पुलिस का संरक्षण, हुक्का बार परवान चढ़ा!

छत्तीसगढ़ में प्रतिबंध के बावजूद हुक्का “बार बार” सरकार और प्रशासन के द्वारा रोके नहीं रुक रहा है. प्रदेश की बड़ी बड़ी होटलों में सफेदपोश हाथों के संरक्षण तले यह खेल बिना रुके अविराम चल रहा है. और औपचारिकता वश पुलिस प्रशासन कार्रवाई करता है फिर कुंभकरण नींद में सो जाता है. जबकि यह सबको पता है कि भूपेश बघेल सरकार ने प्राथमिक रूप से इसे गंभीरता से लेकर पूर्णरूपेण प्रतिबंध लगा दिया है. और कानून सख्त रूप से बनाकर प्रशासन को यह जिम्मेदारी दे दी है कि प्रदेश में हुक्का बार कतई नहीं चलना चाहिए. मगर कागजों में, और हकीकत में, जैसा  अंतर होता है यहां भी वही हालो हवाल है.

कोरोना वायरस के समय में जब छत्तीसगढ़ के अधिकांश शहर लाक डाउन हैं हुक्का बार चल रहे हैं . राजधानी रायपुर में 22 सितंबर की रात को पुलिस ने बारंबार शिकायत के बाद एक बड़ी होटल में कार्रवाई की और यह प्रदर्शित किया कि पुलिस हुक्का बार पर कार्रवाई कर रही है. पुलिस के अनुसार

संपूर्ण लॉकडाउन के दूसरे दिन देर रात हुक्का बार में दबिश देकर 28 युवाओं को धड़ल्ले से बेखौफ होकर कर धुआं उड़ाते पकड़ा है-

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बता दें कि मामला सिविल लाइन, रायपुर थाना क्षेत्र का है. जहां ब्लू स्काई कैफे में छुप-छुप युवाओं के पहुँचने की सूचना पुलिस चेकिंग पोईँट में मिली थी, जिसके आधार पर पुलिस नगर पुलिस अधीक्षक नसर सिद्दीकी के नेतृत्व में पुलिस ने रेड की कार्रवाई की जहाँ से 28 युवाओं को हुक्का पीते हुए पकड़ा गया .पुलिस ने पकड़े गए युवाओं के विरुद्ध भा. द. वि. की धारा 269 ,270 के साथ कोटपा एक्ट के तहत कार्रवाई की.

सभी बड़े  शहरों की यही कहानी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित बिलासपुर, रायगढ़,  दुर्ग आदि शहरों  में धड़ल्ले से जगह-जगह संचालित हो रहे हुक्का बार पर पहले ही कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार लगाम कसने की औपचारिकता पूरी कर चुकी है. कैफे, रेस्टोरेंट, होटल के नाम पर चल रहे हुक्का बार में युवक-युवतियों, महिलाओं के साथ बच्चों को प्रवेश दिए जाने का मामला विधानसभा  में उठने के बाद सरकार की ओर से गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने रोक लगाने के लिए कानून बनाने के साथ छापामार कार्रवाई करने की घोषणा कर मामले को शांत करा दिया था. मगर हुआ क्या ? आने वाले दिनों में अवैध हुक्का बारों पर सख्त कार्रवाई करने के संकेत पुलिस अफसरों ने दिये थे बीते एक साल में  अनेक हुक्का बार पर छापामार कार्रवाई की गई है. मतलब यह कि कानून बन जाने के बाद भी कानून का भय है हुक्का बार संचालकों को होटल वालों को नहीं है?

शहर और आउटर इलाके में संचालित हुक्का बार की पड़ताल करें तो  पायेंगे  होटल, रेस्टोरेंट, क्लब, मॉल में  हुक्का बार  चल रहे हैं. इसके लिए कानून का कोई  अवरोध, भय नहीं  है. धूम्रपान और नशे वाली जगहों पर नाबालिगों को प्रवेश नहीं दिए जाने के आबकारी विभाग के  निर्देश हैं. बावजूद इसके अलग-अलग फ्लेवर के तंबाकू हुक्के में डालकर परोसा जा रहा है.  और पुलिस बहुत दबाव के बाद ही नाम मात्र की कार्रवाई कर रही है.

कानून है, कानून का राज नहीं है

नशाखोरी पर लगाम लगाने के लिए छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार  ने बड़ा निर्णय लिया . राज्य सरकार ने प्रदेश भर में संचालित हुक्का बार को बंद करने का निर्णय लिया . मुख्यमंत्री निवास में आनन-फानन में कैबिनेट की बैठक कर प्रदेश के सभी हुक्का बार को कड़ाई से बंद कराने का निर्णय लिया गया . बैठक के बाद वरिष्ठ मंत्री मोहम्‍मद अकबर ने मीडिया से चर्चा में इसकी पुष्टि की. मंत्री अकबर ने कहा कि सरकार अब कड़ाई से सभी हुक्का बारों को बंद कराएगी. हुक्का बार की चपेट में युवा वर्ग आ रहा है, जिसके बाद सरकार ने इसको बंद करने का निर्णय लिया है.  मगर सरकार के बड़ी-बड़ी बातों के बाद भी कानून बनाए जाने के बाद भी, अगरचे छत्तीसगढ़ में “हुक्का बार” चल रहा है तो आखिर दोषी कौन है? और  लाख टके का सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ को पंजाब के रास्ते पर ले जाकर, यहां के युवाओं को नशे का आदी कौन बनाना चाहता है.

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युवाओं को बर्बाद कौन करना चाहता है?

छत्तीसगढ़ अंचल के सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर रमाकांत कहते हैं- कोरोना समय में जिस तरीके से राजधानी रायपुर में होटल में 28 युवा हुक्का बार में पुलिस द्वारा धर दबोचे गए हैं उससे यह सिद्ध हो जाता है कि हुक्का बार बड़े मजे से चलाए जा रहे हैं और कानून का भय किसी को नहीं है.

दो सौ से लेकर बारह सौ का हुक्का, बार में  सहजता से  मिलता है .अलग-अलग फ्लेवर के हुक्के की कीमत अलग-अलग है.  कॉलेज के छात्र, बड़े घरों के युवक-युवती, नाबालिग आदि इनके शौकीन हैं. इन्हें आदी बनाया जा रहा है और जैसा कि मालूम है बाद में इन युवाओं का अपराधिक व अन्य गतिविधियों में उपयोग किया जाता है.

यहां उल्लेखनीय है कि सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम 2003 (सीओटीपीए) के अंतर्गत 23 मई 2017 को केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर हुक्के के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा रखा है. गुजरात समेत कई राज्यों में इस तरह का काम करने वालों को तीन साल की जेल हो रही है. पंजाब में धारा 144 के तहत कार्रवाई भी की जा रही है. छत्तीसगढ़ में कानून होने के बाद भी हुक्का बार युवाओं का जीवन बर्बाद कर रहा है. पहले तो सिर्फ कानून की आंखों में पट्टी बंधी रहती थी मगर अब लगता है कि पुलिस और जनप्रतिनिधियों की आंखों में भी पट्टी बंध गई है.

