बर्दाश्त की हद

बर्दाश्त की हद – भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

निकिता बर्दाश्त नहीं कर पाई

सास के मुंह से ऐसी बातें सुन कर निकिता को गुस्सा आ गया. उस ने रेखा के हाथ से वह पाइप छीन लिया और बिना सोचेसमझे उस के सिर में दे मारा.

50-52 साल की रेखा बेन जवान बहू का विरोध नहीं कर सकी. उस के सिर से खून बहने लगा. वह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद भी निकिता का गुस्सा शांत नहीं हुआ.  उस ने पाइप से सास के सीने, पेट और चेहरे पर कई वार किए. पाइप के लगातार हमलों को रेखा सहन नहीं कर सकी. उस के शरीर से कई जगह से खून रिसने लगा और थोड़ी ही देर में उस के प्राण निकल गए.

जब निकिता का गुस्सा शांत हुआ, तो वह घबरा गई. उस की सोचनेसमझने की शक्ति जवाब दे गई थी. कुछ देर बैठ कर वह सोचती रही कि अब क्या करे? कुछ देर विचार करने के बाद उस ने सास की हत्या को आत्महत्या का रूप देने की योजना बनाई.

उस ने फ्लैट में ही रेखा के शव पर चादर डाल कर उसे जलाने का प्रयास किया. उसे यह नहीं पता था कि इंसान का शव इतनी आसानी से नहीं जलता. शव नहीं जला, तो वह हताश हो कर अपना सिर पकड़ कर बैडरूम में जा बैठी.

इस बीच, पड़ोसियों ने सासबहू के बीच झगड़े और मारपीट की तेज आवाजें सुनीं, तो उन्होंने रामनिवास के फ्लैट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन निकिता ने दरवाजा नहीं खोला. कई बार घंटी बजाने और कुंडी खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला, तो पड़ोसियों ने रामनिवास को फोन किया. रामनिवास अस्पताल में थे. पड़ोसी की बात सुन कर वे चिंतित हो उठे. उन्होंने बेटे दीपक को तुरंत घर जाने को कहा. दीपक उस समय अपना औफिस बंद कर चाणक्यपुरी ब्रिज स्थित मंदिर में हनुमानजी के दर्शन करने गया हुआ था. वह रात करीब साढ़े 9 बजे फ्लैट पर पहुंचा.

उस ने घंटी बजाई, लेकिन निकिता ने गेट नहीं खोला. उस ने गेट की कुंडी भी खटखटाई, लेकिन फिर भी दरवाजा नहीं खुला, तो उस ने मां और बीवी के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन दोनों ने ही फोन नहीं उठाया. उसे लगा कि निकिता ने मां से झगड़े के बाद गेट बंद कर लिया होगा और अब वह गुस्से में गेट नहीं खोल रही है.

मां की लाश देख होश उड़े

थकहार कर उस ने पड़ोसियों की सीढि़यों के रास्ते अपने फ्लैट में जाने की कोशिश की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. बाद में उस ने पड़ोसियों से पाइप की बनी सीढ़ी का इंतजाम किया. इस सीढ़ी पर चढ़ कर वह रसोई के रास्ते अपने फ्लैट में पहुंचा. उस की मां का कमरा बंद था. उस ने कमरा खोला, तो मां की खून से लथपथ अधजली लाश देख कर दीपक सहम गया. मां की लाश के पास ही खून से सना लोहे का एक पाइप पड़ा था. निकिता अपने बैडरूम में चुपचाप बैठी थी. उस ने उस से पूछा कि यह सब क्या और कैसे हुआ?

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निकिता ने दीपक को बताया कि मम्मीजी ने पहले उस से झगड़ा किया. फिर वे अपने कमरे में चली गईं. पता नहीं उन्होंने खुद कैसे अपना यह हाल बना लिया? शायद उन्होंने सुसाइड कर लिया.

दीपक को निकिता की बातें गले नहीं उतर रही थीं. अगर रेखा बेन सुसाइड करतीं, तो खून से लथपथ कैसे हो जातीं और फिर उन का शव कैसे जलता? दीपक ने निकिता से पूछा कि घर में कोई और आदमी आया था क्या? निकिता ने मना कर दिया.

दीपक ने रात को ही फोन नंबर 108 पर एंबुलेंस सेवा को फोन किया. एंबुलेंस के साथ आए डाक्टर और चिकित्साकर्मियों ने रेखा बेन की जांच कर उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद दीपक ने पुलिस को फोन किया.

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पुलिस उस के फ्लैट में पहुंच गई. पुलिस ने दीपक से पूछताछ की. दीपक ने पिता का फोन आने से ले कर सीढ़ी के रास्ते फ्लैट में चढ़ने और मां का लहूलुहान शव पड़ा होने की सारे बातें बता दीं.

पुलिस ने निकिता से पूछताछ की, तो उस ने वही बातें कहीं, जो दीपक को बताई थीं.

मौके के हालात देख कर पुलिस को भी निकिता की कहानी पर भरोसा नहीं हुआ. रात ज्यादा हो गई थी. फिर भी पुलिस ने रात को ही घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी.

बर्दाश्त की हद – भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

फुटेज में इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि दीपक के फ्लैट में बाहर से कोई आदमी आया था. पुलिस ने पंचनामा बना कर शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. मामला संदिग्ध था. इस के लिए निकिता से पूछताछ जरूरी थी. पुलिस उसे थाने ले गई.

दीपक की शिकायत पर सोला थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने मौके से खून से सना लोहे का पाइप बरामद कर लिया था.

पुलिस ने थाने में निकिता से पूछताछ की. वह कहती रही कि सास और उस का झगड़ा हुआ था. इस के बाद सास अपने कमरे में चली गई और अंदर से कमरा बंद कर लिया. बाद में कैसे और क्या हुआ, इस का उसे कुछ पता नहीं है.

निकिता ने पुलिस को बताया कि उस की सास पिछले कुछ सालों से ऐसी बीमारी से पीडि़त थी कि कोई उसे छू ले, तो वह तुरंत नहाती थीं. मैडिकल की भाषा में इस बीमारी को औब्सेसिव कंपजिव डिसऔर्डर (ओसीडी) कहा जाता है. दीपक ने भी अपनी मां के ऐसी बीमारी से ग्रस्त होने की बात मानी.

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पुलिस ने दीपक से उस के घरपरिवार और सासबहू के रिश्तों के बारे में पूछा. इस में पता चला कि रेखा बेन और निकिता में दहेज और घरेलू कामकाज को ले कर झगड़े होते रहते थे. इस पर पुलिस अधिकारियों ने निकिता से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की.

आखिर दूसरे दिन 28 अक्तूबर को सुबह निकिता ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस के अधिकारी भी हैरान रह गए. निकिता ने बताया कि उस की सास पुराने खयालों की थी. वह उसे कभी दहेज पर तो कभी किसी दूसरी बात पर ताने मारती थी. शादी के बाद से ही सास से उस की पटरी नहीं बैठी थी.

अभी जब वह पीहर से ससुराल आई और मम्मीजी को अपने गर्भवती होने की बात बताई, तो उन की त्यौरियां चढ़ गईं. उस दिन तो उन्होंने कुछ नहीं कहा. ससुरजी के अस्पताल में भरती होने के बाद मम्मीजी मेरे गर्भ को ले कर अनापशनाप बातें कहने लगीं.

