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जिंदगी बदगुमां नहीं : भाग 1

दिल्ली की आउटररिंग रोड पर भागते आटो में बैठा पदम उतावला हो रहा था, घर कब आएगा? कब सब से मिलूंगा.

आटो से बाहर झांका, सुबह का झुटपुटा निखरने लगा था. एअरपोर्ट से उस का घर 18 किलोमीटर होगा. यहां से उस के घर की दूरी एक घंटे में पूरी हो जाएगी और फिर वह अपने घर पर होगा. पूरे 22 बरस बाद लौटा है पदम. उसे मलकागंज का भैरोंगली चौराहा, घर के पास बना पार्क और उस के पास बरगद का मोटा पेड़ सब याद है. इन सब के सामने वह अचानक खड़ा होगा, कितना रोमांचक होगा. नहीं जानता, वक्त के साथ सबकुछ बदल गया हो. हो सकता है मम्मीपापा, भैया कहीं और शिफ्ट हो गए हों. उस ने 2 दशक से उन की खोजखबर नहीं ली. आंखें बंद कर के वह घर आने का इंतजार करने लगा.

22 बरस पहले की यादों की पोटली खुली और एक ढीठ बच्चा ‘छोटा पदम’ सामने खड़ा हुआ. हाथ में बैटबौल और खेल का मैदान, यही थी उस छोटे पदम की पहचान. कुशाग्रबुद्धि का था पदम. सारा महल्ला उसे ‘मलकागंज का गावस्कर’ के नाम से जानता था. एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाला यह बच्चा टीचर्स का भी लाड़ला था. किंतु वह अपनी मां को ले कर हैरान था. जहां जाता, मां साथ जाती. 9 बरस के पदम को मम्मी स्कूल के गेट तक छोड़ कर आती और वापसी में उसे वहीं खड़ी मिलती. यहां तक कि पार्क में जितनी देर वह बैटिंगफील्ंिडग करता, वहीं बैंच पर बैठ कर खेल खत्म होने का इंतजार करती.

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मां के इस व्यवहार से वह कई बार खीझ जाता, ‘मम्मी, मैं कोई बच्चा हूं जो खो जाऊंगा? आप हर समय मेरे पीछे घूमती रहती हो. मेरे सारे दोस्त पूरे महल्ले में अकेले घूमते हैं, उन की मांएं तो उन के साथ नहीं आतीं. फिर मेरे साथ यह तुम्हारा पीछेपीछे आना क्यों?’

मम्मी आंखों में आंसू भर कर कहती, ‘बस, कुछ साल बाद तू अकेला ही घूमेगा, मेरी जरूरत नहीं होगी.’ मां की यह बात उस की समझ से परे थी.

‘‘बाबूजी, आप तो दिल्ली निवासी हो?’’ आटो वाले सरदारजी ने उस की सोच पर शब्दकंकरी फेंकी. उस ने चौंक कर वर्तमान को पकड़ा, ‘‘हां, नहीं, मुझे दिल्ली छोड़े बहुत बरस हो गए.’’

‘‘बाबूजी, आप विदेश में रहते हो?’’ हां, यहां बस किसी से मिलने आया हूं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर सरदारजी ने आटो की स्पीड बढ़ा दी. सच ही तो है…वह तो परदेसी बन गया था. याद आया 22 बरस पहले का वह मनहूस दिन. उस दिन क्रिकेट का मैच था. पार्क में सारे बच्चों को इकट्ठा होना था.

पदम को घर में छोड़ कर मम्मी बाजार चली गई थी. बाहर से ताला लगा था. पदम पार्क में जाने के लिए छटपटा रहा था कि तभी उस के दोस्त अनिल ने खिड़की से आवाज दी, ‘यार, तू यहां घर में बैठा है और हम सब तेरा पार्क में इंतजार कर रहे हैं.’ ‘कैसे आऊं, मम्मी बाहर से ताला लगा गई हैं.’

‘छत से कूद कर आ जा.’ ‘ठीक है.’

पड़ोस की छतों को पार करता पदम पहुंच गया पार्क में. उसे देखते ही सारे दोस्त खुशी से चिल्लाए, ‘आ गया, हमारा गावस्कर, आ गया. अब आएगा मैच का मजा.’ बस, फिर क्या था, जम गया मैदान में. बल्ला घूमा और 30 रन बटोर कर आ गया. आउट हो कर वह बैंच पर आ कर बैठा ही था कि अचानक पता नहीं कहां से एक व्यक्ति उस के पास आ बैठा. उस ने बड़ी आत्मीयता से उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘बेटा, क्रिकेट बहुत बढि़या खेलते हो. लो, इसी खुशी में चौकलेट खाओ. और उस ने हथेली फैला दी. पदम ने चौकलेट उठा कर मुंह में डाल ली. उस के बाद पता नहीं क्या हुआ?

होश आया तो महसूस हुआ कि वह अपनों के बीच नहीं है. जगह और आसपास बैठे लोग सब अनजाने हैं. वह किसी बदबूदार कमरे में गंदी सी जगह पर था. सड़ांध से उस का जी मिचला गया था. कुशाग्रबुद्धि का पदम समझ गया था उसे अगवा कर लिया गया है. लेकिन क्यों? उस ने सुना था कि पैसे वालों के बच्चों को अगवा किया जाता है. बदले में पैसा मांगा जाता है. सब जानते हैं कि उस के पिता एक साधारण से टीचर हैं. वे भला इन लोगों को पैसा कहां से देंगे? वह भी जानता है कि घर में बमुश्किल रोटीदाल चल पाती है. फिर उसे उठा कर इन लोगों को क्या मिलेगा? उस की समझ से परे था. वह घबरा कर रोने लगा था. 2 गुंडा टाइप मुश्टडों ने उसे घूरा, ‘चौप्प, साला भूखा है, तभी रो रहा है. वहीं बैठा रह.’

‘मुझे पापा के पास जाना है.’ ‘खबरदार, जो उस मास्टर का नाम लिया. बैठा रह यहीं पर.’

पदम वहीं बैठा रहा बदबूदार दरी पर. उसे उबकाई आ गई, सारी दरी उलटी से भर गई. सिर भन्ना गया उस का.

शाम होतेहोते उसे कहीं और शिफ्ट कर दिया गया. फिर तो हर 10-12 दिनों बाद उसे किसी और जगह भेज दिया जाता. 4 महीने में 10 जगहें बदली गईं. वह अकेला नहीं था, 3 बच्चे और थे उस के साथ. इस बीच न जाने कितनी ही रातें उस ने आंखों में बिताई थीं और कितनी बार वह मम्मीपापा को याद कर के रोया था. यहां उसे अपनों का चेहरा तो दिखा ही नहीं, सारे बेगाने थे.

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इंदौर, उदयपुर, जयपुर, शेखावटी न जाने कहांकहां उस को रखा गया. इन शहरों के गांवों में उसे रखा जाता जहां सिर्फ तकलीफ, बेज्जती और नफरत ही मिलती थी जिसे उस का बालमन स्वीकार नहीं करता था. इन सब से वह थक चुका था. तीव्रबुद्धि का पदम जानता था कि यह भागमभाग, पुलिस से बचने के लिए है. गंदे काम कराए जाते. गलती करने पर लातघूंसे, गाली और उत्पीड़न किया जाता था. रोटी की जगह यही सब मिलता था.

जब टोले वालों को ज्यादा गुस्सा आता तो उसे शौचालय में बंद कर दिया जाता. टोले के मुखिया की उसे सख्त हिदायत थी कि अपना असली नाम व शहर किसी को मत बताना और नाम तो हरगिज नहीं. टोले वालों ने उस को नया नाम दिया था पम्मी.

उदयपुर के गांव में उसे ट्रेनिंग दी गई. चोरी करना, जेब काटना, उठाईगीरी और लोगों को झांसा दे कर उन की कीमती चीजों को साफ करना. ये सब काम करने का उस का मन न करता, किंतु इसे न करने का विकल्प न था.

