आज आसमान से कोई परी उतरती तो वह भी मुसकान को देख कर शरमा जाती, क्योंकि मुसकान आज परियों की रानी लग रही है. नजाकत से धीरेधीरे पांव रखती शादी के मंडप की ओर बढ़ रही मुसकान लाल सुर्ख जरी पर मोतियों से जड़ा लहंगाचोली पहने जेवरों से लदी, चूड़ा, कलीरे और पांव में झांजर डाले हुए है. उस के भाई उस के ऊपर झांवर तान कर चल रहे हैं. झांवर भी गोटे और घुंघरुओं से सजी है. उस का सगा भाई अनिल उस के आगेआगे रास्ते में फूल बिछाते हुए चल रहा है.
शादी के मंडप की शानोशौकत देखते ही बनती है. सामने स्टेज पर सुनील दूल्हा बना बैठा है. वहां मौजूद सभी एकटक मुसकान को आते हुए देख रहे हैं जो अपने को आज दुनिया की सब से खुशनसीब लड़की समझ रही है. आज मुसकान अपने सपनों के राजकुमार की होने जा रही है. सुनील के पिता सुंदरलालजी जिस फैक्टरी में लेखा अधिकारी हैं उसी में मुसकान के पिता राजकुमार सहायक हैं.
दोनों परिवार 20 साल से इकट्ठे रह रहे हैं. दोनों के घरों के बीच में दीवार न होती तो एक ही परिवार था. राजकुमार के 2 बच्चे थे, जबकि सुंदरलाल का इकलौता बेटा सुनील था. यह छोटा सा परिवार हर तरह से खुशहाल था. सुंदरलाल, मुसकान को अपनी बेटी की तरह मानते थे. तीनों बच्चे साथसाथ खेले, बढ़े और पढ़े.
मुसकान, अनिल से 5 वर्ष छोटी थी. सुनील और मुसकान हमउम्र थे. दोनों पढ़ने में होशियार थे. जैसेजैसे बड़े होते गए उन में प्यार बढ़ता गया. मन एक हो गए, सपने एक हो गए और लक्ष्य भी एक, दोनों डाक्टर बनेंगे.
राजकुमार की हैसियत मुसकान को डाक्टरी कराने जितनी नहीं थी मगर सुनील के मांबाप ने मन ही मन मुसकान को अपनी बहू बनाने का निश्चय कर लिया था इसलिए उन्होंने यथासंभव सहायता का आश्वासन दे कर मुसकान को डाक्टर बनाने का फैसला कर लिया था. अनिल भी इंजीनियरिंग कर के नौकरी पर लग गया. वह भी चाहता था कि मुसकान डाक्टर बने.
सुनील को एम.बी.बी.एस. में दाखिला मिल गया. मुसकान अभी 12वीं में थी. जब सुनील पढ़ने के लिए पटियाला चला गया तब दोनों को लगा कि वे एकदूसरे के बिना जी नहीं सकेंगे. मुसकान को लगता कि उस का कुछ कहीं खो गया है पर वह चेहरे पर खुशी का आवरण ओढ़े रही ताकि मन की पीड़ा को कोई दूसरा भांप न ले. दाखिले के 7 दिन बाद सुनील पटियाला से आया तो सीधा मुसकान के पास ही गया.
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‘लगता है 7 दिन नहीं सात जन्म बाद मिल रहा हूं. मुसकान, मैं तुम्हें बहुत मिस करता हूं.’
मुसकान कुछ कह न पाई पर उस के आंसू सबकुछ कह गए थे.
‘मुसकान, आंसू कमजोर लोगों की निशानी है. हमें तो स्ट्रांग बनना है, कुछ कर दिखाना है, तभी तो हमारा सपना साकार होगा,’ सुनील ने उसे हौसला दिया.
अब दोनों ही अपना कैरियर बनाने में जुट गए. सुनील जब भी घर आता मुसकान के लिए किताबें, नोट्स ले कर आता. वह चाहता था कि मुसकान को भी उस के ही कालिज में दाखिला मिल जाए. मुसकान उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकती थी. सुनील मुसकान की पढ़ाई की इतनी चिंता करता कि फोन पर उसे समझाता रहता कि कौन सा विषय कैसे पढ़ना है, टाइम मैनेज कैसे करना है.
सुनील एक हफ्ते की छुट्टी ले कर घर आया और मुसकान से टेस्ट की तैयारी करवाई. दोनों ने दिनरात एक किया. अगर लक्ष्य अटल हो, प्रयास सबल हो तो विजय निश्चित होती है. मुसकान को भी पटियाला में ही प्रवेश मिल गया. मुसकान को दाखिल करवाने दोनों के ही मांबाप गए थे. वापसी से पहले सुनील की मां ने मुसकान से कहा था, ‘बेटा, हमें उम्मीद है तुम दोनों अपने परिवार की मर्यादा का ध्यान रखोगे तो हम सब तुम्हारे साथ हैं.’
‘मां, जितना प्यार मुझे मेरे मांबाप ने दिया है उस से अधिक आप लोगों ने दिया है. मैं आप से वादा करती हूं कि मेरा जीवन इस परिवार और प्यार के लिए समर्पित है,’ मुसकान मम्मी के गले लग गई.
दोनों ने बड़ी मेहनत की और अपने मांबाप की आशाओं पर फूल चढ़ाए. सुनील ने एम.डी. की और उसे पटियाला में ही नौकरी मिल गई. दोनों के मांबाप चाहते थे अब सुनील व मुसकान की शादी हो जानी चाहिए पर दोनों ने फैसला किया था कि जब मुसकान भी एम.डी. हो जाए उस के बाद ही वे शादी करेंगे.
आज उन की मेहनत और सच्चे प्यार का पुरस्कार शादी के रूप में मिला था. सुनील हाथ में जयमाला लिए मंडप की ओर आती मुसकान को देख रहा था.
मुसकान की विदाई एक तरह से अनोखी ही थी. न किसी के चेहरे पर उदासी न आंखों में आंसू. सभी लोग शादी के मंडप से निकले और गाडि़यों में बैठ कर जहां से चले थे वहीं वापस आ गए. दुलहन के रूप में मुसकान सुनील के घर चली गई. दोनों घरों के बीच एक दीवार ही तो थी. जब सब के दिल एक थे तो मायका क्या और ससुराल क्या.
आज सुनील से भी अपनी खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. आज वह अपनी लाल परी को छुएगा.
‘‘मां, हमें जल्दी फारिग करो, हम थक गए हैं,’’ सुनील बेसब्री से बोला.
‘‘बस, बेटा, 10 मिनट और लगेंगे. मुसकान कपड़े बदल ले.’’
मम्मी मुसकान को एक कमरे में ले गईं और एक बड़ा सा पैकेट दे कर बोलीं, ‘‘बेटा, यह सुनील ने अपनी पसंद से तुम्हारे लिए खरीदा है आज रात के लिए.’’
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मम्मी के जाने के बाद मुसकान ने कमरा अंदर से बंद किया और जैसे ही उस ने पैकेट खोला, वह उसे देख कर हैरान रह गई. पैकेट में सुर्ख रंग का जरी, मोतियों की कढ़ाई से कढ़ा हुआ कुरता, हैवी दुपट्टा पटियाला सलवार, परांदा आदि निकला था. उस ने तो बचपन से ही पैंटजींस पहनी थी. कपड़ों की तरफ दोनों ने पहले कभी ध्यान ही नहीं दिया था. सुनील ने भी कभी उस के कपड़ों पर कोई टिप्पणी नहीं की थी.
