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प्यार, अपहरण और साजिश : भाग 2

सौजन्य-सत्यकथा

जांच के दौरान पुलिस को ड्राइवर से पता चला कि व्यवसाई सुलेमान पत्ती (कमेटी) का काम भी करता था. पत्ती के तहत कई दुकानदार रोजाना या सप्ताहवार रुपए उस के पास जमा करते थे. इस के बाद प्रति माह या तिमाही ड्रा के माध्यम से रुपए उठाए जाते थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस इस काम में किसी तरह का लेनेदेन व रंजिश को ले कर भी गहनता से जांच में जुट गई. पुलिस के लिए कारोबारी का अपहरण चुनौती साबित हो रहा था.

व्यापारी के सरेशाम अपहरण की खबर इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया में प्रमुखता से छाने लगी, जिस सेपुलिस पर दबाव बढ़ता जा रहा था. लेकिन पुलिस अपने काम में जुटी रही.

इसी बीच व्यवसाई के अपहरण मामले में पुलिस के हाथ कई अहम सूत्र लगे. पुलिस को व्यापारी पर लाखों रुपए का कर्ज होने का पता चला ही, साथ ही उस की एक प्रेमिका के बारे में जानकारी मिली. इस से पुलिस को अपहरण पर संदेह हुआ. प्रेमिका की जानकारी मिलने पर शक और गहरा गया.

पुलिस को सुलेमान के मोबाइल की काल डिटेल्स से यह पता चला कि वह आगरा के शाहगंज की महिला के संपर्क में था. तब पुलिस ने ड्राइवर इमरान से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. इस के बाद उस ने पूरा राज खोल दिया.

इधर पुलिस को अपने मुखबिर से सूचना मिली कि अपहृत व्यापारी को भिवाड़ी में देखा गया है. इस सूचना पर पुलिस टीम तुरंत भिवाड़ी रवाना हो गई. मुखबिर के बताए स्थान पर पुलिस ने दबिश दी तो वहां व्यवसाई सुलेमान अपनी प्रेमिका परवीन व उस के 2 बच्चों के साथ मिला.

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जब पुलिस सुलेमान को हिरासत में ले कर जाने लगी तो परवीन भी अपने दोनों बच्चों के साथ चलने की बात कहने लगी. इस के बाद पुलिस सभी को मैनपुरी ले आई. थाने ला कर सुलेमान से उस के अपहरण के बारे में कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने अपहरण को नाटक बताते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया.

सुलेमान ने पुलिस को बताया कि अपहरण के इस नाटक में उस का भाई सद्दाम हुसैन, ड्राइवर इमरान निवासी बिरथुआ व जिगरी दोस्त जाहिद निवासी भिवाड़ी भी शामिल था. पुलिस ने व्यापारी सुलेमान सहित चारों को गिरफ्तार कर लिया.

24 सितंबर को पुलिस लाइन सभागार में आयोजित प्रैस कौन्फ्रैंस में एसपी अजय कुमार पांडेय ने व्यवसाई सुलेमान के कथित अपहरण कांड का परदाफाश करते हुए अभियुक्तों की गिरफ्तारी की जानकारी दी.

पत्रकारों को बताया कि व्यापारी का अपहरण तो हुआ ही नहीं था, बल्कि उस ने शादीशुदा प्रेमिका के साथ रहने व कर्जदारों से बचने के लिए योजनाबद्ध ढंग से स्वयं के अपहरण का सनसनीखेज ड्रामा रचा था.
इस झूठे अपहरण कांड के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह चाैंकाने वाली निकली—

उत्तर प्रदेश का एक जिला है मैनपुरी. जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित गांव दिहुली में सुलेमान अली अपने परिवार के साथ रहता था. गांव में ही उस का बिल्डिंग मैटीरियल का बड़ा काम था, जबकि कुछ दूर चौराहे पर ही उस के पिता शौकीन अली की गिट्टीबालू की दुकान थी.

सुलेमान अली गांव की परवीन नाम की एक लड़की से पिछले 8 साल से प्यार करता था. उन दोनों की शादी भी होने वाली थी. लेकिन किसी कारणवश नहीं हो सकी. तब परवीन की शादी आगरा निवासी खुशाल नाम के युवक से हो गई, वह बैंडबाजे का काम करता था. लेकिन शादी के बाद भी परवीन और सुलेमान दोनों एकदूसरे के लगातार संपर्क में रहे.

परवीन को जब भी कोई परेशानी होती, वह सुलेमान को फोन करती थी. इस बात की जानकारी पति खुशाल को भी थी. 16 सितंबर, 2020 को प्रेमिका परवीन का सुलेमान के पास फोन आया. उस ने बताया उस के पति ने उस की काफी पिटाई की है. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती थी. क्या तुम मुझे व मेरे दोनों बच्चों को अपने पास रखोगे? इस पर सुलेमान ने उसे अपनी रजामंदी दे दी.

सुलेमान ने प्रेमिका को तसल्ली देते हुए कहा कि वह जल्दी ही उसे जालिम पति के चंगुल से आजाद करा देगा. वह प्रेमिका को परेशान नहीं देख सकता.

सुलेमान ने प्रेमिका व बच्चों को 18 सितंबर को सिरसागंज बुला लिया. सुलेमान अपने ड्राइवर इमरान के साथ सिरसागंज जा कर परवीन से मिला. सुलेमान ने प्रेमिका को एक नया मोबाइल फोन व सिम कार्ड दिलाया. उस ने भिवाड़ी में रहने वाले अपने जिगरी दोस्त जाहिद को फोन कर प्रेमिका परवीन के रुकने की व्यवस्था करने के लिए कह दिया.

इस के बाद परवीन को 10 हजार रुपए देते हुए टैक्सी से अपने दोस्त जाहिद के पास भेज दिया. उसे तसल्ली देते हुए कहा कि वह भी जल्दी ही भिवाड़ी पहुंच जाएगा.

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प्रेमिका को भेजने के बाद सुलेमान अपने गांव आ गया. उधर परवीन के घर से बच्चों सहित चले जाने पर उस का पति खुशाल परेशान हो गया. उसे शक था कि वह जरूर सुलेमान के पास गई होगी. खुशाल व उस के घर वाले सुलेमान के बारे में जानकारी करने लगे कि वह गांव में है या कहीं चला गया है

उधर परवीन के भिवाड़ी में रहने व खानेपीने का दोस्त जाहिद ने इंतजाम करा दिया था. लेकिन परवीन बारबार सुलेमान को फोन कर के भिवाड़ी आने को कहने लगी. इस से सुलेमान परेशान हो गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

प्यार, अपहरण और साजिश : भाग 1

सौजन्य-सत्यकथा

शाम का समय था. मैनपुरी जिले के गांव दिहुली में रहने वाले शौकीन अली के मोबाइल पर
इमरान का फोन आया. इमरान शौकीन अली के बेटे सुलेमान का ड्राइवर था.

इमरान ने उन्हें बताया कि 4 हथियारबंद बदमाशों ने मैनपुरी बरनाहल मार्ग पर गांगसी नहर पुल के पास सुलेमान भाई का अपहरण कर लिया है. वह उन्हें अपनी स्कौर्पियो में डाल कर ले गए. ड्राइवर इमरान ने यह सूचना थाना दन्नाहार में भी फोन कर के दे दी. यह बात 21 सितंबर, 2020 की है.

सुलेमान के अपहरण की बात सुनते ही उस के घर वाले परेशान हो गए. शौकीन अली अपने छोटे बेटे सद्दाम हुसैन के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. इस से पहले सूचना मिलने पर दन्नाहार थानाप्रभारी ओमहरि वाजपेयी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. थानाप्रभारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी व्यापारी सुलेमान के अपहरण की सूचना दे दी थी

थानाप्रभारी ने ड्राइवर इमरान से घटना के बारे में पूछताछ की. इमरान घायल था. उस के सिर से खून निकल रहा था. उस ने बताया कि सुलेमान अली जीएसटी जमा करने मैनपुरी अपनी बोलेरो से आए थे.
पंजाब नैशनल बैंक में जीएसटी जमा करने के बाद वह गांव लौट रहे थे. शाम करीब 6 बजे जब उन की कार मैनपुरी बरनाहल मार्ग पर गांगसी नहर पुल के पास पहुंची तो बिना नंबर की सफेद रंग की स्कौर्पियो, जो शायद उन की बोलेरो का मैनपुरी से ही पीछा कर रही थी, ने ओवरटेक कर हमारी गाड़ी रुकवा ली.
ड्राइवर ने बताया कि गाड़ी रुकते ही हथियारबंद 4 बदमाशों ने बोलेरो के साइड के दोनों शीशे तोड़ दिए. विरोध करने पर उन्होंने हम दोनों के साथ मारपीट भी की. फिर सुलेमान को बोलेरो से खींच कर अपनी गाड़ी में डाल लिया और मैनपुरी की ओर भाग गए. चारों बदमाश मास्क लगाए हुए थे. बदमाशों ने हम दोनों के मोबाइल भी छीन लिए थे.

ड्राइवर से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस का मैडिकल कराया. फिर सुलेमान के छोटे भाई सद्दाम हुसैन की तरफ से 4 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ भादंवि की धारा 364 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने बदमाशों की तलाश भी की, लेकिन उन का कोई सुराग नहीं मिला.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद एसपी अजय कुमार पांडेय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अपहृत कारोबारी व बदमाशों की तलाश व घटना के खुलासे के लिए तेजतर्रार पुलिसकर्मियों की 4 टीमें लगाईं. इतना ही नहीं, पुलिस ने देर शाम पूरे क्षेत्र में नाकाबंदी कर दी, ताकि बदमाश अगर अभी शहर में छिपे हों तो व्यवसाई को ले कर रात में शहर से बाहर भाग न सकें.

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दूसरे दिन मंगलवार को पुलिस ने अपहृत कारोबारी सुलेमान के वकील प्रखर दीक्षित के मैनपुरी शहर स्थित औफिस के सीसीटीवी फुटेज चैक किए. फुटेज में सोमवार घटना वाले दिन सुलेमान दोपहर एक बजे उन के औफिस पहुंचा था और 1 बज कर 52 मिनट पर वहां से बाहर निकलता दिखाई दिया.
इस के बाद शहर स्थित पंजाब नैशनल बैंक अपने ड्राइवर इमरान के साथ गया था. पुलिस ने वकील व बैंककर्मियों से भी पूछताछ की.

जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, पुलिस ने उन की फुटेज देखी. पुलिस इस की जानकारी जुटाने में लग गई कि कारोबारी के बारे में पुख्ता जानकारी जुटाई जा सके.

ड्राइवर से भी पुलिस लगातार पूछताछ कर रही थी. क्योंकि केवल वही घटना का चश्मदीद था. इमरान पिछले 2 साल से सुलेमान की गाड़ी चला रहा था. पुलिस सारे दिन अपहृत व्यापारी के बारे में जानकारी जुटाती रही.

अपहरण से पहले व बाद में सुलेमान किस से मिला था, इस पर ड्राइवर इमरान ने बताया कि बैंक से निकलने के बाद उसे गाड़ी में बैठा छोड़ कर सुलेमान किसी जरूरी काम की कह कर कहीं चला गया था. फिर वह करीब डेढ़दो घंटे बाद लौटा था. इस के बाद हम लोग गांव के लिए रवाना हुए.

पुलिस यह पता करने में जुट गई कि सुलेमान अपने ड्राइवर को गाड़ी में छोड़ कर कहां और किस काम के लिए गया था.

सरेशाम हुए सनसनीखेज अपहरण कांड के 24 घंटे बीतने के बाद भी पुलिस को व्यापारी व अपहर्त्ताओं का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था. इस से पुलिस परेशान थी. घटना के बाद सर्विलांस टीम की भी मदद ली गई, लेकिन समस्या यह थी कि अपहर्त्ताओं ने अभी तक सुलेमान के घर वालों को फिरौती के लिए फोन नहीं किया था.

कारोबारी और उस के ड्राइवर के मोबाइल फोन स्विच्ड औफ आ रहे थे. पुलिस ने रात में आसपास के जिलों में कुछ स्थानों पर दबिश डाल कर संदिग्ध लोगों को उठाया, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ.

व्यापारी सुलेमान के अपहरण की खबर पूरे गांव व मैनपुरी शहर में फैल चुकी थी. अपहरण की घटना के बाद व्यापारी वर्ग में हलचल व्याप्त हो गई. उधर सुलेमान के घर पर घटना के बाद बड़ी संख्या में गांव वाले, रिश्तेदार व व्यापारी जुटने लगे. सभी सुलेमान की सकुशल बरामदगी के लिए प्रार्थना कर रहे थे. सुलेमान की पत्नी व दोनों बच्चों का रोरो कर बुरा हाल था.

थानाप्रभारी ओमहरि वाजपेयी ने सुलेमान के गांव पहुंच कर उस के पिता शौकीन अली से पूछा, ‘‘आप की या सुलेमान की किसी से रंजिश तो नहीं है? या किसी पर शक है तो बताओ.’’

शौकीन अली के इनकार करने पर थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आप के या बेटों के पास अपहर्त्ताओं का कोई फोन आए तो जरूर बताना.’’

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गांव में सुलेमान के अपहरण के बाद तरहतरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं. 3 भाइयों में सुलेमान सब से बड़ा था. उस की शादी सन 2013 में रोशनी बेगम उर्फ रश्मि से हुई थी.

सुलेमान के एक बेटी इरम व एक बेटा आदिल है. पुलिस ही नहीं लोगों को भी डर सता रहा था कि फिरौती की रकम न मिलने पर कहीं अपहर्त्ता सुलेमान की हत्या न कर दें. सुलेमान के घरवालों की पूरी रात आंखों में कटी.

पुलिस की नजर व्यापारिक प्रतिस्पर्धा पर भी थी. एसपी अजय कुमार पांडेय ने इस संबंध में संदिग्धों से भी पूछताछ की. इस के साथ ही ऐसे लोगों को चिह्नित भी किया गया, जो सुलेमान से व्यापारिक रंजिश रखते थे. बरनाहल के एक युवक को पुलिस ने हिरासत में भी लिया.

कल तुम बिजी आज हम बिजी : भाग 2

यहां मुकेश को कंपनी की तरफ से बड़ा सा बंगला और साथ ही गाड़ी भी मिली थी. शालिनी के अरमानों को जैसे पंख लग गए थे. यहां उसे पूरी आजादी थी, जैसे चाहे रहो. मुश्किल हुई तो बस, बंटी के कारण, सुबह अफिस जाते समय मुकेश उसे पालना घर में छोड़ देते थे पर लौटते समय बहुत देर हो जाती, शालिनी और मुकेश दोनों में से एक भी समय पर उसे लेने नहीं पहुंच पाते. मुकेश देर तक आफिस में रहते तो उन से कुछ उम्मीद करना बेकार था.

शालिनी को हमेशा पालनाघर के इंचार्ज की शिकायत सुननी पड़ती. उस दिन भी जब वह आफिस से लौटी तो शाम गहराने लगी थी. सारे बच्चे जा चुके थे. सिर्फ बंटी इंचार्ज के कमरे के बाहर सीढि़यों पर घुटने पर सिर टिकाए उदास सा बैठा था. उसे देख कर बंटी धीरे से मुसकराया और उठ कर खड़ा हो गया. इंचार्ज ने बाहर आ कर कहा, ‘मैडम, आप हमेशा लेट आती हैं, सारे बच्चे चले जाते हैं. यह अकेला रह जाता है तो रोता रहता है. एक दिन की बात हो तो ठीक है पर रोजरोज तो यह नहीं चल सकता.’

शालिनी इंचार्ज की बात सुन कर समझ गई कि वह देर तक रुकने के पैसे चाहता है. उस ने इंचार्ज को अतिरिक्त पैसे दे कर बंटी के देर तक रुकने का इंतजाम कर लिया. और कोई चारा भी तो नहीं था. घर के काम के लिए नौकर भी कंपनी से ही मिला था. जिंदगी मजे से गुजर रही थी. उस में भूचाल तभी आता जब बंटी बीमार होता या पालनाघर बंद होता.  ऐसे में दोनों एकदूसरे को छुट्टी लेने को कहते.

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गरमी के दिन थे. स्कूल बंद हो गए तब भी बंटी नियम से पालनाघर जाता. एक दिन शाम को शालिनी, बंटी को ले कर लौटी तो उसी समय लखनऊ से मुकेश के पापा का फोन आया था. उन्होंने बताया, ‘दिनेश की शादी तय हो गई है और इसी महीने की 30 तारीख को शादी है. मेरी इच्छा है कि तुम लोग समय से पहले आ कर अपनी जिम्मेदारी संभाल लो. घर की अंतिम शादी है, बहुत मेहमान आएंगे,’ पापा बहुत उत्साह से बता रहे थे.

शालिनी सोचने लगी, इस समय आफिस में ढेरों काम हैं, कैसे जाना होगा. तभी पापा ने टोका, ‘तुम सुन रही हो न,’ तो वह चौंकी, ‘हां, पापा, हम लोग समय से पहले आ जाएंगे.’

उस समय तो शालिनी ने कह दिया पर वे गए ऐन वक्त पर ही, जब शादी की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. मेहमानों से घर भरा था. धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ. इस बार मां छांट कर अपनी पसंद की बहू लाई थीं. आते ही छोटी बहू ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली.

फिर 2 वर्षों तक मुकेश व शालिनी का लखनऊ जाना ही नहीं हुआ. एक दिन दिनेश का फोन आया कि पापा की तबीयत बहुत खराब है. आप लोग तुरंत आ जाओ. वे पहुंचे तब तक उन का देहांत हो चुका था. मां बेहद दुखी थीं. शालिनी को वापस लौटने की तैयारी करते समय कुछ ध्यान आया. बात उस ने मुकेश से कही, ‘पापा के जाने के बाद मां बहुत अकेलापन अनुभव कर रही हैं. क्यों न हम उन्हें कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले चलें?’

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मुकेश बोले, ‘मैं भी यही सोच रहा था. बंटी के कारण उन का मन भी लग जाएगा.’ इस के बाद शालिनी मूल उद्देश्य  पर आ गई और बोली, ‘हमें बंटी को पालनाघर में नहीं छोड़ना पडे़गा. वैसे भी अब तो बंटी का स्कूल में दाखिला हो जाएगा तो आधा दिन वह वहीं रहेगा और बाकी समय मां संभाल लेंगी.’

शालिनी की बात मुकेश को ठीक लगी पर मां पता नहीं इस के लिए तैयार होंगी या नहीं. मुकेश ने दुविधा जताई तो वह तपाक से बोली, ‘नहीं, मां कभी मना नहीं करेंगी. पोते का मोह उन्हें मना करने से रोकेगा.’

मां से पूछा तो वह आसानी से तैयार हो गईं. नन्हे बंटी का लगाव उन्हें खींच कर अपने साथ ले गया.

चंडीगढ़ में उन के बंगले के सामने बहुत बड़ा लौन था. सैकड़ों प्रकार के पेड़पौधे लौन की खूबसूरती बढ़ा रहे थे. मां बंटी को ढेरों कहानियां सुनातीं, उस के साथ लूडो खेलतीं, कई किताबें दोनों साथसाथ पढ़ते. बंटी और दादी  ने बाहर बाग में बहुत से पौधे साथसाथ लगाए. बंटी अपनी दादी से बहुत सवाल करता था. उसे पता था कि उन के जवाब सिर्फ दादी मां ही दे सकती हैं, वह उन से ही पूछपूछ कर अपनी जिज्ञासा शांत करता वरना मम्मीपापा के पास तो उस के लिए छुट्टी वाले दिन भी वक्त नहीं था.

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उस दिन रविवार था. दादी मां सुबह ही नहा कर रसोई में चली गईं. रविवार के दिन मां बंटी के लिए अपने हाथ से हलवा बनातीं और बंटी को खिलाती थीं. उन्होंने अभी कटोरी में हलवा निकाल कर रखा ही था कि बंटी के जोर से चीखने की आवाज आई. भाग कर  दादी मां बाहर गईं तो देखा बरामदे में खड़ा बंटी अपने गाल को सहला रहा है और बड़ी कातर नजरों से दादी की ओर देख रहा था. तभी वहां मुकेश आ गए, ‘क्या शालिनी, बच्चे के साथ तुम भी बच्ची बन जाती हो. यह सब काम तुम बंटी के जाने के बाद भी तो कर सकती थीं.’

