लोग हैं कि जीने नहीं देते: बॉलीवुड एक्ट्रेसेस को टारगेट करते लोग

साल 1991 में आई फिल्म ‘लम्हे’ एक ऐसी प्रेम कहानी थी, जिसे भारतीय दर्शकों ने सिरे से नकार दिया था. वजह, हीरो अनिल कपूर श्रीदेवी से प्यार करता है, पर वह किसी दूसरे आदमी से शादी कर लेती है.

बाद में जब श्रीदेवी और उस के पति की मौत हो जाती है तो उन की बेटी, जो श्रीदेवी ही है, अपने से कहीं ज्यादा बड़े अनिल कपूर से प्यार करने लगती है. पहले तो अनिल कपूर को श्रीदेवी की यह हरकत बचकानी लगती है, पर आखिर में वह उस से शादी कर लेता है.

दर्शकों को यही बेमेल प्यार रास नहीं आया और उन्होंने यश चोपड़ा की इस बेहतरीन फिल्म को उतनी ज्यादा कमाई नहीं करने दी, जितनी उम्मीद की जा रही थी. हालांकि, इस फिल्म को नैशनल अवार्ड के साथसाथ 5 फिल्म फेयर अवार्ड भी मिले थे.

यह तो हुई फिल्मी बात और कई साल पुरानी भी, पर आज जब हम और ज्यादा एडवांस हो गए हैं, तब भी ऐसे किसी बेमेल प्यार को मन से स्वीकार नहीं कर पाते हैं.

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अर्जुन कपूर और मलाइका अरोड़ा को ही ले लें. मलाइका अरोड़ा तलाकशुदा हैं और उम्र में अर्जुन कपूर से बड़ी हैं, इस के बावजूद वे दोनों साथ हैं. पर जनता है कि उन्हें जीने नहीं देती है. हाल ही में जब वे दोनों एक फोटो में साथसाथ दिखे, तो लोगों ने उन्हें सोशल मीडिया पर खूब भलाबुरा कहा.

दरअसल, किसी ने अर्जुन कपूर और मलाइका अरोड़ा के एक फोटो को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया था, जिस में वे दोनों कार में बैठते दिख रहे थे. इस फोटो पर लोगों ने इतने घटिया कमैंट्स किए कि बहुत से मैसेज को तो पढ़ा भी नहीं जा सकता.

इस जोड़े को ‘चप्पल से मारने’ की बात लिखी गई, तो कुछ ने अर्जुन कपूर को ‘घर तोड़ू’, ‘बुड्ढी के साथ अर्जुन बुड्ढा हो गया’, ‘मांबेटे’ जैसे घटिया कमैंट्स किए.

भले ही मलाइका अरोड़ा बिंदास हो कर अपनी जिंदगी जीती हैं और लोगों की वाहियात बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं देती हैं, पर उन में भी एक औरत का दिल है और साथ ही वे मां भी हैं, इसलिए ऐसी बातों का उन के मन पर बुरा असर जरूर पड़ता है, तभी तो उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि आज भी भारतीय समाज में तलाकशुदा औरत का आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है, जबकि मर्दों के लिए नए रिश्ते में जाना और नौर्मल जिंदगी जीना बहुत आसान है.

मलाइका अरोड़ा की यह बात सौ फीसदी सच है कि भारतीय दकियानूसी समाज में किसी तलाकशुदा औरत का अपने मन से जिंदगी गुजरना बड़ा ही मुश्किल काम है. पर हमारे यहां तो उस औरत को भी ताने सुना दिए जाते हैं, जो न तो तलाकशुदा है और न ही बिना शादी किए किसी मर्द के साथ रहती है.

खूबसूरत हीरोइन प्रियंका चोपड़ा की शादी को भी लोग आज तक नहीं पचा पाए हैं. उन्होंने हौलीवुड के पौप स्टार और फिल्म कलाकार निक जोनस से शादी की थी, जो उम्र में उन से काफी छोटे हैं. लोगों को यह बात भी हजम नहीं हुई और उन्होंने उन्हें ‘ग्लोबल स्कैम आर्टिस्ट’ कहा, तो कुछ ने इस जोड़ी की ‘मांबेटे’ से तुलना कर दी. कुछ ने तो यह तक कहा कि पीसी यानी प्रियंका चोपड़ा ने निक जोनस के ‘पैसे देख कर’ शादी की है.

ऐसी ही कई ऊलजुलूल बातों पर प्रियंका चोपड़ा का कहना है कि अपने से उम्र में छोटे लड़के से शादी करने पर उन्हें आज भी बातें सुनने को मिल जाती हैं. फिलहाल वे खुद को इस से प्रभावित नहीं होने देतीं और अपने व निक के रिश्ते को बेहतर बनाने पर फोकस करती हैं.

ऐसा क्यों होता है कि समाज किसी तलाकशुदा या उम्र में बड़ी औरत या लड़की को अपनी मरजी से जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं देता है, जबकि कानून उन के साथ होता है? यहां पर आजादी से मतलब यह है कि लोगों को दूसरों की जिंदगी में  झांकने की इजाजत किस ने दी?

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इस सवाल का जवाब यह है कि लोग खासकर मर्द समाज किसी ऐसी औरत या लड़की को हंसते हुए नहीं देख सकता, जो उन की नजर में ‘पवित्र’ नहीं है. विधवा, तलाकशुदा या उम्र में बड़ी लड़की को इतने ज्यादा गुणों वाला जीवनसाथी कैसे मिल सकता है, यह बात मर्दों को हजम ही नहीं होती है.