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पति की मार को प्यार समझती पत्नियां

एक तरफ औरतों के हालात में सुधार लाने के लिए दुनियाभर में कोशिशें की जा रही हैं, घरेलू हिंसा को पूरी तरह बंद करने के लिए कोशिशें हो रही हैं, इस के बाद भी हमारे देश में आज भी कुछ पत्नियां पति से पिटाई होने को भी प्यार की बात समझती हैं.

समाज पर मर्दवादी सोच की छाप के चलते कुछ औरतें पति से मार को प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं. और तो और वे यह सोचती हैं कि अगर उन के पति उन्हें मारतेपीटते नहीं हैं, तो वे उन से प्यार नहीं करते हैं.

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भले ही शारीरिक हिंसा के दौरान पैर, हाथ समेत शरीर के दूसरे अंगों में फ्रैक्चर हो जाए, लेकिन यह बहुत आम बात है. सब से ज्यादा चिंता की बात यह है कि सरकार इस तरह की हिंसा को बंद करने के लिए कानून भी बना चुकी है और सजा का प्रावधान भी है, लेकिन कुछ औरतों या समाज पर इस का कोई असर नहीं पड़ रहा है.

अभी हाल की ही घटना है. कुछ दिनों के लिए मेरा बिहार में रहना हुआ था. वहां अकसर पड़ोस से शाम के समय एक पड़ोसन के चीखनेचिल्लाने की आवाजें आती थीं. एक बार दिन के समय मेरा अपनी उस पड़ोसन से आमनासामना हो गया और धीरेधीरे बोलचाल भी शुरू हो गई. जल्द ही वह पड़ोसन काफी घुलमिल गई. लेकिन मु झे यह जान कर हैरानी हुई कि आज के समय में भी पढ़ेलिखे लोगों में भी यह सोच हो सकती है.

उस पड़ोसन के मुताबिक, अपने पति से रोज की मारपीट की अब उस को आदत हो गई है. ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब पड़ोसन के पति ने उस की धुनाई न की हो.

उस ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए यह भी बोला, ‘‘मेरे साथ की कुछ जानकार औरतों को तो लातघूंसों और गालियों का प्रसाद मिलता ही रहता है. 7 साल पहले सिर पर भारी कर्ज उठा कर पिता ने मेरी शादी की थी. 5 तरह की मिठाइयां अलग से बनवाई थीं और अपनी बिरादरी के लिए भोज रखा था. दानदहेज भी खूब दिया था.’’

पिछले 7 सालों में पति ने सिर्फ लिया हो, ऐसा नहीं था. उस ने रचना के शरीर पर ढेरों निशान और 2 बेटियों का तोहफा दे दिया था.

मैं ने पूछा ‘‘क्यों बरदाश्त करती हो इतना?’’

उस पड़ोसन ने बड़ा अजीब सा जवाब दिया, ‘‘हमारी मां, दादी, बूआ, मौसी ने हम लड़कियों को बताया था कि उन के पति उन को कैसे पीटते थे. वे उन का प्यार मान कर गृहस्थी चलाती रहीं. पति खुश रहता है तो घर में बिखराव नहीं होता. वही हम कर रहे हैं. ऐसे घर टूट कर नहीं बिखरते.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह तो पागलपन है.’’

पड़ोसन ने अपनी मजबूरी जताते हुए कहा, ‘‘मैं अगर पिटाई की खिलाफत करूंगी, तो मेरा पति मु झे छोड़ देगा.’’

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फख्र समझती हैं

इस सिलसिले में जब एक गैरसरकारी संस्था से बात की गई तो पता चला कि पत्नियों की पिटाई कुछ तबकों में इस कदर स्वीकार की जा चुकी है कि इसे दूर करना बेहद मुश्किल हो जाता है. कोईकोई पति तो जितनी बेरहमी से पिटाई करता है, उस की पत्नी सम झती है कि वह उस से उतना ही ज्यादा प्यार करता है. उन को अपने पति से पिटने में कोई शर्म नहीं आती, बस उन की कोशिश रहती है कि घर की बात घर में रहे.

ये औरतें जब आपस में मिलती हैं, तो इस तरह से दिखाती हैं जैसे उन का पति उन्हें कितना प्यार करता है. उन के पति से ज्यादा बढि़या पति शायद किसी दूसरी औरत का हो, जबकि हकीकत में हर औरत एकदूसरे की कहानी जानती है.

तलाक का खौफ

जानकारों का कहना है कि ऐसी औरतें तलाक से बचने के लिए पति के जोरजुल्म को खुशी से सहती हैं. एक

35 साला औरत ने बताया कि उस का पति घर की छोटी से छोटी बातों में दखल देता है और खिलाफत करने पर उसे बेरहमी से पीटता है. कभीकभार

तो इतनी बुरी तरह से मारता है कि पूरा शरीर दर्द से कराह उठता है. लेकिन उसे बिलकुल बुरा नहीं लगता.

‘‘जहां प्यार होगा, वहीं तो तकरार होगी,’’ वह औरत हंसते हुए बोलती है. वह अपने पति से बेहद खुश है.

डर है बेबुनियाद

सीमा नाम की एक औरत का तलाक हो चुका है. हालांकि यह सबकुछ इतना आसान भी नहीं था. उस ने बताया, ‘‘मु झे कुछ दिनों तक क्या महीनों तक यही लगा जैसे सबकुछ खत्म हो चुका है. अब मेरी जिंदगी आगे बढ़ ही नहीं सकती. वह खत्म हो गई है, लेकिन आज मेरा खयाल बदल चुका है.

‘‘आज मैं यह कह सकती हूं कि वक्त चाहे अच्छा हो या फिर बुरा, कुछ न कुछ सिखाता ही है. तलाक ने भी बहुतकुछ सिखाया है.

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‘‘तलाक के बाद सब से बड़ी सीख यह मिली है कि किसी एक इनसान के नहीं होने से दुनिया खत्म नहीं हो सकती.’’

गहरी पैठ

मोबाइल रिपेयर शौप खुली रखने पर खड़े हुए झगड़े में तमिलनाडु के थूथुकुड़ी शहर के एक थाने में 2 जनों, बापबेटे दुकानदारों, की पुलिस थाने में बेहद पिटाई की गई. उन्हें लिटा कर उन के घुटनों पर लाठियां मारी गईं. उन के गुदा स्थल में डंडा डाल दिया गया. उन को घंटों पीटा गया और पुलिस वालों ने बारीबारी कर के पीटा. पुलिस को अपनी हरकतों पर इतना भरोसा था कि अगले दिन उन की झलक भर दिखा कर मजिस्ट्रेट से रिमांड ले कर फिर पीटा गया और उस दिन दोनों की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई.

