Story in Hindi
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मौसम में बदलाव हो रहा है. वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है. इस के कारण ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं. इन का पानी जा कर समुद्र में मिल रहा है. समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है. अगर इसी रफ्तार से यह सब चलता रहा तो दुनिया के नक्शे से कई शहर मिट जाएंगे, जिन में एक जकार्ता (इंडोनेशिया की राजधानी) बहुत बड़ा नाम है.
जकार्ता का तो अस्तित्व ही मिटता नजर आ रहा है. यहां जकार्ता की बात इसलिए हो रही है क्योंकि इंडोनेशिया अपनी राजधानी ही बदलने की तैयारी में है.
हम सभी ने कभी न कभी अपनी जिंदगी में जलवायु परिवर्तन के बारे में सुना होगा. ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमैट चेंज, ओजोन लेयर, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की उच्च सांद्रता जैसे शब्दों को सुना होगा. बच्चों ने तो भूगोल में यह सब पढ़ा होगा और आज भी पढ़ रहे हैं. देश और विदेशों में इस की चर्चाएं होती रहती हैं, लेकिन क्या आप को पता है कि यह कितना जरूरी है?
ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती गरम हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं. जब वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है तब प्रकृति का विनाशकारी और भयंकर रूप दिखता है, जो अपने साथ सबकुछ तबाह कर ले जाता है. इस के कारण भयंकर तूफान, बाढ़, जंगल में आग, सूखा, भयंकर लू जैसी आपदाएं बढ़ जाती हैं. इस का ताजा उदाहरण आप हिमाचल से ले सकते हैं. इस बार बारिश और बाढ़ के कारण लगभग पूरा हिमाचल डूब गया. करोड़ों की तबाही हुई. न जाने कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई.
उत्तराखंड का भी यही हाल है. इस से भी चिंता करने की बात यह है कि समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है. अगर यह इसी तरह बढ़ता रहा तो तटवर्ती देशों के डूबने का खतरा बनेगा.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले महीने एक जानकारी सामने आई कि इंडोनेशिया अपनी राजधानी बदल रहा है. अभी उस की राजधानी जकार्ता में है. लेकिन यह शहर अकसर प्राकृतिक आपदाओं से घिरा रहता है. कभी यहां भूकंप तो कभी बाढ़. अकसर यहां पर कुछ न कुछ होता रहता है. लेकिन समस्या यह नहीं है. ऐसा नहीं है कि इस कारण से यहां की सरकार राजधानी बदलने पर विचार कर रही है. दरअसल, जकार्ता जावा सागर के किनारे बसा हुआ है. यह धीरेधीरे समुद्र में समाता जा रहा है क्योंकि समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है.
इस के पीछे का कारण है ग्लोबल वार्मिंग. दुनिया के कई शक्तिशाली देशों ने वैश्विक मंच पर इस मुद्दे को उठाया है और इसे रोकने के भी प्रयास जारी हैं.
इंडोनेशिया के अधिकारियों का कहना है कि नई राजधानी एक फौरेस्ट सिटी होगा. उन का लक्ष्य 2045 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन का है जिसे किसी भी तरह से वे हासिल करना चहाते हैं. लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों ने सरकार को चेतावनी दी है. उन का तर्क है कि जब एक जंगल वाले इलाके को एक शहर में तब्दील करेंगे तो यहां पर बड़े पैमाने में पेड़ काटने पड़ेंगे. इस से प्रकृति, जीवजंतुओ और वे लोग जो जंगलों में रहते हैं उन के लिए खतरा पैदा हो जाएगा.
माना जा रहा है कि 2050 तक जकार्ता का 75% तक हिस्सा पानी में डूब जाएगा. हालांकि अब आगे क्या होगा इस का फैसला तो वहां की सरकार ही लेगी. लेकिन यह तो तय है कि अगर राजधानी बदली तो नुकसान और भी ज्यादा होगा.
इंडोनेशिया सरकार को जकार्ता के डूबने का डर है. इसलिए कैपिटल के लिए बोर्नियो द्वीप का चयन किया गया है. रिपोर्ट्स की मानें तो अगले साल तक इस का उद्घाटन किया जाएगा. हालांकि इस को तैयार होने में कम से कम 20 साल का समय लगेगा.
जकार्ता के हालात बहुत बुरे हैं. यहां पर आबादी बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है. यहां की जनसंख्या 1 करोड़ से ज्यादा है. यहां पर ट्रैफिक, प्रदूषण की भी बड़ी समस्या है. जब आबादी बढ़ती है तो प्रकृति के जरीए कुछ न कुछ नुकसान होता ही है.
अब आप को बताते हैं कुछ रिपोर्ट्स के बारे में, जिन को कई शोधों और रिसर्च के बाद तैयार किया :
जलवायु परिवर्तन पर अंतर्देशीय पैनल की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि साल 1990 से 2100 के बीच समुद्री जल का स्तर 9 सैंटीमीटर से 88 सैंटीमीटर के बीच बढ़ सकता है. अब इस में कोई शक नहीं कि इस के पीछे ग्लोबल वार्मिंग है. यानी पूरी दुनिया में धरती का तापमान बढ़ रहा है. इस के पीछे कार्बन डाइऔक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन का बढ़ना है. इस को रोकने को ले कर दुनियाभर में कवायद चल रही है. अगर वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी होगी तो जाहिर सी बात है कि हीटिंग बढ़ेगी. इस से ग्लेशियर पिघलेंगे. समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और पानी का तापमान भी बढ़ेगा.
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि इस को रोकने के लिए गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा. अगर यह इसी स्पीड से जारी रहा तो खतरा बढ़ता जाएगा. नक्शे से न जाने कितने ही देशों के नाम मिट जाएंगे.
जलवायु वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि पिछले 200 सालों में लगभग सभी वैश्विक तापमान के लिए मनुष्य जिम्मेदार हैं. मानवीय गतिविधियां ग्रीनहाउस गैसों का कारण बन रही हैं, जो कम से कम पिछले 2 हजार सालों में किसी भी समय की तुलना में दुनिया को तेजी से गरम कर रही हैं।
ऐसा नहीं है कि वैज्ञानिक प्रयास नहीं कर रहे हैं लेकिन देश में इतने जोरों पर कंस्ट्रक्शन के काम, पहाड़ों को काटना, समुद्रों में कैमिकल का बढ़ना, पेड़ों की कटाई इन सब को रोक पाना इतना आसान नहीं है और इन सब के जिम्मेदार केवल और केवल मनुष्य हैं.
बिग बॉस ओटीटी 2 की ट्रॉफी अपने नाम कर एल्विश यादव हर जगह छाए हुए है, वह मीडिया की सुर्खियों में छाएं हुए है, अब हाल में उनका एक गाना भी रीलिज हुआ है ये गाना उन्होने उर्वशी रौतेला के साथ शूट किया है. गाने का काफी पसंद किया गया है. गाने को तीन दिन में 18 मिलियन व्यूज मिल चुके है. गाने का नाम है हम तो दिवाने. अब इसी बीच उनका एक ओर वीडियो सुर्खियों में जिसमें वो ईशा गुप्ता के साथ नजर आ रहे है अब यही देख उर्वशी ने कमेंट किया है आइए जानते है कि क्या कहा है उर्वशी रौतेला ने अपने कमेंट में.
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आपको बता दें, कि एल्विश यादव इन दिनों काफी व्यस्त है हाल ही में उन्हे एक इवेंट में देखा गया है जहां हजारों की तदाद में लोग उनसे मिलने पहुंचे हुए है. लोग की भीड़ ने उन्हे निकलने भी नहीं दिया था, इस इवेंट में उनके साथ उर्वशी रौतेला भी साथ थी. एल्विश और उर्वशी को साथ गाड़ी मे जाते देखा गया था, वहीं जाते हुए उर्वशी ने कहा कि रोमांटिक राव साहब है. लेकिन अब फैंस एल्विश की ईशा गुप्ता संग वीडियो देख काफी हैरान है उनके साथ रोमांटिक पोज देते हुए लोग उन्हे कई कमेंट करते दिख रहे है.
