Hindi Story: बिखरी जिंदगी

Hindi Story: शादी से पहले ही सपना पेट से हो गई थी. पर उस का प्रेमी चिरंजीवी डरपोक निकला. मजबूरी में सपना ने अबौर्शन कराया. फिर उस की शादी प्रभात के साथ हुई. पर डाक्टर ने प्रभात को बता दिया कि सपना का शादी से पहले अबौर्शन हुआ था. आगे क्या हुआ?


जि का डर था वही हुआ. सपना मायके रहने गई. उस के पति ने तलाक का नोटिस भेज दिया.
मैं यानी सपना की भाभी निशा हमेशा अपने पति रंजन से कहती रही कि शादीब्याह के मामले में कुछ भी छिपाना अच्छी बात नहीं है. चाहे जैसा भी हो सपना के अतीत के बारे में बता देना उचित हेगा, उस के बाद जो होगा उन की मरजी. अगर उन्हें लगेगा कि सपना से शादी करना ठीक होगा तो करेंगे, नहीं तो कहीं और कोशिश करो.


दरअसल, नौकरी के दरमियान सपना की जानपहचान एक दक्षिण भारतीय लड़के चिरंजीवी से हुई थी. बात इतनी बढ़ी कि वह उस से पेट से हो गई. सपना ने चिरंजीवी पर शादी करने का दबाव बनाया, तो एकाएक वह नौकरी छोड़ कर अपने गांव चला गया. इस बीच सपना ने उसे कई बार फोन किया, मगर चिरंजीवी ने हर बार यही कहा कि वह शादी करने के हालात में नहीं है, लिहाजा वह बच्चा गिरा दे.
सपना एक ऐसे भंवर मे फंस गई, जहां से उसे सिवा बरबादी के कुछ नहीं दिख रहा था. उस से रोते बन रहा था, ही हंसते. कैसे अपने मांबाप को सब बताएगी? उन्हें जब पता चलेगा तब उन पर क्या बीतेगी? एक बार खुदकुशी करने का खयाल मन में आया, मगर बढ़ते कदम रुक गए. खुदकुशी करना क्या आसान होता है?


आखिरकार सपना ने फैसला लिया कि वह मम्मीपापा को बता देगी. अबौर्शन करवाना कोई गुनाह नहीं. उस का गुनाह इतना था कि उसे इस हद तक नहीं जाना चाहिए था. मांबाप अगर बेटियों पर भरोसा कर के उन्हें बाहर नौकरी करने की इजाजत देते हैं, तो उन्हें मर्यादा का खयाल रखना चाहिए. लड़कों का क्या जाएगा, वे तो कोई भी बहाना बना कर कन्नी काट लेंगे, ?ोलना तो लड़कियों को ही पड़ता है. मम्मीपापा ने सुना तो वे आगबबूला हो गए. सपना को खरीखोटी सुनाई. चिरंजीवी से बात करना चाहा, मगर उस का फोन स्विच औफ मिला. एक बार चेन्नई जाने को सोचा, फिर यह सेच कर चुप हो गए कि उस का पुश्तैनी घर एक गांव में था, जहां कुछ कहनेसुनने से कुछ नहीं होगा. वे हमारी बात सम?ाने वाले नहीं. उलटे सपना को ही कुसूरवार मान कर गांव से भगा देंगे. काफी सोचविचार कर सपना का अबौर्शन कराना उचित सम?.


अब सपना आजाद थी. पर उस का औफिस जाना छुड़वा दिया गया. रंजन के ऊपर सपना की शादी की जिम्मेदारी थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि रंजन पूर्वांचल की एक छोटे सी तहसील भाटी में नौकरी करते थे, जो दिल्ली से काफी दूर थी. दिल्ली के आसपास सपना की शादी करना उचित नहीं लगा. भेद खुलने का डर था. लड़का रंजन के ही औफिस में काम करता था. रंजन से उस की अच्छी जानपहचान थी. भाटी में उस का खुद का मकान था, साथ में गांव में कुछ पुश्तैनी जमीन भी थी. सपना इस शादी के हक में नहीं
थी. कहां दिल्ली, कहां एक छोटा सा कसबावह उदास हो गई. मम्मी ने भरोसा दिया कि उस का तबादला लखनऊ हो जाएगा, तब वह आराम से महानगर में रह सकेगी.


पता नहीं मम्मी के भरोसे में कितनी हकीकत थी. एकबारगी मु? लगा कि मम्मीपापा किसी तरह से सपना का घर बसना देखना चाहते थे. लेकिन सपना की पसंदनापसंद का कोई सवाल नहीं था. आज के दौर में शारीरिक संबंध बनना एक सामान्य घटना है. भागदौड़ की जिंदगी में इसे कोई इतनी गंभीरता से नहीं लेता, मगर मम्मीपापा के भीतर  इतना डर था कि उन्होंने सपना को ऐसी जगह ब्याहना मुनासिब सम?, जहां सपना जैसी लड़की के लिए एक पल रहना मुमकिन नहीं था. लड़के का नाम प्रभात था. उसे एकमुश्त जमीन खरीदने के लिए रकम की जरूरत थी, जिसे रंजन ने स्वीकार कर लिया. थोड़े से लोगों की मौजूदगी में सपना की शादी कर दी गई, पर उस का भाटी में कभी मन नहीं लगा.


सपना अकसर रंजन से यही कहा करती थी कि वह किसी तरह प्रभात का तबादला लखनऊ करवा दे, ताकि वहां कोई फ्लैट ले कर रहा जाए. इस बीच सपना पेट से हुई. पहली बार जब प्रभात उसे महिला डाक्टर के पास ले गया, तो चैकअप करने के बाद उस ने प्रभात को अपने केबिन मे बुला कर पूछा कि क्या आप की पत्नी का पहले कभी अबौर्शन हुआ था? यह सुन कर प्रभात थोड़ा हैरान हो कर बोला, ‘‘नहीं, ऐसा तो नहीं है. यह हमारा पहला अनुभव है.’’ डाक्टर ने दोबारा कुछ पूछना मुनासिब नहीं सम?. कुछ दवाएं लिख दीं और बीचबीच में कर दिखाने की सलाह दी. रास्तेभर प्रभात के कानों में लगातार डाक्टर साहिबा की कही बात गूंजती रही. जैसे ही वह सपना के साथ घर के अंदर दाखिल हुआ, सब से पहले उस का यही सवाल था, ‘‘क्या तुम्हें पहले कभी अबौर्शन हुआ था?’’


यह सुन कर सपना कांप गई, फिर खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘कैसी बचकानी बातें कर रहे हैं…’’
‘‘डाक्टर की बात ?ाठी नहीं हो सकती…’’ प्रभात बोला.
‘‘डाक्टर बीच में कहां से गई?’’
‘‘उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा एक बार अबौर्शन हो चुका है.’’
‘‘डाक्टर कैसे पता लगा सकता है?’’
‘‘और कौन बताएगा?’’


सपना ने थोड़ा कड़ा मन करते हुए कहा, ‘‘मान लो ऐसा ही हो तो तुम कर क्या सकते हो?’’
‘‘मैं ऐसी चरित्रहीन औरत के साथ एक पल भी नहीं रहना चाहूंगा,’’ प्रभात ने दो टूक कहा.
‘‘तलाक लेना क्या आसान होगा? दूसरे, मैं डाक्टर की बात को गलत साबित करती हूं. जब ऐसा कुछ हुआ ही हो तो मैं कैसे मान लूं?’’ सपना की आवाज में आत्मविश्वास की कमी थी.
उस रोज प्रभात और सपना में काफी बहस हुई. दोनों का ?ागड़ा सुन कर प्रभात की मां गईं. पूछने पर प्रभात ने कुछ नहीं छिपाया.
‘‘मु? तो पहले से ही शक था.
तुम्हीं शादी के लिए उतावले थे.
10 लाख क्या दिया खोटा सिक्का
थमा दिया,’’ मां सपना को जलीकटी सुनाने लगीं.


उस दिन के बाद प्रभात ने सपना की  तरफ देखना भी छोड़ दिया. सपना की जिंदगी खजूर पर लटके हुए इनसान की तरह हो गई. वह दिल्ली की रही, ही भाटी की. मम्मीपापा ने जो सोच कर उस की शादी का घरौंदा बनाया था, वह रेत की तरह बिखरने वाला था. एक दिन सपना ने फोन कर के रंजन को सारी बातें बता दीं. रंजन सपना की ससुराल आया. प्रभात को रंजन से इतनी नफरत हो गई थी कि जब कभी उस का औफिस में सामना होता, तो वह दुआसलाम भी नहीं करता था. रंजन को सम? में नहीं आया कि एकाएक प्रभात इतना बदल कैसे गया. उसे लगा होगी कोई औफिस की समस्या, पर अब सारा राज खुल गया था.


प्रभात की मां ने साफसाफ कह दिया कि वह सपना को अपनी बहू बना कर नहीं रखना चाहतीं. रंजन ने लाख सम?ाया, मगर प्रभात सम?ाने के लिए तैयार था, ही उस के घर वाले.
‘‘क्या यह आप लोगों का आखिरी फैसला है?’’ रंजन हताश मन से पूछा.
‘‘हां,’’ प्रभात ने जवाब दिया.
‘‘कहीं तुम ने सपना को तलाक देने का तो फैसला नहीं ले लिया है?’’ रंजन ने शक जताया.
‘‘आप ने सही सोचा है,’’ प्रभात
की इस बात पर रंजन के माथे पर बल पड़ गए.
‘‘तलाक लेना आसान नहीं है. वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है.’’
‘‘मैं उसे अपना बच्चा नहीं मानता,’’ प्रभात ने हेकड़ी दिखलाई.
‘‘तुम्हारे मानने या मानने से कुछ नहीं होगा. जैसे डाक्टर ने सपना के अबौर्शन की जानकारी दी, वैसे ही तकनीक के जरीए बताया जा सकता है कि यह तुम्हारा बच्चा ही है. तुम्हें उसे वे सारे हक देने होंगे, जो एक बच्चे के होते हैं,’’ रंजन बोला.


पर प्रभात पर रंजन की बात का बिलकुल भी असर नहीं पड़ा. उस रोज रंजन बिना कोई ठोस फैसला लिए वापस अपने घर गया. घर कर उस का मन किसी काम में नहीं लगा. उस के दिमाग में बारबार सपना ही घूमती रही. क्या सोचा था, क्या हो गया. उसे भरोसा था कि इतनी दूर, साथ में अच्छाखासा दहेज दे कर वह सपना के नाजायज प्यार पर परदा डाल देगा, मगर ऐसा हुआ नहीं. रंजन को अपने फैसले पर अफसोस होने लगा. इस सब की जानकारी जब मम्मीपापा को लगेगी, तब उन पर क्या बीतेगी, यह सोच कर उस का दिल बैठने लगा. अब अकसर अबौर्शन को ले कर सपना और प्रभात में ?ागड़ा होने लगा. प्रभात का सारा परिवार उस के साथ था, जबकि सपना अकेली. कितनी खिलाफत करती. तंग कर एक
दिन अपना जरूरी सामान बांध कर रंजन के पास रहने चली आई.


औफिस में मौका मिला तो रंजन ने प्रभात को सम?ाने की काफी कोशिश की, मगर वह तो कुछ भी सुनने के लिए तैयार था. वह बहुत गुस्से में था. जल्दी ही यह खबर औफिस में फैल  गयी कि प्रभात और रंजन की बहन सपना में अनबन हो गई है. मामला तलाक पर गया है. रंजन को काफी शर्मिंदगी महसूस होने लगी. ऊपर से तो कोई कुछ नहीं कहता था, मगर अंदर ही अंदर कानाफूसी जारी थी. रंजन ने मम्मीपापा को सारी बात बताई. वे दोनों भी बेहद परेशान हो गए. पापा रंजन से बोले कि चाहे जैसे भी हो सपना को वापस ससुराल भेजो. ‘‘किस के बल पर? क्या गारंटी है कि वहां सपना महफूज होगी? कहीं वे सब सपना को मार डालें तब?’’ ‘‘इतना ही डर था तो फिर शादी क्यों की?’’ पापा चिल्लाए.


