देशद्रोही आफरीन- भाग 2: क्या थी उसकी कहानी

डाक्टरों ने उस लड़की की पूरी जांच करने के बाद जो बताया, उस ने आफरीन और उस नौजवान को अंदर तक हिला दिया था.

‘‘इस लड़की के साथ रेप किया गया और जब वह शोर मचाने लगी होगी तो उन दरिंदों ने न केवल उस की जीभ काट दी, बल्कि उस को इतना मारा कि उस की रीढ़ की हड्डी और पैर टूट गए. हमारे लिए इस लड़की को जिंदा रख पाना किसी चुनौती से कम नहीं है,’’ डाक्टर ने कहा.

रात के 3 बजे चुके थे. आफरीन अब भी अस्पताल में ही थी.

‘‘जी देखिए, अब मुझे जाना होगा और मैं आप की हिम्मत की तारीफ करता हूं, जो आप ने इस लड़की की मदद के लिए जुटाई… वैसे, मेरा यह कार्ड रख लीजिए. आप को किसी भी तरह की मदद की जरूरत पड़े, तो मुझ से बात कीजिएगा,’’ वह नौजवान बोला.

एक फीकी सी मुसकराहट से आफरीन ने उस नौजवान को शुक्रिया कहा.

आफरीन भी अस्पताल में ज्यादा देर न रुकी. लड़की के घर वाले कहां हैं? कौन हैं? यह जानने के लिए पीडि़ता का होश में आना जरूरी था, पर डाक्टरों के मुताबिक अभी उस के होश में आने में समय था.

आफरीन अगले दिन काम पर नहीं गई, मन जो उचाट था. दूसरे दिन ही अस्पताल जा पहुंची और पीडि़ता का हाल जाना. पीडि़ता की आंखों में आंसू थे, जो सिर्फ दर्द बयां कर रहे थे. वह बोल तो नहीं सकती थी, पर लिख तो सकती?है, यह खयाल आते ही आफरीन ने उसे अपना पैन और कौपी दी, जिस पर पीडि़ता ने बड़ी मुश्किल से एक मोबाइल नंबर लिखा और एक कार का नंबर.

मोबाइल नंबर उस लड़की के पिताजी का था, जिन्हें आफरीन ने सीधे अस्पताल आने को कहा और कार का नंबर उस गाड़ी का रहा होगा, जिन लोगों ने उस का रेप कर के उसे बीच रास्ते में फेंक दिया होगा.

इंटरनैट और तकनीक के दौर में कार के असली मालिक का पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था. आफरीन ने गाड़ी के मालिक का पता लगाया तो उसे पता चला कि गाड़ी का मालिक और कोई नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक का बेटा है.

‘‘नाम इतना बड़ा और काम इतना नीच…’’ तिलमिला उठी थी आफरीन, ‘‘पर, ऐसे भेडि़यों को सजा दिला कर रहूंगी मैं.’’

‘‘पर, तू क्या सजा दिलाएगी उन लोगों को जिन्होंने एक लड़की पर बिलकुल भी दया नहीं दिखाई और उलटा उस की जीभ ही काट ली और फिर मत भूल कि तू इस बड़े और अजनबी शहर में अकेली रह रही है और यहां कोई भी नहीं है जो तेरा साथ दे, तेरे पास सुबूत भी क्या?है उस विधायक के बेटे के खिलाफ?’’ अपनेआप से ही सवाल किया था आफरीन ने.

आफरीन ने अपने हैंडबैग में हाथ डाला तो उस नौजवान का कार्ड हाथ में आ गया, जिस ने आफरीन की मदद की थी. उस का नाम अनुभव शर्मा था और वह उसी विधायक का सचिव था, जिस के बेटे ने रेप किया था.

‘‘तो मुझे सुबूत के लिए अनुभव से मिलना होगा,’’ ऐसा सोच कर आफरीन दिए गए पते पर चली गई और अनुभव से मुलाकात कर उस से मदद मांगी.

‘‘जी बिलकुल. मैं आप की पूरी तरह से मदद करूंगा, पर भला क्या मदद चाहिए आप को?’’

‘‘दरअसल, उस दिन आप ने इस लड़की को अस्पताल पहुंचाने में मेरी मदद की थी. मैं ने उस लड़की से जबरदस्ती करने वाले का पता लगा लिया है और मैं उन लोगों को सजा दिलाना चाहती हूं,’’ आफरीन ने कहा.

‘‘जी, ऐसे लोगों को सजा जरूर मिलनी चाहिए, पर वह कमीना है कौन और कहां रहता है?’’ अनुभव ने पूछा, तो बदले में आफरीन ने उस गाड़ी का नंबर आगे कर दिया, जिसे देख कर अनुभव को समझते देर नहीं लगी कि आफरीन क्या कहना चाह रही है.

‘‘पर आफरीनजी, मैं इन लोगों के लिए काम करता हूं और बदले में ये लोग मुझे पैसे देते हैं. भला मैं इन से गद्दारी कैसे कर सकता हूं?’’

अनुभव की बातें सुन कर आफरीन को धक्का सा लगा था. वह कुछ बोल तो न सकी, पर उस की कश्मीरी आंखों में झील सी लहरा आई थी.

‘‘आप मेरी मजबूरी को समझिए आफरीनजी,’’ अनुभव ने कहा.

‘‘जी हां, आप मर्दों की मजबूरी मैं खूब समझती हूं और आप भला क्यों मजबूर होंगे. वह लड़की आप की रिश्ते में कुछ भी तो नहीं लगती थी, पर भला तब भी आप अपनी मजबूरी इसी तरह तब जाहिर करते जब वह पीडि़ता आप की बहन या बेटी होती?’’ आफरीन गुस्से से बोली और वहां से उठ कर चली गई और अनुभव उसे देखता रह गया.

रेप की उस पीडि़ता के परिवार वालों का बुरा हाल था. खुद पीडि़ता जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही थी. पुलिस सुबूतों की कमी में खामोश थी और आफरीन के अंदर अब भी बेचैनी थी.

रात के 9 बजे अनुभव ने आफरीन को फोन कर के उस से मिलने की इच्छा जाहिर की, तो आफरीन ने बेहिचक हो कर उसे अपने फ्लैट पर बुला लिया.

‘‘आफरीन जी देखिए, उस दिन आप की बातों ने मेरे जमीर पर गहरी चोट पहुंचाई थी, पर उस दिन मैं अपनी ड्यूटी पर था और चाह कर भी आप की मदद नहीं कर सकता था. पर आज मैं उस विधायक की नौकरी को लात मार आया हूं और आप के मिशन में आप के साथ हूं. बताइए, मुझे क्या करना होगा?’’

‘‘मुझे आप सिर्फ उस विधायक के बेटे के बारे में कुछ जानकारी दीजिए, मसलन, वे लोग क्या करते हैं? कैसे आदमी हैं? वगैरह…’’

‘‘वे लोग अपनी राजनीति के लिए कुछ भी कर सकते हैं. रेप और खून करना उन के लिए आम बात है और मैं तो आप से यही कहूंगा कि उन लोगों से अपना ध्यान हटा कर आप अपना काम करें तो बेहतर होगा,’’ अनुभव ने आगे बोलना शुरू किया.

क्रिकेट: समझना होगा युजवेंद्र चहल का दर्द

इकहरा बदन, दरमियाना कद, शक्ल भी कुछ खास नहीं, पर जब यह खिलाड़ी अपने हाथों से गेंद की फिरकी घुमाता है, तो दिग्गज से दिग्गज बल्लेबाज चारों खाने चित हो जाता है.

इस का नाम है युजवेंद्र चहल, जो जब क्रिकेट के मैदान पर नहीं होता है, तब शौकिया तौर पर शतरंज खेलता है, पर किसी माहिर खिलाड़ी की तरह और जब से इस की शादी डैंटिस्ट और यूट्यूब डांसर धनाश्री वर्मा से हुई है, तब से यह इक्कादुक्का बार किसी वीडियो में नाचता भी दिखाई दे जाता है.

पर हाल ही में युजवेंद्र चहल के साथ कुछ ऐसा हुआ है, जिसे अगर सी ग्रेड हिंदी फिल्म के किसी धांसू डायलौग से  तुलना करें तो कह सकते हैं कि ‘रजिया फंस गई गुंडों में’.

यह गंभीर मामला साल 2011 का है. हाल ही में युजवेंद्र चहल ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए बताया कि कैसे मुंबई इंडियंस की ओर से इंडियन प्रीमियर लीग खेलते हुए उन के 2 साथी क्रिकेटरों ने तब उन के साथ बदसलूकी करते हुए उन्हें रातभर रस्सी से बांधे रखा था और बाद में उन से माफी भी नहीं मांगी थी.

यह था मामला

साल 2011 में आस्ट्रेलिया के एंड्रियू साइमंड्स, न्यूजीलैंड के जेम्स फ्रैंकलीन और युजवेंद्र चहल मुंबई इंडियंस टीम का हिस्सा थे. उस समय जेम्स फ्रैंकलीन और एंड्रियू साइमंड्स ने उन के हाथपैर बांध कर उन्हें कमरे में बंद कर दिया था और बाद में अपनी उस हरकत को भूल भी गए थे.

युजवेंद्र चहल ने बताया, ‘‘यह घटना 2011 की है, जब मुंबई इंडियंस ने चैंपियंस लीग को जीता था. हम चेन्नई में थे. साइमंड्स ने बहुत ‘फ्रूट जूस’ पी लिया था. मुझे नहीं पता कि वह क्या सोच रहा था, लेकिन उस ने और जेम्स फ्रैंकलीन ने मेरे हाथपैर बांधे और कहा कि तुम्हें ही गांठ खोलनी होगी. वे इतना खोए हुए थे कि उन्होंने मेरा मुंह टेप से बांध दिया था और मेरा ध्यान उन्हें पूरी पार्टी में नहीं था. वे चले गए थे.

