मेरे पति का एक शादीशुदा महिला से नाजायज संबंध हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 2 बच्चों की मां हूं. मेरे पति कोलकाता में रहते हैं, मेरे पति के वहां एक महिला से नाजायज संबंध हैं. वह महिला शादीशुदा है और मेरे पति की रुपए-पैसों से मदद भी करती है. एक बार मेरे पति मुझे 15-20 दिनों के लिए अपने साथ कोलकाता ले गए, तब उस महिला से झड़प भी हुई थी. उस के बाद मेरे पति मुझे डांट-डपट कर वापस फैजाबाद छोड़ गए. उस के बाद से वे साल-छह महीने में मात्र 2-4 दिनों के लिए आते हैं और चले जाते हैं. जब भी इस बारे में बात करती हूं तो कहते हैं कि अगर तुम वहां आई और कुछ बोली तो तुम्हें जहर दे कर मार दूंगा.

बहुत समझाने का प्रयास किया पर वे नहीं मानते. बच्चों और घर के लिए पैसे भेज देते हैं. मैं अपने पति के किसी और औरत के साथ संबंध हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती. कानूनी पचड़ों में मैं पड़ना नहीं चाहती क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जो मेरी मदद करे. अकेले कैसे अपनी समस्या निबटाऊं, कृपया बताएं.

जवाब

आप की मदद के लिए कोई नहीं है और कानूनी पचड़ों में पड़ना नहीं चाहतीं तो कैसे आप अपना हक पा सकती हैं. आप हिम्मत रखते हुए अपने पति से साफसाफ बात करें कि वे सही रास्ते पर आ जाएं वरना आप को कानून का सहारा लेना पड़ेगा.

आप को अपना हक पाने के लिए लड़ना ही पड़ेगा. महिला आयोग में जा कर अपनी शिकायत लिखवाएं. उस की एक कौपी आप नजदीकी पुलिस स्टेशन में भी दें. आप के पति मनमानी नहीं कर सकते. आप के साथ आप के दोनों बच्चों का भविष्य भी जुड़ा है. बेशक आप का पति घर बच्चों के लिए पैसा भेजता है लेकिन आप के पत्नी होने के अधिकार वह किसी और स्त्री को नहीं दे सकता.

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चंद पलों का रोमांच : इतना अंधा भी न हो प्यार

प्यार में अकसर दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं, सांसें महकने लगती हैं, खयालों में कोई बस जाता है. पर प्यार का यह आलम तब आफत बन कर टूट पड़ता है जब दिल किसी और पर आ जाए.

पिछले दिनों एक पति दिल्ली के एक कोर्ट में जा पहुंचा और कोर्ट से गुहार लगाई कि वह अपनी पत्नी से परेशान है पुलिस उस की मदद नहीं कर रही.

दरअसल, दिल्ली के उत्तम नगर निवासी रवि की शादी सरिता (बदला नाम) से हुई तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. पत्नी सरिता खूबसूरत थी, जिस के प्रेम में वह खूब डूबताइतराता रहता था. पत्नी की खूबसूरती की तारीफ दोस्तों, रिश्तेदारों से सुनता तो बल्लियों उछलता.

मगर उस की यह खुशी चंद ही दिनों में तब काफूर हो गई, जब पत्नी की असलियत उपन्यास के पन्नों की तरह खुलने लगी. सरिता एक गैरपुरुष के प्रेम में दीवानी थी. 1-2 बार पति की नजरों में आई तो खुद हावी रहने के लिए पति के साथ ससुराल वालों को भी परेशान करने लगी. परिवार को दहेज व अन्य झूठे मामलों में फंसाने की धमकियां देने लगी. वह अपने हाथ की नस काटने तक की धमकी देती.

रवि और उस के परिवार के लोगों ने कभी थानाकचहरी नहीं देखे थे. समाज में बदनामी का डर था. लिहाजा सभी ने सरिता को काफी समझानेबुझाने का प्रयास किया, मगर बजाय समझने के वह और उन्मुक्त हो गई. थकहार कर पति कोर्ट जा पहुंचा और न्याय की गुहार लगाई.

क्या कहता है कानून

ऐडवोकेट दीप्ति कहती हैं, ‘‘इस तरह के मामले कोर्ट में आएदिन आते रहते हैं. अवैध संबंध का राज जब खुलता है तो एकसाथ कई लोगों की जिंदगी दांव पर लग जाती है. रिश्ते खत्म हो जाते हैं. लिहाजा शादी खत्म करने वे कोर्ट की ओर रुख करते हैं. कानूनन ऐडल्टरी के मामले में पुरुषों के दोषी पाए जाने पर उन्हें सजा दिए जाने का तो प्रावधान है पर महिलाओं को नहीं. यह आईपीसी की धारा-497 के तहत आता है.

‘‘दरअसल, धारा-497 पुराना कानून है, जिस में संशोधन की मांग उठती रही है.’’

धारा 497 की पेचीदगियां

आमतौर पर क्रिमिनल लौ में जैंडर समानता दिखती है पर धारा-497 में नहीं. इस धारा के अंतर्गत सिर्फ पुरुष को ही अपराधी माना जाता है जबकि महिला सिर्फ विक्टिम होती है.

यानी अगर कोई विवाहित पुरुष किसी विवाहित औरत के साथ सहमति से संबंध बनाता है तो संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ तो उस औरत का पति ऐडल्टरी का मुकदमा दर्ज करा सकता है, लेकिन संबंध बनाने वाली औरत के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का कोई प्रावधान नहीं है.

आर्थिक जरूरत, रोमांच, कुछ नया करने व शारीरिक भूख को शांत करने की चाह में जब महिलापुरुष एक बार इस दलदल में फंसते हैं, तो फिर फंसते चले जाते हैं. उन के लिए इस दलदल से निकलना असंभव हो जाता है.

दिसंबर, 2011 में विवाहेतर संबंधों पर कराए गए एक अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे. इस अध्ययन के मुताबिक 16% भारतीय महिलाएं विवाहेतर संबंध यानी ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में रहती हैं.

क्रिकेटर शमी की जिंदगी में तूफान

हाल ही में भारतीय क्रिकेटर मो. शमी व उस की पत्नी हसीन जहां में भी विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहा. हसीन ने खुलेआम आरोप लगाया है कि शमी दूसरी लड़कियों के संपर्क में रहते हैं और अंतरंग चैट करते हैं.

हसीन जहां की बातों में कितनी सचाई है, यह तो तहकीकात में ही पता चल सकता है पर इस आरोप से न सिर्फ शमी का कैरियर, बल्कि दांपत्य जीवन भी दांव पर लग गया है.

कभीकभी तो विवाहेतर संबंध शादीशुदा जिंदगी को खत्म कर खतरनाक रूप भी इख्तियार कर लेते हैं. यहां कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने सभ्य समाज की चूलें हिला दीं:

अलीपुर, दिल्ली के रहने वाले सुरेंद्र ईश्वर की हत्या उस की पत्नी के प्रेमी ने इसलिए कर दी कि सुरेंद्र को दोनों के रिश्ते का पता चल गया था. अब आरोपी जेल में है.

दिल्ली के गाजीपुर में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, जब अवैध संबंधों में बाधा बन रही 4 साल की एक मासूम बच्ची को प्रेमी ने इसलिए मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि बच्ची संबंध बनाते समय बाधा बन रही थी. आरोपी कानून की गिरफ्त में है.

मुंबई की एक घटना में पतिपत्नी ने मिल कर बाद में प्रेमी की हत्या कर दी ताकि शादीशुदा जिंदगी बरबाद न हो. दोनों ही पुलिस की गिरफ्त में हैं.

अशोक नगर में पतिपत्नी के बीच ‘वो’ आया तो मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा. पति धर्मेंद्र को पत्नी के रिश्ते की भनक लगी तो धर्मेंद्र की हत्या खुद उस की पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर कर दी. अब दोनों जेल में हैं.

क्यों बनते हैं ऐसे संबंध

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल वर्मा ने विवाहेतर संबंध बनने की कई वजहें बताईं:

भावनात्मक वजह: विवाहोपरांत दंपती एकदूसरे से भावनात्मक जुड़ाव चाहते हैं. एकदूसरे से अपेक्षा करते हैं कि जीवनसाथी उसे दिल की गहराइयों से प्रेम करे, उस का पूरा खयाल रखे. पर साथी से उपेक्षा मिलने पर यही सब किसी तीसरे से मिलने की चाहत होने लगती है. परिणाम विवाहेतर संबंध के रूप में सामने आता है.

अकेलापन: पतिपत्नी में से किसी एक का अकेलापन उसे विवाहेतर संबंध की ओर ले जाता है. फिर चाहे यह अकेलापन कामकाज में व्यस्तता की वजह से हो या फिर पारिवारिक वजहों से एकदूसरे के प्रति उदासीनता संबंध की ऊष्मा को खत्म कर देती है.

