओं ने उन के खिलाफ फतवा जारी किया था. उन से सवाल पूछा गया था कि उन्होंने मुसलिम धर्म का क्यों त्याग किया?

उस समय नुसरत जहां फिल्मी स्टाइल में कह रही थीं कि ‘जिसे जो कहना हो, वो वह कहे, जिसे जो करना हो, वो वह करे. जब प्यार किया है तो डरने की क्या बात है.’

जिस तरह फिल्मों में कहा जाता है कि प्यार करने वाले कभी डरते नहीं, उसी तरह नुसरत के भी कहने का मतलब था कि उस ने भी प्यार किया है तो वह भी किसी से नहीं डरतीं.

निखिल नहीं हैं बच्चे का बाप

लोग कहते थे कि नुसरत और निखिल की बहुत सुंदर जोड़ी है. दोनों का नाम भी ‘न’ से शुरू होता था और दोनों का सरनेम भी एक ही अक्षर ‘ज’ से शुरू होता है. रब ने बना दी जोड़ी. मुसलमान नुसरत जहां दुर्गा पूजा के समय माता के पंडाल में जा कर पूजा करती थीं और सर्वधर्म समभाव, प्रेम, भावनात्मकता और भाईचारे की बात करते नहीं थकती थीं.

लोगों का सोचना था कि नुसरत और निखिल की गाड़ी बढि़या चल रही है. लेकिन अचानक इस लव स्टोरी में फिल्मी ट्विस्ट आ गया.

नुसरत जहां ने बड़े ही खराब तरीके से घोषित किया कि ‘मैं मां बनने वाली हूं.’ दूसरी ओर निखिल ने इस तरह का मैसेज दिया कि ‘मैं इस बच्चे का बाप नहीं हूं.’

इस के बाद नुसरत जहां के अन्य से प्रेम प्रकरण की बातें आने लगीं. फिर तो बात डिवोर्स तक पहुंच गई. अब नुसरत का कहना है कि ‘हमारी शादी ही कहां हुई थी, जो लोग डिवोर्स की बात कर रहे हैं.’

पर मीडिया ने खोज निकाला कि नुसरत जहां ने जब चुनाव लड़ा था, तब उन्होंने जो एफीडेविट दिया था, उस में उन्होंने अपना स्टेटस मैरिड लिखा था. उन्होंने निखिल के साथ तुर्की में की गई अपनी भव्य और खर्चीली मैरिज के फोटो भी डाले थे. अब सवाल यह उठता है कि यह शादी नहीं थी तो क्या था? अभी नुसरत जहां ने सोशल मीडिया से सभी फोटो हटा दिए हैं.

इस सब के बीच नुसरत जहां की कोख में जो बच्चा पल रहा है, उस के बारे में कोई नहीं सोचविचार रहा है. वह मासूम तो पैदा होने के पहले ही विवादों में आ गया. उस का भाग्य, उस की तकदीर, उस की डेस्टिनी तो प्रकृति जाने, पर जो बात सामने आई हैं, वह डीएनए टेस्ट तक जा रही हैं. हमारे यहां कहा जाता है कि हर कोई अपना नसीब ले कर पैदा होता है. शायद नुसरत का बच्चा अपने भाग्य में विवाद ले कर आया है.

निखिल का कहना है कि हम दोनों तो दिसंबर, 2020 से अलग रह रहे हैं. अगस्त में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान मेरी पत्नी का व्यवहार मेरे प्रति बदलने लगा था. हमारे बीच कोई संबंध नहीं है. यह कहना मुश्किल है कि नुसरत सचमुच प्रैग्नेंट हैं या यह बात भी फिल्मी है.

निखिल जैन ने न जाने कितनी बार नुसरत जहां से अपनी शादी का रजिस्ट्रैशन कराने के लिए कहा था, लेकिन नुसरत किसी न किसी बहाने रजिस्ट्रैशन कराने से मना करती रही. 5 नवंबर, 2020 को नुसरत अपने गहनों, रुपयों, कीमती सामान, कागजात और दस्तावेजों के साथ निखिल का फ्लैट छोड़ कर बल्लीगंज स्थित अपने फ्लैट में जा कर रहने लगी थीं. इस के बाद नुसरत और निखिल पतिपत्नी होने के बावजूद साथ नहीं रहते थे.

कोर्ट में की शादी रद्द करने की अपील

8 मार्च, 2021 को निखिल ने स्वीकार किया था कि उन्होंने नुसरत के खिलाफ अपनी शादी को रद्द करने के लिए अलीपुर कोर्ट में ऐक दीवानी मुकदमा दायर किया है.

चूंकि मामला विचाराधीन है, इसलिए निखिल ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहते हैं. पर इतना जरूर कहा कि उन के परिवार ने नुसरत को बहू के रूप में नहीं, एक बेटी के रूप में लिया. उसे एक बेटी के रूप में बहुत कुछ दिया. फिर भी उन सब को यह दिन देखना पड़ा.

नुसरत और निखिल के बीच एक तीसरा व्यक्ति भी है यश दासगुप्ता. नुसरत और निखिल जैसेजैसे दूर होते गए, वैसेवैसे नुसरत जहां और यश दासगुप्ता नजदीक आते गए. यश दासगुप्ता भी ऐक्टर और भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं. भाजपा ने उन्हें विधानसभा चुनाव में चंडीताल से टिकट भी दिया था. तृणमूल कांग्रेस की स्वाति खंडोलकर ने यश दासगुप्ता को 41,347 मतों से हराया था.

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यश दासगुप्ता हैं नजदीकी दोस्त

यश और नुसरत पिछले कुछ समय से अलगअलग जगहों पर एक साथ दिखाई दे रहे हैं. नुसरत जहां पिछले कुछ समय से ‘एसओएस कोलकाता’ फिल्म में अपने कोस्टार रहे यश दासगुप्ता के काफी करीब आ गई हैं.

कहा तो यह भी जाता है कि वह यश के साथ रिलेशन में हैं. कुछ दिनों पहले दोनों राजस्थान ट्रिप पर गए थे. इन खबरों पर दोनों ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी थी. इस से साफ पता चलता है कि दोनों का अफेयर चल रहा है.

नुसरत जहां और निखिल जैन के विवाद में यश दासगुप्ता ने कहा था कि नुसरत की पर्सनल लाइफ में चल रहे विवाद के बारे में कोई जानकारी नहीं है. वह तो हर समय सड़क यात्राएं करता रहता है. इस बार वह राजस्थान गया था. उस के साथ कोई भी जा सकता है. अगर यश दासगुप्ता कुछ कहते हैं तो कोई नई बातें सामने आएंगी.

10 अक्तूबर, 1985 को कोलकाता में जन्मे यश दासगुप्ता के कामकाज की बात करें तो उन्होंने नैशनल टीवी से अपने करियर की शुरुआत की थी. यश को हिंदी शो ‘कोई आने को है’, ‘बंदिनी’, ‘बसेरा’, ‘ना आना इस देश लाडो’, ‘अदालत’, ‘महिमा शनिदेव की’ में देखा जा चुका है. इस के अलावा बांग्ला धारावाहिक ‘बोझेना से बोझेना’ में भी काम कर चुके हैं.

उन्होंने कुछ बांग्ला फिल्मों में भी काम किया है. सब से पहले वह 2016 में फिल्म ‘गैंगस्टर’ में नजर आए थे. इस के बाद उन्होंने ‘वन’, ‘टोटल दादागिरी’, ‘फिदा’, ‘मोन जाने न’ और ‘एसओएस कोलकाता’ में काम किया है.

31 साल की नुसरत की निखिल जैन से मुलाकात तब हुई थी, जब निखिल ने अपने ब्रांड के लिए उन से मौडलिंग करवाई थी. और उसी मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे. निखिल जैन कोलकाता के एक प्रतिष्ठित परिवार से हैं.

उन का साडि़यों का पारिवारिक बिजनैस है. उन के ब्रांड का नाम है रंगोली. उन के पिता मोहन कुमार जैन ने टैक्सटाइल का यह बिजनैस शुरू किया था, जो आज कोलकाता के अलावा हैदराबाद चेन्नई, बंगलुरु और विजयवाड़ा तक फैला है. साड़ी का रंगोली ब्रांड बहुत लोकप्रिय है.

निखिल जैन की गिनती रईसों में होती है. उन की मां हाउसवाइफ हैं. उन की 2 बहनें भी हैं. निखिल का जन्म कोलकाता में ही हुआ था. उन का बचपन यहीं बीता. उन्होंने एमपी बिड़ला से पढ़ाई की थी. यूनाइटेड किंगडम की बार्विक यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की डिग्री ले कर पारिवारिक बिजनैस को संभाल लिया. उन्हें लग्जरी लाइफ जीना पसंद है. उन्हें एस्टन मार्टिन कार पसंद है. वह इंडियन फूड के दीवाने हैं.