कल तुम बिजी आज हम बिजी : भाग 3

‘बंटी के जाने के बाद, बंटी कहां जा रहा है?’ दादी मां ने आश्चर्य से पूछा. ‘बंटी को हम बोर्डिंग में भेज रहे हैं. कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि वह बिगड़ता जा रहा है. वहां रहेगा तो ठीक रहेगा,’ कहते हुए मुकेश ने उसे गोद में उठा लिया.

दादी मां ने विरोध जताते हुए कहा, ‘अभी तो बंटी बहुत छोटा है. इस समय तो उसे मां की गोद और पिता के साए की जरूरत है.’

‘मां, अब  वह समय गया जब सारी जिंदगी बच्चों को मांबाप के साए की जरूरत होती थी. आजकल बच्चों को अपने रास्ते खुद तलाश करने पड़ते हैं, तभी वे जीवन में आगे बढ़ते हैं. बंटी को गोद से उतारते हुए मुकेश ने कहा, ‘आज हमारा बेटा अपने पापा के साथ बाजार जाएगा और ढेर सारे खिलौने खरीदेगा.’

जाने वाले दिन सुबह बंटी दादी से विदा लेने आया था. वह कुछ उदास सा था, यह देख कर दादी का दिल भर आया. वह पोते को ले कर बाहर आ गईं. हरि गाड़ी निकाल चुका था. शालिनी बंटी का सामान रखवा रही थी. मुकेश बोले, ‘मां, हम बंटी को छोड़ कर रात तक वापस आ जाएंगे, तुम अपना ध्यान रखना. मैं ने हरि से कह दिया है कि वह तुम्हारे पास रहेगा.’

दादी मां ने कुछ जवाब नहीं दिया. उन की निगाहें तो बंटी पर लगी थीं, जो जाते वक्त उन से सट कर खड़ा हो गया था. पलकों से आंसू छलकने को थे. उन्होंने बंटी का हाथ पकड़ कर उसे गाड़ी में बैठा दिया. बंटी ने दादी की ओर देख कर नन्ही हथेली से अपने आंसू पोंछे और दादी ने अपने आंसू अपनी पलकों में समेट लिए और कुछ पलों के लिए मुंह फेर लिया.

गाड़ी चल पड़ी. शालिनी और बंटी हाथ हिला रहे थे. जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए, दादी मां देखती रहीं.

बंटी के जाने के बाद उस घर में फिर उन का मन नहीं लगा. शालिनी एवं मुकेश के आने पर उन्होंने अपना फैसला सुना दिया कि अब वह यहां नहीं रहेंगी. रुकने की कोई वजह ही नहीं थी. जिस के लिए वह आई थीं वही नहीं था, तो किस के लिए रुकतीं. उन के जाने का इंतजाम हो गया और वह चली गईं. शालिनी ने भी राहत की सांस ली.

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शालिनी के आफिस की मीटिंग सिंगापुर में थी. कंपनी की तरफ से कुछ लोगों का चुनाव किया गया. जिन्हें भेजा जाना था उन में शालिनी का भी नाम था. उस दिन वह बेहद खुश थी. यह बात वह मुकेश को बताना चाहती थी पर मुलाकात ही नहीं हो रही थी. मुकेश भी आजकल बेहद व्यस्त थे. रात में कब आते पता ही नहीं चलता. सुबह जब वह उठते तो शालिनी जा चुकी होती. एक सप्ताह ऐसे ही निकल गया. उस दिन रविवार था. दोनों एकसाथ सो कर उठे. चाय पीते वक्त शालिनी बोली, ‘मुकेश, हमारे आफिस से एक टूर सिंगापुर जा रहा है. उस में मेरा भी नाम है.’

मुकेश को अच्छा नहीं लगा. वह बोले, ‘शालिनी, तुम शायद भूल गई हो. बंटी के पेपर खत्म होने वाले हैं और हमें उसे लेने जाना है.’

‘बंटी को तुम ले आना. वह हरि के साथ रह लेगा. मैं इतना अच्छा मौका नहीं छोड़ सकती. अगर कंपनी को फायदा होता है तो समझो मेरा प्रमोशन पक्का है,’ कह कर वह उठ खड़ी हुई.

मुकेश अकेले ही गए और बंटी को ले आए पर बंटी के आने के पहले शालिनी जा चुकी थी. बंटी हरि के साथ अपना वक्त बिताता. उस दौरान मुकेश भी बहुत व्यस्त थे.

शाम को बहुत तेज बारिश हो रही थी. बंटी बरामदे में बौल खेल रहा था. हरि घर पर नहीं था. बारबार वह बौल में जोर से किक मारता, बौल बाहर जाती तो वह उठाने दौड़ पड़ता. जब तक हरि आया तब तक बंटी पूरा भीग चुका था. हरि को लगा कहीं बंटी बीमार न हो जाए तो फौरन ही उस के कपड़े बदलवा दिए. तब भी बंटी को जुकाम हो गया था. मुकेश जब आफिस से लौटै तो वह सो चुका था. दूसरे दिन बंटी को होस्टल जाना था. हरि ने उस की सारी तैयारी कर दी. वैसे भी हर बार यह काम उस के जिम्मे ही रहता था.

मुकेश बंटी को भेज कर लौटे तो काफी रात हो गई थी. वह बहुत थक गए क्योंकि बारिश के कारण रास्ता खराब हो गया था. दूसरे दिन आफिस जाने के समय उन के मोबाइल पर रिंग आई, ‘बंटी को कल से तेज बुखार है,’ बंटी के होस्टल से मैनेजर मि. राय का फोन था.

‘मैनेजर साहब, आप जानते हैं कि मैं कल रात को उसे छोड़ कर वापस आया हूं. इतनी जल्दी मैं दोबारा कैसे आ सकता हूं?’

‘जैसा आप ठीक समझें मि. मलहोत्रा, आप को सूचित करना हमारा फर्ज था. वैसे मैं ने डाक्टर को दिखा दिया है, उन्होंने दवा दे दी है. उसे वायरल फीवर है, 2-4 दिन में ठीक हो जाएगा.’

मुकेश के बिना पूछे ही बता कर फोन काट दिया. वायरल फीवर होने की बात सुन उन्हें राहत मिल गई थी. इस में 2-3 दिन में आराम हो जाता है. आफिस जाने के पहले होस्टल के मैनेजर के नाम एक चेक भेज दिया.

जैसेजैसे बंटी बड़ा होता गया उस का घर आना धीरेधीरे कम होता गया था. इस बार आया तो मोबाइल का टूथ इयर पीस पूरे समय कान में लगाए रहता या कंप्यूटर के आगे बैठा घंटों चैटिंग करता रहता. मुकेश और शालिनी के होने न होने का उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. अपने में ही मस्त रहता. जब जितने पैसे की जरूरत होती अपने मम्मीपापा को बता देता. उसे पैसे मिल जाते.

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स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही उच्च शिक्षा के लिए बंटी ने आस्ट्रेलिया जाने का फैसला किया. 4 साल बाद वह वहीं नौकरी भी करने लगा. मुकेश शालिनी का बहुत मन था कि नौकरी ज्वाइन करने से पहले एक बार वह इंडिया आ जाता पर वह नहीं आया. हां, यह जरूर कहता था कि मैं आप लोगों को यहां बुलाना चाहता हूं. कुछ दिन यहां रहना, बहुत मजा आएगा.

अपने ही अतीत के बारे में सोचतेसोचते मुकेश कब सो गए उन्हें पता ही नहीं चला. शाम गहराने लगी ?आसमान में कालेकाले बादल छाने से मौसम कुछ अच्छा था, सो शालिनी ने बाहर बरामदे में नौकर से चेयर लगवा ली थी. फिर पुराने अलबम उठा कर ले आई और खोलखोल कर मुकेश को दिखाने लगी. नौकरी में थे तो कभी इतनी फुरसत ही नहीं मिली कि बैठ कर फोटो देखते.

अपने विवाह की तसवीरें, नन्हे बंटी की तस्वीरें देखतेदेखते बहुत देर हो गई तो दोनों भीतर आ गए. नौकर ने पूछा, ‘साहब, खाना लगा दूं?’ तो मुकेश बोले, ‘बंटी का फोन आने वाला है. उस से बात करने के बाद हम खाना खाएंगे.’ इस के बाद तो देर तक दोनों बंटी के फोन का इंतजार करते रहे पर फोन नहीं आया. तभी शालिनी को याद आया कि हो सकता है कि बेटे ने मेल किया हो. बहुत दिन से चैक नहीं किया. मेल बाक्स में गई तो देखा बंटी का छोटा सा नोट था.’

‘‘हाय मौम, डैड, आई एम वेरी बिजी, सो आई एम नाट कमिंग, आई एम सेंडिंग यू द चेक.’’

बंटी का लैटर पढ़ कर शालिनी सन्न खड़ी रह गई थी. लगा, इतने दिनों से वह एक भ्रम में जी रही थी. भ्रम में जीवन जिया जा सकता है पर उस के टूटने का आघात झेलना कितना मुश्किल होता है यह आज महसूस हुआ.

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डाक्टर का सख्त निर्देश था कि ऐसी कोई भी बात नहीं होनी चाहिए जिस से मुकेश को सदमा पहुंचे. यह सोच कर फीकी सी हंसी उस के चेहरे पर आ गई. यही तो माडर्न युग की त्रासदी है. पहले संयुक्त परिवार होते थे, कई बच्चे होते थे. उन में से 1-2 पढ़ने या कमाने बाहर निकल भी गए तो घर खाली नहीं होता था. अकेलापन छू भी नहीं पाता था, पर एकल परिवार संस्कृति की वजह से आज जीवन संध्या व्यतीत करने वाले प्राय: हर परिवार के दरवाजे पर अकेलापन देखने को मिलता है.

कल तुम बिजी आज हम बिजी : भाग 1

चारों ओर पानी और गहन अंधकार फैला है. तभी पानी का तेज रेला आया और शालिनी का हाथ उन के हाथ से छूट गया. घबराहट से वह पसीनेपसीने हो गए. चीखने की कोशिश की पर आवाज जैसे गले में फंस गई थी, ऐसा महसूस कर के अपने सीने में उन्होंने तेज दबाव महसूस किया, फिर असहनीय दर्द, साथ ही नींद खुल गई. वह बुरी तरह से तड़फने लगे, बहुत भयंकर स्वप्न देखा था.