उस दिन जब उन्होंने उस से गर्भ ससुर का होने की बात कही, तो गुस्से में वह अपना आपा खो बैठी और उन के हाथ से पाइप छीन कर ताबड़तोड़ हमले किए. इस से उन की मौत हो गई. निकिता ने सास की हत्या करने की बात कबूल कर ली थी.

उस ने पुलिस को बताया कि सास की हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए उस ने वहां फैले खून को चादर से साफ किया. फिर शव पर चादर डाल कर आग लगा दी ताकि शव जल जाए, लेकिन शव नहीं जला. इस के बाद उस ने अपने मोबाइल से ससुर के वाट्सएप चैट और मैसेज डिलीट किए.

मोबाइल से मैसेज डिलीट करने की बात सामने आने पर पुलिस ने निकिता के साथ परिवार के चारों लोगों के मोबाइल जब्त कर लिए. इन की जांच की, तो निकिता के मोबाइल में एक मैसेज मिला. 24 अक्तूबर के इस मैसेज में ससुर रामनिवास ने लिखा था कि तुम अभी दीपक से दूर ही रहना.

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स्वीकारोक्ति के बाद

निकिता की स्वीकारोक्ति के बाद पुलिस ने निकिता और उस की सास के खून से सने कपड़े भी जब्त कर लिए. मोबाइल फोन के साथ इन कपड़ों को भी जांच के लिए विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेज दिया गया.

एफएसएल टीम ने भी मौके से साक्ष्य जुटाए. पुलिस ने दूसरे दिन डाक्टरों के मैडिकल बोर्ड से रेखा बेन के शव का पोस्टमार्टम कराया. बाद में दीपक को शव सौंप दिया गया. घर वालों ने रेखा बेन का अंतिम संस्कार कर दिया.

कोरोना जांच में निकिता निगेटिव मिली. इस के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर रिमांड पर लिया. पुलिस ने निकिता को उस के फ्लैट पर ले जा कर वारदात का सीन रिक्रिएट किया.

इस दौरान पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि निकिता और रेखा बेन के बीच झगड़ा कैसे शुरू हुआ होगा. इस के बाद निकिता ने कैसे उस की हत्या की होगी. सीन रिक्रिएट के जरिए पुलिस ने यह बात जानने की भी कोशिश की कि क्या निकिता ने अकेले ही सास की हत्या की या इस में किसी दूसरे आदमी ने भी उस की मदद की? हालांकि पुलिस को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला.

बेटी के हाथों सास की हत्या की सूचना मिलने पर राजस्थान के ब्यावर शहर से निकिता के मातापिता अहमदाबाद पहुंचे. पहले वे समधन रेखा बेन की अंतिम क्रिया में शरीक हुए. बाद में वे सोला पुलिस स्टेशन जा कर हत्या आरोपी बेटी निकिता से मिले.

उसे पुलिस हिरासत में देख कर मांबाप के आंसू बह निकले. निकिता भी रो पड़ी. सुबकते हुए उस ने अपने मातापिता से केवल इतना ही कहा, ‘मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई.’

पुलिस ने जांचपड़ताल के दौरान पड़ोसियों से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि रेखा और निकिता के बीच आमतौर पर रोजाना ही किसी ना किसी बात पर झगड़ा होता था. उस दिन भी उन्होंने दोनों के बीच झगड़े और मारपीट की तेज आवाजें सुनी थीं. इस के बाद ही रामनिवास को फोन किया था.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने निकिता को जेल भिजवा दिया था. पुलिस यह जानने का प्रयास कर रही थी कि क्या निकिता के अपने ससुर से किसी तरह के संबंध थे? हालांकि पुलिस को एक मोबाइल चैटिंग के अलावा इस बारे में दूसरा कोई प्रमाण नहीं मिला. मोबाइल चैटिंग से भी यह बात साफ नहीं होती कि निकिता के ससुर से किसी तरह के संबंध थे.

बहरहाल, 2 महीने की गर्भवती निकिता अपनी सास की हत्या के आरोप में जेल पहुंच गई. ससुर रामनिवास पर बहू से संबंधों का आरोप लग गया. पति दीपक बीच मंझधार में फंस गया.

उस के सामने संकट आ खड़ा हुआ कि वह पिता पर शक करे या पत्नी पर. निकिता के पेट में किस का गर्भ है, यह तो वही जाने. शक की बुनियाद पर एक खातेपीते संपन्न परिवार के रिश्तों में ऐसी दरार आ गई, जो जिंदगी भर नहीं पाटी जा सकती.

Serial Story : निर्दय दीवान सालम सिंह- भाग 2

‘‘हम लोग गुलाम हैं. हमें खरीदा बेचा जाता है. दहेज में दिया जाता है. तेरे मौसा को भी दहेज में दे दिया गया था. मैं अकेली रह गई हूं न. हम गुलामों की नियति यही है. पति, सासससुर, मांबाप की बात करती हो. तुम्हारा ससुराल पिथला गांव में है न. ठाकुर दानसिंह के यहां तुम्हारे ससुराल वाले गोले हैं. अगर ठाकुर सा ने तुझे अपनी बेटी के दहेज में दे दिया तो तू क्या कर लेगी. कहां होगी तेरी ससुराल. कौन होंगे तेरे पति, सासससुर… बातें करती है.’’ गुलाबी को कस्तूरी की बातों पर गुस्सा आ गया.

‘‘मैं भी इंसान हूं. औरों की तरह मेरा भी घरपरिवार हो. यह सपना तो सभी का होता है.’’ कस्तूरी बोली.

‘‘जानती है, जो सुखी हैं, सुख की नींद सोते हैं, उन्हीं को सपने देखने का अधिकार है, हम लोगों को नहीं. हमें चैन की जिंदगी नसीब नहीं. गुलाम का अपना क्या होता है. तो उस के सपने भी कैसे अपने हो सकते हैं.’’ गुलाबी की आवाज भर्राने लगी.

कस्तूरी ने उस की पीठ सहलाई. वह भीगी आंखों से बोली, ‘‘अभी तक तो तुम्हारी उम्र सपने देखने की थी. आज से तुम भी हमारी तरह नरक में धकेल दी गई हो. सपने देखना छोड़ सच्चाई का सामना करो.’’

कस्तूरी रो पड़ी. गुलाबी ने उसे सांत्वना दी. उस का सिर और पीठ सहला कर उसे चुप कराती समझाती रही, ‘‘देखो, हम लोग इंसान नहीं मालिक के काम आने वाले पशु हैं. मालिक जैसा चाहे हम से काम ले. मुकलावा हुआ हो या नहीं. हो जाने के बाद क्या हमें छोड़ देंगे. यह तेरी भूल है.

‘‘शादी…शादी हमारे लिए एक रस्म भर है. होने वाली जायज या नाजायज संतानों को बाप का नाम देने की युक्ति. इस से ज्यादा कुछ नहीं. जब हमें खरीदा बेचा जा सकता है. दहेज, ईनाम में दिया जा सकता है तो कैसा पति, किस की पत्नी, किस का भाई, कौन बाप, कोई रिश्ता नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं. ढोरडांगर की तरह कभी एक ठाण तो कभी दूसरे ठाण.’’

