मैंने भोजपुरी सिनेमा की 3 पीढ़ियों के साथ काम किया है – संजय पांडेय

बृहस्पति कुमार पांडेय

भोजपुरी सिनेमा में अगर सब से फेमस चेहरों की बात की जाए, तो उन में से एक नाम सब से ऊपर उभर कर आता है और वह नाम है संजय पांडेय का. भोजपुरी सिनेमा में पिछले 20 साल से काम कर रहे कलाकार संजय पांडेय ने तकरीबन 300 फिल्मों में अपनी ऐक्टिंग का लोहा मनवाया है.

भोजपुरी सिनेमा में एक विलेन के रूप में उन की तुलना अमरीश पुरी और प्राण तक से की जाती है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के वे ऐसे कलाकार हैं, जो हर तरह के रोल में आसानी से खुद को ढाल लेने में माहिर हैं.

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के कम्हरिया गांव के रहने वाले संजय पांडेय ने अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत साल 2001 में फिल्म ‘कहिया डोली लेके अईबा’ से की थी. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप को फिल्मों में जगह बनाने के लिए किस तरह की जद्दोजेहद का सामना करना पड़ा था?

मैं ने अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत बतौर रंगकर्मी से की थी. जब मुझे लगा कि मैं ने अदाकारी सीख ली है, तो मैं 90 के दशक में मुंबई आया था, वह भी सिर्फ इसलिए कि यह जान पाऊं कि फिल्मों में कदम जमाने के लिए क्याक्या करना पड़ता है. यहां आ कर मैं ने 3 चीजें सीखीं. वे ये थीं कि फिल्मों में काम उसी को मिल सकता है, जिस के पास पैसे हों या कोई आप का गौडफादर, हो या फिर आप में इतना टैलेंट हो, जिस के आधार पर लोग आप को बुला कर काम दें.

आप थिएटर के मंजे हुए कलाकार रहे हैं. फिल्मों में पैर जमाने में थिएटर से आप को  कितनी मदद मिल पाई?

यह थिएटर का ही कमाल था कि अपने शुरुआती दौर में ही मुझे एक टीवी चैनल के सीरियल ‘पंचायत’ में काम करने का मौका मिला. मेरी अदाकारी को देख कर मुझे एक बड़ी फिल्म ‘कहिया डोली लेके अईबा’ का औफर आया था, जिस ने मुझे बुलंदियों पर पहुंचाने में बड़ी मदद की.

ऐक्टिंग सीखने के लिए आप ने किसी तरह की ट्रेनिंग ली है या नैचुरल रूप से ऐक्टिंग सीखते गए?

मैं ने शुरूआती दौर में एक थिएटर ग्रुप में 2 साल तक ऐक्टिंग की ट्रेनिंग ली है. वहां मैं ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बंशी कौल से ऐक्टिंग की सभी बारीकियां सीखीं, जिस ने मेरे अंदर के नैचुरल ऐक्टर को निखारने का काम किया.

आप ने भोजपुरी फिल्मों में सब से ज्यादा नैगेटिव किरदार निभाए हैं. ऐसे किरदारों का आप की निजी और पारिवारिक जिंदगी पर कैसा असर पड़ा है?

नैगेटिव किरदार निभाने से निजी जिंदगी पर कोई असर तो नहीं पड़ता है, लेकिन पब्लिक इमेज पर बड़ा असर पड़ता है. लोग परदे की दुनिया के बाहर भी आप को उसी विलेन के रूप में देखने लगते हैं.

जहां तक परिवार का सवाल है, तो मेरी बेटी मुझे फिल्मों में पिटते हुए नहीं देख पाती है. मेरी पत्नी मेरे पिटने वाले सीन पर टीवी बंद कर देती थी.

आप की तुलना हिंदी सिनेमा के विलेन अमरीश पुरी और प्राण तक से की जाती है. इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

अगर मेरी ऐक्टिंग की तुलना बौलीवुड के महान ऐक्टर प्राण और अमरीश पुरी से की जाती है, तो यकीनन ही यह मेरे लिए फख्र की बात है. मैं इन दोनों कलाकारों की अदाकारी को बहुत मानता हूं.

आप भोजपुरी फिल्मों के एकमात्र चेहरे हैं, जो नैगेटिव रोल के साथ ही कौमिक और सीरियस रोल में बखूबी फिट बैठते हैं. इस की क्या वजह है?

नैगेटिव किरदार के साथ कौमिक और सीरियस रोल करना बहुत ही मुश्किल होता है. जहां तक इस तरह के रोल के लिए मेरी तैयारियों का सवाल है, तो मैं एक रंगकर्मी रहा हूं, इसलिए ऐसे किसी भी रोल के लिए मैं खुद को हर समय तैयार रखता हूं.

आप ने लौकडाउन के दौर को कैसे जिया?

लौकडाउन का दौर सब के लिए दुखदायी रहा है. लेकिन मैं ने इस दौर को बहुत ही पौजिटिव तरीके से जिया. इस दौरान मैं घर के कामों में अपनी पत्नी की मदद करता था, म्यूजिक सुनता था, किताबें पढ़ना मेरे रूटीन का हिस्सा थीं. मैं ऐक्सरसाइज भी करता था.

फिल्मों में नैगेटिव रोल में अकसर विलेन को पिटना पड़ता है. इस के लिए खुद को फिट रखना आप कितना अहम मानते हैं?

मैं खुद के खानपान और कसरत पर खासा ध्यान देता हूं. इसी की बदौलत मैं ने भोजपुरी सिनेमा की 3 पीढि़यों के साथ काम किया है और आने वाली चौथी पीढ़ी के साथ भी आगे कर रहा हूं.

फाइट सीन करने के लिए किस तरह की तैयारियां करनी पड़ती हैं?