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3 साल की डेटिंग के बाद की थी शादी

जैन होते हुए भी उन्होंने मुसलिम नुसरत जहां से शादी की. शादी से पहले 3 साल तक दोनों ने डेटिंग की थी. निखिल और नुसरत ने 19 जून, 2019 को डेस्टिनेशन शादी तो तुर्की में की थी, पर कोलकाता में बहुत ही भव्य रिसैप्शन दिया था, जिस में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हुई थीं.

2010 में नुसरत जहां ने मिस कोलकाता का कौंटैस्ट जीता था. इसी के बाद मौडलिंग और फिर बांग्ला फिल्मों में उन का प्रवेश हुआ. बांग्ला में उन्होंने तमाम अच्छी फिल्में दीं.

शादी के 3 महीने पहले ही तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने यह घोषणा कर के सब को चौंका दिया था कि फिल्म अभिनेत्री नुसरत जहां टीएमसी की उम्मीदवार के रूप में बशीरहाट सीट से चुनाव लड़ेंगीं.

लोकसभा के इस चुनाव में नुसरत जहां को कुल 7,82,078 मत मिले थे. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी भाजपा के उम्मीदवार सयांतन बासु को 3,50,569 मतों से हराया था.

चुनाव जीतने के कुछ दिनों बाद नुसरत जहां ने अपने प्रेम और विवाह की बात जाहिर की थी. नुसरत से अफेयर के पहले लोग निखिल को बहुत कम जानते थे. नुसरत के साथ नाम जुड़ने के बाद निखिल रातेंरात फेमस हो गए थे.

अलबत्ता उन की पहचान नुसरत जहां के पति के रूप में बनी थी. दोनों ने शादी की थी तो लोगों ने यही कहा था कि ये दोनों ही अलगअलग दुनिया के आदमी हैं, इसलिए दोनों ज्यादा दिनों तक एक साथ नहीं चल पाएंगे.

नुसरत बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी हैं. राजनीति में आने के बाद उन के सपनों को पंख लग गए हैं. नुसरत को अब डिवोर्स की बात से छुटकारा चाहिए. वह तो निखिल के साथ के संबंध को लिवइन रिलेशन कहती हैं. नुसरत और निखिल का यह प्रकरण जल्दी समाप्त होने वाला नहीं है. यह लंबा चलने वाला है. क्योंकि इस में अभी बहुत कुछ बाहर आना बाकी है. दोनों के मामले में कोई फिल्म देख रहे हों या मजेदार कहानी पढ़ रहे हों, लोग इस तरह रुचि ले रहे हैं.

सेलिब्रिटीज की जिंदगी अलग होती है. इन लोगों के संबंधों की व्याख्याएं भी एकदम अलग होती हैं. ऐसे मामलों में जजमेंटल बनने में बहुत खास नहीं होता. हर सेलिब्रिटी का किस्सा चर्चा में रहता है. फिल्मी दुनिया में तो यह सब चलता रहता है. इन लोगों की रियल लाइफ में भी शायद फिल्मी टर्न ऐंड ट्विस्ट न आए तो मजा नहीं आता.

प्रैग्नेंसी कंफर्म करने के लिए फोटो

तृणमूल कांग्रेस सांसद, एक्टर नुसरत जहां  की शादी भले टूटने की कगार पर है. उन का अपने पति से जिस बच्चे को ले कर विवाद चल रहा है, ऐसे में उन्होंने अपने उस बच्चे को ले कर अपनी प्रैग्नेंसी कन्फर्म कर दी है. इस के लिए उन्होंने एक तसवीर साझा की है, जिस में वह अपना बेबी बंप फ्लांट करती नजर आ रही हैं.

उन की यह तसवीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है, जिस में वह वाइट कलर के लूज गाउन में नजर आ रही हैं. इस फोटो में उन के गर्भवती होने का साफ पता चल रहा है. वहीं उन के चेहरे पर गर्भवती होने का ग्लो भी झलक रहा है. प्रैग्नेंसी के बाद पहली बार आई इस फोटो में नुसरत काफी खूबसूरत दिखाई दे रही हैं.

पिछले 3 महीने से नुसरत जहां के गर्भवती होने की अटकलें लगाई जा रही थीं. क्योंकि कुछ दिनों पहले उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर की थी, जिस में लिखा था, ‘तुम हमारे अंदाज में खिलोगे.’ हालांकि उस समय नुसरत इस मामले पर चुप्पी साधे रहीं. पर अब यह जो तसवीर सामने आई है, उस ने सारी अटकलों पर विराम लगा दिया है.

Manohar Kahaniya: चित्रकूट जेल साजिश- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का नाम वैसे तो दुनियाभर में रामायण काल से ही विख्यात है. क्योंकि अयोध्या के राजा श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ इसी चित्रकूट में अपने 14 साल के वनवास का अधिकांश समय व्यतीत किया था.

लेकिन इन दिनों यह पौराणिक शहर एक ऐसी घटना के लिए चर्चित हो रहा है, जिस ने पूरी उत्तर प्रदेश सरकार और यहां की कानून व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

14 मई, 2021 की सुबह का वक्त था. उस दिन पूरा देश ईदउलफितर यानी ईद का त्यौहार मना रहा था. चित्रकूट जिले की रगौली जेल के जेलर महेंद्र पाल हमेशा की तरह सुबह साढे़ 5 बजे जेल परिसर के अपने निवास से जेल के भीतर पहुंचे. उन्होंने जेल की हाई सिक्योरिटी समेत सभी बैरकों को खुलवाया था, ताकि बंदी अपने नित्यकर्म कर सकें.

जेल अधीक्षक श्रीप्रकाश त्रिपाठी भी जेल में सुबह 7 बजे आ गए थे. उन के कारागार में पहुंचने पर जेलर महेंद्र पाल ठीक 8 बजे अपने सरकारी आवास में नहानेधोने और नाश्ता करने के लिए चले गए थे. जेल में होने वाली सुबह की गतिविधियां ठीक से संचालित होने लगीं तो जेल अधीक्षक त्रिपाठी भी साढे 9 बजे कारागार से बाहर अपने सरकारी आवास पर नहानेधोने और नाश्ता करने चले गए.

जेल के दोनों जिम्मेदार अधिकारी जेल के बाहर अपने आवास में नित्य कर्म करने में व्यस्त थे, उसी वक्त उन्हें कारागार के भीतर से धांय… धांय गोलियां चलने की आवाजें आने लगीं.

जेल अधीक्षक तत्काल अपने आवास के बाहर आए तो उन्होंने बंगले के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों से पूछा कि गोलियां कहां और क्यों चल रही हैं.  सुरक्षाकर्मियों ने कुछ देर में जेलर व जेल अधीक्षक को बता दिया था कि जेल के भीतर एक बंदी ताबड़तोड़ गोलियां चला रहा है और उस ने 2 बंदियों को गोलियां मार दी हैं.

जेल अधीक्षक और जेलर के लिए यह सूचना एकदम सिर पर फूटने वाले बम जैसी थी. उन्होंने हड़बड़ी में वरदी डाली और 5 मिनट के भीतर तैयार हो कर कारागार के भीतर पहुंच गए.

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कारागार के भीतर पहुंचते ही त्रिपाठी ने जेल का अलार्म बजवा कर खतरे का संकेत दे दिया. जिस का मतलब था कि जेल के भीतर या तो दंगा हो गया है या कोई सुरक्षा की खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो गई. इस का मतलब साफ होता है कि जेल के सभी सुरक्षाकर्मी, जिन के आवास कारागार के आसपास ही होते हैं, यह अलार्म उन के लिए तत्काल कारागार तक पहुंचने की चेतावनी होती है.

जेल अधीक्षक ने जेल मार्ग पर ही बनी पुलिस चौकी के अलावा जिले के डीएम व एसपी को भी जेल में एक बंदी द्वारा गोलियां चलाए जाने की सूचना दे दी.

जेल अधीक्षक त्रिपाठी व जेलर महेंद्र  पाल सुरक्षाकर्मियों को ले कर जेल के भीतर पहुंचे और इस के बाद जेल के भीतर जो नजारा देखने को मिला उस ने चित्रकूट की जेल और जिला प्रशासन को ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश शासन को हिला कर रख दिया.

दरअसल, इस दिन चित्रकूट की रगौली जेल में 90 मिनट तक चले रोमांचक ड्रामे में एक या 2 नहीं, 3 लोगों की मौत हुई थी.

दरअसल, उस सुबह करीब 10 बजे से कुछ मिनट पहले अंशुल दीक्षित अपनी बैरक से निकला. वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों से उस ने कहा कि वह पीसीओ जा रहा है, किसी को फोन करना है.

बैरक के बाहर निकलते ही वह उस चक्कर वाले ग्राउंड में पहुंचा, जहां बंदियों को लाइन में खड़ा कर के उन की गिनती हो रही थी. जिस के बाद उन्हें अपनी बैरकों में वापस लौटना था.