एक और मामला देखते हैं, जिस में लड़की न तलाकशुदा है, न विधवा है और न ही उस ने अपने से कम उम्र के मर्द से शादी की है, पर फिर भी लोगों ने सोशल मीडिया पर खूब खरीखोटी सुनाई.

टैलीविजन सीरियल के बाद फिल्मों में अपनी जगह बनाने वाली अंकिता लोखंडे को तो आप जानते ही होंगे, जो एक समय में फिल्म कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रैंड रही थीं और उन की मौत के बाद वे बहुत दुखी भी हुई थीं.

तब लोगों ने उन की खूब तारीफ की थी, पर बाद में जब अंकिता ने अपने बौयफ्रैंड के साथ सोशल मीडिया पर कुछ तसवीरें शेयर कीं, तब लोगों ने उन्हें आड़े हाथ लेते हुए कहा, ‘सुशांत को इतनी जल्दी भूल गई’, ‘इसलिए सुशांत ने छोड़ दिया था’, ‘सब नौटंकी थी क्या?’ और भी न जाने क्याक्या सुनाया था.

अगर आज अंकिता लोखंडे अपने प्रेमी के साथ खुश हैं, तो सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अंकिता का उन के लिए शोक मनाना नौटंकी कैसे हो सकता है? वैसे भी तब उन दोनों के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं था कि वे किसी तरह की नौटंकी करतीं.

उन्होंने सुशांत के साथ अच्छाबुरा वक्त गुजारा था, जिस की यादें वे जिंदगीभर नहीं भूलेंगी और आगे भी सुशांत को ले कर बोलने के लिए आजाद हैं और उन की यह आजादी सोशल मीडिया के चंद चिरकुट छीन नहीं सकते हैं.

ये वे ही लोग होते हैं, जिन की नजर में कोई मर्द बुढ़ापे में भी सेहरा बांध ले तो वह किसी अबला का सहारा कहलाता है. दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, कबीर बेदी, मिलिंद सोमन, शाहिद कपूर, संजय दत्त में क्या समानता है? इन सब की पत्नी उम्र में इन से काफी छोटी हैं. पर किसी मर्दवादी ने चूं तक नहीं की. मिलिंद सोमन और अंकिता कंवर में तो 29 साल का अंतर है, फिर भी वे दोनों एक हुए.

दिक्कत यह है कि लोग अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह सम झ लेते हैं कि अब उन्हें किसी के बारे में कुछ  भी लिखनेबोलने का हक हो गया है. वे सोशल मीडिया को अपने बाप की जागीर मान लेते हैं और जानबू झ कर ऐसा लिखते हैं, जो सामने वाले को चुभे. उन की भाषा भी वाहियात होती है.

जब कभी कोई आहत सैलेब्रिटी उन्हें जवाब देता है या अपना गुस्सा जाहिर करता है तो उन के मानो पैसे वसूल हो जाते हैं. उन्हें लगता है कि वे खुद सैलेब्रिटी बन गए हैं, बदले में चार गालियां पड़ गईं तो क्या फर्क पड़ता है.

पर यह सब होता क्यों है? क्यों लोग फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर वगैरह पर अपनी भड़ास निकालते हैं?

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दरअसल, अगर हम अपनी पौराणिक किताबों को खंगालेंगे तो पता चलेगा कि यह तो हमेशा से होता आया है. ‘महाभारत’ में द्रौपदी को चौसर के खेल में बेच दिया जाता है, तो ‘रामायण’ में एक अदना से आदमी के कहने पर राम अपनी पत्नी सीता को दोबारा से अकेली वन में भेज देते हैं.

बहुपत्नी का तब रिवाज था. हारा हुआ राजा अपनी बेटी का ब्याह जीते हुए राजा से कर देता था, फिर चाहे उस की उम्र लड़की से कितनी ही ज्यादा क्यों न हो. बाली ने तो अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी पर ही कब्जा कर लिया था.

इन बड़ीबड़ी किताबों में विधवा, बां झ औरतों को दुखभरी जिंदगी जीनी पड़ती थी. किसी ने व्यभिचार किया तो सजा मर्द के बजाय औरत को दी जाती थी. ऐसी किताबों का आम जनता पर इतना गहरा असर पड़ा कि भारत में कुछ समय पहले तक विधवा विवाह को अच्छा नहीं माना जाता था. कहींकहीं तो उन्हें पति की लाश के साथ जबरन सती कर दिया जाता था, मतलब चिता में जिंदा  झोंक दिया जाता था. बां झ को सामाजिक कामों से दूर रखा जाता था और उन को ‘डायन’ प्रचारित कर मार दिया जाता था.

आज भी भारत के कुछ राज्यों में बाल विवाह आम है, जहां दो बच्चों को उस उम्र में एकदूसरे से बांध दिया जाता है, जब उन्हें भाईबहन के अलावा किसी और रिश्ते की पहचान तक नहीं होती है.

यही वजह है कि जब कोई औरत अपने मन के मुताबिक जिंदगी गुजारना चाहती है तो लोग उस की इज्जत की धज्जियां उड़ाने में लग जाते हैं. फिर वे यह नहीं देखते कि खुद समाज में उन की क्या औकात है. जिन्हें अपने घर और समाज में कोई नहीं पूछता, वे ही सोशल मीडिया पर तीसमार खां बनते हैं.

हमें तो फख्र होना चाहिए अर्जुन कपूर, निक जोनस के साथसाथ उन तमाम मर्दों पर, जो किसी औरत के अतीत को जान कर भी उन्हें अपनी गर्लफ्रैंड, जीवनसाथी बनाते हैं और मर्द व औरत के कद को बराबर कर देते हैं.