जीवन में रोमांच लाने के लिए: कुछ लोगों को जीवन में कुछ नयापन लाने की चाहत विवाहेतर संबंध की ओर ले जाती है. आमतौर पर ऐसे लोग पर्सनैलिटी डिसऔर्डर से पीडि़त होते हैं. इन का अधिकतर समय नैट सर्च करने, फ्रैंड बनाने, कामुक संदेश भेजने, सोशल नैटवर्किंग साइटों को खंगालने में बीतता है. ऐसे लोग जीवन को रोमांच समझते हैं और जीवन भर किसी एक व्यक्ति से बंधे रहना पसंद नहीं करते.

ताकि सुखद रहे दांपत्य

डा. अतुल वर्मा मानते हैं कि दांपत्य जीवन में साथी अगर निम्न बातों का ध्यान रखें तो विवाहेतर संबंध बनने और परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है:

  • पतिपत्नी भले ही कामकाजी हों पर एकदूसरे के लिए समय निकालें.
  • घर में टीवी, मोबाइल से दूर रहें.
  • साथ छुट्टियां मनाएं, साथ घूमने जाएं.
  • रात को खाना खाने के लिए एकसाथ डिनर टेबल पर बैठें.
  • एकदूसरे की जरूरतों का ध्यान रखें.
  • सैक्स में नएनए तरीके अपनाएं व खूब ऐंजौय करें.
  • सब से अहम साथी को भावनात्मक सहारे की कमी न महसूस होने दें.

दाढ़ी के नीचे निकल रहे हैं मुंहासे तो अपनाएं ये तरीके

एक बढ़िया दाढ़ी आपको पेशेवर माहौल में बढ़त देती है और आपको डेट नाइट्स पर भी डील करने में मदद करती है. लेकिन, स्वस्थ दाढ़ी बनाए रखना उतना आसान नहीं है जितना आप सोचते हैं. दाढ़ी की बारीकियों पर ध्यान देने से लेकर सही बियर्ड केयर प्रोडक्ट्स में निवेश करने तक, आपको दाढ़ी का फाइनल लुक हासिल करने के लिए काम करना होगा.

लेकिन एक स्ट्रांग बियर्ड गेम के बावजूद, आप अपने आप को दाढ़ी के नीचे होने वाले अनवॉन्टेड और खुजली वाले मुंहासों से जूझते हुए पा सकते हैं. ये मुंहासे गर्मियों के मौसम में कई एक्सपेरिएंस्ड बियर्ड मैन के लिए भी संकट की वजह बन सकते हैं. कई स्किन केयर और बियर्ड प्रोडक्ट्स की आसान उपलब्धता के बावजूद, पुरुष विभिन्न विकल्पों की खोज कर रहे हैं, खुद को विभिन्न रसायनों के संपर्क में ला रहे हैं, जो दाढ़ी की साफ-सफाई और लुक को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे दाढ़ी में मुंहासे और ज्यादा होते हैं.

सामान्य मुंहासों के विपरीत, इन पर किसी का ध्यान नहीं जा सकता है, क्योंकि यह दाढ़ी के नीचे हैं, लेकिन दाढ़ी के नीचे अनचाहे और अजीब तरीके से उठने के कारण होने वाली त्वचा की जलन आपको परेशान कर सकती है.

1. दाढ़ी का ख्याल रखें

चेहरे के बालों को सपोर्ट करने के सबसे बुनियादी नियमों में से एक इसकी स्वच्छता बनाए रखना है. आपकी दाढ़ी को ज्यादा समय की जरूरत नहीं है लेकिन नियमित रूप से जल्दी-जल्दी धोने से मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया दूर रहेंगे. यह धूल के कणों से भी छुटकारा दिलाएगा और आपकी दाढ़ी के नीचे की त्वचा (जो अनावश्यक खुजली के लिए जिम्मेदार है) से सभी जमे हुए अतिरिक्त तेल को साफ करता है. अपनी त्वचा के प्रकार के आधार पर, आप फेशियल क्लींजर का विकल्प चुन सकते हैं. और सबसे महत्वपूर्ण बात, एक्सफोलिएट करना न भूलें, क्योंकि यह इनग्रोन हेयर की ग्रोथ को रोकेगा.

2. बियर्ड ऑयल के अतिरिक्त उपयोग से बचें

पुरुषों के लिए बियर्ड केयर प्रोडक्ट्स की वाइड रेंज को प्रयोग करते हैं और बियर्ड ऑयल इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं.बियर्ड ऑयल का इस्तेमाल दाढ़ी के नीचे स्थित स्किन को सही मात्रा में हाइड्रेशन प्रदान करता है, इस प्रकार हेल्दी दाढ़ी की ग्रोथ को बढ़ावा देता है.इसी वजह से इसे बियर्ड केयर प्रोडक्ट्स में सबसे टॉप पर रखा जाता है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि तेल के ज्यादा इस्तेमाल से आपके रोम छिद्र बंद हो सकते हैं. हां, इसके अवशेष (अगर धोया नहीं गया तो) आपकी त्वचा के प्राकृतिक तेल के साथ मिल सकता है, दाढ़ी में मुंहासे और त्वचा की अन्य समस्याएं पैदा कर सकता है. तो अपने दाढ़ी के तेल का प्रयोग करें लेकिन इसे विवेकपूर्ण तरीके से करें।.

3. ग्रूमिंग प्रोटोकॉल फॉलो करें

दाढ़ी बनाए रखना सभी के लिए आसान काम नहीं है क्योंकि इसके लिए बहुत धैर्य और प्रयास की आवश्यकता होती है. और इसी तरह आपकी दाढ़ी को संवारने का रूटीन भी इसके लिए आला होना चाहिए.

हर बार एक नए रेजर का उपयोग करने से लेकर ब्लेड को उसी दिशा में ले जाने तक जैसे आपकी दाढ़ी बढ़ती है, कोई भी कुछ सरल नियमों का पालन करके ग्रूमिंग गेम को आसान बना सकता है. यह आपके चेहरे की त्वचा को स्वस्थ रखता है और दाढ़ी के नीचे होने वाले मुंहासों को भी रोकता है.

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 3

मैं छाया के पास आ गई. मेरे कंधे पर सिर रख कर वह सिसकने लगी. उस का हाथ अपने हाथ में ले कर मैं ने कहा, ‘‘पढ़ेलिखे मातापिता ऐसे कैसे हो सकते हैं?’’

उस ने जो कहा वह बहुत सही बात थी. वह बोली, ‘‘बच्चे को पालने के लिए दिल में प्रेम चाहिए, दिमाग के किताबी ज्ञान से कुछ नहीं होता है.’’

‘‘छाया, खुद को इतना परेशान मत कर. सुबह तरुण आ रहे हैं. तुम मुझ से एक वादा करो, वीकैंड में तुम मेरे साथ बैडमिंटन जरूर खेलोगी.’’ उस की आंखों ने मुझ से वादा किया और अगले दिन वह अपने घर चली गई.

जब साहिल को मैं ने उस के बारे में बताया तो साहिल बोले, ‘‘शैली, तुम छाया से कुछ मत पूछना. वह आज भी सदमे में है जिस दिन वह खुद बात करे उस दिन उसे समझाना.’’

रविवार की शाम छाया क्लब आई तो बोली, ‘‘आज खेलना नहीं है. चलो न, बातें करते हैं.’’

हम वहीं सीढि़यों पर बैठ गए. छाया ने सीधे ही मुझ से सवाल किया, ‘‘क्या साहिल यह सब जानते हैं? तुम ने उन्हें यह सब कब बताया?’’

‘‘शादी से पहले यह सब साहिल को मां ने बताया था. साहिल ने मुझे हमारे किसी रिश्तेदार के घर देखा था. जब साहिल अपने मातापिता के साथ आए तो उन की मां ने कहा, ‘हमें तो शैली पसंद है. आप चाहें, तो हम अभी बात पक्की कर लेते हैं.’’’

‘‘मां तैयार थीं इस के लिए. मां ने कहा, ‘पहले मैं साहिल से अकेले में बात करना चाहती हूं.’

‘‘मां साहिल को अपनेसाथ अंदर कमरे में ले गईं और उन्होंने मेरे साथ जो हुआ उन्हें सब बताया. फिर बोलीं, ‘बेटा, शादी करो या न करो पर यह बात अपने तक ही रखना. वरना हमारी बेटी की शादी होनी मुश्किल हो जाएगी.’

‘‘उस दिन साहिल ने मां के कंधे पर हाथ रख कर कहा था, ‘मां, मेरी शिक्षा बेकार है, यदि मैं उस दर्द को नहीं समझ पाया. मुझे शैली से ही शादी करनी है. यह बात मेरे अलावा किसी और तक कभी नहीं जाएगी.’

‘‘साहिल मुझ से मिलने कमरे में आए. कमरे का माहौल बहुत गमगीन हो गया था. वे, बस, इतना ही कह पाए, ‘शैली, मेरा हाथ थाम कर आज से जिंदगी शुरू करना, पीछे कुछ था ही नहीं. इसलिए कभी मुड़ कर मत देखना.’’’

मेरी बात पूरी हुई और छाया बोल पड़ी, ‘‘यही तो बात है, तरुण कुछ नहीं जानते हैं. उन से सबकुछ छिपा कर शादी तो करनी पड़ी पर मेरा अपराधबोध मुझे कचोटता है.’’