ईशा गुप्ता और एल्विश का वीडियो चर्चा में बना हुआ है एल्विश यादव इस रील में ब्लू कलर के कुर्ता और व्हाइट कलर के पजामे में नजर आ रहे है. वही ईशा गुप्ता ब्लू कलर के ब्लाउज के साथ पीच कलर की साड़ी पहनी हुई दिख रही है. जिसमें ईशा काफी खूबसूरत लग रही है. ईशा के साथ एल्विश ने ये वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है. वीडियो को शेयर कर एल्विश ने कैप्शन में लिखा है कि हम तो दिवाने नेक्स्ट लेवल पर जा रहे है.
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इस वीडियो पर कई सेलेब्स कमेंट करते दिख रहे है पहला कमेंट उर्वशी का है जिसमें वो कमेंट करती है कि ‘सिस्टम अपडेट हो गया है’. वही दूसरी बार कमेंट में लिखती है कि ‘नेक्स्ट लेवेल में बदल गया है’. बताते चले कि एल्विश ने अपना बर्थडे कुछ ही दिनों पहले दुबई में मनाया था. उनका ये बर्थडे काफी गैंड था. जिसे उन्होने यॉट पर सेलिब्रेट किया था. इतना ही नहीं अपने ब्लॉग में उन्होने ये भी बताया कि उन्होने दुबई में आपर्टमेंट लिया है.
एकता कपूर का नागिन सीरियल ने दर्शकों के दिलों पर खूब राज किया. सीरियल लोगों को खूब पसंद आता है. सीरियल नागिन में इच्छाधारी मधुमक्खी का रोल निभा चुकी एक्ट्रेस आशका गोडारिया को लेकर एक नई खबर सामने आ रही है जी हां, एक्ट्रेस जल्द ही मां बनने वाली है. हाल ही में उन्होने पति ब्रेंट गोबले का साथ बेबी बंप का फोटोशूट कराया है जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है. वायरल फोटो में दोनों स्टार लिपलॉक करते नजर आ रहे है.
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आपको बता दें, कि अपलोड की गई वीडियो में आशका गोडारिया व्हाईट कलर के ऑफ शोल्डर गाउन में नजर आ रही है. इस ड्रेस के साथ एक्ट्रेस ने व्हाइट कलर की बड़ी सी टोपी लगाई हुई है. जिसमें एक्ट्रेस काफी खूबसूरत लग रही है फोटो में पति ब्रेंट बेबी बंप पर किस करते दिख रहे है दोनों की ये रोमांटिक फोटो फैंस को खूब पसंद आ रही है वह जल्द ही मां बनने पर आशका बेहद खुश नजर आ रही है.
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आशका ने ये वीडियो और फोटो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसके साथ उन्होने लंबा चौड़ा पोस्ट शेयर किया है. शेयर करते हुए लिखा है कि एक हजार साल…संसार के सबसे बेहतरीन शख्स के शादी करने से पहले इस गाने पर चल. आपको अपने पति और बच्चा ऐसा पिता पाकर खुशकिस्मत है. आप बेहतरीन साथी बने और बच्चे के लिए पिता के रूप में आपको पाकर खुश होगा. मेरे नीले आंखों वाले बेहतरीन इंसान. आपके ज्यादा मुझे कुछ भी प्यारा नहीं है.’
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बताते चले कि आशका गोराडिया नागिन के अलावा कई और सीरियल्स में नजर आ चुकी हैं. जिसमें ‘कयामत’, ‘कुसुम’, ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, ‘पिया का घर’, ‘कहीं तो होगा’, ‘सिंदूर तेरे नाम का’, ‘जेट सेट गो’, ‘सात फेरे: सलोनी का सफर’ और ‘कभी कभी प्यार कभी कभी यार’ शामिल हैं.
कॉफी और ग्रीन टी का सेवन हर उम्र के लोग करते हैं. इन दोनों में से अक्सर ग्रीन टी को ज्यादा हेल्दी माना जाता है, वजन घटाने की ख्वाहिश रखने वाले लोग अक्सर इस चाय का सेवन करना पसंद करते हैं. आपने सुना होगा कि हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए कैफीन का सेवन अच्छा नहीं होता, क्योंकि इससे बीपी और ज्यादा बढ़ जाता है. अब कॉफी और ग्रीन टी दोनों में ही ये कंपाउंड पाया जाता है, तो क्या बीपी के मरीजों के लिए दोनों ही बुरे हैं?
रिसर्चर्स ने अपनी स्टडी में ये पाया कि जिन लोगों ने एक दिन में एक बार कॉफी पी और डेली ग्रीन टी का सेवन किया, उनमें दिल की बीमारियों का खतरा नहीं पाया गया, भले ही वो बीपी के मरीज थे. 19 साल तक चली इस स्टडी के शुरुआती वक्त में 40 से 79 साल की उम्र के 6570 से ज्यादा पुरुषों और 12,000 महिलाओं को शामिल किया गया था, जिन्हें कैंसर के खतरे के इवेलुएशन के लिए जापान कोलैबोरेटिव कोहोर्ट स्टडी से चुना गया था.
एक कप कॉफी पीने से तकरीबन 80 से 90 मिलीग्राम कैफीन मिलता है, ये हाई ब्लड प्रेशर के कंडीशन में अच्छा नहीं है. बेहतर है कि हाई बीपी के मरीज कॉफी न पिएं क्योंकि लॉन्ग टर्म में इससे दिल की बीमारियों का खतरा पैदा हो जाएगा.
ग्रीन टी में कैफीन जरूर पाया जाता है, लेकिन इसमें इस कंपाउंड की मात्रा काफी कम होती है, जो हार्ट रेट और मेटाबॉलिज्म को खतरनाक लेवल तक नहीं बढ़ाती, फिर भी ग्रीन टी पीने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें.
देश की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा शहर में कारखानों और बड़ीबड़ी कंपनियों के तमाम औफिस हैं, जिन में काम करने के लिए देश के अलगअलग राज्यों से आए लोग यहां रह रहे हैं. रहने वालों की संख्या बढ़ती गई तो फ्लैट कल्चर कायम हुआ. जिन में रहने वाले लोग एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि लोग निजी जिंदगी में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं करते. ऐसे में किस फ्लैट में कौन रहता है और कौन क्या करता है, पड़ोसियों तक को पता नहीं होता. नोएडा शहर के ही सैक्टर-120 स्थित जोडिएक अपार्टमेंट सोसाइटी भी इस आधुनिक हकीकत से अलग नहीं थी. 17 दिसंबर, 2016 की सुबह पुलिस की 2 गाडि़यां सोसाइटी में आ कर रुकीं. पुलिस ने गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों से कुछ पूछताछ की और फिर एक सुरक्षाकर्मी को साथ ले कर सीधे 11वीं मंजिल पर बने फ्लैट नंबर-1104 के सामने जा पहुंची.
पुलिस के इशारे पर सुरक्षाकर्मी ने दरवाजे के ठीक बराबर में लगी डोरबैल बजाई तो अंदर से किसी लड़की की आवाज आई, ‘‘कौन है?’’
सुरक्षाकर्मी ने जवाब में कहा, ‘‘दरवाजा खोलिए मैम, मैं गार्ड हूं.’’
‘‘क्या बात है?’’
‘‘आप से कोई मिलने आया है.’’ गार्ड ने कहा.
कुछ पलों की खामोशी के बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला तो दरवाजे पर पुलिस वालों को देख कर उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. वह कुछ समझ पाती, उस के पहले ही एक पुलिसकर्मी ने पूछा, ‘‘मेघा कहां है?’’