सुबहसवेरे होटल से लाई पावभाजी खा कर उसे व उस के साथियों

को रेलवेस्टेशन भीड़भाड़ वाले बजारों या रेडलाइट पर छोड़ दिया जाता. शाम को टोले का एक आदमी उन्हें इकट्ठा करता और पैदल वापस ले आता. याद है उसे, एक रोज उस ने अपने एक दोस्त से पूछा, ‘ये हम से गलत काम क्यों कराते हैं?’

‘अबे साले, हिज्जू से और क्या कराएंगे. हम हिजड़ों को यही सब करना पड़ता है.’ ‘ये हिज्जूहिजड़ा क्या होता है?’

‘तुझे नहीं पता, हम सब हिजड़े ही तो हैं. तू, मैं, कमल, दीपू सब हिजड़े हैं.’ ‘मतलब.’

‘हम सब न लड़का हैं न लड़की, हम तो बीच के हैं.’ वह बच्चा बड़ी देर तक विद्रूप हंसी हंसता रहा था, साथ में गंदे इशारे भी करता रहा था.

पदम को आज भी याद है, ये सब देख कर उसे भरी सर्दी में पसीना आ गया था. तनबदन में आग सी लग गई थी. यह क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? जिन लोगों के बीच वह पल रहा है वह हिजड़ों की मंडली है? कुशाग्रबुद्धि के पदम को काफीकुछ समझ में आ गया था. समझ गया था कि वह ऐसे चक्रवात में फंस गया है जहां से निकलना आसान नहीं है. उस रात उसे बड़े डरावने सपने आते रहे. अब तक तो आंखें बंद करता था तो मम्मी, पापा, राम भैया और मुन्ना अंकल सपनों में रहते थे पर उस दिन के बाद उसे डरावने सपने ही आते. वह चौंक कर आंखें खोल देता था.

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बस, इस सब के साथ एक आस थी, हो सकता है पापा या भैया उसे ढूंढ़ते हुए कहीं स्टेशन या शहर की रेडलाइट पर मिल जाएं. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. वह यह सब सहतेसहते पत्थर हो गया था. दुख, घुटन, बेजारी, गाली, तिरस्कार, उस के जीवन के पर्याय हो गए थे. कई बार दुख की पराकाष्ठा होती तो जी करता रेल की पटरी पर लेट कर अपने जीवन का अंत कर ले. दूसरे ही पल सोचता, नहीं, मेरा जीवन इतना सस्ता नहीं है. वह 12 बरस का हो गया था. अब उसे अपने शरीर में कसाव और बेचैनी महसूस होती थी. लेकिन कौन उसे बताता कि यह सब उस के साथ क्यों हो रहा है? खुले आसमान के नीचे बैठ कर अपनी बेनामी मजबूरी पर उसे आंसू बहाना अच्छा नहीं लगता था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

घर में दफ्न 4 लाशें

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 3

नरेंद्र ने विजय के सामने ससुर की सारी संपत्ति की पोल खोल दी, जिस से उस के मन में भी लालच पैदा हो गया. नरेंद्र के इशारे पर उस ने हीरालाल की मंझली बेटी पार्वती पर निगाहें गड़ा दीं. लेकिन पार्वती समझदार थी. विजय के लाख कोशिश करने के बाद भी वह उस के प्रेम जाल में नहीं फंसी. यह बात नरेंद्र को पता चली तो उस के मन में हीरालाल की पूरी संपत्ति हड़पने का लालच आ गया.

संपत्ति के लालच में वह ससुर के साथसाथ बाकी लोगों को भी मौत के घाट उतारने के लिए षडयंत्र रचने लगा. लेकिन वह अपनी योजना में सफल नहीं हो पा रहा था. उसे पता लग गया था कि विजय पार्वती को पटाने में असफल रहा. इस पर उस ने विजय से कहा कि पार्वती ने यह बात अपने पापा को बता दी तो वह मोहल्ले में नहीं रह पाएगा.

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नरेंद्र की बात सुन विजय घबरा गया. इस के बाद विजय नरेंद्र की हां में हां मिलाने लगा. अपना अगला दांव चलते हुए नरेंद्र अपने घर पर विजय की दावत करने लगा. खातेपीते एक दिन नरेंद्र ने लालच दे कर विजय को अपनी योजना बता दी.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर 17 अप्रैल, 2019 को अपने ससुराल वालों की हत्या की योजना को अंतिम रूप दे दिया. योजना बन गई तो नरेंद्र बीवीबच्चों को अपने फूफा के घर देवरनियां, बरेली में छोड़ आया ताकि उन्हें उस की साजिश का पता न चल सके.

बीवीबच्चों को बरेली भेजने के बाद नरेंद्र अपनी योजना को अंजाम देने के लिए मौके की तलाश में लग गया. लेकिन उसे मौका नहीं मिल पा रहा था. नरेंद्र और विजय को यह भी डर था कि अगर किसी वजह से वह इस योजना में फेल हो गए तो न घर के रहेंगे न घाट के.

नरेंद्र को पता था कि उस की सास सुबहसुबह दूध लेने जाती है. उस वक्त ससुर और दोनों सालियां सोई रहती हैं. घर का गेट खुला रहता है. पड़ोसी भी सोए होते हैं. घटना को अंजाम देने के लिए नरेंद्र को यह समय ठीक लगा.

20 अप्रैल, 2019 को नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार सुबह जल्दी उठ गए और हेमवती के जाने का इंतजार करने लगे. उस दिन हेमवती सुबह के साढ़े 5 बजे बेटी पार्वती को साथ ले कर दूध लेने के लिए निकली. उन के घर से निकलते ही नरेंद्र विजय को साथ ले कर हीरालाल के घर में घुस गया.

लेकिन तब तक हीरालाल सो कर उठ चुके थे. सुबहसुबह उन दोनों को अपने घर में देख हीरालाल ने आने का कारण पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि आज मैं आखिरी बार आप से पूछने आया हूं कि मेरे हिस्से की संपत्ति मुझे देते हो या नहीं.

सुबहसुबह दामाद के मुंह से ऐसी बात सुन कर हीरालाल का पारा चढ़ गया. दोनों के बीच विवाद बढ़ा तो योजनानुसार नरेंद्र ने वहीं रखी लकड़ी की फंटी से पीटपीट कर हीरालाल की हत्या कर दी. पिता के चीखने की आवाज सुन कर बेटी दुर्गा उन के बचाव में आई तो दोनों ने उसे भी फंटी से पीटपीट कर मार डाला.

दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद नरेंद्र और विजय हेमवती और पार्वती के आने का इंतजार करने लगे. जैसे ही उन दोनों ने घर में प्रवेश किया, दरवाजे के पीछे खड़े नरेंद्र और विजय ने उन्हें भी पीटपीट कर मार डाला.

सासससुर और दोनों सालियों की हत्या करने के बाद नरेंद्र और विजय ने चारों को घसीट कर एक कमरे में ले जा कर डाल दिया. कहीं कोई जिंदा तो नहीं रह गया, जानने के लिए दोनों ने एकएक कर सब की नब्ज चैक की.

जब उन्हें पूरा यकीन हो गया कि चारों की मौत हो चुकी है, तो दोनों ने मकान में फैले खून को धो कर साफ किया और घर के बाहर ताला डाल कर घर लौट आए. नरेंद्र और विजय ने चारों की हत्या तो कर दी, लेकिन समस्या थी लाशों को ठिकाने लगाने की. नरेंद्र जानता था कि लाशों को घर से बाहर ले जाना खतरे से खाली नहीं है.

सोचविचार कर दोनों ने तय किया कि बाजार से प्लास्टिक बैग ला कर लाशों को उस में लपेटा जाए और घर में गड्ढा खोद कर दफना दिया जाए. संभावना थी कि पौलीथिन में लिपटी होने से लाशों के सड़ने की बदबू बाहर नहीं आ पाएगी.

