रायबहादुर घर में आए इस बदलाव को महसूस तो कर रहे थे पर कारण समझने में असमर्थ थे इसलिए केवल मूकदर्शक ही बन कर रह गए थे. इनसान बाहर के दुश्मनों से तो लड़ सकता है किंतु जब घर में ही कोई विभीषण हो तो कोई क्या करे. अपनों से धोखा खाना बेहद सरल है. कहते हैं कि औरत ही घर बनाती है और वही बिगाड़ती भी है. यदि परिवार में एक भी स्त्री गलत मंतव्य की आ जाए तो विनाश अवश्यंभावी है.
उम्र बढ़ने के साथसाथ आरती की चचिया सास के निरंकुश शासन का साम्राज्य भी बढ़ता रहा. इस बात का तकलीफदेह अनुभव तब हुआ जब चाचीजी के सौतेले भाई ने अपने बेटे के विवाह में बहन की नाराजगी के डर से अजय व रायबहादुर को विवाह का आमंत्रणपत्र ही नहीं भेजा. लोगों द्वारा उन के न आने का कारण पूछने पर उन का पैसों का अहंकार प्रचारित कर दिया गया. हालांकि चाचाजी ने इस का विरोध किया था किंतु तेजतर्रार चाची के सामने उन की आवाज नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई थी.
मृतप्राय रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील उन्होंने तब ठोंक दी जब अजय के बेटे अंशुल के जन्मदिन की पार्टी में रायबहादुर द्वारा सानुरोध सपरिवार आमंत्रित होेने के बाद भी केवल चाचाजी थोड़ी देर के लिए आ कर रस्म अदायगी कर गए. केवल लोकलाज के लिए रिश्तों को ढोते रहने का कोई अर्थ नहीं रह गया था. इसीलिए सगी भतीजी नेहा के विवाह आमंत्रण पर अजय ने साफ कह दिया कि यदि चाचाजी के परिवार को बुलाया गया तो हमारा परिवार नहीं जाएगा.
हमेशा की तरह बिना कारण पूछे विजय छूटते ही बोला, ‘अजय, तुम तो लड़ने का बहाना ढूंढ़ते रहते हो, इसीलिए सब तुम से दूर होते जा रहे हैं.’
‘अपने दूर क्यों हो रहे हैं, यह आप नहीं समझ सकते क्योंकि समझना ही नहीं चाहते. मैं न किसी से लड़ने जाता हूं और न अहंकारी हूं. हां, साफ कहने का माद्दा रखता हूं और गलत बात बरदाश्त नहीं करता. मुझे तो भाई आश्चर्य इस बात का है कि जब वे आप को गलत नहीं लगे तो मैं क्यों लग रहा हूं या तो आप को पूरी बातें पता ही नहीं हैं या मेरी इज्जत आप के लिए कोई माने नहीं रखती है. कोई हो या न हो पर पिताजी मेरे साथ हैं और यही मेरे लिए काफी है,’ अजय एक सांस में बोल गया.
‘तुम्हीं लोगों को शिकायतें रहती हैं. पिताजी तो मेरे यहां हर फंक्शन पर आते हैं और चाचाजी व अन्य सब से ठीक से बोलते भी हैं.’
‘संतान का मोह ही उन्हें खींच कर ले जाता है. संतान चाहे कितना भी दुख दे मांबाप का प्यार तो निस्वार्थ होता है. आप ने कभी उन का दर्द महसूस ही नहीं किया. रही बात चाचाजी से पिताजी के बोलने की, तो हम लोग उस स्तर तक असभ्य नहीं हो सकते कि कोई बात करे तो जवाब न दें या अपने घर फंक्शन पर बुला कर खाने तक के लिए न पूछें. क्या आप के लिए चाचाजी, सगे भाई व पिता की खुशी से भी ज्यादा बढ़ कर हैं?’
‘जो भी हो…पर अजय…अब केवल तुम्हारे लिए मैं चाचाजी के पूरे परिवार को तो नहीं छोड़ सकता. उन्हें तो अपनी बेटी नेहा के विवाह में बुलाऊंगा ही,’ विजय जैसे कुछ सुननेसमझने को तैयार ही न था.
‘तो ठीक है, हमें ही छोड़ दीजिए,’ भारी मन से कह अजय सब के बीच से उठ कर चला गया था. पर इस एक पल में अंदर कितना कुछ टूट गया, कौन जान सका. एक क्षण को विजय अपने ही शब्दों की चुभन से आहत हो उठा था. किंतु बंदूक से निकली गोली और मुंह से निकली बोली तो वापस नहीं हो सकती.
उस दिन का व्याप्त सन्नाटा आज तक नहीं टूट पाया था. तभी महरी की आवाज से आरती की तंद्रा भंग हो गई.
‘‘बीबीजी, आप नहीं जाएंगी नेहा बिटिया की गोदभराई पर?’’ आंखों में कुटिल भाव लिए पल्लू से हाथ पोंछती महरी ने पूछा था.
‘‘तुम्हें इस से क्या मतलब है…जाओ, अपना काम करो,’’ उस की चुगलखोरी की आदत से अच्छी तरह परिचित आरती ने उसे झिड़क दिया. वह मुंह बनाती हुई चली गई. आरती ने जा कर दरवाजा बंद कर लिया. मन की थकान से तन भी क्लांत हो उठा था. वह कुरसी पर अधलेटी सी आंखें बंद कर बैठ गई.
घर में फैले तनाव को भांप कर दोनों बच्चे अंशुल व आकांक्षा स्कूल से आ कर चुपचाप खाना खा कर अपने कमरे में पढ़ने का उपक्रम कर रहे थे. अजय के आने में देर थी. विजय का बेटा शिशिर जब बुलाने आया तो पिताजी न चाहते हुए भी उस के साथ नेहा की गोदभराई में चले गए थे. घर के एकांत में लाउडस्पीकर पर गानों की आवाज से ज्यादा पुरानी यादों की गूंज थीं.
आपसी रिश्तों में ख्ंिचाव व नया मकान बन जाने पर अजय अपने परिवार व पिता के साथ पुश्तैनी मकान, जिस में विजय का परिवार भी रहता था, छोड़ कर पास ही बने अपने नए बंगले में शिफ्ट हो गया था. दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार होते हुए भी न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति उन के संबंधों को पुन: मधुर बनने से रोकती रही. स्थान की दूरी तो इनसान तय कर सकता है पर दिलों के फासले दूर करना इतना आसान नहीं है.
तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. अन्यमनस्क सी आरती ने उठ कर द्वार खोला तो सगे देवर कमल व उस की पत्नी पूजा को आया देख सुखद आश्चर्य से भर उठीं.
‘‘आइए, अंदर आइए, कमल भैया. पूजा…कब आए लंदन से?’’ अपनों से मिलने की प्रसन्नता आंखें नम कर गई.
‘‘भाभी, बस, अभी 2 घंटे पहले ही पहुंचे हैं. पर यह सब हम क्या सुन रहे हैं. आप लोग सगाई में शरीक नहीं होंगे?’’
अंदर आ कर कमल और पूजा ने आरती को पेर छूते हुए पूछा तो अनायास ही उस की आंखें भर आईं. पूजा को उठा कर गले से लगाती हुई बोली, ‘‘लोग तो अपने देश में रह कर भी आपसी सभ्यता व संस्कार याद नहीं रखते. तुम लोग विदेश जा कर भी भूले नहीं हो.’’
‘‘हां, भाभी, विदेश में सबकुछ मिलता है. हर चीज पैसों से खरीदी जा सकती है पर बड़ों का आशीर्वाद और प्यार बाजार में नहीं बिकता. सच, आप सब की वहां बहुत याद आती है. चलिए, तैयार हो जाइए. ऐसा भी कहीं हो सकता है, घर में शादी है और आप लोग यहां अकेले बैठे हैं,’’ पूजा मनुहार करती सी बोली.
आरती के चेहरे पर कई रंग आ कर चले गए. तभी अजय भी आ गए. बरसों बाद मिले सब एकदूसरे का सुखदुख बांटते रहे. आखिर, कमल के बहुत पूछने पर अजय ने उन को अपने न जाने की वजह बता दी.
‘‘यहां इतना कुछ हो गया और आप लोगों ने हमें कुछ बताया ही नहीं. उन सब की ज्यादतियों का हिसाब तो हम लोग ले ही लेंगे पर अभी तो आप लोग चलिए वरना हम भी नहीं जाएंगे और आप खुद को अकेला न समझें भैया. मैं हूं न आप के साथ,’’ कमल उत्तेजित हो कर बोला.
‘‘जहां इज्जत न हो वहां न जाना ही बेहतर है. यह हमारा अहंकार या जिद नहीं स्वाभिमान है. हद तो यह है कि चाचीजी के भाई सौतेले हो कर भी उन की गलत बात मान लेते हैं और हम अपने सगे भाइयों से सही बात मानने की आशा न रखें. वे मुझे ही गलत समझते हैं. और तो और पिताजी की इच्छा का भी उन के लिए कोई महत्त्व नहीं है,’’ उदासी अजय की आवाज से साफ झलक उठी थी. एक नजर सब पर डाल वह फिर कहने लगे, ‘‘इस निर्णय तक मुझे पहुंचने में तकलीफ तो बहुत हुई पर अब कोई दुख नहीं है. इसी बहाने मुझे अपने और बेगानों की पहचान तो हो गई.’’
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शैलेंद्र सिंह
त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ ने जब अपने बड़े बेटे राम को 14 साल के लिए वनवास भेजा तो राम ने अयोध्या के सजातीय लोगों या वहां की सेना से कोई मदद नहीं ली, बल्कि मदद लेने के लिए वे पिछड़ी जाति के केवट के पास गए. वन में खानेपीने के लिए वे आदिवासी जनजाति की शबरी के पास गए.
जब वन में रहते हुए पत्नी सीता का अपहरण रावण ने कर लिया, तब सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए भी राम ने अयोध्या की सेना और अपने सगेसंबंधियों का साथ नहीं लिया. रावण से युद्ध के लिए जो सेना राम ने बनाई उस में वानर, भालू जैसे वन में रहने वाले शामिल थे. लेकिन जब राम अयोध्या की गद्दी पर बैठे, तब उन्होंने अपने राज्य के लोगों, मंत्रियों और सजातीय लोगों को हिस्सा दिया.