पुलिस वाले के इस सवाल पर वह चौंकी, लेकिन तुरंत ही संभलने की कोशिश करते हुए जवाब देने के बजाए सवाल दाग दिया, ‘‘एक्सक्यूजमी सर, कौन मेघा? मैं समझी नहीं. आप शायद गलत जगह आ गए हैं. यहां कोई मेघा नहीं रहती.’’
लड़की के जवाब से एकबारगी पुलिसकर्मी सकते में आ गए. लेकिन अगले ही पल उस ने कहा, ‘‘यह नाटक बंद करो और जल्दी बताओ कि मेघा कहां है?’’
वह लड़की कोई जवाब देती, उस के पहले ही पुलिसकर्मी फ्लैट में दाखिल हो गए. अंदर बैडरूम में एक लड़की एक युवक के साथ बैठी टीवी देख रही थी. पुलिसकर्मियों की नजर जैसे ही उस लड़की पर पड़ी, उन के चेहरे पर मुसकान तैर गई. जबकि लड़की ने हारे हुए जुआरी की तरह दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया.
उस की हालत देख कर उस पुलिसकर्मी ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘‘यहां भी तुम शादी करने आई होगी मेघा? चलो, बहुत शादियां कर लीं, अब बाकी का वक्त जेल में बिता लेना.’’
लड़की हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दीजिए सर, अब आगे से ऐसी गलती नहीं करूंगी.’’ पुलिसकर्मियों ने उस की बातों को नजरअंदाज करते हुए फ्लैट में रहने वाले तीनों लोगों को कस्टडी में ले कर औपचारिक पूछताछ की. इस के बाद पुलिस तीनों को थाना फेज-2 ले आई, जहां उन से लंबी पूछताछ की गई. गिरफ्तार तीनों लोगों में मेघा भार्गव, उस की बहन प्राची और जीजा देवेंद्र शर्मा शामिल थे.
अगले दिन मेघा की गिरफ्तारी अखबारों और समाचार चैनलों की सुर्खियां बन गई. इस की वजह यह थी कि मेघा कोई मामूली लड़की नहीं थी. उस ने 11 लोगों से शादी कर के उन से करीब एक करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी की थी. लोग उस की सुंदरता के जाल में आसानी से फंस जाते थे. उसे ले कर ढेरों अरमान सजाते थे, जबकि वह शादी की शहनाई में धोखे की धुन बजाती थी.
उन की नईनवेली दुलहन मेघा फरेबी होती थी और वह कुछ ही दिनों में पूरे परिवार को नींद की गोलियां खिला कर घर में रखी नकदी और गहने ले कर रफूचक्कर हो जाती थी. इस के बाद ऐशपरस्त जिंदगी जीने वाली मेघा एक बार फिर नए दूल्हे की तलाश में निकल पड़ती थी. सिलसिला था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. केरल के त्रिवेंद्रम में भी मेघा फरेब का ऐसा ही खेल खेल कर आई थी.
नोएडा पुलिस की मदद से उसे गिरफ्तार करने वाली केरल पुलिस ही थी. उस के कारनामे से हर कोई दंग था. तीनों आरोपियों को केरल ले जाना था, लिहाजा पुलिस ने तीनों को सूरजपुर स्थित न्यायालय में पेश किया और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के उन्हें साथ ले कर केरल के लिए रवाना हो गई. सचमुच इस लुटेरी दुलहन का हर कारनामा चौंकाने वाला था.
27 वर्षीया मेघा भार्गव मूलरूप से भोपाल के अशोकनगर निवासी उमेश भार्गव की 4 बेटियों में तीसरे नंबर के बेटी थी. उस ने एमबीए की पढ़ाई की थी. वह शुरू से ही शातिर दिमाग और महत्वाकांक्षी थी. उस के ऐशपरस्ती के जो सपने थे, वे साधारण जिंदगी में कभी पूरे नहीं हो सकते थे. लेकिन वह अपने सपनों को पूरा करना चाहती थी.
करीब 6 साल पहले मेघा ने केतन नामक युवक से एक कालेज में एडमीशन कराने के नाम पर 80 हजार रुपए ले लिए थे. लेकिन एडमीशन नहीं हो सका तो केतन अपने रुपए वापस मांगने लगा. मेघा ने रुपए लौटाने में आनाकानी की तो उस ने उस के खिलाफ ठगी का मामला दर्ज करा दिया. दरअसल, मेघा का मकसद उसे धोखा देना ही था. पुलिस ने इस मामले में उस के खिलाफ कोई काररवाई नहीं की तो केतन न्यायालय चला गया. इस के बाद मेघा का परिवार मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के गोयल विहार में शिफ्ट हो गया. लेकिन केतन ने उस का पीछा नहीं छोड़ा.
अंत में पुलिस से दबाव डलवा कर उस ने अपनी रकम वसूल कर ही ली. मेघा ने पीछा छुड़ाने के लिए यह रकम कर्ज ले कर अदा की थी. कर्ज अदा करने के लिए उस ने एक संस्थान में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली. समय अपनी गति से चलता रहा. करीब 2 साल पहले मेघा की मुलाकात महेंद्र बुंदेला से हुई. समाज में ऐसे शातिर लोगों की कमी नहीं है, जो महत्वाकांक्षी लोगों का इस्तेमाल अपने हिसाब से करने में माहिर होते हैं.
मेघा के रंगढंग और पैसे की जरूरतों को देख कर महेंद्र समझ गया कि यह ऐसी लड़की है, जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकती है. मौका देख कर उस ने मेघा से कहा, ‘‘मेघा, तुम ऐश की जिंदगी जीना चाहती हो न?’’
‘‘बिलकुल.’’ मेघा की आंखों में एकाएक चमक आ गई. ‘‘मेरे पास एक आइडिया है. तुम चाहो तो महीने भर में ही इतनी रकम कमा सकती हो कि पूरे साल मेहनत कर के भी उतना नहीं कमा सकती. लेकिन इस के लिए मैं जिस से कहूं, तुम्हें उस से शादी करनी होगी. वहां से जो माल मिलेगा, उस में मुझे आधा हिस्सा देना होगा.’’
‘‘क…क्या,’’ मेघा चौंकी, ‘‘लेकिन मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.’’
‘‘शादी तो एक नाटक होगी, लेकिन उसी से तुम अमीर बन सकती हो.’’ महेंद्र ने उसे समझाया, ‘‘मैं किसी ऐसे अमीर को पकडूंगा, जिस की शादी नहीं हो रही होगी. शादी के बाद उस के माल पर हाथ साफ कर के तुम दूर निकल जाना.’’
मेघा को महेंद्र की यह योजना पसंद आ गई. इस के बाद महेंद्र एक ऐसा तलाकशुदा आदमी ढूंढ कर लाया, जो शादी के लिए काफी परेशान था. महेंद्र ने उसे मेघा की फोटो दिखा कर किसी दूसरे राज्य की अनाथ लड़की बताया. फोटो देखते ही उस ने मेघा को पसंद कर लिया तो उस ने दोनों की मुलाकात करा दी. मेघा सुंदर भी थी और पढीलिखी भी.
उस आदमी की जिंदगी में जैसे खुशियों की बहार खुद चल कर आ रही थी. महेंद्र ने कहा कि लड़की जल्द से जल्द शादी करना चाहती है, क्योंकि उसे पति के रूप में सहारा चाहिए. इस पर वह आदमी और भी खुश हुआ. इस मौके को वह हाथ से जाने नहीं देना चाहता था, इसलिए जल्दी ही महेंद्र ने एक मंदिर में उन का विवाह करा दिया.
विवाह के अभी 10 दिन ही बीते थे कि मेघा एक रात करीब साढ़े 11 लाख रुपए की नकदी ले कर लापता हो गई. उस आदमी ने महेंद्र से संपर्क किया तो उस ने हाथ खड़े कर दिए. उस ने कहा कि उस अनाथ लड़की से उस की जानपहचान जरूर थी, लेकिन वह कहां की रहने वाली थी, इस बारे में उसे पता नहीं था. यह उस आदमी की शराफत थी कि उस ने पुलिस में शिकायत नहीं की. जैसा तय था, मेघा ने आधी रकम महेंद्र को दे दी.
