⚲

Hindi Story: कई कई रावण से रुबरु

Hindi Story: रोहरानंद से रहा नहीं गया दशानन के पास पहुंच हाथ जोड़कर पूछा,- महात्मन क्या इस नाचीज को एक प्रश्न का जवाब मिलेगा ? हे मनीषी! ज्ञान के सागर!! कृपया, मेरी जिज्ञासा को शांत करें .

दशानन ने सर नीचे कर कहा,- अब अंतिम वक्त में, क्या पूछना चाहते हो .अच्छा होता,  दो-चार दिन पूर्व आते.

रोहरानंद ने नम्र स्वर में कहा,- हे वीर, दशानन! प्लीज… अगर आप मेरी जिज्ञासा शांत नहीं करेंगे तो मेरा दिल टूट जाएगा…

रावण के मुखड़े पर स्मित हास्य तैरने लगी-

-‘अच्छा ! अपनी जिज्ञासा शांत करो । पूछो वत्स…’

दशानन की मधुर वाणी से रोहरानंद को आत्म संबल मिला और उसने खुलकर प्रश्न किया, हे रिपुदमन!कृपया मुझे यह बताएं,  कि आपके चेहरे पर इतनी सौम्यता कहां से आई, इस आभा का रहस्य क्या है ? आपको देखने मात्र से हृदय को बड़ी ठंडक महसूस होने लगी है.

दशानन – ( हंसते हुए ) बस.हम तो तुम्हारे प्रश्न पूछने के अंदाज से भयभीत हो गए थे.जाने क्या जानना चाहता है… हम यही सोच रहे थे.

रोहरानंद,- महात्मा रावण! मैं ने जो महसूस किया उसी जिज्ञासा का शमन चाहता हूं.

दशानन- ( सकुचाते हुए ) वत्स! संभवत: इसका कारण मेरे निर्माता आयोजको का मन है. तुम नहीं जानते,रावण दहन कमेटी के पदाधिकारी स्वच्छ, सरल हृदय के लोग हैं उनकी प्रतिछाया में मैं भी सरल और सादगी को अंगीकार किए हुए हूं.

रोहरानंद प्रसन्न हुआ,दशानन ने आत्मीयता से हाथ मिलाया उसे गर्माहट महसूस हुई.

कहा,-दशानन ! क्या मैं आपका सेल्फी प्राप्त कर सकता हूं.

दशानन मुस्कुराए  – क्यों नहीं. हमारी मित्रता की यह अविस्मरणीय स्मृति होगी.

रोहरानंद पुरानी बस्ती पहुंचा. एक निरीह रावण खड़ा था, देखते ही दया आने लगी. रोहरानंद ने पास पहुंच विनम्र  स्वर में कहा,- मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं ?

आदमकद के साधारण से दशानन ने  भावविहीन चेहरा लिए कहा क्या, सचमुच,  आप मेरी मदद करेंगे ?

रोहरानंद – हां वाकई ! मगर मेरी क्षमता के भीतर.अगर आप आधुनिक सीता हरण में मारीच सृदश्य मदद मांगेंगे, तो मैं कहाँ  कर पाऊंगा.

दशानन- नहीं नहीं,  मुझे तो आपका सिर्फ मारंल सपोर्ट चाहिए.

रोहरानंद- उसके लिए तो मैं हर क्षण तत्पर हूं .

दशानन-( हाथ जोड़कर ) सिर्फ इतनी कृपया करो, समिति वालों को कुछ  जरा चंदा वगैरह करवा दो. कैसे फटे पुराने कागज,  मेरे देह पर चिपका दिए हैं. मुझे बड़ी शर्म आ रही है । लंकाधिपति  रावण की इज्जत का कुछ तो ख्याल रखना चाहिए.

रावण के दु:खी वाणी को सुनकर रोहरानंद का दिल भर आया. उसने समिति वालों की भरसक मदद करने का आश्वासन देकर, आगे बढ़ने मे भलाई समझी.

आगे रोहरानंद बाल्को पहुंच गया,स्टेडियम मैं विराट रावण अट्टाहास लगाता खड़ा था. ऐश्वर्य उसके रोएं रोएं से टपक रहा था. दशानन को देखते ही लोगों के हृदय में एक आंतक, एक सम्मान की भावना स्वमेव जागृत हो जाती थी.

दशानन ने अपनी विशाल गोल- गोल आंखें घुमाते हुए पुराने जमाने के खलनायक की भांति हुंकारा,-ओह कैसा है रे तू. बडी देर कर दी, कहां था अभी तक.

रोहरानंद ने हिचकिचाते हुए ससम्मान कहा,- क्षमा चाहता हूं एक-दो पुराने मित्र मिल गए थे,बस देर हो गई.

दशानन- समय की कीमत किया करो .अपने काम से काम रखो. दोस्त यार काम नहीं आएंगे. खुद को बुलंद करना सीखो. देखो! वेदांता, बाल्को कंपनी किस तरह सतत आगे बढ़ रही है.

रोहरानंद- सर ! कंपनी और मुझ जैसे अदने से व्यक्ति में अंतर तो रहेगा. कहां मैं कहां वेदांता.

दशानन- कंपनी को कौन चलाता है ?तुम जैसा इंसान ही न .अगर इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता ? चिमनी गिर गई थी- गिरी थी न .मगर देखो, कैसे आज लोग उस भीषण त्रासदी को भूल गए हैं.

रोहरानंद – वाकई आप सही हैं. मुझे बहुत कुछ सीखना है. मैं वेदांता से यह सब सीखूगां.

दशानन- ( स्निग्ध मुस्कान बिखेर कर ) बहुत अच्छा चलो,  इंजॉय करो…

रोहरानंद गरीब बस्ती पहुंचा. दशानन जी खड़े, मानो उसी का इंतजार कर रहे थे .रोहरानंद को देखा तो अपने पास बुलाया फुसफुसा कर कहा,- भूख लगी है कुछ जुगाड़ करो न .

रोहरानंद- हे वीर! यहां तो खाने को कुछ भी नहीं है.

दशानन – अरे भाई! ऐसा अनर्थ ना करो, सच ! बड़ी भूख लगी है .अगर मुझे भोजन नहीं दिया गया तो ठीक नहीं होगा.

रोहरानंद- हे लंका नरेश! सच यहां भोज्य सामग्री एक रत्ती भर नहीं है । एक बात मानोगे .वैसे भी अभी आपको अग्नि के सुपुर्द करेंगे ही, जरा धैर्य धारण करो.

दशानन की छोटी- छोटी गोल आंखें घूमने लगी, – देखो मैं यहां एक मिनट भी नहीं रुकूगां. मैं जा रहा हूं.और देखते-देखते दशानन गधे के सिंग की तरह गायब हो गया. Hindi Story

Hindi Funny Story: सबके अच्छे दिन आ गए

Hindi Funny Story: इस देश में बहुत अच्छे दिन आ चुके हैं. चारों ओर विकास की गंगा बहुत जोरों से बहती जा रही है. यह भी कह सकते हैं कि चारों ओर विकास ही विकास पैदा होता जा रहा है और बहुत तेजी से आगे भी पैदा होता रहेगा.

देश में व्यापारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. कर्मचारियों के अच्छे दिन आ चुके हैं. किसानों के अच्छे दिन आ चुके हैं. खूब महंगा आलूप्याज बेचबेच कर वे खूब मालामाल होते जा रहे हैं.

चोरउचक्कों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. सभी चोरउचक्के अपनीअपनी ड्यूटी समय से बजा कर अपना और देश का विकास अंधाधुंध करते जा रहे हैं.

देश में दुराचार और सदाचार के भी अच्छे दिन आ चुके हैं. एक तरफ दुराचार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐनकाउंटर कर के सदाचार का श्रीगणेश हो रहा है. ऐसा विकास क्या आप ने कहीं देखा होगा? मेरा दावा है, कहीं नहीं देखा होगा.

देश से करोड़ोंअरबों रुपए ले कर भागने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं. काला धन गोरा करने वालों के अच्छे दिन आ चुके हैं.

नेताओं के बाथरूम में नहाते हुए, मालिश कराते हुए मनोरंजक वीडियो के अच्छे दिन आ चुके हैं.

सत्ता के गलियारों और अधिकारियों के अहातों में भटकती विषकन्याओं के अच्छे दिन आ चुके हैं. हनी ट्रैप के सजीव प्रसारण से यह हम जान चुके हैं.

नोटबंदी के बाद नकली करंसी धड़ाधड़ पैदा करने वाली मशीनों के अच्छे दिन आ चुके हैं. चोरउचक्कों, उठाईगीरों, डकैतोंहत्यारों के संसदविधानसभाओं में पहुंचने के अच्छे दिन आ चुके हैं.

हम दुनिया का सब से बड़ा मंदिर बनाने जा रहे हैं, अब पंडेपुजारियों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

भूमाफिया, शिक्षा माफिया, किडनी चोरों, गरीब औरतों की बच्चेदानी निकाल, बां झ बना कर चांदी कूटने वाले डाक्टरों के भी अच्छे दिन आ चुके हैं.

पिछड़ों के अच्छे दिन आ चुके हैं, इसीलिए उन के आरक्षण को खत्म करने की मांग जोर पकड़ रही है.

दलितों के भी अच्छे दिन आ गए हैं. उन्हें घोडि़यों पर बैठ कर शादियां करने की जरूरत नहीं रही है.

डायन, कुलटा, निगोड़ी, करमजली, बढ़ती महंगाई के अच्छे दिन आ चुके हैं.

मैं ऐसी विकास की गंगा बहाते हुए देश के हर घर को बिलकुल पवित्र कर दूंगा. देश में सभी खुश हैं. सभी अमीर हैं. कोई दुखी नहीं है. कोई परेशान नहीं है. कोई पीडि़त नहीं है, कोई पीडि़ता नहीं है. किसी को कोई तकलीफ नहीं है.

गीता में भी कहा गया है, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है. जो होगा अच्छा होगा. जो होने वाला है, वह भी अच्छा होगा. और दोस्तो, हमें इस देश पर गर्व है कि सब से अच्छे दिन आ चुके हैं. आए कि नहीं आए…

हमारे अच्छे दिनों की तारीफ दुनियाभर में हो रही है, इसलिए दुनियाभर में यह फकीर  झोला उठा कर घूमते हुए सब की बधाइयां ले रहा है. आप भी हमें अपनी बधाइयां हमारी ओर  झोंकते रहें और कहते रहें, अच्छे दिन आ गए, अच्छे दिन आ गए. Hindi Funny Story

Hindi Kahani: पति की नीति निर्देशक

Hindi Kahani: पत्नी को तरहतरह से संबोधन दिया जाता है. कोई जीवनसंगिनी कहता है, कोई जीवनसहचरी, कोई हमसफर तो कोई अर्धांगिनी. कई तो उसे स्वीटहार्ट कहते हैं, ऐसे लोगों को धोखा हो जाता होगा, वे पत्नी की जगह प्रेयसी को देख रहे होते होंगे. आखिर जिस के साथ समय सुहाना लगता है वही तो खयालों के आकाश में ज्यादा आच्छादित रहती है.

कुछ सयाने पतिजन कहते हैं कि उन की पत्नी, पत्नी नहीं बल्कि पथप्रदर्शक है. गोया कि वे जीवनपथ के भटके हुए राहगीर हैं और पत्नी यातायात के सिपाही की तरह उन की मार्गप्रदर्शक.

चमचागीरी केवल राजनीतिक या प्रशासनिक क्षेत्र में नहीं होती है. दांपत्य में भी इस का काफी महत्त्व व आधिपत्य है. पति नामक जीव भी पत्नी की चमचागीरी में स्वार्थवश या भयवश अव्वल बना रहता है.

और भी पति हैं जो कहते हैं कि उन का यदि सब से बड़ा मित्र कोई दुनिया में है तो वह उन की पत्नी है. वाह भाई वाह, विवाह होने तक न जाने कितने मित्र बनाए, उन के साथ जीनेमरने की कसमें खाईं, कितनी खट्टीमीठी यादें साथ बिताए पलों की उन के साथ जुड़ी हैं, लेकिन, एक अनजान सी लड़की से शादी क्या हो गई कि सारे मित्रों को जोर का झटका धीरे से दे यादों की भूलभुलैया में छोड़ दिया. और ताल ठोक कर कह रहे हैं कि यदि कोई मित्र है तो वह पत्नी है. अच्छा हुआ कि ऐसा कहते समय कोई पुराना जिगरी दोस्त सामने नहीं था, वरना दोस्ती की इतनी किरकिरी होते देख उसी समय वह किसी चट्टान से कूदने के लिए रवानगी डाल देता.

कुल मिला कर जितने तरह के पति हैं उतनी तरह की बातें व उपमाएं वे पत्नियों की शोभा में पेश करते हैं. पत्नी के सामने वैसे भी एक पति की औकात शोभा की सुपारी से अधिक होती नहीं है. ऐसे नमूने भी हैं जो पत्नी को अपना गुरु तक कहते हैं. हो सकता है कि रोज सुबह उठ कर उस के पैर छू आशीर्वाद भी लेते हों. वैसे, इस मामले में गंगू का कहना है कि आज के पाखंडी बाबाओं, गुरुओं की तुलना में तो पत्नी को ही किसी ने यदि गुरु मान लिया है तो यह एक अच्छा दौर शुरू हुआ मान सकते हैं.