उन की हरकत से बगल में सोई शालिनी की नींद खुल गई. देखा तो सीने पर हाथ रखे मुकेश कराह रहे हैं. अपने पारिवारिक डाक्टर को शालिनी ने फोन लगाया. उस समय डाक्टर नर्सिंग होम में थे. वह बोले, ‘‘मुकेश को फौरन यहां ले आओ.’’

शालिनी ने बरामदे में सोए हरि को जोर से पुकारा. मालकिन की घबराई हुई आवाज सुन कर वह भागाभागा आया.

‘‘हरि, तुम जल्दी से गाड़ी निकालो, मैं साहब को ले कर आती हूं,’’ कह कर शालिनी मुकेश को उठाने की कोशिश में लगी. समय की गंभीरता समझ हरि जैसे आया था उन्हीं पैरों से वापस लौट कर चला गया और गाड़ी निकालने लगा.

डा. खन्ना ने मुकेश को आई.सी.यू. में एडमिट कर लिया. पूरे स्टाफ में हलचल मच गई. तत्काल सारी चिकित्सा सुविधाएं मिल गईं. पास खड़ी शालिनी का घबराहट के कारण बुरा हाल था, काफी देर बाद स्थिति काबू में आई. मुकेश खतरे से बाहर हैं, यह जान कर शालिनी ने राहत की सांस ली. 4 दिन अस्पताल में रहने के बाद डिस्चार्ज के समय डाक्टर ने शालिनी को समझाते हुए कहा, ‘‘मुकेश को माइनर अटैक आया था. दूसरा झटका जानलेवा सिद्ध हो सकता है इसलिए भविष्य में बहुत सावधानी रखने की जरूरत है.’’

घर आ कर भी मुकेश आंखें बंद किए शांत बैठे रहे. शालिनी ने गौर से उन की ओर देखा. इन 4 दिनों में वह कितने झटक गए हैं, जैसे महीनों से बीमार रहे हों. डाक्टर की सलाह के मुताबिक चलना बेहद जरूरी है.

नहा कर शालिनी सीधे रसोई में आ कर नाश्ता तैयार करने लगी. बहुत दिनों के बाद आज वह रसोई में आई थी. हरि को आवाज दी और उस की मदद से नाश्ता तैयार करने लगी. कई वर्षों से हरि इस घर में था और घर के सारे काम वही संभालता था. उस की मदद के बिना घर का एक पत्ता भी नहीं हिलता था. शालिनी और मुकेश प्राय: हर काम के लिए उस पर आश्रित थे.

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नाश्ता ले कर शालिनी मुकेश के पास आ गई. पलंग के सिरहाने तकिए का सहारा ले कर वह आंखें बंद कर बैठे थे. शालिनी ने मेज पर नाश्ता रखा तो आहट से उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बोले, ‘‘शालिनी, आज मेरा बंटी से बात करने का बहुत मन कर रहा है.’’

‘‘मुकेश, मैं कई बार कोशिश कर चुकी पर फोन लगता ही नहीं है. वैसे मुझे लगता है कि वह खुद ही फोन करेगा. मैं ने उसे आने को कहा है. हो सकता है आने की सोच रहा हो,’’ दलिया में चीनी डालते हुए शालिनी ने कहा तो बंटी के आने की कल्पना से ही दोनों खुश हो गए.

बंटी को आस्ट्रेलिया में रहते 4 साल हो गए हैं. जब से वह गया उस का आना ही नहीं हुआ, पहले पढ़ाई के कारण और उस के बाद नौकरी के कारण. मुकेश की तबीयत के बारे में तो उसी दिन शालिनी ने अस्पताल ले जाते वक्त बता दिया था. दोनों को उम्मीद थी कि अब आए बिना कैसे रहेगा.

नैपकिन मुकेश की गोद में डाल कर शालिनी ने दलिया का कटोरा हाथ में पकड़ाया तो उन्होंने बच्चे की तरह बुरा सा मुंह बनाया. शालिनी बोली, ‘‘दवाइयों के कारण तुम्हारे मुंह का स्वाद बिगड़ गया है पर दवाइयां खानी हैं तो नाश्ता करना पडे़गा,’’ और इसी के साथ चम्मच से उन्हें खुद खिलाने लगी.

मुकेश नाश्ता कर दवा ले कर सो गए तो शालिनी उन के पास बैठेबैठे अतीत की गलियों में खो गई. उसे लगा कि मुकेश की इस हालत के लिए बहुत कुछ दोष खुद उस का ही था.

उसे किचन में जाना बिलकुल पसंद नहीं था. बहुत मजबूरी होती तभी वह किचन में कदम रखती. कभी मुकेश किसी खास खाने की फरमाइश करते तो वह कहती, ‘हम जैसे लोगों की सुविधा के लिए ही तो बडे़ होटल खुल रहे हैं, जिन के पास समय की कमी है, होटल में आर्डर दो और खाना हाजिर.’ इस से एक तो पसंद का खाना मिल जाता, दूसरे, किचन में सामान नहीं फैलता. ड्राइंगरूम में बैठ कर खाना खा लो, उस के बाद कचरा सीधे डस्टबिन में.

मुकेश एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी से रिटायर  हुए थे. अपनी मेहनत से वह कंपनी में बडे़ ओहदे तक पहुंचे थे. आज उन के पास वह सबकुछ था जिस की कामना कर उन्होंने नौकरी शुरू की थी. अच्छा बैंक बैलेंस, बडे़ शहर में खुद का बड़ा सा बंगला, कदम से कदम मिला कर चलने वाली पत्नी, विदेश में नौकरी कर रहा बेटा…सबकुछ तो था, पर पता नहीं क्यों इतना सब होते हुए भी उन की जिंदगी में एक सूनापन अपनी जगह बनाता जा रहा है.

नौकरी में थे तो व्यस्तता की वजह से सामाजिक संबंध बनाने की न कभी जरूरत महसूस हुई और न कभी समय मिला. कभीकभी मन में विचार आते, इस से अच्छी जिंदगी तो पिताजी की थी. जब तक वह जिंदा रहे लोगों की महफिलें घर में सजी रहीं.

मुकेश के पिता निखिलेशजी बहुत बडे़ सामाजिक कार्यकर्त्ता और जनप्रतिनिधि थे. खानदानी दौलत के साथसाथ ईमानदारी की दौलत भी उन्हें विरासत में मिली थी. समाज में मानसम्मान भी बहुत था. मां लता सरल सहज स्वभाव की विदुषी महिला थीं. छोटा भाई दिनेश कालिज की पढ़ाई के साथसाथ पिता के नक्शेकदम पर चल कर राजनीति की दुनिया में प्रवेश कर चुका था.

मुकेश राजनीति की दुनिया से सैकड़ों कदम दूर रह कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उसी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने में लगे थे. परिवार से दूर रह कर उन की शिक्षा हुई थी. फिर दिल्ली में ही एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में नौकरी शुरू कर अपने कैरियर की ऊंचाई पाने के लिए जीजान से जुट गए.

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विवाह की उम्र हुई तो मातापिता ने विवाह के लिए जोर डालना शुरू कर दिया. मुकेश का सोचना था कि अगर मैं ने परिवार वालों की इच्छा से शादी की तो जिंदगी की वे ऊंचाइयां हासिल नहीं कर सकूंगा, जिन की चाहत है. निखिलजी और लता ये बात जानते थे इसलिए उसे अपनी पसंद की लड़की से शादी करने की छूट मिल गई.

मुकेश ने अपने दोस्त विनोद से इस मामले में राय ली तो सब से पहले उस ने सवाल किया कि क्या तुम ने कोई लड़की पसंद की है? मुकेश ने भोलेपन से नहीं में जवाब दिया तो वह खिलखिला कर हंस पड़ा और बोला, ‘लगता है यह काम भी मुझे ही करना पडे़गा.’

दूसरे दिन विनोद ने मुकेश को अपने आफिस बुलाया. लंच में वह वहां पहुंच गया. पहुंचते ही विनोद ने उस का परिचय अपने नजदीक खड़ी शालिनी से कराया. गोरीछरहरी काया की स्वामिनी शालिनी पहली नजर में  मुकेश को भा गई. उसे लगा, जिस लड़की की उसे वर्षों से तलाश थी वह यही है. विनोद उस के परिवार वालों को अच्छी तरह से जानता था. उस ने मध्यस्थता का काम कर दोनों परिवारों को मिला कर विवाह तय करवा दिया.

विवाह के पहले शालिनी की मां के मन में मुकेश के परिवार को ले कर एक दुविधा थी कि जहां पूरा परिवार परंपरावादी है वहां आधुनिक सुखसुविधाओं में पली उन की बेटी शालिनी निभा पाएगी या नहीं, पर मुकेश से मिल कर उन की सारी शंकाएं मिट गईं. मुकेश पढ़ाई के सिलसिले से प्राय: घर से बाहर ही रहे थे. महत्त्वाकांक्षी विचारों वाले खूबसूरत व्यक्तित्व के धनी मुकेश ने उन्हें बहुत प्रभावित किया. उन्हें वह हर दृष्टि से शालिनी के अनुरूप लगे. धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया. घर में पहली शादी होने की वजह से बहुत मेहमान जमा हुए थे. अखिलेशजी ने सभी को विशेष आग्रह कर के बुलाया था. कितने दिनों के बाद घर में खुशी का मौका आया तो सभी बेहद खुश थे.

दूर के रिश्तेदारों की विदाई होने के बाद अब केवल खास मेहमान बचे थे. विवाह के 5वें दिन सुबहसुबह लता नाश्ते की व्यवस्था करने किचन में गईं तो देख कर आश्चर्य में पड़ गईं. उन्होंने देखा कि नहाधो कर तैयार नई बहू गैस के पास खड़ी थी. नवेली दुलहन इस समय यहां क्या कर रही है और कपडे़ भी इस तरह के पहने हैं जैसे कहीं जा रही हो. उन्होंने पूछा, ‘तुम यहां क्या कर रही हो, बहू? अभी तो तुम्हारा रसोई प्रवेश का दस्तूर भी नहीं हुआ. रामू से कह देतीं, वह नाश्ता तैयार कर देता.’