इस के बाद मेघा मुंबई चली गई. कुछ दिन मस्ती में गुजारने के बाद उस ने नया शिकार तलाश कर लिया और इस नए शिकार को उस ने 40 लाख रुपए का चूना लगाया. मेघा को ठगी का यह अनोखा धंधा रास आ गया. अब तक वह इतनी तेज हो गई थी कि उस ने महेंद्र का साथ छोड़ दिया और खुद ही अपने लिए दूल्हे ढूंढने लगी.
उस ने पुणे के एक अमीर परिवार के अपाहिज लड़के से शादी कर के वहां 90 लाख रुपए का चूना लगाया. इस के बाद उस ने मुंबई छोड़ दी. इस बीच मेघा की बड़ी बहन प्राची का विवाह देवेंद्र से हो चुका था. मेघा के धंधे से वे वाकिफ थे. रुपयों के लालच में वे भी उस की फितरत में शामिल हो गए.
कभी पैसोंपैसों के लिए मोहताज रहने वाली मेघा नोटों से खेलने लगी. वह अच्छा खाने और महंगे कपड़े पहनने की शौकीन थी. बड़े शहरों में घूमने के लिए हवाई जहाज की यात्राएं करती थी. मेघा सौ, 5 सौ के नोट टिप में दे दिया करती थी.
उस का कोई स्थाई ठिकाना नहीं था. वह शादियों के विज्ञापन देने वाली इंटरनेट बेवसाइट्स पर शिकार की तलाश करती थी. खास बात यह थी कि वह पैसे वाले तलाकशुदा और विकलांगों से ही शादी करती थी. इस की वजह यह थी कि उन्हें अच्छी लड़की मिल रही होती थी. ऐसे जरूरतमंद लोग ज्यादा छानबीन किए बिना शादी के लिए आसानी से तैयार हो जाते थे.
मेघा की बहन और जीजा भावी दूल्हे के परिवार से मिलते थे और माली हालत का अंदाजा लगा कर ही रिश्ता पक्का करते थे. रिश्ता पक्का होते ही शादी की जल्दी करते थे. वह अपनी कमजोर माली हालत का परिचय देते तो शादी का खर्च भी लड़के वाले ही उठाते थे. जिन की माली हालत लूटने लायक नहीं होती थी, वहां वे कोई न कोई बहाना बना कर रिश्ता तोड़ देते थे.
मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा राजस्थान और बिहार में भी मेघा ने लोगों को अपना शिकार बनाया था. परिवार के नाम पर मेघा की शादी में बहन और जीजा ही शामिल होते थे. कुछ मामलों में वह खुद को अनाथ और दुखियारी लड़की बता कर अकेली ही रिश्ता पक्का कर लेती थी. वह हंसमुख स्वभाव की थी, इसलिए शादी के बाद दूल्हे के घर वालों से मीठीमीठी बातें कर के घुलमिल जाती थी.
ससुराल वाले तो अपनी नईनवेली दुलहन की तारीफ करते नहीं थकते थे कि उन के नसीब अच्छे थे, जो गुणी बहू मिली. रुपए और गहने कहां रखे होते थे, इस की वह जल्दी से जल्दी जानकारी हासिल कर लेती थी. उस में एक खास बात यह थी कि वह घर में खाना बनाने का काम भी जल्दी ही संभाल लेती थी.
ऐसा कर के वह एक तीर से 2 शिकार करती थी. एक तो लड़के वाले उस के कामकाज की प्रशंसा कर के विश्वास करने लगते थे, दूसरे उसे नींद की गोलियां मिलाने में सुविधा हो जाती थी. वह ऐसी अदाकारा बन चुकी थी कि सभी उस पर पूरी तरह विश्वास कर बैठते थे. वारदात करने से पहले वह बहन और जीजा को बता देती थी, जिस से तय समय पर वे घर के बाहर पहुंच जाते थे. इस के बाद मेघा सामान समेट कर उन के साथ निकल जाती थी.
प्रत्येक वारदात के बाद मेघा अपने मोबाइल का सिमकार्ड तोड़ कर फेंक देती थी. कुछ लोगों ने पुलिस में शिकायतें भी कीं, लेकिन पुलिस कभी उस तक पहुंच नहीं पाई. इस से उस के हौसले बढ़ते गए. पिछले साल मेघा अपनी बहन और जीजा के साथ केरल पहुंची. मेघा ने अपने पुराने अंदाज में शादी कर के 4 लोगों को ठगा. कुछ महीने पहले उस ने त्रिवेंद्रम के लौरेन जोसटिस से शादी की.
शादी के 20 दिनों बाद ही वह करीब 15 लाख के माल पर हाथ साफ कर के भाग निकली. उस के शिकार हुए लोग लुटने के बाद सिर पीट कर रह जाते थे, लेकिन लौरेन सिर पीटने वालों में नहीं थे. उन्होंने सीधा पुलिस का रुख किया और मेघा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने मामले को गंभीरता लिया और इस केस की जांच का जिम्मा इंसपेक्टर टी. सज्जी को सौंपा गया. कुछ समय मुंबई में रहने के बाद मेघा, प्राची और देवेंद्र नोएडा आ कर रहने लगे.
यह इत्तेफाक ही था कि अभी तक मेघा कभी पकड़ी नहीं गई थी. उस का सोचना था कि उस का जन्म ही शादी की चाह रखने वाले लोगों को ठगने के लिए हुआ है. तीनों फ्लैट में गुमनाम जिंदगी जी रहे थे और किसी से कोई वास्ता नहीं रखते थे. आसपास के लोगों को खबर भी नहीं थी कि वहां शादी के नाम पर अपने हाथों में मक्कारी की मेहंदी लगाने वाली जालसाज दुलहन रहती है. नोएडा में भी वे नए शिकार की तलाश में जुट गए थे. उधर केरल पुलिस ने ठगी के इस मामले को चुनौती के रूप में लिया.
उस ने मेघा के फोटो हासिल करने के साथ ही उस के मोबाइल नंबर को हासिल कर के उस की कौल डिटेल्स निकलवाई. उन की गहराई से जांचपड़ताल की गई. उस में 2 नंबर मिले, जिन पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. इन तीनों की लोकेशन भी साथसाथ होती थी. यही दोनों नंबर उस की बहन और जीजा के थे. लेकिन परेशानी की बात यह थी कि तीनों ही नंबर बंद कर दिए गए थे.
जिन मोबाइल हैंडसेट में ये नंबर इस्तेमाल होते थे, उन पर कोई दूसरा नंबर भी नहीं चल रहा था. लेकिन एक महीने बाद एक मोबाइल हैंडसेट में नया नंबर चल गया. जांच में यह नंबर मेघा के जीजा देवेंद्र का निकला. इस नंबर के संपर्क में 2॒ नंबर और आए. पुलिस समझ गई कि ये मेघा और प्राची के नंबर हैं. पुलिस ने इन नंबरों की लोकेशन पता कराई तो वह नोएडा की मिली. इस के बाद पुलिस ने तीनों ही नंबरों को सर्विलांस पर लगा दिया. बहुत जल्दी साफ हो गया कि ये नंबर शादी के नाम पर ठगी करने वाली तिगड़ी के हैं. मेघा कोई नया शिकार फांस कर नंबर बदल सकती थी, इसलिए उसे जल्दी गिरफ्तार करना जरूरी था.
इंसपेक्टर टी. सज्जी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम नोएडा आ पहुंची और एसएसपी धर्मेंद्र यादव से मिली. एसएसपी ने एसपी (सिटी) दिनेश यादव को मदद करने के निर्देश दिए. उन्होंने फेज-2 थानाप्रभारी उम्मेद सिंह को केरल से आई पुलिस टीम के साथ लगा दिया.