‘‘सुबह जब कोई सफाई के लिए आया और मुझे देखा, तब मेरे हाथ खोले. उन्होंने मुझ से पूछा कि आप कब से थे यहां. इस पर मैं ने कहा कि मैं तो पूरी रात से यही हूं. यह एक मजाकिया कहानी बन गई.’’

मौत के मुंह में धकेला

युजवेंद्र चहल ने इस से पहले अपने साथ साल 2013 में घटी एक घटना के बारे में बताते हुए कहा था कि तब इंडियन प्रीमियर लीग के छठे सीजन में उन की जान जातेजाते बची थी. उस समय वे मुंबई इंडियंस का ही हिस्सा थे.

युजवेंद्र चहल ने खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मेरी यह स्टोरी कुछ लोगों को पता है, लेकिन आज से पहले मैं ने यह बात कभी किसी को नहीं बताई. अब लोग इस के बारे में जानेंगे.

‘‘यह साल 2013 की बात है, जब मैं मुंबई इंडियंस टीम का हिस्सा था. हमारा बैंगलुरु में एक मैच था. मैच के बाद एक गैटटुगैदर था. वहां एक खिलाड़ी था, जो शराब के नशे में धुत्त था. मैं उस का नाम नहीं लूंगा. वह काफी देर से मुझे घूर रहा था, फिर कुछ सोच कर उस ने मुझे अपने पास बुलाया.

‘‘वह मुझे बाहर ले कर गया और बालकनी से लटका दिया. मेरे हाथ उस के गले से लिपटे हुए थे. अगर मेरा हाथ फिसल जाता तो मैं 15वीं मंजिल से ही गिर गया होता. तभी वहां मौजूद लोगों ने पूरे हालात को संभाला. मैं तो बेहोश हो गया था. मुझे लोगों ने पानी पिलाया.’’

जातिसूचक शब्द से छेड़ा

युजवेंद्र चहल की मुसीबतें यहीं खत्म नहीं होतीं. उन्हें जातिसूचक शब्दों के बाण भी झेलने पड़े हैं, वे भी अपने साथी खिलाड़ी युवराज सिंह से.

दरअसल, कोरोना महामारी के चलते साल 2020 में पूरे देश में जब लौकडाउन लगा था, तब खिलाड़ी वीडियो चैट पर बातें करते थे. इसी सिलसिले में युवराज सिंह और रोहित शर्मा इंस्टाग्राम लाइव चैट पर बात कर रहे थे, तभी दोनों के बीच युजवेंद्र चहल को ले कर बात हुई, तो युवराज सिंह ने कथिततौर पर जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था.

जल्द ही वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिस में युवराज सिंह जातिवादी टिप्पणी करते हुए बोले थे, ‘‘इन (जातिसूचक शब्द) लोगों को कोई काम नहीं है. युजी (युजवेंद्र चहल) को देखा कैसा वीडियो डाला है…’’

इस मामले में हांसी, हरियाणा पुलिस ने रजत कलसन की शिकायत पर युवराज सिंह के खिलाफ अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार अधिनियम के खिलाफ केस दर्ज किया था. मुकदमे को खारिज कराने के लिए युवराज सिंह ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस को युवराज सिंह के खिलाफ कोई कार्यवाही न करने का आदेश दिया था.

बात यह नहीं है कि अब जबकि युजवेंद्र चहल ने अपने मन की भड़ास निकाली है, तो एंड्रियू साइमंड्स और जेम्स फ्रैंकलीन पर क्या कार्यवाही होगी. होगी भी या नहीं… या फिर उस अनाम खिलाड़ी को कोई सजा मिलेगी भी या नहीं, जिस ने शराब के नशे में युजवेंद्र चहल को 15वीं मंजिल से नीचे लटका दिया था.

जहां तक युवराज सिंह वाले मामले की बात है, तो वह कोर्ट में जा चुका है. वैसे, युवराज सिंह सार्वजनिक तौर पर सब से माफी मांग चुके हैं, पर सब से बड़ा सवाल यह है कि ऐसा होता ही क्यों है इस जैंटलमैन गेम में?

ऐसा नहीं है कि खिलाडि़यों के विवाद पहले नहीं होते थे या उन में क्रिकेट के मैदान पर स्लैजिंग नहीं होती है, पर मैदान के बाहर शराब के नशे में की गई शर्मनाक हरकत को प्रैंक तो कतई नहीं कहा जा सकता. जातिगत या रंगभेद की टिप्पणी तो आप को जेल तक भेज सकती है.

अगर वीरेंद्र सहवाग की मानें, तो उन्होंने एकदम सही कहा है कि युजवेंद्र चहल को उस खिलाड़ी का नाम सब को बताना चाहिए, जिस ने उन्हें 15वीं मंजिल से नीचे लटका दिया था.

पर क्या इस समस्या का हल नाम बताने से हो जाएगा? शायद नहीं. दरअसल, यह जो कमजोर को सताने की रीत है न, वह दुनिया में बहुत पुरानी है. ताकतवर अगर जाति से बड़ा हो तो वह निचली जाति वाले को और ज्यादा सताता है.

युवराज सिंह ने जातिसूचक शब्द का सीधेतौर पर युजवेंद्र चहल पर नहीं किया था, पर उन का सीधा मतलब यह था कि यह नाचगाना तो निचली जाति के फूहड़ लोग करते हैं, जबकि यह तो इनसान की काबिलीयत के साथसाथ उस कला की भी बेइज्जती थी, जिसे नाच कहा जाता है.

जेम्स फ्रैंकलीन और एंड्रियू साइमंड्स को इस बात का घमंड था कि अगर वे किसी को बांध कर कमरे में बंद कर देंगे तो वह पीडि़त हमेशा उन से डर कर रहेगा और शायद उस के खेल पर भी इस का नैगेटिव असर पड़ेगा. पर, वे यह भूल जाते हैं कि मजाक और मसखरापन हद से ज्यादा बढ़ जाए, तो मामला बिगड़ते देर नहीं लगती है. स्कूलकालेज में रैगिंग के कितने बुरे नतीजे हो सकते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है.

वैसे, आप को इस मुद्दे से हट कर एक बात बताते चलते हैं कि युजवेंद्र चहल हरियाणा के जींद इलाके के रहने वाले हैं और उन का परिवार साधारण मिडिल क्लास से है.

एक समय ऐसा था, जब वे शतरंज खेल को अपना कैरियर बनाना चाहते थे, पर चूंकि प्रोफैशनल शतरंज खिलाड़ी बनना काफी महंगा होता है, इसलिए उन्होंने क्रिकेट को चुना और अब अपनी कड़ी मेहनत से नाम भी बना लिया है. लेकिन साथ ही इस खेल की काली करतूतों को उजागर कर के उन्होंने शह और मात की नई शतरंजी बाजी चल दी है.

देशद्रोही आफरीन- भाग 1: क्या थी उसकी कहानी

‘‘राजनीति का एक रूप यह भी हो सकता है… और वे लोग इस हद तक भी जा सकते हैं… मैं ने कभी नहीं सोचा था,’’ जेल की एक सीलन भरी कोठरी में पड़ी हुई एक लड़की बुदबुदा उठी थी.

वह लड़की, जिस का नाम आफरीन था, को देख कर कोई भी कह सकता था कि उस के चेहरे का उजलापन चांद को भी मात करता होगा, पर अब इस उजलेपन पर अमावस की छाया पड़ गई थी और उस का चेहरा बुझ सा गया था, उस की आंखों को काले गड्ढों ने आ कर दबोच लिया था.

आफरीन के शरीर में जवानी के जितने भी प्रतीक थे, वे सारे अब उस की बदहाली बतलाते थे और भला ऐसा होता भी क्यों न. बेचारी आफरीन पर देशद्रोह का आरोप जो लगा था. जी हां, देशद्रोह का.

अपने देश भारत के दुश्मन पाकिस्तान को ‘जिंदाबाद’ कहने का आरोप लगा था आफरीन पर.

पर आफरीन ही क्यों? भला कोई भी सच्चा भारतीय ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे क्यों लगाएगा?

आफरीन का जन्म कश्मीर में हुआ था. उस के अब्बू का सूखे मेवों का कारोबार था. आफरीन की नानी पाकिस्तान के लाहौर से थीं, जो बंटवारे के बाद भारत में आ गई थीं और तब से यहीं रह रही थीं.

आफरीन का बचपन लाहौर और पाकिस्तान की बातें और कहानियां सुन कर बीता था. नानी को जब भी समय मिलता, वे अपने लाहौर की मीठी यादों में खो जातीं. आफरीन को लाहौर की हर एक छोटीछोटी बातें बतातीं और अपनी यादें बांटतीं. बचपन में आफरीन को नानी की बातों से कभी यह अहसास नहीं हुआ कि पाकिस्तान एक दुश्मन देश है.

‘अगर नानी का पाकिस्तान इतना ही अच्छा है तो इन दोनों देशों में हमेशा ही जंग क्यों जारी रहती है? क्यों दोनों ही तरफ के लोग मारे जाते हैं? कितना अच्छा हुआ होता कि पाकिस्तान का जन्म ही नहीं हुआ होता, फिर तो दोनों तरफ इतनी नफरत ही न होती,’ आफरीन ऐसी बातें अकसर सोचती थी, पर भला सियासत करने वालों को इन सब जोड़ने वाली बातों से क्या सरोकार, उन्हें तो लोगों को तोड़ कर ही अपनी सियासत चमकाने में मजा आता है.

नानी की बड़ी इच्छा थी कि वे मरने से पहले एक बार लाहौर हो आएं, पर उन की यह इच्छा तब उन के साथ ही सुपुर्देखाक हो गई, जब वे एक लंबी बीमारी के बाद इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं.

आफरीन ने दिल्ली आ कर पढ़ाई की और वकालत करने के बाद इसे ही अपना पेशा बना लिया.