फिल्मों में फाइट सीन को ले कर खासा सजग रहना पड़ता है,क्यों कि जब तक क्लाईमैक्स चलता है, तो हमारी हालत एकदम अस्तव्यस्त होती है, क्योंकि भोजपुरी का इतना बजट नहीं होता है कि नकली धूल लगाएं या कीचड़ की जगह चौकलेट लगाएं. हमें फाइट के दौरान असल में कीचड़ में कूदना पड़ता है. खुद ही यह ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं कंकड़पत्थर न लग जाए.

इस के अलावा कई बार धमाके के सीन में आप को चोट भी लगने का डर बना रहता है, क्योंकि इस में पटाखों का इस्तेमाल होता है, जो आप को घायल भी कर सकता है. ऐसा मेरे साथ एक बार हो भी चुका है. और मेरी आंख में चोट लग गई थी, जिस का निशान आज भी बना हुआ है.

भोजपुरी सिने इंडस्ट्री से सीखी गई अब तक की सब से खास बात क्या है?

भोजपुरी सिनेमा से मैं ने सब से बड़ी बात जो सीखी है, वह है लोगों की मदद करना. इस इंडस्ट्री में मदद करने का जज्बा कूटकूट कर भरा है.

ऐक्टिंग के लिए जद्दोजेहद करने वाले नौजवानों के लिए आप क्या कहना चाहेंगे?

उन के लिए बस इतना ही कहना चाहूंगा कि ऐक्टिंग के लिए खुद को तैयार करें, तभी इस क्षेत्र में आएं. आप के पास जो साधन उपलब्ध हैं, उन के जरीए साधना कीजिए और फिर इस क्षेत्र में कदम रखिए.

‘कुंडली भाग्य’ फेम Mansi Srivastava ने रचाई शादी, ‘इश्कबाज’ की टीम ने यूं मनाया जश्न

‘कुंडली भाग्य’ और ‘इशकबाज’ (Ishqbaaz) फेम एक्ट्रेस मानसी श्रीवास्तव (Mansi Srivastava) और  फोटोग्राफर कपिल तेजवानी 22 जनवरी को शादी के बंधन में बंध गए. दोनों काफी लंबे समय से एक दूसरे को डेट कर रहे थे. कोरोना संक्रमण के नियमों के चलते ज्यादा लोगों को शादी में नहीं बुलाया गया केवल कुछ करीबी दोस्त शादी में मौजूद रहे.

दोस्तों की बात करें तो उनकी बैचलरेट पार्टी में नजर आईं सुरभि चंदना, श्रेनू पारीख, नेहा लक्ष्मी, मृणाल देशराज की टोली ने शादी में भी खूब धमाल मचाया.

फिलहाल मानसी की शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी हैं ,शादी की फोटोज़ में मानसी बेहद खूबसूरत लग रही है. बात करें वेडिंग लुक की तो मानसी ने शादी के लिए सुर्ख  लाल जोड़े को डबल लेयर्ड गोल्डन नेकलेस, मैचिंग ईयरिंग्स, महारानी स्टाइल  में मांग टीका और नथ के साथ कम्पलीट किया. लाइट जूलरी और हेवी लहंगे में मानसी मारवाड़ी दुल्हन से कम नहीं लग रही थी. मानसी ने शादी के दौरान गोल्डन चूड़ा भी पहना था ,जो उनके दुल्हन वाले लुक में चार चाँद लगा रहा था . वहीं कपिल तेजवानी  भी डार्क ब्लू रंग की शेरवानी और गोल्डन रंग के साफे में काफी हैंडसम दिखाई दिए.

मानसी के मंडप तक पहुंचने का एक वीडियो सामने आया है ,जिसमे वो अपनी फॅमिली और रिश्तेदारों के साथ मंडप की  ओर आते हुए दिखाई दे रहीं हैं.यही नहीं एक्ट्रेस काफी खुश दिखाई दे रहीं हैं।,और अपने दोस्तों को फ्लाइंग किस दे रही हैं. शादी के वीडियो की बात करें तो मानसी को देखकर ये लग रहा है कि मानसी ने अपनी शादी का हर एक पल एन्जॉय किया और अपनी स्माइल से सबका दिल भी जीत लिया.

मेरी सगाई हो चुकी है लेकिन मैं शादी को लेकर बिलकुल भी उत्साहित नहीं हूं, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल
मैं 24 वर्षीय युवती हूं. सगाई हो चुकी है. इसी साल के अंत तक मेरी शादी होने वाली है. मैं अपनी शादी को ले कर बिलकुल भी उत्साहित नहीं हूं, क्योंकि मेरे घर वालों ने मेरे मंगेतर और उस के घर वालों को यह नहीं बताया कि मेरी जांघ पर छोटा सा सफेद दाग है. मैं ने 2 साल तक इस की दवा ली थी, इसलिए यह फैला नहीं. इसलिए मेरे माता पिता का कहना है कि इस के बारे में लड़के वालों को बताने की कोई जरूरत नहीं है. मैं अब तक चुप रही हूं पर भयभीत हूं कि शादी के बाद यदि पति को यह बात पता चलेगी तो उन का व्यवहार कैसा होगा? मैं उन की नजरों में गिर जाऊंगी. कृपया बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब
रिश्ता तय होने से पूर्व दोनों पक्षों को वास्तव में एकदूसरे से कोई बात नहीं छिपानी चाहिए. पर चूंकि आप के माता पिता ने आप के भावी ससुराल वालों से यह बात छिपाई है और हो सकता है कि भविष्य में इस बात पर कोई विवाद भी न हो पर तब तक आप चिंतित रहेंगी. अगर डाक्टर ने कहा है कि चिंता की कोई बात नहीं तो आप को यह रहस्य खोलने की जरूरत नहीं. इस तरह की बीमारियां किसी को भी किसी भी आयु में हो सकती हैं.