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20 अप्रैल, 2019 को ही नरेंद्र बाजार से पौलीथिन खरीद कर लाया. उसी रात दोनों ने हीरालाल के मकान में जा कर चारों लाशों को पैक कर दिया. अगले दिन 21 अप्रैल, 2019 को सुबह नरेंद्र विजय को साथ ले कर ससुर के घर गया. फिर अपनी योजना के मुताबिक दोनों ने जीने के नीचे गड्ढा खोदना शुरू किया.

कुछ पड़ोसियों ने नरेंद्र से हीरालाल के घर में अचानक काम कराने के बारे में पूछा तो नरेंद्र ने कहा कि ससुर मकान बेच कर कहीं दूसरी जगह चले गए. घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा है. वैसे उस मोहल्ले में नरेंद्र से कोई ज्यादा मतलब नहीं रखता था.

नरेंद्र ने विजय के साथ मिल कर लगभग 6 घंटे में गहरा गड्ढा खोदा. उस के बाद दोनों ने प्लास्टिक की शीट में पैक चारों लाशें गड्ढे में डाल दीं. लाशों को गड्ढे में दफन कर दोनों ने वहां पर पक्का फर्श बना दिया. नरेंद्र ने हीरालाल के घर के मुख्य दरवाजे पर ताला डाल दिया.

हीरालाल के घर पर अचानक ताला पड़ा देख लोगों को हैरत जरूर हुई. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि हीरालाल रात ही रात में अपने परिवार को ले कर अचानक कहां गायब हो गए. लेकिन नरेंद्र से किसी ने भी पूछने की हिम्मत नहीं की थी.

अपने सासससुर और सालियों को ठिकाने लगा कर नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को भी घर ले आया. घर आते ही लीलावती की नजर पिता के मकान की ओर गई, जहां पर ताला पड़ा था. लीलावती ने नरेंद्र से उन के बारे में पूछा, तो उस ने बताया कि उस के पिता अपना मकान बेच कर हल्द्वानी चले गए हैं. उन्होंने वहां पर अपना प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया है.

यह सुन कर लीलावती चुप हो गई. मातापिता के बारे में नरेंद्र से ज्यादा पूछने की हिम्मत उस में नहीं थी. अगर नरेंद्र संपत्ति हड़पने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने में जल्दबाजी न करता तो यह राज शायद राज ही बन कर रह जाता.

इस केस के खुलते ही पुलिस ने आरोपी नरेंद्र गंगवार और विजय गंगवार को भादंवि की धारा 302/201/120बी के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया था.

चारों शव पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने उन के रिश्तेदार दुर्गा प्रसाद को सौंप दिए. उन का दाह संस्कार बरेली के गांव पैगानगरी के पास भाखड़ा नदी किनारे किया गया.

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नरेंद्र गंगवार इतना शातिर दिमाग इंसान था कि इस केस में उस ने दुर्गा प्रसाद को भी फंसाने की कोशिश की. लेकिन सच्चाई सामने आते ही पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. हालांकि इस केस की रिपोर्ट दुर्गा प्रसाद की ओर से ही दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने लीलावती से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. वह नरेंद्र के फूफा के साथ बहेड़ी चली गई थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 2

हीरालाल जिला बरेली के गांव पैगानगरी के रहने वाले थे. उन का परिवार सुखीसंपन्न था. गांव में उन की करीब 60 बीघा जुतासे की जमीन थी. उन की 3 बेटियां थीं.

लीलावती उर्फ लवली, पार्वती और सब से छोटी दुर्गा. पत्नी हेमवती सहित घर में कुल 5 सदस्य थे. हीरालाल की एक ही परेशानी थी कि उन का कोई बेटा नहीं था.

हीरालाल ने बेटे की चाह में काफी हाथपांव मारे. वह कई डाक्टरों और तांत्रिकों से मिले, लेकिन उन की बेटा पाने की इच्छा पूरी न हो सकी.

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अंतत: उन्होंने अपना पूरा ध्यान बेटियों की परवरिश में लगा दिया. बेटियां समझदार हुईं तो हीरालाल ने सोचा कि उन्हें अच्छी शिक्षा दिलानी चाहिए. लेकिन गांव में रहते यह संभव नहीं था.

सोचविचार के बाद हीरालाल ने सन 2007 में अपनी खेती की जमीन में से 44 बीघा जमीन बेच दी. उस पैसे को ले कर वह अपने परिवार के साथ रुद्रपुर की राजा कालोनी में आ बसे. वहीं उन्होेंने अपना मकान बना लिया.

रुद्रपुर आ कर हीरालाल ने अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए तीनों बेटियों का अच्छे स्कूल में दाखिला करा दिया था.

बेटियों की तरफ से निश्चिंत हो कर हीरालाल ने बाकी बचे पैसों से प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू कर दिया. जमीन के पैसों से उन्होंने घर के आसपास कई प्लौट खरीद कर डाल दिए. उसी दौरान हीरालाल की मुलाकात नरेंद्र गंगवार से हुई.

नरेंद्र रामपुर जिले के गांव खेड़ासराय का रहने वाला था. वह उसी मोहल्ले में किराए के मकान में रहता था और सिडकुल की एक फैक्ट्री में काम करता था. उस ने हीरालाल से एक प्लौट खरीदने की इच्छा जाहिर की.

हीरालाल ने उसे अपने घर के सामने पड़ा प्लौट दिखाया तो वह नरेंद्र को पसंद आ गया. नरेंद्र ने वह प्लौट खरीद लिया. प्लौट लेने के बाद नरेंद्र की हीरालाल से जानपहचान हो गई. वह उन के संपर्क में रहने लगा. इसी बहाने वह हीरालाल के घर भी आनेजाने लगा.

इसी बीच नरेंद्र की नजर हीरालाल के बड़ी बेटी लीलावती पर पड़ी. लीला देखनेभालने में सुंदर थी और उस समय पढ़ रही थी. वह जब भी हीरालाल के घर जाता तो उस की निगाहें लीला पर टिकी रहती थीं.

लीला नरेंद्र के बारे में पहले ही सब कुछ जान चुकी थी. जब उस ने नरेंद्र को अपनी ओर आकर्षित होते देखा तो उस के दिल में भी चाहत पैदा हो गई. जल्दी ही दोनों प्रेम की राह पर चल निकले.

लीला स्कूल जाती तो नरेंद्र घंटों उस की राह तकता रहता. उस के स्कूल जाने का फायदा उठा कर वह घर के बाहर ही मिलने लगा. प्रेम बेल फलीफूली तो मोहल्ले वालों की नजरों में किरकरी बन कर चुभने लगी.

दोनों की प्रेम कहानी हीरालाल के सामने जा पहुंची तो बेटी की करतूत सुन कर उन्हें बहुत दुख हुआ. हीरालाल ने लीला को समझाया और नरेंद्र के घर आने पर पाबंदी लगा दी. लेकिन मोबाइल फोन के होते नरेंद्र और लीला के मिलने में किसी तरह की अड़चन नहीं आई. दोनों चोरीछिपे मिलते रहे.

प्रेम कहानी के चलते लीला ने सन 2008 में घर वालों को बिना बताए नरेंद्र से लव मैरिज कर ली. नरेंद्र के साथ शादी करने के बाद लीला उस के साथ किराए के मकान में रहने लगी.

बेटी की इस करतूत से हीरालाल और उन की पत्नी हेमवती दोनों को ही आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी लीला से संबंध खत्म कर दिए.

लेकिन हेमवती मां थी. बच्चों के लिए मां का दिल कोमल होता है. लीलावती ने नरेंद्र से शादी कर भले ही अपनी दुनिया बसा ली थी, लेकिन मां होने के नाते हेमवती उस के लिए परेशान रहने लगी थी. जब उस से बेटी के बिना नहीं रहा गया तो वह पति को बिना बताए उस से मिलने लगी.

