बदचलनी का ठप्पा – भाग 3: क्यों भागी परबतिया घर से?

‘‘किसी की घरवाली कोई दूसरा खसम कर ले, तो इस में हम क्या करें?’’

देवेंद्रजी थोड़ा नाराज हो कर बोले, ‘‘क्या सभी की समस्याएं सुलझाने का हम ने ठेका ले रखा है? किसी से अपनी घरवाली नहीं संभाली जाती तो कोई क्या करेगा?’’ भीड़ ने अर्जुन महतो की ओर देखा, देवेंद्रजी शायद ठीक ही कह रहे हैं. अर्जुन ने शर्म से अपना सिर झुका लिया.

‘‘वही तो हम भी कह रहे हैं,’’ बलदेव प्रसाद बोला, ‘‘पार्वती के रंगढंग कई दिनों से ठीक नहीं चल रहे थे. मैं ने सुना तो मैं ने समझाया भी था अर्जुन को. समझाना फर्ज बनता था हमारा. है कि नहीं अर्जुन?’’

अर्जुन ने रजामंदी में अपना सिर हिलाया.

‘‘बलदेवा, तुम चाहे जो करवा दो यहां,’’ देवेंद्रजी ने फिर मजाक किया, ‘‘बेचारी धनिया को भी लुटवा दिए थे ऐसे ही,’’ भीड़ फिर हंस पड़ी. बलदेव प्रसाद झेंपने का नाटक करते हुए बोला, ‘‘आप तो मजाक करने लगे. मुझे क्या पड़ी है कि मैं हर जगह टांग अड़ाऊं. वह तो ऐसे गरीबों का दुख नहीं देखा जाता इसीलिए. अब देखिए न, परबतिया गई सो गई, साथ में गहनेकपड़े, रुपयापैसा सबकुछ ले गई. अब इस बेचारे अर्जुन का क्या होगा?’’ ‘‘हां… माईबाप…’’

अर्जुन महतो फिर सिसकने लगा. देवेंद्रजी नाराजगी से बोले, ‘‘मरो भूखे अब. ये लोग अपनी सब कमाई तो खिला देते हैं ब्याज वालों को या दारू पी कर उड़ा देते हैं. चंदा भी देंगे तो दूसरे नेताओं को. और अब घरवाली भाग गई तो चले आए मेरे पास. जैसे देवेंद्र सब का दुख दूर करने का ठेका ले रखे हैं.’’

‘‘वही तो मैं भी कहता हूं,’’ बलदेव प्रसाद ने कहा, ‘‘लेकिन, ये लोग मानते कहां हैं. और अगर घरवाली खूबसूरत हुई तो हवा में उड़ने लगते हैं. वह तो आप जैसे दयालु हैं, जो सब सहते हैं.

पर सच पूछिए, तो एक गरीब के साथ ऐसी ज्यादती भी तो देखी नहीं जाती. आप के रहते यहां यह सब हो, यह तो अच्छी बात नहीं है न?’’ बलदेव प्रसाद के चेहरे पर देवेंद्रजी के लिए तारीफ के भाव थे. भीड़ ने सोचा कि देवेंद्रजी हैं तो कोई न कोई रास्ता जरूर निकालेंगे. अर्जुन को घबराना नहीं चाहिए. वह सही जगह पर आया है. ‘‘यही मस्का मारमार कर तो तुम ने हमें बरबाद करवा दिया है बलदेवा,’’ देवेंद्रजी मानो बलदेव को मीठा उलाहना देते हुए बोले. ‘‘खैर, यह तो बताओ कि अर्जुन और पार्वती की शादी को कितने दिन हुए थे?’’ उन्होंने जैसे भीड़ से सवाल किया. अर्जुन को कुछ उम्मीद बंधी.

देवेंद्रजी मामले में दिलचस्पी लेने लगे हैं. बस, वह एक बार हाथ तो धर दें सिर पर, फिर तो उस गया प्रसाद की ऐसीतैसी… यह सोच कर अर्जुन का खून जोश मारने लगा. बलदेव प्रसाद बोला, ‘‘अरे, भली कही आप ने. यही तो मुसीबत है. इस ने अगर परबतिया से शादी की ही होती तो वह भागती क्यों? पर यहां तो फैशन है. या तो रिश्ता बना लेते हैं या खूबसूरत औरत के मांबाप को 200-400 रुपए  दे कर उस औरत को घर बैठा लेते हैं. तभी तो…’’ अर्जुन ने बलदेव प्रसाद की बात का विरोध करना चाहा. वह चीखचीख कर कहना चाहता था कि पार्वती उसी की ब्याहता है, पर उस के बोलने के पहले ही देवेंद्रजी बोल पड़े, ‘‘तब तो मामला हाथ से गया, समझो. जब ब्याह नहीं रचाया तो कहां की घरवाली और कैसी परबतिया? कौन मानेगा भला?  ‘‘अरे, मैं कहता हूं कि परबतिया अर्जुन की घरवाली नहीं थी.

तो है कोई माई का लाल, जो यह दावा करे?’’ देवेंद्रजी ने जैसे भीड़ को ललकार दिया था.  भीड़ में सनाका खिंच गया. यह तो सोचने वाली बात है. क्या दावा है अर्जुन के पास? बेचारा अब क्या करे? कहां से लाए अपनी और परबतिया की शादी का कागजी सुबूत? ‘‘तभी तो मैं भी कहता हूं कि अब कौन गया प्रसाद जैसे बदमाश से कहने जाए कि उस ने बड़ा गलत किया है. सभी जानते हैं कि वह कैसा आदमी है?’’ बलदेव प्रसाद ने कहा. ‘‘हांहां, जाओ,’’ देवेंद्र तैश में आ कर बोले,

‘‘कौन सा मुंह ले कर जाओगे उस बदमाश के घर? लाठी मार कर घर से निकाल न दे तो कहना.

‘‘अपने ऊपर हाथ भी नहीं धरने देगा वह बदमाश. क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूं, बलदेवा?’’ उन्होंने बलदेव प्रसाद की ओर देखा. ‘‘अरे, आप और गलत बोलेंगे?’’

चमचागीरी करते हुए बलदेव प्रसाद ने नहले पर दहला मारा, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. वह बदमाश गया प्रसाद तो मुंह पर कह देगा कि किस की बीवी और कैसी परबतिया? खुलेआम दावा करेगा कि यह तो मेरी बीवी है.

ज्यादा जोर लगाएंगे तो जमा देगा 2-4 डंडे. इस तरह अपना सिर भी फुड़वाओ और हाथ भी कुछ न आए.’’ देवेंद्रजी अपने दाहिने हाथ बलदेव प्रसाद की बातों से मन ही मन खुश हुए. भीड़ को भी लगा कि बलदेव प्रसाद की बातों में दम है. गया प्रसाद जैसे गुंडे से उलझना आसान काम नहीं.  अर्जुन फिर एक बार मानो किसी अंधेरी कोठरी में छटपटाने लगा. ‘तो क्या अब कुछ नहीं हो सकता?’

मन ही मन उस ने सोचा. अब देवेंद्रजी ने सधासधाया तीर चलाया,

‘‘भाइयो, एक मिनट के लिए मान भी लें कि गया प्रसाद कुछ नहीं कहेगा. पर क्या पार्वती ताल ठोंक कर कह सकती है कि वह अर्जुन की घरवाली है और गया प्रसाद उसे बहका कर लाया है? ‘‘बोलो लोगो, क्या ऐसा कह पाएगी परबतिया? क्या उस की अपनी मरजी न रही होगी गया प्रसाद के साथ जाने की? वह कोई बच्ची तो है नहीं, जो कोई उसे बहका ले जाए?’’

भीड़ फिर प्रभावित हो गई देवेंद्रजी से. कितनी जोरदार धार है उन की बातों में? सभी बेचारे अर्जुन के बारे में सोचने लगे. लगता है, बेचारा अपनी घरवाली को सदा के लिए गंवा ही बैठा.

देवेंद्रजी ठीक ही तो कह रहे हैं. क्या परबतिया की अपनी मरजी न रही होगी? अब तो अर्जुन को उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिए. भूल जाए पार्वती को. जिंदगी रहेगी तो उस जैसी कई मिल जाएंगी.

बलदेव प्रसाद ने देवेंद्रजी की हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं. यह औरत जात ही आफत की पुडि़या है. और यह अर्जुन तो बेकार रो रहा है ऐसी धोखेबाज और बदचलन औरत के लिए.’’

यह क्या सुन रहा था अर्जुन? परबतिया और बदचलन? नहीं, वह ऐसी औरत नहीं है. अर्जुन ने सोचा. फिर उस के मन में चोर उभरा. पार्वती उस का घर छोड़ कर गई ही क्यों? क्या कमी थी उस को? क्या नहीं किया उस ने पार्वती के लिए? फिर भी धोखा दे गई. जगहंसाई करा गई.