राम की बात और रामराज लाने वाली भाजपा ने भी यही किया. साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दलित और पिछड़ों में फूट डालने के लिए गैरयादव, पिछड़ी जातियों और गैरजाटव दलित जातियों के नेताओं से सत्ता बनाने में मदद ली. जैसे ही भाजपा को बहुमत मिला, सत्ता ऊंची जातियों के ठाकुरब्राह्मणों को सौंप दी.
इस से दलित और पिछड़े ठगे से रह गए. इन लोगों ने किसी न किसी बहाने अपनी बात रखने की कोशिश की, पर उन की आवाज को सुना नहीं गया. अब साल 2022 के विधानसभा चुनाव में दलितपिछड़ों ने तय किया है कि वे भाजपा की बात को नहीं सुनेंगे.
सत्ता की चाबी इन के पास
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में दलित, पिछड़े और मुसलिम जीतहार के सब से बड़े फैक्टर हैं. ये तीनों मिल कर तकरीबन 85 फीसदी होते हैं. बहुत से दलों और नेताओं को लग रहा है कि मायावती इस चुनाव में हाशिए पर हैं. तमाम चुनावी सर्वे मायावती को कांग्रेस से भी नीचे चौथे नंबर की पार्टी मानते हैं.
यह सच है कि मायावती का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले जैसा दमदार नहीं है, इस के बाद भी दलित बड़ा वोट बैंक है. चुनावी जीत में वह सब से बड़ा फैक्टर है. इस की वजह यह है कि सब से ज्यादा दलित वोट ही एक दल से दूसरे दल की तरफ जाते हैं.
साल 2014 से ले कर साल 2019 तक लोकसभा के 2 और विधानसभा के एक चुनाव में दलित वोटर धर्म के नाम पर भाजपा के साथ खड़े हो गए. साल 2017 में योगी सरकार के राज में दलितों पर हुए जोरजुल्म ने इस तबके को फिर से भाजपा से दूर खड़ा कर दिया है. अब यह तबका जिधर होगा जीत उधर ही होगी. उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 85 सीटें रिजर्व्ड विधानसभा सीटें हैं.
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इन रिजर्व्ड सीटों में 31.5 फीसदी वोट ले कर 58 और बहुजन समाज पार्टी ने 27.5 फीसदी वोटों के साथ 15 सीटें जीती थीं. भारतीय जनता पार्टी को 14.4 फीसदी वोटों के साथ केवल 3 सीटें मिली थीं.
पर साल 2017 के विधानसभा चुनाव में नतीजे उलट गए और 85 रिजर्व्ड सीटों में से 69 सीटें भाजपा ने जीतीं. भाजपा को 39.8 फीसदी वोट मिले. वहीं सपा को 19.3 फीसदी वोट और 7 सीटें मिलीं, जबकि बसपा सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई. मतलब, दलित समाज जिधर खड़ा होगा जीत उधर ही होगी.
दलित को सत्ता में हिस्सेदारी देने के लिए संविधान में रिजर्व्ड सीटों का इंतजाम किया गया है. उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों में से 85 सीटें रिजर्व्ड हैं. इन सीटों पर जिस का कब्जा रहा है, वही उत्तर प्रदेश की सत्ता में रहा है. साल 2017 में 85 रिजर्व्ड सीटों में भाजपा ने 65 गैरजाटवों को टिकट दिया था. भाजपा ने 76 रिजर्व्ड सीटों पर जीत हासिल की. बसपा को 2, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 3 और अपना दल को 2 सीटें मिली थीं.
साल 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा 58, बसपा 15 और भाजपा 3 सीटों पर जीत हासिल कर सकी थी, वहीं साल 2007 में बसपा 62, सपा 13, भाजपा 7 और कांग्रेस 5 सीटों पर जीती थी.
योगी राज में जब दलित अत्याचार की घटनाएं तेजी से घट रही थीं, उस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर दलित राजनीति का नया चेहरा बन कर उभरे. दलित वर्ग उन को किस तरह से साथ दे रहा है, यह बात 2022 के विधानसभा चुनाव में तय हो जाएगी.
चंद्रशेखर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन को केवल 3 सीटें देने की बात कही. इस से नाराज हो कर चंद्रशेखर ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं किया.
इन में बंटी दलित राजनीति
बसपा प्रमुख मायावती का अब दलितों के बीच वैसा असर नहीं रहा, जैसा 1990 के दशक में था. इस के बाद भी दलित तबका जीत का सब से बड़ा फैक्टर है. बसपा संस्थापक कांशीराम ने 80 के दशक में दलित समाज के बीच राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया था. यह उन की चेतना जगाने का ही नतीजा था कि मायावती 1-2 बार नहीं, बल्कि 4 बार मुख्यमंत्री बनी थीं.
दलित वोटों पर कांशीराम के बाद मायावती का लंबे समय तक एकछत्र राज रहा. पर मायावती ने जब सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ‘दलितब्राह्मण’ किया तब से दलित तबका मायावती से दूर जाने लगा. बसपा जाटव और गैरजाटव में बंट गई. मायावती सिर्फ जाटव दलितों की ही नेता बन कर रह गईं. इसी वजह से मायावती उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर चली गईं.
मायावती ने खुद को राजनीति की मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए अपने धुर विरोधी दल समाजवादी पार्टी के साथ साल 2019 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन भी किया था. इस के बाद भी दलित तबका मायावती के साथ खड़ा नहीं हुआ. लोकसभा चुनाव में जीत के लिए बना यह गठबंधन चुनाव के खत्म होते ही टूट गया.
अब साल 2022 के विधानसभा चुनाव में दलित वोटरों पर कांग्रेस, सपा और भाजपा की नजर है. असल में पिछड़े समुदाय के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सब से बड़ी हिस्सेदारी दलित बिरादरी की है.
उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 22 फीसदी के करीब है. यह दलित वोट बैंक जाटव और गैरजाटव के बीच बंटा हुआ है. दलित आबादी की सब से बड़ी तादाद 12 फीसदी जाटवों की है और 10 फीसदी गैरजाटव दलित हैं. उत्तर प्रदेश में दलितों की कुल 66 उपजातियां हैं, जिन में 55 ऐसी उपजातियां हैं, जिन का संख्या बल ज्यादा नहीं है.
दलित तबके की कुल आबादी में से 56 फीसदी जाटव के अलावा दलितों की दूसरी जो उपजातियां हैं, उन की तादाद 46 फीसदी के करीब है. पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक तकरीबन 5 फीसदी हैं.
उत्तर प्रदेश में 42 ऐसे जिले हैं, जहां दलितों की तादाद 20 फीसदी से ज्यादा है. राज्य में सब से ज्यादा दलित आबादी सोनभद्र में 42 फीसदी, कौशांबी में 36 फीसदी, सीतापुर में 31 फीसदी है, बिजनौरबाराबंकी में 25-25 फीसदी है. इस के अलावा सहारनपुर, बुलंदशहर, मेरठ, अंबेडकरनगर, जौनपुर में दलित तबका निर्णायक भूमिका में है.
उत्तर प्रदेश में दलितों की सब से बड़ी आबादी आजमगढ़, जौनपुर, आगरा, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, गोरखपुर, गाजीपुर, अमरोहा, मुरादाबाद, नोएडा, अलीगढ़, गाजियाबाद, बस्ती, संत कबीरनगर, गोंडा, सिद्धार्थनगर, मेरठ, बुलंदशहर, बदायूं और सहारनपुर जिलों में है. दलितों में जाटव के बाद दूसरे नंबर पर पासी जाति आती है, जो खासकर राजधानी लखनऊ के आसपास के जिलों जैसे सीतापुर, रायबरेली, बाराबंकी, अमेठी, कौशांबी, प्रतापगढ़, लखनऊ देहात, फतेहपुर, उन्नाव, हरदोई, बस्ती, गोंडा आदि में खासा असर रखती है.
मायावती की तरह ही दलित नेता चंद्रशेखर भी जाटव समुदाय से आते हैं. दोनों ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं. उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति जाटव समुदाय के ही आसपास रही है, जिस की वजह से अनदेखी का शिकार हो कर साल 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से गैरजाटव दलित में वाल्मीकि, खटीक, पासी, धोबी, कोरी समेत तमाम ऐसी जातियों के लोग विरोधी दलों के साथ चले गए.
दलित आबादी का यह बिखराव ही उस को कमजोर कर गया. बसपा के अलावा दूसरे दलों ने गैरजाटव दलित नेताओं को अपने पक्ष में करने का काम किया. भाजपा ने इस दिशा में बेहतर काम किया. पासी बिरादरी के कौशल किशोर को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया. उन की पत्नी को लखनऊ की मलिहाबाद सीट से विधायक बनाया गया.
दलित सियासत में धोबी और वाल्मीकि वोटरों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. बरेली, शाहजहांपुर, सुलतानपुर, गाजियाबाद, मेरठ, हाथरस और बागपत में धोबी और वाल्मीकि काफी बड़ी तादाद में रहते हैं. जाटवों और वाल्मीकि समाज के बीच काफी दूरियां देखने को मिलती हैं. वाल्मीकि तबका शुरू से ही भाजपा के साथ जुड़ा है. धोबी समाज भी साल 2012 के बाद से बसपा से हट गया.
उत्तर प्रदेश के दलित नेता
उत्तर प्रदेश में दलित नेताओं में मायावती का नाम सब से ऊपर आता है. उन की छांव में बसपा में कोई बड़ा नेता उभर नहीं पाया. भाजपा में सुरेश पासी, रमापति शास्त्री, गुलाबो देवी, कौशल किशोर और विनोद सोनकर जैसे नेता हैं. कांग्रेस के पास आलोक प्रसाद और पीएल पुनिया जैसे नेता हैं. साल 2017 के बाद दलित नेता चंद्रशेखर का नाम चर्चा में आया.