‘मैं आज आफिस जा रही हूं,’ शालिनी की आवाज में कुछ रुखाई थी.

‘पर आज से ही, अभी तो घर मेें मेहमान हैं, वे सब क्या कहेंगे,’ लता ने समझाने का प्रयास किया.

‘मैं घर में बोर हो जाती हूं, मांजी, फिर आफिस में जरूरी मीटिंग भी है, इसलिए मेरा जाना जरूरी है,’ कहते हुए अपना सैंडविच और काफी का मग उठा कर शालिनी वहां से चली गई.

अखिलेशजी को पता चला तो उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस समय तो वह चुप रहे पर शाम को उन्होंने शालिनी को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया तो वह बोली, ‘पापा, मैं ने मुकेश के साथ शादी इस शर्त पर की थी कि बाद में नौकरी नहीं छोडूंगी.’

‘मैं नौकरी करने के लिए मना नहीं कर रहा हूं पर इस घर के कुछ नियमकानून हैं और उन का पालन करना सभी सदस्यों के लिए जरूरी है,’ उन्होंने कुछ कठोरता से कहा तो शालिनी वहां से चली गई.

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चंद दिनों में ही उन लोगों को पता चल गया था कि बहू अपनी मनमर्जी से चलने वाली आजाद  खयालों की लड़की है. किसी भी तरह की रोकटोक उसे पसंद नहीं है और यहां का माहौल उसे रास नहीं आएगा. जल्दी ही शालिनी के पैर भारी हो गए तो वह और भी परेशान हो गई. वह कुछ दिन के लिए मायके आ गई. अपनी गर्भावस्था के ज्यादातर दिन उस ने वहीं गुजारे. डिलीवरी होने के बाद बच्चे को ले कर शालिनी ससुराल आई तो पहला पोता होने की वजह से कई दिन तक खुशियां मनाई गईं.

उन्हीं दिनों मुकेश का ट्रांसफर चंडीगढ़ हो गया तो शालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने अपना ट्रांसफर भी चंडीगढ़ करवा लिया और पति के साथ आ गई. दादादादी की पोता खिलाने की साध अधूरी ही रह गई…पर क्या करते.

शक की बीमारी और पति पत्नी!

पति पत्नी के बीच जब शक की सुई घूमने लगती है तो एक नई कहानी लिख जाती है जो अपराध की भी होती है और तलाक की भी सवाल है, पति और पत्नी में से कौन कितना संवेदनशील है, समझदार है. अगर इसमें चूक हुई तो समझो अपराध घटित हुआ. जाने कितने परिवार पति-पत्नी की जोड़ियां इस शक की सुई के चलते चलते खत्म हो गए.

प्रथम घटना-

राजधानी रायपुर में अशोका रत्न वीआईपी कॉलोनी है. जहां एक शख्स ने अपनी पत्नी की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसे शक हो गया था कि पत्नी का संबंध किसी और से है हत्या के जुर्म में पति अंततः जेल चल गया.

दूसरी घटना-

न्यायाधानी कही जाने वाले बिलासपुर के जबड़ापारा में पति-पत्नी का झगड़ा शक की सुई कुछ इस तरह भूमि की पति ने पत्नी को तलाक दे दिया.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक महिला ने अपने पति को इसलिए जहर देकर मार डाला कि उसे शक था कि वह उसे छोड़ देगा उसका जीवन तबाह हो जाएगा. पकड़े जाने पर पत्नी जेल के सीखचों में भेज दी गई.

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शक की बीमारी और हत्या

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला जशपुर में पत्नी द्वारा अपने पति की हत्या कर देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है. दरअसल, आरोपी महिला का पति रोज शराब पीता था और उसे शक की ‘बीमारी’ थी. वह अपनी पत्नी के चरित्र पर बेवजह संदेश किया करता था. मामला जशुपर जिले के थाना बगीचा चौकी पंडरा पाठ के ग्राम गायबूडा का है.

सनद रहे कि राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले कोरवा जनजाति की मुन्नीबाई पति किशुन राम कोरवा उम्र 33 वर्ष ने अपने पति के संदिग्ध व्यवहार से मानसिक रूप से परेशान होकर आवेश में उसके सिर पर वार कर घायल कर दिया. जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया था.किशनु राम को बगीचा अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया, लेकिन उसकी मृत्यु हो गई.जिस पर थाना बगीचा में मुन्नीबाई के खिलाफ अपराध कायम कर लिया गया. यहां एक बड़ा ट्विस्ट यह आया की आरोपी महिला वारदात को अंजाम देने के बाद फरार हो गई. मुखबिर की सूचना पर उसे अंततः जेलपे पाठ चुंदा पाठ से गिरफ्तार किया गया.

आरोपी महिला ने पूछताछ में गुनाह कबूल कर लिया. उसने पुलिस को अपने इकबालिया बयान में बताया कि उसने अपने पति के सिर पर लोहे के पाइप से वार किया था. उसे न्यायालय में पेश किया गया जहां से उसे मामले की गंभीरता को देखते हुए जेल भेज दिया गया.

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पति पत्नी और शक का मनोविज्ञान

दरअसल, पति-पत्नी का बंधन आपसी समझ और संवेदना के साथ विश्वास से जुड़ा होता है. इसमें से एक भी तार कमजोर हुआ नहीं कि पति पत्नी के रास्ते अलग हो जाते हैं. वैवाहिक जीवन में पति पत्नी दोनों का दायित्व होता है कि एक दूसरे की भावनाओं को ध्यान रखते हुए सम्मान करते हुए आगे बढ़े.
जी.आर. पंजवानी के मुताबिक जाने कितने परिवार सिर्फ इसलिए टूट जाते हैं, तलाक के कगार तक पहुंच जाते हैं अथवा किसी अपराधिक संजाल में उलझ जाते हैं क्योंकि शक की बीमारी उन्हें बरबाद कर चुकी होती है. एक चिकित्सक होने के नाते सलाह यही है कि अच्छा हो अगर किसी एक पक्ष को शक हो तो दूसरे पक्ष की हकीकत को समझें और सिर्फ शक की बिनाह पर कोई ऐसा कदम ना उठाएं कि बाद में पछताना पड़े.

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.के. शुक्ला के अनुसार मुताबिक जाने कितने मामले पति पत्नी के शक के आधार पर खत्म हो जाते हैं मेरे वकालत के लंबे कार्यकाल में अक्सर ऐसे मामले आए हैं जिसमें प्रयास किया जाता है कि आपसी समझाइश के साथ मामले को खत्म किया जा सके मगर शक की सुई कई बार इतना दिमाग के भीतर घुस चुकी होती है कि तलाक के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाता.
पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा के मुताबिक अक्सर शक की सुई के कारण अपराध घटित हो जाते हैं. हत्या हो जाती है. इसमें अक्सर पुरुष पक्ष ही दोषी देखा गया है. जिसमें पुलिस की यही समझाइश रहती है कि ठंडे दिमाग से एक दूसरे को समझे और जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाएं.

जीजासाली का खूनी इश्क : भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

9साल पहले जब अजय साहू उर्फ मोहित ने सरिता से विवाह किया था, तब सरिता से छोटी साली कविता 15 साल की थी. इस के 3 साल बाद 18 साल की उम्र में वह भरीपूरी युवती लगने लगी थी.

ससुराल में अजय के सासससुर के अलावा उस की 2 सालियां कविता और सविता थीं, कोई साला नहीं था. सविता काफी छोटी थी, इसलिए अजय को खिलानेपिलाने व उस की सुखसुविधा का खयाल रखने की जिम्मेदारी बड़ी साली कविता की थी. कविता भी अपने जीजा का हुक्म मानने के लिए एक पैर पर खड़ी रहती थी.

जीजा की जरूरतों का खयाल रखना साली का कर्त्तव्य होता है, इस में कोई नई बात नहीं है. अजय भी इन बातों को सामान्य रूप से लेता था. लेकिन एक दिन अचानक ही वह कविता के अद्भुत सौंदर्य की तेज रोशनी में चौंधिया गया.

एक दिन जब अजय ससुराल पहुंचा तो कविता किसी परिचित के यहां मांगलिक समारोह में जाने के लिए तैयार हो रही थी. कविता ने सुर्ख लाल जोड़ा पहन रखा था और अपने बाल खुले छोड़ रखे थे. कलाई में चूडि़यां और चेहरे पर सादगी भरा शृंगार. आंखों में काजल की रेखा और होंठों पर हलकी सी लिपस्टिक. उसे देख कर अजय की नजरें ऐसी चिपकीं कि हटने को ही तैयार नहीं हुईं.

कविता ने अजय को मीठा और पानी ला कर दिया, फिर चाय बना कर पिलाई. कुछ देर उस के पास बैठ कर अपनी बहन की खैरियत पूछी. फिर उस के पास से उठते हुए बोली, ‘‘जीजाजी, आप आराम करो, मैं जल्दी ही लौट आऊंगी.’’

कविता चली गई और वह देखता रह गया. अजय बैड पर लेट गया और कविता के बारे में सोचने लगा कि इतनी सुंदर तो सरिता तब भी नहीं लगी थी, जब दुलहन बन कर उस के घर आई थी.

अजय ने अपने मन से कविता का खयाल निकालने की बहुत कोशिश की, पर कामयाब नहीं हो सका. कविता के सौंदर्य की तेज रोशनी से उस ने जितना दूर जाना चाहा, उतना ही मस्तिष्क से अंधा होता गया.

अजय सोचने लगा कि मेरी शादी भले ही सरिता से हो गई पर कविता भी तो उस की साली ही है. साली यानी आधी घरवाली.

अजय के मन में पाप समाया तो वह कविता को पाने की जुगत में लग गया.

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उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के गांव पूरब थोक में राजेश चंद्र अपने परिवार के साथ रहते थे. वह खेतीबाड़ी का काम करते थे. परिवार में पत्नी उषा और 3 बेटियां सरिता, कविता और सविता थीं. बेटा न होने का राजेश को कतई गम नहीं था. उन्होंने तीनों बेटियों की बेटों से बढ़ कर परवरिश की थी. सरिता ने इंटर की पढ़ाई पूरी कर ली थी.