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जब कभी वह घर में कुछ अच्छा बनाती, तो चुपके से लीला को दे आती थी. साथ ही वह उस की आर्थिक मदद भी करने लगी थी. यह बात हीरालाल को भी पता चल गई थी. शुरूशुरू में तो इस बात को ले कर मियांबीवी में विवाद होने लगा. लेकिन हीरालाल भी दिल के कमजोर थे. बेटी की परेशानी को देखते हुए उन का दिल भी पसीज गया.

शादी के कुछ समय बाद ही हीरालाल ने नरेंद्र को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया. हीरालाल और हेमवती दोनों को अपने घर ले आए. इस के बाद नरेंद्र और लीला हीरालाल के मकान में रहने लगे.

उसी दौरान नरेंद्र कई बार हीरालाल के साथ उन के गांव पैगानगरी भी गया था. गांव में हीरालाल का मकान था. साथ ही उन की 16 बीघा जमीन भी थी, जिसे उन्होंने बंटाई पर दे रखा था. उस जमीन से उन्हें हर साल इतना रुपया मिल जाता था कि उन के परिवार की जरूरतें पूरी हो जाती थीं, प्रौपर्टी खरीदबेच कर जो कमाते थे वह अलग था.

ससुर के साथ रहते हुए नरेंद्र उन की एकएक बात अपने दिमाग में बैठा लेता था. मातापिता के घर पर रहते हुए लीलावती 2 बेटियों और 2 बेटों की मां बनी.

हीरालाल के घर पर रहते हुए नरेंद्र नौकरी के साथसाथ उन के काम में भी हाथ बंटाने लगा था. हालांकि नरेंद्र के चारों बच्चों का खर्च हीरालाल ही उठाते थे. इस के बावजूद वह अपने खर्च के लिए हीरालाल से पैसे ऐंठता रहता था.

अभी हीरालाल की 2 बेटियां शादी के लिए बाकी थीं. वह चाहते थे कि दोनों बेटियां बड़ी की तरह कोई कदम न उठाएं. यही सोच कर वह टाइम से उन की शादी कर देना चाहते थे.

लेकिन जब से नरेंद्र दामाद बन कर घर में आया था, सालियों को फूटी आंख नहीं देखना चाहता था. वह तेजतर्रार और चालाक था. लीला से शादी कर के उस की निगाह हीरालाल की संपत्ति पर जम गई थी.

उसी दौरान उस ने हीरालाल पर दबाव बनाना शुरू किया कि उस के हिस्से की संपत्ति उस के नाम करा दें. लेकिन हीरालाल ने साफ कह दिया कि जब तक दोनों बेटियां विदा नहीं हो जातीं, वह अपनी संपत्ति का बंटवारा नहीं करेंगे.

हीरालाल जब नरेंद्र की हरकतों से परेशान हो गए तो उन्होंने नरेंद्र के प्लौट पर मकान बनवा दिया. इस के बाद नरेंद्र अपने बीवीबच्चों को साथ ले कर नए मकान में चला गया.

हीरालाल ने सोचा था कि नरेंद्र अपने घर जाने के बाद सुधर जाएगा. लेकिन घर आमनेसामने होने की वजह से उस के बीवीबच्चे तो हीरालाल के घर पर पड़े ही रहते थे, वह भी आ कर बदतमीजी पर उतर आता था. लेकिन ससुर होने के नाते हीरालाल सब कुछ सहन करते रहे.

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उसी दौरान नरेंद्र ने अपने मकान में विजय नाम का एक किराएदार रख लिया. विजय गंगवार जिला बरेली के गांव दमखोदा का रहने वाला था. नरेंद्र विजय गंगवार से पहले से ही परिचित था. सो दोनों में खूब पटने लगी. विजय गंगवार कुंवारा था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

घर में दफ्न 4 लाशें : भाग 1

25 अगस्त, 2020 को नरेंद्र गंगवार अपने ससुर हीरालाल के पैतृक गांव पैगानगरी पहुंचा. यह गांव बरेली जिले की तहसील मीरगंज में आता है. गांव के दुर्गाप्रसाद नरेंद्र को जानते थे, इसलिए वह उन्हीं से मिला. नरेंद्र के ससुर हीरालाल दुर्गाप्रसाद के नाना थे.

पैगानगरी में हीरालाल की 16 बीघा जमीन थी जो उन्होंने बटाई पर दे रखी थी. वह खेती की पैदावार का हिस्सा लेने गांव आते रहते थे. नरेंद्र बटाई का हिस्सा लेने आया था. साथ ही उसे इस से भी बड़ा एक और काम था. दुर्गा प्रसाद नरेंद्र को जानते थे. वह कई बार अपने ससुर के साथ गांव आया था.

इस पर नरेंद्र ने कहा, ‘‘दुर्गा प्रसादजी, बहुत दुखद खबर है. आप के नाना हीरालालजी अब इस दुनिया में नहीं रहे. 22 अप्रैल, 2020 को हीरालालजी और उन की मंझली बेटी दुर्गा ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लौकडाउन के चलते हम किसी को उन की मृत्यु की खबर नहीं दे पाए.

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कोरोना महामारी के चलते मैं ने अपनी बीवी लीलावती, किराएदार विजय व अन्य लोगों के सहयोग से उन का दाहसंस्कार करा दिया था.

बाद में पति के वियोग में उन की पत्नी हेमवती भी बेटी पार्वती को ले कर कहीं चली गईं. मैं ने और लीलावती ने उन्हें सब जगह ढूंढा, लेकिन उन का कहीं पता न चल सका.’’

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर दुर्गा प्रसाद को झटका लगा.

दुर्गाप्रसाद के पास गांव के कई लोग बैठे थे. यह खबर सुन कर सब हैरत में रह गए. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो इंसान अपनी औलादों के सुनहरे भविष्य के लिए गांव छोड़ शहर जा बसा था, वह कायरों की तरह आत्महत्या कर लेगा.

हीरालाल की मृत्यु की खबर सुन कर गांव के लोग तरहतरह की बातें करने लगे. दुर्गाप्रसाद और गांव वालों की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जब पति और बेटी खत्म हो गई तो हेमवती को छोटी बेटी को ले कर कहीं जाने की क्या जरूरत थी? गांव में उस के पति की 16 बीघा जमीन थी, जिस के सहारे आराम से दोनों की जिंदगी चल जाती. गांव में उन का अपना मकान भी था.

नरेंद्र ने अपने आने का मकसद बताते हुए कहा, ‘‘ससुर के घर के पास ही मेरा भी मकान है. उन के मकान पर एकमात्र बची उन की बेटी लीलावती का मालिकाना हक है. मैं उस मकान को लीलावती के नाम कराना चाहता हूं, लेकिन इस के लिए मुझे हीरालालजी के मृत्यु प्रमाण पत्र की जरूरत है. आप लोग उन के परिवार के लोग हो, आप यह काम करा सकते हैं.’’

नरेंद्र की बात सुन कर दुर्गा प्रसाद का दिमाग घूम गया. उन्हें नरेंद्र की बात में कुछ झोल नजर आया. दुर्गा प्रसाद ने उसी समय हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन के घर जा कर उन्हें सारी बात बताई और नरेंद्र की बातों पर शक जाहिर किया.

कुंवर सैन ने उसे बटाई का हिस्सा देने से साफ मना कर दिया. साथ ही दुर्गा प्रसाद ने लिखित में कुछ देने से भी इनकार कर दिया. नरेंद्र खाली हाथ लौट गया.

नरेंद्र की बातों पर शक हुआ तो दुर्गा प्रसाद हीरालाल के बटाईदार कुंवर सैन को साथ ले कर 27 अगस्त, 2020 को उन की मौत की सच्चाई जानने के लिए रुद्रपुरट्रांजिट कैंप पहुंचे. वहां हीरालाल के घर पर ताला लगा मिला.

