इंटरनैट पोर्नोग्राफी से बच्चों को रखें दूर, वरना भुगतने होंगे ये नतीजे

Internet pornography: चाइल्ड पोर्नोग्राफी (Child Pornography) के मामले में भारत सब से बड़े कंज्यूमर (Conusmer) व डिस्ट्रीब्यूटर (Distributor) के तौर पर उभर रहा है. साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘स्कूल गर्ल’, ‘टीन्स’, ‘देसी गर्ल्स’ जैसे टौप सर्च बताते हैं कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी का बाजार कितना बड़ा है. जाहिर है इस के असली टारगेट स्कूली बच्चे ज्यादा हैं. इंटरनैट पर तैरती पोर्नोग्राफी व फ्री इंटरनैट डाटा सेवाओं ने ज्यादातर बच्चों के स्मार्टफोन में एडल्ट कंटैंट के फ्लो में इजाफा किया है. एक शोध के मुताबिक, 12 से 18 वर्ष तक के 90 प्रतिशत लड़के व 60 प्रतिशत लड़कियां पोर्नोग्राफी की जद में हैं. ये आंकड़े वाकई चिंताजनक हैं.

कुछ माह पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी से निबटने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा रहे हैं. सरकार ने जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 3 सदस्यीय पीठ से यह भी कहा था कि उस ने सीबीएसई से स्कूलों में जैमर लगाने पर विचार करने को कहा ताकि छात्रों को पोर्नोग्राफी साइट्स से दूर रखा जा सके. लेकिन 2-3 महीनों के बावजूद नतीजा कुछ नहीं निकला. सरकार की कमेटी और वादों की लापरवाही के तले सारे मुद्दे दब गए. सरकार भले ही सुप्रीम कोर्ट को करीब 3,523 चाइल्ड पोर्नोग्राफी साइट्स पर रोक लगाने का दावा करती हो लेकिन उन्हीं साइटों पर यह काम बदस्तूर जारी है.

जरूरी है इंटरनैट लेकिन…

आजकल पढ़नेलिखने वाले बच्चों को रैफरैंस जुटाने के लिए इंटरनैट जरूरी हो गया है. जाहिर है आज घरघर में इंटरनैट कनैक्शन हैं. और घर पर इंटरनैट होने का मतलब है पूरी दुनिया का कंप्यूटर के स्क्रीन पर सिमट कर आ जाना. इस में दोराय नहीं कि यह बहुत ही अच्छी बात है. बच्चे इंटरनैट सर्च करना पसंद भी करते हैं. लेकिन यह भी सचाई है कि कुछ किशोर उम्र के बच्चे इस का बेजा इस्तेमाल भी करते हैं.

इंटरनैट के दौरान विभिन्न साइटों में लुभावने विज्ञापन का भुलावा कभीकभी इन्हें भटका देता है. खासतौर पर वे विज्ञापन जो दोस्ती का झांसा दे कर बच्चोंकिशोरों को भटकाव के रास्ते ले जाते हैं. और बच्चे भी एक अनजानी, रहस्यमयी दुनिया के आकर्षण में खिंचे चले जाते हैं.

किंशुक पटेल एक अच्छा स्टूडैंट रहा है. अपनी कक्षा में टौप टैन में उस का नंबर आता रहा है. खेलकूद में भी भाग लेता रहा है. शाम को क्रिकेट तो कभी फुटबौल खेलने जाता. खेलने के अलावा किताबें पढ़ने का भी उसे शौक रहा है.

9वीं क्लास की फाइनल परीक्षा देने के बाद किंशुक कभीकभार कंप्यूटर पर गेम भी खेल लिया करता था. एक दिन उस ने चैट में अपना हाथ आजमाया. यह उसे कंप्यूटर गेम से कहीं अधिक भाया. अब अकसर वह चैटिंग करने बैठ जाया करता. कुछ ही दिनों में चैटिंग उस का शगल बन गया. मौका मिलते ही वह चैटिंग करने लगता. और चूंकि उस के मम्मीपापा दोनों वर्किंग हैं तो घर पर उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. मम्मीपापा की अनुपस्थिति में अगर वह कुछ करता तो वह सिर्फ और सिर्फ चैटिंग करता.

एक दिन उस ने विभिन्न साइटों पर आने वाले फ्रैंडशिप विज्ञापन पर क्लिक किया. इस के बाद दूसरे दिन उस ने चैटिंग पर भी अपना हाथ आजमाया. धीरेधीरे उस का हाथ खुलने लगा. जिज्ञासाएं बढ़ती चली गईं. और फिर एक दिन एस्कौर्ट सर्विस से ले कर पोर्नोग्राफी तक उस की पहुंच हो गई. एक तरफ किशोर मन पर बहुत सारे सवाल कुलबुलाने लगे तो दूसरी तरफ एक अनजानी व रहस्यमयी दुनिया का आकर्षण उसे खींचने लगा. अगले कुछ ही दिनों में किंशुक पर पोर्नोग्राफी का नशा छाने लगा.

ऐसा अकेले किंशुक के साथ हुआ, ऐसा नहीं है. ऐसा होना किशोर उम्र के बच्चों के साथ आम बात हो गई है. इंटरनैट पर बहुतकुछ मिलने के साथ पोर्नोग्राफी भी सहज उपलब्ध है. और इसीलिए घर पर बच्चों द्वारा इंटरनैट के इस्तेमाल के सिलसिले में मातापिता को सजग होना जरूरी होता है.

हाल ही में हुए सर्वेक्षण से पता चलता है कि 4 किशोर उम्र के लड़केलड़कियों में से एक इंटरनैट पर बिछे पोर्नोग्राफी के जाल में फंस जाता है. यही नहीं, ये भोलेभाले बच्चे, महज उत्सुकता के चक्कर में पड़ कर, इंटरनैट पर फ्रैंडशिप के कारण किसी न किसी तरह के झमेले में पड़ जाते हैं.

इसीलिए, कम या कच्ची उम्र के लड़केलड़कियों को इंटरनैट के इस्तेमाल का तरीका और कुछ गाइडलाइन तय कर देनी जरूरी है. और यह काम मातापिता या अभिभावक ही कर सकते हैं. बल्कि यह कहना चाहिए कि उन का यह फर्ज बनता है कि वे अपने बच्चों द्वारा इंटरनैट के इस्तेमाल के प्रति हमेशा सजग रहें, चौकस रहें. कुछ मोटी बातें उन्हें साफसाफ समझा दें, मसलन इंटरनैट पर फ्रैंडशिप से बचें.

अपरिचितों के साथ चैटिंग में न जाएं. अगर चैटिंग करते भी हैं तो किसी अपरिचित को अपना नाम, घर का पता, पारिवारिक सूचना व जानकारी और पासवर्ड न बताएं. किसी भी तरह के भुलावे या छलावे में न पड़ें. अपने ही घर पर इंटरनैट के इस्तेमाल का एक कल्चर तैयार करें.

कई घरों में यह सब होता भी है. लेकिन यहां समस्या यह है कि बच्चे पूरी तरह से उस गाइडलाइन को फौलो नहीं करते. कभी जानबूझ कर, तो कभी इंटरनैट पर छलावे और चकाचौंध में भटक कर. और कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो अपनी उम्र व समझ की तुलना में कुछ ज्यादा ही स्मार्ट होते हैं. वैसे भी, आजकल स्कूलों में कंप्यूटर पर विषय अलग से पढ़ने के कारण उन्हें अभिभावकों और मातापिता की आंखों में धूल झोंकना भी बखूबी आता है. ऐसे लड़केलड़कियां इंटरनैट के बेजा इस्तेमाल के बाद तथ्यों को डिलीट कर देते हैं. वे ऐसा न कर पाएं, इस के भी रास्ते हैं.

रेप की सजा काट चुका हूं, जिससे शादी होने वाली है उसे ये बात बताऊं या नहीं ?

सवाल

मैं 37 वर्षीय अविवाहित डाक्टर हूं, एक सरकारी अस्पताल में कौंट्रैक्ट बेसिस पर कार्यरत हूं. मैं एक लड़की से विवाह करना चाहता हूं. समस्या यह है कि इस से पहले मैं रेप के अपराध में 5 साल की जेल की सजा भुगत चुका हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं जिस लड़की से विवाह करना चाहता हूं उसे इस बारे में बताऊं या नहीं. हालांकि वह और उस का परिवार अगर जांच पड़ताल करेंगे, भी तो इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं चल पाएगा. पर मुझे क्या करना चाहिए, उन्हें सब कुछ बता देना चाहिए या नहीं?