वह बड़े सलीके से तैयार हुई. अपने केशों में परांदी, सग्गीफूल लगाया, मैच करती लिपस्टिक लगाई, माथे पर मांग टीका लटक रहा था, फिर दुपट्टा पिनअप कर के जैसे ही शीशे के सामने खड़ी हुई सामने पंजाबी दुलहन के रूप में खुद को देख मुसकान हैरान रह गई. सुनील की पसंद पर उसे नाज हो आया और दिल धड़क उठा रात के उस क्षण के लिए जब उस का राजकुमार उसे अपनी बांहों में भर कर उस की कुंआरी देहगंध से रात को सराबोर करेगा.
किसी ने दरवाजा खटखटाया. मुसकान ने दरवाजा खोला तो सामने मम्मी और मां घबराई सी खड़ी थीं.
‘‘बेटी, तुम्हारे पापा की तबीयत खराब हो गई थी. सुनील और अनिल उन्हें अस्पताल ले कर गए हैं. पर घबराने की बात नहीं है, अभी आते होंगे,’’ कह कर मां और मम्मी दोनों उस के पास बैठ गईं.
मुसकान एकदम घबरा गई. अभी 1 घंटा पहले तो पापा ठीक थे, हंसखेल रहे थे. उस ने जल्दी से मोबाइल उठाया, ‘‘सुनील, कैसे हैं पापा, क्या हुआ उन्हें?’’
‘‘मुसकान, देखो घबराना नहीं,’’ सुनील बोला, ‘‘मेरे होते हुए चिंता मत करो. पापा को हलका हार्ट अटैक पड़ा है. हमें इन्हें ले कर पटियाला जाना होगा. तुम जरूरी सामान और कपड़े ले कर डैडी के साथ यहीं आ जाओ. तुम भी साथ चलोगी. मेरे वाला पैकेट अभी संभाल कर रख लो.’’
‘‘मम्मी, सुनील ने मुझे अस्पताल बुलाया है. पापा को पटियाला ले कर जाना पड़ेगा,’’ और फिर जितनी हसरत से उस ने सुनील वाले कपड़े पहने थे, उतने ही दुखी मन से उन्हें उतार दिया. हलके रंग का सूट पहना और यह सोच कर कि इस लाल सूट को तो वह सुहागरात को ही पहनेगी उसे बड़े प्यार से उसी तरह अलमारी में रख दिया.
राजकुमार को एंबुलेंस में डाला गया तो सभी उन के साथ जाना चाहते थे पर सुनील नहीं माना. सुनील, अनिल और मुसकान साथ गए.
पटियाला पहुंच कर जल्दी ही सारे टेस्ट हो गए. डाक्टर ने रात को ही उन की बाईपास सर्जरी करने को कहा. 2 बोतल खून का भी प्रबंध करना था, जिस के लिए सुनील और अनिल अपना खून का सैंपल मैच करने के लिए दे आए थे. बेशक दोनों डाक्टर थे पर मुसकान बहुत घबराई हुई थी. लोगों को बीमारी में देखना और बात है पर अपनों के लिए जो दर्द, घबराहट होती है, यह मुसकान आज जान पाई.
सुनील उसे ढाढ़स बंधा रहा था. उसे यह सोच कर दुख हो रहा था कि उस के सपनों की राजकुमारी, जिस ने जीवन में दुख का एक क्षण नहीं देखा, आज इतना बड़ा दुख…वह भी उस रात में जिस में इस समय उस की बांहों में लिपटी सुहागरात की सेज पर बैठी होती.
‘‘मुसकान, मैं हूं न तुम्हारे साथ. मेरे होते तुम चिंता क्यों करती हो.’’
‘‘मुझे आप के लिए दुख हो रहा है कि मेरे पापा के कारण आप को अपनी खुशी छोड़नी पड़ी,’’ मुसकान की आंखों में आंसू आ गए.
‘‘पगली, यह हमारे बीच में मेरे-तुम्हारे कहां से आ गया. यह मेरे भी पापा हैं. कल को मुझ पर या घर के किसी दूसरे सदस्य पर कोई मुसीबत आ जाए तो क्या तुम साथ नहीं दोगी?’’
‘‘मेरी तो जान भी हाजिर है.’’
‘‘मुझे जान नहीं, बस, मुसकान चाहिए,’’ कहते हुए सुनील ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर दबाया.
सुनील को डाक्टर ने बुलाया था. अनिल बाजार सामान लेने गया हुआ था. मुसकान पापा के पास बैठ गई. पूरे एक घंटे बाद सुनील आया तो उदास और थकाथका सा था.
‘‘क्या खून दे कर आए हैं?’’ मुसकान घबरा गई.
‘‘हां,’’ जैसे कहीं दूर से उस ने जवाब दिया हो.
‘‘आप थोड़ी देर कमरे में जा कर आराम कर लें, अभी भैया भी आ जाएंगे. मैं पापा के पास बैठती हूं.’’
मुसकान के मन में चिंता होने लगी. सुनील को क्या हो गया. शायद थकावट और परेशानी है और ऊपर से खून भी देना पड़ा. चलो, थोड़ा आराम कर लेंगे तो ठीक हो जाएंगे.
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उधर सुनील पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा था. किसे बताए, क्या बताए. मुसकान का क्या होगा. फिर डाक्टर परमिंदर सिंह का चेहरा उस की आंखों के सामने घूमने लगा और उन के कहे शब्द दिमाग में गूंजने लगे :
‘‘सुनील बेटा, तुम मेरे छात्र रह चुके हो, मेरे बेटे जैसे हो. कैसे कहूं, क्या बताऊं मैं 2 घंटे से परेशान हूं.’’
‘‘सर, मैं बहुत स्ट्रांग हूं, कुछ भी सुन सकता हूं, आप निश्ंिचत हो कर बताइए,’’ सुनील सोच भी नहीं सकता था, वह क्या सुनने जा रहा है.
‘‘तुम एच.आई.वी. पौजिटिव हो. जांच के लिए भेजे गए तुम्हारे ब्लड से पता चला है.’’
‘‘क्या? सर, यह कैसे हो सकता है? आप तो मुझे जानते हैं. कितना सादा और संयमित जीवन रहा है मेरा.’’
लेेखिक- पुष्पा अग्रवाल
‘‘आदाब चाचाजान, मैं आप को पहचान गया. मैं सलीम भाई का लड़का अशरफ बोल रहा हूं, अब्बा अकसर आप की बातें करते हैं. आप मुझे हुक्म कीजिए,’’ अशरफ की आवाज नम्र थी.
ये एकदम आतुरता से बोले, ‘‘असल में मैं आप को एक तकलीफ दे रहा हूं, मेरे बेटे राजीव का एलप्पी में एक्सीडेंट हो गया है. वहीं अस्पताल में है, आप उस की कुछ मदद कर सकते हैं क्या?’’
‘‘अरे, चाचाजान, आप बेफिक्र रहिए. मैं अभी एलप्पी के लिए गाड़ी से निकल जाता हूं. उन का पूरा खयाल रख लूंगा और आप को सूचना भी देता रहूंगा. आप उन का मोबाइल नंबर बता दीजिए.’’
इन्होंने जल्दी से सीमा का मोबाइल नंबर बता दिया और आगे कहा, ‘‘ऐसा है, हम जल्दी से जल्दी पहुंचने की कोशिश करेंगे, सो यदि उचित समझो तो उन को कोच्चि में भी दिखा देना.’’
‘‘आप मुझे शर्मिंदा न करें, चाचाजान, अच्छा अब मैं फोन रखता हूं.’’
अशरफ की बातें सुन कर तो हमें चैन आ गया, फटाफट प्लेन का पता किया. जल्दीजल्दी अटैची में सामान ठूंस रहे थे और जाने की व्यवस्था भी कर रहे थे. रात होने की वजह से हवाई जहाज से जाने का कार्यक्रम कुछ सही बैठ नहीं रहा था. सिर्फ सीमा से बात कर के तसल्ली कर रहे थे. मन में शंका भी हो रही थी कि अशरफ अभी रवाना होगा या सुबह?