उन्होंने पड़ोसियों से उन के बारे में जानकारी लेनी चाही तो पता चला कि हीरालाल के घर पर पिछले 15 महीने से ताला लटका हुआ है. इस दौरान उन्होंने कभी भी हीरालाल और उन के परिवार वालों को आतेजाते नहीं देखा.

यह जान कर दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन को हैरानी हुई, क्योंकि नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि हीरालाल ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली थी. लेकिन उस के पड़ोसियों को इस की जानकारी नहीं थी.

नरेंद्र का झूठ सामने आया तो दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन समझ गए कि हीरालाल की संपत्ति हड़पने की मंशा के चलते नरेंद्र ने ही कोई चक्रव्यूह रच कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया होगा.

हीरालाल के परिवार के साथ किसी अनहोनी की आशंका को देखते हुए दुर्गा प्रसाद और कुंवर सैन उसी दिन ट्रांजिट कैंप थाने पहुंच गए. उन्होंने यह बात थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी को बताई.

मामला एक ही परिवार के 4 लोगों के लापता होने का था, इसलिए जोशीजी ने इसे गंभीरता से लिया. दुर्गाप्रसाद और कुंवर सैन से जरूरी जानकारी ले कर जोशी ने उन्हें घर भेज दिया. फिर थानाप्रभारी जोशी ने इस मामले की सच्चाई जानने के लिए गुप्तरूप से जांचपड़ताल करानी शुरू की. सादे कपड़ों में जा कर उन्होंने नरेंद्र गंगवार को कब्जे में लिया, ताकि वह फरार न हो सके.

थानाप्रभारी ललित मोहन जोशी ने नरेंद्र से हीरालाल और उन के परिवार के सदस्यों के बारे में कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में नरेंद्र शुरूशुरू में इधरउधर की कहानी गढ़ता रहा. लेकिन जब पुलिस की सख्ती बढ़ी तो उस का धैर्य जवाब दे गया. उस के बाद उस ने अपनी ससुराल वालों की हत्या की बात स्वीकार कर ली. उस ने यह काम अपने किराएदार विजय की मदद से किया था.

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नरेंद्र गंगवार ने बताया कि 20 अप्रैल, 2019 को सुबह साढ़े 5 बजे उस ने विजय के साथ मिल कर सासससुर और 2 सालियों को डंडे से मार कर मौत के घाट उतारा था. फिर गड्ढा खोद कर उन की लाशों को उन्हीं के मकान में दफन कर दिया था.

नरेंद्र द्वारा 4 लोगों की हत्या कर घर में ही दफनाने वाली बात सामने आई तो थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने इस की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. साथ ही तत्परता दिखाते हुए थानाप्रभारी ने नरेंद्र के सहयोगी उस के किराएदार विजय को अपनी हिरासत में ले लिया.

अधिकारियों ने थाना ट्रांजिट कैंप के साथसाथ थाना पंतनगर, थाना रुद्रपुर और थाना किच्छा से भी पुलिस टीम बुला ली. देखतेदेखते आजादनगर की मुख्य सड़क पुलिस छावनी में तब्दील हो गई.

आजादनगर के आसपास के लोग इतनी पुलिस को देख हैरत में पड़ गए. एसएसपी दिलीप सिंह व आईजी (कुमाऊं) अजय कुमार रौतेला भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे.

पुलिस ने नरेंद्र की निशानदेही पर मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में 4 मजदूरों को लगा कर खुदाई शुरू कराई. लगभग 2 घंटे बाद पुलिस लाश तक पहुंची. साढ़े 4 फीट की गहराई में एक के ऊपर एक 4 लाशें पड़ी मिलीं, जो प्लास्टिक बैग में पैक थीं.

इस हृदयविदारक दृश्य को देख लोगों के होश उड़ गए. किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने है वह सच है. पुलिस ने प्लास्टिक बैग को खोल कर लाशों की जांचपड़ताल की. लाशों को देख कर पुलिस हैरान थी, क्योंकि सभी लाशें अच्छी हालत में थीं.

पुलिस को उम्मीद थी कि 15 महीनों के लंबे अंतराल के दौरान लाशें कंकाल में बदल गई होंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं था. उसी गड्ढे से पुलिस ने लकड़ी के डंडे के आकार की एक फंटी बरामद की. नरेंद्र ने उसी फंटी से चारों को मारने की बात स्वीकार की.

घटनास्थल पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने सैंपल एकत्र किए, जिन्हें जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया.

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पुलिस ने चारों लाशें कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दीं. मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 डाक्टरों के पैनल से लाशों का पोस्टमार्टम कराया गया. साथ ही वीडियोग्राफी भी कराई गई. यह कुमाऊं का पहला ऐसा सनसनीखेज  मामला था, जिस ने पूरे प्रदेश में तहलका मचा दिया था.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

जिंदगी बदगुमां नहीं : जिंदगी भी अजब रंग दिखाती है

पिंजरे वाली मुनिया : बेटी के सपनों को पूरा करने की कहानी

पिंजरे वाली मुनिया : भाग 3

‘काउंसलिंग’ की तारीख नजदीक आती जा रही है. घर में तूफान आया हुआ है, पुलक सब को मनाने की कोशिश में लगी हुई है लेकिन वे टस से मस होने को तैयार नहीं हैं. लड़की को इंजीनियर बनाने के लिए होस्टल भेज कर पढ़ाना कोई तुक नहीं है.

‘लड़की को इंजीनियर बना कर करना क्या है? नौकरी करानी है? साल 2 साल में शादी कर के अपना घर बसाएगी,’ दादाजी का तर्क है.

‘बेटा, इतनी ऊंची पढ़ाई करना, लड़के वाले सपने देखना कोई बुद्धिमानी नहीं. अब देख, तेरी मां ने भी तो आई.आई.एम. से एम.बी.ए. किया. क्या फायदा हुआ? एक सीट बरबाद हुई न? कोई लड़का आता, उस पर नौकरी करता तो सही इस्तेमाल होता उस सीट का. तू तो बी.एससी. कर के कालिज जाने का शौक पूरा कर ले,’ सिद्धांत ने बड़े प्यार से पुलक का सिर सहलाया.

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तरंग ने सब सुना. उन्हें लगा, जैसे आरे से चीर कर रख दिया सिद्धांत के तर्क ने. खुद चोर ही लुटे हुए से प्रश्न कर रहा था. विवाह के 22 साल बीत चुके हैं. आज तक कभी उन्होंने सिद्धांत की कोई बात काटी नहीं है. तर्कवितर्क नहीं किया है. आज भी चुप लगा गईं. सहसा यादों की डोर थामे वह 24 साल पहले के अतीत में पहुंच गईं. आई.आई.एम. से तरंग के प्रवेश का कार्ड आने के बाद पापा परेशान थे.

‘क्या करूं कल्पना, कुछ समझ नहीं पा रहा हूं. लड़की के रास्ते की रुकावट बनना नहीं चाहता और उस पर उसे चलाने का साधन जुटाने की राह नहीं दिख रही. शान से सिर ऊंचा हो रहा है और शर्म से डूब मरने को मन कर रहा है,’ पापा सचमुच परेशान थे.

‘अरे, तो सोच क्या रहे हैं? भेजिए उसे.’

‘हां, भेजूं तो. पर होस्टल का खर्च उठाने की औकात कहां है हमारी?’

‘ओह, यह समस्या है? वह प्रबंध मैं ने कर लिया है. शकुंतला चाची की लड़की सुहासिनी कोलकाता में है. पिछले साल ही अभिराम का तबादला हुआ है. मेरी बात हो गई है सुहास से.’

‘लेकिन इतना बड़ा एहसान… बात एकदो दिन की नहीं पूरे 2 साल की है.’

‘हां, वह भी बात हो गई है मेरी. बड़ी मुश्किल से मानी. 1 हजार रुपया महीना हम किट्टू के नाम जमा करते रहेंगे.’

‘किट्टू?’