एक दिन काम में काफी बिजी रहने के बाद जब रात के 10 बज गए, तो आफरीन ने एक कैब ली और रोहतास एन्क्लेव में अपने फ्लैट की ओर जाने लगी. अभी वह अपने औफिस से कुछ ही दूरी पर पहुंची थी कि उस ने देखा कि सड़क के बीचोंबीच कोई पड़ा हुआ है.

‘‘लगता है, किसी का एक्सीडैंट हुआ है… पर कमाल है कि इतनी गाडि़यां आजा रही हैं, पर इस को मदद देने का समय किसी के पास नहीं?है,’’ आफरीन बुदबुदा उठी थी.

‘‘भैया, जरा गाड़ी रोकना,’’ गाड़ी रुकवा कर आफरीन उस आदमी के पास गई.

और उस के बाद जो आफरीन ने देखा, वह देख कर उस की चीख निकल गई. वह एक लड़की थी, जो बिलकुल नंगी हालत में सड़क पर फेंक दी गई थी. देखने से ही लगता था कि उस के साथ रेप हुआ है. लड़की के मुंह से लगातार ढेर सारा खून निकल रहा था.

आफरीन को कुछ समझ नहीं आया. वह थोड़ा घबराई थी. उस ने देखा कि अभी उस लड़की की सांसें चल रही थीं यानी अगर अभी उसे समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो उस की जान बच सकती है. आफरीन ने कैब वाले को मदद के लिए बुलाया.

‘‘अरे क्या मैडम, इस को अस्पताल ले जा कर क्यों लफड़े में पड़ती हो? और वैसे भी यह रेप का केस लगता है… मैं किसी तरह के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता… जो आप की मरजी हो करो. मैं यहां से जा रहा हूं,’’ इतना कह कर कैब ड्राइवर तेजी से चला गया.

हैरान हो गई थी आफरीन, ‘‘क्या वाकई इनसानियत मर गई थी… एक कैब ड्राइवर एक पीडि़ता को अस्पताल तक नहीं पहुंचा रहा है…’’

आफरीन के अगलबगल से गाडि़यां निकल रही थीं, पर कोई भी रुक कर इस लड़की का हाल तक नहीं पूछना चाह रहा है, पर कुछ भी हो जाए, मैं इस लड़की को अस्पताल तो पहुंचा कर ही रहूंगी,’’ सब से पहले तो आफरीन ने मोबाइल फोन से पुलिस को फोन लगाया, तो पुलिस ने जल्द से जल्द वहां पहुंचने का यकीन दिलाया.

‘‘अगर पुलिस को आने में देर हुई तो ज्यादा खून बहने के चलते यह लड़की मर भी सकती है,’’ यह सोच कर आफरीन ने लोगों को हाथ हिला कर मदद की गुहार लगानी शुरू की, आटोरिकशा और कैब वालों को भी रोका, पर सब बेकार रहा. तकरीबन एक घंटा हो चुका था, पुलिस का कहीं अतापता नहीं था.

इस बीच आफरीन ने लड़की के मुंह से बहता हुआ खून रोकने के लिए रूमाल लड़की के मुंह पर लगाया, तो उसे एहसास हुआ कि खून की एक धार लगातार उस के मुंह से बाहर आ रही थी. वह लड़की चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रही थी. दरिंदों ने रेप करने के बाद उस लड़की की जीभ ही काट दी थी.

‘‘शायद मैं इस लड़की को बचा नहीं पाऊंगी… कोई भी मदद को नहीं रुक रहा है… पर क्या करूं… मैं इसे छोड़ कर जा भी तो नहीं सकती… मेरा जमीर मुझे इस की इजाजत नहीं दे रहा है,’’ अपनेआप से ही बातें कर रही थी आफरीन.

तभी किसी ने रोड के किनारे अपनी लंबी सी कार रोकी. उस में से एक नौजवान निकला और फौरन आफरीन के पास पहुंचा.

‘‘जी कहिए… क्या कोई हादसा हुआ?है… उफ,’’ लड़की के नंगे शरीर और बहते खून को देख कर वह नौजवान भी परेशान हो उठा था. वह जल्दी से अपनी गाड़ी में रखा हुआ एक कपड़ा निकाल कर लाया और लड़की के शरीर को ढक दिया.

‘‘लगता है, किसी ने रेप के बाद इसे फेंक दिया है. क्या आप इसे उठाने में मेरी मदद करेंगी…?’’ उस नौजवान ने आफरीन को देखते हुए कहा.

‘‘जी जरूर,’’ इतना कह कर उन दोनों ने उस लड़की को गाड़ी में लिटा दिया और अस्पताल पहुंचा दिया.

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की भाव और भावना एक: सीएम योगी

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लिए गुरुवार का दिन ऐतिहासिक रहा. दोनों राज्यों के बीच तीन दशक से चले आ रहे एक विवाद का पटाक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अलकनंदा अतिथि गृह की चाबी सौंपी तो उत्तर प्रदेशवासियों के लिए हरिद्वार में नवनिर्मित भव्य भागीरथी भवन का लोकार्पण किया.

माँ गंगा तट के पर आयोजित संपन्न कार्यक्रम को मुख्यमंत्री योगी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुरूप बताया. उन्होंने कहा कि माँ गंगा भारत के जीवनधारा की आत्मा हैं. गंगा तब बनती है जब अलकनंदा और भागीरथी एक साथ मिलती हैं.

प्रधानमंत्री जी ने हमें विवादों को संवाद से सुलझाना सिखाया है और इसी भावना के साथ दोनों राज्यों के बीच विवादों का समाधान होना संभव हुआ.

पूज्य संतों, धर्माचार्यों, अनेक पूर्व मुख्यमंत्री गणों, उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों की उपस्थिति में मुख्यमंत्री योगी ने दोनों राज्यों के समग्र विकास के लिए साथ-साथ मिलकर काम करने की जरूरत बताई.

उत्तराखंड को अपनी माँ और मातृभूमि कहते हुए सीएम योगी ने कहा कि उत्तराखंड में स्प्रिचुअल टूरिज्म और इको टूरिज्म की अपार सम्भावनाएं हैं. उत्तर प्रदेश की 25 करोड़ जनता सहित पूरे भारत से कौन ऐसा है जो उत्तराखंड के चार धाम का पुण्य लाभ नहीं लेना चाहता, ऐसा कोई नहीं जो हर की पैड़ी पर स्नान नहीं करना चाहता. यहां हर मौसम में पर्यटन के अवसर हैं.

चारधाम यात्रा के दौरान केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री की ओर लोग आने को उत्सुक हैं तो दूसरे सीजन में कुमाऊं, नैनीताल, झूंसी मठ से जुड़े अनेक हिल स्टेशन भी लोगों को लालायित करता है. यही नहीं, हाल के वर्षों में यहां फारेस्ट कवर भी बढ़ा है, जो इको टूरिज्म की संभावनाओं को बल देने वाला गया. सीएम योगी ने डबल इंजन की सरकार में देवभूमि उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ, ऋषिकेश, आदि आध्यत्मिक स्थलों के पर्यटन विकास के लिए जारी प्रयासों की सराहना की. इन पावन स्थलों को आस्था के साथ-साथ राष्ट्रीय एकात्मता को तेज और ओज देने के केंद्र की संज्ञा देते हुए सीएम योगी ने विश्वास जताया कि यहां विकास की यह यात्रा सभी के सुख-समृद्धि का कारक बनेगी.

काशी में 50 लोग पूजन नहीं कर पाते थे, आज 50 हजार लोग होते हैं मौजूद उत्तर प्रदेश में अयोध्या दीपोत्सव, काशी देव दीपावली, बरसाना रंगोत्सव, कृष्ण जन्मोत्सव के भव्य आयोजनों की चर्चा करते हुए सीएम ने अयोध्या, काशी, शुक तीर्थ, नैमिष धाम, राजापुर, आदि पावन, आध्यत्मिक ऊर्जा के केंद्रों के समग्र विकास के कार्यक्रमों की भी जानकारी दी.

प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन में काशी में श्रीकाशीविश्वनाथ धाम कॉरिडोर निर्माण के बाद बदली परिस्थितियों की चर्चा करते हुए सीएम योगी ने कहा कि जहां 50 लोग एक साथ पूजा-पाठ नहीं कर सकते थे आज 50 हजार लोग एक साथ उपस्थित रहते हैं. मुख्य पर्वों पर तो 05 लाख लोग दर्शन कर रहे हैं.

वेदालाइफ-निरामयम् में लिया आड़ू और खुमैनी का स्वाद

पौड़ी-गढ़वाल में पतंजलि योगपीठ द्वारा नवविकसित योग, आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा की इंटीग्रेटेड थेरेपी के अत्याधुनिक केंद्र “वेदालाइफ-निरामयम्” भ्रमण के अनुभवों को भी साझा किया.

सीएम ने बताया कि वहां उन्होंने आड़ू और खुमैनी जैसे फलों का आनंद लिया. उन्होंने कहा कि एक सूखी पहाड़ी पर, जहां मोटे पत्थर हुआ करते थे, वहां 40 हजार से अधिक वृक्षों का एक मनोरम जंगल बसा दिया गया है. यह पूरा क्षेत्र किसी ऋषि की साधना स्थली लगती है. कल देश के मैदानी क्षेत्रों में जब 45℃ तापमान था तब हम लोग वहां 15℃ का आनंद ले रहे थे. सीएम योगी ने कहा कि यह केंद्र हेल्थ टूरिज्म को बढ़ावा देने के साथ ही व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन का कारक भी बनेगा.

हीरोपंती-2: नहीं चला टाइगर का जादू, नवाजुद्दीन ने जीता दिल

फिल्म: हीरोपंती-2

रेटिंग: डेढ़ स्टार

स्टार कास्ट: टाइगर श्रौफ़, तारा सुतारिया और नवाजुद्दीन सिद्दीकी

डायरेक्टर: अहमद खान

यह फिल्म 2014 में आई फिल्म ‘हीरोपंती’ की सीक्वल है. शब्बीर खान द्वारा निर्देशित फिल्म ‘हीरोपंती’ एक रोमांटिक ऐक्शन फिल्म थी मगर इस दूसरे भाग की कहानी बिलकुल अलग है.