और भी पति हैं जोकि एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं कि उन की पत्नी उन के पिता व मां से भी बढ़ कर है.

गंगू ने उपरोक्त सारी उपमाओं पर गंभीरता से विचारमंथन किया और यह पाया कि अलगअलग पति अपनेअपने अनुभवों के आधार पर अलगअलग तरह से पत्नी का अलंकरण कर्म करते रहते हैं. कुछ विशेष स्वार्थवश पत्नी का यश बढ़ाने वाली बात तात्कालिक रूप से अपने मुखश्री से उगल दते हैं. लेकिन सही व खरी बात यह है कि पत्नी, पति की जीवनरूपी फिल्म की निर्देशक है, जैसे कि किसी मूवी को बनाने में निर्देशक का अहम योगदान होता है. वह कलाकारों को छोटीछोटी बारीकियों के बारे में समझाइश व निर्देश देता रहता है और वे कलाकार उस की बात को मगन हो कर एक निष्ठावान व समर्पित शिष्य की तरह गगन की ओर देखते हुए सुनते हैं.

निर्देशक के निर्देश के बिना कलाकार एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते हैं. और यदि मूवी को बौक्सऔफिस पर करोड़ों का व्यापार करने लायक दमदार व सफल बनाना है तो उसे इग्नोर तो कर ही नहीं सकते. उसी तरह पति की जिंदगीरूपी मूवी सफल हो, वह निरंतर तरक्की के पथ पर अग्रसर रहे, वह दाएंबाएं जाने की जुर्रत भी न करे, इस के लिए पत्नीरूपी एक निर्देशक के निरंतर निर्देश उस के दिनप्रतिदिन के कार्यकलापरूपी अभिनय के लिए आवश्यक हैं. वह सुबह से रात तक, देररात तक पति को निर्देश देती रहती है और पति मुंडी नीची कर के सुनता रहता है. सिर ऊपर करने की सुविधा यहां नहीं है.

पत्नी यदि बोलेगी बैठ जाओ, तो उसे बैठना है. वह बोलेगी कि खड़े हो जाओ तो उसे तुरंत खड़े हो जाना है. बिना कारण पूछे यदि वह कहे कि उठकबैठक करो, तो वह करनी है. सवालजवाब की कोई गुंजाइश यहां नहीं होती.

आप किसी पार्टी में जा रहे हैं. आप ने पतलूनशर्टटाई सब गांठ ली है. अचानक पत्नी का सीन में प्रवेश होता है. वह कहती है कि यह क्या विदूषक जैसा वेश बना डाला है, और उस के निर्देश पर आप तुरंत पहने कपड़े बदलने को मजबूर हो जाते हो. आप को कुछ पसंद आ रहा है, उसे वह नापसंद है. जो आप को नापसंद है, वह उसे पसंद है. बात वही है कि निर्देशक के निर्देशों को आप नजरअंदाज कर ही नहीं सकते.

पत्नी के पापाजी व मम्मीजी आ रहे हैं और बौस ने एक जरूरी मीटिंग में आप को शिरकत करने को निर्देशित किया है, लेकिन घर की बौस ने आप को रेलवे स्टेशन ड्यूटी के लिए निर्देशित कर दिया है. ट्रेन का समय आप की बैठक के समय से क्लेश हो रहा है. ऐसी स्थिति में भी आप निर्देशक से क्लेश नहीं कर सकते हैं. यहां की डांट खाने व अपनी खाट खड़ी करने से अच्छा है कि बौस की डांट खा लो.

तो, आप सहमत हैं कि नहीं कि पत्नी के लिए बाकी की सारी उपमाएं अपनी जगह सही हो सकती हैं, लेकिन सब से सही उपमा जो गंगू ने निर्देशक की कही है, वही है और केवल वही है. Hindi Kahani

Story In Hindi: सवाल अपने बेटे की अंग्रेजी तालीम का

Story In Hindi: ‘‘बच्चे को एलकेजी में भरती करने वाला मुझे फार्म तो दीजिए,’’ मैं ने अंगरेजी स्कूल के क्लर्क से कहा.

पहले तो उस ने मुझे घूरा, फिर पूछा, ‘‘किसे भरती कराना है?’’

‘‘कहा न, बच्चे को,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘कहां है आप का बच्चा?’’ मेरे आसपास नजर दौड़ाते हुए उस ने पूछा.

‘‘घर में,’’ मैं ने बताया.

‘‘जिसे भरती होना है, उसे घर छोड़ आए. जाइए, उसे ले कर आइए.’’

‘‘भला क्यों…?’’

‘‘पहले मैं उस बच्चे का इंटरव्यू लूंगा. अगर वह भरती होने लायक होगा, तब फार्म दूंगा. यही प्रिंसिपल साहब का आर्डर है,’’ उस ने खुलासा करते हुए बताया.

‘‘भरती करना है या नहीं, यह फैसला कौन लेगा?’’

‘‘प्रिंसिपल साहब. वे आप का इंटरव्यू ले कर फैसला करेंगे.’’

‘‘बच्चे के इंटरव्यू की बात तो गले उतरती है, लेकिन मेरा इंटरव्यू… बात कुछ जमी नहीं,’’ मैं ने हैरानी जाहिर की.

‘‘देखिए, यह अंगरेजी स्कूल है, कोई खैराती या सरकारी नहीं. हमें बच्चे के साथसाथ स्कूल के भले का खयाल रखना पड़ता है, इसीलिए बच्चे के साथसाथ उस के माता पिता का भी इंटरव्यू लिया जाता है.’’

‘‘बात समझ में आई या नहीं? अब जाइए और बच्चे को ले कर आइए.’’

मैं जातेजाते धड़कते दिल से पूछ बैठा, ‘‘किस भाषा में इंटरव्यू लेते हैं प्रिंसिपल साहब?’’

‘‘अंगरेजी स्कूल में दाखिला कराने आए हो और यह भी नहीं जानते?’’

इतना सुनते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मुझे अंगरेजी नहीं आती थी. आज पता चला कि अंगरेजी स्कूल में बच्चे को भरती कराना कितना मुश्किल काम है, खासतौर पर मेरे लिए.

घर पहुंचा, तो मेरी बीवी ने पूछा, ‘‘हो गई भरती?’’

‘‘अभी नहीं,’’ मैं ने ठंडे दिल से कहा.

‘‘क्यों…’’ बीवी की आवाज में उलझन थी.

‘‘फिर बताऊंगा, फिलहाल तो बच्चे को फटाफट तैयार कर दो. उसे स्कूल ले कर जाना है,’’ मैं ने कहा.

मैं ने भी कहने को तो कह दिया, लेकिन मुझे अंगरेजी न आने का कोई हल नजर नहीं आ रहा था.

अचानक मुझे रास्ता सूझा कि मेरे पड़ोसी को अंगरेजी आती है. क्यों न उस से मदद मांगी जाए.

मैं मदद मांगने के लिए उस के पास चला गया. थोड़ी आनाकानी के बाद उस ने बात मान ली. मैं उसे और बच्चे को ले कर स्कूल पहुंचा.

‘‘क्या पढ़ते हो मुन्ना?’’ दाखिले के पहले दौर में क्लर्क ने पुचकारते हुए बच्चे से जब पूछा, तो मैं ने टोका, ‘‘अरे सरजी, अभी पढ़ कहां रहा है… पढ़ाना तो अब आप लोगों को है.’’

‘‘अरे, एबीसीडी तो पढ़ता होगा?’’ चौंकते हुए उस ने कहा.

‘‘जी नहीं,’’ अचानक मेरे मुंह से सच बात निकल गई.

‘‘तो क्या बिना तैयारी के ही दाखिला कराने चले आए?’’

मैं ने बात को बिगड़ते देख कहा, ‘‘मेरे कहने का मतलब है कि अभी स्कूल में नहीं पढ़ रहा. घर में एबीसीडी सिखा रहे हैं.’’

‘‘वही तो मैं पूछ रहा था.’’

‘‘जी हां… जी हां,’’ बात बनती देख मैं ने चैन की सांस ली.

उस ने बच्चे से और भी सवाल पूछे, जिन के माकूल जवाब वह दे नहीं पाया.

बहरहाल, बेहद खुशामद के बाद क्लर्क ने एहसान जताते हुए मुझे फार्म दे दिया.

फार्म भरने के बाद हम लोग प्रिंसिपल साहब के पास पहुंचे. पहले उन्होंने 5 मिनट तक भाषण पिलाया, जिस का मतलब यह था कि अंगरेजी स्कूल में पढ़ना कोई हंसीखेल नहीं है. यहां पढ़ाने के लिए घर का माहौल अंगरेजी वाला होना चाहिए.

फिर प्रिंसिपल साहब ने इंटरव्यू लेना शुरू किया. अंगरेजी में पूछे गए सवालों के जवाब पड़ोसी देने लगा, इसलिए प्रिंसिपल ने समझा कि बच्चे का पिता वही है. वैसे भी वह इस तरह बनठन कर गया था, जैसा अंगरेजी स्कूल में बच्चे को पढ़ाने वाले पिता का होना चाहिए.

प्रिंसिपल साहब बीचबीच में हिंदी में भी कुछ पूछ लेते थे, तब जवाब मैं दे देता था. इस से प्रिंसिपल साहब ने अंदाजा लगाया कि मैं लड़के के पिता का दोस्त हूं, इसीलिए उन्होंने पूछा भी नहीं कि हम दोनों में से लड़के का पिता कौन है?

यही मैं चाहता था, ताकि दाखिला हो जाने के बाद जब इस राज का भंडाफोड़ हो, तो मुझे यह कहने का मौका मिले कि जब पूछा ही नहीं गया, तो बताते कैसे?

खैर, किसी तरह से लड़के का दाखिला हो गया.

कुछ दिनों बाद प्रिंसिपल साहब का मेरे नाम नोटिस आया. लड़के की पढ़ाई के सिलसिले में मुझे बुलाया गया था. अब तो मेरी आंखों के आगे सचमुच अंधेरा छाने लगा.

मैं फिर पड़ोसी के पास गया, लेकिन इस बार उस ने मेरी मदद करने से साफ इनकार कर दिया. अलबत्ता, मेरी हौसलाअफजाई करते हुए उस ने कहा, ‘‘घबराओ मत, हिम्मत से काम लो. बच्चे का दाखिला हो चुका है. अब कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.

‘‘वैसे भी इतने दिनों बाद प्रिंसिपल साहब यह भूल चुके होंगे कि उस दिन लड़के का बाप बन कर मैं गया था.’’

मैं दिल मजबूत कर के प्रिंसिपल के पास चला गया. उन्होंने मुझ से शिकायत करते हुए पूछा (गनीमत थी कि हिंदी में) कि मैं लड़के को घर में पढ़ाता क्यों नहीं? मगर, मैं कैसे कह देता कि मैं अंगरेजी नहीं पढ़ पाया और उसी कमी को बच्चे के जरीए पूरा करने की कोशिश कर रहा हूं?

खैर, मैं बहाने बनाने लगा. तब वे सोच में पड़ कर बड़बड़ाने लगे कि आखिर आप के लड़के का दाखिला हो कैसे गया?

हालांकि प्रिंसिपल साहब ने खूब फटकार लगाई, लेकिन मुझे इस बात की बेहद खुशी थी कि उन की ओर से मुझे मेरे बेटे के पिता के रूप में मंजूरी मिल चुकी थी.

मैं ने मन ही मन पड़ोसी का शुक्रिया अदा किया कि उस ने आज मेरे साथ चलने से इनकार कर के अच्छा ही किया, वरना मैं स्कूल में बेटे का पिता कहलाने का हक खो देता. Story In Hindi

Hindi Crime Story: हवस – मर्यादा तोड़ने का खतरनाक अंजाम

Hindi Crime Story: जय प्रकाश दोपहर में अपनी दुकान से घर आ गया. उस ने तय कर लिया था कि आज वह हर हाल में अपनी बीवी सीमा और उस के चचेरे भाई मनोज के असली चेहरे बेनकाब कर के रहेगा.

आंगन का दरवाजा बंद था. चारदीवारी फांद कर जय प्रकाश अंदर गया. दबे पैर चल कर उस ने बैडरूम के दरवाजे पर कान लगाया, तो अंदर से उसे सीमा और मनोज की बातें सुनाई पड़ीं.

‘‘काश, तुम मेरी बीवी बन कर जिंदगीभर मेरे साथ रहतीं?’’ यह मनोज की आवाज थी.

‘‘बीवी तो मैं दूसरे की हूं, लेकिन प्रेमिका के नाते तुम्हारे साथ बीवी जैसा फर्ज तो अदा कर रही हूं,’’ सीमा बोल रही थी.

‘‘मैं तुम्हें जिंदगीभर के लिए पाना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा था.

‘‘ठीक है, अगर कभी मेरे पति को हमारे नाजायज रिश्ते की जानकारी हो गई और उसी ने मु?ो अपने साथ रखने से मना कर दिया, तो तुम मु?ो अपनी बीवी बना लेना.