‘‘पापा, आप 2 तरह की बातें करते हैं. एक तरफ आप छिपाना चाहते थे, तो दूसरी तरफ शादी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं. इतना ही था तो कर लिए होते अपने तरीके से शादी,’’ इतना बोलने के अगले पल रंजन को पापा को कहे शब्दों पर अफसोस होने लगा. उसे पापा से ऐसे तल्ख लहजे में नहीं बात करनी चाहिए थी. उस ने पापा से माफी मांगी. इधर, सपना ने साफसाफ कह दिया कि वह उस गांव में रहने नहीं जाएगी. वहां उस का मन नहीं लगता. भले ही जिंदगी अकेले काटनी हो, काट लेगी मगर वापस उस जेलखाने में नहीं जाएगी. जेलखाना ही थी उस की ससुराल. सासससुर, ननदननदोई कहीं से भी वे लोग शहरी नहीं लगते थे. पता नहीं रंजन ने क्या देखा जो टूट पड़े इस रिश्ते के लिए.


आखिरकार रंजन ने सपना को वापस दिल्ली भेज दिया. दिल्ली कर फिर से वही सवाल खड़ा हुआ कि सपना के पेट में पल रहे बच्चे का क्या होगा? एक बार सोचा कि फिर से अबौर्शन करा कर पहले की तरह आजाद जिंदगी जिए. नौकरी तो मिल ही जाएगी. सपना के मम्मीपापा इस के खिलाफ थे. उन्हें भरोसा था कि देरसवेर प्रभात को सम? जाएगा और सबकुछ ठीक हो जाएगा. काफी जद्दोजेहद के बाद सपना ने मम्मीपापा की बात मान ली. उसे भी लगा यही ठीक रहेगा. इस बीच प्रभात ने तलाक का नोटिस भेज दिया. सपना कुछ पल के लिए बेचैन हुई, मगर अगले पल खुद में हिम्मत संजोई कि चाहे जो भी हो जाए, वह प्रभात को तलाक नहीं देगी.


पूरे 9 महीने बाद सपना ने अपने बच्चे को जन्म दिया. प्रभात ने काफी कोशिश की, मगर सपना टस से मस
हुई. 2 साल गुजरने के बाद भी सपना ने तलाक के लिए कोई पहल नहीं की, तब सुनने में आया कि प्रभात ने दूसरी शादी कर ली. यह तो और भी बड़ा अपराध था. सपना ने बच्चे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने का मन बनाया. उस ने प्रभात की पुश्तैनी जायदाद पर दावा ठोंक दिया, साथ में उस की दूसरी शादी पर भी सवाल खड़े किए. तमाम कानूनी पचड़े की वजह से प्रभात काफी दबाव में गया और उस ने सपना की बात मान कर उसके मनमुताबिक हर्जाना दे कर तलाक पा लिया. सपना का बेटा 5 साल का हुआ, तो उस ने दोबारा नौकरी करने का मन बनाया. उसे नौकरी मिल भी मिल गई. ऐसे ही एक शाम सपना औफिस से घर आने के लिए मैट्रो का स्टेशन पर इंतजार कर रही थी, तभी उसे चिरंजीवी दिखा. उस ने नफरत से नजरें दूसरी तरफ मोड़ लीं. इस के बावजूद चिरंजीवी ने उसे देख लिया. वह उस के करीब आया.


‘‘सपना, मैं चिरंजीवी,’’ इतना कह कर वह मुसकराया.
सपना ने उस की बात का कोई जवाब नहीं दिया.
‘‘सपना, मु? माफ कर दो. मैं ने तुम्हें धोखा दिया.’’
‘‘अब गड़े मुरदे उखाड़ने से क्या फायदा?’’ सपना की आवाज में
तल्खी थी.
‘‘पिताजी को कोरोना हो गया था. अचानक मु? गांव जाना पड़ा.’’
‘‘चलो, मान लेते हैं. मगर क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि एक बार फोन कर के मेरा हाल लेते. बड़ी आसानी से कह दिया अबौर्शन करा लो. तुम्हें
मेरी हालत का अंदाजा था?’’ कहतेकहते सपना का गला रुंध गया, ‘‘तुम ने मु? कहीं का नहीं छोड़ा.’’
‘‘मु? माफ कर दो,’’ कह कर चिरंजीवी ने चुप्पी साध ली. उस के चेहरे पर बनतेबिगड़ते भावों से लगा मानो वह सपना से और भी कुछ कहना चाहता है, मगर कह नहीं पा रहा था.
फिर चिरंजीवी ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘सपना, अगर तुम्हारे पास समय हो तो क्या थोड़ी देर के लिए मेरे साथ पास के किसी रैस्टोरैंट में जा कर चाय पीना पसंद करोगी?’’
‘‘नहीं चिरंजीवी, अब हमारे रास्ते अलगअलग  हैं.’’
‘‘सिर्फ आज, उस के बाद मैं
तुम से कभी नहीं मिलूंगा,’’ चिरंजीवी दोबारा बोला.
दोनों रैस्टोरैंट में आए. चिरंजीवी
ने चाय के साथ कुछ स्नैक्स का भी और्डर दिया.


चाय की चुसकियों के बीच चिरंजीवी ने सपना के पति और बच्चे के बारे में पूछा.
यह सुन कर सपना का मन भीग गया. बड़ी मुश्किल से उस की जबान से बोल फूटे, ‘‘मेरा तलाक हो चुका है. मु? एक 5 साल का बेटा है. वही मेरे जीने का सहारा है.’’
सपना की आंखों में आंसू देख कर चिरंजीवी का दिल पसीज गया.
चाहते हुए भी सपना ने अपने अतीत के पन्ने बारीबारी से खोल कर चिरंजीवी के सामने रख दिए.
चिरंजीवी अपराधबोध से भर गया. सपना की बिखरी जिंदगी के लिए वह खुद को कुसूरवार मानने लगा. वह भरे दिल से बोला, ‘‘सपना, बीते हुए कल को वापस तो नहीं लाया जा सकता, मगर उसे नए सिरे से संवारा जरूर जा सकता है.’’


‘‘मतलब?’’ पूछते हुए सपना हैरानी से उसे देखने लगी.
‘‘क्या हम शादी कर के नई जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकते?’’
‘‘यह तुम क्या कह रहे होतुम्हारे बीवीबच्चे क्या सोचेंगे…’’
‘‘मैं ने आज तक शादी नहीं की.
वैसे भी मेरी उम्र इतनी भी गई नहीं है
कि मैं शादी कर सकूं. अभी तो महज 33 साल का हूं.’’
कुछ सोच कर सपना का मन उदास हो गया, ‘‘नहीं चिरंजीवी, ऐसा नहीं हो सकता. मैं एक बेटे की मां हूं. तुम शायद ही मेरे बेटे का अपना पाओ. अगर मेरा बेटा हम दोनों की शादी की वजह से अनदेखा हुआ, तो मैं खुद का कभी माफ नहीं कर पाऊंगी.’’
‘‘अकेले जिंदगी काटना क्या आसान होगा तुम्हारे लिए?’’ चिरंजीवी के इस सवाल ने सपना को ?ाक?ार कर रख दिया. बेशक आज मांबाप जिंदा हैं, पर कल का क्या ठिकाना. वे नहीं रहे तब किस के सहारे जिंदगी काटेगी. कोई तो होना चाहिए, जो उस के अकेलेपन का साथी हो.


देर हो रही थी. सपना ने चिरंजीवी का मोबाइल नंबर मांगा. घर कर वह बेहद बेचैन हो रही थी. कभी अपने भविष्य के बारे में सोचती, तो कभी बूढ़े हो रहे मांबाप के बारे में. बच्चे को ले कर भी वह परेशान थी. पता नहीं बड़ा हो कर वह चिरंजीवी को अपना पिता स्वीकार करेगा भी या नहीं? सम?ादार होने के बाद अपने असली पिता के पास जाने का जिद कर बैठे और उसे गुनाहगार मानने लगे तब? अगले दिन रविवार था. चिरंजीवी ने सपना के साथ घूमने का प्लान बनाया, जिसे सपना इनकार कर सकी. बेटे को मां के पास छोड़ कर वह यह कह कर गई कि औफिस के काम से जा रही है, जल्द जाएगी.


आज चिरंजीवी और सपना ने एकदूसरे को काफी वक्त दिया.
‘‘चिरंजीवी, क्या तुम मु? पर तरस खा कर शादी तो नहीं कर रहे हो?’’ सपना ने अचानक पूछा.
‘‘बिलकुल नहीं. मैं तुम से आज भी बेहद प्यार करता हूं.’’
‘‘मेरे बच्चे का क्या होगा? क्या तुम उसे बाप का नाम देगे?’’
‘‘सपना, मैं खुद अपने पिता का सौतेला बेटा हूं. क्या मेरे पिता ने मु? बेटे का  मान नहीं दिया. क्या मैं ने उन्हें पिता का दर्जा नहीं दिया. तुम ने खुद देखा होगा कि जब वे कोरोना से पीडि़त हुए थे, तो मैं उन की देखभाल के लिए अपने गांव भागाभागा चला गया था.’’
सपना को चिरंजीवी निश्छल और बेकुसूर लगा.
जब सपना को पूरी तसल्ली हो गई कि चिरंजीवी के बारे में जैसा सोचा था वह वैसा नहीं है, तब घर कर उस ने अपने मम्मीपापा से उस का जिक्र किया. वे तो पहले से ही चाहते थे कि सपना का घर बस जाए. ऐसे में चिरंजीवी की पहल को मना कर सके.


सादे समारोह में शादी हो गई. जब विदाई का समय आया, तब सपना के पापा ने उसे एक कमरे में बुला कर नम आंखों से कहा, ‘‘बेटी, मु? माफ करना. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की. तुम पर दबाव बना कर ऐसी जगह तुम्हारी शादी कर दी, जहां करने के बारे में मु? सौ बार सोचना चाहिए था.
सिर्फ शादी कर देना ही मांबाप की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि शादी के लिए बेटी की रजामंदी भी लेनी चाहिए, जो मैं ने नहीं ली.’’  Hindi Story     

 Social Story: सच्ची सलाह

Social Story: मैं 21 साल की लड़की हूं. मैं मध्य प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. हमारे यहां सरकारी स्कूल में मु? पढ़ाने का मौका मिला है. इस के लिए मु? पैसे नहीं मिलते हैं, पर मु? पढ़ाने का शौक है तो मैं 12वीं जमात के बच्चों को विज्ञान पढ़ा देती हूं. उस जमात के कुछ बच्चे बड़े बदमाश हैं.

वे पढ़ाई से ज्यादा लड़कियों पर ध्यान देते हैं और भद्दे कमैंट्स करते हैं. इतने ज्यादा बेहूदा की हम सब का सिर शर्म से ?ाक जाता है. मैं ने उन्हें सम?ाया और प्रिंसिपल से शिकायत करने की धमकी भी दी पर वे बड़े ढीठ हैं. हम ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी टूटे, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि किसी भी छात्र का कैरियर दांव पर लगे? यह हैरानी की बात है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने के पैसे ही मिलें. अगर आप ठेके पर किसी टीचर के लिए पढ़ा रही हों तो उस से अपनी मेहनत के पैसे लें.


रही बात लड़कों के बरताव की तो पहले यह देखसम? लें कि लड़कियों को भी इस पर कोई एतराज है या नहीं और अगर है तो उन्हें प्रिंसिपल से शिकायत करने को कहें और इस में उन का साथ दें.
वैसे, आप घर पर भी साइंस की ट्यूशन पढ़ा सकती हैं. इस से स्कूल के ?ां?ाटों से बच जाएंगी और फीस भी मिलेगी. फोकट में ज्ञान बांटने से कोई फायदा नहीं



मैं 45 साल का शादीशुदा आदमी हूं और मेरे 2 बच्चे हैं. मेरी पत्नी की उम्र 40 साल है और अब वह सैक्स से दूर भागती है. जब भी रात को मेरा मन करता है तो वह थके होने का बहाना बना कर करवट बदल लेती है. कभीकभार तो मु? बहुत ज्यादा गुस्सा आता है और दिल करता है कि कहीं किसी और औरत से चक्कर चला लूं, पर बाद में मु? महसूस होता है कि यह गलत है. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी पत्नी को मेरी जिस्मानी भूख की सम? जाए?