जवाब

आप का परेशान होना जायज है लेकिन इस मामले में हमारी आप को यही सलाह होगी कि जिस लड़की के साथ आप अपनी आने वाली जिंदगी गुजारना चाहते हैं, उसे अपने अतीत से अवश्य वाकिफ कराएं, फिर उस के बाद वह लड़की जो निर्णय ले, उसे आप मंजूर करें. आप उसे पूरी बात विस्तार से बताएं और वर्तमान स्थिति से भी अवगत कराएं क्योंकि यह जानना उस का हक भी है. जहां तक आप का यह समझना कि लड़की और उस के परिवार वालों को आप के अतीत के बारे में पता नहीं चलेगा, इस गलतफहमी में न रहें. ऐसी बातें छिपाए नहीं छिपतीं, इसलिए उसे यह बात कहीं और से पता चले और उस का असर आप की आने वाली जिंदगी पर पड़े, इस से बेहतर है उसे आप सबकुछ सचसच बता दें. इसी में आप की भलाई है.

एक अनूठी खूनी साजिश

Crime News in Hindi: 6 भाईबहनों में गोपाल सेजाणी सब से छोटा था. कुछ समय पहले एक दुर्घटना में उस के पिता की मौत के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली थी. बच्चों को छोड़ कर वह दूसरे पति के साथ कहीं और जा कर रहने लगी थी. बच्चे अकेले पड़ गए तो उन की देखभाल के लिए उन के मौसा हरसुख पटेल आगे आए. उन्होंने बच्चों को सहारा दिया. उस समय गोपाल की उम्र यही कोई 11 साल थी. हरसुख अपने बच्चों की तरह उन की भी देखभाल कर रहे थे. सब ठीकठाक चल रहा था, लेकिन 8 फरवरी, 2017 को एक अनहोनी घट गई. शाम को हरसुख अपने स्कूटर पर गोपाल को बिठा कर गांव की तरफ आ रहे थे. उन का दोस्त महादेव भी उन के साथ था.

गांव के बाहर उन की मुलाकात नितेश मंड से हो गई. वह एनआरआई था, जो स्थाई रूप से लंदन में रहता था. उन दिनों वह भारत आया हुआ था. हरसुख को रोक कर वह उन से बातें करने लगा. उन्हें बातचीत करते हुए कुछ ही मिनट हुए होंगे कि मोटरसाइकिल से 2 लड़के आए और पास खड़े गोपाल को उठा कर भागने लगे.

नितेश ने उन का विरोध किया. जबकि हरसुख ने जान पर खेल कर गोपाल को बचाने की कोशिश की. लेकिन दोनों लड़कों के पास हथियार थे, जिस की वजह से वह उन का मुकाबला नहीं कर सके. वे लड़के हरसुख को घायल कर गोपाल को अपने साथ ले जाने में सफल हो गए. शोरशराबा सुन कर वहां काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. हरसुख गंभीर रूप से घायल थे, इसलिए उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया.

सूचना पा कर थानाप्रभारी ए.वी. टिल्वा पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए थानाप्रभारी ने मुख्य मार्गों की नाकेबंदी करवा दी. वह भी अपहर्त्ताओं को तलाशने लगे, पर उन का पता नहीं चल सका.

अगले दिन औटोचालक श्यामण अपने औटो से केशोड़ हाईवे से गुजर रहा था, तभी उस की निगाह अचानक एक गड्ढे की तरफ चली गई. उस गड्ढे में उसे एक छोटा लड़का जख्मी हालत में पड़ा दिखाई दिया. श्यामण ने औटो रोक कर देखा तो वह खून से लथपथ था. उस की सांस अभी चल रही थी. श्यामण उसे अपने औटो से केशोड़ अस्पताल ले गया.

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डाक्टरों ने बच्चे को बचाने की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन उस की मौत हो गई. अस्पताल प्रशासन द्वारा इस की सूचना पुलिस को दी गई तो थानाप्रभारी ए.वी. टिल्वा हरसुख को साथ ले कर केशोड़ अस्पताल पहुंच गए. हरसुख ने उस की शिनाख्त गोपाल सेजाणी के रूप में कर दी.

चलती सड़क पर सरेराह एक बच्चे के इस तरह अपहृत हो जाने से लोगों में डर बैठ गया था. जब उस की मौत की बात सामने आई तो मामला और उछल गया. पुलिस ने इस मामले को भादंवि की धारा 361 के तहत दर्ज कर लिया. बाद में इस में भादंवि की धाराएं 364 और 302 और जोड़ दी गईं. जूनागढ़ के एसपी निलेश जिगाडि़या ने इस सनसनीखेज मामले की जांच के लिए एक स्पैशल टीम गठित कर दी थी.

हरसुख पटेल ने अपनी शिकायत में किसी को आरोपी नहीं बनाया था और न ही किसी पर शंका जाहिर की थी. एसपी जिगाडि़या ने उन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. उन्होंने सीधेसीधे बताया कि साजिश रच कर गोपाल का अपहरण कर के उस की हत्या की गई है. अपहरण फिरौती के लिए नहीं, बल्कि किसी अन्य मकसद से किया गया है. इस के पीछे नितेश मंड के अलावा एनआरआई आरती का हाथ है.

एसपी ने आरती के बारे में पूछा तो हरसुख पटेल ने उन्हें आरती के बारे में विस्तार से बता दिया. 53 वर्षीया आरती लोकनाथ धार बरसों पहले भारत से लंदन गई थी और वहीं बस गई थी. कभीकभी वह भारत भी आती रहती थी. उन्होंने लंदन में अपना एक अपार्टमेंट बनवा लिया था, जिस में कई किराएदार रहते थे. उन्हीं में एक नितेश मंड भी था. नितेश से आरती की खासी बनती थी.

मूलरूप से नितेश पंजाब का रहने वाला था, लंदन जाने से पहले वह गुजरात में जा कर कारोबार करने लगा था. गुजरात के कई लोग उस के संपर्क में थे. उन्हीं में हरसुख पटेल भी थे. वह जूनागढ़ के पास मालियाहाटिन गांव में रहते थे. नितेश का भी वहां पर एक मकान था.

नितेश मंड से हरसुख की जानपहचान थी. करीब एक साल पहले की बात है. एक दिन नितेश हरसुख के पास आया. इधरउधर की बातें करने के बाद उस ने कहा, ‘‘हरसुख भाई, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां, कहो.’’ हरसुख ने सहज भाव से कहा.

‘‘आप ने अपनी साली के बच्चों की जो जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है, यह बहुत बड़ी बात है.’’ नितेश ने कहा.

‘‘पता नहीं यह बड़ी बात है या छोटी, पर इतना जरूर जानता हूं कि मैं अपना फर्ज पूरा कर रहा हूं. एक तरह से वे भी मेरे ही बच्चे हैं.’’

‘‘यह तो आप की महानता है हरसुख भाई, वरना आज के महंगाई के जमाने में अपने परिवार की गुजर करना ही मुश्किल हो रहा है, ऐसे में आप… इस बारे में मेरा मन आप की मदद करने को कर रहा है.’’

‘‘कैसी मदद?’’ हरसुख पटेल ने हैरानी से पूछा.

‘‘कुछ ऐसी मदद, जिस से आप के कंधे का बोझ थोड़ा हलका हो जाए और आप के सब से छोटे भांजे गोपाल का भविष्य भी संवर जाए.’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं, जो कुछ कहना चाहते हो, खुल कर कहो.’’ हरसुख ने नितेश के चेहरे को सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

‘‘ऐसा है हरसुख भाई, लंदन में जहां मैं रहता हूं, उस अपार्टमेंट की मालकिन एक सज्जन महिला हैं. वह मूलरूप से हिंदुस्तानी हैं. उन के पास बहुत कुछ है. इसलिए वह सब की मदद करती रहती हैं. वह बहुत ही नेकदिल औरत हैं.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है. लेकिन उन के बारे में आप मुझे क्यों बता रहे हैं?’’ हरसुख ने पूछा.

‘‘मैं उन के बारे में इसलिए बता रहा हूं क्योंकि इतनी भलाई का काम करने के बावजूद उन्हें संतान सुख नहीं मिला. एक बच्चे की मां कहलाने को तरसती हैं वह. मैं चाहता हूं कि…’’

‘‘…यानी कि मैं अपना गोपाल उन के हवाले कर दूं.’’ हरसुख ने नितेश की बात बीच में ही काट कर कहा.

‘‘अरे नहीं भाई, ऐसा नहीं है. उन्हें औलाद पैदा नहीं हुई तो इस का मतलब यह नहीं है कि वह किसी का बच्चा छीनना चाहती हैं.’’

‘‘तो क्या चाहती हैं वह?’’

‘‘दरअसल, वह एक भारतीय बच्चा कानून के अनुसार गोद लेना चाहती हैं. मैं सोचता हूं कि अगर आप के छोटे भांजे को उन का दत्तक पुत्र बना दिया जाए तो उस की जिंदगी बन जाएगी. आप इस बारे में सोच लीजिए.’’ नितेश ने कहा.

हरसुख सचमुच सोचने लगे. आखिर उन्होंने नितेश से कह दिया कि वह इस बारे में उसे कल बताएंगे. भांजे के उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए हरसुख ने नितेश का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इस के बाद नितेश एडौप्शन पेपर तैयार कराने लगा. उस ने आरती को भी भारत आने के लिए फोन कर दिया था. आरती भी लंदन से हिंदुस्तान आ गई.

हरसुख को हर तरह से आश्वस्त कर आरती ने बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी कर ली. उस के बाद हरसुख को समझाया कि वह बच्चे का पासपोर्ट बनवा कर रखें, जल्दी ही वीजा लगवा कर वह उसे अपने पास लंदन बुला लेगी. इस के बाद वह लंदन चली गई. नितेश भी उस के साथ चला गया था. यह सन 2015 की बात है.

हरसुख ने एसपी निलेश जिगाडि़या को बताया कि इस के बाद उन लोगों ने गोपाल के नाम से लंदन में ही जीवन बीमा करवा लिया था. इंडियन करेंसी के मुताबिक उस पौलिसी की वैल्यू एक करोड़ रुपए से भी ज्यादा थी. बीमा कराने के बाद वह उस से बच्चे का पासपोर्ट जल्द बनवाने को कहते रहे. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी बच्चे का पासपोर्ट नहीं बन सका, जिस से वह लंदन नहीं जा सका.

हरसुख की बात सुन कर एसपी सारा माजरा समझ गए. नितेश को संदेह के आधार पर हिरासत में ले कर पूछताछ की गई. इस पूछताछ में एनआरआई होने के नाते वह पुलिस को ही धमकाने लगा. पुलिस उस की धमकी में नहीं आई. उस से जब सख्ती से पूछताछ की गई तो तो उस ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए.

उस ने गोपाल की हत्या कराने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने 13 फरवरी, 2017 को उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर के 6 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में उस से सघन पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने पुलिस को गोपाल की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह एक अनोखी अपराध कथा थी—

लंदन में आरती धार के अपार्टमेंट में किराए पर रहते हुए नितेश मंड उस से काफी घुलमिल गया था. उम्र में अच्छाखासा अंतर होने की वजह से दोनों के बीच मांबेटे जैसा रिश्ता कायम हो गया था. दोनों आपस में सुखदुख भी साझा करने लगे थे.

एक दिन बातें करतेकरते दोनों ने अपनीअपनी आर्थिक परेशानियां बयान कर दीं. नितेश के पास जहां ढंग की नौकरी नहीं थी, वहीं आरती का कहना था कि भले ही उस ने ठीकठाक प्रौपर्टी बना ली थी, लेकिन उस के ऊपर बहुत कर्ज चढ़ गया था. वह कर्ज उतार पाना उस के लिए कठिन हो रहा था. लेनदार कंपनियां उसे परेशान कर रही थीं.

एक दिन सुबह दोनों बैठे चाय पी रहे थे, तभी अपनीअपनी परेशानियों का रोना रोने लगे. रोना रोतेरोते वे योजना बनाने लगे कि किस तरह एक ही झटके में मोटे पैसों का जुगाड़ किया जाए. इस बारे में बात करते हुए दोनों ने कई मुद्दों पर विचार किया.

आखिर नितेश ने एक तरकीब सुझाते हुए आरती को सुझाव दिया कि किसी गरीब बच्चे को गोद ले कर उस का मोटा लाइफ इंश्योरेंस करवा दिया जाए. कुछ दिनों बाद उस बच्चे की हत्या कर के इंश्योरेंस का क्लेम ले लिया जाएगा.

आरती को बात जंच गई. यह भी तय हो गया कि गोद लेने वाला बच्चा हिंदुस्तानी हो. लेकिन मोटा बीमा करवाने को प्रीमियम अदा करने के लिए उस के पास ज्यादा पैसा नहीं था. जब बीमा करोड़ रुपए से अधिक का होगा तो जाहिर है, उस का प्रीमियम भी बड़ा होगा. इसलिए आरती ने कहा कि उस के पास प्रीमियम देने के पैसे नहीं हैं.

नितेश ने कहा कि भारत में बच्चे को तलाश करने का काम वह भारत के ही रहने वाले अपने एक दोस्त पर छोड़ देता है. इस काम को वह जल्दी पूरा कर देगा. उसे भी इस योजना में शामिल कर लिया जाएगा. बीमा का प्रीमियम तीनों मिल कर बराबरबराबर अदा कर देंगे. बच्चे को लंदन ला कर कुछ दिनों तक उस का खूब ध्यान रखेंगे, ताकि किसी को पर शक न हो. उस के बाद बच्चे की रहस्यमय तरीके से हत्या कर इंश्योरेंस का क्लेम ले लिया जाएगा.

आरती ने खुश हो कर हामी भर दी. इस के बाद नितेश ने अपना काम करना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त कंवलजीत सिंह रायजादा से बात की तो उस ने योजना में शामिल होने की हामी भर दी. 28 वर्षीय कंवलजीत सिंह जूनागढ़ के कस्बा मालिया का रहने वाला था.

कंवलजीत किसी बच्चे की तलाश करने लगा. जल्दी ही उस ने मालियाहाटिना के रहने वाले हरसुख पटेल के भांजे गोपाल सेजाणी के बारे में जानकारी हासिल कर ली. उस ने यह बात फोन द्वारा नितेश को बताते हुए कहा कि अगर वह या आरती भारत आ कर गोद लेने वाले बच्चे गोपाल के मौसा से बात कर लें तो काम हो सकता है. नितेश ने ऐसा ही किया. पहले वह भारत आया और हरसुख से बात की. बाद में बात फाइनल हो गई तो आरती भी भारत आ गई.

दोनों ने गोपाल सेजाणी को गोद लेने की काररवाई पूरी कर ली. इस के बाद आरती और नितेश लंदन चले गए. वहां उन्होंने गोपाल का भारतीय मुद्रा के हिसाब से 1.30 करोड़ रुपए का जीवन बीमा करवा दिया. इस के लिए बीमा कंपनी को 13 लाख का प्रीमियम देना पड़ा, जो आरती, नितेश और कंवलजीत ने मिल कर दिया.

गोपाल को लंदन ले जा कर मौत के घाट उतारने का काम पहले ही साल में कर दिया जाना था. लेकिन पासपोर्ट न बन पाने की वजह से उसे लंदन नहीं ले जाया जा सका. देखतेदेखते एक साल का समय निकल गया. इस बीच बीमा कंपनी का 13 लाख का आगामी प्रीमियम ड्यू हो गया. इस बार इन लोगों को यह रकम अदा करने में काफी परेशानी हुई.

इस के बाद तय किया गया कि आगामी प्रीमियम ड्यू होने से पहले ही गोपाल का काम तमाम कर दिया जाए. वह लंदन नहीं आ पाता तो इंडिया में इस की व्यवस्था की जाए. इस की जिम्मेदारी कंवलजीत को सौंपी गई. कंवलजीत अकेला काम को अंजाम नहीं दे सकता था, इसलिए उस ने एक बदमाश से बात की.

नितेश भी लंदन से इंडिया आ गया. योजना बना कर कंवलजीत और उस के साथी ने 8 फरवरी, 2017 को गोपाल का अपहरण कर के उसे चाकुओं से गोद डाला. अगले दिन अस्पताल में उस की मौत हो गई.

नितेश मंड के बाद पुलिस ने गोपाल की हत्या के आरोप में कंवलजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस का साथी फरार हो गया था. अभी तक आरती को डिपोर्ट नहीं किया जा सका है.

कथा तैयार होने तक जूनागढ़ पुलिस ने नितेश और कंवलजीत के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया था. केस के अन्य वांछित आरोपियों के गिरफ्तार होने पर सप्लीमेंट चालान तैयार कर के अदालत में दाखिल कर दिया जाएगा.

टूटे हुए पंखों की उड़ान : अर्चना के किसने काटे पर

गली में घुसते ही शोरगुल के बीच लड़ाईझगड़े और गालीगलौज की आवाजें अर्चना के कानों में पड़ीं. सड़ांध भरी नालियों के बीच एक संकरी गली से गुजर कर उस का घर आता था, जहां बरसात में मारे बदबू के चलना मुश्किल हो जाता था.

दुपट्टे से नाक ढकते हुए अर्चना ने घर में कदम रखा, तो वहां का नजारा ही दूसरा था. आंगन के बीचोंबीच उस की मां और पड़ोस वाली शीला एकदूसरे पर नाक फुलाए खड़ी थीं. यह रोज की बात थी, जब किसी न किसी बात पर दोनों का टकराव हो जाता था.

मकान मालिक ने किराए के लालच में कई सारे कोठरीनुमा कमरे बनवा रखे थे, मगर सुविधा के नाम पर बस एक छोटा सा गुसलखाना और लैट्रिन थी, जिसे सब किराएदार इस्तेमाल करते थे.

वहां रहने वाले किराएदार आएदिन किसी न किसी बात को ले कर जाहिलों की तरह लड़ते रहते थे. पड़ोसन शीला तो भद्दी गालियां देने और मारपीट करने से भी बाज नहीं आती थी.

गुस्से में हांफती, जबान से जहर उगलती प्रेमा घर में दाखिल हुई. पानी का बरतन बड़ी जोर से वहीं जमीन पर पटक कर उस ने सिगड़ी जला कर उस पर चाय का भगौना रख दिया.

‘‘अम्मां, तुम शीला चाची के मुंह क्यों लगती हो? क्या तुम्हें तमाशा कर के मजा आता है? काम से थकहार कर आओ, तो रोज यही सब देखने को मिलता है. कहीं भी शांति नहीं है,’’ अर्चना गुस्से से बोली.

‘‘हांहां, तमाशा तो बस मैं ही करती हूं न. वह तो जैसे दूध की धुली है. सब जानती हूं… उस की बेटी तो पूरे महल्ले में बदनाम है. मक्कार औरत नल में पानी आते ही कब्जा जमा कर बैठ जाती है. उस पर मुझे भलाबुरा कह रही थी.

‘‘अब तू ही बता, मैं कैसे चुप रहूं?’’ चाय का कप अर्चना के सामने रख कर प्रेमा बोली.

‘‘अच्छा लाडो, यह सब छोड़. यह बता कि तू ने अपनी कंपनी में एडवांस पैसों की बात की?’’ यह कहते हुए

प्रेमा ने बेटी के चेहरे की तरफ देखा भी नहीं था अब तक, जो दिनभर की कड़ी मेहनत से कुम्हलाया हुआ था.

‘‘अम्मां, सुपरवाइजर ने एडवांस पैसे देने से मना कर दिया है. मंदी चल रही है कंपनी में,’’ मुंह बिचकाते हुए अर्चना ने कहा, फिर दो पल रुक कर उस ने कुछ सोचा और बोली, ‘‘जब हमारी हैसियत ही नहीं है तो क्या जरूरत है इतना दिखावा करने की. ननकू का मुंडन सीधेसादे तरीके से करा दो. यह जरूरी तो नहीं है कि सभी रिश्तेदारों को कपड़ेलत्ते बांटे जाएं.’’

‘‘यह क्या बोल रही है तू? एक बेटा है हमारा. तुम बहनों का एकलौता भाई. अरी, तुम 3 पैदा हुईं, तब जा कर वह पैदा हुआ… और रिश्तेदार क्या कहेंगे? सब का मान तो रखना ही पड़ेगा न.’’

‘‘रिश्तेदार…’’ अर्चना ने थूक गटका. एक फैक्टरी में काम करने वाला उस का बाप जब टीबी का मरीज हो कर चारपाई पर पड़ गया था, तो किसी ने आगे आ कर एक पैसे तक की मदद नहीं की. भूखे मरने की नौबत आ गई, तो 12वीं का इम्तिहान पास करते ही एक गारमैंट फैक्टरी में अर्चना ने अपने लिए काम ढूंढ़ लिया.

अर्चना के महल्ले की कुछ और भी लड़कियां वहां काम कर के अपने परिवार का सहारा बनी हुई थीं.

अर्चना की कमाई का ज्यादातर हिस्सा परिवार का पेट भरने में ही खर्च हो जाता था. घर की बड़ी बेटी होने का भार उस के कंधों को दबाए हुए था. वह तरस जाती थी अच्छा पहननेओढ़ने को. इतने बड़े परिवार का पेट पालने में ही उस की ज्यादातर इच्छाएं दम तोड़ देती थीं.

कोठरी की उमस में अर्चना का दम घुटने लगा, सिगड़ी के धुएं ने आंसू ला दिए. सिगड़ी के पास बैठी उस की मां खांसते हुए रोटियां सेंक रही थी.

‘‘अम्मां, कितनी बार कहा है गैस पर खाना पकाया करो… कितना धुआं है,’’ दुपट्टे से आंखमुंह पोंछती अर्चना ने पंखा तेज कर दिया.

‘‘और सिलैंडर के पैसे कहां से आएंगे? गैस के दाम आसमान छू रहे हैं. अरी, रुक जा. अभी धुआं कम हो जाएगा, कोयले जरा गीले हैं.’’

अर्चना उठ कर बाहर आ गई. कतार में बनी कोठरियों से लग कर सीढि़यां छत पर जाती थीं. कुछ देर ताजा हवा लेने के लिए वह छत पर टहलने लगी. हवा के झोंकों से तनमन की थकान दूर होने लगी.

टहलते हुए अर्चना की नजर अचानक छत के एक कोने पर चली गई. बीड़ी की महक से उसे उबकाई सी आने लगी. पड़ोस का छोटेलाल गंजी और तहमद घुटनों के ऊपर चढ़ाए अपनी कंचे जैसी गोलगोल आंखों से न जाने कब से उसे घूरे जा रहा था.

छोटेलाल कुछ महीने पहले ही उस मकान में किराएदार बन कर आया था. अर्चना को वह फूटी आंख नहीं सुहाता था. अर्चना और उस की छोटी बहनों को देखते ही वह यहांवहां अपना बदन खुजाने लगता था.

शुरू में अर्चना को समझ नहीं आया कि वह क्यों हर वक्त खुजाता रहता है, फिर जब वह उस की बदनीयती से वाकिफ हुई, तो उस ने अपनी बहनों को छोटेलाल से जरा बच कर रहने की हिदायत दे दी.

‘‘यहां क्या कर रही है तू इतने अंधेरे में? अम्मां ने मना किया है न इस समय छत पर जाने को. चल, नीचे खाना लग गया है,’’ छोटी बहन ज्योति सीढ़ियों पर खड़ी उसे आवाज दे रही थी.

अर्चना फुरती से उतर कर कमरे में आ गई. गरम रोटी खिलाती उस की मां ने एक बार और चिरौरी की, ‘‘देख ले लाडो, एक बार और कोशिश कर के देख ले. अरे, थोड़े हाथपैर जोड़ने पड़ें, तो वह भी कर ले. यह काम हो जाए बस, फिर तुझे तंग न करूंगी.’’

अर्चना ने कमरे में टैलीविजन देखती ज्योति की तरफ देखा. वह मस्त हो कर टीवी देखने में मगन थी. ज्योति उस से उम्र में कुल 2 साल ही छोटी थी. मगर अपनी जवानी के उठान और लंबे कद से वह अर्चना की बड़ी बहन लगती थी.

9वीं जमात पास ज्योति एक साड़ी के शोरूम में सेल्सगर्ल का काम करती थी. जहां अर्चना की जान को घरभर के खर्च की फिक्र थी, वहीं ज्योति छोटी होने का पूरा फायदा उठाती थी.

‘‘अम्मां, ज्योति भी तो अब कमाती है. तुम उसे कुछ क्यों नहीं कहती?’’

‘‘अरी, अभी तो उस की नौकरी लगी है, कहां से ला कर देगी बेचारी?’’ मां की इस बात पर अर्चना चुप हो गई.

‘‘ठीक है, मैं फिर से एक बार बात करूंगी, मगर कान खोल कर सुन लो अम्मां, यह आखिरी बार होगा, जब तुम्हारे इन फुजूल के रिवाजों के लिए मैं अपनी मेहनत की कमाई खर्च करूंगी.’’

‘‘हांहां, ठीक है. अपनी कमाई की धौंस मत जमा. चार पैसे क्या कमाने लगी, इतना रोब दिखा रही है. अरे, कोई एहसान नहीं कर रही है हम पर,’’ गुस्से में प्रेमा का पारा फिर से चढ़ने लगा.

एक कड़वाहट भरी नजर अपनी मां पर डाल कर अर्चना ने सारे जूठे बरतन मांजने के लिए समेटे.

बरतन साफ कर अर्चना ने अपना बिस्तर लगाया और सोने की कोशिश करने लगी, उसे सुबह जल्दी उठना था, एक और जद्दोजेहद भरे दिन के लिए. वह कमर कस के तैयार थी. जब तक हाथपैर चलते रहेंगे, वह भी चलती रहेगी. उसे इस बात का संतोष हुआ कि कम से कम वह किसी के सामने हाथ तो नहीं फैलाती.

अर्चना के होंठों पर एक संतुष्टि भरी फीकी मुसकान आ गई और उस ने आंखें मूंद लीं.

अटूट बंधन : अनजानी लड़की और ट्रेन का खूबसूरत सफर

ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार पर थी. जंगल, पेड़पौधे, पहाड़, नदीनाले सभी पीछे की ओर भागते जा रहे थे. मैं 6 साल बाद अपने गांव जा रहा था. मैं अपने खयालों में खोया बीते दिनों के बारे में सोच रहा था कि जब घर से निकला था, तो कुरतेपाजामे में हाथ में गठरी ले कर दिल्ली के लिए रवाना हुआ था.

मन में एक अजीब सा डर था कि इतने बड़े शहर में मैं कैसे रह पाऊंगा, लेकिन कुछ ही दिनों में मैं भी ‘शहरी बाबू’ बन गया और एक कंपनी में नौकरी भी लग गई.

मेरे सामने की सीट पर एक सुंदर लड़की अपने बूढ़े पिता के साथ बैठी थी. वह देखने में बहुत ही साधारण परिवार की लग रही थी. वह ठीक मेरी बिंदु जैसी लग रही थी. उसे देख कर मैं कुछ पलों के लिए अपने अतीत में खो गया. हम दोनों गांव में एकसाथ पढ़े थे. बचपन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, हमें पता भी नहीं चला. हम दोनों स्कूल के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर घंटों बातें किया करते थे.

एक दिन बातें करतेकरते उस ने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया, ‘अच्छा, बताओ, तुम मुझे एकटक क्यों देख रहे हो? तुम अपने मन की बात क्यों नहीं बोलते? तुम मुझे चाहते हो, यह बात क्या मैं नहीं जानती…’

‘तुम जानती हो बिंदु?’

‘मैं जानती न होती, तो तुम्हारे साथ अकेले में क्यों मिलती… क्या तुम इतना भी नहीं जानते?

‘मुझे प्यार भी करते हो और इतनी पराई भी समझाते हो. तुम्हारे प्यार पर मैं अपनी जान भी कुरबान कर सकती हूं,’ इतना कहते हुए उस ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए.

मेरे बदन में एक अजीब सी मदहोशी छाने लगी. मुझे पहली बार किसी लड़की के जिस्म की गरमी महसूस हुई. मेरा दिल बहुत तेजी से धड़कने लगा.

बिंदु अचानक जमीन पर लेट गई. उस के सीने का उतारचढ़ाव मुझे पागल बना रहा था. उस की आंखों में विनती और होंठों पर मुसकराहट थी.

मुझे बिंदु पहले से ज्यादा हसीन लग रही थी. उस के जिस्म की गरमी से मैं अपने दिल पर काबू नहीं रख सका और मैं ने चुंबनों की झड़ी लगा दी.

उस दिन हम लोग जो फिसले, तो फिसलते ही चले गए. उस के बाद जब भी मौका मिलता, हम दोनों के जवान जिस्म एक हो जाते और तन की प्यास बुझ लेते.

अचानक एक दिन हम लोगों को गांव के कुछ लोगों ने रंगे हाथों पकड़ लिया. इस से बहुत बवाल मच गया, क्योंकि मैं ऊंची जाति और बिंदु नीची जाति से ताल्लुक रखती थी.

कुछ बुजुर्ग लोगों के बीचबचाव करने से मामला शांत हुआ और तय किया गया कि पंचायत में फैसला किया जाएगा.

शाम के समय में हम दोनों को पंचायत के सामने पेश किया गया.

सरपंच ने पूछा, ‘क्या तुम दोनों ने जिस्मानी संबंध बना लिए हैं?’

मैं बोला, ‘मैं बिंदु से प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं.’

उसी समय मेरे पिता एक थप्पड़ मारते हुए मुझ से बोले, ‘एक तो गलती की, ऊपर से गांव वालों के सामने मेरी इज्जत का जनाजा निकाल रहे हो.’

काफी बहस के बाद हम दोनों को सजा सुनाई गई. मुझे 6 साल के लिए गांव से बाहर रहने का हुक्म सुनाया गया और हमारे घर वालों को बिंदु की शादी का आधा खर्चा उठाने का आदेश हुआ…

तभी ट्रेन प्लेटफार्म पर रुकी. मेरी मंजिल आ गई थी. ट्रेन से उतर कर मैं बस पकड़ कर अपने गांव जा पहुंचा.

उस दिन तो घर वालों और पासपड़ोस से मिलनेजुलने में ही समय बीत गया. मैं रातभर करवटें बदलता रहा और बिंदु के बारे में सोचता रहा.

दूसरे दिन मैं ने अपने दोस्त दीपक से बिंदु के बारे में पूछा.

दीपक ने बताया, ‘‘तुम्हारे जाने के एक महीने बाद ही अजीतपुर में उस की शादी हो गई. शादी के कुछ दिन बाद ही उस के पति का एक्सीडैंट हो गया और उस की मौत हो गई.’’

इतना सुनते ही मुझे लगा कि जैसे आसमान टूट पड़ा हो. दीपक आगे बोला, ‘‘उस के ससुराल वालों ने उसे मनहूस कहते हुए घर से निकाल दिया.

‘‘बिंदु अपने मायके आई और अब वह इसी गांव में अपने भाई के साथ रहती है. उस के पिता यह सदमा बरदाश्त न कर सके और चल बसे. उस की भाभी उसे हमेशा ताने देती है और दिनभर घर का काम करवाती है.’’

मैं बोला, ‘‘मैं बिंदु से कैसे मिल सकता हूं?’’

‘‘बिंदु दोपहर में कपड़े धोने नदी पर जाती है… मिलने का वही समय ठीक रहेगा.’’

मैं ठीक समय पर नदी किनारे पहुंच गया. थोड़ी देर में ही बिंदु आती हुई दिखाई दी. मैं उस के सामने खड़ा हो गया.

मुझे देखते ही वह बोली, ‘‘तुम… यहां?’’

‘‘कैसी हो बिंदु?’’

‘‘ठीक हूं.’’

उस की दशा देख कर मैं अपनेआप को रोक न सका. मैं ने जैसे ही उस

का हाथ पकड़ना चाहा, वह बोली, ‘‘मेरा हाथ मत पकड़ो, मैं अब तुम्हारे लायक नहीं रही. अगर कोई देख लेगा, तो फिर बवाल मच जाएगा.’’

मैं बोला, ‘‘अब कोई भी ताकत हम दोनों को जुदा नहीं कर सकती. मैं तुम से शादी करूंगा.’’

‘‘लेकिन समाज ऐसे रिश्तों को नहीं मानता. क्योंकि मैं एक छोटी जाति की हूं और अब विधवा भी हो चुकी हूं. तुम कोई अच्छी सी लड़की देख कर शादी कर लो,’’ इतना कहते हुए वह रो पड़ी और हाथ छुड़ा कर चली गई.

उस दिन के बाद मैं रोज बिंदु से मिलने लगा. आखिर बात कब तक छिपती?

एक दिन उड़ती हुई यह खबर उस के भाई के कानों तक पहुंच गई. उस ने बिंदु के बाहर आनेजाने पर रोक लगा दी.

मैं उस से मिलने के लिए बेचैन हो गया. एक रात मैं चोरों की तरह उस के घर पहुंचा. बिंदु जमीन पर सोई हुई थी, मैं ने उसे धीरे से जगाया.

मुझे देखते ही उस ने मुंह से आवाज निकालनी चाही, लेकिन मैं ने उसे चुप रहने का इशारा किया, फिर धीरे से पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

बिंदु बोली, ‘‘मेरे भैयाभाभी ने घर से निकलने पर भी रोक लगा दी है. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती. अगर जीना है तो तुम्हारे साथ, नहीं तो मरूंगी भी तुम्हारे साथ.’’

तब मैं ने फैसला किया कि हम लोग गांव से भाग कर दिल्ली में कोर्ट मैरिज कर लेंगे.

एक रात जब गांव के लोग गहरी नींद में सोए हुए थे, हम लोग अपने घर से निकल कर स्टेशन पहुंचे और दिल्ली जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए.

हम दोनों बालिग थे, इसलिए जल्दी ही हम ने शादी कर ली.

गंध मादन : कर्नल साहब क्यों निराश नहीं किया

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मौन: जब दो जवां और अजनबी दिल मिले – भाग 1

सर्द मौसम था, हड्डियों को कंपकंपा देने वाली ठंड. शुक्र था औफिस का काम कल ही निबट गया था. दिल्ली से उस का मसूरी आना सार्थक हो गया था. बौस निश्चित ही उस से खुश हो जाएंगे.

श्रीनिवास खुद को काफी हलका महसूस कर रहा था. मातापिता की वह इकलौती संतान थी. उस के अलावा 2 छोटी बहनें थीं. पिता नौकरी से रिटायर्ड थे. बेटा होने के नाते घर की जिम्मेदारी उसे ही निभानी थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी रहा है. मल्टीनैशनल कंपनी में उसे जौब पढ़ाई खत्म करते ही मिल गई थी. आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक तो वह था ही, बोलने में भी उस का जवाब नहीं था. लोग जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे. कई लड़कियों ने उस से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन अभी वह इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था.

श्रीनिवास ने सोचा था मसूरी में उसे 2 दिन लग जाएंगे, लेकिन यहां तो एक दिन में ही काम निबट गया. क्यों न कल मसूरी घूमा जाए. श्रीनिवास मजे से गरम कंबल में सो गया.

अगले दिन वह मसूरी के माल रोड पर खड़ा था. लेकिन पता चला आज वहां टैक्सी व बसों की हड़ताल है.

‘ओफ, इस हड़ताल को भी आज ही होना था,’ श्रीनिवास अभी सोच में पड़ा ही था कि एक टैक्सी वाला उस के पास आ कानों में फुसफुसाया, ‘साहब, कहां जाना है.’

‘अरे भाई, मसूरी घूमना था लेकिन इस हड़ताल को भी आज होना था.’

‘कोई दिक्कत नहीं साहब, अपनी टैक्सी है न. इस हड़ताल के चक्कर में अपनी वाट लग जाती है. सरजी, हम आप को घुमाने ले चलते हैं लेकिन आप को एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी होगी. वे भी मसूरी घूमना चाहती हैं. आप को कोई दिक्कत तो नहीं,’ ड्राइवर बोला.

‘कोई चारा भी तो नहीं. चलो, कहां है टैक्सी.’

ड्राइवर ने दूर खड़ी टैक्सी के पास खड़ी लड़की की ओर इशारा किया.

श्रीनिवास ड्राइवर के साथ चल पड़ा.

‘हैलो, मैं श्रीनिवास, दिल्ली से.’

‘हैलो, मैं मनामी, लखनऊ से.’

‘मैडम, आज मसूरी में हम 2 अनजानों को टैक्सी शेयर करना है. आप कंफर्टेबल तो रहेंगी न.’

‘अ…ह थोड़ा अनकंफर्टेबल लग तो रहा है पर इट्स ओके.’

इतने छोटे से परिचय के साथ गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर ने बताया, ‘सर, मसूरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर शांत और खूबसूरत जगह धनौल्टी है. आज सुबह से ही वहां बर्फबारी हो रही है. क्या आप लोग वहां जा कर बर्फ का मजा लेना चाहेंगे?’

मैं ने एक प्रश्नवाचक निगाह मनामी पर डाली तो उस की भी निगाह मेरी तरफ ही थी. दोनों की मौन स्वीकृति से ही मैं ने ड्राइवर को धनौल्टी चलने को हां कह दिया.

गूगल से ही थोड़ाबहुत मसूरी और धनौल्टी के बारे में जाना था. आज प्रत्यक्षरूप से देखने का पहली बार मौका मिला है. मन बहुत ही कुतूहल से भरा था. खूबसूरत कटावदार पहाड़ी रास्ते पर हमारी टैक्सी दौड़ रही थी. एकएक पहाड़ की चढ़ाई वाला रास्ता बहुत ही रोमांचकारी लग रहा था.

बगल में बैठी मनामी को ले कर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे. मन हो रहा था कि पूछूं कि यहां किस सिलसिले में आई हो, अकेली क्यों हो. लेकिन किसी अनजान लड़की से एकदम से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

मनामी की गहरी, बड़ीबड़ी आंखें उसे और भी खूबसूरत बना रही थीं. न चाहते हुए भी मेरी नजरें बारबार उस की तरफ उठ जातीं.

मैं और मनामी बीचबीच में थोड़ा बातें करते हुए मसूरी के अनुपम सौंदर्य को निहार रहे थे. हमारी गाड़ी कब एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच गई, पता ही नहीं चल रहा था. कभीकभी जब गाड़ी को हलका सा ब्रेक लगता और हम लोगों की नजरें खिड़की से नीचे जातीं तो गहरी खाई देख कर दोनों की सांसें थम जातीं. लगता कि जरा सी चूक हुई तो बस काम तमाम हो जाएगा.

जिंदगी में आदमी भले कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न हो पर नीचे देख कर गिरने का जो डर होता है, उस का पहली बार एहसास हो रहा था.

‘अरे भई, ड्राइवर साहब, धीरे… जरा संभल कर,’ मनामी मौन तोड़ते हुए बोली.

‘मैडम, आप परेशान मत होइए. गाड़ी पर पूरा कंट्रोल है मेरा. अच्छा सरजी, यहां थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोकता हूं. यहां से चारों तरफ का काफी सुंदर दृश्य दिखता है.’

बचपन में पढ़ते थे कि मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है. आज वास्तविकता देखने का मौका मिला.

गाड़ी से बाहर निकलते ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास हुआ. चारों तरफ से धुएं जैसे उड़ते हुए कोहरे को देखने से लग रहा था मानो हम बादलों के बीच खड़े हो कर आंखमिचौली खेल रहे होें. दूरबीन से चारों तरफ नजर दौड़ाई तो सोचने लगे कहां थे हम और कहां पहुंच गए.

अभी तक शांत सी रहने वाली मनामी धीरे से बोल उठी, ‘इस ठंड में यदि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा रहता.’

‘चलिए, पास में ही एक चाय का स्टौल दिख रहा है, वहीं चाय पी जाए,’ मैं मनामी से बोला.

हाथ में गरम दस्ताने पहनने के बावजूद चाय के प्याले की थोड़ी सी गरमाहट भी काफी सुकून दे रही थी.

मसूरी के अप्रतिम सौंदर्य को अपनेअपने कैमरों में कैद करते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी धनौल्टी के नजदीक पहुंचने लगी वैसे ही हमारी बर्फबारी देखने की आकुलता बढ़ने लगी. चारों तरफ देवदार के ऊंचेऊंचे पेड़ दिखने लगे थे जो बर्फ से आच्छादित थे. पहाड़ों पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने सफेद चादर ओढ़ा दी हो. पहाड़ एकदम सफेद लग रहे थे.

पहाड़ों की ढलान पर काफी फिसलन होने लगी थी. बर्फ गिरने की वजह से कुछ भी साफसाफ नहीं दिखाई दे रहा था. कुछ ही देर में ऐसा लगने लगा मानो सारे पहाड़ों को प्रकृति ने सफेद रंग से रंग दिया हो. देवदार के वृक्षों के ऊपर बर्फ जमी पड़ी थी, जो मोतियों की तरह अप्रतिम आभा बिखेर रही थी.

गाड़ी से नीचे उतर कर मैं और मनामी भी गिरती हुई बर्फ का भरपूर आनंद ले रहे थे. आसपास अन्य पर्यटकों को भी बर्फ में खेलतेकूदते देख बड़ा मजा आ रहा था.

‘सर, आज यहां से वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा. आप लोगों को यहीं किसी गैस्टहाउस में रुकना पड़ेगा,’ टैक्सी ड्राइवर ने हमें सलाह दी.

‘चलो, यह भी अच्छा है. यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और अच्छी तरह से एंजौय करेंगे,’ ऐसा सोच कर मैं और मनामी गैस्टहाउस बुक करने चल दिए.

‘सर, गैस्टहाउस में इस वक्त एक ही कमरा खाली है. अचानक बर्फबारी हो जाने से यात्रियों की संख्या बढ़ गई है. आप दोनों को एक ही रूम शेयर करना पड़ेगा,’ ड्राइवर ने कहा.

‘क्या? रूम शेयर?’ दोनों की निगाहें प्रश्नभरी हो कर एकदूसरे पर टिक गईं. कोई और रास्ता न होने से फिर मौन स्वीकृति के साथ अपना सामान गैस्टहाउस के उस रूम में रखने के लिए कह दिया.

अरबाज खान की बनीं नई गर्लफ्रेंड, जानें कौन है शूरा खान

बौलीवुड इंडस्ट्री के पॉपुलर एक्टर अरबाज खान इन दिनों एक बार फिर लव लाइफ को लेकर चर्चा में बने हुए हैं. बीते दिनों खबर आई थी कि 56 साल के अरबाज खान को एक बार फिर प्यार हो गया है और इसको लेकर वह काफी सीरियस हैं. अब खबर आ रही है कि अरबाज खान जल्द ही अपनी गर्लफ्रेंड से शादी करने वाले हैं. अब उनके फैंस ये जानने के लिए बेसब्र है कि अरबाज खान की गर्लफ्रेंड कौन है और दोनों कब शादी करने वाले हैं.

 

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आपको बता दें कि अरबाज खान और मलाइका अरोड़ा ने साल 1998 में शादी की थी और दोनों का साल 2017 में तलाक हो गया. इन दोनों के एक बेटा अरहान खान है. लेकिन अब खबरें आ रही है कि अरबाज खान और शूरा खान एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं और दोनों जल्द शादी करने वाले हैं. खबरों की माने तो अरबाज खान और शूरा खान आने वाले 24 दिसंबर को शादी के बंधन में बंध सकते हैं. अरबाज खान और शूरा खान की शादी का फंक्शन मुंबई में होगा और इसमें सिर्फ परिवार के सदस्य और करीबी लोग शामिल होंगे.

 

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अरबाज खान की कथित गर्लफ्रेंड शूरा खान का बॉलीवुड इंडस्ट्री से कनेक्शन है लेकिन वह एक्ट्रेस नहीं हैं. दरअसल, शूरा खान मेकअप आर्टिस्ट हैं और बॉलीवुड के तमाम सितारों के साथ जुड़ी हैं. बताया जा रहा है कि शूरा खान की उम्र 29 साल है और वह अरबाज खान से 27 साल छोटी हैं. अरबाज खान और शूरा खान की मुलाकात फिल्म ‘पटना शुक्ला’ के सेट पर हुई थी. इसके बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं.

रानी चटर्जी ने किया जबरदस्त ट्रांसफोर्मेशन, 79 किलो वजन को दी मात

भोजपुरी इंडस्ट्री की सबसे टॉप एक्ट्रेस रानी चटर्जी अक्सर किसी न किसी वजह से सुर्खियों में छाई रहती हैं. एक्ट्रेस इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं अपने फैंस के साथ तस्वीरें और वीडियोज शेयर कर रही हैं. रानी चटर्जी का ग्लैमरस अंदाज लोगों को काफी पसंद आता है. यह कहना गलत नहीं होगा कि रानी चटर्जी की हर अदा पर लाखों लोग फिदा हैं. लेकिन एक समय ऐसा था जब रानी का लोग मजाक उड़ाते हैं. रानी के बढ़ते वजन को देखकर लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि उनका करियर अब खत्म हो जाएगा. हालाकि रानी ने समय रहते ही अपने आपको पूरी तरह से बदल लिया है.


दरअसल, कुछ सालों पहले रानी चटर्जी का वजन अचानक से बढ़ गया था. इस वजह से उनका करियर खतरे में पड़ गया था. रानी चटर्जी का बढ़ता वजन देख लोग उनसे सवाल पूछते थे. कई लोग तो रानी चटर्जी को ट्रोल भी करने लगे थे. हालांकि भोजपुरी अदाकारा रानी चटर्जी ने अपनी मेहनत और लगन से सभी का मुंह बंद कर दिया था. रिपोर्ट्स की मानें तो भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने कुछ दिनों में ही अपना वजन कम कर लिया था. रानी चटर्जी का नया अवतार देख फैंस गदगद हो गए थे. बता दें कि अब रानी चटर्जी हर रोज जिम में घंटों पसीना बहाती हैं.


बताते चलें कि भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. उनकी फोटोज और वीडियोज इंटरनेट पर आते ही छा जाते हैं. रानी चटर्जी के हर लुक पर फैंस अपनी जान छिड़कते हैं. साड़ी से लेकर बोल्ड अवतार तक, एक्ट्रेस रानी चटर्जी की ड्रेसिंग सेंस लोगों को खूब पसंद आती है.

खुशियां आई घर : बांटने से खुशियां बढ़ती है

विश्वनाथ ने अपने घर में बगिया लगाई हुई थी. एक आम पर कच्ची कैरियां लदी थीं. गरीब घर के मोहित और राधिका ने कैरियां तोड़ कर खा लीं. यह देख कर विश्वनाथ को अपना बचपन याद आ गया, जब वे किसी को अपने मकान के पेड़ से फल नहीं तोड़ने देते थे. क्या उन्होंने मोहित और राधिका को सजा दी?

विश्वनाथ पटना शहर में बने आलीशान घर में अकेले ही रहते थे. उन के बच्चे विदेश में अपनी ही दुनिया में मस्त थे. विश्वनाथ ने भी अपनेआप को बिजी रखने के लिए घर के पिछले हिस्से में कई तरह के फलदार पेड़ लगा रखे थे.

विश्वनाथ सुबहसुबह रोजाना एक घंटा बगिया में काम करते थे. उन की मेहनत रंग लाई. इस बार आम का पेड़ कैरियों से लद गया था.

झुग्गियों में रहने वाले मोहित और राधिका कालोनी में लोगों की कारों की सफाई करने का काम करते थे.

एक दिन दोपहर में वे दोनों जब विश्वनाथ के घर के पिछवाड़े में लगे आम के पेड़ की छांव में सुस्ताने बैठ गए, तो उन का ध्यान ऊपर गया.

कच्ची कैरियों को देख कर राधिका का मन ललचा उठा, ‘‘मोहित, मेरे लिए एक आम तोड़ दो.’’

‘‘नहीं, किसी से बिना पूछे फल नहीं लेते,’’ मोहित बोला.

‘‘तू तो ऐसे कह रहा है, जैसे पूछने से तुझे तोड़ने देंगे…’’

‘‘इतना ही खाना जरूरी है, तो खरीद कर क्यों नहीं खाती…’’

‘‘मोहित, मैं तुझे धन्ना सेठ नजर आती हूं क्या? इतना कमा लेती तो दुकान से बढि़या कपड़े न खरीद लेती. बालटी उठाउठा कर कमर दोहरी हो जाती है, तब कहीं 10-20 रुपए हाथ आते हैं. उन को भी मां को देना पड़ता है, तब कहीं मेरे घर चूल्हा जलता है.’’

‘‘राधिका, मेरा भी तो यही हाल है, वरना कसम से खरीद कर खिला देता तुझे कच्ची कैरी.’’

‘‘चलचल, तू तो रहने ही दे. तुझ से न हो पाएगा, मैं ही कुछ करती हूं,’’ राधिका ने इधरउधर नजर दौड़ाई. उसे एक लकड़ी दूर पड़ी हुई दिखाई दी. वह उसे उठा कर ले आई और निशाना साध कर लकड़ी फेंकी, पर वह कैरी तक पहुंच ही नहीं पाई.

राधिका गुस्से में मुंह फुला कर वहां से चल दी.

‘‘ओहो, राधिका… कहां चल दी…’’

‘‘जहन्नुम में…’’

‘‘रुको जरा… मैं भी आ रहा हूं…’’

‘‘ओहो, तुम भी… न, तुम मेरे पीछे मत आओ.’’

‘‘यह सड़क तुम्हारी नहीं है…

सभी के लिए बनी है…’’

‘‘ओह… ठीक है…’’

‘‘अब यह फिक्र जताने की नौटंकी मेरे सामने मत करना, वरना कट्टी… राधा रानी, गुस्सा थूक दो. चलो, मैं तुम्हें उसी पेड़ से कैरी तोड़ देता हूं…’’

‘‘सच में देगा… झठ तो नहीं बोल रहा…’’

‘‘चलो, न तोड़ कर दूं तब कहना…’’

राधिका मुड़ कर फिर पेड़ के नीचे पहुंच गई.

मोहित ने डंडा उठा कर कई बार कैरी पर निशाना साधा और जोर से डंडा फेंक कर मारा. झट से 2 कच्चे आम राधिका की झोली में आ गिरे.

राधिका खुशी से नाच उठी और वहीं बैठ कर आम खाने लगी.

‘‘मुझे भी तो दे आम… अकेले ही खा जाएगी क्या…’’

‘‘मरा क्यों जा रहा है… लड़कियां कच्चे आम खाती हैं, लड़के नहीं खाते…’’

‘‘तुझ से किस ने कहा कि लड़के कच्चे आम नहीं खाते…’’

‘‘मेरी मां भाई को खाने से मना करती है…’’

‘‘वैसे, तेरा भी अभी कच्चे आम खाने का समय नहीं आया है…’’

सोलह बरस की राधिका का मुंह शर्म से लाल हो गया, ‘‘चल हट, बेशर्म कहीं का…’’

पास बैठे मोहित ने राधिका के माथे पर हवा से लहराती बालों की लट को आहिस्ता से अपने हाथों से संवार दिया.

राधिका ने मोहित को धीरे से धक्का दिया, ‘‘दूर से बात करो…’’ और दोनों खिलखिला कर हंस दिए.

मोहित और राधिका उठ कर झुग्गियों की तरफ बढ़ गए.