‘‘मैं क्या अपनी खुशी से जय प्रकाश के साथ रह रही हूं. यह मैं ही जानती हूं कि मैं उस से कैसे निबाह रही हूं. यह मेरी बदकिस्मती थी कि लाख कोशिशों के बावजूद मेरी तुम से शादी नहीं हो सकी, नहीं तो मैं आज तुम्हारी ही बीवी होती. खैर, छोड़ो उन सब बातों को, अपने कपड़े तो उतारो.’’

जय प्रकाश सबकुछ सम?ा गया, मगर दरवाजे पर दस्तक देने से पहले वह अपनी आंखों से कमरे का नजारा देख कर यह पक्का कर लेना चाहता था कि उन दोनों में नाजायज रिश्ता है.

दरवाजे में कोई छेद नहीं था, इसलिए वह खिड़की की तरफ बढ़ गया. उस ने खिड़की के पाटों के बीच एक दरार में आंख लगा दी.

भीतर का नजारा देख कर जय प्रकाश हैरान था. सीमा बिस्तर पर लेटी थी. मनोज उस से सट कर बैठा था. वह सीमा के होंठों और गालों को चूम रहा था.

जय प्रकाश का खून खौल उठा. उस का मन सीमा का कत्ल कर के जेल चले जाने का हुआ, मगर उस ने यह सोच कर इस विचार को छोड़ दिया कि अगर वह जेल चला जाएगा, तो उस के 3 साल के बेटे रोहित की परवरिश कौन करेगा?

मगर जय प्रकाश सीमा और मनोज को यों ही नहीं छोड़ना चाहता था. वह उन्हें सबक सिखाना चाहता था, इसलिए उस ने दरवाजे पर दस्तक दी.

दस्तक सुन कर वे दोनों सचेत हो गए. अपने कपडे़ ठीक करते हुए सीमा बिस्तर से उठ कर आई और दरवाजा खोल दिया.

जैसे ही सीमा की नजर जय प्रकाश पर पड़ी, उस का हलक सूख गया.

सीमा को कुछ कहे बिना जय प्रकाश कमरे में आ गया और उस ने मनोज को ढूंढ़ निकाला. वह पलंग के नीचे छिप गया था.

सीमा को लातघूंसों से मारते हुए जय प्रकाश ने कहा, ‘‘बदजात औरत, तू ने तो कहा था कि मनोज तुम्हारा चचेरा भाई है. महल्ले के लोग यों ही तु?ो बदनाम करते हैं.

‘‘अब बता कि यह सब क्या है? भाई के साथ कमरा बंद कर के क्या कोई चोंच से चोंच मिलाता है?’’

सीमा ने ?ाट से जय प्रकाश के पैर पकड़ लिए और अपनी गलती के लिए माफी मांगते हुए कहा कि अब वह मनोज के साथ नाजायज संबंध नहीं रखेगी.

जय प्रकाश सीमा को एक मौका और देना चाहता था, इसलिए उस ने उसे इस शर्त पर माफ किया कि वह आइंदा मनोज से नहीं मिलेगी.

मनोज के जाने के कुछ देर बाद जय प्रकाश अपने मकान से बाहर आया, तो वहां लोगों की भीड़ लगी थी. लोग उसे ऐसे देख रहे थे, जैसे आज उन्हें पता चला हो कि उन के महल्ले में कोई नामर्द रहता है.

पड़ोस की एक औरत ने जय प्रकाश के मुंह पर कह भी दिया, ‘‘क्यों भैया, मर्द नहीं हो क्या? बीवी को दूसरे मर्द के साथ सोते देख कर भी उसे माफ कर दिया?’’

जय प्रकाश सिर ?ाका कर अपने रास्ते चला गया. भला वह उस औरत की बात का क्या जवाब देता? उसे कैसे बताता कि अपने बेटे का खयाल कर के उस ने अपनेआप से सम?ौता किया है.

सीमा मुजफ्फरपुर के एक गांव की रहने वाली थी. मनोज का घर भी उसी गांव में था. वह सीमा से एक साल बड़ा था, मगर दोनों ने बीए तक एकसाथ पढ़ाई की थी.

जवानी की दहलीज पर आते ही मनोज सीमा की तरफ खिंच गया और उसे अपना दिल दे दिया.

सीमा भी मनोज को मन ही मन प्यार करती थी. दोनों का मिलनाजुलना शुरू हो गया. एक दिन मौका मिला, तो दोनों ने जिस्मों का मिलन भी कर लिया.

कुछ महीनों के बाद उन दोनों ने शादी कर के जिंदगीभर साथ रहने का फैसला किया, मगर उन की एक न चली.

दोनों एक ही गांव के थे और अलगअलग जाति के भी. उन के घर वाले जाति की दीवार तोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए.

आखिरकार सीमा की शादी जय प्रकाश से कर दी गई. वह कोलकाता का रहने वाला था. वहां उस की कपड़े की दुकान थी.

सीमा अपने पति के घर आ गई. पति से भरपूर प्यार और सासससुर का दुलार पा कर भी वह मनोज को भुला न सकी. जब भी मौका मिलता, सीमा मनोज को फोन कर लेती.

मनोज भी सीमा से मिलने के लिए कम बेचैन नहीं था.

इसी तरह 6 महीने बीत गए. मनोज अपनेआप पर काबू न रख सका. फोन पर सीमा से इजाजत ले कर एक दिन वह कोलकाता पहुंच गया.

सीमा ने पति और सासससुर से मनोज की पहचान अपने चचेरे भाई के रूप में कराई, इसलिए उन दोनों के नाजायज रिश्ते पर किसी को शक नहीं हुआ. एकदूसरे की बांहों में समा कर वे दोनों अपनी हवस शांत कर लेते.

जल्दी ही मनोज के घर वालों को पता चल गया कि वह सीमा से मिलने बारबार कोलकाता जाता है, फिर तो मनोज के पिता ने जल्दी ही उस की शादी वीणा से करा दी.

वीणा सीमा से भी ज्यादा खूबसूरत थी. लेकिन मनोज उस के रूपजाल में ज्यादा दिनों तक बंधा न रह सका.

अपनी शादी के 4 महीने बाद ही मनोज कोलकाता जा कर सीमा से मिला. उस समय वह मां बन चुकी थी. उस के बेटे का नाम रोहित था. इस के बावजूद सीमा ने मनोज से नाजायज संबंध नहीं तोड़ा.

सीमा से मिलने बारबार कोलकाता न आना पड़े, इसलिए मनोज ने वहीं रहने का फैसला किया.

कुछ कोशिश के बाद मनोज को एक कंपनी में नौकरी मिल गई. उसे सीमा के घर से कुछ ही दूरी पर किराए का मकान भी मिल गया.

जय प्रकाश रोजाना घर से सुबह 10 बजे दुकान जाता था. वहां से लौट कर वह रात के 10 बजे घर आता था. इस बीच सीमा पूरी तरह आजाद रहती थी. उस का जब भी मन होता, वह मनोज को घर बुला लेती.

मनोज की आजादी पर अंकुश उस समय लगा, जब उस की पत्नी वीणा गांव से शहर आ गई. उस की एक साल की बच्ची थी.

जल्दी ही वीणा को मनोज और सीमा के नाजायज संबंध की सारी जानकारी हो गई. फिर तो उन दोनों में सीमा को ले कर ?ागड़ा होने लगा.

मनोज किसी भी हाल में सीमा से नाजायज संबंध तोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो एक दिन वीणा सीमा के घर गई.

उस ने सीमा को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

सीमा ने उसी दिन मनोज को बुला कर बताया. मनोज को वीणा पर बहुत गुस्सा आया. उस ने घर जा कर वीणा की खूब पिटाई की और यह चेतावनी दी कि अगर उस ने फिर कभी सीमा से कुछ कहा, तो वह उसे तलाक दे देगा.

वीणा को इस बात से इतना धक्का पहुंचा कि एक दिन वह गले में साड़ी का फंदा लगा कर पंखे से ?ाल गई. खुदकुशी करने से पहले उस ने अपनी बेटी को भी जहर दे कर मार डाला था.

पत्नी और बच्ची की मौत के बाद भी मनोज नहीं सुधरा. उस ने पहले की तरह सीमा से नाजायज संबंध बनाए रखा.

सीमा ने भी इस घटना से कोई सीख नहीं ली.

वीणा ने जब अपनी बेटी को मार कर खुदकुशी की थी, तभी जय प्रकाश को किसी ने मनोज और सीमा के नाजायज संबंध के बारे में सबकुछ बता दिया था.

जय प्रकाश सीधासादा था. वह मन में छलकपट नहीं रखता था. सो, एक दिन उस ने सीमा से पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि मनोज से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है? तुम दोनों की वजह से ही मनोज की पत्नी ने खुदकुशी की थी?’’

पहले तो सीमा घबरा गई, मगर तुरंत उस ने अपनेआप को संभाल लिया और बोली ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं? महल्ले वालों की बातों में आ कर भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर लांछन लगा रहे हैं? आप ही बताइए कि क्या मैं चरित्रहीन लगती हूं?’’ यह कह कर सीमा फफकफफक कर रोने लगी.

जय प्रकाश को उस की बात पर भरोसा हो गया और उस ने उसे यह कह कर चुप कराया कि अब वह उस पर शक नहीं करेगा.

इस के बाद 3 महीने और बीत गए. एक दिन जय प्रकाश के पड़ोस की मुंहबोली भाभी ने उसे मनोज और सीमा की सारी करतूतें बताते हुए कहा कि अगर उस ने जल्दी ही सीमा और मनोज के नाजायज संबंध को नहीं रोका, तो महल्ले के लोग उस की बीवी पर जिस्मफरोशी का आरोप लगा कर पुलिस के हवाले कर देंगे.

जय प्रकाश को अपनी मुंहबोली भाभी पर पूरा भरोसा था. उस ने मनोज और सीमा को रंगे हाथ पकड़ने का प्लान बना लिया.

अगले दिन ही जय प्रकाश दुकान से घर आया और उस ने सीमा को मनोज के साथ पकड़ लिया.

अपने बेटे का खयाल कर के जय प्रकाश ने सीमा को माफ कर दिया. मगर सीमा ने मनोज से नाजायज संबंध नहीं तोड़ा, वह सिर्फ सावधानी बरतने लगी.

2-3 महीने बाद जब सीमा को लगा कि महल्ले के लोग अब उस के पति के कान नहीं भरेंगे, तो उस ने फिर से मनोज को अपने घर बुलाना शुरू कर दिया.

एक दिन जय प्रकाश को एक काम से किसी रिश्तेदार के घर पटना जाना था. सीमा को 3 दिन बाद लौटने की बात कह कर वह चला गया, मगर उस की ट्रेन छूट गई और वह घर लौट आया.

उस समय शाम के 4 बज रहे थे. उस के घर के बाहर महल्ले के बहुत से लोग खड़े थे.

जय प्रकाश ने उस भीड़ में एक से पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘हम लोग यहां तमाशा देखने के लिए खड़े हैं. तुम अंदर जाओगे, तो खुद जान जाओगे कि यहां कैसा तमाशा हो रहा है.’’

जय प्रकाश उस शख्स की बात सम?ा नहीं पाया. वह चुपचाप आंगन में चला गया.

उस के बैडरूम का दरवाजा बंद था. पड़ोस में रहने वाला एक 16 साल का लड़का दरवाजे से आंख लगाए खड़ा था.

जय प्रकाश को गुस्सा आ गया.

उस ने लड़के का गरीबान पकड़ कर पूछा, ‘‘मेरे घर में ताक?ांक क्यों कर रहा है? चल, तेरे बाप को तेरी करतूत बताता हूं.’’

वह लड़का भी कोई कम नहीं था. उस ने तुरंत जवाब दिया, ‘‘मेरे बाप को बाद में बताना, पहले दरवाजा खुलवा कर अपनी बीवी से पूछ कि तेरे रहते वह गैरमर्द के साथ कमरा बंद कर के क्या कर रही है?’’

जय प्रकाश के हाथों के तोते उड़ गए. लड़के ने अपना गिरेबान छुड़ाया और अपनी राह चला गया.

जय प्रकाश ने गुस्से में दरवाजा पीटना शुरू कर दिया.

जय प्रकाश को देखते ही सीमा डर गई. वह कुछ सम?ा नहीं पाई कि ऐसी हालत में उसे क्या करना चाहिए.

लेकिन जय प्रकाश समझ गया था कि सीमा और मनोज के दिल में हवस का तूफान है. वे दोनों समझने वालों में से नहीं हैं, इसलिए उस ने छुटकारा पाने के लिए उन का कत्ल कर देना ही ठीक समझा.

जय प्रकाश ने बरामदे में पड़ी लोहे की छड़ उठाई और सीमा के सिर पर एक जोरदार वार किया, जिस से उस का सिर फट गया और वह चीख कर जमीन पर गिर गई.

सीमा का हश्र देख कर मनोज ने वहां से भागने की कोशिश की, मगर जय प्रकाश ने उसे भागने नहीं दिया.

लोहे की उसी छड़ से उस ने मनोज के सिर पर कई वार किए. जो हश्र सीमा का हुआ, वही मनोज का भी हुआ. थोड़ी देर में दोनों की लाशें बिछ गईं.