कौशांबी के ही कुम्हियवा गांव में रामहित साहू रहते थे. वह भी खेतीकिसानी करते थे. उन के 3 बेटे थे, जिस में अजय उर्फ मोहित सब से बड़ा था. अजय ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई करने के बाद अपना खुद का काम करने का निर्णय लिया.

काफी सोचविचार के बाद उस ने डीजे संचालन का काम शुरू किया. उस का यह काम अच्छा चल गया. अपने इसी काम के दौरान एक वैवाहिक समारोह में उस की मुलाकात सरिता से हुई. सरिता उस समारोह में काफी सजधज कर आई थी. इस वजह से वह काफी खूबसूरत दिख रही थी.

डीजे पर डांस करने के दौरान सरिता ने ‘डीजे वाले बाबू मेरा गाना बजा दो’ गाना चलाने की मांग की. अजय औपरेटर के पास ही खड़ा था. उस की पीठ सरिता की तरफ थी. मधुर आवाज सुनते ही अजय पलटा तो पलटते ही सरिता को देखा तो देखता ही रह गया.

अजय काफी स्मार्ट था. उसे अपनी तरफ देखते पा कर सरिता भी लजा गई और बोली, ‘‘सौरी, मैं आप को डीजे वाला समझ बैठी. इसलिए अपनी पसंद का गाना चलाने के लिए कह दिया.’’

अजय उस के भोलेपन पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आप से कोई गलती नहीं हुई, मैं डीजे वाला बाबू ही हूं यानी इस डीजे का मालिक.’’

‘‘ओह…तो यह बात है, तो मेरा पसंदीदा गाना लगवा दें, जिस से मैं डांस कर सकूं.’’ सरिता ने तिरछी नजरों से अजय को निहारते हुए कहा.

अजय ने औपरेटर को बोल कर ‘डीजे वाले बाबू…’ गाना लगवा दिया. गाना भारीभरकम स्पीकरों पर गूंजने लगा तो सरिता अपनी सहेलियों के साथ डांस करने लगी. वह डांस कर जरूर रही थी, लेकिन उस का सारा ध्यान अजय पर ही था. अजय भी उसे देखते हुए मुसकरा रहा था.

वह इशारे से बारबार सरिता की तारीफ भी कर रहा था. उस की तारीफ पा कर सरिता लजा कर दूसरी ओर देखने लगती थी.

डांस खत्म होने के बाद भी दोनों वहां से हटने को तैयार नहीं थे. उन की निगाहें मिलने के बाद अब उन के दिल मिलने को तड़प रहे थे. वह तड़प उन की निगाहों में बखूबी नजर आ रही थी.

आखिर अजय ने उसे इशारे से अपने पीछेपीछे आने को कहा तो सरिता उस का इशारा समझ कर दिल के हाथों मजबूर हो कर उस के पीछेपीछे चली गई.

अजय एकांत में सुनसान जगह पर खड़ा हुआ तो शरमातेसकुचाते सरिता भी वहां पहुंच गई और पूछने लगी, ‘‘आप ने मुझे इशारे से अपने पीछे आने को क्यों कहा?’’

‘‘क्यों…क्या तुम्हें वास्तव में नहीं पता?’’ अजय उस की आंखों में देखते हुए बोला, ‘‘जरा अपने दिल पर हाथ रख कर अपनी धड़कनों को सुनो, जवाब मिल जाएगा.’’

‘‘सब दिल का ही तो मामला है, ये ऐसा मजबूर कर देता है कि इंसान अपनी सुधबुध खो बैठता है. और इंसान वही करने लगता है जो यह चाहता है. मैं भी दिल के हाथों मजबूर हो कर यहां आ गई हूं.’’ सरिता अपने दिल की व्यथा उजागर करती हुई बोली.

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‘‘ये दिल ही तो है जब इस के अपने मन का मीत मिल जाता है तो प्यार की घंटी बजा कर आगाह कर देता है. देखो न, जब तुम्हारे दिल को मेरे दिल ने पुकारा तो तुम्हारा दिल मेरे पीछेपीछे खिंचा चला आया. कहने को हम अजनबी हैं, लेकिन हमारे दिलों ने हमारे बीच प्यार के रिश्ते की नींव रख दी है, जिस पर हमें मिल कर प्यार की इमारत खड़ी करनी है. अगर मेरा प्यार मेरा साथ मंजूर हो तो मेरे पास आ कर गले लग जाओ.’’ कहते हुए अजय ने बड़ी चाहत भरी नजरों से देखा तो सरिता उस की ओर खिंची चली गई और उस के गले लग गई.

यह ऐसा प्यार था, जिस ने बिना एकदूसरे के बारे में जाने उन के दिलों को मिला दिया था. उस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे के बारे में जाना, खूब ढेर सारी बातें कीं. मोबाइल नंबर एकदूसरे को दिए. फिर मिलने का वादा कर के जुदा हो गए.

उस दिन के बाद उन में बराबर बातें और मुलाकातें होने लगीं. करीब 9 साल पहले दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया. सरिता के घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था लेकिन अजय के घर वाले इस प्रेम विवाह के खिलाफ थे. अजय विवाह करने के बाद कौशांबी के सिराथू कस्बे में सैनी रोड पर किराए का कमरा ले कर सरिता के साथ रहने लगा. अजय अपनी जिंदगी से काफी खुश था.

सरिता की छोटी बहन कविता की खूबसूरती अजय का मन लुभाती तो थी, पर उस की नजरें बेईमान नहीं थीं. लेकिन उस दिन कविता को सुर्ख लाल जोड़े में सजासंवरा देखा तो वह उसे दुलहन सी हसीन लगी. बस, जीजा के मन में साली के लिए फितूर समा गया.

कविता के बारे में सोचते हुए अजय सो गया और सपने में भी कविता उस का चैन हरती रही. सुखद सपनों में खोया अजय न जाने कब तक सोया रहता कि उस की सास उषा ने आ कर जगा दिया, ‘‘अजय बेटा उठो, शाम हो गई है.’’

अजय हड़बड़ा कर उठ बैठा, ‘‘मैं दोपहर को सोया था और अब शाम ढल रही है. मम्मी, आप ने मुझे जगाया क्यों नहीं.’’

‘‘तुम्हारे आराम में विघ्न न पड़े, इसलिए मैं ने नहीं जगाया.’’ उषा बोली, ‘‘तुम उठ कर हाथमुंह धो लो, तब तक कविता चाय बना कर ले आएगी.’’

जीजासाली का खूनी इश्क : भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

अजय ने बाथरूम में जा कर हाथमुंह धोया और तौलिए से पोंछने के बाद कुरसी पर आ कर बैठ गया. सामने किचन में कविता खड़ी चाय बना रही थी.

अब उस के शरीर पर लाल जोड़े की जगह सफेद सलवारसूट था. कलाई में चूडि़यां भी नहीं थीं. उस ने चेहरा पानी से जरूर धो लिया था, पर मेकअप की मौजूदगी अब भी नुमायां हो रही थी.

आंखें मिलते ही कविता मुसकराई, ‘‘जीजाजी, खूब मजे से सोए.’’

अजय ने मन ही मन में जवाब दिया, ‘सपने में बिजली गिरा कर मासूम बन रही हो.’ लेकिन जुबान से बोला, ‘‘मजा ले कर सो रहा था या कजा से गुजर रहा था, बाद में बताऊंगा. पहले तुम बताओ, कब आईं?’’

‘‘थोड़ी ही देर में आ गई थी. घर आ कर देखा तो आप सो गए थे. इसलिए मैं भी घर के कामों मे लग गई थी.’’ कविता ने मुसकरा कर कहा और उस के सामने टेबल पर चाय का कप रख दिया. फिर उसी के पास बैठ गई.

अजय को उस समय वहां अपनी सास की मौजूदगी खल रही थी. कविता अकेली होती तो वह उसे रिझाने का प्रयास करता. अजय की मजबूरी यह थी कि वह न सास को वहां से जाने को कह सकता था और न कविता का हाथ पकड़ कर अकेले में बात करने के लिए ले जा सकता था.

रात को खाना खाने के बाद अजय को कविता के कमरे में सोने के लिए पहुंचा दिया गया. और कविता सविता के कमरे में उस के साथ सो गई.

अगले दिन सुबह होने पर अजय के सासससुर खेतों पर चले गए. सविता स्कूल चली गई. इस से अजय को कविता से बात करने का मौका मिल गया. उस समय कविता नहाने जा रही थी. अजय ने उस से पूछा, ‘‘कविता, नहाने के बाद तुम कौन से कपड़े पहनोगी?’’

कविता ने सहजता से उत्तर दिया, ‘‘मुझे कहीं जाना तो है नहीं, इसलिए घर में जो पहनती हूं, वही पहन लूंगी.’’

‘‘घर में पहनने वाले नहीं,’’ अजय ने मन की परतें उस के सामने खोलनी शुरू कर दीं, ‘‘तुम वही लाल जोड़ा पहनो, जो तुम ने कल पहना था.’’

‘‘वह रोज पहनने के लिए थोड़े ही है,’’ कविता मुसकरा कर बोली,‘‘ वह लाल जोड़ा विशेष अवसरों पर पहनने के लिए बनवाया है. कहीं विशेष प्रोग्राम होता है, तभी पहनती हूं.’’

अजय कविता के सामने आ कर खड़ा हो गया और उस की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘तुम मुझे चाहती हो न?’’

कविता जीजा के मन का मैल नहीं समझ सकी. उस ने सहजता से जवाब दिया, ‘‘हां, चाहती हूं.’’

‘‘अगर तुम मुझे चाहती होगी तो वही लाल जोड़ा पहनोगी.’’

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‘‘जीजाजी, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि तुम लाल जोड़े को पहनने की जिद क्यों कर रहे हो?’’ वह बोली.

‘‘इसलिए कि उसे पहन कर तुम दुलहन जैसी लगती हो.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि आप लोग मेरा विवाह कर के मुझे इस घर से निकालने पर तुले हैं.’’ कविता हंसी, ‘‘अब तो मैं उसे हरगिज नहीं पहनने वाली.’’ कह कर कविता तेजी से बाथरूम की ओर बढ़ गई.