कुछ औरतों में बढ़ती उम्र में सैक्स में दिलचस्पी रह जाना कुदरती बात है, जिस की अपनी वजहें भी होती हैं मसलन बच्चों घर की जिम्मेदारियां, सेहत से ताल्लुक रखते मसले और इस से भी ज्यादा अहम पति यानी आप का रोल जो भूखे भेडि़ए की तरह महज अपने मजे के लिए बीवी पर टूट पड़ते हैं. उस की संतुष्टि और इच्छा से कोई वास्ता रखने की भूल की कीमत कभीकभी इसी तरह चुकाना पड़ती है, लेकिन यह बहुत बड़ी समस्या नहीं है.


पत्नी की दिलचस्पी सैक्स में पैदा करें, उस के साथ घूमेफिरें, उस से बातें करें, चुहलबाजी करें और फोरप्ले पर खास ध्यान दें. इस पर भी बात बने तो किसी काबिल डाक्टर को दिखाएं. इधरउधर मुंह मारने से समस्या हल होने के बजाय और बढ़ भी सकती है.

मेरी उम्र 25 साल है. मेरी अभी शादी नहीं हुई है, पर एक दोस्त है जो मेरे साथ जिस्मानी रिश्ता बना चुकी है. हाल ही में मु? पता चला कि वह और भी कई लड़कों से दोस्ती किए हुए है और उन के साथ घूमनेफिरने जाती है. पूछने पर मुकर जाती है.


मैं उस से बहुत ज्यादा प्यार करता हूं, पर उस की इन बातों से मु? में बहुत ज्यादा तनाव रहने लगा है. मु? क्या करना चाहिए? आप बजाय सीरियस होने के अपनी गर्लफ्रैंड की तरह जिंदगी के मजे लूटें और अगर ऐसा करने में खुद को नाकाम पाते हैं तो धीरेधीरे उस से किनारा कर लें. लेकिन उस की निजी जिंदगी में दखल दे कर उसे परेशान करें और ही खुद के लिए टैंशन लें.


इस के बाद भी दिलोदिमाग से वह लड़की निकले तो उसे सम?ाने की कोशिश करें. शायद वह रास्ते पर जाए, बशर्ते उस के बारे में आपको जो पता चला है, उस में हकीकत हो.                 
    

Marrycom Life: तुम हमेशा ‘मैग्निफिसैंट मैरी’ ही रहोगी

Marrycom Life: भारतीय मुक्केबाजी में जब भी किसी महिला को याद किया जाएगा, सब से ऊपर एमसी मैरी कौम का नाम रहेगा, जिन्होंने रिकौर्ड 6 बार एआईबीए वुमन वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियनशिप जीती है.


इतना ही नहीं, एमसी मैरी कौम ने साल 2012 के लंदन ओलिंपिक में ब्रौन्ज मैडल और साल 2018 के क्वींसलैंड कौमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल जीता था. साल 2014 के इंचियोन एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीतने वाली वे पहली भारतीय महिला बौक्सर बनी थीं. उन्होंने 5 बार एशियन वुमन बौक्सिंग चैंपियनशिप में भी गोल्ड मैडल जीता था.


एमसी मैरी कौम को साल 2020 में पद्म विभूषण, साल 2013 में पद्म भूषण, साल 2006 में पद्मश्री, साल 2009 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न और साल 2003 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया था. एमसी मैरी कौम को साल 2016 में भारत की राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया था. वे साल 2007 में जुड़वां बच्चों की मां बनने के बाद भी शानदार प्रदर्शन करने के लिए जानी जाती हैं.


पर हाल ही में एमसी मैरी कौम अपनी घरेलू जिंदगी में आए तूफान से दोदो हाथ करती नजर आईं. एक शो में उन्होंने अपने पूर्व पति करुंग ओन्खोलर परपत्नी की कमाईखाने के आरोप लगाए, उन्हें नकारा बताया और सरेआम उन की बेइज्जती की. ऐसा कहने की वजह क्या थी? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले यह जान लें कि यह पारिवारिक और निजी ?ागड़ा पब्लिक डिबेट का हिस्सा कैसे बन गया.


एक बड़ी न्यूज एजेंसी से बात करते हुए एमसी मैरी कौम ने अपनी निजी जिंदगी में मची उथलपुथल पर बताया कि यह संकट 2022 कौमनवैल्थ गेम्स से पहले लगी चोट के बाद शुरू हुआ. वे कई महीनों तक बिस्तर पर रहीं और बाद में उन्हें वौकर का सहारा लेना पड़ा. इसी दौरान उन्हें उन सब बातों का सामना करना पड़ा, जिन्हें वे लंबे समय से नजरअंदाज करती रही थीं.


मैरी कौम ने बताया कि इसी दौर में उन का अपने पूर्व पति करुंग ओन्खोलर पर से भरोसा उठ गया था. वैसे, साल 2023 में उन दोनों का तलाक हो गया था. एमसी मैरी कौम ने बताया, ‘‘मैं नहीं चाहती थी कि यह पूरी दुनिया के लिए तमाशा बने, इसलिए मैं ने कई बार आपसीतौर पर सुल?ाने की कोशिश के बाद तलाक का फैसला लिया. दोनों परिवारों को इस फैसले की जानकारी थी और उन्होंने इसे सम? भी,

लेकिन हालात तब बिगड़ गए, जब मेरी निजी जिंदगी से जुड़ी बातें मीडिया खबरों और सोशल मीडिया पर आने लगीं. मु? लालची कहा गयाऐसे लोगों द्वारा जिन्हें यह तक नहीं पता कि मैं किन हालात से गुजरी हूं.’’ एमसी मैरी कौम ने आरोप लगाया कि उन के साथ करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी हुई और उन्होंने अपनी ही कमाई से खरीदी गई जमीन का कब्जा खो दिया.

उन का दावा है कि उन की जायदाद और मणिपुर की जमीन पर लोन लिया गया, जिसे बाद में वसूली के लिए स्थानीय समूहों ने जब्त कर लिया. हालांकि, इसी रिपोर्ट में उन के पूर्व पति करुंग ओंखोलर ने किसी भी तरह की गलत हरकत से इनकार किया है. मैरी कौम ने आगे कहा कि इस पूरे मामले में सब में सब से दर्दनाक बात यह थी कि सार्वजनिक तौर पर उन के कैरेक्टर पर सवाल उठाए गए. वे अंदर से टूट चुकी हैं, लेकिन उन्हें शोक मनाने की भी इजाजत नहीं है.


यह विवाद तब और बढ़ गया जब एमसी मैरी कौम ने टैलीविजन शोआप की अदालतमें इस बात को खारिज कर दिया कि उन के पति ने उन की बौक्सिंग यात्रा का समर्थन करने के लिए अपने कैरियर काबलिदानकर दिया था. मैरी कौम ने दावा किया कि ओन्खोलर कभी भी परिवार का भरणपोषण करने वाला नहीं था और वह अपना ज्यादातर समयघर पर सो करबिताता था, जबकि वे परिवार के लिए कमाती थीं.


उन्होंने ओन्खोलर पर बिना रजामंदी के बड़ी रकम (एक बार में 10 लाख रुपए तक) निकालने और उस की एसैट्स को गिरवी रखने का आरोप लगाया. उन्होंने अपने पति के सियासी सपनों को पूरा करने के लिए तकरीबन 5-6 करोड़ रुपए खर्च किए. अपने पति को ले कर मैरी कौम ने तब यह भी कहा था ‘‘कैसा सफल कैरियर (पति का) वह तो गलियों में फुटबौल खेला करता था. सच कहूं तो वह एक रुपया भी नहीं कमाता था. कुछ भी नहीं, कहां बलिदान किया? सुबहशाम सोता रहता था.


‘‘वह एक लड़की की कमाई पर जी रहा था. मु? बहुत दुख हुआ. मैं बहुत कमा रही थी, मेरा सारा भरोसा और विश्वास उसी पर टिका था. बाद में मु? पता चला कि मेरा खाता तकरीबन खाली था. ओन्खोलर ने किया पलटवार मैरी कौम के पूर्व पति करुंग ओन्खोलर ने भी अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के साथ पलटवार किया.


समाचार एजेंसी आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में करुंग ओन्खोलर ने कहा, ‘‘मैं बताऊंगा कि उन्होंने लोक अदालत में क्या कहा. सब से पहले, साल 2013 में उस का एक जूनियर बौक्सर के साथ अफेयर था. हमारे परिवारों में ?ागड़ा हुआ था और उस के बाद हम ने सम?ाता कर लिया. ‘‘इस के बाद साल साल 2017 से उस कामैरी कौम बौक्सिंग एकेडमीमें काम करने वाले किसी शख्स के साथ रिश्ता है. मेरे पास उस के व्हाट्सऐप मैसेज सुबूत के तौर पर हैं. मेरे पास उस शख्स के नाम के साथ सुबूत है जिस के साथ उस का अफेयर था. मैं चुप रहा.’’


साथ ही, करुंग ओन्खोलर ने दिल्ली में किराए के मकान में रहने की अपनी वर्तमान हालत का हवाला देते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि उन्होंनेकरोड़ोंरुपए नहीं चुराए हैं. करुंग ओन्खोलर ने आगे कहा, ‘‘उस ने (मैरी कौम) कहा कि चुनाव लड़ने की चाह में मैं ने बहुत पैसा खर्च किया. दरअसल, उस ने ही मु? चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था. 2016 में उसे राज्यसभा के लिए सांसद के रूप में मनोनीत किया गया था. जब उस का बतौर सांसद कार्यकाल पूरा हो रहा था, तब उस ने मु? चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया.


‘‘जब हमारी मुलाकात हुई थी, तब मैं यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. मैं एक कौन्ट्रैक्ट फुटबौल खिलाड़ी भी थाउस ने (मैरी कौम) मु? से अपना कैरियर छोड़ने और उस का साथ देने का अनुरोध किया.
‘‘उस ने मु? से बच्चों की देखभाल करने को कहा. उसे बौक्सिंग का बहुत शौक था और मैं उस से प्यार करता था, इसलिए मैं ने सोचा कि उस का शौक हमारा शौक है. ‘‘वह हफ्तों और महीनों तक घर से दूर रहती थी. मैं ने बच्चों की देखभाल की. मैं ने उन्हें नहलाया, खाना खिलाया, कोचिंग ले गया और घर का सारा काम संभाला.’’


सोशल मीडिया पर फजीहत इस ?ागड़े से सोशल मीडिया पर लोगों की राय के 2 धड़े बन गए. एक धड़े ने पति का साथ दिया कि उस ने वाकई अपने कैरियर की कुरबानी दी और उसे मिली अपनी पत्नी की बेवफाई. मैरी कौम की हिम्मत कैसे हुई उसेऔरत की कमाई खाने वालाकहने की. उस ने तो अपनी पत्नी के सपनों को पूरा करने के लिए खुद को परिवार पालने में ?ांक दिया.


दूसरी तरफ एक धड़े ने मैरी कौम के दर्द को सम? और कहा कि जब किसी औरत का विश्वास टूटता है तो वह अपने पति को भी सही सबक सिखा सकती है. पर यहां सवाल उठता है कि क्यों कोई औरत या लड़की अपनी कमाई का खुद ध्यान नहीं रख सकती?


भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में हर कामयाब औरत की कमाई का हिसाबकिताब शादी से पहले उस का पिता या भाई रखता है और शादी के बाद पति. इस की सब से बड़ी वजह है औरत या लड़की की बुनियादी सोच जिस में उस के पैदा होने से ही भर दिया जाता है कि उस की सिक्योरिटी कोई मर्द ही कर सकता है. वह हमेशा इसी डर में जीती है.


एमसी मैरी कौम ने अपने इंटरव्यू में कहा कि इतने साल से उन्होंने अपने अकाउंट्स तक चैक नहीं किए. इसी बात का उन्हें बहुत बड़ा नुकसान हुआ. इस मामले से यह बात सम? में आई कि हर औरत और लड़की को अपनी कमाई का हिसाबकिताब खुद रखना चाहिए. क्या और कितना कमाया, कहां इन्वैस्ट
किया, आप का फाइनैंशियल स्टेटस क्या है, हर छोटी से छोटी बात पर नजर रखनी चाहिए.