सावधानी: चाइनीज मांझे से कटती जिंदगी की डोर

 देवेंद्रराज सुथार  

चाइनीज मांझे से  कटती जिंदगी  की डोर  पूरे देश में चाइनीज मांझे पर बैन है, लेकिन आज भी चाइनीज मांझे की खुलेआम बिक्री हो रही है, जिस के चलते आएदिन हादसे हो रहे हैं.  एक मामला दिल्ली के शाहदरा इलाके से सामने आया है, जहां के 46 साल के विजय शर्मा खेड़ा गांव में रहते हैं. वे नंद नगरी की तरफ जा रहे थे. 212 बसस्टैंड के पास चाइनीज मांझा उन के स्कूटर  चला रहे दोस्त के आगे आया, तो उन्होंने हाथ से पीछे की तरफ कर दिया.  वह मांझा विजय के चेहरे को काटता चला गया. इस से उन की भौंहें, पलकें और नाक बुरी तरह से जख्मी हो गईं.   जीटीबी अस्पताल और दयानंद अस्पताल के डाक्टरों ने पलक पर टांके लगाने में दिक्कत बताई, तो प्राइवेट नर्सिंगहोम में इलाज करवाया. उन के चेहरे पर 23 टांके आए.

34 साल के राधेश्याम दिल्ली के जगतपुरी ऐक्सटैंशन में रहते हैं. 5 जून, 2021 की शाम दुर्गापुरी से आते समय नत्थू कालोनी फ्लाईओवर पर पहुंचे. अचानक ही उन के आगे चाइनीज मांझा आ गया, जिस से उन की गरदन पर  कट लग गया. उन्होंने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल रोक दी और खुद को मांझे से अलग किया. उन के गले का घाव पूरी तरह से भरा नहीं है.

33 साल की गीतांजलि आईएसबीटी की तरफ से स्कूटर पर अपने मायके दिलशाद गार्डन जा रही थीं. वे मार्शल आर्ट की इंटरनैशनल खिलाड़ी हैं और कोचिंग भी करती हैं. जब वे वैलकम फ्लाईओवर से नीचे उतर रही थीं, तो अचानक मांझा उन के आगे आ गया.  उन्होंने तुरंत स्कूटर में ब्रेक लगाए और गरदन को साइड करने की कोशिश की, इसलिए उन की गरदन को साइड की तरफ से मांझा चीरता चला गया. वे 10 दिन तक घर से बाहर नहीं निकल सकीं.

38 साल के वहीद दिल्ली के ब्रह्मपुरी इलाके की गली नंबर 21 में रहते हैं. शास्त्री पार्क फ्लाईओवर पर उन के गले में मांझा उलझ गया. गले में कट लगने से जलन होने लगी, तो उन्होंने हाथ से हटाने की कोशिश की.  मांझे से उन की उंगली भी कट गई. जख्मी हालत में उन्हें जगप्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया, जहां उन की उंगली में 3 टांके आए. चांदनी चौक का चैरिटी बर्ड्स अस्पताल दिल्ली का एकलौता ऐसा अस्पताल है, जहां हर नस्ल के पक्षी  का मुफ्त इलाज किया जाता है. इस अस्पताल में रोजाना तकरीबन 70 से  80 पक्षियों को इलाज के लिए लाया जाता है. दिल्ली के खुले आसमान में उड़ रहे इन परिंदों पर चाइनीज मांझा  कहर बन कर टूट जाता है.  पिछले साल 13, 14 और 15 अगस्त के इन 3 दिनों में चाइनीज मांझे की चपेट में आने से तकरीबन 550 पक्षी घायल हो गए, जिन्हें इस अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया था.  सब से चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि इन 3 दिनों में तकरीबन 200 पक्षियों की चाइनीज मांझे की चपेट में आने से मौत हो गई, जिन में तोता, मैना, कबूतर, चील और दूसरे पक्षी शामिल हैं.  ज्यादातर मामलों में इन बेजबान पक्षियों की गरदन और पंख मांझे की चपेट में आए. सैकड़ों ऐसे पक्षी भी हैं, जो अब कभी खुले आसमान में उड़ नहीं पाएंगे. प्लास्टिक की डोर में पक्षियों के पंख उलझ जाते हैं और वे इस डोर को काट नहीं पाते, जिस के चलते उन की जान चली जाती है.

नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जुलाई, 2017 में खतरनाक चीनी मांझे की बिक्री पर पूरे देश में बैन लगा दिया था. पीपल्स फोर एथिकल ट्रीटमैंट औफ एनिमल यानी ‘पीटा’ की अर्जी पर यह आदेश आया था. इस में कहा गया था कि पतंग उड़ाना देश की परंपरा रही है, लेकिन खतरनाक चीनी मांझे से पशुपक्षी और लोग बुरी तरह जख्मी हो जाते हैं. मांझा बनाने वाली कंपनियां सुप्रीम कोर्ट गईं, जिन्हें वहां से राहत नहीं मिली. चाइनीज मांझा, जिसे कुछ लोग ‘प्लास्टिक मांझा’ भी कहते हैं, में कुल  5 तरह के कैमिकल और दूसरी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है. इन में सीसा, वजरम नामक औद्योगिक गोंद, मैदा फ्लौर, एल्युमीनियम औक्साइड और जिरकोनिया औक्साइड का इस्तेमाल होता है. इन सभी चीजों को मिला कर कांच के महीन टुकड़ों से रगड़ कर तेज धार वाला चाइनीज मांझा तैयार किया जाता है. सामान्य मांझे की अपेक्षा चाइनीज मांझा सस्ता होने से इस की बिक्री तेजी से होती है. यह मजबूत तो होता ही है, इस में धार भी काफी होती है. इस की डिमांड ज्यादा होती है.

चीनी मांझे की 6 रील की एक चरखी (एक रील में तकरीबन 1,000 मीटर होता है) 500 रुपए की आती है. देशी मांझे की 6 रील की चरखी 1,500 रुपए तक की आती है.  चाइनीज मांझे पर दुकानदारों का मार्जिन ज्यादा है, इसलिए वे इसे चोरीछिपे बेच रहे हैं. जरूरत है कि प्रशासन चाइनीज मांझे की हो रही गैरकानूनी बिक्री को ले कर अपनी कार्यवाही तेज करे. ऐसे दुकानदारों पर तुरंत शिकंजा कसे, जो नियमों की सीमा लांघ कर गैरकानूनी तौर पर चाइनीज मांझे का कारोबार  करते हैं.  पतंगबाजी सामूहिक रूप से किसी खुले मैदान में एक निश्चित समय  सीमा में हो, ताकि इन पक्षियों की हंसतीखिलखिलाती दुनिया सलामत रह सके और इनसान जख्मी होने व अपनी जान से हाथ धोने से बच सकें.