बदचलन कहीं की.  अर्जुन के मन में गुस्सा उमड़ने लगा. वह कुलटा मिल जाए तो वह उस का गला ही घोंट दे. पर कैसे करेगा ऐसा वह? जिन हाथों से उस ने परबतिया को प्यार किया, क्या उन्हीं हाथों से वह उस का गला दबा पाएगा? और परबतिया नहीं रहेगी तो उस के मासूम बच्चे का क्या होगा?

बच्चे का मासूम चेहरा घूम गया अर्जुन की आंखों में. कितना प्यार करता था वह अपने बच्चे को. कोयला खदान की हड्डीतोड़ मेहनत के बाद जब वह घर लौटता तो अपने बच्चे को गोद में उठाते ही उस की थकान दूर हो जाती. एक हूक सी उठी उस के मन में. बीवी भी गई, बच्चा भी गया. वह फिर पिघलने लगा. गुस्सा आंसू बन कर दोगुने वेग से बह चला था.

इस बार देवेंद्रजी ने अर्जुन को ढांढस देते हुए कहा, ‘‘अर्जुन रोओ मत. रोने  से तो समस्या सुलझेगी नहीं, इंसाफ अभी एकदम से नहीं उठा है धरती से. पुलिस है, अदालत है, कचहरी है. कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा, ताकि तुम्हें इंसाफ मिले.’’ बलदेव प्रसाद ने उन्हें टोका, ‘‘नहीं, नहीं. आप को ही कुछ करना पड़ेगा. पुलिस को तो आप जानते ही हैं.

वह दोनों तरफ से खापी कर चुप्पी मार जाएगी, इसलिए आप ही कोई उपाय बताइए.  ‘‘गया प्रसाद जैसा अकेला बदमाश यहां की जुझारू जनता को नहीं हरा सकता. हमें ऐसे लोगों को रोकना है और जोरजुल्म से इन गरीबों की हिफाजत करनी है.’’

पति परदेस में तो फिर डर काहे का – भाग 3

सूचना मिलते ही गोंडा थानाप्रभारी सुभाष यादव पुलिस टीम के साथ गांव पींजरी के लिए रवाना हो गए. तब तक घटनास्थल पर गांव के सैकड़ों लोग एकत्र हो चुके थे. थानाप्रभारी ने भीड़ को अलग हटा कर लाश देखी. तत्पश्चात उन्होंने इस हत्या की सूचना अपने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी और प्रारंभिक काररवाई में लग गए.

थोड़ी देर में एसपी ग्रामीण संकल्प शर्मा और क्षेत्राधिकारी पंकज श्रीवास्तव भी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. लाश के मुआयने से पता चला कि दिव्या की हत्या उस खेत में नहीं की गई थी, क्योंकि लाश को वहां तक घसीट कर लाने के निशान साफ नजर आ रहे थे. मृत दिव्या के शरीर पर चाकुओं के कई घाव मौजूद थे.

जब जांच की गई तो जहां लाश पड़ी थी, वहां से 300 मीटर दूर पुलिस को डालचंद के खेत में हत्या करने के प्रमाण मिल गए. ढालचंद के खेत में लाल चूडि़यों के टुकड़े, कान का एक टौप्स, एक जोड़ी लेडीज चप्पल के साथ खून के निशान भी मिले.

जांच चल ही रही थी कि डौग एक्वायड के अलावा फोरेंसिक विभाग के प्रभारी के.के. मौर्य भी अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल से बरामद कान के टौप्स और चप्पलें मृतका दिव्या की ही थीं. जबकि लाल चूडि़यों के टुकड़े उस के नहीं थे. इस से यह बात साफ हो गई कि दिव्या की हत्या में कोई औरत भी शामिल थी. डौग टीम में आई स्निफर डौग गुड्डी लाश और हत्यास्थल को सूंघने के बाद सीधी दिव्या के घर तक जा पहुंची. इस से अंदेशा हुआ कि दिव्या की हत्या में घर का कोई व्यक्ति शामिल रहा होगा.

पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पंचनामा भर कर दिव्या की लाश को पोस्टमार्टम के लिए अलीगढ़ भिजवा दिया गया. पूछताछ में दिव्या के परिवार से किसी की दुश्मनी की बात सामने नहीं आई. अब सवाल यह था कि दिव्या की हत्या किसने और किस मकसद के तहत की थी.

हत्या का यह मुकदमा उसी दिन थाना गोंडा में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत दर्ज हो गया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम दिव्या का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

दूसरे दिन थानाप्रभारी ने महिला सिपाहियों के साथ पींजरी गांव जा कर व्यापक तरीके से पूछताछ की. दिव्या की तीनों चाचियों से भी पूछताछ की गई. सुभाष यादव अपने स्तर पर पहले दिन ही दिव्या की हत्या की वजह के तथ्य जुटा चुके थे. बस मजबूत साक्ष्य हासिल कर के हत्यारों को पकड़ना बाकी था.

दिव्या की सब से छोटी चाची मोना से जब चूडि़यों के बारे में सवाल किया गया तो उस ने बताया कि वह चूड़ी नहीं पहनती, लेकिन जब तलाशी ली गई तो उस के बेड के पीछे से लाल चूडि़यां बरामद हो गईं, जो घटनास्थल पर मिले चूडि़यों के टुकड़ों से पूरी तरह मेल खा रही थीं. सुभाष यादव का इशारा पाते ही महिला पुलिस ने मोना को पकड़ कर जीप में बैठा लिया. पुलिस उसे थाने ले आई.

थाने में थानाप्रभारी सुभाष यादव को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. मोना ने हत्या का पूरा सच खुद ही बयां कर दिया. सच सामने आते ही बिना देर किए गांव जा कर मोना के प्रेमी सोनू को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सोनू के अलावा नगला मोनी के रहने वाले मनीष को भी धर दबोचा गया. दोनों को थाने ला कर पूछताछ के बाद हवालात में डाल दिया गया. दिव्या हत्याकांड के खुलासे की सूचना एसपी ग्रामीण संकल्प शर्मा और सीओ इगलास पंकज श्रीवास्तव को दे दी गई.

दोनों अधिकारियों ने थाना गोंडा पहुंच कर थानाप्रभारी सुभाष यादव को शाबासी देने के साथ अभियुक्तों से खुद भी पूछताछ की.

पूछताछ में मोना के साथ उस के प्रेमी सोनू व उस के दोस्त ने जो कुछ बताया वह कुछ इस तरह था-

दिव्या ने सोनू को मोना के साथ शारीरिक संबंध बनाते देख लिया था. उस ने चाचा के घर लौटने पर उसे सब कुछ सचसच बता देने की बात भी कही थी. उस समय बात खत्म जरूर हो गई थी. फिर भी डर यही था कि बाल बुद्धि की दिव्या ने अगर यह बात जयकिंदर को बता दी तो उस का क्या हश्र होगा, इसी से चिंतित मोना व सोनू ने योजना बनाई कि जयकिंदर के आने से पहले दिव्या की हत्या कर दी जाए.

दिव्या हर रोज मोना के साथ ही सोती थी और अलसुबह चाची के साथ दौड़ लगाने जाती थी. कभीकभी वह दौड़ने के लिए वहीं रुक जाती थीं. जब कि मोना अकेली लौट आती थी. दिव्या को दौड़ का शौक था, ये बात घर के सभी लोग जानते थे. इसी लिए हत्या में मोना का हाथ होने की संभावना नहीं मानी जाएगी, यह सोच कर मोना ने सोनू के साथ योजना बना डाली, जिस में सोनू ने दूसरे गांव के रहने वाले अपने दोस्त मनीष को भी शामिल कर लिया.

26 दिसंबर को सोनू व मनीष पहले ही वहां पहुंच गए. मोना दिव्या को ले कर जब डालचंद के खेत के पास पहुंची तो घात में बैठे सोनू और मनीष ने दिव्या को दबोच कर चाकुओं से वार करने शुरू कर दिए. दिव्या ने बचने के लिए मोना का हाथ पकड़ा, जिस से उस के हाथ से 2 चूडि़यां टूट कर वहां गिर गईं. हत्यारे उसे खींच कर खेत में ले गए, जहां गर्दन काट कर उस की हत्या कर डाली. इसी छीनाझपटी में दिव्या के कान का एक टौप्स भी गिर गया था और चप्पलें भी पैरों से निकल गई थीं.

दिव्या की हत्या के बाद ये लोग लाश को खींचते हुए लगभग 300 मीटर दूर गजेंद्र के खेत में ले गए. इस के बाद सभी अपनेअपने घर चले गए.

हत्यारा कितना भी चतुर हो फिर भी कोई न कोई सुबूत छोड़ ही जाता है. जो पुलिस के लिए जांच की अहम कड़ी बन जाता है. ऐसा ही साक्ष्य मोना की चूडि़यां बनीं, जिस ने पूरे केस का परदाफाश कर दिया.