कस्तूरी उसे देखती रही. आज उसे मौसी में नया ही रूप दिखाई देने लगा. मौसी ही नहीं, उसे सारी दुनिया नई लगने लगी. सपनों की नहीं, क्रूर फरेबी आतंक की दुनिया. मजबूरी, लाचारी, गुरबत की दुनिया. वीभत्स, हास्यास्पद, बजबजाती दुनिया.

उस का दिलोदिमाग शून्य में कहीं लुप्त हो गया था. उसे जरा भी होश नहीं था. कब वह तैयार हुई, कब दीवान सा आए, कब वह औरत बनी. कूड़े पर फेंक दी गई जूठन. दीवट जलते रहे. लौ कांपती हुई बाती से बंधी नाचती रही. धुएं की गंध के साथ पीला उजास सारे घर में भरता रहा. वह नुची हुई फूलों की तरह बिखरी पड़ी थी, जिस के फूल तोड़ कर मसल दिए गए थे और खुशबू लूटी जा चुकी थी.

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रात अपने पूरे अंधेरे के साथ घर पर सवार रही. दीवान के जाते ही मुंडेर पर बैठी रात चुपके से उतरी और उस के दिलोदिमाग पर छा गई. दीवान ने जातेजाते गुलाबी से कहा, ‘‘तुम जौहरी हो. क्या हीरा छिपाए बैठी थी. इसे मेरे पूछे बिना कहीं नहीं भेजोगी. मैं कल फिर आऊंगा.’’

गुलाबी ने देखा, दीवान के चेहरे पर भरपूर तृप्ति थी. दीवान दूसरे, तीसरे, चौथे कई दिन तक आया. एक दिन उस ने कहा, ‘‘गुलाबी, कस्तूरी अब मेरी हुई. अब इस का न तो गौना होगा और न ही यह कहीं जाएगी. इस के लिए मैं एक अलग नया घर बनवा दूंगा. यह वहीं रहेगी. अब इस की सारी जिम्मेदारी मेरी.’’

गुलाबी तो जैसे धन्य हो गई. उस की भांजी अब गोली नहीं, दीवान की रखैल होगी. उस के सामने दूसरा कोई देख भी नहीं सकेगा.

मगर कस्तूरी के मन में कुछ और घुमड़ रहा था. वह खुश नहीं थी. वह वहां से भाग जाना चाहती थी. पर दीवान के सामने उस का उद्धार करने वाला कौन था. उस के मन में आग लगी हुई थी. वह भी बदले की आग.

कस्तूरी को गर्भ ठहर गया था. गुलाबी ने खूब समझाया, मगर वह न मानी. उस ने विरोध का एक तरीका निकाला. उस ने तय कर लिया कि वह उसे जन्म दे कर रहेगी. समय आने पर कस्तूरी ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रखा कोजा. वह एकदम दीवान सालम की प्रतिकृति था. कस्तूरी सोचती मेरा क्या है, मैं तो एक गोली हूं रखैल, मेरी क्या इज्जत. पर यह दुनिया के सामने दीवान के गुनाहों की सबूत की तरह घूमता रहेगा.

वही रंगरूप, कोमलता, डीलडौल. कैसे कोई झुठला सकेगा इसे कि यह दीवान सालम सिंह का एक गोली की कोख से उपजा अंश नहीं है. जबजब राजा अधम हुआ है, मंत्री ने मनमानी की है, कमजोरी का फायदा तो उठाया ही जाता है.

सालम सिंह एक ओर राज्य की आंतरिक व्यवस्था को अंकुश में रखे हुए था तो वहीं दूसरी ओर वह विपुल धनराशि देश में विभिन्न स्थानों पर रहने वाले रिश्तेदारों को भेज रहा था. रियासत के खजाने को लूटता जा रहा था. अपने मनमाने आदेश चला रहा था. किसी की हत्या करवा देता, किसी की इज्जत लूट लेता. अपने दुराचार, व्यभिचार और अत्याचारों से जनता को कुचल रहा था.

सालम सिंह अपने पिता स्वरूप सिंह की सरे दरबार हुई हत्या से इतना क्रूर दीवान बना कि उस ने महारावल को मंदिर व राजमहल में भक्ति करने तक सीमित कर के एकएक से बदला लिया. अपने पिता के हत्यारों को चुनचुन कर मारा. सालम को जब लगता कि यह व्यक्ति उस के लिए खतरा बन सकता है, तो वह उसे मरवा डालता था.

ऐसे में राजपूतों में दहशत फैल गई. कई राजपूत भाग कर बीकानेर चले गए. कई शांत हो कर बैठ गए. उन्हें लगने लगा कि सालम से पार पाना मुश्किल है.

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सालम सिंह अपनी राह निष्कंटक कर निरंकुश हो गया. अब उस के सामने कोई चुनौती नहीं थी. उस ने किसी को प्रधान सेनापति नहीं बनाया. वह काम भी अपने हाथ में ले लिया. वह किसी राजपूत को इसलिए आगे नहीं आने देना चाहता था कि आगे चल कर उसे कोई चुनौती दे.

इस दरम्यान उसने सालमसागर, स्वरूपसर और जयकिशनसर तालाब खुदवाए. उन पर पक्के घाट व बारादरियां बनवाईं. पेड़ लगवाए. सालमसागर पर प्रायद्वीप की तरह आगे की तरफ निकल आई पहाड़ी पर शानदार बुर्ज बनवाया.

Serial Story : निर्दय दीवान सालम सिंह- भाग 1

जैसलमेर रियासत का दीवान सालम सिंह अपने नए बने मोतीमहल में लेटा हुआ था. दोपहर का समय था. भोजन करने के बाद वह आराम कर रहा था. कमरा हलकी खुशबू से महक रहा था. उस के मन में अजीब सी हुलस थी. झरने से टकरा कर आ रही ठंडीठंडी हवा उस के मन में ताजगी भर रही थी.

वैसे बाहर लू चल रही थी. मगर खिड़की की जगह बने कृत्रिम झरने से पूरा कमरा ठंडा हो रहा था. तभी दरवाजा खुला. उस ने देखा झरने के पास बने दरवाजे से चांदी की सुराही में जल ले कर गुलाबी ऊपर आई. झरने के पास से आती हुई गुलाबी उसे अचानक प्रकट हुई हूर सी लगी. जैसे अभी कहेगी, ‘‘आप ने याद फरमाया हुजूर! बांदी आप की खिदमत के लिए हाजिर है.’’

वह मुसकराया. गुलाबी अपना आंचल संभालती धीरे से पास आई. सुराही आले में रख कर वह उस की तरफ भरपूर नजर से देखती हुई मुड़ी.

सालम ने उस का हाथ पकड़ लिया. गुलाबी को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ. आज यह दीवान साहब को क्या हो गया. वह तो सालों से हवेली में काम कर रही है. आज अचानक बरसों बाद फिर इस नाचीज पर मन कैसे आ गया. हवेली में एक से बढ़ कर एक 3-3 स्त्रियां जिन के इशारे का इंतजार कर रही हैं. सुंदर, कोमलांगी, गोरी, गुदगुदी. उन के आगे वह कहां ठहरती है.

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‘‘आजकल तुम्हें मेरा खयाल ही नहीं रहा गुलाबी.’’ सालम ने उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा.