‘‘पर अब देर हो चुकी है, छाया.’’ यदि तरुण ने साथ रहने से मना कर दिया तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, अपनी रिसर्च के लिए, एक जिंदगी भी कम है. मैं फिर से उसी में जुट जाऊंगी. शैली, आज बताती हूं उस दिन क्या हुआ था.’’

उस ने बहुत सहजता से कहना शुरू किया, ‘‘मैं बौटनी में रिसर्चस्कौलर थी. सब से ज्यादा फैलोशिप भी मुझे ही मिलती थी. विपिन राय, जो नंबर दो पर था, मुझ से बहुत चिढ़ता था. वह शादीशुदा था.

‘‘मुझ से पीछे रहने के अपमान का बदला उस ने मुझे चोट पहुंचा कर लिया. एक दिन उस ने मुझे फोन किया, ‘कुछ जरूरी काम है.’

‘‘छुट्टी का दिन था. वह अकेला मेरा इंतजार कर रहा था. जब मैं वहां पहुंची तो अकेलेपन का फायदा उठा कर उस ने मुझे बहुत मारा, गालियां दीं और कहा, ‘आज के बाद तू उस लैब में नहीं आ पाएगी. यहां आने की सोच भी तेरे ख्वाब में नहीं आएगी. मेरे खिलाफ पुलिस केस करने की गलती मत करना. 10 साल कोर्ट के चक्कर लगाएगी, फिर भी हो सकता है मैं यह साबित कर दूं कि तूने मेरा बलात्कार किया है.’

‘‘वह दरिंदा जीत गया. मेरे परिवार की नजर में मेरी इज्जत चली गई थी.

2 महीने के अंदर तरुण से मेरी शादी हो गई.

‘‘वह दिन, पिता की नफरत, मां का मुझ से ज्यादा समाज और छोटी बहन की चिंता करना मुझे आज तक रुलाता है. घाव पर मरहम लगाने वाला कोई तो चाहिए. यहां तो घाव नासूर बन गया जो आज तक…’’

आज हम दोनों की आंखों में आंसू नहीं थे. शैली उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘चलो, घर चलते हैं, तरुण को आज सबकुछ बताना है.’’

मुझे छाया की चिंता हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘तरुण का जवाब जो भी हो, मैं और साहिल अब तुम्हारा परिवार हैं. तुम तरुण को अपनी बात बताने से पहले मेरे और साहिल के बारे में बता देना. तुम चाहो तो साहिल भी…’’

‘‘तू चिंता मत कर. जो भी होगा उस का सामना करने की हिम्मत है मुझ में.’’

मैं घर तो आ गई पर मेरा मन बहुत बेचैन था. सुबह भी उस का फोन नहीं आया. साहिल काम पर चला गया. मैं घर में अकेली बैठी छाया के फोन का इंतजार करने लगी.

दीवाली के अगले दिन शुरू हुआ दोस्ती का यह सफर 5 महीने का रास्ता तय कर चुका था. क्या होगा? कहीं मेरे कारण छाया हमेशा के लिए अकेली न हो जाए. वह चाहे जो कहे, अब तनहा जीना आसान नहीं होगा. उसे भी तरुण के साथ की आदत पड़ चुकी थी.

शाम के 5 बज गए. फोन की घंटी बजी. देखा, तरुण का फोन है. मैं ने डरते हुए फोन उठाया. उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो, शैली, तुम्हारा बहुतबहुत शुक्रिया.’’ उस के बाद छाया से जो बात हुई उस का एक शब्द भी याद नहीं. वैसे भी, अब शब्दों का कोई महत्त्व नहीं था. एक खुशी का एहसास. लगा मेरा पूरा शरीर रोशनी से भर गया हो.

मेरे कमजोर पलों में मेरा साथ मेरे परिवार व साहिल ने दिया था. आज किसी को मैं ने हिम्मत दी और वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत गया. छाया की जीत का एहसास मेरे लिए कुछ ऐसा था जैसे मां को अपने बच्चे की जीत के लिए होता है.

अगले दिन छाया और तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं. जाते समय तरुण ने साहिल से कहा, ‘‘साहिल, मंगलवार को होली की पार्टी का इंतजाम कर लेना, पार्टी हमारे घर पर होगी.’’

साहिल ने कहा, ‘‘तुम थके हुए आओगे, पार्टी हमारे घर पर रख लेते हैं. मैं और शैली सारा इंतजाम कर लेंगे.’’

छाया ने कहा, ‘‘नहीं साहिल, इस बार पार्टी हमारे घर होने दो. दीपक की रोशनी से उस रात तुम्हारा घर जगमगाया था, इस बार रंगों को हमारे घरआंगन में छिटकने दो.’’

होली की पार्टी से घर लौटते समय मेरे और साहिल के मोबाइल पर एक संदेश आया, ‘शैली, तुम्हारे मातापिता जैसा साहस और प्रेम हर मातापिता में हो तो तुम जैसी बेटियां न जाने कितनी छाया को अंधेरों से खींच लाएंगी. और हर दर्दभरे दिल को अपना साहिल मिल ही जाएगा…’

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 2

फिल्म खत्म होने के बाद रेस्तरां में खाना खाते समय तरुण बोले, ‘‘साहिल, औफिस के बाहर, सर और आप कुछ नहीं चलेगा. यहां हम भी दोस्त हैं छाया और शैली की तरह.’’

खाना खा कर हम बाहर निकले. एकदूसरे से विदा ली. हम चारों खुश थे. हां, सब की खुशी के कारण अलगअलग थे. अब मैं और छाया एकदो दिनों में हलकीफुलकी बातें कर लिया करते थे.

तरुण ने आज एकसाथ 2 अच्छी खबरें दीं. पहली, मुझे एक क्लब की सदस्यता तरुण ने दिलवा दी जहां मेरे दोनों शौक पूरे हो जाएंगे. दूसरी, तो इस से भी बड़ी थी, तरुण 2 दिनों के लिए सिंगापुर जा रहे हैं तो छाया हमारे साथ रहना चाहती है.

अगले दिन, तरुण को साहिल ने एयरपोर्ट छोड़ा और छाया हमारे साथ घर आ गई.

घर आते ही मैं ने छाया से पूछा, ‘‘कौफी के साथ पौपकौर्न लोगी या भेल?’’

उस ने बच्चों की तरह कहा, ‘‘दोनों.’’ उस का ऐसे बोलना मुझे बहुत अच्छा लगा. वह बोली, ‘‘रुको, मैं भी आती हूं, मिल कर बनाएंगे.’’

साहिल अपने औफिस के काम में व्यस्त थे. वे जानते थे स्वयं को हमें व्यस्त दिखाना ही सही होगा.

छाया और मेरे हाथ में कौफी थी. मैं ने टीवी चला दिया. पर मैं जानती थी यहां चलना तो कुछ और ही है.

बात मैं ने शुरू की, ‘‘क्या हुआ था?’’

‘‘पहले तुम बोलो, शैली, मुझ में बोलने की हिम्मत शायद तुम्हारे बाद ही आ पाए.’’

अपनी दोस्त को उस अंधेरे से बाहर निकालने के लिए मुझे उस गहरी खाई में फिर से जाना पड़ेगा. मन पक्का किया और मैं ने बताना शुरू किया, ‘‘उस शाम मैं हमेशा की तरह बैडमिंटन खेल कर ड्रैसिंगरूम में गई. वहां से मुझे पूल में जाना था. सबकुछ शायद पहले से ही सैट था. 2 लड़के बाहर घूम रहे थे, जिन को देख कर मैं ने अनदेखा कर दिया.

मैं रुक कर आगे बोली, ‘‘अंदर एक लड़का था जिसे ड्रैसिंगरूम में देख कर मैं चौंक गई. ‘महिलाओं के चेंजिंगरूम में लड़का कैसे?’ यह खयाल आया. मुझे देखते ही उस ने मेरे पास आ कर मुझे छूना चाहा. मैं बहुत घबरा गई, जोर से चिल्लाई और बाहर निकलने के लिए मुड़ी. उस जानवर ने मेरे मुंह में कपड़ा डाल दिया. बहुत छीनाझपटी हुई.

‘‘मैं घसीटतेघसीटते दरवाजे तक आ भी गई. काश, उस दिन दरवाजा खुल गया होता, जो बाहर से बंद था. एक को मारपीट कर मैं शायद भाग जाती मगर वक्त और इंसानियत सब शायद दरवाजे के बाहर ही छूट गए थे. बाहर वाले भी बारीबारी से अंदर आए. मेरे शरीर में संघर्ष की ताकत व होश सबकुछ खत्म हो गया था. उसी बेहोशी की हालत और रात के अंधेरे में वे मुझे मेरे घर के बाहर फेंक गए.

‘‘उन दर्दनाक पलों को मैं फिर से भुगत रही हूं किसी को जीना सिखाने के लिए. मम्मीपापा रात तक मेरे घर न आने पर और फोन बंद होने पर बहुत परेशान थे. वे दोनों मुझे ढूंढ़ने बाहर निकले तो देखा घर के दरवाजे पर मैं बेहोश पड़ी थी.

‘‘मुझे देख कर मां भी बेहोश हो गईं. 3 दिनों तक डाक्टर आंटी हमारे घर में रहीं.’’