अंशुल ने चलाईं गोलियां

परेड ग्रांउड में पहंचने के बाद अंशुल की नजरें तेजी से किसी को खोजने लगीं. अचानक उस की नजरें मेराज पर टिक गईं. उसे देखते ही अंशुल चीख कर बोला, ‘‘अबे ओ मेराज, तुम लोगों ने बहुत आतंक मचा लिया. अब तेरे बाप मुख्तार का खेल खत्म हो चुका है, उस का कोई गुर्गा जिंदा नहीं रहेगा.’’

कुछ बंदी साथियों के साथ खड़ा हो कर बात कर रहा मेराज जब तक कुछ समझ पाता, तब तक अंशुल ने अपनी जींस की बेल्ट में खोंसी हुई पिस्तौल निकाल ली और एक के बाद एक ताबड़तोड़ कई गोलियां मेराज के ऊपर चला दीं. मेराज वहीं लहरा कर जमीन पर गिर गया.

इस दौरान पहली गोली चलते ही और अंशुल के हाथ में पिस्तौल देख वहां आसपास खड़े बंदी सिर पर हाथ रख कर इधरउधर दौड़ते हुए छिपने के लिए जहां जगह मिली उस तरफ भाग निकले.

एक के बाद एक मेराज पर कई गोलियां चलाने के बाद जब अंशुल को इत्मीनान हो गया कि मेराज मर चुका है तो कुछ ही सेकेंड बाद 50 मीटर की दूरी पर स्थित उस अस्थाई बैरक में पहुंचा, जहां पर मुकीम काला बंद था.

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वहां पहुंचते ही अंशुल ने मुकीम से कहा, ‘‘काला मुझे तेरा बहुत दिनों से इंतजार था. मुख्तार का कोई बदमाश जिंदा नहीं रहेगा. खेल खत्म.’’ कहते हुए अंशुल ने अपने हाथ में पकड़े हुए पिस्तौल से कई गोलियां मुकीम पर झोंक दी.

अचानक उस के पिस्तौल की गोलियां खत्म हो गईं तो उस ने जेब में पड़ी एक दूसरी मैग्जीन निकाल कर पिस्तौल में लगाई और एक बार फिर उस का रुख मुकीम काला की तरफ कर ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

चंद मिनटों में ही अंशुल ने मुकीम का शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. लहूलुहान मुकीम अस्थाई बैरक में ही लाश बन कर लहराते हुए जमीन पर ढेर हो गया. मुकीम को मारने के बाद अंशुल इत्मीनान से टहलते हुए अपनी बैरक में गया. उस के भीतर कोई डर नहीं दिख रहा था और न ही कोई फिक्र.

अंशुल दीक्षित ने पिस्तौल लहराते हुए बैरक में बंद कुछ अन्य बंदियों को अपने काबू में कर लिया. तब तक जेल के अधिकारी एकत्र होने लगे थे. अंशुल ने उन से कहा कि अगर इन कैदियों को जिंदा बचाना चाहते हो तो मुझे जिंदा जेल से बाहर जाने दो.

जिस वक्त अंशुल रगौली जेल में यह खूनी तांडव कर रहा था. तब इस की खबर पा कर पहले जेल अधीक्षक व जेलर जेल के भीतर पहुंचे. उस के बाद स्थानीय चौकी की पुलिस भी सूचना पा कर जेल के भीतर पहुंच चुकी थी. जेल अधिकारियों व पुलिस ने अंशुल से जब बारबार आत्मसमर्पण के लिए कहना शुरू किया तो उस ने खीझ कर पुलिस पर भी गोलियां चला दीं.

पहले तो पुलिस आत्मरक्षा करने की कोशिश करती रही. लेकिन जब अंशुल की गोलीबारी का सिलसिला जारी रहा तो पुलिस की जवाबी गोलीबारी में अंशुल भी मारा गया.

दरअसल, करीब आधा घंटे तक अंशुल ने पिस्तौल के बल पर कई बंदियों को काबू में कर अपने आगे खड़ा कर लिया था. उस ने बंदियों को मारने की धमकी दे कर खुद को जेल से बाहर निकालने के लिए कहा था.

लेकिन किसी तरह जब उस के आगे खड़े बंदी उसे चकमा दे कर भाग कर बैरकों में चले गए. तो एक तरफ अंशुल और दूसरी तरफ पुलिस फोर्स बची थी. अंशुल ने जैसे ही पोजिशन ले कर पुलिस पर फिर से फायर झोंका तो पुलिस ने जवाबी काररवाई कर उसे मौके पर ही ढेर कर दिया.

इस बीच पुलिस और शार्प शूटर के बीच फायरिंग की सूचना पा कर मंडलायुक्त दिनेश कुमार सिंह, आईजी के. सत्यनारायण, जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ल, एसपी अंकित मित्तल भी भारी पुलिस फोर्स के साथ जेल पहुंच गए.

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मुख्यमंत्री ने की रिपोर्ट तलब

जेल के अंदर ताबड़तोड़ फायरिंग की सूचना पूरे जिले में तो जंगल की आग की तरह फैल ही गई थी बल्कि टेलीफोन से मिली सूचना के बाद लखनऊ में सत्ता के गलियारों और नौकरशाही तक में हड़कंप मच गया.

उसी दिन इस घटना का मुकदमा स्थानीय थाने में दर्ज कर लिया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चित्रकूट जेल में हुए शूटआउट के मामले में डीजी (जेल) आनंद कुमार से रिपोर्ट तलब कर ली.

कमिश्नर डी.के. सिंह, डीआईजी के. सत्यनारायण और एडीजी (जेल) संजीव त्रिपाठी से इस मामले की जांच कर 6 घंटे में पूरी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया. डीजी  (जेल) ने घटना की विस्तृत जांच और जेल का जायजा लेने के लिए प्रभारी उप महानिरीक्षक (कारागार) इलाहाबाद रेंज पी.एन. पांडे को चित्रकूट रवाना कर दिया.

दिलचस्प बात थी कि इस शूटआउट में जेल के जो तीनों बंदी मारे गए, उन का किसी न किसी रूप में उत्तर प्रदेश के सब से बड़े डौन मुख्तार अंसारी से करीबी संबंध रहा था.

चित्रकूट जेल शूटआउट की जांच जैसे ही शुरू हुई तो इस में जेल प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नजर आने लगी. मामले की जांच कर रहे अफसरों के काररवाई की सूई भी जेलकर्मियों की तरफ घूम गई.

पिस्तौल कैसे पहुंची हमलावर तक

क्योंकि जेल मैनुअल और नियमों के हिसाब से जेल के भीतर कोई भी हथियार लाने पर प्रतिबंध होता है. तब अंशुल दीक्षित के पास पिस्तौल और कारतूसों से मैग्जीन कैसे पहुंचीं. जाहिर था, ये सब जेल के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था.

तत्काल तो वारदात की कडि़यां नहीं जुड़ सकीं, लेकिन यह साफ हो गया कि सुबह करीब साढ़े 9 बजे जेल में ड्यूटी करने वाले बंदी सभी बैरकों में जा कर नाश्ता बांट रहे थे. उसी वक्त कैदियों की गणना भी चल रही थी. ज्यादातर कैदी बैरक से बाहर मैदान में ही थे.

इस की वजह से चारों तरफ जेल के सिपाही नजर गड़ाए मुस्तैद थे. इसी दौरान बाल्टी में कच्चा चना और गुड़ ले कर 2 कैदी अंशुल की बैरक में दाखिल हुए.

वे चना दे कर जैसे ही लौटे चंद मिनट बाद ही अंशुल भी अपनी बैरक से बाहर आया था और उस ने पिस्टल से ताबड़तोड़ फायरिंग कर मेराज और मुकीम काला को मौत के घाट उतार दिया. जांच करने वाले अधिकारियों को शक है कि नाश्ते के साथ ही पिस्तौल भी अंशुल तक पहुंचाई गई थी.

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मेरे पति की दो गर्लफ्रेंड है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं विवाहित युवती हूं. मेरे पति के 2 युवतियों से संबंध हैं. मैं बहुत परेशान हूं. कृपया बताएं कि मैं ऐसा क्या करूं जिस से अपने पति को उन युवतियों के चंगुल से बचा सकूं?

जवाब

लगता है, आप अपनी घरगृहस्थी में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो पति के प्रति लापरवाह होती गईं. घर में अपेक्षित प्यार और तवज्जो न मिलने के कारण ही आप के पति ने बाहर दूसरी महिलाओं से संबंध बना लिए. उन्हें वापस पाने के लिए आप को अब थोड़े धीरज से काम लेना होगा.

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पति जब भी घर आएं उन के साथ बिलकुल सामान्य व्यवहार करें. उन्हें तानेउलाहने न दें वरना वे घर आने से भी कतराने लगेंगे, जो आप के हित में नहीं होगा. पति जितनी देर घर रहें उन्हें भरपूर
प्यार दें. धीरेधीरे उन का बाहर से वैसे भी मोहभंग हो जाएगा. विवाहित पुरुषों को युवतियां ज्यादा दिनों तक घास नहीं डालतीं, साथ ही अवैध संबंधों की मियाद भी ज्यादा लंबी नहीं होती. इसलिए चिंता छोड़ कर पति को वापस पाने के प्रयास में लग जाएं.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
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Social Story in Hindi: डुप्लीकेट- भाग 2: आखिर क्यों दुखी था मनोहर

नीलू भी मजबूर हो गई थी. उस का सब से पहला यौन शोषण मामा ने किया. स्क्रीन टैस्ट के नाम पर कई बार यौन शोषण हुआ, पर उसे किसी फिल्म में काम नहीं मिला.