याद रखें कि महिलाएं किसी भी सूरत में पुरुषों से कम नहीं हैं. जो औरत हर क्षेत्र में नाम और दाम कमा रही हैं, क्या वे पैसे का हिसाब नहीं रख सकतीं? बिलकुल रख सकती हैं. परिवार पर लगाम लगा कर रखने में कोई बुराई नहीं है. महिलाओं को अपने हकों के बारे में पता होना चाहिए. उन्हें किसी
की जीहुजूरी करने की जरूरत नहीं है.

वे अपना ख्याल खुद रख सकती हैं और अपने लिए गए किसी फैसले पर उन्हें कभी भी अफसोस नहीं होना चाहिए. फिलहाल चाहे एमसी मैरी कौम पर लोग उंगली उठा रहे हैं, पर इस महिला ने अपने जीवट से दुनियाभर में नाम कमाया है. भारतीय महिला मुक्केबाजी को नई ऊंचाइयां दी हैं. शायद इसीलिए उन्हेंमैग्निफिसैंट मैरीकहा जाता है और वे हमेशा यही रहेंगी.          

Hindi Story: मुआवजा

Hindi Story: जिस्मफरोशी के धंधे से जुड़ी मगनाबाई एक जुलूस में शामिल हो कर मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थी. क्या  नाइंसाफी हुई थी उस के साथ?

जुलूस शहर की बड़ी सड़क से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था. औरतों के हाथों में बैनर थे, जिन में से एक पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, ‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमें भी जीने का हक है. औरत का जिस्म खिलौना नहीं है…’


लोग उन्हें पढ़ते, कुछ पढ़ कर चुपचाप निकल जाते, कुछ मनचले भद्दे इशारे करते, तो कुछ मनचले जुलूस के बीच घुस कर औरतों की छातियों पर चिकोटी काट लेते. औरतें चुपचाप सहतीं, बेखबर सी नारे लगाती आगे बढ़ती जा रही थीं.


वे सब मुख्यमंत्री के पास इंसाफ मांगने जा रही थीं. इंसाफ की एवज में अपनी इज्जत की कीमत लगाने, अपने उघड़े बदन को और उघाड़ने, गरम गोश्त के शौकीनों को ललचाने. शायद इसी बहाने उन्हें अपने दर्द का कोई मरहम मिल सके.


उन के माईबाप सरकार को बताएंगे कि उन की बेटी, बहन, बहू के साथ कब, क्या और कैसे हुआ? करने वाला कौन था? उन की देह को उघाड़ने वाला, नोचने वाला कौन था? औरतों के जिस्म का सौदा हमेशा से होता रहा है और होता रहेगा. ये वे अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन वे सौदे में नुकसान की हिमायती नहीं हैं.


घर वाले बतातेबताते यह भूल जाएंगे कि शब्दों के बहाने वे खुद अपनी ही बेटियोंऔरतों को चौराहों पर, सभाओं में या सड़कों पर नंगा कर रहे हैं. उन की इज्जत के चिथड़े कर रहे हैं, लेकिन जुलूस वालों की यह सोच कहां होती है? उन्हें तो मुआवजा चाहिए, औरत की देह का सरकारी मुआवजा.


अखबार के पहले पेज पर मुख्यमंत्रीजी के साथ छपी तसवीर ही शायद उन के दर्द का मरहम हो. चाहे कुछ भी हो, लेकिन लोग उन्हें देखेंगे, पढ़ेंगे और यकीनन हमदर्दी जताने के बहाने उन के घर कर उन के जख्म टटोलतेटटोलते खुद कोई चीरा लगा जाएंगे. भीड़ में इतनी सोच और सम? कहां होती है.


पर मगनाबाई इतनी छोटी सी उम्र में भी सब सम?ाने लगी थी. लड़की जब एक ही रात में औरत बना दी जाती है, तब सम? में आने वाली बातें भी सम? में आने लगती हैं. मर्दों के प्रति उस का नजरिया बदल जाता है. 15 साल की मगनाबाई 8 दिन की बच्ची को कंधे से चिपकाए जुलूस में चल रही थी.

उस के साथ उस जैसी और भी लड़कियां थीं. किसी की सलवार में खून लगा था, कपड़े फटे और गंदे थे. किसी के गले और मुंह पर खरोंचों के निशान साफ नजर रहे थे. अंदर जाने कितने होंगे. किसी का पेट बढ़ा था. क्या ये सब अपनीअपनी देह उघाड़ कर दिखाएंगी? कैसे बताएंगी कि उस रात कितने लोगों ने
मगनाबाई का गला सूखने लगा. कमजोरी के चलते उसे चक्कर आने लगे. लगा कि कंधे से चिपकी बच्ची छूट कर नीचे गिर जाएगी और जुलूस उस को कुचलता हुआ निकल जाएगा. जो कुचली जाएगी, उस के साथ किसी की भी हमदर्दी नहीं होगी.


मगनाबाई ने साथ चलती एक औरत को पकड़ लिया. उस औरत ने मगनाबाई पर एक नजर डाली, उस की पीठ थपथपाई, ‘‘बच्ची, जब इतनी हिम्मत की है, तो थोड़ी और सही. अब तो मंजिल के करीब ही गए
हैं. भरोसा रख. कहीं कहीं तो इंसाफ मिलेगा…’’ कहने वाली औरत को मगनाबाई ने देखा. मन हुआ कि हंसे और पूछे, ‘भला औरत की भी कोई मंजिल होती है? किस पर भरोसा रखे? भेडि़यों से इंसाफ की उम्मीद तुम्हें होगी, मु? नहीं,’ नफरत से उस ने जमीन पर थूक दिया.


कंधे से चिपकी बच्ची रोए जा रही थी. मगनाबाई का मन हुआ कि जलालत के इस मांस के लोथड़े को पैरों से कुचल जाने के लिए जमीन पर गिरा दे. उसे लगा कि बच्ची बहुत भारी होती जा रही है. उस के कंधे बो? उठाने में नाकाम लग रहे थे. जुलूस के साथ पैरों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया था.


मगनाबाई कुछ देर वहीं खड़ी रही. जुलूस को उस ने आगे बढ़ जाने दिया. सड़क खाली हुई, तो उस की नजर सड़क के किनारे लगे हैंडपंप पर पड़ी. उस ने दौड़ कर किसी तरह बच्ची को गोद में उठाए ही पानी पीया. फिर वह एक बंद दुकान के चबूतरे पर रोती बच्ची को लिटा कर दीवार की टेक लगा कर बैठ गई.
बच्ची ने लेटते ही रोना बंद कर दिया. मगनाबाई को भी सुकून मिला. कुनकुनी धूप उसे भली लगी. वह भी बच्ची के करीब लेट गई. उस की आंखें मुंदने लगीं.


मगनाबाई इस जुलूस के साथ आना नहीं चाहती थी. गप्पू भाई और भोला चाचा ही उसे बिस्तर से घसीट कर जुलूस के साथ ले आए. उस की आंखों के सामने बस्ता ले कर स्कूल जाती चंपा, गंगा और जूही नाच उठीं, लेकिन अब उस का बस्ता छूट गया और बस्ते की जगह इस बच्ची ने ले ली. गप्पू भाई और भोला चाचा कहते थे कि मगनाबाई पहले की तरह स्कूल जा सकेगी. इस बच्ची को किसी अनाथालय में डाल देंगे. वह फिर पहले की तरह हो जाएगी. बस, मुख्यमंत्री से मुआवजा मिल जाए.


वे दोनों इन औरतों को दलदल से निकालने वाली संस्था के पैरोकार थे. जब भी पुलिस की रेड पड़नी होती थी, वे दोनों और उन की रखैलें इन औरतों के साथ बदसलूकी हो, इसलिए साथ होते. जब भी वे दोनों साथ होते, तो पुलिस वाले रहम से पेश आते थे. आमतौर पर प्रैस रिपोर्टर भी पहुंचे होते थे. वे दोनों कई बार गोरी चमड़ी वाली लड़कियों को भी लाते थे.


उन दोनों का खूब रोब था, क्योंकि दलालों को अगर डर लगता था, तो उन से ही. उन दोनों ने मुख्यमंत्री के सामने धरनेप्रदर्शन का प्रोग्राम बनाया था और पुलिस से मिल कर जुलूस का बंदोबस्त करा था. क्या मजाल है कि ये मिलीजुली जिस्म बेचने वाली थुलथुल लड़कियां इस तरह बाजार में निकल सकें. मगनाबाई को कहा गया था कि वे दोनों मुआवजा मांग रहे हैं. इस से स्कूल खुलवाएंगे.

इन की जिंदगी खुशहाल होगी. तभी मगनाबाई के विचारों को ?ाटका लगा. मुआवजा किस बात का? किसे मिलेगा? क्या इसलिए कि 9 महीने तक इस बच्ची को बस्ते की जगह पेट में लादे घूमती रही थी? बारीबारी से लोगों का वहशीपन सहती रही थी? या फिर मुआवजे के रूप में गप्पू और भोला की पीठ ठोंकी जाएगी कि उन्होंने बेटी और बहन को अपनी मर्दानगी से परिचित कराया? सरकार उस की भी पीठ ठोंकेगी कि वह स्कूल जाने की उम्र में मां बनना सीख गई?


क्या सरकार उस से पूछेगी कि उसे मां किस तरह बनाया गया? क्या वह बता पाएगी कि उस के भाई ने पहली बार उस के हाथपैर खाट की पाटियों से बांध कर उसे चाचा को सौंप दिया था? चाचा ने भी इस के बदले भाई को मुआवजा दिया था और फिर भाई ने भी चाचा की तरह वही सब उस के साथ दोहराया था.


यही सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा. उसे डर दिखाया जाता कि अगर किसी से इस बात का जिक्र किया, तो काट कर फेंक दिया जाएगा. मुआवजे के रूप में यह बच्ची उस की कोख में गई. पता नहीं, दोनों में से किस की थी? क्या इन तमाम औरतों के साथ भी इसी की तरहबच्ची दूध पी कर सो गई थी.
तभी किसी ने बाल पकड़ कर मगनाबाई को ?ाक?ोरा, ‘‘तो यहां है नवाबजादी?’’


मगनाबाई ने मुड़ कर देखा. भोला चाचा जलती आंखों से उसे देख रहा था.
‘‘मैं नहीं जाऊंगी. अब मु? से नहीं चला जाता,’’ मगनाबाई ने कहा.
‘‘चला तो तु? से अभी जाएगा. चलती है या उतारूं सब के सामने…’’
लोग सुन कर हंस पड़े. वे चटपटी बात सुन कर मजेदार नजारा देखने के इच्छुक थे. उसे लगा कि यहां मर्द नहीं, महज जिस्मफरोश हैं.


डरीसहमी मगनाबाई बच्ची को उठा कर धीरेधीरे उन के पीछे चल दी. भोला चाचा ने मगनाबाई को पीछे से जोरदार लात मारी. उस के मुंह से निकला, ‘‘हम जिस्मफरोश नहीं हैं. हमारी मांगें पूरी करोपूरी करो…’’ 

Social Story: गहरी पैठ

Social Story: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने वर्कर्स की एक मांग की सुनवाई करते हुए कहा कि यूनियनों ने देश के कारखानों को बंद कराने का बड़ा काम किया है. उन्होंने कहा कि बचपन में उन्होंने सैकड़ों छोटीबड़ी फैक्टरियों को चलते देखा जो अब यूनियनों की वजह से बंद हो गई हैं.


यह सही ही लगता है क्योंकि 1950 के बाद अचानक देश के थोड़े से कारखानों में भी धड़ाधड़ हड़तालें होने लगी थीं. हर छोटीबड़ी फैक्टरी के सामने 1 नहीं 10-10 अलगअलग यूनियनों के ?ांडे लग जाते थे और यूनियनों को कंट्रोल करने के तरहतरह के कानूनों के बावजूद यूनियनबाजी में मोटा मुनाफा होने लगा था. जो भी जरा सा सम?ादार वर्कर होता वह अपनी यूनियन खोल लेता था.


इस की वजह शायद यह रही कि जब से देश में हिंदू राजाओं का राज खत्म हुआ, काम करने के आदी ब्राह्मणों को रोजीरोटी के लाले पड़ने लगे. वे गांवों में हाथ का काम भी नहीं कर पाते थे. बिहार में जहां उन्होंने खेती करनी शुरू की उन्हें निचले पायदान का भूमिहार ब्राह्मण कहा जाने लगा.


जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पैर जमाए तो उन्होंने बढ़चढ़ कर उस की सेना में नौकरी शुरू कर दी और अपने ही देश के लोगों के खिलाफ  लड़ाइयां शुरू कर दीं. 1957 का विद्रोह ब्राह्मण सैनिकों ने शुरू किया क्योंकि गांवों में उन्हें गोरों की सेना में काम करने और चरबी वाले कारतूसों का इस्तेमाल करने पर जाति से बाहर किया जाने लगा.


बाद में जब कारखाने लगने लगे तो वे बड़ी तादाद में गांवों से शहर आए और चूंकि वे थोड़े सम?ादार थे, उन्होंने मशीनें चलाना जल्दी सीख लिया. वे बातचीत में भी अच्छे थे, व्यवहार में भी और इसलिए अंगरेज और देशी सेठों ने उन्हें नौकरियां भी दीं.


पर उन का मन हाथ के काम में क्या लगना था, इसलिए उन्होंने यूनियनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. दुनियाभर में मार्क्सवादी स्लोगन चल ही रहे थे, वर्कर्स औफ वर्ल्ड यूनाइट के नारे लगा रहे थे. इन को सम?ाने में इन ऊंची जातियों के वर्कर्स को देर नहीं लगी और देश के कारखाने यूनियनबाजी, हड़तालों, काम रोको, नियम के हिसाब से काम के शिकार हो गए.


आज यूनियनें कमजोर हो गई हैं क्योंकि अब कारखानों में पिछड़ी निचली जातियों के लोग हैं जो काम करने को जिंदगी का असल मानते हैं. उन के लिए कैसा भी काम, कितना भी काम अच्छा ही है. आज अगर कम्यूनिस्ट पार्टियां आखिरी सांसें ले रही हैं तो इसलिए कि अब वर्कर्स तो ओबीसी एससी जातियों के हैं जिन के लिए काम बेइज्जती नहीं है. वे कमाई भी अच्छी करते हैं और पढ़लिख कर आगे बढ़ रहे हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सही कहा है पर अब लेबर कोर्ट काम को जाति के चश्मे से नहीं देखती. तभी तो देश तरक्की कर पा रहा है.


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सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला कि पीरियड के दिनों में स्कूली बच्चों को स्कूल में मुफ्त सैनिटरी पैड पाना उन का मौलिक हक है और स्कूलों को पैड बदलने की जगह और मुफ्त पैड देने ही पड़ेंगे, एक अच्छा फैसला है. लाखों लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल ही नहीं आतीं क्योंकि स्कूलों के शौचालय गंदे होते हैं और वहां पैड बदलना मुश्किल होता है. बहुत सी लड़कियों के पास सैनिटरी पैड खरीदने के पैसे नहीं होते और वे फटेपुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं पर उन्हें बैग में लाना मुश्किल होता है और इसलिए वे 4-5 दिन स्कूल ही नहीं आतीं.


गांवदेहात की ही नहीं कसबों और शहरों की लड़कियों को भी पैड बदलने में मुश्किल होती है जबकि थोड़ी सी बदन में कमजोरी के बावजूद वे पढ़ने या काम करने लायक रहती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस का इंतजाम करने का जिम्मा स्कूलों पर डाल कर अच्छा काम किया है, यह तो सरकारों और पंचायतों को कब का कर लेना चाहिए था. सैनिटरी पैड मुफ्त राशन की तरह जरूरी है और चाहे जो भी खर्च हो, यह इंतजाम होना चाहिए.


जैसेजैसे लड़कियां स्कूलों में आगे बढ़ रही हैं, पढ़ने में लड़कों को पछाड़ रही हैं, देश को उन्हीं से उम्मीद है. लड़कों ने तो अपनी जिंदगी फालतू की रीलबाजी, गली के नुक्कड़ पर खड़े हो कर कमैंट पास करने में, धर्म के नाम पर कांवड़ ढोने और नशे में जिंदगी बरबाद करनी शुरू कर दी है. घरों में अब लड़कियों का जन्म खुशी लाने लगा है क्योंकि पेरैंट्स को लगता है कि उन का घर चलाने वाली अब कोई पैदा हो गई है जबकि लड़के एक आफत बनने लगे हैं जिन्हें पालना मुश्किल होता जा रहा है.


आज जरूरत है कि देश ही नहीं घर भी लड़कियों के आड़े आने वाली हर दिक्कतको दूर करे. सदियोें से धर्मों ने ऐसी बिसात बिछाई है कि लड़कियों को या तो सैक्स सुख के लिए रिजर्व कर दिया गया या फिर घरेलू काम के लिए ताकि लड़के और मर्द मौजमस्ती कर सकें. तरहतरह के रीतिरिवाज, त्योहार, परंपराएं, तीर्थयात्राएं लड़कियों और औरतों को फालतू में थकाने के लिए बनाई गई हैं और जो भी इन में भाग नहीं लेतीं, समाज का नाम ले कर घर के आदमी जबरन उन से ये सब करवाते हैं.


माहवारी के दिनों में जहां भी कहीं काम से छुटकारा मिलता था, वहां लड़कियों को किसी गंदे कमरे में बंद कर दिया जाता था यह जताने के लिए वे पैदा ही गंद में हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्कूलों को सैनिटरी पैड खरीदने की ग्रांट मिलेगी और इस में बड़े घपले होंगे जिस से स्कूलों के अफसरों को मोटा फायदा होगा. यही लड़कियों के लिए नया मौका देगा कि वे अपना दमखम दिखाएं और कोर्ट के आदेश पर बनी कमेटियों को शिकायतें कर सकें. स्कूली पढ़ाई लड़कियों को जहालत से निकालने के लिए जरूरी है. सैनिटरी पैड इतना ही जरूरी है जितनी बेटियां.                                                                                      

Crime: रंगदारी की बदरंग दुनिया

Crime: नैटफ्लिक्स परटौप बौयनाम की एक ब्रिटिश वैब सीरीज है, जिस की मूल कहानी यह है कि 2 ड्रग डीलर उत्तरी लंदन में गरीबों के लिए बने सरकारी रिहायशी इलाके से अपना धंधा चलाते हैं और मोटा मुनाफा बनाते हैं. इस वैब सीरीज को आईएमडीबी पर 10 में से 8.4 रेटिंग मिली है.


इस वैब सीरीज में ड्रग की दुनिया का ऐसा काला सच दिखाया गया है, जहां जुर्म की बस्ती का सरताज बनने के लिए खूनखराबा करना जरूरी है. यहां महासागर की बड़ी मछली ही छोटी मछली को नहीं खाती है, बल्कि तालाब का नन्हा सा टैडपोल भी कब आप के सिर पर गन तान कर आप का गेम बजा दे, पता ही नहीं चलता है.


ड्रग्स के धंधे में तो तमाम तरह के खतरे होते हैं, पर आजकल रंगदारी (एक्सटौर्शन) का धंधा भी काफी फलफूल रहा है, जिस में किसी को धमकी दी जाती है कि अगर जान की सलामती चाहिए, तो इतने पैसे दो वरना राम नाम सत्य सम?. टौप बौयके ड्रग माफिया और जबरन वसूली के रंगदार में एक समानता है कि इस धंधे में बौस भले ही अधेड़ उम्र का हो, पर गुरगे कम उम्र के नौजवान होते हैं. भारत में ड्रग्स और रंगदारी दोनों गैरकानूनी धंधे फलफूल रहे हैं.


रंगदारी से जुड़ा एक मामला देखते हैं. दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में रोहित खत्री नाम का एक शख्सआरके फिटनैसनाम का अपना जिम चलाता है. 12 और 13 जनवरी, 2026 की दरमियानी रात को इस जिम पर अज्ञात लोगों द्वारा ताबड़तोड़ फायरिंग की गई. रोहित खत्री एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर भी है. इस के जिम पर हुई गोलीबारी की जिम्मेदारी लारैंस बिश्नोई गिरोह ने ली है.

सोशल मीडिया पर रणदीप मलिक नाम के एक यूजर ने कहा कि जिम को इसलिए निशाना बनाया गया, क्योंकि गिरोह द्वारा जिम के मालिक को किए गए फोन का कोई जवाब नहीं मिला था. साथ ही, उस ने रोहित खत्री को जान से मारने की धमकी भी दी है. लारैंस गैंग के शूटर ने धमकी देते हुए कहा है कि अगर उस ने (रोहित खत्री) अगले टाइम फोन नहीं उठाया, तो उसे धरती से उठवा देंगे.


बता दें कि रोहित खत्री और उस की पत्नी सोनिया खत्री दोनों अपनी फिटनैस और लाइफस्टाइल के लिए काफी फेमस हैं. रोहित खत्री देश के टौप 20 फिटनैस यूट्यूबरों में से एक है. उस के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 24 लाख फौलोवर हैं. एक दूसरे मामले में 12 जनवरी, 2026 को ही पूर्वी दिल्ली के वैस्ट विनोद नगर इलाके में जितेंद्र्र गुप्ता नाम के एक प्रोपर्टी डीलर से लारैंस बिश्नोई के नाम पर 2 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी गई. रकम नहीं देने पर बदमाशों ने जितेंद्र्र गुप्ता के घर के बाहर फायरिंग कर दहशत फैलाने की कोशिश की गई. यह वारदात घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई.


इस सिलसिले में पीडि़त जितेंद्र गुप्ता ने बताया कि उन्हें सितंबर, 2025 से लगातार धमकी भरे फोन रहे थे और मैसेज मिल रहे थे. ऐसा करने वाले खुद को लारैंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा बता रहे थे और उन से 2 करोड़ रुपए की मांग की जा रही थी. लारैंस बिश्नोई एक बहुत बड़ा गैंगस्टर है, जो जेल से अपनी काली करतूतों को अंजाम देता है. उस के एक इशारे पर कुछ लोग बाइक पर कर अपने टारगेट पर बेतहाशा फायरिंग कर के चले जाते हैं. ऐसे भाड़े के लोग ज्यादातर गरीब घर के वे नौजवान होते हैं, जो चंद पैसों के चक्कर में इस तरह के अपराध को अंजाम देते हैं.


रंगदारी के और मामलों और उन के खतरनाक असर के बारे में बात करने से पहले यह सम? लेते हैं कि रंगदार कौन होता है और यह रंगदारी शब्द आया कहां से है. दरअसलरंगदारीशब्द का जन्म बिहार में हुआ है, जो एक जबरन या गैरकानूनी वसूली है और इसेरंगदारी टैक्सभी कहा जाता है. इस में अपराधी या गुंडे टाइप लोग कारोबारियों, ठेकेदारों या आम लोगों सेप्रोटैक्शन मनीके नाम पर जबरन पैसे ऐंठते हैं.


आसान शब्दों मेंरंगदारवह आदमी होता है, जो इस गैरकानूनी टैक्स को वसूलता है. ऐसे लोगों का अपने इलाके में दबदबा होता है और धीरेधीरे ये अपने फैलाए गए डर और दादागीरी की वजह से चर्चा में बने रहते हैं. पर सवाल उठता है कि जब कोई रंगदार किसी से जबरदस्ती प्रोटैक्शन मनी मांगता है, तो पीडि़त पर उस का क्या असर होता है? यह तो कड़वा सच है कि पीडि़त चाहे कोई कारोबारी हो, ठेकेदार हो या फिर आम नागरिक ही क्यों हो, को रंगदार को जबरन पैसे देने पड़ते हैं, जिस से उस की आमदनी कम होती है. बहुत बार तो ऐसे लोग दूसरों से पिछड़ जाते हैं या उन के कामधंधे तक बंद हो जाते हैं.


पैसे की मार तो लोग किसी तरह ?ोल जाते हैं, पर रंगदारों से लगातार मिलती धमकियों से उन में डर, तनाव और असुरक्षा की भावना बढ़ती है. सब से बड़ा नुकसान, जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है कि समाज में अराजकता और डर का माहौल बनता है. कानून से भरोसा उठ जाता है. अपनी या किसी अपने की जान तक जाने का डर बना रहता है, क्योंकि रंगदारी की वारदात में अकसर धमकी, मारपीट, बमबारी और गोलीबारी जैसी हिंसक घटनाएं शामिल होती हैं. यह सब अपराध की दुनिया को बढ़ावा देता है और अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है.


पर क्या ऐसे गैंगस्टर या रंगदार मौज की जिंदगी जीते हैं? जो नौजवान इस दलदल में धंसते हैं, उन के मन में क्या चल रहा होता है? वे अपराध की राह चुन कर क्या साबित करना चाहते हैं? कई साल पहले एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर बड़ी वायरल हुई थी, जिस में सहारनपुर, उत्तर प्रदेश का बिल्लू सांडा नाम का एक शख्स पश्चिम उत्तर प्रदेश का सब से बड़ा डौन बनने का सपना देखता था. संजय दत्त की फिल्मखलनायकउस ने इतनी बार देख ली थी कि उस का एकएक डायलौग उसे रटा हुआ था.


उस वीडियो क्लिप में एक पत्रकार ने बिल्लू सांडा से पूछ लिया था कि अब कितने दिन रहोगे जेल में? इस पर बिल्लू सांडा ने जवाब दिया था कि मुश्किल से 6 महीने. बहुत से लोगों को यह वीडियो क्लिप किसी मसालेदार फिल्म के सीन जैसी लगी होगी, पर यहां चिंताजनक बात यह है कि बिल्लू सांडा आदतन अपराधी था. खबरों के मुताबिक, उस ने फरवरी, 2015 में आलम चौकीदार का खून किया था. उसे इस के लिए 6 लाख रुपए मिले थे. पहली हत्या के कुछ महीने बाद उस ने दूसरी हत्या की.


उस ने इश्तिकार नामक एक शख्स का खून करने के पौने 6 लाख लिए थे. इस के बाद बिल्लू सांडा इन पैसों से अपने शौक पूरे करने लगा था. खून करना उसे बाएं हाथ का खेल लगने लगा था. भारत में ऐसे जाने कितने नौजवान हैं जो जुर्म की काली दुनिया का सच जाने बिना इस दलदल में धंस जाते हैं. बिल्लू सांडा जैसे आदतन अपराधी का अंजाम बहुत बुरा होता है. सब से ज्यादा तो वे लोग भुगतते हैं, जो ऐसे लोगों के शिकार बनते हैं.


दिल्ली में धमकी के दम पर वसूली अगर सिर्फ दिल्ली और एमसीआर की बात करें तो यहां पीछे तकरीबन
2 साल में ही ऐसे कांड हुए हैं, जिन की जड़ में रंगदारी रही है. कुछ उदाहरण देखते हैं :
*12 सितंबर, 2024 को दिल्ली के ग्रेटर कैलाश-1 में लारैंस बिश्नोई गैंग ने एक जिम ट्रेनर नादिर शाह की हत्या की थी, जिस की साजिश साबरमती जेल से रची गई थी.
*15 मार्च, 2025 को हरियाणा के गुरुग्राम में सैक्टर-65 में गोल्डी बराड़ और लारैंस बिश्नोई गैंग ने एक रिएल एस्टेट बिल्डर के औफिस पर 10 राउंड फायरिंग की थी और 10 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगी थी.
* 22 जून, 2025 को दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में हिमांशु भाऊ गैंग
ने एक होटल कारोबारी की कार पर फायरिंग की थी और सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी ली थी.
*10 अगस्त, 2025 को दिल्ली के नजफगढ़ में कपिल सांगवान (नंदू) स्क्रैप डीलर से 50 लाख रुपए की रंगदारी के लिए उस के घर पर हमला किया गया था.
*18 अगस्त, 2025 को दिल्ली के विकासपुरी में प्रिंस तेवतिया गुट ने मिठाई की एक दुकान पर फायरिंग की थी.
*10 नवंबर, 2025 को दिल्ली के द्वारका इलाके में अनमोल बिश्नोई द्वारा एक नामी बिल्डर के गेट पर फायरिंग कर के खुली धमकी दी गई थी.


इस तरह की रंगदारी उन नौजवानों के लिए बड़ी मुसीबत बनती है जो अपनी मेहनत से पैसे कमाते हैं. यहां एक विचार भी काम करता है कि इस अदना से इनसान ने इतनी जल्दी पैसे कैसे बना लिए. इस से तो प्रोटैक्शन मनी लेनी पड़ेगी. फिर शुरू होता है किसी का मनोबल तोड़ने का सिलसिला. गरीब अमीर होने पाए. ऐसे में छुटभैया गैंगस्टर प्रोटैक्शन मनी के नाम पर छोटी रकम तक मांग लेते हैं. जैसे फिल्मों में गरीब कामगारों सेहफ्ता वसूलीहोती है.


दीवारजैसी फिल्म में तो अमिताभ बच्चन हफ्ता वसूलने वालों को सबक सिखा देता है, पर असल जिंदगी में ऐसा नहीं हो पाता. यहां सरकार की अनदेखी भी गैंगस्टर को बढ़ावा देती है. दबी जबान में कहा जाता है कि फलां गैंगस्टर के पीछे अमुक पार्टी की सपोर्ट है. यही गठजोड़ आम आदमी को डराने के लिए काफी है.


किसी के घर के बाहर तड़ातड़ गोलियां बरसाना सुनने में बड़ा कौमन लगता है, पर जिस घर की दीवार पर उन गोलियों के निशान बनते हैं, उन के मन पर भी डर के फफोले निकल आते हैं, जो काफी लंबे समय तक दर्द देते हैं



सिंगर बी प्राक को मिली धमकी


बी प्राक का असली नाम प्रतीक बच्चन है और वे हिंदी फिल्मकेसरीके गानेतेरी मिट्टी में मिल जावां…’ से बहुत ज्यादा मशहूर हुए हैं. हाल ही में उन्हें लारैंस बिश्नोई गैंग से धमकी मिली है किएक हफ्ते में 10 करोड़ रुपए दे देनहीं तो बहुत बड़ा नुकसान कर देंगे…’


ऐसा बताया जा रहा है कि यह धमकी भरी आडियो रिकौर्डिंग पंजाबी सिंगर दिलनूर को 6 जनवरी, 2026 की दोपहर भेजी गई. इस के पहले दिलनूर को 5 जनवरी, 2026 को 2 बार फोन किया गया. लेकिन दिलनूर ने फोन नहीं उठाया. 6 जनवरी, 2026 को भी विदेशी नंबर से फोन किया गया. दिलनूर की शिकायत के मुताबिक, उस ने फोन उठाया, लेकिन बात जब अजीब लगी, तो उस ने फोन काट दिया. इस के बाद दिलनूर को वौइस मैसेज भेजा गया.


इस मैसेज में फोन करने वाले ने अपना नाम आरजू बिश्नोई बताया, जो लारैंस बिश्नोई के लिए काम करता है. मैसेज में यह था, ‘हैलोआरजू बिश्नोई बोल रहा हूं, उस बी प्राक को मैसेज कर देना 10 करोड़ रुपए चाहिए. तेरे पास एक हफ्ते का टाइम है. जिस मरजी कंट्री (देश) में चला जा, आसपास इस के साथ वाला कोई भी मिल गया तो नुकसान कर देंगे. और इस को फेक काल मत सम?ाना. मिल के चलेगा तो ठीक, नहीं तो उस को बोल मिट्टी में मिला देंगे.


इस मैसेज के मिलने के बाद दिलनूर ने 6 जनवरी, 2026 को ही एसएसपी, मोहाली को लिखित शिकायत दी थी. वैसे, इस से पहले हनी सिंह, एपी ढिल्लों, बब्बू मान, जानी, पवन सिंह, हंसराज रघुवंशी जैसे सिंगर को भी ऐसे ही धमकी मिल चुकी है.



डिजिटल रंगदारी का बढ़ा दबदबा



जब से तकनीक ने अपना कमाल दिखाना शुरू किया है, अपराध भी डिजिटल प्लेटफार्म पर सिर उठाने लगे हैं. अब तो डिजिटल रंगदारी का जन्म हो चुका है. ‘डिजिटल रंगदारीएक साइबर अपराध है, जिस में अपराधी डिजिटल तरीकों जैसे सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर के किसी को धमकाते हैं और बदले में पैसे मांगते हैं.


दिल्ली पुलिस के एक बड़े अफसर के मुताबिक, साल 2025 में डिजिटल वसूली के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. अपराधी अब पारंपरिक फोन करने के बजाय सिगनल, टैलीग्राम और व्हाट्सऐप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर रहे हैं.


गैंगस्टर के निशाने पर अब सिर्फ बड़े अमीर लोग ही नहीं हैं, बल्कि जिम चलाने वाले, प्रोपर्टी डीलर, किराना दुकानदार और व्यापारी भी रडार पर चुके हैं. इस की वजह यह है कि छोटे कारोबारी पुलिस के पास जाने से डरते हैं और 10 से 50 लाख रुपए की मांग को मजबूरी में स्वीकार कर लेते हैं. यही वजह है कि यह तरीका गैंगस्टर के लिए ज्यादा महफूज और फायदेमंद साबित हो रहा है.


इन का घमकी देने का तरीका तकरीबन एक सा है, जिस में पहले विदेशी नंबर से धमकी भरा फोन या वौइस नोट आता है. रकम और समय तय किया जाता है. अगर कारोबारी फोन को नजरअंदाज करता है, तो अगले 24 घंटे के भीतर उस के घर, दुकान या दफ्तर के बाहर गोलियां बरसा कर पूरे इलाके में दहशत फैला दी जाती है.    

 

Film: किसी और की हिट फिल्म का फार्मूला न उठाएं -शाहिद कपूर

भारतीय सिनेमा के फलक पर कुछ कलाकार पहली फिल्म से ही अपनी पहचान तय कर लेते हैं, लेकिन बतौर कलाकार शाहिद कपूर की कहानी एक लगातार होतेपुनर्जन्मकी कहानी है.


शाहिद कपूर ने साल 2003 में फिल्मइश्कविश्कसे एक मासूम चेहरे वालेचौकलेटी बौयके रूप में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था. फिर उन्होनेविवाहजैसी सामाजिक फिल्म की. तब किसी ने कल्पना नहीं की थी कि लोग उन्हेंहैदरजैसी फिल्म में एक पेचीदा किरदार निभाते हुए देखेंगे या फिर फिल्मकबीर सिंहके रूप में वे एक गुस्सैल और शराबी प्रेमी के किरदार में नजर सकते हैं.


शाहिद कपूर को विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्मों में अलगअलग किरदार निभाने का मौका दिया है और अब उन की नई फिल्म रोमियोमें वे फिर डार्क शेड वाला किरदार निभा रहे हैं. पेश हैं, शाहिद कपूर से हुई बातचीत के खास अंश :


विशाल भारद्वाज नेकमीने’, ‘हैदरऔररंगूनजैसी फिल्मों में आप को एक अलग इमेज दी. अब आप 7 साल बाद उन के साथ वापसी कर रहे हैं. इस पर आप क्या कहेंगे? यह वापसी नहीं है. बतौर कलाकार मेरी एक अलग यात्रा है और डायरैक्टर के तौर पर विशाल सर की अपनी अलग यात्रा है, लेकिन सच यह है कि विशाल सर कुछ औफर करेंगे, तो मैं उसे सुनूंगा जरूर.

इस फिल्म की स्क्रिप्ट सुनतेसुनते मु? अहसास हुआ कि मेरी फिल्मोग्राफी में यह फिल्म होनी चाहिए.
फिल्महैदरमें एक पिता अपने बेटे की तलाश कर रहा है, जबकि रोमियोमें आप का किरदार खुद को बहुत ही ज्यादा भयावह साबित करने की कोशिश कर रहा है. इन दोनों किरदारों के बीच जो खामोशी है, वह क्या है?


रोमियोका किरदारहैदरके किरदार से काफी अलग है. ‘हैदरका किरदार शुरू में थोड़ा सौफ्ट है, पर फिर पागल हो जाता है, जबकि रोमियोका हुसैन उस्तरा बहुत हार्ड किरदार है, लेकिन मुहब्बत इसे बदल देती है.


फिल्म रोमियोके हुसैन उस्तरा के किरदार को निभाते समय आप को प्रोस्थैटिक मेकअप का इस्तेमाल करने की जरूरत क्यों पड़ी?


आप ने कहां प्रोस्थैटिक मेकअप देख लियाफिल्म में थोड़ाबहुत ही प्रोस्थैटिक मेकअप है, कहीं भी ज्यादा हैवी प्रोस्थैटिक मेकअप नहीं है. इस में फुल बौडी एक टैटू है, जिसे लोग प्रोस्थैटिक मेकअप की संज्ञा दे रहे हैं. हर दिन इस टैटू को लगाने में 2 से ढाई घंटे लगते थे.