नायक टाइगर श्रौफ़ अपने चिरपरिचित डांस और ऐक्शन के चलते घिसे सिक्के जैसा लगता है. फिल्म का एकमात्र आकर्षण है नवाजुद्दीन सिद्दीकी. वह विलेन बना है. सिर्फ यही किरदार है जो दर्शकों का मनोरंजन करता है. हाथों में नेलपेंट और गालों पर लाली लगाए इस किरदार को देख कर दर्शकों को हंसी आती है.

फिल्म की कहानी निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने लिखी है. कहानी एक जादूगर लैला (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की है, जो फाइनैंशियल ईयर की क्लोजिंग पर इंडिया के टैक्स के सारे पैसे हैक करने की फिराक में है. दूसरी ओर बबलू (टाइगर श्रौफ) एक महत्त्वाकांक्षी हैकर है जो पैसे कमा कर शोबाजी करना चाहता है. पर सरकारी मिशन के तहत लैला की पोल खोलने के लिए बबलू को नियुक्त किया जाता है.

 

यहां बबलू लैला की बहन शनाया (तारा सुतारिया) से प्रेम कर बैठता है. बबलू का जमीर तब जागता है जब उस की मुलाकात मुंहबोली मां (अमृता सिंह) से होती है. वह खुद लैला की ठगी का शिकार हो चुकी थी. लैला बबलू की मुंहबोली मां को मारने की कोशिश करता है परंतु बबलू न सिर्फ अपनी मां को बचाता है, अपराधियों को जेल भिजवाने की कसम भी खाता है. वह लैला के मंसूबों पर पानी फेर देता है. वह देश के पैसे को हैक नहीं होने देता और देश का पैसा देश में ही रहता है.

इस बेसिरपैर की कहानी की पटकथा बेहद कमजोर है. टाइगर श्रौफ के सीटीमार डायलौग्स हैं. ए आर रहमान का संगीत बांध नहीं पाता. हां, कोरियोग्राफी दर्शनीय है. फिल्म का निर्देशक अहमद खान खुद कोरियाग्राफर है, इसलिए उस ने कोरियाग्राफी पर विशेष ध्यान दिया है. मगर निर्देशन के मामले में वह सफल नहीं है. निर्देशक ने सारे देशवासियों के खाते 31 मार्च को ही खाली कर देने का ख़याल आखिर 21वीं सदी के 22 साल बीतने के बाद सोचा भी कैसे होगा?

फिल्म के अंत में गाना ‘धूमधड़क्का…’ अच्छा बन पड़ा है. इस गाने में कृति सेनन ने परफौर्म किया है. क्लाइमैक्स में खूब मारधाड़ है. फिल्म में कई जगह बेवजह की गोलीबारी और चिपकाचिपकी दिखाई गई है, बहुत तोड़फोड़ की गई है, कई कारों का प्रयोग किया गया है. विदेशी लोकेशनें खूबसूरत हैं. फिल्म रंगबिरंगी लगती है. तारा सुतारिया की ऐक्टिंग में दम नहीं है. उस ने सैक्सी कौस्ट्यूम पहने हैं.

टैस्टेड ओके- भाग 3: क्या कैरेक्टर टेस्ट में पास हुए विशाल और संजय

सिमरन ने अपना हेयर बैंड उतारते हुए संजय से कहा कि उस ने न्यूड औरत की तसवीर में औरत के उभारों को ठीक नहीं बनाया. लगता है कि उस ने अब तक किसी न्यूड औरत को देखा ही नहीं है.

संजय ने औरत के प्यार पर एक हरे रंग की नस दिखाई थी. सिमरन का मानना था कि इस तरह की नस न तो अच्छी लग रही है, न ही असलियत है. फिर उस ने अपनी टीशर्ट उतार दी और अगले ही पल अपनी ब्रा उतार कर वह पूरी तरह से टौपलैस हो गई.

सिमरन के गोल, कसे हुए, चिकने और गोरे उभारों को संजय 5 मिनट तक तो देखता ही रहा, फिर तुरंत ही अपनेआप को संभाल लिया. संजय को अभी भी कोई फर्क नहीं पड़ा था.

सिमरन ने अब जबरदस्ती संजय को थिएटर में पड़ी हुई बैंच पर लिटाने की कोशिश की, तो संजय ने साफ मना कर दिया. संजय ने सिमरन के दोनों उभारों को हथेलियों से दबाते हुए परे धकेल दिया और बोला, ‘‘मैडम, मैं किसी और को पसंद करता हूं.

सिमरन अब तक अच्छीखासी गरम हो चुकी थी. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘भाड़ में गया तुम्हारा कमिटमैंट… मैं कौन सा तुम्हें अपना बौयफ्रैंड बनाना चाहती हूं. चुपचाप लेटे रहो, वरना मैं चिल्लाने लगूंगी कि तुम जबरदस्ती कर रहे थे मेरे साथ.

‘‘मैं तुम्हारी किस्मत बना सकती हूं, तो बिगाड़ भी सकती हूं. गुरुग्राम में रहना मुश्किल हो जाएगा तुम्हें,’’ यह कहते हुए सिमरन जबरदस्ती उस की पैंट उतारते हुए उस से चिपकने की कोशिश करने लगी.

संजय ने पूरी ताकत से एक बार फिर सिमरन को परे धकेल दिया.

सिमरन को यह संजय के कमिटमैंट की नहीं, बल्कि अपने पैसे और रुतबे की हार लगने लगी थी. दो कौड़ी का सड़कछाप पेंटर उस के खुले औफर को ठुकरा देगा, उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था.

सिमरन ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम जैसे लोग देश पर बोझ हैं और कभी जिंदगी में तरक्की नहीं कर सकते हैं. जिंदगी बदलने का मौका सिर्फ एक बार मिलता है.

‘‘फिर से सोच लो एक बार,’’ कहते हुए सिमरन वापस कपड़े पहन कर जाने लगी. उसे पूरा यकीन था कि संजय उसे वापस बुलाएगा, लेकिन उस ने गाड़ी स्टार्ट कर ली, तब भी अंदर से वापस आने के लिए कोई आवाज नहीं आई.

तीसरे दिन सिमरन ने विशाल को बताया कि आज रात का डिनर हम डैडी औफ टेस्ट रैस्टोरैंट में मेरी यूनिवर्सिटी के समय की दोस्त और उस के पति के साथ करेंगे.

होटल के परिसर में विशाल ने रंजना से मिलते समय ठीक वैसे ही चौंकने की ऐक्टिंग की जैसा कि संजय ने सिमरन के साथ मिल कर किया. चारों ने खाने की टेबल पर एकसाथ हनीमून पर जाने का प्लान बनाया.

रंजना ने अपने जीजाजी को किस करते हुए स्टार्टर पास किया, तो सिमरन ने अपने जीजाजी को फिर से एक किलर मुसकान देते हुए अभी भी सोच लेने का इशारा किया.

पोस्ट क्रेडिट सीन में हम देखते हैं कि अगले दिन सिमरन और रंजना के होने वाले संजय और विशाल गुरुग्राम के सैक्टर 53 के उसी बार में बैठे हुए चियर्स कर रहे थे, जिस में रंजना और सिमरन ने कहानी के पहले सीन में अपनेअपने मंगेतरों के करैक्टर को चैक करने की योजना बनाई थी.

विशाल को पहले दिन ही सिमरन की योजना के बारे में पता चल गया था. उस ने संजय को भी उस की गर्लफ्रैंड के द्वारा उस का इम्तिहान लिए जाने की जानकारी दे दी थी.

पहले दिन रंजना बार से सिमरन को घर छोड़ने आई थी, विशाल ने पोर्च से उन्हें एकसाथ देख लिया था.

विशाल की वैशाली के नाम से फेसबुक पर एक फेक आईडी थी, जिस में सिमरन, रंजना और उन की ढेर सारी फ्रैंड विशाल उर्फ वैशाली की दोस्त थीं. संजय भी उस वैशाली नाम की फेक आईडी से जुड़ा हुआ था.

संजय पहले एक बार वैशाली नाम की फेक आईडी को प्रपोज करते हुए अपना फोन नंबर, विशाल उर्फ वैशाली से शेयर कर चुका था.

इस तरह विशाल को पहले से सिमरन और रंजना के कनैक्शन के बारे में जानकारी थी.

पहली मुलाकात में सिमरन ने रंजना को कस्टमर की तरह मिलाया और दोस्ती के बारे में नहीं बताया. सिमरन ने घर जा कर टैक्नौलाजी सपोर्ट के लिए कहा, जबकि रंजना अपने लैपटौप को औफिस में भी ला सकती थी.

सारी कडि़यों को जोड़ कर विशाल तुरंत ही उन की योजना को भांप गया और समय रहते उस ने संजय को भी सचेत कर दिया.

संजय ने कहा, ‘‘थैंक्स यार, अगर तुम ने समय रहते न बताया होता तो हम इम्तिहान में फैल हो गए होते.’’

विशाल बोला, ‘‘भाई है तू मेरा. यह तो मेरी फेक आईडी की मेहरबानी थी, जिस ने हम दोनों को बचा लिया.’’

संजय बोला, ‘‘हमारी गर्लफ्रैंड सोने के अंडे देने वाली मुरगियां हैं. बहुत ही कम लोगों को ऐसी जुगाड़ मिलती हैं, जो बाकी सब भी दें और खर्च भी उठा सकें.’’

विशाल ने कहा, ‘‘अपनी तो लाइफ सैटल है भाई. कमाऊ गर्लफ्रैंड जो मिल गई है.’’

