Crime Story: गोंडा में औनर किलिंग – लड़की को करंट लगा कर मारा

Crime Story: उत्तर प्रदेश का गोंडा जिला अपनी चीनी इंडस्ट्री के लिए मशहूर है, पर यहीं से एक ऐसी खबर आई है, जो समाज और परिवार में फैले जहर की दर्दनाक मिसाल है. यहां के पांडेय बाबा पुरवा इलाके में रहने वाली 19 साल की शिवानी पांडेय की 30 जनवरी, 2026 की सुबह संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. इस बारे में शिवानी के पिता चंद्र प्रकाश पांडे और भाई राहुल ने सुबह 7 बजे पुलिस को सूचना दी और बताया कि शिवानी कपड़े इस्तरी कर रही थी और करंट लगने से उस की मौत हो गई.


पर यह मामला इतना सीधा था नहीं, क्योंकि इसी बीच शिवानी के प्रेमी ने उस के पिता और भाई के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करा दिया. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची. शिवानी की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज कर जांच शुरू की. साथ ही, पुलिस को यह भी पता चला कि शिवानी का गांव में रहने वाले परमेश्वर पाठक से तकरीबन 5 साल से अफेयर चल रहा था. जब यह बात शिवानी के पिता और भाई को मालूम हुई, तो उन्होंने शिवानी को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन शिवानी यह रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार नहीं थी.


इस के बाद पुलिस ने शिवानी के भाई और पिता को गिरफ्तार कर लिया. कड़ाई से हुई पूछताछ में उन दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. क्यों हुआ यह कांड 28 मई, 2025 को शिवानी के प्रेमी परमेश्वर पाठक ने उस के पिता चंद्र प्रकाश पांडे से शादी को ले कर बात की थी, लेकिन उन्होंने शादी करने से इनकार कर दिया. बाद में किसी तरह नवंबर, 2025 में शादी तय हुई, लेकिन उस से पहले ही परमेश्वर पाठक के पिता की मौत हो गई और यह शादी टल गई.


हाल ही में फिर से शादी की बात उठी, लेकिन शिवानी के घर वालों ने साफ मना कर दिया. इतना ही नहीं, वे शिवानी के साथ मारपीट भी करने लगे. इस बात से तंग आई शिवानी ने अपने प्रेमी परमेश्वर पाठक को 2 बार चिट्ठी लिख कर भेजी और उस ने डर जाहिर किया कि उस के साथ कुछ भी गलत हो सकता है. इधर, शिवानी के पिता और भाई गुस्से में थे. पुलिस पूछताछ में इन दोनों आरोपियों ने बताया कि वारदात वाले दिन शिवानी सुबह के तकरीबन 5 बजे घर से चुपचाप भागने की फिराक में थी. यह पता चलने पर वे शिवानी को कमरे में ले गए और भाई राहुल ने उसे तख्त पर लिटा दिया, फिर उस के हाथों को मफलर से बांध दिया.


इस के बाद पिता चंद्र प्रकाश ने शिवानी के मुंह को दुपट्टे से बांधा और बिजली की इस्तरी के तार से उस के पैर में करंट लगाया गया. इस से कुछ देर में तड़पतड़प कर उस की मौत हो गई. इस पूरे मामले के बारे में एसपी विनीत जायसवाल ने बताया कि बेटी की पिता और भाई ने मिल कर हत्या की थी और पुलिस को गुमराह करने के लिए करंट से मौत की सूचना दी थी, पर पोस्टमौर्टम रिपोर्ट और आरोपियों के कुबूलनामे
से मामले का खुलासा हो गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.                                

Hindi Story: होली पर खुली पोल

Hindi Story: रंगतेज पालजी को अपनी ताई की असीम कृपा से भारतीय नाट्यकला केंद्र में प्रवेश मिल गया. वहां होली के रंगोत्सव के लिए नाटक तैयार करने के लिए राइटर और डायरैक्टर साहब ने उन्हें जो रोल प्ले करने के लिए दिया उस में उन्हें अपनी कभी होली खेलने वाली प्रेमिका को उस के घर जा कर रंग लगाना था. उन्होंने नाटक की स्क्रिप्ट बिना पढ़े ही अपना यह रोल करने की ठान ली.


दरअसल, जवानी के दिनों में होली पर रंगतेज पालजी ने अपना दिलफेंक पानी भरा गुब्बारा आसपड़ोस की जवान लड़कियों पर मारा था. यह बात अलग थी कि उन का पानी भरा गुब्बारा किसी एक को भी लगा. हां, एक बार पड़ोस वाली सविता भाभी जरूर उन के फटे गुब्बारे के पानी पर फिसली थीं. उन की गोरी टांग में फ्रैक्चर हुआ तो उन्हें अपनी कार में उन की बनारसी साड़ी उन के घुटनों तक उठा कर आहिस्ता से बैठा कर अस्पताल ले जाना पड़ा था.


खबर पा कर जब तक सविता के पति अस्पताल पहुंचे तब तक तो अस्पताल के परचे में पति के नाम की जगह पर रंगतेज पाल का नाम दर्ज हो चुका था. सविता टूटा पैर लिए स्ट्रैचर पर बैठी थीं और रंगतेज पालजी उन को अपने हाथों से उन की पीठ से सरके पल्लू को साइड से और सरकाते हुए उन की कट स्लीव्स ओपन गहरे कट वाले ब्लाउज से झांकती गुलाबी पीठ को अपने धड़ से लगा कर जकड़े हुए थे. उन के पति को आता देख वे संभले और बिल्ली रास्ता काट गई जैसी हालत से गुजर कर तुरंत सावधान हो गए.


खैर, बात चल रही थी होली के नाटक में रोल प्ले करने की तो अनुभवी रंगतेज पालजी ने अपनेआप को संभाला, रंगीन रंगों से लैस किया. राइटर और डायरैक्टर साहब ने बताया कि तुम्हें धोखे से होली खेलने वाली अपनी प्रेमिका के घर में घुस कर उस के थानेदार बाप से बच कर उसे रंग लगाना है. ‘बुरा मानो होली हैकह कर सबक सिखाना है. उन की बांछें फिर खिल उठीं. वे तैयार होने लगे.


वाशरूम में 4-5 बार शेव बनाने के बाद जब उन्हें अपना चेहरा चिकना और सलोना लगने लगा तो मेकअपरूम में पहुंचे. आईने के सामने खड़े हो कर अपने माथे पर लाल बिंदी, आंखों में काजल, गालों पर गुलाबी चटक रोज, होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक और बौबकट बालों पर औरतों जैसी लंबी चुटिया वाली विग लगा कर अपनी मांग में चुटकीभर सिंदूर भी भर लिया.


चेहरे की खूबसूरती को पूरा करने के बाद उन्होंने पेटीकोट और साड़ीब्लाउज को पहनने के लिए उठाया और जैसे ही उन्होंने इधरउधर देख कर सावधानी से अपनी पैंट उतारने के लिए उस के आगे का बटन खोला और जिप के रोलर को नीचे की तरफ सर्र से सरकाया ही था कि एकाएक उन्हेंसावधानी हटी दुर्घटना घटीवाला मूलमंत्र याद गया, सो, उन्होंने तुरंत जिप के रोलर को सर्र से ऊपर की तरफ चढ़ाने के बाद आगे का बटन बंद कर लिया. अपने तन से पैंट और टीशर्ट को नहीं उतारा.


पैंट के ऊपर ही पेटीकोट पहन लिया और टीशर्ट के ऊपर जैसे ही ब्लाउज पहन साड़ी पहनने लगे तो उन का ध्यान आईने में चला गया. अपनी खूबसूरती पर इतराते हुए पहले तो भाभियों सी मुसकराहट मारी, देवर सी आंख मारी और इठलातेइतराते हुएआंखों ही आंखों में इशारा हो गया, बैठेबैठे जीने का सहारा हो गया…’ गीत गाते हुए अपनी आंखों के इशारे से आड़ीतिरछी नैनकटारी मारने की प्रैक्टिस करने लगे.


आईने में ब्लाउज के एरिया पर ध्यान गया तो अपने सपाट हिस्से को भरने के लिए उन्होंने अटैंडैंट छोटू को भेज कर तुरंत 2 संतरे मंगवा लिए. छोटू के मेकअपरूम से बाहर जाते ही उन्होंने दोनों संतरे अपने ब्लाउज में फिट कर लिए. मगर अंदर ब्रा पहने होने के कारण उन दोनों संतरों के निकल कर गिर जाने का डर उन के मन में समाया तो ?ाटपट उन्होंने राइटर और डायरैक्टर साहब को इंटरकौम कर के एक ब्रा का इंतजाम करवाया. फिर ब्रा पहन कर उस में संतरे महफूज रख लिए.


साड़ी पहनी तो फिर मन में खयाल आया कि क्यों बेबी बंप भी बना लिया जाए. आड़े वक्त में काम आएगा. अगर दुष्ट सास यानी प्रेमिका की मां सामने गईं तो मेरा बेबी बंप देख तरस खा कर कुछ बोलेंगी. उन्होंने अपना बेबी बंप बनाने के लिए तुरंत पेटीकोट को ऊपर की तरफ चढ़ाया और अपने मजबूत अंडरवियर बनियान का सहारा ले कर सोफासैट के एक कुशन को उस के अंदर सैट किया तो उन का बेबी बंप कभी ज्यादा ऊपर की तरफ उठा हुआ दिखे तो कभी नीचे की तरफ ?ाका हुआ.

खैर, कस कर साड़ी लपेटने के बाद साड़ी के पल्लू की मदद से वे अपना नया बेबी बंप बनाने में कामयाब हो गए. मेकअप रूम से बाहर निकल वे मंच पर पहुंच गए. प्ले चालू हो चुका था. उन का रोल आया तो वे अपना नया बेबी बंप संभाल आहिस्ता से मंच पर चढ़े. रोल के मुताबिक, सब से पहले उन का सामना हुआ होने वाले खुर्राट थानेदार ससुर से. मगर वह उन को पहचान पाया और सामने आती प्रैग्नैंट लुगाई को देख अपना सिर नीचे की ओर कर के घर से बाहर निकल गया.


फिर सामना हुआ होने वाली सास यानी प्रेमिका की मां से. तो वे अपने बेबी बंप पर हाथ फेर उन से बोले, ‘‘चाची, होली मुबारक हो. महल्ले में नई आई हूं. ये तो अपने औफिस के दोस्तों के साथ होली खेलने बाहर निकल गए तो मैं ने सोचा, होली का मौका है, मां भी साथ में नहीं है. ऐसे में आप से ही मिल कर होली की शुभकामनाएं बांट लूं, आप का आशीर्वाद ले लूं.’’ चाची को भी अपने जमाने का बेबी बंप याद गया, वे बोलीं, ‘‘आओ, पलंग पर संभल कर बैठ जाओ. मैं तुम्हारे लिए होली के पकवान ले कर आती हूं.’’


चाची रसोई में जाने से पहले अपनी हसीन बिटिया रजनी को आवाज दे कर बुलाती हैं और नई पड़ोस वाली प्रैग्नैंट भाभी से परिचय करवाती हुई कहती हैं, ‘‘रजनी, बैठ जा इन के पास और कुछ गुर ले ले इन से. आज नहीं तो कल तु? भी ससुराल जा कर ऐसे ही पेट फुला कर मेरे पास बच्चा जनने आना होगा.’’ रजनी शरमा जाती है और अपनी मम्मी के रसोई में जाते ही उन के पास ही पलंग पर बैठ जाती है.


प्रैग्नैंट भाभी को मौके की तलाश थी. रजनी को पलंग पर अकेला साथ बैठा हुआ देख मानो, अंधे को दो नैन मिल गए हों, ऐसा महसूस करते हुए उन्होंने अपनी प्रेमिका को अपनी भरपूर बांहों में प्यार से जकड़ा. सिर पर हाथ फेरते हुए उस के बदन को नीचे तक सहलाया. उस के साथ गले लग कर ?ामे और नजर बचा कर अपना पेटीकोट उठा कर उस के नीचे पहनी हुई पैंट की जेब से रंगगुलाल निकाल उस को जम करबुरा मानो होली हैकहते हुए पोत दिया लेकिन होली खेलने के चक्कर में वे औरतों वाली दबी हुई आवाज में बोलना भूल गए और एकाएक मर्दाना आवाज में सबकुछ बोल गए.


रजनी को शक हुआ और इस बार उस ने प्यार से भाभी को थोड़ा जोर से गले लगाया कि तभी उन के दोनों संतरे ब्रा में से निकल जमीन पर गिर पड़े. संतरे बाहर निकल गिरते हुए देख वे तुरंत दौड़ कर घर से बाहर निकलने लगे तो उन का बेबी बंप भी ज्यादा नीचे लटक गया. यह सब देख रजनी को अब दाल में कुछ काला नजर गया. उस ने रंग लगा कर लालपीला कर के जाती हुई भाभी की चुटिया को पीछे से आहिस्ता से पकड़ कर वापस रोकना चाहा तो चुटिया ही हाथ में गई. तब सारा मामला सम? रजनी चौंकी और उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे, तुम?’’


‘‘बुरा मानो रजनी, तुम्हारे प्यार ने मेरा यह हाल कर दिया जो मेरे साथ शादी करने के बाद तुम्हारा हाल होना चाहिए था. इस होली के मौके पर तुम्हें रंगने के चक्कर में मेरा हो गया. ‘‘अब मु? जाने दो. मेरा काम तो हो गया. वैसे भी, कहीं मांजी गईं और उन को सब पता चल गया तो दिन में रात हो जाएगी. वे लातों से मारमार कर मु? काला भूत बना देंगी.’’ तभी रजनी ने आंगन में रखी पानी से भरी बालटी अपनी पड़ोस वाली प्रैग्नैंट भाभी पर यह कहते हुए उड़ेल डाली, ‘‘जाओ, अब घर जाओ. अब कभी चोर नहीं, असली मर्द बन कर सामने आना. मैं तभी तुम से शादी करूंगी वरना अगली होली तक किसी और की हो लूंगी.’’    Hindi Story                       

Hindi Story: बच्चों के भीतर नफरत का बीज

Hindi Story: बच्चे जन्म से हिंसक नहीं होते. उन का मन एक कोरे कागज की तरह होता है, जिस पर समाज, परिवार और माहौल अपनेअपने रंग भरते हैं. यह हम हैं, बड़े लोग, जो अनजाने में या जानबू? कर बच्चों के मन में प्रेम, करुणा और भाईचारे के बीज बो सकते हैं या फिर नफरत, डर और शक के जहरीले अंकुर उगा सकते हैं.


आज सब से बड़ा और सब से चिंताजनक सवाल यही है कि हमारे बच्चों के भीतर दूसरे धर्म, जाति और समुदाय के प्रति नफरत और अविश्वास का बीज आखिर बो कौन रहा है? बचपन सीखने की उम्र है. बच्चे अपने आसपास जो देखते हैं, सुनते हैं और महसूस करते हैं, वही उन की पर्सनैलिटी की बुनियाद बनता है. घरपरिवार की बातचीत, बड़ों की सोच, महल्ले की चर्चाएं, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों की भाषा और यहां तक कि चुटकुलों अफवाहों का असर भी उन के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है. वह वही सच मान लेता है, जो उस के भरोसेमंद बड़े उसे बताते हैं.


पर आज हालत यह है कि बहुत छोटेछोटे बच्चे ऐसे राजनीतिक और धार्मिक जहर से लैस कर दिए जा रहे हैं, जिसे वे सम? भी नहीं सकते. एक 11 साल के बच्चे को महात्मा गांधी की जन्मतिथि या पुण्यतिथि की जानकारी नहीं है, लेकिन उसे यहज्ञानजरूर दे दिया गया है कि मुसलिमों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और जो भारत में रह गए, वे गांधी कीगलतीकी वजह से रह गए.