शूटिंग देखतेदेखते नीलू की दोस्ती निशा से हो गई थी. निशा फिल्मों में डुप्लीकेट का काम करती थी. कभीकभी छोटामोटा रोल भी उसे मिल जाता था.

एक दिन एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी. निशा के डुप्लीकेट के रूप में कुछ शौट फिल्माए जाने थे. अचानक निशा की तबीयत खराब हो गई तो उस ने अपना काम नीलू को दिला दिया.

इतने साल हो गए हैं डुप्लीकेट का रोल करतेकरते, पर किसी फिल्म में कोई ढंग का रोल नहीं मिला.

इस के बाद मनोहर व नीलू का मिलनाजुलना बढ़ता रहा. एक दिन वह आया जब उस ने नीलू से शादी कर ली.

शादी के बाद उस ने नीलू को किसी भी फिल्म में डुप्लीकेट का काम करने को बिलकुल मना कर दिया था.

2 साल बाद उन के घर में एक नन्हामुन्ना मेहमान आ गया. बेटे का नाम कमल रखा गया.

एक दिन नीलू ने उस से कहा, ‘मैं तो चाहती हूं कि तुम भी डुप्लीकेट का काम छोड़ दो. जब तुम शूटिंग पर चले जाते हो, मुझे बहुत डर लगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हम दोनों का क्या होगा?’

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‘हां नीलू, तुम ठीक कहती हो. मैं भी यही सोच रहा हूं. मेरा मन भी इस काम से ऊब चुका है. इस काम में इज्जत तो बिलकुल है ही नहीं. कभीकभी तो अपनेआप से ही नफरत होने लगती है.

क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘जब कोई मामूली सा डायरैक्टर भी सब के सामने डांट देता है तब लगता है कि क्या हम इतने गिरे हुए हैं जो हमारी इस तरह बेइज्जती कर दी जाती है? क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘अब तो यहां मुंबई में रहते हुए मेरा मन ऊब गया है,’ नीलू ने कहा था.

‘तुम ठीक कहती हो. हम जल्द ही यहां से चले जाएंगे किसी छोटे से शहर में या किसी पहाड़ी इलाके में. वहीं पर मैं कोई छोटामोटा काम कर लूंगा. हम अपने बेटे कमल को इस फिल्मी दुनिया से दूर ही रखेंगे.’

नीलू ने मुसकराते हुए उस की ओर देखा था.

एक दिन मनोहर की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई. इलाज शुरू हुआ. कई डाक्टरों को दिखाया गया, पर बीमारी कम नहीं हो रही थी. जो भी पास में पैसा था, बीमारी की भेंट चढ़ गया.

एक स्पैशलिस्ट डाक्टर को दिखाया गया तो उस ने कुछ जरूरी जांच, दवा, इंजैक्शन वगैरह लिख दिए थे.

मनोहर बिस्तर पर लेटा हुआ कुछ सोच रहा था. उस की आंखों से पता नहीं कब आंसू बह निकले.

नीलू ने उस के आंसू पोंछते हुए कहा था, ‘आप अपना मन दुखी न करो. डाक्टर ने कहा है कि तुम ठीक हो जाओगे.’

‘नीलू, इतने रुपए कहां से आएंगे? तुम रहने दो, जो होगा वह हो जाएगा.’

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‘तुम किसी भी तरह की चिंता मत करो. मैं प्रकाश स्टूडियो जाऊंगी. वहां फिल्म ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही है. डायरैक्टर प्रशांत राय तुम्हें और मुझे जानता है.’

‘नहीं नीलू, तुम्हें चौथा महीना चल रहा है. तुम दोबारा पेट से हो. ऐसे में तुम्हें मैं कहीं नहीं जाने दूंगा.’

मनोहर  ने मन ही मन यह फैसला किया…

‘तुम्हारी यह नीलू कोई गलत काम कर के पैसे नहीं लाएगी. मुझे जाने दो,’ कह कर नीलू चली गई थी.

मनोहर चुपचाप लेटा रहा. उस ने मन ही मन यह फैसला कर लिया था कि बीमारी ठीक होते ही वह नीलू व बेटे कमल के साथ यहां से चला जाएगा. उसे नींद आने लगी थी.

रात के 3 बज रहे थे. दरवाजे पर खटखटाहट हुई तो उस ने उठ कर दरवाजा खोल दिया. सामने खड़े विजय को देख कर मनोहर बुरी तरह चौंका.

विजय एकदम बोल उठा, ‘मनोहर, जल्दी अस्पताल चलना है. भाभी बहुत सीरियस हैं.’

मनोहर ने घबराई आवाज में पूछा, ‘क्या हुआ नीलू को?’

‘प्रकाश स्टूडियो में ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही थी. नीलू भाभी ने तुम्हारी बीमारी की बता कर डायरैक्टर प्रशांत राय से काम मांगा. डायरैक्टर ने डुप्लीकेट का काम दे दिया. हीरोइन को सीढि़यों से लुढ़क कर नीचे फर्श पर गिरना था.

‘यही सीन नीलू भाभी पर फिल्माया गया. वे फर्श पर गिरीं तो फिर उठ न सकीं. बेहोश हो गईं. शायद वे पेट से थीं,’ विजय ने बताया था.

यह सुन कर मनोहर सन्न रह गया था. विजय ने एक टैक्सी की और उसे व कमल को साथ ले कर चल दिया.

विजय ने रास्ते में बताया था, ‘जब नीलू भाभी बेहोश हो गईं तो डायरैक्टर प्रशांत राय ने कहा था कि आजकल किसी के साथ हमदर्दी करना भी ठीक नहीं. इस ने हम को बताया नहीं था अपनी प्रैगनैंसी के बारे में. यह सीरियस है. इसे अभी अस्पताल ले जाओ और इस के घर पर खबर कर दो,’ कहते हुए डायरैक्टर ने मुझे कुछ रुपए भी दिए थे.

मनोहर के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था.

अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि नीलू आपरेशन थिएटर में है. कुछ देर बाद लेडी डाक्टर ने बाहर आ कर कहा था, ‘सौरी, ज्यादा खून बह जाने के चलते नीलू को नहीं बचाया जा सका. उसे इस हालत में यह काम नहीं करना चाहिए था.’

मनोहर चुपचाप सुनता रहा. वह कुछ भी कहने की हालत में नहीं था.

नीलू ने तो उस से यह डुप्लीकेट का काम न करने का वादा ले लिया था, पर यही काम नीलू को हमेशा के लिए उस से बहुत दूर ले गया था.

फिर उस की जिंदगी में आई निशा. वह निशा को भी कई सालों से जानता था. निशा नीलू की सहेली थी. निशा पड़ोस में ही रहती थी. उसे भी नीलू के इस तरह मरने का बहुत दुख था.

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नादानियां- भाग 1: उम्र की इक दहलीज

प्रथमा की शादी को 3 साल हो गए हैं. कितने अरमानों से उस ने रितेश की जीवनसंगिनी बन कर इस घर में पहला कदम रखा था. रितेश से जब उस की शादी की बात चल रही थी तो वह उस की फोटो पर ही रीझ गई थी. मांपिताजी भी संतुष्ट थे क्योंकि रितेश 2 बहनों का इकलौता भाई था और दोनों बहनें शादी के बाद अपनेअपने घरपरिवार में रचीबसी थीं. सासससुर भी पढ़ेलिखे व सुलझे विचारों के थे.

शादी से पहले जब रितेश उसे फोन करता था तो उन की बातों में उस की मां यानी प्रथमा की होने वाली सास एक अहम हिस्सा होती थी. प्रथमा प्रेमभरी बातें और होने वाले पति के मुंह से खुद की तारीफ सुनने के लिए तरसती रह जाती थी और रितेश था कि बस, मां के ही गुणगान करता रहता. उसी बातचीत के आधार पर प्रथमा ने अनुमान लगा लिया था कि रितेश के जीवन में उस की मां का पहला स्थान है और उसे पति के दिल में जगह बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

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शादी के बाद हनीमून की योजना बनाते समय रितेश बारबार हरिद्वार, ऋ षिकेश, मसूरी जाने का प्लान ही बनाता रहा. आखिरी समय तक वह अपनी मम्मीपापा से साथ चलने की जिद करता रहा. प्रथमा इस नई और अनोखी जिद पर हैरान थी क्योंकि उस ने तो यही पढ़ा व सुना था कि हनीमून पर पतिपत्नी इसलिए जाते हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा वक्त एकदूसरे के साथ बिता सकें और उन की आपसी समझ मजबूत हो. मगर यहां तो उलटी गंगा बह रही है. मां के साथ तीर्थ पर ही जाना था तो इसे हनीमून का नाम देने की क्या जरूरत है. खैर, ससुरजी ने समझदारी दिखाई और उन्हें हनीमून पर अकेले ही भेजा.