संजय बोला, ‘‘हां यार. अगर आज हमारी गर्लफ्रैंड हमें छोड़ कर चली जाएं, तो दानेदाने को मोहताज हो जाएं.’’

इस के बाद वे दोनों अपनीअपनी ऐंगेजमैंट रिंग को एकदूसरे को दिखाते हैं.

विशाल बोला, ‘‘यार मानना पड़ेगा, भाभीजी स्मार्ट हैं.’’

संजय ने कहा, ‘‘हां, मगर तुम्हारी वाली खूबसूरत है और कमाती ज्यादा है.’’

विशाल बोला, ‘‘ओके भाई. रात गई बात गई, अब से हम अपनीअपनी भाभियों को मां की तरह ही देखेंगे और समझेंगे.’’

संजय ने कहा, ‘‘पक्का.’’

यहां हमें यह पता चलता है कि संजय और विशाल दोनों जानते हैं कि उन की गर्लफ्रैंड उन के दोस्त के साथ इंटीमेट होने के लिए किस हद तक गिर चुकी थीं, लेकिन इस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. वे खुश थे कि उन की कमाऊ गर्लफ्रैंड हाथ से फिसलतेफिसलते बची थीं.

सिमरन के क्रेडिट कार्ड से पेमेंट कर के वे दोनों घर निकल जाते हैं.

Mother’s Day Special: ममता का तराजू

‘‘मां, मैं किस के साथ खेलूं? मुझे भी आप अस्पताल से छोटा सा बच्चा ला दीजिए न. आप तो अपने काम में लगी रहती हैं और मैं अकेलेअकेले खेलता हूं. कृपया ला दीजिए न. मुझे अकेले खेलना अच्छा नहीं लगता है.’’

अपने 4 वर्षीय पुत्र अंचल की यह फरमाइश सुन कर मैं धीरे से मुसकरा दी थी और अपने हाथ की पत्रिका को एक किनारे रखते हुए उस के गाल पर एक पप्पी ले ली थी. थोड़ी देर बाद मैं ने उसे गोद में बैठा लिया और बोली, ‘‘अच्छा, मेरे राजा बेटे को बच्चा चाहिए अपने साथ खेलने के लिए. हम तुम्हें 7 महीने बाद छोटा सा बच्चा ला कर देंगे, अब तो खुश हो?’’

अंचल ने खुश हो कर मेरे दोनों गालों के तड़ातड़ कई चुंबन ले डाले व संतुष्ट हो कर गोद से उतर कर पुन: अपनी कार से खेलने लगा था. शीघ्र ही उस ने एक नया प्रश्न मेरी ओर उछाल दिया, ‘‘मां, जो बच्चा आप अस्पताल से लाएंगी वह मेरी तरह लड़का होगा या आप की तरह लड़की?’’

मैं ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘बेटे, यह तो मैं नहीं जानती. जो डाक्टर देंगे, हम ले लेंगे. परंतु तुम से एक बात अवश्य कहनी है कि वह लड़का हो या लड़की, तुम उसे खूब प्यार करोगे. उसे मारोगे तो नहीं न?’’

‘‘नहीं, मां. मैं उसे बहुत प्यार करूंगा,’’ अंचल पूर्ण रूप से संतुष्ट हो कर खेल में जुट गया, पर मेरे मन में विचारों का बवंडर उठने लगा था. वैसे भी उन दिनों दिमाग हर वक्त कुछ न कुछ सोचता ही रहता था. ऊपर से तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी.

अंचल आपरेशन से हुआ था, अत: डाक्टर और भी सावधानी बरतने को कह रहे थे. मां को मैं ने पत्र लिख दिया था क्योंकि इंगलैंड में भला मेरी देखभाल करने वाला कौन था? पति के सभी मित्रों की पत्नियां नौकरी और व्यापार में व्यस्त थीं. घबरा कर मैं ने मां को अपनी स्थिति से अवगत करा दिया था. मां का पत्र आया था कि वह 2 माह बाद आ जाएंगी, तब कहीं जा कर मैं संतुष्ट हुई थी.

उस दिन शाम को जब मेरे पति ऐश्वर्य घर आए तो अंचल दौड़ कर उन की गोद में चढ़ गया और बोला, ‘‘पिताजी, पिताजी, मां मेरे लिए एक छोटा सा बच्चा लाएंगी, मजा आएगा न?’’

ऐश्वर्य ने हंसते हुए कहा, ‘‘हांहां, तुम उस से खूब खेलना. पर देखो, लड़ाई मत करना.’’

अंचल सिर हिलाते हुए नीचे उतर गया था.

मैं ने चाय मेज पर लगा दी थी. ऐश्वर्य ने पूछा, ‘‘कैसी तबीयत है, सर्वदा?’’

मैं ने कहा, ‘‘सारा दिन सुस्ती छाई रहती है. कुछ खा भी नहीं पाती हूं ठीक से. उलटी हो जाती है. ऐसा लगता है कि किसी तरह 7 माह बीत जाएं तो मुझे नया जन्म मिले.’’

ऐश्वर्य बोले, ‘‘देखो सर्वदा, तुम 7 माह की चिंता न कर के बस, डाक्टर के बताए निर्देशों का पालन करती जाओ. डाक्टर ने कहा है कि तीसरा माह खत्म होतेहोते उलटियां कम होने लगेंगी, पर कोई दवा वगैरह मत खाना.’’

2 माह के पश्चात भारत से मेरी मां आ गई थीं. उस समय मुझे 5वां माह लगा ही था. मां को देख कर लगा था जैसे मुझे सभी शारीरिक व मानसिक तकलीफों से छुटकारा मिलने जा रहा हो. अंचल ने दौड़ कर नानीजी की उंगली पकड़ ली थी व ऐश्वर्य ने उन के सामान की ट्राली. मैं खूब खुश रहती थी. मां से खूब बतियाती. मेरी उलटियां भी बंद हो चली थीं. मेरे मन की सारी उलझनें मां के  आ जाने मात्र से ही मिट गई थीं.

मैं हर माह जांच हेतु क्लीनिक भी जाती थी. इस प्रकार देखतेदेखते समय व्यतीत होता चला गया. मैं ने इंगलैंड के कुशल डाक्टरों के निर्देशन व सहयोग से एक बच्ची को जन्म दिया और सब से खुशी की बात तो यह थी कि इस बार आपरेशन की आवश्यकता नहीं पड़ी थी. बच्ची का नाम मां ने अभिलाषा रखा. वह बहुत खुश दिखाई दे रही थीं क्योंकि उन की कोई नातिन अभी तक न थी. मेरी बहन के 2 पुत्र थे, अत: मां का उल्लास देखने योग्य था. छोटी सी गुडि़या को नर्स ने सफेद गाउन, मोजे, टोपा व दस्ताने पहना दिए थे.

तभी अंचल ने कहा, ‘‘मां, मैं बच्ची को गोद में ले लूं.’’

मैं ने अंचल को पलंग पर बैठा दिया व बच्ची को उस की गोद में लिटा दिया. अंचल के चेहरे के भाव देखने लायक थे. उसे तो मानो जमानेभर की खुशियां मिल गई थीं. खुशी उस के चेहरे से छलकी जा रही थी. यही हाल ऐश्वर्य का भी था. तभी नर्स ने आ कर बतलाया कि मिलने का समय समाप्त हो चुका है.

उसी नर्स ने अंचल से पूछा, ‘‘क्या मैं तुम्हारा बच्चा ले सकती हूं?’’

अंचल ने हड़बड़ा कर ‘न’ में सिर हिला दिया. हम सब हंसने लगे.

जब सब लोग घर चले गए तो मैं बिस्तर में सोई नन्ही, प्यारी सी अभिलाषा को देखने लगी, जो मेरे व मेरे  परिवार वालों की अभिलाषा को पूर्ण करती हुई इस दुनिया में आ गई थी. परंतु अब देखना यह था कि मेरे साढ़े 4 वर्षीय पुत्र व इस बच्ची में कैसा तालमेल होता है.

5 दिन बाद जब मैं घर आई तो अंचल बड़ा खुश हुआ कि उस की छोटी सी बहन अब सदा के लिए उस के पास आ गई है.

बच्ची 2 माह की हुई तो मां भारत वापस चली गईं. उन के जाने से घर बिलकुल सूना हो गया. इन देशों में बिना नौकरों के इतने काम करने पड़ते हैं कि मैं बच्ची व घर के कार्यों में मशीन की भांति जुटी रहती थी.

देखतेदेखते अभिलाषा 8 माह की हो गई. अब तक तो अंचल उस पर अपना प्यार लुटाता रहा था, पर असली समस्या तब उत्पन्न हुई जब अभिलाषा ने घुटनों के बल रेंगना आरंभ किया. अब वह अंचल के खिलौनों तक आराम से पहुंच जाती थी. अपने रंगीन व आकर्षक खिलौनों व झुनझुनों को छोड़ कर उस ने भैया की एक कार को हाथ से पकड़ा ही था कि अंचल ने झपट कर उस से कार छीन ली, जिस से अभिलाषा के हाथ में खरोंचें आ गईं.

उस समय मैं वहीं बैठी बुनाई कर रही थी. मुझे क्रोध तो बहुत आया पर स्वयं पर किसी तरह नियंत्रण किया. बालमनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए मैं ने अंचल को प्यार से समझाने की चेष्टा की, ‘‘बेटे, अपनी छोटी बहन से इस तरह कोई चीज नहीं छीना करते. देखो, इस के हाथ में चोट लग गई. तुम इस के बड़े भाई हो. यह तुम्हारी चीजों से क्यों नहीं खेल सकती? तुम इसे प्यार करोगे तो यह भी तुम्हें प्यार करेगी.’’

मेरे समझाने का प्रत्यक्ष असर थोड़ा ही दिखाई दिया और ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे सवा 5 वर्षीय यह बालक स्वयं के अधिकार क्षेत्र में किसी और के प्रवेश की बात को हृदय से स्वीकार नहीं कर पा रहा है. मैं चुपचाप रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद जब मैं रसोई से बाहर आई तो देखा कि अंचल अभिलाषा को खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था.