लड़की ‘न’ कहे तो उस की ‘हां’ समझना चाहिए, सोच कर अजय के होंठों पर मुसकान फैल गई. अजय पहले ही तैयार हो चुका था. इसलिए वह बैठ कर अखबार पढ़ने लगा.

कुछ देर बाद जब कविता नहा कर तैयार हुई तो मन ही मन खयाली पुलाव पका रहे अजय ने देखा तो जैसे उस के अरमान बिखर कर रह गए. कविता ने लाल जोड़ा नहीं पहना था. उस ने मेहंदी कलर का सलवारसूट पहन रखा था.

उस सलवार सूट में भी उस का सौंदर्य कयामत ढा रहा था. भीगे बालों से टपकती बूंदें उस के चेहरे पर आ कर ठहर गई थी, जिस से भीगाभीगा उस का सौंदर्य दिल को लुभाने वाला था. अजय बेकाबू हो उठा और उस ने कविता को बांहों में भर लिया और उस के गालों को चूम लिया.

कविता स्तब्ध रह गई. जीजा ने यह क्या गजब कर डाला. किसी तरह उस ने स्वयं को अजय के चंगुल से आजाद किया और कमरे से निकल भागी. तभी सास भी घर लौट आई.

जीजा की हरकत से कविता का दिल खिल गया. वह सोचने लगी कि मैं इतनी गजब की सुंदर हूं कि जीजा को अपनी बीवी फीकी लगती है. जबकि उन्होंने दीदी से प्रेम विवाह किया है.

दोपहर को अजय को भोजन कराने के बाद उषा किसी काम से बाजार चली गई. अजय कविता के कमरे में गया और उस के पास बैठते हुए बोला, ‘‘कविता जब से तुम को लाल जोड़े में देखा है, दिल वश में नहीं है. कुछ करो कविता, वरना मैं तुम्हारे वियोग में तड़पतड़प कर मर जाऊंगा.’’

‘‘अब मैं क्या कर सकती हूं, आप की शादी तो सरिता दीदी से हो गई और वह भी आप ने लव मैरिज की है.’’

‘‘तुम पहले मिल जाती तो सरिता से बिलकुल शादी नहीं करता. लेकिन अब भी देर नहीं हुई है शादी टूटने में कितनी देर लगती है. तुम हां बोलो तो मैं सरिता को तलाक दे कर तुम से विवाह करने का जतन करूं.’’ अजय बेबाकी से बोला.

‘‘धत्त,’’ कविता हंसते हुए बैड से उठ खड़ी हुई, ‘‘जीजा, तुम पागल हो गए हो.’’

उस के बाद उस ने हाथ छुड़ाया और कमरे से जाने लगी तो अजय बेसब्र हो उठा और उस का हाथ पकड़ कर खींच कर बैड पर गिरा लिया. इस के बाद वह उसे पागलों की तरह चूमने लगा.

कविता के कुंवारे बदन को परपुरुष का कामुक स्पर्श मिला तो वह भी बहक गई. उस के बाद उन के बीच अनैतिक रिश्ता कायम हो गया. कविता को अपने जीजा के प्यार में गजब का न भूलने वाला आनंद मिला. इस के बाद जब तक अजय रहा, वह कविता के साथ मजे लेता रहा.

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संबंधों का यह सिलसिला चलता रहा. दूसरी ओर सरिता ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम तनु रखा गया. लेकिन अजय तो कविता के प्यार में पागल था. अब वह ससुराल के अधिक चक्कर लगाने लगा.

जीजासाली का खूनी इश्क : भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

ससुराल वालों का माथा ठनका. जब नजर रखी तो उन्होंने कविता के साथ अजय की खिचड़ी पकती देखी. इस से पहले कि कोई अनर्थ हो जाए राजेश चंद्र ने बेटी कविता का विवाह कौशांबी के चरवा गांव निवासी नीरज से कर दिया. यह 5 साल पहले की बात है.

विवाह का एक साल बीततेबीतते कविता भी एक बेटी की मां बन गई. अब वह कभीकभार ही मायके आ पाती थी. उस के आने पर अजय ससुराल पहुंच जाता था. दोनों की चाहत तन मिलने से कुछ समय के लिए पूरी हो जाती, लेकिन फिर वही पहले जैसा हाल हो जाता.

दोनों को अपने बीच की दूरी बहुत अखर रही थी. कविता पूरी तरह से अजय के प्यार में रंगी थी. इसलिए उस का ससुराल में मन नहीं लगता था. एक साल पहले वह ससुराल से मायके आई तो वापस लौट कर ससुराल नहीं गई.

अजय की खुशी का ठिकाना न रहा. वह पहले की भांति उस से मिलने जाने लगा. अजय की ससुराल वाले सब जान कर भी कुछ न कर पाते. वह चुपचाप तमाशा देखते रहे.

सरिता को भी अपने पति के अपनी बहन कविता से संबंध की जानकारी हो गई. इस के बाद अजय और सरिता में विवाद होने लगा. अजय एक बहन का पति था तो दूसरे का प्रेमी. वह दोनों के जीवन से खेल रहा था.

13 अक्तूबर को अजय इलैक्ट्रौनिक्स का सामान खरीदने के लिए सुबह प्रयागराज चला गया. शाम 6 बजे जब वह घर लौटा तो दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, धक्का देते ही खुल गया. जैसे ही वह अंदर पहुंचा तो कमरे में उस की पत्नी सरिता और 7 वर्षीय बेटी तनु की लाशें पड़ी थीं. यह देख कर वह चीखनेचिल्लाने लगा.

शोर सुन कर आसपास के लोग वहां आ गए. घटना की खबर मिलने पर क्षेत्र के विधायक शीतला प्रसाद पटेल भी वहां पहुंच गए. अजय के कमरे में उस की पत्नी व बेटी की लाशें देखने के बाद उन्होंने सैनी कोतवाली के इंसपेक्टर प्रदीप सिंह को घटना की सूचना दे दी.

इंसपेक्टर प्रदीप सिंह ने अपने उच्चाधिकारियों को दोहरे हत्याकांड की सूचना दे दी. फिर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने लाशों का निरीक्षण किया. सरिता की लाश कमरे में मेज के पास जमीन पर पड़ी थी. उस के गले को चाकू से रेता गया था. शरीर पर भी 4-5 घाव के निशान थे.

लाश के पास काफी खून पड़ा था, जो सूख चुका था. लाश अकड़ी हुई थी. दरवाजे के पास सरिता की बेटी तनु की लाश पड़ी थी. उस के गले पर दबाए जाने के निशान मौजूद थे.

तनु की लाश में काफी चींटियां लग गई थीं. निरीक्षण करने के बाद अनुमान लगाया गया कि दिन में किसी वक्त दोनों को मारा गया है. घर में किसी व्यक्ति द्वारा जबरन घुसने का कोई सबूत नहीं मिला. न ही आसपास पड़ोस में किसी ने घटना को अंजाम देने के समय किसी प्रकार का शोरशराबा सुना था. इस का मतलब यह कि हत्यारा कोई परिचित व्यक्ति है.

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इसी बीच एसपी अभिनंदन, एएसपी समर बहादुर सिंह और सीओ (सिराथू) श्यामकांत भी डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम के साथ पहुंच गए. फोरैंसिक टीम साक्ष्य जुटाने में लग गई.

उच्चाधिकारियों ने लाश व घटनास्थल का निरीक्षण किया. तत्पश्चात अजय साहू से पूछताछ की तो उस ने सुबह प्रयागराज जाने और शाम 6 बजे घर आने पर घटना का पता होने की बात बताई.

सीसीटीवी फुटेज देखी गई. लेकिन कोई संदेहास्पद व्यक्ति नहीं दिखा. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह को अजय पर ही शक था. उन्होंने अपना शक एसपी अभिनंदन को बताया. एसपी अभिनंदन की सोच भी वही थी. अजय ने बताया था कि वह दोपहर 12 बजे के करीब प्रयागराज गया था. उस के बाद ही लगभग 2-3 बजे घटना हुई होगी. लेकिन 3-4 घंटे में लाश अकड़ नहीं सकती.

ऐसा तभी होता है, जब घटना हुए 10-12 घंटे का समय हो जाए. यानी सुबह के समय तब अजय घर पर ही था. अजय ने ही हत्या कर के सारी कहानी गढ़ी है, इस का विश्वास हुआ तो अजय से और सख्ती से पूछताछ के लिए उसे थाने ले जाया गया. लेकिन इस से पहले दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया गया.

अजय के ससुर राजेश चंद्र और छोटी साली सविता आई तो इंसपेक्टर प्रदीप सिंह ने उन से पूछताछ की. राजेश चंद्र काफी दुखी थे. उन्होंने अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी. पूछताछ करने पर वह चुप ही रहे लेकिन सविता फट पड़ी. उस ने बताया कि कविता दीदी और जीजा का आपस में काफी लगाव था. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह का शक सही साबित हुआ.

इस के बाद अजय से थाने में सख्ती से उन्होंने पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और इस जुर्म में उस ने साली कविता के भी शामिल होने की बात स्वीकारी. दोनों ने ही मिल कर सरिता की हत्या की साजिश रची थी. इस के बाद कविता को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की गई.

पूछताछ में पता चला कि अजय और कविता एकदूसरे से विवाह कर के साथ रहना चाहते थे. सरिता उन के संबंधों का विरोध कर रही थी, वह उन के रास्ते में आ रही थी. इसलिए कविता और अजय ने मिल कर सरिता की हत्या की योजना बनाई. अजय ने कविता से बात करने के लिए दूसरा नंबर ले रखा था, उसी से बराबर कविता से बात करता था.

उसी नंबर से बात कर के उन्होंने हत्या का षडयंत्र रचा. 13 अक्तूबर की सुबह 6 बजे अजय ने घर में रखे सब्जी काटने वाले चाकू से नींद में सोई सरिता का गला काट दिया. सरिता चीख भी न सकी, जमीन पर गिर कर तड़पने लगी. अजय ने फिर उस के शरीर पर कई वार किए, जिस से सरिता की मौत हो गई.

अपने पिता के हाथों मां को मरता देख कर मासूम तनु जाग गई और डर की वजह से रोते हुए बाहर की तरफ भागने लगी. अजय ने दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही उसे पकड़ लिया और उस का सिर दीवार पर पटक दिया.

