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Women’s Day Special- पथरीली मुस्कान: भाग 2

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

संतोषी के मरद की  आवाज़ सुनते ही सहम गयी थी गौरी ,आत्मा का दर्द एक बार फिर ताज़ा हो आया था ,पहले तो छत पर ही दुबक गयी ,आँखों और मुट्ठियों को किसके भीचें ,अपने शरीर को छोटा और छोटा करते हुए पर। मिठ्ठू वाली बात ने उसके बाल सुलभ मन को थोड़ा कमज़ोर किया था पर अपनी भावनाओं पर काबू पाना शायद स्त्री जाति में प्राकृतिक गुण ही तो है.

गिद्ध ,बाज़ और मक्खी की नाक और नज़र बड़ी पैनी होती है वे अपने शिकार को सूँघ ही लेते हैं.

संतोषी का मरद भी छत पर जा पहुंचा ,उसकी आहट जान सिहर उठी थी गौरी,उसकी सिहरन अभी खत्म भी न हो पायी थी कि एक पंजा उसकी पीठ को सहलाने लगा ,गौरी अभी बच्ची थी उसका डर भी स्वाभाविक था ,पर आज जैसे ही गिद्ध ने अपनी चोंच आगे बढ़ा कर शिकार करने चाहा ,गौरी ने प्रतिरोध किया पर उसका शक्ति प्रदर्शन एक पुरुष के सामने कहाँ चलने वाला था.

अपने आपको नर्क में गिरता देख गौरी ने चाचा की कलाई पर पूरी शक्ति से काटा , एक बारगी कराह तो उठा था चाचा,पकड़ ढीली हुयी तो गौरी बेतहाशा भागी और ऐसी भागी की नीचे की सीढ़ियों की जगह छत से सीधे नीचे ही आ गिरी .

कितनी चोट लगी थी ,कितनी नहीं ,गौरी को उसका गम नहीं था पर ज़मीन पर पड़े हुए जब उसकी नज़रें छत की और गयी तो उसने चाचा को अपनी और देखता हुआ पाया और गौरी के मन में एक संतोष सा उभर आया था कि आज उसने अपनी रक्षा कर ली है.

गांव में हल्ला हो गया कि गौरी छत से गिर गयी है ,और सबसे पहले चाचा ने ही गौरी को गोद में उठाया था उसके स्पर्श में भी एक गिजगिजाहट महसूस कर रही थी वो पर पीठ में आयी चोट के कारण प्रतिरोध करते न बनता था ,

चाचा अम्मा पापा को पता नहीं क्या मनगढ़ंत कहानी बता रहा था और वो भी चाचा की बात को सच ही मान रहे थे .

पैर में आयी चोट के कारण पैर में प्लास्टर करवाना पड़ा था पर उस दिन की घटना के बाद चाचा दुबारा गौरी को छूने  हिम्मत नहीं कर पाया था.

इस घटना ने गौरी को मर्दों के प्रति अनिच्छा सी भर दी थी ,वह जब भी कोई मर्द देखती तो गौरी को यही लगता कि उसकी नज़रें उसके अंगों को टटोल रही हैं और वो अंदर तक सिहर जाती और अपने दायरे में ही सिमट कर रह जाती.

गौरी का स्कूल जाना  पैर पर प्लास्टर होने के कारण फिलहाल बंद हो गया था,पर फिर भी गौरी ने घर से ही पढाई जारी रखी और जब इम्तेहान आये तो पापा आधी बोरी हल्दी की गांठे मास्साब के घर पहुंचा आये थे जिसका नतीजा ये हुआ कि अगले दिन  मास्साब खुद ही घर आकर कॉपी लिखवाकर ले गए, गौरी से.

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गौरी ने कॉपी में जो भी लिखा था वह पास होने के लिए काफी था पर वो ज़ख्म जो चाचा ने गौरी के मन पर दे दिया था वो तो भरने का नाम ही नहीं ले रहा था.

पापा का मसाले और गल्ले का काम और बढ़ चला था ,उनके सामान को  बाज़ार तक ले जाने और फिर वहां से वापिस लाने के लिए उन्हें एक सहायक की ज़रूरत थी क्योंकि छोटा भाई अभी  छोटा था और इस लायक नहीं था कि उनके काम में सहायक हो सके.