सूचना पा कर पुलिस आई और जय प्रकाश को गिरफ्तार कर के ले गई. रोहित अनाथ हो गया. Hindi Crime Story

Hindi Family Story: वजह – प्रिया से लड़के वालों ने क्यों रिश्ता तोड़ लिया

Hindi Family Story: ‘‘अरे,संभल कर बेटा,’’ मैट्रो में तेजी से चढ़ती प्रिया के धक्के से आहत बुजुर्ग महिला बोलीं.

प्रिया जल्दी में आगे बढ़ गई. बुजुर्ग महिला को यह बात अखर गई. वे उस के करीब जा कर बोलीं, ‘‘बेटा, चाहे कितनी भी जल्दी हो पर कभी शिष्टाचार नहीं भूलने चाहिए. तुम ने एक तो मुझे धक्का मार कर मेरा चश्मा गिरा दिया उस पर मेरे कहने के बावजूद मुझ से माफी मांगने के बजाय आंखें दिखा रही हो.’’

अब तो प्रिया ने उन्हें और भी ज्यादा गुस्से से देखा. मैं जानती हूं, प्रिया को गुस्सा बहुत जल्दी आता है. इस में उस की कोई गलती नहीं. वह घर की इकलौती लाडली बेटी है. गजब की खूबसूरत और होशियार भी. वह जल्दी नाराज होती है तो सामान्य भी तुरंत हो जाती है. उसे किसी की टोकाटाकी या जोर से बोलना पसंद नहीं. इस के अलावा उसे किसी से हारना या पीछे रहना भी नहीं भाता.

जो चाहती उसे पा कर रहती. मैं उसे अच्छी तरह समझती हूं. इसीलिए सदैव उस के पीछे रहती हूं. आगे चलने या रास्ते में आने का प्रयास नहीं करती.

मुझे जिंदगी ने भी कुछ ऐसा ही बनाया है. बचपन में अपनी मां को खो दिया था. पिता ने दूसरी शादी कर ली. सौतेली मां को मैं बिलकुल नहीं भाती थी. मैं दिखने में भी खूबसूरत नहीं. एक ही उम्र की होने के बावजूद मुझ में और प्रिया में दिनरात का अंतर है. वह दूध सी सफेद, खूबसूरत, नाजुक, बड़ीबड़ी आंखों वाली और मैं साधारण सी हर चीज में औसत हूं.

जाहिर है, पापा की लाडली भी प्रिया ही थी. मेरे प्रति तो वे केवल अपनी जिम्मेदारी ही निभा रहे थे. पर मैं ने बचपन से ही अपनी परिस्थितियों से समझौता करना सीख लिया था. मुझे किसी की कोई बात बुरी नहीं लगती. सब की परवाह करती पर इस बात की परवाह कभी नहीं करती कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है. जिंदगी जीने का एक अलग ही तरीका था मेरा. शायद यही वजह थी कि प्रिया मुझ से बहुत खुश रहती. मैं अकसर उस की सुरक्षाकवच बन कर खड़ी रहती.

आज भी ऐसा ही हुआ. प्रिया को बचाने के लिए मैं सामने आ गई, ‘‘नहींनहीं आंटीजी, आप प्लीज उसे कुछ मत कहिए. प्रिया ने आप को देखा नहीं था. वह जल्दी में थी. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगती हूं, प्लीज, माफ कर दीजिए.’’

‘‘बेटा जब गलती तूने की ही नहीं तो माफी क्यों मांग रही है? तूने तो उलटा मुझे मेरा गिरा चश्मा उठा कर दिया. तेरे जैसी बच्चियों की वजह से ही दुनिया में बुजुर्गों के प्रति सम्मान बाकी है वरना इस के जैसी लड़कियां तो…’’

‘‘मेरे जैसी से क्या मतलब है आप का? ओल्ड लेडी, गले ही पड़ गई हो,’’ बुजुर्ग महिला को झिड़कती हुई प्रिया आगे बढ़ गई.

मुझे प्रिया की यह बात बहुत बुरी लगी. मैं ने बुजुर्ग महिला को सहारा देते हुए खाली पड़ी सीट पर बैठाया और उन्हें चश्मा पहना कर प्रिया के पास लौट आई.

हम दोनों जल्दीजल्दी घर पहुंचे. प्रिया का मूड औफ हो गया था. पर मैं उसे लगातार चियरअप करने का प्रयास करती रही.

मैं सिर्फ प्रिया की रक्षक या पीछे चलने वाली सहायिका ही नहीं थी वरन उस की सहेली और सब से बड़ी राजदार भी थी. वह अपने दिल की हर बात सब से पहले मुझ से ही शेयर करती. मैं उस के प्रेम संबंधों की एकमात्र गवाह थी. उसे बौयफ्रैंड से मिलने कब जाना है, कैसे इस बात को घर में सब से छिपाना है और आनेजाने का कैसे प्रबंध करना है, इन सब बातों का खयाल मुझे ही रखना होता था.

प्रिया का पहला बौयफ्रैंड 8वीं क्लास में उस के साथ पढ़ने वाला प्रिंस था. उसी ने पीछे पड़ कर प्रिया को प्रोपोज किया था. उस की कहानी करीब 4 सालों तक चली. फिर प्रिया ने उसे डिच कर दिया. दूसरा बौयफ्रैंड वर्तमान में भी प्रिया के साथ था. अमीर घर का इकलौता चिराग वैभव नाम के अनुरूप ही वैभवशाली था. प्रिया की खूबसूरती से आकर्षित वैभव ने जब प्रोपोज किया तो प्रिया मना नहीं कर सकी.

आज भी प्रिया उस के साथ रिश्ता निभा रही है पर दिल से उस से जुड़ नहीं सकी है. बस दोनों के बीच टाइमपास रिलेशनशिप ही है. प्रिया की नजरें किसी और को ही तलाशती रहती हैं.

उस दिन हमें अपनी कजिन की शादी में नोएडा जाना था. मम्मी ने पहले ही ताकीद कर दी थी कि दोनों बहनें समय पर तैयार हो जाएं. प्रिया के लिए पापा बेहद खूबसूरत नीले रंग का गाउन ले आए थे जबकि मैं ने अपनी पुरानी मैरून ड्रैस निकाल ली.

नई ड्रैस प्रिया की कमजोरी है. इसी वजह से जब भी पापा प्रिया को पार्टी में ले जाना चाहते तो इसी तरह एक नई ड्रैस उस के बैड पर चुपके से रख आते.

आज भी प्रिया ने नई डै्रस देखी तो खुशी से उछल पड़ी. जल्दी से तैयार हो कर निकली तो सब दंग रह गए. बहुत खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आज तो तू बहुतों का कत्ल कर के आएगी,’’ मैं ने प्यार से उसे छेड़ा तो वह मुझे बांहों में भर कर बोली, ‘‘बहुतों का कत्ल कर के क्या करना है, मुझे तो बस अपने उसी सपनों के राजकुमार की ख्वाहिश है जिसे देखते ही मेरी नजरें झपकना भूल जाएं.’’

‘‘जरूर मिलेगा मैडम, मगर अभी सपनों की दुनिया से जरा बाहर निकलिए और पार्टी में चलिए. क्या पता वहीं कोई आप का इंतजार कर रहा हो,’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए कहा तो वह हंस पड़ी.

पार्टी में पहुंच कर हम मस्ती करने लगे. करीब 1 घंटा बीत चुका था. अचानक प्रिया मेरी बांह पकड़ कर खींचती हुई मुझे अलग ले गई और कानों में फुसफुसा कर बोली, ‘‘प्रज्ञा वह देखो सामने. ब्लू सूट पहने मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा है. मुझे तो बस इसी से शादी करनी है.’’

मैं खुशी से उछल पड़ी, ‘‘सच प्रिया? तो क्या तेरी तलाश पूरी हुई?’’

‘‘हां,’’ प्रिया ने शरमाते हुए कहा.

सामने खड़ा नौजवान वाकई बहुत हैंडसम और खुशमिजाज लग रहा था. मैं ने कहा, ‘‘मुझे तेरी पसंद पर नाज है प्रिया, मैं पता लगाती हूं कि यह है कौन? वैसे तब तक तुझे उस से दोस्ती करने का प्रयास करना चाहिए.’’

वह रोंआसी हो कर बोली, ‘‘यार यही तो समस्या है. वह पहला लड़का है जो मुझे भाव नहीं दे रहा. मैं ने 1-2 बार प्रयास किया पर वह अपने घर वालों में ही व्यस्त है.’’

‘‘यार कुछ लड़के शर्मीले होते हैं. हो सकता है वह दूसरे लड़कों की तरह बोल्ड न हो जो पहली मुलाकात में ही दोस्ती के लिए उतावले हो उठते हैं.’’

‘‘यार तभी तो यह लड़का मुझे और भी ज्यादा पसंद आ रहा है. दिल कर रहा है कि किसी भी तरह यह मेरा बन जाए.’’

‘‘तू फिक्र मत कर. मैं इस के बारे में सारी बात पता करती हूं. सारी कुंडली निकलवा लूंगी,’’ मैं ने उस लड़के की तरफ देखते हुए कहा.

जल्द ही कोशिश कर के मैं ने उस लड़के से जुड़ी काफी जानकारी इकट्ठी कर ली. वह हमारी कजिन के फ्रैंड का भाई था. उस का नाम मयूर था.

वह कहां काम करता है, कहां रहता है, क्या पसंद है, घर में कौनकौन हैं जैसी बातें मैं ने प्रिया को बता दीं. प्रिया ने फेसबुक, लिंक्डइन जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर जा कर उस लड़के के बारे में और भी जानकारी ले ली. प्रिया ने फेसबुक पर मयूर को फ्रैंड रिक्वैस्ट भी भेजी पर उस ने स्वीकार नहीं की.

अब तो मैं अकसर देखती कि प्रिया उस लड़के के ही खयालों में खोई रहती है. उसी की तसवीरें देखती रहती है या उस की डिटेल्स ढूंढ़ रही होती है. मुझे समझ में आ गया कि प्रिया को उस लड़के से वास्तव में प्यार हो गया है.

एक दिन मैं ने यह बात पापा को बता दी और आग्रह किया कि वे उस लड़के के घर प्रिया का रिश्ता ले कर जाएं. पापा ने उस के परिवार वालों से बात चलाई तो पता चला कि वे लोग भी मयूर के लिए लड़की ढूंढ़ रहे हैं. पापा ने अपनी तरफ से प्रिया के लिए उन्हें प्रपोजल दिया.

रविवार के दिन मयूर और उस के परिवार वाले प्रिया को देखने आने वाले थे. प्रिया बहुत खुश थी. अपनी सब से अच्छी ड्रैस पहन कर वह तैयार हुई. मैं ने बहुत जतन से उस का मेकअप किया. मेकअप कर के बालों को खुला छोड़ दिया. वह बेहद खूबसूरत लग रही थी.

मगर आज पहली दफा प्रिया मुझे नर्वस दिखाई दे रही थी. जब प्रिया को उन के सामने लाया गया तो मयूर और उस की मां एकटक उसे देखते रह गए. मैं भी पास ही खड़ी थी. मयूर ने तो कुछ नहीं कहा पर उस की मां ने बगैर किसी औपचारिक बातचीत के जो कहा उसे सुन कर हम सब सकते में आ गए.

लड़के की मां ने कहा, ‘‘खूबसूरती और आकर्षण तो लड़की में कूटकूट कर भरा है, मगर आगे कोई बात की जाए उस से पहले ही क्षमा मांगते हुए मैं यह रिश्ता अस्वीकार करती हूं.’’

प्रिया का चेहरा उतर गया. पापा भी इस अप्रत्याशित इनकार से हैरान थे. अजीब मुझे भी बहुत लग रहा था. आखिर प्रिया जैसी खूबसूरत और पढ़ीलिखी बड़े घर की लड़की को पाना किसी के लिए भी हार्दिक प्रसन्नता की बात होती और फिर प्रिया भी तो इस रिश्ते के लिए कितनी उत्साहित थी.

पापा ने हाथ जोड़ते हुए धीरे से पूछा, ‘‘इस इनकार की वजह तो बता दीजिए. आखिर मेरी बच्ची में कमी क्या है?’’

लड़के की मां ने बात बदली और मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘मुझे यह लड़की पसंद है. यदि आप चाहें तो मैं इसे अपनी बहू बनाना पसंद करूंगी. आप घर में बात कर के जब चाहें अपना जवाब दे देना.’’

पापा ने उम्मीद के साथ मयूर की ओर देखा तो वह भी हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘अंकल, जैसा मम्मी कह रही हैं मेरा जवाब भी वही है. मैं भी चाहूंगा कि प्रज्ञा जैसी लड़की ही मेरी जीवनसाथी बने.’’

प्रिया रोती हुई अंदर भाग गई. मैं भी उस के पीछेपीछे अंदर चली गई. उन्हें बिदा कर मम्मीपापा भी जल्दी से प्रिया के कमरे में आ गए.

मगर प्रिया किसी से भी बात करने को तैयार नहीं थी. रोती हुई बोली, ‘‘प्लीज, आप लोग बाहर जाएं, मैं अभी अकेली रहना चाहती हूं.’’