GHKKPM: सई की वजह से भवानी छोड़ेगी घर, आएगा धमाकेदार ट्विस्ट

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में इन दिनो हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. शो में नए-नए ट्विस्ट आ रहे है, जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है.

शो के बिते एपिसोड मे दिखाया गया कि विराट (Neil Bhatt) सई का दोस्त  आजिंक्य को लेकर काफी परेशान हो जाता है. वह सई को समझाता है कि शादी होने के बाद सई को आजिंक्य से दूर रहना चाहिए. सई इस बात से चिढ़ जाती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में नया ट्विस्ट आने वाला है.  आइए जानते हैं कहानी के नए एपिसोड के बारे में.

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शो में दिखाया जा रहा है कि पाखी, विराट और सई को साथ देखकर पाखी जल-भून जाती है.  शो के अपकमिंग एपिसोड में यह दिखाया जाएगा कि सई के झूठ बोलने की वजह से घर के लोग सई को खूब सुनाएंगे. निनाद आरोप कहेगा कि एक दिन सई पूरे परिवार को अपनी उंगली पर नचाएगी.

 

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वह ये भी कहेगा कि वो अब सई के साथ एक छत के नीचे नहीं रह सकता. वह किसी वृद्ध आश्रम में चला जाएगा. तो वहीं भवानी और ओमकार भी निनाद के बात से सहमत हो जाएंगे. निनाद को लगेगा कि घर का कोई न कोई सदस्य उसे रोक ही लेगा लेकिन ऐसा नहीं होने वाला है.

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शो के अपकमिंग एपिसोड में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सई की वजह से भवानी, ओमकार और निनाद घर छोड़ देंगे?

ऑक्सीजन की उपलब्धता के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग में यूपी ने पकड़ी रफ्तार

प्रदेश में कोरोना की तीसरी लहर को ध्‍यान में रखते हुए सरकार ने अस्‍पतालों में सभी पुख्‍ता इंतजाम कर लिए हैं. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के हर जिले में एक-एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल में ऑक्सीजन जेनरेटर्स युद्धस्‍तर पर लगाए जा रहे हैं. अस्पतालों में नौ हजार से अधिक पीडियाट्रिक आईसीयू (पीकू) बेड तैयार किए जा चुके हैं. योगी सरकार ने निर्णयों से प्रदेश में अब कोरोना की दूसरी लहर पूरी तौर पर नियंत्रित है. दूसरे प्रदेशों के मुकाबले ‘योगी के यूपी मॉडल’ से संक्रमण पर तेजी से लगाम लगी है. कम समय में कोरोना वायरस के नए वेरिएंट जीनोम सिक्वेंसिंग की तेजी से जांच की जा रही है.

केजीएमयू लखनऊ में 109 सैम्पल की जीनोम सिक्वेंसिंग कराई गई. प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक 107 सैंपल में कोविड की दूसरी लहर वाले पुराने डेल्टा वैरिएंट की पुष्टि ही हुई है, जबकि 02 सैम्पल में कप्पा वैरिएंट पाए गए. दोनों ही वैरिएंट प्रदेश के लिए नए नहीं हैं. प्रदेश में ट्रेसिंग से संक्रमण का प्रसार भी न्यूनतम स्‍तर पर है.

जीनोम सिक्वेंसिंग की सुविधा से लैस केन्‍द्र की होगी स्‍थापना

कोरोना वायरस के परीक्षण के लिए प्रदेश में जीनोम सिक्वेंसिंग की सुविधा का लगातार विस्‍तार किया जा रहा है. जल्‍द ही प्रदेश में इस सुविधा से लैस केंद्र की स्थापना भी की जाएगी. सरकार ने पहले ही प्रदेश में जीनोम  सिक्वेंसिंग के दायरे को बढ़ाते हुए बीएचयू,  केजीएमयू,  सीडीआरआई,  आईजीआईबी, राम मनोहर लोहिया संस्‍थान में जीनोम परीक्षण की व्यवस्था की है.

15 अगस्‍त तक यूपी में 536 ऑक्‍सीजन प्‍लांट होंगें क्रियाशील 

यूपी ऑक्सीजन उपलब्धता में आत्मनिर्भर हो रहा है. प्रदेश में 536 ऑक्‍सीजन प्‍लांट पर तेजी से काम किया जा रहा है जिसमें से अब तक  146 ऑक्सीजन प्लांट प्रदेश में क्रियाशील हो चुके हैं. प्रदेश में ऑक्सीजन जेनरेटर के जरिए 15 फीसदी ऑक्सीजन की 3300 बेडों पर आपूर्ति हो रही है. विभिन्न औद्योगिक समूहों की ओर से ऑक्सीजन प्लांट, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्‍ध कराने में  मदद की गई है. अनेक औद्योगिक समूहों व इकाइयों ने ‘हेल्थ एटीएम’ उपलब्ध कराने के लिए आगे आए हैं. इन अत्याधुनिक मशीनों के जरिए से लोग बॉडी मास इंडेक्स, ब्लड प्रेशर , मेटाबॉलिक ऐज, बॉडी फैट, हाईड्रेशन, पल्स रेट, हाइट, मसल मास, शरीर का तापमान, शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा, वजन सहित कई पैरामीटर की जांच कर सकते हैं.