वे 3 जानवर जिन को मैं जानती ही नहीं थी, उन्हें ढूंढ़ना, मीडिया को मसाले के साथ सबकुछ परोसना मेरे भविष्य को बरबाद करने जैसा ही था. मम्मीपापा और आंटी ने निर्णय लिया कि सबकुछ भुला कर जीना ही बेहतर है.

‘‘मगर इतना सब होने के बाद जीना इतना आसान भी नहीं, उन दर्दनाक यादों से खुद को अलग करना बहुत मुश्किल है, पर नामुमकिन नहीं.’’ कहते हुए मैं ने अपने आंसू पोंछे. छाया भी आंसुओं से भीग चुकी थी.

सामने देखा दरवाजे पर साहिल खड़े थे. हमें देखते हुए बोले, ‘‘अब सो जाओ, रात के 3 बज रहे हैं. सुबह काम पर जाना है.’’

उन्होंने कमरे की लाइट व टीवी बंद कर दिया.

सोतेसोते छाया बोली, ‘‘इतना समझदार पति, शैली, तुम्हारे पति की जितनी तारीफ की जाए, कम है.’’

‘‘छाया, तरुण भी बहुत अच्छे हैं. बस, इतना याद रखना कि यदि तुम उस सब से बाहर नहीं निकली तो जिंदगी का अतीत वर्तमान को भी काला कर देगा. तरुण महीने में 10 दिन बाहर रहते हैं. बहुत लोगों से मिलते भी होंगे. दोस्ती और प्रेम के बीच एक महीन सी दीवार ही होती है. पता नहीं कब वह दीवार टूट जाए, उस से पहले अपनी पीठ से अतीत की लाश को फेंक देना.’’

सुबह नींद खुली 9 बजे किचन की खटपट की आवाज से. छाया, हम तीनों के लिए नाश्ता बना रही थी और साहिल वहीं बैठे उस से बातें कर रहे थे.

छाया मुझे सहज और खुश लगी. हम तीनों अपने काम पर चले गए. रात का खाना हम दोनों ने मिल कर बनाया. खाना खा कर कमरे में आते ही छाया बोली, ‘‘इस सब के बाद तुम्हारे मातापिता ने क्या कहा?’’

‘‘मैं ने बोला तो था मां बेहोश हो गई थीं. एक दिन मैं पलंग पर सो रही थी, पापा भी मेरे पास बैठे थे. मां कुरसी पर बैठी मेरे बाल सहला रही थीं कि अचानक मैं रोने लगी और मेरे मुंह से निकला, ‘मैं मैली हो गई, सचमुच मेरी इज्जत चली गई.’

‘‘सुन कर मां को जैसे करंट लगा, ‘शरीर को अपमानित करने के लिए किसी ने तुम पर जुल्म और ज्यादती की, उस को तुम अपना गुनाह कैसे मान सकती हो? तुम पर जुल्म हुआ वह भी अनजाने में, धोखे से. औरत के मन और शरीर को तारतार करने वाले किस जालिम ने अपने गुनाह को औरत की इज्जत से जोड़ा? हम आज भी इन शब्दों को अपने पैरों की बेडि़यां बना कर जी रहे हैं.’ मां बोलतेबोलते खड़ी हो गईं. वे गुस्से से कांप रही थीं और रो रही थीं.

‘‘पापा की आंखों में भी आंसू थे. वे बोले, ‘बेटा, तुम हमारी बहादुर बेटी हो, शरीर के घाव तो भर जाएंगे पर उन को अपने मन में जगह मत देना. हम दोनों की जिंदगी और खुशी तेरे ही दिल में रहती है.’’’

कहतेकहते मेरी आंखों में भी आंसू आ गए. न जाने कितनी बार हम तीनों साथसाथ रोए थे. मैं ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘2 महीने के लिए मैं मौसी के पास गई थी. जब वापस आई तो पापा के साथ खेलने भी जाती थी. धीरेधीरे सब सामान्य हो गया.’’

गुस्से और नफरत से छाया बोली, ‘‘मेरी तो मां ने ही कहा था, यह क्या कर आई? खानदान के नाम पर कलंक. खुद की नहीं, छोटी की भी सोचो. यह रोनाधोना बंद करो. चुपचाप काम पर जाना शुरू करो. किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है. तब से आज तक मेरे घाव खुले ही हैं और टीसते हैं. उन्हें भरने वाला कोई नहीं मिला. तरुण से भी यह सब छिपा कर शादी हुई जो मुझे बहुत ग्लानि से भर देती है. क्या करती, मां के आगे कुछ नहीं बोल पाई.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारे पिता तो कालेज में प्रोफैसर हैं. उन की प्रतिक्रिया कैसी थी?’’

‘‘‘यह अपवित्र हो गई है,’ पापा ने मेरे सामने मां को डांटते हुए कहा, ‘इस से कह देना, आज के बाद मंदिर में हाथ न लगाए.’’’

अजबगजब : 7 महीने का बच्चा हुआ प्रैगनैंट

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है, जिस को जानने के बाद कोई शायद ही यकीन करे. महज 7 माह के बच्चे के पेट में एक और बच्चा विकसित हो रहा था, जोकि चिकित्सा विज्ञान में काफी दुर्लभ मामला है.

मामला यह है कि 7 माह के एक मेल बच्चे का पेट लगातार फूलता जा रहा था, जिस को ले कर उस के परिजन काफी परेशान थे. परिजनों ने बच्चे को कई डाक्टरों को दिखाया. डाक्टरों ने पहले तो बताया कि बच्चे को यूरीन में कोई समस्या है जिस की वजह से पेट फूलता जा रहा है, लेकिन जब उसे कोई लाभ नहीं हुआ तो कुंडा प्रतापगढ़ से परिजन बच्चे को ले कर मैडिकल कालेज, सरोजिनी नायडू चिल्ड्रैन अस्पताल प्रयागराज पहुंचे.

डाक्टरों ने कराया अल्ट्रासाउंड

चिल्ड्रैन अस्पताल के डाक्टरों ने बच्चे का अल्ट्रासाउंड कराया और अन्य जांचें भी.

खबरों के मुताबिक, बालरोग विभाग के प्रोफैसर, डाक्टर डी कुमार ने सफल सर्जरी कर बच्चे के पेट से मृत भ्रूण निकाला. हालांकि सर्जरी के बाद बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है.

बच्चे के पिता ने क्या कहा

बच्चे के पिता प्रवीण शुक्ला के मुताबिक,”बच्चे के पेट से मेल भ्रूण निकला है जोकि अर्धविकसित था. हालांकि भ्रूण में हाथपैर और बाल विकसित हो रहे थे.”

खबरों के मुताबिक, बच्चे की सर्जरी में शामिल रैजिडेंट डाक्टर जियाउर रहमान ने बताया कि बच्चे कि अल्ट्रासाउंड की जांच में भ्रूण होने की बात सामने आई थी. भ्रूण लगातार विकसित हो रहा था, जिस के बाद चिकित्सकों ने सर्जरी कर भ्रूण को निकालने का फैसला किया.

डाक्टर के मुताबिक, इस तरह के पहले भी मामले सामने आए हैं. लेकिन यह दुर्लभ मामला था क्योंकि पूरी दुनिया में ऐसे लगभग 200 मामले ही अब तक सामने आए हैं. डाक्टरों का दावा है कि ऐसे बच्चों में कोई न कोई बीमारी जरूर रहती है. हालांकि इस बच्चे में कोई बीमारी नहीं है.

वजह क्या है

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2 स्पर्म और 2 ओवम मिल कर 2 जाइगोट बनते हैं, जिस के कारण ऐसे हालात पैदा होते हैं. पहले जाइगोट से बच्चा बनता है और दूसरे जाइगोट बच्चे के अंदर चला जाता है, जिस से पेट में भ्रूण बनने लगता है. अगर दूसरा जाइगोट बच्चे के पेट में न जा कर बाहर रहता है तो जुड़वां बच्चे बनते हैं और जो मां के गर्भ में बनते हैं और ट्विन बच्चे पैदा होते हैं. यानि कि बच्चे के पेट के अंदर जो बच्चा है, वह असल में उस का जुड़वां है. मैडिकल साइंस में इसे ‘फीट्स इन फीटू’ कहते हैं.

ऐसे केस बहुत रेयर होते हैं. हालांकि सैल्स बच्चे के अंदर कैसे जाते हैं, कब जाते हैं इस की आज तक कोई पुख्ता जानकारी नहीं है. लेकिन जिस तरह से ऐसे केस सामने आ रहे हैं, उम्मीद है कि मैडिकल साइंस जल्द ही इस की जड़ तक पहुंचेगा.

Raksha Bandhan: तृप्त मन- भाग 1

अमेरिका में स्थायी रूप से रह रहे राजन के ताऊ धर्म प्रकाश को जब खबर मिली कि उन के भतीजे राजन ने आई.टी. परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है तो उन्होंने फौरन फोन से अपने छोटे भाई चंद्र प्रकाश को कहा कि वह राजन को अमेरिका भेज दे…यहां प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण के बाद नौकरी का बहुत अच्छा स्कोप है.