समाजवादी पार्टी में सुशीला सरोज और अंबरीश सिंह ‘पुष्कर’ जैसे नेता हैं. अंबरीश सिंह ‘पुष्कर’ ऐसे नेता हैं, जो साल 2017 में भाजपा लहर में भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे. अगर समाजवादी पार्टी के संगठन में इन को अहमियत दी गई होती, तो आज वे दलितों के बड़े नेता बनते.
दलित राजनीति में एक दौर ऐसा भी था, जब कांग्रेस में बड़े दलित नेता होते थे. धीरेधीरे कांग्रेस का दलित वोट बैंक भाजपा में चला गया. इस को अपनी तरफ करने में सपा और बसपा दोनों ही नाकाम रहे.
जिधर पिछड़े उधर जीत
उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैरयादव, अतिपिछड़ी जातियां चुनावी जीत का आधार बन गई हैं. इस वजह से ही भाजपा और सपा दोनों ही इन जातियों पर निर्भर हो चुकी हैं. छोटीछोटी ये जातियां आबादी में कम होने की वजह से अकेले दम पर भले ही सियासी तौर पर खास असर न दिखा सकें, लेकिन किसी बड़ी तादाद वाली जाति या फिर तमाम छोटीछोटी जातियां मिल कर किसी भी दल का राजनीतिक खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखती हैं.
उत्तर प्रदेश में सब से बड़ा वोट बैंक पिछड़े तबके का है. 52 फीसदी पिछड़े वोट बैंक में से तकरीबन 43 फीसदी वोट बैंक गैरयादव बिरादरी का है. जीतहार में इस का रोल सब से ज्यादा होता है.
उत्तर प्रदेश में पिछड़े तबके की 79 जातियां हैं, जिन में सब से ज्यादा यादव और दूसरा नंबर कुर्मी समुदाय का है. यादव सपा का परंपरागत वोटर माना जाता है. गैरयादव जातियों में कुर्मी और पटेल 7 फीसदी, कुशवाहा, मौर्य, शाक्य और सैनी 6 फीसदी, लोध 4 फीसदी, गड़रिया और पाल 3 फीसदी, निषाद, मल्लाह, बिंद, कश्यप, केवट 4 फीसदी, तेली, साहू, जायसवाल 4 फीसदी, जाट 3 फीसदी, कुम्हार, प्रजापति, चौहान 3 फीसदी, कहार, नाई, चौरसिया 3 फीसदी, राजभर 2 फीसदी और गुर्जर 2 फीसदी हैं.
स्वामी प्रसाद मौर्य समेत 12 दूसरे पिछड़ी जाति के विधायकों के भाजपा छोड़ने से यह बात साफ है कि इस चुनाव में भाजपा के साथ अतिपिछड़ी जातियां नहीं जा रही हैं.
फूट डालो और राज करो
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित, पिछड़े और मुसलिम सब से मजबूत हैं. मुसलिम तबका हमेशा से भाजपा के खिलाफ रहा है. ऐसे में भाजपा के पास केवल दलित और पिछड़े ही थे, जिन्हें भाजपा अपनी तरफ कर सकती थी. यहां यादव और जाटव भले ही भाजपा के साथ न हों, पर गैरजाटव और गैरयादव जातियों को वह अपनी तरफ करने में कामयाब रही है.
उत्तर प्रदेश का एक सामाजिक समीकरण और भी है, जिस में पिछड़ी जातियां और दलित एक जगह नहीं खड़े हो सकते. 90 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति के बाद साल 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर सरकार बनाई. 2 साल में ही यह सरकार गिर गई. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने चुनावी गठबंधन किया, पर वह भी कामयाब नहीं रहा.
भाजपा दलित और पिछड़ों के बीच इस दूरी का फायदा उठा कर सत्ता में बनी रहती है. भाजपा के लिए भी अब मुश्किल यह है कि वह दलित और पिछड़ों को एकसाथ कैसे साधेगी. जैसे ही चुनाव भाजपा बनाम सपा होगा, गैरजाटव दलित सपा के साथ न जा कर भाजपा के साथ खड़े हो जाएंगे, जो भाजपा के लिए फायदे का काम होगा. उत्तर प्रदेश में जाटव बनाम यादव एक मुद्दा रहा है. वे दोनों एकसाथ खड़े नहीं रहना चाहते हैं.
भाजपा की राजनीति
भारतीय जनता पार्टी ने जैसेजैसे राम मंदिर की राजनीति को आगे बढ़ाया, वैसेवैसे मुसलिम राजनीति उस के विरोध में एकजुट होने लगी. पहले मुसलिम तबका कांग्रेस के साथ पूरी तरह से लामबंद था. साल 1993 में उत्तर प्रदेश में मुसलिम वोटर का एक बड़ा धड़ा समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के साथ खड़ा हो गया.
उत्तर प्रदेश में तकरीबन 20 फीसदी मुसलिम मतदाता हैं, जो पूरी तरह से भाजपा के विरोध में हैं. साल 2014 के बाद मुसलिम व भाजपा 2 अलगअलग ध्रुवों पर खड़े हो गए हैं. 20 फीसदी वोट जीतहार में बड़ा माने रखते हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस खाई को और भी चौड़ा कर दिया है.
इस के साथसाथ तीन तलाक, नागरिकता कानून और राम मंदिर के चलते मुसलिम तबका खुद को असुरक्षित महसूस कर के एकजुट हो गया है. योगी आदित्यनाथ ने ‘80 बनाम 20’ का नारा दे कर साफ कर दिया है कि मुसलिम भाजपा के साथ नहीं हैं.
इस चुनाव से पहले भी मुसलिम एकजुटता ने कमंडल की राजनीति को पछाड़ने का काम किया है. मुसलिम राजनीति तब और ज्यादा असरदार हो जाती है, जब दलित और पिछड़े उस के साथ मिल जाते हैं. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के माहौल में साल 1991 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हुए. हिंदुत्व के बल पर भाजपा ने उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल कर ली. कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. उन्हीं के मुख्यमंत्री रहते 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मसजिद ढहा दी गई.
इस के बाद मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के एकमात्र मसीहा बन कर उभरे. मुसलिम वोटों के जरीए वे साल 1993 में मुख्यमंत्री बन गए. मुसलमानों का एक बड़ा तबका मुलायम सिंह यादव को एक मसीहा के रूप में देखने लगा. तब उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारा लगा था ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गया जय श्रीराम’.
इस समीकरण को तोड़ने में भाजपा ने ‘फूट डालो राज करो’ का काम किया. इस का असर साल 2014 से देखने को मिला. हिंदुत्व का भाव दलित और पिछड़ों में जगा कर मुसलिम विरोध की ढाल तैयार हो गई.
पर साल 2022 में जिस तरह से दलितपिछड़ा तबका भाजपा से दूर हो रहा है, उस से उसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ?ाटका लगेगा.
उत्तर प्रदेश के चुनाव अब सही पटरी पर आते दिख रहे हैं. जो पिछड़े और दलित नेता पिछले 7 सालों में पाखंड और छुआछूत की दैवीय ताकतों में भरोसा करने वाले संघ की राजनीतिक ब्रांच भारतीय जनता पार्टी में थोक में अपने सताए हुए, गरीब, बेचारे, फटेहाल, आधे भूखों को पाखंड के खेल में ?ोंक रहे थे, वे अब समाजवादी पार्टी में लौट रहे हैं.
यह कहना गलत होगा कि यह पलायन अजय बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ की काम करने की पौलिसी के खिलाफ है. यह फेरबदल इस अहसास का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी तो सिर्फ और सिर्फ मंदिर और पाखंडों के इर्दगिर्द घूमने वाली है जो दानदक्षिणा, पूजापाठ, स्नानों, तीर्थयात्राओं में भरोसा करती है, आम मजदूर, किसान, कारीगर, छोटे दुकानदारों के लिए नहीं.
ऊपर से कांग्रेस का नारा कि लड़की हूं, लड़ सकती हूं, काफी जोर का है क्योंकि पाखंड के ठेकेदारों के हिसाब से लड़की सिर्फ भोग की चीज है जिसे पिता, पति या बेटे के इशारों पर चलना चाहिए और जिस का काम बच्चे पैदा करना, पालना, घर चलाना, पंडों की तनधन से सेवा करना और फिर भी यातना सहना है. लड़ सकती हूं का नारा कांग्रेस को सीटें चाहे न दिलाए वह भारतीय जनता पार्टी के अंधभक्तों की औरतों को सिर उठाने की ताकत दे सकता है. भारतीय जनता पार्टी अब बलात्कार का राजनीतिक फायदा नहीं उठा सकती.
राम मंदिर और काशी कौरीडोर पिछड़ों को सम्मान न दिए जाने और औरतों को पैर की जूती सम?ाने की आदत में बेमतलब के हो गए हैं. उत्तर प्रदेश जो देश की राजनीतिक जान है, अगर कहीं हाथ से फिसल गया तो 100 साल से पौराणिक राज के सपने देख रहे लोगों को बड़ा धक्का लगेगा.
वैसे चंद नेताओं के इधर से उधर हो जाने पर कुछ ज्यादा नहीं होता. पश्चिम बंगाल चुनाव में अमित शाह ने थोक में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में शामिल करा लिया था और नरेंद्र मोदी खुले मंचों पर ‘दीदी ओ दीदी…’, ‘2 मई दीदी गई’ का नारा लगाते रहे पर चुनाव परिणाम कुछ और थे. उत्तर प्रदेश में नेता अपने मतलबों से भाजपा से नहीं छिटक रहे हैं, उन्हें जमीनी हकीकत का अहसास है. उत्तर प्रदेश हो या देश का कोईर् भी हिस्सा, देश का विकास सिर्फ मंदिरों तक है. और इन मंदिरों में भी जातिगत भेदभाव है. जहां पिछड़ों को उन के अपने छोटे देवता या गणेश और हनुमान पकड़ाए गए हैं, दलितों को भैरव जैसे. विष्णु, राम और महाभारत वाले कृष्ण ऊंची जातियों के लिए रिजर्व कर दिए गए हैं. ये मंदिर ही हैं जो आरक्षण की जरूरत को मजबूत करते हैं, उस आरक्षण की जिसे खत्म करने के लिए सरकारें जीजान से लगी हैं. उन्होंने सरकार में साराकाम ठेके पर कराना शुरू कर दिया है और सरकारी कारखाने निजी कंपनियों को बेच डाले जहां आरक्षण का कानून नहीं चलता.