हम सब बाहर आ गए. इस समय मेरी स्थिति अजीब हो रही थी. समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. कुसूरवार न होते हुए भी आज मैं सब की आंखों में चुभ रही थी. मम्मी मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थीं तो प्रिया भी नजरें चुरा रही थी. मुझे रात भर नींद नहीं आई.

अगली सुबह भी प्रिया बहुत उदास दिखी. उस की नजरों में दोषी मैं ही थी और यह बात सहन करना मेरे लिए बहुत कठिन था. मैं ने तय किया कि मैं मयूर के घर वालों के इनकार की वजह जान कर रहूंगी. प्रिया को छोड़ कर उन्होंने मुझे क्यों चुना जबकि प्रिया मुझ से लाख गुना ज्यादा खूबसूरत और स्मार्ट है, होशियार है. मैं तो कुछ भी नहीं.

बात की तह तक पहुंचने का फैसला कर मैं मयूर के घर पहुंच गई. बहुत आलीशान और खूबसूरत घर था उन का. महरी ने दरवाजा खोला और मुझे अंदर आने को कहा. घर बहुत करीने से सजा था. मैं ड्राइंगरूम का जायजा ले रही थी कि तभी बगल के कमरे से चश्मा पोंछती बुजुर्ग महिला निकलीं.

मुझे उन्हें पहचानने में एक पल भी नहीं लगा. यह तो मैट्रो वाली वही बुजुर्ग महिला थीं जिन का चश्मा कुछ दिन पहले प्रिया ने गिरा दिया था. मैं ने उन्हें चश्मा उठा कर दिया था. मुझे सहसा सारी बात समझ में आने लगी कि क्यों प्रिया को रिजैक्ट कर उन्होंने मुझे चुना.

सामने से मयूर की मां निकलीं. मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘बेटा, मैं समझ सकती हूं कि तू क्या पूछने आई है. शायद तुझे अपने सवाल का जवाब मिल भी गया होगा. दरअसल, उस दिन मैट्रो में मैं भी वहीं थी और सब कुछ अपनी नजरों से देखा था. खूबसूरती, रंगरूप, धन, इन सब से ऊपर एक चीज होती है और वह है संस्कार. हमें एक सभ्य और व्यवहारकुशल बहू चाहिए बिलकुल तुम्हारे जैसी.’’

मैं ने आगे बढ़ कर दोनों के पांव छूने चाहे पर अम्मांजी ने मुझे गले से लगा लिया.

घर पहुंची तो प्रिया ने पहले की तरह रूखेपन से मेरी तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई.

मैं उस के पास जा कर धीरे से बोली, ‘‘कल के इनकार की वजह जानने मैं मयूर के घर गई थी. तुझे याद हैं वे बुजुर्ग महिला, जिन का चश्मा मैट्रो में तेरी टक्कर से नीचे गिर गया था? दरअसल, वे बुजुर्ग महिला मयूर की दादी हैं और इसी वजह से उन्होंने तुझे न कह दिया.

पर तू परेशान मत हो प्रिया. तेरी पसंद के लड़के को मैं कभी अपना नहीं बनाऊंगी. मैं न कह कर आई हूं.’’

प्रिया खामोशी से मेरी तरफ देखती रही. उस की आंखों में रूखेपन की जगह बेचारगी और अफसोस ने ले ली थी. थोड़ी देर चुप बैठने के बाद वह धीरे से उठी और मुझे गले लगाती हुई बोली, ‘‘पागल है क्या? इतने अच्छे रिश्ते के लिए कभी न नहीं करते. मैं करवाऊंगी मयूर से तेरी शादी.’’

मैं आश्चर्य से उसे देखने लगी तो वह मुसकराती हुई बोली, ‘‘आज तक तू मेरे लिए जीती रही है. आज समय है कि मैं भी तेरे लिए कुछ अच्छा करूं. खबरदार जो न कहा.’’

मेरे दिल पर पड़ा बोझ हट गया था. मैं ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया. Hindi Family Story

Romantic Story In Hindi: यादों के सहारे – प्रकाश का प्यार

Romantic Story In Hindi: वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था.

उस ने उस लड़की को अपने मकान के सामने वाली सड़क से गुजरते देखा था. उसे देख कर वह लड़की भी एक हलकी सी मुसकान छोड़ जाती थी. वह यहीं के कालेज में पढ़ती थी.

धीरेधीरे उस लड़की की मुसकान ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था. जब वे आपस में मिले, तो उस ने लड़की से कहा था, ‘‘तुम हर पल आंखों में छाई रहती हो. क्यों न हम हमेशा के लिए एकदूजे के हो जाएं?’’

उस लड़की ने कुछ नहीं कहा था. वह कैमिस्ट से दवा खरीद कर चली गई थी. उस का चेहरा उदासी में डूबा था.

उस लड़की का नाम नीलू था. नीलू के मातापिता उस के उदास चेहरे को देख कर चिंतित हो उठे थे.

पिता ने कहा था, ‘‘पहले तो नीलू के चेहरे पर मुसकराहट तैरती थी. लेकिन कई दिनों से उस के चेहरे पर गुलाब के फूल की तरह रंगत नहीं, वह चिडि़यों की तरह फुदकती नहीं, बल्कि किसी बासी फूल की तरह उस के चेहरे पर पीलापन छाया रहता है.’’

नीलू की मां बोली, ‘‘लड़की सयानी हो गई है. कुछ सोचती होगी.’’

नीलू के पिता बोले, ‘‘क्यों नहीं इस के हाथ पीले कर दिए जाएं?’’

मां ने कहा, ‘‘कोई ऊंचनीच न हो जाए, इस से तो यही अच्छा रहेगा.’’

नीलू की यादों को न भूल पाने वाले लड़के का नाम प्रकाश था. वह खुद इस कशिश के बारे में नहीं जानता था. वह अपनेआप को संभाल नहीं सका था. उसे अकेलापन खलने लगा था. उस की आंखों के सामने हर घड़ी नीलू का चेहरा तैरता रहता था.

एक दिन प्रकाश नीलू से बोला, ‘‘नीलू, क्यों न हम अपनेअपने मम्मीडैडी से इस बारे में बात करें?’’

‘‘मेरे मम्मीडैडी पुराने विचारों के हैं. वे इस संबंध को कभी नहीं स्वीकारेंगे,’’ नीलू ने कहा.

‘‘क्यों?’’ प्रकाश ने पूछा था.

‘‘क्योंकि जाति आड़े आ सकती है प्रकाश. उन के विचार हम लोगों के विचारों से अलग हैं. उन की सोच को कोई बदल नहीं सकता.’’

‘‘कोई रास्ता निकालो नीलू. मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता.’’

नीलू कुछ जवाब नहीं दे पाई थी. एक खामोशी उस के चेहरे पर घिर गई थी. दोनों निराश मन लिए अलग हो गए. पूरे महल्ले में उन दोनों के प्यार की चर्चा होने लगी थी.

‘‘जानती हो फूलमती, आजकल प्रकाश और नीलू का चक्कर चल रहा है. दोनों आपस में मिल रहे हैं.’’

‘‘हां दीदी, मैं ने भी स्कूल के पास उन्हें मिलते देखा है. आपस में दोनों हौलेहौले बतिया रहे थे. मुझ पर नजर पड़ते ही दोनों वहां से खिसक लिए थे.’’

‘‘हां, मैं ने भी दोनों को बैंक्वेट हाल के पास देखा है.’’

‘‘ऐसा न हो कि बबीता की कहानी दोहरा दी जाए.’’

‘‘यह प्यारव्यार का चक्कर बहुत ही बेहूदा है. प्यार की आंधी में बह कर लोग अपनी जिंदगी खराब कर लेते हैं.’’

‘‘आज का प्यार वासना से भरा है, प्यार में गंभीरता नहीं है.’’

‘‘देखो, इन दोनों की प्रेम कहानी का नतीजा क्या होता है.’’

प्रकाश के पिता उदय बा अपने महल्ले के इज्जतदार लोगों में शुमार थे. किसी भी शख्स के साथ कोई समस्या होती, तो वे ही समाधान किया करते थे.

धीरेधीरे यह चर्चा उन के कानों तक भी पहुंच गई थी. उन्होंने घर आ कर अपनी पत्नी से कहा था, ‘‘सुनती हो…’’

पत्नी निशा ने रसोईघर से आ कर पूछा, ‘‘क्या है जी?’’

‘‘महल्ले में प्रकाश और नीलू के प्यार की चर्चा फैली हुई है,’’ उदय बाबू ने कहा.

‘‘तभी तो मैं मन ही मन सोचूं कि आजकल वह उखड़ाउखड़ा सा क्यों रहता है? वह खुल कर किसी से बात भी नहीं करता है.’’

‘‘मैं प्रोफैसर साहब के यहां से आ रहा था. गली में 2-4 औरतें उसी के बारे में बातें कर रही थीं.’’

‘‘मैं प्रकाश को समझाऊंगी कि हमें यह रिश्ता कबूल नहीं है,’’ निशा ने कहा.

उधर नीलू के मम्मीडैडी ने सोचा कि जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करवा दें और वे इस जुगाड़ में जुट गए. नीलू को जब इस बारे में मालूम हुआ था, तो उस ने प्रकाश से कहा, ‘‘प्रकाश, अब हम कभी नहीं मिल सकेंगे.’’

‘‘क्यों?’’ उस ने पूछा था.

‘‘डैडी मेरा रिश्ता करने की बात चला रहे हैं. हो सकता है कि कुछ ही दिनों में ऐसा हो जाए,’’ इतना कह कर नीलू की आंखों में आंसू डबडबा गए थे.

‘‘क्या तुम ने…?’’

‘‘नहीं प्रकाश, मैं उन के विचारों का विरोध नहीं कर सकती.’’

‘‘तो तुम ने मुझे इतना प्यार क्यों किया था?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘हम एकदूसरे के हो जाएं, क्या इसे प्यार कहते हैं? क्या जिस्मानी संबंध को ही तुम प्यार का नाम देते हो?’’ यह सुन कर प्रकाश चुप था.

‘‘क्या अलग रह कर हम एकदूसरे को प्यार नहीं करते रहेंगे?’’ कुछ देर चुप रह कर नीलू बोली, ‘‘मुझे गलत मत समझना. मेरे मम्मीडैडी मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं उन के प्यार को ठेस नहीं पहुंचा सकती.’’

‘‘क्या तुम उन का विरोध नहीं कर सकती?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘जिस ने हमें यह रूप दिया है, हमें बचपन से ले कर आज तक लाड़प्यार दिया है, क्या उन का विरोध करना ठीक होगा?’’ नीलू ने समझाया.

‘‘तो फिर क्या होगा हमारे प्यार का?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘अपनी चाहत को पाने के लिए मैं उन के अरमानों को नहीं तोड़ सकती. उन की सोच हम से बेहतर है.’’

इस के बाद वे दोनों अलग हो गए थे, क्योंकि लोगों की नजरें उन्हें घूर रही थीं. नीलू के मम्मीडैडी की आंखों के सामने बरसों पुराना एक मंजर घूम गया था. उसी महल्ले के गिरधारी बाबू की लड़की बबीता को भी पड़ोस के लड़के से प्यार हो गया था.

उस लड़के ने बबीता को खूब सब्जबाग दिखाए थे और जब उस का मकसद पूरा हो गया था, तो वह दिल्ली भाग गया था. कुछ दिनों तक बबीता ने इंतजार भी किया था. गिरधारी बाबू की बड़ी बेइज्जती हुई थी. कई दिनों तक तो वे घर से बाहर निकले नहीं थे. इतना बोले थे, ‘यह तुम ने क्या किया बेटी?’

बबीता मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह गई थी. एक दिन चुपके से मुंहअंधेरे घर से निकल पड़ी और हमेशाहमेशा के लिए नदी की गोद में समा गई.

गिरधारी बाबू को जब पता चला, तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया था. नीलू की शादी उमाकांत बाबू के यहां तय हो गई थी. जब प्रकाश को शादी की जानकारी हुई, तो उस की आंखों में आंसू डबडबा आए थे. वह अपनेआप को संभाल नहीं पा रहा था.

प्रकाश का एक मन कहता, ‘महल्ले को छोड़ दूं, खुदकुशी कर लूं…’ दूसरा मन कहता, ‘ऐसा कर के अपने प्यार को बदनाम करना चाहते हो तुम? नीलू के दिल को ठेस पहुंचाना चाहते हो तुम?’

कुछ पल तक यही हालत रही, फिर प्रकाश ने सोचा कि यह बेवकूफी होगी, बुजदिली होगी. उस ने उम्रभर नीलू की यादों के सहारे जीने की कमस खाई. नीलू की शादी हो रही थी. खूब चहलपहल थी. मेहमानों के आनेजाने का सिलसिला शुरू हो गया था. गाजेबाजे के साथ लड़के की बरात निकल चुकी थी.