स्मार्ट और हैंडसम रितेश का फ्रैंडसर्किल बहुत बड़ा है. शाम को औफिस से घर आते ही जहां प्रथमा की इच्छा होती कि वह पति के साथ बैठ कर आने वाले कल के सपने बुने, उस के साथ घूमनेफिरने जाए, वहीं रितेश अपनी मां के साथ बैठ कर गप मारता और फिर वहां से दोस्तों के पास चला जाता. प्रथमा से जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं था. रात लगभग 9 बजे लौटने के बाद खाना खा कर वह सो जाता. हां, हर रात वह सोने से पहले प्रथमा को प्यार जरूर करता था. प्रथमा का कोमल हृदय इस बात से आहत हो उठता, उसे लगता जैसे पति ने उसे सिर्फ अपने बिस्तर में ही जगह दी है, दिल में नहीं. वह केवल उस की आवश्यकतापूर्ति का साधन मात्र है. ऐसा नहीं है कि उस की सास पुरानी फिल्मों वाली ललिता पंवार की भूमिका में है या फिर वह रितेश को उस के पास आने से रोकती है, बल्कि वह तो स्वयं कई बार रितेश से उसे फिल्म, मेले या फिर होटल जाने के लिए कहती. रितेश उसे ले कर भी जाता है मगर उन के साथ उस की मां यानी प्रथमा की सास जरूर होती है. प्रथमा मन मसोस कर रह जाती, मगर सास को मना भी कैसे करे. जब पति खुद चाहता है कि मां उन के साथ रहे तो फिर वह कौन होती है उन्हें टोकने वाली.

कई बार तो उसे लगता कि पति के दिल में उस का एकछत्र राज कभी नहीं हो सकता. वह उस के दिल की रानी सास के रहते तो नहीं बन सकती. उस की टीस तब और भी बढ़ जाती है जब उस की बहन अपने पति के प्यार व दीवानगी के किस्से बढ़ाचढ़ा कर उसे बताती कि कैसे उस के पति अपनी मां को चकमा दे कर और बहाने बना कर उसे फिल्म दिखाने ले जाते हैं, कैसे वे दोनों चांदनी रातों में सड़कों पर आवारगी करते घूमते हैं और चाटपकौड़ी, आइसक्रीम का मजा लेते हैं. प्रथमा सिर्फ आह भर कर रह जाती. हां, उस के ससुर उस के दर्द को समझने लगे थे और कभी बेकार में चाय बनवा कर, पास बैठा कर इधरउधर की बातें करते तो कभी टीवी पर आ रही फिल्म को देखने के लिए उस से अनुरोध करते.

दिन गुजरते रहे, वह सब्र करती रही. लेकिन जब बात सिर से गुजरने लगी तो उस ने एक नया फैसला कर लिया अपनी जीवनशैली को बदलने का. प्रथमा को मालूम था कि राकेश मेहरा यानी उस के ससुरजी को चाय के साथ प्याज के पकौड़े बहुत पसंद हैं, हर रोज वह शाम की चाय के साथ रितेश की पसंद के दूसरे स्नैक्स बनाती रही है और कभीकभी रितेश के कहने पर सासूमां की पसंद के भी. मगर आज उस ने प्याज के पकौड़े बनाए. पकौड़े देखते ही राकेश के चेहरे पर लुभावनी सी मुसकान तैर गई.

प्रथमा ने आज पहली बार गौर से अपने ससुरजी को देखा. राकेश की उम्र लगभग 55 वर्ष थी, मगर दिखने में बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व है उन का. रितेश अपने पापा पर ही गया है, यह सोच कर प्रथमा के दिल में गुदगुदी सी हो गई.

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राकेश ने जीभर कर पकौड़ों की तारीफ की और प्रथमा से बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘मोगाम्बो खुश हुआ. अपनी एक इच्छा बताओ, बच्ची. कहो, क्या चाहती हो?’’ प्रथमा खिल उठी. फिलहाल तो उस ने कुछ नहीं मांगा मगर आगे की रणनीति मन ही मन तय कर ली. 2 दिनों बाद उस ने राकेश से कहा, ‘‘आज यह बच्ची आप से आप का दिया हुआ वादा पूरा करने की गुजारिश करती है. क्या आप मुझे कार चलाना सिखाएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं, अवश्य सिखाएंगे बालिके,’’ राकेश ने कहा. जब वे बहुत खुश होते हैं तो इसी तरह नाटकीय अंदाज में बात करते हैं. अब हर शाम औफिस से आ कर चायनाश्ता करने के बाद राकेश प्रथमा को कार चलाना सिखाने लगा. जब राकेश उसे क्लच, गियर, रेस और ब्रेक के बारे में जानकारी देता तो प्रथमा बड़े मनोयोग से सुनती. कभीकभी घुमावदार रास्तों पर कार को टर्न लेते समय स्टीयरिंग पर दोनों के हाथ आपस में टकरा जाते. राकेश ने इसे सामान्य प्रक्रिया समझते हुए कभी इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर प्रथमा के गाल लाल हो उठते थे.

Family Story- नादानियां: उम्र की इक दहलीज

रिश्तों की परख: भाग 2

लेखका- शैलेंद्र सिंह परिहार

वार्षिक परीक्षा समाप्त होते ही मैं नानीजी के पास आ गई. रिजल्ट आया तो मैं फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी. गणित में अच्छे नंबर मिले थे. मैं अपने रिजल्ट से संतुष्ट थी. कुछ दिनों बाद कमल का भी रिजल्ट आया था. उसे मैरिट लिस्ट में दूसरा स्थान मिला था. उसे बधाई देने के लिए मेरा मन बेचैन हो रहा था. मैं जल्द ही नानी के घर से वापस लौट आई थी. कमल से मिली लेकिन उसे प्रसन्न नहीं देखा. वह दुखी मन से बोला था, ‘नहीं स्नेह, मैं पीछे नहीं रहना चाहता हूं, मुझे पहली पोजीशन चाहिए थी.’

वह कालिज पहुंचा और मैं 11वीं में. मैं ने अपनी सुविधानुसार कामर्स विषय लिया और उस ने आर्ट. अब उसे आई.ए.एस. बनने की धुन सवार थी.

‘आप को इस तरह विषय नहीं बदलना चाहिए था,’  मौका मिलते ही एक दिन मैं ने उसे समझाना चाहा.

‘मैं आई.ए.एस. बनना चाहता हूं और गणित उस के लिए ठीक विषय नहीं है. पिछले सालों के रिजल्ट देख लो, साइंस की तुलना में आर्ट वालों का चयन प्रतिशत ज्यादा है.’

मैं उस का तर्क सुन कर खामोश हो गई थी. मेरी बला से, कुछ भी पढ़ो, मुझे क्या करना है लेकिन मैं ने जल्द ही पाया कि मैं उस की तरफ खिंचती जा रही हूं. धीरेधीरे वह मेरे सपनों में भी आने लगा था, मेरे वजूद का एक हिस्सा सा बनता जा रहा था. अकेले में मिलने, उस से बातें करने को दिल चाहता था. समझ नहीं पा रही थी कि मुझे उस से प्यार होता जा रहा है या फिर यह उम्र की मांग है.

वह मेरे सपनों का राजकुमार बन गया था और एक शाम तो मेरे सपनों को एक आधार भी मिल गया था. आंटीजी बातों ही बातों में मेरी मम्मी से बोली थीं, ‘मन में एक बात आई थी, आप बुरा न मानें तो कहूं?’

‘कहिए न,’ मम्मी ने उन्हें हरी झंडी दे दी.

‘आप अपनी बेटी मुझे दे दीजिए, सच कहती हूं मैं उसे अपनी बहू नहीं बेटी बना कर रखूंगी,’ यह सुन मम्मी खामोश हो गई थीं. इतना बड़ा फैसला पापा से पूछे बगैर वह कैसे कर लेतीं. उन्हें खामोश देख कर और आगे बोली थीं, ‘नहीं, जल्दी नहीं है, आप सोचसमझ लीजिए, भाई साहब से भी पूछ लीजिएगा, मैं तो कमल के पापा से पूछ कर ही आप से बात कर रही हूं. कमल से भी बात कर ली है, उसे भी स्नेह पसंद है.’

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उस रात मम्मीपापा में इसी बात को ले कर फिर तकरार हुई थी.

‘क्या कमी है कमल में,’ मम्मी पापा को समझाने में लगी हुई थीं, ‘पढ़नेलिखने में होशियार है, कल को आई.ए.एस. बन गया तो अपनी बेटी राज करेगी.’

‘तुम समझती क्यों नहीं हो,’ पापा ने खीजते हुए कहा था, ‘अभी वह पढ़ रहा है, अभी से बात करना उचित नहीं है. वह आई.ए.एस. बन तो नहीं गया न, मान लो कल को बन भी गया और उसे हमारी स्नेह नापसंद हो गई तो?’