वह संकोच में खड़ी रही.

‘‘अब आप को गुलाबी की क्या जरूरत. आप ठहरे राज्य के दीवान. 3-3 लुगाइयों के धणी. अब आप वही मौसर फूटते छोरे नहीं रहे. आप राज के मालिक हैं.’’

गुलाबी का एक हाथ सालम की गिरफ्त में था. वह दूसरे हाथ से आंचल ठीक करने लगी.

‘‘मुझे पहला पाठ तो तूने ही पढ़ाया था. मेरी गुरु तो तू ही है.’’ सालम हंसा.

‘‘गुरु तो आप हैं, मैं तो आप की चेली हूं. एक दरोगन. बस, आप के पैरों की धूल.’’

‘‘तो आ न, खड़ी क्यों है?’’

‘‘नहींनहीं, अब आप को मुझ दासी के मुंह नहीं लगना चाहिए. आप रियासत के दीवान हैं.’’ गुलाबी हाथ खींचने का नाटक करने लगी.

सालम ने झटका दिया. वह वहीं ढेर हो गई.

‘‘गुलाबी, मैं रोज दाल खाखा कर उकता गया हूं.’’ सालम ने गुलाबी के चेहरे को हाथों में लेते हुए कहा.

‘‘तो आप कहो सो खिलाऊं.’’ गुलाबी ढुल गई.

तभी दरवाजे पर खटका हुआ. गुलाबी हड़बड़ा कर खड़ी हो गई. सालम ने देखा दरवाजे पर झरने के पास 15-16 साल की अनिंद्य सुंदरी खड़ी थी. अति साधारण कपड़ों में उस का गोरा रंग और दिव्य रूप छलक रहा था. जैसे भटकती हुई साक्षात अप्सरा आ गई  हो. दीवान सालम ने ऐसा सौंदर्य पहली बार देखा था. युवती ठिठकी सी हिरनी की तरह हैरत से उसे देख रही थी.

‘‘कस्तूरी, क्या बात है? यहां कैसे आई?’’ गुलाबी ने उस लड़की से पूछा.

मगर सालम की नजरें उस पर से हट ही नहीं रही थीं. कस्तूरी के मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे. वह जैसे पत्थर हो गई थी. गुलाबी उस के पास गई, ‘‘यहां क्यों आई है. जा, मैं आ रही हूं.’’

कस्तूरी की मूर्ति जैसे सजीव हो गई. उस में हरकत हुई तो सालम जागा, ‘‘इसे अंदर ले आओ. कौन है यह?’’

‘‘यह कस्तूरी है. मेरी बहन की बेटी. आजकल यहां आई हुई है.’’ गुलाबी उसे अंदर ले आई.

सालम उसे देखता रह गया. गजब की सुंदरता, चेहरे पर मासूमियत. शर्मसार आंखें. लज्जा के गहनों को पलकों के कपाट से ढांके. अपने आप में सिकुड़ती. गुलाबी में खुद को छिपाने की कोशिश करती हुई.

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‘‘सुंदर…यह तो कोई हूर है.’’ सालम चकित होते हुए बोला.

‘‘आप की रैयत है. कस्तूरी चल जा, मैं आ रही हूं.’’ गुलाबी ने धीरे से कहा.

कस्तूरी तुरंत भाग गई. सालम उसे जाते देखता रहा. एक हीरे की अंगूठी उतारी. गुलाबी को देते हुए बोला, ‘‘आज से यह मेरी हुई.’’

‘‘हुकम, माफ करें, यह शादीशुदा है. बचपन में ही इस का विवाह हो गया था. मुकलावा होने वाला है.’’ अंगूठी हाथ में ही रही.

‘‘मुकलावा होता रहेगा. आज की रात तू इसे यहीं लाएगी.’’ सालम ने जोर दे कर कहा.

‘‘हुकम, मेरी बहन…’’

‘‘वह तू जाने, मुझे नहीं मालूम. यह काम तुझे करना है, बस.’’ सालम की आवाज थोड़ी कड़क हो गई.

‘‘जड़ा सोरा को जोतीजेनी. बाई काढणी पड़ै.’’ (अप्रशिक्षित को जोतना सरल नहीं है. पहले उसे प्रशिक्षित करना पड़ता है)

‘‘तो तू किसलिए है. तू तो पुरानी गुरु है.’’ सालम ने हंस कर कहा. उस ने एक और अंगूठी उतार कर गुलाबी को दिखाई.

‘‘आप इतना कह रहे हैं तो…बाकी मैं संभाल लूंगी. पर आप को रात में मेरे गरीबखाने पर पधारना होगा. उसे यहां लाना मुश्किल होगा. वहां सारे इंतजाम हो जाएंगे. एक बार नथ उतरने के बाद आप चाहेंगे तो वह यहां आती रहेगी. पर पहली बार तो…’’ गुलाबी के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. इस मुसकराहट में डर, आशंकाएं, मजबूरियां, भोग और चापलूसी के भाव थे. ये सारे भाव एक साथ एक मुसकराहट में भर देना गुलाबी जैसी औरत के ही वश में था.

सालम ने दूसरी अंगूठी भी गुलाबी को दे दी.

‘‘जा, सारे इंतजाम कर के रखना. मैं रात के दूसरे पहर में कभी भी आ जाऊंगा.’’

गुलाबी ने दोनों अंगूठियों को बेशरमी से कांचली (चोली) में रखा. आंचल को पहले हटाया फिर ढंका. मगर सालम ने ध्यान ही नहीं दिया. वह मुजरा करती हुई वहां से चली गई.

घर आ कर गुलाबी ने कस्तूरी को देखा तो सोचने लगी, ‘दीवान सा गलत नहीं हैं. इस रूप के आगे दूसरी कोई भी सुंदरी कैसे ठहर सकती है. वह रोज उसे देखती थी, पर कभी गौर ही नहीं किया. वाकई वह अब बच्ची नहीं रही. वह तो रूपलावण्य की देवी बन चुकी थी. उस के रूपरंग पर तो वह खुद भी सब कुछ हार जाने को तैयार हो सकती है, फिर दीवान सा तो असली पारखी हैं.’

उस ने कस्तूरी से कहा, ‘‘तू बहुत भाग्यशाली है छोरी. तेरे रूप पर दीवान सा मर मिटे.’’

कस्तूरी लजा गई.

‘‘तेरा मुकलावा तो अब तक हो जाना था. बहन ने देखा ही नहीं. तू जवान हो गई है.’’

कस्तूरी की आंखें चंचल और होंठ थिरकने लगे. उस के गाल गुलाबी हो गए.

‘‘अब तुझे बचपन की बातें छोड़ कर जवानी की लहरों पर उतर जाना चाहिए.’’ गुलाबी शातिर आंखों से उसे देखने लगी.

कस्तूरी शर्मसार हो गई. अगर उस के शरीर में खुद में ही सिकुड़ जाने की कला होती तो वह अपने आप को खुद में छिपा लेती.