भारतीय जनता पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने अपनी जान और राजनीतिक कल पर बड़ा दांव खेला है. वे जानते हैं कि उन के खिलाफ जांचें शुरू हो सकती हैं और उन्हें लालू प्रसाद यादव की तरह जेल में ठूंसा जा सकता है. पर जैसे लालू प्रसाद यादव ने अपनी जनता के हित के लिए सम?ौता नहीं किया, उम्मीद करें कि जो आज पाखंड की राजनीति छोड़ रहे हैं, जिस भी पार्टी में जाएं, कुछ बनाने की राजनीति करें. देश को तरक्की की राह पर ले जाने में बड़ी मेहनत करनी है. सब को बराबरी का स्तर देना आसान नहीं है. एक पीढ़ी में तो कुछ न होगा क्योंकि 800 साल तक का बौद्ध धर्म का, जो पौराणिक धर्म से ज्यादा खुला था, आज नामोनिशान नहीं है.
सुनील शर्मा
विराट कोहली ने टैस्ट क्रिकेट टीम की कप्तानी अचानक छोड़ दी है. दक्षिण अफ्रीका से 3 टैस्ट मैचों की सीरीज 2-1 से हारने के बाद उन्होंने 15 जनवरी, 2022 को यह कदम उठाया है.
बता दें कि विराट कोहली का पिछले दिनों वनडे की कप्तानी छीने जाने को ले कर भी बीसीसीआई से विवाद हुआ था. इस के बाद उन्होंने पत्रकारों के सामने सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा था और बीसीसीआई को कठघरे में खड़ा किया था.
अब टैस्ट कप्तानी छोड़ते हुए विराट कोहली ने जो चिट्ठी लिखी है, उस में भी काफी नपेतुले शब्दों में उन्होंने बहुत कम लोगों का जिक्र करते हुए अपनी बात रखी है. कभी के जु झारू खिलाड़ी और कोच रह चुके अनिल कुंबले के साथसाथ किसी और साथी खिलाड़ी को ज्यादा भाव नहीं दिया गया है. हां, रवि शास्त्री और महेंद्र सिंह धौनी का खासतौर पर शुक्रिया अदा किया गया है.
इस में कोई दोराय नहीं है कि विराट कोहली एक आक्रामक बल्लेबाज और जु झारू खिलाड़ी हैं, जिन का गुस्सा उन के बल्ले और जबान से मैदान पर बखूबी दिखता है, पर यह भी एक कड़वा सच है कि बतौर बल्लेबाज वे पिछले तकरीबन 2 साल से जू झ रहे हैं. नवंबर, 2019 से अब टैस्ट कप्तानी छोड़ने तक उन्होंने इंटरनैशनल क्रिकेट में एक भी सैकड़ा नहीं बनाया है.
इस के बावजूद विराट कोहली के अब तक के खेल आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 99 टैस्ट मैचों में उन्होंने 50.4 की औसत से 7,962 रन बनाए हैं. 254 वनडे मैचों में 59.1 की औसत से 12,169 रन बटोरे हैं, जबकि 95 ट्वैंटी20 मैचों में 52.0 की औसत से 3,227 रन अपने नाम किए हैं.
विराट कोहली ने 68 टैस्ट मुकाबलों में भारतीय टीम की कप्तानी की है. इन में से 40 मुकाबलों में टीम को जीत मिली, 17 मुकाबलों में हार मिली और 11 मैच बेनतीजा रहे. कुलमिला कर टीम का जीत फीसदी 58.82 रहा.
विराट कोहली ने 68 टैस्ट मैचों की 113 पारियों में 54.80 की औसत से 5,864 रन बनाए हैं. उन्होंने बतौर कप्तान 20 सैंचुरी जड़ी हैं और 18 हाफ सैंचुरी लगाई हैं.
भले ही टीम इंडिया विराट कोहली की कप्तानी में पहला वर्ल्ड टैस्ट चैंपियनशिप का खिताब जीतने से चूक गई, लेकिन फिर भी टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई सीरीज जीतीं. उन की कप्तानी में भारत ने सब से ज्यादा टैस्ट मुकाबले जीते हैं.
अब सवाल उठता है कि विराट कोहली टीम के लिए बतौर बल्लेबाज जरूरी हैं या कप्तान? आज की तारीख में वे एकलौते ऐसे बल्लेबाज हैं, जो सचिन तेंदुलकर के बनाए गए रिकौर्डों की बराबरी करने का माद्दा रखते हैं और फिलहाल चाहे वे अपनी फौर्म से जू झ रहे हैं, पर उन की तकनीक और आक्रामकता आज भी वही है.
विराट कोहली बल्लेबाजी में जितने चाकचौबंद हैं उतने ही चपल फील्डर भी हैं. फिटनैस में कोई उन का सानी नहीं है और मैदान पर वे एक चीते की तरह चौकस दिखाई देते हैं.
एक समय था, जब सचिन तेंदुलकर कप्तानी में सिरे से फेल हो गए थे और वे उस का दबाव झेलने की हालत में नहीं थे, इसलिए उन्होंने कप्तानी छोड़ते हुए अपनी बल्लेबाजी पर नए जोश के साथ फोकस किया था.
विराट कोहली अभी 33 साल के हैं और उन में कई साल का खेल बचा है. वे सचिन तेंदुलकर को देख कर क्रिकेट की दुनिया में आए हैं, लिहाजा, उन्हें ‘लिटिल मास्टर’ को ही आदर्श मान कर अब कप्तानी के बजाय अपनी बल्लेबाजी पर फोकस करना चाहिए, ताकि वह उन का ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित हो सके.
‘उन की निगाहों में जाने कितने ही रंग समाए हैं….
पर हर रंग में मुझे अपना ही अक्स नजर आता है….’
अमर ने एकटक प्रतिभा को देखते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.
“चलो आज तुम्हें अपने पैरंट्स से मिलवा दूं.” अमर ने प्रतिभा का हाथ थाम कर फिर से कहा. प्रतिभा खुशी से चीख पड़ी,
” सच”
उस के चेहरे पर शर्म की लाली बिखर गई.
माहौल में और भी रंग भरते हुए अमर ने कहा, “सोचता हूं लगे हाथ उन से हमारी शादी का दिन भी तय करवा लूं.”
प्रतिभा ने हौले से पलकें उठाते हुए कहा,” सीधे शब्दों में कहो न कि तुम मुझे प्रपोज कर रहे हो. इतने निराले अंदाज में तो कभी किसी ने प्रपोज नहीं किया होगा.”
प्रतिभा की बात सुन कर अमर हंस पड़ा फिर गंभीर होता हुआ बोला,” सच प्रतिभा बहुत प्यार करने लगा हूं तुम्हें और तुम से जुदा हो कर जीने की बात सोच भी नहीं सकता. इसलिए चाहता हूं जल्द से जल्द हमारे रिश्ते को घर वालों की भी स्वीकृति मिल जाए. ”
“जरूर मिल जाएगी स्वीकृति. तुम बताओ कब चलना है?”
“कल कैसा रहेगा? एक्चुअली कल सटरडे है. सुबह निकलेंगे तो शाम से पहले ही लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर संडे वापस दिल्ली.”
“वेरी गुड. मैं इंडियन ड्रैस पहन कर चलूंगी ताकि तुम्हारे पेरेंट्स को एक नजर में पसंद आ जाऊं. ” कह कर उस ने अपना सिर अमर के कंधों पर टिका दिया.
अमर और प्रतिभा एक ही ऑफिस में पिछले 4 सालों से साथ काम करते आ रहे हैं. प्रतिभा पटना की है और दिल्ली में पढ़ाई के साथ पार्टटाइम जॉब करती है. इधर अमर भी लखनऊ से अपने सपनों को पूरा करने दिल्ली आया हुआ है. दोनों इतने दिनों से साथ हैं. एकदूसरे को पसंद भी करते हैं. पर आज पहली दफा अमर ने साफ तौर पर प्रतिभा से दिल की बात कही थी. दोनों के दिल सुनहरे सपनों की दुनिया में खो गए थे.
अगले दिन सुबहसुबह ट्रेन थी. प्रतिभा ने एक सुंदर हल्के नीले रंग का फ्रॉकसूट पहना. उस पर गुलाबी रंग का काम किया हुआ दुपट्टा लिया. माथे पर नीले रंग की बिंदी लगाई. होठों पर हल्का गुलाबी लिपस्टिक लगा कर बालों को खुले छोड़ दिए. हाई हील्स पहन कर जब वह अमर के सामने आई तो वह आहें भरता हुआ बोला,” आज तो महताब जमीन पर उतर आया है….. साथसाथ चलेगी रोशनी सारी रात …. ”
“मिस्टर शायर, आप कहें तो हम प्रस्थान करें?” मुसकुरा कर प्रतिभा ने कहा और दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़े आगे बढ़ गए.
पूरे रास्ते दोनों भावी जीवन के सपने देखते रहे. घर पहुंच कर अमर ने बेल बजाई तो प्रतिभा का दिल धड़क उठा. वह पहली बार अपनी भावी सासससुर से मिलने वाली थी. दरवाजा अमर की मां ने खोला. पीछे से उस के पिता भी आ गए. प्रतिभा ने जल्दी से दुपट्टा सिर पर रख कर सासससुर के पैर छूए और आशीर्वाद लिया. सास ने उसे गले से लगा लिया और प्यार से अंदर ले आई.
इधर प्रतिभा इस बात को ले कर चकित थी कि पहली बार मिलने के बावजूद उसे अमर के मातापिता का चेहरा जाना पहचाना सा लग रहा था. वह असमंजस की स्थिति में थी. थोड़ी देर की बातचीत के बाद आखिरकार उस ने अपने मन की बात बोल ही दी.
इस पर अमर के पिता एकदम हड़बड़ा से गए. मगर जल्द ही संभलते हुए बोले,” देखा होगा बेटी तुम ने कहीं आतेजाते.”