शाम को ऐश्वर्य घर आए तो अंचल उन की ओर रोज की भांति दौड़ा. वह उसे उठाना ही चाहते थे कि तभी घुटनों के बल रेंगती अभिलाषा ने अपने हाथ आगे बढ़ा दिए. ऐश्वर्य चाहते हुए भी स्वयं को रोक न सके और अंचल के सिर पर हाथ फेरते हुए अभिलाषा को उन्होंने गोद में उठा लिया.

मैं यह सब देख रही थी, अत: झट अंचल को गोद में उठा कर पप्पी लेते हुए बोली, ‘‘राजा बेटा, मेरी गोद में आ जाएगा, है न बेटे?’’ तब मैं ने अंचल की नजरों में निरीहता की भावना को मिटते हुए अनुभव किया.

तभी भारत से मां व भैया का पत्र आया, जिस में हम दोनों पतिपत्नी को यह विशेष हिदायत दी गई थी कि छोटी बच्ची को प्यार करते समय अंचल की उपेक्षा न होने पाए, वरना बचपन से ही उस के मन में अभिलाषा के प्रति द्वेषभाव पनप सकता है. इस बात को तो मैं पहले ही ध्यान में रखती थी और इस पत्र के पश्चात और भी चौकन्नी हो गई थी.

मेरे सामने तो अंचल का व्यवहार सामान्य रहता था, पर जब मैं किसी काम में लगी होती थी और छिप कर उस के व्यवहार का अवलोकन करती थी. ऐसा करते हुए मैं ने पाया कि हमारे समक्ष तो वह स्वयं को नियंत्रित रखता था, परंतु हमारी अनुपस्थिति में वह अभिलाषा को छेड़ता रहता था और कभीकभी उसे धक्का भी दे देता था.

मैं समयसमय पर अंचल का मार्ग- दर्शन करती रहती थी, परंतु उस का प्रभाव उस के नन्हे से मस्तिष्क पर थोड़ी ही देर के लिए पड़ता था.

बाल मनोविज्ञान की यह धारणा कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण न केवल युवावस्था में अपितु बचपन में भी होता है. अर्थात पुत्री पिता को अधिक प्यार करती है व पुत्र माता से अधिक जुड़ा होता है, मेरे घर में वास्तव में सही सिद्ध हो रही थी.

एक दिन कार्यालय से लौटते समय ऐश्वर्य एक सुंदर सी गुडि़या लेते आए. अभिलाषा 10 माह की हो चुकी थी. गुडि़या देख कर वह ऐश्वर्य की ओर लपकी.

मैं ने फुसफुसाते हुए ऐश्वर्य से पूछा, ‘‘अंचल के लिए कुछ नहीं लाए?’’

उन के ‘न’ कहने पर मैं तो चुप हो गई, पर मैं ने अंचल की आंखों में उपजे द्वेषभाव व पिता के प्रति क्रोध की चिनगारी स्पष्ट अनुभव कर ली थी. मैं ने धीरे से उस का हाथ पकड़ा, रसोई की ओर ले जाते हुए उसे बताया, ‘‘बेटे, मैं ने आज तुम्हारे मनपसंद बेसन के लड्डू बनाए हैं, खाओगे न?’’

अंचल बोला, ‘‘नहीं मां, मेरा जरा भी मन नहीं है. पहले एक बात बताइए, आप जब भी हमें बाजार ले जाती हैं तो मेरे व अभिलाषा दोनों के लिए खिलौने खरीदती हैं, पर पिताजी तो आज मेरे लिए कुछ भी नहीं लाए? ऐसा क्यों किया उन्होंने? क्या वह मुझे प्यार नहीं करते?’’

जिस प्रश्न का मुझे डर था, वही मेरे सामने था, मैं ने उसे पुचकारते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटे, पिताजी तो तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. उन के कार्यालय से आते समय बीच रास्ते में एक ऐसी दुकान पड़ती है जहां केवल गुडि़या ही बिकती हैं. इसीलिए उन्होंने एक गुडि़या खरीद ली. अब तुम्हारे लिए तो गुडि़या खरीदना बेकार था क्योंकि तुम तो कारों से खेलना पसंद करते हो. पिछले सप्ताह उन्होंने तुम्हें एक ‘रोबोट’ भी तो ला कर दिया था. तब अभिलाषा तो नहीं रोई थी. जाओ, पिताजी के पास जा कर उन्हें एक पप्पी दे दो. वह खुश हो जाएंगे.’’

अंचल दौड़ कर अपने पिताजी के पास चला गया. मैं ने उस के मन में उठते हुए ईर्ष्या के अंकुर को कुछ हद तक दबा दिया था. वह अपनी ड्राइंग की कापी में कोई चित्र बनाने में व्यस्त हो गया था.

कुछ दिन पहले ही उस ने नर्सरी स्कूल जाना आरंभ किया था और यह उस के लिए अच्छा ही था. ऐश्वर्य को बाद में मैं ने यह बात बतलाई तो उन्होंने भी अपनी गलती स्वीकार कर ली. इन 2 छोटेछोटे बच्चों की छोटीछोटी लड़ाइयों को सुलझातेसुलझाते कभीकभी मैं स्वयं बड़ी अशांत हो जाती थी क्योंकि हम उन दोनों को प्यार करते समय सदा ही एक संतुलन बनाए रखने की चेष्टा करते थे.

अब तो एक वर्षीय अभिलाषा भी द्वेष भावना से अप्रभावित न रह सकी थी. अंचल को जरा भी प्यार करो कि वह चीखचीख कर रोने लगती थी. अपनी गुडि़या को तो वह अंचल को हाथ भी न लगाने देती थी और इसी प्रकार वह अपने सभी खिलौने पहचानती थी. उसे समझाना अभी संभव भी न था. अत: मैं अंचल को ही प्यार से समझा दिया करती थी.

मैं मारने का अस्त्र प्रयोग में नहीं लाना चाहती थी क्योंकि मेरे विचार से इस अस्त्र का प्रयोग अधिक समय तक के लिए प्रभावी नहीं होता, जबकि प्यार से समझाने का प्रभाव अधिक समय तक रहता है. हम दोनों ही अपने प्यार व ममता की इस तुला को संतुलन की स्थिति में रखते थे.

एक दिन अंचल की आंख में कुछ चुभ गया. वह उसे मसल रहा था और आंख लाल हो चुकी थी. तभी वह मेरे पास आया. उस की दोनों आंखों से आंसू बह रहे थे.

मैं ने एक साफ रूमाल से अंचल की आंख को साफ करते हुए कहा, ‘‘बेटे, तुम्हारी एक आंख में कुछ चुभ रहा था, पर तुम्हारी दूसरी आंख से आंसू क्यों बह रहे हैं?’’

वह मासूमियत से बोला, ‘‘मां, है न अजीब बात. पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है?’’

मैं ने उसे प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘देखो बेटे, जिस तरह तुम्हारी एक आंख को कोई तकलीफ होती है तो दूसरी आंख भी रोने लगती है, ठीक उसी प्रकार तुम और अभिलाषा मेरी व पिताजी की दोनों आंखों की तरह हो. यदि तुम दोनों में से एक को तकलीफ होती हो तो दूसरे को तकलीफ होनी चाहिए. इस का मतलब यह हुआ कि यदि तुम्हारी बहन को कोई तकलीफ हो तो तुम्हें भी उसे अनुभव करना चाहिए. उस की तकलीफ को समझना चाहिए और यदि तुम दोनों को कोई तकलीफ या परेशानी होगी तो मुझे और तुम्हारे पिताजी को भी तकलीफ होगी. इसलिए तुम दोनों मिलजुल कर खेलो, आपस में लड़ो नहीं और अच्छे भाईबहन बनो. जब तुम्हारी बहन बड़ी होगी तो हम उसे भी यही बात समझा देंगे.’’

अंचल ने बात के मर्म व गहराई को समझते हुए ‘हां’ में सिर हिलाया.

तभी से मैं ने अंचल के व्यवहार में कुछ परिवर्तन अनुभव किया. पिता का प्यार अब दोनों को बराबर मात्रा में मिल रहा था और मैं तो पहले से ही संतुलन की स्थिति बनाए रखती थी.

तभी रक्षाबंधन का त्योहार आ गया. मैं एक भारतीय दुकान से राखी खरीद लाई. अभिलाषा ने अंचल को पहली बार राखी बांधनी थी. राखी से एक दिन पूर्व अंचल ने मुझ से पूछा, ‘‘मां, अभिलाषा मुझे राखी क्यों बांधेगी?’’

मैं ने उसे समझाया, ‘‘बेटे, वह तुम्हारी कलाई पर राखी बांध कर यह कहना चाहती है कि तुम उस के अत्यंत प्यारे बड़े भाई हो व सदा उस का ध्यान रखोगे, उस की रक्षा करोगे. यदि उसे कोई तकलीफ या परेशानी होगी तो तुम उसे उस तकलीफ से बचाओगे और हमेशा उस की सहायता करोगे.’’

अंचल आश्चर्य से मेरी बातें सुन रहा था. बोला, ‘‘मां, यदि राखी का यह मतलब है तो मैं आज से वादा करता हूं कि मैं अभिलाषा को कभी नहीं मारूंगा, न ही उसे कभी धक्का दूंगा, अपने खिलौनों से उसे खेलने भी दूंगा. जब वह बड़ी हो कर स्कूल जाएगी और वहां पर उसे कोई बच्चा मारेगा तो मैं उसे बचाऊंगा,’’ यह कह कर वह अपनी एक वर्षीय छोटी बहन को गोद में उठाने की चेष्टा करने लगा.