जनसंख्या संतुलन के लिए समुदाय केंद्रित कार्यक्रमों की है जरूरत: सीएम योगी

करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में जनसंख्या स्थिरीकरण की जरूरतों को देखते हुए, राज्य सरकार नई जनसंख्या नीति घोषित करने वाली है. वर्ष 2021-30 की अवधि के लिए प्रस्तावित नीति के माध्यम से एक ओर जहां परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत जारी गर्भ निरोधक उपायों की सुलभता को बढ़ाया जाना और सुरक्षित गर्भपात की समुचित व्यवस्था देने की कोशिश होगी, वहीं, उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से नवजात मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर को कम करने, नपुंसकता/बांझपन की समस्या के सुलभ समाधान उपलब्ध कराते हुए जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रयास भी किए जाएंगे.

नवीन नीति में एक अहम बिंदु 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था करना भी है. 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नवीन जनसंख्या नीति 2021-30 जारी करेंगे.

गुरुवार को लोकभवन में नवीन जनसंख्या नीति 2021-30 के संबंध में प्रस्तुतिकरण का अवलोकन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि, आबादी विस्तार के लिए गरीबी और अशिक्षा बड़ा कारक है. कतिपय समुदाय में भी जनसंख्या को लेकर जागरूकता का अभाव है. ऐसे में समुदाय केंद्रित जागरूकता प्रयास की जरूरत है. प्रदेश की निवर्तमान जनसंख्या नीति 2000-16 की अवधि समाप्त हो चुकी है. अब नई नीति समय की मांग है.

प्रस्तुतिकरण के अवलोकन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ सभी जरूरी प्रयास किए जाएं.जागरूकता प्रयासों के क्रम में उन्होंने स्कूलों में “हेल्थ क्लब” बनाये जाने के निर्देश भी दिए. साथ ही, डिजिटल हेल्थ मिशन की भावनाओं के अनुरूप नवजातों, किशोरों और वृद्धजनों की डिजिटल ट्रैकिंग की व्यवस्था के भी निर्देश दिए. उन्होंने कहा कि नई नीति तैयार करते हुए सभी समुदायों में जनसांख्यकीय संतुलन बनाये रखने, उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं की सहज उपलब्धता, समुचित पोषण के माध्यम से मातृ-शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर तक लाने का प्रयास होना चाहिए. नई नीति के उद्देश्यों में सतत विकास लक्ष्य के भावना निहित हो.

इससे पहले अपर मुख्य सचिव चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, अमित मोहन प्रसाद ने मुख्यमंत्री को बताया कि प्रस्तावित जनसंख्या नीति प्रदेश में एनएफएचएस-04 सहित अनेक रिपोर्ट के अध्ययन के उपरांत उपरांत तैयार की जा रही है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-05 की रिपोर्ट जल्द ही जारी होने वाली है.  नवीन नीति जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रयासों को तेज करने वाली होगी. इसमें 2026 और 2030 तक के लिए दो चरणों में अलग-अलग मानकों पर केंद्रित लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं.

पहली महिला Hawker अरीना खान उर्फ पारो

अगर इंसान चाह ले तो उस के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. चाहे वह महिला हो या पुरुष. आज महिलाएं वे सारे काम बखूबी कर रही हैं, जिन पर कभी केवल पुरुष अपना अधिकार समझता था. जमीन से ले कर आसमान तक महिलाएं पुरुषों को मात दे रही हैं. ऐसा ही काम जयपुर की अरीना खान उर्फ पारो ने भी किया है. उन्होंने जो काम किया है, उस की बदौलत आज वह भारत की पहली महिला हौकर मानी जा रही है.

जिस समय पूरा शहर मस्ती भरी नींद में सो रहा होता था, उसी समय सर्दी हो या गरमी या फिर बरसात, 9 साल की अरीना खान उर्फ पारो सुबह के 4 बजे उठ जाती और फिर अपने नन्हेनन्हे पैरों से साइकिल के बड़ेबड़े पैडल मारते हुए राजस्थान के शहर जयपुर के गुलाब बाग सेंटर पर पहुंच जाती थी. गुलाब बाग के सेंटर से अखबार ले कर वह बांटने के लिए निकल जाती. पिछले 20 सालों से उस का यह सिलसिला जारी है.

9 साल की उम्र में पारो ने भले ही यह काम मजबूरी में शुरू किया था, पर आज इसी काम की वजह से वह देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में जानी जाती है. एक तरह से यह काम आज उस की पहचान बन गया है. अपने इसी काम की बदौलत आज वह देश की पहली महिला हाकर बन गई है. पारो जिन  लोगों तक अखबार पहुंचाती है, उन में जयपुर का राज परिवार भी शामिल है.

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अरीना खान की 7 बहनें और 2 भाई हैं. मातापिता को ले कर कुल 11 लोगों का परिवार था. इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी उस के पिता सलीम खान उठाते थे. इस के लिए वह सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे. जयपुर के गुलाब बाग स्थित सेंटर पर जा कर अखबार उठाते और जयपुर के बड़ी चौपड़, चौड़ा रास्ता, सिटी पैलेस, चांद पुल, दिलीप चौक, जौहरी बाजार और तिरपौलिया बाजार में घूमघूम कर अखबार बांटते थे.

इस के बाद दूसरा काम करते थे. 12 से 14 घंटे काम कर के किसी तरह वह परिवार के लिए दो जून की रोटी और तन के कपड़ों की व्यवस्था कर रहे थे.