‘आप तो बस हर बात में मीनमेख निकालने लगते हैं, कल को उस की शादी तो करनी ही पड़ेगी, दोनों बच्चों को पढ़ालिखा कर सेटल करना होगा, कहां से लाएंगे इतना पैसा? आज जब बेटी का सौभाग्य खुद चल कर उस के पास आया है तो दिखाई नहीं पड़ रहा है.’

पापा हमेशा की तरह मम्मी से हार गए थे और उन का हारना मुझे अच्छा भी लग रहा था. वह बस, इतना ही बोले थे, ‘लेकिन स्नेह से भी तो पूछ लो.’

‘मैं उस की मां हूं. उस की नजर पहचानती हूं, फिर भी आप कहते हैं तो कल पूछ लूंगी.’

दूसरे दिन जब मम्मी ने पूछा तो मैं शर्म से लाल हो गई थी, चाह कर भी हां नहीं कह पा रही थी. मैं ने शरमा कर अपना चेहरा झुका लिया था. वह मेरी मौन स्वीकृति थी. फिर क्या था, मैं एक सपनों की दुनिया में जीने लगी थी. जब भी वह हमारे घर आता तो छोटे भाई मुझे चिढ़ाते, ‘दीदी, तुम्हारा दूल्हा आया है.’

देखते ही देखते 2 साल का समय गुजर गया, मैं ने भी हायर सेकंडरी पास कर उसी कालिज में दाखिला ले लिया था जिस में कमल पढ़ता था. 1 साल तक एक ही कालिज में पढ़ने के बावजूद हम कभी अकेले कहीं घूमनेफिरने नहीं गए. बस, घर से कालिज और कालिज से सीधे घर. ऐसा नहीं था कि मैं उसे मना कर देती, लेकिन उस ने कभी प्रपोज ही नहीं किया. और मुझे लड़की का एक स्वाभाविक संकोच रोकता था.

ग्रेजुएशन पूरी होने के बाद उसे कंपीटीशन की तैयारी के लिए इलाहाबाद जाना था. सुनते ही मैं सकते में आ गई. उसे रोक भी नहीं सकती थी और जाते हुए भी नहीं देख सकती थी. जिस शाम उसे जाना था उसी दोपहर को मैं उस के घर पहुंची थी. वह जाने की तैयारी कर रहा था. आंटीजी रसोई में थीं. मैं ने पूछा था, ‘मुझे भूल तो न जाओगे?’

उस ने कोई जवाब नहीं दिया था, जैसे मेरी बात सुनी ही न हो. उस की इस बेरुखी से मेरी आंखें भर आई थीं. उस ने देखा और फिर बोला था, ‘यदि कुछ बन गया तो नहीं भूलूंगा और यदि नहीं बन पाया तो शायद…भूल भी जाऊंगा,’ सुनते ही मैं वहां से भाग आई थी.

लगभग 4 माह बाद वह इलाहाबाद से वापस आया था. बड़ा परिवर्तन देखा. हेयर स्टाइल, बात करने का ढंग, सबकुछ बदल गया था. एक दिन कमल ने कहा था, ‘मेरे साथ फिल्म देखने चलोगी?’

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‘क्या,’ मुझे आश्चर्य हुआ था. मन में एक तरंग सी दौड़ गई थी.

‘लेकिन बिना पापा से पूछे…’

‘ओह यार, पापा से क्या पूछना… आफ्टर आल यू आर माई वाइफ…अच्छा ठीक है, मैं पूछ भी लूंगा.’

कमल ने पापा से क्या कहा मुझे नहीं मालूम पर पापा मान गए थे. वह शाम मेरी जिंदगी की एक यादगार शाम थी. 3 से 6 पिक्चर देखी. ठंड में भी हम दोनों ने आइसक्रीम खाई. लौटते समय मैं ने उस से कहा था, ‘तुम्हें इलाहाबाद पहले ही जाना चाहिए था.’

समय गुजरता गया. मैं भी ग्रेजुएट हो गई. सुनने में आया कि कमल का चयन मध्य प्रदेश पी.सी.एस. में नायब तहसीलदार की पोस्ट के लिए हो गया था, लेकिन उस ने नियुक्ति नहीं ली. उस का तो बस एक ही सपना था आई.ए.एस. बनना है. 2 बार उस ने मुख्य परीक्षा पास भी की लेकिन इंटरव्यू में बाहर हो गया.

मेरे पापा का ग्वालियर तबादला हो गया. एक बार फिर हम लोगों को अपना पुराना शहर छोड़ना पड़ा. अंकल और आंटी दोनों ही स्टेशन तक छोड़ने आए थे.

मेरी पोस्ट गे्रजुएशन भी हो चुकी थी, अब तो पापा को सब से अधिक चिंता मेरी शादी की थी. जब भी यू.पी.एस.सी. का रिजल्ट आता वह पेपर ले कर घंटों देखा करते थे. मम्मी उन्हें समझातीं, ‘जहां इतने दिनों तक सब्र किया वहां एकाध साल और कर लीजिए.’

पापा गुस्से में बोले थे, ‘ये सब तुम्हारी ही करनी का फल है. बड़ी दूरदर्शी बनती थीं न…अब भुगतो.’

‘आप वर्माजी से बात तो कीजिए, कोई अपनी जबान से थोड़े ही फिर जाएगा, शादी कर लें, लड़का अपनी तैयारी करता रहेगा.’

‘तुम मुझे बेवकूफ समझती हो,’ पापा गुस्से से चीखे थे, ‘उस सनकी को अपनी बेटी ब्याह दूं, अच्छीखासी पोस्ट पर सलेक्ट हुआ था, लेकिन नियुक्ति नहीं ली. यदि कल को कुछ नहीं बन पाया तो?’

‘ऐसा नहीं है. वह योग्य है, कुछ न कुछ कर ही लेगा. आप की बेटी भूखी नहीं मरेगी.’

पापा दूसरे दिन आफिस से छुट्टी ले कर जबलपुर चले गए. मैं धड़कते हृदय से उन की प्रतीक्षा कर रही थी. 2 दिन बाद लौट कर आए तो मुंह उतरा हुआ था. आते ही आफिस चले गए. पूरे दिन मां और मैं ने प्रतीक्षा की. पापा शाम को आए तो चुपचाप खाना खा कर अपने बेडरूम में चले गए. उन के पीछेपीछे मम्मी भी. मैं उन की बात सुनने के लिए बेडरूम के दरवाजे के ही पास रुक गई थी.

‘क्या हुआ? क्या उन्होंने मना कर दिया?’

‘नहीं…’  पापा कुछ थकेथके से बोले थे, ‘वर्माजी तो आज भी तैयार हैं, लेकिन लड़का नहीं मान रहा है, कहता है आई.ए.एस. बनने के बाद ही शादी करूंगा. हां, वर्माजी ने थोड़े दिनों की और मोहलत मांगी है, लड़के को समझा कर फोन करेंगे.

Crime Story in Hindi: वह नीला परदा- भाग 8: आखिर ऐसा क्या देख लिया था जौन ने?

Writer- Kadambari Mehra

पूर्व कथा

एक रोज जौन सुबहसुबह अपने कुत्ते डोरा के साथ जंगल में सैर के लिए गया, तो वहां नीले परदे में लिपटी सड़ीगली लाश देख कर वह बुरी तरह घबरा गया. उस ने तुरंत पुलिस को सूचना दी. बिना सिर और हाथ की लाश की पहचान करना पुलिस के लिए नामुमकिन हो रहा था. ऐसे में हत्यारे तक पहुंचने का जरिया सिर्फ वह नीला परदा था, जिस में उस लड़की की लाश थी. इंस्पैक्टर क्रिस्टी ने टीवी पर वह नीला परदा बारबार दिखाया, मगर कोई सुराग हाथ नहीं लगा.

एक रोज क्रिस्टी के पास किसी जैनेट नाम की लड़की का फोन आया, जो पेशे से नर्स थी. वह क्रिस्टी से मिल कर नीले परदे के बारे में कुछ बताना चाहती थी.

जैनेट ने क्रिस्टी को जिस लड़की का फोटो दिखाया उस का नाम फैमी था. फोटो में वह अपने 3 साल के बेटे को गाल से सटाए बैठी थी. जैनेट ने बताया कि वह छुट्टियों में अपने वतन मोरक्को गई थी. क्रिस्टी ने मोरक्को से यहां आ कर बसी लड़कियों की खोजबीन शुरू की. आखिरकार क्रिस्टी को फहमीदा नाम की एक महिला की जानकारी मिली. क्रिस्टी फहमीदा के परिवार से मिलने मोरक्को गया. वहां फहमीदा की मां ने लंदन में बसे अपने

2-3 जानकारों के पते दिए. क्रिस्टी को लारेन नाम की औरत ने बताया कि फहमीदा किसी मुहम्मद नाम के व्यक्ति से प्यार करती थी. वह उस के बच्चे की मां बनने वाली थी.