प्रकाश के घर के सामने वाली सड़क से बरात गुजर रही थी. वह अपनी छत पर खड़ा देख रहा था. वह अपनेआप से बोल रहा था, ‘मैं तुम्हें बदनाम नहीं करूंगा नीलू. इस में मेरे प्यार की रुसवाई होगी. तुम खुश रहो. मैं तुम्हारी यादों के सहारे ही अपनी जिंदगी गुजार दूंगा…’

प्रकाश ने देखा कि बरात बहुत दूर जा चुकी थी. प्रकाश छत से नीचे उतर आया था. वह अपने कमरे में आ कर कागज के पन्नों पर दूधिया रोशनी में लिख रहा था:

‘प्यारी नीलू,

‘वे पल कितने मधुर थे, जब बाग में शुरूशुरू में हमतुम मिले थे. तुम्हारा साथ पा कर मैं निहाल हो उठा था.

‘मैं रातभर यही सोचता था कि वे पल, जो हम दोनों ने एकसाथ बिताए थे, वे कभी खत्म न हों, पर मेरी चाहत के टीले को जमीन से उखाड़ कर टुकड़ेटुकड़े कर दिया गया.

‘मैं चाहता तो जमाने से रूबरू हो कर लड़ता, पर ऐसा कर के मैं अपनी मुहब्बत को बदनाम नहीं करना चाहता था. मेरे मन में हमेशा यही बात आती रही कि वे पल हमारी जिंदगी में क्यों आए?

‘तुम मेरी जिंदगी से दूर हो गई हो. मैं बेजान हो गया हूं. एक अजीब सा खालीपन पूरे शरीर में पसर गया है. संभाल कर रखूंगा उन मधुर पलों को, जो हम दोनों ने साथ बिताए थे.

‘तुम्हारा प्रकाश…’

प्रकाश की आंखें आंसुओं से टिमटिमा रही थीं. धीरेधीरे नीलू की यादों में खोया वह सो गया था. Romantic Story In Hindi

Best Hindi Story: देवर – मंजू के देवर ने उस के साथ क्या किया

Best Hindi Story: प्रदीप को पति के रूप में पा कर मंजू के सारे सपने चूरचूर हो गए. प्रदीप का रंग सांवला और कद नाटा था. वह मंजू से उम्र में भी काफी बड़ा था.

मंजू ज्यादा पढ़ीलिखी तो नहीं थी, मगर थी बहुत खूबसूरत. उस ने खूबसूरत फिल्मी हीरो जैसे पति की कल्पना की थी.

प्रदीप सीधासादा और नेक इनसान था. वह मंजू से बहुत प्यार करता था और उसे खुश करने के लिए अच्छेअच्छे तोहफे लाता था. मगर मंजू मुंह बिचका कर तोहफे एक ओर रख देती. वह हमेशा तनाव में रहती. उसे पति के साथ घूमनेफिरने में भी शर्म महसूस होती. मंजू तो अपने देवर संदीप पर फिदा थी. पहली नजर में ही वह उस की दीवानी हो गई थी.

संदीप मंजू का हमउम्र भी था और खूबसूरत भी. मंजू को लगा कि उस के सपनों का राजकुमार तो संदीप ही है. प्रदीप की नईनई नौकरी थी. उसे बहुत कम फुरसत मिलती थी. अकसर वह घर से बाहर ही रहता. ऐसे में मंजू को देवर का साथ बेहद भाता. वह उस के साथ खूब हंसीमजाक करती.

संदीप को रिझाने के लिए मंजू उस के इर्दगिर्द मंडराती रहती. जानबूझ कर वह साड़ी का पल्लू सरका कर रखती. उस के गोरे खूबसूरत बदन को संदीप जब चोर निगाहों से घूरता तो मंजू के दिल में शहनाइयां बज उठतीं.

वह चाहती कि संदीप उस के साथ छेड़छाड़ करे मगर लोकलाज के डर और घबराहट के चलते संदीप ऐसा कुछ नहीं कर पाता था.

संदीप की तरफ से कोई पहल न होते देख मंजू उस के और भी करीब आने लगी. वह उस का खूब खयाल रखती. बातोंबातों में वह संदीप को छेड़ने लगती. कभी उस के बालों में हाथ फिराती तो कभी उस के बदन को सहलाती. कभी चिकोटी काट कर वह खिलखिलाने लगती तो कभी उस के हाथों को अपने सीने पर रख कर कहती, ‘‘देवरजी, देखो मेरा दिल कैसे धकधक कर रहा है…’’

जवान औैर खूबसूरत भाभी की मोहक अदाओं से संदीप के मन के तार झनझना उठते. उस के तनबदन में आग सी लग जाती. वह भला कब तक खुद को रोके रखता. धीरेधीरे वह भी खुलने लगा.

देवरभाभी एकदूसरे से चिपके रहने लगे. दोनों खूब हंसीठिठोली करते व एकदूसरे की चुहलबाजियों से खूब खुश होते. अपने हाथों से एकदूसरे को खाना खिलाते. साथसाथ घूमने जाते. कभी पार्क में समय बिताते तो कभी सिनेमा देखने चले जाते. एकदूसरे का साथ उन्हें अपार सुख से भर देता.

दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. संदीप के प्यार से मंजू को बेहद खुशी मिलती. हंसतीखिलखिलाती मंजू को संदीप बांहों में भर कर चूम लेता तो कभी गोद में उठा लेता. कभी उस के सीने पर सिर रख कर संदीप कहता, ‘‘इस दिल में अपने लिए जगह ढूंढ़ रहा हूं. मिलेगी क्या?’’

‘‘चलो देवरजी, फिल्म देखने चलते हैं,’’ एक दिन मंजू बोली.

‘‘हां भाभी, चलो. अजंता टौकीज में नई फिल्म लगी है,’’ संदीप खुश हो कर बोला और कपड़े बदलने के लिए अपने कमरे में चला गया.

मंजू कपड़े बदलने के बाद आईने के सामने खड़ी हो कर बाल संवारने लगी. अपना चेहरा देख कर वह खुद से ही शरमा गई. बनठन कर जब वह निकली तो संदीप उसे देखता ही रह गया.

‘‘तुम इस तरह क्या देख रहे हो देवरजी?’’ तभी मंजू इठलाते हुए हंस कर बोली.

अचानक संदीप ने मंजू को पीछे से बांहों में भर लिया और उस के कंधे को चूम कर बोला, ‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो, भाभी. काश, हमारे बीच यह रिश्ता न होता तो कितना अच्छा होता?’’

‘‘अच्छा, तो तुम क्या करते?’’ मंजू शरारत से बोली.

‘‘मैं झटपट शादी कर लेता,’’ संदीप ने कहा.

‘‘धत…’’ मंजू शरमा गई. लेकिन उस के होंठों पर मादक मुसकान बिखर गई. देवर का प्यार जताना उसे बेहद अच्छा लगा.

खैर, वे दोनों फिल्म देखने चल पड़े. फिल्म देख कर जब वे बाहर निकले तो अंधेरा हो चुका था. वे अपनी ही धुन में बातें करते हुए घर लौट पड़े. उन्हें क्या पता था कि 2 बदमाश उन का पीछा कर रहे हैं. रास्ता सुनसान होते ही बदमाशों ने उन्हें घेर लिया और बदतमीजी करने लगे. यह देख कर संदीप डर के मारे कांपने लगा.

‘‘जान प्यारी है तो तू भाग जा यहां से वरना यह चाकू पेट में उतार दूंगा,’’

एक बदमाश दांत पीसता हुआ संदीप के आगे गुर्राया.

‘‘मुझे मत मारो. मैं मरना नहीं चाहता,’’ संदीप गिड़गिड़ाने लगा.

‘‘जा, तुझे छोड़ दिया. अब फूट ले यहां से वरना…’’

‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ संदीप. मुझे बचा लो…’’ तभी मंजू घबराए लहजे में बोली.

लेकिन संदीप ने जैसे कुछ सुना ही नहीं. वह वहां से भाग खड़ा हुआ. सारे बदमाश हो… हो… कर हंसने लगे.

मंजू उन की कैद से छूटने के लिए छटपटा रही थी पर उस का विरोध काम नहीं आ रहा था. बदमाश मंजू को अपने चंगुल में देख उसे छेड़ते हुए जबरदस्ती खींचने लगे. वे उस के कपड़े उतारने की फिराक में थे.

‘‘बचाओ…बचाओ…’’ मंजू चीखने लगी.

‘‘चीखो मत मेरी रानी, गला खराब हो जाएगा. तुम्हें बचाने वाला यहां कोई नहीं है. तुम्हें हमारी प्यास बुझानी होगी,’’ एक बदमाश बोला.

‘‘हाय, कितनी सुंदर हो? मजा आ जाएगा. तुम्हें पाने के लिए हम कब से तड़प रहे थे?’’ दूसरे बदमाश ने हंसते हुए कहा.

बदमाशों ने मंजू का मुंह दबोच लिया और उसे घसीटते हुए ले जाने लगे. मंजू की घुटीघुटी चीख निकल रही थी. वह बेबस हो गई थी. इत्तिफाक से प्रदीप अपने दोस्त अजय के साथ उसी रास्ते से गुजर रहा था. चीख सुन कर उस के कान खड़़े हो गए.

‘‘यह तो मंजू की आवाज लगती है. जल्दी चलो,’’ प्रदीप अपने दोस्त अजय से बोला.

दोनों तेजी से घटनास्थल पर पहुंचे. अजय ने टौर्च जलाई तो बदमाश रोशनी में नहा गए. बदमाश मंजू के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे. मंजू लाचार हिरनी सी छटपटा रही थी.

प्रदीप और अजय फौरन बदमाशों पर टूट पड़े. उन दोनों ने हिम्मत दिखाते हुए उन की पिटाई करनी शुरू कर दी. मामला बिगड़ता देख बदमाश भाग खडे़ हुए, लेकिन जातेजाते उन्होंने प्रदीप को जख्मी कर दिया.

मंजू ने देखा कि प्रदीप घायल हो गया है. वह जैसेतैसे खड़ी हुई और सीने से लग कर फूटफूट कर रो पड़ी. उस ने अपने आंसुओं से प्रदीप के सीने को तर कर दिया.

‘‘चलो, घर चलें,’’ प्रदीप ने मंजू को सहारा दिया.

उन्हें घर पहुंचा कर अजय वापस चला गया. मंजू अभी भी घबराई हुई थी. पर धीरेधीरे वह ठीक हुई.

‘‘यह क्या… आप के हाथ से तो खून बह रहा है. मैं पट्टी बांध देती हूं,’’ प्रदीप का जख्म देख कर मंजू ने कहा.

‘‘मामूली सा जख्म है, जल्दी ठीक हो जाएगा,’’ प्रदीप प्यार से मंजू को देखते हुए बोला.

मंजू के दिल में पति का प्यार बस चुका था. प्रदीप से नजर मिलते ही वह शरमा गई. वह मासूम लग रही थी. उस का प्यार देख कर प्रदीप की आंखें छलछला आईं.

बीवी का सच्चा प्यार पा कर प्रदीप के वीरान दिल में हरियाली छा गई. वह मंजू को अपनी बांहों में भरने के लिए मचल उठा.

इतने में मंजू का देवर संदीप सामने आ गया. वह अभी भी घबराया हुआ था. बड़े भाई के वहां से जाने के बाद संदीप ने अपनी भाभी का हालचाल पूछना चाहा तो मंजू ने उसे दूर रहने का इशारा किया.

‘‘तुम ने तो मुझे बदमाशों के हवाले कर ही दिया था. अगर मेरे पति समय पर न पहुंचते तो मैं लुट ही गई थी. कैसे देवर हो तुम?’’ जब मंजू ने कहा तो संदीप का सिर शर्म से झुक गया.

इस एक घटना ने मंजू की आंखें खोल दी थीं. अब उसे अपना पति ही सच्चा हमदर्द लग रहा था. वह अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: सागर से मुझ को मिलना नहीं है – कहानी अल्हड़ गंगा की

Hindi Romantic Story: गंगा गांव की एक भोलीभाली और बेहद खूबसूरत लड़की थी. उस की मासूम खूबसूरती को वैसे तो शब्दों में ढालना बहुत ही मुश्किल है, पर यह समझ लीजिए कि गंगा को देख कर ऐसा लगता था, जैसे खेतों की हरियाली उसी पर छाई हुई है…

अल्हड़, मस्त गंगा पूरे गांव में घूमतीफिरती… कभी गन्ना चूसते हुए, तो कभी बकरी के बच्चे को पकड़ने के लिए… गांवभर के मुस्टंडे आंखें

भरभर कर उसे देखा करते और ठंडी आहें भरते थे, पर गंगा किसी को घास नहीं डालती थी.

गांव के सरपंच के बेटे की शादी का मौका था… सरपंच के घर खूब रौनक थी… दूरदराज के गांवों से भी ढेरों मेहमान आए थे.

गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह और सरपंच में गहरी दोस्ती थी, सो गंगा का पूरा परिवार उस शादी में घराती के रोल में बिजी था. कई सारे इंतजाम लक्ष्मण सिंह के ही जिम्मे थे…

गंगा की मां पार्वती घर के कामों को निबटाने में सरपंच की पत्नी का हाथ बंटा रही थी. गंगा के लिए तो यह शादी जैसे कोई त्योहार, कोई उत्सव जैसी थी… नएनए कपड़े पहनना, सजनासंवरना और नाचगाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना…

‘‘अरी ओ गंगा… कुछ काम भी कर लिया कर… सारा दिन यहां से वहां मटकती फिरती है…’’ पार्वती ने कहा.