सिर में लगी चोट से तनु बेहोश हो गई. अजय ने फिर उस का गला घोंट कर उस की भी हत्या कर दी. अजय तनु को मारना नहीं चाहता था लेकिन भेद खुलने के डर से उसे बेटी की हत्या करनी पड़ी. उस ने हत्या के बाद कविता से मोबाइल पर बात की और दोनों की हत्या करने की बात बता दी.

इस के बाद वह बाजार गया और कई जगह जानबूझ कर गया, जिस से वह सीसीटीवी कैमरों में कैद में आ जाए. एक जगह उस ने समोसा खरीद कर भी खाया. इस के बाद वह प्रयागराज चला गया.

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वहां वह शाहगंज इलाके में कई उन इलैक्ट्रौनिक सामानों की दुकानों पर गया, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे. अपने प्रयागराज में होने के सबूत छोड़ कर शाम को वह कौशांबी लौट आया. यहां लौटने के बाद भी कुछ जगहों पर गया.

शाम 6 बजे वह कमरे पर पहुंचा और लाश देख कर शोर मचाने लगा. लेकिन काफी होशियारी के बाद भी वह कविता के साथ कानून के शिकंजे में फंस गया. इंसपेक्टर प्रदीप सिंह ने दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, वहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

ट्रस्ट एक प्रयास :भाग 3

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

‘‘बिलकुल, तभी तो तुम ने मुझ से कल की सारी बातें छिपाईं,’’ उन के दुखी स्वर से मैं और दुखी थी.

‘‘मैं आप को दुखी नहीं करना चाहती थी. बस, इसलिए मैं ने आप को कुछ नहीं बताया,’’ मैं रो पड़ी.

‘‘नैना, मैं पराया नहीं हूं, तुम्हारा अपना…’’ वह आगे नहीं बोल पाए. मैं उन के कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी थी.

कुछ ही दिन बाद…

‘‘नैना, तैयार रहना, आज कहीं खास जगह चलना है, ठीक 5 बजे,’’ कह कर आलोक ने फोन रख दिया. मैं ने घड़ी देखी तो 4 बज रहे थे.

मैं धीरेधीरे तैयार होने लगी. अपनी शक्ल शीशे में देखी तो चौंक गई. लग ही नहीं रहा था कि मेरा चेहरा है. गुलाबी रंगत गायब हो गई थी. आंखों के नीचे काले गड्ढे पड़ गए थे. कितने ही दिनों से खुद को शीशे में देखा ही नहीं था. सारा दिन भाइयों की बातें ध्यान में आती रहतीं. भाइयों का तो दुख था ही उस पर बाऊजी से मिल न पाने का गम भीतर ही भीतर दीमक की तरह मुझे खोखला करता जा रहा था.

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आलोक दुखी न हों इसलिए उन से कुछ न कह कर मैं अपना सारा दुख डायरी में लिखती जा रही थी. बचपन से ही मुझे डायरी लिखने का शौक था. पता नहीं अब शादी से पहले की डायरी किस कोने में पड़ी मेरी तरह जारजार आंसू बहाती होगी. शादी के बाद वह डायरी बाऊजी के पास ही रह गई थी.

‘‘आलोक, हम कहां जा रहे हैं?’’ मैं आलोक के साथ कार में बैठी हुई थी.

‘‘बस, नैना, कुछ देर और फिर सब पता चल जाएगा,’’ आलोक हंस कर बोले.

कार धीरेधीरे शहर से बाहर लेकिन एक खुली जगह पर जा रुकी. मैं हैरानपरेशान कार में बैठी रही. समझ नहीं पा रही थी कि आखिर आलोक चाहते क्या हैं. अभी इसी उधेड़बुन में थी कि सामने खड़ी कार से जिस व्यक्ति को उतरते देखा तो उन्हें देख कर मैं एकदम चौंक पड़ी. मुझ से रहा न गया और मैं भी कार से बाहर आ गई.

‘‘आओ, नैना बिटिया,’’ वर्मा चाचाजी बोले.

‘‘नमस्ते, चाचाजी, आप यहां?’’

‘‘हां, बेटी, अब तो यहां आना लगा ही रहेगा.’’

‘‘आलोक, प्लीज, क्या छिपा रहे हैं आप लोग मुझ से?’’

‘‘नैना, क्या छिपाने का हक सिर्फ तुम्हें ही है, मुझे नहीं.’’

‘‘आलोक, मैं ने आप से क्या छिपाया है?’’ मैं हैरान थी.

‘‘अपना दुख, अपने जज्बात, छिपाए या नहीं वह तो अलमारी में रखी तुम्हारी डायरी पढ़ ली वरना तुम्हारा चेहरा तो वैसे ही सारा हाल बता रहा है. तुम ने क्या सोचा, मुझे कुछ खबर नहीं है?’’

नजरें नीची किए मैं किसी अपराधी की तरह खड़ी रही लेकिन यह समझ अभी भी नहीं आया था कि यहां क्या यही सब कहने के लिए लाए हैं.

‘‘आलोक, बेटा, अब नैना को और परेशान मत करो और सचाई बता ही डालो.’’

‘‘नैना, यह जमीन का टुकड़ा, जहां हम खडे़ हैं, अब से तुम्हारा है.’’

‘‘लेकिन, आलोक, हमारे पास तो अच्छाखासा मकान है, फिर यह सब?’’

‘‘नैना, यह जमीन तुम्हारे बाऊजी ने दी है,’’ चाचाजी भावुक हो कर बोले और फिर बताते चले गए, ‘‘हरिश्चंद्र (बाऊजी) को तुम्हारे विवाह से बहुत पहले ही यह आभास होने लगा था कि बहुओं ने तुम्हें दिल से कभी स्वीकार नहीं किया. उन्होंने कई साल पहले यह प्लाट बुक किया था जिस की भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी. उन्होंने अपने प्लाट और फिक्स्ड डिपोजिट की नामिनी तुम्हें बनाया था. जब वह बीमार रहने लगे तो उन्होंने मुझे सब कागजात दे दिए और तुम्हें देने के लिए कहा. क्या पता था कि वह अचानक हमें यों छोड़ जाएंगे. मैं ने आलोक को वे सब कागजात, एक डायरी और तसवीरें, जो तुम्हारे बाऊजी ने तुम्हें देने को बोला था, क्रिया के बाद भिजवा दीं. आगे आलोक तुम्हें बताएगा.’’

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मैं ने प्रश्नसूचक नजरों से आलोक को देखा, ‘‘नैना, याद है जब तुम रजिस्ट्रार आफिस से लौटी थीं तो मैं ने एक पैकेट की बात की थी. लेकिन तुम ने ध्यान नहीं दिया तो उत्सुकतावश मैं ने खोल लिया था, जानती हो उस में क्या था, प्लाट के कागजात के अलावा… तुम्हारी शादी से पहले की डायरी…

‘‘मैं नहीं जानता था कि तुम बचपन से ही इतनी भावुक थीं. उस मेें तुम ने एक सपने का जिक्र किया था. बस, वही सपना पूरा करने का मैं ने एक छोटा सा प्रयास किया है.’’

आलोक और भी पता नहीं क्याक्या बताते चले गए. मेरी आंखों से आंसू बह निकले. लेकिन आज आंसू खुशी के थे, इस एहसास से भरे हुए थे कि मेरा वह सपना जो मैं ने बाऊजी की लिखी हुई एक कहानी ‘ट्रस्ट : एक छोटा सा प्रयास’ से संजोया था, सच बन कर, एक हकीकत बन कर मेरे सामने खड़ा हुआ है.

उन की उस कहानी का नायक अपना सारा जीवन समाजसेवा में लगा देता है. वह एक ऐसे ट्रस्ट का निर्माण करता है जिस का उद्देश्य अपंग और अपनों से ठुकराए, बेबस, लाचार, बेसहारा लोगों की मदद करना होता है. लेकिन मदद के नाम पर केवल रोटी, कपड़ा या आश्रय देना ही उस का उद्देश्य नहीं होता, वह उन में स्वाभिमान भी जागृत करना चाहता है.

बाऊजी से मुझे क्या नहीं मिला. अच्छी परवरिश, अच्छी शिक्षा, संस्कार, प्यार, आत्मविश्वास और अब एक अच्छे जीवनसाथी का साथ.

चाचाजी ने बताया कि आलोक ने अपनी तरफ से भी बहुत बड़ी रकम ट्रस्ट के लिए दी है. वह चाहते तो प्लाट या बैंक के पैसे अपने इस्तेमाल में ले लेते लेकिन मेरा दुख देख उन्होंने इस कार्य को अंजाम दिया.

‘‘आलोक, आप एक अच्छे जीवनसाथी हैं यह तो मैं जानती थी लेकिन इतने अच्छे इनसान भी हैं, यह आज पता चला.’’

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‘‘अब यह तुम्हारा नहीं हमारा सपना है,’’ आलोक ने कहा, ‘‘हम अपने चेरिटेबल ट्रस्ट का नाम ‘प्रयास’ रखेंगे. कैसा लगा?’’

‘‘बहुत अच्छा और सटीक लगा यह नाम,’’ नैना बोली, ‘‘सच ही तो है, जरूरतमंदों की मदद के लिए जितना भी प्रयास किया जाए कम होता है.’’

ट्रस्ट का एक मतलब जहां विश्वास होता है तो दूसरा मतलब अब हमारी जिंदगी का उद्देश्य बन चुका था. यानी कि मानव सेवा. जैसेजैसे हम इस उद्देश्य के निकट पहुंचते गए वैसेवैसे ही मेरे भीतर के दुख दूर होते गए.

आज भी मां और बाऊजी की तसवीरें ‘प्रयास’ के आफिस में हमें आशीर्वाद देती प्रतीत होती हैं. उन दोनों ने मुझे अपनाया और एक पहचान दी. वे दोनों ही मेरे परिवार और मेरी नजरों में अमर हैं. वे हमारे दिलोें में सदा जीवित रहेंगे. मैं, आलोक और मेरी दोनों बेटियां, आन्या और पाखी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं हर दिन, हर पल लेकिन फूलों से नहीं बल्कि ट्रस्ट  ‘प्रयास’ के रूप में.

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