चंद्र्र प्रकाश भी तैयार हो गए और बेटे को अमेरिका के लिए पासपोर्ट, वीजा आदि बनवाने में लग गए. लेकिन उन की पत्नी सरोजनी के मन को कुछ बहुत अच्छा नहीं लगा. कुल 2 बच्चे राजन और उस से 5 साल छोटी 8वीं में पढ़ रही राशी. अब बेटा सात समुंदर पार चला जाएगा तो मां को कैसे अच्छा लगेगा. उस ने तो पति से साफ शब्दों में मना भी किया.

चंद्र प्रकाश ने पत्नी को समझाया, ‘‘बच्चे के अच्छे भविष्य के  लिए अमेरिका की शिक्षा बहुत उपयोगी साबित होगी और मांबाप होने के नाते कुछ त्याग हमें भी तो करना ही पड़ेगा. रही बात आंखों से दूर जाने की, तो साल में एक बार तो आएगा न.’’

राशी भी भाई के अमेरिका जाने से दुखी थी. आंखों में आंसू भर कर बोली, ‘‘भैया, तुम इतनी दूर चले जाओगे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा. मैं रक्षाबंधन के दिन किसे राखी बांधूंगी? नहीं, तुम मत जाओ, भैया,’’ कहने के साथ ही राशी रो पड़ी.

राजन ने बहन को धैर्य बंधाया, ‘‘रोते नहीं राशी. मैं जल्दी आऊंगा और तेरे लिए खूब सारी चीजें अमेरिका से लाऊंगा. रही राखी की बात, तो वह थोड़ा पहले भेज दिया करना…मैं ताऊ की लड़की से बंधवा लूंगा…फिर उस दिन अपनी प्यारीप्यारी बहन से फोन पर बात भी करूंगा.’’

बहरहाल, सब को समझाबुझा कर, खास लोगों से मिल कर राजन निर्धारित समय पर अमेरिका चला गया. वहां उस को ताऊजी के पास अच्छा लगा. परिवार के सभी सदस्यों का बातव्यवहार उस के साथ बिलकुल अपनों जैसा ही था.

मां का पत्र अकसर आ जाता…कभीकभी राशी का पत्र भी उस में रहता. मां

तो बारबार यही लिखतीं कि तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता. घर सब तरफ से सूनासूना लगता है.

अमेरिका में प्रशिक्षण पूरा होते ही एक कंपनी ने राजन का चयन कर लिया. तो ताऊजी ने खुशीखुशी अपने छोटे भाई चंद्र प्रकाश और सरोजनी को राजन के नौकरी पर लगने की सूचना भेजी. साथ में यह भी बताया कि जल्द ही वह 1 माह का अवकाश ले कर भारत जाएगा.

राजन को अमेरिका में नौकरी मिलने का समाचार सुन कर सरोजनी को तनिक भी अच्छा नहीं लगा. क्या अपने देश में उसे नौकरी नहीं मिलती? क्या हर भारतीय युवक का भविष्य विदेश में ही जा कर संवरता है? राशी भी दुखी हुई. बड़ी उम्मीद लगा रखी थी कि अब भैया के आने के दिन आ रहे हैं.

राजन जिस आफिस में काम करता था उस में इटली की डौली नाम की एक लड़की रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थी. डौली शक्लसूरत से बेहद आकर्षक थी. डौली की एक खासियत यह भी थी कि यदि वह पाश्चात्य पहनावे में न हो तो चेहरे से बिलकुल भारतीय लगती थी.

एक ही आफिस में साथसाथ काम करने, आनेजाने पर आपस में बातचीत से राजन और डौली एकदूसरे से काफी प्रभावित हुए. बाद में वे एकदूसरे की चाहत व पसंद बन गए, लेकिन बिना बड़ों की आज्ञा के राजन ऐसा कोई कदम उठाने के पक्ष में नहीं था जिस से उस के व परिवार के सम्मान को ठेस पहुंचे.

डौली के साथ अपनी दोस्ती के बारे में ताऊजी को बताने के साथ ही राजन ने यह भी कहा कि हम एकदूसरे क ो पसंद करते हैं और विवाह भी करना चाहते हैं.

भतीजे की इच्छा को खुशीखुशी स्वीकार करते हुए धर्म प्रकाश ने कहा, ‘‘तुम्हारे पिताजी को सूचित करता हूं और उन से कहूंगा कि शादी की कोई तारीख तय कर लें.’’

चंद्र प्रकाश और सरोजनी को जब राजन के प्रेम और शादी का पता चला तो दोनों को बेटे का यह कदम अखर गया. उन्होंने बड़े भाई से साफ शब्दों में कह दिया कि राजन वहां किसी लड़की से विवाह करने का विचार छोड़ दे, क्योंकि उस के इस तरह विवाह करने से उस की बहन की शादी में अड़ंगा खड़ा हो सकता है. और यदि वह नहीं मानता है तो कम से कम अपनी शादी की खबर भारत में किसी को न दे.

मातापिता की बात से राजन को अपनी गलती का एहसास हुआ. अभी तक उस के दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि अंतर्जातीय विवाह, वह भी ईसाई लड़की से करने के कारण बहन की शादी में रुकावट आ सकती है.

इस के बाद राजन ने फोन पर कई बार घर पर सब से बात की, उन का हालचाल पूछा लेकिन अपने विवाह से संबंधित कोई बात न तो उस ने छेड़ी और न मातापिता की तरफ से कोई प्रतिक्रिया हुई.

Friendship Day Special: दिये से रंगों तक-दोस्ती और प्रेम की कहानी- भाग 1

हम दोनों चेन्नई में 2 महीने पहले ही आए थे. मेरे पति साहिल का यहां ट्रांसफर हुआ था. मेरे पास एमबीए की डिगरी थी. सो, मुझे भी नौकरी मिलने में ज्यादा दिक्कत न आई. हमारे दोस्त अभी कम थे. यही सोच कर दीवाली के दूसरे दिन घर में ही पार्टी रख ली. अपने और साहिल के औफिस के कुछ दोस्तों को घर पर बुलाया था. दीवाली के अगले दिन जब मैं शाम को दिये और फूलों से घर सजा रही थी तो साहिल बोले, ‘‘शैली, कितने दिये लगाओगी? घर सुंदर लग रहा है. तुम सुबह से काम कर रही हो, थक जाओगी. अभी तुम्हें तैयार भी तो होना है.’’

मैं ने साहिल की तरफ  प्यार से देखते हुए कहा, ‘‘मैं क्यों, तुम भी तो मेरे साथ बराबरी से काम कर रहे हो. बस, 10 मिनट और, फिर तैयार होते हैं.’’

हम तैयार हुए कि दोस्तों का आना शुरू हो गया. पहली बार घर में इतनी चहलपहल अच्छी लग रही थी. जब टेबल पर सूप, समोसे, पकौड़े रखे तो सब खुश हो कर बोले, ‘‘वाह, चेन्नई में ये सब खाने को मिल जाए तो बहुत मजा आ जाता है.’’

फिर दौर चला बातों का, मिठाइयों का और नाचगाने का. सब ने पार्टी को खूब एंजौय किया.

पार्टी में हमारे साथ थे साहिल के बौस और उन की पत्नी छाया. रात के 2 बजे पार्टी खत्म हुई. सभी दोस्तों ने हमें इस पार्टी के लिए धन्यवाद दिया.

दिनभर की थकान के बाद भी आंखों में नींद नहीं थी. मैं और साहिल बालकनी में बैठ गए बातें करने के लिए. खामोश रात और रंगीन जुगनुओं की चमक से चमकता शहर बहुत सुंदर लग रहा था.

‘‘साहिल, एक बात गौर की तुम ने कि तुम्हारे बौस की बीवी कितनी चुप थीं. न तो वे खाना खाते समय कुछ बोलीं और न खेलते समय. ऐसा लग रहा था जैसे एक मशीन की तरह सबकुछ कर रही हैं. वे सुंदर तो थीं पर खुश नहीं लग रही थीं.’’

‘‘तुम भी न शैली, यार वे बौस की बीवी हैं. इतनी उछलकूद नहीं मचाएंगी. बड़े लोग जूनियर सहकर्मियों से एक दूरी बना कर चलते हैं.’’

‘‘तुम्हारे बौस तो बड़े जिंदादिल हैं. तुम ने देखा नहीं, वे डांस के समय अपनी बीवी को बड़े प्यार से देख रहे थे. पर मैडम का ध्यान उन की तरफ नहीं था.’’

साहिल ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा, तो तुम मेरे साथ डांस कर रही थीं पर तुम्हारी नजर…तुम उन को इतने गौर से क्यों देख रही थीं?’’

साहिल के मजाक से अनजान मैं ने कहा, ‘‘साहिल, मुझे कुछ टूटा सा लग रहा है.’’

‘‘छोड़ो शैली, यदि तुम सही हो, तो भी हमें क्या करना?’’

अपनी धुन में मैं कह गई, ‘‘नहीं साहिल, इसे नहीं छोड़ पाऊंगी. अब मुझे याद आया, छाया कालेज में मेरे साथ थी. वह मुझे बहुत पहचानी सी लग रही थी.’’

साहिल को मनाते हुए मैं ने आगे कहा, ‘‘मुझे छाया से दोस्ती करनी है.’’

‘‘यार, बौस से दोस्ती बढ़ाने का एक ही मतलब होता है, चमचागीरी. छोड़ दो उस गुमसुम सी छाया को.’’