पुलिस ने पहले सुरागसी की, उस के बाद सोसाइटी जा कर तीनों को गिरफ्तार कर लिया. मेघा के पकड़े जाने के बाद केरल के वे अन्य लोग भी सामने आ गए हैं, जिन्हें मेघा ने ठगा था. पुलिस ने मेघा, प्राची और देवेंद्र को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. मेघा ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता और पढ़ाई का सही इस्तेमाल किया होता तो आज उसे जेल जाने की नौबत न आती.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
सवाल
मैं 23 साल का कुंआरा लड़का हूं और पढ़ाई में अच्छा हूं. मैं 12वीं क्लास के छात्रों को विज्ञान की ट्यूशन पढ़ाता हूं. पर इतने से मेरा काम नहीं चल पा रहा है. मुझे ज्यादा पैसा कमाना है और इस के लिए कोई तरीका नहीं सूझ रहा है. कभीकभी दिल करता है कि कोई अमीर लड़की फंसा कर उस से शादी कर लूं और घरजमाई बन जाऊं. पर क्या यह आइडिया काम करेगा?
जवाब
आइडिया बुरा नहीं है और इसे कई हिंदी फिल्मों में दिखाया जा चुका है. राकेश रोशन और जयाप्रदा की 1982 में आई फिल्म ‘कामचोर’ यूट्यूब पर देख लें. उस में भी हीरो के ख्वाब वही थे जो आप के हैं. आप की इस सोच पर लानत ही दी जा सकती है. आप में स्वाभिमान नहीं रह गया है, जो सफलता और संतुष्टि दोनों देता है, इसलिए मेहनत करें और जम कर करें.ये मुंगेरीलाल जैसे हसीन सपने देखना छोड़ कर हकीकत में जिएं. अमीर लड़कियां फिल्मों, किस्सेकहानियों में ही आप जैसे आलसियों और निकम्मों के फेर में पड़ती हैं.
सवाल
मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 32 साल है. मेरी शादी नहीं हुई है और मुझे अब जीवनसाथी की बहुत ज्यादा जरूरत महसूस होने लगी है. अकेलापन भी मुझे काट खाने को दौड़ता है. मेरे औफिस में एक लड़की है, जो 34 साल की है. उस की भी शादी नहीं हुई है. वह मुझे पसंद करती है, पर उम्र में बड़ी है. एक बार मैं ने अपने घर वालों को उस के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे डांट दिया कि तुझ से बड़ी उम्र की लड़की से शादी नहीं करेंगे. उस लड़की में कोई कमी नहीं है और कमाती भी अच्छा है. पर घर वालों के रवैए की वजह से मुझे तनाव रहने लगा है. मैं क्या करूं?
जवाब
घर वालों की परवाह न करें. जिंदगी आप को गुजारनी है, उन्हें नहीं. बाकी रही बात उम्र के अंतर की तो उस के कोई माने नहीं. पत्नी उम्र और कद में छोटी ही हो, ये पुरातन बातें हैं. अगर बाकी सबकुछ ठीकठाक है, तो शादी कर डालिए. कुछ दिनों में सब खामोश हो जाएंगे, क्योंकि जब मियांबीवी राजी तो…
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हर किसी को यह एहसास है कि अब होना जाना कुछ नहीं है और जो होना था वह हो चुका है, लेकिन जो हुआ उस पर कोई हल्ला नहीं मचा, जबकि यह दिल दहला देने वाला हादसा है. रक्षाबंधन क्या कोई भी त्योहार गरीबों के लिए खास माने नहीं रखता, उलटे रोज कमानेखाने वालों को तो कोफ्त ही होती है, क्योंकि छुट्टी के दिन दिहाड़ी नहीं मिलती और अगर टैंपरेरी नौकरी वाले हो तो पगार कट जाती है.
चंबल इलाके के मुरैना जिले के गांव धनेला के तिलहन संघ के दफ्तर के नजदीक एक फैक्टरी साक्षी फूड प्रोडक्ट्स है, जिस में चैरी बनाने और सप्लाई करने का काम होता है. इस फैक्टरी के मालिक इलाके के नामी और रसूखदार रईस कौशल गोयल हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर यह फैक्टरी खोली है.
कौशल गोयल के रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन की फैक्टरी एक ऐसे इलाके में चल रही थी, जो इंडस्ट्रियल नहीं है.
रक्षाबंधन की दोपहर साक्षी फूड के इर्दगिर्द काफी गहमागहमी थी. कलक्टर और एसपी समेत छोटेबड़े सरकारी मुलाजिमों के अलावा सैकड़ों गांव वाले जमा थे, जिस की वजह थी टैंक में 5 मजदूरों का मर जाना.
फैक्टरी के टैंक ने एकएक कर के जब 5 लाशें उगलीं तो वहां मौजूद लोगों का कलेजा कांप उठा. कुछ ने अपना गुस्सा भी जताया, जिसे बड़ी चतुराई से अफसरों ने ‘मैनेज’ कर लिया.
पांचों लाशों के निकलने के बाद इस हादसे की पूरी कहानी सामने आई, जिस के मुताबिक मरने वालों के नाम वीर सिंह, राजेश, रामावतार, गिरिराज और रामनरेश थे.
रामावतार, रामनरेश और वीर सिंह टिकटोली गांव के बाशिंदे थे और सगे भाई थे, जबकि राजेश और गिरिराज घुरैया वसई गांव के रहने वाले थे. इन सभी की उम्र 40 साल से कम थी. गिरिराज तो महज 28 साल का था. ये पांचों इस लालच या उम्मीद में टैंक की सफाई करने के लिए राजी हो गए थे कि इस मेहनत से जो पैसा मिलेगा उस से शाम को अपनी बहनों के लिए तोहफा और मिठाई वगैरह घर लेते जाएंगे.
एक के बाद एक इस फैक्टरी में पपीते से चैरी और गुलकंद बनते हैं. फलों का खराब मैटिरियल और पानी एक टैंक में जमा होता जाता है, लेकिन इस टैंक की कई दिनों से साफसफाई नहीं हुई थी, इसलिए इस बाबत हादसे वाले दिन इन पांचों को फैक्टरी वालों ने बुलाया था.
टैंक जो पांचों की कब्र बन गया तकरीबन 9 फुट गहरा है. पहले इन में से कोई 2 आदमी टैंक की सफाई के लिए नीचे उतरे, लेकिन टैंक में पानी गहरा था और कोई जहरीली गैस भी उस में से रिस रही थी, इसलिए वे जान बचाने की गरज से मदद के लिए चिल्लाए तो बाकी 3 भी एकएक कर के टैंक में कूद पड़े.
ऐसे दूसरे सैकड़ोंहजारों हादसों की तरह इन पांचों को भी मास्क और दस्तानों समेत हिफाजत के दूसरे सामान या औजार मुहैया नहीं कराए गये थे, जिस से इन का दम घुट गया. हल्ला मचा तो फैक्टरी में मौजूद लोग और गांव वाले टैंक के पास पहुंच गए.
किसी ने पुलिस को खबर कर दी, जिस ने आ कर इन्हें बाहर निकाला और इलाज के लिए जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मरा घोषित कर लाशों का पोस्टमार्टम किया.
अब तक अस्पताल में भी भीड़ जमा हो चुकी थी और कार्यवाही की मांग करने लगी थी, लेकिन भारीभरकम पुलिस ने कोई ‘अनहोनी’ नहीं होने दी.
हादसे की खबर चंबल इलाके में आग की तरह फैली. तरहतरह की बातों के बीच पता चला कि मरने वाले गुर्जर समाज के नौजवान थे, जिस की गिनती उन पिछड़ों में होती है, जिन्हें छूने से सवर्णों को पाप नहीं लगता और उन्हें नहाना नहीं पड़ता. माली हालत की तरह इन की सामाजिक हैसियत भी धार्मिक किताबों के मुताबिक शूद्रों सरीखी ही है.