एक रोज लारेन ने क्रिस्टी को बताया कि उस ने मुहम्मद को देखा है. क्रिस्टी और लारेन जब उस जगह पहुंचे तो पता चला कि यह दुकान मुहम्मद की नहीं, बल्कि साफिया की थी, जिस के दूसरे पति का नाम नासेर था. अब सवाल यह उठ रहा था, आखिर साफिया दुकान बेच कर कहां चली गई?

एक रोज डेविड एक कबाब की दुकान पर गया तो अचानक दुकान के मालिक को देख उस के दिमाग में लारेन का बताया हुलिया कुलबुलाने लगा.

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नासेर के बारे में एकएक कर के जो बातें उजागर हो रही थीं, वे उसे कठघरे की तरफ धकेलती जा रही थीं. कांस्टेबल एंडी ने नासेर का पीछा किया तो मालूम पड़ा कि उस की बीवी और 3 बच्चे वहीं रहते हैं. डेविड ने एंडी को उस की बीवी का पीछा करने की सलाह दी. एंडी ने उस की बीवी, दुकान व बच्चों का ब्योरा डेविड को दिया. डेविड ने स्कूल से बच्चे का बर्थसर्टिफिकेट निकलवाया तो कई बातें उजागर हो गईं. डेविड ने नासेर से फहमीदा नाम की औरत का जिक्र किया, तो उस के चेहरे का रंग उड़ गया. मौयरा ने स्कूल के हैडमास्टर की मदद से बच्चे को फैमी का फोटो दिखाया तो बच्चे ने तुरंत उसे पहचान लिया.

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शकूर की तारीफें सुन कर साफिया बहुत खुश हुई. मौयरा ने कहा कि वह उस के घर के वातावरण से परिचित होना चाहती है. साफिया ने झट से उसे बुलावा दे डाला, अगले ही दिन सुबह लंच से पहले.

घर बड़े करीने से सजा था. साफिया ने  मौयरा को बताया कि वह 2 साल पहले ही यहां आई है. इस से पहले वह पति की दुकान के ऊपर फ्लैट में रहती थी. वह दुकान ग्रोसरी की थी.

उस का पिता टर्की से आया था और उस ने काफी अच्छा पैसा बनाया लंदन में. उसी दौरान उस ने एक मोरक्कन मुसलमान से शादी कर ली. वह भी अच्छे घरपरिवार से था, मगर उसे सिगरेट पीने की बुरी लत थी. इसलिए

वह फेफड़े के कैंसर से मर गया. उन की 3 बेटियां थीं.

पति के मरने के बाद साफिया ने उस की फलसब्जी की दुकान संभाली. मगर 3 बच्चों को पालना और दुकान चलाना काफी भारी पड़ता था. कुछ साल बाद उस के पति के रिश्ते का भाई अली नासेर स्टूडैंट वीजा पर लंदन आया. पति का भाई होने के नाते साफिया ने उसे घर में रखा. बाद में उस से शादी कर ली. अली से भी उसे 2 बेटियां हुईं. अली हर हालत में एक लड़का चाहता था ताकि वह अपनी पुश्तैनी जायदाद का हक न खो दे.

‘‘फिर?’’ मौयरा ने पूछा.

साफिया थोड़ा अटकी फिर सोच कर बोली, ‘‘फिर क्या, शकूर आ गया, बस.’’

साफिया की कहानी हूबहू लारेन की बताई कहानी से मिलती थी. मौयरा ने अपने बैग में रखे टेपरिकौर्डर पर उस की सारी बातें रिकौर्ड कर ली थीं.

मौयरा ने आगे पूछा, ‘‘तुम किसी मुहम्मद नाम के आदमी को जानती हो?’’

‘‘वह तो मेरा पहला पति था, जो मर गया.’’

‘‘अली मुहम्मद?’’

‘‘नहीं, मुहम्मद जब्बार नासेर. यह नाम था उस का.’’

‘‘किसी अब्दुल नाम के बच्चे को जानती हो, वह भी मोरक्को से आया है?’’

‘‘नहीं, यहां कोई मोरक्कन नहीं है.’’

‘‘उस की मां का नाम फहमीदा है.’’

‘‘नहीं, मैं नहीं जानती.’’

साफिया की बातचीत एकदम निश्छल लगी.

‘‘तुम्हारी बड़ी बेटियां?’’

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साफिया उदासी को छिपाते हुए बोली, ‘‘वे अलग रहती हैं. दरअसल, मेरे पिता ने उन के लिए अलग से बिजनैस शुरू करवा दिया और फ्लैट खरीद कर दे दिया. दरअसल, ग्रोसरी ही हमारा पुराना धंधा है, जिसे अब वे तीनों मिल कर चलाती हैं और मैं भी वहां जा कर उन की मदद कर आती हूं. ये तीनों छोटे बच्चे मेरे दूसरे पति नासेर की जिम्मेदारी हैं. अब कोई तकरार नहीं.’’

‘‘क्या पहले तकरार होती थी?’’

साफिया मुसकरा कर चुप हो गई.

‘‘नासेर क्या करता है?’’

‘‘उसी दुकान में है मगर डोनर कबाब बेचता है.’’

‘‘फ्लैट में कौन रहता है?’’

‘‘कोई नहीं, पिछले क्रिसमस के बाद उस ने उसे रंगरोगन करवाया था मगर खाली ही पड़ा है.’’

मौयरा ने सारी रिपोर्ट क्रिस्टी को दे दी.

क्रिस्टी सावधान था. लारेन को चकमा दे कर दुकान से निकलने के बाद नासेर का अगला कदम होगा कि वह भाग जाए. क्रिस्टी

ने चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी और वह सीधा दुकान पहुंचा. लारेन भी उस के साथ

थी. लारेन ने ऐसा दिखावा किया जैसे वह क्रिस्टी की बीवी हो और वह नासेर को पहचानती ही न हो.

मगर उसे देख कर नासेर का रंग उड़ गया.

क्रिस्टी ने उस से पूछा, ‘‘क्या तुम हमें पसंद नहीं करते?’’

नासेर संभल कर सामान्य होते हुए बोला, ‘‘नहीं, वह बात नहीं. दरअसल, आप की मित्र को देख कर मुझे किसी और का भ्रम हो गया था. आप गोरी चमड़ी के लोग न कभीकभी एकदूसरे से काफी मिलते हो.’’

‘‘मुझे भी तुम सारे मोरक्कन एकजैसे लगते हो.’’

सुन कर नासेर जोरजोर से हंसने लगा, मगर उस की घबराहट छिपी नहीं रही. क्रिस्टी ने लारेन को अभी तक नहीं बताया था कि फैमी गायब थी. मगर उस का शक एकदम पक्का हो गया कि नासेर अपराधी है. सिवा उसे हिरासत में ले कर सवालजवाब करने के, क्रिस्टी के पास दूसरा चारा नहीं बचा था.

नासेर और साफिया दोनों की इंक्वायरी अलगअलग तरीकों से की गई थी. दोनों को जरा भी शक नहीं हुआ कि यह सब तहकीकात एक ही गुत्थी को सुलझाने का प्रयास था. साफिया ने नासेर को मनोवैज्ञानिक टीचर के बारे में सब बताया मगर नासेर अपनी ही परेशानी में उलझा रहा.

लारेन को देखने के बाद वह बदहवास हो गया था. हालांकि लारेन ने उसे जरा भी यह एहसास नहीं होने दिया कि वह उसे पहचानती है. साफिया से बहाना बना कर वह अगले दिन चंपत हो गया. साफिया अपने दूर के किसी रिश्तेदार को दुकान खोलने के लिए कह कर स्वयं अपनी दुकान में चली गई.

क्रिस्टी इस के लिए तैयार था. जिस टे्रन से नासेर भागा वह उसी पर चढ़ गया. उस की तैनात की हुई पुलिस फोर्स ने उसे नासेर के स्टेशन पर गाड़ी पकड़ने की इत्तला तुरंत दे दी थी. अगले स्टेशन पर क्रिस्टी उस में चढ़ा और ऐसा दिखाया, जैसे यह इत्तफाक हो. नासेर उसे देख कर बेबसी से मुसकराया और उस से पूछा कि आप कहां तक जाएंगे?

क्रिस्टी ने कहा कि जहां तक यह टे्रन जाएगी.

मुझे तो पास ही जाना है, कह कर नासेर फटाफट अगले ही स्टेशन पर उतर गया.

मगर जैसे ही वह उतरा, क्रिस्टी ने इंटरकाम पर पुलिस को आगाह कर दिया. लंदन के बाहरी इलाकों में छोटे शहरों में उतरने वाले इक्केदुक्के लोग ही होते हैं. नासेर का पीछा करना आसान नहीं तो दुष्कर भी नहीं था.

