15 अगस्त स्पेशल: फौजी के फोल्डर से एक सैनिक की कहानी – भाग 1

कैप्टन राघव सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर टैलीविजन पर चल रही बहस और श्रेय लेने की होड़ से ऊब कर, अपना लैपटौप खोल कर बैठ गए. महीनेभर की भागादौड़ी से फुरसत पा कर, आज यह शाम का समय मिला है कि वे कुछ अपने मन की करें. उड़ी आतंकवादी घटना के बाद से ही मन विचलित हो गया था. मगर यह पूरा माह अत्यंत व्यस्त था, इसलिए जागते समय तो नहीं, किंतु सोते समय अवश्य उन मित्रों के चेहरे नजरों के सामने तैरने लगते थे जो इस साल आतंकियों से लोहा लेते शहीद हो गए थे. आज वे लैपटौप में उस पिक्चर फोल्डर को खोल कर बैठ गए जो उन्होंने एनडीए में ट्रेनिंग के दौरान फोटोग्राफर से लिया था. उस फोटोग्राफर को भी केवल खास मौकों पर अंदर आ कर फोटो लेने की इजाजत मिलती थी, वरना वहां कैमरा और मोबाइल रखने की किसी भी कैडेट को इजाजत नहीं थी.

12वीं की परीक्षा के बाद जहां उस के सहपाठी इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेज के परिणामों का इंतजार कर रहे थे वहीं वह बेसब्री से एनडीए के परिणाम का इंतजार कर रहा था. हालांकि मां की खुशी के लिए यूपीटीयू के अलावा उस ने और भी अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं भी दी थीं मगर इंतजार एनडीए के परिणाम का ही था. यदि लिखित में पास हो गया तो फिर एसएसबी (साक्षात्कार) के लिए तो वह जीजान लगा देगा.

मां को तो पूरा विश्वास था कि वह इस में पास नहीं हो सकता, इसलिए उन्होंने उस परीक्षा को एक बार में ही पास करने की शर्त रख दी थी. उस दिन नीमा मौसी ने मां से बोला भी था, ‘तुम अपने इकलौते बेटे के सेना में जाने से रोकती क्यों नहीं?’ और मां ने कहा, ‘अरे, परीक्षा दे कर उसे अपना शौक पूरा कर लेने दो. परीक्षा में लाखों बच्चे बैठते हैं, लेकिन सिलैक्शन तो 3-4 सौ का ही हो पाता है. कौन सा इस का हो ही जाएगा. मैं तो यही सोच कर खुश हूं कि इसे ही लक्ष्य मान परीक्षा की तैयारियां तो करता है वरना यह भी सड़क पर अन्य नवयुवकों के संग बाइक ले कर स्टंट करता घूमता.’

मौसी चुप हो गईं. मां व मौसी की ये बातें सुन कर मैं जीजान से तैयारी में जुट गया कि कहीं पहली बार में पास नहीं कर पाया तो फिर मां को बहाना मिल जाएगा सेना में न भेजने का. मां हमेशा फुसलातीं, ‘बेटा, सरकारी इंजीनियरिंग कालेज न मिले तो कोई बात नहीं, तुम यहीं लखनऊ के ही किसी प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज में ऐडमिशन ले लेना, घर से ही आनाजाना हो जाएगा.’ मैं कहता, ‘मां, मुझे इंजीनियरिंग करनी ही नहीं, आप समझती क्यों नहीं.’

सोमेश भी तो यही कहता था. यहां आने वाले हर दूसरे कैडेट की यही कहानी है. किस की मां अपने कलेजे के टुकड़े को गोलियों की बौछार के आगे खड़ा कर खुश होगी. सोमेश तो अपने मातापिता की इकलौती औलाद था. उस की मां तो एनडीए में ऐडमिशन के समय साथ ही आई थी. एक हफ्ते पुणे में रुकी रही कि शायद सोमेश का मन बदल जाए तो वे उसे अपने साथ ले कर वापस लौट जाएंगी. भले ही अब जुर्माना भी क्यों न भरना पड़े पर सोमेश न लौटा और उस की मां ही लौट गईं. उस दिन वे कितना रो रही थीं, शायद उन के मन को आभास हो गया था.

मैं और सोमेश एक ही हाउस में थे. शुरू के 3 महीने तो सब से कठिन समय था. कब आधी रात को दौड़ना पड़ जाए, कब तपतपाती गरमी में सड़क पर बदन को रोल करना पड़ जाए, कब दसियों बार रस्सी पर अपडाउन करने का फरमान आ जाए और कब किस समय कौन सा कानून भंग हो जाए, पता ही नहीं चलता था. मगर सजा देने वाले सीनियर के पास पूरा हिसाब रहता और उस सीनियर को सजा देने का हक उस के सीनियर का रहता. हर 6 महीने में एक नया बैच जौइन करता और उसी के साथ अगला बैच सीनियर बन जाता और सब से पुराना बैच, 3 साल पूरे कर पासिंगआउट परेड कर रवाना हो जाता आर्मी गु्रप आइएमए उत्तराखंड के देहरादून में, नेवी ग्रुप अलगअलग अपने जहाज में और एयरफोर्स ग्रुप एयरफोर्स एकेडमी, बेंगलुरु में. बस, यहीं से सभी कैडेट जैंटलमैन में बदल अपनी अलग औफिसर ट्रेनिंग के लिए एकदूसरे से विदा लेते.

प्रवेश के प्रांरभिक 3 महीने सब से कठिन होते. उस समय में जो कैडेट एनडीए में टिक गया, वह फिर जिंदगीभर अपने कदम पीछे नहीं कर सकता. मां की सहेली का भाईर् यहां से महीनेभर में ही वापस चला गया था. तभी से उन के मन में एक भयंकर तसवीर बन गई थी, उसी कठोर प्रशिक्षण के बारे में सुन कर ही वे मुझे यहां नहीं भेजना चाहती थीं. पर वैसे भी, किस की मां खुशीखुशी भेजती है.

सोमेश ने बताया था कि जब वह पहले सैमेस्टर के बाद घर गया तो मां के सामने शर्ट नहीं उतारता था कि वे कहीं पीठ पर बने निशान न देख लें जो डामर रोड पर रोलिंग करने से बन गए थे, वरना वे फिर से हायतौबा मचा कर मुझे वापस ही न आने देतीं. यही हाल मेरी मां का भी था. हर वक्त यही कहती थीं, ‘कितना चुप रहने लगा है, कुछ बताता क्यों नहीं वहां की बात. पहले तो बहुत बोलता था, अब क्या हुआ?’ क्या बोलता मैं, अगर यहां की कठिन दिनचर्या बताता तो फिर वे मुझे भूल कर भी वापस न आने देतीं.

बहन सुनीति बोली थी, ‘मैं ने सुना, 3 साल में आप को वहां से जेएनयू की डिगरी मिलेगी,’

‘हां, तो,’ मैं ने लापरवाही से कहा.

‘वाह, पुणे में रहते हुए, आप को जेएनयू की डिगरी मिल जाएगी, दिल्ली भी जाना नहीं पड़ेगा,’ सुनीति चहकी थी.

‘हां, हम जेएनयू नहीं, बल्कि जेएनयू हमारे पास आएगा,’ मैं ने उसे चिढ़ाया था.

‘अजी, मजे हैं आप के भाई,’ सुनीति बोली.

‘तू भी आ जा, तुझे भी मिल जाएगी,’ मैं ने कहा.

‘न भाई न, मेरे अंदर इतना स्टैमिना नहीं है कि मैं मीलों दौड़ लगाऊं. वह भी पीठ पर वजन लाद कर. न सोने का ठिकाना, न खाने का. इस के बजाय मैं अपनी डिगरी मौज काटते हुए ले लूंगी. आप की तरह मुझे अपने शरीर को कष्ट नहीं देना. इस से कई गुना मस्त हमारी यूनिवर्सिटी है जहां सालभर नारेबाजी, धरना, प्रदर्शन और फैशन परेड ही चलती रहती है.’

बहन और भाई के रिश्ते में प्यार है, तकरार भी. एक को कुछ कष्ट हो तो  दूसरे को बरदाश्त नहीं हो पाता. वह मेरी कठिन ट्रेनिंग से हमेशा विचलित हो जाती. जब मैं ने उस से कहा, ‘अब मैं कमांडो ट्रेनिंग पर भी जाऊंगा,’ तो गुस्सा हो गई. ‘क्या जरूरत है इतनी कठिन ट्रेनिंग पर जाने की, आप शांति से अपनी जौब करते रहो, अब और कहीं जाने की जरूरत नहीं.’

शुरुआत में सोमेश तो फिर भी बहुत स्ट्रौंग था पर मोहित अकसर उदास हो जाता था. उस की स्थिति डावांडोल होने लगी थी. एक दिन कहता, ‘घर जाना है’ तो दूसरे ही दिन, ‘यहीं रहना है,’ का राग अलापता. सोमेश उसे समझाबुझा कर मना ही लेता. फिर तो हम तीनों की बहुत अच्छी जमने लगी थी. मोहित हमारा जूनियर था, मगर मौका पा हमारे रूम में झांक ही जाता, ‘सर, कुछ लाना तो नहीं, मैं कैंटीन जा रहा हूं?’

एक दिन आ कर बोला, ‘सर, आ की राखी आ गई?’

‘नहीं, अभी तो बहुत दिन हैं राखी आने के, आ जाएगी, क्यों परेशान हो?’

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

Raksha Bandhan: सत्य असत्य- भाग 1

कर्ण के एक असत्य ने सब के लिए परेशानी खड़ी कर दी. जहां इसी की वजह से हुई निशा के पिता की मौत ने उसे झकझोर कर रख दिया, वहीं खुद कर्ण पछतावे की आग में सुलगता रहा. पर निशा से क्या उसे कभी माफी मिल सकी?