वर्मा मलिक : दो सरनेम वाला एक शानदार गीतकार

आप ने ‘राष्ट्रीय गान’ के बारे में तो खूब सुना होगा, पर अगर आप से ‘बरात गान’ के बारे में पूछा जाए कि वह कौन सा गाना है, जो हर बरात में जरूर बजता है, तो यकीनन आप सिर खुजाते हुए कहेंगे कि गाने तो बहुत से हैं, लेकिन शायद ही ऐसी कोई बरात होगी, जिस में ‘आज मेरे यार की शादी है…’ गाना न बजा हो. बराती फरमाइश कर के बैंड वालों से इस गाने की धुन बजवाते हैं और फिर जम कर नाचते हैं.

इस ‘बरात गान’ को लिखा किस ने था? यह हमारा दूसरा सवाल है. दरअसल, आज हम आप को ऐसी शख्सीयत से मिलवा रहे हैं, जिन के 2 गाने हर शादीब्याह में जरूर बजते हैं. पहला गाना फिल्म ‘आदमी सड़क का’ से ‘आज मेरे यार की शादी…’ है और दूसरा गाना फिल्म ‘जानी दुश्मन’ से ‘चलो रे डोली उठाओ कहार’ है. गीतकार का नाम है वर्मा मलिक. पर यह अजीब सा उन का असली नाम नहीं है.

वर्मा मलिक 13 अप्रैल, 1925 को भारत के उस फिरोजपुर हिस्से में जनमे थे जो आज का पाकिस्तान है. इन के मांबाप ने नाम रखा था बरकत राय. और इस पूत के पांव पालने में ही दिखने लगे थे, क्योंकि इन्होंने छोटी सी उम्र में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं.

चूंकि तब भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तो बरकत राय कांग्रेस के सदस्य बन गए थे. स्कूल में पढ़ाई के दिनों वे अंगरेजों के खिलाफ कांग्रेस के जलसों और सभाओं में देशभक्ति के गीत गाते थे. इस दौरान उन्हें जेल भी हुई थी, लेकिन उम्र कम होने की वजह से वे रिहा कर दिए गए थे.

साल 1947 में जब भारत 2 हिस्सों में बंटा तो बरकत राय दंगों के दौरान जख्मी भी हुए थे और अपने परिवार के साथ जान बचा कर किसी तरह दिल्ली पहुंचे थे. दिल्ली में संगीतकार हंसराज बहल के भाई बरकत राय के काफी नजदीकी दोस्त थे. उन्होंने ही बरकत राय को मुंबई जाने की सलाह दी थी.

बरकत राय ने इस सलाह पर अमल किया और उन्हें फिल्मों में पहला मौका संगीतकार हंसराज बहल ने पंजाबी फिल्म ‘चकोरी’ में दिया था. जब बरकत राय का नाम पंजाबी फिल्मों में चमकने लगा तो उन्होंने कुछ दोस्तों की सलाह पर अपना नाम बरकत राय से बदल कर वर्मा मलिक रख लिया था.

वर्मा मलिक ने तकरीबन 40 पंजाबी फिल्मों में गीत और 3 फिल्मों में संवाद लिखे थे. उन्होंने कुछ फिल्मों का डायरैक्शन भी किया था. पर 60 के दशक में पंजाबी फिल्में बननी कम हो गईं तो वर्मा मलिक को काम मिलना बंद हो गया था.

मनोज कुमार का उपकार

बेरोजगारी के दिनों में जब वर्मा मलिक मनोज कुमार से मिले, तब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म ‘उपकार’ के लिए उन से एक गाना ‘एक तारा बोले…’ लिखवाया, पर पूरी फिल्म में उस गाने की सिचुएशन नहीं बन पाई तो वे उसे इस्तेमाल नहीं कर पाए, पर उन्होंने उस गाने को संभाल कर रख लिया था.

इस के बाद मनोज कुमार ने फिल्म ‘यादगार’ बनाई, तो उन्होंने इस गाने को कुछ बदलाव के बाद फिल्म में इस्तेमाल किया. ‘बातें लंबी मतलब गोल, खोल न दे कहीं सब की पोल, तो फिर उस के बाद इकतारा बोले तुनतुन…’ नामक यह गीत सुपरहिट साबित हुआ.

इस कामयाबी के बाद वर्मा मलिक ने भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और एक के बाद एक उन की कई फिल्मों के गाने सुपरहिट हुए. ‘पहचान’, ‘बेईमान’, ‘अनहोनी’, ‘धर्मा’, ‘कसौटी’, ‘विक्टोरिया नंबर 203’, ‘नागिन’, ‘चोरी मेरा काम’, ‘हमतुम और वो’, ‘जानी दुश्मन’, ‘शक’, ‘दो उस्ताद’, ‘कर्तव्य’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संतान’, ‘बेरहम’, ‘हुकूमत’, ‘एक से बढ़ कर एक’ जैसी कई फिल्मों में वर्मा मलिक ने हिट गाने लिखे.

वर्मा मलिक को 2 बार ‘फिल्मफेयर अवार्ड’ मिला था. पहली बार फिल्म ‘पहचान’ के गीत ‘सब से बड़ा नादान वही हैं…’ के लिए और फिर फिल्म ‘बेईमान’ के गीत ‘जय बोलो बेईमान की…’ के लिए.

वर्मा मलिक ने अपने फिल्मी कैरियर में शंकरजयकिशन, कल्याणजीआनंदजी, लक्ष्मीकांतप्यारेलाल, सोनिकओमी, जयदेव, आरडी बर्मन, बप्पी लाहिरी, चित्रगुप्त और राम लक्ष्मण जैसे संगीतकारों की धुनों पर शानदार गीत लिखे थे. संगीतकार सोनिकओमी के साथ उन की जोड़ी खूब जमी थी. उन्होंने तकरीबन 35 फिल्मों में एक साथ काम किया था.

साल 1976 में आई फिल्म ‘नागिन’ और साल 1979 में आई फिल्म ‘जानी दुश्मन’ और ‘कर्तव्य’ में लिखे वर्मा मलिक के गाने जैसे ‘तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना’, ‘तेरे इश्का का मुझ पे हुआ ये असर’, ‘तेरे हाथों में पहना के चूड़ियां’, ‘ले मैं तेरे वास्ते सब छोड़ के’, ‘कोई आएगा, लाएगा दिल का चैन’, ‘चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा’ ने लोगों के दिलों में जगह बना ली थी.

15 मार्च, 2009 में जुहू, मुंबई में 84 साल की उम्र में बरकत राय उर्फ वर्मा मलिक यह दुनिया छोड़ कर चले गए थे..

मन की बात का 100वां एपिसोड: नाकामियों पर परदा गिराने का भ्रमजाल

भाजपा का प्रचारतंत्र कितना मजबूत है, इस का एक और नमूना रविवार, 30 अप्रैल को देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के 100 एपिसोड पूरे हो गए. पिछले कुछ सालों में नयी सरकारों को 100 दिन का जश्न मनाते देखा गया है.

जनता तो 5 साल का जनादेश देती है, लेकिन सरकारें अब शायद खुद को इतना कमजोर समझने लग गई हैं कि 100 दिन पूरे होने पर ही खुश हो जाती हैं. और अब ये देखना ही बाकी रह गया था कि प्रधानमंत्री के रेडियो कार्यक्रम के 100 एपिसोड होने पर उत्सव मनाया जाए.

अक्टूबर 2014 से शुरु हुआ यह सिलसिला दूसरी बार 2019 में मिली जीत के बाद भी जारी रहा, तो जाहिर है कि इसके सौ एपिसोड होने ही थे. लेकिन अभी कई तरह की मुश्किलों से गुजर रही भाजपा ने इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश में कई प्लेटफार्म्स पर इसका लाइव प्रसारण हुआ. वैसे ही जैसे आधी रात को जीएसटी लागू करने की घोषणा की गई थी और इसके लिए संसद को वैसे ही सजाया गया था, मानो देश को आजादी मिली हो.

स्वतंत्रता आंदोलन में तो संघ से जुड़े लोगों ने रत्तीभर योगदान नहीं दिया, अब उन के वारिस इस कोशिश में लगे हैं कि जनता को यकीन दिला सकें कि उन से बढ़ कर देशभक्त कोई नहीं है और देश को असली आजादी उन के कर्मों से मिल रही है.

प्रधानमंत्री मोदी मन की बात में मोटिवेशनल स्पीकर यानी सकारात्मक विचारों की सीख देने वाले उपदेशक की तरह बात करते हैं. अच्छी बातों के प्रचारप्रसार में कोई बुराई नहीं है. लेकिन इस काम के लिए और भी बहुत से लोग हैं. सोशल मीडिया पर करियर मार्गदर्शन से ले कर प्रेम में मिली निराशा को कैसे दूर किया जाए और दफ्तर के तनाव को कैसे कम किया जाए तक, कई किस्म की समस्याओं पर ज्ञान देने वाले भरे पड़े हैं.