अंचल की बातें सुन कर मैं कुछ हलका अनुभव कर रही थी. साथ ही यह भी सोच रही थी कि छोटे बच्चों के पालनपोषण में मातापिता को कितने धैर्य व समझदारी से काम लेना पड़ता है.

आज इन बातों को 20 वर्ष हो चुके हैं. अंचल ब्रिटिश रेलवे में वैज्ञानिक है व अभिलाषा डाक्टरी के अंतिम वर्ष में पढ़ रही है. ऐसा नहीं है कि अन्य भाईबहनों की भांति उन में नोकझोंक या बहस नहीं होती, परंतु इस के साथ ही दोनों आपस में समझदार मित्रों की भांति व्यवहार करते हैं. दोनों के मध्य सामंजस्य, सद्भाव, स्नेह व सहयोग की भावनाओं को देख कर उन के बचपन की छोटीछोटी लड़ाइयां याद आती हैं तो मेरे होंठों पर स्वत: मुसकान आ जाती है.

इस के साथ ही याद आती है अपने प्यार व ममता की वह तुला, जिस के दोनों पलड़ों में संतुलन रखने का प्रयास हम पतिपत्नी अपने आपसी मतभेद व वैचारिक विभिन्नताओं को एक ओर रख कर किया करते थे. दरवाजे की घंटी बजती है. मैं दरवाजा खोलती हूं. सामने अंचल हाथ में एक खूबसूरत राखी लिए खड़ा है. मुसकराते हुए वह कहता है, ‘‘मां, कल रक्षाबंधन है, अभिलाषा आज शाम तक आ जाएगी न?’’

‘‘हां बेटा, भला आज तक अभिलाषा कभी रक्षाबंधन का दिन भूली है,’’ मैं हंसते हुए कहती हूं.

‘‘मैं ने सोचा, पता नहीं बेचारी को लंदन में राखी के लिए कहांकहां भटकना पड़ेगा. इसलिए मैं राखी लेता आया हूं. आप ने मिठाई वगैरा बना ली है न?’’ अंचल ने कहा.

मैं ने ‘हां’ में सिर हिलाया और मुसकराते हुए पति की ओर देखा, जो स्वयं भी मुसकरा रहे थे.

लेखिका- कल्पना गुप्ता 

प्रिंस नरूला से सीखे हर लुक में स्टाइलिश दिखना

टी.वी. इंडस्ट्री की जानी-मानी हस्तियों में से एक नाम है प्रिंस नरूला का. प्रिंस ‘रोडीज सीजन 12’, ‘स्प्लिट्सविला सीजन 8’, और ‘बिग बौस सीजन 9’, जैसे रिएलिटी शो जीत सबके फेवरेट बन चुके हैं. प्रिंस ने कई टीवी सीरियल में भी काम किया किया है जैसे कि, ‘नागिन 3’, ‘लाल इश्क’, ‘बढ़ो बहू’. प्रिंस एक एक्टर होने के साथ बेहतरीन मौडल भी रह चुके हैं. रोडीज सीजन 12 में पार्टिसिपेट करने से पहले उन्होनें काफी साल तक मौडलिंग की है. ना केवल लड़कियां बल्कि लड़के भी प्रिंस नरूला की लुक्स के दीवाने हैं तो अगर आप भी अपने फैशन से करना चाहते हैं सबको इम्प्रेस तो ट्राय करें उनके ये लुक्स.

  1. प्रिंस नरूला का फंकी लुक…

 

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आजकल हर यंग लड़का फंकी दिखना चाहता है तो अगर आप भी फंकी लुक अपनाना चाहते हैं तो ट्राय करे प्रिंस नरूला का ये फंकी लुक. प्रिंस ने अपने इस फंकी लुक में व्हाइट राउंड नैक टी-शर्ट के ऊपर ओरेंज कलर की शर्ट, डार्क ब्लू कलर की जींस के साथ कलरफुल शूज पहने हुए हैं. आप भी प्रिंस नरूला का ये फंकी लुक अपने कौलेज या इंस्टीट्यूट में जरूर ट्राय करें.

2. प्रिंस नरूला का कैजुअल लुक…

प्रिंस नरूला ने अपने इस कैजुअल लुक में व्हाइट प्रिंटिड राउंड नैक टी-शर्ट के ऊपर ब्लू डेनिम शर्ट और साथ में ब्लैक ‘rugged’ जींस पहनी हुई है. इस लुक में वो काफी स्मार्ट और कूल नजर आ रहे हैं तो आप भी ये लुक अपनी डेली-रूटीन में ट्राय कर सकते हैं.

3. प्रिंस नरूला का इंडियन लुक…

प्रिंस नरूला ने अपने इस इंडियन आउट-फिट में क्रीम कलर के कुर्ते-पजामे के साथ लाइट ब्लू कलर का बेस कोट पहना हुआ है. आप भी ये लुक अपने फैमिली फंक्शन्स या किसी भी रिलीजियस फंक्शन में ट्राय कर सकते हैं.

4. प्रिंस नरूला का पार्टी लुक

इस पार्टी लुक में प्रिंस ने डार्क ब्लू शर्ट के ऊपर कोक कलर का बेस कोट, ब्लेजर और सेम कलर का ट्राउजर पहना हुआ है. प्रिंस ने इस आउट-फिट के साथ ब्लैक कलर की बो भी लगा रखी है जो कि काफी अच्छी लग रही है. आप भी ये लुक अपनी फैमिली पार्टीज में ट्राय कर सबको इम्प्रेस कर सकते हैं.

बता दें, प्रिंस नरूला की लव लाइफ भी काफी दिलचस्प रही है. प्रिंस युविका चौधरी से ‘बिग बौस सीजन 9’ के दौरान मिले थे और तब से ही दोनों के दिल भी आपस मे मिल गए थे. कुछ साल दोनों ने एक दूसरे को डेट करने के बाद शादी करने का फैसला किया. प्रिंस नरूला ने युविका चौधरी के साथ 24 जनवरी 2018 को सगाई की और कुछ ही महीने बाद यानी 12 अक्टूबर 2018 को दोनो ने शादी कर ली. प्रिंस नरूला ने कई म्यूजिक वीडियो भी की हैं जैसे की, ‘बर्नआउट’, ‘गोल्डी गोल्डन’, ‘हैल्लो हैल्लो’.

एक तरफा प्यार में जिंदा जल गई अंकिता: भाग 2

इसी उधेड़बुन में अंकिता खोई रहती थी कि वह कैसे शाहरुख से पीछा छुड़ाए जिस से वह उसे बाजार या ट्यूशन जाने के दौरान कभी नहीं मिल पाए? लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था. हमेशा वह उस से टकरा ही जाता था. हर बार उस के तेवर बदले हुए तल्ख होते थे. कई बार तो वह उसे दूर से देख कर ही भयभीत हो जाती थी. डर जाती थी, पता नहीं क्या बोल दे.

घर में पढ़ाई करने के वक्त एक बार उस के भाई ने आ कर कहा कि दीदी ‘पठान’ फिल्म का बायकाट हो रहा है. उस ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘अरे उस में शाहरुख खान है न! वह भी तो मुसलमान है.’’ यह कहता हुआ भाई वहां से चला गया.

लेकिन शाहरुख का नाम सुनते ही मोहल्ले वाले शाहरुख का चेहरा अचानक उस के दिमाग में घूम गया. वह एकदम से सहम गई. कुछ समय के लिए निस्तब्ध बनी रही. क्योंकि वह तो उस के नाम से ही खौफ खाने लगी थी.

मूलरूप से दुमका के रानीश्वर ब्लौक के गांव आसनबनी के रहने वाले शाहरुख के पिता की मौत हो चुकी थी. पिता की मौत के बाद जरुआडीह में स्थित अपनी ननिहाल में वह रहने लगा. उस का बड़ा भाई सलमान मोटर मैकेनिक है और मामा राजमिस्त्री का काम करते हैं.

कई तरह के विचारों में खोई अंकिता के कानों में अचानक दादी की आवाज आई, ‘‘अंकिता, सावन चला गया तो तुम मंदिर जाना भी भूल गई. आज सोमवार है. तुम को उठने में भी देर हो गई. जाओ, जल्दी से नहा लो. मंदिर हो आओ.’’

अंकिता दादी की आवाज सुन कर तुरंत बोली, ‘‘जी दादी, अभी आई. पहले कमरे का बिस्तर ठीक तो कर दूं. झाड़ू भी लगानी है.’’

तब तक कमरे में दादी ही आ गईं. उन की नजर खिड़की की टूटी किवाड़ पर गई. दादी बोल पड़ीं, ‘‘अरे यह कैसे टूटी, इसे जल्द बनवानी होगी, बाहर की है.’’

दादी की आवाज सुन कर अंकिता के पापा संजीव सिंह भी कमरे में आ गए थे. उन के आते ही दादी बोलीं, ‘‘बेटा, देख तो खिड़की की किवाड़ टूट गई है. पूरा पल्ला ही निकल गया है. आज ही बनवा दो.’’

संजीव सिंह अंकिता की ओर देखते हुए पूछने वाले थे कि वह अचानक से रो पड़ी. दादी और पापा की समझ नहीं आया कि अचानक अंकिता को क्या हो गया जो रोने लगी. दादी उसे चुप करवा कर पूछने लगीं, ‘‘क्या बात है? अचानक क्यों रोने लगी?’’ दादी पुचकारते हुई बोलीं, ‘‘जो बात दिल में है, हमें बताओ बेटा. हम लोग हैं न, किसी से झगड़ा हुआ है क्या?’’

अंकिता ने दादी का दुलार पा कर आंसू पोछते हुए शाहरुख द्वारा उसे बारबार तंग करने की बात बता दी. उस ने यह भी बताया कि उसी ने बीती रात खिड़की का पल्ला तोड़ डाला था. वह हम से जबरदस्ती शादी करने को कहता है. कहा नहीं मानने पर हमें जान से मारने की धमकी भी दी है.