मौके की नजाकत को भांपते हुए कलक्टर ने मरने वालों के घर वालों को 50,000-50,000 रुपए की इमदाद देने की घोषणा कर डाली, लेकिन अब तक गुर्जर समाज के लोग फैक्टरी मालिक
के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करने लगे थे, इसलिए प्रशासन की तरफ से खबर आई कि फैक्टरी मालिक एकएक लाख रुपए और मरने वाले के घर के एकएक मैंबर को नौकरी देने को तैयार हो गया है, तो लोगों का गुस्सा कुछ कम हुआ.
मारे गए पांचों की बहनें राखी का थाल सजाए भाइयों का इंतजार करती रहीं, लेकिन खबर उन की मौत की पहुंची तो दोनों गांवों में मातम पसर गया. इन बहनों पर क्या गुजरी होगी, इस का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता, जिन्होंने राखी के दिन अपने भाइयों को खो दिया.
आएदिन की बात है धन्ना सेठों का लिहाज और खौफ ही इसे कहा जाएगा कि गुर्जर समाज के विरोध के बाद भी पुलिस प्रशासन ने फैक्टरी मालकिन के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज नहीं किया.
6 दिन बाद समाज के लोगों ने कलक्ट्रेट का घेराव कर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया, लेकिन गुर्जर समाज के लोगों को दुख और हैरत इस बात का भी रहा कि कोई मंत्री, विधायक, सांसद या दूसरा कोई बड़ा नेता उन के साथ खड़ा नहीं हुआ, जबकि माहौल पूरी तरह से चुनावी था.
तय है कि इस से उन्हें समझ आ गया होगा कि दौर दबंगों और अमीरों का है. दलित पिछड़े गरीबों की जिंदगी की कीमत महज एक लाख रुपए होती है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ट्वीट कर हादसे पर दुख जताने की सियासी रस्म निभा दी.
मुरैना के जैसे सैकड़ों हादसे आएदिन होते रहते हैं, जिन पर 2-4 दिन तो हल्ला मचता है, लेकिन बात फिर आईगई हो जाती है. टैंकों, सीवरों, बौयलरों और गटरों में मरने वालों पर कोई गंभीर है, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. ऐसे कुछ हादसों पर नजर डालें, तो समझ आता है कि चूंकि मरने वाले ज्यादातर सफाई मुलाजिम दलित, पिछड़े, गरीब होते हैं, इसलिए किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती :
* इसी साल 15 जून को मुरैना के ही नजदीक ग्वालियर के पुराने रेशम मिल इलाके की एक सीवर लाइन के गटर को साफ करते समय 2 सफाई मुलाजिम अमन और विक्रम करोसिया बेमौत मारे गए थे. इन दोनों की हिफाजत के भी कोई इंतजाम नहीं थे.
हादसे की जिम्मेदारी नगरनिगम ने सफाई ठेकेदार के सिर फोड़ दी, क्योंकि मरने वाले आउट सोर्स मुलाजिम थे यानी ठेके पर काम कर रहे थे.
* भोपाल के गांधीनगर इलाके में पिछले साल दिसंबर महीने में सीवर की सफाई के दौरान एक इंजीनियर और एक मजदूर की मौत हुई थी. इन दोनों को 20 फुट गहरे गड्ढे में सफाई के लिए उतारा गया था, जहां सांस लेने के लिए औक्सीजन न मिलने से दोनों का दम घुट गया था. इन दोनों को भी हिफाजत के औजार नहीं दिए गए थे.
नगरनिगम ने सफाई का ठेका गुजरात की एक कंपनी अंकिता कंस्ट्रक्शन को दिया था, जिस ने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया था कि हमें नहीं पता कि दोनों क्यों नीचे उतरे और कैसे मरे. इन दोनों की तो लाशों का भी पता न चलता, अगर लोगों की नजर चैंबर के बाहर रखे इन के जूतों पर न पड़ी होती.
* मध्य प्रदेश के ही सिंगरौली में 25 सितंबर, 2021 को इस से भी भयानक हादसा हुआ था, जिस में 3 सफाई मुलाजिम कन्हैया लाल यादव, इंद्रभान सिंह और नागेंद्र रजक को जान से हाथ धोना पड़ा था. ये तीनों भी गटर की जहरीली गैस का शिकार हुए थे.
* इसी साल 24 जनवरी को इंदौर में सीवेज लाइन डालते समय दिलान सिंह नाम के मजदूर की मौत हुई थी. यह मजदूर 25 फुट गहरे गड्ढे में गिरा था और उस का सिर धड़ से अलग हो गया था.
* बीती 25 जून को राजस्थान के कोटा के एक 25 फुट गहरे सीवेज में 3 मजदूरों कमल, किर सिंह और गलिया की भी जहरीली गैस के कारण दम घुटने से मौत हो गई थी. ये सब मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले झाबुआ के रहने वाले थे. तीनों को चैंबर के नीचे की पाइप लाइन से रस्सी के जरीए बाहर निकाला गया था. बन रही इमारत सरकारी थी, लेकिन यह काम भी ठेके पर चल रहा था. इस हादसे में भी मुरैना की तरह किर सिंह और गलिया सगे भाई थे. गलिया तो 4 बच्चों का पिता था, जिसे सीवेज ने निगल लिया या सिस्टम ने, बात एकही है.
* अहमदाबाद के ढोलका में भी एक बड़ा हादसा इसी साल 25 अप्रैल को हुआ था, जिस में सीवेज लाइन की सफाई के दौरान 2 मजदूर 24 साला गोपाल पाथर और 32 साला विजय पाथार मारे गए थे. इन दोनों की मौत भी गटर में दम घुटने से हुई थी.
इस हादसे पर हल्ला मचा तो पता चला कि इसी साल तकरीबन 11 सफाई मुलाजिम गटर में मारे गए हैं. गुजरात की एक एनजीओ मानव गरिमा ने दावा किया था कि गुजरात में साल 1993 से ले कर साल 2014 के बीच मरने वाले 16 मजदूरों को मुआवजा नहीं दिया है. राज्य में ऐसे कुल 45 हादसों में 95 लोग मारे गए हैं.
* पटना के जकारियापुर इलाके में इसी साल 11 अप्रैल को 2 सफाई मुलाजिम 24 साला रंजन रविदास और 23 साला मुन्ना रजक की मौत भी सीवेज की सफाई के दौरान हुई थी.
जैसा कि ऐसे ज्यादातर मामलों में होता है, इस में भी देखने में आया कि पहले एक सफाई के लिए गटर में उतरा और काफी देर तक तक वापस नहीं आया तो दूसरा भी उसे देखने उतर गया और वह भी मारा गया. रविदास को देखने मुन्ना गया, तो फिर लाश की शक्ल में ही बाहर आया. ये दोनों नमामि गंगे प्रोजैक्ट के तहत कंपनी के लिए मजदूरी कर रहे थे. इन के पास भी हिफाजत के औजार नहीं थे.
* कानपुर के बिठूर के गांव चक्रतनपुर में पिछले साल 30 अक्तूबर को 3 मजदूरों की मौत भी सीवर टैंक में गिरने से हो गई थी. मरने वालों में से एक साहिल तो नाबालिग ही था, जबकि 2 अन्य मोहित 25 साल का और नंदू 18 साल का था. ये तीनों एक बन रहे मकान की सीवर शटरिंग खोलने गटर में उतरे थे और जहरीली गैस की चपेट में आने से मारे गए.
* 22 सितंबर, 2022 को कानपुर के ही बर्रा इलाके के मालवीय विहार में भी 3 मजदूर 28 साला अंकित पाल,
25 साला शिवा तिवारी और 26 साला अमित कुमार भी एकएक कर के मारे गए थे. ये तीनों भी एक मकान का सैप्टिक टैंक साफ करने उतरे थे.
* बीती 4 अगस्त को बिहार के समस्तीपुर के मगरदही महल्ले में सैप्टिक टैंक में दम घुटने से 2 मजदूरों अमरजीत कुमार और सनी कुमार की मौत हो गई थी.