जब सोशल मीडिया नहीं था, तब भी आप जीत सकते हैं, जैसी किताबें थोक में बिका करती थीं. रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर इन के बहुत ग्राहक मिल जाते हैं. इन से काम न बने, तो देश में कई तरह के बाबाओं की धार्मिक दुकानें ठाठ से चलती हैं, जहां लोग अपनी पीड़ाओं को ले कर पहुंचते हैं और चमत्कार का इंतजार करते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री अगर 100 हफ्तों से उपदेश न भी देते, तो इस देश पर कोई फर्क नहीं पड़ता. अलबत्ता मन की बात करने की जगह अगर वे लोगों के मन को टटोलते तो देश कई मामलों में बेहतर स्थिति में होता.

अपने 100वें एपिसोड में प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा के सुनील जगलान की बात की, जिन्होंने सेल्फी विद डॉटर अभियान शुरु किया. जो राज्य लैंगिक असमानता से जूझ रहा हो, वहां अपनी बेटी के साथ सेल्फी ले कर उसे गर्व का विषय बताना अच्छी बात है. मोदी ने उन का जिक्र करते हुए कहा कि इस अभियान ने मुझे बहुत आकर्षित किया, क्योंकि इस में मुख्य बिंदु बेटियां हैं.

प्रधानमंत्री जब ये कह रहे थे, तब क्या उन्हें जंतरमंतर पर बैठी बेटियों की याद नहीं आई, जो अपने साथ हुए एक गंभीर अपराध पर इंसाफ की मांग कर रही हैं. यह कैसा दोहरा रवैया है कि बेटियों के साथ सेल्फी खिंचाना तो अच्छा लग रहा है, लेकिन बेटियों की सुरक्षा पर एक लफ्ज नहीं कहा जा रहा, सिर्फ इसलिए क्योंकि जिस पर आऱोप लग रहे हैं, वो आप की पार्टी का एक बलशाली सांसद है.

मन की बात के श्रोताओं और उस के प्रभाव को ले कर एक सर्वे भी आकाशवाणी और आईआईएम रोहतक ने किया है, जिस में पता चला है कि 96 प्रतिशत जनता इस के बारे में जानती है और 23 करोड़ लोग इसे सुनते हैं. सर्वे में लोगों ने ये भी कहा है कि प्रधानमंत्री ज्ञानी हैं.

अब सवाल ये है कि ऐसे किसी सर्वे का क्या औचित्य. टीवी चैनलों में टीआरपी की होड़ रहती है, क्योंकि वहां कई खिलाड़ी मैदान में हैं. लेकिन देश में तो मन की बात करने वाले अकेले मोदी ही हैं. देश के प्रधानमंत्री हैं, तो जाहिर है उन के मासिक कार्यक्रम के बारे में लोगों को पता ही होगा. भाजपा को तो इस बात की चिंता करनी चाहिए कि इतने प्रचारप्रसार के बावजूद 4 प्रतिशत लोगों को इस बारे में पता क्यों नहीं है.

130 करोड़ की आबादी में केवल 23 करोड़ लोग ही मन की बात को सुनते हैं, तो इस से यही पता चलता है कि लोग अपनी दिक्कतों और उन के समाधान के बारे में सुनने की इच्छा रखते हैं, और मन की बात में तो वास्तविक समस्याओं पर कोई बात ही नहीं होती. शायद इसलिए लगभग 100 करोड़ लोग इस कार्यक्रम को नहीं सुनते हैं.

रहा सवाल प्रधानमंत्री के ज्ञानी होने का है, तो क्या इसे एक तथ्य के तौर पर इसलिए स्थापित किया जा रहा है, क्योंकि उन की डिग्री को ले कर संदेह खड़े किए जाते रहे हैं. क्योंकि इस से पहले तो किसी प्रधानमंत्री पर ऐसे सवाल नहीं किए गए.

एक लोकतांत्रिक देश में, जनता के धन से संचालित सार्वजनिक प्रसार संस्था का इस्तेमाल प्रधानमंत्री अपने मन की बात करने के लिए कर रहे हैं, यह गलत मिसाल देश में पड़ी. आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि की स्थापना देश में कृषि कार्यों में गुणात्मक सुधार और शिक्षा के प्रचारप्रसार के लिए की गई थी. जागरुकता के प्रसार के साथसाथ बाद में इस का इस्तेमाल जनता तक स्वस्थ मनोरंजन पहुंचाने के लिए किया गया.

देश के कोनेकोने तक आकाशवाणी और दूरदर्शन की तरंगें पहुंचाई गईं, इस से देश को एक सूत्र में बांधने में मदद मिली. प्रधानमंत्री मोदी अगर ऐसी ही कोई पहल करते तो उस का स्वागत होता. मगर अफसोस उन्होंने इस महत्वपूर्ण, शक्तिशाली साधन को अपने प्रचार के लिए इस्तेमाल किया.

उन के मन की बात में न महिला सुरक्षा की बात है, न बेरोजगारी या महंगाई की, न आत्महत्या के बढ़ते प्रकरणों की, न किसानों या मजदूरों की दिक्कतों का जिक्र है. एक आभासी सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश है, जैसा 8-10 दिनों के ध्यान शिविरों में किया जाता है. वहां वास्तविक समस्याओं से मुंह मोड़ कर गहरी सांस खींच कर हर मुश्किल से निकलने का भरम बनाया जाता है. देश फिलहाल ऐसी ही गहरी सांस लिए किसी चमत्कार की आशा में बैठा मन की बात होते देख रहा है.

सलमान खान के करीबी का हुआ निधन, शेयर किया इमोशनल पोस्ट

इन दिनों सलमान खान अपनी फिल्म किसी का भाई किसी की जान को लेकर सुर्खियो में बने हुए है लेकिन इस बार उनकी चर्चा में आने की वजह उनका एक पोस्ट है जिसमें वह अपनी करीबी को श्रद्धांजली देते हुए नजर आ  रहा है जी हां, सलमान खान इंस्टा पर काफी एक्टिव रहते है ऐसे में उनकी एख करीबी का देहांत हो गया है जिसकी तस्वीर शेयर कर उन्होंने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजली दी है जो कि पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहा है.

 

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आपको बता दें, कि एक अद्दू नाम की महिला सलमान खान के बेहद ही करीबी दोस्त थी, जिनका हाल ही में देहांत हो गया है इसकी जानकारी देर रात इंस्टा पर पोस्ट करके दी है जो कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है वही, सलमान खान के फैंस इस पोस्ट को देखकर काफी दुखी नजर आ रहे है सभी इमोशनल पोस्ट को देखकर कमेंट कर रहे है.  वही, सलमान खान ने पोस्ट करते हुए कैप्शन भी दिया है और लिखा है कि ‘मेरी प्यारी अद्दू आपके प्यार उस प्यार और सपोर्ट के लिए शुक्रिया जो आपने मुझे दिया जब मैं बड़ा हो रहा था।’ सलमान खान ने अद्दू की एक फोटो भी शेयर की है। सलमान खान की ये पोस्ट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है। सलमान खान की इस पोस्ट उनके फैंस भी अद्दू को श्रद्धांजली देते हुए नजर आ रहे है। इसके अलावा इस महिला को लेकर सावल पूछते हुए नजर आए। कई यूजर्स ने पूछा ये महिला कौन है?

 

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फिल्म ‘किसी का भाई किसी की जान’ एक्टर सलमान खान की इस पोस्ट के सामने आने के बाद लोग ये जानना चाहते है वो महिला कौन है जिसे भाईजान श्रद्धांजली देते हुए दिखाई दे रहे हैं. लोगों के इस सावल का जवाब भाईजान के फैंस कमेंट बॉक्स में देते हुए नजर आ आए. किसी ने बताया कि अद्दू सलमान खान की नैनी थी. तो किसी ने कहा कि अद्दू सलमान खान की केयर टेकर थीं. जानकारी के लिए बता दें कि इसको लेकर कोई अधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है कि अद्दू सलमान खान की ये क्या लगती हैं.

YRKKH: विलेन बनेंगी आरोही की बेटी रूही, दिखाएंगी अपना असली चेहरा!

ये रिश्ता क्या कहलाता है इऩ दिनों हिट चल रहा है शो की कहानी में नया मोड़ आ गया है जिसकी वजह से ये दर्शकों के दिलों पर छाया हुआ है शो में अबतक अभि -अबीर के साथ समय बीता रहा है वहीं शो की कहानी अबीर और रुही के ईद-गिर्द घूमती नजर आ रही है. शो ने दर्शकों को 14 साल से अपना दिवाना बनाया हुआ अब ये ट्विस्ट देख दर्शक शो मे अपकमिंग एपिसोड में क्या होने वाला ये जानने से खुद को रोक नहीं पा रहे है.