इस किरदार को निभाने से पहले आप को किस तरह की मानसिक तैयारी करनी पड़ी? मेरे लिए किसी भी किरदार को निभाते समय उस की फिजिकल यात्रा पर काम करना हो होता है, लेकिन जो इमोशनल यात्रा और मानसिक तैयारी होती है, असल में दर्शकों पर उसी का असर पड़ता है. मेरे लिए यही तैयारी बहुत खास होती है.


क्या कबीर सिंह से हुसैन उस्तरा तक पहुंचतेपहुंचते शाहिद कपूर डार्क किरदार निभाना सीख गए हैं?
हर कलाकार की शुरुआत स्वीट क्यूट लवरबौय जैसे किरदारों से होती है. उस के बाद थोड़ा कौम्प्लैक्स किरदार निभाना शुरू करता है, जिस में अलगअलग एलीमैंट होते हैं. तब तक कलाकार रोमांटिक क्यूट जोन से बाहर चुका होता है, जैसा कि मेरे साथ फिल्मकमीनेमें हुआ, फिरउड़ता पंजाबके साथ हुआ.


क्या आप को लगता है कि आप की सोच के मुताबिक फिल्म कहानियां लिखी जा रही हैं?
जैसी फिल्में पहले मिलती थीं, उस के मुकाबले अब काफी बदलाव गया है. अब मु?    हर तरह के किरदार के औफर रहे हैं, लेकिन अच्छी लिखाई होने की समस्या जरूर है.

ऐसी स्क्रिप्ट्स बहुत कम मिलती हैं, जो सच में नई हों, अलग हों और ताजा लगें. आज ज्यादातर फिल्में एकदूसरे की कौपी जैसी लगती हैं. किसी और की हिट फिल्म का फार्मूला उठा कर फिल्में बनाना बंद होना चाहिए.       

शांति स्वरूप त्रिपाठी


   

Social Story: 6 मुसहरों की  मौत ब्लास्ट  में

Social Story: ज किसी औद्योगिक हादसे की खबर टैलीविजन या डिजिटल प्लेटफार्म परब्रेकिंग न्यूजबन कर उभरती है, तब कुछ पल के लिए पूरा देश सिहर उठता है. मीडिया के कैमरे धुएं, आग और एंबुलैंसों की तसवीरें दिखाते हैं. एंकर मारे गए लोगों की तादाद गिनाते हैं. फिर धीरेधीरे खबर ठंडी पड़ जाती है.


छत्तीसगढ़ के भिलाई क्षेत्र के आयरन प्लांट रियल इस्पात फैक्टरी में हुए भीषण ब्लास्ट की खबर भी इसी तरह आई और चली गई. पर इस खबर के भीतर जो सच छिपा है, वह सिर्फ एक औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि बिहार, खासकर गया जिले के सब से वंचित समुदायों की जिंदगी और मौत की कहानी है.


जैसे ही खबर फ्लैश हुई, स्वाभाविक जिज्ञासा के साथ एक गहरा डर भी मन में उभरा कि मारे गए मजदूर आखिर हैं कहां के? सालों से एक पैटर्न बन चुका है कि देश के अलगअलग हिस्सों में होने वाले औद्योगिक हादसों, खदान हादसों, फैक्टरियों में ब्लास्ट और फर्नेस में ?ालसने वाली खबरों के पीछे ज्यादातर चेहरे बिहार के होते हैं खासकर वे जिले, जहां से पलायन जिंदगी की कड़वी हकीकत बन चुका है, जैसे गया, औरंगाबाद, नवादा, जमुई, खगडि़या, सहरसा वगैरह.


मुसहरों पर टूटा कहर पहले दिन खबर में मजदूरों की पहचान नहीं थी, लेकिन अगले ही दिन अखबार में छपी तसवीरों और नामों ने डर को सच में बदल दिया. मारे गए सभी 6 मजदूर गया जिले के थे. जो जिंदा थे, वे भी मौत और जिंदगी के बीच ?ाल रहे थे. इस हादसे में मारे गए सभी 6 मजदूर मुसहर जाति से थे. बिहार की सब से गरीब और सब से हाशिए पर धकेली गई जाति. 4 घायलों में से 2 मुसहर थे और 2 मुसलिम.


यह आंकड़ा अपनेआप में बहुतकुछ कह जाता है. यह बताता है कि देश की औद्योगिक प्रगति का बो? किन कंधों पर लादा जा रहा है. जिन लोगों के पास जमीन है, स्थायी घर, सामाजिक सिक्योरिटी, वही लोग सब से खतरनाक कामों में ?ांक दिए जाते हैं. बिहार के 90 फीसदी से ज्यादा मुसहर भूमिहीन हैं. उन के पास खेत नहीं हैं, मकान नहीं हैं और अकसर सरकारी जमीन पर ?ांपड़ी बना कर रहना ही उन की मजबूरी होती है और जब सरकार इन्हें गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर बुलडोजर चलाती है, तब उन के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.


हाल के सालों में बिहार में बुलडोजर की राजनीति ने जिस तरह से गरीबों और दलितों को निशाना बनाया है, उस ने मुसहर समुदाय को और ज्यादा असुरक्षित बना दिया है. जिन के पास पहले से कुछ नहीं था, उन से वह भी छीन लिया गया. नतीजा यह हुआ कि गांव में रहने की आखिरी जमीन भी खिसक गई. ऐसे में परिवार के मर्द ही नहीं, बल्कि किशोर और कभीकभी बच्चे भी काम की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं.


गया, जिसे अब सरकारी कागजों में गयाजी कहा जाने लगा है, वहां ऐसे हालात कोई नई बात नहीं हैं. अपने निजी अनुभव से कहा जा सकता है कि यहां मजदूरी के लिए पलायन बचपन से ही शुरू हो जाता है. इस हादसे में मारे गए लोगों में से कम से कम 3 लोग 18 से 20 साल से ज्यादा के नहीं लगते. यह सवाल बेहद गंभीर है. अगर ये मजदूर नाबालिग थे या 18 साल के आसपास थे, तो यह सिर्फ श्रम शोषण नहीं, बल्कि सीधे सीधे मानव तस्करी का मामला बनता है.

बच्चों को काम के नाम पर दूसरे राज्यों में ले जाना, उन्हें खतरनाक उद्योगों में ?ांक देना और उन की हिफाजत के कोई इंतजाम करना, यह सब कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आंखों के सामने हो रहा है.
यह कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है. रेलवे स्टेशनों से रोज सैकड़ों मजदूर ट्रेनों में भर कर जाते हैं. ठेकेदार खुलेआम दलाली करते हैं. फिर भी श्रम विभाग की नींद टूटती है, ही पुलिस की.


बिहार और खासकर गया जिले से मजदूरों को देश के हर कोने में ले जाया जाता है, जैसे छत्तीसगढ़, ?ारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब. जहां कहीं खदान है, फैक्टरी है, फर्नेस है, वहां बिहार का मजदूर मिलेगा और अकसर वहां के हालात बदतर होती हैं. सिक्योरिटी उपकरणों की कमी, लंबी शिफ्ट, न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान, रहने के लिए बदहाल ?ांपडि़यां, यह सब आम बात है.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में हुए इस हादसे से जुड़ी खबर बताती है कि घटना के समय मजदूरों ने सेफ्टी सूट तक नहीं पहना था. फर्नेस के आसपास काम कर रहे मजदूरों के लिए यह सीधा मौत को न्योता देने जैसा है. घेरे में प्रशासन इस पूरे मामले में राज्य के रोल पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. बिहार सरकार ने हाल ही में श्रम संसाधन विभाग का नाम बदल करश्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभागकर दिया है.

नाम से यह संकेत मिलता है कि सरकार प्रवासी मजदूरों को ले कर संवेदनशील है, लेकिन सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से हकीकत बदल जाती है? अगर विभाग सच में प्रवासी मजदूरों के कल्याण को ले कर गंभीर है, तो उस कल्याण को कागजों से बाहर निकालना होगा. सब से पहला कदम यह होना चाहिए कि उन रेलवे स्टेशनों पर विभाग के स्थायी बूथ खोले जाएं, जहां से बड़ी तादाद में मजदूर पलायन करते हैं.

गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा जैसे स्टेशनों पर अगर श्रम विभाग की मौजूदगी होती, तो मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हो सकता था. यह पता चल सकता था कि कौन कहां जा रहा है, किस ठेकेदार के साथ जा रहा है और किस तरह के काम में लगाया जा रहा है. इस से सिर्फ मानव तस्करी पर रोक लगाई जा सकती थी, बल्कि हादसे के हालात में जिम्मेदारी तय करना भी आसान होता.


दूसरा, विभाग को सिर्फ स्रोत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, क्योंकि प्रवासी मजदूरों का कल्याण तभी मुमकिन है, जब राज्य गंतव्य स्थलों तक भी पहुंचे. छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बिहार के मजदूर भारी तादाद में काम करते हैं. वहां महकमों के अफसरों की तैनाती, श्रम शिविरों का निरीक्षण और स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बेहद जरूरी है.

अभी हालात ये हैं कि बिहार का मजदूर दूसरे राज्य में मरता है, तो उस का शव बिहार लौटता है और उस के साथ लौटता है कुछ मुआवजे का चैक और बहुत सारा सन्नाटा. मुसहर समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक अनदेखी का शिकार रहा है. पढ़ाईलिखाई, जमीन और संसाधनों से दूर रखे गए इस समुदाय के लिए औद्योगिक मजदूरी ही एकमात्र रास्ता बचता है.

लेकिन जब यही मजदूरी मौत में बदल जाती है, तब यह सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत हमेशा वही लोग चुकाएंगे, जिन की आवाज सब से कमजोर है? सुरक्षा की खुली पोल औद्योगिक सुरक्षा मानकों की बात करें तो यह हादसा देश की औद्योगिक व्यवस्था की पोल खोलता है. आयरन प्लांट जैसे खतरनाक उद्योगों में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड का पालन कोई औप्शन नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए.

लेकिन अकसर ठेकेदारी प्रथा के चलते मजदूरों की जान सब से सस्ती सम? जाती है. परमानैंट मुलाजिमों के लिए सिक्योरिटी उपकरण, ट्रेनिंग और बीमा का इंतजाम होता है, जबकि ठेका मजदूरों को बिना किसी सिक्योरिटी के काम पर लगा दिया जाता है. जब हादसा होता है, तो जिम्मेदारी तय करने के बजाय जांच समितियां बना दी जाती हैं और कुछ दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है.


मीडिया का रोल भी यहां सवालों के घेरे में आता है. हादसे के पहले दिन तक मजदूरों की पहचान सामने नहीं आई थी. यह भी एक तरह की अनदेखी है. जब तक यह नहीं बताया जाता कि मरने वाले कौन थे, कहां से थे, किस सामाजिक बैकग्राउंड से थे, तब तक यह हादसा सिर्फ एक संख्या बन कर रह जाता है,
6 की मौत, 11 घायल.


पर जैसे ही पता चलता है कि ये सभी गया के मुसहर थे, तब इस खबर का सामाजिक मतलब बदल जाता है. तब यह सवाल उठता है कि क्यों हर बार यही समुदाय सब से ज्यादा मरता है?
जिम्मेदारी लेनी होगी इस पूरी व्यवस्था में केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है. प्रवासी मजदूरों के लिए बने कानून, जैसे अंतर्राज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी लैवल पर उन का पालन नहीं होता.


इन कानूनों को सख्ती से लागू किया जाता, तो ठेकेदारों की मनमानी पर रोक लग सकती थी. मजदूरों का रजिस्ट्रेशन, न्यूनतम मजदूरी, हैल्थ बीमा और दुर्घटना बीमा तय किया जा सकता था. लेकिन जब राज्य खुद गरीबों को गैरकानूनी कब्जा करने वाला बता कर उन के घर गिरा देता है, तब उन से यह उम्मीद करना कि वे सिक्योर रहेंगे और इज्जत से काम पाएंगे, एक तरह का मजाक लगता है.

बिना जमीन, बिना घर और पढ़ाईलिखाई से दूर मुसहर के लिए औप्शन बेहद सीमित हैं. गांव में रोजगार नहीं, शहर में सिक्योरिटी नहीं. ऐसे में वह फर्नेस के सामने खड़ा होता है, पिघले लोहे के बीच काम करता है और किसी दिन उसी में ?ालस कर मर जाता है. यह हादसा हमें एक बार फिर चेतावनी देता है कि अगर प्रवासी मजदूरों को ले कर नीतिगत और ठोस बदलाव नहीं किए गए, तो यही ट्रैंड जारी रहेगा.

बिहार के मजदूर स्लैब के नीचे दब कर, खदानों में फंस कर और फर्नेस के पिघले लोहे में पिघल कर मरते रहेंगे और हम हर बार कुछ दिनों तक शोक जता कर फिर अगली खबर की ओर बढ़ जाएंगे. यह सरकार की नाकामी है, आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक तीनों लैवलों पर. जब तक यह नहीं मान लिया जाएगा कि प्रवासी मजदूरों की मौतें विकास की जरूरी कीमत नहीं, बल्कि नीतियों की नाकामी हैं, तब तक कुछ नहीं बदलेगा.


छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में मारे गए गया के मुसहर मजदूर सिर्फ 6 लोग नहीं थे, बल्कि वे उस भारत का चेहरा थे, जो चमकते उद्योगों के पीछे अंधेरे में काम करता है. अगर हम सच में एक अच्छे समाज की बात करते हैं, तो हमें यह पक्का करना होगा कि विकास की आग में सब से गरीब और वंचित जलें वरना इतिहास हमें इसी सवाल के साथ याद रखेगा कि जब मजदूर पिघलते लोहे में ?ालस रहे थे, तब राज्य और समाज क्या कर रहे थे?                  

Hindi Story: धोखाधड़ी

Hindi Story: अजय वर्मा ने अपना रेलवे टिकट का रिफंड मांगने का औनलाइन तरीका अपनाया और एक अनजान नंबर से आए लिंक पर क्लिक कर दिया. उस के बाद शुरू हुआ एक ऐसा खेल जो उन पर भारी पड़ा. क्या था माजरा?

मे  रा नाम अजय वर्मा है और मेरा रेलवे का टिकट रद्द किए हुए पूरा एक महीना बीत चुका था, लेकिन 12,850 रुपए का रिफंड अभी तक मेरे खाते में नहीं आया था. थकहार कर मैं ने रेलवे को एक ट्वीट कर दिया. उम्मीद थी कि एक हफ्ते में जवाब मिल जाएगा, पर जो हुआ, वह उम्मीद से तेज और अचरज से भरा हुआ था.


शिकायत डालने के कुछ ही मिनट बाद इनबौक्स में संदेश गया. प्रोफाइल पर रेलवे का लोगो था और संदेश जैन्युइन लग रहा था. संदेश बहुत भरोसेमंद अंदाज में लिखा हुआ था, ‘प्रिय ग्राहक, आप की शिकायत प्राप्त हुई. कृपया अपना संपर्क नंबर भेजें, ताकि तत्काल रिफंड प्रोसैस शुरू किया जा सके.’
दिल में एक उम्मीद जगी. मन में एक सवाल कौंध गया. क्या वाकई अब सरकारी तंत्र इतना तेज हो गया है?


मैं ने बिना देरी किए उसे अपना फोन नंबर भेज दिया. यह मेरी पहली और सब से बड़ी गलती थी.
कुछ ही पलों में मु? फोन गया. सामने एक आत्मविश्वासी आवाज थी, ‘सर, मैं रेलवे रिफंड सैल से बोल रहा हूं.’ उस आदमी की भाषा और लहजा बिलकुल आधिकारिक लग रहे थे. उस ने पूछा, ‘टिकट कहां से बुक किया था आप ने?’’


मैं ने अपने बैंक का नाम बताया और कहा, ‘‘इस के ईमोबाइल ऐप से.’’ उस ने कहा, ‘ठीक है सर, आप के अकाउंट को कन्फर्म करना होगा. कृपया अपना यूजरनेम बताएं.’ यहीं मु? थोड़ा शक हुआ. मैं ने फोन होल्ड कर अपने बेटे से पूछा, ‘‘यूजरनेम मांग रहा है. बता दूं क्या?’’ बेटा बोला, ‘‘दे दो पापा, इस में कोई दिक्कत नहीं है.’’


और हम ने उसे अपना यूजर नेम दे दिया. यह मेरी दूसरी गलती थी. अब वह आदमी सीधा मेरे बेटे से बात करने लगा, क्योंकि उसे लगा कि यह स्मार्ट तरीके से जवाब करेगा. उस आदमी ने कहा, ‘अभी एक लिंक भेज रहा हूं. अपना ईमोबाइल ऐप खोल कर लिंक पर क्लिक कर दीजिए. आप की रकम 12,850 रुपए आप के खाते में जाएंगे.’ कुछ ही सैकंड में उस आदमी का भेजा गया एक लिंक आया और हम ने क्लिक भी कर दिया, बिना पढ़े, बिना सोचे. वह लिंकपेमेंट रिक्वैस्टका था. यहीं से शुरू हुआ असली खेल.
जल्दी कीजिए सर,’ वह आदमी लगातार दबाव बना रहा था.


घबराहट में हम ने सबमिट बटन दबा दिया और तुरंत मैसेज आया, ‘12,850 रुपए आप के खाते से डैबिट किए गए.’ मैं दंग रह गया, ‘‘अरे, हमारे पैसे कैसे कट गए?’’ सामने से आवाज आई, ‘नो प्रौब्लम सर, यह सिर्फ डमी ट्रांजैक्शन है. अभी नया लिंक भेजता हूं, उस से आप को रिफंड जाएगा.’ और हम ने वही गलती दोहराई, एक बार 2 बार कुल 5 बार. अब हमारे खाते से 64,250 रुपए निकल चुके थे. जब उस ने छठी बार 10,000 रुपए का नया लिंक भेजा, बेटे ने कांपती आवाज में पूछा, ‘‘बारबार पैसे कट रहे हैं पापा, रिफंड क्यों नहीं रहा?’’


फोन पर आदमी झल्ला गया, ‘सर, यह कन्फर्मेशन है. फास्ट करिए.’ बेटे ने बैंक ऐप खोला और उस ने देखा तो पता चला पूरे 64,250 रुपए हमारे खाते से निकल चुके थे. हम ने उसे एक भद्दी सी गाली दी और उस ने तुरंत फोन काट दियाअब हम ने बैंक की हैल्पलाइन से बात की. जवाब मिला, ‘यह फिशिंग फ्रौड है. तुरंत साइबर क्राइम में शिकायत दर्ज करें.’ मेरा मन बहुत बो?िल हो गया था. मरता क्या करता. 2 घंटे में हम ने एफआईआर से ले कर औनलाइन शिकायत तक सबकुछ पूरा किया.


लेकिन अगले ही दिन सुबह एक चमत्कार हुआ. फोन खोला तो देखा पूरर 64,250 रुपए वापस मेरे खाते में जमा हो गए थे. खुशी के आंसू गए. पहली बार लगा कि सरकारी विज्ञापन सच बोलते हैं, ‘तुरंत शिकायत करो, पूरा पैसा वापस मिल जाएगा.’ एक महीना बीत गया. जिंदगी धीरेधीरे सामान्य हो चली थी, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. बैंक से फिर हमें 4 एसएमएस मिले. चैक किया तो पता चला कि कुल 5 में से 4 रिफंड वापस ले लिए गए थे. मतलब 51,400 रुपए फिर से काट लिए गए थे.


मैं ने घबरा कर बैंक को फोन लगाया. जवाब मिला, ‘सर, हम ने रिफंड की पुष्टि के लिए आप को फोन किया था. आप ने रिसीव नहीं किया, इसलिए रकम वापस डैबिट हो गई है.’ मेरे पैरों तले की जमीन खिसक गई. ठगी से बचने के डर ने मु? अनजान फोन उठाने नहीं दिया और अब उसीसतर्कताकी सजा मिल गई थी. हम ने बैंकिंग लोकपाल में शिकायत की. एक महीने बाद जवाब आया, ‘आप की शिकायत निराधार है.’


सरकारी तंत्र ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के नाम पर बस औपचारिकता कर दी थी. उस दिन सम? में आया कि खतरा सिर्फ ठगों से नहीं, खतरा उस व्यवस्था से भी है, जो जनता से जागरूकता की उम्मीद तो करती है, पर खुद कभी संवेदनशीलता नहीं दिखाती. अब मु? एक ही बात सम? में रही थी, वह यह थी कि सावधानी कोई औप्शन नहीं, बल्कि आज की पहली जरूरत है. एक गलत क्लिक हमारी सारी सिक्योरिटी में सेंध लगा सकता है. किसी तंत्र, संस्था या नियम से पहले अपनी सोच पर भरोसा करना ही सब से बड़ा कवच है.    Hindi Story                     

Crime Story: गोंडा में औनर किलिंग – लड़की को करंट लगा कर मारा

Crime Story: उत्तर प्रदेश का गोंडा जिला अपनी चीनी इंडस्ट्री के लिए मशहूर है, पर यहीं से एक ऐसी खबर आई है, जो समाज और परिवार में फैले जहर की दर्दनाक मिसाल है. यहां के पांडेय बाबा पुरवा इलाके में रहने वाली 19 साल की शिवानी पांडेय की 30 जनवरी, 2026 की सुबह संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. इस बारे में शिवानी के पिता चंद्र प्रकाश पांडे और भाई राहुल ने सुबह 7 बजे पुलिस को सूचना दी और बताया कि शिवानी कपड़े इस्तरी कर रही थी और करंट लगने से उस की मौत हो गई.


पर यह मामला इतना सीधा था नहीं, क्योंकि इसी बीच शिवानी के प्रेमी ने उस के पिता और भाई के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करा दिया. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची. शिवानी की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज कर जांच शुरू की. साथ ही, पुलिस को यह भी पता चला कि शिवानी का गांव में रहने वाले परमेश्वर पाठक से तकरीबन 5 साल से अफेयर चल रहा था. जब यह बात शिवानी के पिता और भाई को मालूम हुई, तो उन्होंने शिवानी को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन शिवानी यह रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार नहीं थी.


इस के बाद पुलिस ने शिवानी के भाई और पिता को गिरफ्तार कर लिया. कड़ाई से हुई पूछताछ में उन दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. क्यों हुआ यह कांड 28 मई, 2025 को शिवानी के प्रेमी परमेश्वर पाठक ने उस के पिता चंद्र प्रकाश पांडे से शादी को ले कर बात की थी, लेकिन उन्होंने शादी करने से इनकार कर दिया. बाद में किसी तरह नवंबर, 2025 में शादी तय हुई, लेकिन उस से पहले ही परमेश्वर पाठक के पिता की मौत हो गई और यह शादी टल गई.


हाल ही में फिर से शादी की बात उठी, लेकिन शिवानी के घर वालों ने साफ मना कर दिया. इतना ही नहीं, वे शिवानी के साथ मारपीट भी करने लगे. इस बात से तंग आई शिवानी ने अपने प्रेमी परमेश्वर पाठक को 2 बार चिट्ठी लिख कर भेजी और उस ने डर जाहिर किया कि उस के साथ कुछ भी गलत हो सकता है. इधर, शिवानी के पिता और भाई गुस्से में थे. पुलिस पूछताछ में इन दोनों आरोपियों ने बताया कि वारदात वाले दिन शिवानी सुबह के तकरीबन 5 बजे घर से चुपचाप भागने की फिराक में थी. यह पता चलने पर वे शिवानी को कमरे में ले गए और भाई राहुल ने उसे तख्त पर लिटा दिया, फिर उस के हाथों को मफलर से बांध दिया.


इस के बाद पिता चंद्र प्रकाश ने शिवानी के मुंह को दुपट्टे से बांधा और बिजली की इस्तरी के तार से उस के पैर में करंट लगाया गया. इस से कुछ देर में तड़पतड़प कर उस की मौत हो गई. इस पूरे मामले के बारे में एसपी विनीत जायसवाल ने बताया कि बेटी की पिता और भाई ने मिल कर हत्या की थी और पुलिस को गुमराह करने के लिए करंट से मौत की सूचना दी थी, पर पोस्टमौर्टम रिपोर्ट और आरोपियों के कुबूलनामे
से मामले का खुलासा हो गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.                                

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