‘‘अरी अम्मां, काम करने के लिए तू तो है… अभी तो मेरी खेलनेकूदने की उम्र है,’’ गंगा खिलखिलाते हुए बोली.

‘‘देख तो… ताड़ जैसी हो गई है… कल हाथ पीले हो गए, तो अपनी ससुराल में खिलाएगी… पत्थर…’’ पार्वती गुस्सा दिखाते हुए बोली.

‘‘अम्मां… तू फिक्र मत कर… मेरी ससुराल में नौकरचाकर होंगे… मैं नहीं करूंगी कोई कामधाम,’’ गंगा ने तपाक से जवाब दिया.

‘‘तेरे मुंह में गुड़ की डली मेरी लाडो… तेरी खातिर ऐसी ही ससुराल देखेंगे…’’ बीच में गंगा के पिता लक्ष्मण सिंह बोले.

‘‘यह लो… सेर को सवा सेर. समझाने के बजाय उस की हां में हां मिला रहे हो… ओ गंगा के बापू… क्यों इतना सिर चढ़ा रहे हो… लड़की जात है… दोचार गुण सीख लेगी तो ससुराल में काम आएंगे…’’ गंगा की मां तुनक कर बोली.

‘‘क्यों इस के पीछे पड़ी रहती हो… जब ब्याह होएगा… तो सब अपनेआप सीख जाएगी…’’ लक्ष्मण सिंह ने कहा.

‘‘बापू… यह देखो… यह घाघरा और चोली सिलवाई है… अम्मां की बनारसी साड़ी से… कैसी है बापू?’’ गंगा ने पिता से पूछा.

‘‘बहुत बढि़या है… मेरी लाडो एकदम रानी लगती है रानी…’’ लक्ष्मण सिंह खुश होते हुए बोले.

गंगा लहंगाचोली को अपने तन से लगा कर हिलहिल कर खुद को निहार रही थी.

शाम को सरपंच के यहां से बरात निकलनी थी. गंगा के मांबापू पहले ही वहां पहुंच चुके थे. गंगा सजसंवर कर जब वहां पहुंची, तो सब के मुंह खुले के खुले रह गए…

हर कोई गंगा को ही देख रहा था… सब को अपनी तरफ देखते हुए देख कर गंगा शरमा गई. शर्म के मारे उस के गाल और गुलाबी हो गए…

दूसरे गांवों के सरपंच भी वहां आए हुए थे. सीमन गांव के सरपंच और उन का बेटा निहाल भी इस शादी में आए थे… निहाल बांका जवान था. गठा हुआ शरीर और रोबदार चेहरामोहरा… झबरीली मूंछें और गुलाबी होंठ.

गंगा और निहाल ने एकसाथ एकदूजे को देखा. निहाल से नजरें मिलते ही गंगा का दिल जोरजोर से धड़कने लगा और निहाल तो बस एकटक गंगा को ही देखे जा रहा था… मानो उस की आंखें गंगा के सिवा कुछ देखना ही नहीं चाहती हों.

‘‘चलो चलो… जल्दी करो… वर निकासी का समय हो गया,’’ किसी ने कहा.

गंगा और निहाल की तंद्रा टूटी. बरात गई और बरात वापस भी आ गई… लेकिन गंगा और निहाल तो जैसे एकदूसरे में ठहर गए थे… प्यार का बीज फूट चुका था.

‘‘गंगा…’’ किसी ने धीरे से गंगा को पुकारा.

गंगा ने देखा कि एक कोने में निहाल खड़ा था… उस ने गंगा को इशारा किया कि घर के पीछे आ जाओ.

गंगा का दिल जोर से धड़क रहा था, पर निहाल से मिलने की बेताबी भी थी… सब से नजरें बचा कर गंगा घर के पिछवाड़े में पहुंच गई, जहां निहाल बेसब्री से उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘गंगा…’’ निहाल ने गंगा के कान

में कहा.

गंगा का पूरा शरीर सिहर गया… मानो निहाल की सांसें, खून के साथ उस की धमनियों में बहने लगी हों.

‘‘हम आज अपने गांव वापस जा रहे हैं,’’ निहाल ने गंगा से कहा.

यह सुन कर गंगा की आंखों में आंसू आ गए और उस ने पलकें उठा कर निहाल को देखा.

‘‘अरी पगली, रोती क्यों हो… अब मैं तुम्हें ब्याह कर हमेशा के लिए साथ ले जाऊंगा,’’ निहाल ने गंगा के आंसू पोंछते हुए कहा.

गंगा थरथर कांप रही थी. निहाल ने उस का माथा चूम लिया. गंगा को ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. वह लता की तरह निहाल से लिपट गई.

निहाल उसे उठा कर पिछवाड़े में मवेशियों के लिए बनी कोठरी में ले गया. गंगा सुधबुध खो बैठी थी और निहाल बेताब था. उस अंधेरी कोठरी में अचानक बिजलियां चमकीं… कई सारे जुगनू टिमटिमाने लगे… जज्बातों की बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी… बांध टूट गए…

कुछ ही पलों में सबकुछ शांत था, मानो एक भयंकर तूफान आया और

फिर थम गया, जो छोड़ गया कुछ निशानियां… जिन्हें अब गंगा समेट

रही थी.

‘‘गंगा, मैं जल्दी ही आऊंगा और तुम्हें अपनी दुलहन बना कर ले जाऊंगा,’’ निहाल बोला.

गंगा शांत थी. उसे कुछ कहनेसुनने का समय ही न मिला. निहाल फुरती से कोठरी से बाहर निकल गया.

गंगा पिघली जा रही थी. निहाल के प्यार और इस अनोखे एहसास से घिरी गंगा कोठरी से बाहर निकली. निहाल अपने पिता के साथ वापस गांव के लिए निकल चुका था.

गंगा नहीं जानती थी कि जिस पर उस ने अपना सबकुछ लुटा दिया है, वह कौन है, किस गांव का है और उसे लेने कब आएगा.

मदमस्त लहराती चंचल गंगा एकाएक शांत और गंभीर हो गई थी. रातदिन आहट रहती कि अब निहाल आए या उस की कोई खबर ही आ जाए… कई महीने बीत गए, पर निहाल नहीं आया.

पार्वती और लक्ष्मण सिंह समझ नहीं पा रहे थे कि खिलीखिली सी उन की बेटी क्यों पलपल मुरझा रही है.

नदी किनारे बैठ आंसू बहाती गंगा हताश हो गई… उस का धीरज अब जवाब दे चुका था. अम्मांबापू का ब्याह के लिए जोर देना… जैसे गंगा को भीतर ही भीतर मार रहा था.

एक दिन नदी की आतीजाती लहरों को देखतेदेखते जाने कौन सा तूफान गंगा के दिल में उठा कि उस ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा डूबने लगी. उस का दम घुटने लगा. सांसें उखड़ने लगीं. एकाएक हाथपैर मारती गंगा के हाथ में लकड़ी का एक भारी लट्ठा आ गया. गंगा उस के सहारे तैर कर नदी के किनारे आ गई.

पानी में कूदने, डूबने और मौत का सामना कर लौटी गंगा के मन में एक ही विचार बारबार कौंध रहा था कि जानबूझ कर पानी में कूदने या अनजाने में पानी में गिरने पर इनसान कितना छटपटाता होगा… कितनी तकलीफदेह मौत होती होगी… उस समय उसे अगर एक लकड़ी मिल जाए… तो कितनों की जान बच सकती है… बस, उस ने कुछ सोच कर जंगल से लकडि़यां तोड़ीं और उन से एक नाव तैयार की और उतार दी नदी में.

अब गंगा ने तय किया कि उस की जिंदगी का एक यही मकसद होगा… वह इस नाव से सब को पार लगाएगी और डूबतों के प्राण बचाएगी…

गंगा अब ‘नाव वाली गंगा’ कहलाने लगी. गरीब जरूरतमंदों को नदी पार कराने वाली गंगा… डूबतों की जान बचाने वाली गंगा…

अम्मांबापू की उस के आगे एक न चली. गंगा ने शादी करने से साफ मना कर दिया. कह दिया कि ब्याह की बात की तो वह नदी में कूद कर अपनी जान दे देगी. अम्मांबापू ने हार मान ली.

महीने बीते… साल गुजरे… नाव वाली गंगा नहीं बदली. वह डटी रही नदी किनारे… पार करवाती रही नदी… न जाने कितनी जानें बचाईं उस की नाव ने.

इस बार बारिश बहुत हुई. कई गांव के खेतखलिहान, घरजमीन सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए. गंगा के गांव में भी बाढ़ ने तहलका मचाया, लेकिन गंगा औरों की तरह गांव छोड़ कर भागी नहीं, बल्कि बाढ़ में डूबे लोगों को बचा कर उन की देखरेख करती रही.

बाढ़ का पानी अब उतार पर था. गंगा अपनी नाव के साथ नदी किनारे बैठी थी कि तभी किसी ने नदी में छलांग लगा दी. गंगा ने लपक कर अपनी नाव उस तरफ चला दी. उस ने देखा कि एक नौजवान डूब रहा था, घबरा कर हाथपैर मार रहा था.

गंगा ने पास पहुंच कर उसे बड़ी मुश्किल से अपनी नाव पर चढ़ा लिया और उस की पीठ दबा कर पानी निकाला.

‘‘क्यों कूदे…?’’ गंगा ने औंधे पड़े उस नौजवान से पूछा.

‘‘मेरा तो सबकुछ लूट गया है. खेतखलिहान, घरजायदाद सब बरबाद हो गया और परिवार भी… सब बह गए. अब मैं

जी कर भी

क्या करूंगा… क्यों बचाया तुम ने?’’ उस  नौजवान ने उलटा लेटे हुए ही जवाब दिया.

‘‘तूफान तो आते हैं और चले जाते हैं… पर इस का यह मतलब तो नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गई. एक तूफान से क्या घबराना. हिम्मत करो और फिर जीना शुरू करो. हो सकता?है कि कुछ बहुत अच्छा हो जाए…’’ गंगा ने कहा.

इतना सुन कर वह नौजवान पलटा. गंगा का मुंह खुला का खुला रह गया.

‘‘निहाल…’’ गंगा बुदबुदाई.

‘‘गंगा…’’ निहाल गंगा को देख कर हैरान रह गया.

‘‘मैं ने तुम्हें धोखा दिया. उसी

की सजा मुझे मिली है,’’ निहाल रोते

हुए बोला.

गंगा की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे.

‘‘गंगा, क्या तुम मुझे एक मौका और नहीं दोगी?’’ निहाल ने गंगा की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

गंगा अवाक थी. उस ने निहाल पर एक तीक्ष्ण निगाह डाली और बोली, ‘‘तुम ने पश्चाताप कर लिया. इस से तुम्हारे तनमन का मैल धुल गया है, लेकिन तुम्हारा और मेरा मेल मुमकिन नहीं है. आओ, तुम्हें नदी किनारे लगा दूं, क्योंकि बीच मंझधार में छोड़ना मेरी फितरत नहीं है.’’

निहाल को नदी किनारे पर उतार कर गंगा की नाव चल पड़ी. निहाल देखता रहा दूर तक, उथली लहरों पर गंगा को चप्पू चलाते हुए.

नदी की कलकल से मानो यही आवाज सुनाई दे रही थी :

‘सागर से मुझ को मिलना नहीं है,

सागर से मिल कर मैं खारी हो जाऊंगी.’ Hindi Romantic Story

Story In Hindi: आखिरी झूठ – जब सपना ने किया अपने झूठ का खुलासा

Story In Hindi: दिल्ली रेलवे स्टेशन से नंगलडैम शहर के लिए जैसे ही राहुल रेलगाड़ी के कंपार्टमैंट में चढ़ा, उस ने नजर खाली बर्थ की तरफ दौड़ाई, लेकिन स्लीपिंग कंपार्टमैंट में अधिकतर सीटें खाली पड़ी थीं. उस ने अपना सामान एक बर्थ पर रख कर देखा तो एक युवती खिड़की के पास वाली लंबी बर्थ पर अकेली बैठी थी. उस की उम्र यही कोई 22-23 के आसपास की रही होगी. वह गुलाबी रंग के सूट में थी. दिसंबर का महीना था. वह आकर्षण और रूपलावण्य से भरपूर इतनी सुंदर लग रही थी मानो जैसे कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो.

टिकट चैकर के पास जा कर राहुल ने उस लड़की के पास वाली सीट अपने लिए बुक करवा ली. राहुल एक कंपनी में जौइन करने के लिए नंगल जा रहा था. असिस्टैंट मैनेजर का पद था. गाड़ी रात को 10 बजे चल कर नंगल सवेरे 5 बजे पहुंचती थी. वह खुश था, ‘काफी समय के लिए यात्रा में इतनी सुंदर युवती का साथ रहेगा,’ ऐसा वह मन ही मन सोचने लगा.

राहुल लगभग 25 वर्ष के आसपास था. एक क्षण के लिए उस ने सोचा, ‘क्यों न वह अपना परिचय देते हुए, उस युवती के पास बैठ कर उस से नजदीकी बढ़ाए.’