आपको बता दें, कि समर कैंप में अभिमन्यु अबीर के साथ ज्यादा समय बिता रहा है और यह सब रूही को पसंद नहीं आ रहा. यह सब अक्षरा और आरोही अच्छे से नोटिस भी कर रही है, लेकिन अभि कुछ नहीं समझ रहा. बीते एपिसोड में देखने के लिए मिला था कि समर कैंप में हो रहे टास्क में अबीर और अभिमन्यु एक टीम में होते हैं. अपकमिंग एपिसोड में देखने के लिए मिलेगा कि अबीर और अभि साथ मिलकर गार्डन में नया पौधा लगाते हैं और आरोही ये सब बहुत ध्यान से देख रही होती है. वह बार-बार सोचती है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो ये दोनों और पास हो जाएंगे. इस दौरान रूही, अक्षरा और अभिनव के पास होती है, लेकिन वह टास्क में ध्यान नहीं देती.

 

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कहानी में आगे देखने के लिए मिलेगा कि जब अभिमन्यु किसी काम से अबीर के पास से जाता है, तब वहीं रूही आ जाती है और अपनी मां से पूछती है कि पॉपी कहां है? इस दौरान रूही के हाथ में हल्का सा स्क्रैच लगा होता है, जिसे देख अबीर कहता है कि यह बहुत छोटा है. इस बात पर रूही भी जवाब देती है कि मेरे पॉपी मुझे हल्का सा भी स्क्रैच नहीं लगते देते. तभी अचानक अबीर के हाथ में हल्की सी चोट लगती है और अपने बेटे की आवाज सुनकर अभि भागकर आ जाता है और अपने बेटे का हाथ देखने लगता है. यह सब देखकर रूही भड़क जाएगी.

रूही करेंगी बड़ा तमाशा

 

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ये रिश्ता क्या कहलाता है में आगे देखने के लिए मिलेगा कि अभिमन्यु और अबीर यह टास्क जीत जाते हैं, जिस वजह से अभि अपने बेटे को कंधे पर बैठाकर जमकर डांस करता है. यह सब रूही से बर्दाश्त नहीं होता और वह आगे आकर जबरदस्ती अबीर को अपने पॉपी को कंधे से उतारती है. इस दौरान वह अबीर को धक्का भी देती है, जिस वजह से काफी तमाशा होता है. इसके बाद, जब रूही आरोही को कहती है कि उसे अपने पुराने वाले पॉपी चाहिए, तो वह अपनी बेटी से कहती है कि तुम्हें खुद जाकर अपने पॉपी से बात करनी चाहिए. दूसरी तरफ, अक्षरा भी अभिमन्यु से बात करने का सोचती है.

एक थी मां- भाग 3: कहानी एक नौकरानी की

मेरे आते ही गोलू का पास के ही एक नर्सरी स्कूल में एडमिशन करा दिया गया था. गोलू को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए मैं ही जाती थी.

वह जब मुझे प्यार से अपनी आवाज में ‘कश्मीरा दीदी’ कहता था, तो सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगता था. गोलू को देख कर मुझे बारबार मेरे अपने भाई अमर की याद आती रहती थी. पता नहीं, अब वह घर में अकेले कैसे रहता होगा.

साकेत अंकल ने गोलू को घर पर पढ़ाने के लिए एक टीचर रख लिया था. आंटी के कहने पर वे टीचर मुझे भी पढ़ाने लगे थे. मैं भी मन लगा कर पढ़ने लगी थी.

समय बीतता रहा. कैसे 2 साल बीत गए, कुछ पता ही नहीं चला. अब तो मुझे कभी एहसास भी नहीं होता था कि मैं इस घर की नौकरानी हूं. मैं भी घर के एक सदस्य की तरह वहां रह रही थी.

मैं सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही हर साल अपने घर जाती थी और भाई को राखी बांध कर वापस आ जाती थी. मैं गोलू को भी राखी बांधती थी.

देखतेदेखते अंकल के यहां 6 साल गुजर गए. अब गोलू 10 साल का हो गया था. इसी साल अंकल ने एक सरकारी स्कूल से मुझे मैट्रिक का इम्तिहान दिलवा दिया था और मैं अच्छे अंक से पास भी हो गई थी.

सिकंदरपुर में अब मेरा भाई भी पढ़ने लगा था. इतने साल में अंकल द्वारा दिए हुए पैसे से पिताजी ने अपना कर्जा चुका दिया था और अब वे एक ठेले पर फल बेचने लगे थे.

मां अभी भी पहले जैसे ही अपनी दुनिया में मस्त रहती थीं. उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं थी. इसी बीच मेरे दादाजी इस दुनिया से चल बसे थे.

बाकी सबकुछ अब ठीक से चल रहा था, मगर अचानक एक दिन मुझे एक ऐसी बुरी खबर मिली कि सुन कर मेरी जान हलक में आ गई. मेरे मासूम भाई अमर को किसी ने मार कर सड़क किनारे फेंक दिया था. सुबह सड़क के किनारे उस की लाश मिली थी.

मैं यह खबर सुन कर मानो मर सी गई थी, मगर मेरे मुंहबोले भाई गोलू और अंकलआंटी के प्यार के चलते मैं अपनेआप को संभाल पाई थी.

अमर की मौत के बाद अब मेरा अपने घर जाना भी बंद हो गया था. पिताजी जब कभी बलिया आते तो मुझ से मिल लेते थे. कभीकभार फोन कर के भी बात कर लेते थे, पर अपनी मां के लिए तो मैं कब की पराई हो गई थी.

धीरेधीरे सबकुछ पहले जैसा होता जा रहा था. इसी बीच मैं ने इंटर भी पास कर लिया था. भले ही मैं स्कूल या कालेज कभी गई नहीं थी, मगर घर पर ही पढ़पढ़ कर मैं सभी इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास करती जा रही थी.

अंकल ने अब मेरा कालेज में भी एडमिशन करा दिया था. मैं अपनेआप को बहुत खुशनसीब समझती थी कि मुझे अपने मांबाप से भी ज्यादा चाहने वाले पराए मांबाप मिले थे.

मगर मेरी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह सकी थी, तभी तो एक दिन सुबह एक और दिल दहला देने वाली खबर मुझे मिली. पिताजी का भी किसी ने रात में घर के अंदर ही खून कर दिया था.

यह सुनते ही मेरे ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कोई धीरेधीरे हमेशा के लिए मुझ से दूर करता जा रहा था. पहले भाई और अब पिताजी को भी किसी ने जान से मार दिया था. आखिर मेरे भाई या पिताजी ने किसी का क्या बिगाड़ा था? कौन था, जो ये हत्याएं कर रहा था?

पर कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक न एक दिन तो भरता ही है और जब भरता है तो वह किसी न किसी दिन फूटता ही है. ऐसा ही कुछ हुआ इस बार.

पिताजी का खून करने वाले गुनाहगार के गुनाह की काली करतूत का काला चिट्ठा इस बार पुलिस ने खोल दिया था. खून किसी और ने नहीं, बल्कि मेरी अपनी मां ने ही अपनी ऐयाशी को छिपाने के लिए अपने प्रेमी के साथ मिल कर किया था.

इतना ही नहीं, जिस रात मैं ने मां के कमरे में एक अनजान आदमी को देखा था, अपनी उसी पोल के खुलने के डर से चाल चल कर मुझे घर से दूर नौकरानी बना कर मेरी मां ने ही मुझे बलिया भेजा था. मां ने ही दुकान में आग लगवा कर मुझे घर से दूर करने की चाल चली थी.

यही नहीं, मेरी उस अपनी मां ने ही अपनी हवस की आग को जलाए रखने के लिए अपने ही हाथों अपने बेटे का भी गला दबा कर जान से मारा था. शायद अमर को जन्म देने वाली अपनी मां की हकीकत का पता चल गया था.

मेरी मां और उन के प्रेमी को कोर्ट से आजीवन कैद की सजा मिली थी. यह सुन कर मेरे सीने में अपनी मां के प्रति धधकती आग को कुछ ठंडक मिली थी.

एक बार फिर से अपने मुंहबोले भाई गोलू और पराए मातापिता के प्यार के चलते मैं बीती बातें भुला कर पहले जैसी होने की कोशिश करने लगी थी.

अब मैं ने ग्रेजुएशन कर ली थी. गोलू भी 12वीं पास कर गया था. अब वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने वाला था. इसी बीच मेघना आंटी ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी.

साकेत अंकल के औफिस में काम करने वाला एक लड़का पंकज हमेशा किसी न किसी काम से घर आया करता था. वह देखने में हैंडसम था. मैं भी अब 24 साल की बला की खूबसूरत लड़की हो गई थी.

अचानक एक दिन मैं अंकल और आंटी के साथ बैठी बातें कर रही थी कि आंटी ने मेरे सामने पंकज के साथ शादी करने की बात रख दी. मैं उन की बात को कैसे टालती और वह भी पंकज जैसे अच्छे लड़के के साथ.

अंकल ने पंकज को मेरी हकीकत बता दी थी. पंकज या उन के परिवार वालों ने भी कोई एतराज नहीं जताया.

आज मेरी यानी आप की कश्मीरा की शादी पंकज से हो रही थी.

मैं अभी अपने बैडरूम में आईने के सामने खड़ी हो कर अपनी जिंदगी के उतारचढ़ाव रूपी भंवर में गोते लगा रही थी कि अचानक पीछे से किसी ने छू कर मेरी तंद्रा भंग कर दी.