State Of Siege Temple Attack Review: निराश करती हैं अक्षरधाम हमले पर बनी ये फिल्म

रेटिंगः दो़ स्टार

निर्माता: अभिमन्यू सिंह

लेखकः  विलियम बॉर्थविक और सिमॉन

फैंटाउजो

निर्देशकः केन घोष

कलाकारः अक्षय खन्ना, विवेक दहिया, प्रवीन डब्बास, समीर सोनी, गौतम रोड़े,मीर

सरवर,मंजरी फणनीस, अक्षय ओबेरॉय और अभिमन्यु सिंह

अवधि: एक घंटा पचास मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5

2002 में गुजरात के अक्षर धाम मंदिर पर जो आतंकवादी हमला हुआ था, उसी सत्य घटनाक्रम से प्रेरित होकर निर्देशक केन घोष व क्रिएटर अभिमन्यू सिंह एक फिल्म ‘‘स्टेट आफ सीएज’’लेकर आए हैं. यॅूं तो निर्माता व निर्देशक की तरफ से इसे काल्पनिक कहानी बतायी गयी है.

कहानीः

फिल्म की कहानी 2001 से शुरू होती है जहां एनएसजी कमांडो मेजर हनुत सिंह(अक्षय खन्ना) अपनी टीम के साथ मिनिस्टर की बेटी को बचाने जाते हैं. रोहित बग्गा (विवेक दहिया) जो हनुत को खास पसंद नहीं करता, जबकि समीर (गौतम रोड़े) हनुत का अच्छा दोस्त है.यहां मंत्री की बेटी को बचाने की मुहीम में अपने वरिष्ठ कर्नल एम.एस. नागर (प्रवीण डबास) के आदेश को नजरंदाज एनएसजी कमांडो मेजर हनुत सिंह पाकिस्तानी आतंकवादी अबू हाजमा को जिंदा पकड़ने के चक्कर में अपने एक साथी को खोने के साथ ही खुद घायल हो गए थे. अबू हाजमा को पकड़ नही पाए,जबकि बिलाल भारत की जेल पहुंच चुका था.अब अबू हाजमा नए आतंकवादियों को तैयार कर 2002 में फारुख उमर, हनीफ सहित चार लोगों को गुजरात में अहमदाबाद के कृष्णा धाम मंदिर पर हमला करने भेजता है, उसी वक्त वहीं एक होटल में मंत्री चोकसी का कार्यक्रम हो रहा है, जहां सारी एनएसजी फौज लगी हुई है. मंदिर के अंदर पुजारी, सैकड़ों भक्त के साथ साथ मंदिर के ऑडीटोरियम में स्कूल के कई बच्चे व षिक्षक मौजूद हैं. तभी चार आतंकवादी पहुंचकर अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगते हैं. चारों आतंकवादी मंदिर के अंदर अलग अलग जगह पर पहुंचकर लोगों को जीवित बचे लोगों को बंधक बना लेते हैं.

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उसके बाद पाकिस्तान से अबू हाजमा भारत सरकार से बिलाल की रिहाई की मांग करता है. कृष्णा धाम मंदिर में लोगों के मरने की खबरें सुनकर भारत के प्रधानमंत्री बिलाल को छोड़ने का ऐलान कर देते हैं.उधर एनएसजी कमांडों के मेजर हनुत सिंह जिद करके कुछ साथियों के साथ कृष्णा धाम मंदिर पहुॅचकर कुछ लोगों को जिंदा मंदिर से बाहर निकालने में कामयाब होने के साथ ही दो आतंकवादियों को खत्म करने में सफल होते हैं. पर फिर मेजर हनुत सिंह घायल हो जाते है.कर्नल सिंह अब हनुत सिंह की जगह दूसरे कमांडो को नेतृत्व करने की जिम्मेदारी देते है.मगर हालात बिगड़ते देख हनुत सिंह पुनः मंदिर के अंदर जाते हैं.अंततः अन्य दो आतंकवादी मारे जाते हैं, उधर उरी के आसपास के एलओसी पर बिलाल को छोड़ने गए सैनिकों इसकी खबर मिलती है, तो वह बिलाल से वापस चलने के लिए कहते हंै,पर वह पाकिस्तान की तरफ भागता है, तब एक सैनिक उसे मौत के घाट उतार देता है.

लेखन व निर्देशन:

लेखन व निर्देशन की अति कमजोर कड़ियों के चलते फिल्म अपनी दमदार शुरूआत के चंद मिनटों बाद ही फुसफुसा पटाखा हो जाती है. फिल्म में निर्देशक केन घोष पूरी तरह से भ्रमित है,ऐ सा नहीं कहा जा सकता बल्कि उन्होंने जानबूझकर ऐसे दृष्य गढ़े हैं. कहानी जब गुजरात पहुंचती है, तो लेखक व निर्देषक ने दिखाया है कि मंदिर के अंदर आतंकवादियों के चंगुल से अपने बेटे को बचाने के लालच में मंदिर प्रांगण के पास दुकान चला रहा एक हिंदू पिता आतंकवादियों को एनसीजी कमांडों की हर गतिविधि की जानकारी फोन पर देते हैं.

आखिर इस तरह के दृश्यों से वह क्या संकेत देना चाहते हैं? इतना ही नही भारत के किसी भी एनएसजी कमांडो के शौर्य के सामने एक भी आतंकवादी ठहर नही सकता, मगर फिल्मकार ने एक आतंकवादी के सामने मेजर हनुत सिंह को कमजोर दिखाया,क्या इस पर हर किसी को आपत्ति होनी चाहिए? फिल्म में भारत व पाकिस्तान की राजनीति को भी गलत अंदाज में पेष किया गया है. 19 वर्ष पहले अक्षरधाम पर हुए आतंकवादी हमले ने पूरे देष में भूकंप ला दिया था,मगर केन घोष ने उस पर फिल्म तो बनायी,मगर डरकर ‘अक्षरधाम’को ‘कृष्णधाम’ कर दिया. ऐसा क्यो?इसकी एक मात्र वजह यह है कि वर्तमान समय में हमारे फिल्मकार सच कहने की हिम्मत खो चुके हैं.2002 के आतंकवादी हमले मे तीस लोगो ने अपनी जिंदगी खोयी थी, ऐसे में कोई भी फिल्मकार इसे कमतर कैसे आंका सकता है. तभी तो केन घोष ने मध्य का रास्ता चुनते हुए फिल्म में ‘अच्छा मुस्लिम’और ‘देषद्रोही हिंदू’को मिश्रित कर दिया. फिल्म में मंदिर का एक मुस्लिम सफाई कर्मी मोहसिन (चंदन रॉय), का आतंकवादियो के सामने दिया गया मानवता का भाषण सिर्फ निराष ही करता है. मोहसिन, एक हत्यारे (अभिलाष चैधरी) से कहता है- ‘‘मैं एक मुसलमान हूं लेकिन मैं आपके जैसा नहीं हूं,’’ फिल्म ‘‘स्टेट आफ सीजः मंदिर अटैक’’की षुरूआत में जब एक वतन परस्त कमांडो मेजर हनुत सिंह अपने वरिष्ठ के आदेष का उल्लंघन कर अपने चंद साथियों के सेाथ मिशन पर आगे बढ़ता है, तो लगता है कि फिल्म सही दिशा में जा रही है. मगर दस मिनट बाद कहानी गुजरात पहुंचते ही फिल्म धीरे धीरे बिखरती चली जाती है.

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फिल्म का क्लायमेक्स बहुत ढीला है. फिल्म के कुछ दृश्य अविश्वसनीय है. मसलन-एनएसजी कमांडो जब अपनी ड्यूटी पर है, तब वह अपना मोबाइल फोन साथ में ले जाते हैं और अपनी पत्नी से मोबाइल पर बात करते हैं. पर क्या ऐसा संभव है? कहानी सत्य घटनाक्रम पर आधारित होने के बावजूद उसका पूरा मुंबई मसाला फिल्मीकरण कर दिया गया है. लेखक व निर्देशक ने हनुत सिंह सहित कई किरदारों को सही ढंग से गढ़ा ही नही है.फिल्म में लोग मरते हैं,गोलियां चलती हैं, मगर दर्शकों के मन में आतंकवादियों के प्रति गुस्से का भाव नही पैदा कर पाती.

फिल्म में मानवता का संदेष भी दिया गया है.मंदिर का ही एक पुजारी अंत में मृत आतंकवादियों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए एक संवाद कहते हैं-‘‘हिंसा हर समाज को तोड़ने का काम करती है.’’मगर यह फिल्म सांप्रदायिका संघर्ष रोकने का कोई संदेश नहीं देती.

अभिनयः

एनएसजी कमांडो हनुत सिंह के किरदार में अक्षय खन्ना ने बेहतरीन अभिनय किया है.मगर लेखक व निर्देषक ने उनके चरित्र को सही ढंग से गढ़ा ही नही. अक्षय खन्ना उत्कृष्ट कलाकार हैं.ऐसे में उन्हे किरदार चयन करते समय सावधानी बरतनी चाहिए. अक्षय खन्ना के अलावा फिल्म के सभी कलाकारों ने महज अपनी ड्यूटी ही निभायी है.

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