वह बच्चा यह भी मानता है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ मुसलिम हैं. सवाल यह नहीं है कि यह बच्चा ऐसा क्यों सोचता है, बल्कि सवाल यह है कि उसे यह सोच सिखाई किस ने? दूसरी ओर, एक मुसलिम बच्चे को यह बताया जाता है कि हिंदुओं के घरों में शादीब्याह के मौके पर दाल में जो घी डाला जाता है, वह सूअर की चरबी का होता है. जब उस परिवार से पूछा जाता है कि यह बात उसे कैसे पता चली, तो उस का जवाब होता है किहमारी बिरादरी के हमारे साथी यही कहते हैं…’


जब उस परिवार को यह सम?ाया जाता है कि हिंदू परिवारों में गाय या भैंस के दूध से बना घी ही इस्तेमाल होता है, तब भी वह भरोसा नहीं कर पाता. अविश्वास इतना गहरा कर दिया गया है कि सच भी ?ाठ लगने लगता है. इसी तरह, हिंदू बच्चों के बीच यह डर बैठा दिया जाता है कि अगर वे मुसलिमों के यहां खाना खा लेंगे, तो उन्हें किसी किसी रूप में गाय का मांस खिला दिया जाएगा. यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि किसी हिंदू को अगर मुसलिम गाय का मांस खिला दे, तो उसे मसजिद बनाने कापुण्यमिलता है.


इस से भी आगे बढ़ कर, यह जहरीली सोच बच्चों के भीतर इस हद तक भर दी जाती है कि अगर कोई हिंदू किसी मुसलिम लड़की से संबंध बनाता है, तो उसे मंदिर बनाने काफलमिलता है. ये बातें इतनी भयावह हैं कि इन्हें दोहराते हुए भी शर्म आती है, लेकिन यही ?ाठ आज बच्चों के मन में सच की तरह बोया जा रहा है.


एक सच्ची घटना इस पूरे मामले को आईने की तरह सामने रखती है. एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक हिंदू और एक मुसलिम परिवार अगलबगल की सीटों पर बैठे थे. हिंदू परिवार के साथ 8 साल का एक बच्चा था. जब मुसलिम परिवार ने अपना खाना निकाला, तो बच्चा उत्सुकता से उन की ओर देखने लगा. वे लोग उस बच्चे को भी परांठा और भुजिया देने लगे, लेकिन बच्चे के मातापिता ने तुरंत रोक दिया और कहा, ‘मत दीजिए, हम आप के यहां का खाना नहीं खाते. हमारे बापदादा ने भी नहीं खाया, तो हम अपने बच्चों को क्यों खाने दें…’


बात आईगई हो गई, पर रात के समय, जब सभी सो गए, अचानक वही बच्चा तेज पेटदर्द से रोने लगा. हिंदू परिवार के पास उस समय कोई दवा नहीं थी. थोड़ी ?ि?ाक के साथ मुसलिम परिवार ने पेटदर्द की दवा देने की पेशकश की. मजबूरी में दवा ली गई. कुछ ही देर में बच्चा ठीक महसूस करने लगा और गहरी में नींद सो गया. सुबह उठते ही वही बच्चा अपने पिता से बोला, ‘‘पापा, अगर अंकल दवा नहीं देते तो मेरा बहुत बुरा हाल हो जाता. मुसलिम लोग भी अच्छे होते हैं.’’


पिता के पास इस वाक्य का कोई जवाब नहीं था. वे बसहांहांकह कर बात टाल गए. उस एक रात ने बच्चे के भीतर सालों से भरे गए जहर को हिला दिया था. यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम बच्चों को धार्मिक और संस्कारी बनाने के नाम पर उन के दिमाग में जहर तो नहीं घोल रहे हैं? क्या हम उन्हें आस्था नहीं, बल्कि नफरत विरासत में दे रहे हैं? क्या हम उन्हें इनसान बनने से पहले हिंदूमुसलिम बनने की सीख नहीं दे रहे हैं?


आज जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों को यह सिखाएं कि समाज विविधताओं से बना है और यही उस की ताकत है. उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि इस देश को आजाद कराने, संवारने और आगे बढ़ाने में हर धर्म, हर जाति और हर समुदाय के लोगों का योगदान रहा है. खेत में काम करने वाला किसान हो या अस्पताल में सेवा देने वाला डाक्टर, स्कूल में पढ़ाने वाला टीचर हो या सड़क साफ करने वाला मजदूर, सभी इस देश को बनाने में बराबर के भागीदार हैं.


बच्चों के भीतर नफरत नहीं, बल्कि प्यार और भाईचारे का बीज बोना होगा. उन्हें सिखाना होगा कि धर्म, जाति और भाषा  इनसान को बांटने के औजार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के रंग हैं. अगर हम यह कर पाए, अगर हम बच्चों के मन में इनसानियत को सब से ऊपर रख पाए, तो यकीन मानिए कि आने वाला कल समाज और देश दोनों के लिए ज्यादा शांत, खुशहाल और सुखद होगा. Hindi Story

Film: परदे की दुनिया-पीरियड्स में किया आइटम डांस

Film: रणवीर सिंह की फिल्मधुरंधरने खूब पैसा बनाया है. अब उस का दूसरा पार्ट आने वाला है. पहले पार्ट में एक आइटम डांस नंबरशरारतबहुत पसंद किया गया था, जो आयशा खान पर भी फिल्माया गया था, जिस में उन के डांस की तारीफ हुई थी.
पर हाल ही में आयशा खान ने इस गाने के बारे में बताते हुए लोगों को चौंका दिया. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘हमारी 2 दिन की शूटिंग थी. बहुत
थकान वाली थी, मैं उन दिनों पीरियड्स पर थी. मतलब पीरियड्स में सूजन हो जाती है, चेहरा और शरीर बैस्ट नहीं लगता. काश, मैं शूटिंग के दौरान अपने बैस्ट फौर्म में होती.’’


कंगना पर किया सनसनीखेज दावा
कंगना राणावत अपने बोल्ड अंदाज के लिए जानी जाती हैं, फिर वह उन की फिल्में हों या निजी जिंदगी. अपने कैरियर की शुरुआत में उन्होंने कहा था कि वे हैंडसम पर अपने पिता की उम्र के आदित्य पंचोली के साथ रिलेशनशिप में थीं, पर यह भी दावा किया कि आदित्य पंचोली उन के साथ बदसलूकी, मारपीट और इमोशनल टौर्चर किया करते थे.
इस के उलट आदित्य पंचोली ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘हम पतिपत्नी की तरह थे. मैं तो यारी रोड पर हम दोनों के लिए घर बनवा रहा था. हम पिछले 3 साल तक एक दोस्त के घर पर साथ रहे. मैं उसे बहुत सारी फिल्में दिखाया करता था.’ आज कंगना और आदित्य दोनों अलग हैं, पर इन की यह रिलेशनशिप किसी मसाला फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी तीखी लगती है.


प्रतीक बब्बर ने खोला राज
राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक फिल्मों से ज्यादा अपनी निजी जिंदगी को ले कर खबरों में बने रहते हैं. जब उन्होंने प्रिया बनर्जी से दूसरी शादी की तो अपने पिता राज बब्बर तक को न्योता नहीं दिया था और अपने नाम से बब्बर भी हटा दिया था. हाल ही में प्रतीक और और प्रिया ने शादी के बारे में बात की और प्रिया ने कहा, ‘‘हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में
90 फीसदी शादियां दिखावटी होती हैं और मैं यह जानती हूं, क्योंकि मैं ने इसे करीब से देखा है.’’
इस पर प्रतीक ने सहमति जताते हुए ट्विंकल खन्ना के उस बयान का जिक्र किया, जिस में उन्होंने अपने टौक शो में फिजीकल चीटिंग के बारे में बात करते हुए कहा था, ‘अगर शादीशुदा लोग रात गई बात गईकह रहे हैं, तो आप सम? सकते हैं कि क्या हालात हैं.’                        

सोफी चौधरी की अमीरी का राज
खूबसूरत ऐक्ट्रैस और सिंगर सोफी चौधरी आज भले ही फिल्म इंडस्ट्री से दूर दिखाई देती हैं, पर वे बेरोजगार नहीं हैं, बल्कि अच्छीखासी कमाई कर रही हैं.
सोफी चौधरी नेशादी नंबर 1’, ‘प्यार के साइड इफैक्ट्स’, ‘हे बेबीऔरवन्स अपौन टाइम इन मुंबई दोबाराजैसी कई फिल्मों में काम किया है और कई म्यूजिक वीडियो में अपने गाने और डांस का हुनर दिखाया है, पर वे फिल्मों में कभी लीड हीरोइन नहीं बन पाईं, लेकिन अपने अलबम गानों की वजह से नाम और दाम दोनों कमा रही हैं. इस के अलावा वे अरबपतियों की शादी और फंक्शन भी होस्ट करती हैं.
      

Hindi Story: पिघलता सावन

Hindi Story: डो बैल की आवाज सुन कर अमन ने दरवाजा खोला.
‘‘अरे, मंजरी तुम? यहां कैसे अचानक?’’
‘‘अंदर नहीं आने दोगे क्या? सारे सवालों के जवाब यहीं चौखट पर चाहिए?’’
‘‘अरे, नही. आओ, अंदर आओ,’’ अमन ने पानी का गिलास पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘यहां कैसे?’’
‘‘तुम एक्सपैक्ट नहीं कर रहे थे मुझे’’
‘‘यों अचानक कैसे कर सकता हूंतुम्हीं बताओ?’’
अभी उन्होंने बात शुरू ही की थी कि अचानक मौसम पलटने लगा. सुरमई घटाओं के साए यहांवहां दौड़ने लगे, हवा ने भी ठंडक से दोस्ती कर ली और बादल भी अपनी धीमी आवाज में ताल छेड़ने लगे. सावन का महीना, कब धूप कब बारिशवैसे भी दिल्ली का अपना कोई मौसम तो है नहीं. आसपास के मौसम में रंग जाता है और बिखर भी जाता है.
‘‘लगता है कि बारिश होगी…’’ अमन ने मंजरी के हाथ से गिलास वापस लेते हुए कहा.
‘‘हां, लगता तो है.’’
‘‘इस से तो तुम्हें वापसी में परेशानी हो सकती है.’’
‘‘तो क्या मैं यहां नहीं रुक सकती?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘फैसला तुम्हारा ही था, रुकने का,’’ अमन ने मंजरी की बु? सी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें जाना क्यों है? क्यों जाना चाहती हो अपना भरापूरा, बसाबसाया घर छोड़ कर
‘‘सबकुछ तो है तुम्हारे पास. एक बड़ा घर, बैंक बैलेंस, 2 खूबसूरत बच्चे, एक अच्छी नौकरी वाला सच्चा पति और उस पर तुम्हारी इतनी अच्छी जौब. मु? से ज्यादा ही कमाती हो, फिर संतुष्ट क्यों नहीं हो तुम?’’
‘‘हां, मैं संतुष्ट नहीं हूं तुम से.’’
‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ अमन
ने पूछा
‘‘यही कि तुम मु? संतुष्ट नहीं कर पाते हो.’’
अमन पर जैसे बिजली गिरी. कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर अपने अंदर की सारी ताकत जमा करता हुआ वह बोला, ‘‘देखो, मैं एक आम इनसान हूं, कोई सुपरमैन नहीं.’’
‘‘पर मु? सुपरमैन ही चाहिए…’’ मंजरी ने अमन के चेहरे पर नजर गड़ाए हुए कहा, ‘‘जो मु? शारीरिक रूप से संतुष्ट कर सके, चरम सुख का अहसास
करा सके.’’
‘‘वाहियात किस्म की मैगजीन पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा.’’
‘‘छोड़ो, मैं तुम से किसी बहस में उल?ाना नहीं चाहती.’’
‘‘अगर मु? में कुछ कमी होती तो हमारे ये 2 बच्चे कैसे हो गए?’’
‘‘बच्चे तो हिजड़ों के भी हो जाते हैं,’’ मंजरी की यह बात सुन कर अमन भीतर ही भीतर गुस्से से तमतमाने लगा. उस का दिल चाहा कि 2 थप्पड़ में सारा चरम सुख पानी की तरह बहा दे, लेकिन उस ने खुद पर बड़ी मुश्किल से
कंट्रोल पाते हुए कहा, ‘‘देखो, अभी तुम बहकी हुई हो, सोचसम? कर सही फैसला लो.’’
‘‘अच्छी तरह सोच समझकर लिया है मैं ने यह फैसला. वैसे भी तुम्हारे साथ बहुत समय गंवा दिया है मैं ने. मैं तुम से तुम्हारी दौलत और जायदाद मैं से कोई हिस्सा नहीं मांग रही हूं और ही तुम्हें कोर्टकचहरी में फंसाना चाहती हूं. मैं बस तुम से आजाद हो कर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से बिताना चाहती हूंबिंदास.’’
‘‘चलो, मैं मान लेता हूं कि तुम्हें चरम सुख नहीं दे पाता हूं, मगर ऐसा
प्ले बौय टाइप का आदमी तुम्हें
मिलेगा कैसे और कहां?’’ अमन ने चिंतित आवाज में कहा.
मंजरी मुसकराती हुई अपना बैग उठा कर दरवाजे से बाहर निकल गई.
‘‘हां, फैसला तो मेरा ही था. बच्चे कहां हैं? आज तो संडे है, घर पर ही होना चाहिए,’’ मंजरी ने इधरउधर नजर दौड़ाते हुए कहा.
‘‘बच्चे याद हैं तुम्हें?’’ अमन ने हैरानी से पूछा.
‘‘ताना दे रहे हो?’’
‘‘तुम जो चाहे सम?. तुम्हारा अपना दिमाग है और अपनी सोच.’’
‘‘जन्म तो मैं ने ही दिया था.’’
‘‘काश, जाते समय यह सोच लेती. खैर, छोड़ो मैं भी किन बातों में उल? गयाकौफी पियोगी?’’ अमन ने पूछा.
‘‘तुम ने बच्चों से क्या कहा? उन की मां कहां गई?’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं दिल्ली शिफ्ट हो गया हूं?’’ अमन
ने कुरेदा.
‘‘तुम सरकारी नौकर हो, आसानी से पता मिल गया. बच्चों से क्या कहा तुम ने? और बच्चे हैं कहां?’’
‘‘इन सब बातों में क्यों उल? रही हो तुम? वैसे, तुम आई क्यों हो?’’
‘‘बताते क्यों नहींबच्चे कहां हैं?’’
‘‘जैसे मेरा पता किया, बच्चों का भी पता कर लेती…’’
‘‘मतलब तुम नहीं बताओगे?’’
‘‘क्या तुम भी बच्चों की रट
लगा रही होतुम ने कल रात कोई
सामाजिक उपन्यास पढ़ लिया क्या पोर्न मैगजीन की जगह?’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
बादलों की तेज गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी और बारिश होने लगी. अभी बारिश थोड़ी हलकी ही थी,
लेकिन शोर बहुत था पानी काजो पानी कभीकभी गंदगी अपने साथ बहा ले जाता है और ले भी आता है.
बाहर लौन में पानी के ऊपर गंदगी जमा होने लगी. साथ ही बारिश धीरेधीरे तेज होने लगी, लेकिन अब शोर कुछ कम हो गया था.
मंजरी कुछ बोली, बस आंखें बंद किए सोफे से सिर टिकाए रही.
अमन ने उठ कर कौफी बनाई, साथ ही कुछ स्नैक्स भी टेबल पर ला कर रखते हुए बोला, ‘‘कौफी पियो.’’
‘‘तुम तो मेहमान सम? कर खातिरदारी कर रहे हो…’’ मंजरी ने अमन की आंखों में ?ांकते हुए कहा.
‘‘लेकिन मेहमानों से लोग खुश
होते हैं.’’
‘‘पर मेरे आने से तुम खुश नहीं हो.’’
‘‘सच तो यह है कि कोई अहसास ही नहीं हो रहा है.’’
‘‘अगर मैं आती तो?’’
‘‘तो कुछ नहींअब आई हो तो भी कुछ नहींकुछ जिंदा नहीं है.’’
‘‘ठीक कहा तुम ने. हम मर ही तो जाते हैं ख्वाहिशों में घिर कर…’’
‘‘तुम्हारे चरम सुख का अहसास कैसा रहा और अनुभव भी?’’
‘‘कुछ दिन तो अच्छा लगता है, फिर हम थकने लगते हैं.’’
‘‘तो अभी अच्छा लगता है या थक गई हो?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’
‘‘थकावट तुम पर ज्यादा भारी पड़ गई है शायद.’’
‘‘तुम पहले से भी ज्यादा सम?ादार हो गए हो.’’
बारिश अब मूसलाधार हो गई है.
घर के आंगन में थोड़ा पानी ठहरने लगा है. बाहर की सड़कें डूब गई हैं. सारा कूड़ाकचरा पानी पर तैरने लगा है. बारिश के दिनों में दिल्ली बद से बदतर हो
जाती है.
‘‘तुम यहां कहां ठहरी हुई हो? वैसे, मु? पूछना तो नहीं चाहिए था,’’ अमन ने चुप्पी तोड़ी.
‘‘क्या जाने के लिए कह रहे हो?’’
‘‘सम?ादार तो तुम भी बहुत हो,’’ कहते हुए अमन ने खिड़कियों के परदे हटा दिए और कांच वाले पल्ले खोल दिए. अब ड्राइंगरूम में कुछ ताजा हवा आने लगी.
‘‘अभी तो शाम होने में समय है,
जब बरसात रुक जाए तो चली जाना,’’ अमन बोला.
‘‘सैक्स में भी यही होता हैपानी खत्म सैक्स खत्म. बरसात हवस एकजैसे ही हैं, जब तक बरसात कायम है तब तक मौसम सुहाना रहता है, उस के बाद उमस. सैक्स में आकर्षण तो है, पर हमेशा के लिए नहीं.’’
‘‘हमेशा के लिए तो कुछ भी नहीं होता मंजरी.’’
‘‘प्यारहोता है हमेशा के लिए.’’
‘‘अब तुम 40 की हो गई हो. जब
28 की थी तो चरम सुख के लिए भटकी, अब प्यार के लिए? तुम ने जिंदगी को जरूरतों के हिसाब से जीने की कोशिश की, पर जिंदगी आपसी तालमेल और सहयोग से भी जी जा सकती थी,’’ अमन ने कहा.
‘‘उपदेश दे रहे हो?’’
‘‘जब उपदेश देना चाहता था, तब तुम ने सुना नहीं. अब क्या फायदा इन प्रवचनों का?’’
‘‘भूल सुधारी भी जा सकती है और राह से भटका इनसान सही राह पर भी सकता है.’’
‘‘बिलकुल, अगर वह भूल हो तो.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो ? मैं पछतावा करूं?’’ मंजरी थोड़ी तेज आवाज में अमन से बोली.
‘‘नहीं. मैं क्यों चाहूंगा? मेरा इस
से क्या सरोकार?’’ अमन ने कहा.
‘‘सरोकार होता तो तुम वह करते जो मैं कहती थी.’’
‘‘मतलबजोश बढ़ाने वाली
दवा? जो तुम मैगजीन में पढ़ कर सजैस्ट करती थी…’’
‘‘पर तुम एक बार कोशिश कर के तो देखते.’’
‘‘मैं जैसा था खुद से सैटिस्फाई था और हूं भी. तुम भी अब सैटिस्फाई
तो होगी? 12 साल से चरम सुख लेने
के बाद?’’
कमरे में खामोशी छा गई. सिर्फ बारिश की आवाज अपने सुरीले अंदाज में आलाप ले रही थी. हवा में थोड़ी और ठंडक बढ़ गई थी और थोड़ा अंधेरा भी बढ़ गया था. ऐसा लगता था सावन आज अपने पूरे जोबन पर है.
‘‘तुम मु? माफ नहीं कर सकते?’’ मंजरी ने पूछा.
‘‘शायद तुम जानती हो कि मैं इस तरह नहीं सोचता. अंधेरा बढ़ रहा है और बारिश भी. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. बारिश भी रुकेगी और अंधेरा भी छंटेगा. बस, थोड़ा सा समय लगेगा,’’ अमन ने कहा.
‘‘मगर, इस चक्कर में कहीं ज्यादा देर हो जाए?’’
‘‘तुम फिक्र मत करो, मु? खाना बनाना आता है. आज मेरे हाथ का बना खाना खा कर जाना,’’ अमन ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं ने खाने की बात नहीं की. और यह क्या तुम ने जाने की रट सी लगाई हुई है?’’
‘‘तो फिर…’’ अमन बोला.
‘‘मैं कहीं नहीं जाने वाली.’’
‘‘इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी मंजरी.’’
‘‘इस बार भी मेरी ही चलेगी. मैं यहां  तुम्हारे पास मरने आई हूं. मेरा हक है अपने घर में मरना. मैं अभी भी तुम्हारी पत्नी हूं.’’
‘‘कहना क्या चाहती हो?’’
‘‘2 महीने हैं मेरे पास, वे तुम्हारे साथ  बिताना चाहती हूं. यूटरस में कैंसर पड़ गया है.’’
‘‘यूटरस तो निकाला जा सकता है.’’
‘‘तो तुम मु? जिंदा देखना चाहते हो?’’ मंजरी पहली बार खिलखिला
कर हंसी और हंसती ही रही बड़ी देर तक, फिर अचानक मंजरी की हंसी
रुक गई.
अमन ने मंजरी की तरफ देखा. वह एक ओर को लुढ़की हुई थी.
अमन लपक कर उस तक पहुंचा. मंजरी को सीधा कर लिटाया. उस
ने चैक किया, सांसें चल रही थीं.
उस ने जल्दी से पानी के छींटे मुंह
पर मारे.
कुछ ही देर के बाद मंजरी को होश गया. वह थकी हुई आवाज में
बोली, ‘‘लास्ट स्टेज. यूटरस निकलवा चुकी हूं. आपरेशन हो चुका है, पर
कैंसर बाकी हिस्से में फैल चुका है. सिर्फ 2 महीने…’’
बारिश आहिस्ताआहिस्ता कम होने लगी. काली घटाएं छटने लगीं और  अंधेरा भी कम होने लगा था. सड़क का पानी अपने साथ गंदगी बहा कर ले गया. घर का आंगन भी बरसात के पानी से धुल कर चमकने लगा था.
‘‘अब कहो तो मैं चली जाऊं?’’ मंजरी ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘नहीं. इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी,’’ मौसम की नमी अब अमन की आंखों में थी.
मौसम बिलकुल साफ था.      

लेखक – अहमद मुख्तार

Crime Story: औरत की दीवानगी काट दी मर्दानगी

Crime Story: गोवा के बाद मुंबई दूसरा ऐसा शहर है, जहां के लोग नए साल का जश्न पूरे जोरशोर और जोश से मनाते हैं. इस के लिए कई दिन पहले से प्लान भी बनने लगते हैं कि इस बार 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच की रात को क्याक्या करना है. अगर घर पर ही पार्टी देनी है, तो किसकिस को बुलाना है, खाने में क्याक्या आइटम रखना है, डांस और म्यूजिक का क्या इंतजाम करना है और इन सब से भी ज्यादा अहम बात यह कि मेहमानों का स्वागत कैसे करना है और उन्हें तोहफे में क्या देना है.


मुंबई के सांताक्रूज (पूर्व) इलाके में रहने वाली 25 साला कंचन देवी महतो ने भी नए साल के स्वागत का प्लान बना रखा था. एक आटोरिकशा ड्राइवर की पत्नी और 2 बच्चों की मां कंचन देवी ने अपने 44 साला आशिक और रिश्तेदार जोगिंदर लखन महतो को मिठाई खाने के लिए अपने घर आने का न्योता दिया था, जिसे स्वीकार करने की कोई वजह जोगिंदर जैसे आशिक के पास नहीं होती. पेशे से कैब ड्राइवर जोगिंदर भी सांताक्रूज (पूर्व) में ही रहता था. कंचन देवी का न्यू ईयर प्लान कितना खतरनाक था, इस से पहले यह जान लें कि उस की और जोगिंदर की आशिकी तकरीबन 7 साल पुरानी थी. जब भी मौका मिलता था, वे दोनों एकदूसरे से मिल कर अपने तन और मन की प्यास बु? लिया करते थे, क्योंकि शादीशुदा और बालबच्चेदार होने के चलते दोनों को एहतियात बरतनी पड़ती थी.


हालांकि, नजदीकी रिश्तेदार होने से उन्हें दूसरे माशूक और आशिक की तरह चोरीछिपे नहीं मिलना पड़ता था, लेकिन जिस मकसद से वे मिलते थे, उस में सावधानी जरूर रखनी पड़ती थी. पिछले कुछ दिनों से वही हो रहा था, जो ऐसे नाजायज रिश्तों में अकसर अपराध की वजह बनता है. कंचन देवी जोगिंदर के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी कि अब तुम बिन रहा और सहा नहीं जातातुम अपनी पत्नी को छोड़ कर मु? से शादी कर लोमैं भी तो सबकुछ छोड़ने के लिए तैयार हूं. इस मांग और जिद से जोगिंदर इस कदर घबराया था कि नवंबर, 2025 में मुंबई छोड़ कर अपने घर बिहार वापस चला गया था. लेकिन कंचन देवी अब भी जिद पर अड़ी थी और हर कभी फोन कर उस पर शादी करने का दबाव बनाती रहती थी.
नए साल पर कंचन देवी ने जोगिंदर लखन को बुलाया तो वह मना नहीं कर पाया. ऐसे नाजायज संबंधों की एकलौती खूबी यह होती है कि हमबिस्तरी का लुत्फ चोरी के आम सरीखा आता है और इन्हें छोड़ पाना आसान नहीं रह जाता.


जब जोगिंदर लखन कंचन देवी के घर पहुंचा जो दोनों बच्चों को सुला कर तमाम तैयारियों के साथ वह उस का ही इंतजार कर रही थी. दोनों ने पहले जीभर कर 2 महीने की अपनी प्यास बु?ाई, फिर कंचन मिठाई ले कर गई. कर दिया बड़ा कांड रात के तकरीबन डेढ़ बजे कंचन देवी और जोगिंदर बिना कपड़ों के थे. कंचन देवी के भरेपूरे जिस्म और सैक्स हरकतों की गिरफ्त में आया जोगिंदर उस वक्त कसमसा उठा, जब कंचन देवी ने एकाएक ही बिना उसे संभलने का मौका दिए चाकू से उस का प्राइवेट पार्ट काट डाला.
यह था नए साल का महबूबा का तोहफा जिसे जोगिंदर तो जोगिंदर, इस घटना को पढ़ने और इस के बारे में सुनने वाले लोग तय है कि जिंदगीभर नहीं भुला पाएंगे. लहूलुहान और तड़पता जोगिंदर लखन गिरतापड़ता जैसेतैसे घर पहुंचा, तो उस का बेटा उसे ले कर तुरंत वीएन देसाई अस्पताल पहुंचा और इलाज शुरू करवाया. यहां से मरहमपट्टी कर डाक्टरों ने उसे सायन अस्पताल रैफर कर दिया, जहां उस के प्राइवेट पार्ट को दोबारा जोड़ने के लिए 2 आपरेशन हुए.


नए साल के इस पहले और अनूठे जुर्म की खबर मिलते ही तुरंत हरकत में आई वाकोला पुलिस कंचन देवी के घर पहुंची, तो पाया कि वह बच्चों समेत पहले ही फरार हो चुकी थी. पर जल्द ही कुर्ला रेलवे स्टेशन से वह गिरफ्तार भी कर ली गई. पुलिस ने बीएनएस यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 (2) के तहत मामला दर्ज कर के कंचन देवी को जेल भेज दिया. आरोप साबित होने पर उसे 10 साल की सजा हो सकती है. लेकिन जोगिंदर को जो सजा मिली, उसे वह जिंदगीभर नहीं भूल पाएगा. भूल तो आगरा का योगेश भी नहीं पाएगा कि उस का भी प्राइवेट पार्ट कटा था. लेकिन काटने वाली पत्नी या माशूका नहीं, बल्कि उस की सगी भाभी थी.


उत्तर प्रदेश में प्रयागराज जिले के मलखानपुर के बाशिंदे राम आसरे के 5 बेटों में से दूसरे नंबर के बेटे उदय कुमार की शादी मंजू से हुई थी. जैसा कि ऐसी करीबी रिश्तेदारी में अकसर होता है, मंजू के देवर उमेश का टांका अपनी भाभी की छोटी बहन अंजू (बदला हुआ नाम) से भिड़ गया यानी अफेयर हो गया. दोनों एकदूसरे से बेइंतिहा प्यार करने लगे और शादी करने के कसमेवादे भी हो गए. दोनों के घर वालों ने भी इस बाबत बातचीत करना शुरू कर दिया था. भाभी ने लिया बदला बात यहां तक किसी के एतराज या हर्ज की नहीं थी. मंजू खुद भी चाहती थी कि अंजू उस की देवरानी बन कर इस घर में जाए, जिस से मांबाप के सिर से एक लड़की की जिम्मेदारी और उतरे. सबकुछ तकरीबन पक्का था कि एक दिन उमेश ने अंजू से शादी करने से इनकार कर दिया. इस से मंजू को हैरानी हुई, लेकिन सबकुछ उस के बस में नहीं था. उस ने उमेश को सम?ाने की बहुत कोशिश की, पर वह टस से मस हुआ.


इस इनकार से अंजू डिप्रैशन में चली गई और जान देने की बात करने लगी. अपनी बहन को इस हालत में देख कर मंजू को गुस्सा आना लाजिमी था, क्योंकि उस की बहन अंजू मन ही मन उमेश को पति मान बैठी थी और शादी से पहले अपना सबकुछ उमेश को सौंप चुकी थी. चूंकि देवर और बहन के अफेयर को परवान चढ़ने देने में मंजू का रोल अहम था, इसलिए वह इस धोखे से बदले की आग में जलने लगी और जब यह अगन बरदाश्त नहीं हुई, तो उस ने उमेश को उस की बहन से बेवफाई करने पर सबक सिखाने का फैसला कर लिया. 16 अक्तूबर, 2025 की रात जब घर में सभी सो रहे थे, तब मंजू चुपके से उठी, हाथ में चाकू लिया और उमेश के नजदीक जा कर उस का प्राइवेट पार्ट काट डाला. मंजू ने उमेश के प्राइवेट पार्ट पर 1-2 नहीं, बल्कि 4 वार किए, जिस से वह चिल्ला कर उठ बैठा. आवाज सुन कर सारा घर जाग
गया और उमेश को अस्पताल पहुंचाया. उस का प्रयागराज के रूपरानी नेहरू अस्पताल में लंबा इलाज चला. जोगिंदर की तरह उस का भी आपरेशन हुआ, तब कहीं जा कर जान बची, लेकिन जो चीज चली गई, उस की भरपाई कोई डाक्टर अब नहीं कर सकता.


आम हो रहे ऐसे अपराध देशभर में अब हर कभी और हर कहीं मर्दों के प्राइवेट पार्ट औरतों द्वारा काटे जाने की वारदात बेहद आम हो चली हैं, जो काफीकुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं. 17 दिसंबर, 2025 को पंजाब के लुधियाना में उस वक्त सनसनी मच गई थी, जब सीएमसी अस्पताल में अमित नाम का एक नौजवान अपना कटा लटकता सा प्राइवेट पार्ट ले कर इलाज के लिए पहुंचा था. डाक्टरों के पूछने पर अमित ने मनगढ़ंत कहानी यह बताई कि जालंधर बाईपास के पास कुछ बदमाशों ने उसे घेर कर लूटा और प्राइवेट पार्ट काट कर चलते बने. इलाज शुरू हुआ और फिर पुलिस आई तो असली कहानी सामने आई कि अमित का प्राइवेट पार्ट बदमाशों ने नहीं, बल्कि उस की माशूका रेखा ने काटा था. दरअसल, अमित और रेखा एकदूसरे से प्यार करते थे और मौजमस्ती के लिए शहर के इंडोअमेरिकन होटल में कमरा ले कर ठहरे थे. वहीं दोनों में ?ागड़ा हो गया. वजह वही पुरानी थी. रेखा जिद कर रही थी कि इतने दिन हो गए मुहब्बत करते हुए, शादी कब करोगे?


रेखा को सैकड़ों बार भोग चुका अमित अब गले में ढोल लटकाने के मूड में नहीं था, सो उस ने साफ मना कर दिया. इस बात पर दोनों में हाथापाई होने लगी. गुस्साई रेखा ने कटर से अमित का प्राइवेट पार्ट काट डाला. गुस्सा अमित को भी गया, तो उस ने पहले तो रेखा को ताबड़तोड़ घूंसे मारे और फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी. जाहिर है कि अमित को तगड़ी सजा होगी, लेकिन रेखा जो सजा दे गई है, वह जिंदगीभर उसे सालती रहेगी. मर्दों से कम नहीं औरतें आखिरकार पेशे से नर्स रेखा में इतनी ताकत और हिम्मत आई कहां से, जो उस ने लंबेतगड़े अमित का प्राइवेट पार्ट काट डाला? इतनी ही हिम्मत और ताकत कंचन देवी में भी गई थी और इतनी ही हिम्मत मंजू में भी गई थी. हालांकि, जब उस ने देवर का प्राइवेट पार्ट काटा, तब वह गहरी नींद में सो रहा था. मंजू ने आगेपीछे की परवाह नहीं की और ही ससुराल और मायके वालों के बारे में कुछ सोचा.


दरअसल, औरतें अब पहले जैसी नाजुक नहीं रह गई हैं और मर्दों के हाथों खाए धोखे को किस्मत मान कर चुप नहीं बैठती हैं. सजा देने के लिए वे कानून पर भरोसा करती हैं या नहीं करती, यह ऐसी दर्जनों वारदात से साफ है कि नहीं करतीं, क्योंकि अदालतें धोखे को धोखा ही कई बार नहीं मानतीं, उलटे फैसले में यह कह देती हैं कि दोनों बालिग थे और रजामंदी से सैक्स संबंध बने थे, इसलिए कोई मामला ही नहीं बनता.
बात एक हद तक सही भी है, लेकिन इन औरतों की नजर और नजरिए से देखें, तो उन्होंने मर्द का सब से अहम और नाजुक अंग काट कर धोखे का बदला ही लिया है और ज्यादातर मामलों में वे तय कर चुकी थीं कि इस से बेहतर सबक और सजा कोई हो नहीं सकती कि मर्द जिंदगीभर सैक्स सुख के लिए तरसता रहे और जब भी तरसे तो उन्हें याद जरूर करे.


कोई दर्जनभर मामले प्राइवेट पार्ट काटने के देखें, तो सम? आता है कि तकरीबन सभी में मर्द या तो बिना कपड़ों के था या फिर सिर्फ अंडरवियर में था, जिस से पत्नी या माशूका को ज्यादा मशक्कत नहीं करना पड़ी और उस ने सहूलियत से अपनी मंशा को अंजाम दे दिया. अब वह दौर गया कि माशूका या पत्नी अपनी किस्मत को कोसते हुए खामोश रह जाती थीं. जब से लड़कियां कमानेखाने बाहर निकली हैं या नौकरियां करने लगी हैं, तब से इस तरह के जुर्म और बढ़े हैं. मर्द औरत के हाथों पिट भी खूब रहे हैं और उन की हत्याएं भी माशूका या पत्नी कर रही हैं. पर हत्या जैसे संगीन अपराध के लिए आमतौर पर औरतों को दूसरे मर्द का साथ या सहारा चाहिए रहता है. प्राइवेट पार्ट काटने में यह जरूरी नहीं रह जाता, क्योंकि मर्द पूरे भरोसे के साथ उन के सामने हथियार डाल चुका होता है और उसे सपने में भी यह अंदाजा नहीं रहता कि थोड़ी देर पहले जो पत्नी या माशूका बिस्तर में उस के साथ तरहतरह से मजे लूट और लुटा रही थी, उस के दिमाग में कितना खतरनाक प्लान पनप रहा है.

तकरीबन सभी मामलों में औरतों ने सैक्स का लुत्फ लेने और देने के बाद ही मर्द को हमेशा के लिए मजे से महरूम किया. ऐसा ही एक मामला बीती 7 जनवरी को सोनीपत से सामने आया था, जिस में सरिता नाम की एक औरत ने अपने पति रामकिशन की हत्या प्राइवेट पार्ट दबा कर कर दी थी. रामकिशन एक मैरिज गार्डन में केयरटेकर की नौकरी करता था और गांजा पीने की लत का शिकार था. यहां तक तो सरिता बरदाश्त करती रही, लेकिन परेशान उस वक्त हो उठती जब पोर्न फिल्में देखने का भी आदी हो गया रामकिशन जबरन उसे भी पोर्न फिल्में दिखाता था और उन्हीं के मुताबिक जिस्मानी ताल्लुक बनाने के लिए मजबूर करने लगता था. इसी बात के चलते सरिता तंग चुकी थी, इसलिए उस ने सतपाल नाम के एक नौजवान की मदद से रामकिशन की हत्या कर दी.                     


अमेरिका से आया घातक चलन
भारत में मर्दों के प्राइवेट पार्ट काटने का जुर्म अब फैशन की शक्ल में पसर रहा है, लेकिन यह बहुत पुराना नहीं है. पिछले 5 सालों में ऐसी वारदात बढ़ी हैं. इन की छानबीन बताती है कि शायद पहली एफआईआर साल 2017 में केरल के तिरुअनंतपुरम में दर्ज हुई थी, जिस पर देशभर का ध्यान गया था. 23 साला कानून की एक छात्रा ने एक धर्मगुरु हरि स्वामी का प्राइवेट पार्ट काट डाला था और खुद ही पुलिस को खबर की थी. हरि स्वामी छात्रा के बीमार पिता को तंत्रमंत्र और ?ाड़फूंक के जरीए ठीक करने के बहाने घर में आताजाता था. इसी दौरान उस ने छात्रा का यौन शोषण करना शुरू कर दिया था, जो कोई 3 साल तक चला. इस से छात्रा तंग गई और उस ने रहेगा बांस और बजेगी बांसुरी की तर्ज पर हरि स्वामी का प्राइवेट पार्ट ही काट डाला. हालांकि, इस से पहला ऐसा कभी नहीं हुआ था या नहीं हुआ होगा, यह गारंटी से नहीं कहा जा सकता. मुमकिन यह है कि कोई रिपोर्ट ही दर्ज हुई हो या फिर लोकलाज के चलते मामलों ने तूल पकड़ा हो. अब मामले जानबू? कर तूल दिए जाते हैं, ताकि औरतों को बदनाम किया जा सके और उन की इमेज बिगाड़ी जा सके.


यहां मकसद कतई अपराधी औरतों या किसी भी किस्म के अपराध की वकालत करना नहीं है, लेकिन इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब कोई औरत किसी अपराध को अंजाम देती है, तो मीडिया उसे बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है. पेश क्या करता है, अपनी दुकान चलाने के लिए सुर्खियां लगा कर बेचता है. यह उस की मजबूरी भी दिखती है, क्योंकि प्राइवेट पार्ट काटे जाने पर मीडिया में ही प्रचलित यह कहावत काम करती है कि कुत्ता आदमी को काटे तो कोई खास खबर नहीं बनती, लेकिन कोई आदमी अगर कुत्ते को काट ले, तो जरूर खबर खास हो जाती है. दुनियाभर की बात करें तो पहला चर्चित मामला अमेरिका के वर्जिनिया राज्य से  साल 1993 के जून महीने में सामने आया था. 24 साला बेहद खूबसूरत लारेना बाबिट की शादी 26 साला जौन बेन बाबिट से साल 1989 में हुई थी. 23 जून, 1993 को लारेना ने जौन का प्राइवेट पार्ट काट डाला था, क्योंकि घटना की शाम जौन जबरदस्ती सैक्स पर उतारू हो आया था, जबकि लारेना की रत्तीभर इच्छा भी उस वक्त सैक्स की नहीं थी. यह सौ फीसदी रेप करने जैसा था, क्योंकि जितना लारेना मना करती जा रही थी, उतना ही जौन उस पर हावी हुआ जा रहा था.


यह मुकदमा दुनियाभर में चर्चित रहा था. अदालत में लारेना ने बयान दिया था कि रेप करने के बाद जौन जब सो गया तो वह बिस्तर से उठी, किचन में जा कर पानी पिया जहां उसे प्लेटफार्म पर रखा चाकू दिख गया और जिसे हाथ में ले कर वह वापस बैडरूम में आई और सोते हुए जौन का प्राइवेट पार्ट काट डाला.
लारेना यहीं नहीं रुकी, बल्कि उस ने कटा हुआ प्राइवेट पार्ट उठाया और अपनी कार में बैठ कर चली गई और काफी देर तक वह सड़कों पर बेमकसद घूमती रही. लेकिन उसे कार चलाने में दिक्कत हो रही थी, क्योंकि एक हाथ में उस ने कटा हुआ प्राइवेट पार्ट थामा हुआ था, जिसे कुछ देर बाद एक खेत में फेंक दिया. कुछ देर सोचने के बाद उस ने ही पुलिस को फोन कर सारी बात बता दी. पुलिस ने लारेना को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मुकदमे की कार्रवाई के दौरान जो कई बातें उजागर हुईं उन से जौन का असल चेहरा सामने आया कि वह अव्वल दर्जे का लंपट था और जिस के कई और लड़कियों से भी अफेयर थे. असलियत लारेना की भी सामने आई कि उस ने एक पागलपन के तहत प्राइवेट पार्ट काटा था, इसलिए उसे 45 दिन की मामूली सजा के बाद वहां के कानून के तहत बरी कर दिया गया.


यह कहानी बहुत लंबी और दिलचस्प है. जौन को इस मामले और मुकदमे से शोहरत तो मिली ही साथ ही डाक्टरों ने आपरेशन कर उस का प्राइवेट पार्ट जोड़ दिया, जो पुलिस ने लारेना की निशानदेही पर बरामद किया था. इस से भी ज्यादा हैरत की बात यह कि वह पहले की तरह काम भी करने लगा. इतना काम करने लगा कि जौन ने 2 पोर्न फिल्मो में काम भी किया और कुछ टीवी शो में भी वह दिखा.
इस मामले को दुनियाभर के मीडिया ने कवरेज दिया था, क्योंकि बात वही आदमी द्वारा कुत्ते को काटे जाने की खबर जैसी थी.       

Hindi Story: 3 मौत और कोरियन चक्रव्यूह

Hindi Story: फरवरी महीना आते ही दिल्ली की सर्दी पर वैलेंटाइन डे की गरमी चढ़ने लगी थी. इस बार विजय और अनामिका ने सूरजकुंड मेला देखने का प्लान बनाया था. पर अचानक से अनामिका ने अपना मोबाइल फोन औफ कर दिया था. पहले तो विजय को लगा कि कोई खास वजह होगी, पर जब 2 दिन हो गए तो उसे थोड़ी चिंता हुई.


‘‘मम्मी, अनामिका मेरा फोन नहीं उठा रही है. क्या उस ने आप से कुछ कहा था?’’ विजय ने अपनी मम्मी
से पूछा. ‘‘नहीं तो. क्या हुआ?’’ मम्मी ने रसोई में सब्जी छोंकते हुए कहा. ‘‘ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. वह अगर अपने घर मम्मीपापा से भी मिलने जाती है तो मु? बता देती है. फोन तो वह कभी औफ करती नहीं है,’’ विजय ने चिंता जताई.
‘‘तुम उस के घर क्यों नहीं चले जाते?’’ पापा ने विजय से कहा.
‘‘लेकिन पापा, मु? तो एक हफ्ते के लिए दिल्ली से बाहर जाना है. आज
1 तारीख है, मैं 7 तारीख तक वापस जाऊंगा,’’ विजय ने कहा.
‘‘पर तुम्हें एक बार उस का हालचाल ले लेना चाहिए,’’ मम्मी ने कहा.
‘‘मैं उसे फोन कर लूंगा,’’ विजय ने कहा और जयपुर चला गया.
विजय ने वहां से अनामिका को कई बार फोन किया, पर उस से बात
हो पाई. जैसे ही वह 7 तारीख को दिल्ली वापस आया तो सीधा अनामिका के घर गया.
घर पर कोई नहीं था, पर दरवाजे पर ताला भी नहीं लगा था. विजय ने कई बार डोरबैल बजाई, पर कोई दरवाजे पर नहीं आया.


लेकिन विजय का मन नहीं मान रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि अनामिका घर पर ही है और उस के साथ कुछ सही नहीं हुआ है. वह एक खिड़की के रास्ते उस के घर में घुसने की कोशिश कर रहा था. बड़ी मुश्किल से वह घर में दाखिल हुआ. भीतर अंधेरा था. अनामिका के बैडरूम का दरवाजा भी बंद था. विजय ने खटखटाया, तो काफी देर के बाद अनामिका ने दरवाजा खोला, पर विजय को देखते है उस ने दरवाजा बंद करने की कोशिश की. विजय ने धक्का दे कर दरवाजा खोला और गुस्से में अनामिका से पूछा, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें? तुम मेरे फोन का जवाब क्यों नहीं दे रही?’’


‘‘तुम से मतलबमु? अकेला छोड़ दो. मैं कुछ दिन किसी से बात नहीं करना चाहती,’’ अनामिका बोली.
‘‘पर तुम ऐसा क्यों कर रही हो? हुआ क्या है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘मु? कुछ नहीं हुआ है, बस मु? अकेले रहना है,’’ अनामिका बोली. ‘‘सब करो अपनी मरजी. मैं भी अपनी मरजी करता हूं और इस बालकनी से छलांग लगा देता हूं,’’ कह कर विजय अनामिका की बालकनी की रेलिंग पर चढ़ने लगा.
यह सुन कर अनामिका डर गई. उस ने विजय को कस कर पकड़ लिया और बोली, ‘‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते होआज के बाद कभी ऐसा मत करना.’’
‘‘क्यों नहीं कर सकता ऐसागाजियाबाद में भी तो 3 लड़कियों ने खुदकुशी कर ली. सब जगह यही तो
हो रहा है. जरा सा मन उदास हुआ नहीं कि दे दो अपनी जान,’’ विजय झल्ला कर बोला.
‘‘गाजियाबाद में क्या हुआ है?


तुम वहां की क्यों बात कर रहे हो?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
विजय थोड़ा रुक गया. उस के चेहरे पर अभी भी परेशानी के भाव थे. एक ठंडी सांस ले कर उस ने बताया, ‘‘गाजियाबाद की भारत सिटी सोसाइटी में चेतन अपनी 2 पत्नियों और 5 बच्चों के साथ रहते थे. 4 फरवरी, 2026 की रात को उन की 15 साल की बड़ी बेटी निशिका, 14 साल की मं?ाली बेटी प्राची और 11 साल की छोटी बेटी पाखी ने अपने अपार्टमैंट की 9वीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली थी.’’
‘‘यह तो बहुत बुरा हुआ. कहीं
यह किसी की साजिश तो नहीं थी?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘खबरों के मुताबिक, ट्रांस हिंडन जोन के डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि पुलिस ने मौके की जगह पर सीन रिक्रिएट कर के यह परखा था कि कहीं बच्चियों को जबरन धक्का देने या नीचे फेंके जाने की संभावना तो नहीं थी.


‘‘जांच में सामने आया कि जिस स्लाइडिंग खिड़की से कूदने की बात सामने आई, वहां से एक समय में केवल एक शख्स ही बाहर निकल सकता था. इस से यह साफ हुआ कि तीनों बहनों ने बारीबारी से छलांग लगाई. हालांकि, यह साफ नहीं हो सका था कि सब से पहले किस बहन ने छलांग लगाई थी.’’
‘‘यह तो बहुत ही दर्दनाक हादसा है. पुलिस ने और क्या बताया?’’ अनामिका ने चिंता जताई.
‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे बताया कि कमरे के अंदर संघर्ष या जबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले थे. कमरा अंदर से बंद था, जिसे पुलिस को तोड़ कर खोलना पड़ा. खिड़की के शीशे और पूजा घर से फिंगरप्रिंट लिए गए, जिन्हें फोरैंसिक जांच के लिए भेजा गया.


‘‘पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि कमरा काफी सलीके से सजाया गया था. फर्श पर परिवार के साथ लड़कियों की तसवीरें सजा कर रखी गई थीं. कमरे से एक डायरी और मोबाइल फोन अलग रखे हुए मिले थे. खिड़की तक पहुंचने के लिए प्लास्टिक के स्टूल का इस्तेमाल किया गया था.’’
‘‘उस डायरी में क्या लिखा था?’’ अनामिका ने जानना चाहा.
‘‘पुलिस के मुताबिक, डायरी में मिले सुसाइड नोट से लड़कियों के मानसिक तनाव की ?ालक मिली थी. नोट में लिखा था, ‘मार खाने से बेहतर मर जाना है’. डायरी में शादी को ले कर डर और तनाव का भी जिक्र था.


‘‘पुलिस का कहना था कि पिता द्वारा मोबाइल फोन छीने जाने और कोरियन ड्रामा देखने को ले कर हुए विवाद ने भी बच्चियों को गहरे मानसिक दबाव में डाल दिया था.’’
‘‘यह कोरियन ड्रामा क्या बला है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘मैं ने बीबीसी की रिपोर्ट में पढ़ा था, जिस में डीसीपी निमिष पाटिल ने बताया था कि इस मामले की शुरुआती जांच में यह सम? आया कि फोन और कोरियाई संस्कृति के प्रति लड़कियों का जुनून इस घटना की मेन वजह हो सकती है.’’


‘‘कोरियाई संस्कृति का मतलब?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘पुलिस के मुताबिक वे तीनों लड़कियां कोरियाई संगीत, ड्रामा, हस्तियों, जापानी फिल्मों औरडोरेमोनके अलावाशिन चैनजैसे कार्टूनों
के साथसाथ औनलाइन गेम्स की
शौकीन थीं.
‘‘साथ ही वे कोरियाई कल्चर से इस हद तक प्रभावित थीं कि उन्होंने अपने नाम भी बदल लिए थे. लेकिनब्लू व्हेलजैसे टास्क देने से जुड़े गेम को
इस घटना की एकमात्र या मेन वजह नहीं माना जा सकता.


‘‘पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में बताया गया कि तीनों बच्चियों की मौत शरीर से ज्यादा खून निकलने और चोट से हुई. ऊंचाई से गिरने के चलते कई हड्डियां टूटी हुई थीं. ‘‘डीसीपी निमिष पाटिल ने आगे कहा कि सुसाइड नोट में एक लाइन मारपीट की थी, लेकिन पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में ऐसी कोई चोट नहीं मिली है. यह परिवार पैसे की तंगी की मार ?ोल रहा था और घर में मची कलह ने भी चीजें मुश्किल बना दी थीं.
‘‘कोविड के बाद परिवार को पैसे का भारी नुकसान उठाना पड़ा और
काफी कर्ज में गया. कुछ साल
पहले लड़कियों को परिवार ने स्कूल से निकाल लिया था.


‘‘परिवार में ?ागड़े भी होते थे. पिता बेटियों को ले कर बहुत कड़ाई बरतते थे. शुरू में इन बच्चियों के पास 2 मोबाइल थे, जिसे वे सा? करती थीं. लेकिन पैसे के दबाव के चलते पिता ने 6 महीने पहले एक मोबाइल को बेच दिया. फिर दूसरा मोबाइल घटना के 10-15 दिन पहले बेच दिया था.’’
‘‘क्या इस परिवार को पैसे की तंगी थी? इस मामले में आसपास के लोग क्या बोल रहे हैं?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘जब पैसे की तंगी के बारे में इन मारी गई लड़कियों के पिता चेतन कुमार से पत्रकारों ने सवाल पूछा, तो उन का कहना था, ‘‘मु? 20-30 लाख रुपए का नुकसान जरूर हुआ था, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि बच्चे खुदकुशी जैसा कदम उठा लें. बच्चों ने अपने नाम तक बदल लिए थे.
‘‘पुलिस ने बताया कि चेतन कुमार की 2 पत्नियां हैं, जो आपस में सगी बहनें हैं. घर में उन के साथ उन की एक साली भी रहती हैं. अपनी दोनों पत्नियों से उन के कुल 5 बच्चे हैं.
‘‘चेतन पेशे से स्टौक ब्रोकर हैं. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उन की बेटियां कहती थीं कि पापा हम कोरिया जाएंगी. उन्हें भारतीय नामों से चिढ़ होने लगी थी.


‘‘बीबीसी ने स्थानीय लोगों से इस घटना के बारे में बात की तो सोसाइटी में इन बच्चियों के घर से ठीक 2 फ्लोर नीचे रहने वाले आरके सिंघानिया की उस रात नींद एक धमाके की आवाज से टूटी. ‘‘आवाज सुनने के बाद सोसाइटी के लोग घर से बाहर आने लगे और देखा कि जमीन पर 3 बच्चियों के शव थे, जिस के बाद पुलिस को सूचना दी गई. ‘‘सोसाइटी के सचिव राहुल कुमार ? ने बीबीसी न्यूज हिंदी को बताया कि जब मैं प्राइमरी एविडैंस के तौर पर ऊपर गया, तो वह कमरा अंदर से बंद था. इसी कमरे से बच्चियों के कूदने की बात कही जा रही है. पुलिस ने उस दरवाजे को तोड़ा. अंदर फैमिली की तसवीरें पूरे फर्श पर बिखरी हुई थीं और कमरे में एक सुसाइड नोट भी मिला, जिस मेंसौरी पापालिखा हुआ था.’’
‘‘यह तो बहुत उल? हुआ मामला है. वहां तो दहशत का माहौल बन गया होगा?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस घटना के बाद बच्चों के बीच फोन एडिक्शन को ले कर फिर चर्चाएं तेज हो गई हैं. उस सोसाइटी की रहने वाली कुसुम ने मीडिया को बताया कि हमारे बच्चे रात को सो नहीं पा रहे हैं. वे इतने डरे हुए हैं. मैं मानती हूं कि कम से कम मांबाप को पता होना चाहिए कि बच्चे फोन में क्या चला रहे हैं.


‘‘वैसे, डीसीपी निमिष पाटिल ने इस मामले में बताया कि बच्चियों के सुसाइड नोट में गेमिंग ऐप्स का भी जिक्र था, जो उन की दिमागी सेहत पर नैगेटिव असर डाल रहे थे.’’
‘‘कौन से गेमिंग ऐप्स?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘बताया जा रहा है कि ये गेम्सपौपी प्लेटाइम’, ‘ बेबी इन यैलो’, ‘ईविल नन’, ‘आइसक्रीम मैनहैं.’’
‘‘इन गेम्स में क्या है?’’ अनामिका ने हैरान हो कर पूछा.
‘‘पौपी प्लेटाइम एक डरावने माहौल का खेल है, जो बच्चों को एक सुनसान खिलौना फैक्टरी में ले जाता है, जहां अजीबोगरीब गुडि़या, अंधेरे कोने और अचानक डराने वाले सीन मौजूद होते हैं.
‘‘इस का किरदारहगी वगीभले ही टीनएजर्स को ध्यान में रख कर बनाया गया हो लेकिन माहिर मानते हैं कि यह कंटैंट बड़े बच्चों के लिए भी मानसिक रूप से भारी पड़ सकता है.
‘‘ बेबी इन यैलो नाम का यह गेम जितना मासूम लगता है, असल में उतना ही खौफनाक है. इस में खिलाड़ी एक ऐसे बच्चे की देखभाल करता है जिस के साथ धीरेधीरे अलौकिक घटनाएं जुड़ती जाती हैं.
‘‘मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की देखभाल जैसे सामान्य विषय को हौरर से जोड़ना छोटे बच्चों के लिए भरम और डर पैदा कर सकता है.


‘‘ईवल नन गेम में खिलाड़ी को एक डरावने स्कूल में बंद कर दिया जाता है, जहां से एक खतरनाक नन से बच कर निकलना होता है, जबकि आइस स्क्रीम गेम में एक आइसक्रीम बेचने वाले विलेन की कहानी है, जो बच्चों का अपहरण करता है. भले ही इन गेम्स का ग्राफिक्स कार्टून जैसा हो लेकिन इन
के विषय डर, कैद और अपहरण संवेदनशील बच्चों में चिंता और डर को बढ़ा सकते हैं.’’
‘‘सरकार इस बारे में क्या कर रही है?’’ अनामिका ने पूछा.


‘‘पुलिस ने उत्तर प्रदेश सरकार से सिफारिश की है कि इन गेम्स पर तुरंत बैन लगाया जाए, साथ ही यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भी भेजा जाएगा. ‘‘घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबीता सिंह चौहान ने पीडि़त परिवार से मुलाकात की. उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देश देने की बात कही है कि स्कूलों को जमात 5 तक के बच्चों को मोबाइल फोन पर प्रोजैक्ट या असाइनमैंट भेजने से रोका जाए, ताकि बच्चों की मोबाइल लत को कम किया जा सके.’’ ‘‘कह तो तुम सही रहे हो. बच्चे क्या हम बड़े भी मोबाइल के फेर में फंसे हुए हैं. अगर थोड़ी देर के लिए भी मोबाइल देखें तो ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है. हम लोग किताबों और पत्रिकाओं से दूर हो रहे हैं, जबकि उन्हें पढ़ने की आदत हमें डालनी होगी


‘‘सरकार को ऐसे गेम्स पर लगाम लगानी चाहिए, जो बच्चों को हिंसक बना रहे हैं, टास्क क्लियर करने के
नाम पर उन्हें बरगलाया जा रहा है,’’ अनामिका ने अपनी बात रखी. ‘‘और तुम ने भी मु? डरा दिया था. कोई इस तरह दुनिया से कटता है क्या, जो तुम पिछले इतने दिन से गायब सी हो गई थी,’’ विजय ने कहा.
‘‘सौरी विजय, हो सके तो मु? माफ कर देना. मेरी हरकत वाकई बचकाना थी. मैं आगे से ध्यान रखूंगी,’’ अनामिका ने इतना कहा और विजय के गले से लग गई.   Hindi Story                 
    

Hindi Story: इश्कबाज को सबक-क्या मोड़ लाई वर्तिका और गजाला की दोस्ती

Hindi Story: ग्रेजुएशन करने के बाद वर्तिका बैंक में प्रोबेशनरी अफसर बनने की तैयारी में लगी हुई थी. इस के लिए उस ने एक जानेमाने कोचिंग सैंटर में दाखिला ले लिया था. वहीं उस की मुलाकात गजाला से हुई थी. वह भी उसी कोचिंग सैंटर में प्रोबेशनरी अफसर की तैयारी कर रही थी. जल्दी ही दोनों में दोस्ती हो गई थी.

एक दिन गजाला ने वर्तिका को अपने भाई के दोस्त विक्रम से मिलवाया, ‘‘वर्तिका, इन से मिलो. ये हैं मेरे भाई के दोस्त विक्रम. काफी हैंडसम हैं न… क्यों?’’ यह कह कर गजाला मुसकराई.

‘‘अरे, हम हैंडसम हैं, तो क्या आप की सहेली कम खूबसूरत हैं? हमें तो आप की सहेली किसी ‘ब्यूटी क्वीन’ से कम नहीं लगतीं,’’ विक्रम ने वर्तिका की खूबसूरती की तारीफ करते हुए कहा.

पहली मुलाकात में ही अपनी खूबसूरती की ऐसी तारीफ सुन कर वर्तिका झोंप गई. विक्रम अब हर रोज ही वर्तिका और गजाला से कोचिंग के बाद मिलने लगा.

एक दिन गजाला जानबूझ कर कोचिंग सैंटर नहीं आई. कोचिंग के छूटने के बाद विक्रम वर्तिका को रास्तेमें मिला.

वर्तिका उस से बचना चाहती थी, फिर भी उस ने वर्तिका का रास्ता रोकते हुए कहा, ‘‘वर्तिकाजी, आज गजाला नहीं आई क्या?’’

‘‘नहीं, वे तो आज नहीं आईं.’’

‘‘तो क्या आज आप हम से बात भी नहीं करेंगी? क्या हम इतने बुरे हैं?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. आप तो काफी हैंडसम हैं.’’

आखिरी शब्द वर्तिका के मुंह से अचानक ही निकल पड़े थे. अब तो विक्रम पर जैसे हैंडसम होने का नशा ही चढ़ गया, जबकि वर्तिका सोचने लगी कि उस की जीभ कैसे फिसल गई.

मौके का फायदा उठाते हुए विक्रम ने कहा, ‘‘वर्तिकाजी, मेरा दिल तो कहता है कि आप इस जहां की सब से हसीन लड़की हो. मेरा दिल तो आप से दोस्ती करने को चाहता है,’’ इतना कह कर वह मोटरसाइकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया.

विक्रम के जाने के बाद वर्तिका सोचने लगी, ‘विक्रम हैंडसम है. वह मुझ से दोस्ती भी करना चाहता है. अगर उस से दोस्ती कर ली जाए, तो इस में हर्ज ही क्या है?’

अगले दिन वर्तिका ने बातोंबातों में गजाला से लड़कों से दोस्ती करने की बात कही. गजाला समझ गई कि वर्तिका के मन में क्या चल रहा है. उस ने वर्तिका की बातों पर रजामंदी

का ठप्पा लगाते हुए कहा, ‘‘वर्तिका, लड़कों से दोस्ती करने में आखिर बुराई ही क्या है?’’

फिर गजाला ने वर्तिका के चेहरे को पढ़ते हुए कहा, ‘‘लेकिन वर्तिका, तू यह सब क्यों पूछ रही है? कहीं तेरा मन भी किसी लड़के से दोस्ती करने को तो नहीं चाह रहा है? कहे तो विक्रम से तेरी दोस्ती करा दूं.’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है.’’

‘‘अरे झठी, तेरे चेहरे की मुसकराहट बता रही है कि तेरे मन में विक्रम को ले कर लड्डू फूट रहे हैं.’’

‘‘चल हट, मैं तुझ से बात नहीं करती,’’ वर्तिका ने वहां से चलते हुए कहा.

अब गजाला सब समझ गई थी. उस ने विक्रम और वर्तिका की आपस में दोस्ती करा दी. फिर उन्होंने एकदूसरे से मोबाइल फोन नंबर भी ले लिए.

वर्तिका विक्रम के प्यार में इस कदर डूब चुकी थी कि उस ने विक्रम के बारे में कोई जानकारी जुटाना भी ठीक नहीं समझ.

इस के बाद वर्तिका और विक्रम एकदूसरे को प्यार भरे एसएमएस भेजने लगे. गजाला इश्क की इस आग में घी डालने का काम कर रही थी.

वर्तिका के जन्मदिन पर विक्रम ने उसे एक महंगा मोबाइल फोन गिफ्ट में दिया. जब विक्रम का जन्मदिन आया, तो वर्तिका ने उसे एक महंगी टीशर्ट गिफ्ट में दी.

विक्रम ने एक दिन मौका देख कर वर्तिका से डेटिंग पर चलने को कहा. वर्तिका तो जैसे तैयार ही बैठी थी. उस ने तुरंत हामी भर दी.

अगले दिन वर्तिका सहेली से मिलने का बहाना बना कर विक्रम के साथ डेटिंग पर चली गई.

विक्रम वर्तिका को मोटरसाइकिल पर बैठा कर शहर से दूर झल के किनारे पिकनिक स्पौट पर ले गया.

अभी वर्तिका और विक्रम एक पेड़ की छांव में बैठे ही थे कि तभी विक्रम का मोबाइल फोन बज उठा, लेकिन उस ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद फिर उस का मोबाइल फोन बज उठा.

वह वहां से उठ कर जाना चाहता था, लेकिन वर्तिका ने रोक लिया. अब विक्रम की मजबूरी हो गई थी कि वहीं पर फोन सुने.

उस ने जल्दबाजी में झठ बोला, ‘‘हैलो, मैं मोटरसाइकिल चला रहा हूं. बाद में बात करूंगा,’’ इतना कह कर उस ने फोन काट दिया.

वर्तिका समझ गई थी कि यह किसी लड़की का फोन था. इसी वजह से विक्रम उस के सामने मोबाइल फोन पर बातें करने से बच रहा था. बस, यहीं से उस के मन में विक्रम के प्रति शक पैदा हो गया.

बातों ही बातों में उस ने असलियत जानने की एक तरकीब सोच ली. उसे कुछ दूरी पर एक आइसक्रीम वाला दिखाई दिया. उस ने विक्रम से कहा, ‘‘मेरा मन तो आइसक्रीम खाने को कर रहा है.’’

‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है. मैं अभी अपने और तुम्हारे लिए आइसक्रीम ले कर आता हूं.’’

इतना कह कर विक्रम जल्दी से वहां से उठा, पर उसे अपना मोबाइल फोन का ध्यान ही नहीं रहा.

जैसे ही विक्रम वहां से गया, वर्तिका ने उस का मोबाइल फोन खंगालना शुरू कर दिया. उस ने जल्दी से दीपा, कंगना और रूबीना के फोन नंबर ले लिए.

अब वर्तिका को पूरा यकीन हो गया था कि दाल में जरूर कुछ काला है. विक्रम के आने पर सिरदर्द का बहाना बना कर वापस चलने को कहा.

विक्रम अभी घर नहीं जाना चाहता था, लेकिन वह वर्तिका को नाराज भी नहीं करना चाहता था. लिहाजा, वह बुझे मन से घर चलने को तैयार हुआ.

अब वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना से मिल कर उन से दोस्ती कर ली. लेकिन विक्रम के बारे में उस ने किसी से कोई जिक्र नहीं किया.

एक दिन दीपा ने खुश हो कर वर्तिका को बताया कि अगले दिन वह अपने बौयफ्रैंड के साथ डेटिंग पर जा रही है. वर्तिका तुरंत समझ गई कि वह किस के साथ डेटिंग पर जा रही है.

तब वर्तिका ने दीपा और विक्रम की डेटिंग कन्फर्म करने के लिए विक्रम को फोन लगाया. उस ने विक्रम से डेटिंग पर चलने को कहा, लेकिन उस ने एक जरूरी काम बता कर टाल दिया.

अगले दिन वर्तिका ने विक्रम का पीछा करना शुरू किया. विक्रम मोटरसाइकिल पर था, जबकि वर्तिका अपनी स्कूटी पर. वह जानती थी कि विक्रम दीपा को डेटिंग के लिए झल पर ही ले जाएगा, क्योंकि प्रेमी जोड़ों की डेटिंग के लिए इस से बढि़या जगह कोई दूसरी न थी.

विक्रम दीपा को लेकर झल की ओर चल पड़ा. जब झल पर पहुंच कर दीपा और विक्रम मटरगश्ती करने लगे, तभी दीपा ने वहां पहुंच कर चुपके से अपने मोबाइल फोन में लगे कैमरे से उन की वीडियो फिल्म बना ली और घर चली आई.

वर्तिका ने ऐसी ही वीडियो फिल्में कंगना और रूबीना के साथ भी इश्कबाज विक्रम की बना डालीं.

एक दिन वर्तिका ने दीपा, कंगना और रूबीना को अपने घर बुलाया, फिर उस ने उन वीडियो फिल्मों को कंप्यूटर में डाउनलोड कर के उन तीनों को दिखलाया.

अब विक्रम की इश्कबाजी का कच्चा चिट्ठा खुल चुका था. अब चारों ने विक्रम को सबक सिखाने की ठानी. साथ ही, उन्होंने फैसला किया कि लड़कियों को पे्रमजाल में फंसाने वाली गजाला का भी दिमाग ठिकाने लगाना चाहिए.

वर्तिका ने अपने मम्मीपापा से सब बातें साफसाफ बता दीं और उन से अपनी गलती की माफी भी मांग ली.

पहले वर्तिका के मम्मीपापा उस की बात पर राजी नहीं हुए, लेकिन जब उस ने उन्हें अपनी योजना समझ , तो वे भी ऐसे मक्कार इश्कबाजों को सबक सिखाने के लिए तैयार हो गए.

तब योजना के मुताबिक, वर्तिका ने एक दिन विक्रम और गजाला को अपने घर बुलाया और उन्हें अपने कमरे में ले गई. वहां उस ने उन्हें कंप्यूटर पर दीपा, कंगना और रूबीना वाली वीडियो फिल्में दिखाईं. विक्रम और गजाला की काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई.

वे चुपचाप वहां से खिसकना चाहते थे, लेकिन वर्तिका उन्हें ऐसे कैसे जाने देती. उस ने 3 तालियां बजाईं, जिन्हें सुन कर पास के कमरे में छिपी बैठी दीपा, कंगना और रूबीना भी वहां आ गईं.

कंगना ने विक्रम से पूछा, ‘‘कहिए मियां मजनू, क्या हाल है? और कितनी लड़कियां चाहिए तुम्हें इश्क फरमाने के लिए?’’

विक्रम ने अचानक चाकू निकाल लिया और कंगना की गरदन पर रखते हुए बोला, ‘‘तुम सब कमरे के एक कोने में जाओ, नहीं तो चाकू से कंगना की गरदन हलाल कर दूंगा.’’

इस के बाद गजाला ने वर्तिका, दीपा और रूबीना के मोबाइल फोन अपने कब्जे में कर लिए और विक्रम के कहने पर गजाला ने उन के मुंह व हाथपैरों को कस कर बांधने के बाद सब को बाथरूम में बंद कर दिया.

विक्रम और गजाला घर से निकल कर बाहर की ओर भागे, लेकिन सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े. सामने दरवाजे पर इंस्पैक्टर शोभित रिवाल्वर ताने खड़ा था. उस के ‘हैंड्सअप’ कहते ही विक्रम और गजाला ने अपने हाथ ऊपर कर लिए.

तब इंस्पैक्टर शोभित ने अपने साथ आए पुलिस वालों को आदेश देते हुए कहा, ‘‘रामदीन, इस लड़के की तलाशी लो. और अर्चना, तुम इस लड़की की तलाशी लो.’’

पुलिस को देख कर विक्रम और गजाला चौंक गए. उन की हैरानी को दूर करते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘तुम दोनों को जरा भी हैरान होने की जरूरत नहीं है. तुम दोनों जब से इस घर में घुसे हो, तभी से हमारी गिरफ्त में हो.

‘‘वर्तिका के मम्मीपापा के साथ हम यहां पहले से ही मौजूद थे. हम सामने वाले पड़ोसी के घर में छिपे थे.

‘‘हम जानते थे कि तुम जैसे मक्कार लोग कोई न कोई गुस्ताखी जरूर करते हैं, इसलिए घर में घुसने से ले कर बाहर आने तक की तुम्हारी वीडियोग्राफी हम ने तैयार करा ली.

‘‘पड़ोसी की छत से आ कर हमारे फोटोग्राफर ने सारा काम बखूबी अंजाम दिया. अब यह वीडियोग्राफी तुम दोनों को अदालत में सजा दिलवाने में बड़ी काम आएगी.’’

यह सुन कर गजाला और विक्रम के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वे इंस्पैक्टर शोभित के सामने गिड़गिड़ाने लगे, लेकिन इंस्पैक्टर शोभित ने कानून के अनुसार अपना काम किया.

बाथरूम में बंद वर्तिका, दीपा, कंगना व रूबीना के हाथपैरों और मुंह को खोला गया और उन के बयान लिए गए.

वर्तिका की बढि़या योजना और हिम्मत पर शाबाशी देते हुए इंस्पैक्टर शोभित ने कहा, ‘‘अगर हमारे देश की सारी लड़कियां वर्तिका की तरह हिम्मत और होशियारी से काम लें, तो वे ऐसे मक्कार इश्कबाजों से धोखा खाने से बच जाएं.’’

इस के बाद इंस्पैक्टर शोभित गजाला और विक्रम को जीप में बैठा कर अपने साथ आगे की कार्यवाही के लिए थाने ले गया. Hindi Story

Hindi Story: विकराल शून्य : निशा की कौनसी बीमारी से बेखबर था सोम?

Hindi Story: ‘‘कैसी विडंबना है, हम पराए लोगों को तो धन्यवाद कहते हैं लेकिन उन को नहीं, जो करीब होते हैं, मांबाप, भाईबहन, पत्नी या पति,’’ अजय ने कहा.

‘‘उस की जरूरत भी क्या है? अपनों में इन औपचारिक शब्दों का क्या मतलब? अपनों में धन्यवाद की तलवार अपनत्व को काटती है, पराया बना देती है,’’ मैं ने अजय को जवाब दिया.

‘‘यहीं तो हम भूल कर जाते हैं, सोम. अपनों के बीच भी एक बारीक सी रेखा होती है, जिस के पार नहीं जाना चाहिए, न किसी को आने देना चाहिए. माना अपना इनसान जो भी हमारे लिए करता है वह हमारे अधिकार या उस के कर्तव्य की श्रेणी में आता है, फिर भी उस ने किया तो है न. जो मांबाप ने कर दिया उसी को अगर वे न करते या न कर पाते तो सोचो हमारा क्या होता?’’ अजय बोला.

अजय की गहरी बातें वास्तव में अपने में बहुत कुछ समाए रखती हैं. जब भी उस के पास बैठता हूं, बहुत कुछ नया ही सीख कर जाता हूं.

बड़े गौर से मैं अजय की बातें सुनता था जो अजय कहता था, गलत या फिजूल उस में तो कुछ भी नहीं होता था. सत्य है हमारा तो रोमरोम किसी न किसी का आभारी है. अकेला इनसान संपूर्ण कहां है? क्या पहचान है एक अकेले इनसान की? जन्म से ले कर बुढ़ापे तक मनुष्य किसी न किसी पर आश्रित ही तो रहता है न.

‘‘मेरी पत्नी सुबह से शाम तक बहुत कुछ करती है मेरे लिए, सुबह की चाय से ले कर रात के खाने तक, मेरे कपड़े, मेरा कमरा, मेरी व्यक्तिगत चीजों का खयाल, यहां तक कि मेरा मूड जरा सा भी खराब हो तो बारबार मनाना या किसी तरह मुझे हंसाना,’’ मैं अजय से बोला.

‘‘वही सब अगर वह न करे तो जीवन कैसा हो जाए, समझ सकते हो न. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन की बीवियां तिनका भी उठा कर इधरउधर नहीं करतीं. पति ही घर भी संभालता है और दफ्तर भी. पत्नी को धन्यवाद कहने में कैसी शर्म, यदि उस से कुछ मिला है तुम्हें? इस से आपस का स्नेह, आपस की ऊष्मा बढ़ती है, घटती नहीं,’’ अजय ने कहा.

सच ही कहा अजय ने. इनसान इतना तो समझदार है ही कि बेमन से किया कोई भी प्रयास झट से पहचान जाता है. हम भी तो पहचान जाते हैं न, जब कोई भावहीन शब्द हम पर बरसाता है.

उस दिन देर तक हम साथसाथ बैठे रहे. अपनी जीवनशैली और उस के तामझाम को निभाने के लिए ही मैं इस पार्टी में आया था, जहां सहसा अजय से मुलाकात हो गई थी. हमारी कंपनी के ही एक डाइरेक्टर ने पार्टी दी थी, जिस में मैं हाजिर हुए बिना नहीं रह सकता था. इसे व्यावसायिक मजबूरी कह लो या तहजीब का तकाजा, निभाना जरूरी था.

12 घंटे की नौकरी और छुट्टी पर भी कोई न कोई आयोजन, कैसे घर के लिए जरा सा समय निकालूं? निशा पहले तो शिकायत करती रही लेकिन अब उस ने कुछ भी कहनासुनना छोड़ दिया है. समूल सुखसुविधाओं के बावजूद वह खुश नजर नहीं आती. सुबह की चाय और रात की रोटी बस यही उस की जिम्मेदारी है. मेरा नाश्ता और दोपहर का खाना कंपनी के मैस में ही होता है. आखिर क्या कमी है हमारे घर में जो वह खुश नजर नहीं आती? दिन भर वह अकेली होती है, न कोई रोकटोक, न सासससुर का मुंह देखना, पूरी आजादी है निशा को. फिर भी हमारे बीच कुछ है, जो कम होता जा रहा है. कुछ ऐसा है जो पहले था अब नहीं है.

सुबह की चाय और अखबार वह मेरे पास छोड़ जाती है. जब नहा कर आता हूं, मेरे कपड़े पलंग पर मिलते हैं. उस के बाद यंत्रवत सा मेरा तैयार होना और चले जाना. जातेजाते एक मशीनी सा हाथ हिला कर बायबाय कर देना.

मैं पिछले कुछ समय से महसूस कर रहा हूं, अब निशा चुप रहती है. हां, कभी माथे पर शिकन हो तो पूछ लेती है, ‘‘क्या हुआ? क्या आफिस में कोई समस्या है?’’

‘‘नहीं,’’ जरा सा उत्तर होता है मेरा.

आज शनिवार की छुट्टी थी लेकिन पार्टी थी, सो यहां आना पड़ा. निशा साथ नहीं आती, उसे पसंद नहीं. एक छत के नीचे रहते हैं हम, फिर भी लगता है कोसों की दूरी है.

मैं पार्टी से लौट कर घर आया, चाबी लगा कर घर खोला. चुप्पी थी घर में. शायद निशा कहीं गई होगी. पानी अपने हाथ से पीना खला. चाय की इच्छा नहीं थी. बीच वाले कमरे में टीवी देखने बैठ गया. नजर बारबार मुख्य

द्वार की ओर उठने लगी. कहां रह गई यह लड़की? चिंता होने लगी मुझे. उठ कर बैडरूम में आया और निशा की अलमारी खोली. ऊपर वाले खाने में कुछ उपहार पड़े थे. जिज्ञासावश उठा लिए. समयसमय पर मैं ने ही उसे दिए थे. मेरा ही नाम लिखा था उन पर. स्तब्ध रह गया मैं. निशा ने उन्हें खोला तक नहीं था. महंगी साडि़यां, कुछ गहने. हजारों का सामान अनछुआ पड़ा था. क्षण भर को तो अपना अपमान लगा यह मुझे, लेकिन दूसरे ही क्षण लगा मेरी बेरुखी का इस से बड़ा प्रमाण और क्या होगा?

उपहार देने के बाद मैं ने उन्हें कब याद रखा. साड़ी सिर्फ दुकान में देखी थी, उसे निशा के तन पर देखना याद ही नहीं रहा. कान के बुंदे और गले का जड़ाऊ हार मैं ने निशा के तन पर सजा देखने की इच्छा कब जाहिर की? वक्त ही नहीं दे पाता हूं पत्नी को, जिस की भरपाई गहनों और कपड़ों से करता रहा था. जरा भी प्यार समाया होता इस सामान में तो मेरे मन में भी सजीसंवरी निशा देखने की इच्छा होती. मेरा प्यार और स्नेह ऊष्मारहित है. तभी तो न मुझे याद रहा और न ही निशा ने इन्हें खोल कर देखने की इच्छा महसूस की होगी. सब से पुराना तोहफा 4 महीनों पुराना है, जो निशा के जन्मदिन का उपहार था. मतलब यह कि पिछले 4 महीनों से यह सामान लावारिस की तरह उस की अलमारी में पड़ा है, जिसे खोल कर देखने तक की जरूरत निशा ने नहीं समझी.

यह तो मुझे समझ में आ गया कि निशा को गहनों और कपड़ों की भूख नहीं है और न ही वह मुझ से कोई उम्मीद करती है.

2 साल का वैवाहिक जीवन और साथ बिताया समय इतना कम, इतना गिनाचुना कि कुछ भी संजो नहीं पा रहा हूं, जिसे याद कर मैं यह विश्वास कर पाऊं कि हमारा वैवाहिक जीवन सुखमय है.

निशा की पूरी अलमारी देखी मैं ने. लाकर में वे सभी रुपए भी वैसे के वैसे ही पड़े थे. उस ने उन्हें भी हाथ नहीं लगाया था.

शाम के 6 बज गए. निशा लौटी नहीं थी. 3 घंटे से मैं घर पर बैठा उस का इंतजार कर रहा हूं. कहां ढूंढू उसे? इस अजनबी शहर में उस की जानपहचान भी तो कहीं नहीं है. कुछ समय पहले ही तो इस शहर में ट्रांसफर हुआ है.

करीब 7 बजे बाहर का दरवाजा खुला. बैडरूम के दरवाजे की ओट से ही मैं ने देखा, निशा ही थी. साथ था कोई पुरुष, जो सहारा दे रहा था निशा को.

‘‘बस, अब आप आराम कीजिए,’’

सोफे पर बैठा कर उस ने कुछ दवाइयां मेज पर रख दी थीं. वह दरवाजा बंद कर के चला गया और मैं जड़वत सा वहीं खड़ा रह गया. तो क्या निशा बीमार है? इतनी बीमार कि कोई पड़ोसी उस की सहायता कर रहा है और मुझे पता तक नहीं. शर्म आने लगी मुझे.

आंखें बंद कर चुपचाप सोफे से टेक लगाए बैठी थी निशा. उस की सांस बहुत तेज चल रही थी. मानो कहीं से भाग कर आई हो. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी पास जाने की. शब्द कहां हैं मेरे पास जिन से बात शुरू करूंगा. पैसों का ढेर लगाता रहा निशा के सामने, लेकिन यह नहीं समझ पाया, रुपयापैसा किसी रिश्ते की जगह नहीं ले सकता.

‘‘क्या हुआ निशा?’’ पास आ कर मैं ने उस के माथे पर हाथ रखा. तेज बुखार था, जिस वजह से उस की आंखों से पानी भी बह रहा था. जबान खिंच गई मेरी. आत्मग्लानि का बोझ इतना था कि लग रहा था कि आजीवन आंखें न उठा पाऊंगा.

किसी गहरी खाई में जैसे मेरी चेतना धंसने लगी. अच्छी नौकरी, अच्छी तनख्वाह के साथ मेरा घर, मेरी गृहस्थी कहीं उजड़ने तो नहीं लगी? हंसतीखेलती यह लड़की ऐसी कब थी, जब मेरे साथ नहीं जुड़ी थी. मेरी ही इच्छा थी कि मुझे नौकरी वाली लड़की नहीं चाहिए. वैसी हो जो घर संभाले और मुझे संभाले. इस ने तो मुझे संभाला लेकिन क्या मैं इसे संभाल पाया?

‘‘आप कब आए?’’ कमजोर स्वर ने मुझे चौंकाया. अधखुली आंखों से मुझे देख रही थी निशा.

निशा का हाथ कस कर अपने हाथ में पकड़ लिया मैं ने. क्या उत्तर दूं, मैं कब आया.

‘‘चाय पिएंगे?’’ उठने का प्रयास किया निशा ने.

‘‘कब से बीमार हो?’’ मैं ने उठने से उसे रोक लिया.

‘‘कुछ दिन हो गए.’’

‘‘तुम्हारी सांस क्यों फूल रही है?’’

‘‘ऐसी हालत में कुछ औरतों को सांस की तकलीफ हो जाती है.’’

‘‘कैसी हालत?’’ मेरा प्रश्न विचित्र सा भाव ले आया निशा के चेहरे पर. वह मुसकराने लगी. ऐसी मुसकराहट, जो मुझे आरपार तक चीरती गई.

फिर रो पड़ी निशा. रोना और मुसकराना साथसाथ ऐसा दयनीय चित्र प्रस्तुत करने लगा मानो निशा पूर्णत: हार गई हो. जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा. डर लगने लगा मुझे. हांफतेहांफते निशा का रोना और हंसना ऐसा चित्र उभार रहा था मानो उसे अब मुझ से

कोई भी आशा नहीं रही. अपना हाथ खींच लिया निशा ने.

तभी द्वार घंटी बजी और विषय वहीं थम गया. मैं ही दरवाजा खोलने गया. सामने वही पुरुष खड़ा था, मेरी तरफ कुछ कागज बढ़ाता हुआ.

‘‘अच्छा हुआ, आप आ गए. आप की पत्नी की रिपोर्ट्स मेरी गाड़ी में ही छूट गई थीं. दवा समय से देते रहिए. इन की सांस बहुत फूल रही थी इसलिए मैं ही छोड़ने चला आया था.’’

अवाक था मैं. निशा को 4 महीने का गर्भ था और मुझे पता तक नहीं. कुछ घर छोड़ कर एक क्लीनिक था, जिस के डाक्टर साहब मेरे सामने खड़े थे. उन्होंने 1-2 कुशल स्त्री विशेषज्ञ डाक्टरों का पता मुझे दिया और जल्दी ही जरूरी टैस्ट करवा लेने को कह कर चले गए. जमीन निकल गई मेरे पैरों तले से. कैसा नाता है मेरा निशा से? वह कुछ सुनाना चाहती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं. तो फिर शादी क्यों की मैं ने, अगर पत्नी का सुखदुख भी नहीं पूछ सकता मैं.

चुपचाप आ कर बैठ गया मैं निशा के पास. मैं पिता बनने जा रहा हूं, यह सत्य अभीअभी पता चला है मुझे और मैं खुश भी नहीं हो पा रहा. कैसे आंखें मिलाऊं मैं निशा से? पिछले कुछ महीनों से कंपनी में इतना ज्यादा काम है कि सांस भी लेने की फुरसत नहीं है मुझे. निशा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और मैं ने एक बार भी पूछा नहीं, उसे क्या तकलीफ है.

निशा के विरोध के बावजूद मैं उसे उठा कर बिस्तर पर ले आया. देर तक ठंडे पानी की पट्टियां रखता रहा. करीब आधी रात को उस का बुखार उतरा. दूध और डबलरोटी ही खा कर गुजारा करना पड़ा उस रात, जबकि यह सत्य है, 2 साल के साथ में निशा ने कभी मुझे अच्छा खाना खिलाए बिना नहीं सुलाया.

सुबह मैं उठा तो निशा रसोई में व्यस्त थी. मैं लपक कर उस के पास गया. कुछ कह पाता, तब तक तटस्थ सी निशा ने सामने इशारा किया. चाय ट्रे में सजी थी.

‘‘यह क्या कर रही हो तुम? तुम तो बीमार हो,’’ मैं ने कहा.

‘‘बीमार तो मैं पिछले कई दिनों से हूं. आज नई बात क्या है?’’

‘‘देखो निशा, तुम ने एक बार भी मुझे नहीं बताया,’’ मैं ने कहा.

‘‘बताया था मैं ने लेकिन आप ने सुना ही नहीं. सोम, आप ने कहा था, मुझे इस घर में रोटीकपड़ा मिलता है न, क्या कमी है, जो बहाने बना कर आप को घर पर रोकना चाहती हूं. आप इतनी बड़ी कंपनी में काम करते हैं. क्या आप को और कोई काम नहीं है, जो हर पल पत्नी के बिस्तर में घुसे रहें? क्या मुझे आप की जरूरत सिर्फ बिस्तर में होती है? क्या मेरी वासना इतनी तीव्र है कि मैं चाहती हूं, आप दिनरात मेरे साथ वही सब करते रहें?’’ निशा बोलती चली गई.

काटो तो खून नहीं रहा मेरे शरीर में.

‘‘आप मुझे रोटीकपड़ा देते हैं, यह सच

है. लेकिन बदले में इतना बड़ा अपमान भी करें, क्या जरूरी है? सोम, आप भूल गए, पत्नी का भी मानसम्मान होता है. रोटीकपड़ा तो मेरे पिता के घर पर भी मिलता था मुझे. 2 रोटी तो कमा भी सकती हूं. क्या शादी का मतलब यह होता है कि पति को पत्नी का अपमान करने का अधिकार मिल जाता है?’’ निशा बिफर पड़ी.

याद आया, ऐसा ही हुआ था एक दिन. मैं ने ऐसा ही कहा था. इतनी ओछी बात पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गई थी. सच है, उस के बाद निशा ने मुझ से कुछ भी कहना छोड़ दिया था. जिस खबर पर मुझे खुश होना चाहिए था उसे बिना सुने ही मैं ने इतना सब कह दिया था, जो एक पत्नी की गरिमा पर प्रहार का ही काम करता.

निशा को बांहों में ले कर मैं रो पड़ा. कितनी कमजोर हो गई है निशा, मैं देख ही नहीं पाया. कैसे माफी मांगूं अपने कहे की. लाखों रुपए हर महीने कमाने वाला मैं इतना कंगाल हूं कि न अपने बच्चे के आने की खबर का स्वागत कर पाया और न ही शब्द ही जुटा पा रहा हूं कि पत्नी से माफी मांग सकूं.

पत्नी के मन में पति के लिए एक सम्मानजनक स्थान होता है, जिसे शायद मैं खो चुका हूं. लाख हवा में उड़ता रहूं, आना तो जमीन पर ही था मुझे, जहां निशा ने सदा शीतल छाया सा सुख दिया है मुझे.

मेरे हाथ हटा दिए निशा ने. उस के होंठों पर एक कड़वी सी मुसकराहट थी.

‘‘ऐसा क्या हुआ है मुझे, जो आप को रोना आ गया. आप रोटीकपड़ा देते हैं मुझे, बदले में संतान पाना तो आप का अधिकार है न. डाक्टर ने कहा है, कुछ औरतों को गर्भावस्था में सांस की तकलीफ हो जाती है. ठीक हो जाऊंगी मैं. आप की और घर की देखभाल में कोई कमी नहीं आएगी,’’ निशा ने कहा.

‘‘निशा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो. पता नहीं क्यों मेरे मुंह से

वह सब निकल गया,’’ मैं निशा के आगे गिड़गिड़ाया.

‘‘सच ही आया होगा न जबान पर, इस में माफी मांगने की क्या जरूरत है? मैं जैसी हूं वैसी ही बताया आप ने.’’

‘‘तुम वैसी नहीं हो, निशा. तुम तो संसार की सब से अच्छी पत्नी हो. तुम्हारे बिना मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा. अगर मैं अपनी कंपनी का सब से अच्छा अधिकारी हूं तो उस के पीछे तुम्हारी ही मेहनत और देखभाल है. यह सच है, मैं तुम्हें समय नहीं दे पाता लेकिन यह सच नहीं कि मैं तुम से प्यार नहीं करता. तुम्हें गहनों, कपड़ों की चाह होती तो मेरे दिए तोहफे यों ही नहीं पड़े होते अलमारी में. तुम मुझ से सिर्फ जरा सा समय, जरा सा प्यार चाहती हो, जो मैं नहीं दे पाता. मैं क्या करूं, निशा, शायद आज संसार का सब से बड़ा कंगाल भी मैं ही हूं, जिस की पत्नी खाली हाथ है, कुछ नहीं है जिस के पास. क्षमा कर दो मुझे. मैं तुम्हारी देखभाल नहीं कर पाया.’’ मैं रोने लगा था.

मुझे रोते देख कर निशा भी रोने लगी थी. रोने से उस की सांस फूलने लगी थी. निशा को कस कर छाती से लगा लिया मैं ने. इस पल निशा ने विरोध नहीं किया. मैं जानता हूं, मेरी निशा मुझ से ज्यादा नाराज नहीं रह पाएगी. मुझे अपना घर बचाने के लिए कुछ करना होगा. घर और बाहर में एक उचित तालमेल बनाना होगा, हर रिश्ते को उचित सम्मान देना होगा, वरना वह दिन दूर नहीं जब मेरे बैंक खातों में तो हर पल शून्य का इजाफा होगा ही, वहीं शून्य अपने विकराल रूप में मेरे जीवन में भी स्थापित हो जाएगा. Hindi Story

Hindi Story: ए सीक्रेट नाइट इन होटल, झांसे में न आएं लड़कियां

Hindi Story:अप्रैल के तीसरे सप्ताह में नोएडा की रहने वाली रश्मि (बदला नाम) जब भी अपना फेसबुक एकाउंट खोलती, उसे फ्रैंड रिक्वैस्ट में एक अंजान शख्स की रिक्वैस्ट जरूर दिखाई दे जाती. वह जानती थी कि आवारा, शरारती और दिलफेंक किस्म के मनचले युवक लड़कियों की कवर फोटो और प्रोफाइल देख कर ऐसी फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजा करते हैं. अगर इन की रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली जाए तो जल्द ही ये रोमांस और सैक्स की बातें करते हुए नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगते हैं.

आमतौर पर ऐसी फ्रैंड रिक्वैस्ट पर समझदारी दिखाते हुए रश्मि ध्यान नहीं देती थी. इसलिए इस पर भी उस ने ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वह बैठेबिठाए आफत मोल नहीं लेना चाहती थी. लेकिन 20 अप्रैल को उस ने इस अंजान फ्रैंड रिक्वैस्ट के साथ एक टैगलाइन लगी देखी तो वह बेसाख्ता चौंक उठी. वह लाइन थी ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’

इस टैगलाइन ने उसे भीतर तक न केवल हिला कर रख दिया, बल्कि गुदगुदा भी दिया. उसे पढ़ कर अनायास ही वह 20 दिन पहले की दुनिया में ठीक वैसे ही पहुंच गई, जैसे फिल्मों के फ्लैशबैक में नायिकाएं पहुंचने से खुद को रोक नहीं पातीं.

कीबोर्ड पर चलती उस की अंगुलियां थम गईं और दिलोदिमाग पर ग्वालियर छा गया. वह वाकई सीक्रेट और हसीन रात थी, जब उस ने पूरा वक्त पहले अभिसार में अपने मंगेतर विवेक (बदला नाम) के साथ गुजारा था. जिंदगी के पहले सहवास को शायद ही कोई युवती कभी भुला पाती है. वह वाकई अद्भुत होता है, जिसे याद कर अरसे तक जिस्म में कंपकंपी और झुरझुरी छूटा करती है.

रश्मि को याद आ गया, जब वह और विवेक दिल्ली से ग्वालियर जाने वाली ट्रेन में सवार हुए थे तो उन्हें कतई गर्मी का अहसास नहीं हो रहा था. उस के कहने पर ही विवेक ने रिजर्वेशन एसी कोच के बजाय स्लीपर क्लास में करवाया था. दिल्ली से ग्वालियर लगभग 5 घंटे का रास्ता था. कैसे बातोंबातों में कट गया, इस का अंदाजा भी रश्मि को नहीं हो पाया.

आगरा निकलतेनिकलते रश्मि के चेहरे पर पसीना चुहचुहाने लगा तो विवेक प्यार से यह कहते हुए झल्ला भी उठा, ‘‘तुम से कहा था कि एसी कोच में रिजर्वेशन करवा लें, पर तुम्हें तो बचत करने की पड़ी थी. अब पोंछती रहो बारबार रूमाल से पसीना.’’

विवेक और रश्मि की शादी उन के घर वालों ने तय कर दी थी, जिस का मुहूर्त जून के महीने का निकला था. चूंकि सगाई हो चुकी थी, इसलिए दोनों के साथ ग्वालियर जाने पर घर वालों को कोई ऐतराज नहीं था. यह आजकल का चलन हो गया है कि एगेंजमेंट के बाद लड़कालड़की साथ घूमेफिरें तो उन के घर वाले पुराने जमाने की तरह ऊंचनीच की बातें करते टांग नहीं अड़ाते.

रश्मि को अपनी रिश्तेदारी के एक समारोह में जाना था, जिस के बाबत घर वालों ने ही कहा था कि विवेक को भी ले जाओ तो उस की रिश्तेदारों से जानपहचान हो जाएगी. बारबार पसीना पोंछती रश्मि की हालत देख कर विवेक खीझ रहा था कि इस से तो अच्छा था कि एसी में चलते. उसे परेशानी तो न होती.

प्यार की बात का जवाब भी प्यार से देते रश्मि उसे समझा रही थी कि उस का साथ है तो क्या गर्मी और क्या सर्दी, वह सब कुछ बरदाश्त कर लेगी. बातों ही बातों में रश्मि ने अपना सिर विवेक के कंधे पर टिका दिया तो सहयात्री प्रेमीयुगल के इस अंदाज पर मुसकरा उठे. लेकिन उन्हें किसी की परवाह नहीं थी. ट्रेनों में ऐसे दृश्य अब बेहद आम हो चले हैं.