मैं जब खयालों की दुनिया से हकीकत में आई, तो देखा कि सामने मेरा मुंहबोला भाई गोलू और मुंहबोली मां मेघना खड़ी थीं.

दोनों की आंखों में मेरे इस घर को छोड़ कर अब नए घर में जाने की टीस आंसू के रूप में साफ झलक रही थी. मैं दोनों से लिपट कर जोरजोर से रोने लगी. जिंदगी में पहली बार आज मुझे बेपनाह सुख हो रहा था. सब को ऐसी मां मिले, भले पराई ही सही.

जुम्मन और अलगू का बदला – भाग 3

अलगू ने सुना, तो तुरंत फोन काट कर जुम्मन के पास भागा हुआ आया और उस से पूछने लगा कि आखिर वह ऐसा क्यों कहा रहा है. तो जुम्मन ने उसे हंसते हुए बताया कि जिगलान ने टौप के मेकैनिक से पंगा लिया है न, तो मैं ने भी उसे अपना जलवा दिखा दिया.

जुम्मन ने अलगू को बताया कि उस ने चुपके से उस गाड़ी का ब्रेक औयल निकाल दिया था और ब्रेक सिस्टम में गड़बड़ी कर दी थी, जिस से कि गाड़ी जब तेज स्पीड में जाएगी, तब चाह कर भी ड्राइवर ब्रेक नहीं लगा पाएगा और कार का ऐक्सीडैंट हो जाएगा.

‘‘पर, इन महंगी गाडि़यों में तो वह सीट के आगे गुब्बारे वाली सुविधा भी तो होती है… जिगलनवा बच जाएगा भाई उस बेहया को कुछ नहीं होगा,’’ अलगू ने शक जाहिर किया, तो जुम्मन मुसकरा उठा, ‘‘घबरा मत अलगू, एक मेकैनिक गाड़ी के सारे फंक्शन खराब कर सकता है… सोचो, अगर गुब्बारे उस के अंदर से हटा ही दिए गए हों तो…’’

जुम्मन यह बात कह ही रहा था कि तभी अचानक ठाकुर जिगलान के बंगले के बाहर जैसे कुछ उथलपुथल सी महसूस हुई. ठाकुर जिगलान के चमचों की कई गाडि़यां शहर की ओर जाने वाली सड़क पर दौड़ पड़ी थीं.

जुम्मन और अलगू की नजरें एकदूसरे से टकराईं और दोनों मुसकरा उठे.‘‘उस की गाडि़यों के आसपास तो कई आदमी रहते हैं और गाड़ी की चाभी वगैरह?’’ एकसाथ कई सवाल पूछ लेना चाहता था अलगू.

जुम्मन ने सारे सवालों का जवाब एक शराब की बोतल दिखाते हुए कहा, ‘‘इसे देख दोस्त, सारा खेल इस बला का है.’’

अलगू समझ गया था कि अपना रास्ता बनाने के लिए जुम्मन ने शराब का इस्तेमाल किया है. शाम तक गांव में खबर फैल गई थी कि ठाकुर जिगलान की महंगी वाली गाड़ी का ऐक्सीडैंट हो गया है और वह शहर के अस्पताल में भरती है.

कुछ समय बाद जुम्मन और अलगू के परिवारों ने रन्नो और सलमा से शादी करने की बात उठाई, तो गांव के बहुत सारे लोगों के विरोध के स्वर गूंजे. उन लोगों की समझ में सभी लड़केलड़कियों की शादी कैसे हो और किस से हो, इस बात का ठेका उन लोगों के ही पास है.

सब लोगों ने कहा कि मामला गंभीर है, इसलिए पंचायत बुलाई गई. पंच लोग बैठे और बाकी गांव के लोग भी जमा हो गए. पंचों ने कहा कि अगर कोई मुसलिम लड़का सलमा से निकाह करना चाहे तो इसी वक्त अपना नाम आगे करे, पर अफसोस, एक बलात्कार पीडि़ता सलमा से शादी करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया. ठीक ऐसा ही रन्नो के केस में किया गया, पर कोई हिंदू लड़का रन्नो से शादी करने को आगे नहीं आया.

काफी देर तक इंतजार के बाद भी जब कोई आगे नहीं आया, तब पंचायत ने जुम्मन और अलगू के हक में फैसला दे दिया और कहा कि एक शर्त यह रहेगी कि शादी कर के उन्हें यह गांव छोड़ कर शहर जाना होगा, क्योंकि पंचायत नहीं चाहती कि भविष्य में हिंदू और मुसलिमों में शादियां हों.

जुम्मन और अलगू ने बिना देर किए हां कर दी. अब दोनों जोड़े एकसाथ बैंगलुरु में रहते हैं. जुम्मन ने वहां एक कंपनी में मेकैनिक की नौकरी कर ली है और अलगू भी उसी के साथ असिस्टैंट का काम करता है.

दोनों जोड़े समयसमय पर अपने मांबाप से मिलने गांव आते हैं. अब वहां ठाकुर जिगलान की तूती नहीं बोलती है, क्योंकि उस दिन सड़क हादसे में उस की जान तो बच गई, पर पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था. उस के पास उस के शरीर की मक्खियां उड़ाने को भी कोई नहीं था. उस के सारे चमचे उसे छोड़ कर भाग चुके थे.

अब बगिया में चूल्हा नहीं जलता, मांस नहीं पकता और न ही शराब की बोतलें खुलती हैं. लकवाग्रस्त ठाकुर जिगलान अब खेत में काम कर रही किसी औरत का चाह कर भी रेप नहीं कर सकता.

ठाकुर जिगलान के पास न तो जानकीदास है और न ही उस की खामोश रहने वाली ठकुराइन. ठाकुर जिगलान के जुल्मोसितम के चलते 30 साल की ठकुराइन और

25 साल के जानकीदास में ऐसा प्रेम पनपा कि दोनों का अलग रहना मुश्किल हो गया. कार हादसे के बाद उन दोनों ने गांव से भाग कर शादी कर ली और एकसाथ रहने लगे.जुम्मन और अलगू ने सोचसमझ कर ठाकुर जिगलान से अपना बदला ले लिया था.

अंधविश्वास की बलिवेदी पर : भाग 3- रूपल क्या बचा पाई इज्जत

अगले दिन मामी की योजना के तहत रूपल बाबा के खास कमरे में थी. दूसरी सेवादारिनों ने उसे देवी की तरह कपड़े व गहने वगैरह पहना कर दुलहन की तरह सजा दिया था.

पलपल कांपती रूपल को आज अपनी इज्जत लुट जाने का डर था. लेकिन वह किसी भी तरह से हार नहीं मानना चाहती थी. अभी भी वह अपने बचाव की सारी उम्मीदों पर सोच रही थी कि गुरु कमलाप्रसाद ने कमरे में प्रवेश किया. आमजन का भगवान एक शैतान की तरह अट्टहास लगाता रूपल की तरफ बढ़ चला.

‘‘बाबा, मैं पैर पड़ती हूं आप के, मुझ पर दया करो. मुझे जाने दो,’’ उस ने दौड़ कर बाबा के चरण पकड़ लिए.

‘‘देख लड़की, सुहाग सेज पर मुझे किसी तरह का दखल पसंद नहीं. क्या तुझे समर्पण का भाव नहीं समझाया गया?’’

बाबा की आंखों में वासना का ज्वार अपनी हद पर था. उस के मुंह से निकला शराब का भभका रूपल की सांसों में पिघलते सीसे जैसा समाने लगा.

‘‘बाबा, छोड़ दीजिए मुझे, हाथ जोड़ती हूं आप के आगे…’’ रूपल ने अपने शरीर पर रेंग रहे उन हाथों को हटाने की पूरी कोशिश की.

‘‘वैसे तो मैं किसी से जबरदस्ती नहीं करता, पर तेरे रूप ने मुझे सम्मोहित कर दिया है. पहले ही मैं बहुत इंतजार कर चुका हूं, अब और नहीं… चिल्लाने की सारी कोशिशें बेकार हैं. तेरी आवाज यहां से बाहर नहीं जा सकती,’’ कह कर बाबा ने रूपल के मुंह पर हाथ रख उसे बिस्तर पर पटक दिया और एक वहशी दरिंदे की तरह उस पर टूट पड़ा.

तभी अचानक ‘धाड़’ की आवाज से कमरे का दरवाजा खुला. अगले ही पल पुलिस कमरे के अंदर थी. बाबा की पकड़ तनिक ढीली पड़ते ही घबराई रूपल झटक कर अलग खड़ी हो गई.

पुलिस के पीछे ही ‘रूपल…’ जोर से आवाज लगाती उस की मां ने कमरे में प्रवेश किया और डर से कांप रही रूपल को अपनी छाती से चिपटा लिया.

इस तरह अचानक रंगे हाथों पकड़े जाने से हवस के पुजारी गुरु कमलाप्रसाद के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. फिर भी वह पुलिस वालों को अपने रोब का हवाला दे कर धमकाने लगा.