दिन में बात यहीं तक हुई. कस्तूरी सोचती रही. उसे अपना शरीर बड़ा लगने लगा. हथेलियां, कलाई, बांह, कंधे, चेहरा, आंखें सभी कुछ. उसे लोगों की घूरती आंखें दिखाई देने लगीं. दीवान सा की कामुक आंखें बारबार उस के आगे आ खड़ी होतीं. उस ने लाख हटाने की कोशिश की, आंखें बंद कर देखना बंद कर दिया. उन पर से ध्यान हटाने के लिए कुछ और सोचने लगती. मगर वे ढीठ आंखें सामने से हट ही नहीं रही थीं.

वह अपने पड़ोस के लड़के किशन को देखा करती. वह भी उसे देखता था. उस का देखना भी उसे अच्छा लगता था. मगर उस की आंखें दहशत को पैदा करने की हद तक पीछा नहीं करती थीं. अब तो उसे घेरते शिकारियों के बीच डरी हिरणी की तरह कंपकंपी हो रही थी.

उस ने हमेशा सपना देखा. वह, उस का पति और उस का परिवार. एक सुखी और सुरक्षित जीवन. मगर दीवान सा की आंखों से तो उस में डर बैठ गया था. शाम ढलते ही गुलाबी विशेष तैयारियों में जुट गई. उस ने सारे घर में साफसफाई सजावट की. जगहजगह दीपक जलाए. सारा घर जगमगा उठा. खुद भी नहाधो कर नएकपड़े पहन कर इत्र की खुशबू से महकतीचहकती भाग रही थी. लगता था जैसे आज कोई उत्सव हो.

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कस्तूरी को सुगंधित साबुन से नहलाया, सिर धो कर चमेली का तेल लगा चोटी गूंथी. नए कपड़े पहनाए. कस्तूरी की समझ में नहीं आ रहा था. वह बारबार पूछ रही थी मगर गुलाबी टालती जा रही थी.

जब उसे गहने पहना कर दुलहन की तरह सजाया जाने लगा तो उस के सब्र का बांध टूट गया. वह चिल्ला पड़ी, ‘‘क्या है? क्यों मुझे इस तरह तैयार कर रही हो?’’

‘‘तू तो भाग्यशाली है. तुझ पर दीवान सा की मेहर हो गई है.’’ गुलाबी ने समझाया.

‘‘तो?’’

‘‘और सुन, आज रात दीवान सा हमारे घर आएंगे. वह भी तेरे लिए.’’

‘‘मेरे लिए?’’ कस्तूरी चौंकी.

‘‘तू आज की रात दीवान सा की रानी बनेगी.’’

‘‘मौसी, तुझे नहीं पता मैं ब्याहता हूं. मेरा मुकलावा होने वाला है.’’ कस्तूरी बेचैन हो गई. तन के कपड़े, गहने सभी उसे चुभने लगे. उस का मन किया कि अभी भाग जाए यहां से.

‘‘मैं जानती हूं. क्या बिगड़ जाएगा जो तू एक रात दीवान सा के साथ बिता देगी. शादी टूट नहीं जाएगी.’’ गुलाबी की आवाज कठोर होने लगी.

‘‘यह क्या कह रही है तू. मेरी इज्जतआबरू का भी खयाल नहीं है तुझे?’’

‘‘इज्जत आबरू?’’ गुलाबी हंसी, ‘‘गोलों की इज्जत इसी तरह ऊंचाइयां चढ़ती, उतरती रही है. हम लोग गुलाम हैं और गुलाम का काम मालिक का हुकम बजाना होता है, समझी?’’

‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती. अपने पति, सासससुर, मांबाप सब से कैसे नजरें मिला पाऊंगी.’’

Serial Story : निर्दय दीवान सालम सिंह- भाग 3

जैसलमेर शहर से मात्र 2 कोस दूर उत्तर मे स्थित इस बुर्ज के 3 तरफ खाई थी. इस के 2 उद्देश्य थे. एक, अगर हमला हो तो अच्छे मोर्चे की तरह उस का इस्तेमाल किया जाए. क्योंकि वह मोटी दीवारों का गोल बुर्ज था, जिस में हथियार चलाने के लिए स्थान बनाए गए थे.

दूसरा उपयोग अय्याशी के लिए था. बुर्ज में घुसते ही बाईं तरफ ऊपर जाने की सीढि़यां. दाईं तरफ शौचालय. बीच में हाल. हाल के बाईं तरफ बहुत बड़ा झरोखा था, जिस पर एक साथ 10 आदमी बैठ सकते थे. वहां से दूरदूर तक फैली धरती के नजारे देखने लायक थे. दूसरी तरफ भी झरोखा था. इस तरह वह हवादार हो गया था.

इस हाल के अंदर एक निजी कक्ष था. इस का झरोखा दक्षिण की तरफ था. वह झरोखा भी काफी बड़ा था. इस पर 4-5 लोग आराम से बैठ सकते थे. यह कक्ष छोटा था, मगर इस में एक बड़ा पलंग आसानी से आ सकता था. सालम ने इसे भोग का स्थान बना लिया था. राज्य की हर सुंदर स्त्री उसे अपने लिए पैदा हुई लगती थी. गुलाबी जैसी कुछ औरतें उस की मदद करती थीं.

इस बुर्ज में कई स्त्रियों की चीखें घुटघुट कर रह गईं. अकसर यहां शाम होते ही किसी स्त्री की पालकी आती और देर रात वापस जाती. सारी जनता में भय था. लोग सालम से तो डरते ही थे, गुलाबी, खेमा जैसे लोगों से भी दूर रहने की कोशिश करते थे.

बहूबेटियों को हवेली के पास फटकने तक नहीं दिया जाता था. इस हद तक आतंक था कि अगर किसी को उस तरफ से जाना भी पड़ता तो चेहरे पर राख मल कर जाती ताकि उस का गोरा रंग और सुंदर रूप छिप जाए. फिर भी हर समय यही भय रहता कि कहीं सालम या उस के दलालों की नजर न पड़ जाए. अगर नजर में चढ़ गई तो दुर्भाग्य के पंजे से कोई नहीं बचा सकता था.

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अन्य जाति की स्त्रियों के साथ वह दुराचरण करता, मगर अपनी ही जाति बनिया (माहेश्वरी) स्त्रियों के साथ वह रियायत बरतता. यह रियायत स्त्रियों के लिए थी, लड़कियों के लिए नहीं. वह उन से विवाह कर लेता था.

सालम ने 6 विवाह किए थे. उस के 6 पत्नियां थीं. फिर भी वह हर रात बुर्ज पर जा कर किसी न किसी कि आबरू लूटता था. इज्जत लुटा कर स्त्रियां या लड़कियां चुप रह जातीं, मगर दीवान सालम ने आना भाटी की बहन की इज्जत लूटी तो वह गड़ीसर में जा कर डूब मरी. आना को सालम की करतूत पता चली तो उस ने तलवार से दीवान पर हमला किया.

तलवार सालम के सिर की पगड़ी से टकरा कर बाएं कंधे में जा गड़ी. अत्यधिक गुस्से के कारण वह उस पर दूसरा वार नहीं कर पाया. आना भाटी काठ हो गया था. न हिला न भागा. तभी कई लोगों ने उसे दबोच लिया. तलवार छीन ली और पीटते हुए उसे कोतवाली ले गए. वहां पर आना को मारापीटा गया और पूछा गया कि यह सब किस का षडयंत्र था. मगर आना कुछ नहीं बोला.