इसलिए पापा ने एक लड़का काम के लिए रख लिया उसका नाम पारस था ,बाजार वाले दिन वो पापा के साथ ही आता जाता और थोड़ा बहुत घर के कामों में माँ को भी सहायता करता ,बेहद ही हँसमुख था वो,सबको हँसाता पर गौरी को कभी हँसी नहीं आती.

एक जीवन का पत्थर की मूर्ति में बदलना आरम्भ हो चुका था. पारस और गौरी दोनों हमउम्र थे ,इसलिए दोनों में बातचीत भी हो जाती थी ,गौरी के पैरों का प्लास्टर कटने से पहले ,एक  सुंदर फूल की आकृति उकेरी थी उसने गौरी के पैर पर चढ़े सफ़ेद प्लास्टर पर.

“अरे वाह तुम तो कलाकार भी हो”माँ ने कहा

माँ की इस बात पर बच्चों की तरह हँस दिया था पारस.

प्लास्टर काटा जा चुका था और गौरी पहले की तरह ही स्कूल आने जाने लगी थी,पर मुस्कान अब भी उसके होठों से अंजान रिश्ता ही कायम कर हुए थी.

पारस की मौजूदगी गौरी को अच्छी लगने लगी थी ,गौरी के मन में चाचा की गंदी हरकतों की वजह से पुरूष के प्रति जो नफरत भरी हुयी थी ,पारस के आने के बाद वह कम हो गयी थी.

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अब किसी दिन अगर पारस काम पर नहीं आता तो गौरी को अच्छा नहीं लगता ,और उसके आने पर वो उसे पापा के साथ काम करते हुए कनखियों से देखती रहती.

जब कभी पापा को दुकान नहीं लगानी होती तो पारस घर में रहता ,एक दिन वह छत पर पतंग उडा रहा था ,और पतंग खूब हिचकोले लेकर मानो सूरज से ही बातें करना चाहती थी

“अरे ….कैसे इतनी ऊंची पतंग उडा लेते हो तुम” गौरी अपने छोटे भाई के साथ छत पर आते हुए बोली

“कोई भी उडा सकता है”

“कोई भी …..मतलब …मैं भी”

“हाँ..हाँ क्यों …नहीं ,देखो मैं तुम्हे सिखाता हूँ….देखो ..ये डोर ऐसे पकड़नी है …और जब पतंग आसमान की तरफ जाए तो थोड़ा डोर को ढीला करना …है और फिर थोड़ा डोर को खींचना है …..और बस” पारस ने गौरी को बताया

गौरी ने डोर उसके हाथ से ले ली और अपनी ही मस्ती में पतंग उड़ाने लगी ,पारस उसकी मदद कर रहा था जबकि गौरी के  छोटे भाई को नीचे रखा मांझा लेने भेज दिया था पारस ने

जैसे ही पारस ने अकेलापन पाया ,गौरी की पीठ से चिपक गया और फुसफुसा कर बोला “गौरी में तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ….और तुमसे शादी करना चाहता हूँ”

और पारस के हाथ गौरी के सीने पर जा पहुंचे गौरी के लिए पारस के मन में भी लगाव था पर अचानक से फिर उसी घटना की पुनरावृत्ति ……..,गौरी के सामने मिठ्ठू और चाचा वाली घटना आँखों में उतर आई ,उसने  अपने को पारस की गिरफ्त से छुड़ाया तमतमाती हुयी नीचे चली आयी.

आसमान में पतंग डोर समेत लहराते हुए एक पीपल के पेड़ में जाकर अटक गयी थी.

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Women’s Day Special- पथरीली मुस्कान: भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

बचपन में ही दानव के हाथों इस राजकुमारी को भी मसल दिया गया था.

बाप और बेटी के ठहाकों की आवाज़ें किचन तक आ रहीं थी,कभी रिया फुसफुसा कर कुछ कहती तो कभी ये धीरे से ये  कुछ कहते ,और फिर अनवरत हँसी का फव्वारा छूट पड़ता.

बापबेटी अपने हँसी के समंदर में गोते लगा ही रहे थे ,कि गौरी  भी कॉफी देने कमरे में गयी तो रिया  गौरी से लिपटते हुए बोली

“अरे….माँ कभी हमारे साथ भी बैठ लिया करो और थोड़ा हँस भी लिया करो ….

आप अपने होठों को कैसे सीये रहती हो  ,मेरा तो मुंह ही दर्द हो जाये और हाँ….माँ ….आपको तो अच्छे अच्छे जोक पर भी हँसी नहीं आती है ….कैसे माँ….तुम कभी हँसती क्यों नहीं हो….?”

रिया ने बात खत्म करी तो उसके समर्थन में ये भी उतर आये , और हसते रहने के महत्व पर पूरा लेक्चर ही दे डाला.

पर फिर भी गौरी चुप ही रही रिया ने  अपने पापा की ओर देखा पर गौरी के मौन ने सब कुछ कह डाला ,और शायद ये बात विराम भी समझ गए ,इसीलिये तुरंत ही बात बदलकर रिया से उसके कॉलेज की राजनीति पर बात शुरू कर दी.

रिया जब भी कॉलेज से घर आती तो घर में ऐसा ही माहौल रहता ,पर उसके मासूम सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं होता,भला अपनी खमोशी और उदासी का क्या कारण बताती वह ,और अगर बताती भी तो पता नहीं रिया का क्या रिएक्शन होता गौरी के प्रति, इसलिए वह खामोश ही थी.

गौरी  दोबारा जब कमरे में गयी तब तक रिया टीवी पर “टॉम और जैरी ” कार्टून फिल्म देख रही थी और ठहाके लगाकर हँस रही थी,गौरी को रिया ने खींचकर अपने पास बैठा लिया और शिकायती लहज़े में माँ से बोली

“हंसो न माँ ,देखो कितना अच्छा और मजेदार कार्टून आ रहा है ,अरे….तुम तो हँसती ही नहीं, मिस सीरियस ही बनी रहती हो”

“अरे ….क्या …हँसना और न हँसना…मेरे लिए अब तू आ गयी है ना यही सबसे बड़ी खुशी की बात है …” इतना कहकर गौरी किचन में आकर काम करने लगी.

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अपने ही ख्यालों में खोयी हुई  थी गौरी कि बाहर वाले कमरे से रिया की आवाज़ आयी जो अपने पापा के साथ मार्किट होकर आने की बात कह रही थी.

मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज़ गौरी भी सुन सकती थी

” हाँ ….मिस सीरियस ही तो हूँ ….ज़िंदा हूँ …यही क्या कम है….”बुदबुदा उठी थी गौरी

गौरी ने किचन की खिड़की खोली ,सामने ही अमरुद का पेड़ था ,इस समय उस पर अमरुद भी फल हुए थे .

तभी तोतों का एक झुण्ड उड़ता हुआ आया और अमरुद के पेड़ को लगभग ढक ही लिया और सारे  तोते एक ही साथ अमरुद खाने में मगन हो गए.

ये देख गौरी को अपने मायके वाले ‘मिठ्ठू मियाँ’ की याद आ गयी और अतीत के पन्ने पलटने लगे कितने प्यार से तो पापा उसके लिए लाए थे ये तोता,और हाँ वो साथ में सुनहरा सा पिंजरा भी तो लाये थे ,जिसे देख कितना खुश हुई थी गौरी,पिंजरे में रख सारा दिन घूमती , खाने  को अमरुद और हरी मिर्च .

हरी मिर्च खाने से मिठ्ठू मियाँ  जल्दी ही राम राम बोलने लगेगा और संतोषी चाची वाला मिठ्ठू तो उनका नाम भी रटता था .

पर जब एक दिन संतोषी चाची का मिठ्ठू पिजरा खुला पाकर उड़ गया तबसे वे दुखी होकर यही कहने लगी

“अरे….इन पंछियन की जात तो बड़ी बेवफा होत है ,इनकी आँखिन में कोई प्यार ममता नाही ,एक बार उडि पावें ,फिर नाइ आवै के”

पर संतोषी चाची की इन बातों से गौरी सहमत ना होती ,उसे तो यही गुमान था कि चाहे जो कुछ हो पर उसका मिठ्ठू मियाँ तो उसको छोड़कर कहीं नहीं जा सकता.

मिठ्ठू मियाँ अब राम-राम भी बोलने लगा था और गौरी -गौरी भी ,स्कूल से आने पर गौरी अपने मिठ्ठू के पास ही जाती और खूब खेलने के बाद ही उसके पास से हटती थी.

पर उस दिन जब गौरी स्कूल से लौटी तो अम्मा और पापा भागे जा रहे थे ,गौरी के पूछने पर ये ही बताया कि गांव के कोने पर रहने वाले सरवन की मौत हो गयी है ,अभी बस वहीँ जाकर आते हैं तू घर पहुँच और रोटी पानी खा ले जाकर .

गौरी घर आयी तो मिठ्ठू मियाँ का पिंजरा खाली था, वह अपना बस्ता वहीँ गिरा कर दौड़ी और पिंजरा हाथ में ले मिठ्ठू-मिठ्ठू चिल्लाकर इधरउधर भागने लगी.

“अरे तेरा मिठ्ठू मेरे यहां उड़कर आ गया है,ले…ले आकर “संतोषी चाची के पति बोल रहे थे

“क्या….चाचा …मिठ्ठू तुम्हारे यहाँ आ गया है …कहाँ …है ,कहाँ है”कहते कहते चाचा के आँगन में आ गयी थी गौरी

“हाँ …वो देख …आँगन के कोने वाली दीवार के ऊपर”

“कहाँ ….मुझे तो नहीं दिखता”

चाचा गौरी के पीछे आकर खड़े हो गए थे और गौरी के कंधे पर हाथ रखकर बोलने लगे

“अरे ….ध्यान से देख गौ…री…”चाचा के मुंह से अस्फुट से स्वर निकल रहे थे  और उनका हाथ गौरी के हाथ से फिसलता हुआ उसके सीने तक जा पहुंचा.

अपने मिठ्ठू को अब भी ढूंढ रही थी गौरी पर अब उसके साथ चाचा कुछ ऐसा करने लगे जो उसे भी असहज हो रहा था.

क्या …ये वही काम है जो कुछ समय पहले उसके स्कूल के मास्टर ने संध्या के साथ किया था……पर वो संध्या तो मर गयी थी…..तब तो मैं भी मर जाऊंगी.

Women’s Day Special: टिट फौर टैट

पूरा जोर लगा दिया था गौरी ने ,पसीनेपसीने हो गयी ,कसमसाई भी ,चिल्लाई भी पर चाचा की गिरफ्त से आज़ाद न हो सकी .

ये बात किसी को भी बताने पर चाचा उसके छोटे भाई को मार देगा…. ऐसा बोलकर चाचा ने मासूम गौरी के मुँह पर ताला लगा दिया था

और ये ले तेरा मिठ्ठू …बिल्ली ने मार दिया था इसे मरा हुआ मिठ्ठू हाथ में ले रोती ही जा रही थी गौरी, सही कारण क्या है ये तो किसी को पता ही ना था .

अम्मा पापा यही सोच रहे थे कि मिठ्ठू के मरने से लड़की दुखी है तभी रोये जा रही है ,पर तेरह साल की गौरी को इतना तो आभास हो ही गया था कि जो भी उसके साथ हुआ है वो सही नहीं है.

वो अपना दुख कहती भी तो कैसे क्योंकि  एक तरफ तो किसी को भी बता देने पर चाचा द्वारा छोटे भाई को मार दिए जाने का डर था और दूसरी तरफ जब संध्या की वो वाली बात सभी लोगों को पता चली थी तो भी गांव वाले संध्या के माँ बाबूजी को अजीब नज़रों से देखते थे और फिर गांव वालों ने अपनी बातों से ऐसे ताने कसे कि संध्या के घर वालों को अपना सामान ले गांव ही छोड़ जाना पड़ा.

गौरी के पापा गांव की साप्ताहिक बाज़ार में मसाले और थोड़ा मोड़ा गल्ले की दुकान लगाते थे,कल  अचानक हुयी बारिश ने उनके मसालों को भिगो दिया था ,आज धूप हुयी तो माँ ने उन मसालों को छत के ऊपर सूखने को फैला दिया था और गौरी से यही छत पर  बैठने को कहा .