तभी उस की एक पुरानी सेवादारिन ने आगे बढ़ कर उस के गाल पर एक जोरदार तमाचा रसीद किया. पहले वह भी इसी वहशी की हवस का शिकार हुई थी. वह बाबा के खिलाफ पुलिस की गवाह बनने को तैयार हो गई.

बाबा का मुखौटा लगाए उस ढोंगी का परदाफाश हो चुका था. आखिरकार एक नाबालिग लड़की पर रेप और जबरदस्ती करने के जुर्म में बाबा को

तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया. उस के सभी चेलेचपाटे कानून के शिकंजे में पहले ही कसे जा चुके थे.

मां की छाती से लगी रूपल को अभी भी अपने सुरक्षित बच जाने का यकीन नहीं हो रहा था, ‘‘मां… मामी ने मुझे जबरदस्ती यहां…’’

‘‘मैं सब जान चुकी हूं मेरी बच्ची…’’ मां ने उस के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा. ‘‘तू चिंता मत कर, भाभी को भी सजा मिल कर रहेगी. पुलिस उन्हें पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है.

‘‘मैं अपनी बच्ची की इस बदहाली के लिए उन्हें कभी माफ नहीं करूंगी. तू मेरे ही पास रहेगी मेरी बच्ची. तेरी मां गरीब जरूर है, पर लाचार नहीं. मैं तुझ पर कभी कोई आंच नहीं आने दूंगी.

‘‘मेरी मति मारी गई थी कि मैं भाभी की बातों में आ गई और सुनहरे भविष्य के लालच में तुझे अपने से दूर कर दिया.

‘‘भला हो तुम्हारे उस पड़ोसी का, जिस ने तुम्हारे दिए नंबर पर फोन कर के मुझे इस बात की जानकारी दे दी वरना मैं अपनेआप को कभी माफ न कर पाती,’’ शर्मिंदगी में मां अपनेआप को कोसे जा रही थीं.

‘‘मुझे माफ कर दो दीदी. मैं रमा की असलियत से अनजान था. गलती तो मुझ से भी हुई है. मैं ने सबकुछ उस के भरोसे छोड़ दिया, यह कभी जानने की कोशिश नहीं की कि रूपल किस तरह से कैसे हालात में रह रही है,’’ सामने से आ रहे मामा ने अपनी बहन के पैर पकड़ लिए.

बहन ने कोई जवाब न देते हुए भाई पर एक तीखी नजर डाली और बेटी का हाथ पकड़ कर अपने घर की राह पकड़ी. रूपल मन ही मन उस पड़ोसी का शुक्रिया अदा कर रही थी जिसे सेवइयों के लिए दूध लाते वक्त उस ने मां का फोन नंबर दिया था और उस ने ही समय रहते मां को मामी की कारगुजारी के बारे में बताया था जिस के चलते ही आज वह अंधविश्वास की बलिवेदी पर भेंट चढ़ने से बच गई थी.

मां का हाथ थामे गांव लौटती रूपल अब खुली हवा में एक बार फिर सुकून की सांसें ले रही थी.

दलित लड़कियां : बदले शादी के दस्तूर

उत्तर प्रदेश में रामदासपुर गांव की रहने वाली शिवानी की शादी तय हो रही थी. शिवानी ने 12वीं जमात पास कर ली थी. घर वालों का कहना था कि लड़का अच्छा है. उस की अपनी दुकान है, इसलिए आगे की पढ़ाई शिवानी ससुराल से भी कर सकती है.

शिवानी दलित जाति की लड़की थी. उस के लिए शादी के बाद पढ़ाई जारी रखना उतना आसान नहीं था, जितना अगड़ी जाति की लड़कियों के लिए रहता है. शिवानी ने पढ़ाई देर से शुरू की थी. वह बदले जमाने की लड़की थी. उस की अपनी सोच थी और उसे मातापिता का साथ मिला था, जो उस की बात सुनते थे, नहीं तो आमतौर पर लड़कियों से उन की इच्छा के बारे में पूछा ही नहीं जाता है.

शादी के रिवाजों में एक बदलाव यह भी था कि शिवानी की बरात आएगी. आमतौर पर दलित लड़कियों की शादी में पहले उलटा रिवाज था. लड़की को ले कर उस के घर वाले लड़के के घर जाते थे. इस को ‘पैपूंजी’ कहा जाता है.

सामंती व्यवस्था में यह नियम था कि जो काम अगड़ी जाति के करते थे, उन्हें करने का हक नीची जाति के लोगों को नहीं था. इन में से ही एक नियम यह भी था कि दलितों में लड़की की शादी में बरात नहीं आएगी.

‘बरात आने’ और ‘पैपूंजी जाने’ में शान का फर्क था. अगड़ी जाति के लोगों को यह पसंद नहीं था. अब कुछ सालों से यह व्यवस्था बदल चुकी है. अब दलित लड़की की भी बरात आने लगी है. इस के बावजूद अभी भी कई जगहों पर यह विवाद हो जाता है कि दलित समाज का दूल्हा घोड़ी चढ़ कर कैसे आया? छिटपुट रूप से ऐसे विवाद होते रहते हैं. इस की वजह यही है कि पहले दलित लड़कियों की बरात नहीं आती थी, बल्कि ‘पैपूंजी’ जाती थी.

यह बदलाव अगड़ी जाति के लोगों को जहां पसंद नहीं आता है, वहां विवाद हो जाते हैं. वैसे बड़े लैवल पर अब माहौल बदल चुका है. अब गांव में भी दलित लड़कियों की बरात आने लगी है. न केवल बरात आती है, बल्कि पूरी धूमधाम से आती है. परिवार की जैसी माली हालत होती है, वैसा इंतजाम होता है.

बदल रहे हैं रीतिरिवाज

राजस्थान में ऊंची जाति की लड़कियां आमतौर पर अपनी शादी में घोड़ी पर बैठती हैं. उन के परिवार ऐसा कर के ‘बेटा और बेटी एकसमान’ का संदेश देना चाहते हैं. अब दलित लड़कियां भी घोड़ी पर बैठने का रिवाज करने लगी हैं. इस के खिलाफ उन के समाज के भीतर से ही विरोध के स्वर उठने लगते हैं.

राजस्थान की एक प्रथा है बिंदोली. इस में शादी से एक दिन पहले लड़की को घोड़ी पर बैठा कर पूजा करने के लिए ले जाया जाता है.

घोड़ा हमेशा से आनबानशान, गौरव, शौर्य और सामंतवाद का प्रतीक है. दूल्हा पहले बग्गी पर जाता था. हाथीघोड़े की सवारी स्टेटस को भी दिखाता है. अब शाही बग्गियां खत्म सी हो गई हैं, क्योंकि उन की साजसज्जा और रखरखाव मुश्किल होता है. तो फिर हम घोड़ी पर आ गए.

पिछले कुछ सालों से दलितों ने भी बिंदोली प्रथा निभानी शुरू कर दी है, जिस का खुद दलितों में विरोध होने लगा है. केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के इलाकों में इस तरह के तमाम उदाहरण मिल जाते हैं.

राजस्थान में बाड़मेर जिले के मेली गांव में कुछ ऐसा ही हुआ. 2 दलित बहनों को घोड़ी पर बैठा कर बिंदोली की रस्म निभाई गई. शादी के 2 महीने के बाद ही घोड़ी पर बैठने का विवाद बढ़ने लगा. दरअसल, बिंदोली नाम की रस्म शादी के एक दिन पहले निभाई जाती है. इस में लड़कियां अपनी कुलदेवी के पूजन के लिए जाती हैं.

दलित लड़कियां दोहरे शोषण से गुजरती हैं. बाहर जाति की वजह से सताई जाती हैं और घरपरिवार और समाज में पितृसत्तात्मक सोच से सताई जाती हैं.

बाड़मेर में सिवानाकल्याणपुर सड़क पर बसा है मेली गांव. तकरीबन 4,000 आबादी वाले इस गांव में कोई 300 परिवार दलित मेघवाल समाज के हैं. इस गांव में पहली बार शादी से पहले लड़कियों को घोड़ी पर बैठाया गया.

इन बहनों की शादी के तकरीबन 2 महीने बाद मेघवाल समाज के 12 गांवों के पंचों की पंचायत हुई. दोनों बहनों को घोड़ी पर बैठाने के लिए परिवार पर 50,000 रुपए का जुर्माना लगाया गया. पैसा न देने पर उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया.

पैसे से बदले हालात

जैसेजैसे गांवों में पढ़ाईलिखाई का प्रचारप्रसार हुआ और दलित तबके में पैसा आया, वैसेवैसे हालात बदलते दिखे. दलितों में अच्छी और पढ़ीलिखी लड़कियों की कमी है. ऐसे में कई बार पढ़ीलिखी लड़की के लिए अमीर घरों से अच्छे रिश्ते आ जाते हैं. वे भी चाहते हैं कि शादी नए रंगढंग में हो. अगर लड़की वाले गरीब हैं, तो लड़के वाले शादी के आयोजन में मदद भी कर देते हैं.