पुलिस अत्याचार इस देश में तो क्या दुनियाभर में कहीं भी नई बात नहीं है. अमेरिका आजकल मिनियापोलिस नाम के शहर में 20 डौलर के विवाद में फंसे एक काले युवक की गोरे पुलिसमैन के घुटनों के नीचे गरदन दबाने से हुई मौत पर उबल रहा है. हमारे यहां भी पुलिस का वहशीपन वैसा ही है जैसा तानाशाही देशों में या पुलिस को ज्यादा भाव देने वाले देशों में होता है. पुलिस में भरती होने के बाद जो पहला पाठ पढ़ाया जाता है वह बेदर्दी से पीटने का है और उस में न बच्चों को छोड़ा जाता है, न बूढ़ों को और न औरतों को.

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हमारे यहां सोशल मीडिया में तमिलनाडु से बढ़ कर वहशीपन के साथ सड़कों पर हो रही पुलिस के हाथों पिटाई के वीडियो भरे हैं पर कहीं किसी पुलिस वाले के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता. सरकार ही नहीं अदालतें भी पुलिस वालों से डरती हैं और उन्हें खुली छूट देती रहती हैं.

जो बरताव अमेरिका में गोरे पुलिस वाले कालों से करते हैं वैसा ही हमारे यहां ऊंची जातियों के पुलिस वाले निचली जातियों के साथ करते हैं. हर देश का कानून पुलिस के हाथ बांधता है पर लगभग हर देश में चलती है पुलिस की मनमानी ही. पुलिस गरीब या कमजोर को ही नहीं बुरी तरह मारतीपीटती है, वह अपने खिलाफ खड़े हुए किसी के साथ भी बहुत बुरी तरह पेश आ सकती है. थूथुकुड़ी शहर में बापबेटे ने पुलिस वालों पर कुछ कमैंट कस दिया था जिस का बदला लेने के लिए नाडर जाति के इन दुकानदारों को सही सबक सिखाने के लिए पुलिस ने उन की हड्डीपसली इस तरह तोड़ी कि उन की जान ही चली गई.

2019 में कम से कम 1,731 लोग तो पुलिस हिरासत में पिटाई की वजह से मौत के घाट उतारे गए थे. ज्यादा से ज्यादा पुलिस वालों को सस्पैंड किया जाता है या ट्रांसफर किया जाता है. आम जनता आमतौर पर हर देश में पुलिस के वहशीपन पर चुप रहती है कि यही पुलिस उस की सुरक्षा की गारंटी है और यही तरीका है किसी से अपराध उगलवाने का. वैसे भी आम जनता भी अपने झगड़े मारपीट से निबटाने की कला जानती है. बचपन में ही मांबाप पिटाई का सहारा लेने लगते हैं. गलियों में खेल के दौरान और स्कूलों में डीलडौल वालों को धमका कर मारपीट कर के अपनी चलाने की क्लासें लगा दी जाती हैं. घरों में मारपीट आम है, चाहे उस में पुलिस वाला वहशीपन न हो.

पुलिस के वहशीपन के खिलाफ आवाज बड़ी दबी हुई सी उठती है क्योंकि आम जनता और पुलिस के बीच खड़ी अदालतों का रुख पुलिस वालों के बारे में हमेशा नरम ही रहा?है. जमानत तक आमतौर पर आसानी से नहीं मिलती. समाज ने अपने बचाव के लिए पुलिस बनाई थी, पर असल में यह केवल सत्ता को बचाने और खुद को बनाए रखने का काम करती है. इस से छुटकारा मिलना नामुमकिन है.

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चीन के साथ अब चाहे पूरी तरह लड़ाई न हो, झड़पें जरूर होती रहेंगी. हमारी सेना को 24 घंटे मुस्तैदी से बर्फीले तूफानों वाली सीमा पर लगे रहना होगा, जहां पहुंचना भी मुश्किल है और एक रात काटना भी. यह देश के बहादुर जवानों की बदौलत है कि आज देश चीन के साथ आंख से आंख मिला रहा है और हालात कतई 1962 वाले नहीं हैं जब माओ त्से तुंग की भेजी फौजों ने बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था.

तब से अब तक सरकारों ने लगातार चीन से अपनी सुरक्षा की तैयारी की है. ऊंचे पहाड़ों में सड़कें बनाई गई हैं, पुल बने हैं, सुरंगें बनी हैं, हवाई पट्टियां बनी हैं, बैरकें बनी हैं. दिल्ली में बैठे नेता चीन को मनाने में भी लगे रहे कि वह कभी कोई गलत हरकत न करे और लगातार बदलती राजनीति के बावजूद पिछले 2-3 साल से पहले कभी ज्यादा कुछ नहीं हुआ.

चीन का कहना है कि वह कश्मीर के कानूनी ढांचे में संविधान के अनुच्छेद 370 के बदलाव से चिंतित है. उस का यह भी कहना है कि भारतीय फौजों ने कोविड 19 की आड़ में कुछ ज्यादा करना चाहा, पर हकीकत है कि भारत अपनी ही जमीन पर था. हालांकि दूसरे बड़े दलों के साथ हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की जमीन पर कोई घुसपैठ नहीं हुई है, पर यह भी सही नहीं लगता. सैटेलाइट पिक्चरों से साफ है कि जो जमीन अब तक हम अपनी कहते रहे हैं वह शायद हमारे कब्जे में नहीं है. मामला इतना जरूर है कि अब यह ठंडा पड़ने वाला मसला नहीं है.

लड़ाई हमेशा महंगी होती?है. जानें भी जाती हैं, पैसा भी जाता है. हमारे 20 जवान अपनी जान खो चुके हैं, कितने ही घायल हैं. हमें तुरंत सारी दुनिया से फौजी सामान खरीदना पड़ रहा है. चीन से घरेलू सामान, जो सस्ता होता था, अब नहीं आ सकेगा. बहुत सी मशीनें नहीं आ पाएंगी. दवाओं की भारी कमी हो जाएगी.

अगर भारत और चीन के नेता समझदारी से काम लेते तो 260 करोड़ जनता इस बेकार के झगड़े से बच सकती थी. चीन की 130 करोड़ जनता का तो मालूम नहीं, पर हमारी 130 करोड़ जनता को देश की सरहद को बचाने के लिए कुरबानी को तैयार रहना होगा.

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जो 20 जवान अभी शहीद हुए हैं, वे बिहार रैजिमैंट के हैं और उन्होंने चाहे जान दी पर बहादुरी से मुकाबला करा. उम्मीद की जाए कि बिहार रैजिमैंट और देश की कुरबानियों को देश के नेता चुनावों के लिए या जनता का ध्यान भटकाने का जरीया नहीं बनाएंगे. पूरा देश आज सेना के साथ है पर देश के कुरसी पर बैठे नेता देश की सोच रहे हैं, यह भी पक्का होना चाहिए. जिस तरह से इन नेताओं ने बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों से लौकडाउन के दौरान बरताव किया है, उस से तो कुछ और ही नजर आता है. नेता राजधानियों में मौज करते रहे, अपनी कोठियों में दुबके रहे और मजदूर भूखेप्यासे दरदर भटकते रहे. यही हाल चीन से 2-2 हाथ में न हो.