विश्वनाथ कुछ देर पहले बगिया में आए थे और दोनों को बातें करते देख पेड़ की ओट में हो गए. उन की तरफ दोनों की पीठ थी, इसलिए वे उन का चेहरा नहीं देख पाए. वे मुसकराते हुए अंदर चले गए.

अगले दिन विश्वनाथ दोपहर में बारबार खिड़की से झांक कर देख रहे थे कि अब वह लड़का आए और देखें कौन है, लेकिन उस दिन कोई नहीं आया.

अगले दिन विश्वनाथ बगीचे में टहल रहे थे कि तभी आम के पेड़ पर हलचल हुई. वे एक पेड़ की आड़ से देखने लगे. लड़के ने डंडी मारी और कुछ आम जमीन पर गिर पड़े. साथ खड़ी लड़की ने लपक कर वे उठा लिए.

अब अकसर वे दोनों उसी आम के पेड़ के नीचे समय बिताते नजर आते. विश्वनाथ को मोहित में अपना पोता नजर आता था. उन्हें दूर से देख कर ही मन को एक अजीब सी शांति मिलती थी.

एक दिन बरामदे में बैठे विश्वनाथ सोचने लगे… आज से 40 साल पहले वे पिताजी के साथ कानपुर में रहते थे. रेलवे के क्वार्टरों में पीछे बगीचा था. घर रेलवे स्टेशन के पीछे ही बना था, तो रेल की पटरियों पर कबाड़ बीनने वाले बच्चे घूमते हुए आते और दोपहर में मौका पा कर फल तोड़ लिया करते.

पिताजी से शिकायत करते तो वे यही कहते, ‘खाने की चीज है, खाने दो… बेचारे खरीद कर तो खा नहीं सकते…’

विश्वनाथ को इस बात पर बहुत गुस्सा आता था. वे भुनभुनाते हुए पढ़ने बैठ जाते, लेकिन उन का ध्यान अमरूद के पेड़ पर ही रहता? और जब भी वे बच्चों को देखते, उन्हें भगा कर ही दम लेते.

एक दिन पिताजी ने विश्वनाथ को टोका, ‘विशू, अमरूद पक कर गिरते जा रहे हैं. तुम भी इतना खाते नहीं हो… बेचारे बच्चों को ही खाने दो…’

लेकिन विश्वनाथ को तो जिद हो गई थी कि इन बच्चों को नहीं खाने देना है. नतीजतन, अमरूद पकपक कर गिरने लगे और सड़ने लगे. पिताजी ने तुड़वा कर पड़ोसियों को देने के लिए कहा, तो विश्वनाथ को वह भी पसंद नहीं आया.

तब पिताजी ने कहा, ‘बेटा, बांटने से खुशियां बढ़ती हैं.’

लेकिन विश्वनाथ को समझ में कुछ नहीं आता था. वे गुस्से से पैर पटकते हुए अंदर चला जाते और फल की टोकरी उठा कर बेमन से सभी पड़ोसियों को बांट आते थे. पर, आज बच्चों को फल तोड़ते देख कर विश्वनाथ को गुस्सा नहीं आया.

पिछले कुछ दिनों तक बच्चे पेड़ के पास दिखाई नहीं दिए. विश्वनाथ का मन बेचैन रहा. इस बीच आम पक गए थे. आज ही माली ने सुबह तोड़ कर रख दिए.

विश्वनाथ ने माली के साथ पड़ोसियों को आम बंटवा दिए और कुछ माली काका को दे दिए. कुछ आम उन बच्चों के लिए भी रखवा लिए.

‘‘माली काका, अगर आप को एक लड़का और लड़की साथ में दिखाई दें, तो उन्हें घर बुला लेना.’’

‘‘जी साहब, नजर आए तो जरूर बुला लेंगे,’’ कह कर माली निराईगुड़ाई करने लगा.

‘‘राधिका, एक भी आम पेड़ पर नहीं है,’’ मोहित ने कहा.

‘‘वह देख माली काका… हमें यहां देख लेंगे तो पकड़े जाएंगे… चल जल्दी…’’ राधिका बोली.

आवाज सुन कर माली ने पीछे मुड़ कर  देखा और बोले, ‘‘यहां आओ…’’

‘‘जी, हम ने कोई आम नहीं तोड़ा है…’’ मोहित ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों को हमारे साहब बुला रहे हैं… अंदर आ जाओ…’’

‘‘मोहित, मत जाना… दाल में कुछ काला है,’’ राधिक मोहित के कान में फुसफुसाई.

‘‘जो होगा देखा जाएगा… ओखली में सिर दिया है, तो डरना क्या…’’

‘‘मोहित, आज बड़ी कहावतें याद आ रही हैं. अगर मार पड़ी न तो नानी भी याद आ जाएगी.’’

मोहित और राधिका डरते हुए माली काका के पीछेपीछे चल दिए. घर में घुसे तो बैठक में एक बुजुर्ग बैठे थे. उन्होंने एकसाथ ‘दादाजी नमस्ते’ कहा.

विश्वनाथ ने उन दोनों को बैठने का इशारा किया.

राधिका अपने कपड़े समेट कर जमीन पर बैठ गई, जबकि मोहित अभी भी खड़ा हुआ था.

‘‘मोहित… यही नाम है न तुम्हारा?’’

‘‘जी हां, मेरा नाम मोहित है… आप को कैसे पता चला?’’

‘‘आम के पेड़ पर बने दिल में लिखा देखा था तुम दोनों का नाम.’’

राधिका और मोहित शरमा गए.

‘‘शरमाओ मत… बैठ जाओ…’’

मोहित भी राधिका के पास बैठ गया.

‘‘माली काका, इन बच्चों को आम काट कर खाने को दो.’’

‘‘जी मालिक, अभी लाया…’’ माली काका प्लेट में आम काट कर ले आए और बच्चों के सामने प्लेट रख दी.

‘‘बच्चो, आम खाओ…’’

राधिका मोहित की तरफ हैरानी से देखने लगी.

मोहित ने प्लेट से आम का टुकड़ा उठा कर राधिका को दिया. दोनों बैठ कर आम खाने लगे. विश्वनाथ को आज से पहले कभी ऐसे सुकून का अनुभव नहीं हुआ था.

‘‘माली काका, इन बच्चों को घर ले जाने के लिए भी आम दे दो,’’ विश्वनाथ ने कहा.

माली ने आम दे कर बच्चों को विदा कर दिया. जाते हुए बच्चों को देख कर विश्वनाथ हाथ हिलाते रहे और बोले, ‘‘बच्चो, जब भी समय मिले, मुझ से मिलने आते रहना.’’

‘‘राधिका, आज तो बच गए… मार नहीं पड़ी. अभी तक तो यही होता था कि कोई भी हमें चपत लगा देता था.’’

‘‘आज तो कमाल ही हो गया. कितने अच्छे वाले दादाजी हैं. मैं यों ही डर ही रही थी.’’

बच्चों के चले जाने के बाद विश्वनाथ आरामकुरसी पर बैठ कर मुसकरा पड़े.

देखतेदेखते कब 3 बरस बीत गए, पता ही नहीं चला. मोहित और राधिका को कालोनी के सैक्रेटरी से कह कर विश्वनाथ ने कम्यूनिटी हाल की देखरेख की नौकरी दिलवा दी थी. तब से दोनों मन लगा कर काम कर रहे थे.

एक दिन मोहित अपनी शादी का कार्ड देने के लिए आया, ‘‘दादाजी,

मैं राधिका से शादी कर रहा हूं. आप हम दोनों को आशीर्वाद देने जरूर आइएगा. आप की बात सैक्रेटरी साहब नहीं टालते हैं. सैक्रेटरी साहब ने हमारी के शादी के लिए कम्यूनिटी हाल दे दिया है.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा हुआ. सारा इंतजाम कालोनी वालों के सहयोग से हो गया है. मैं तुम दोनों बच्चों को आशीर्वाद देने जरूर आऊंगा.’’

शादी वाले दिन विश्वनाथ जब कम्यूनिटी हाल पहुंचे, तो उन्हें देखते ही राधिका और मोहित स्टेज से उतर कर आए और उन के पैर छुए और उन्हें आदर समेत स्टेज पर ले गए.

दोनों के सिर पर हाथ रखते ही विश्वनाथ की खुशी से आंखें भर आईं. राधिका दुलहन के रूप में बहुत सुंदर लग रही थी.

विश्वनाथ ने नई जिंदगी की शुरुआत के लिए राधिका और मोहित के नाम 50,000 रुपए का चैक उपहार में दिया.

विश्वनाथ घर आते हुए सोच रहे थे, ‘पिताजी, आप ठीक कहते थे… बांटने से खुशियां बढ़ती हैं.’

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