उत्तर प्रदेश में सीतापुर के रहने वाले रमेश कुमार की नौकरी लग गई थी. उसे शादी के लिए कविता नामक जो लड़की पसंद थी, वह अपनी जाति की थी, पर गरीब थी. ऐसे में रमेश और उस के परिवार ने पैसे से मदद कर के शादी कराई.

दलित लड़कियों की शादी में अब पुराने रीतिरिवाज बदलने लगे हैं. अब उन की शादियां भी ऊंची जाति की लड़कियों जैसी होती है. गांव में भी बरात, बैंडबाजा, मेहंदी, जयमाल और फेरे का रिवाज बढ़ गया है. अब न्योते के लिए कार्ड बंटने लगे हैं. डीजे पर डांस और बढ़िया दावत होने लगी है. शादी में दुलहन ही नहीं, बल्कि उस के परिवार का पहनावा भी बदलने लगा है. कपड़े सस्ते भले हों, पर फैशन के मुताबिक होने लगे हैं.

पढ़ीलिखी गरीब लड़कियों में अपनी ही जाति में काबिल लड़के कम मिलते हैं, जिस की वजह से वे गैरबिरादरी में शादियां करने लगी हैं. कुछ मामलो में अभी भी गैरबिरादरी में शादी करने पर जातीय पंचायतों या खाप पंचायतों का रोल देखने को मिलता है.

पढ़ाईलिखाई से बदली सोच

दलित लड़कियों में पढ़ाईलिखाई और शादी दोनों ही बदलाव दिखा रहे हैं. ये दोनों ही मुद्दे एकदूसरे से जुड़े हैं. दलितों में पैठी पुरानी सोच से लड़कियों की पढ़ाई और शादी दोनों का टकराव होने लगा है. दलितों में भी पितृसत्तात्मक सोच हावी है. वहां के मर्द किसी भी तरह से लड़कियों को पढ़ाईलिखाई और शादी में आजादी नहीं देना चाहते हैं.

दलितों में ज्यादा गरीबी होने के चलते लड़कियां पढ़ने में पिछड़ जाती हैं. ज्यादातर दलित परिवार अपनी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में ही परेशान रहते हैं. इस का सीधा दबाव लड़कियों पर पड़ता है.

लड़कियों के पास बाहर जा कर पढ़ाई करने का कोई औप्शन नहीं होता, जिस के चलते उन्हें घर में ही रह कर सारा काम संभालना होता है. इस के बाद बहुत ही कम लड़कियां आगे बढ़ पाती हैं.

गांव में टीचरों की तादाद में कमी और खराब माहौल के चलते लड़कियों में पढ़ाई को ले कर कोई खास जोश नहीं होता. साथ ही घर में रोजमर्रा के काम के दबाव के चलते लड़कियां पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाती हैं.

घरपरिवार की सोच यह होती है कि लड़की के लिए घर में रह कर काम करना ही सही है, बाहर जाएगी तो दस लोगों से मिलेगीजुलेगी, घर में कलेश होगा और अगर कुछ उलटासीधा हो गया तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.

शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पहली से 12वीं जमात तक के दाखिले में दलित लड़कियों की तादाद ज्यादा होती है, पर ऊंची तालीम में वे पीछे हो जाती हैं. ऊंची तालीम हासिल करने वालों का राष्ट्रीय औसत 24.3 फीसदी है, जबकि दलितों में यह औसत 19.1 फीसदी है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में पढ़ाईलिखाई के क्षेत्र में पुरुषों की साक्षरता दर 83.5 फीसदी रही और महिलाओं की साक्षरता दर 68.2 फीसदी रही, लेकिन अनुसूचित जाति में महिलाओं की साक्षरता दर केवल 56.5 फीसदी ही रही. वहीं अनुसूचित जनजाति में महिलाओं की साक्षरता दर 49.4 फीसदी रही.

तादाद में कम ही सही, पर अब हालात बदल रहे हैं. दलित लड़कियां भी सरकारी एग्जाम की तैयारी करने लगी हैं. कुछ लड़कियां तो गांव से शहरोें में जा कर कोचिंग भी करने लगी हैं. कई लड़कियां तो बड़े शहरी स्कूलों में पढ़ने भी लगी हैं.

जिन दलित परिवारों में रिजर्वेशन के तहत सरकारी नौकरी मिलने या राजनीति में आने के बाद पैसा आ गया है, उन की लड़कियों को ऊंची जाति के लोगों जैसे मौके मिलने लगे हैं. इस तरह की लड़कियां समाज के बाहर दूसरी जाति के लड़कों से भी शादी कर लेती हैं. ज्यादातर मामलों में परिवार इन की बात मान लेते हैं.

दूसरी जाति में शादी करने वाली ज्यादातर लड़कियां अपने शहर या गांव से दूर चली जाती हैं. वे अपनी पहचान भी छिपा लेती हैं. जिस जाति का पति होता है, उसी जाति की वे भी हो जाती हैं.

गैरबिरादरी में शादी करने वाली ज्यादातर दलित लड़कियां अतिपिछड़े वर्ग में शादी करती हैं. इस के बाद पिछड़े और मुसलिम समाज में ऐसे ब्याह ज्यादा होते हैं.

कमजोर लड़कियां हैं परेशान

गांव में रहने वाली गरीब दलित परिवारों में लड़कियां शादी कर के अपना घर संभाल रही हैं. ज्यादातर लड़कियों की शादी कम उम्र में ही शादी हो जाती है. इस की सब से बडी वजह दलित परिवारों में पुरानी सोच का होना है.

लड़कियों के साथ हिंसक बरताव, यौन हिंसा, जातिगत हिंसा और अलगअलग तरह के शोषण होना कोई नई बात नहीं है. उन्हें सताने वालों में अपनी ही जाति और परिवार के लोग भी शामिल होते है. इन में से बहुत कम ही मामले सामने आते हैं.

आमतौर पर लड़कियों और औरतों को डराधमका कर चुप करा दिया जाता है. ऐसी लड़कियां जब गैरबिरादरी में शादी करती हैं, तो उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश के इटावा सिविल लाइंस के विजयपुरा गांव की रहने वाली डिंपल का उन्नाव जिले में रहने वाले ऊंची जाति के दिवाकर शुक्ला से प्रेम हो गया. दिवाकर ब्राह्मण था. ऐसे में दलित जाति की डिंपल से उस का प्रेम घर वालों को पसंद नहीं था. इस के बाद भी जब उन दोनों ने शादी कर ली तो दिवाकर शुक्ला के घर वालों ने बेटे और बहू को घर से निकाल दिया.

घर में इज्जत न मिलने पर उस जोड़े ने पुलिस की मदद ली. महिला थानाध्यक्ष सुभद्रा वर्मा ने उन दोनों के परिवार वालों को बुलाया और समझाया. थानाध्यक्ष की बात उन्होंने मान ली और फिर महिला थाने के अंदर डिंपल और दिवाकर की हिंदू रीतिरिवाज के साथ शादी करा दी गई.

इंटरकास्ट शादी में सरकारी मदद

इंटरकास्ट शादी को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा एक योजना चलाई जाती है. इस योजना का नाम डाक्टर अंबेडकर फाउंडेशन है. इस सरकारी योजना के तहत नए शादीशुदा जोड़े को सरकार द्वारा पैसे की मदद दी जाती है, जिस से उन की माली हालत में बदलाव के साथसाथ सामाजिक सोच बदलने में भी मदद मिलती है.

डाक्टर अंबेडकर फाउंडेशन की इस योजना के तहत जो लोग इंटरकास्ट शादी करते हैं, उन्हें यह माली मदद दी जाती है. इस योजना को डाक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर रखा गया है.

डाक्टर अंबेडकर फाउंडेशन योजना का फायदा लेने के लिए जरूरी है कि लड़की की उम्र कम से कम 18 साल और लड़के की उम्र कम से 21 साल हो. इस के साथ ही इन में से कोई एक दलित समुदाय से हो और दूसरा दलित समुदाय से बाहर का होना चाहिए.

इस के साथ लड़कालड़की ने अपनी शादी हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 के तहत रजिस्टर की हो. अगर दोनों दलित समुदाय के हैं या दोनों ही दलित समुदाय के नहीं हैं, तो उन्हें फायदा नहीं मिल सकता है.

इस योजना का फायदा केवल वे जोड़े उठा सकते हैं, जिन्होंने पहली शादी की है. पत्नी या पति में से किसी की भी दूसरी शादी होने पर आप इस योजना का फायदा नहीं उठा सकते हैं. अपनी शादी रजिस्टर करवा कर नएनवेले जोड़े को मैरिज सर्टिफिकेट जमा करना होगा. इस के बाद ही वह जोड़ा डाक्टर अंबेडकर फाउंडेशन के लिए अर्जी दे सकता है. इस योजना का फायदा शादी के एक साल के भीतर ही लिया जा सकता है.

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