यह सुन कर संजीव सिंह गुस्से में आ गए, लेकिन दादी ने उन्हें संभाला और बोलीं कि वह शाहरुख के भाई सलमान को जा कर समझा दे. उन्होंने कहा कि यही ठीक रहेगा. अभी ड्यूटी जाते वक्त उस से मिलता जाऊंगा.

पिता के आश्वासन और हमदर्दी से अंकिता का मन थोड़ा हलका हो गया था. उस ने महसूस किया कि शायद अब शाहरुख से पीछा छूट जाएगा. पूरे दिन घर पर रही.

संयोग से उस दिन बढ़ई के नहीं आने के कारण खिड़की की मरम्मत नहीं हो पाई थी. संजीव सिंह ने शाम को घर आ कर उसे बता दिया कि उन्होंने शाहरुख के भाई को हिदायत दे दी है कि वह अपने भाई को समझा दे.

उस रात अंकिता को अच्छी नींद आई थी, किंतु संजीव सिंह रात को करवटें बदल रहे थे. वह बेटी की शिकायत भले ही सुन कर शाहरुख के भाई को हिदायत दे आए थे, लेकिन मन अनहोनी से आशंकित था.

शाहरुख का खौफ उन के मन में भी समा गया था. वह भी उस की आवारगी और गलत संगत से परिचित थे. अंकिता को ले कर तरहतरह के विचार उन के मन में आ रहे थे. उन की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला.

थोड़ी देर में ही अंकिता के कमरे से आ रहे शोरगुल को सुन कर अचानक वह चौंक गए. हड़बड़ा कर उस के कमरे की तरफ दौड़े. वहां का दृश्य देख कर घबरा गए. कमरे में अंकिता जल रही थी. वह अपने कपड़ों में लगी आग को बुझाने के लिए कमरे में इधरउधर भाग रही थी.

संजीव ने जल रही अंकिता की आग को किसी तरह बुझाया. वह चीख रही थी. कुछ देर में ही उस का बदन बुरी तरह से जल चुका था. संजीव सिंह तुरंत उसे ले कर जिला अस्पताल भागे. वहां उसे इमरजेंसी में डाक्टर ने बताया कि वह 40 फीसदी से अधिक जल चुकी है. उस की जान को खतरा है.

यह घटना 23 अगस्त, 2022 के सुबह 5 बजे के करीब की थी. वहां के डाक्टर ने उसे तुरंत रांची ले जाने के लिए कहा. पिता जैसेतैसे कर के उसे रांची के अस्पताल रिम्स ले गए. वहां उसे भरती करवाया गया. मामला अपराध का था, इसलिए इस की कानूनी प्रक्रिया की भी शुरुआत हुई.

इस की सूचना 23 अगस्त की सुबह दुमका पुलिस को मिल गई थी. सूचना में कहा गया कि नगर थाना दुमका के जरुआडीह में पैट्रोल छिड़क कर एक छात्रा के शरीर में आग लगा दी गई है. वह गंभीर रूप से जख्मी है और उस का इलाज पीजेएमसीएच दुमका में चल रहा है.

उक्त घटना को गंभीरता से लेते हुए दुमका पुलिस ने त्वरित काररवाई करते हुए अस्पताल जा कर कार्यपालक दंडाधिकारी की उपस्थिति में पीडि़ता का बयान लिया और इस संबंध में दुमका नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कर जांच शुरू की.

इस सिलसिले में पहले पीडि़ता के बयान लिए गए. उस वक्त जख्मी अंकिता किसी तरह से बोल पा रही थी. उस ने बताया, ‘‘सोमवार 22 अगस्त को मैं ने पापा को शाहरुख के बारे में बताया था. पापा ने कहा कि उसे समझाते हैं. उन को मैं ने रात को भी विस्तार से पूरी बात बताई थी. उन्होंने कहा कि सुबह देखते हैं.

‘‘लेकिन सुबह शाहरुख खिड़की से मेरे ऊपर पैट्रोल डाल कर आग लगा कर भाग गया. उस के साथ उस का दोस्त छोटू खान उर्फ नईम खान भी था. मैं ने खिड़की से दोनों को भागते देखा था.

‘‘मैं सिर्फ यही देख पाई कि ब्लू टीशर्ट पहने, हाथ में पैट्रोल की कैन लिए शाहरुख भाग रहा था. ये वही शाहरुख था, जो पिछले 10-15 दिन से मुझे परेशान कर रहा था. मोहल्ले में उसे आवारा किस्म के लड़के के रूप में सब जानते थे. उस का काम सिर्फ लड़कियों को परेशान करना और उन्हें अपने झांसे में ले कर इधरउधर घुमाना होता था.

‘‘जब भी मैं स्कूल या ट्यूशन के लिए जाती, वह मेरा पीछा करता. हालांकि, मैं ने कभी उस की हरकतों को सीरियसली नहीं लिया, लेकिन उस ने कहीं से मेरा मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. उस के बाद वह अकसर मुझे फोन कर के दोस्ती करने का दबाव बनाने लगा.

‘‘शाहरुख ने धमकी भी दी थी कि अगर मैं उस की बात नहीं मानूंगी तो वह मुझे और मेरे परिवार वालों को मार देगा. मुझे उस की हरकतों का अंदेशा तो था, लेकिन यह नहीं समझ पाई कि मेरे साथ ऐसा होगा.

‘‘22 अगस्त की रात को भी उस ने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैं उस की बात नहीं मानूंगी तो वह मुझे मारेगा. मैं ने पापा को यह बात बताई, तब उन्होंने कहा कि सुबह होने के बाद इस मामले का हल निकाला जाएगा.’’

अकिता के बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने उस के 13 वर्षीय भाई से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘23 अगस्त की सुबह करीब 5 बजे मेरी दीदी आग की लपटों में घिरी घर में इधरउधर भाग रही थी और पापा उस के शरीर पर लगी आग को बुझाने के लिए पागलों की तरह चिल्ला रहे थे.

‘‘वह दर्द से चिल्ला रही थी और पापा से बचाने की बारबार गुहार लगा रही थी. मैं और मेरी दादी जो एक साथ बगल के कमरे में सोए हुए थे. हम लोग दीदी की ऐसी हालत देख कर जोरजोर से रोने लगे.’

महिला सुरक्षा को लेकर योगी सरकार अपना रही जीरो टॉलरेंस की नीति

ललितपुर मामले में योगी सरकार ने एसपी और डीएम को सख्‍त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. जिसके चलते बुधवार को एसपी ने आरोपी थानाध्‍यक्ष को सस्‍पेंड कर दिया है. इसके साथ ही पूरा थाना लाइन हाजिर कर दिया गया है. एसओ समेत चार युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच की जा रही है. आरोपियों को पकड़ने के लिए पुलिस टीमें लगातार छापेमारी कर रही हैं. महिलाओं की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध योगी सरकार ने इस मामले में दोषियों को सख्‍त से सख्‍त सजा देने के आदेश दिए हैं.

योगी सरकार महिला सुरक्षा को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है. महिला के खिलाफ होने वाले अपराध के मामले में सख्त कार्रवाई कर रही है. इसके साथ ही महिलाओं और बेटियों को अपनी शिकायतों के लेकर जिला या राज्य मुख्यालय स्तर पर उनको चक्कर काटने न काटने पड़े इसकी तैयारी कर ली गई है.

अब गांव, ब्लॉक और तहसील स्तर पर ही उनकी समस्याओं का समाधान मिलेगा. ब्लॉक, तहसील और थाना दिवसों में प्राथमिकता के आधार पर शिकायतों का समाधान होगा और गुणवत्ता के आधार पर शिकायतकर्ता की संतुष्टि ही आधार मानी जाएगी. महिला बीट पुलिस अधिकारी उनकी समस्‍याओं का निवारण करेंगी.

प्रदेश में सभी ग्राम पंचायतों में  महिला बीट पुलिस अधिकारियों को नियुक्‍त किया गया है. अब थाना दिवस में ये महिला बीट पुलिस अधिकारी महिलाओं से जुड़ी शिकायतों का निवारण करेंगी.

छह मई से शुरू होगा मिशन शक्त‍ि का चौथा चरण

महिला सुरक्षा, सम्‍मान और स्‍वावलंबन के लिए प्रतिबद्ध योगी सरकार के वृहद मिशन शक्ति अभियान के चौथे चरण की शुरूआत छह मई से होने जा रही है. मिशन शक्ति एक नए कलेवर में नजर आएगा.

प्रदेश में महिलाओं और बेटियों के उत्‍थान के और उनके सुरक्षा, सम्‍मान व स्‍वावलंबन के लिए शुरू किए गए इस म‍हाभियान से ग्रामीण व शहरी क्षेत्र की परिवेश से जुड़ी महिलाओं व बेटियों को संबल मिला है. ऐसे में मिशन शक्ति के बेहतर परिणामों के चलते योगी सरकार 2.0 में अभियान को गति देने की कवायद शुरू हो गई है.

महिला कल्याण विभाग के निदेशक मनोज राय ने बताया कि प्रदेश में योगी सरकार के पिछले कार्यकाल में मिशन शक्ति अभियान में सभी जिलों में वृहद जागरूकता अभियान चलाने संग स्‍वर्णिम योजनाओं से बेटियों और महिलाओं को जोड़ा गया था. इस बार भी प्रदेश के अलग अलग विभाग मिशन शक्ति के तहत विशेष कार्यक्रमों को आयोजित कराएंगे.

महिला कल्‍याण विभाग की ओर से अभियान के तहत महिलाओं और बच्‍चों के प्रति हिंसा से जुड़े विभिन्‍न कानूनों व प्रावधानों के बारे में लोगों जागरूक करने का कार्य सभी जिलों में किया जाएगा. जिसमें महिलाओं और बच्‍चों के साथ होने वाले उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, नशे में मारपीट, तस्करी, बाल विवाह,भेदभाव, बालश्रम अन्‍य शोषणों के विरूद्ध विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा.

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