खाने का मन न होते हुए भी इन की डायबिटीज का ध्यान कर हम ने दूध बे्रड ले लिया.
मन में बहुत ज्यादा उथलपुथल हो रही थी. सलीम भाई से बात नहीं हुई थी, यहां आते थे तब तो बहुत बातें करते थे. क्या कारण हो सकता है? कितने ही विचार मन में घूम रहे थे.
6 साल पुरानी बातें आज जेहन में टकराने लगीं.
मैं सब्जी बना चुकी थी कि इन का फोन आ गया, ‘सुधा, एक मेहमान खाना खाएंगे. जरा देख लेना.’
मेरा मूड एकदम बिगड़ गया, कितने दिनों बाद तो आज मूंग की दालपालक बनाया था, अब मेहमान के सामने नए सिरे से सोचना पड़ेगा. न मालूम कौन है?
खाने की मेज पर इन्होंने मेरा परिचय दिया और बताया, ‘ये सलीम भाई हैं. सामने उदयपुर होटल में ही ठहरे हैं. इन का मार्बल और लोहे का व्यापार है. उसी सिलसिले में मुझ से मिलने आए हैं.’
फिर आगे बोले, ‘ये कैल्लूर के रहने वाले हैं, बहुत ही खुशमिजाज हैं.’
वास्तव में सलीम भाई बहुत ही खुशहाल स्वभाव के थे. उन के चेहरे पर हरदम एक मुसकान सी रहती थी, मार्बल के सिलसिले में इन से राय लेने आए थे.
धीरेधीरे इन का सलीम भाई के साथ अभिन्न मित्र की तरह संबंध हो गया. वह 2-3 महीने में अपने काम के सिलसिले में उदयपुर चक्कर लगाते थे.
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गरमी के दिन थे. सलीम भाई का सिर सुबह से ही दुख रहा था. दवा दी पर शाम तक तबीयत और खराब होने लगी. उलटियां और छाती में दर्द बढ़ता गया. अस्पताल में भरती कराया क्योंकि उन को एसीडीटी की समस्या हो गई थी. 1 दिन अस्पताल में रहे, तो इन्होंने उन्हें 4 दिन रोक लिया. घर की तरह रहते हुए उन की आंखें बारबार शुक्रिया कहतेकहते भर आती थीं.
सलीम भाई के स्वभाव से तो कोई तकलीफ नहीं थी पर मैं अकसर कुढ़ जाती थी, ‘आप भी बहुत भोले हो. अरे, दुनिया बहुत दोरंगी है, अभी तो आप के यहां आते हैं. परदेस में आप का जैसा जिंदादिल आदमी मिल गया है. कभी खुद को कुछ करना पड़ेगा तब देखेंगे.’
‘बस, तुम्हारी यही आदत खराब है. सबकुछ करते हुए भी अपनी जबान को वश में नहीं रख सकतीं, वे अपना समझ कर यहां आते हैं. दोस्ती तो काम ही आती है,’ ये मुझे समझाते.
2 साल तक उन का आनाजाना रहा. एक बार वे हमारे यहां आए. एकाएक उन का मार्बल का ट्रक खराब हो गया. 2 दिन तक ठीक कराने की कोशिश की. पर ठीक नहीं हुआ. पता लगा कि इंजन फेल हो गया था इसलिए अब ज्यादा समय लगेगा.
सलीम भाई ने झिझकते हुए कहा, ‘भाई साहब, अब मेरा जाना भी जरूरी है और मैं आप को काम भी बता कर जा रहा हूं, कृपया इसे ठीक करा कर भेज दीजिएगा. अगले महीने मैं आऊंगा तब सारा पेमेंट कर दूंगा.’
पर सलीम भाई के आने की कोई खबर नहीं आई. न उन के पेमेंट के कोई आसार नजर आए.
इंतजार में दिन महीनों में और महीने सालों में बदलने लगे. पूरे 5 साल निकल गए.
मैं अकसर इन को ताना मार देती थी, ‘और करो भलाई, एक अनजान आदमी पर भरोसा किया. मतलब भी निकाल लिया. 40 हजार का फटका भी लग गया.’
ये ठंडे स्वर में कहते, ‘भूलो भी, जो हो गया सो हो गया. उस की करनी उस के साथ.’
‘‘क्या बात है? किन खयालों में खोई हुई हो,’’ इन की आवाज सुन कर मेरा ध्यान बंटा, घड़ी की ओर देखा पूरे 12 बज रहे थे. नींद आने का तो सवाल ही नहीं था, बेटे और पोतेपोती की चिंता हो रही थी. न जाने कहां कितनीकितनी चोटें लगी होंगी. शायद सीमा ज्यादा नहीं बता रही हो कि मम्मीपापा को चिंता हो जाएगी.
वहां एलप्पी में न जाने कैसा अस्पताल होगा. बस, बुराबुरा ही दिमाग में घूम रहा था. करीब 3 बजे फोन की घंटी बजी. हड़बड़ाहट में लपकते हुए मैं ने फोन उठाया. सीमा का ही था, ‘‘मम्मी, यहां एलप्पी अस्पताल में हम ने मरहमपट्टी करा ली है. अब अशरफ भाईजान आ गए हैं. हम सुबह उन के संग कोच्चि जा रहे हैं.’’
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फिर एक क्षण रुक कर बोली, ‘‘अशरफ भाईजान से बात कर लो.’’
‘‘आंटी, आप बिलकुल चिंता मत करना, मैं कोच्चि में बढि़या से बढि़या इलाज करवा दूंगा, आप बेफिक्र हो कर आराम से आओ.’’
फिर आगे बोला, ‘‘यदि आप की तबीयत ठीक न हो तो इतना लंबा सफर मत करना, मैं इन्हें सकुशल उदयपुर पहुंचा दूंगा.’’
‘‘शुक्रिया बेटा, लो अपने अंकल से बात करो,’’ मेरा मन हलका हो गया था.
‘‘बेटा, हम परसों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. तुम्हें तकलीफ तो दे रहे हैं, पर सलीम भाई से बात नहीं हुई. वे कहां हैं?’’ इन्होंने संशय के साथ पूछा.
‘‘अंकल, वह कोच्चि में ही हैं. आजकल उन की भी तबीयत ठीक नहीं है. अच्छा मैं फोन रखता हूं.’’
‘‘चलो, मन को तसल्ली हो गई कि परदेस में भी कोई तो अपना मिला. यह कहते हुए मैं लेट गई. जल्दी से जल्दी टैक्सी से पहुंचने में भी हमें समय लग गया. अशरफ ने हमें अस्पताल और रूम नंबर बता दिया था, सो हम सीधे कोच्चि के अस्पताल में पहुंच गए.
वाकई अशरफ वहां के एक बड़े अस्पताल में सब जांच करवा रहा था, आरुषि के 2-3 फ्रैक्चर हो गए थे, उस के प्लास्टर बंध गया था.
राजीव के दिमाग में तो कोई चोट नहीं आई थी. पर बैकबोन में लगने से वह हिलडुल नहीं पा रहा था. चक्कर भी पूरे बंद नहीं हुए थे. एक पांव की एड़ी में भी ज्यादा चोट लग गई थी.
डाक्टर ने 10 दिन कोच्चि में ही रहने की सलाह दी. ऐसी हालत में इतनी दूर का सफर ठीक नहीं है, सीमा ठीक थी और वही सब को संभाल रही थी.
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पोते आयुष को हम अपने साथ अस्पताल से बाहर ले आए और अशरफ से होटल में ठहरने की बात की.
‘‘अंकल, आप क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं. घर चलिए, अब्बाजान आप का इंतजार कर रहे हैं.’’
हमारी हिचक देख कर वह बोला, ‘‘अंकल, आप चिंता न करें. आप के धर्म को देख कर मैं ने इंतजाम कर दिया है.’’