अरीना उस समय 9 साल की थी, जब उस के पिता की तबीयत खराब हुई. दरअसल उन्हें बुखार आ रहा था. बुखार आता तो वह मैडिकल स्टोर से दवा ले कर खा लेते और अपने काम के लिए निकल जाते. उन के पास इतना पैसा नहीं था कि वह अपना इलाज किसी अच्छे डाक्टर से कराते. इस का नतीजा यह निकला कि बीमारी उन पर हावी होती गई. वह साधारण बुखार टाइफाइड बन गया.

एक तो बीमारी, दूसरे मेहनत ज्यादा और तीसरे खानेपीने की ठीक से व्यवस्था न होने की वजह से उन का शरीर कमजोर होता गया. एक दिन ऐसा भी आया जब सलीम खान को चलनेफिरने में परेशानी होने लगी.

अगर सलीम काम पर न जाते तो परिवार के भूखों मरने की नौबत आ जाती. उन्हें अपनी नहीं, अपने छोटेछोटे बच्चों की चिंता थी. वह अपनी दवा कराए या बच्चों का पेट भरे. जब वह चलनेफिरने से भी मजबूर हो गए तो 9 साल की अरीना अपने अब्बू के साथ अखबार बंटवाने में उन की मदद के लिए जाने लगी. वह पिता की साइकिल में पीछे से धक्का लगाती और अखबार बंटवाने में उन की मदद करती.

किसी तरह घर की गाड़ी चल रही थी कि अचानक एक दिन अरीना के परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा. बीमारी की वजह से उस के पिता सलीम खान की मौत हो गई.

अब कमाने वाला कोई नहीं था. ऐसी कोई जमापूंजी भी नहीं थी कि उसी से काम चलता. ऐसे में सहानुभूति जताने वाले तो बहुत होते हैं, लेकिन मदद करने वाले कम ही होते हैं. फिर किसी की मदद से कितने दिन घर चलता.

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पिता के मरते ही मात्र 9 साल की नन्ही अरीना समझदार हो गई. उस ने पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली. इस की वजह यह थी कि उसे अपने पिता के अखबार बांटने वाले काम की थोड़ीबहुत जानकारी थी. इस के अलावा वह और कुछ न तो करने के लायक थी और न ही कुछ कर सकती थी.

पारो को पता था कि कहां से अखबार उठाना है और किसकिस घर में देना है. फिर क्या था अरीना उर्फ पारो भाई के साथ गुलाब बाग जा कर पेपर उठाती और घरघर जा कर पहुंचाती.

इस के लिए उसे सुबह 4 बजे उठना पड़ता था. घरघर अखबार पहुंचा कर उसे घर लौटने में 9, साढ़े 9 बज जाते थे.

अरीना जयपुर के गुलाब बाग से अखबार उठा कर चौपड़, चौड़ा रास्ता, सिटी पैलेस, चांद पुल, दिलीप चौक, जौहरी बाजार, तिरपौलिया बाजार इलाके में घरघर जा कर अखबार पहुंचाती थी. इस तरह उसे लगभग 7 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता था. वह करीब सौ घरों में अखबार पहुंचाती थी.

शुरूशुरू में अरीना को इस काम में काफी परेशानी हुई. क्योंकि वह 9 साल की बच्ची ही तो थी. उतनी दूर चल कर वह थक तो जाती ही थी, साथ ही उसे यह भी याद नहीं रहता था कि उसे किसकिस घर में अखबार डालना है.

यही नहीं, वह रास्ता भी भूल जाती थी. इस के अलावा उसे इस बात पर भी बुरा लगता था, जब छोटी बच्ची होने की वजह से कोई उसे दया की दृष्टि से देखता था.

बुरे दिनों में मदद करने वाले कम ही लोग होते हैं. फिर भी अरीना के पिता को जानने वाले कुछ लोगों ने उस की मदद जरूर की. इसलिए अरीना सुबह जब अखबार लेने गुलाब बाग जाती तो उसे लाइन नहीं लगानी पड़ती थी. उसे सब से पहले अखबार मिल जाता था. इस के बावजूद उसे परेशान तो होना ही पड़ता था. क्योंकि अखबार बांटने के बाद उसे स्कूल भी जाना होता था.

स्कूल जाने में उसे अकसर देर हो जाती थी. क्योंकि वह अखबार बांट कर 9, साढ़े 9 बजे तो घर ही लौटती थी. उस के स्कूल पहुंचतेपहुंचते एकदो पीरियड निकल जाते थे. उस का पढ़ाई का नुकसान तो होता ही, लगभग रोज ही प्रिंसिपल और क्लास टीचर की डांट भी सुननी पड़ती थी.

उस समय अरीना 5वीं में पढ़ती थी. जब इसी तरह सालों तक चलता रहा तो नाराज हो कर प्रिंसिपल ने उस का नाम काट दिया. इस के बाद अरीना एक साल तक अपने लिए स्कूल ढूंढती रही, जहां वह अपना काम निपटाने के बाद पढ़ने जा सके. वह इस तरह का स्कूल ढूंढ रही थी कि अगर वह देर से भी स्कूल पहुंचे तो उसे क्लास में बैठने दिया जाए.

आखिर रहमानी मौडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल ने उस की शर्त पर अपने यहां एडमिशन दे दिया. इस तरह एक बार फिर उस की पढ़ाई शुरू हो गई. अखबार बांटने के बाद वह एक बजे तक अपनी पढ़ाई करती.

स्कूल में अरीना की जो क्लास छूट जाती, उस की पढ़ाई अरीना को खुद ही करनी पड़ती. जिस समय अरीना 9वीं क्लास में थी तो एक बार फिर उस की और उस की छोटी बहन की पढ़ाई में रुकावट आ गई. इस की वजह थी उस की आर्थिक स्थिति.