जाति की वकालत करता नागरिकता संशोधन कानून

लेखक- कुशलेंद्र श्रीवास्तव

जाहिर है कि यह कानून सब को मंजूर नहीं है. इसे ले कर विपक्ष में तो असंतोष है ही, साथ ही देश के कुछ राज्यों में भी असंतोष फैला हुआ है. जनता के इस विरोध ने यह साबित कर दिया है कि हर समय लच्छेदार भाषणों से जनता को नहीं बरगलाया जा सकता.

नोटबंदी और जीएसटी कानून के बाद आर्थिक मंदी की मार  झेल रही केंद्र सरकार जनता को असली मुद्दों से भटका कर हिंदुत्व के अपने एजेंडे पर चल कर पीछे के दरवाजे से वर्ण व्यवस्था को वापस लाना चाहती है.

राम मंदिर जैसे मसलों पर धार्मिक भावनाएं भड़का कर देश के हिंदूमुसलिम समाज के बीच अलगाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि भाजपाई पुजारियों की असली कमाई इन्हीं मंदिरों से ही होती है.

संसद से पास नागरिकता संशोधन कानून अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से भारत में आए गैरमुसलिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की बात करता है. इन तीनों देशों को इसलिए रखा गया है, क्योंकि ये तीनों देश धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं. पाकिस्तान और बंगलादेश तो साल 1947 तक भारत का हिस्सा थे और अफगानिस्तान तकरीबन भारत का सांस्कृतिक हिस्सा था. तीनों ही अब इसलामिक देश हैं.

यह कानून साल 1955 में पास नागरिकता कानून को संशोधित कर उन हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई और पारसियों को भारत की नागरिकता के योग्य बना देगा, जो अफगानिस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान से भारत आए हैं.

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यह अधिकार 31 दिसंबर, 2014 तक उन सभी लोगों पर लागू होगा, जो इस मीआद तक भारत में आ चुके हैं.

नागरिकता संशोधन कानून में लिखा है कि भारत की नागरिकता उन्हें ही दी जाएगी, जो 5 सालों से भारत में रह रहे हैं और अपने देशों में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हैं.

इस कानून के पास होने के पहले तक भारत की नागरिकता केवल उन्हीं लोगों को मिलती थी, जिन का जन्म भारत में हुआ हो या उन के पुरखे भारत के नागरिक हों या वे कम से कम 12 साल से भारत में रह रहे हों.

इस कानून की धारा 7 में एक उपधारा डी भी शामिल की गई है, जिस के मुताबिक अगर भारत का कोई ओवरसीज कार्ड है और उस ने नागरिकता कानून या किसी दूसरे कानून का उल्लंघन किया है, तो उस की ऐसी नागरिकता खारिज कर दी जाएगी.

इस सरकार ने यह मान लिया है कि मुसलिम बहुल देशों में अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर जोरजुल्म हो रहे हैं. वे अपनी जान बचा कर भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. इन देशों के बहुत से शरणार्थी भारत में रह भी रहे हैं.

नागरिकता संशोधन कानून ने अनेक सवालों को जन्म दे दिया है. इस का मतलब है कि बदले में हमें अपने अल्पसंख्यकों, मुसलिमों से भेदभाव करने का हक है और हम उन पर जोरजुल्म करें तो गलत न होगा. लिहाजा, यह भेदभाव फैलाने वाला कानून है.

हिंदुत्व की छाप

भाजपा हिंदुत्व की पहचान के रूप में जानी जाती है. नरेंद्र मोदी की अगुआई में जब भाजपा ने साल 2014 में केंद्र में अपनी सरकार बनाई तो उस के सामने वोटरों को लुभाने के लिए दिए गए आश्वासनों का भारी पिटारा था, जिसे वे अपने पहले कार्यकाल में ही पूरा कर लेना चाहते थे, पर उस कार्यकाल में उन के पास लोकसभा में खुद का बहुमत नहीं था और न ही राज्यसभा में. ऐसे में वे चाहते हुए भी अपने एजेंडे पर काम नहीं कर पाए थे.

तब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने देश के विभिन्न राज्यों में अपनी सरकार बनाने का लक्ष्य रखा और तकरीबन 72 फीसदी इस टारगेट को हासिल भी कर लिया और खुद के ही सांसदों की संख्या को तय बहुमत के पार पहुंचा दिया. इस जीत ने उन का मनोबल भी बढ़ाया और अपने एजेंडे को पूरा करने का मौका भी पा लिया.

कश्मीर से धारा 370 हटाना भाजपा का पहला कदम था. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी उन के लक्ष्य में शामिल था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरा कर दिया. एनआरसी पर तो वे पहले ही काम शुरू कर चुके थे और अब सारे देश को इस में शामिल करने का ऐलान भी वे कर चुके हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक को पास करना भी उन के सपनों के पूरा हो जाने जैसा है.

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भाजपा आम वोटरों के बीच बनी अपनी हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी इमेज को गहरा करना चाहती है, ताकि उस का वोट बैंक और भी मजबूत बना रहे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चाहता है कि भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बने.

नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को दोनों सदनों में पास कराने के बाद भाजपा ने इस दिशा में अपने मजबूत कदम आगे बढ़ा दिए हैं, ऐसा माना जा सकता है.

कश्मीर से धारा 370 हटाई जा चुकी है और राम मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट के बेसिरपैर के फैसले से रास्ता साफ कर दिया गया है.

इस नागरिकता संशोधन कानून में गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता दे कर वे हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के लोगों को नागरिकता दे कर अपना वोट बैंक मजबूत करेंगे ही, साथ ही यहां के मुसलिमों पर हिंदू विरोधी होने की मोहर भी लगा देना चाहेंगे.

पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में रहने वाले हिंदू अगर वहां सताए जाते हैं, तो वे भारत नहीं आएंगे तो और कहां जाएंगे. वैसे, इस में यह सवाल भी सामने आता है कि इन तीनों देशों में रहने वाले हिंदू क्या असल में सताए जाते रहे हैं? तो क्या सत्तारूढ़ दल केवल अपने वोट बैंक के लिए इस देश को ऐसे हालात में ले जा रहा है जहां से उबरना उस के लिए मुश्किल ही साबित होगा?

पाकिस्तान में रहने वाले बंटवारे के समय भारत से गए मुसलिम पाकिस्तान में ‘मुजाहिर’ कहे जाते हैं और उन के साथ दूसरे दर्जे का बरताव ही किया जाता है. इस के अलावा शिया मुसलिमों को भी कट्टरपंथी सुन्नी समुदाय अपने गुस्से का शिकार बनाता है. क्या उन के भविष्य के बारे में सोचा जाना उचित नहीं होेता? वहां सिर्फ हिंदुओं के साथ ही नहीं, बल्कि मुसलिमों से भी भेदभाव हो सकता है, जैसा हमारे यहां पिछड़ों, दलितों, बौद्धों के साथ होता है.