लेेखिक- पुष्पा अग्रवाल
‘‘अरे, नहीं बेटा, दोस्ती में धर्म नहीं देखा जाता है,’’ ये शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे.
अशरफ हमें सलीम भाई के कमरे में ले गया. सलीम भाई ने एक हाथ उठा कर अस्फुट शब्दों में बोल कर हमारा स्वागत किया. उन की आंखें बहुत कुछ कह रही थीं. हमारे मुंह से बोल नहीं निकल रहा था. इन्होंने सलीम भाई का हाथ पकड़ कर हौले से दबा दिया. 10 मिनट तक हम बैठे रहे, सलीम भाई उसी टूटेफूटे शब्दों में हम से बात करने की कोशिश कर रहे थे. अशरफ ही उन की बात समझ रहा था.
खाना खाने के बाद अशरफ ने बताया, ‘‘अब्बाजान जब भी उदयपुर से आते थे आप की बहुत तारीफ करते थे. हमेशा कहते थे, ‘‘मुझे जिंदगी में इस से बढि़या आदमी नहीं मिला और चाचीजान के खाने की इतनी तारीफ करते थे कि पूछो मत.’’
उस के चेहरे पर उदासी आ गई. एक मिनट खामोश रह कर बात आगे बढ़ाई, ‘‘आप के यहां से आने के चौथे दिन बाद ही अम्मीजान की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. बे्रस्ट में ब्लड आ जाने से एकदम चिंता हो गई थी. कैल्लूर के डाक्टर ने तो सीधा मुंबई जाने की सलाह दी.
‘‘जांच होने पर पता चला कि उन्हें बे्रस्ट कैंसर है और वह भी सेकंडरी स्टेज पर. बस, सारा घर अम्मीजान की सेवा में और पूरा दिन अस्पताल, डाक्टरों के चक्कर लगाने में बीत जाता था.
‘‘इलाज करवातेकरवाते भी कैंसर उन के दिमाग में पहुंच गया. अब्बाजान तो अम्मीजान से बेइंतहा मोहब्बत करते थे. अम्मी 2 साल जिंदा रहीं पर अब्बाजान ने उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा. मैं उस समय सिर्फ 20 साल का था.
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‘‘ऐसी हालत में व्यापार बिलकुल चौपट हो गया. फैक्टरी बेचनी पड़ी. अम्मीजान घर से क्या गईं, लक्ष्मी भी हमारे घर का रास्ता भटक गई.
‘‘अकसर अब्बाजान आप का जिक्र करते थे और कहते थे, ‘एक बार मुझे उदयपुर जाना है और उन का हिसाब करना है, वे क्या सोचते होंगे कि दोस्ती के नाम पर एक मुसलमान धोखा दे गया.’?’’
हमारी आंखें नम हो रही थीं, इन्होंने एकदम से अशरफ को गले लगा लिया और बात बदलते हुए पूछा, ‘‘सलीम भाई की यह हालत कैसे हो गई?’’
अशरफ गुमसुम सा छत की ओर ताकने लगा, मन की वेदना छिपाते हुए आगे बोला, ‘‘अंकल, जब मुसीबत आती है, तो इनसान को चारों ओर से घेर लेती है. अभी 2 साल पहले अब्बाजान ने फिर से व्यापार में अच्छी तरह मन लगाना शुरू किया था. हमारा कैल्लूर छूट गया था. हम कोच्चि में ही रहने लगे. मैं भी अब उन के संग काम करना सीख रहा था.
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‘‘पहले वाला मार्बल का काम बिलकुल ठप्प पड़ गया था. कर्जदारों का बोझ बढ़ गया था. व्यापार की हालत खराब हुई तो लेनदार आ कर दरवाजे पर खड़े हो गए. पर देने वालों ने तो पल्ला ही झाड़ लिया. आजकल मोबाइल नंबर होते हैं, बस, नंबर देखते ही लाइन काट देते थे.
‘‘जैसेतैसे थोड़ी हालत ठीक हुई तो अब्बाजान को लकवे ने आ दबोचा. चल- फिर नहीं पाते और जबान भी साफ नहीं हुई, इसलिए एक बार फिर व्यापार का वजन मेरे कंधों पर आ गया.’’
यों कहतेकहते अशरफ फूटफूट कर रो पड़ा. मेरी भी रुलाई फूट रही थी. मुझे आत्मग्लानि भी महसूस हो रही थी. कितनी संकीर्णता से मैं ने एकतरफा फैसला कर के किसी को मुजरिम करार दे दिया था.
राजीव की सारी जांच की रिपोर्टें आने के बाद कोई बीमारी नहीं निकली थी. हम सब ने राहत की सांस ली. मन की दुविधा निकल गई थी. हमें देख कर आज भी सलीम भाई के चेहरे पर वही चिरपरिचित मुसकान आ जाती थी.
10 दिन रह कर हमारे उदयपुर लौटने का समय आ गया था. अशरफ के कई बार मना करने के बावजूद इन्होंने सारा पेमेंट चुकाते हुए कहा, ‘‘बेटा, मैं तुम्हारे पिता के समान हूं. एक बाप अपने बेटे पर कर्तव्यों का बोझ डालता है पर खर्चे का नहीं. अभी तो मैं खर्च कर सकता हूं.’’
अशरफ इन के पांवों में झुक गया. इन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम ने जिस तरह से अपने पिताजी की शिक्षा ग्रहण की है और कर्तव्य की कसौटी निभाई है वह बेमिसाल है.’’
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फिर एक बार सलीम भाई के गले मिले. दोनों की आंखें झिलमिला रही थीं.
चलते समय अशरफ ने झुक कर आदाब किया. इन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘बेटा, आज से अपने इस चाचा को पराया मत समझना. तुम्हारे एक नहीं 2 घर हैं. हमारे बीच एक अनमोल रिश्ता है, जो सब रिश्तों से ऊपर है.’’
सौजन्य-सत्यकथा
एसएसपी आकाश तोमर ने हत्या के इस केस की जांच के लिए 2 टीमें बनाईं. एक टीम सीओ (भरथना) चंद्रपाल की अगुवाई में तथा दूसरी टीम लवेदी थानाप्रभारी बृजेश कुमार की अगुवाई में बनी. दोनों टीमों की कमान एसपी (देहात) ओमवीर सिंह को सौंपी गई. सहयोग के लिए क्राइम ब्रांच प्रभारी सत्येंद्र सिंह यादव तथा सर्विलांस प्रभारी वी.के. सिंह को भी लगाया गया.
पुलिस ने मंदाकिनी और उस की बहनों के फोन नंबर हासिल कर लिए. गठित टीमों ने सब से पहले मोबाइल डिटेल्स तथा मोबाइल फोन की लोकेशन की छानबीन शुरू की. छानबीन से पता चला कि मंदाकिनी उर्फ संगीता तथा उस की बहनें मीना व ममता 7 अक्तूबर की रात घटनास्थल पर मौजूद थीं.
यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम ने मंदाकिनी के बहादुरपुर गांव स्थित घर पर दबिश दी. लेकिन वह घर पर नहीं मिली. पता चला कि वह आगरा में अपनी बड़ी बहन मीना के घर है. यह पता चलते ही पुलिस टीम ने आगरा से मीना के घर से मंदाकिनी व ममता को हिरासत में ले लिया.
मीना सहित तीनों बहनों को थाना लवेदी लाया गया. पुलिस टीम ने तीनों बहनों से योगेश चौहान की हत्या के संबंध में पूछताछ की. पहले तो वे तीनों मुकर गईं, लेकिन सख्ती करने पर टूट गईं और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.
उन्होंने बताया कि मथुरा के अपराधी महेश, विनोद शर्मा तथा उन के साथी को योगेश की हत्या के लिए एक लाख रुपए की सुपारी दी गई थी. ये अपराधी मथुरा के गांव दूधाधारी जमुना पार के रहने वाले हैं. इन्हें 10 हजार रुपए एडवांस दिया गया था. बाकी के रुपए लेने ये लोग कल 19 अक्तूबर को स्टेशन रोड इटावा आएंगे.