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अखबार बांटने से उस की इतनी कमाई नहीं हो रही थी कि उस का अपना घर खर्च आराम से चल पाता. जब घर का खर्च ही पूरा नहीं होता था तो पढ़ाई का खर्च कहां से निकालती. खर्च पूरे करने के लिए उस ने एक नर्सिंगहोम में पार्टटाइम नौकरी कर ली.

अब वह सुबह उठ कर अखबार बांटती, फिर स्कूल जाती, उस के बाद नर्सिंगहोम में नौकरी करती. नर्सिंगहोम में वह शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक काम करती थी. रात को घर आ कर उसे फिर अपनी पढ़ाई करनी पड़ती. इस तरह उसे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी.

अरीना जब बड़ी हो रही थी, सुबह उसे अकेली पा कर लड़के उस से छेड़छाड़ करने लगे थे. पर अरीना इस से जरा भी नहीं घबराई. अगर कोई लड़का ज्यादा पीछे पड़ता या परेशान करता तो अरीना उसे धमका देती. अगर इस पर भी वह नहीं मानता तो अरीना उस की पिटाई कर देती. अब वह किसी से नहीं डरती थी. परिस्थितियां सचमुच इंसान को निडर बना देती हैं.

अरीना अखबार बांटने के साथसाथ पार्टटाइम नौकरी करते हुए पढ़ भी रही थी. कड़ी मेहनत करते हुए उस ने 12वीं पास कर ली. इतने पर भी वह नहीं रुकी. उस ने महारानी कालेज से ग्रैजुएशन किया, साथ ही वह कंप्यूटर भी सीखती रही.

कंप्यूटर सीखने के बाद उसे एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई. लेकिन उस ने अखबार बांटना नहीं बंद किया. सुबह उठ कर वह अखबार बांटती है, उस के बाद लौट कर नहाधो कर तैयार हो कर नौकरी पर जाती है.

इतना ही नहीं, बाकी बचे समय में वह गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं करती, बल्कि पढ़ाती भी थी. इस के अलावा कई संगठनों के साथ मिल कर गरीब बच्चों के लिए काम भी करना शुरू कर दिया.

अरीना के समाज सेवा के इन कामों को देखते हुए उसे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं. यही वजह है कि देश की पहली महिला हाकर होने के साथसाथ समाज सेवा करने वाली अरीना को राष्ट्रपति ने भी सम्मानित किया है.

अरीना को जब पता चला कि उस की मेहनत को राष्ट्रपति सम्मानित करने वाले हैं तो उसे बड़ी खुशी हुई. जिसे बयां करने के लिए उस के पास शब्द नहीं थे. उस के पैर मानो जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. पैर जमीन पर पड़ते भी कैसे, छोटी सी उम्र से अब तक उस के द्वारा किया गया संघर्ष सम्मानित जो किया जा रहा था.

अरीना की जो कल तक आलोचना करते थे, आज उसे सम्मान की नजरों से देखते हैं. शायद यह उस के संघर्ष का फल है. लोग आज अपने बच्चों को उस की मिसाल देते हैं. आज अरीना एक तरह से सेलिब्रिटी बन चुकी है. वह जहां भी जाती है, लोग उसे पहचान लेते हैं और उस के साथ सेल्फी लेते हैं.

अरीना ने जो काम कभी मजबूरी में शुरू किया था, आज वही काम उस की पहचान बन चुका है. शायद इसीलिए उस ने अपना अखबार बांटने का काम आज भी बंद नहीं किया है. अरीना की स्थिति को देखते हुए साफ लगता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. लड़कियां भी अगर चाह लें तो कोई भी काम कर सकती हैं.

‘अनुपमा’ के प्रोड्यूसर Rajan Shahi ने नई एंट्री को लेकर लगाई मुहर, नहीं होगी ‘वनराज शाह’ की छुट्टी

स्टार प्लस का पॉपुलर शो ‘अनुपमा’ लगातार सुर्खियों में छाया हुआ है. कई दिनों से खबर आ रही थी कि वनराज यानी सुधांशु पांडे (Sudhanshu Pandey) का ‘अनुपमा’ से पत्ता कटने वाला है. अब इस खबरों पर शो के प्रोड्यूसर राजन शाही (Rajan Shahi) ने चुप्पी तोड़ी है. आइए बताते हैं, क्या कहा है शो के प्रोड्यूसर ने.

‘अनुपमा’ के प्रोड्यूसर राजन शाही (Rajan Shahi)  ने कहा है कि शो में नई एंट्री जरूर होगी लेकिन इसका मलतब यह नहीं कि सुधांशु पांडे शो से बाहर हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार राजन शाही ने आगे कहा, ‘सुधांशु पांडे शो का एक अभिन्न हिस्सा हैं और वो हमारे वनराज शाह बने रहेंगे. जहां तक ​​नई एंट्री की बात है. इस शो में जल्द ही एक नया करैक्टर शामिल होगा लेकिन उसकी कास्टिंग अभी नहीं हुई है.

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उन्होंने आगे कहा कि अनुपमा शो को प्यार देने और इसे डेली लाइफ का हिस्सा बनाने के लिए मैं दर्शकों का आभारी हूं. हम दर्शकों का मनोरंजन करने में कोई कमी नहीं छोड़ेंगे. नई की एंट्री को लेकर हम जल्द ही घोषणा करेंगे.

 

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शो के प्रोड्यूसर राजन शाही ने इस खबर पर मुहर लगा दी है कि सुधांशु पांडे शो में वनराज शाह बने रहेंगे. और दर्शकों को एंटरटेन करते रहेंगे.