सियासत : इत्र, काला धन और चुनावी शतरंज

शैलेंद्र सिंह

गांवदेहात की एक बहुत पुरानी कहावत है, ‘कहता तो कहता, सुनता ब्याउर’. इस का मतलब है कि कहने वाला तो जैसा है वैसा है ही, सुनने वाला भी अपना दिमाग नहीं इस्तेमाल करता. वह भी झूठ को सच मान लेता है.

कुछ इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश की ‘इत्र नगरी’ कन्नौज में इत्र और गुटके का कारोबार करने वाले पीयूष जैन के यहां इनकम टैक्स का छापा पड़ा. पीयूष जैन पर टैक्स न अदा करने और काला धन रखने का आरोप लगा. उन के यहां से बहुत सारा पैसा नकदी के रूप में मिला.

इस को ले कर राजनीति होने लगी. भारतीय जनता पार्टी के नेता पीयूष जैन को समाजवादी पार्टी का नेता बताते हुए कहते हैं कि ‘समाजवादी इत्र बनाने वाले कारोबारी के घर से काला धन निकला है’.

इस के बाद केवल छोटेमोटे लोकल नेता ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक इस का जिक्र करने लगते हैं. एक तरह से ‘इत्र’ की खुशबू को काले धन की ‘बदबू’ में बदल दिया जाता है. झूठ बोलने में न तो कहने वाला कुछ संकोच कर रहा है और न समझने वाला अपना दिमाग लगाना चाह रहा है.

क्या भारतीय जनता पार्टी का यह ‘मिथ्या प्रचार’ कामयाब हो गया? वैसे, किसी ने यह जानने और समझने की कोशिश नहीं की कि पीयूष जैन कौन हैं? उन का समाजवादी पार्टी के साथ किसी भी तरह का संबंध है भी या नहीं? समाजवादी इत्र किस ने बनाया था?

पीयूष जैन के जरीए समझा जा सकता है कि सोशल मीडिया के जमाने में राजनीतिक दलों के लिए काम करने वाली आईटी सैल किस तरह से सच को झूठ में बदल सकती है. ऐसा अकेले पीयूष जैन के ही साथ नहीं हुआ है, बल्कि बहुत सारे ऐसे नेताओं के साथ हुआ है, जो भाजपा और उस की विचारधारा के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाते हैं.

इस का एक बहुत बड़ा उदाहरण कांग्रेस नेता राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी को आईटी सेल की ताकत ने ‘पप्पू’ में बदल दिया. इस दिशा में बहुत सारे नाम हैं, जिन्हें आईटी सैल ने हीरो से विलेन बना दिया.

याद रहे कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भी वहां पर केंद्र सरकार की एजेंसियों ने ममता बनर्जी पर शिकंजा कसने की कवायद की थी, पर पश्चिम बंगाल की जनता ने केंद्र की ‘डबल इंजन’ सरकार को धो डाला था.

अब कन्नौज के रहने वाले पीयूष जैन पर आते हैं. उन का कुसूर इतना था कि वे उस महल्ले में रहते हैं, जहां समाजवादी पार्टी के विधायक पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन भी रहते हैं. वे दोनों ही जैन हैं और इत्र व गुटके के कारोबार से जुड़े हैं. जैसे ही पीयूष जैन के यहां छापा पड़ा और तथाकथित काला धन मिला, भाजपा की आईटी सैल ने पीयूष जैन को सपा विधायक पुष्पराज जैन के रूप में बदनाम करना शुरू कर दिया.

छापा और बरामदगी

यह बात सच है कि पीयूष जैन के घर से जो पैसा बरामद हुआ, वह आंखें खोल देने वाला था. पर इस छापे में मिली रकम से 2 बातें भी साफ होती हैं कि सरकार नोटबंदी के बाद जिस काले धन के खत्म होने की बात कर रही थी, वह सही नहीं है. नोटबंदी से काले धन को रोकने में कोई मदद नहीं मिली, उलटे छोटे कारोबारी खत्म हो गए, क्योंकि अगर काले धन पर लगाम लग गई होती तो पीयूष जैन के यहां से इतना पैसा नहीं निकलता.

दूसरी बात यह कि भाजपा सरकार ने यह दावा भी किया था कि जीएसटी के बाद टैक्स चोरी खत्म हो गई है या न के बराबर रह गई है, पर यहां भी वह मात खा गई.

बहरहाल, पीयूष जैन को टैक्स चोरी के आरोप में अहमदाबाद की जीएसटी इंटैलिजैंस टीम ने 50 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद गिरफ्तार किया. उन्हें सीजीएसटी ऐक्ट की धारा-69 के तहत गिरफ्तार कर पूछताछ के लिए कानपुर से अहमदाबाद ले जाया गया.

सर्विस ऐंड सर्विसेज टैक्स के अफसरों ने बताया कि छापामारी में इत्र कारोबारी के घर के अंदर एक बड़ा तहखाना मिला और 16 बेशकीमती प्रोपर्टी के दस्तावेज मिले. इन में कानपुर में 4, कन्नौज में 7, मुंबई में 2, दिल्ली में एक और दुबई की 2 प्रोपर्टी के दस्तावेज शामिल हैं.

इस के अलावा 18 लौकर और 500 चाबियां मिलीं. कुलमिला कर शुरुआती 120 घंटे की कार्यवाही में पीयूष जैन के ठिकानों से 257 करोड़ रुपए नकद और कई किलो सोना बरामद हुआ.

पीयूष जैन के घर में इतने पैसे मिले कि नोट गिनने के लिए मशीनें लाई गईं. कुल 8 मशीनों के जरीए पैसे को गिना गया.