‘‘प्लीज, बस एक बार मिलवा दो. मैं वादा करती हूं, अगली बार छाया खुद मुझ से मिलना चाहेगी.’’

‘‘तुम अपनी बात मनवाना जानती हो. चलो, देखते हैं. सुबह के 4 बज गए हैं. उठो, सुबह औफिस भी जाना है.’’

अगले शनिवार जब साहिल औफिस से आया तो बोला, ‘‘मैडम, आप का काम हो गया. बौस तैयार हो गए हैं. रविवार को पहले फिल्म और फिर डिनर, ठीक है.’’ ‘‘ठीक नहीं, सुपर प्लान है. साहिल तुम बहुत अच्छे हो.’’

साहिल ने मुसकरा कर मेरा हाथ थाम लिया, बोला, ‘‘मैं जानता हूं असली खिलाड़ी कभी हारते नहीं.’’

दुख का एक पल मेरे अंदर आया, पर मैं ने उसे झटक कर दूर किया और साहिल के लिए चाय बनाने चली गई. मैं शादी से पहले हमेशा बैडमिंटन खेलने की शौकीन रही हूं. खेल के बाद तैराकी मुझे बहुत सुकून देती है. सूरत में तो वीकैंड में क्लब में जाती थी. यहां चेन्नई में ऐसी जगह अभी तक मिल नहीं पाई. अधिकतर क्लबों की मैंबरशिप बहुत महंगी है. अभी तो मुझे रविवार का इंतजार था.

रविवार की शाम हम चारों मिले. आज मैं ने मिलते ही सब से पहले छाया को याद दिलाया, ‘‘आप को याद नहीं, हम एक ही कालेज में पढ़े हैं. उस दिन मुझे आप का चेहरा बहुत पहचाना सा लग रहा था. फिर बाद में याद आया.’’

छाया ने खुश होते हुए कहा, ‘‘जब पुराने दोस्त मिल गए हैं तो ‘आप’ नहीं शैली, ‘तुम’ ही अच्छा लगेगा.’’

हम साथ में हंस दिए. जब तरुण ने ये सब सुना तो बोले, ‘‘शैली, आप छाया से दोस्ती कर ही लो. उस का भी मन लग जाएगा यहां.’’

साहिल मेरी ओर देख कर मुसकरा पड़े, उन की निगाहों ने कहा, ‘जीत गई न तुम.’

सिनेमाहौल में मैं और छाया पासपास बैठे थे. एक समय आया जब स्क्रीन पर बलात्कार का सीन चल रहा था. नायिका चीखचिल्ला रही थी, रो रही थी, भाग रही थी, उस जगह से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ रही थी. उस सीन ने मुझे दहला दिया. साहिल ने मेरे हाथ को अपने दोनों हाथों से थाम लिया था. अचानक मेरी निगाह छाया की तरफ गई, उस ने कस कर आंखें बंद की हुई थीं.

बस, यही बात थी जो मुझे छाया के करीब लाई थी. इसीलिए मैं उस से दोस्ती करना चाहती थी.

फिल्म के मध्यांतर में खाने के लिए स्नैक्स ‘हम दोनों ही लाएंगे’ कह कर मैं छाया को अपने साथ बाहर ले आई.

एक कोने में जा कर हम खड़े हुए, मैं ने उस से कहा, ‘‘जिस सीन को देख कर तुम ने आंखें बंद की थीं, उस काले, घिनौने वक्त से मैं भी गुजर चुकी हूं. बस, फर्क इतना है तुम उस वक्त अकेली थी और साहिल ने अपने दोनों हाथों से मेरा हाथ थामा था. मैं ने उस के कंधे पर अपना सिर टिका दिया था.’’

छाया की आंखें भय से फैल गईं. वह बोली, ‘‘क्या बोल रही हो? तुम्हें देख कर तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता है कि तुम दर्द के उस दरिया से निकल कर आई हो.’’

‘‘दर्द के दरिया को पार कर मैं भी आई हूं, छाया. पर उस के पानी से मेरे कपड़े आज भीगे नहीं हैं. तुम आज भी भीगी हो और कांप रही हो.’’

हम दोनों भूल चुके थे कि हम कहां खड़े हैं और क्या लेने आए हैं. हमारे सामने साहिल खड़ा था. हाथ में स्नैक्स की ट्रे लिए. वह जानता था उस समय यहां क्या बात हो रही है. वह सिर्फ इतना बोला, ‘‘चलो, फिल्म शुरू हो गई है.’’

तांकझांक तो बुरी आदत है पर क्या करूं, आज तो मैं ने भी वही किया. देख कर अच्छा लगा, छाया तरुण का हाथ थामें बैठी थी. इस से ज्यादा ध्यान देना तो ठीक नहीं था. मैं ने अपना ध्यान फिल्म में लगा दिया.

कर्णफूल : क्यों अपनी ही बहन पर शक करने लगी अलीना-भाग 1

जब मैं अपने कमरे के बाहर निकली तो अन्नामां अम्मी के पास बैठी उन्हें नाश्ता करा रही थीं. वह कहने लगीं, ‘‘मलीहा बेटी, बीबी की तबीयत ठीक नहीं हैं. इन्होंने नाश्ता नहीं किया, बस चाय पी है.’’

मैं जल्दी से अम्मी के कमरे में गई. वह कल से कमजोर लग रही थीं. पेट में दर्द भी बता रही थीं. मैं ने अन्नामां से कहा, ‘‘अम्मी के बाल बना कर उन्हें जल्द से तैयार कर दो, मैं गाड़ी गेट पर लगाती हूं.’’

अम्मी को ले कर हम दोनों अस्पताल पहुंचे. जांच में पता चला कि हार्टअटैक का झटका था. उन का इलाज शुरू हो गया. इस खबर ने जैसे मेरी जान ही निकाल दी थी. लेकिन यदि मैं ही हिम्मत हार जाती तो ये काम कौन संभालता? मैं ने अपने दर्द को छिपा कर खुद को कंट्रोल किया. उस वक्त पापा बहुत याद आए.

वह बहुत मोहब्बत करने वाले, परिवार के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति थे. एक एक्सीडेंट में उन का इंतकाल हो गया था. घर में मुझ से बड़़ी बहन अलीना थीं, जिन की शादी हैदराबाद में हुई थी. उन का 3 साल का एक बेटा था. मैं ने उन्हें फोन कर के खबर दे देना जरूरी समझा, ताकि बाद में शिकायत न करें.

मैं आईसीयू में गई, डाक्टरों ने मुझे काफी तसल्ली दी, ‘‘इंजेक्शन दे दिए गए हैं, इलाज चल रहा है, खतरे की कोई बात नहीं है. अभी दवाओं का असर है, सो गई हैं. इन के लिए आराम जरूरी है. इन्हें डिस्टर्ब न करें.’’

मैं ने बाहर आ कर अन्नामां को घर भेज दिया और खुद वेटिंगरूम में जा कर एक कोने में बैठ गई. वेटिंगरूम काफी खाली था. सोफे पर आराम से बैठ कर मैं ने अलीना बाजी को फोन मिलाया. मेरी आवाज सुन कर उन्होंने रूखे अंदाज में सलाम का जवाब दिया.मैं ने अपने गम समेटते हुए आंसू पी कर अम्मी के बारे में बताया तो सुन कर वह परेशान हो गईं. फिर कहा, ‘‘मैं जल्द पहुंचने की कोशिश करती हूं.’’

मुझे तसल्ली का एक शब्द कहे बिना उन्होंने फोन कट कर दिया. मेरे दिल को झटका सा लगा. अलीना मेरी वही बहन थीं, जो मुझे बेइंतहा प्यार करती थीं. मेरी जरा सी उदासी पर दुनिया के जतन कर डालती थीं. इतनी चाहत, इतनी मोहब्बत के बाद इतनी बेरुखी… मेरी आंखें आंसुओं से भर आईं.

पापा की मौत के थोड़े दिनों बाद ही मुझ पर कयामत सी टूट पड़ी थी. पापा ने बहुत देखभाल कर मेरी शादी एक अच्छे खानदान में करवाई थी. शादी हुई भी खूब शानदार थी. बड़े अरमानों से ससुराल गई. मैं ने एमबीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जौब कर रही थी. जौब के बारे में शादी के पहले ही बात हो गई थी.

उन्हें मेरे जौब पर कोई ऐतराज नहीं था. ससुराल वाले मिडिल क्लास के थे, उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी होनी थी. इसलिए नौकरी वाली बहू का अच्छा स्वागत हुआ. मेरी सास अच्छे मिजाज की थीं और मुझ से काफी अच्छा व्यवहार करती थीं.

कभीकभी नादिर की बातों में कौंप्लेक्स झलकता था. आखिर 2-3 महीने के बाद उन का असली रंग खुल कर सामने आ गया. उन के दिल में नएनए शक पनपने लगे. नादिर को लगता कि मैं उस से बेवफाई कर रही हूं. जराजरा सी बात पर नाराज हो जाता, झगड़ना शुरू कर देता.

इसे मैं उस का कौंप्लेक्स समझ कर टालती रहती, निबाहती रही. लेकिन एक दिन तो हद ही हो गई. उस ने मुझे मेरे बौस के साथ एक मीटिंग में जाते देख लिया. शाम को घर लौटी तो हंगामा खड़ा कर दिया. मुझ पर बेवफाई व बदकिरदारी का इलजाम लगा कर गंदेगंदे ताने मारे.

कई लोगों के साथ मेरे ताल्लुक जोड़ दिए. ऐसे वाहियात इलजाम सुन कर मैं गुस्से से पागल हो गई. आखिर मैं ने एक फैसला कर लिया कि यहां की इस बेइज्जती से जुदाई बेहतर है.

मैं ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘नादिर, अगर आप का रवैया इतना तौहीन वाला रहा तो फिर मेरा आप के साथ रहना मुश्किल है. आप को अपने लगाए बेहूदा इलजामों की सच्चाई साबित करनी पड़ेगी. एक पाक दामन औरत पर आप ऐसे इलजाम नहीं लगा सकते.’’

मम्मीपापा ने भी समझाने की कोशिश की, लेकिन वह गुस्से से उफनते हुए बोला, ‘‘मुझे कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है, सब जानता हूं मैं. तुम जैसी आवारा औरतों को घर में नहीं रखा जा सकता. मुझे बदचलन औरतों से नफरत है. मैं खुद ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता. मैं तुझे तलाक देता हूं, तलाक…तलाक…तलाक.’’

और कुछ पलों में ही सब कुछ खत्म हो गया. मैं अम्मी के पास आ गई. सुन कर उन पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा. मेरे चरित्र पर चोट पड़ी थी. मुझ पर लांछन लगाए गए थे. मैं ने धीरेधीरे खुद को संभाल लिया. क्योंकि मैं कुसूरवार नहीं थी. यह मेरी इज्जत और अस्मिता की लड़ाई थी.

परछाई: मायका या ससुराल, क्या था माही का फैसला?- भाग 1

माही को 2 शादियों के कार्ड एकसाथ मिले. एक भाई की बेटी की शादी का और एक जेठजी की बेटी की शादी का. दोनों शादियां भी एक ही दिन थीं और दोनों ही रिश्ते ऐसे कि शादी में जाना टाला नहीं जा सकता था. माही कार्ड को उलटपुलट कर ऐसे देखने लगी, जैसे ध्यान से देखने पर कोई न कोई सुराग मिल जाएगा या कोई दूसरी तारीख मिल जाएगी. या फिर कोई दूसरी सूरत मिल जाएगी दोनों शादियां अटैंड करने की. वह क्या करेगी अब?

भाई की बेटी की शादी में शामिल नहीं हो पाएगी तो भैयाभाभी की नाराजगी झेलनी पड़ेगी और अगर जेठजी की बेटी की शादी में शामिल नहीं हुई तो जेठजेठानी उस की मजबूरी समझ कर कुछ कहेंगे नहीं पर उन के प्यार भरे उलाहने का सामना कैसे करेगी?

किंकर्तव्यविमूढ़ सी वह पास पड़ी कुरसी पर बैठ गई. विभव से पूछेगी तो वे तपाक से कह देंगे कि जो तुम्हें ठीक लगता है वह करो. वह फिर दोराहे पर खड़ी हो जाएगी. या फिर बहुत अच्छे मूड में होंगे तो कह देंगे कि तुम अपने

भाई की बेटी की शादी में शामिल हो जाओ और मैं अपने भाई की बेटी की शादी में शामिल हो जाता हूं. लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकती. शाम होने को थी, अंधेरा धीरेधीरे चारों तरफ फैल रहा था.

उस का दिल वहां पहुंच गया जब उमंगें थीं, रंगीन इंद्रधनुषी सपने थे, मातापिता थे. उस की कुलांचे भरने वाली उम्र थी. वे 2 भाईबहन थे. मातापिता की इकलौती लाडली बेटी. भाई के बाद लगभग 10 सालों के बाद हुई, इसलिए भाई का भी लाड़प्यार भरपूर मिला. वह 20 साल की थी जब भाई की शादी हुई. आम लड़कियों की तरह उस के भी कई अरमान थे भाई की शादी के… काफी लड़कियां देखने के बाद सिमरन पसंद आ गई. भाई के सेहरा बांधे देख हर बहन की तरह वह भी खुश थी.

भाभी ने जब घर में कदम रखा तो खुशियां जैसे उन के घर के दरवाजे पर हाथ बांधे खड़ी हो गईं. भाभी 23 साल की थीं, उम्र का फासला कम था. उसे लगा उसे हमउम्र एक सहेली मिल गई. अभी तक तो घर में सभी बडे़ थे. 3 साल उसे भाभी के सान्निध्य में रहने का मौका मिला. 23 साल की उम्र में उस की भी शादी हो गई. पहले मां काम करती थीं तो वह निश्चिंत हो कर अपनी पढ़ाई करती थी. मां भाभी की भी किचन में पूरी मदद करती थीं. पर भाभी न जाने क्यों उस से हमेशा चिढ़ी सी ही रहती थीं. शायद उन्हें लगता था कि यह आराम से अपनी पढ़ाई कर रही है. बाकी सारा काम मुझे ही करना पड़ता है. नई होने के कारण वे अधिक नहीं बोल पाती थीं पर भावभंगिमाओं से सब जता देती थीं.

भाभी के हावभाव समझ कर वह भी किचन में हाथ बंटाने की कोशिश करने लगी तो मां ने टोक दिया, ‘तू जा…अपनी पढ़ाई कर… ये काम तो जिंदगी भर करने हैं…’ वह जाने को हुई तो भाभी बोल पड़ीं, ‘पर काम आएगा नहीं तो आगे करेगी कैसे?’ उसे समझ नहीं आया कि भाभी की बात माने कि मां की. वह एम.एससी. कर रही थी. पढ़ने में वह हमेशा कक्षा में अच्छे विद्यार्थियों में गिनी जाती रही. भाभी अपनी चुप्पी के पीछे से भी पूरी दबंगता दिखा देती थीं. भाई भी उस से अब पहले की तरह बेतकल्लुफ नहीं रहते थे. पहले की तरह भाई से फरमाइश करने की उस की अब हिम्मत नहीं पड़ती थी.

भाई कहीं बाहर तो जाते तो भाभी के लिए कई चीजें खरीद कर लाते. वह बहुत उम्मीद से देखती कि शायद उस के लिए भी कुछ खरीद कर लाए हों, पर ऐसा होता नहीं था. उसे किसी बात की कमी नहीं थी पर भाई का कुछ न लाना जता देता कि अब उन की जिंदगी में उस की कोई अहमियत नहीं रह गई है. उस ने यह मासूम सी शिकायत मां से की तो उन्होंने उसे ही समझा दिया, ‘ऐसा तो होता ही है पगली. तेरी शादी होगी तो तेरा पति भी तेरे लिए ऐसे ही लाएगा, पति के लिए पत्नी सब कुछ होती है.’

‘और लोग कुछ नहीं होते?’

‘होते हैं… पर पत्नी से कम ही होते हैं.’ 2 साल तक भाभी का व्यवहार समझते हुए भी उस ने अधिक ध्यान नहीं दिया. उस के लिए भाभी फिर भी अपनी थीं पर भाभी उसे कभी अपना नहीं समझ पाईं. उस के 23 की होतेहोते मातापिता ने उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया. विभव बैंक में अफसर थे. उन के घर में 2 भाई व 1 बहन और मां थीं. वहां सब कुछ अच्छा देख कर उस का रिश्ता तय हो गया और फिर उस की शादी हो गई. उस ने सोचा कि अब भाभी के साथ उस के रिश्ते सहज हो जाएंगे, जब वह कभीकभी आएगी तो भाभी भी उसे पूरा सम्मान देंगी.

ससुराल में सभी ने उसे हाथोंहाथ लिया पर घर में जेठानी का ही राज था. वे पूरे परिवार पर छाई हुई थीं. सास, ननद व यहां तक की उस के पति के दिलोदिमाग पर भी वही राज कर रही थीं. वह अनायास ही ईर्ष्या से भर उठी. मायके जाती तो वहां सब कुछ भाभी का तो यहां सब कुछ जेठानी का.

धीरेधीरे न चाहते हुए भी उस के मन में जेठानी के प्रति ईर्ष्या की भावना घर कर गई. पति से कुछ भी पूछती तो एक ही जवाब मिलता कि भाभी से पूछ लो.

‘साड़ी खरीदनी है साथ चलो,’ तो उसे जवाब मिलता, ‘भाभी के साथ चली जाओ’ या फिर, ‘चलो भाभी को भी साथ ले चलते हैं, उन की पसंद बहुत अच्छी है.’’

‘खाने में क्या बनाऊं…’

‘भाभी से पूछ लो.’

गुप्त रोग: रूबी और अजय के नजायज संबंधों का कैसे हुआ पर्दाफाश – भाग 1

‘अब छोड़ो भी, जाने दो मुझे. मेरे पति रणबीर का फोन आता ही होगा,” रूबी ने अजय सिंह की बांहों में कसमसाते हुए कहा.

”अच्छा… तो अपने पति के वापस आते ही मुझ से नखरे दिखाने लगी हो तुम,” अजय सिंह ने रूबी के सीने पर हाथ का दबाव बढ़ाते हुए कहा.