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सीरियल ‘अनुपमा’ की करेंट ट्रैक की बात करे तो अनुपमा, वनराज शाह को अपनी डांस अकादमी के छोटा सा कैफे खोलने के लिए बोलती है, तो काव्य को इस बात पार काफी गुस्सा आता है. और वह उसे खरी-खोटी सुनाती है. तो दूसरी तरफ इस फैसले से बा और बाबूजी काफी खुश होंते हैं क्योंकि अनुपमा उनके बेटे वनराज को सपोर्ट करती दिखाई दे रही हैं.

दिव्यांका त्रिपाठी ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ में कम उम्र के एक्टर संग करेंगी रोमांस, पढ़ें खबर

छोटे पर्दे का सुपरहिट सीरियल बड़े अच्छे लगते हैं (Bade Acche Lagte Hain) को दर्शक आज भी याद करते है. इस शो में राम यानी राम कपूर और प्रिया यानी साक्षी तंवर की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया.  हाल ही में इस शो ने 10 साल पूरे किए हैं.

कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि इस शो का सीक्वल बनने वाला है. खबरों के मुताबिक एकता कपूर ने सीरियल ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ के लिए टीवी कलाकार दिव्यांका त्रिपाठी और नकुल मेहता (Nakuul Mehta And Divyanka Tripathi) को फाइनल कर लिया है.

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इसी बीच दिव्यांका त्रिपाठी के किरदार को लेकर मिली है. एक रिपोर्ट के अनुसार इस शो में दिव्यांका त्रिपाठी एक उम्रदराज महिला का किरदार निभाने वाली हैं. और वह ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ में खुद से कम उम्र के एक्टर का साथ रोमांस करने वाली हैं.

 

बताया जा रहा था कि एकता कपूर करण पटेल को सीरियल ‘बड़े अच्छे लगते हैं 2’ में मेन लीड के तौर पर लेना चाहती हैं. इस शो में एक बार फिर से दिव्यांका त्रिपाठी और करण पटेल की जोड़ी नजर आ सकती है.

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‘ये है मोहब्बतें’ के रमन भल्ला और इशिता की जोड़ी  फैंस को बेहद पसंद आई थी. हालांकि ये भी बताया जा रहा है कि मेकर्स को करण पटेल की जगह किसी नए चेहरे की तलाश है. मेकर्स चाहते हैं कि नकुल मेहता, दिव्यांका त्रिपाठी के साथ स्क्रीन शेयर करें.

‘बड़े अच्छे लगते हैं’ के पहले सीजन में राम कपूर ने उम्रदराज बिजनेसमैन का किरदार निभाया था तो वहीं दूसरी तरफ साक्षी संवर (Sakshi Tanwar) ने कम उम्र की लड़की का किरदार निभाया था.

हकीकत- भाग 1: क्या रश्मि की मां ने शादी की मंजूरी दी?

राइटर- सोनाली करमरकर

मौसम बड़ा खुशनुमा और प्यारा था. रिमझिम बारिश की फुहार, मन को रिझाने वाली ठंडी हवा… आज यों लग रहा था, जैसे मन की सारी मुरादें पूरी होने वाली हों. गोविंद और रश्मि के प्यार को गोविंद की मां ने कुबूल कर लिया था.

गोविंद एक फाइनैंस कंपनी में मैनेजर था और रश्मि उस की जूनियर. साथ काम करतेकरते जाने कब दोनों के दिल के तार जुड़ गए और दोस्ती चाहत में बदल गई, पता ही नहीं चला.

गोविंद के बाबूजी उस के बचपन में ही गुजर गए थे. मां ने ही उसे आंखों में सपने लिए बड़ी मशक्कत से पाला था. उस ने अपनी मां को चिट्ठी लिख कर रश्मि के बारे में सब बता दिया था और उस की तसवीर भी भेजी थी. मां का जवाब उस के पक्ष में आया था. अगले हफ्ते मां खुद आने वाली थीं, अपनी होने वाली बहू से मिलने.

औफिस आने के बाद गोविंद ने जल्दी से रश्मि को अपने केबिन में बुलाया.

“क्या हुआ गोविंद?” रश्मि ने आते ही पूछा.

“रश्मि, तुम्हें तो पता ही था कि मैं ने मां को तुम्हारे बारे में बताया है. कल घर जाने के बाद मुझे उन का खत मिला,” गोविंद ने उदास हो कर कहा.

“क्या लिखा था उस खत में और तुम इतने उदास क्यों हो?” रश्मि ने घबराते हुए पूछा.

“बात ही ऐसी है रश्मि… मां ने हमेशा के लिए तुम्हें मेरे पल्ले बांधने का फैसला सुनाया है,” गोविंद ने गंभीरता से अपनी बात पूरी की.

गोविंद ने यह बात इतनी ज्यादा गंभीरता से कही थी कि पहले तो रश्मि समझ न सकी, पर जब समझी तो उस का चेहरा खुशी से खिल उठा.

“रश्मि, अब तो मां ने भी हां कह दिया है, तो तुम्हें भी अपने घर वालों से बात कर लेनी चाहिए. मैं वापस आने के बाद उन से मिलता हूं. अब तुम जाओ.

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“जानती हो न आज रात मुझे टूर के लिए निकलना है. उस के पहले अपने काम जल्दी से निबटाने हैं,” गोविंद ने वहां से तकरीबन भगाते हुए उस से कहा.