‘अरे, भई, उस की छोटी बेटी. बस, बाकी तरंग समझदार है. मौसी पर बोझ नहीं, सहारा ही बनेगी.’

बहुत बड़ा बोझ उतरा था पापा के सिर से, वरना वह तो पी.एफ. पर लोन लेने की सोच रहे थे. बेटी के उज्ज्वल भविष्य को अंधकार में बदलने की तो वह सोच ही नहीं सकते थे. एक वह पिता थे और एक यह सिद्धांत हैं. बेचारी पुलक आज्ञाकारिणी है, उन की तरह जिद्दी नहीं है. वह अपने पापा की आंखों में आंखें डाल कर कभी बहस नहीं करेगी. बस, मम्मी का आंचल पकड़ कर रो सकती है या घायल हिरणी की तरह कातर दृष्टि उन पर टिका सकती है.

अचानक तरंग को लगा कि वह अपने और पुलक के पापा की तुलना कर रही है, तो दोनों की मम्मियों की क्यों नहीं? उस की अनपढ़ मम्मी ने उपाय निकाला था और वह स्वयं इतनी शिक्षित हो कर भी असहाय हैं, मूक हैं, क्यों? कहीं उन की अपनी कमजोरी ही तो बेटी की सजा नहीं बन रही. उन की बेजबानी ने बेटी को लाचार बना दिया है. कुछ निश्चय किया उन्होंने और रात में सिद्धांत से बात कर डाली.

‘सिद्धांत, आप ने पुलक को मेरा उदाहरण दिया. पर जमाना अब बदल गया है. आज लड़कियां लड़कों की तरह अलगअलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं और फिर जरूरी तो नहीं कि सब के विचार आप लोगों की ही तरह हों. समय के साथ विचारों में भी परिवर्तन आता है. हो सकता है उस की डिगरी मेरी तरह बरबाद न हो और डिगरी तो एक पूंजी है, जो मौका पड़ने पर सहारा बन सकती है. आप क्यों अपनी बेटी के पंख कतरने पर तुले हैं?’

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जलती आंखों से देखा सिद्धांत ने, कि इस मुंह में जबान कैसे आ गई? फिर तुरंत मुसकरा पड़े. तीखे स्वर में बोले, ‘आ गया आंधी का झोंका तुम पर भी. ‘वुमेन इमैन्सिपेशन’? बेटी है न? तो सुनो, तुम्हारे बाप ने तुम्हें इसलिए पढ़ा दिया, क्योंकि उन्हें अपनी हैसियत का पता था. पढ़लिख कर नौकरी करेगी, अफसर बनेगी. उन्हें पता था कि वह किसी ऊंचे घराने में बेटी ब्याहने की हैसियत नहीं रखते. पर मुझे पता है कि मेरी औकात है अपनी बेटी को ऐसे ऊंचे खानदान में देने की, जहां वह बिना दरदर की खाक छाने राज करेगी. यह तो तुम्हारी किस्मत ने जोर मारा और तुम मुझे पसंद आ गईं, वरना इतने नीचे गिर कर भला हम लड़की उठाते? अब इस विषय में कोई बात नहीं होगी. दिस चैप्टर इस क्लोज्ड. बारबार एक ही बात दोहराना मुझे बिलकुल पसंद नहीं,’ और वह करवट बदल कर सो गए. तरंग की वह रात आंखों में कटी.

तीसरे दिन जिम से लौटने पर सिद्धांत बाहर टैक्सी खड़ी देख हैरान रह गए. पूछने ही वाले थे कि कमरे से तरंग को निकलते देखा. काले रंग की बालूचरी साड़ी में लिपटी उन की कोमल काया थोड़ी कठोर लग रही थी. हैरान होने की आज उन की बारी थी.

‘कहां जा रही हो? सुनीता के यहां, लेकिन इतनी सुबह?’

तरंग अपनी बचपन की सहेली सुनीता के यहां कभीकभी चली जाती हैं. वह सीधी आगे बढ़ कर सिद्धांत से मुखातिब हुईं.

‘नहीं, सुनीता के यहां नहीं. साढ़े 9 वाली फ्लाइट से दिल्ली जा रही हूं. किस लिए, यह आप समझ ही गए होंगे. वहां मैं रमण अरोड़ा के घर रुकूंगी. यह रहा उन का पता.’

उन्होंने सिद्धांत के हाथ में कार्ड पकड़ा दिया. तब तक पुलक हाथ में अटैची पकड़े अपने कमरे से बाहर आ चुकी थी. सिद्धांत तो इस कदर अकबका गए कि बोल ही बंद हो गए.

मांजी बाहर ही खड़ी थीं, उन्होंने चुप्पी तोड़ी, ‘लेकिन जा ही रही हो तो मौसी के घर रुक जातीं. गैरों के घर इस तरह…’

‘नहीं मम्मीजी, मौसी के घर रुकने में परिवार की बदनामी होगी. अकेली जा रही हूं न बेटी के साथ. क्या बहाना बनाऊंगी? और फिर कौन गैर, कौन अपना…’

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सब के मुंह पर ताले लग गए. तरंग ने मांबाबूजी के पैर छुए. एक हाथ में पोर्टफोलियो और दूसरे से पुलक का हाथ पकड़ सीधे निकल गईं. मुड़ कर देखा तक नहीं.

पिंजरे वाली मुनिया : भाग 2

चुपचाप तरंग ने गुलाबी सिल्क पहन ली, लेकिन अपनी छलछलाई आंखों को छिपाने के लिए उन्हें दोबारा बाथरूम में घुसना पड़ा था. उस के बाद उन्होंने सभी काले कपड़े अपने वार्डरोब से निकाल ही दिए. कभीकभी उन्हें अपने होने का जैसे एहसास ही नहीं होता. जब उन की अपनी कोई इच्छा ही नहीं तो उन का तो पूरा का पूरा अस्तित्व ही निषेधात्मक हो गया न? कितने सपने थे आंखों में, कितनी योजनाएं थीं मन में. विवाह के बाद तो उन योजनाओं ने और भी वृहद् रूप धर लिया था. इतने बड़े व्यवसाय का स्वामित्व तो सारी की सारी पढ़ाई को सार्थक कर देगा. पर हुआ क्या?

मन में उमंग और तरंग लिए मुसकरा कर जब उन्होंने सिद्धांत से कहा था, ‘अब बहुत हो चुकी मौजमस्ती, आफिस में मेरा केबिन तैयार करवा दीजिए. कल से ही मैं शुरू करती हूं. महीना तो काम समझने में ही लग जाएगा.’

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सिद्धांत अवाक् उन का मुंह देखने लगे.

‘क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहे हैं आप?’

‘तुम आफिस जाओगी? पागल हो गई हो क्या? हमारे खानदान की औरतें आफिस में?’

‘अरे, तो क्या इतनी मेहनत से अर्जित एम.बी.ए. की डिगरी बरबाद करूं घर बैठ कर? बोल क्या रहे हैं आप?’ वह सचमुच हैरान थीं.

‘हां, डिगरी ली, बहुत मेहनत की, ठीक है. पढ़ीलिखी हो, घर के बच्चों को पढ़ाओ, अखबार पढ़ो, पत्रिकाएं पढ़ो, टीवी देखो,’ इतना बोल कर सिद्धांत उठ कर चल दिए.

तरंग को काटो तो खून नहीं. मम्मीपापा की दी हुई सीख और पारिवारिक संस्कारों ने उन की जबान पर ताला जड़ दिया था. छटपटाहट में कई रातें आंखों में ही कट गईं. पर करें तो क्या करें? सोने का पिंजरा तोड़ने की तो हिम्मत है नहीं. और जैसा होता है, धीरेधीरे रमतेरमते वह उसी वातावरण की आदी हो गईं.