“क्या बताऊं, जब से मेरा मरद गुजरात से कमाई कर के लौटा है, तब से वह सैक्स का भूखा भेड़िया बन गया है. रात में भी मुझे सोने नहीं देता,” रूबी ने एक मादक अंगड़ाई लेते हुए कहा.

“तो तुम भी सैक्स के मजे लो, इस में परेशानी की क्या बात है भला?” एक भद्दी सी मुसकराहट के साथ अजय सिंह ने कहा.

”रात में उस का बिस्तर गरम करूं और दिन में तुम्हारे जोश को ठंडा करूं, अरे, मैं एक औरत हूं, कोई ‘सैक्स डौल’ नहीं, और फिर मैं प्यार तो तुम से करती हूं न, मेरा वह तोंद वाला मोटा पति मुझे कतई पसंद नहीं,” यह कह कर रूबी ने अजय सिंह को अपनी बांहों में भर लिया.

तीखे नैननक्श और भरे बदन वाली रूबी पर महल्ले के मनचलों की नजर रहती थी. जब रूबी नाभि प्रदर्शना ढंग से साड़ी पहन कर बाहर निकलती तो लोग फटी आंखों से उसे घूरते रह जाते. अपनी इस खूबसूरती का अच्छी तरह एहसास भी था रूबी को और मौका पड़ने पर वह इस का फायदा उठाने से भी नहीं चूकती थी.

रूबी इस मकान में अकेली रहती थी, जबकि उस के पति को गुजरात में काम के सिलसिले में कई महीनों तक बाहर रुकना पड़ जाता था.

रूबी को अपने पति के मोटे होने से चिढ़ थी, इसलिए उस ने कई बार रणबीर से खुल कर कहा भी, पर उस के पति को पैसे से इतना प्यार था कि वह अपने शरीर पर बिलकुल ध्यान नहीं देता था.

अपने पति की गैरमौजूदगी में जब भी रूबी की तबीयत कुछ खराब होती तो  वह  महल्ले के नुक्कड़ पर बने अस्पताल में दवा लेने चली जाती थी.

तनहाई की मारी हुई जवान और खूबसूरत रूबी की जानपहचान जल्दी ही उस अस्पताल में काम करने वाले कंपाउंडर अजय सिंह से हो गई.

रूबी और अजय सिंह एकदूसरे से प्यार करने लगे. रूबी को एक आदमी का सहारा मिला, तो वह और भी निखर गई.

अजय सिंह का डाक्टर जब कभी भी अस्पताल से बाहर कहीं जाता, तो अजय सिंह रूबी को फोन कर के अस्पताल में बुला लेता. दोनों साथ में ही खातेपीते और अस्पताल में ही जिस्मानी सुख का मजा भी लेते.

दोनों की जिंदगी मजे से गुजर रही थी, पर इसी बीच रूबी के पति रणबीर के गुजरात से वापस लौट आने से उस की आजादी पर ब्रेक सा लग गया था.

अगले दिन रूबी ने भरे गले से अजय सिंह को फोन कर के बताया कि वह अब उस से मिलने नहीं आ पाएगी, क्योंकि उस का पति रणबीर उसे ले कर हमेशा ही बिस्तर पर पड़ा रहता है और पोर्न फिल्में दिखा कर अपनी ‘सैक्स फैंटेसी’ पूरी करने के लिए उस पर दबाव डालता रहता है.

रूबी को उस का पति परेशान कर रहा था, यह बात अजय सिंह को अच्छी नहीं लग रही थी. रूबी का पति उसे एक दुश्मन की तरह लग रहा था.

एक तो रूबी से दूरी अजय सिंह को सहन नहीं हो रही थी, ऊपर से ये बातें सुन कर अजय सिंह को गुस्सा आ रहा था, इसलिए मन ही मन अजय सिंह रूबी के पति को उस से दूर रखने के लिए कुछ ऐसा प्लान सोचने लगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

फिर एक दिन अजय सिंह ने रूबी को अस्पताल में बुलाया. अस्पताल आते ही रूबी ने कहा, ”बड़ी मुश्किल से आ पाई हूं, जल्दी से बताओ कि क्या बात है?”

”यह लो, यह एक किस्म का तेल है, जिस में मैं ने कई तरह की दवाएं मिला रखी हैं… इस तेल को तुम्हें अपने पति के प्राइवेट पार्ट यानी अंग पर मलना है,” अजय सिंह ने एक छोटी सी शीशी रूबी की ओर बढ़ाते हुए कहा.

अजय सिंह की बातें सुन कर रूबी चौंक पड़ी थी.

”पर, इस से भला क्या होगा?” रूबी ने पूछा.

”मैं ने इस तेल में कुछ ऐसे कैमिकल मिलाए हैं, जिन का पीएच मान बहुत कम होता है और यदि कम पीएच मान वाली चीजों को चमड़ी पर 2-4 दिन तक लगाया जाए, तो चमड़े पर हलका घाव या इंफैक्शन हो सकता है,” अपनी आंखों को शरारती अंदाज में दबाते हुए अजय सिंह ने कहा.

”ओह, इस का मतलब है कि इसे लगाते ही रणबीर को इंफैक्शन हो जाएगा और फिर वह मुझे सैक्स के लिए तंग नहीं करेगा. पर, फिर यह तेल मेरे हाथ पर भी घाव बना सकता है न,” रूबी ने अपनी घबराहट दिखाई.

”वैरी स्मार्ट, यह काम तुम दस्ताने पहन कर करोगी, ये लो ग्लव्स.”

”पर, इस तरह से तो रणबीर को मुझ पर शक हो जाएगा,” रूबी ने शक जाहिर करते हुए पूछा, तो अजय सिंह खीज उठा, “उफ्फ, बहुत ही नासमझ हो. तुम्हें मोटे पति के साथ न सोना पड़े, इस का एकमात्र यही रास्ता था… अब आगे का सफर कैसे तय करना है, वह सब तुम्हें सोचना है.”

”ठीक है बाबा… मैं ही कुछ सोचती हूं,” कहते हुए रूबी ने तेल की शीशी अपने बैग में रख ली.

रोज रात की तरह रणबीर फिर से रूमानी होने लगा, तो रूबी ने महीना होने का झूठ बोला. इस पर रणबीर ने बुरा सा मुंह बना लिया.

”अरे, अब तुम नाराज मत हो, मेरे पास तुम्हें खुश करने के और भी बहुत से तरीके हैं, मैं तुम्हारे पैरों में तेल से मसाज कर देती हूं, तुम्हें अच्छी नींद आ जाएगी,” कह कर रूबी ने रणबीर की आंखों पर एक दुपट्टा बांध दिया.

रणबीर मन ही मन कल्पना के गोते लगाने लगा कि न जाने उस की पत्नी उस के साथ क्या करने जा रही है. इस समय वह अपनेआप को किसी इंगलिश फिल्म का हीरो समझ रहा था.

रणबीर को लिटा कर रूबी ने हाथों में ग्लव्स पहन लिए और उस की टांगों पर चढ़ कर बैठ गई. रणबीर के पैरों और घुटनों में सादा यानी बिना मिलावट वाला तेल लगाया, जबकि अजय सिंह के द्वारा दिए गए तेल को रणबीर के प्राइवेट अंग में लगा कर धीरधीरे मालिश करने लगी.

रणबीर आंखें बंद कर के आनंद के सागर में गोते लगा रहा था, क्योंकि इस मसाज से एक अजीब सा असर हो रहा था उसे.

”रूबी, तुम ने कल जिस तेल से मसाज की थी… मुझे बहुत अच्छी लगी. तुम आज भी ठीक वैसी ही मसाज देना,” रणबीर ने सुबह उठते ही कहा, जिस पर रूबी मुसकरा कर रह गई.

रणबीर ने 3-4 दिन ये मसाज करवा कर मजा लिया, पर उस बेचारे को क्या पता था कि उस के साथ क्या होने

वाला है.

एक दिन सुबह जब रणबीर सो कर उठा, तो उस के अंग में हलकी सी जलन हो रही थी. उस ने ध्यान दिया कि अंग पर लाललाल दाने हैं, जिस में खुजली भी हो रही थी. दानों को खुजला भी दिया था रणबीर ने, जिस के चलते ऊपर की चमड़ी से हलका सा खून निकलने लगा था.

”रूबी, जब से तुम ने मेरे अंग पर मसाज की है, तब से वहां एलर्जी सी हो गई है, देखो तो क्या हाल हो गया है मेरा,” रणबीर ने शिकायती लहजे में रूबी से कहा.

”देखिए, इस में मेरी कोई गलती नहीं है, आप महीनों घर से बाहर रहते हैं. पत्नी का साथ आप को नसीब नहीं होता. ऐसे में धंधेबाज औरतों से संबंध भी आप जरूर ही बनाते होंगे, आप को किसी भी तरह का गुप्त रोग होना तो लाजिमी ही है,” रूबी ने नाकभौं सिकोड़ते हुए उपेक्षित लहजे में कहा.

अपनी पत्नी से रणबीर को हमदर्दी की उम्मीद थी, पर उसे तो नफरत मिल रही थी.

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