रश्मि भी गोविंद को रेलवे स्टेशन तक छोड़ने साथ गई. आते समय वह रास्तेभर सोचती रही कि शायद गोविंद ही उस के लिए बना है वरना 3 बार पक्की हुई उस की शादी टूटती नहीं. लेकिन इस बार उसे किसी तरह की अनहोनी का डर नहीं था. उस का प्यार… उस का गोविंद जो उस के साथ था.

पापा और मम्मी से किस तरह बात करे? इस बारे में रश्मि सोचती रही. उस की छोटी बहन की शादी हो चुकी थी. छोटे भाई ने भी अपनी पत्नी के साथ दूसरी जगह बसेरा बसा लिया था. अब अगर उस की शादी भी हो गई तो मम्मीपापा अकेले रहेंगे या भाई के पास रहेंगे, वह समझ नहीं पा रही थी. उसे कुछ पुराने दिन याद आ गए.

उन दिनों रश्मि घर में अकेली कमाने वाली थी. उसे जब कालेज की डिगरी मिली थी, उसी साल पापा की कंपनी बंद हो गई थी. वे सालों से उसी कंपनी में काम कर रहे थे. वे यह सदमा सह नहीं सके. वे दिनभर कमरे की छत को ताकते घर में पड़े रहते.

उस समय रश्मि के दोनों भाईबहन छोटे थे. रश्मि ने आगे बढ़ कर घर की जिम्मेदारी ली. उस ने एक नौकरी पकड़ ली. धीरेधीरे सब ‍ठीक हो गया.

शादी की तारीख भी तय हो गई, पर अचानक एक दिन लड़के वालों ने शादी तोड़ने का संदेशा भेज दिया.

“आखिर बात क्या है? आप उन के पास जा कर मिल आइए न,” मां ने बेचैन हो कर पापा से कहा.

“रिश्ता तोड़ते समय ही उन्होंने मिलने से मना कर दिया था. खैर, जाने दो. हमारी बेटी को इस से भी अच्छा लड़का मिलेगा,” पापा उन दोनों को समझाते रहे.

इस के बाद 2 बार रश्मि का रिश्ता जुड़ा और ‍फिर टूट गया. मन का बोझ बढ़ गया था. उस की जिंदगी जैसे एक ही ढर्रे पर चल रही थी, जिस में कोई रोमांचक मोड़ नहीं था.

सालभर तक तो यही सब चलता रहा और तभी अचानक कंपनी ने रश्मि का उसी शहर की दूसरी ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया. रश्मि भी एक ही जगह काम करकर के ऊब गई थी, सो वह भी खुशीखुशी दूसरी ब्रांच में चली गई.

नई ब्रांच में आना जैसे रश्मि के लिए फायदेमंद साबित हुआ. यहां की आबोहवा उसे अच्छे से रास आई. कंपनी का औफिस घर से दूर था, लेकिन बस सेवा उपलब्ध थी, इसलिए रश्मि को कोई परेशानी नहीं थी.

एक दिन अचानक रश्मि की गोविंद से मुलाकात हो गई जो वहां मैनेजर था. पहले उन दोनों की दोस्ती हुई और फिर दोस्ती चाहत में बदल गई. यह भी इत्तिफाक ही था कि अभी तक गोविंद की शादी भी नहीं हुई थी.

रश्मि अपने ही खयालों में खोई थी कि अचानक ड्राइवर ने बस को जोर से ब्रेक लगाया और वह हकीकत में लौट आई. बस में बैठेबैठे उस के खयालों में पुरानी यादें ताजा हो गई थीं. आज कितने दिनों के बाद उस का मूड अच्छा था. जिंदगी को ले कर मन में फिर से उम्मीद जागी थी.

रश्मि घर पहुंची तो मम्मी चाय बना रही थीं और पापा टैलीविजन देख रहे थे. रश्मि कपड़े बदल कर आई और मम्मी का हाथ बंटाने लगी. चाह कर भी वह मम्मी से शादी की बात नहीं कर पाई. इसी ऊहापोह में अगला दिन ‍भी निकल गया. गोविंद के आने से पहले उसे घर में बात करना जरूरी था.

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रश्मि जब शाम को औफिस से घर पहुंची, तो पापा तैयार बैठे थे और मां अच्छी सी साड़ी पहने आईने के सामने सिंगार कर रही थीं.

“सुनो, अब बेटी के ‍लिए चाय बनाने मत बैठ जाना. देर हो रही है. जल्दी करो भई,” पापा ने मम्मी को आवाज लगाई.

“सुनो बेटा, मैं और तुम्हारे पापा फिल्म देखने जा रहे हैं. तुम चाय बना कर पी लेना. और हां, रात के लिए रोटी भी सेंक लेना. हम साढ़े 9 बजे तक वापस आ जाएंगे,” कहते हुए मम्मी ने चप्पल पहनीं और बाहर निकल गईं.

रश्मि को लगा कि जब हर कोई अपनी पसंद का खयाल रख रहा है, तो उसे झिझक क्यों? अगली सुबह बड़ी हिम्मत कर के वह मम्मी के सामने खड़ी हो गई और बोली, “मम्मी, मुझे आप से कुछ कहना है. शायद आप को अटपटा लगे सुनने में… पर मैं ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है…”

यह सुन कर मम्मी इस कदर चौंकी कि उन के हाथ का कलछा नीचे गिर गया.

“मम्मी, गोविंद मेरे मैनेजर हैं और उन्होंने मेरे बारे में अपनी मां से बात कर ली है. अगले हफ्ते उन की मां हमारे घर आ रही हैं… आप से मेरा हाथ मांगने,” रश्मि ने छूटते ही सारी बात एक ही सांस में कह डाली. ‍

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