सालम के बेटे बिशन सिंह ने कोतवाल से कहा कि जैसे भी हो, इस से षडयंत्रकारियों के नाम उगलवाओ. षडयंत्र था ही नहीं तो आना किस के नाम बताता. आना ने दीवान पर हमला क्यों किया, गड़ीसर पर मिली बहन की लाश ने सारी कहानी खोल कर रख दी थी. आना भाटी दीवान का सुरक्षा गार्ड था. दीवान ने उसी गार्ड की बहन की इज्जत लूटी थी.

दीवान मरा नहीं था. वह घायल हो गया था. उस का वैद्य ने इलाज शुरू किया. सालम ने सातवीं शादी भी की. वह शादी तो कर लेता था लेकिन पत्नियों की शारीरिक जरूरत का खयाल नहीं रखता था. क्योंकि उसे तो किसी नई लड़की या महिला के साथ रात गुजारने की आदत बन चुकी थी. इसलिए उस की सातवीं पत्नी घाटण बहू अपनी सौतन औरतों के कहने पर हवेली में ही अपने जिस्म की आग बुझाने का कोई उपाय ढूंढने लगी.

उस की सभी सौतनों ने अपनेअपने हिसाब से टाइमपास का साधन चुन लिया था. उस की सौतन ने कहा था, ‘‘तुम्हें अपने जीने के साधन खुद तलाश करने पड़ेंगे. दीवान सा के भरोसे उम्र नहीं निकल सकती.’’

बस घाटण बहू ने यह बात गांठ बांध ली और अपने लिए साधन तलाशने लगी. ऐसे में एक रात उस की मुलाकात कस्तूरी के बेटे कोजा से हुई. उस रात गुलाबी की तबीयत खराब थी, इस कारण कोजा हवेली आया था. घाटण बहू ने दीवान सा की इस प्रतिमूर्ति को देखा तो वह उस पर मुग्ध हो गई. उस ने कोजा से कहा कि आज से तुम मेरे पास रहोगे. गुलाबी आए न आए, तुम मेरा काम करोगे. समझे. कोजा ने हां भर दी.

घाटण बहू ने कोजा को हवेली में अपने सामने वाला कमरा रहने को दे दिया. कोजा हवेली में आनेजाने लगा और घाटण बहू की हाजिरी बजाने लगा. घाटण बहू ने कोजा के साथ एक दुनिया रचाई और उस में मस्त हो गई. कोजा उस का नौकर, दोस्त, हमदर्द, प्रेमी सभी कुछ बन गया था.

उधर कोजा के रंगढंग देख कर उस की मां कस्तूरी का दिल बैठ रहा था. घाटण बहू की मेहरबानी और निकटता ने कोजा के स्वभाव को बदल डाला था. पहले नौकरी पर रखना और उस के बाद वहीं रह जाना, अच्छे संकेत नहीं थे. ऐसे में मां ने कोजा को बहुत समझाया और यहां तक कहा कि सालम तेरे पिता हैं, इस नाते घाटण बहू तेरी मां है.

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मगर कोजा ने कहा कि मैं एक रखैल की नाजायज औलाद हूं. मैं उस पापी दीवान से बदला ले रहा हूं, जिस ने मेरी मां को ब्याहता होने के बावजूद मुकलावा करने के बजाय खुद की रखैल बनाया और इज्जत से खेलता रहा. मैं उस से बदला ले रहा हूं. चाहे वह मेरी जान ही क्यों न ले ले.

एक रोज सालम के कानों में घाटण बहू और कोजा की खिलखिलाती हंसी सुनाई दी. दीवान को पता चला कि यह हंसी उस की रखैल के बेटे और उस की सातवीं पत्नी घाटण बहू की है. दीवान ने कोजा के हवेली आने पर प्रतिबंध लगा दिया. मगर घाटण बहू ने उसे हवेली में आने की स्वीकृति दे दी.

दीवान का आदेश भारी पड़ा. कोजा के विरह में घाटण बहू ने दूध में जहर मिला कर दीवान सालम सिंह को रास्ते से हटा दिया. उस के बाद वह फिर से कोजा के साथ रहने लगी.

जब दीवान के बेटे को पता चला कि उस की विधवा मां एक गोले के साथ मौजमस्ती करती है तो उस ने दोनों को तलवार से काट डाला.

Serial Story : निर्दय दीवान सालम सिंह

अपनों ने दिया धोखा

अपनों ने दिया धोखा : भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

ममता बन गई पुलिस इंसपेक्टर

अब तक ममता इंसपेक्टर के पद पर प्रोन्नत हो चुकी थी. किसी ने कपिल से ईर्ष्या कर पुलिस विभाग के अधिकारियों से शिकायत कर दी कि कपिल की पत्नी ममता आगरा में इंसपेक्टर है. पत्नी के पुलिस इंसपेक्टर होने के बलबूते पर कपिल ने कई विवादित जमीन की खरीदफरोख्त की है. इस पर पुलिस अधिकारियों ने ममता पवार का स्थानांतरण आगरा से प्रयागराज कर दिया.

ममता को अपने विभागीय अधिकारियों का आदेश तो मानना ही था, लिहाजा उसे मजबूरन प्रयागराज जाना पड़ा. प्रयागराज में तैनाती के दौरान 24 सितंबर, 2019 को ममता की तबियत खराब हुई. उस की गंभीर हालत को देखते हुए उसे पीजीआई लखनऊ में भरती कराया गया. लेकिन 27 सितंबर, 2019 को ब्रेन हैमरेज के कारण उस की मृत्यु हो गई.

ममता की मौत के बाद उस की मां शिमला कपिल से और बैर रखने लगी. अभी तक ममता के कारण वह कुछ नहीं कहती थी. लेकिन ममता की मौत के बाद शिमला का कपिल से विवाद रहने लगा. विवाद का कारण था ममता के नाम कई प्रौपर्टीज का होना

ममता के नाम मेरठ के अंसल टाउन में एक प्लौट, आगरा के जाटनी के बाग में एक फ्लैट जिस में शिमला खुद रह रही थी, आस्था सिटी सेंटर के सामने एक प्लौट और एक बेकरी की दुकान थी. बेकरी की दुकान के किराएनामे में शिमला का नाम था. कपिल ने उस का बैनामा अपने नाम करा लिया था. प्लौट भी कपिल अपने नाम कराने की कोशिश कर रहा था.

शिमला ने ममता को यह संपत्ति खरीदने के लिए अपनी जमापूंजी दी थी. अब उसे डर था कि उस का दामाद कपिल सारी संपत्ति पर कब्जा कर के उसे घर से बेदखल न कर दे. इसे ले कर उन के बीच बहुत गहरा विवाद था.

ममता की मौत के बाद कपिल के सामने उस की रखी शर्त की कोई बंदिश नहीं थी. वैसे भी कपिल अकेलापन महसूस करता था. इसलिए कपिल ने अपने परिवार से संपर्क रखना शुरू कर दिया.
हालांकि फोन पर कपिल पहले भी जबतब बात कर लेता था, लेकिन ममता की वजह से न घर वालों को घर बुला पाता था और न ही उन से मिलने घर जाता था. बंदिश हटी तो कपिल के घर वाले उस के पास आनेजाने लगे.

26 अक्तूबर, 2020 की शाम कपिल अपने फ्लैट में था. 10 दिन पहले उस ने अपनी 90 वर्षीया मां निर्मला को अपने पास रहने के लिए बुला लिया था. वह शाम को अपनी मां से प्लौट पर जाने की बात कह कर घर से निकल गया. अपनी मारुति वैगनआर कार से वह आस्था सिटी सेंटर के पास वाले प्लौट पर गया था. लेकिन पूरी रात बीत गई, वह वापस नहीं लौटा.

सुबह निर्मला ने पड़ोसियों से कहा तो उन्होंने फोन मिलाने को कहा. निर्मला फोन मिलाना नहीं जानती थी, न ही उन के पास बेटे का नंबर था. पड़ोसियों ने नीचे की मंजिल पर रह रही कपिल की सास शिमला से कहा कि वह कपिल के बारे में पता करे. इस पर शिमला कपिल के फ्लैट में आई और निर्मला पर बरस पड़ी, ‘‘ड्रामा मत करो. यहां मजाक बनेगा. वह आ जाएगा, उसे कौन ले जाएगा. तुम चुप रहो बस.’’ कह कर शिमला चली गई.

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बाद में पड़ोसियों के दबाव में 27 अक्तूबर की शाम को ही शिमला ने स्थानीय छत्ता थाना पुलिस को कपिल के लापता होने की सूचना दी. जिस के बाद छत्ता थाने के इंसपेक्टर सुनील दत्त मय टीम के कपिल के फ्लैट पर पहुंचे. वहां उन्होंने निर्मला से कपिल के संबंध में पूछताछ की. इस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने कपिल पवार उर्फ यश की थाने में गुमशुदगी दर्ज करा दी.

कपिल की मिली लाश

बाद में कपिल का कोई सुराग न लगने पर गुमशुदगी को भादंवि की धारा 364 में तरमीम कर दिया गया. इसी बीच इंसपेक्टर सुनील दत्त को 27 अक्तूबर की शाम को इटावा जिले के भरथना थाना क्षेत्र के मल्हौली नहर में एक लाश मिलने की सूचना मिली. उन्होंने इटावा पुलिस से संपर्क कर के लाश की फोटो मंगवाई.

वह फोटो कपिल की मां और उस के दोनों भाइयों को दिखाई गई तो उन्होंने लाश की पहचान कपिल के रूप में कर दी. इस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने दोनों भाइयों को एसआई योगेश कुमार के साथ इटावा भेज दिया. दोनों भाइयों ने लाश की शिनाख्त अपने भाई यश उर्फ कपिल के रूप में की. इटावा पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद लाश दोनों भाइयों के सुपुर्द कर दी.

इंसपेक्टर दत्त ने कपिल के फोन नंबर की काल डिटेल्स की जांच की तो उस में एक नंबर पर उन की नजर टिक गई. उस नंबर की जानकारी की गई तो वह नंबर कपिल के दोस्त जीतू उर्फ हर्ष यादव का निकला. जीतू के नंबर की लोकेशन ट्रेस की गई तो 26 अक्तूबर की शाम को कपिल के प्लौट, फिर उस के घर से होती हुई इटावा तक मिली.

इस के बाद उन्होंने अपार्टमेंट में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की तो उस में घटना की रात जीतू कपिल की कार के साथ आया दिखा. साथ में एक जाइलो कार भी थी, जिस में 2 व्यक्ति सवार थे. जीतू ने वहां कुछ देर रुक कर कपिल की सास शिमला से बात की. उस के बाद चला गया.

इस के बाद 30 अक्तूबर, 2020 को इंसपेक्टर दत्त ने कपिल की सास शिमला को हिरासत में ले कर पूछताछ की. पूछताछ में शिमला ने कपिल की हत्या जीतू और उस के 2 साथियों राहुल और अनवर से करवाने की बात स्वीकार कर ली. जिस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने अपने मुखबिरों को राहुल और अनवर की तलाश के लिए लगा दिया.

जल्द ही एक मुखबिर ने सूचना दी कि राहुल और अनवर एत्मादपुर से मथुरा की ओर जाइलो कार नंबर यूपी75एन 0021 से जा रहे हैं. जिस के बाद इंसपेक्टर दत्त ने अपनी टीम के साथ जा कर वाटर वर्क्स पुल के ऊपर से दोनों को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उन से कड़ाई से पूछताछ की गई तो सारी कहानी सामने आ गई.

प्रौपर्टी के धंधे में काम करते हुए कपिल की जानपहचान जीतू उर्फ हर्ष यादव से हो गई थी, जोकि आगरा के एत्माद्दौला थाना क्षेत्र में टेढ़ी बगिया में रहता था. दोनों में दोस्ती भी हो गई.

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जीतू का कपिल के घर आनाजाना हुआ. धीरेधीरे दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि कपिल ने उसे अपनी पत्नी ममता की सारी संपत्तियों की जानकारी उसे दे दी. उस ने यह भी बता दिया कि कई संपत्ति पत्नी ममता और सास शिमला के संयुक्त नाम से भी हैं.

जीतू कहने को कपिल का दोस्त था, लेकिन वह मन ही मन उस से जलता था. कई जमीन के सौदे करवाने में दोनों लगे होते थे लेकिन हर बार कपिल बाजी मार ले जाता था. इस से जीतू को नुकसान उठाना पड़ता था.

कपिल से जीतू मानने लगा रंजिश

करीब डेढ़ साल पहले जोंस मिल कंपाउंड में यमुना किनारे जीतू का डेढ़ हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन का इकरारनामा कपिल के माध्यम से हुआ था. मगर बाद में मौरिस जौन ने जमीन का बैनामा उस के नाम न कर के दूसरे किसी कारोबारी को कर दिया.

मौरिस ने यह कदम जीतू के खिलाफ छत्ता थाने में रंगदारी का मुकदमा दर्ज होने के बाद उठाया था. इस मामले में जीतू ने कपिल से जमीन उस के नाम कराने को कहा लेकिन कपिल ने उस का इस मामले में कोई साथ नहीं दिया. लिहाजा दर्ज मुकदमे में जीतू को जेल जाना पड़ा.

इस से वह कपिल से रंजिश मानने लगा. जीतू वैसे भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. उस पर विभिन्न धाराओं में 5 मुकदमे दर्ज हैं.

अपनों ने दिया धोखा : भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उत्तर प्रदेश के जनपद हापुड़ के असोड़ा गांव में बालकिशन सैनी रहते थे. वह खेतीकिसानी करते थे. परिवार में पत्नी निर्मला और 3 बेटे बिरजू, सुखबीर और यशवीर के अलावा 3 बेटियां थीं. सब से छोटा यशवीर था. यश पड़ने में काफी तेज था. उस का पढ़ाई में मन देख कर पिता बालकिशन और मां निर्मला काफी खुश होते थे कि कम से कम एक बेटा तो पढ़ कर अपनी जिंदगी संवार लेगा.

आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद बालकिशन ने बेटे की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीं आने दी.
यश ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में रह कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगा. बाद में उस ने वहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए कोचिंग देनी शुरू कर दी. दिल्ली में रहते यशवीर ने एलएलबी की और वकील बन गया.

कुछ ही दिनों में उस के कोचिंग सेंटर में काफी छात्रछात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आने लगे. यश का पढ़ाने का तरीका काफी अच्छा था, जिस से छात्रछात्राएं उस से पढ़ने में रुचि लेते थे.
उस के कोचिंग सेंटर में पढ़ने आने वाली छात्राओं में ममता पवार नाम की भी एक छात्रा भी थी. वह भी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में लगी थी. ममता का परिवार बागपत जिले में रहता था. उस के पिता का नाम लक्ष्मीचंद्र पवार और मां का नाम शिमला पवार था.

ममता 3 भाईबहनों में सब से बड़ी थी. पिता बड़े बिजनेसमैन थे. आगरा में उन की काफी संपत्ति थी, जिस वजह से ममता की मां शिमला आगरा में ही रहती थीं. उन का घर आगरा के थाना छत्ता अंतर्गत जाटनी के बाग के एक अपार्टमेंट में था. यह फ्लैट ममता और शिमला के संयुक्त नाम पर था.

ममता पढ़ने में काफी तेज थी. किसी भी प्रश्न के जवाब से जब तक वह संतुष्ट नहीं हो जाती, तब तक उस का पीछा नहीं छोड़ती थी. इस में यश उस की मदद करता था.

यश भी उस की उत्सुकता और पढ़ाई के प्रति अच्छा रुख देख कर खुश होता था. इसलिए वह उसे किसी भी प्रश्न का जवाब समझाने के लिए अतिरिक्त समय दे देता था. इस अतिरिक्त समय में वे दोनों ही होते थे. पढ़नेपढ़ाने के दौरान दोनों काफी खुल गए थे, इसलिए बेझिझक एकदूसरे से बातें करते थे. पढ़ाई के अलावा भी उन के बीच इधरउधर की बातें होने लगीं.

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दोनों को एक साथ रहना और बातें करना अच्छा लगने लगा. दोनों की उम्र में कोई खास अंतर नहीं था. इसलिए दोनों एकदूसरे से दोस्तों की तरह व्यवहार करने लगे. साथ समय बिताते, घूमने जाते और साथ खातेपीते.

दिल की बात की जाहिर

इस सब के चलते दोनों के दिल काफी करीब आ गए. दोस्ती से वे कब प्यार में पड़ गए, उन्हें पता ही न चला. जब दिल की धड़कनें और निगाहें उन के प्यार को जताने लगीं तब उन्हें एहसास हुआ कि वे प्यार में आकंठ डूब गए हैं. दिल की बात जुबां पर लाने के लिए दोनों की जुबान कुछ कहने से पहले ही लड़खड़ा जाती थी.

एक दिन एकांत के क्षणों में ममता मेज पर कोहनियों के बल दोनों हाथ टिकाए यश के सामने बैठी थी तो कपिल ने उस की मेज पर रखे दोनों हाथों के पंजे अपने हाथों में लिए और अपने होंठों से उन्हें चूमते हुए बोला, ‘‘ममता, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं. यह प्यार काफी दिनों से अपने दिल में छिपाए बैठा था, लेकिन तुम से इजहार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. तुम भी मुझ से प्यार करती हो कि नहीं, बस इसी ऊहापोह में हर पल गुजारता था. अब रहा नहीं गया तो तुम से अपने दिल की बात कह दी. अब तुम मेरे प्यार को ठुकराओ या स्वीकार करो, यह फैसला तुम्हारा होगा. तुम जो भी फैसला करोगी, मुझे मंजूर होगा.’’

ममता तो जैसे इसी पल के इंतजार में थी. यश ने जब उस का हाथ चूमा था, तभी समझ गई थी कि आज यश उस से अपने दिल की बात कहने वाला है. वह जान गई थी कि यश भी उस से प्यार करता है.
इसलिए मुसकराते हुए बोली, ‘‘सच कहूं, मैं तो कब से इसी इंतजार में थी कि कब तुम मुझ से अपने प्यार का इजहार करोगे. आज आखिर वह शुभ घड़ी आ गई. मैं भी तुम से बहुत प्यार करती हूं.’’ कहते हुए ममता ने यश की आंखों में झांका तो यश ने उसे झट अपने सीने से लगा लिया. यश ने उसे सीने से लगा कर सुकून की सांस ली तो ममता भी अपनी आंखें बंद कर यश के सीने में कैद दिल की धड़कनें सुनने लगी. यश की हर धड़कन में उसे अपने लिए प्यार महसूस हुआ, जिस की वजह से उस के होंठों पर प्यारी सी मुसकराहट तैरने लगी.

उन का प्यार समय के साथ और प्रगाढ़ होता गया. इस दौरान यश की नौकरी लग गई. वह मेरठ की कोर्ट में पेशकार हो गया. उधर ममता भी उत्तर प्रदेश पुलिस में सबइंस्पेक्टर के पद पर भरती हो गई.
नौकरी करते हुए भी उन की बातचीत होती रहती थी. दोनों शादी करने का फैसला कर चुके थे. लेकिन इस में जाति आड़े आ रही थी. क्योंकि यश सैनी समाज से था और ममता जाट समाज की. ममता ने अपने घर वालों से बात की तो वे यश से अंतरजातीय विवाह करने की बात पर विरोध में आ गए.

ममता ने घर वालों के विरोध के बावजूद यश से विवाह करने की ठान ली. लेकिन उसे और उस के परिवार को इस विवाह से परेशानी न उठानी पड़े, इस के लिए ममता ने यश के सामने शर्त रख दी कि उसे अपना सरनेम बदल कर पवार करना पड़ेगा और विवाह के बाद यश अपने परिवार से कोई संबंध नहीं रखेगा.
यश ने उस की शर्त मान ली और उस ने अपना नाम बदल कर कपिल पवार रख लिया. उस ने सरनेम के साथ नाम भी बदल लिया. 15 साल पहले दोनों ने विवाह कर लिया. ममता की पोस्टिंग आगरा में हो गई. दोनों के अलगअलग शहर में रहने पर परेशानी होने लगी तो कपिल अपनी नौकरी छोड़ कर आगरा आ गया.

आगरा के जाटनी के बाग के जिस अपार्टमेंट में ममता की मां शिमला रहती थी, ममता कपिल उर्फ यश के साथ अपनी मां के फ्लैट से ऊपर वाली मंजिल पर स्थित फ्लैट में रहने लगी. यह फ्लैट ममता के नाम पर था.

आगरा आ कर कपिल वकालत करने लगा. इस के अलावा वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी करता था. समय के साथ 8 साल पहले ममता ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने कन्नू रखा. इस समय कन्नू सेंट पैट्रिक्स स्कूल में पहली कक्षा की छात्रा थी.

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कपिल कुछ ही समय में वकालत के क्षेत्र में आगरा में छा गया. कई बड़े केस उस के हाथ में आ गए. उन में आगरा का बहुचर्चित जोंस मिल कंपाउंड भूमि घोटाले का मुकदमा भी था. जोंस मिल कंपाउंड की आखिरी महिला वारिस मौरिस जोन ने उसे अपना वकील बनाया था. वह कपिल को बेटे की तरह मानती थीं.

दूसरी ओर कपिल का प्रौपर्टी डीलिंग का धंधा भी खूब फलफूल रहा था. जमीन का सौदा करवाने में कपिल को जबरदस्त महारत हासिल थी. उस ने कई ऐसे सौदे करवाए थे जो विवादित थे.

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