विद्रोह का सुर तो कभी नहीं उठा था पर अब भावना भी लुप्त हो गई. दिनमहीने इसी तरह बीतते गए. 4 साल में प्यारी सी पुलक और गुड्डा सा श्रीष तनमन को लहरा गए. अधूरे जीवन में संपूर्णता आ गई. पूरा दिन बच्चों में बीतने लगा. उन का पढ़नापढ़ाना और उसी में व्यस्त तरंग को देख सिद्धांत ने भी चैन की सांस ली. वरना तरंग का मूक विद्रोह और सूनी अपलक दृष्टि को झेलना कभीकभी सिद्धांत के लिए कठिन हो जाता.

वह कई बार संकल्प करती हैं कि जिस तरह उन के सपने चकनाचूर हुए, सारी कामनाएं राख हो गईं, ऐसा पुलक के साथ नहीं होने देंगी. पर विद्रोह की चिनगारी भड़कने से पहले ही राख हो जाती है. विदाई के समय दी गई मम्मी की नसीहत एकदम याद जो आ जाती है :

‘बेटी, तू हमेशा अपनी इच्छा की मालिक रही है. अपनी तरंग में कभी किसी को कुछ नहीं समझा तू ने. पर ससुराल में संभल कर रहना. हर बात को काटना, अपनी मरजी चलाना यह सब यहीं छोड़ जा. वैसे भी वे बड़े लोग हैं, उन का रखरखाव और तरह का है. तेरी किसी भी हरकत से उन की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने पाए. जैसा वे कहें वैसा ही करना, जो वे चाहें वही चाहना, जितना वे सोचें उतना ही सोचना.’

और तरंग मम्मी की बात मान कर पिंजरे वाली मुनिया बन गईं. कितनी विचित्र होती हैं न इन भारतीय संस्कारी परिवारों की कन्याएं. पिता के घर से विदा होते समय हाथ से पीछे की ओर धान उछालती हुई अपनी प्रकृति, आदतें, प्रवृत्तियां सबकुछ छोड़ आती हैं. इसीलिए उन्हें दुहिता कहते हैं शायद. लेकिन एक जगह दिक्कत आ गई कि वह अपनी भावनाओं को, अपनी सोच को, ससुराली सांचे में नहीं ढाल पाईं. करतींकहतीं उन के मन की पर सोचतींमहसूसतीं उन से अलग. इसी अंतराल ने उन्हें अकसर झिंझोड़ा है, निचोड़ा है.

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दिनों को महीनों में और महीनों को सालों में बदलने में भला देर कब लगती है? पुलक ने 12वीं कर ली है. एकदम मां जैसी वह भी बहुत जहीन है. उस ने जे.ई.ई. की स्क्रीनिंग पार कर ली है. सिद्धांत तो उस के प्रतियोगिता में बैठने के ही पक्ष में नहीं थे, तरंग ने ही जैसेतैसे मना लिया था. अब बारी आई है ‘मेन्स’ में बैठने की. पुलक ने अपने स्तर से भरपूर तैयारी की है और तरंग ने पूरी जान लगा दी है. फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स को नए सिरे से रात भर जाग कर पढ़ा है तरंग ने. बेटी कहीं अटकी और समाधान ले कर मां तैयार. सिद्धांत सब देख रहे हैं और उन के पागलपन पर हंस रहे हैं.

घर के सभी लोगों ने कह दिया कि ‘मेन्स’ में बैठने की कोई जरूरत नहीं. जिस दर जाना नहीं वहां का पता क्या पूछना? लेकिन पुलक ने हार नहीं मानी. उस ने पापा से लाड़ लगाया, ‘पापा, मुझे सिर्फ जरा अपनी क्षमता मापने दीजिए. कौन सा मैं आ जाऊंगी? मैं ने तो कोचिंग वगैरह भी नहीं ली है, न ‘पोस्टल’ न ‘रेगुलर’. मेरी क्लास के बच्चों ने तो 2-2 कोचिंग ली हैं. दिल्ली जा कर टेस्ट दिए हैं, क्लासें की हैं. मैं जानती हूं पापा, आना मुश्किल ही नहीं, असंभव है. मैं तो बस, अपने आप को आजमाने के लिए बैठना चाहती हूं. प्लीज, पापा, प्लीज.’

और सिद्धांत पसीज गए. उन्होंने सोचा, आना तो है नहीं, करने दो पागलपन. बोले, ‘चल, कर ले शौक पूरा. तू भी क्या याद करेगी अपने पापा को.’

हंसती खिलखिलाती पुलक ‘मेन्स’ में बैठ गई. और यह क्या? शायद निषेध संघर्ष करने की क्षमता में एकदम वृद्धि कर देता है. व्यक्ति को अधिक गहनता से उत्साहित करता है. पुलक की तो रैंक भी 400 की आ गई है. आराम से दिल्ली में प्रवेश मिल जाएगा. ऐसा तो सचमुच न पुलक ने सोचा था और न ही तरंग ने. अब? मांबेटी दोनों ऐसी सकते में हैं जैसे कोई अपराध कर डाला हो. पुलक की इतनी बड़ी उपलब्धि इस परिवार के घिसेपिटे विचारों या पता नहीं झूठी मानमर्यादा के कारण एक पाप बन गई है. दूसरे परिवारों में तो बच्चे के 3-4 हजार रैंक लाने पर भी उस की पीठ ठोंकी जा रही होगी, जश्न मनाया जा रहा होगा. बेचारी पुलक का हफ्ता इसी उलझन में निकल गया कि बताए तो कैसे बताए?

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तरंग भी हैरान हैं. वह मौके की तलाश में हैं कि यह खुशखबरी कैसे दें, कब दें. बात तो सचमुच हैरानी की है. दुनिया कहां से कहां छलांग लगा रही है. करनाल जैसे छोटे से शहर की कल्पना चावला ऐसी ऊंचाइयां छू सकती है तो उसी भारत के महानगर कोलकाता का यह परिवार इतना दकियानूसी? आज भी परिवार की मानमर्यादा के नाम पर पत्नी का, कन्या का ऐसा मानसिक शोषण? असल में पारिवारिक संस्कारों और परंपराओं का बरगद जब अपनी जड़ें फैला लेता है तो उसे उखाड़ फेंकना प्राय: असंभव हो जाता है. वही यहां भी हो रहा है.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

पिंजरे वाली मुनिया : भाग 1

मरा हुआ मन भी कभीकभी कुलबुलाने लगता है. आखिर मन ही तो है, सो पति के आने पर उन्होंने हिम्मत कर ही डाली.

‘‘आज चलिए ‘मन मंदिर’ में चल कर परिणीता देख आते हैं. नई ऐक्ट्रेस का लाजवाब काम है. अच्छी ‘रीमेक’ है. मैं ने टिकट मंगवा लिया है.’’

‘‘टिकट मंगवा लिया? यह तुम्हारा अच्छाखासा ठहरा हुआ दिमाग अचानक छलांगें क्यों लगाने लगता है? पता है न कि पिक्चर हाल की भीड़भाड़ में मेरा दम घुटता है. मंगा लो सीडी, देख लो. इतना बड़ा ‘प्लाज्मा स्क्रीन’ वाला टीवी किस लिए लिया है? हाल के परदे से कम है क्या? तुम भी न तरंग, अपने ‘मिडिल क्लास टेस्ट’ से ऊपर ही नहीं उठ पातीं.’’

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वह चुप हो गईं. पति से बहस करना, उन की किसी बात को काटना तो उन्होंने सीखा ही नहीं है. बात चाहे कितनी भी कष्टकारी हो, वह चुप ही लगा जाती हैं. वैसे यह भी सही है कि जितनी सुखसुविधा, आराम का, मनोरंजन का हर साधन यहां उपलब्ध है, इस की तो वह कभी कल्पना कर ही नहीं सकती थीं.

वह स्वयं से कई बार पूछती हैं कि इतना सबकुछ पा कर भी वह प्रसन्न क्यों नहीं? तब उन का अंतर्मन चीत्कार कर उठता है.