सच तो यह भी है कि सरकार ने मुसलिम महिलाओं के लिए तीन तलाक का कानून पास करा कर मुसलिमों में अपनी अच्छी इमेज बनाने की पहल की थी. उस इमेज को इस कानून से नुकसान पहुंच सकता है.

वैसे, भाजपा को इस की ज्यादा चिंता है भी नहीं, क्योंकि महज 2-3 फीसदी नाराज मुसलिमों के चलते वह अपने एजेंडे को बदल नहीं सकती थी.

अब भाजपा के निशाने पर एनआरसी बिल रहेगा, जिसे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं. हालांकि नागरिकता संशोधन कानून का जिस तरह से विरोध हो रहा है, उसे देखते हुए लग रहा है कि पूरे भारत से एनआरसी को लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि अभी तो भाजपा को नागरिकता संशोधन कानून से पैदा हुए विरोध से ही निबटने में समय लगेगा.

विपक्ष इसे इतनी आसानी से शांत नहीं होने देगा. कालेजों में पढ़ने वाली नौजवान पीढ़ी, जिस तरह से अपने विरोध की आवाज को बाहर निकाल रही है उस से केंद्र को चिंतित होना चाहिए, क्योंकि नौजवानों के गुस्से को दबा पाना आसान नहीं होता.

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बहरहाल, इस कानून के जरीए केंद्र सरकार पाकिस्तान समेत दूसरे मुसलिम बहुल देशों को यह संदेश देने में कामयाब रही है कि भारत के दरवाजे उन के देशों में अत्याचार सहन कर रहे हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए हमेशा खुले हैं और वह सीना ठोंक कर उन की मदद कर सकती है.

नागरिकता संशोधन कानून को ले कर भाजपाइयों के अपने तर्क हैं. गाडरवारा की विधायक रह चुकी और भाजपाई साधना स्थापक का कहना है कि भारत के दरवाजे किसी के लिए बंद नहीं हैं, पर हमारा मानना है कि आज हमारी प्राथमिकता उन हिंदुओं को नागरिकता देने की है, जो हिंदू होने के चलते इन देशों में सताए जा रहे हैं.

राज्यसभा सांसद कैलाश सोनी ने अपने जागरूकता अभियान में कहा कि कांग्रेस अपने फायदे के चलते हिंसा को बढ़ावा दे रही है, जबकि इस कानून से किसी भी जाति, धर्म के लोगों को कोई परेशानी नहीं होने वाली.

जिला नरसिंहपुर के भाजपा अध्यक्ष अभिलाष मिश्रा का भी यही कहना है कि पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाता है. वे भारत की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखते हैं. यह कानून उन्हें नागरिकता दे कर उन के भविष्य को संवारने का काम करेगा.

भाजपा इस बात पर ज्यादा जोर देती दिखाई दे रही है कि इस कानून से किसी को कोई नुकसान नहीं होने वाला, पर वह इस बात पर रोशनी नहीं डाल पा रही है कि इन तीनों देशों में अल्पसंख्यक न होने के बावजूद अगर मुसलिम सताया जाता है तो वह भारत की नागरिकता क्यों नहीं ले सकता?

भाजपा का जागरण अभियान तो चालू है, पर इस के बावजूद भारत को इस कानून के साइड इफैक्ट के लिए तैयार रहने की जरूरत है. इन सभी नेताओं के बयानों में हिंदूमुसलिम की बात है. हिंदू यानी कर्मकांडी हिंदू और मुसलिम यानी टोपी लगाने वाला नमाजी मुसलिम.

आखिर खिलाफत क्यों

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध बड़े लैवल पर हो रहा है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 को बारबार रेखांकित किया जा रहा है. इस अनुच्छेद में समानता की बात कही गई है. विरोध करने वालों का मानना है कि जब समानता का अधिकार हमारा ही संविधान हमें देता है, तब गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात क्यों की जा रही है?

विदेशों में भी इसी आधार पर विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं. अमेरिका के ‘वैश्विक धार्मिक आयोग’ ने भी इस कानून का विरोध किया है. अमेरिकी आयोग ने भी अपना विरोध दर्ज कराया है.

इस सब के बीच भारत इस नए कानून का पालन कराने के लिए तैयारी कर चुका है. उस ने सारे विरोधों के प्रति अपनी असहमति देते हुए नए कानून को देश के लिए जरूरी करार दिया है.

भाजपा इस कानून के संबंध में लाख दलीलें दे, पर जमीनी सचाई यही है कि वह देश की जनता को धार्मिक मसलों में उल झा कर उन की जातीय भावनाओं को जाहिर करने का मौका दे रही है. हिंदू और मुसलिमों के बीच विवाद खड़ा कर के वर्ण व्यवस्था की वकालत कर के वह अपनी हिंदुत्व वाली इमेज को बनाए रखना चाहती है.

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आज देश में केंद्र सरकार जिस हिंदुत्व के एजेंडे पर काम कर रही है, उस में ‘मनुस्मृति’ अपनेआप ही आ जाती है. वर्ण व्यवस्था खुद ब खुद आ जाती है और जाति के आधार पर सजा का मापदंड जो ‘मनुस्मृति’ में लिखा है, ऐसी व्यवस्था को बढ़ाने वाली सरकार जो बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की आड़ में मनुस्मृति को लागू करना चाहती है, तो उस सरकार से उम्मीद नहीं की जा सकती कि देश में महिलाओं और दलितों को समान अधिकार और सुरक्षा मिलेगी.

डा. प्रियंका रेड्डी: कानून, एनकाउन्टर और जन भावना

6 दिसंबर की सुबह सुबह जो समाचार देश की मीडिया में आकाश के बादलों की तरह छा गया वह था हैदराबाद में हुए डा. प्रियंका रेड्डी के साथ हुए बलात्कार एवं नृशंस हत्याकांड के बाद देशभर में गुस्से के प्रतिकार स्वरुप पुलिस के एनकाउंटर का. जिसमें बताया गया था कि डॉ प्रियंका रेड्डी के साथ हुई अनाचार के चारों आरोपियों को पुलिस ने एक एनकाउंटर में मार गिराया है.

इस खबर के पश्चात चारों तरफ मानो खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा. सोशल मीडिया हो या देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जब समाचार को लेकर आया तो इसके पक्ष में कसीदे पढ़े जाने लगे. यह अच्छी बात है कि लोगों में बलात्कार अनाचार के प्रति रोष दिखाई पड़ता है. मगर इस एनकाउंटर के पश्चात जिस तरह एकतरफा एनकाउंटर को जायज ठहराया गया वह कई प्रश्न खड़े करता है और यह संकेत देता है कि हमारा समाज, देश किस दिशा में जाने को तैयार खड़ा है. देखिए सोशल मीडिया कि कुछ प्रतिक्रियाएं-

प्रथम-हैदराबाद में रेप के चारों आरोपियों को पुलिस ने मार गिराया. बहुत लोग खुश हो रहे हैं. सत्ता यही चाहती है कि आप ऐसी घटनाओं पर खुश हों और आपकी आस्था बनी रहे.

द्वितीय- क्या एनकाउंटर की इसी तर्ज पर बड़ी मछलियों को भी मार दिया जाएगा? लिस्ट बहुत लंबी है. किस किस का नाम लिया जाय और किसे छोड़ा जाय?

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तृतीय- शायद मानवाधिकार और बुद्धिजीवी वर्ग पुनः सक्रिय होनेवाला है, इस एनकाउंटर के लिए पर आम जनता प्रसन्न है. तुरंत दान महा कल्याण. डिसीजन ओन द स्पॉट.निर्भय  की तरह न झूलेगा केस न जुवेनाइल कोर्ट का झमेला. जियो जियो .

चतुर्थ- सेंगर, कांडा, चिन्मयानंद, मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मालिक और एम जे अकबर जैसों का एनकाउंटर कब होगा ?

पंचम- “कुछ देर बाद कई मानवाधिकार के ढोल वाले अपना शटररुपी मुँह खोलेंगे.उन्हें अवॉयड करियेगा. आज पीड़ित बेटी को अधिकार मिला है.

सुबह सुबह की तल्ख  खबर

हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर केस के चारों आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया गया है. चारों आरोपियों को गुरुवार देर रात नेशनल हाइवे-44 पर क्राइम सीन पर ले जाया गया था. जहां उन्होंने भागने की कोशिश की तो पुलिस को एनकांउंटर करना पड़ा.हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इन चारों का एनकाउंटर किन परिस्थितियों में हुआ है.हैदराबाद में महिला वेटनरी डॉक्टर के साथ जिस तरह से चार लोगों ने कथित रूप से गैंगरेप किया और उसे जिंदा जला दिया उसके बाद देशभर में लोगों के भीतर इस घटना को लेकर आक्रोश था. लेकिन अब इन चारों ही आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया है.

बता दें कि गैंगरेप और बर्बरता से हत्या के मामले तेलंगाना सरकार ने बुधवार को आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई के लिए महबूबनगर जिले में स्थित प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत को विशेष अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के रूप में नामित किया था. इस मामले में पुलिस ने सोमवार को अदालत में याचिका दाखिल करके आरोपियों की दस दिनों की हिरासत की मांग की . लगातार तीन दिनों तक अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद सात दिनों की पुलिस हिरासत दे दी गई.

 डॉ प्रियंका के साथ जो हुआ, और अनुत्तरित प्रश्न

गौरतलब है कि 28 नवंबर को इन चार आरोपियों की जिनकी उम्र 20 से 26 साल के बीच थी ने डॉक्टर  प्रियंका रेड्डी को टोल बूथ पर स्कूटी पार्क करते देखा था. आरोप है कि इन लोगों ने जानबूझकर उसकी स्कूटी पंक्चर की थी. इसके बाद मदद करने के बहाने उसका एक सूनसान जगह पर लेकर गैंगरेप किया और बाद में पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया. पुलिस के मुताबिक घटना से पहले इन लोगों ने शराब भी पी रखी थी. रेप और मर्डर की घटना के बाद पूरे देश में गुस्सा था .

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वहीं इस एनकाउंटर के बाद लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने की मिल रही है. एक चैनल  से बात करते हुए एक्टिविस्ट और वकील वृंदा ग्रोवर ने सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि वह सभी के लिए “न्याय” चाहती हैं लेकिन इस तरह नहीं होना चाहिए था. वहीं इसी मुद्दे पर अनशन पर बैठीं दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा कि जो हुआ अच्छा है कम से कम वह सरकारी दामाद बनकर रहेंगे जैसा कि दिल्ली के निर्भया केस में हुआ.

सबसे बड़ा प्रश्न इस संपूर्ण मामले में यह है कि क्या प्रियंका रेड्डी को इन चार आरोपियों के एनकाउंटर से न्याय मिल गया?

अगर पुलिस ने निअपराधियों को आरोपी बनाकर, देश को दिखा दिया होगा तो, जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है, तो क्या होगा?

सवाल यह भी है कि जैसी प्रसन्नता लोग सोशल मीडिया पर जाहिर कर रहे हैं क्या वह सही  कही जा सकती  है?

यह भी सच है कि लोगों में  प्रियंका रेड्डी बलात्कार कांड के बाद भयंकर रोष था, यह भी सच है कि कानून अपना काम अच्छे से नहीं कर पा रहा.यह भी सच है कि जिस त्वरित गति से प्रकरण की सुनवाई होनी चाहिए, नहीं हो पा रही. यह भी सही है कि मामला ले देकर राष्ट्रपति दया याचिका  पर फंस जाता है.  तो क्या इलाज अब एनकाउंटर ही बच गया है?

डॉक्टर प्रियंका रेड्डी कांड  के दोषी निसंदेह कानून के अपराधी हैं और हमारा कानून इतना सक्षम है कि वह दूध का दूध पानी का पानी कर सकता है. कानून की मंशा यही है कि चाहे सो गुनाहगार बचे जाएं मगर एक बेगुनाह नहीं मारा जाना चाहिए. इसी सारभूत तत्व को लेकर हमारा कानून  काम कर रहा है, अगर इसी तरह एनकाउंटर करके लोगों को मारा जाएगा तो फिर क्या  कानून की भावना, कानून की आत्मा के साथ क्या हमारा समाज और सिस्टम गलत नहीं कर रहा है.

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आने वाले समय में इस एनकाउंटर को जांच आयोग बनाकर और न्यायालय की देहरी पर हर तरीके से परखा जाएगा तब शायद यह तथ्य सामने आ जाएंगे की किस जगह एनकाउंटर में कई बड़ी गलतियां हुई हैं.

– जैसे सुबह सवेरे अंधेरी रात में चारों आरोपियों को घटनास्थल पर रीक्रिएशन के लिए ले जाना….?

-क्या आरोपियों के हाथों में हथकड़ीयां नहीं बांधी गई थी?

क्या आरोपी फिल्मी सितारों की तरह इतने ताकतवर थे की पुलिस की भारी दस्ते पर सरासर भारी पड़ गए? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन चारों के चेहरे देखकर लगता है कि यह आम गरीब  परिवार से थे. क्या यह लोग किसी बड़ी शख्सियत के वारिस होते, तो क्या पुलिस इस तरह काउंटर का पाती.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि डॉ प्रियंका के हत्यारों के रूप में आरोपियों के साथ जो हुआ उससे देश में खुशी का माहौल दिखाई दे रहा है. मगर हमें  यह समझना होगा कि आरोपियों की जगह हम या हमारे कोई परिजन होते,उनके साथ अगर ऐसा पुलिस करती, तो हम क्या सोचते!

और अगर हम यह जानते होते की यह अपराधी नहीं है और तब यह एनकाउंटर होता तब क्या व्यतीत होता? क्योंकि यह सच जानना समझना होगा कि पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कियाा जाना, कोई अपराधी सिद्ध हो जाना नहीं है. हमारे देश में जिस तरह पुलिस काम करती है, उससे यह समझा जा जा सकता है कि कभी भी किसी को भी पुलिस गिरफ्तार कर सकती है मगर अंतिम फैसला इजलास पर होता है.

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किस काम का हिंदू विवाह कानून

उत्तर प्रदेश के इटावा शहर में प्रवीण व नीलम का विवाह 1998 में हुआ जब नीलम 18 साल की थी. दोनों को एक बेटी भी हुई. फिर दोनों के बीच मतभेद खड़े हो गए और वे अलगअलग रहने लगे. तब 2009 में पति ने तलाक का मुकदमा पारिवारिक अदालत में डाला. होना तो यह चाहिए था कि पत्नी की जो भी वजहें रही हों, पति और पत्नी को जबरन ढोए जा रहे संबंधों से कानूनी मुक्ति दिला दी जानी चाहिए थी पर पारिवारिक अदालत ने ऐप्लिकेशन रद्द कर दी.

चूंकि साथ रहना संभव न था, इसलिए पति ने जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया. जिला अदालत ने 3 साल इंतजार करा कर 2012 में तलाक मंजूर करने से इनकार कर दिया. नीलम अब 32 साल की हो चुकी थी.

प्रवीण उच्च न्यायालय पहुंचा. उच्च न्यायालय ने मई, 2013 में तलाक नामंजूर कर दिया, जबकि मामला शुरू हुए 15 साल गुजर चुके थे. दोनों जवानी भूल चुके थे.

प्रवीण अब सुप्रीम कोर्ट आया. समझौता वार्त्ता के दौरान प्रवीण ने क्व10 लाख पत्नी को देने की पेशकश की और क्व3 लाख का फिक्स्ड डिपौजिट करने का प्रस्ताव रखा, पर यह करतेकराते सुप्रीम कोर्ट में 6 साल लग गए.

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इस दौरान दोनों पक्षों ने कई मुकदमे शुरू कर दिए. 2009 में गुजारेभत्ते के लिए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के अंतर्गत जिला अदालत इटावा में एक मुकदमा दायर किया गया. 2009 में ही घरेलू हिंसा का एक और मुकदमा नीलम ने इटावा में दायर किया. एक दहेज के बारे में 2002 में केस दायर किया गया था. एक मामला इटावा में ही इंडियन पीनल कोड की धारा 406 में अमानत में खयानत यानी ब्रीच औफ ट्रस्ट पर दायर किया गया था.

यहां तक कि पति के खिलाफ डकैती तक का मामला दायर किया गया था कि वह 5 जनों के साथ घर लूटने आया था.

आंतरिक विवाद जो भी हों विवाह के मामले में इतनी मुकदमेबाजी आज आम हो गई है और इस में पिसती औरत ही है.

18 साल की लड़की, जिस की शादी 1998 में हुई हो, न जाने कितने सपने ले कर ससुराल आई होगी पर जो भी मतभेद हों, वे अगर हल नहीं होते तो अलग हो कर चाहे तलाकशुदा का तमगा लगाए घूमना पड़े पर 20 साल अदालतों के चक्कर तो नहीं लगाने पड़ने चाहिए.

लाखों की वकीलों की फीस के बदले क्व13 लाख मिले पर क्या ये काफी हैं? क्या यह जवानी की अल्हड़ता फिर आएगी जब बेटी खुद शादी के लायक हो रही है?

यह हिंदू विवाह कानून किस काम का जो औरतों को 20-30 साल इंतजार कराए और बिना तलाक के रखे? यह आतंक तीन तलाक से कम नहीं है, लेकिन हिंदू धर्माधीश इसे सिर पर पगड़ी और माथे पर तिलक मान कर चल रहे हैं.

औरतें उन के पैरों की जूतियां हैं, जो चरणामृत पीती हैं. विवाह तो धर्म के दुकानदारों के हिसाब से संस्कार है. कुंडलियां मिला कर होने वाला विवाह जिस में लड़की की रजामंदी नहीं ली जाती पहले सुधार मांगती है. मुसलिम औरतें कम से कम दासी नहीं हैं, यह निर्णय तो यही कहता है.

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सामाजिक दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन धार्मिक कथाएं किस तरह दिमाग खराब करती हैं और किस तरह औरतों के अत्याचारों के लिए जिम्मेदार हैं, यह रामायण और महाभारत से साफ है. हजारों औरतों को देशभर में अपने पाकसाफ होने के सुबूत में हाथपैर जलाने पड़ते हैं. पति अगर आरोप लगा दे कि पत्नी की किसी से आशनाई चल रही है तो राम और सीता के प्रसंग का लाभ उठा कर घरवाले ही नहीं, बल्कि पूरा समाज औरत को अग्नि परीक्षा सी देने को मजबूर करता है, जिस में स्वाभाविक है वह दोषी पाई जाती है और सदा के लिए बदनाम हो जाती है.

इसी तरह युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को जुए में हारने की कहानी इतनी बार कही जाती है कि आम लोगों में इसे सही मान कर अपनी पत्नी को दांव पर लगाने का हक सा मिल गया है. रामसीता के प्रदेश उत्तर प्रदेश में जौनपुर में एक पति ने एक बार नहीं 2 बार अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगा दिया और हार गया.

जाफराबाद में पुलिस स्टेशन में जुलाई 2019 में दर्ज रिपोर्ट के अनुसार एक नशेड़ी व जुआरी पति ने 2 दोस्तों के साथ जुआ खेलते हुए सबकुछ हार कर अपनी पत्नी को ही दांव पर लगा दिया. शायद उस के मन में बैठा होगा कि हारने पर कोई कृष्ण उस की पत्नी को भी बचा ही लेगा. अफसोस वह हार गया और दोनों दोस्तों ने उस की पत्नी का रेप किया, पति की इच्छा के हिसाब से.

नाराज पत्नी के पास घर छोड़ने के अलावा कोई चारा न था, क्योंकि पति ने तो धर्मनिष्ठ काम किया था, जो शायद स्वयं पत्नी की निगाह में अपराध न था. उस ने पहली बार न पुलिस में शिकायत की, न तलाक मांगा. वह घर छोड़ गई तो पति माफी मांगता पहुंचा. बेचारी हिंदू औरत उसे लौटना पड़ा, समाज का दबाव जो था. पति ने तो धर्म की मुहर लगा काम ही किया था न.

पति के सिर पर तो धर्म का भूत सवार था कि पत्नी उस की मिल्कीयत है, हाथ की घड़ी, पैरों के जूतों की तरह. उस ने उसे फिर धर्मराज युधिष्ठिर बन कर दांव पर लगा दिया. इस बार द्रौपदी नाराज हो गई. कोई कृष्ण नहीं आया बचाने के लिए तो पुलिस स्टेशन पहुंची.

अभियुक्तों को पकड़ लिया पर आगे होगा क्या? कुछ नहीं. औरत को झख मार कर लौटना पड़ेगा.