आगरा निकलते ही विवेक ने उस से वह बात कह डाली, जिसे वह दिल्ली से बैठने के बाद से दिलोदिमाग में जब्त किए बैठा था कि क्यों न हम रिश्तेदार के यहां कल सुबह चलें. वैसे भी फंक्शन कल ही है, आज की रात किसी होटल में गुजार लें. यह बात शायद रश्मि भी अपने मंगेतर के मुंह से सुनना चाहती थी.

क्योंकि स्वाभाविक तौर पर शरम के चलते वह एदकम से कह नहीं पा रही थी. दिखाने के लिए पहले तो उस ने बहाना बनाया कि घर वालों को पता चल गया तो वे क्या सोचेंगे? इस पर विवेक का रेडीमेड जवाब था, ‘‘उन्हीं के कहने पर तो हम साथ जा रहे हैं और फिर बस 2 महीने बाद ही तो हमारी शादी होने वाली है. उस के बाद तो हमें हर रात साथ ही बितानी है.’’

इस पर रश्मि बोली, ‘‘…तो फिर उस रात का इंतजार करो, अभी से क्यों उतावले हुए जा रहे हो?’’

रश्मि का मूड बनते देख विवेक ऊंचनीच के अंदाज में बोला, ‘‘अरे यार, क्या तुम्हें भरोसा नहीं मुझ पर?’’

यह एक ऐसा शाश्वत डायलौग है, जिस का कोई जवाब किसी प्रेमिका या मंगेतर के पास नहीं होता. और जो होता है, वह सहमति में हिलता सिर वह जवाब होता है.

‘‘तुम पर भरोसा है, तभी तो सब कुछ तुम्हें सौंप दिया है.’’ रश्मि ने कहा.

यही जवाब विवेक सुनना चाहता था. जब यह तय हो गया कि दोनों रात एक साथ किसी होटल के कमरे में गुजारेंगे तो बहने वाली पसीने की तादाद तो बढ़ गई, पर बरसती गर्मी का अहसास कम हो गया. दोनों आने वाले पलों की सोचसोच कर रोमांचित हुए जा रहे थे. अलबत्ता रश्मि के दिल में जरूर शंका थी कि धोखे से अगर किसी जानपहचान वाले ने देख लिया तो वह क्या सोचेगा?

अपनी शंका का समाधान करते हुए वह विवेक की आवाज में खुद को समझाती रही कि सोचने दो जिसे जो सोचना है, आखिर हम जल्द ही पतिपत्नी होने जा रहे हैं. आजकल तो सब कुछ चलता है. और कौन हम होटल के कमरे में वही सब करेंगे, जो सब सोचते हैं. हमें तो रोमांस और प्यार भरी बातें करने के लिए एकांत चाहिए, जो मिल रहा है तो मौका क्यों हाथ से जाने दें?

ट्रेन के ग्वालियर स्टेशन पहुंचतेपहुंचते अंधेरा छा गया था, पर इस प्रेमीयुगल के दिलोदिमाग में एक अछूते अंजाने अहसास को जी लेने का सुरूर छाता जा रहा था. स्टेशन पर उतर कर विवेक ने औटोरिक्शा किया. नई सवारियों को देख कर ही औटोरिक्शा वाले तुरंत ताड़ लेते हैं कि ये किसी लौज में जाएंगे. कुछ देर औटोरिक्शा इधरउधर घूमता रहा. दोनों ने कई होटल देखे, फिर रुकना तय किया होटल उत्तम पैलेस में.

ग्वालियर रेलवे स्टेशन के प्लेटफौर्म नंबर एक के बाहर की सड़क पर रुकने के लिए होटलों की भरमार है. चूंकि आमतौर पर रेलवे स्टेशनों के बाहर की होटलें जोड़ों को रुकने के लिए मुफीद नहीं लगतीं, इसलिए विवेक और रश्मि को उत्तम होटल पसंद आया. जो रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर रेसकोर्स रोड पर सैनिक पैट्रोल पंप के पास स्थित है. दोनों को यह होटल सुरक्षित लगा.

औटो वाले को पैसे दे कर दोनों काउंटर पर पहुंचे तो वहां एक बुजुर्ग मैनेजर बैठा था, जिस की अनुभवी निगाहें समझ गईं कि यह नया जोड़ा है. मैनेजर पूरे कारोबारी शिष्टाचार से पेश आया और एंट्री रजिस्टर उन के आगे कर दिया. आजकल होटलों में रुकने के लिए फोटो आईडी अनिवार्य है, जो मांगने पर विवेक और रश्मि ने दिए तो मैनेजर ने तुरंत उन की फोटोकौफी कर के अपने पास रख ली.

खानापूर्ति कर दोनों अपने कमरे में आ गए. 6 घंटों से दिलोदिमाग में उमड़घुमड़ रहा प्यार का जज्बा अब आकार लेने लगा. दरवाजा बंद करते ही विवेक ने रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ लिया और ताबड़तोड़ उस पर चुंबनों की बौछार कर दी. एक पुरानी कहावत है, आग और घी को पास रखा जाए तो घी पिघलेगा, जिस से आग और भड़केगी.

यही इस कमरे में हो रहा था. मंगेतर की बांहों में समाते ही रश्मि का संयम जवाब दे गया. जल्द ही दोनों बिस्तर पर आ कर एकदूसरे के आगोश में खो गए. तकरीबन एक घंटे कमरे में गर्म सांसों का तूफान उफनता रहा. तृप्त हो जाने के बाद दोनों फ्रेश हुए तो शरीर की भूख मिटने के बाद अब पेट की भूख सिर उठाने लगी.

रश्मि का मन बाहर जा कर खाना खाने का नहीं था, इसलिए विवेक ने कमरे में ही खाना मंगवा लिया. खाना खा कर टीवी देखते हुए दोनों दुनियाजहान की बातें करते आने वाले कल का तानाबाना बुनते रहे कि शादी के बाद हनीमून कहां मनाएंगे और क्याक्या करेंगे?

एक बार के संसर्ग से दोनों का मन नहीं भरा था, इसलिए फिर सैक्स की मांग सिर उठाने लगी, जिस में उस एकांत का पूरा योगदान था, जिस की जरूरत एक अच्छे मूड के लिए होती है. इस बार दोनों ने वे सारे प्रयोग कर डाले, जो वात्स्यायन के कामसूत्र सोशल मीडिया और इधरउधर से उन्होंने सीखे थे.

2-3 घंटे बाद दोनों थक कर चूर हो गए तो कब एकदूसरे की बांहों में सो गए, दोनों को पता ही नहीं चला. और जब चला तब तक सुबह हो चुकी थी. रश्मि और विवेक, दोनों के लिए ही यह एक नया अनुभव था, जिसे उन्होंने जी भर जिया था. दोनों के बीच कोई परदा नहीं रह गया था, पर इस बात की कोई ग्लानि उन्हें नहीं थी, क्योंकि दोनों शादी के बंधन में बंधने जा रहे थे.

सुबह अपना सामान समेट कर दोनों काउंटर पर पहुंचे और होटल का बिल अदा कर रिश्तेदार के यहां पहुंच गए. रश्मि ने चहकते हुए सभी रिश्तेदारों से विवेक का परिचय कराया, लेकिन दोनों यह बात छिपा गए कि वे रात को ही ग्वालियर आ गए थे और रात उन्होंने एक होटल में गुजारी थी. जाहिर है, यह बात बताने की थी भी नहीं.

उसी दिन शाम को दोनों वापस नोएडा के लिए रवाना हो गए. साथ में था एक रोमांटिक रात का दस्तावेज, जिसे याद कर दोनों सिहर उठते थे और एकदूसरे की तरफ देख हौले से मुसकरा देते थे. बात आई गई हो गई, पर दोनों के बीच व्हाट्सऐप और फेसबुक की चैटिंग में वह रात और उस की बातें और यादें ताजा होती रहीं. अब न केवल दोनों, बल्कि उन के घर वाले भी शादी की तैयारियां और खरीदारी में लग गए थे.

इन यादों से उबरते रश्मि की नजर फिर से टैग की हुई इस लाइन पर पड़ी ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल’ तो वह चौंक उठी कि अजीब इत्तफाक है. फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजने वाले ने जैसे उस की यादों को जिंदा कर दिया था. रश्मि की जिज्ञासा अब शबाब पर थी कि आखिर इस लाइन का मतलब क्या है? लिहाजा उस ने कुछ सोच कर उस अंजान व्यक्ति की फ्रैंड रिक्वैस्ट स्वीकार कर ली.

जैसे ही उस ने इस नए फेसबुक फ्रैंड का एकाउंट खोला, वह भौचक रह गई. भेजने वाले ने एक पैराग्राफ का यह मैसेज लिख रखा था.

‘रश्मिजी, आप का कमसिन फिगर लाखों में एक है. जब से मैं ने आप को देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. वीडियो में आप एक लड़के को प्यार कर रही हैं. सच कहूं तो मुझे उस लड़के की किस्मत से जलन हो रही है. काश! उस युवक की जगह मैं होता तो आप मुझे उसी तरह टूट कर प्यार करतीं. आप को यकीन नहीं हो रहा हो तो अब वीडियो देखिए.’

अव्वल तो मैसेज पढ़ कर ही रश्मि के दिमाग के फ्यूज उड़ गए थे. रहीसही कसर वह वीडियो देखने पर पूरी हो गई, जिस में उत्तम होटल के कमरे में उस के और विवेक के बीच बने सैक्स संबंधों की तमाम रिकौर्डिंग कंप्यूटर स्क्रीन पर दिख रही थी.

वीडियो देख कर रश्मि पानीपानी हो गई. अब उसे लग रहा था कि उस ने और विवेक ने जो किया था, वह किसी ब्लू फिल्म से कम नहीं था. वह हैरान इस बात पर थी कि यह सब रिकौर्ड कैसे हुआ? जबकि विवेक ने कमरे में दाखिल होते ही अच्छे से ठोकबजा कर देख लिया था कि कमरे में कोई कैमरा वगैरह तो नहीं लगा.

पर जो हुआ था, वह कंप्यूटर स्क्रीन पर चल रहा था. वीडियो देख कर सकते में आ गई रश्मि ने तुरंत फोन कर के विवेक को अपने घर बुलाया. विवेक आया तो रश्मि ने उसे सारी बात बताई, जिसे सुन कर वह भी झटका खा गया. यह तो साफ समझ आ रहा था कि वीडियो उसी रात का था, पर इसे भेजने वाले की मंशा साफ नहीं हो रही थी कि वह क्या चाहता है, सिवाय इस के कि वह गलत मंशा से रश्मि पर दबाव बना रहा था.

दोनों गंभीरतापूर्वक काफी देर तक इस बिन बुलाई मुसीबत पर चरचा करते रहे. बात चिंता की थी, इस लिहाज से थी कि अगर यह वीडियो वायरल हो गया तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे. दोनों अब अपनी जवानी के जोश में छिप कर किए इस कृत्य पर पछता रहे थे. लंबी चर्चा के बाद आखिरकार उन्होंने तय किया कि भेजने वाले से उस की मंशा पूछी जाए.

लिहाजा उन्होंने इस बाबत मैसेज किया तो जवाब आया कि अगर इस वीडियो को वायरल होने से बचाना है तो ढाई लाख रुपए दे दो. अब तसवीर साफ थी कि उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था. विवेक और रश्मि, दोनों निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से थे, इसलिए ढाई लाख रुपए का इंतजाम करना उन की हैसियत के बाहर की बात थी. पर होने वाली बदनामी का डर भी उन के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

आखिरकार विवेक ने सख्त और समझदारी भरा फैसला लिया कि जब पौकेट में इतने पैसे नहीं हैं तो बेहतर है कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जाए. दोनों अपनेअपने घर से बहाना बना कर बीती 1 मई को ग्वालियर पहुंचे और सीधे एसपी डा. आशीष खरे से मिले. मामले की गंभीरता और शादी के बंधन में बंधने जा रहे इन दोनों की परेशानी आशीष ने समझी और मामला पड़ाव थाने के टीआई को सौंप दिया.

पुलिस वालों ने दोनों को सलाह दी कि वे ब्लैकमेलर से संपर्क कर किस्तों में पैसा देने की बात कहें. रश्मि ने पुलिस की हिदायत के मुताबिक ब्लैकमेलर को फोन कर के कहा कि वह ढाई लाख रुपए एकमुश्त तो देने की स्थिति में नहीं हैं, पर 5 किस्तों में 50-50 हजार रुपए दे सकती है. इस पर ब्लैकमेलर तैयार हो गया.

सीधे उत्तम होटल पर छापा न मारने के पीछे पुलिस की मंशा यह थी कि ब्लैमेलर को रंगेहाथों पकड़ा जाए. ऐसा हुआ भी. आरोपी आसानी से पुलिस के बिछाए जाल में फंस गया और रश्मि से 50 हजार रुपए लेते धरा गया. जिस युवक को पुलिस ने पकड़ा था, उस का नाम भूपेंद्र राय था. वह उत्तम होटल में ही काम करता था.

भूपेंद्र को उम्मीद नहीं थी कि रश्मि पुलिस में खबर करेगी, इसलिए वह पकड़े जाने पर हैरान रह गया. पूछताछ में उस ने बताया कि वह तो बस पैसा लेने आया था, असली कर्ताधर्ता तो कोई और है.

वह कोई और नहीं, बल्कि होटल का 63 वर्षीय मैनेजर विमुक्तानंद सारस्वत निकला. उसे भी पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने पूछताछ में मान लिया कि उन्होंने इस तरह कई जोड़ों को ब्लैकमेल किया था.

भूपेंद्र ने बताया कि इस होटल में उसे उस के बहनोई पंकज इंगले ने काम दिलवाया था. काम करतेकरते भूपेंद्र ने महसूस किया कि होटल में रुकने वाले अधिकांश कपल सैक्स करने आते हैं. लिहाजा उस के दिमाग में एक खुराफाती बात वीडियो बना कर ब्लैकमेल करने की आई, जिस का आइडिया एक क्राइम सीरियल से उसे मिला था.

भूपेंद्र ने दिल्ली जा कर नाइट विजन कैमरे खरीदे, जो आकार में काफी छोटे होते हैं. इन कैमरों को उस ने टीवी के औनऔफ स्विच में फिट कर रखा था. इस से कोई शक भी नहीं कर पाता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं. आमतौर पर ठहरने वाले इस बात पर ध्यान नहीं देते कि टीवी का स्विच औन है, क्योंकि इस से कोई खतरा रिकौर्डिंग का नहीं होता.

ग्राहकों के जाने के बाद भूपेंद्र कैमरे निकाल कर फिल्म देखता था और जिन लोगों ने सैक्स किया होता था, उन के नामपते होटल में जमा फोटो आईडी से निकाल कर फेसबुक, व्हाट्सऐप या फिर सीधे मोबाइल फोन के जरिए ब्लैकमेल करता था. दोनों ने माना कि वे ब्लैकमेलिंग के इस धंधे से लाखों रुपए अब तक कमा चुके हैं. दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

मामला उजागर हुआ तो ग्वालियर में हड़कंप मच गया. पता यह चला कि कई होटलों में इस तरह के कैमरे फिट हैं और ब्लैकमेलिंग का धंधा बड़े पैमाने पर फलफूल रहा है. इस तरह की रिकौर्डिंग के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने प्रदर्शन भी किया.

इस पर पुलिस ने कई होटलों में छापे मारे, पर कुछ खास हाथ नहीं लगा. क्योंकि संभावना यह थी कि भूपेंद्र की गिरफ्तारी के साथ ही ब्लैकमेलर्स ने कैमरे हटा दिए थे. हालांकि उम्मीद बंधती देख कुछ लोगों ने पुलिस में जा कर अपने ब्लैकमेल होने का दुखड़ा रोया.

जब यह सब कुछ हो गया तो विवेक और रश्मि ब्रेफ्रिकी से नोएडा वापस चले गए और दोबारा शादी की तैयारियों में जुट गए. पर एक सबक इन्हें मिल गया कि हनीमून मनाते वक्त  होटल में इस बात का ध्यान रखेंगे कि टीवी के खटके में कैमरा न लगा हो और घर आने के बाद फिर फेसबुक पर यह मैसेज न मिले कि ‘ए सीक्रेट नाइट इन होटल.’ Hindi Story

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