‘तरंग, क्या जीवन जीने के लिए, खुश रहने के लिए शारीरिक सुख- सुविधाएं ही पर्याप्त हैं? क्या इनसान केवल एक शरीर है? तो फिर मनुष्य और पशुपक्षी में क्या अंतर हुआ? तुम तो स्वच्छंद विचरती चिडि़या से भी बदतर हो. पिंजरे वाली मुनिया में और तुम में अंतर क्या है? तुम भी तो अपना मुंह तभी खोलती हो जब कहा जाए. ठीक वही बोलती हो जो सिखाया गया हो, न एक शब्द कम, न एक शब्द अधिक.’

और अपने अंतर्मन की इस आवाज को सुन कर उन का मन हाहाकार कर उठा. लेकिन घर आने वाला हर मेहमान, रिश्तेदार उन की तारीफ करते नहीं थकता कि तरंग अपनी बातों में शहद घोल देती हैं, सब का मन मोह लेती हैं.’’

वह सोचने लगीं कि सब का मन वह मोह लेती है, तो कोई कभी उन का मन मोहने की कोशिश क्यों नहीं करता?

एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार की असाधारण लड़की. तीखे नाकनक्श, गोरा रंग, लंबा छरहरा शरीर. पढ़ने में जहीन, क्लास में हमेशा फर्स्ट. कभी पापा की सीमित आय में उसे सेंध नहीं लगानी पड़ी. फेलोशिप, स्कालरशिप, बुकग्रांट, बचपन से खुशमिजाज, हमेशा गुनगुनाती, लहराती, बलखाती लड़की को दादी कहतीं, ‘यह लड़की आखिर है क्या? कभी इसे रोते नहीं देखा, चोट लग जाए तो भी खिलखिला कर हंसना, दूसरों को हंसाना. इस का नाम तो तरंग होना चाहिए.’

और पापा ने सचमुच उन का नाम विजया से बदल कर तरंग कर दिया. वह ऐसी ही थीं. पूरी गंभीरता से पढ़ाई करते हुए गाने गुनगुनाना. चलतीं तो लगता दौड़ रही हैं, सीढि़यां उतरतीं तो लगता छलांगें लगा रही हैं. स्कूलकालिज में सब कहते, ‘तुम्हारा नाम बड़ा सोच कर रखा गया है. हमेशा तुम तरंग में ही रहती हो.’

और उस दिन उन की ननद कह रही थीं, ‘समझ में नहीं आता भाभी, आप का नाम आप के स्वभाव से एकदम उलटा क्यों रखा अंकलआंटी ने? आप इतनी शांत, दबीदबी और नाम तरंग.’

क्या कहतीं वह? कैसे कहतीं कि यहां, इस घर में आ कर तरंग ने हिलोरें लेना बंद कर दिया है.

बी.काम. के पहले साल में वह बहुत बीमार हो गई थीं. सब के मुंह यह सोच कर लटक गए थे कि तरंग का क्या हाल होगा, लेकिन वह सामान्य थीं बल्कि उन्होंने पापा को धीरज बंधाया, ‘पापा, क्या हो गया? यह सब तो चलता रहता है. मेरे पास 2 वर्ष हैं अभी तो, आप देखिएगा, गोल्ड मेडल मैं ही लूंगी.’

पापा आत्मविश्वास से ओतप्रोत उस नन्हे से चेहरे को निहारते ही रह गए थे. उन की बेटी थी ही अलग. उन्हें गर्व था उन पर. ड्रामा, डांस सब में आगे और पढ़ाई तो उन की मिल्कीयत, कालिज की शान थीं, प्रिंसिपल की जान थीं वह.

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आई.आई.एम. कोलकाता के सालाना जलसे में स्टेज पर उर्वशी बनी तरंग सीधी सिद्धांत के दिल में उतर गईं. सारा अतापता ले कर सिद्धांत घर लौटे और रट लगा दी कि जीवनसंगिनी बनाएंगे तो उसी को.

मां ने समझाया, ‘देख बेटा, इतने साधारण परिवार की लड़की भला हमारे ऊंचे खानदान में कहां निभेगी? इन लोगों में ठहराव नहीं होता.’

जवाब जीभ पर था. ‘सब हो जाता है मां. आएगी तो हमारे तौरतरीकों में रम जाएगी. तेज लड़की है, बुद्धिमती है, सब सीख जाएगी.’

‘यह भी एक चिंता की ही बात है बेटा. इतनी पढ़ीलिखी, इतनी लायक है तो महत्त्वाकांक्षिणी भी होगी. आगे बढ़ने की, कुछ करने की ललक होगी. कहां टिक पाएगी हमारे घर में?’ पापा ने दबाव डालना चाहा.

‘पापा, आप भी…जब उसे घर बैठे सारा कुछ मिलेगा, हर सुखसुविधा उस के कदमों में होगी तो वह रानीमहारानी की गद्दी छोड़ कर भला चेरी बनने बाहर क्यों जाएगी?’

हर तर्क का जवाब हाजिर कर के सिद्धांत ने सब का मुंह ही बंद नहीं किया, उन्हें समझा भी दिया.

तरंग ब्याह कर आ गईं. तरंग के घर वालों की तो जैसे लाटरी खुल गई. भला कभी सपने में सोच सकते थे, बेटी के लिए ऐसा घर जुटाना तो दूर की बात थी. घर बैठे मांग कर ले गए लड़की.

तरंग भी बहुत खुश थी. सिद्धांत कद में उस के बराबर और जरा गोलमटोल हैं तो क्या हुआ. इतने बड़े ‘बिजनेस हाउस’ की वह अब मालकिन बन गई थीं.

मेहमानों के जाने, लोगों का आतिथ्य ग्रहण करने और मधुयामिनी से लौटते 2 महीने निकल गए. ऐसे खुशगवार दिन तो इसी तरह पंख लगा कर उड़ते हैं. माउंट टिटलस पर बर्फ के गोले एकदूसरे पर मारतेमरवाते स्विट्जरलैंड की सैर, तो कभी रोशनी से जगमगाते सुनहरे ‘एफिल टावर’ को निहारता पेरिस का कू्रज. वेनिस के जलपथ में अठखेलियां करते वे दोनों कब एकदूसरे के दिलों में ही नहीं शरीर में भी समा गए, पता ही नहीं चला. वे दो बदन एक जान बन चुके थे. ऐसे में कोई छोटीमोटी बात चुभी भी तो तरंग ने उसे गुलाब का कांटा समझ कर झटक दिया.

उस दिन पेरिस का मशहूर ‘लीडो शो’ देखने के लिए तरंग अपनी वह सुनहरी बेल वाली काली साड़ी ‘मैचिंग ज्वेलरी’ के साथ पहन कर इठलाती निकली तो सिद्धांत ने एकदम टोक दिया, ‘बदलो जा कर, यह क्या पहन लिया है? वह आसमानी रंग वाली शिफान पहनो, मोती वाले सेट के साथ.’

चुपचाप उन्होंने अपने वस्त्र बदल तो लिए थे पर कुछ समझ में नहीं आया कि इस में क्या बुराई थी. लेकिन उन सुनहरे पलों में वह कटुता नहीं लाना चाहती थीं. इसलिए चुप रहीं.

अब उस दिन कोकाकोलाके एम.डी. के यहां जाने के लिए उन्होंने बड़े शौक से मोतियोंके बारीक झालर वाली डे्रस निकाल कर रखी थी, मोतियों के ही इटेलियन सेट के साथ. बाथरूम से बाहर निकलीं तो देखा सिद्धांत बड़े ध्यान से उस डे्रस को देख रहे थे. खुश हो कर वह बोलीं, ‘अच्छी है न यह डे्रस?’

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‘अच्छी है? मुझे तो यह समझ में नहीं आता कि तुम हमेशा यह मनहूस रंग लादने को क्यों तैयार रहती हो?’ सिद्धांत की आवाज में बेहद खीज थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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