रामायण, महाभारत का नाम ले कर तो कहानियां रातदिन इतनी बार दोहराईर् जाती हैं कि औरतों को अपना पूरा जीवन सेवा और हुक्म मानने के लिए तैयार रहना पड़ता है. जब तलाक मांगो तब अदालतें भी नहीं देतीं. उन के दिमाग में भी बैठा है कि पति के बिना पत्नी कमजोर, असहाय है. इस सामाजिक दुर्दशा के लिए भाजपा सरकार तो कुछ न करेगी. औरतों को खुद ही आगे आना होगा पर वे आएंगी तो तब न जब उन्हें पूजापाठ, व्रतों, संतों की सेवा, तीर्थयात्राओं, जलाभिषेकों, मूर्तिपूजाओं से फुरसत मिले.

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बिजली मुफ्त औरतें मुक्त

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का 2 बत्ती, 1 टीवी, 1 पंखा, 1 फ्रिज, 1 कूलर, 1 कंप्यूटर के लायक 200 यूनिट तक की बिजली मुफ्त करने का फैसला चतुराईभरा है. 200 यूनिट तक का बिल अब माफ कर दिया गया है. शहर के

45 लाख उपभोक्ताओं को इस से लाभ होगा और बिजली का बिल भुगतान न होने के कारण बिजली इंस्पैक्टरों की धौंस का सामना नहीं करना पड़ेगा.

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से वैसे भी 33% घरों में 200 यूनिट से कम बिजली खर्च होती है. अब तक लोग 200 यूनिट के क्व600-700 देते थे. इस से पहले खर्च क्व1,200 था जिस की खपत ज्यादा है, वे पक्की बात है कि अब कम बत्ती का इस्तेमाल कर के 200 यूनिट के नीचे रहना चाहेंगे. सब से बड़ी बात यह है जब बत्ती मुफ्त मिल रही है तो घर के सामने खुले तारों पर कांटा डाल कर बत्ती जलाने की आदत भी खत्म हो जाएगी.

इस पर खर्च क्व1,400 करोड़ तक आ सकता है पर 60,000 करोड़ के बजट में यह कोई खास नहीं. खासतौर पर तब जब सरकार को कम बिल भेजने पड़ेंगे. एक बिल छापने, भेजने, पैसा वसूल करने में ही 50 से 100 रुपए लग जाना मामूली बात है. बिजली दफ्तर जा कर बिल जमा कराने में शहरी गरीब जनता को न जाने कितना खर्च करना पड़ता है.

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जब सरकार जगहजगह वाईफाई फ्री कर ही रही है कि लोग मोबाइलों का इस्तेमाल कर के हर समय सरकार के फंदे में रहें तो गरीबों को यह छूट देना गलत नहीं है. गरीब औरतों के लिए यह वरदान है कि अब उन की बिजली कटेगी नहीं और वे न रातभर खुले में सोने को मजबूर होंगी और न उन के बच्चे रातभर पढ़ने से रह जाएंगे.

सरकारें बहुत पैसा वैसे भी जनहित के कामों के लिए खर्च करती हैं. हर शहर में पार्क बनते हैं पर पार्क में जाने के लिए पैसे नहीं लिए जाते. सड़कें, गलियां बनती हैं जिन पर चलने की फीस नहीं ली जाती. सस्ते सरकारी स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय हैं जहां बहुत कम पैसों में पढ़ाई होती है. बहुत अस्पतालों में तामझाम का पैसा न ले कर इलाज होता है.

जो लोग इसे टैक्सपेयर की जेब पर डाका मान रहे हैं यह भूल रहे हैं कि उन के अपने कर्मचारी अब ज्यादा सुरक्षित, सुखी और प्रोडक्टिव हो जाएंगे, क्योंकि वे अंधेरे के खौफ में न रहेंगे.

जनहित काम केवल कांवड़ यात्रा का नहीं होता, पटेल की मूर्ति का नहीं होता, मन की बात का जबरन प्रसारण नहीं होता, बिजलीपानी भी जरूरी है. साफ हवा की तरह गरीब औरतों के लिए थोड़ी सी बिजली मुफ्त हो तो एतराज नहीं. यह उन्हें कटने के खौफ से मुक्त रखेगा.

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फांसी से बचाने के लिए सालाना खर्च करते हैं 36 करोड़ रुपए

हर देश का अपना अलगअलग कानून होता है. कहींकहीं, खासतौर पर अरब देशों में कानून बहुत सख्त है. पाकिस्तान को ही ले लीजिए, वहां एक बच्ची से रेप और हत्या के दोषी को 2 महीने में फांसी की सजा सुना दी गई, लेकिन हमारे यहां देश के सब से चर्चित मामले निर्भया रेप और हत्या के मामले में दोषी साबित हो जाने के बाद भी मुजरिमों को जेल में पाला जा रहा है.

अगर ऐसा अरब देशों में हुआ होता तो मुजरिमों को अब से 6 साल पहले फांसी हो चुकी होती. सख्त कानून के चलते अरब देशों में यह भी कानून है कि अगर कोई व्यक्ति किसी की हत्या कर देता है और शरिया कानून के अंतर्गत उसे फांसी की सजा हो जाती है तो फांसी से बचने के लिए उस के पास एक ही उपाय होता है, पीडि़त परिवार से सौदेबाजी.

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अगर पीडि़त परिवार उस से इच्छित रकम ले कर उसे माफ कर देता है तो अदालत फांसी की सजा को रद्द कर देती है. लेकिन सौदेबाजी की यह रकम इतनी बड़ी होती है, जिसे चुकाना आसान नहीं होता. इस रकम को वहां ब्लड मनी कहा जाता है.

दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के बड़े बिजनैसमैन एस.पी.एस. ओबराय ऐसे व्यक्ति हैं, जो लोगों को फांसी से बचाने के लिए प्रतिवर्ष 36 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. यानी फांसी पाए लोगों को बचाने के लिए ब्लड मनी खुद देते हैं. अब तक वह 80 से ज्यादा युवाओं को फांसी से बचा चुके हैं, जिन में से 50 से ज्यादा भारतीय थे. ये ऐसे लोग थे, जो काम की तलाश में सऊदी अरब गए थे और हत्या या अन्य अपराधों में फंसा दिए गए.

2015 में भारत के पंजाब से अबूधाबी जा कर काम करने वाले 10 युवकों से झड़प के दौरान पाकिस्तानी युवक की हत्या हो गई. अबूधाबी की अल अइन अदालत में केस चला, जहां 2016 में दसों युवकों को फांसी की सजा सुनाई गई. बाद में जब इस सिलसिले में याचिका दायर की गई तो अदालत ब्लड मनी चुका कर सजा को माफी में बदलने के लिए तैयार हो गई.

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सौदेबाजी में मृतक का परिवार 6 करोड़ 50 लाख रुपए ले कर माफी देने को तैयार हुआ. यह ब्लड मनी चुकाई एस.पी.एस. ओबराय ने.

इस तरह दसों युवक फांसी से बच गए. ओबराय साहब यह काम सालों से करते आ रहे हैं और उन के अनुसार जीवन भर करते रहेंगे.

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