घर की तामीर चाहे जैसी हो, इस में रोने की कुछ जगह रखना.’ कागज पर लिखी चंद पंक्तियां निशा के हाथ में देख मैं हंस पड़ी, ‘‘घर में रोने की जगह क्यों चाहिए?’’

‘‘तो क्या रोने के लिए घर से बाहर जाना चाहिए?’’ निशा ने हंस कर कहा.

‘‘अरे भई, क्या बिना रोए जीवन नहीं काटा जा सकता?’’

‘‘रोना भी तो जीवन का एक अनिवार्य अंग है. गीता, अगर हंसना चाहती हो तो रोने का अर्थ भी समझो. अगर मीठा पसंद है तो कड़वाहट को भी सदा याद रखो. जीत की खुशी से मन भरा पड़ा है तो यह मत भूलो, हारने वाला भी कम महत्त्व नहीं रखता. वह अगर हारता नहीं तो दूसरा जीतता कैसे?’’

निशा के सांवले चेहरे पर बड़ीबड़ी आंखें मुझे सदा ही भाती रही हैं, और उस से भी ज्यादा प्यारी लगती रही हैं मुझे उस की बातें. हलके रंग के कपड़े उस पर बहुत सजते हैं.

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘ये मशहूर शायर निदा फाजली के विचार हैं और मैं इन से पूरी तरह सहमत हूं. गीता, यह सच है, घर में एक ऐसा कोना जरूर होना चाहिए जहां इंसान जी भर कर रो सके.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है, जैसे घर में रसोईघर, सोने का कमरा, अतिथि कक्ष, क्या वैसा ही? मगर इतनी महंगाई में कैसे होगा यह सब? सुना है, राजामहाराजा रानियों के लिए कोपभवन बनवाते थे. क्या तुम भी वैसा ही कोई कक्ष चाहती हो?’’

शायद मेरी बात में छिपा व्यंग्य उसे चुभ गया. उस ने किताबें संभालीं और उठ कर चल दी.

मैं ने उसे रोकना चाहा, मगर वह रुकी नहीं. पलभर को मुझे बुरा लगा, लेकिन जल्द ही नौर्मल हो गई.

मैं एमए के बाद बीएड कर रही थी. इसी सिलसिले में निशा से मुलाकात हो गई थी. पहली ही बार जब वह मिली, तभी इतनी अच्छी लगी थी कि कहीं गहरे मन में समा सी गई थी. पिता के सिवा उस का और कोईर् न था. पिता ही उस के सब थे. मैं उन से मिली नहीं थी, परंतु उन के बारे मैं इतना कुछ जान लिया था, मानो बहुतकुछ देखापरखा हो.

निशा के पिता विज्ञान के प्राध्यापक थे. लगभग 6 माह पहले ही उन का दिल्ली स्थानांतरण हुआ था.

‘‘आप इस से पहले कहां थीं?’’ एक दिन मैं ने पूछा तो वह बोली, ‘‘जम्मू.’’

‘‘बड़ी सुंदर जगह है न जम्मू. कश्मीर भी तो एक सुंदर जगह है. वहां तो तुम लोग जाती ही रहती होगी?’’

‘‘हां, बहुत सुंदर. कश्मीर तो अकसर जाते रहते हैं.’’

‘‘मगर तुम तो कश्मीरी नहीं लगतीं?’’

‘‘जानती हूं, दक्षिण भारतीय लगती हूं न, सभी हंसते हैं, पता नहीं क्यों. शायद मेरी मां सांवली होंगी. मगर मेरे पिता तो बहुत सुंदर हैं, कश्मीरी हैं न.’’

‘‘तुम्हारे भाईबहन?’’

‘‘कोई नहीं है. मैं और मेरे पिता, बस.’’

मां की कमी उसे खलती हो, ऐसा मुझे कभी नहीं लगा. वह मस्तभाव से हर बात करती थी.

एक दिन मेरे बड़े भैया ने मुझ से कहा, ‘‘कभी उसे घर लाना न, निशा कैसी है, जरा हम भी तो देखें.’’

‘‘अच्छा, लाऊंगी, मगर तुम इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हो?’’ भाई को तनिक छेड़ा तो पिताजी ने कहा, ‘‘अरे भई, दिलचस्पी लेने की यही तो उम्र है.’’

कहकहों के बीच एक भीनी सी इच्छा ने भी जन्म ले लिया था कि क्यों न मैं उसे अपनी भाभी ही बना लूं. वैसे है तो सांवली, लेकिन हो सकता है, भैया को पसंद आ जाए. हां, मां का पता नहीं, उन का गोरीचिट्टी बहू का सपना है, क्या पता वे इस लोभ से ऊपर न उठ पाएं.

उसी दिन से मैं उसे दूसरी ही नजर से देखने लगी थी. कल्पना में ही उसे भैया की बगल में बिठा कर दोनों की जोड़ी कैसी लगेगी. गुलाबी जोड़े में कैसी सजेगी निशा, कैसी प्यारी लगेगी.

‘गीता, क्या देखती रहती हो?’ अकसर निशा के टोकने पर ही मेरी तंद्रा भंग होती थी.

‘कुछ भी तो नहीं,’ मैं हौले से कह उठती.

एक दिन मैं ने उस से कहा, ‘‘हमारे घर चलोगी? तुम्हें सब से मिलाना चाहती हूं. चलो, मेरे साथ.’’

‘‘नहीं गीता, पिताजी को अच्छा नहीं लगता. फिर इस शहर में हम नए हैं न, किसी से इतनी जानपहचान कहां है, जो…’’

‘‘क्या मेरे साथ भी जानपहचान नहीं है?’’

‘‘कभी पिताजी के साथ ही आऊंगी, उन के बिना मैं कहीं नहीं जाती.’’

एक दिन मैं उस के साथ उस के घर चली गई. वे विश्वविद्यालय की ओर से मिले आवास में रहते थे.

उन लोगों के पास 2 चाबियां थीं. घर पहुंचने पर द्वार उसे खुद ही खोलना पड़ा, क्योंकि उस के पिता अभी नहीं आए थे. पर सुंदर, व्यवस्थित घर में मैं ने उन का चित्र जरूर देख लिया. सचमुच वे बहुत सुंदर थे. किसी भी कोने से वे मुझे उस के पिता नहीं लगे, मगर बालों की सफेदी के कारण विश्वास करना ही पड़ा.

उस ने कहा, ‘‘पिताजी को फोन कर के बुला लूं. आज तुम पहली बार आई हो?’’

‘‘नहीं निशा, क्या यह अच्छा लगेगा कि मेरी वजह से वे काम छोड़ कर चले आएं? मैं फिर कभी अपने पिताजी के साथ आ जाऊंगी. दोनों में दोस्ती हो गई तो तुम्हें हमारे घर आने से नहीं रोकेंगे न.’’

‘घर में रोने को एक कोना उसे क्यों चाहिए? क्या उस के पिता ने किसी वजह से डांट दिया?’ घर आ कर भी मैं देर तक यह सोचती रही.

एक शाम भैया को

घर में प्रवेश करते

देखा तो कह दिया, ‘‘मेरे साथ निशा के घर चलो भैया, आज वह बहुत उदास थी. पता नहीं उसे क्या हो गया है.’’

‘‘तुम गौर से सुन लो, आइंदा उस से कभी मत मिलना. वह अच्छे चरित्र की लड़की नहीं है.’’

‘‘भैया,’’ मैं चीख उठी.

‘‘तुम उस के बहुत गुणगान करती थीं. अपने बाप के बिना वह कहीं जाती नहीं. अरे, दस बार तो मैं उसे एक लड़के के साथ देख चुका हूं.’’

‘‘लेकिन,’’ मैं भाई के कथन पर अवाक रह गई. फिर सोचते हुए पूछा, ‘‘आप ने निशा को कब देखा? जानते भी हो उसे?’’

‘‘जब से घर में उस के गुण गा रही हो, तभी से उसे देख रहा हूं.’’

‘‘कहां?’’

‘‘वहीं कालेज के बाहर. जब वह अपने घर जाती है, तब.’’

‘‘क्यों देखते रहे उसे?’’

‘‘झक मारता रहा, बस. और क्या कहूं,’’ भैया पैर पटक कर भीतर चले गए.

घर में मां और पिताजी नहीं थे, इसीलिए तमतमाई सी पीछे जा पहुंची, ‘‘आप सड़कछाप लड़कों की तरह उस का पीछा करते रहे? क्या आप अच्छे चरित्र के मालिक हैं? वाह भैया, वाह.’’

‘‘तुम ने ही कहा था न कि वह जहां जाती है, अपने पिता के साथ जाती है. यहां तक कि यहां तुम्हारे साथ भी नहीं आई.’’

‘‘हां, मैं ने कहा था, लेकिन यह तो नहीं कहा था कि…लेकिन आप इतने गंभीर क्यों हो रहे हैं? क्या वह किसी के साथ आजा नहीं सकती. भैया, आखिर उसे चरित्रहीन कहने का आप को क्या हक है?’’

‘‘हक क्यों नहीं है. मैं…मैं उसे पसंद करने लगा था. वह मुझे भी उतनी ही अच्छी लगती रही है, जितनी कि तुम्हें. पिछले कई हफ्तों से मैं उस पर नजर रख रहा हूं. वह लड़का उस के घर उस से मिलने भी जाता है. मैं ने कई जगह दोनों को देखा है.’’

पहली बार लगा, मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई. अगर उस का किसी के साथ प्रेम है भी, तो मुझे बताया क्यों नहीं.

मैं ने तनिक गुस्से में कहा, ‘‘भैया, अपने शब्द वापस लो. प्रेम करने और चरित्रहीन होने में जमीनआसमान का अंतर है. वह चरित्रहीन नहीं है.’’

‘‘कैसे नहीं है? तुम ने कहा था न.’’

‘‘मेरी बात छोड़ो. मैं तो यह भी कह रही हूं कि वह अच्छी लड़की है. मात्र मेरी बातों का सहारा मत लो. अपनी जलन को कीचड़ बना कर उस के चरित्र पर मत उछालो.’’

इतना सुनते ही भैया खामोश हो गए.

मैं निशा को ले कर बराबर विचलित रही. 2-3 दिन बीत गए, पर वह कालेज नहीं आई. मैं ने बहुत चाहा कि उस के घर जा कर उस युवक के विषय में पूछूं, पर हिम्मत ही न हुई.

?एक रात फोन की घंटी घनघना उठी.

?फोन निशा का था और वह अस्पताल से बोल रही थी. उस के पिता को दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा था. भैया मेरे साथ उसी समय अस्पताल गए.

निशा के पिता आपातकक्ष में थे. हम उन्हें देखने भीतर नहीं जा सकते थे. मुझे देखते ही वह जोरजोर से रोने लगी. उन के पड़ोसी प्रोफैसर सुदीप चुपचाप पास खड़े थे.

दूसरे दिन सुबह भैया ने कहा था कि मैं निशा को अपने साथ घर ले जाऊं. पर वह हड़बड़ा गई, ‘‘नहीं गीता, मैं पिताजी को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’

निशा के मना करने पर भैया ऊंची आवाज में बोले, ‘‘यहां बैठ कर रोनेधोने से क्या वे जल्दी अच्छे हो जाएंगे? जाओ, घर जा कर कुछ खापी लो. मैं यहीं हूं. पिताजी से कह देना, आज छुट्टी ले लें. जाओ, तुम दोनों घर चली जाओ.’’

वह मेरे साथ घर आईर् तो पिताजी ने कहा, ‘‘घबराना नहीं बेटी, यह मत सोचना कि तुम इस शहर में अकेली हो. हम हैं न तुम्हारे…’’

मेरे मन में बारबार प्रश्न उठता रहा कि आखिर इस संकट की घड़ी में निशा का वह मित्र कहां गायब हो गया? क्या वह मात्र सुख का साथी था?

निशा ने नहा कर मेरी गुलाबी साड़ी पहन ली. मेरा मन भर आया कि काश, निशा मेरी भाभी बन पाती.

मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं? मुझे भैया की आंखों में बसी पीड़ा याद आने लगी.

बरामदे से मां का बिस्तर साफ दिख रहा था. सर्दी में निशा सिकुड़ी सी सोई थी. भीतर जा कर मैं ने उस के ऊपर लिहाफ ओढ़ा दिया.

नहा कर और नाश्ता कर के मैं भी अपने कमरे में जा लेटी. भैया अभी तक घर नहीं लौटे थे. थोड़ी देर बार मेरी पलकें मुंदने लगीं. परंतु शीघ्र ही ऐसा लगा, जैसे कोई मुझे पुकार रहा है, ‘गीता…गीता…उठो न.’’

सहसा मेरी नींद खुल गई. लेकिन मेरी हड़बड़ाहट की सीमा न रही. वास्तव में जो सामने था, वह अविश्वसनीय था. सामने द्वार पर भैया पगलाए से खड़े थे और मेरी पीठ के पीछे निशा छिपने का प्रयास कर रही थी. फिर किसी तरह बोली, ‘‘मेरे पैर पकड़ रहे हैं तुम्हारे भैया. कहते हैं, वे मेरे दोषी हैं. पर मैं ने तो इन्हें पहले कभी नहीं देखा.’’

‘‘गीता, मुझ से घोर ‘पाप’ हो गया. मुझे माफ कर दो, गीता,’’ भैया ने डबडबाई आंखों से मेरी ओर देखा.

सहमी सी निशा कभी मुझे और कभी उन्हें देख रही थी. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘आप ने मेरा क्या बिगाड़ा है जो इस तरह क्षमायाचना…मेरे पिताजी को कुछ हो तो नहीं गया?’’

उन दोनों का सच : क्या पति के धोखे का बदला ले पाई गौरा- भाग 3

तभी उन्हीं दिनों कोविड के प्रकोप से आई विश्वव्यापी मंदी की वजह से पलाश की छंटनी हो गई. एक तरफ उस की महंगी महंगी दवाओं का खर्च, दूसरी तरफ घरगृहस्थी के सौ खर्चे. पलाश की उड़ाऊ आदत और अस्पताल में उस के इलाज पर हुए खर्चे के चलते उस के पास बचत भी कोई खास न थी. नौकरी के दिनों में बिब्बो से अफेयर चलातेचलाते वह उस पर महंगेमहंगे तोहफों के रूप में अपनी तनख्वाह की एक बड़ी रकम उस पर खर्च करता आया था, लेकिन अब उस के बेरोजगार होने पर वह उस पर पहले की तरह उपहारों की बारिश नहीं कर पाता. सो उस की कड़की देख कर उस ने भी पलाश से आंखें फेर ली और किसी दूसरे मुरगे की तलाश में जुट गई. वक्त के साथ अब पलाश के घर उस का आना न के बराबर रह गया था.

पिछले 1 साल से गौरा की मां अपने पड़ोस में किराए पर रहने वाले 10-15 लड़कों के लिए 2 वक्त के खाने का टिफिन भेजने का काम कर रही थी, जो दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था. गौरा की मां पाककला में निपुण थीं. एक बार जो भी उन का बनाया खाना, खासकर सब्जी, दाल चख लेता, उन के स्वाद का दीवाना बने न रहता. वक्त के साथ गौरा की मां के टिफिन के और्डर बढ़ते ही जा रहे थे. काम इतना बढ़ता जा रहा था कि उन से अकेले सिमट नहीं पा रहा था.

तभी घर में पलाश की नौकरी जाने की दशा में गौरा की मां ने गौरा से भी यह काम शुरू करने के लिए कहा, और अपने कुछ और्डर उसे दे दिए. गौरा भी कुकिंग में अपनी मां की तरह सिद्धहस्त थी. गौरा ने पूरी मेहनत और लगन से यह काम शुरू किया और मां की तरह उस की टिफिन सर्विस भी अच्छी चल निकली.
वक्त का फेर, पलाश की नौकरी गए 6 माह होने आए, लेकिन उसे कोई दूसरी अच्छी नौकरी नहीं मिली. नौकरी गई, माशूका गई और इस के साथ ही आर्थिक स्वतंत्रता जाने के साथसाथ पलाश अब गौरा पर पूरी तरह से आश्रित हो गया.

उस की महंगीमहंगी दवाएं सालभर तक चलने वाली थीं. परिस्थितियों के इस मोड़ पर उसे बिब्बो और गौरा के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देने लगा था. गौरा मुंह से कुछ न कहती, न जताती लेकिन उस के प्रति किए गए अपने अन्याय के एहसास से वह अब उस से आंखें न मिला पाता. उस के मन का चोर उसे हर लमहा शर्मिंदा करता.

वक्त के साथ गौरा की टिफिन सर्विस का काम अच्छाखासा बढ़ता जा रहा था. अब उसने रसोई में अपनी मदद के लिए 2 सहायिकाएं रख लीं थीं, जो पूरे काम में उस की मदद करतीं. उसे अब अपनी जिंदगी का मकसद मिल गया था. पति की बेशर्म बेवफाई के बाद यह एक सुखद परिवर्तन था.उधर जिंदगी के इस कठिन दौर ने पलाश को भी एहसास दिला दिया था कि गौरा खरा सोना है और बिब्बो जैसी मतलबपरस्त, चरित्रहीन औरत के लिए उस की बेकद्री कर के उस ने अपनी जिंदगी की महत भूल की थी.
अब वह गौरा के प्रति अपने दुर्व्यवहार को ले कर बेहद शर्मिंदा महसूस करता. इतना कुछ हो जाने के बाद भी गौरा के पति के प्रति पूर्ण समर्पण और परवाह में कोई कमी नहीं आई थी.

वह एक परंपरावादी महिला थी, जो पति के साथ हर हाल में एक छत के नीचे रहने में विश्वास रखती थी. पलाश की बचत लगभग खत्म होने आई थी. अब घर का खर्च पूरी तरह से गौरा की टिफिन सर्विस की आमदनी से चलता. पलाश की महंगीमहंगी दवाओं का आना बदस्तूर जारी रहा. डाक्टरों के निर्देशों के मुताबिक उस के त्वरित स्वास्थ्य लाभ के लिए उस की थाली में भरपूर महंगेमहंगे पोषक खाद्य पदार्थ रहते. उन में किसी तरह की कोई कमी एक दिन के लिए भी नहीं आई. कमी आई थी तो महज पति के प्रति उस के व्यवहार में.

पति के निर्लज्ज प्रेम प्रसंग से उस का उस से मन पूरी तरह से फट गया. उसे उस की शक्ल तक देखना गवारा नहीं था. वह दिनदिन भर मात्र अपनी टिफिन सर्विस के काम में अपने होंठ भींचे व्यस्त रहती. पति के साथ उस की बोलचाल मात्र हां या न तक सीमित रह गई. उस की उस से बात करने की तनिक भी इच्छा न होती.

पति के बेशर्म आचरण से क्षतविक्षत आहत मन उस ने अपनेआप को मौन के अभेद्य खोल में समेट लिया था. पलाश कभी उस से बात भी करता तो वह मात्र हूंहां कर वहां से इधरउधर हो जाती. पिछले कुछ समय से पत्नी के इस नितांत शुष्क और रूखे व्यवहार से पलाश बेहद बेचैनी का अनुभव कर रहा था.

उस दिन गौरा की दोनों सहायिकाओं ने अचानक किसी जरूरी काम से छुट्टी ले ली. गौरा को खुश करने की मंशा से पलाश भी रसोई में घुस गया. उस ने पूरे वक्त एक पैर पर खड़े रह पत्नी की यथासंभव मदद की. अपनी गलती का मन से एहसास कर वह एक बार फिर से पत्नी से अपने संबंध सामान्य बनाना चाहता था. जब से बिब्बो उन दोनों के बीच आई थी, गौरा दोनों बच्चों के साथ दूसरे बैडरूम में सोने लगी थी. गौरा बच्चों के साथ उन के बैडरूम में लेटी हुई थी कि पलाश ने दोनों सोते हुए बच्चों को गोद में उठा कर अपने बैडरूम के पलंग पर सुलाया और खुद पत्नी के बगल में लेट गया.

तभी उसे पलंग पर आया देख गौरा ने उठने का उपक्रम किया ही था कि पलाश ने उसे खींच कर अपने सीने पर गिरा दिया और उस की आंखों में झांकते हुए उस से बोला, “गौरा और कितने दिन मुझ से गुस्सा रहोगी? अब गुस्सा थूक भी दो. मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो गया है.

“बिब्बो जैसी औरत के लिए मैं ने तुम्हारी बेकद्री की. मुझ से बड़ी भूल हुई. प्लीज, मुझे माफ कर दो,” पति की यह बातें सुन कर गौरा की आंखों में आंसुओं का सैलाब उतर आया और रुंधे गले से वह बोली, “तुम्हारी गलती की कोई माफी नहीं है. तुम ने बिब्बो जैसी सस्ती औरत के लिए मुझे खून के आंसू रुलाए. मैं तुम्हें जिंदगी भर माफ नहीं करूंगी. तुम ने मेरा बहुत जी दुखाया है. अब मुझ से माफी की उम्मीद मत रखो.”

पलाश के पास पत्नी के इस कड़वे उलाहने का कोई जवाब नहीं था. उस ने बेबस करवट बदल कर आंखें मूंद लीं. गोरा की आंखों में खून के आंसू थे तो पलाश की आंखों में पश्चाताप के. अब शायद आंसू ही उन दोनों की नियति थी, उन दोनों का सच था.

पीली साड़ी पहन पूल में उतरी श्वेता तिवारी, 42 की उम्र में दिए बोल्ड पोज

टीवी सीरियल की मशहूर अदाकारा श्वेता तिवारी हमेशा ही अपने बोल्ड लुक को लेकर सुर्खियों में रहती है ऐसी ही कुछ तस्वीरें हाल में श्वेता तिवारी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर की है जिसके पोस्ट करते ही फोटो वायरल हो गई है लोग श्वेता की जमकर तारीफ करते दिख रहे है.

 

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आपको बता दें, कि श्वेता तिवारी इन फोटो में पीली रंग की साड़ी में नजर आ रही है जिसमें वह बेहद ही हॉट लग रही है. श्वेता तिवारी की उम्र 42 साल की है जिसमें वो इन फोटो में सबके होश उड़ाती नजर आ रही है.पीली रंग की साड़ी में श्वेता पूल में बोल्ड पोज देती हुई दिख रही है हर पोज में वह बेहद ही खूबसूरत लग रही है. ये फोटो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है.लोग इसपर जमकर कमेंट करते दिख रहे है.

 

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सामने आईं इन लेटेस्ट फोटोज में अदाकारा श्वेता तिवारी किलर पोज से फैंस को दीवाना बनाती दिखीं. जिसकी तस्वीरें आग की तरह वायरल हो गईं. अदाकारा श्वेता तिवारी की ये तस्वीरें देख फैंस भी हैरान हैं. उनकी तस्वीरें देख एक यूजर ने कमेंट कर लिखा, ‘कौन कहेगा कि इनकी 25 साल की एक बेटी है और खुद ये 42 साल की हैं. अदाकारा श्वेता तिवारी सामने आए इस फोटोशूट में मंदाकिनी की तरह सेंसुअस पोज करती दिखीं. ये तस्वीरें इंटरनेट पर आते ही वायरल हो गईं.

 

YRKKH: अबीर को ढ़ूंढ़ने के लिए लाखों का इनाम रखेगा अभिमन्यु, अक्षु की सेवा करेंगी मंजरी

इन दिनों ये रिश्ता क्या कहलाता है ( yeh Rishta kya kehlata hai) में हाई वॉल्टेज ड्रामा देखने को मिल रहा है शो काफी बहतर चल रहा है. शो में हर दिन कुछ नया देखने को मिल रहा है बीते एपिसोड में देखने के लिए मिला था कि अक्षरा अबीर के गायब होने की खबर सुनते ही उदयपुर पहुंच जाती है.यहां पर वह अभिमन्यु पर खूब भड़कती है और तभी उसकी तबीयत खराब हो जाती है.दूसरी तरफ अबीर भी एक कपल के घर पर पहुंच जाता है. सीरियल का ड्रामा यहीं खत्म नहीं होगा. ये रिश्ता क्या कहलाता है के अपकमिंग एपिसोड में अक्षरा भी घर से भागने की कोशिश करेगी. वहीं, अभिमन्यु अबीर को वापिस लाने के लिए गेम खेलेगा.

अपकमिंग एपिसोड़ में देखने को मिलेगा की अबीर एक कपल के घर पहुंच जाएगा. जहां वह अबीर से उसके मां-बाप का नाम पूछते है तब अबीर उन्हे अक्षरा और अभिनव के बारें में बताता है. और बताता है कि उसके मां-पापा कसौली में रहते हैं. दूसरी तरफ बिरला हाउस से अभिनव अक्षरा को ले जाने की बात करता है, तो आरोही उसे रोक लेती है. इसके बाद, मंजरी को भी अपनी गलतियों का पछतावा होता है और वह बीमार अक्षरा की सेवा करने लगती है.

अबीर के लिए इनाम रखेगा अभिमन्यु

सीरियल में आगे देखने के लिए मिलेगा कि अभिमन्यु अपने बेटे को पाने के लिए एक ईनाम का एलान करेगा. वह मीडिया के सामने आकर कहेगा कि जो उसके बेटे को ढूंढकर लाएगा वह उसे 50 लाख का ईनाम देगा, ये बात उस कपल को भी पता चल जाती है, जहां अबीर रह रहा होता है. इस चीज की भनक अबीर को भी लग जाती है और वह वहां से भाग जाता है. वह कपल अबीर को ढूंढने की कोशिश करता है.

 

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ये रिश्ता क्या कहलाता है में आगे देखने के लिए मिलेगा कि अक्षरा को बिरला हाउस में होश आ जाता है और वह वहां से भागने की कोशिश करती है. तब परिवार के लोग उसे पकड़ लेते हैं और खाना खिलाने की जिद्द करते हैं. इस दौरान अक्षरा किसी की नहीं मानती, लेकिन कुछ देर बाद अचानक ही अक्षु का मुड बदल जाता है और वह खाना खाने के लिए मान जाती है. हालांकि, अभिमन्यु अक्षरा की चाल समझ जाता है और वह पहले ही गाड़ी तक पहुंच जाता है. इसके बाद अक्षरा सबको चमका देकर आती है और अभि काफी बहस के बाद अक्षरा को अपने साथ ले जाता है.

आखिर क्या था कमरा नंबर 104 का रहस्य

अमृतसर के सिटी सैंटर स्थित होटल सिंह इंटरनेशनल के रिसैप्शन पर बैठे मैनेजर दीपक से आने वाले युवक ने कहा था कि उसे ठहरने के लिए कमरा चाहिए तो उन्होंने रूम बौय को आवाज दे कर उसे कमरा दिखाने भेज दिया था. रूमबौय उस युवक को कमरा दिखाने फर्स्ट फ्लोर पर ले जाने लगा तो उस ने साथ आई युवती को स्वागतकक्ष में ही बैठा दिया था और खुद कमरा देखने चला गया था. युवक को कमरा पसंद आ गया तो दीपक ने एंट्री रजिस्टर उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘सर, इस में आप अपना नामपता और फोन नंबर आदि लिख कर अपनी और मैडम की आईडी दे दीजिए. कमरे का किराया एक हजार रुपए प्रतिदिन होगा और नियम के अनुसार चैकआउट का समय दोपहर 12 बजे होगा.’’

दीपक से एंट्री रजिस्टर ले कर उस ने युवक ने अपना नाम रणवीर सिंह और साथ आई युवती को पत्नी बता कर उस का नाम मोनिका लिख दिया. पता उस ने 26-ए, नियर केवीएस मालवीय रोड, जयपुर, राजस्थान लिखा. मोबाइल नंबर- 8766711800 लिख कर अपनी और पत्नी मोनिका की आईडी दीपक के पास जमा करा दी. इस के बाद रूम बौय ने उन्हें होटल के कमरा नंबर 104 में पहुंचा दिया. यह 12 नवंबर, 2016 की बात है. उस समय शाम के यही कोई साढे़ 4 बज रहे थे.

कुछ देर आराम करने के बाद दोनों ने चायनाश्ता किया और स्वर्णमंदिर श्री हरमिंदर साहिब के दर्शन करने चले गए. लौट कर उन्होंने रात का खाना होटल से ही मंगवा कर खाया. अगले दिन यानी 13 नवंबर को दोनों सुबह 11 बजे घूमने के लिए निकले तो रात करीब साढ़े 8 बजे लौटे. खाना वगैरह खा कर वे सो गए तो अगले दिन यानी 14 नवंबर को दोनों में से न कोई बाहर आया और न चायनाश्ता या खाना मंगाया.

पूरा दिन बीत गया और उस कमरे में कोई हलचल नहीं हुई तो रात 10 बजे के करीब होटल मैनेजर दीपक यह पता करने के लिए कमरा नंबर 104 के सामने जा पहुंचे कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि करीब 30 घंटे से इस कमरे से कोई बाहर नहीं निकला है.

दीपक ने दरवाजा भी खटखटाया और आवाजें भी दीं, लेकिन अंदर किसी तरह की हलचल नहीं हुई. उन्होंने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. अंदर उन्हें जो दिखाई दिया, वह परेशान करने वाला था. वह भाग कर नीचे आए और होटल के मालिक करनदीप सिंह को फोन कर के कहा, ‘‘सरदारजी, कमरा नंबर 104 में एक लाश पड़ी है.’’

करनदीप सिंह फौरन होटल पहुंचे तो सारा स्टाफ कमरा नंबर 104 के सामने खड़ा था. उन्होंने देखा, कमरे के बैड पर 24-25 साल की एक युवती की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. पूछने पर मैनेजर दीपक ने बताया, ‘‘यह युवती 2 दिनों पहले ही अपने पति रणवीर सिंह के साथ होटल में आई थी.’’

‘‘इस का पति कहां है?’’

‘‘13 नवंबर की रात से वह दिखाई नहीं दिया.’’ दीपक ने कहा.

इस के बाद करनदीप सिंह ने थाना रामबाग की बसअड्डा पुलिस चौकी को फोन कर के मुंशी संजीव कुमार को इस बात की सूचना दे दी. सूचना मिलते ही चौकीइंचार्ज एएसआई सुशील कुमार पुलिस बल के साथ होटल सिंह इंटरनेशनल आ पहुंचे. होटल में लाश मिलने की सूचना उन्होंने थाना रामबाग के थानाप्रभारी, एसीपी और क्राइम टीम को भी दे दी थी.

उन्हीं की सूचना पर थाना रामबाग के थानाप्रभारी इंसपेक्टर दलविंदर कुमार, एसीपी (ईस्ट) गुरमेल सिंह भी होटल आ पहुंचे थे. पुलिस ने कमरे और लाश का निरीक्षण किया. बैड पर लाश पड़ी थी. उसी के पास रखी टेबल पर खून सनी एक हथौड़ी रखी थी. उसी टेबल पर पानी का जग और 2 गिलास रखे थे.

मृतका के सिर के पिछले हिस्से में गहरे घाव थे. चेहरे पर भी चोटों के गंभीर निशान थे, जो संभवत: हथौड़ी के वार से हुए थे. फिंगरप्रिंट विशेषज्ञों के अनुसार, हत्यारा इतना चालाक था कि उस ने कमरे की इस तरह सफाई की थी कि कहीं भी उस की अंगुली के निशान नहीं मिले थे. हथौड़ी पर भी अंगुलियों के निशान नहीं थे.

चौकीइंचार्ज ने लाश को कब्जे में ले कर सारी काररवाई निपटाई और पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर अपराध संख्या 460/2016 पर हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

पुलिस ने होटल में लगे सीसीटीवी कैमरों की 12 नवंबर से 15 नवंबर तक की फुटेज कब्जे में ले ली थी. रजिस्टर में दर्ज रणवीर और मोनिका का पता, फोन नंबर नोट कर के रणवीर द्वारा होटल में जमा कराई गई आईडी भी अपने कब्जे में ले ली.

पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या रणवीर ने ही की है, इसलिए चौकीइंचार्ज सुशील कुमार ने उस की तलाश के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में उन्होंने एएसआई बलदेव सिंह, हैडकांस्टेबल बलविंदर सिंह, हीरा सिंह, बूटा सिंह, गुरचरण सिंह, गुरप्रीत सिंह, हरप्रीत सिंह, हरजिंदर सिंह और कांस्टेबल रणजीत सिंह को शामिल किया.

होटल के रजिस्टर में रणवीर द्वारा लिखवाया गया मोबाइल नंबर चैक किया गया तो वह फरजी पाया गया. जयपुर भेजी गई पुलिस टीम ने लौट कर बताया कि होटल में रणवीर ने जो पता लिखाया था और जो आईडी दी थी, वे सब फरजी थीं. इस के बाद सीसीटीवी फुटेज से मिले रणवीर और मोनिका के फोटो पंजाब और राजस्थान के सभी थानों को भेज कर कहा गया कि अगर इन के बारे में कोई जानकारी मिले तो सूचना दी जाए.

लाश का पोस्टमार्टम होने के बाद शिनाख्त न होने की वजह से चौकीइंचार्ज सुशील कुमार ने अपने खर्चे से उस का अंतिम संस्कार करा दिया. लाख प्रयास के बाद भी रणवीर और मृतका के बारे में कोई जानकारी न मिलने से सुशील कुमार भी शांत हो गए.

लेकिन 8 दिसंबर, 2016 को अचानक बाड़मेर, राजस्थान के पुलिस अधीक्षक गगन सिंगला के औफिस से एक संदेश मिला, जिस में कहा गया था कि अमृतसर के होटल सिंह इंटरनेशनल के कमरा नंबर 104 में पत्नी भावना चौधरी की हत्या कर के फरार हुआ हत्यारा राजेंद्र चौधरी उन की हिरासत में है.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए चौकीइंचार्ज सुशील कुमार अपने साथ हैडकांस्टेबल हरप्रीत सिंह, हरजिंदर सिंह और बलविंदर सिंह को ले कर 9 दिसंबर को बाड़मेर पहुंच गए. थाना सदर के थानाप्रभारी जयराम चौधरी के सामने उन्होंने राजेंद्र चौधरी से शुरुआती पूछताछ कर के विस्तारपूर्वक पूछताछ करने एवं सबूत जुटाने के लिए 10 दिसंबर, 2016 को उसे बाड़मेर के जेएमसी अंबिका सोलंकी बल्होत्रा की अदालत में पेश कर के 3 दिनों के ट्रांजिट रिमांड पर ले लिया.

राजेंद्र चौधरी उर्फ रणवीर सिंह को अमृतसर ला कर ड्यूटी मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर के रिमांड पर लिया और पुलिस चौकी ला कर पूछताछ की गई तो होटल सिंह इंटरनेशनल के कमरा नंबर 104 में हुई युवती की हत्या के बारे में की गई पूछताछ में उस ने जो कहानी बताई, वह घरेलू कलह और संदेह के घेरे में कैद एक अविवेकी पुरुष की मानसिकता से जुड़ी कहानी थी.

राजेंद्र प्रकाश चौधरी राजस्थान के जिला बाड़मेर के सारणनगर-जालिया के रहने वाले तगाराम का बेटा था. राजेंद्र के अलावा उन की 2 संतानें और थीं, एक बेटा और एक बेटी. 12वीं करने के बाद राजेंद्र डिस्कौम कंपनी में इलैक्ट्रिशियन की नौकरी करने लगा था. पितापुत्र की कमाई से घर के खर्च आराम से चल जाते थे.

राजेंद्र की नौकरी लग गई तो घर वालों ने लड़की देख कर 10 जून, 2014 को भावना से उस की शादी कर दी. भावना बहुत खूबसूरत तो नहीं थी, लेकिन खराब भी नहीं थी. पतिपत्नी दोनों सामान्य शक्लसूरत के थे, इसलिए दोनों ही एकदूसरे को दिल से चाहते थे. पर इस में परेशानी तब खड़ी हुई, जब राजेंद्र पत्नी पर संदेह करने लगा.

दरअसल, भावना का हंसमुख स्वभाव ही उस के लिए दुश्मन बन गया. अपने इसी स्वभाव की वजह से वह हर किसी से हंसहंस कर बातें कर लेती थी. उस के इसी स्वभाव की वजह से घर वाले ही नहीं, बाहर वाले भी उसे पसंद करते थे. लेकिन राजेंद्र को उस का यह स्वभाव यानी हर किसी से हंसनाबोलना जरा भी पसंद नहीं था.

इसी बात को ले कर पहले तो थोड़ीबहुत कहासुनी होती रही, लेकिन धीरेधीरे इस कहासुनी ने झगड़े का रूप ले लिया. जब यह झगड़ा रोजरोज होने लगा तो राजेंद्र की मोहल्ले में बदनामी होने लगी. इस बदनामी से बचने के लिए उस ने घर छोड़ दिया और नेहरूनगर में किराए का मकान ले कर पत्नी के साथ रहने लगा.

राजेंद्र ने घर जरूर बदल लिया था, लेकिन न उस का स्वभाव बदला था और न भावना का. इसलिए घर वालों से अलग होने के बाद पतिपत्नी के बीच होने वाले झगड़े और ज्यादा होने लगे. वह भावना को किसी से बातें करते देख लेता तो उस का खून खौल उठता. भावना लाख सफाई देती, लेकिन वह उस की बातों पर बिलकुल विश्वास नहीं करता था. इसी वजह से वह शराब भी पीने लगा.

एक दिन झगड़ा करने के बाद राजेंद्र ने शराब पी तो उस के दिमाग में आया कि ऐसी बेशर्म और बदचलन औरत को मौत के घाट उतार देना ही ठीक है. यह जब तक जिंदा रहेगी, उसे इसी तरह जिल्लत और बदनामी झेलनी पड़ेगी. बस इसी के बाद वह भावना की हत्या के बारे में सोचने लगा.

वह भावना की हत्या कुछ इस तरीके से करना चाहता था कि किसी भी सूरत में पकड़ा न जाए. इस के लिए वह साइबर कैफे जा कर इंटरनेट पर भावना की हत्या के लिए आइडिया ढूंढ़ने लगा. आखिर एक दिन उसे आइडिया मिल गया. इस के बाद उस ने बाजार से एक सर्जिकल ब्लेड और हथौड़ी खरीद कर रख ली.

इस के बाद राजेंद्र ने साइबर कैफे से ही अपने और भावना के फरजी नाम रणवीर और मोनिका के नाम से पहचान पत्र बनाया. योजना के अनुसार, उस ने भावना से लड़ाईझगड़ा बंद कर दिया और उसे विश्वास में लेने के लिए प्यार से बातें करने लगा. फरजी पहचान पत्र से नया सिम खरीद कर उस ने भावना से कहा, ‘‘अब हमारे घर का झगड़ाक्लेश खत्म हो गया है, क्यों न हम कहीं घूमने चलें?’’

भावना को भला इस में क्या ऐतराज हो सकता था. वह तैयार हो गई तो 10 नवंबर, 2016 को फरजी पहचान पत्र से टिकट करा कर वह भावना के साथ अमृतसर आ गया. घर से चलते समय उस ने अपना मोबाइल फोन घर में ही खड़ी मोटरसाइकिल की डिक्की में रख दिया था, जिस से कभी कोई बात हो तो उस के फोन की लोकेशन घर की मिले.

अमृतसर में उस ने होटल सिंह इंटरनेशनल में कमरा नंबर 104 बुक कराया और उसी में भावना के साथ ठहर गया. 13 नवंबर को दिन में उस ने भावना को अमृतसर में घुमाया और रात 9 बजे लौट कर होटल के कमरे में ही शराब पीने बैठ गया. बातोंबातों में प्यार की दुहाई दे कर उस ने भावना को भी शराब पिला दी.

रात के 11 बजे के करीब राजेंद्र ने देखा कि भावना की नशे और नींद की खुमारी में आंखें बंद हो रही हैं तो पहले उस ने उसे पीटपीट कर अधमरा कर दिया. इस के बाद साथ लाई हथौड़ी से उस के सिर और चेहरे पर कई वार किए. वह बेहोश हो गई तो सर्जिकल ब्लेड से श्वांस नली काट दी.

भावना की हत्या करने के बाद उस ने कमरे में मौजूद एकएक चीज से अपनी अंगुलियों के निशान मिटाए. इस के बाद 12 बजे के करीब कमरे का दरवाजा बंद कर के वह होटल के बाहर निकल गया. रेलवे स्टेशन से उस ने ट्रेन पकड़ी और बाड़मेर पहुंच गया.

घर आने पर उसे पता चला कि उस की अनुपस्थिति में उस का साला देवेंद्र भावना के बारे में पता करने आया था. इस के बाद जब उस से भावना के बारे में पूछा गया तो सारी सच्चाई सामने आ गई और भावना की हत्या का राज खुल गया.

सबूत जुटाने के लिए राजेंद्र को 2 दिनों के रिमांड पर और लिया गया. इस बीच उस की निशानदेही पर उस के घर से सर्जिकल ब्लेड बरामद कर ली गई. हथौड़ी होटल के कमरे से बरामद ही हो चुकी थी, इसलिए 2 दिनों का रिमांड समाप्त होने पर उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मंदिरों के भरम में दलित

यह धर्म ही बताता है कि किसी भी जने का ऊंची या नीची जाति में पैदा होना उस के पिछले जन्म में किए गए पुण्य या पाप का नतीजा होता है. समाज में सब से निचले पायदान पर दलित हैं. सब से ऊपर ब्राह्मण, जिसे समाज का दिमाग कहा गया, इसी तरह से क्षत्रिय को छाती, बनिए को पेट या उदर और शूद्र को सब से नीचे पैरों का हिस्सा बताया गया. शूद्र वे हैं, जिन्हें आज बैकवर्ड कहा जाता है.

धार्मिक कहानियों के जरीए बारबार इस बात को बताया गया कि मंदिरों में पूजापाठ, धर्मकर्म करना अपने आने वाले जन्म को बेहतर बनाने के काम आता है. दलितों को 5वीं जाति यानी अछूत या जाति के बाहर के लोग कहा जाता था. उन को इस बात का बारबार एहसास कराया गया कि मंदिरों में पूजापाठ करना या धार्मिक ग्रंथ पढ़ना, यह सब उन के लिए नहीं है.

आज भी देश में तमाम मंदिर ऐसे हैं, जहां दलितों के लिए पूजापाठ करना मना है. कई बार ऐसे मंदिरों में प्रवेश को ले कर लड़ाईझगड़ा तक होता रहता है. मंदिरों में पुजारी के रूप में कहीं भी दलित नहीं हैं. धर्म के इसी भेदभाव का शिकार हो कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था.

आजादी के समय देश में धार्मिक लैवल पर भेदभाव और छुआछूत बड़े पैमाने पर था. यही वजह है कि दलित समाज को बराबरी का दर्जा देने के लिए सरकारी नौकरियों और चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक हलकों में रिजर्वेशन दिया गया. इस वजह से दलित समाज का एक बड़ा तबका माली और सामाजिक रूप से आगे बढ़ गया.

लेकिन इस तबके ने दलित समाज की सामाजिक भलाई के लिए किसी तरह का कोई सहयोग नहीं किया. यह तबका पूरी तरह से इस कोशिश में लग गया कि वह सामाजिक रूप से दलित की पहचान से छूट जाए. साथ ही, इस तबके ने दलित तबके से अपना रिश्ता वहीं तक रखा, जहां उसे रिजर्वेशन की जरूरत पड़ी.

अपने नाम के आगे दलित जाति से अलग ‘सरनेम’ रख लिया. यही नहीं, यह तबका मंदिरों में जा कर पूजापाठ करने लगा. अपने घर में ही मंदिर बना लिया. यह तबका दलित समाज के कमजोर और गरीब तबके को यह समझाने लगा कि पूजापाठ का ही नतीजा है कि वह आज ऊंच तबके के बराबर खड़ा है.

दलितों का मंदिरों से कोई भला नहीं होगा, यह इस बात से समझा जा सकता है कि कारसेवा करने वाले दलित तो हैं, पर उन के साथ जब गैरदलित हों तो घर वाले उन का शुद्धीकरण कराते हैं. जब वे घर लौटते हैं, तो उन्हें गाय छूने को कहा जाता है और उन पर गंगाजल छिड़का जाता है.

अहमदाबाद के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर राजन प्रियदर्शी कहते हैं, ‘‘दलितों को गैरदलित पड़ोसी तक बनाने को तैयार नहीं हैं. गुजरात में कोई दलित अपनी मनपसंद जगह नहीं रह सकता. 98.1 फीसदी गांवों में दलितों को पूजापाठ करने के बावजूद गैरदलितों के यहां मकान किराए पर नहीं मिल सकता. मुझे खुद मजबूरन दलित बहुल इलाके में ही रहना पड़ा है.’’

2014 में पिलखुवा, उत्तर प्रदेश के शुकलान महल्ले में चंडी मंदिर में पूजा करने गए एक दंपती को पुजारी ने पूजा नहीं करने दी और अंजू वाल्मीकि व प्रमोद वाल्मीकि को रोक दिया. ये वहां करने ही क्या गए थे?

चंदौली, उत्तर प्रदेश के एक स्कूल से इसी अक्तूबर महीने में एक छात्रा को निकाल दिया गया, क्योंकि वह दलित जाति की थी. जब स्कूलों में उन्हें स्वीकारा नहीं जा रहा, जो सरकारी पैसों पर चल रहे हैं, जहां पूजापाठ नहीं हो रहा, तो मंदिरों में क्या स्वीकार होंगे और वहां दलितों को मिलेगा क्या?

कांग्रेस की नेता कुमारी शैलजा 2013 में जब द्वारका गईं, तो उन से पुजारी ने उन की जाति पूछी. पूर्व मंत्री कुमारी शैलजा कांग्रेस की दलित नेता हैं, फिर भी उन्हें इस अपमान से मुक्ति नहीं मिली. अफसोस यह है कि कुमारी शैलजा मंदिर देखने नहीं गईं, वहां मत्था टेकने गईं और यही गलत है.

कुछ साल पहले नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया था, पर मधुबनी जिले में एक मंदिर में बतौर मुख्यमंत्री जाने के बावजूद उसे धोया गया और उस बिहार में उसी जीतनराम मांझी के संरक्षक रहे नीतीश कुमार आज उसी भाजपा के पैरों पर गिरे पड़े हैं, जो दलितों को अपनी औकात में रखना चाहती है और मंदिर उस की साजिश की धुरी हैं.

दलितों में बढ़ रहा पाखंड

धर्म के नाम पर चल रहे तमाम पाखंड चढ़ावा चढ़ाने के लिए होते हैं. दलित तबके के ‘नवहिंदुत्व’ में शामिल हुए लोग चढ़ावा चढ़ाने में सवर्णों से भी आगे होने लगे हैं. वे अपने घर पर पूजापाठ करने के लिए पुजारियों को बुलाने लगे हैं.

गरीब दलित के यहां जाने से आनाकानी करने वाले पुजारी यहां पूजा कराने आने लगे. इस की वजह यह नहीं थी कि पुजारी के मन से छुआछूत की भावना मिट गई थी. इस की वजह यह थी कि यहां मुंहमांगा चढ़ावा मिलने लगा था.

एक पुजारी ने बताया, ‘‘नवरात्र के दिनों में मैं एक ऐसे ही परिवार के यहां रोज पूजापाठ और हवन करने जाता था. उन लोगों ने हर दिन के लिए नए कपड़े दिए और कहा कि आप को रोज नए कपड़े पहन कर ही हवन करना है.

‘‘उन्होंने हमारी सोच से ज्यादा चढ़ावा दिया. नवरात्र के खत्म होने पर मुझे दक्षिणा दे कर विदा किया. हमें वहां इतना चढ़ावा मिला, जितना 5 सवर्ण परिवार मिल कर भी नहीं देते थे.’’

आजादी के कुछ सालों तक दलितों के तमाम संगठन ऐसे थे, जो यह बताते थे कि दलितों की हालत के लिए जिम्मेदार धार्मिक कुरीतियां, रूढि़वाद और छुआछूत है. जब तक यह है, तब तक दलितों को समाज में बराबरी का हक नहीं मिलने वाला.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बाद उत्तर प्रदेश में कांशीराम ने दलितों को जागरूक करने का काम किया. उन्हें यह लगता था कि राजनीतिक सत्ता हासिल कर के ही दलितों की तरक्की की जा सकती है.

कांशीराम के बाद बसपा की नेता मायावती को अपने सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले के बाद लगा कि जो सवर्ण मंच पर उन के पैर छू रहे हैं, उस से दलितों के हालात बदल जाएंगे, जबकि अगड़ों का मायावती के पैर छूना एक राजनीतिक मजबूरी थी. इस का सामाजिक बराबरी से कोई लेनादेना नहीं था.

पूजापाठ में दिलचस्पी

दलितों की ताकत समझ चुके अगड़ों को समझ आ गया था कि जातिवाद के सहारे ताकत हासिल करना मुश्किल है. ऐसे में दलितों को धार्मिक पाखंड से जोड़ा जाने लगा. जिन मंदिरों में कभी दलितों को घुसने नहीं दिया जाता था, वहां उन को प्रवेश दिया जाने लगा.

अब बहुत ही कम ऐसे मंदिर बचे हैं, जहां दलितों को प्रवेश न मिलता हो. दलितों को इस बात के लिए दिमागी रूप से तैयार किया जाने लगा कि वे अपने मंदिर खुद बना लें.

अब दलितों की नौजवान पीढ़ी इस धार्मिक पूजापाठ में ज्यादा दिलचस्पी रखने लगी है. यह पीढ़ी ऐसी है, जो थोड़ीबहुत पढ़ीलिखी है. वह किताबें पढ़ लेती है. बड़े घरों को देख कर अपने घर में धार्मिक कहानियों की किताबें पढ़ने लगी है. किताबों में लिखी विधि के हिसाब से पूजापाठ करने लगी है.

गणेश, दुर्गा और सरस्वती की पूजा कर के उन की मूर्तियों के विसर्जित करते समय देखा जाता है कि बहुत सी दलित बस्तियों में यह शुरू हो चुका है. पहले यह रिवाज शहरों में था, पर अब गांव और कसबों में भी दिखने लगा है. रातरातभर आरकेस्ट्रा पर फिल्मी गानों की धुनों पर भजन बजते हैं.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘हैरानी की बात तो यह है कि दलित और पिछड़े तबके के ये नौजवान पढ़ेलिखे होने के बाद भी धर्म की कहानियों में लिखी बातों को समझने की कोशिश नहीं करते. जिन चौपाइयों और कहानियों में दलित तबके की बुराई की गई है, उस लाइन को भी वह जोरशोर से पढ़ते हैं. वे यह भी नहीं सोचते हैं कि इन लाइनों में दलित तबके को ही गलत बताया गया है.

‘‘असल में इन नौजवानों का कुसूर भी नहीं है. पहले दलितों के लिए काम करने वाले संगठन बताते थे कि किनकिन धर्मग्रंथों में धार्मिक कहानियों के जरीए दलितों की बुराई की गई है. उस समय बहुत सारे दलित होलीदीवाली नहीं मनाते थे. ये त्योहार धार्मिक रूप से हिंदुओं की अगड़ी जातियों के त्योहार माने जाते थे. राम की आलोचना होती थी. ये बातें आज की नौजवान पीढ़ी को नहीं पता. धर्म का प्रचार करने वाले धर्म की सचाई बताने वालों से अधिक संगठित हो गए हैं.’’

बढ़ रहे हैं धार्मिक मेले

दलित परिवारों में धार्मिक मेलों की अहमियत बढ़ रही है. आज भी गांवकसबों की औरतों को घूमनेफिरने की बहुत आजादी नहीं है. ऐसे में जब कोई उन के आसपास मेला लगता है, तो उन का वहां जाना आसान हो जाता है. ऐसे मेले किसी मंदिर या फिर धार्मिक जगह पर होते हैं.

यहां जाने वालों को 2 तरह का फायदा हो जाता है. वे मेला भी घूम लेते हैं और घरों की जरूरत का सामान भी खरीद लेते हैं. बीमारी से ले कर बाकी जरूरतों के लिए ये लोग मंदिरों, बाबाओं और ओझाओं की शरण में जाने से नहीं चूकते हैं. दलित औरतें पहले से ही धर्म को ले कर बहुत डरी रहती हैं. ऐसे में वे बाबाओं की हर बात मान लेती हैं.

लखनऊ के पास बाराबंकी जिले में एक बाबा की सीडी सामने आई, जिस में वे तमाम औरतों का बांझपन दूर करने का उपाय करते थे. कई सीडी में वे सैक्स करते भी दिखे. इन औरतों में बड़ी तादाद दलित औरतों की थी.

जागरूकता की कमी

धार्मिक मेलों में भगदड़ के समय मरने वालों में अगर देखें, तो उन में इन गरीब लोगों की तादाद सब से ज्यादा होती है. धार्मिक भरोसे के मामले में दलित सब से अधिक धर्मभीरु बनते जा रहे हैं. उन के धर्म से प्रभावित होने की वजह गरीबी है.

गरीब को लगता है कि यह सब उस के पिछले जन्म के किए गए बुरे कामों का नतीजा है. ऐसे में वे इस जन्म में अपने काम के प्रति धार्मिक हो जाते हैं.

अब दलित तबके के पास भी पैसा है. वह रोज न सही, पर 2-4 महीने में किसी न किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होता है. मीडिया भी ऐसी खबरों को प्रमुखता से दिखाता है.

कुंभ के मौके पर दलितों के लिए नहाने का अलग से इंतजाम होता है. यह बात इस तरह से सामने रखी गई, जिस से कुंभ में नहाने के बाद दलितों की सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. केवल पूजापाठ ही नहीं, अब दलित भी परिवार में किसी के मरने के बाद तेरहवीं जैसे भोज करने लगे हैं.

इस बारे में रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘छुआछूत और गैरबराबरी की बात धर्म की ही देन है. इस के बाद भी धर्म पर भरोसा बढ़ता जा रहा है. आज कई दलित इस बात के लिए आंदोलन करते हैं कि उन को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता.

‘‘सोचने वाली बात यह है कि जिस मंदिर में उन को बराबरी का हक नहीं दिया जाता, वहां जा कर वे क्या हासिल कर लेंगे? इस के बाद भी वे ऐसे मंदिरों में जाने की जिद करने लगते हैं.

‘‘असल में आजादी के बाद दलितों में जिस तरह से मंदिर का भरम कम हुआ था, वह अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के बाद फिर से उभर आया है.

‘‘अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के समय समाज दलितपिछड़ों और अगड़ों की जमात में खड़ा था, पर अब जातिवाद पर धर्म हावी हो गया है.’’

दलित नेता बने मार्गदर्शक

पहले दलितों के नेता अपने लोगों को जागरूक करते थे और खुद भी ऐसे आंडबरों से दूर रहते थे. डाक्टर भीमराव अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने अपनी निजी जिंदगी में पाखंड को कभी अहमियत नहीं दी. बाद में आने वाले नेताओं में पाखंड बढ़ने लगा. ये लोग न केवल मंदिर जाने लगे, बल्कि  खुद भी पूजापाठ, हाथ में अंगूठी, कलावा बांधने लगे. अपने पद को बचाए रखने के लिए हवन और जाप कराने लगे. इन को देख कर इन के समर्थक और अनुयायी भी उसी दिशा में बढ़ने लगे.

शहरों में बस चुके दलित केवल रिजर्वेशन का फायदा लेते समय ही दलित होने का प्रमाणपत्र दाखिल करते हैं. उस के बाद वे खुद को सवर्ण समझ लेते हैं. धर्म के कामों में लग कर वे ऊंची जातियों की बराबरी का सपना देखने लगते हैं.

दलितों को यह समझ नहीं आता कि मंदिरों में पूजापाठ करने से समाज में उसे बराबरी का दर्जा हासिल नहीं होगा. समाज में बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए उसे कुरीतियों से मुकाबला करना होगा. वे कुरीतियां धर्म के पाखंड के चलते ही समाज में फैली हुई हैं.

दलितों को समाज से छुआछूत और भेदभाव को दूर करना है, तो मंदिरों के भरम से उसे बाहर निकलना होगा. जब तक वह पापपुण्य, पिछला जन्म भूल कर  पढ़लिख नहीं जाएगा, तब तक समाज में गैरबराबरी का शिकार होता रहेगा.

अगर आप अनचाहे सेक्स का शिकार हैं तो जरूर पढ़ें ये खबर

दिन ब दिन बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोतरी होती जा रही है. इस के कई कारण हैं, जिन में एक है मानसिक हिंसा की प्रवृत्ति का बढ़ना. बलात्कार शब्द से एक लड़की या युवती पर जबरदस्ती झपटने वाले लोगों के लिए हिंसात्मक छवि उभर कर सामने आती है. इस घृणित कार्य के लिए कड़े दंड का भी प्रावधान है. मगर बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि वैवाहिक जिंदगी में भी बलात्कार वर्जित है और इस के लिए भी दंड दिया जाता है. मगर इसे बलात्कार की जगह एक नए शब्द से संबोधित किया जाता है और वह शब्द है अनचाहा सेक्स संबंध.

आज अनचाहे सेक्स संबंधों की संख्या बढ़ गई है. समाज जाग्रत हो चुका है और अपने शरीर या आत्मसम्मान पर किसी भी तरह का दबाव कोई बरदाश्त नहीं करना चाहता है. इस विषय पर हम ने समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों से बातचीत भी की और जानने की कोशिश की कि आखिर क्या है यह अनचाहा सेक्स संबंध?

डा. अनुराधा परब, जो एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैं, बताती हैं, ‘‘बलात्कार और अनचाहे सेक्स में बहुत महीन सा फर्क है. बलात्कार अनजाने लोगों के बीच हुआ करता है और एक पक्ष इस का सशरीर पूर्ण विरोध करता है. अनचाहा सेक्स परिचितों के बीच होता है और इस में एक पक्ष मानसिक रूप से न चाह कर भी शारीरिक रूप से पूर्णत: विरोध नहीं करता है. सामान्यत: यही फर्क होता है. मगर गहराई से जाना जाए तो बहुत ही सघन भेद होता है. ‘‘अनचाहा सेक्स ज्यादातर पतिपत्नी के बीच हुआ करता है और आजकल प्रेमीप्रेमिका भी इस संबंध की चपेट में आ गए हैं. आधुनिक युग में शारीरिक संबंध बनाना एक आम बात भले ही हो गई हो, फिर भी महिलाएं इस से अभी भी परहेज करती हैं. कारण चाहे गर्भवती हो जाने का डर हो या मानसिक रूप से समर्पण न कर पाने का स्वभाव, मगर अनचाहे सेक्स संबंध की प्रताड़नाएं सब से ज्यादा महिलाओं को ही झेलनी पड़ती हैं.’’

वजह वर्कलोड

एक एडवरटाइजिंग कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत पारुल श्रीनिवासन, जिन का विवाह 6 साल पहले हुआ था, एक चौंका देने वाला सत्य सामने लाती हैं. वह बताती हैं, ‘‘मैं अपने पति को बेहद प्यार करती हूं. उन के साथ आउटिंग पर भी अकसर जाती रहती हूं, मगर सेक्स संबंधों में बहुत रेगुलर नहीं हूं. इस का कारण जो भी हो, मगर मुझे ऐसा लगता है कि इस का मुख्य कारण है, हम दोनों का वर्किंग  होना. शुरूशुरू में 1 महीना हम दोनों छुट्टियां ले कर हनीमून के लिए हांगकांग और मलयेशिया गए थे. वहां से आने के बाद अपनेअपने कामों में व्यस्त हो गए. रात को बेड पर जाने के बाद सेक्स संबंध बनाने की इच्छा न तो मुझे रहती है, न मेरे पति को. पति कभी आगे बढ़ते भी हैं तो मैं टालने की पूरी कोशिश करती हूं.’’

कारण की तह तक पहुंचने पर पता चला कि शुरूशुरू के दिनों में पति सेक्स संबंध बनाना चाहता था. मगर पारुल को अपनी मार्केटिंग का वर्कलोड इतना रहता था कि वह उसी में खोई रहती थी. पति के समक्ष अपना शरीर तो समर्पित कर देती थी, मगर मन कहीं और भटकता रहता था. पति को यह प्रक्रिया बलात्कार सी लगती. कई बार समझाने, मनाने की कोशिश भी उस ने की. मगर पारुल हमेशा यही कहती कि आज मूड नहीं बन रहा है. और एक दिन पारुल ने खुल कर कह ही दिया कि वह यदि सेक्स संबंधों में रत होती भी है तो बिना मन और इच्छा के. वह अनचाहा सेक्स संबंध जी रही है. पति को यह बुरा लगा और धीरेधीरे सेक्स के प्रति उसे भी अरुचि होती चली गई.

भयमुक्त करना जरूरी

ऐसी कई पत्नियां हैं, जो अनचाहा सेक्स संबंध बनाने पर विवश हो जाती हैं. मगर तबस्सुम खानम की कहानी कुछ और ही है.  26 वर्षीय तबस्सुम एक टीचर हैं, उन के पति उन से 12 साल बड़े हैं. उन की एक दुकान है. वह बताती हैं, ‘‘जब मैं किशोरी थी, तभी से मुझे सेक्स संबंधों के प्रति भय बना हुआ था. सहेलियों से इस को ले कर सेक्स अनुभव की बातें करती थीं और मुझे सुन कर डर सा लगता था. मैं सहेलियों से कहती थी कि मैं तो अपने शौहर से कहूंगी कि बस मेरे गले लग कर मेरे पहलू में सोए रहें. इस से आगे मैं उन्हें बढ़ने ही नहीं दूंगी. सभी सहेलियां खूब हंसती थीं. जब मेरी शादी हुई तो शौहर हालांकि बड़े समझदार हैं, मगर शारीरिक उत्तेजना की बात करें तो खुद पर संयम नहीं रख पाते हैं.’’

थोड़ा झिझकती हुई, थोड़ा शरमाती हुई तबस्सुम बताती हैं, ‘‘मेरे पति ने मेरे लाख समझाने पर भी सुहागरात के दिन ही मुझे अपनी मीठीमीठी बातों में बहला लिया. उन का यह सिलसिला महीनों चलता रहा, मुझे आनंद का अनुभव तो होता, मगर भय ज्यादा लगता था. मेरा भय बढ़ता गया. जब भी रात होती, मेरे पति बेडरूम में प्रवेश करते, मैं डर से कांप उठती थी. हालांकि मेरे पति के द्वारा कोई भी अमानवीय हरकत कभी नहीं होती. काफी प्यार और भावुकता से वे फोरप्ले करते हुए, आगे बढ़ते थे.

मगर मेरे मन में जो डर समाया था, वह निकलता ही न था. 3 महीनों के बाद जब मैं गर्भवती हो गई तो डाक्टर ने हम दोनों के अगले 2 महीनों तक शारीरिक संबंध बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. मुझे तो ऐसा लगाजैसे एक नया जीवन मिल गया. मेरा बेटा हुआ. इस बीच मैं ने धीरेधीरे पति को अपने डर की बात बता दी और वे भी समझ गए. मेरे पति ने भी परिपक्वता दिखाई और मुझ से दूर रह कर मुझे धीरेधीरे समझाने लगे. वे सेक्स संबंधों को स्वाभाविक और जीवन का एक अंश बताते. अंतत: उन्होंने मेरे मन से भय निकाल ही दिया.’’

इच्छाअनिच्छा का खयाल

विनोद कामलानी, जो एक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक हैं, अपना क्लीनिक चलाते हैं, बताते हैं, ‘‘तबस्सुम के मन में बैठा हुआ सेक्स का डर था. बहुत सी लड़कियां इस भय से भयातुर हुआ करती हैं. मगर बहुत कम पति ऐसे होते हैं, जो धीरेधीरे इस भय को निकालते हैं. ऐसे कई केस मेरे पास आते हैं. पुरुषों के भी होते हैं, मगर अनचाहे सेक्स की शिकार ज्यादातर महिलाएं ही हुआ करती हैं.’’ डा. कामलानी के ही एक मरीज तरुण पटवर्धन ने बताया कि उन की शादी को 3 साल हो गए हैं, मगर आज तक उन्होंने अनचाहा सेक्स संबंध ही जीया है.

तरुण के अनुसार, विवाहपूर्व उन का प्रेम अपने पड़ोस की एक लड़की से था. किसी कारणवश शादी नहीं हो पाई, मगर प्रेम अभी भी बरकरार है. उस लड़की ने तरुण की याद में आजीवन कुंआरी रहने की शपथ भी ले रखी है. यही कारण है कि जब भी तरुण अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने की पहल करते हैं, उन की प्रेमिका का चेहरा सामने आ जाता है. उन्हें एक ‘गिल्ट’ महसूस होता है और वे शांत हो कर लेट जाते हैं. वे अपनी पत्नी से यह सब कहना भी नहीं चाहते हैं वरना उस के आत्मसम्मान को चोट पहुंचेगी. चूंकि उन की पत्नी तरुण को सेक्स प्रक्रिया बनाने में अयोग्य न समझे, उन्हें अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाना पड़ता है. वे सेक्स संबंध बिना मन, बिना रुचि के बनाते हैं और इस तरह वे अनचाहा सेक्स संबंध ही जी रहे हैं.

एक सर्वे के अनुसार, आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम की होड़ और आगे निकलने की चाह ने इनसान को मशीन बना दिया है. पैसा कमाना ही एक मात्र ध्येय बन चुका है. ऐसी भागदौड़ में इनसान सेक्स संबंधों के प्रति इंसाफ नहीं कर पाता है और बिना मन और बिना प्रोपर फोरप्ले के बने हुए सेक्स संबंध, मन में सेक्स के प्रति अरुचि पैदा कर देते हैं.

यहीं से शुरुआत होती है अनचाहे सेक्स संबंधों की. अपने पार्टनर की खुशी के लिए संबंध बनाना कभीकभी विवशता भी होती है. अंतत: यही संबंध ऊब का रूप धारण कर लेते हैं या पार्टनर बदलने की चाह मन में उठती है. यद्यपि यह अनचाहा सेक्स पश्चिमी देशों में तेजी से बढ़ रहा है, भारत भी इस से अछूता नहीं है, परंतु यहां का अनुपात अन्य देशों के मुकाबले नगण्य है.

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