‘‘मेरा नाम राहुल है. मैं नंगल जौब जौइन करने जा रहा हूं. आप का क्या नाम है? आप कहां जा रही हैं?’’ पूछते हुए उस की बेसब्री जाहिर थी. वह उस के चेहरे को गौर से देख रहा था.

‘‘हम दोनों हमउम्र हैं, पहले तो मैं यह कहूंगी कि आप की जगह तुम शब्द का इस्तेमाल कीजिए. मेरा नाम सपना है. मैं नंगल डैम शहर में सिविल अस्पताल में इंटर्नशिप के लिए जा रही हूं. 3 महीने मैं नंगल शहर में ही रहूंगी.’’

राहुल को सपना का अनौपचारिक होना अच्छा लगा. उसे भी लड़कियों को तुम कह कर संबोधित करना अच्छा लगता था. सपना की सीट पर बैठ कर उस से बातें करना उसे बहुत अच्छा लगा. सपना ने बताया उस का परिवार दिल्ली में रहता है. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने परिवार के बारे में विस्तार से बताते हुए बातचीत शुरू की. दोनों के ही परिवार दिल्ली में रहते थे.

राहुल के पिता पुस्तक प्रकाशक थे, उन का अच्छाखासा व्यापार था. मां हाउसवाइफ थीं. सपना के पिता तलाकशुदा थे, मां झगड़ालू और क्लेश करने वाली थीं इसलिए मां और पिता का तलाक कई वर्ष पहले ही हो चुका था. बचपन से यौवनावस्था तक सपना का जीवन संघर्षमय रहा था. वह पिता के साथ दिल्ली में रहती थी. डाक्टरी की पढ़ाई भी उस ने दिल्ली में ही की और अब इंटर्नशिप के लिए नंगल जा रही थी.

यह सब सुन कर राहुल का मन सपना के लिए सहानुभूति से भर उठा और भावविभोर हो कर उस ने कहा, ‘‘सपना, मुझे तुम्हारे संघर्षमय जीवन के बारे में जान कर बहुत दुख हुआ है. तुम बहुत बहादुर और सैल्फमेड लड़की हो. मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि तुम कैरियर बनाने के प्रति जागरूक और प्रयत्नशील हो. नंगल पहुंच कर अपनी इंटर्नशिप शुरू करो. मुझे तुम कभी भी किसी भी प्रकार की सहायता के लिए बगैर हिचकिचाहट के कह सकती हो. हम अपने मोबाइल नंबर एकदूसरे को दे देते हैं,’’ राहुल ने जेब से एक कागज निकाल कर उस पर अपना मोबाइल नंबर लिखा और सपना को दे दिया, ‘‘फील फ्री टू कौंटैक्ट मी.’’

ये भी पढ़ें- Short Story: प्यार का रंग

सपना ‘थैंक्स’ कहते समय बहुत खुश दिखाई दी. सोने से पहले कानों में हैडफोन लगा कर उस ने अपना मनपसंद संगीत सुना. राहुल ने देखा सपना उनींदी आंखों से उस की ओर मुसकरा कर निहार रही थी. मधुर आवाज में ‘गुडनाइट’ कहते हुए उस ने कंबल ओढ़ लिया.

यों तो एमबीए की पढ़ाई के दौरान कई युवतियों के संपर्क में रहने वाला राहुल आश्चर्यचकित था कि इतनी सुंदर युवती उस के जीवन में अब तक नहीं आई थी. अपनी बर्थ पर लेटे हुए टकटकी लगाए वह सपना को देख कर खुश हो रहा था. उसे इस बात की भी प्रसन्नता थी कि 3 महीने नंगल में सपना का साथ मिलेगा. भविष्य के विषय में सोचते हुए कब उसे नींद आ गई पता ही नहीं चला.

सवेरे 4 बजे गाड़ी आनंदपुर साहब स्टेशन पर 15 मिनट के लिए रुकी. सपना अभी सो ही रही थी. राहुल 2 कप चाय ले आया. सपना गहरी नींद में थी. राहुल ने उस के गाल पर हलके स्पर्श के साथ उसे जगाया. सपना को अच्छा लगा. ‘‘गुडमौर्निंग,’’ कहते हुए सपना ने चाय का गिलास राहुल से ले लिया. राहुल का बरसों के इंतजार के बाद इतनी सुंदर युवती से जो सामना हुआ था. उस ने मन में सोचा, ‘पापा को फोन पर बताएगा कि उन के लिए बहू तलाश ली है,’ दूसरी तरफ मन में यह बात भी आई कि अभी बहुत जल्दी होगी. सब्र करना ठीक होगा. अभी एकदूसरे को जानना बाकी है.

ये भी पढ़ें- Short story: जरा सा मोहत्याग

नंगल स्टेशन पर पहुंचने के बाद राहुल कंपनी के गैस्ट हाउस की ओर चला गया.

‘‘सपना, तुम अपने वूमन होस्टल पहुंच कर फोन करना,’’ राहुल ने कहा.

‘‘ठीक है, लैटअस विश ईच अदर बैस्ट औफ लक’’ सपना ने मुसकराते हुए कहा और अस्पताल से आई हुई वैन में बैठ गई.

दोनों ने अपनीअपनी जौब जौइन कर ली. राहुल और सपना दोनों के लिए नए शहर में रहना एक अद्भुत अनुभव था. एकदूसरे से मिलना और साथसाथ समय बिताना उन्हें अच्छा लगने लगा. नंगल डैम पर एक रेस्तरां था. वहां से चारों ओर का बहुत ही सुहावना दृश्य दिखता था. रविवार के दिन इसी रेस्तरां में वे दोनों घंटों साथसाथ समय बिताते थे. लंच यहीं पर करते थे. कभीकभी सपना राहुल के साथ उस के गैस्ट हाउस में भी घंटों बैठी रहती थी. ज्योंज्यों नजदीकियां बढ़ रही थीं त्योंत्यों उन का रिश्ता स्वाभाविक रूप से गहरा होता जा रहा था.

एक दिन राहुल ने सपना से कहा, ‘‘तुम अपने पापा का पूरा पता मुझे दे दो ताकि मैं दिल्ली जा कर उन से मिल सकूं या फिर मैं अपने मातापिता को तुम्हारे पापा के पास भेज कर उन की जानपहचान करवा सकूं.’’

सपना बोली, ‘‘अभी पापा से मिलवाना या तुम्हारा दिल्ली जा कर उन से मिलना जल्दबाजी होगी. मैं अभी पता नहीं देना चाहती.’’

राहुल की समझ में नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो वह अपने पापा का पता उसे नहीं दे रही है.

समयसमय पर जब कभी मौका मिलता, राहुल अपना प्रेम व्यक्त करता रहता. वह सपना से कहा करता कि जब हम दोनों एकदूसरे के इतने नजदीक आ चुके हैं, तो समझ में नहीं आता कि क्यों तुम उन बातों से परहेज करती हो जो इस उम्र में नौजवान युवकयुवतियां करते हैं. राहुल ने अपनी जेब से सोने की एक अंगूठी निकाली और सपना को पहनाते हुए कहा, ‘‘यह मेरा तुम्हारे लिए पहला गिफ्ट है. मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब तुम से प्यार करने लगा. मेरे जीवन में यह पहला अनुभव है,’’ उस ने भावुक हो कर सपना को गले लगाना चाहा, लेकिन सपना ने उसे मना करते हुए अनुरोध किया, ‘‘नहीं, राहुल अभी ऐसा कुछ मैं स्वीकार नहीं करूंगी. जब कभी हम विवाह के बंधन में बंध जाएंगे तो मैं प्रौमिस करती हूं कि तुम्हें जी भर कर प्यार करूंगी. अभी बस इतने से ही काम चलाना होगा,’’ कहते हुए उस ने राहुल का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाया और चूम लिया, ‘‘इन हाथों ने मुझे अंगूठी पहनानी चाही इसलिए इन्हें चूम कर मैं अपने प्यार का इजहार कर रही हूं.’’

एक दिन दोनों गैस्ट हाउस के लौन में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे. दोनों एकदूसरे को अपने कालेज के दिनों के बारे में विस्तार से बता रहे थे. सपना ने बताया कि कैसे लड़के उस के करीब आने का प्रयत्न करते थे, लेकिन वह किसी के प्रति आकर्षित नहीं होती थी. अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर के अपना टौप करने का उद्देश्य वह पूरा करना चाहती है.

ये भी पढ़ें- अपने लोग : आनंद क्या रानी को कर पाया खुशस्ती की.

‘‘सपना, मैं एक बार फिर तुम से कह रहा हूं कि मुझे अपने डैडी का ऐड्रैस और मोबाइल नंबर दे दो. जैसा तुम ने बताया था कि डैडी बिलकुल अकेले हैं, तुम्हारी मां उन्हें छोड़ कर जा चुकी हैं. मेरा उन से मिलना जरूरी है, कहीं ऐसा न हो कि वे कोई और लड़का तुम्हारे लिए देख लें,’’ राहुल ने सपना को समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे भी पापा की चिंता है कि कैसे वे मेरी अनुपस्थिति में समय गुजारते होंगे. उन्हें खाना भी बाहर से मंगाना पड़ता होगा. पहली बार उन से दूर आ कर मैं यहां रह रही हूं,’’ सपना ने कहा.

राहुल बोला, ‘‘मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. मैं जानता हूं कि मां के बिना तुम्हारा जीवन कितना कष्टमय रहा होगा. सपना, मैं तो यही कामना करता हूं कि तुम्हारी मां वापस तुम्हारे घर आ जाए. तुम्हारी शादी का इंतजाम वे संभाल लें.’’

सपना का उदास चेहरा राहुल से देखा नहीं जाता था. अपना प्यार, अपने हावभाव उस पर उडे़लता हुआ वह यही कहता था, ‘‘मैं तुम्हारे जीवन को खुशियों से भर दूंगा. यह मेरी दिली तमन्ना है.’’

सपना की इंटर्नशिप का 2 महीने का समय बीत चुका था और वह 2-3 दिन की छुट्टी ले कर दिल्ली अपने पापा के पास जा रही थी. राहुल ने जोर दे कर सपना को बताया कि वह भी उस के साथ दिल्ली जाएगा. बेशक सपना ने आनाकानी की लेकिन वह नहीं माना और दोनों ने टिकट बुक करा लिए.

राहुल यह नहीं समझ पा रहा था कि हर बार सपना इस बात पर हिचकिचाती क्यों है कि राहुल उस के पापा से दिल्ली जा कर न मिलें. राहुल के दृढ़निश्चय का परिणाम यह हुआ कि दोनों दिल्ली सपना के पापा के पास पहुंच गए.

राहुल को इस बात का अनुमान था कि सपना अपने साथ राहुल को दिल्ली लाने के बारे में अपने पापा को फोन पर बता चुकी होगी. उस के घर पहुंचने पर राहुल आश्चर्यचकित था. सपना के पापा के साथ उस की मम्मी भी घर पर मौजूद थीं.

राहुल ने प्रश्न किया, ‘‘सपना, तुम ने तो बताया था कि तुम्हारे मम्मीपापा का तलाक हो चुका है. मम्मी साथ नहीं रहती हैं.’’

सपना ने कहा, ‘‘मुझे भी सरप्राइज हुआ था जब पापा ने फोन पर बताया था कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन का मम्मी से समझौता हो गया है और वे खुशीखुशी उन के साथ रहने के लिए चली आई हैं. मैं इस बात से बहुत खुश हूं,’’ वह अपनी मां के गले लग कर बहुत रोई. सपना के पापा की आंखें भी आंसुओं से भर आई थीं.

सब ने मिलबैठ कर एकसाथ नाश्ता किया. चाय पी कर माहौल को अनुकूल देख कर सपना ने शरारत भरी मुसकराहट के साथ राहुल से कहा, ‘‘मेरी पूरी बात धैर्य से सुन लो. प्रतिक्रिया बाद में देना. मम्मीपापा में कभी कोई मतभेद या तलाक हुआ ही नहीं था. मैं ने तुम से झूठ बोला था. तुम से सहानुभूति प्राप्त करने और प्यार पाने के लिए मैं ने ऐसा किया था. तुम से मिलते ही पहली नजर में ही मैं ने तुम्हें चुन लिया था. दुनिया में तुम से बेहतर जीवन साथी तो हो ही नहीं सकता,’’ क्षण भर को वह रुकी, फिर राहुल से पूछा, ‘‘क्या तुम मुझे माफ कर सकोगे. मेरा तरीका गलत हो सकता है पर मेरा मकसद अपने लिए योग्यप्रेमी को पाना था. यह मेरा आखिरी झूठ था. भविष्य में कभी झूठ का सहारा नहीं लूंगी.’’ सपना के मातापिता हक्केबक्के हो कर अपनी पुत्री को निहार रहे थे. सपना ने कहा, ‘‘पापा, आई एम सौरी.’’

राहुल की खुशी उस के चेहरे पर झलक रही थी. ‘‘तुम्हारे अब तक के मधुर व्यवहार और प्रगाढ़ प्रेम को देखते हुए यह गलती माफ करने योग्य है,’’ अपनी स्वीकृति व्यक्त करते हुए उस ने सपना के मातापिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया. Story In Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें