शादी के 5 वर्ष बाद भी पत्नी सहवास के लिए कभी इच्छा जाहिर नहीं करती, बताएं क्या करूं?

सवाल
मैं 30 वर्षीय युवक हूं. शादी को 5 वर्ष हो चुके हैं. 2 बच्चे हैं. बेटा 3 साल का है और बेटी 1 साल की. घर में हमारे अलावा बीमार मां है. पत्नी बहुत ही सुंदर और सुशील है. घर के कामकाज, बच्चों की परवरिश के अलावा मेरी मां की सेवा भी बखूबी करती है. पर रात को कमरे में आते ही निढाल हो जाती है. सहवास के लिए उस ने कभी इच्छा जाहिर नहीं की. मेरे पहल करने पर भी कोई उत्साह नहीं दिखाती. कई बार तो उस की बेरुखी देख कर मेरा मूढ़ ही बिगड़ जाता है. मैं कई कई दिन इच्छा जाहिर नहीं करता. पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. बताएं क्या करूं?

जवाब
आप की बीवी घर की देखभाल करती हैं. 2 छोटे बच्चे  हैं, जिन की परवरिश अपनेआप में काफी जिम्मेदारी का काम है. इस के अलावा वे आप की मां की सेवा भी करती हैं. जाहिर है इन सब दायित्वों को पूरा करतेकरते वे थक जाती होंगी. उस के बाद आप चाहते हैं कि रात को वे तरोताजा नजर आएं. सहवास के लिए उत्साह दिखाएं तो यह कैसे संभव है?

आप घर के कार्यों में और बच्चों की देखरेख में पत्नी की मदद करें. संभव हो तो कोई मेड रख लें. इस से उन्हें कुछ राहत मिलेगी और फिर आप को उन से कोई शिकायत नहीं रहेगी.

भीतर का दर्द: क्यों सानिया घर से भाग गई थी?

Writer-  रमेश मनोहरा

रमजान मियां का आज पूरा कुनबा खुश था. उन का छोटा 2 कमरे का मकान खाने की खुशबू से महक रहा था. 20 साल बाद उन की सब से छोटी बेटी सानिया जो आ रही?थी.

सानिया ने खिलाफत कर के हिंदू लड़के से शादी की थी, तभी से उन्होंने बेटी से रिश्ता तोड़ दिया था. न तो कभी बुलाने की कोशिश की और न ही कभी मिलने गए.

रमजान मियां की 4 बेटियों के बाद सानिया पैदा हुई थी. मतलब, वह उन की 5वीं बेटी थी. आखिर में लड़का पैदा हुआ था.

रमजान मियां सरकारी मुलाजिम रहे थे. आज उन्हें रिटायर हुए 20 साल हो गए थे. वे जब सरकारी नौकरी में थे, तब 1-1 कर के 4 बेटियों की शादी कर चुके थे. जब वे रिटायर हुए, तब सानिया की शादी की जिम्मेदारी रह गई थी.

सानिया काफी खूबसूरत थी. वह सब से ज्यादा पढ़ीलिखी भी थी. जब वह निकाह के लायक हुई, उस के लिए दूल्हे की खोज शुरू हो गई थी.

कई लड़के देखने के बाद फिरोज खान से बात चल रही थी. इसी बीच सानिया और सुरेश शर्मा में इश्क परवान चढ़ गया था.

सुरेश शर्मा उस के कालेज में ही था.  जब उन्हें पता चला, तब फिरोज खान के घर वाले सानिया को देखने आने वाले थे.

फिरोज खान के साथ उस के अब्बा, अम्मी और परिवार के दूसरे लोग आए थे, मगर सानिया उस समय घर में नहीं थी.

मेहमान बैठकखाने में थे. जिस बेटी को देखने आ रहे थे, वही बेटी सुबह सहेली के यहां न्योता देने की कह कर गई थी. अभी तक आने का ठिकाना नहीं. जिस सहेली की कह कर गई थी, उस ने भी इनकार कर दिया था कि वह यहां नहीं आई.

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21 साल की सानिया कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी. मगर कहां गई, उन की चिंता को बढ़ा दिया, जबकि होने वाले समधी कई बार कह चुके थे कि रमजान मियां लड़की को बुलाओ, मगर उस का कहीं पता नहीं चला. महल्ले के लड़के भी गाड़ी ले कर ढूंढ़ने निकल पड़े. सानिया के न आने से कई तरह के डर जन्म ले रहे थे.

अभी दोपहर के 12 बज रहे थे. महल्ले के कुछ लड़कों ने आ कर कहा कि सानिया आ रही है. यह सुनते ही सब के मुरझाए चेहरे खिल उठे.

पलभर बाद जब सानिया ने बैठक में प्रवेश किया, तब हमेशा सलवारकमीज पहनने वाली उस लड़की ने साड़ी पहन रखी थी और मांग में सिंदूर था. साथ में सुरेश शर्मा भी था.

रमजान मियां बोले, ‘‘सानिया बेटी कहां चली गई थी? हम ने तुम्हें कहांकहां नहीं ढूंढ़ा, कहांकहां नहीं फोन लगाया और तुम ने यह क्या हुलिया बना रखा है… और यह मांग में…’’

‘‘माफ करें अब्बा…’’ बीच में ही बात काटते हुए सानिया बोली, ‘‘मैं ने सुरेश से कोर्ट में जा कर शादी कर ली है. एक महीने पहले ही अर्जी दे दी थी. उन की बहन और मेरा कजिन दोनों गवाह भी हैं.’’

‘‘क्या कहा…? मेरे पूछे बिना शादी कर ली,’’ गुस्से से रमजान मियां बोले.

‘‘हां अब्बा, अगर मैं आप से पूछती, तब क्या आप यह शादी करने देते…?’’ सानिया ने पूछा.

‘‘अरे, होने वाले समधीजी…’’ उठते हुए फिरोज खान के अब्बा बोले, ‘‘हमें यहां बुला कर हमारी बेइज्जती की. चलो फिरोज, अच्छा हुआ, सगाई के पहले ही लड़की के चालचलन का पता चल गया.

‘‘ऐसी लड़की को जन्म दे कर आप ने मुसलिम कौम की बेइज्जती की है. मेरी लड़की अगर किसी हिंदू लड़के के साथ शादी करती, तब मैं उसे काट कर फेंक देता. क्या आप ने अपनी बेटी को यही तालीम दी है…’’ कह कर फिरोज खान के अब्बा समेत पूरा कुनबा गुस्से में उठ कर चल दिया.

कुछ पल के लिए वहां सन्नाटा रहा, फिर रमजान मियां बोले, ‘‘कटा दी न तुम ने हमारी नाक. अरे, मुझे कहीं का नहीं रखा… अब यहां क्या लेने आई हो?’’

‘‘आप का आशीर्वाद लेने अब्बा,’’ सानिया ने कहा.

‘‘अब्बा की नाक काट कर अब आशीर्वाद लेने आई हो…’’ रमजान मियां गुस्से से उफन पड़े थे, ‘‘चली जा… अब मुझे अपनी सूरत भी मत दिखाना.’’

‘‘बिना आशीर्वाद लिए कैसे जाऊं अब्बा?’’ सानिया बोली.

‘‘किस मुंह से आशीर्वाद लेने आई हो? अपने अब्बा की टोपी तो तुम ने उछाल दी. अरे, तू पैदा होते ही मर गई होती तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता. चली जा, मुझे तेरी सूरत से भी नफरत है.

‘‘तुम अपनी अम्मां को देख रही हो, जिस की आंखों से आंसू बह रहे हैं. इस का भी खयाल तुझे नहीं आया.

‘‘अरे, तेरे रिश्ते के लिए जो लोग आए थे, उन की नजर में तू ने मेरी इज्जत गिरा दी. क्या कह कर गए हैं वे, सुना तुम ने. अब आ गई आशीर्वाद लेने.

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‘‘चले जाओ तुम दोनों. अब कभी अपनी मनहूस सूरत मत दिखाना. मेरे लिए अब तुम मर चुकी हो. सुना कि नहीं, चले जाओ तुम दोनों…’’

तब सानिया और सुरेश शर्मा बाहर निकल गए. सारा घर और महल्ला उन्हें जाते हुए देखता रहा.

कुछ गुस्साए नौजवानों ने ‘सानिया मुरदाबाद’ के नारे लगाए. कुछ उग्र लड़के सुरेश शर्मा को मारना चाहते थे, मगर कुछ समझदार बुजुर्गों ने समझाया कि कानून को हाथ में मत लो.

इस घटना को घटे 20 साल हो गए. उस दिन के बाद से उन्होंने न बेटी से रिश्ता रखा और न बेटी यहां आई. वे उसे तकरीबन भूल चुके थे.

इन 20 सालों में रिश्तों के दरिया से न जाने कितना पानी बह चुका था. बेटीबाप का रिश्ता खत्म हो चुका था. सानिया को उस के एकलौते भाई की शादी में भी नहीं बुलाया गया.

मगर सानिया उन की सब से समझदार बेटी थी. उस से रिश्ता तोड़ना उन को पछतावा दे रहा है. मगर गैरकौम में शादी कर के खुद हिंदू बन जाना यही उन्हें अंदर ही अंदर कचोट रहा था. वह अपनी ही बिरादरी में शादी कर लेती, तब उन्हें कोई पछतावा नहीं होता.

इन 20 सालों में माहौल भी बदलने लगा था. हिंदूमुसलिम को अपना जानी दुश्मन बनाने में टैलीविजन कोई कसर नहीं छोड़ रहा था. रमजान मियां ने कभी यह नहीं पूछा कि कैसी है, क्या तकलीफ है, मगर उस की तरफ से भी कोई खबर नहीं आती. वह कैसे देती, उस को तो उन्होंने बेइज्जत कर के सिर्फ इसलिए निकाल दिया था कि वह मुसलमान से हिंदू बन गई है.

चलो बन गई तब कोई बात नहीं, मगर उसे तो सब सच बता देना था. उस ने भी सबकुछ छिपा कर रखा. उस की याद में कितनी रातें उन्हें ठीक से नींद नहीं आई. कई बार उन की इच्छा हुई थी कि सानिया को बुला लें, मगर अंदर के कठोर चेहरे ने हर बार इनकार कर दिया.

ऐसे में उन के एक रिश्तेदार आबिद हुसैन आ कर बोले, ‘‘तुम्हारी चारों बेटियों में से सानिया ही अपने घर में सुखी है. पैसों की बचत भी हो जाती है और वह जिस हिंदू परिवार में गई है, वह परिवार दकियानूसी नहीं है और न ही उस पर किसी तरह की रोकटोक है. आजादी से घूमती है. उस के प्रति अभी इतने कठोर मत बनो.

‘‘माना कि उस ने जवानी में आ कर अपनी मरजी का कदम उठा लिया. यह उम्र ही ऐसी होती है. वह मर चुकी?है, कह देने से बापबेटी का रिश्ता खत्म नहीं हो जाता है. उसे एक बार बुला कर तो देखो.’’

‘‘मेरे बुलाने से क्या वह आ जाएगी?’’ रमजान मियां ने पूछा.

‘‘वह तो आने के लिए तैयार बैठी थी, मगर जब तक आप नहीं बुलाएंगे, वह नहीं आएगी.’’

‘‘मगर, आप यह कैसे कह सकते हो आबिद हुसैन भाई?’’

‘‘मेरी उन से बात हुई है. उसी ने यह कहा है कि अब्बा जब तक आने को नहीं कहेंगे, तब तक नहीं आएगी…’’ आबिद हुसैन ने अपनी बात कह दी, ‘‘ठीक है, चलता हूं. मेरा काम था समझाने का मैं ने समझा दिया. अब तुम जानो. तुम उसे बुलाओ या मरी हुई समझो.’’

सानिया के प्रति उस के अब्बा ने अब तक नफरत पाल रखी थी. आबिद हुसैन उन के भीतर एक बाप का प्यार डाल गए. सचमुच सानिया को देखे 20 साल हो गए थे. बाप और बेटी का रिश्ता भी उन्होंने खत्म कर दिया था. उन की चारों बेटियों को दुखी देख कर उन का मन कितना पिघल जाता था. जब भी वे अपनी ससुराल से पीहर में आती हैं, अपना दुखड़ा सुना कर उन का मन और पिघल उठता था.

उन की बड़ी बेटी नसीम बानो ने तो यहां तक कह दिया था, ‘‘अब्बा, किस खानदान में मेरा निकाह कर दिया. रोकटोक इतनी कि खुली हवा में सांस भी न ले सकें. हर चीज के लिए तरसो. हर साल बच्चे पैदा करो, जैसे औरत को मशीन समझ रखा है.’’

जब चारों बेटियां घर में आती हैं, सब आपस में अपनी ससुराल का दुखड़ा रोया करती हैं. उन के दुखड़ों से वे खुद परेशान तो रहते ही हैं, साथ में उन की बेगम रजिया भी दुखी रहती हैं. मगर वे सब जैसेतैसे जिंदगी की गाड़ी घसीट रही हैं.

उन की चारों लड़कियों का एक ही मत है कि सानिया ने अपनी मरजी से शादी की, इसलिए आज वह सुखी है. दोनों कमा रहे हैं और बचत भी हो रही है. बच्चे भी 2 हैं, एक लड़का और एक लड़की. सानिया के सुखी परिवार को देख कर उन चारों बहनों को जलन होने लगती है.

तभी बेगम रजिया आ कर बोलीं, ‘‘आबिद हुसैन क्या कह कर गए हैं?’’

‘‘कह गए हैं कि सानिया को

बुला लो.’’

‘‘बुला लीजिए न, उसे देखने के लिए आंखें तरस गई?हैं,’’ रजिया की ममता एकदम जाग उठी.

तब नाराजगी से रमजान मियां बोले, ‘‘अरे बेगम, सानिया तो उस दिन से ही मेरे लिए मर गई, जिस दिन उस ने…’’

‘‘यह आप नहीं, बाप का कट्टर दिल बोल रहा?है…’’ बीच में ही बात काट कर रजिया बोलीं, ‘‘एक मां का दिल क्या होता है, आप क्या जानें? फिर वह हमारी बेटी है. मर गई कह देने से क्या रिश्ता खत्म हो जाएगा.’’

‘‘बेगम, तुम भी वही भाषा बोल रही हो, जो आबिद मियां बोल गए हैं…’’ नाराज हो कर रमजान मियां बोले, ‘‘मैं नहीं बुला सकता हूं. भरी बिरादरी में उस ने मेरी नाक कटा दी. आज तक बिरादरी वाले ताने मार रहे हैं.’’

‘‘हां, उस समय उस ने आप की नाक कटा दी…’’ रजिया भी जरा नाराज हो कर बोलीं, ‘‘मगर सोचो, रजिया से भले ही हम ने रिश्ते खत्म कर लिए हैं, उस ने हिंदू धर्म अपना लिया है, मगर जातबिरादरी में सुनने को मिलता है कि वह अपनी चारों बहनों से ज्यादा सुखी है…

‘‘मैं ने आप का अब तक हर कहना माना है. जैसा आप ने कहा, वैसा मैं ने किया है. आप के हर सुखदुख में मैं ने साथ दिया है. आज आप की चारों बेटियां किस कदर दुखी हैं. उन के दुख में हम कितने दुखी होते हैं. उन का दुख हमारा दुख होता है. मगर, सानिया ने हमारी मरजी के खिलाफ शादी की, पर आज वह सुखी तो है.

‘‘हम अपने भीतर का दर्द किसी को बयां नहीं कर सकते हैं. मगर सानिया को सुखी देख कर खुशियां तो मना सकते हैं कि उस ने अच्छे खानदान में निकाह किया है. अब यह अलग बात है कि कौम अलग है. कौम अलग होने से क्या इनसानियत मर जाती है? मैं कहती हूं कि जोकुछ हुआ, उसे भूल जाओ और सानिया को बुला लो.’’

रमजान मियां ने सानिया घर फोन

कर दिया. उधर से आने की रजामंदी भी मिल गई.

‘‘अब्बा,’’ रमजान मियां की सारी सोच टूट गई. सामने सानिया खड़ी थी, साथ में सुरेश और उन के दोनों बच्चे. रमजान मियां का चेहरा खुशी से खिल उठा. उन की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए.

इन 20 सालों में सानिया कितनी बदल गई. साड़ी पहन रखी थी. बदन भरा था. गले में सोने का हार था. हाथ में 4-4 सोने की चूडि़यां, महंगी साड़ी और महंगी जूती उस की अमीरी बयां कर बना रही थी. अनजान आदमी कोई मिल जाता तो उसे मुसलिम नहीं हिंदू कहेगा.

रमजान मियां अंदर आवाज देते हुए बोले, ‘‘बेगम बाहर आओ. हमारी सानिया आई है.’’

रजिया, उन की बहू आयशा बाहर आ गए. सानिया को देख कर उस की भी आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला पड़े.

सानिया ने अपने बच्चों से कहा, ‘प्रभात और कुसुम, ये तुम्हारे नाना और नानी हैं… और ये तुम्हारी मामी हैं. इन के पैर छुओ.’

उन्होंने बारीबारी से पैर छुए. इस समय घर का गमगीन माहौल ऐसा हो गया कि बहुत दिनों के बाद खुशियां लौटी हैं. रजिया तो खुश थीं.

‘‘कैसी हो बेटी, तुझे तो बहुत सालों के बाद देखा है…’’ अम्मी अपने आंसू पोंछते हुई बोलीं, ‘‘क्या तुम्हें हमारी याद नहीं आई?’’

‘‘मैं तो एकदम ठीक हूं अम्मी…’’ चहक कर सानिया बोली, ‘‘जब आप लोगों ने मुझ से संबंध ही तोड़ लिए, तब मैं कैसे आती? फिर भी आप लोगों की याद मुझे आती रही.’’

‘‘अरे ओ बेगम, सालों बाद तो बेटी आई है और उलट इस से शिकायत करने बैठ गई,’’ रमजान मियां ने टोका.

‘‘हां बेटी, मैं भी कैसी मां हूं, जो आते ही शिकायत करने बैठ गई,’’ अपनी गलती स्वीकार करती हुई रजिया बोलीं, ‘‘आज तुझे पास पा कर बहुत खुश हूं. बहुत खुश हूं और तुझे खुश देख कर तो और भी खुश हूं.

‘‘बता बेटी, तेरे सासससुर कैसे हैं?

वे तुझे…’’

‘‘अम्मी, मेरे सासससुर एकदम ठीक हैं…’’ बीच में ही बात काट कर सानिया बोली, ‘‘वे मुझे बहू नहीं बेटी मानते हैं. सच अम्मी मैं वहां बहुत सुखी हूं. वहां हम न हिंदू त्योहार मनाते हैं, न मुसलिम. सिर्फ हर बार बड़ा सा खर्चा होता है. सारे रिश्तेदार मिलते हैं. कोई मुझ से भेदभाव नहीं करता है.’’

मां की ममता एक बार फिर जाग उठी. उस की आंखों से फिर आंसू

बह निकले.

पलभर के सन्नाटे के बाद सानिया बोली, ‘‘अम्मी, चारों बहनों की हालत देख कर और उन का दकिनानूसी परिवार देख कर ही मैं ने फैसला लिया था कि मैं शादी अपनी इच्छा से करूंगी. तभी तो आप से खिलाफत कर के मैं ने सुरेश से शादी करने का फैसला लिया था. आज मैं वहां बहुत सुखी हूं अब्बा. मैं वहां रोरो कर जिंदगी नहीं गुजार रही हूं,’’ सानिया ने कहा.

सानिया की इस बात से रमजान मियां और रजिया की आंखों से कितनी ही गंगाजमाना बह चुकी थीं. उन के भीतर का जो दर्द था, वह मर चुका था.      द्य

गंगासागर: सपना अपनी बुआ से क्यों नाराज थी?

Writer- माला वर्मा

‘सब तीर्थ बारबार, गंगासागर एकबार,’ इस वाक्य को रटते हुए गांव से हर साल कुछ परिचित टपक ही पड़ते. जैसेजैसे गंगासागर स्नान की तारीख नजदीक आती जाती, वैसेवैसे सपना को बुखार चढ़ने लगता.

विकास का छोटा सा घर गंगासागर स्नान के दिनों में गुलजार हो जाता. बबुआ, भैया व बचवा  कह कर बाबूजी या दादाजी का कोई न कोई परिचित कलकत्ता धमक ही पड़ता. गंगासागर का मेला तो 14 जनवरी को लगता, पर लोग 10-11 तारीख को ही आ जाते. हफ्तेभर पहले से घर की काया बदल देनी पड़ती, ताकि जितने लोग हों, उसी हिसाब से बिस्तरों का इंतजाम किया जा सके.

इस दौरान बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होता. वैसे उन की तो मौज हो जाती, इतने लोगों के बीच जोर से डांटना भी संभव न होता.

फिर सब के जाने के बाद एक दिन की खटनी होती, नए सिरे से घर को व्यवस्थित करना पड़ता था. यह सारा तामझाम सपना को ही निबटाना पड़ता, सो उस की भृकुटि तनी रहती. पर इस से बचने का कोई उपाय भी न था. पिछले लगातार 5 वर्षों से जब से उन का तबादला पटना से कलकत्ता हुआ, गंगासागर के तीर्थयात्री उन के घर जुटते रहते.

विकास के लिए आनाकानी करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. साल में जब भी वे एक बार छुट्टियों में गांव जाते, सभी लोग आत्मीयता से मिलते थे. जितने दिन भी वे गांव में रहते, कहीं से दूध आ जाता तो कहीं से दही, कोई मुरगा भिजवाता तो कोई तालाब से ताजा मछली लिए पहुंच जाता.

‘अब जहां से इतना मानसम्मान, स्नेह मिलता है, वहां से कोई गंगासागर के नाम पर उस के घर पहुंचता हो तो कैसे इनकार किया जा सकता है?’ विकास सपना को समझाने की बहुत कोशिश करते थे.

पर सपना को हर साल नए सिरे से समझाना पड़ता. वह भुनभुनाती रहती, ‘थोड़ा सा दूधदही खिला दिया और बापदादा का नाम ले कर कलकत्ता आ गए. आखिर जब हम कलकत्ता में नहीं थे, तब कैसे गंगासागर का पुण्य कमाया जाता था? इतनी दूर से लोग गठरियां उठाए हमारे भरोसे आ पहुंचते हैं. हमारी परेशानियों का तो किसी को ध्यान ही नहीं. क्या कलकत्ता में होटल और धर्मशाला नहीं, वे वहां नहीं ठहर सकते? न जाने तुम्हें क्या सुख मिलता है उन बूढ़ेबूढि़यों से बातचीत कर के. अगले साल से देखना, मैं इन्हीं दिनों मायके चली जाऊंगी, अकेले संभालना पड़ेगा, तब नानी याद आएगी.’

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एक दिन पत्नी की भाषणबाजी पर विराम लगाते हुए विकास कह उठे, ‘‘क्या बच्चों जैसी बातें करती हो. हमें अपना समझते हैं तभी तो अधिकार सहित पहुंचते हैं. उन के पास पैसों की कमी नहीं है, चाहें तो होटल या धर्मशाला में ठहर सकते हैं. पर जब हम यहां मौजूद हैं तो उन्हें ऐसा करने की क्या जरूरत है. फिर वे कभी खाली हाथ नहीं आते, गांव का शुद्ध घी, सत्तू, बेसन, दाल, मसाले वगैरा ले कर आते हैं. अब तुम्हीं बताओ, ऐसी शुद्ध चीजें यहां कलकत्ता में मिल सकती हैं?

‘‘तुम तो सब भूल जाती हो. लौटते वक्त वे बच्चों को रुपए भी पकड़ा जाते हैं. आखिर वे हमारे बुजुर्ग हैं, 2-4 दिनों की सेवा से हम छोटे तो नहीं हो जाएंगे. गांव लौट कर वे हमारी कितनी तारीफ करते हैं तब माई व बाबूजी को कितनी खुशी होती होगी.’’

सपना मुंह बिचकाती हुई कह उठी, ‘‘ठीक है भई, हर साल यह झमेला मुझे ही सहना है तो सहूंगी. तुम से कहने का कोई फायदा नहीं. अब गंगासागर स्नान का समय फिर नजदीक आ गया है. देखें, इस बार कितने लोग आते हैं.’’

विकास ने जेब में हाथ डाला और एक पत्र निकालते हुए कह उठे, ‘‘अरे हां, मैं भूल गया था. आज ही सरस्वती बूआ की चिट्ठी आई है. वे भी गंगासागर के लिए आ रही हैं. तुम जरा उन का विशेष खयाल रखना. बेचारी ने सारा जीवन दुख ही सहा है. वे मुझे बहुत चाहती हैं. शायद मेरे ही कारण उन की गंगासागर स्नान की इच्छा पूर्ण होने जा रही है.’’

सपना, जो थोड़ी देर पहले समझौते वाले मूड में आ गई थी, फिर बिफर पड़ी, ‘‘वे तो न जाने कहां से तुम्हारी बूआ बन बैठीं. हर कोई चाची, बूआ बन कर पहुंचता रहता है और तुम उन्हें अपना करीबी कहते रहते हो. इन बूढ़ी विधवाओं के खानेपीने में और झंझट है. जरा कहीं भी लहसुन व प्याज की गंध मिली नहीं कि खाना नहीं खाएंगी. मैं ने तो तुम्हारी इस बूआ को कभी देखा नहीं. बिना पूछे कैसे लोग मुंह उठाए चले आते हैं, जैसे हम ने पुण्य कमाने का ठेका ले रखा हो.’’

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विकास शांत स्वर में बोले, ‘‘उस बेचारी के लिए कुछ न कहो. उस दुखियारी ने घरगृहस्थी का सुख देखा ही नहीं. बचपन में शादी हो गई थी. गौना हुआ भी नहीं था कि पति की मृत्यु हो गई. शादी का अर्थ भी नहीं समझा और विधवा का खिताब मिल गया. अपने ही गांव की बेटी थी. ससुराल में स्थान नहीं मिला. सब उन्हें अभागी और मनहूस समझने लगे. मायके में भी इज्जत कम हो गई.

‘‘जब भाइयों ने दुत्कारना शुरू कर दिया तो एक दिन रोतीकलपती हमारे दरवाजे आ पहुंचीं. बाबूजी से उन का दुख न देखा गया. उसी क्षण उन्होंने फैसला किया कि सरस्वती मुंहबोली बहन बन कर इस घर में अपना जीवन गुजार सकती है. उन के इस फैसले से थोड़ी देर के लिए घर में हंगामा मच गया कि एक जवान लड़की को सारा जीवन ढोना पड़ेगा, पर बाबूजी के दृढ़ व्यक्तित्व के सामने फिर किसी की जबान न हिली.

‘‘दादादादी ने भी सहर्ष सरस्वती को अपनी बेटी मान लिया और इस तरह एक दुखी, लाचार लड़की अपना परिवार रहते दूसरे के घर में रहने को बाध्य हुई. हमारी शादी में उन्होंने बहुत काम किया था. तुम ने देखा होगा, पर शायद अभी याद नहीं आ रहा. करीब 10 साल वे हमारे घर में रहीं. फिर एक दिन उन के भाईभतीजों ने आ कर क्षमा मांगी. पंचायत बैठी और सब के सामने आदरसहित सरस्वती बूआ को वे लोग अपने घर ले गए.

‘‘सरस्वती बूआ इज्जत के साथ अपने मायके में रहने लगीं. पर खास मौकों पर वे जरूर हमारे घर आतीं. इस तरह भाईबहन का अटूट बंधन अभी तक निभता चला आ रहा है. सो, सरस्वती बूआ को यहां किसी बात की तकलीफ नहीं होनी चाहिए.’’

सपना का गुस्सा फिर भी कम न हुआ था. वह भुनभुनाती हुई रसोई की तरफ चली गई.

12 जनवरी को सुबह वाली गाड़ी से सरस्वती बूआ के साथ 2 अन्य बुजुर्ग भी आ पहुंचे. नहानाधोना, खानापीना हुआ और विकास बैठ गए गांव का हालचाल पूछने. सरस्वती बूआ सपना के साथ रसोई में चली गईं तथा खाना बनाने में कुछ मदद करने का इरादा जाहिर किया.

सपना रूखे स्वर में कह उठी, ‘‘आप आराम कीजिए, थकीहारी आई हैं. मेरे साथ महरी है. हम दोनों मिल कर सब काम कर लेंगी. आप से काम करवाऊंगी तो ये नाराज हो जाएंगे. वैसे भी यह तो हर साल का नियम है. आखिर सब अकेले ही करती हूं. आप आज मदद कर देंगी, अगले साल कौन करेगा?’’

सरस्वती बूआ को सपना का लहजा कड़वा लगा. वे बड़े शौक से आई थीं, पर मुंह लटका कर वापस बैठक में चली गईं. एक कोने में उन की खाट लगी थी. खाट की बगल में छोटा स्टूल रखा था, जिस पर उन की गठरी रखी थी. वे चुपचाप गईं और अपने बिस्तर पर लेट गईं. विकास की घरगृहस्थी देखने की उन की बड़ी साध थी. बचपन में विकास ज्यादातर उन के पास ही सोता था. बूआ की भतीजे से खूब पटती थी.

बूआ की इच्छा थी, गंगासागर घूमने के बाद कुछ दिन यहां और रहेंगी. जीवन में गांव से कभी बाहर कदम नहीं रखा था. कलकत्ता का नाम बचपन से सुनती आई थीं, पूरा शहर घूमने का मन था. परंतु बहू की बातों से उन का मन बुझ गया था.

पर विकास ताड़ गए कि सपना ने जरूर कुछ गलत कहा होगा. बात को तूल न देते हुए वे खुद बूआ की खातिरदारी में लगे रहे. शाम को उन्होंने टैक्सी ली तथा बूआ को घुमाने ले गए. दूसरे दोनों बुजुर्गों को भी कहा, पर उन्होंने अनिच्छा दिखाई.

विकास बूआ को घुमाफिरा कर रात 10 बजे तक लौटे. बूआ का मन अत्यधिक प्रसन्न था. बिना कहे विकास ने उन के मन की साध पूरी कर दी थी. महानगर कलकत्ता की भव्यता देख कर वे चकित थीं.

इधर सपना कुढ़ रही थी. बूआ को इतनी तरजीह देना और घुमानाफिराना उसे रत्तीभर नहीं सुहा रहा था. वह क्रोधित थी, पर चुप्पी लगाए थी. मौका मिलते ही पति को आड़ेहाथों लिया, ‘‘अब तुम ने सब के सैरसपाटे का ठेका भी ले लिया? टैक्सी के पैसे किस ने दिए थे? जरूर तुम ने ही खर्च किए होंगे.’’

विकास खामोश ही रहे. इतनी रात को बहस करने का उन का मूड नहीं था. वे समझ रहे थे कि बूआ को घुमाफिरा कर उन्होंने कोई गलती नहीं की है, आखिर पत्नी उस त्यागमयी औरत को कितना जानती है. मैं जितना बूआ के करीब हूं, पत्नी उतनी ही दूर है. बस, 2-4 दिनों की बात है, बूआ वापस चली जाएंगी. न जाने फिर कभी उन का दोबारा कलकत्ता आना हो या नहीं.

खैर, 3-4 दिन गुजर गए. गांव से आए सभी लोगों का गंगासागर तीर्थ पूरा हुआ. शाम की गाड़ी से सब को लौटना था. रास्ते के लिए पूड़ी, सब्जी के पैकेट बनाए गए.

बूआ का मन बड़ा उदास हो रहा था. बारबार उन की आंखों से आंसू छलक पड़ते. विकास और उस के बच्चों से उन का मन खूब हिलमिल गया था. बहू अंदर ही अंदर नाखुश है, इस का एहसास उन्हें पलपल हो रहा था, पर उसे भी वह यह सोच कर आसानी से पचा गई कि नई उम्र है, घरगृहस्थी के बोझ के अलावा मेहमानों का अलग से इंतजाम करना,  इसी सब से चिड़चिड़ी हो गई है. वैसे, सपना दिल की बुरी नहीं है.

बूआ के कारण सपना को भी स्टेशन जाना पड़ा. निश्चित समय पर प्लेटफौर्म पर गाड़ी आ कर लग गई. चूंकि गाड़ी को हावड़ा से ही बन कर चलना था, इसलिए हड़बड़ी नहीं थी. विकास ने आराम से आरक्षण वाले डब्बे में सब को पहुंचा दिया. सामान वगैरा भी सब खुद ही संभाल कर रखवा दिया ताकि उन बुजुर्गों को सफर में कोईर् तकलीफ न हो.

गाड़ी चलने में थोड़ा वक्त रह गया था. विकास और उन की पत्नी डब्बे से नीचे उतरने लगे. बूआ को अंतिम बार प्रणाम करने के लिए सपना आगे बढ़ी और उन के पैरों पर झुक गई. जब उठी तो बूआ ने एक रूमाल उस के हाथों में थमा दिया. कहा, ‘‘बहू, इसे तू घर जा कर खोलना, गरीब बूआ की तरफ से एक छोटी सी भेंट है.’’

सिगनल हो गया था. दोनों पतिपत्नी नीचे उतर पड़े. गाड़ी चल पड़ी और धीरेधीरे उस ने गति पकड़ ली.

सपना को बेचैनी हो रही थी कि आखिर बूआ ने अंतिम समय में क्या पकड़ाया है? वे टैक्सी से घर लौट रहे थे. रास्ते में सपना ने रूमाल खोला तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. अंदर सोने का सीताहार अपनी पूरी आभा के साथ चमचमा रहा था.

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सपना उस हार को देख कर सुखद आश्चर्य से भर उठी, ‘बूआ ने यह क्या किया? इतना कीमती हार इतनी आसानी से पकड़ा कर चली गईं. क्या अपनी सगी बूआ भी ऐसा उपहार दे सकती हैं? धिक्कार है मुझ पर, सिर्फ एक बार ही सही, बूआ को कहा होता… ‘कुछ दिन यहां और ठहर जाइए,’ यह सोचते हुए सपना की आंखों से आंसू बहने लगे.

मृदुभाषिणी: सामने आया मामी का चरित्र

सुहागरात को दुलहन बनी शुभा से पति ने प्रथम शब्द यही कहे थे, ‘मेरी एक मामी हैं. वे बहुत अच्छी हैं. हमारे घर में सभी उन की प्रशंसा करते हैं. मैं चाहता हूं, भविष्य में तुम उन का स्थान लो. सब कहें कि बहू हो तो शुभा जैसी. मैं चाहता हूं जैसे वे सब को पसंद हैं, वैसे ही तुम भी सब की पसंद बन जाओ.’

पति ने अपनी धुन में बोलतेबोलते एक आदर्श उस के सामने प्रस्तुत कर दिया था. वास्तव में शुभा को भी पति की मामी बहुत पसंद आई थीं, मृदुभाषिणी व धीरगंभीर. वे बहुत स्नेह से शुभा को खाना खिलाती रही थीं. उस का खयाल रखती रही थीं. नई वधू को क्याक्या चाहिए, सब उन के ध्यान में था. सत्य है, अच्छे लोग सदा अच्छे ही लगते हैं, उन्होंने सब का मन मोह रखा था.

वक्त बीतता गया और शुभा 2 बच्चों की मां बन गई. मामी से मुलाकात होती रहती थी, कभी शादीब्याह पर तो कभी मातम पर. शुभा की सास अकसर कहतीं, ‘‘देखा मेरी भाभी को, कभी ऊंची आवाज में बात नहीं करतीं.’’

शुभा अकसर सोचती, ‘2-3 वर्ष के अंतराल के उपरांत जब कोई मनुष्य किसी सगेसंबंधी से मिलता है, तब भला उसे ऊंचे स्वर में बात करने की जरूरत भी क्या होगी?’ कभीकभी वह इस प्रशंसा पर जरा सा चिढ़ भी जाती थी.

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एक शाम बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते उस ने जरा डांट दिया तो सास ने कहा, ‘‘कभी अपनी मामी को ऊंचे स्वर में बात करते सुना है?’’

‘‘अरे, बच्चों को पढ़ाऊंगी तो क्या चुप रह कर पढ़ाऊंगी? क्या सदा आप मामीमामी की रट लगाए रखती हैं. अपने घर में भी क्या वे ऊंची आवाज में बात नहीं करती होंगी?’’ बरसों की कड़वाहट सहसा निकली तो बस निकल ही गई, ‘‘अपने घर में भी मुझे कोई आजादी नहीं है. आप लोग क्या जानें कि अपने घर में वे क्याक्या करती होंगी. दूसरी जगह जा कर तो हर इंसान अनुशासित ही रहता है.’’

‘‘शुभा,’’ पति ने बुरी तरह डांट दिया. वह प्रथम अवसर था जब उस की मामी के विषय में शुभा ने कुछ अनचाहा कह दिया था.

कुछ दिन सास का मुंह भी चढ़ा रहा था. उन के मायके की सदस्य का अपमान उन से सहा न गया. लेदे कर वही तो थीं, जिन से सासुमां की पटती थी.

धीरेधीरे समय बीता और मामाजी के दोनों बच्चों की शादियां हो गईं. शुभा उन के शहर न जा पाई क्योंकि उसे घर पर ही रहना था. सासुमां ने महंगे उपहार दे कर अपना दायित्व निभाया था.

ससुरजी की मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी शुभा के कंधों पर आ गई थी. सीमित आय में हर किसी से निभाना अति विकट था, फिर भी जोड़जोड़ कर शुभा सब निभाने में जुटी रहती.

पति श्रीनगर गए तो उस के लिए महंगी शौल ले आए. इस पर शुभा बोली, ‘‘इतनी महंगी शौल की क्या जरूरत थी. अम्मा के लिए क्यों नहीं लाए?’’

‘‘अरे भई, इस पर किसी का नाम लिखा है क्या. दोनों मिलजुल कर इस्तेमाल कर लिया करना.’’

शुभा ने शौल सास को थमा दी.

कुछ दिनों बाद कहीं जाना पड़ा तो शुभा ने शौल मांगी तो पता चला कि अम्मा ने मामी को पार्सल करवा दी.

यह सुन शुभा अवाक रह गई, ‘‘इतनी महंगी शौल आप ने…’’

‘‘अरे, मेरे बेटे की कमाई की थी, तुझे क्यों पेट में दर्द हो रहा है?’’

‘‘अम्मा, ऐसी बात नहीं है. इतनी महंगी शौल आप ने बेवजह ही भेज दी. हजार रुपए कम तो नहीं होते. ये इतने चाव से लाए थे.’’

‘‘बसबस, मुझे हिसाबकिताब मत सुना. अरे, मैं ने अपने बेटे पर हजारों खर्च किए हैं. क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं, जो अपने किसी रिश्तेदार को कोई भेंट दे सकूं?’’

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अम्मा ने बहू की नाराजगी जब बेटे के सामने प्रकट की, तब वह भी हैरान रह गया और बोला, ‘‘अम्मा, मैं पेट काटकाट कर इतनी महंगी शौल लाया था. पर तुम ने बिना वजह उठा कर मामी को भेज दी. कम से कम हम से पूछ तो लेतीं.’’

इस पर अम्मा ने इतना होहल्ला मचाया कि घर की दीवारें तक दहल गईं. शुभा और उस के पति मन मसोस कर रह गए.

‘‘पता नहीं अम्मा को क्या हो गया है, सदा ऐसी जलीकटी सुनाती रहती हैं. इतनी महंगाई में अपना खर्च चलाना मुश्किल है, उस पर घर लुटाने की तुक मेरे तो पल्ले नहीं पड़ती,’’ शौल का कांटा शुभा के पति के मन में गहरा उतर गया था.

कुछ समय बीता और एक शाम मामा की मृत्यु का समाचार मिला. रोतीपीटती अम्मा को साथ ले कर शुभा और उस के पति ने गाड़ी पकड़ी. बच्चों को ननिहाल छोड़ना पड़ा था.

क्रियाकर्म के बाद रिश्तेदार विदा होने लगे. मामी चुप थीं, शांत और गंभीर. सदा की भांति रो भी रही थीं तो चुपचाप. शुभा को पति के शब्द याद आने लगे, ‘हमारी मामी जैसी बन कर दिखाना, वे बहुत अच्छी हैं.’

शुभा के पति और मामा का बेटा अजय अस्थियां विसर्जित कर के लौटे तो अम्मा फिर बिलखबिलख कर रोने लगीं, ‘‘कहां छोड़ आए रे, मेरे भाई को…’’

शुभा खामोशी से सबकुछ देखसुन रही थी. मामी का आदर्श परिवार पिछले 20 वर्षों से कांटे की शक्ल में उस के हलक में अटका था. उन के विषय में जानने की मन में गहरी जिज्ञासा थी. मामी की बहू मेहमाननवाजी में व्यस्त थी और बेटी उस का हाथ बंटाती नजर आ रही थी. एक नौकर भी उन की मदद कर रहा था.

बहू का सालभर का बच्चा बारबार रसोई में चला जाता, जिस के कारण उसे असुविधा हो रही थी. शुभा बच्चा लेना चाहती, मगर अपरिचित चेहरों में घिरा बच्चा चीखचीख कर रोने लगता.

‘‘बहू, तुम कुछ देर के लिए बच्चे को ले लो, नाश्ता मैं बना लेती हूं,’’ शुभा के अनुरोध पर बीना बच्चे को गोद में ले कर बैठ गई.

जब शुभा रसोई में जाने लगी तो बीना ने रोक लिया, ‘‘आप बैठिए, छोटू है न रसोई में.’’

मामी की बहू अत्यंत प्यारी सी, गुडि़या जैसी थी. वह धीरेधीरे बच्चे को सहला रही थी कि तभी कहीं से मामी का बेटा अजय चला आया और गुस्से में बोला, ‘‘तुम्हारे मांबाप कहां हैं? वे मुझ से मिले बिना वापस चल गए? उन्हें इतनी भी तहजीब नहीं है क्या?’’

‘‘आप हरिद्वार से 2 दिनों बाद लौटे हैं. वे भला आप से मिलने का इंतजार कैसेकर सकते थे.’’

‘‘उन्हें मुझ से मिल कर जाना चाहिए था.’’

‘‘वे 2 दिन और यहां कैसे रुक जाते? आप तो जानते हैं न, वे बेटी के घर का नहीं खाते. बात को खींचने की क्या जरूरत है. कोई शादी वाला घर तो था नहीं जो वे आप का इंतजार करते रहते.’’

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‘‘बकवास बंद करो, अपने बाप की ज्यादा वकालत मत करो,’’ अजय तिलमिला गया.

‘‘तो आप क्यों उन्हें ले कर इतना हंगामा मचा रहे हैं? क्या आप को बात करने की तमीज नहीं है? क्या मेरा बाप आप का कुछ नहीं लगता?’’

‘‘चुप…’’

‘‘आप भी चुप रहिए और जाइए यहां से.’’

शुभा अवाक रह गई. उस के सामने  ही पतिपत्नी भिड़ गए थे. ज्यादा  दोषी उसे अजय ही नजर आ रहा था. खैर, अपमानित हो कर वह बाहर चला गया और बहू रोने लगी.

‘‘जब देखो, मेरे मांबाप को अपमानित करते रहते हैं. मेरे भाई की शादी में भी यही सब करते रहे, वहां से रूठ कर ही चले आए. एक ही भाई है मेरा, मुझे वहां भी खुशी की सांस नहीं लेने दी. सब के सामने ही बोलना शुरू कर देंगे. कोई इन्हें मना भी नहीं करता. कोई समझाता ही नहीं.’’

शुभा क्या कहती. फिर जरा सा मौका मिलते ही शुभा ने मामी की समझदार बेटी से कहा, ‘‘जया, जरा अपने भाई को समझाओ, क्यों बिना वजह सब के सामने पत्नी का और उस के मांबाप का अपमान कर रहा है. तुम उस की बड़ी बहन हो न, डांट कर भी समझा सकती हो. कोई भी लड़की अपने मांबाप का अपमान नहीं सह सकती.’’

‘‘उस के मांबाप को भी तो अपने दामाद से मिल कर जाना चाहिए था. बीना को भी समझ से काम लेना चाहिए. क्या उसे पति का खयाल नहीं रखना चाहिए. वह भी तो हमेशा अजय को जलीकटी सुनाती रहती है?’’

शुभा चुप रह गई और देखती रही कि बीना रोतेरोते हर काम कर रही है. किसी ने उस के पक्ष में दो शब्द भी नहीं कहे.

खाने के समय सारा परिवार इकट्ठा हुआ तो फिर अजय भड़क उठा, ‘‘अपने बाप को फोन कर के बता देना कि मैं उन लोगों से नाराज हूं. आइंदा कभी उन की सूरत नहीं देखूंगा.’’

तभी शुभा के पति ने उसे बुरी तरह डपट दिया, ‘‘तेरा दिमाग ठीक है कि नहीं? पत्नी से कैसा सुलूक करना चाहिए, यह क्या तुझे किसी ने नहीं सिखाया? मामी, क्या आप ने भी नहीं?’’

लेकिन मामी सदा की तरह चुप थीं. शुभा के पति बोलते रहे, ‘‘हर इंसान की इज्जत उस के अपने हाथ में होती है. पत्नी का हर पल अपमान कर के, वह भी 10 लोगों के बीच में, भला तुम अपनी मर्दानगी का कौन सा प्रमाण देना चाहते हो? आज तुम उस का अपमान कर रहे हो, कल को वह भी करेगी, फिर कहां चेहरा छिपाओगे? अरे, इतनी संस्कारी मां का बेटा ऐसा बदतमीज.’’

वहां से लौटने के बाद भी शुभा मामी के अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ही सोचती रही कि अजय की गलती पर वे क्यों खामोश बैठी रहीं? गलत को गलत न कहना कहां तक उचित है?

एक दिन शुभा ने गंभीर स्वर में पति से कहा, ‘‘मैं आप की मामी जैसी नहीं बनना चाहती. जो औरत पुत्रमोह में फंसी, उसे सही रास्ता न दिखा सके, वह भला कैसी मृदुभाषिणी? क्या बहू के पक्ष में वे कुछ नहीं कह सकती थीं, ऐसी भी क्या खामोशी, जो गूंगेपन की सीमा तक पहुंच जाए.’’

यह सुन कर भी शुभा के पति और सास दोनों ही खामोश रहे. उन्हें इस समय शायद कोई जवाब सूझ ही नहीं रहा था.

Valentine’s Special- मिलने का वादा: क्या राज को मिल पाई नीलू

नीलू ससुराल से मायके महीनाभर रहने को आई थी. नीलू यानी नीलोफर की शादी को 2 साल गुजर गए थे. ऐसा लगता था कि कल ही की बात हो. राज के जेहन में जो यादें धुंधली पड़ गई थीं, वे एकएक कर सामने आने लगीं. नीलू की शादी में दर्द देने वाले डरावने मंजर धीरेधीरे जिंदा होने लगे थे.

यह राज नीलू की अधूरी मुहब्बत का अंजाम था. निगाहों में हर पल बसने वाली नीलोफर को वह आज तक नहीं भुला पाया था. राज अपनी अधूरी मुहब्बत का इलजाम पूरी तरह नीलू पर नहीं लगा सकता था. अपनी नाकाम मुहब्बत का वह खुद भी जिम्मेदार था. आने वाले तूफान से वह घबरा गया था.

चांद सी सूरत वाली नीलोफर राज पर अपनी जान लुटाती थी, पर नीलोफर का बाप अकरम गांव का दबंग, शातिर, झगड़ालू किस्म का आदमी था. गांव में कहीं भी झगड़ाफसाद, राहजनी, आगजनी… यहां तक कि कई हत्याओं में उस का नाम जुड़ा होता था. आधे गांव ने तो अकरम का हुक्कापानी बंद कर रखा था.

अकरम और राज के घरों की दीवारें आपस में मिली हुई थीं. बचपन के दिनों में मासूम राज गांव के स्कूल में पढ़ता था. नीलू भी वहीं पढ़ती थी.

राज और नीलू घर से साथसाथ ही स्कूल जाते थे और घर आ कर अपने घरों के सामने एकसाथ खेलते थे. उन दिनों राज शाम के समय अपनी छत पर पतंग भी उड़ाया करता था. उस समय नीलू भी अपने घर की छत पर चढ़ जाया करती थी और राज को पेंच लड़ाने को उकसाया करती थी.

जब राज नीलू के कहने पर किसी की पतंग काट देता था, तो नीलू उछलउछल कर अपनी खुशी जाहिर किया करती थी. अगर पेंच लड़ाने के मुकाबले में राज की पतंग कट जाती, तो वह उदास हो जाती थी.

एक दिन राज बड़ी सी पतंग खरीद कर लाया. उस ने स्कैच पैन से पतंग पर कार्टून बना कर नीचे शरारत से नीलू का नाम लिख दिया. कार्टून के नीचे अपना नाम लिखा देख कर नीलू गुस्से से भर उठी थी. राज बारबार उड़ती पतंग को नीलू पर झुका कर उस के गुस्से को बढ़ा रहा था.

अचानक राज की पतंग जरा ज्यादा झुक गई और नीलू के हाथ में आ गई. उस ने राज की पतंग दबोच कर धागा खींचा और अपने घर के अंदर भाग गई. नीलू की इस शरारत पर राज को बहुत गुस्सा आया. वह चीखताचिल्लाता हुआ सीधा नीलू के घर पहुंच गया. वह नीलू को उस के घर में ही दबोच कर पीटने लगा.

उस समय नीलू का बाप अकरम घर पर ही मौजूद था. छोटे से राज की इतनी हिम्मत देख उस ने उसे 2 तमाचे मारे और अपने घर से भगा दिया.

उस समय राज की उम्र 12 साल की रही होगी. वह रोताबिलखता अपने घर चला गया और पापा को बताया. राज के पापा रामदयाल शांत स्वभाव के थे. वे एक स्कूल में टीचर थे. उन्होंने अपराधी अकरम के मुंह लगना ठीक नहीं समझा और राज को ही डांटडपट कर खामोश कर दिया.

अब रामदयाल ने राज को जेबखर्च देना बंद कर दिया. इस तरह राज की पतंगबाजी पर रोक लग गई.

राज नीलू से बेहद नाराज था. वह नीलू को अकेला देख कर उसे पीटने की फिराक में था. एक दिन स्कूल में खेलकूद का पीरियड चल रहा था. उस समय क्लास के तमाम सहपाठी अपनेअपने मनपसंद खेल खेलने में मसरूफ थे, तभी राज ने देखा कि नीलू नलके से पानी पी कर अकेली आ रही है.

उसी समय राज ने नीलू को लपक कर उस का एक बाजू पकड़ा और गुर्राया, ‘‘परसों शाम को मेरी पतंग पकड़ कर क्यों खींची थी? वह पतंग मैं 2 रुपए की खरीद कर लाया था, जिस की तू ने ऐसी की तैसी कर के रख दी.’’

‘‘उस पर तो मेरा नाम लिखा था, इसलिए मैं ने अपनी पतंग ले ली. तुम दूसरी पतंग उड़ा लेते,’’ नीलू बोली.

‘‘मैं तेरे दोनों हाथ और मुंह तोड़ दूंगा. तुझे बचाने इस समय कोई नहीं आएगा,’’ राज चिल्लाया.

‘‘लो मारो मुझे. मेरे दोनों हाथ तोड़ दो. सामने पड़ी ईंट उठा कर मेरे मुंह पर दे मारो. अगर मुझे मारने से तुम्हारी पतंग जुड़ जाए, तो अपने मन की इच्छा पूरी कर लो,’’ नीलू ने कहा. मगर राज का हाथ नीलू पर उठा नहीं.

राज ने चेतावनी देते हुए नीलू को छोड़ दिया. 4-5 दिनों तक नीलू से उस की कोई बात नहीं हुई. अब उस ने घर जाना बंद कर दिया. उसे अपने पापा का डर भी था. सालाना इम्तिहान सिर पर आ गएथे. वह मन लगा कर अपनी पढ़ाई में जुट गया. एक दिन शाम के समय नीलू अपनी मां के साथ राज के घर आई. उन दिनों नीलू के बड़े भाई की शादी होने वाली थी. नीलू की मां उस के परिवार को शादी में शामिल होने का न्योता देने आई थीं.

नीलू सब की नजरें बचा कर राज के कमरे में आ गई और उस से पूछने लगी कि वह अब पतंग क्यों नहीं उड़ाता है?

राज ने उदास मन से बताया कि अब उसे जेबखर्च नहीं मिलता. इतना सुनते ही नीलू ने छिपा कर साथ लाई एक छोटी सी पोटली राज की तरफ उछाल दी और पतंग उड़ाने को कह कर चली गई. राज ने पोटली खोली, तो उस के चेहरे पर बेशुमार खुशियों के भाव चमक उठे. उस के सामने सिक्कों का अंबार सा लग गया. शायद नीलू ने अपनी गुल्लक खाली कर के दी थी. धीरेधीरे समय गुजरता चला गया. प्यार भरी शरारतें कब चाहत में बदल गईं, उन दोनों को पता ही नहीं चला. वे दोनों पलभर भी एकदूसरे से दूर होने पर बुरी तरह तड़प उठते थे.

अकरम को इस इश्क की भनक लग गई. वह दोनों प्रेमियों के बीच दीवार बन कर खड़ा हो गया. वह किसी भी सूरत में अपनी बेटी को गैरजात में ब्याहना नहीं चाहता था. उस ने आननफानन बेटी नीलोफर यानी नीलू का रिश्ता दूसरे गांव के गुलेमान, जो जुआघरों, शराब की दुकानों का मालिक था, के साथ पक्का कर दिया. अकरम अपनी बेटी को जल्दी ब्याह कर ससुराल भेजना चाहता था, पर उसे डर भी था कि कहीं नीलोफर बगावत न कर दे.

नीलोफर के लिए अकरम ने जो शौहर पसंद किया था, वह उम्र में नीलू से दोगुना बड़ा था. जल्दबाजी में शादी की तारीख भी तय कर दी गई. 2-4 दिन बाद अकरम 4-5 बदमाश ले कर रामदयाल मास्टर के घर जा पहुंचा और धमकी दे आया कि वे अपने बेटे को समझा कर रखे, वरना पूरे परिवार को इसी घर में बंद कर के आग लगा देगा.

राज के पापा लड़ाईझगड़े से दूर रहना पसंद करते थे. उन्होंने प्यार से अपने बेटे पर दबाव डाला कि वह नीलू को भूल जाए. राज ने मन ही मन अपने पापा का कहना मानने का मन बना लिया, मगर कामयाब नहीं हो पा रहा था.

एक दिन राज दोपहर के समय गांव के बाहर नीलू से मिला. नीलू ने उलाहना देते हुए न मिलने की वजह पूछी, तो राज खामोश रहा. नीलू ने अपनी बात पर जोर देते हुए दोबारा पूछा, पर राज को कुछ भी बताना मुनासिब नहीं लग रहा था. राज की खामोशी देख नीलू ने राज का कौलर पकड़ते हुए सारा माजरा पूछा.

राज ने आखिरकार दुखी मन से सारी बातें नीलू को बता दीं. नीलू गरजते हुए बोली कि उसे अपने निजी मामलों में बाप की दखलअंदाजी बिलकुल मंजूर नहीं है. वह जिस से प्यार करती है, उसी से शादी करेगी.

राज ने नीलू को जिद न करने की सलाह दी. यह भी समझाया कि अगर उन दोनों ने गलत कदम उठाया, तो उस का अपराधी बाप उस के परिवार की हत्या कर देगा. मगर नीलू सारी बात सुन कर भी अपनी जिद पर अड़ी थी. कुछ देर सोचने के बाद नीलू ने एक सलाह दी, तो राज सोच में पड़ गया.

नीलू बोली, ‘‘हम दोनों इस जालिम जमाने से बहुत दूर भाग चलते हैं, जहां हमारे प्यार का कोई दुश्मन न हो. जब हमारे 4-5 बच्चे हो जाएंगे, तब पापा का गुस्सा अपनेआप ठंडा हो जाएगा.’’

यह सुन कर राज डर गया और बोला, ‘‘नहींनहीं, मेरी प्यारी नीलू, यह रास्ता बदनामी और तबाही की तरफ जाता है. ऐसा करने से हमारे परिवारों की बदनामी तो होगी ही, तुम्हारा बाप मेरे परिवार पर कहर बन कर टूट पड़ेगा. इस का अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

राज ने खतरे का सुलगता हुआ आईना दिखाया, तो नीलू थोड़ा सहम गई. नीलू बोली, ‘‘सोच लो राज, आया समय एक बार हाथ से निकल गया, तो दोबारा हमारे हाथ कभी नहीं आएगा. हिम्मत और कोशिश करने से हमारी समस्या का हल हो सकता है.’’

मगर राज को अकरम का डर था. वह जल्लाद से कम न था. राज अपने मांबाप और बहन से बहुत प्यार करता था, इसलिए उस ने अपनी मुहब्बत को कुरबान करने का मन बना लिया. उस दिन के बाद से वह नीलू से नहीं मिला. मगर नीलू को दिल से भुलाना इतना आसान कहां था?

अकरम ने हफ्तेभर में ही नीलू की शादी कर के उसे ससुराल भेज दिया. आज जब राज को पता चला कि नीलू अपने मायके आई है, उस का दिल मिलने को मचल उठा. मिलने की चाहत लिए राज धीरेधीरे कदमों से चलता हुआ नीलू के घर पहुंच गया. घर का मेन गेट अंदर से बंद था. उस ने नीलू के घर का गेट खटखटाया, तो वह खुल गया. सामने उस की प्यारी नीलू ही खड़ी थी. शायद नहा कर निकली थी, पानी के मोती उस के काले लंबे बालों से गिर रहे थे.

‘‘अरे राज, कैसे हो? अंदर आओ न…’’ राज को देखते ही नीलू खुशी से चहक उठी, ‘‘अपनी क्या हालत बना ली है तुम ने? अपनेआप को संभालो राज?’’

‘‘नीलू, जो मुसाफिर अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचते, उन का यही अंजाम होता है. लेकिन, तुम मेरी हालत पर मत जाओ, अपनी सुनाओ?’’ राज ने कांपती आवाज में पूछा.

नीलू को लगा कि हालात से घबरा कर राज उस से दूर तो हो गया, मगर अपनी महबूबा को भूल नहीं पाया.

‘‘मैं खुश हूं या नहीं, इस का कोई माने नहीं है. जब तुम ने ही हालात से घबरा कर मेरा कहा मानने से इनकार कर दिया, तो मुझे तो हालात से समझौता करना ही था. मगर आज तुम्हारी हालत देख कर ऐसा लग रहा है कि तुम अधूरी मुहब्बत की आग में बुरी तरह झुलस रहे हो. बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूं?’’ कहते हुए नीलू ने राज के दोनों हाथ थाम लिए.

‘‘नीलू, मैं जो देखना और महसूस करना चाहता था, वह सब देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मेरी कुरबानी कामयाब हो गई है. मैं जिंदगीभर तुम्हारी यादों को अपने दिल में सहेज कर रखूंगा. तुम खुशहाल रहोगी, तो मैं समझूंगा कि मुझे सबकुछ मिल गया,’’ राज ने कहा.

‘‘नहीं राज, तुम मुझे कभी अपने से अलग मत समझना. मैं आज भी तुम्हारे साथ हूं. जहां चाहे ले चलो, मैं तुम्हारी बन कर रहूंगी,’’ कहते हुए नीलू ने राज को अपनी बांहों में कस कर चूमना चाहा.

‘‘मेरी वजह से जमाना तुम्हें बदचलन कहे, मैं यह सब सह नहीं पाऊंगा,’’ राज ने कहा.

नीलू बोली, ‘‘अब पता नहीं कब आ सकूंगी. थोड़ी देर अंदर आओ. अपने मन की बात मैं तुम्हारे सामने रखना चाहती हूं,’’ इतना कह कर नीलू ने राज का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाना चाहा.

‘‘नहीं नीलू, मुझ से यह नहीं हो पाएगा. मुझे माफ कर देना,’’ इतना कह कर राज उलटे कदमों से गेट से बाहर आ गया. नीलू राज को रोकना तो चाहती थी, मगर उसे रोक नहीं सकी.

#tejran Video: तेजस्वी के पीछे-पीछे ब्यूटी पार्लर तक पहुंचे करण कुंद्रा, नहीं बर्दाश्त हो रही है दूरी

बिग बॉस 15 खत्म को चुका है. बिग बॉस के घर से बाहर आने के बाद तेजस्वी प्रकाश और करण कुंद्रा अपने अपने काम में बिज़ी हो गए हैं, लेकिन करण, अब तेजस्वी को काफी मिस कर रहे हैं. तभी तो दोनों लव बर्ड्स अपने बिज़ी शेड्यूल से टाइम निकाल कर एक दूसरे के साथ टाइम स्पेंड करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं.

ब्यूटी पार्लर में साथ दिखे करण-तेजा

बीती रात से ही करण और तेजस्वी का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. यह वीडियो तेजा ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर किया है. दरअसल, जब तेजा ‘नागिन-6’ की शूटिंग  ख़त्म करने के बाद शाम को ब्यूटी पार्लर गई तो करण भी उनके पीछे पीछे पहुंच गए, इसके बाद तेजा ने ये क्यूट सा वीडियो बनाया जो अब तेजी से वायरल हो रहा है. #tejran के फैंस दोनों को साथ देखकर काफी खुश हैं.

देखें वीडियो 

फैंस कर रहे हैं शादी की डिमांड

बिग बॉस 15 के दौरान दोनों की नज़दीकियां देखने को मिली थी. अब घर के बाहर भी करण का तेजा के लिए प्यार साफ़ दिखाई देने लगा है, दोनों को हर जगह एक साथ स्पॉट किया जा सकता है, सोशल मीडिया पर इनके वीडियोज़ को लोग काफी पसंद कर रहे हैं, फैंस चाहते हैं कि दोनों जल्द से जल्द शादी कर लें और मीडिया वाले में अक्सर दोनों से शादी से जुड़े सवाल करते रहते हैं. हालांकि, दोनों अभी और वक्त साथ बिताना चाहते हैं ताकी एक दूसरे को अच्छे से समझ सकें.

 

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बता दें कि 30 जनवरी को तेजस्वी प्रकाश ने बिग बॉस 15 की ट्रॉफी अपने नाम कर ली. खिताब जीतने के बाद तेजस्वी के पैंरेट्स और ब्वॉयफ्रेंड करण ने उनका शानदार वेलकम भी किया. करन कुंद्रा और तेजा आजकल सोशल मीडिया पर जमकर पोस्ट डाल रहे हैं और फैंस उन्हें फॉलो भी कर रहे हैं.

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