कैसे खुला काला सच

अहमदाबाद की जीएसटी टीम को पुख्ता जानकारी मिली थी कि कानपुर में एक ट्रांसपोर्ट बिजनैसमैन टैक्स चोरी करता है. दरअसल, अहमदाबाद में एक ट्रक पकड़ा गया था. इस ट्रक में जा रहे सामान का बिल फर्जी कंपनियों के नाम पर बनाया गया था. सभी बिल 50,000 रुपए से कम के थे. टीम ने उस ट्रांसपोर्टर के घर और दफ्तर पर छापा मारा. वहां पर डीजीजीआई को तकरीबन 200 फर्जी बिल मिले. वहीं से पीयूष जैन और फर्जी बिलों के कनैक्शन का पता लगा. इस के बाद पीयूष जैन के घर पर छापामारी की गई.

पीयूष जैन कन्नौज की मशहूर इत्र वाली गली में इत्र का कारोबार करते हैं. इन के मुंबई में भी औफिस हैं. इनकम टैक्स को इन की तकरीबन 40 से ज्यादा ऐसी कंपनियां मिली हैं, जिन के जरीए पीयूष जैन अपना इत्र कारोबार चला रहे थे. वे गुटके के कारोबार से भी जुड़े हैं. कानपुर के ज्यादातर पान मसाला बनाने वाले उन के ग्राहक हैं. वे पीयूष जैन से ही पान मसाला कंपाउंड खरीदते हैं. गुटके के बिजनैस का कारोबार बढ़ने की वजह से ही पीयूष जैन को कन्नौज छोड़ कर कानपुर जाना पड़ा.

पीयूष जैन के पिता महेश चंद्र जैन कैमिस्ट की अच्छी जानकारी रखते हैं और उन का कारोबार भी इत्र से न जुड़ा हो कर कैमिस्ट की कंपाउंडिंग से जुड़ा हुआ है. पीयूष जैन के एक और भाई हैं अमरीश जैन. वे दोनों ही भाई कभी कन्नौज तो कभी कानपुर के घर पर रहते हैं. इन के पिताजी महेश चंद्र जैन ज्यादातर कन्नौज के मकान में रहते हैं.

50 साल के पीयूष जैन एक बहुत ही लोप्रोफाइल बिजनैसमैन हैं, जो एक आम जिंदगी बिताते हैं. वे अभी भी स्कूटर पर चलते हैं. उन के घर से सोना और नकदी बरामद होने के बाद और टैक्स चोरी के आरोप में कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.

जब पीयूष जैन के कानपुर वाले घर पर डीजीजीआई टीम की छापेमारी हुई, उस के बाद से उन का संबंध समाजवादी पार्टी और कन्नौज से समाजवादी पार्टी के एमएलसी पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन से जोड़ा जाने लगा. ऐसे में जब इस बात की पड़ताल की गई, तो पता चला कि पीयूष जैन और पुष्पराज जैन का आपस में कोई संबंध नहीं है. बस, इतना ही संबंध है कि वे दोनों एक ही जगह महल्ला छिपट्टी के रहने वाले हैं. वे दोनों जैन हैं और इत्र कारोबारी भी हैं. उन की आपस में न तो कोई रिश्तेदारी है और न ही कोई राजनीतिक संबंध.

समाजवादी इत्र को पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन ने लौंच किया था. इस से पीयूष जैन का कोई संबंध नहीं था. 60 साल के पुष्पराज जैन को कन्नौज में ‘परोपकारी’ और ‘राजनेता’ कहा जाता है. उन के पास एक पैट्रोल पंप और कोल्ड स्टोरेज यूनिट है. वे खेतीबारी से भी कमाई करते हैं और उन के पास मुंबई में भी घर और दफ्तर हैं. पुष्पराज जैन को साल 2016 में इटावाफर्रुखाबाद से एमएलसी के रूप में चुना गया था. वे प्रगति अरोमा औयल डिस्टिलर्स प्राइवेट लिमिटेड के सहमालिक हैं. उन के इस बिजनैस की शुरुआत उन के पिता सवाई लाल जैन ने साल 1950 में की थी.

पुष्पराज जैन और उन के 3 भाई कन्नौज में कारोबार चलाते हैं और एक ही घर में रहते हैं. उन के 3 भाइयों में से 2 भी मुंबई औफिस में काम करते हैं, जबकि तीसरा भाई उन के साथ कन्नौज में मैन्युफैक्चरिंग सैटअप पर काम करता है.

साल 2016 में पुष्पराज जैन के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, पुष्पराज और उन के परिवार के पास 37.15 करोड़ रुपए की चल संपत्ति और 10.10 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति है. उन का कोई आपराधिक रिकौर्ड नहीं है और उन्होंने कन्नौज के स्वरूप नारायण इंटरमीडिएट कालेज में 12वीं जमात तक पढ़ाई की है.

इन का है समाजवादी इत्र

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने ‘इत्र नगरी’ कन्नौज से सांसद होने का सफर शुरू किया तो उन के साथ इत्र कारोबारी पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन भी पार्टी में शामिल हो गए और धीरेधीरे उन की गिनती अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में होने लगी. इस के बाद उन्होंने समाजवादी इत्र का निर्माण कर उसे लौंच किया और पार्टी से एमएलसी का चुनाव लड़ कर जीत हासिल की.

पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन शुरू से ही अपने पुश्तैनी घर पर रहे हैं और घर के पास ही इत्र का कारखाना लगाए हुए हैं, जहां से इत्र तैयार हो कर देशविदेश में भेजा जाता है.

पीयूष जैन के घर हुई छापेमारी के बाद पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन भी सुर्खियों में आ गए. भाजपा के लोगों ने पीयूष जैन को ही समाजवादी पार्टी का नेता बताना शुरू कर दिया, तो अखिलेश यादव ने उन पर आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा ने पुष्पराज उर्फ पंपी जैन के घर छापा मारने के लिए कहा था, पर अफसर गलती से पीयूष जैन के घर पर छापा मार बैठे. पीयूष जैन के घर जो काला धन मिला है, उस से सपा का कोई मतलब नहीं है. यह सारा पैसा भाजपा के नेताओं का है. अफसरों की गलती से भाजपा का सच बाहर आ गया है.

अखिलेश यादव ने दावा किया कि भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार का असली निशाना पुष्पराज जैन थे, जिन्होंने हमारे लिए परफ्यूम बनाया था. उन्होंने (भाजपा) मीडिया के जरीए विज्ञापन दिया कि जिस पर छापा मारा गया, वह आदमी सपा का है. बाद में लोग सम?ा गए कि सपा के एमएलसी का इस से कोई लेनादेना नहीं है. भाजपा के लोग ‘सपा के इत्र कारोबारी पर छापा’ को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगे. यह सब ‘डिजिटल इंडिया’ की गलती की तरह लग रहा था.

काले धन पर प्रधानमंत्री का निशाना

समाजवादी पार्टी को बदनाम करने के लिए काले धन के आरोपी पीयूष जैन को सपाई नेता साबित करने की लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कूद पड़े. नरेंद्र मोदी का भाषण देश के प्रधानमंत्री का भाषण होता है. इस के तथ्यों में गलतियां नहीं होनी चाहिए. पीयूष जैन और पुष्पराज जैन के बीच के फर्क को पीएमओ के लोग भी नहीं समझ पाए या उत्तर प्रदेश में चुनावी फायदे के लिए इस फर्क को जानबूझ कर मिटाने का काम किया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीयूष जैन के घर हुई छापेमारी का इशारे से जिक्र किया, जिस में 194 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकदी बरामद हुई है और समाजवादी पार्टी पर सत्ता में अपने कार्यकाल के दौरान पूरे उत्तर प्रदेश में ‘भ्रष्टाचार का इत्र’ छिड़कने का आरोप लगाया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीयूष जैन पर मारे गए छापे का जिक्र किया और कहा कि उन्होंने (सपा) साल 2017 से पहले पूरे उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार की इत्र बिखेर दी थी, जो सभी के सामने है, मगर अब वे अपना मुंह बंद रखे हुए हैं और के्रडिट लेने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं. नोटों का पहाड़, जिसे पूरे देश ने देखा है, यही उन की उपलब्धि और हकीकत है.

झूठ को सच में बदलने के लिए छापेमारी

बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस भाषण की आलोचना होने लगी. समाजवादी पार्टी ने भाजपा के इस झूठ को मुद्दा बना लिया. इस के बाद अचानक समाजवादी पार्टी के एमएलसी पुष्पराज जैन उर्फ पंपी जैन के कारोबारी ठिकानों पर भी इनकम टैक्स वालों की छापेमारी होने लगी. इस को अखिलेश यादव ने पकडे़ गए झूठ को सच में बदलने की कोशिश बताया.

सपा नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि जबजब चुनाव आता है, तो छापे मारने वाले अफसरों की गाडि़यों पर लिख दिया जाता है, ‘आल इलैक्शन ड्यूटी’. तो ये तो इलैक्शन ड्यूटी पर हैं. वे अपना काम कर रहे हैं. अगर वे प्रोफैशनली करना चाहते थे, तो चुनाव से ठीक पहले यह छापे क्यों मारे जा रहे हैं? इस से पहले क्या इनकम टैक्स विभाग सो रहा था? सरकारी एजेंसियां दबाव में भी काम कर रही हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को कितनी परेशानी उठानी पड़ी, पर जीत ममता की हुई, भाजपा को मुंह की खानी पड़ी. उत्तर प्रदेश में भी यही होगा. जनता भाजपा को सबक सिखाने के लिए तैयार है.

Bigg Boss 15: मिड वीक एविक्शन में ये कंटेस्टेंट हुआ घर से बाहर! भड़के फैंस

बिग बॉस का घर वैसे तो हमेशा से सुर्ख़ियों में रहा है, लेकिन बिग बॉस 15 का आगाज़ ही सुर्ख़ियों से हुआ था. शुरू से ही बिग बॉस  कंटेस्टेंट उमर रियाज, प्रतीक सहजपाल, देवोलीना भट्टाचार्जी, तेजस्वी प्रकाश, करण कुंद्रा और रश्मि देसाई के बीच किसी न किसी बात को लेकर हमेशा लड़ाई देखने को मिली है. शो की टीआरपी  वैसे ही बहुत नीचे चल रही है, उपर से कोई न कोई कंटेस्टेंट घर में बवाल करते हुए नज़र आते हैं.

पिछले दिनों उमर रियाज़ को हिंसा करने के आरोप में घर से बेघर कर दिया था ,इस एविक्शन से वैसे ही उमर के फैंस काफी नाराज़ थे. लेकिन अब मिड वीक में भी एक और एविक्शन होने से सोशल मीडिया  पर जमकर हंगामा हो रहा है. इसी बीच शो को बॉयकॉट करने की मांग भी सुनने मिल रही है. शो के मेकर्स इस बात को लेकर काफी परेशान हैं.

ये कंटेस्टेंट हुआ घर से बाहर!

खबरों की माने तो बिग बॉस के टास्क टिकिट तो फिनाले  के दौरान रशिम देसाई और देवोलिना में किसी बात को लेकर काफी तू-तू मैं-मैं हुई, लेकिन हद तो तब हो गई जब रश्मि ने अपनी दोस्ती को भुलाकर देवोलिना को चांटा जड़ दिया. रश्मि के इस व्यवहार से बिग बॉस काफी नाराज़ हुए और उन्हें घर में हिंसा करने के आरोप में मिड वीक में ही घर से बाहर कर दिया. बिग बॉस के लाइव फीड में कोई भी कंटेस्टेंट की मूवमेंट फैंस को देखने नहीं मिलीऔर रश्मि की गैरमौजूदगी से उनके फैंस समझ गए कि शो से रश्मि को बेघर कर दिया गया है.

रश्मि देसाई के फैंस ने अपना गुस्सा सोशल मीडिया पर जमकर निकाला, और शो को बंद करने की मांग भी की. रश्मि के फैंस के अनुसार रश्मि बिग बॉस की स्ट्रांग कंटेस्टेंट हैं और टॉप 5 की दावेदार भी.

एक यूज़र ट्वीट करके कहा कि ‘सब झुंड में खेलते हैं, रश्मि ने अकेले ही बहुत अच्छा गेम खेला’ यहीं कारण है कि बिग बॉस की टीआरपी नहीं आ रही.’

एक अन्य यूज़र ने भी लिखा कि ‘रश्मि टॉप 5 में जाना डिसर्व करती हैं ,ये उनके साथ अनफेयर है. और अगर वोट कि बात है तो राखी सावंत को शो से बाहर करो ‘

हिंदू धर्म के ठेकेदारों ने जो नफरत फैलाई है उसमें पिसेंगे हम सभी

नफरत का जो माहौल देश में 20-25 सालों में बनाया जा रहा है .इस का मतलब असल में इतिहास के काले धब्बों को धोना नहीं है, अपनी दुकान चमकाना मात्र है. हिंदू धर्म के दुकानदारों को राजाओं की छत्रछाया भारत के काफी बड़े हिस्से में पिछले 1000 साल तक नहीं मिली. हालांकि समाज पर उन का कंट्रोल पूरा रहा और दलितों (अछूतों), पिछड़ों (शूद्रों) और दूसरों जैसे बनियों, किसानों, कारीगरों पर वे धर्म का नाम ले कर अपना दबदबा बनाए रख सके.

अब हिंदूमुसलिम या हिंदूईसाई को ले कर जो नफरत कभी राममंदिर, कभी गौपूजा, कभी आरक्षण, कभी पाकिस्तान से बदला, कभी कश्मीर को ले कर फैलाई जाती है उस में मतलब एक ही रहता है कि धर्म के ठेकेदार बिना काम किए पैसा भी पाते रहें और पावर में भी रहें. इस में कहना पड़ेगा कि वे पूरी तरह सफल रहे हैं और न सिर्फ पिछड़ों, दलितों, दूसरे धर्म वालों, ऊंचों को भी लूटने और उन की औरतों को पूरी तरह गुलाम सा बनाए रख पाए हैं.

हरिद्वार की हिंदू संसद सभा में कालीचरण, बैंगलुरु के सांसद एलएस तेजस्वी सूर्या और बुल्ली बाई वाले विशाल झा और श्वेता सिंह की बातों से असली चोट अगर किसी को लगती है तो वे पिछड़े और दलित हैं, हिंदूमुसलिम का नाम ले कर, वोट पा कर, धर्म के ठेकेदार मंदिरों को बनवा रहे हैं, तीर्थों को ठीक कर रहे हैं, नएनए तीर्थस्थान बनवा रहे हैं, मुफ्त में खानेपीने के अपनी जाति वालों के लिए होटलों का इंतजाम कर रहे हैं, पढ़ाई पर कब्जा कर रहे हैं, नौकरियों और धंधों को पहले की तरह अपनी मुट्ठी में कर रहे हैं.

नफरत का धुआं जब फैलता है तो चारों ओर फैलता है. नफरत के उपले जलाएंगे तो धुआं जलाने वालों के घरों में भी घुसेगा. नफरत की आंधी में दूसरों के घरों को उड़वाने की साजिश में धर्म के दुकानदार भूल गए कि उन के अपने मकान, उन के अपने ऐशगाह के स्थान बनाने तो ये ही आएंगे जो नफरत के शिकार हैं. यह नफरत का कीड़ा केवल मुसलिमों और ईसाइयों को ही नहीं काटेगा, यह खुद ऊंची जातियों में घुस जाएगा.

आज देशभर के घरों में नफरत करना सिखाना पहला काम हो गया है. लोगों को साथ काम करने से पहले सभी से नफरत करना सिखाया जा रहा है. बच्चों को मिड डे मील खाने में दलित औरत का पकाया खाना न खाने का पाठ पढ़ाया जा रहा है. भेदभाव पहले भी था, पर तब सब अपनेअपने दायरे में रहते थे जो खुद गलत था पर तब नफरत न थी, उसे रास्ते के पत्थर व गड्ढे मान कर कुदरत की देन माना जाता था जिसे पिछले जन्मों के कर्मों का फल बता कर समझाया जाता था.

आज भी भेदभाव नफरत की शक्ल में बदल गया है. आज हर पिछड़े व दलित से नफरत हो गई है. किसानों को ले कर न जाने क्याक्या कहा गया है क्योंकि वे गैरजरूरी कानूनों का विरोध कर रहे थे, पर वे नीची जातियों के, वे ऊंची जातियों की नफरत पर सवाल उठाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. हर दूसरे धर्म वाले से नफरत सिखाई जा रही है पर इस का मतलब यह भी है कि अपने खुद के सगों के साथ भी नफरती रवैया अपनाने की आदत पड़ना. अब मंदिरों में चढ़ावे के लिए मारपीट आम हो गई है. अब मंदिरों की सी पढ़ाई पढ़ाने वाले स्कूलों में जबरदस्त गुटबाजी शुरू हो गई है. स्वामियों में आपसी ईर्ष्या पैदा हो गई है.

नफरत का मतलब है कि आप पड़ोसी को दुश्मन मानें, दोस्त नहीं. साथ देने वाले को हमलावर मानें, बचाने वाला नहीं. शहरों, गांवों में जो आज अकेलापन दिखता है, वह इसी नफरत का नतीजा है जो हिंदू धर्म के ठेकेदारों ने फैलाई है पर पिसेंगे सब इस में.

मैं टीवी, फिल्म और ओटीटी पर काम करना चाहती हूं – रानी चटर्जी

शांतिस्वरूप त्रिपाठी

भोजपुरी फिल्मों में अपनी मजबूत जगह बनाने वाली खूबसूरत और सैक्सी हीरोइन व लोगों के दिलों की मलिका रानी चटर्जी ने ‘दंगल टीवी’ के सीरियल ‘सिंदूर की कीमत’ में नए साल के जश्न में ठुमके लगाए.

अपने इस खास डांस नंबर के लिए रानी चटर्जी ने कातिलाना कौस्ट्यूम पहन रखी थी. नीले रंग की पोशाक में वे लोगों के दिलों को लूटती नजर आईं. कपड़ों से मैच करती चूडि़यां, माथे पर जूलरी और आकर्षक झुमके के साथ जब रानी ने ठुमके लगाने शुरू किए, तो हर कोई दंग रह गया.

सीरियल ‘सिंदूर की कीमत’ में रानी चटर्जी का आगमन भले ही खास डांस के साथ हुआ हो, मगर इस की बैकग्राउंड में रोचक कहानी है. रानी चटर्जी चैरिटी कर पैसा जमा करती हैं और वे यह पैसा उस आश्रम को दान करती हैं, जहां सीरियल की अहम किरदार मिश्री का पालनपोषण हुआ था. इस तरह वे मिश्री को जानती हैं.

भोजपुरी सिनेमा में रानी चटर्जी का अपना एक अलग मुकाम है. पिछले 17 साल के अपने कैरियर में वे ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’, ‘देवरा बड़ा सतावेला’, ‘दामादजी’, ‘कर्ज’, ‘वकालत’, ‘रंगबाज’, ‘इच्छाधारी’, ‘छोटी ठकुराइन’ समेत 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में अपनी अदाकारी का जलवा दिखा कर जबरदस्त शोहरत बटोर चुकी हैं.

भोजपुरी सिनेमा में रानी चटर्जी की गिनती ग्लैमरस अदाकारा के रूप में होती है. पिछले साल वे वैब सीरीज ‘मस्तराम’ में भी नजर आई थीं. वे कलर्स टीवी पर रिएलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में भी आ चुकी हैं. साल 2020 में कोरोना महामारी के समय रानी चटर्जी ओटीटी प्लेटफार्म ‘एमएक्स प्लेयर’ पर वैब सीरीज ‘मस्तराम’ में रानी का किरदार निभाते हुए अपना जलवा दिखा चुकी हैं.

वैब सीरीज ‘मस्तराम’ की कहानी 80 के दशक के एक ऐसे लेखक और कहानीकार की है, जिस की कहानियां प्रकाशक छापने से इनकार कर देते हैं. लेखक की माली हालत खराब होती है. अचानक एक दिन एक सैक्सी फिल्म देख कर उस के दिमाग में कहानियों को ले कर एक नई कल्पना जन्म लेती है. उस के बाद वह अपने आसपास की औरतों पर नजर दौड़ाता है और ऐसी कहानियां लिखना शुरू करता है, जिन में सैक्स का तड़का होता है.

वैब सीरीज ‘मस्तराम’ के एक ऐपिसोड की कहानी में रानी चटर्जी ने ऐक्टिंग की है. इस में उन्होंने पहाड़ की वादियों में पलीबढ़ी एक लड़की रानी का किरदार निभाया है, जो बंजारन जैसी लड़कियों की तरह रंगबिरंगे बहुत छोटे कपड़े पहनती है, जिस से उस के अंदर की मादकता झलकती रहती है. रानी बस में ‘चना जोर गरम’ की आवाज लगाते हुए चना बेचती है. बस के मुसाफिर चना जोर गरम के बहाने कम कपड़ों से रानी के बदन से ?ांकते उभारों का मजा लेते रहते हैं.रानी चटर्जी कहती हैं, ‘‘मुझे किसी भी माध्यम में काम करने से परहेज नहीं है. मैं टीवी, फिल्म व ओटीटी पर भी काम करना चाहती हूं, बशर्ते किरदार दमदार हो. मुझे मौका मिले, तो मैं थिएटर भी करना चाहती हूं.’’

मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता हूं, वह भी मुझे प्यार करती थी लेकिन अब उसने मुझसे बात करनी बंद कर दी है, क्या करना चाहिए?

सवाल
मैं एक युवती से उस समय से प्यार करता हूं जब हम कक्षा 6 में पढ़ते थे. वह भी मुझे खूब प्यार करती थी. हमारा आपस में इतना प्यार था कि अगर किसी एक को चोट लगती तो दर्द दूसरे को होता था. अचानक 19 अप्रैल, 2013 को उस के पापा ने हमें साथ साथ देख लिया. उस दिन के बाद से हम दोनों की बातचीत कम होती गई. 19 अप्रैल के बाद से उस ने बात करनी बंद कर दी. मैं ने उस से बात करने की बहुत कोशिश की तब जा कर 1 साल बाद उस से मेरी बात हुई. मेरे यह पूछने पर कि क्या मेरे प्यार में कोई कमी रह गई थी, उस ने सिर्फ इतना ही कहा कि अब वह मुझ से प्यार नहीं कर सकती. मुझे यह सुन कर बड़ा सदमा लगा. उस दिन से आज तक मैं उसे मिस करता हूं. अपनी दास्तान का यह तो एक पेज ही है, बाकी पूरी बुक दिल व दिमाग में है. सो, प्लीज बताएं, मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब
आप ने अपने एसएमएस में अपनी वर्तमान आयु के बारे में कोई जिक्र नहीं किया. अगर आप को लगता है कि उस के फादर के देखने के बाद पूरी कहानी बदल गई है और अब पहले जैसा प्यार संभव नहीं हो पा रहा है तो आप भी खुद को चेंज कीजिए. अगर पढ़ने की उम्र में कोई इन किस्सों में खुद को शामिल कर लेता है तो उस का विशेष दायित्व बनता है कि वह ऐसा कुछ खास करे कि कोई भी उस की ओर उंगली उठा कर यह न बोले कि आशिकी के चलते जीवन संवारते भी कैसे? आप अपना ध्यान और कामों में लगाइए. शुरू में कुछ दिक्कत होगी लेकिन कोशिश करने पर सफलता अवश्य मिलेगी ही.

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