फिर बात बदलते हुए पूछने लगे,” तुम पटना में कहां रहती हो?”
जी कंकरबाग में. ”
जवाब दे कर प्रतिभा ने फिर सवाल किया,” पर अंकल आप दोनों तो लखनऊ में रहते हो और मैं दिल्ली में. आप कभी अमर से मिलने दिल्ली आए भी नहीं हो. फिर मैं ने आप दोनों को कहां देखा होगा?”
अमर की मां ने बात बात संभालने की कोशिश की और बोली,” बेटी एक जैसे चेहरे वाले भी बहुत से लोग होते हैं. वह सब छोड़ और यह बता कि तुझे पसंद क्या है वही बना देती हूं.”
प्रतिभा तुरंत उठ गई और बोली,” अरे आंटी आप बैठो मैं बनाती हूं न.”
इस के बाद प्रतिभा ने कोई सवाल नहीं किया. खातेपीते और बातें करते कब रात हो गई पता ही नहीं चला. सास ने प्रतिभा को अपने कमरे में सोने के लिए बुला लिया. प्रतिभा ने टेबल पर रखी तस्वीरें देखते हुए पूछा,” आंटी जी अपनी पुरानी तस्वीरें दिखाइए न और आप दोनों की शादी की तस्वीर भी.”
“अरे बेटी अब पुरानी तस्वीरें कौन निकाले. अंदर कहीं संदूक में पड़ी होगी और वैसे भी हम ने कोर्ट मैरिज की थी.”
“कोर्ट मैरिज, क्या बात है आंटी. उस जमाने में आप ने कोर्ट मैरिज कर ली.”
“अब चल सो जा प्रतिभा. पुरानी बातें याद करने से क्या फायदा?” कह कर सास करवट बदल कर सो गई. इधर प्रतिभा सोच में डूबी रही.
अगले दिन दोनों दिल्ली के लिए वापस रवाना हो गए. प्रतिभा के मन में अभी भी कुछ उलझनें थी मगर अमर बहुत खुश था. प्रतिभा को ले कर उस के मांबाप का रिस्पांस पॉजिटिव जो था. प्रतिभा ने अपने मन की बात अमर को नहीं बताई. वह उस की खुशी में कोई बाधा पहुंचाना जो नहीं चाहती थी.
दिल्ली पहुंच कर प्रतिभा ने नेट पर खोजखबर निकालने की कोशिश की. मगर कुछ पता नहीं चला. फिर उस ने अमर के मांबाप के साथ अपनी फोटो अपने पैरेंट्स को शेयर की और लिखा,” यह फोटो मेरे सब से अच्छे दोस्त के मम्मीपापा की है. उन से पहली बार मिलने के बावजूद उन का चेहरा जानापहचाना सा लगा. क्या आप इन्हें पहचानते हैं?
प्रतिभा के पिता ने जवाब दिया,”चेहरे पहचाने से लगते हैं पर याद नहीं आता कि कौन है.”
जवाब पढ़ कर प्रतिभा चुप रह गई. धीरेधीरे यह बात उस के दिलोदिमाग से उतरती गई.
कुछ दिन बाद गर्मी की छुट्टियों में प्रतिभा ने अपने घर पटना जाने की तैयारियां शुरू कर दी. पटना जाने को ले कर वह उत्साहित थी मगर अमर से बिछड़ने के अहसास से मन भारी भी हो रहा था. किसी तरह अमर से विदा ले कर वह ट्रेन में बैठ गई. सारे रास्ते वह अमर और अपने रिश्ते को ले कर सोचती रही. अब वह अमर के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. पिछले कुछ दिनों में अमर उस के दिल के बहुत करीब आ गया था.
पटना जंक्शन पर उतरते ही उस का दिमाग दिल्ली के गलियारों को भूल कर पटना की सड़कों पर आ टिका. अपने घर के आगे रुकते ही पुराना समय आंखों के आगे नाचने लगा जब स्कूल में पढ़ने वाली प्रतिभा अपने घरआंगन को गुलजार रखती थी. वह मम्मीपापा की इकलौती लाडली बिटिया जो थी. दरवाजा खोलते ही मां ने उसे गले से लगा लिया.
अपने कमरे का दरवाजा खोलते ही पुरानी यादों के साये फिर से उस के मन को छूने लगे. बैग एक कोने में पटक कर वह बिस्तर पर लुढ़क गई. 2 दिन प्रतिभा ने जम कर आराम किया और मम्मीपापा को अपनी नई जिंदगी से जुड़े किस्से सुनाए. तीसरे दिन वह थोड़ी एक्टिव हुई और घर की सफाई करने लगी. सफाई के दौरान उसे जाले लगी एक पुरानी तस्वीर दिखी. तस्वीर करीब 30 -35 साल पहले की थी जब उस के मम्मीपापा कॉलेज में थे. जाले पोंछ कर प्रतिभा ध्यान से तस्वीर देखने लगी कि अचानक उसे तस्वीर में अमर के पिता दिखाई दिए हालांकि वे काफी बदले हुए नजर आ रहे थे मगर वह उन का चेहरा एक नजर में ही पहचान गई थी.
बगल में ही उसे अमर की मां भी दिख गई. प्रतिभा को अब सारी बात समझ आने लगी थी कि क्यों उसे उन दोनों के चेहरे जानेपहचाने लग रहे थे. बचपन में उस ने कई बार वह फोटो बहुत ध्यान से देखी थी. पर उसे अब तक यह समझ नहीं आया था कि उस के मम्मीपापा ने अमर के पैरंट्स की फोटो पहचानी क्यों नहीं जबकि वे कॉलेज में साथ थे.
काफी देर तक प्रतिभा यही सब सोचती रही. तभी उसे सरला काकी का ख्याल आया. उस के परिवार के साथ उन का रिश्ता बहुत पुराना था. प्रतिभा ने अपने साथ वह तस्वीर भी ले ली. सरला आंटी का बेटा सुजय उस का बचपन का साथी था.
सरला काकी ने उसे देखते ही गले से लगा लिया. कुछ देर बैठने के बाद प्रतिभा ने वह तस्वीर निकाली और काकी को दिखाई. काकी तुरंत तस्वीर पहचान गई. तब प्रतिभा ने अमर के पैरंट्स की तस्वीर दिखाई जिस में वह भी थी. इस तस्वीर को देख कर काकी चौंकी और फिर बोलीं,” अरे तुम मुकुंद और सुधा से कब मिली? वे दोनों कैसे हैं बेटा?”
“आप जानती हैं इन्हें?”
“हां मेरी बच्ची. वे तस्वीर दिखा अपने पापा वाली. उस में भी तो वे दोनों खड़े हैं न.”
“पर मम्मीपापा ने तो इन्हें पहचाना नहीं.”
प्रतिभा की बात सुन कर काकी थोड़ी गंभीर हो गई फिर बोली,” कैसे पहचानेंगे? उस का घर जो जलाया था तेरे पापा ने.”
“घर जलाया था पर क्यों काकी?”
“क्योंकि उस वक्त तेरे पापा की बुद्धि मारी गई थी. सरपंच के इशारों पर चलते थे. सरपंच ने आदेश दिया था कि उन की बिरादरी का लड़का एक दलित लड़की से शादी नहीं कर सकता. सुधा दलित थी न. सरपंच ने लठैतों को भेजा उन का घर जलाने को. बस तेरे पापा भी निकल लिए साथ. यह भी नहीं सोचा कि अपने दोस्त का घर जलाने जा रहे हैैं. उस की आंख तो तब खुली जब उन का पुश्तैनी घर पूरी तरह जलाने के बाद सरपंच के लड़कों ने मुकुंद के बूढ़ेमां बाप को भी मार डाला. छोटी बहन को घर में जिंदा जला दिया. यह सब देख कर तेरे बाप की रूह कांप उठी और उस ने उसी दिन से सरपंच का साथ पूरी तरह छोड़ दिया. इधर मुकुंद और सुधा किसी तरह अपनी जान बचा कर कहीं भाग गए. वे कहां गए, उन के साथ क्या हुआ यह कोई नहीं जानता.”
प्रतिभा चुपचाप काकी से यह बीती कहानी सुनती रही. उस की आंखों के आगे अब सब कुछ स्पष्ट हो चुका था.
“क्या आप मुझे उन का जला हुआ घर दिखा सकती हो?”
“बेटा उन का पुश्तैनी घर तो सालों पहले खंडहर में तब्दील हो चुका है और आज तक खंडहर ही है. कोई नहीं जाता उधर. तू कहती है तो मैं सुजय को भेजती हूं तेरे साथ.”
प्रतिभा सुजय के साथ उस खंडहरनुमा घर को देखने पहुंची. टूटीजली इमारतें, खाली पड़े आधेअधूरे कमरे, दरकी हुई दीवारें, दम घोंटता वीरानापन, सब चीखचीख कर उस स्याह काली रात का दर्द बयां करते दिखे. प्रतिभा ने मोबाइल से तसवीरें खींचीं. एकएक जगह जा कर उस दर्द को महसूस किया. फिर अपने घर लौट आई.
दिल्ली आ कर वह अमर के पिता से मिली और भरी आंखों से उन्हें धन्यवाद कहा तो उन्होंने चौंकते हुए प्रतिभा की ओर देखा.
प्रतिभा ने कहा,” अंकल मैं पटना के कंकड़बाग में उसी मोहल्ले में रहती हूं जहां कभी आप दोनों भी…… इतनी मुसीबतें आने के बाद भी आप ने आंटी का साथ नहीं छोड़ा. अपने प्यार को निभाया. इतनी हिम्मत दिखाई. यू आर ग्रेट अंकल …. ”
उस की बातें सुन कर अमर के पिता की आँखें भर आई. वे समझ गए थे कि जो राज उन्होंने बेटे से भी छुपाया वह सब बहू जान चुकी है. अमर के पिता ने प्रतिभा के सर पर आशीर्वाद का हाथ रखा और फिर हौले से मुस्कुरा दिए.
प्रतिभा ने फैसला कर लिया था कि अब वह जल्द ही अमर से शादी कर लेगी मगर अपने पिता को इस शादी में नहीं बुलाएंगी. अमर से भी सच्चाई छिपा कर रखेगी. इस बीच मम्मी ने फोन पर बताया कि अगले सप्ताह पापा का कैटरैक्ट का ऑपरेशन होने वाला है.
यह सुन कर उस ने अमर से बात की और उसे कोर्ट मैरिज के लिए तैयार कर लिया. कुछ खास लोगों की उपस्थिति में कोर्ट मैरिज कर के आर्य समाजी तरीके से शादी करना तय हुआ. प्रतिभा ने जानबूझ कर शादी की तारीख 15 दिन बाद की रखवाई जब उस के पापा का ऑपरेशन हो चुका हो और उस की शादी में केवल उस की मम्मी ही आ सकें.
शादी वाले दिन प्रतिभा की मम्मी ने अमर की मम्मी को देखा तो खुद को रोक नहीं सकी और सुधा कह कर एकदम से उन के गले लग गई. 30 साल पुरानी सहेलियां जो मिली थी. अमर के पिता भी प्रतिभा की मम्मी को देख कर चकित थे. तीनों भीगी पलकों से पुराने दिन याद करने लगे.
नियत समय पर शादी भी हो गई. सारा कार्यक्रम अच्छी तरह निबट गया.
प्रतिभा की मम्मी अब घर लौटने वाली थी. ट्रेन में बैठने से पहले उन्होंने प्रतिभा को गले लगाया और रोती हुई बोली,” बेटा मैं समझ गई हूँ कि तूने ऐसा इंतजाम क्यों किया ताकि केवल मुझे ही शादी में बुलाना पड़े. देख बेटा तेरे पापा के हाथों तेरे सासससुर के साथ गलत हुआ था मैं यह मानती हूं. मगर उसी दिन से तेरे पापा बिल्कुल बदल भी गए और उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा भी है. मुझ से शादी होने के बाद उन्हें प्यार की गहराई का एहसास भी हो चुका है. जानती है मैं जब आ रही थी तो तेरे पापा ने क्या कहा था?”
“क्या कहा था मम्मी ?”
“उन्होंने कहा, ‘मुझे लग रहा है मेरी बच्ची मेरा पाप धोने वाली है. वह उसी दलित लड़की के बेटे से शादी करने वाली है जिन के परिवार को मेरी आंखों के आगे मार दिया गया और मैं ने कोई विरोध भी नहीं किया. मैं सालों से यह दर्द और पछतावा दिल में लिए जी रहा था. मेरी बच्ची उन से रिश्ता जोड़ कर मेरी जिंदगी का दर्द थोड़ा कम कर देगी.”
“सच मम्मी, पापा सब कुछ समझ गए?” प्रतिभा की आंखें भर आईं.
“हां बेटा और वे तुझ से बात कर के आशीर्वाद देने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे थे. उन्हें लगता है कि तू उन्हें माफ नहीं कर पाएगी.”
“ऐसा नहीं है मम्मी. पापा को कहना हम जिंदगी की नई शुरुआत करेंगे.” कह कर उस ने मम्मी को गले से लगा लिया.
उस की आंखों में खुशी के आंसू थे.
लखिका -Sakshi Sharma
सीमा रविवार की सुबह देर तक सोना चाहती थी, लेकिन उस के दोनों बच्चों ने उस की यह इच्छा पूरी नहीं होने दी.
‘‘आज हम सब घूमने चल रहे हैं. मुझे तो याद ही नहीं आता कि हम सब ने छुट्टी का कोई दिन कब एकसाथ गुजारा था,’’ उस के बेटे समीर ने ऊंची आवाज में शिकायत की.
‘‘बच्चो, इतवार आराम करने के लिए बना है और…’’
‘‘और बच्चो, हमें घूमनेफिरने के लिए अपने मम्मी पापा को औफिस से छुट्टी दिलानी चाहिए,’’ शिखा ने अपने पिता राकेशजी की आवाज की बढि़या नकल उतारी तो तीनों ठहाका मार कर हंस पड़े.
‘‘पापा, आप भी एक नंबर के आलसी हो. मम्मी और हम सब को घुमा कर लाने की पहल आप को ही करनी चाहिए. क्या आप को पता नहीं कि जिस परिवार के सदस्य मिल कर मनोरंजन में हिस्सा नहीं लेते, वह परिवार टूट कर बिखर भी सकता है,’’ समीर ने अपने पिता को यह चेतावनी मजाकिया लहजे में दी.
‘‘यार, तू जो कहना चाहता है, साफसाफ कह. हम में से कौन टूट कर परिवार से अलग हो रहा है?’’ राकेशजी ने माथे पर बल डाल कर सवाल किया.
‘‘मैं ने तो अपने कहे में वजन पैदा करने के लिए यों ही एक बात कही है. चलो, आज मैं आप को मम्मी से ज्यादा स्मार्ट ढंग से तैयार करवाता हूं,’’ समीर अपने पिता का हाथ पकड़ कर उन के शयनकक्ष की तरफ चल पड़ा.
सीमा को आकर्षक ढंग से तैयार करने में शिखा ने बहुत मेहनत की थी. समीर ने अपने पिता के पीछे पड़ कर उन्हें इतनी अच्छी तरह से तैयार कराया मानो किसी दावत में जाने की तैयारी हो.
‘‘आज खूब जम रही है आप दोनों की जोड़ी,’’ शिखा ने उन्हें साथसाथ खड़ा देख कर कहा और फिर किसी छोटी बच्ची की तरह खुश हो कर तालियां बजाईं.
‘‘तुम्हारी मां तो सचमुच बहुत सुंदर लग रही है,’’ राकेशजी ने अपनी पत्नी की तरफ प्यार भरी नजरों से देखा.
‘‘अगर ढंग से कपड़े पहनना शुरू कर दो तो आप भी इतना ही जंचो. अब गले में मफलर मत लपेट लेना,’’ सीमा की इस टिप्पणी को सुन कर राकेशजी ही सब से ज्यादा जोर से हंसे थे.
कार में बैठने के बाद सीमा ने पूछा, ‘‘हम जा कहां रहे हैं?’’
‘‘पहले लंच होगा और फिर फिल्म देखने के बाद शौपिंग करेंगे,’’ समीर ने प्रसन्न लहजे में उन्हें जानकारी दी.
‘‘हम सागर रत्ना में चल रहे हैं न?’’ दक्षिण भारतीय खाने के शौकीन राकेशजी ने आंखों में चमक ला कर पूछा.
‘‘नो पापा, आज हम मम्मी की पसंद का चाइनीज खाने जा रहे हैं,’’ समीर ने अपनी मां की तरफ मुसकराते हुए देखा.
‘‘बहुत अच्छा, किस रेस्तरां में चल रहे हो?’’ सीमा एकदम से प्रसन्न हो गई.
‘‘नए रेस्तरां ईस्टर्न डिलाइट में.’’
‘‘वह तो बहुत दूर है,’’ सीमा झटके में उन्हें यह जानकारी दे तो गई, पर फौरन ही उसे यों मुंह खोलने का अफसोस भी हुआ.
‘‘तो क्या हुआ? मम्मी, आप को खुश रखने के लिए हम कितनी भी दूर चल सकते हैं.’’
‘‘तुम कब हो आईं इस रेस्तरां में?’’ राकेशजी ने उस से पूछा.
‘‘मेरे औफिस में कोई बता रहा था कि रेस्तरां अच्छा तो है, पर बहुत दूर भी है,’’ यों झूठ बोलते हुए सीमा के दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं.
‘‘वहां खाना ज्यादा महंगा तो नहीं होगा?’’ राकेशजी का स्वर चिंता से भर उठा था.
‘‘पापा, हमारी खुशियों और मनोरंजन की खातिर आप खर्च करने से हमेशा बचते हैं, लेकिन अब यह नहीं चलेगा,’’ समीर ने अपने दिल की बात साफसाफ कह दी.
‘‘भैया ठीक कह रहे हैं. हम लोग साथसाथ कहीं घूमने जाते ही कहां हैं,’’ शिखा एकदम से भावुक हो उठी, ‘‘आप दोनों हफ्ते में 6 दिन औफिस जाते हो और हम कालेज. पर अब हम भाईबहन ने फैसला कर लिया है कि हर संडे हम सब इकट्ठे कहीं न कहीं घूमनेफिरने जरूर जाया करेंगे. अगर हम ने ऐसा करना नहीं शुरू किया तो एक ही छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी से हो जाएंगे.’’
‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा. तुम सब समझते क्यों नहीं हो कि यों बेकार की बातों पर ज्यादा खर्च करना ठीक नहीं है. अभी तुम दोनों की पढ़ाई बाकी है. फिर शादीब्याह भी होने हैं. इंसान को पैसा बचा कर रखना चाहिए,’’ राकेशजी ने कुछ नाराजगी भरे अंदाज में उन्हें समझाने की कोशिश की.
‘‘पापा, ज्यादा मन मार कर जीना भी ठीक नहीं है. क्या मैं गलत कह रहा हूं, मम्मी?’’ समीर बोला.
‘‘ये बातें तुम्हारे पापा को कभी समझ में नहीं आएंगी और न ही वे अपनी कंजूसी की आदत बदलेंगे,’’ सीमा ने शिकायत की और फिर इस चर्चा में हिस्सा न लेने का भाव दर्शाने के लिए अपनी आंखें मूंद लीं.
‘‘प्यार से समझाने पर इंसान जरूर बदल जाता है, मौम. हम बदलेंगे पापा को,’’ समीर ने उन को आश्वस्त करना चाहा.
‘‘बस, आप हमारी हैल्प करती रहोगी तो देखना कितनी जल्दी हमारे घर का माहौल हंसीखुशी और मौजमस्ती से भर जाएगा,’’ शिखा भावुक हो कर अपनी मां की छाती से लग गई.
‘‘अरे, मैं क्या कोई छोटा बच्चा हूं, जो तुम सब मुझे बदलने की बातें मेरे ही सामने कर रहे हो?’’ राकेशजी नाराज हो उठे.
‘‘पापा, आप घर में सब से बड़े हो पर अब हम छोटों की बातें आप को जरूर माननी पड़ेंगी. भैया और मैं चाहते हैं कि हमारे बीच प्यार का रिश्ता बहुतबहुत मजबूत हो जाए.’’
‘‘यह बात कुछकुछ मेरी समझ में आ रही है. मेरी गुडि़या, मुझे बता कि ऐसा करने के लिए मुझे क्या करना होगा?’’
उन के इस सकारात्मक नजरिए को देख कर शिखा ने अपने पापा का हाथ प्यार से पकड़ कर चूम लिया.
इस पल के बाद सीमा तो कुछ चुपचुप सी रही पर वे तीनों खूब खुल कर हंसनेबोलने लगे थे. ईस्टर्न डिलाइट में समीर ने कोने की टेबल को बैठने के लिए चुना. अगर कोई वहां बैठी सीमा के चेहरे के भावों को पढ़ सकता, तो जरूर ही उस के मन की बेचैनी को भांप जाता.
वेटर के आने पर समीर ने सब के लिए और्डर दे दिया, ‘‘हम सब के लिए पहले चिकन कौर्न सूप ले आओ, फिर मंचूरियन और फिर फ्राइड राइस लाना. मम्मी, हैं न ये आप की पसंद की चीजें?’’
‘‘हांहां, तुम ने जो और्डर दे दिया, वह ठीक है,’’ सीमा ने परेशान से अंदाज में अपनी रजामंदी व्यक्त की और फिर इधरउधर देखने लगी.
सीमा ने भी सब की तरह भरपेट खाना खाया, लेकिन उस ने महसूस किया कि वह जबरदस्ती व नकली ढंग से मुसकरा रही थी और यह बात उसे देर तक चुभती रही.
रेस्तरां से बाहर आए तो समीर ने मुसकराते हुए सब को बताया, ‘‘आप सब को याद होगा कि फिल्म ‘ब्लैक’ मम्मी को बहुत पसंद आई थी. इन के मुंह से इसे दोबारा देखने की बात मैं ने कई बार सुनी तो इसी फिल्म के टिकट कल शाम मैं ने अपने दोस्त मयंक से मंगवा लिए, जो यहां घूमने आया हुआ था. मम्मी, आप यह फिल्म दोबारा देख लेंगी न?’’
‘‘हांहां, जरूर देख लूंगी. यह फिल्म है भी बहुत बढि़या,’’ अपने मन की बेचैनी व तनाव को छिपाने के लिए सीमा को अब बहुत कोशिश करनी पड़ रही थी.
फिल्म देखते हुए अगर सीमा चाहती तो लगभग हर आने वाले सीन की जानकारी उन्हें पहले से दे सकती थी. अगर कोई 24 घंटों के अंदर किसी फिल्म को फिर से देखे तो उसे सारी फिल्म अच्छी तरह से याद तो रहती ही है.
फिल्म देख लेने के बाद वे सब बाजार में घूमने निकले. सब ने आइसक्रीम खाई, लेकिन सीमा ने इनकार कर दिया. उस का अब घूमने में मन नहीं लग रहा था.
‘‘चलो, अब घर चलते हैं. मेरे सिर में अचानक दर्द होने लगा है,’’ उस ने कई बार ऐसी इच्छा प्रकट की पर कोई इतनी जल्दी घर लौटने को तैयार नहीं था.
समीर और शिखा ने अपने पापा के ऊपर दबाव बनाया और उन से सीमा को उस का मनपसंद सैंट, लिपस्टिक और नेलपौलिश दिलवाए.
घर पहुंचने तक चिंतित नजर आ रही सीमा का सिर दर्द से फटने लगा था. उस ने कपड़े बदले और सिर पर चुन्नी बांध कर पलंग पर लेट गई. कोई उसे डिस्टर्ब न करे, इस के लिए उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
उसे पता भी नहीं लगा कि कब उस की आंखों से आंसू बहने लगे. फिर अचानक ही उस की रुलाई फूट पड़ी और वह तकिए में मुंह छिपा कर रोने लगी.
तभी बाहर से समीर ने दरवाजा खटखटाया तो सीमा ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मुझे आराम करने दो.’’
‘‘मम्मी, आप कुछ देर जरूर आराम कर लो. शिखा पुलाव बना रही है, तैयार हो जाने पर मैं आप को बुलाने आ जाऊंगा,’’ समीर ने कोमल स्वर में कहा.
‘‘मैं सो जाऊं तो मुझे उठाना मत,’’ सीमा ने उसे रोआंसी आवाज में हिदायत दी.
कुछ पलों की खामोशी के बाद समीर का जवाब सीमा के कानों तक पहुंचा, ‘‘मम्मी, हम सब आप को बहुत प्यार करते हैं. पापा में लाख कमियां होंगी पर यह भी सच है कि उन्हें आप के सुखदुख की पूरी फिक्र रहती है. मैं आप को यह विश्वास भी दिलाता हूं कि हम कभी कोई ऐसा काम नहीं करेंगे, जिस के कारण आप का मन दुखे या कभी आप को शर्म से आंखें झुका कर समाज में जीना पड़े. अब आप कुछ देर आराम कर लो पर भूखे पेट सोना ठीक नहीं. मैं कुछ देर बाद आप को जगाने जरूर आऊंगा.’’
‘तू ने मुझे जगा तो दिया ही है, मेरे लाल,’ उस के दूर जा रहे कदमों की आवाज सुनते हुए सीमा होंठों ही होंठों में बुदबुदाई और फिर उस ने झटके से उठ कर उसी वक्त मोबाइल फोन निकाल कर अपने सहयोगी नीरज का नंबर मिलाया.
‘‘स्वीटहार्ट, इस वक्त मुझे कैसे याद किया है?’’ नीरज चहकती आवाज में बोला.
‘‘तुम से इसी समय एक जरूरी बात कहनी है,’’ सीमा ने संजीदा लहजे में कहा.
‘‘कहो.’’
‘‘समीर को उस के दोस्त मयंक से पता लग गया है कि कल दिन में मैं तुम्हारे साथ घूमने गई थी.’’
‘‘ओह.’’
‘‘आज वह हमें उसी रेस्तरां में ले कर गया, जहां कल हम गए थे और खाने में वही चीजें मंगवाईं, जो कल तुम ने मंगवाई थीं. वही फिल्म दिखाई, जो हम ने देखी थी और उसी दुकान से वही चीजें खरीदवाईं, जो कल दिन में तुम ने मेरे लिए खरीदवाई थीं.’’
‘‘क्या उस ने तुम से इस बात को ले कर झगड़ा किया है?’’
‘‘नहीं, बल्कि आज तो सब ने मुझे खुश रखने की पूरी कोशिश की है.’’
‘‘तुम कोई बहाना सोच कर उस के सवालों के जवाब देने की तैयारी कर लो, स्वीटहार्ट. हम आगे से कहीं भी साथसाथ घूमने जाने में और ज्यादा एहतियात बरतेंगे.’’
कुछ पलों की खामोशी के बाद सीमा ने गहरी सांस खींची और फिर दृढ़ लहजे में बोली, ‘‘नीरज, मैं अकेले में काफी देर रोने के बाद तुम्हें फोन कर रही हूं. जिस पल से आज मुझे एहसास हुआ है कि समीर को हमारे प्रेम संबंध के बारे में मालूम पड़ गया है, उसी पल से मैं अपनेआप को शर्म के मारे जमीन में गड़ता हुआ महसूस कर रही हूं.
‘‘मैं अपने बेटे से आंखें नहीं मिला पा रही हूं. मुझे हंसनाबोलना, खानापीना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है. बारबार यह सोच कर मन कांप उठता है कि अगर तुम्हारे साथ मेरे प्रेम संबंध होने की बात मेरी बेटी और पति को भी मालूम पड़ गई, तो मुझे जिंदगी भर के लिए सब के सामने शर्मिंदा हो कर जीना पड़ेगा.
‘‘आज एक झटके में ही मुझे यह बात अच्छी तरह से समझ आ गई है कि अपने बड़े होते बच्चों की नजरों में गिर कर जीने से और दुखद बात मेरे लिए क्या हो सकती है नीरज. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मेरे गलत, अनैतिक व्यवहार के कारण वे समाज में शर्मिंदा हो कर जिएं.
‘‘यह सोचसोच कर मेरा दिल खून के आंसू रो रहा है कि जब समीर के दोस्त मयंक ने उसे यह बताया होगा कि उस की मां किसी गैरमर्द के साथ गुलछर्रे उड़ाती घूम रही थी, तो वह कितना शर्मिंदा हुआ होगा. नहीं, अपने बड़े हो रहे बच्चों के मानसम्मान की खातिर आज से मेरे और तुम्हारे बीच चल रहे अवैध प्रेम संबंधों को मैं हमेशाहमेशा के लिए खत्म कर रही हूं.’’
‘‘मेरी बात तो…’’
‘‘मुझे कुछ नहीं सुनना है, क्योंकि मैं ने इस मामले में अपना अंतिम फैसला तुम्हें बता दिया है,’’ सीमा ने यह फैसला सुना कर झटके से फोन का स्विच औफकर दिया.
सीमा का परेशान मन उसे और ज्यादा रुलाना चाहता था, पर उस ने एक गहरी सांस खींची और फ्रैश होने के लिए गुसलखाने में घुस गई.
हाथमुंह धो कर वह समीर के कमरे में गई. अपने बेटे के सामने वह मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाल पाई. बस, अपने समझदार बेटे की छाती से लग कर खूब रोई. इन आंसुओं के साथ सीमा के मन का सारा अपराधबोध और दुखदर्द बह गया.
जब रो कर मन कुछ हलका हो गया, तो उस ने समीर का माथा प्यार से चूमा और सहज मुसकान होंठों पर सजा कर बोली, ‘‘देखूं, शिखा रसोई में क्या कर रही है… मैं तेरे पापा के लिए चाय बना देती हूं. मेरे हाथों की बनी चाय हम दोनों को एकसाथ पिए एक जमाना बीत गया है.’’
‘‘जो बीत गया सो बीत गया, मम्मी. अब हम सब को अपनेआप से यह वादा जरूर करना है कि एकदूसरे के साथ प्यार का मजबूत रिश्ता बनाने में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे,’’ समीर ने उन का माथा प्यार से चूम कर अपने मन की इच्छा जाहिर की.