इस जानकारी पर पुलिस की दोनों टीमों ने जाल बिछा कर महेश व विनोद शर्मा को पकड़ लिया. तीसरा साथी पुलिस को चकमा दे कर फरार हो गया. उन दोनों को थाना लवेदी लाया गया. वहां उन का सामना मीना, ममता व मंदाकिनी से हुआ तो वे समझ गए कि हत्या का राज खुल गया है.
अत: उन दोनों ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस ने भादंवि की धारा 302/201 के तहत मीना, ममता, मंदाकिनी, महेश, विनोद शर्मा आदि के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.
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पुलिस टीम ने हत्यारोपियों की निशानदेही पर आलाकत्ल रौड, नान चाक, घटना में प्रयुक्त मारुति स्विफ्ट कार तथा एक तमंचा बरामद कर लिया. इस के अलावा मृतक के जले कपड़े, जूते, उस का परिचय पत्र तथा आधार कार्ड बरामद किया गया. कार के अलावा सारा सामान साक्ष्य के तौर पर सुरक्षित कर लिया गया.
पुलिस पूछताछ में मंदाकिनी उर्फ संगीता ने बताया कि योगेश ने जब शादी से इनकार किया तो तीनों बहनें प्यार के प्रतिशोध में जल उठीं और योगेश की हत्या की योजना बनाई. फिर मथुरा के महेश व विनोद शर्मा को एक लाख की सुपारी दे दी.
योजना के तहत वह 7 अक्तूबर को योगेश के साथ अयोध्या से घर के लिए रवाना हुई. बस से वे दोनों इटावा बसस्टैंड पहुंचे. बड़ी बहन मीना मथुरा से सुपारी किलर के साथ कार से इटावा आ गई थी. ममता भी गांव से आ गई थी.
इस के बाद उन्होंने योगेश को सवारी के बहाने अपनी कार में बिठा लिया और मानिकपुर मोड़ की ओर ले जाते समय रास्ते में कार में ही रौड से उस के सिर पर वार किया. फिर नानचाक से गला दबा कर हत्या कर दी.
हत्या के बाद योगेश के कपड़े उतार कर शव बहादुरपुर के सूखे बंबे में फेंक दिया. पहचान छिपाने के लिए उस के चेहरे पर हारपिक (टायलेट क्लीनर) डाल दिया. फिर आगे जा कर कपड़े व अन्य सामान जला कर मिट्टी में दबा दिया. इस के बाद वे कार से मथुरा चले गए. दूसरे रोज मीना, ममता व मंदाकिनी आगरा चली गईं.
2 दिन बाद शव की पहचान तब हुई, जब मृतक का भाई थाना लवेदी आया और फोटो देख कर शव की पहचान अपने भाई योगेश के रूप में की. उस ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तब कहीं जा कर हत्या का परदाफाश हुआ और कातिल पकड़े गए.
20 अक्तूबर, 2020 को थाना लवेदी पुलिस ने हत्यारोपियों को इटावा की कोर्ट में पेश किया, जहां से उन को जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक एक आरोपी फरार था. द्य
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
सौजन्य-सत्यकथा
इस से मंदाकिनी के मन में प्यार का प्रतिशोध पनपने लगा. उस ने ठान लिया कि यदि योगेश उस से शादी नहीं करेगा तो वह किसी और से भी उस की शादी नहीं होने देगी. इस के लिए अगर उसे अनर्थ करना पड़ा तो वह भी करेगी.
कुछ दिनों बाद मंदाकिनी छुट्टी ले कर अपनी बड़ी बहन मीना के घर आगरा पहुंची. वहां उस समय मंझली बहन ममता भी आई हुई थी. मंदाकिनी ने अपनी प्रेम कहानी दोनों बहनों को बताई और यह भी बताया कि योगेश उस से शादी करने को राजी नहीं है.
इस पर दोनों बहनों ने मंदाकिनी को समझाया कि वह ज्यादा परेशान न हो. वह योगेश से बात करेंगी और उसे शादी के लिए हर हाल में राजी करेंगी.
मीना की तैनाती मथुरा में थी. उस ने गुपचुप तरीके से योगेश और उस के परिवार के संबंध में जानकारी जुटाई तो सब ठीक लगा. उस के बाद मीना ने योगेश चौहान से बात की और मंदाकिनी से शादी करने की बात कही.
लेकिन योगेश ने शादी करने से साफ मना कर दिया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही शुरू हो गया. कभी ममता उस से फोेन पर बात करती तो कभी मीना. दोनों का एक ही मकसद होता, किसी तरह योगेश को बातों में उलझा कर मंदाकिनी से शादी करने को राजी करना. लेकिन योगेश उन की बातों में आने वाला कहां था, वह उन्हें हर बार मना कर देता था.
एक दिन तो योगेश और मीना की मंदाकिनी से शादी को ले कर तीखी झड़प हो गई. योगेश ने गुस्से में मीना और उस की बहन ममता के चरित्र को ले कर ऐसी बात कह दी जो मीना और ममता के कलेजे में तीर की तरह चुभ गई.
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उस के बाद उन्होंने योगेश से बात करनी बंद कर दी. अब तीनों बहनें प्यार के प्रतिशोध में जलने लगीं. उन्होंने योगेश को सबक सिखाने की ठान ली.
7 अक्तूबर, 2020 को दोपहर 12 बजे योगेश कुमार चौहान ने अपने बड़े भाई सुनील कुमार चौहान से मोबाइल फोन पर बात की और बताया कि उसे 7 दिन की छुट्टी मिल गई है और वह बस द्वारा घर आ रहा है. इस समय वह अयोध्या से निकल चुका है. इस के बाद उस ने फोन बंद कर लिया.
शाम 7 बजे वह बस से लखनऊ पहुंचा और फिर 10 बजे औरैया. औरैया पहुंचने पर उस ने बड़े भाई सुनील से फिर बात की और बताया कि वह औरैया पहुंच गया है. इटावा से सवारी मिल गई तो रात 2 बजे तक वह घर पहुंच जाएगा. फिर फोन बंद हो गया.
योगेश चौहान सुबह 8 बजे तक मथुरा स्थित अपने घर नहीं पहुंचा तो भाई सुनील को चिंता हुई. उस ने योगेश को फोन मिलाया तो वह बंद था. इस के बाद तो ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, त्योंत्यों घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी. औरैया, इटावा और आगरा के बीच जहांजहां रिश्तेदारियां थीं, सुनील ने फोन कर पता किया, लेकिन योगेश की कोई जानकारी नहीं मिली.
सुनील कुमार ने अपने चचेरे भाई राहुल को साथ लिया और कार से योगेश की खोज में निकल पड़ा. उस ने आगरा-इटावा के बीच पता किया कि वहां कोई वाहन दुर्घटनाग्रस्त तो नहीं हुई. पर कोई गंभीर दुर्घटना की जानकारी नहीं मिली.
9 अक्तूबर की सुबह 10 बजे सुनील भाई की खोज करता हुआ अयोध्या के राम जन्मभूमि थाना पहुंचा और योगेश की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थाने से ही उसे पता चला कि सिपाही मंदाकिनी भी 3 दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव गई है. संभवत: दोनों साथ ही गए हैं.
मंदाकिनी इटावा के लवेदी थाने के गांव बहादुरपुर की रहने वाली थी. वहां एक बात और चौंकाने वाली पता चली कि योगेश और मंदाकिनी दोस्त थे. मंदाकिनी योगेश से प्यार करती थी और शादी करना चाहती थी. लेकिन योगेश शादी को राजी नहीं था.
प्रेम संबंध की जानकारी पा कर सुनील का माथा ठनका. उस के मन में तरहतरह के विचार आने लगे. वह सोचने लगा कि कहीं साथी महिला सिपाही मंदाकिनी ने कोई खेल खेल कर योगेश के साथ विश्वासघात तो नहीं कर दिया. लवेदी थाने जा कर पता करना होगा. अगर कोई वारदात हुई होगी तो थाने में दर्ज होगी.
10 अक्तूबर को सुनील कुमार चचेरे भाई राहुल के साथ थाना लवेदी पहुंचा. उस समय थानाप्रभारी बृजेश कुमार थाने में मौजूद थे. सुनील ने उन्हें योगेश के गुम होने की जानकारी दी तो थानाप्रभारी ने उसे बताया कि 8 अक्तूबर को बहादुरपुर गांव के बाहर सूखे बंबा में उन्हें एक जवान युवक की नग्नावस्था में लाश मिली थी.
उस के सिर पर प्रहार कर तथा गला कस कर हत्या की गई थी. उस का चेहरा बिगाड़ने की भी कोशिश की गई थी. शव की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. शव का फोटो मेरे पास है. आप उसे देख कर बताएं कहीं वह लाश आप के भाई की तो नहीं है.
सुनील और राहुल ने फोटो गौर से देखा तो दोनों रो पड़े और बताया कि शव का फोटो उस के भाई योगेश कुमार का है जो अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में सिपाही था. उस के साथ महिला सिपाही मंदाकिनी उर्फ संगीता बस में सफर कर रही थी, जो उसी थाने में तैनात है. वह लवेदी के बहादुरपुर गांव की रहने वाली है. संभवत: उसी ने योगेश की हत्या अन्य लोगों के साथ मिल कर की है. आप उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करें.
लेकिन थानाप्रभारी बृजेश कुमार ने सुनील के अनुरोध को ठुकरा दिया और हत्या की रिपोर्ट दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने हत्या की रिपोर्ट राम जन्मभूमि थाने में दर्ज कराने की सलाह दी.
इस के बाद सुनील कुमार चकरघिन्नी बन गया. लवेदी पुलिस कहती कि रिपोर्ट राम जन्मभूमि थाने में दर्ज होगी. जबकि राम जन्मभूमि थाने की पुलिस कहती कि रिपोर्ट लवेदी थाने में दर्ज होगी.
परेशान सुनील तब राहुल व अन्य घर वालों के साथ इटावा के एसएसपी आकाश तोमर से मिला और रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगाई.
मामले की गंभीरता को समझते हुए एसएसपी आकाश तोमर ने लवेदी के थानाप्रभारी बृजेश को महिला सिपाही मंदाकिनी उर्फ संगीता तथा अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया. आदेश पाते ही उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर ली.
सौजन्य-सत्यकथा
इटावा जिले का एक गांव है बहादुरपुर. यादव व ठाकुर बाहुल्य इस गांव में सुलतान सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के
परिवार में पत्नी सीमा सिंह के अलावा 3 बेटियां मीना, ममता और मंदाकिनी उर्फ संगीता थीं. सुलतान सिंह गांव के दबंग ठाकुर थे. उन की पहचान लंबरदार के नाम से थी. वह संपन्न किसान थे.
छोटे किसानों की वह भरपूर मदद करते थे. सुलतान सिंह स्वयं भी पढ़ेलिखे थे, इसलिए उन्होंने अपनी बेटियों को भी खूब पढ़ाया था. बड़ी बेटी मीना पढ़लिख कर पुलिस विभाग में नौकरी करने लगी थी. वह मथुरा में सिपाही के पद पर तैनात थी.
मीना जब नौकरी करने लगी तब सुलतान सिंह ने उस का विवाह आगरा निवासी रमेश चंद्र के साथ कर दिया. मीना पति के साथ आगरा में रहती थी और मथुरा में नौकरी करती थी.
मीना से छोटी ममता थी. वह बीए की पढ़ाई कर रही थी. वह पिता के साथ गांव में रहती थी. बहनों में सब से छोेटी मंदाकिनी उर्फ संगीता थी. वह अपनी अन्य बहनों से कुछ ज्यादा ही खूबसूरत थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही तेजतर्रार भी थी और पढ़ने में तेज भी. इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उस ने बड़ी बहन मीना की तरह पुलिस की नौकरी करने की ठान ली.
इस के लिए वह अभ्यास भी करने लगी. उस की लगन और मेहनत रंग लाई और सन 2019 में वह भी सिपाही के पद पर भरती हो गई. इटावा में ट्रेनिंग के बाद उस की पहली तैनाती अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में हुई. व्यवहारकुशल व तेज होने के कारण वह जल्द ही थाने में चर्चित हो गई.
अपनी कार्यप्रणाली से वह अधिकारियों की नजर में भी आ गई थी. इसी राम जन्मभूमि थाने में योगेश कुमार चौहान सिपाही के पद पर तैनात था. मंदाकिनी की तरह योगेश भी 2019 बैच का था और इस थाने में उस की भी पहली तैनाती थी.
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योगेश कुमार मूलरूप से मथुरा शहर के बालाजीपुरम मोहल्ले का रहने वाला था. उस के पिता मुकेश सिंह चौहान व्यापारी थे. बड़ा भाई सुनील कुमार चौहान पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाता था. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.
चूंकि योगेश व मंदाकिनी एक ही बैच व एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे, अत: उन दोनों में जल्द ही दोस्ती हो गई. दोस्ती हुई तो बातचीत भी खुल कर होने लगी. बातचीत से आकर्षण बढ़ा तो दोनों एकदूसरे की बातों में रुचि लेने लगे. मंदाकिनी को जहां योगेश की लच्छेदार बातें पसंद थीं तो योगेश को उस की मुसकान और भावभंगिमा पसंद थी.
जल्दी ही दोनों की नजदीकियों की चर्चा थाने के स्टाफ में होने लगी थी. योगेश कुमार स्मार्ट युवक था. वह जब आंखों पर काला चश्मा लगाता, तो हीरो जैसा दिखता था. मंदाकिनी मन ही मन उसे प्यार करने लगी थी. उस के मन ने योगेश को पति के रूप में स्वीकार कर लिया था. वह योगेश को पति के रूप में पाने के सपने भी संजोने लगी थी.
अपना सपना पूरा करने के लिए मंदाकिनी योगेश से नजदीकियां बढ़ाने लगी तथा उस से प्यार भरी बातें करने लगी. उसे लगता भी था कि योगेश उस से उतना ही प्यार करता है जितना वह उस से करती है. लेकिन कभी लगता कि योगेश उस से दूर भाग रहा है. मंदाकिनी योगेश के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी, लेकिन अपने प्यार का इजहार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी.
आखिर जब मंदाकिनी से नहीं रहा गया, तो उस ने एक रोज एकांत में योगेश से कहा, ‘‘योगेश, कुछ दिनों से मैं अपनी बात तुम से कहना चाहती हूं. लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही हूं.’’
‘‘ऐसी क्या बात है जिस के लिए तुम हिम्मत नहीं जुटा पा रही हो?’’ योगेश ने मंदाकिनी से पूछा.
‘‘योगेश, मैं तुम से प्यार करती हूं और मैं ने तुम्हें अपने दिल में बसा लिया है. मैं तुम से शादी रचाना चाहती हूं. तुम्हें पति के रूप में पा कर मेरा सपना साकार हो जाएगा.’’ मंदाकिनी ने खुल कर प्यार का इजहार कर दिया.
मंदाकिनी की बात सुन कर योगेश चौंका, ‘‘मंदाकिनी, आज तुम्हें क्या हो गया है, जो बहकीबहकी बातें कर रही हो. यह बात सच है कि हम दोनों दोस्त हैं और दोस्ती के नाते ही हम दोनों की बातचीत और हंसीमजाक होती है. इस में प्यारमोहब्बत की बात कहां से आ गई. तुम मुझ से भले ही प्यार करती हो लेकिन मैं तुम से प्यार नहीं करता. इसलिए मुझ से शादी रचाने की बात दिल से निकाल दो. तुम केवल मेरी दोस्त हो और दोस्त ही रहोगी. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ योगेश ने दोटूक जवाब दिया.
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‘‘क्यों नहीं कर सकते शादी? आखिर मुझ में कमी क्या है. पढ़ीलिखी हूं. सरकारी सर्विस कर रही हूं. तुम्हारी बिरादरी की हूं.’’ मंदाकिनी ने तमतमाते हुए पूछा.
‘‘तुम में कोई कमी भले न हो. लेकिन फिर भी मैं तुम से शादी नहीं कर सकता. मैं शादी अपने मांबाप की मरजी से करूंगा. उन की मरजी के खिलाफ नहीं.’’ योगेश ने स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया.
योगेश ने शादी से इनकार किया तो मंदाकिनी मन ही मन दुखी हुई. लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. गाहेबगाहे वह योगेश को प्यार से समझाती और शादी करने का दबाव डालती. लेकिन योगेश हर बार उसे मना कर देता.
लेेखिक- पुष्पा अग्रवाल
‘हैलो, हां बेटा, कहां पर हो?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘मम्मी, बस, अब आधे घंटे बाद ही हम एलप्पी के लिए रवाना हो रहे हैं, शाम तक वहां पहुंच जाएंगे,’’ राजीव खुशी के साथ अपना कार्यक्रम बता रहा था.
‘‘चलो, ठीक है, वहां पहुंच कर खबर देना…और हां बेटा, खूब मौजमस्ती करना. बारबार इतनी दूर जाना नहीं होता है.’’
एक गाना गुनगुनाती हुई मैं अपने बच्चों के लिए ही सोच रही थी. 2 साल तक सोचतेसोचते आखिर इस बार दक्षिण भारत का 1 महीने का ट्रिप बना ही लिया. राजीव, बहू सीमा और उन के दोनों बच्चे आयुषआरुषि गरमियों की छुट्टियां होते ही गाड़ी द्वारा अपनी केरल की यात्रा पर निकले थे.
राजीव डाक्टर होने की वजह से कभी कहीं ज्यादा समय के लिए जा ही नहीं पाता था. बच्चे भी अब 12-14 साल के हो गए थे. उन्हें भी घूमनेफिरने का शौक हो गया था. बच्चों की फरमाइश पर राजीव ने आखिरकार अपना लंबा कार्यक्रम बना ही लिया.
हम ने तो 20 साल पहले, जब राजीव मनीपाल में पढ़ता था, पूरे केरल घूमने का कार्यक्रम बना लिया था. घूमने का घूमना हो गया और बेटे से मनीपाल में मिलना भी.
एलप्पी शहर मुझे बहुत पसंद आया था. खासकर उस की मीठी झील और खारा समुद्र का मेल, एलप्पी से चलने वाली यह झील कोच्चि तक जाती है. इस झील में जगहजगह छोटेछोटे टापू झील का सौंदर्य दोगुना कर देते हैं.
7 बजे जैसे ही मेरे पति घर में घुसे, सीधा प्रश्न किया, ‘‘बच्चों की कोई खबर आई?’’
‘‘हां, एलप्पी के लिए रवाना हो गए हैं, अब थोड़ी देर में पहुंचने ही वाले होंगे,’’ मैं ने पानी का गिलास उन के हाथ में देते हुए कहा.
‘‘बच्चों को गए 15 दिन हो गए, उन के बिना घर कितना सूनासूना लगता है,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर बोले, ‘‘याद है तुम्हें, एलप्पी में मोटरबोट में तुम कितना डर गई थीं, जब झील से हम समुद्र के हिलोरों के बीच पहुंचे थे. डर के मारे तुम ने तो मोटरबोट मोड़ने को ही कह दिया था,’’ कहते हुए वे होहो कर हंस पड़े.
‘‘अरे, बाप रे, आज भी याद करती हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मैं तो वैसे भी बहुत जल्दी घबरा जाती हूं. फोन पर राजीव को समझा दूंगी, नहीं तो बच्चे डर जाएंगे,’’ मैं ने उतावले हो कर कहा.
‘‘रहने दो, बच्चों को अपने हिसाब से, जो कर रहे हैं, करने दो, नसीहत देने की जरूरत नहीं है,’’ अपनी आदत के मुताबिक पति ने मुझे झिड़क दिया.
मैं पलट कर कुछ कहती कि फोन की घंटी बज उठी. इन्होंने फोन उठाया, ‘‘हां, बेटी सीमा, तुम एलप्पी पहुंच गए?’’
न जाने उधर से क्या जवाब मिला कि इन का चेहरा एकदम फक पड़ गया. बुझी आवाज में बोले, ‘‘ऐसा कैसे हो गया, ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’ आगे बोले, ‘‘क्या आरुषि का हाथ बिलकुल मुड़ गया है और आयुष का क्या हाल है.’’
इन के चेहरे के भाव बदल रहे थे. मैं भी घबराती हुई इन से सट कर खड़ी हो गई.
फोन में से टूटेफूटे शब्द मुझे भी सुनाई दे रहे थे, ‘‘राजीव को चक्कर आ रहे हैं और कमर में तेज दर्द हो रहा है, उठा भी नहीं जा रहा है.’’
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ये एकदम चिंतित हो कर बोले, ‘‘हां, ठीक है. एक बार पास ही के अस्पताल में दिखा दो. मैं कुछ सोचता हूं,’’ कह कर इन्होंने फोन धम्म से पटक दिया और वहीं बैठ गए.
मैं ने एकदम से प्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘‘बच्चों के संग क्या हो गया? कैसे हो गया? कहां हो गया और अब क्या सोच रहे हैं?’’
मेरे प्रश्नों को अनसुना करते हुए खुद ही बुदबुदाने लगे, ‘यह क्या हो गया, अच्छाभला बच्चे का सफर चल रहा था, एक बच्चा और मोटरसाइकिल को बचाने के चक्कर में गाड़ी असंतुलित हो कर एक खड़ी कार से टकरा गई. यह तो अच्छा है कि एलप्पी बिलकुल पास है, कम से कम अस्पताल तो जल्दी से पहुंच जाएंगे,’ यह कहते हुए वे ऊपर शून्य में देखने लगे.
मेरा मन बहुत अशांत हो रहा था. राजीव को चक्कर आ रहे हैं. कहीं सिर में तो चोट नहीं लग गई, यह सोच कर ही मैं कांप गई. सब से ज्यादा तो ये हताश हो रहे थे, ‘‘एलप्पी में तो क्या, साउथ में भी अपना कोई रिश्तेदार या दोस्त नहीं है, जो उन्हें जा कर संभाल ले. यहां उदयपुर से पहुंचने में तो समय लग जाएगा.’’
अचानक मुझे याद आया, ‘‘5-6 साल पहले अपने यहां कैल्लूर से सलीम भाई आते थे. हर 2-3 महीने में उन का एक चक्कर लग जाता था. उन से संपर्क करो,’’ मैं ने सलाह दी.
‘‘पर 5 साल से तो उन की कोई खबर नहीं है,’’ फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘मेरे ब्रीफकेस में से पुरानी डायरी लाना. शायद कोई नंबर मिल जाए.’’
मैं झटपट दौड़ कर डायरी ले आई. पन्ने पलटते हुए एक जगह कैल्लूर का नंबर मिल गया.
फटाफट नंबर लगाया तो नंबर मिल गया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहे हैं? हां, मैं उदयपुर से मदन…मदनलाल बोल रहा हूं. क्या सलीम भाई से बात हो सकती है?’’
‘‘अब यह फैक्टरी सलीम भाई की नहीं है, मैं ने खरीद ली है,’’ एक ठंडा स्वर सुनाई दिया.
‘‘ओह, देखिए, आप किसी तरह से सलीम भाई का नंबर दे सकते हैं, मुझे उन से बहुत जरूरी काम है,’’ इन की आवाज में लाचारी थी.
उधर से आवाज आई, ‘‘हमारे यहां एक अकाउंटेंट संजीव रेड्डी पुराना है, मैं उस से बात करवा देता हूं.’’
हमें एकएक पल भारी लग रहा था, ‘‘हैलो,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘हां, मैं रेड्डी बोल रहा हूं, हां जी, मैं सलीम भाई को जानता हूं. पर मुझे उन का नंबर नहीं मालूम है. हां, पर उन की लड़की कोच्चि में रहती है. उस का नंबर शायद मेरी लड़की के पास होगा. आप 5 मिनट बाद फोन मिलाएं. मैं पूछ कर बताता हूं.’’
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रेड्डी साहब के सहयोग से हमें सलीम भाई की लड़की शमीमा का नंबर मिल गया. उस से फटाफट हमें उस के भाई अशरफ का नंबर मिल गया.
नंबर मिलते ही हमारी आंखों में चमक आ गई, ‘‘हैलो, आप सलीम भाई के घर से बोल रहे हैं?’’
‘‘हां, जी, आप कहां से बोल रहे हैं,’’ उधर से आवाज आई.
‘‘जी, मैं उदयपुर से बोल रहा हूं. आप सलीम भाई से बात करवा दीजिए.’’
सौजन्य-सत्यकथा
उस ने अपने भाई सद्दाम से इस संबंध में बात कर सारी बात समझाई. सुलेमान पर लाखों रुपए की उधारी थी. कर्ज वालों को पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे और प्रेमिका की बात रखते हुए वह नया परिवार बसा लेगा.
इस के साथ ही इन दिनों सुलेमान अपनी पत्नी रोशनी से भी तंग आ चुका था. वह उस से छुटकारा पाना चाहता था. उस के एक कदम से सारे काम पूरे होते दिख रहे थे. यानी सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.
भाई सद्दाम ने हौसला बढ़ाते हुए कहा कि वह घर वालों को किसी तरह समझा लेगा. योजना के तहत 21 सितंबर को सुलेमान जीएसटी जमा करने के लिए घर से बोलेरो ले कर ड्राइवर इमरान के साथ मैनपुरी गया.
काम निपटाने के बाद ईशन नदी पुल महाराजा तेज सिंह की प्रतिमा के पास बोलेरो रोक कर उस ने इमरान को पूरी योजना समझाई और योजनानुसार उस ने उस का भी मोबाइल ले लिया. ईशन नदी पुल पर बोलेरो से उतर कर सुलेमान पैदल बस स्टैंड पहुंचा. वहां से टैक्सी ले कर भिवाड़ी में अपनी प्रेमिका के पास चला गया.
योजना के मुताबिक इमरान बोलेरो ले कर गांगसी नहर पुल के पास पहुंचा. गाड़ी खड़ी कर घटना को सच दिखाने के लिए इमरान को अपने सिर में चोट पहुंचाने के लिए रुपयों का लालच दे कर सुलेमान ने पहले ही तैयार कर लिया था. उस ने बदमाशों का आना दिखाने के लिए बोलेरो के शीशे भी रिंच (स्पैनर) से तोड़ दिए. और स्पैनर से ही अपने माथे पर चोट मार कर उस ने स्वयं को घायल कर लिया.
इस के बाद आगे नवाटेड़ा गांव पहुंच कर एक व्यक्ति से उस का मोबाइल फोन ले कर सुलेमान के पिता शौकीन अली व पुलिस को सुलेमान का अपहरण हो जाने की सूचना दी.
पिता ने सद्दाम को भाई सुलेमान के अपहरण के बारे में बताया. भाई सद्दाम को तो सब पता था ही. वह अपने अब्बू के साथ मौके पर पहुंचा. इस के बाद उस ने थाने पहुंच कर अज्ञात बदमाशों के विरुद्ध सुलेमान के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.
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भिवाड़ी में रह रहे सुलेमान को उस के दोस्त जाहिद ने बताया कि पुलिस तुम्हें तलाशते हुए कभी भी यहां आ सकती है. तुम अपनी प्रेमिका व बच्चों को ले कर नेपाल चले जाओ. नेपाल में उस के परिचित हैं, वे वहां तुम्हारे रहने का इंतजाम कर देंगे.
सुलेमान नेपाल भागने की फिराक में था, लेकिन उस से पहले ही पुलिस ने उसे दबोच लिया. जाहिद सुलेमान के गांव का ही रहने वाला है, वह पिछले 5 साल से भिवाड़ी में रह कर रेडीमेड कपड़े का काम करता है.
सुलेमान ने कमेटी की रकम में से आधी रकम जाहिद को देने का वादा किया था. दोस्ती व रुपयों के लालच में आ कर जाहिद भी षडयंत्र में शामिल हो गया था.
पुलिस के आगे सुलेमान व सहयोगियों की सारी चालाकी धरी रह गई. इमरान के सच कुबूल करते ही सुलेमान के नाटक का परदाफाश हो गया. फिर पुलिस ने सुलेमान और उस के मददगारों को गिरफ्तार करने में देर नहीं लगाई. चारों आरोपी पुलिस के हत्थे चढ़ गए. गिरफ्तारी के साथ ही पुलिस ने इस मुकदमे में चारों आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 364 के साथ 211/182/417/420/469/120बी/108 भी बढ़ा दी.
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 4 मोबाइल फोन, इन में एक मोबाइल इमरान का भी था, एक बोलेरो गाड़ी, घटना में प्रयुक्त टूल रिंच (स्पैनर) तथा 2 लाख 69 हजार 500 रुपए की नकदी बरामद की.
इस सनसनीखेज फरजी अपहरण कांड का पुलिस ने 24 घंटों के अंदर खुलासा कर दिया. इस के लिए आईजी ए. सतीश गणेश ने मैनपुरी पुलिस टीम को 40 हजार रुपए का तथा एसपी अजय कुमार पांडेय ने 25 हजार का इनाम दिया.
आरोपियों को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम में थानाप्रभारी ओमहरि वाजपेई, एसआई सर्विलांस प्रभारी जोगिंद्र, अमित सिंह, कांस्टेबल राजवीर सिंह, अमित, संदीप कुमार, जुगेंद्र सिंह, हरेंद्र सिंह, रोबिन सिंह, ललित छोकर, तरन सिंह व महिला कांस्टेबल निधि मिश्रा शामिल थीं.
इस मामले में कोई भूमिका न पाए जाने पर पुलिस ने सुलेमान की प्रेमिका परवीन व बच्चों को घर वालों को बुला कर उन के सुपुर्द कर दिया.
व्यापारी सुलेमान सहित चारों आरोपियों को 24 सितंबर, 2020 को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से चारों को जेल भेज दिया गया. प्यार में सुना है लोग अंधे हो जाते हैं और कुछ भी कर सकते हैं.
ऐसा ही सुलेमान व्यापारी ने इस मामले में किया. सुलेमान अब अपने भाई सद्दाम, दोस्त जाहिद व ड्राइवर इमरान के साथ जेल की सलाखों के पीछे है.
उधर परवीन के पति खुशाल निवासी शाहगंज ने मैनपुरी में सुलेमान की गिरफ्तारी की जानकारी होने के बाद 25 सितंबर को अपनी पत्नी व 2 बच्चों के अपहरण की रिपोर्ट आगरा के थाना शाहगंज में खिलाफ दर्ज करा दी.
एसपी (सिटी) बोत्रे रोहन प्रमोद ने बताया कि खुशाल की तरफ से सुलेमान के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. अब इस मामले में सुलेमान के खिलाफ काररवाई की जाएगी.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. परवीन परिवर्तित नाम है