वजह वही कि दोनों एक मकान का सैप्टिक टैंक साफ करने उतरे थे और जहरीली गैस का शिकार बन गए. इन दोनों को भी मकान मालिक ने हिफाजत के लिए कोई औजार मुहैया नहीं कराए थे.
देशभर में ऐसे हादसों की तादाद बता पाना मुश्किल है, लेकिन सभी में समान बात यह है कि मरने वालों को हिफाजत के लिए औजार नहीं दिए गए थे और तकरीबन सभी गटर की जहरीली गैस के चलते दम घुटने से मरे.
समान बात यह भी है कि किसी भी मामले में सख्त कार्यवाही करने की जरूरत नहीं समझी गई, क्योंकि ये लोग गरीब थे और इन में से 90 फीसदी दलितपिछड़े तबके के थे, जिन्हें कीड़ेमकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता.
गटर और टैंकों में इस तरह मरने वालों की तादाद को ले कर सरकार हमेशा सच छिपाने की कोशिश करती रही है, जिस से उस का दामन पाकसाफ दिखे.
इसी साल जून महीने में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले ने एक सवाल के जवाब में लोकसभा में बताया था कि साल 2023 में अब तक इस तरह की कुल 9 मौतें हुई हैं, जबकि साल 2022 में 66, साल 2021 में 58, साल 2020 में 22, साल 2019 में 117 और साल 2018 में
67 मौतें दर्ज की गईं. इस तरह सीवर और सैप्टिक टैंकों में सफाई करते समय साल 2018 में और जून महीने तक कुल 339 लोग मारे गए.
इस आंकड़े पर यकीन करने की कोई वजह नहीं है, जिसे कई एनजीओ ने चुनौती भी दी है, लेकिन कोई भी गूगल पर सर्च करे तो हकीकत उसे पता चल जाएगी.
लोकसभा में ही सरकार ने जानकारी दी थी कि देश में मैला ढोने की प्रथा पर पूरी तरह रोक है. इस रिवाज को रोकने के लिए कानून है, लेकिन हर कोई जानता है कि हकीकत में आज भी देश के कुछ हिस्सों में सिर पर मैला ढोने का शर्मनाक सिलसिला बदस्तूर जारी है.
खुद सरकार का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय इसी साल जून में संसद में मान चुका है कि देश के 766 जिलों में से अब तक 508 ने ही खुद को मैला ढोने से मुक्त घोषित किया है.
इस का सीधा सा मतलब यह निकलता है कि 35 फीसदी जिलों में अभी भी मैला ढोया जा रहा है. जाहिर है कि यह काम कोई तो कर रहा होगा, नहीं तो जादू के जोर से तो मैला साफ होने से रहा.
सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने मुंबई में 2 लोगों की मौत का हवाला देते हुए कहा था कि संसद में कोई कैसे कह सकता है कि हाथ से मैला ढोने से होने वाली किसी की मौत की खबर नहीं दी जा रही. इसी आंदोलन ने कुछ साल पहले अदालत को बताया था कि इस काम में तकरीबन 12 लाख लोग आज भी लगे हुए हैं.
यहां यह समझना जरूरी है कि हाथ से मैला ढोने और सीवर व सैप्टिक टैंक की सफाई के बीच में फर्क है. मुरैना जैसे हादसे बेहद आम हैं और इस के कुछ उदाहरण ऊपर बताए भी गए हैं, लेकिन सरकारी आंकड़ों में इन की गिनती नहीं होती. यह एक बहुत बड़ा पेंच और कमी है.
साल 1993 में सूखे यानी शुष्क शौचालयों के बनाने और ऐसे शुष्क शौचालयों को साफ करने के लिए मैनुअल मैला ढोने वालों के रोजगार पर रोक लगाई गई थी.
साल 2013 में सीवर, खाई, गड्ढों और सैप्टिक टैंकों की सीधी सफाई के लिए मानव श्रम के इस्तेमाल पर रोक को शामिल करने के लिए कानून को और स्पष्ट किया गया था.
कानून होने के बावजूद भी कई राज्यों, जिन में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात वगैरह खासतौर से शामिल हैं, में मैनुअल स्केवेंजिंग के मामले मिले थे, जिस का कानूनी मतलब है कि मानव मल को मैनुअल रूप से ढोना और मैनुअल स्केवेंजर का मतलब होता है, वह मजदूर या सफाई मुलाजिम, जिस से स्थानीय प्राधिकारी हाथों से मैला ढुलवाने का काम करवाए, मैला साफ कराए, ऐसी खुली नालियां या गड्ढे, जिस में किसी भी तरह से इनसानों का मलमूत्र इकट्ठा होता हो, उसे हाथों से साफ कराए.
फिर साल 2013 में इस शब्द का दायरा बढ़ाते हुए जो कहा गया, उस का मतलब यह है कि किसी भी तरीके से किसी अस्वच्छ शौचालय में या किसी खुली नाली या गड्ढे में मानव मल का निबटान किया जाता है. इस में रेलवे और राज्य सरकारों को यह हक दिया गया था कि वे ऐसी खुली जगहों की पहचान तय कर सकती हैं.
यह टेढ़ीमेढ़ी सांपसीढ़ी सरीखी कानूनी भाषा अच्छेअच्छों को आसानी से समझ नहीं आने वाली, खासतौर से उन 90 फीसदी दलितों को तो कतई नहीं, जो पुश्तों से मैला ढोने के काम में ढकेल दिए गए हैं, क्योंकि धार्मिक किताबों के मुताबिक सेवा का यह काम भी ऊपर वाले ने उन्हें सौंप रखा है.
सफाई कर्मचारी आंदोलन ने साल 2018 में बताया था कि सफाई कर्मचारियों की औसत उम्र तकरीबन 32 साल ही होती है, क्योंकि सफाई के काम के दौरान उन्हें तरहतरह की बीमारियां घेर लेती हैं. इस तरह वे अपनी रिटायरमैंट की उम्र तक भी नहीं जी पाते.
सफाई मुलाजिमों के हितों से ताल्लुक रखते कानून में समयसमय पर बदलाव होते रहे, लेकिन मौतों का सिलसिला उन से थमा नहीं है. हर कहीं होने वाले हादसे इस की गवाही देते हैं. ये कानून बहुत उलझे हुए हैं. प्रोहिबिशन औफ ऐंप्लौयमैंट एंड देयर रिहैबिलिटेशन ऐक्ट 2013 सीवर और नालों की मैनुअल स्केवेंजिंग के लिए सफाई मुलाजिमों को काम करने से रोकता है.
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में हिदायत दी थी और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को साल 2013 का कानून पूरी तरह से लागू करने का आदेश दिया था.
अदालत ने यह भी कहा था कि सैप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोका जाए. खास बात यह भी है कि सैप्टिक टैंकों और सीवर में सफाई के दौरान मरने वालों के आश्रितों को बतौर मुआवजा 10 लाख रुपए देने का इंतजाम है.
सुप्रीम कोर्ट की यह बात ही हकीकत बताती हुई थी कि दुनिया में कहीं नहीं लोगों को मरने के लिए गैस चैंबरों में भेजा जाता है. आजादी के 76 साल गुजर जाने के बाद भी जातिगत भेदभाव कायम है.
अदालत ने कई तरह के और अफसोस जताते हुए यह भी कहा था कि मैनुअल स्केवेंजिंग में लगे लोगों को औक्सीजन गैस सिलैंडर और मास्क जैसे औजार क्यों नही दिए जा रहे? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चिथड़े देश में हर कहीं उड़ते देखे जा सकते हैं.
सीवेज और गटर में सफाई के दौरान मरने वालों में से मुरेना समेत किसी भी शहर के मजदूर के पास हिफाजत के औजार नहीं थे. इस बारे में भोपाल के कुछ सफाई वालों से बात की गई तो पता चला कि न तो नगरनिगम इन्हें मुहैया कराता है और न ही ठेकेदार देते हैं.