‘‘हां, जब सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते हैं,’’ सीमा ने मजबूत स्वर में उस की बात का समर्थन किया और फिर अपने पति के साथ अपने संबंध सुधारने का मजबूत इरादा मन में लिए ड्राइंगरूम की तरफ चल पड़ी.
भोजपुरी अभिनेत्री रानी चटर्जी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. रानी इंटरनेट पर अपने पोस्ट फैंस के साथ शेयर करती रहती है. हाल ही में अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर रानी चटर्जी ने टीवी एक्टर और कॉमेडियन कृष्णा अभिषेक (Krushna Abhishek) के साथ डांस करते हुए एक वीडियो पोस्ट किया है. इस वीडियो में रानी और कृष्णा दोनों ही भोजपुरी एक्टर और सिंगर अरविंद अकेला कल्लू के ‘नाच रे पतरकी’ गाने पर नागिन डांस करते नजर आ रहे हैं. फैंस इस वीडियो को काफी पसंद कर रहे हैं.
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रानी चटर्जी ने वीडियो पोस्ट करते हुए कैप्शन दिया, ‘नाच रे पतरकी गाने पर कृष्णा अभिषेक के साथ खूब मस्ती की. वो भोजपुरी इंडस्ट्री में मेरे सबसे अच्छे दोस्त और को-एक्टर हैं.’
शादियों के मौसम में जहां टीवी जगत के कई कलाकार शादी के बंधन में बंध चुके हैं ,वहीं अब टीवी कलाकार करिश्मा तन्ना ने भी 5 फरवरी 2022 को एक निजी समारोह में अपने बॉयफ्रेंड वरुण बंगेरा के साथ शादी रचा ली. मुंबई में अपने परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों की मौजूदगी में करिश्मा और वरुण ने शादी के सात फेरे लिए. करिश्मा की शादी में टीवी और फिल्म जगत के कई लोगों ने शिरकत की जिसमे एक्ट्रेस हरलीन सेठी, दलजीत कौर, अनिता हस्सनंदानी, एकता कपूर और रिद्धिमा पंडित थे.
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करिश्मा ने अपनी शादी के लिए फाल्गुनी शेन पीकॉक के लहंगे को चुना था. करिश्मा ने अपनी वेडिंग ड्रेस को गोल्ड ज्वेलरी के साथ पेयर किया था, जो उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था. अपने ब्राइडल आउटफिट में स्टनिंग लग रहीं करिश्मा ने अपने पति के साथ अपनी शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. उन्होंने इसे शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है “जस्ट मैरिड.”
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करिश्मा और उनके हब्बी वरुण ने अपने इंडस्ट्री फ्रेंड्स के लिए एक फाइव-स्टार होटल में ग्रैंड वेडिंग रिसेप्शन रखा. रिसेप्शन में करिश्मा ने गोल्डन ड्रेस पहनकर सुर्खियां बटोरी. ‘ब्रोकन बट ब्यूटीफुल’ में अपनी भूमिका के लिए जानी जाने वाली हरलीन ने सोशल मीडिया पर नई दुल्हन करिश्मा के रिसेप्शन का एक वीडियो शेयर किया है. वीडियो में करिश्मा को गोल्डन ड्रेस में डांस करते हुए देखा जा सकता है
करिश्मा ने अल्लू अर्जुन-स्टारर फिल्म ‘पुष्पा: द राइज’ के गाने ‘ऊं अंटावा’ पर जमकर ठुमके लगाए और दोस्तों के साथ जमकर मस्ती की.
छोटे पर्दे की पॉपुलर एक्ट्रेस करिश्मा, सलमान खान के शो ‘बिग बॉस 8’ की फर्स्ट रनर-अप रहने के साथ खतरों के खिलाडी सीज़न 10 में विजेता रह चुकी हैं. करिश्मा तन्ना को आखिरी बार फिल्म ‘लाहौर कॉन्फिडेंटल’ में देखा गया था, जिसका प्रीमियर ‘ZEE5’ पर हुआ था. इसके साथ ही उन्होंने ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ‘क़यामत की रात’, नागिन 3और ‘बाल वीर’ सहित कई लोकप्रिय शो में काम किया है.
गांवों में वैसे भी रात जल्दी हो जाती है और जब दिसंबर की सर्द रात हो तो गांव की गलियों में सन्नाटा पसरना आम बात है. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के कौंधियारा ब्लौक के बड़गोहना गांव में भी ऐसा ही कुछ माहौल था. ज्यादातर घरों की बत्तियां बंद थीं और लोग बिस्तरों में दुबक कर ठंड से मुकाबला कर रहे थे.
लेकिन सर्द हवा से सांयसांय करती गांव की एक गली में 16 साल की नाबालिग लड़की मोबाइल फोन से किसी से हंसहंस कर बातें कर रही थी. वह इस बात से बेखबर थी कि उस को किसी ने देख लिया है. उस लड़की की बातचीत का अंदाज बता रहा था कि दूसरी तरफ वाला शख्स उस का प्रेमी ही हो सकता है.
मांबाप की गैरमौजूदगी में उस लड़की के सिर पर इश्क का भूत सवार था. उस की उम्र 16 साल जरूर थी, लेकिन मोबाइल फोन पर मुहैया इंटरनैट से उस ने सैक्स की काफी जानकारी हासिल कर ली थी, इसीलिए उस ने सर्द रात में अपने सूने घर में प्रेमी को आने का न्योता दे दिया.
19 साल का प्रेमी शिवशंकर उर्फ छोटू तो ऐसे मौके की तलाश में था. उस लड़की मीना का फोन आते ही वह झटपट मोटरसाइकिल से उस के घर पहुंच गया. कई किलोमीटर की दूरी उस ने इतने कम समय में पूरी कर ली कि अपने सामने खड़े प्रेमी को देख कर भी मीना को आसानी से यकीन नहीं हुआ.
मीना ने अपने छोटे भाई अमन को पहले ही किसी तरह गहरी नींद में सुला दिया था. जवानी की दहलीज पर खड़े दोनों बहुत देर तक अपने को रोक नहीं पाए. इश्क की पेंगें बढ़ाते हुए वे उस में इतना खो गए कि उन को होश ही नहीं रहा कि घर में कोई और भी है. शिवशंकर भी अपनी माशूका को सामने पा कर अपनी सुधबुध खो बैठा था.
इधर बातचीत और हंसीमजाक की आवाज सुन कर 14 साल के अमन की आंख खुल गई. वह अपने घर में बहन के साथ किसी अनजान को देख कर सबकुछ जल्दी ही समझ गया. उम्र में छोटा होने के बाद भी भाई को बहन की यह हरकत नागवार लगी और वह बहन का विरोध करने लगा. डांटफटकार के बाद भी वह चुप नहीं हुआ और आंखों देखी सारी बात पिता को बताने के लिए कहने लगा.
छोटे भाई की इस घमकी के बाद उस की बड़ी बहन डर गई, लेकिन उसे अपने प्यार में बाधा बन रहे भाई की ये बातें अच्छी नहीं लगीं. इस के बाद उस ने जो किया वह जान कर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे.
मीना ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पहले अपने छोटे भाई पर लोहे की एक छड़ से हमला किया और बाद में पीटपीट कर उस का कत्ल कर दिया.
मीना के घर वालों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार ऐसा क्यों हो गया और किस ने मासूम लड़के को जान से मार दिया. इस वारदात की खबर मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर की.
पुलिस जांचपड़ताल में जो मामला सामने आया उस से सब की आंखें खुली की खुली रह गईं. अमन के पिता गुलाब खेती करते हैं. वे अपनी पत्नी को ले कर अपनी ससुराल गए थे और रात में वहीं पर रुक गए थे. घर पर उन का 14 साल बेटा अमन और 16 साल की बेटी मीना थी.
कौंधियारा पुलिस को जब एक 14 साल के लड़के की घर के भीतर हत्या की खबर मिली तो वह भी चकरा गई. पुलिस जब गुलाब के घर पहुंची तो 14 साल के मासूम अमन की खून से लथपथ लाश बिस्तर पर पड़ी थी. पुलिस को भी पहले समझ नही आ रहा था कि एक मासूम का कत्ल क्यों और कौन करेगा, वह भी घर के भीतर, जब घर में केवल भाईबहन ही हों?
पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमौर्टम के लिए भेज दिया और इस के बाद मामले की जांच शुरू कर की. घर और गांव वालों को समझ नहीं आ रहा था कि आखिरकार ऐसा क्या हो गया कि किसी ने नाबालिग लड़के को मार दिया. एक 14 साल के मासूम से किस की दुश्मनी हो सकती है?
इस से पहले सुबह आरोपी लड़की ने सब को चीखते हुए बताया था कि अमन को किसी ने मार दिया है. वैसे, पुलिस को शुरुआती जांच में ही बहन पर शक हो गया था. इस के बाद क्राइम ब्रांच ने जब लड़की का मोबाइल फोन सर्विलांस पर ले कर काल डिटेल निकाली तो सारा भेद खुल गया.
पुलिस की पूछताछ में लड़की घबरा गई, लेकिन उस ने अपने बयान बारबार बदल कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश भी की. बाद में घर की तलाशी पर पुलिस को एक मोबाइल फोन मिला जिस से वह लड़की केवल अपने प्रेमी शिवशंकर उर्फ छोटू निवासी बस्तर करछना से बात करती थी.
गांव के एक बुजुर्ग ने भी पुलिस को बताया कि रात को 12 बजे के आसपास वह लड़की किसी से फोन पर बात कर रही थी. बातचीत में मशगूल मीना उन बुजुर्ग को नहीं देख सकी थी.
पुलिस को रात में शिवशंकर के मोबाइल फोन की लोकेशन बड़गोहना गांव में ही मिली. वह मौके से फरार हो चुका था, लेकिन क्राइम ब्रांच ने तेजी दिखाते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई लोहे की छड़ भी हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर ली.
जिस प्यार को पाने के लिए एक बहन ने अपने छोटे भाई की बलि दे दी उसी प्रेमी के साथ अब वह जेल में अपने गुनाहों की सजा पाने के लिए भेज दी गई है.