एक ठेकेदार से यह सवाल किया गया, तो वह बेहद नफरत भरे लहजे में बोला, ‘‘हम तो देते हैं, लेकिन ये लोग ही नहीं लेते और ले भी लेते हैं, तो इस्तेमाल नहीं करते. इन का असली औजार तो शराब है, जिसे बिना पिए सफाई के लिए सीवर, नालियों और गड्ढों में नहीं उतर पाते.’’
सफाई मुलाजिमों ने पूछने पर ईमानदारी से बताया कि हां, यह सच है कि हम वहां बिना नशे के नहीं जा सकते, क्योंकि चैंबरों, सीवेज और टैंकों में भयंकर बदबू आती है और तरहतरह के कीड़ेमकोड़े भी रहते हैं. होश में यह काम नहीं किया जा सकता.
एक सफाई मुलाजिम के मुताबिक, प्राइवेट तौर पर चैंबर या टैंक साफ करने के एवज में 500 रुपए तक मिल जाते हैं, जबकि नगरनिगम का ठेकेदार 8,000 से 10,000 रुपए महीना देता है यानी कुछ पैसों के लिए सफाई मुलाजिम अपनी जान पर खेलने को तैयार हो जाते हैं, तो यह उन की मजबूरी भी है और जरूरत भी.
सफाई के काम में लगे 90 फीसदी से भी ज्यादा लोग दलित होते हैं, जो पीढि़यों से मैला ढोते आ रहे हैं, बस तरीका बदल गया है. साल 2021 में इस बात को केंद्र सरकार भी संसद में मान चुकी है कि मैला ढोने के काम में लगे 97 फीसदी लोग अनुसूचित जातियों के हैं.
इन लोगों से ताल्लुक रखती सुकून देने वाली एकलौती बात यह है कि ये लोग अपने बच्चों को इस घटिया और जानलेवा पेशे में नहीं लाना और लगाना चाहते, इसलिए उन्हें पढ़ा रहे हैं. हालांकि हालात हाहाकारी तरीके से बदलेंगे, ऐसा लगता नहीं.
जब भोपाल के ही दूसरे लोगों से मुरैना जैसे हादसों पर राय मांगी गई, तो उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि अब तो ऊंची जाति वाले भी सफाई मुलाजिम बनने लगे हैं, लेकिन पूछने पर कोई भी तीन से ज्यादा नाम नहीं बता पाया.
सवाल यह भी अहम नहीं है कि ऊंची जाति वाले कुछ लोग इस पेशे में आ गए हैं, अहम सवाल उन की जिंदगी का है, जिस की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं.
म ध्य प्रदेश के इंदौर में रहने वाली शोभा की उम्र तकरीबन 48 साल है. उस का पति दिलीप 52 साल का है. उन के 2 बच्चे हैं. देखने में तो यह एक सुखी परिवार लगता है, पर रात होते ही शोभा बिस्तर पर जाने से घबराती है. वजह, दिलीप अब भी खुद को 25 साल का बांका जवान समझता है और चाहता है कि शोभा उस की हर रात रंगीन कर दे.
पर शोभा का शरीर उस का साथ नहीं दे रहा है. मेनोपौज ने दस्तक दे दी है. नतीजतन, वह अब थकीथकी सी रहती है. मूड अपनेआप खराब हो जाता है. बिस्तर पर जाने के नाम पर खीज मचने लगती है. उस ने इशारे से दिलीप को बताने की कोशिश भी की, पर सब बेकार.
दरअसल, मेनोपौज की वजह से शोभा के अंग में सूखापन रहने लगा है. सैक्स करते हुए तेज दर्द होता है. दिन में काम करते हुए उसे अचानक से पसीना आ जाता है. माहवारी अनियमित रहती है. इस वजह से उसे रात को नींद नहीं आती है.
शोभा की समस्या जायज तो है, पर सवाल उठता है कि क्या बढ़ती उम्र में सैक्स सुख लिया जा सकता है? अगर पतिपत्नी में से कोई एक बिस्तर पर गरमी न दिखाए, तो दूसरे पार्टनर को क्या करना चाहिए? अगर पति ही पत्नी से दूरी बनाने लगे, तो पत्नी को क्या करना चाहिए?
सच तो यह है कि बढ़ती उम्र का सैक्स लाइफ से कुछ लेनादेना नहीं है. अगर पत्नी मन से तैयार नहीं होती है, तो पति का फर्ज बनता है कि पहले वह उस की बात सुने और उसे समझाए कि सैक्स को ले कर उस की उदासीनता तन से कम, बल्कि मन से ज्यादा है.
बहुत सी बार पत्नी घरेलू जिंदगी में इतनी ज्यादा उलझ कर रह जाती है कि बढ़ती उम्र उस के मन पर छा जाती है. अगर वह कामकाजी नहीं है, तो समस्या और ज्यादा बड़ी हो जाती है. पति को चाहिए कि वह उसे कहीं बाहर घुमाने ले जाए. यह एक तरह का दूसरा हनीमून कहा जाएगा, जहां पतिपत्नी अपने पुराने रोमांस को दोबारा हासिल कर सकते हैं.
किसी औरत को बढ़ती उम्र के साथ ज्यादा ही थकान रहने लगती है, तो वह डाक्टर की सलाह पर थायराइड और ब्लड सैल काउंट टैस्ट करा सकती है. अकसर बच्चे के जन्म या मेनोपौज के बाद औरतों में थायराइड की समस्या हो जाती है. ब्लड सैल काउंट टैस्ट से शरीर के अंदर खून की कमी के बारे में पता चल जाता है. फिर बीमारी के हिसाब से उस का इलाज शुरू किया जा सकता है.
अब मर्दों की बात करते हैं. उम्र बढ़ने के साथसाथ बहुत से मर्दों में जल्दी पस्त होने का डर मन में बैठ जाता है. अगर पति और पत्नी में उम्र का फर्क ज्यादा है, तो यह समस्या और ज्यादा बढ़ सकती है. अंग में पूरा तनाव न होना या संबंध बनाते समय अंग में जलन होना भी मर्दों को सैक्स से दूर करने लगता है.
इतना ही नहीं, ब्लड प्रैशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां भी मर्दाना ताकत पर बुरा असर डालती हैं. काम का तनाव भी उन्हें बिस्तरबाजी से दूर करने की वजह बनता है.
50 साल की उम्र के बाद मर्दों में भी मेनोपौज जैसी समस्या उभर सकती है, जिसे एंड्रोपौज कहते हैं. इस में उम्र बढ़ने के साथसाथ उन में टैस्टोस्टैरोन की कमी होने लगती है. तो फिर इस सब का हल क्या है?
इस का हल है खुद पर उम्र को हावी न होने देना. रात को बिस्तर पर पतिपत्नी दिनभर की बोर कर देनी वाली बातें भूल जाएं और उन पलों को भरपूर जिएं. अपने खानपान का खास खयाल रखें. रात का भोजन हलका ही रखें और जल्दी खा लें. अगर दोनों के पास समय है, तो सुबह एकसाथ कसरत करें.
रात को बिस्तर पर जाने का मतलब यह नहीं होता कि बढ़ती उम्र में रोजाना सैक्स होगा ही, पर कपड़े ऐसे पहनें जो एकदूसरे को लुभाने वाले हों. रात को नहाने से शरीर की सुस्ती और बदबू दूर हो जाती है, तनाव भी दूर रहता है. ऐसा कर के आप एकदूसरे की बांहों में खो सकते हैं.
याद रखें कि अंगूर तो खट्टे भी निकल सकते हैं, पर किशमिश हमेशा मीठी ही होती है. बढ़ती हुई जिंदगी को किशमिश समझ कर स्वीकार करना चाहिए और पतिपत्नी को उम्र के इस पड़ाव पर अपने जिस्मानी रिश्ते का लुत्फ उठाना चाहिए.
अगर फिर भी जोश में कोई कमी है, तो डाक्टर से सलाह जरूर लें. बाजार में भी जोश बढ़ाने वाले तमाम साधन मौजूद हैं.
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