आज सरवन की तेरवीं थी ,घर के लोग उसके घर भोज में गए हुए थे,पता नहीं ये बात संतोषी चाची के आदमी को कैसे पता चल गयी

“गौरी….ओ ..गौरी …अरे कहा है रे तू …

देख तो तेरे लिए दूसरा मिठ्ठू लाया हूँ

Women’s Day Special- पथरीली मुस्कान: भाग 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

नीचे आकर गौरी छोटे भाई बाबू पर खूब चिल्लाई थी ,वो क्यों इतना गुस्सा कर रही थी किसी को पता नहीं था बस सबने ये ज़रूर देखा कि  थोड़ी देर के बाद पारस वहाँ से गर्दन नीची करके चला गया.

उस दिन के बाद पारस कभी नहीं वापस आया,पापा ने कुछ दिन तो इन्तज़ार किया फिर कहने लगे की “दो महीने से पगार भी नहीं दिया था पारस को , राम जाने काहे काम छोड़ कर भाग गया ,चलो कभी मैं ही उसके गाँव जाऊँगा तो उसका पता करूँगा”

पापा पारस के गांव गए भी पर वहां भी उसका कुछ पता नहीं चला .

क्या पारस और चाचा एक ही सिक्के के दो पहलू ही नहीं हैं,जब जिसको मौका मिला ,नारी देह से खेलना चाहा, क्या एक पुरुष एक लड़की में सिर्फ एक ही चीज़ को खोजता है,अपने आप से कई सवाल और बदले में कई और सवाल.

युवा होती लड़कियों में अपने अंगों के प्रति एक जिज्ञासा भी होती है और अधिक से अधिक सुंदर दिखने की चाह भी .

गौरी में ये सारी जिज्ञासाएं मर चुकी थी,वह कभी दर्पण के सामने खड़ी होकर अपने को देखती तो यही सोचती कि इससे तो अच्छा हो कि ये अंग ही कट जाएँ , खत्म हो जाएं जिन्हें देखते ही मर्द लोग लार चुआने लगते है, न उन्हें रिश्ते नातों का भान रहता है और ना ही समाज की कोई चिंता ,उन्हें तो बस स्त्री की देह से ही सरोकार है,कहीं न कहीं सभी मर्दों के प्रति एक ही राय कायम कर ली थी गौरी ने.

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गांव की बाहरी सड़क को हाईवे में बदला जा रहा था ,काम जोर शोर से चल रहा था ,इसी नाते शहर से बाबू और इंजीनियर लोग गांव में आतेजाते रहते थे.

गांव के पास हाईवे का निर्माण होना सारे गांव के लिए  कौतूहल का विषय था ,सुबह शाम गांव वाले लोग अक्सर देखने पहुँच जाते कि सड़क निर्माण का काम कैसे होता है .

अपनी सहेलियों के बहुत कहने पर गौरी भी एक दिन हाईवे देखने चली गयी थी ,वहाँ पर एक सजीला सा नौजवान भी था जो तीन टांगों पर लगे एक दूरबीन नामक यंत्र से कुछ देखता था ,गांव की लड़कियों ने भी उस दूरबीन से झाँकने की  इच्छा प्रकट करी ,बारी बारी से सब लड़कियों ने उसमे झाँका,पर गौरी बुत बनी खड़ी रही.

उस सजीले नौजवान को बहुत कुछ अच्छा लग गया था गौरी में.

दो दिन बाद ही वह इंजीनियर  गौरी का हाथ मांगने ही उसके  घर चला आया.

“मैं आपकी बिटिया से शादी करना चाहता हूँ ”

“पर बेटा तुम तो शहर के इतने बड़े बाबू ,और हमारी बिटिया बारह तक ही पड़ी है ,तुम काहे ब्याह करोगे उससे”पापा ने चौककर कहा

“जी….वो बात सही है ,पर मैंने हमेशा गौरी की तरह ही सीधी सादी लड़की चाही है ,ताकि वो मेरे माँ और पापा का ध्यान रख सके” वो इंजीनियर बोला जिसका नाम विराम था

अम्मा पापा भी गौरी को एक बोझ ही मानते थे और बोझ सर से जितना जल्दी उतर जाए उतना अच्छा.

कहते हैं कि जोड़े स्वर्ग  से ही बनकर आते हैं ,कम से कम गौरी के संदर्भ में तो यही बात सही लग रही थी और सारे गांव वाले चकित थे कि गौरी की शादी शहर में वो भी एक इंजीनियर के साथ ,अब तो मोटर में ही घूमेगी गौरी.

और आखिर वो दिन भी आ गया जब गौरी की शादी विराम से हो गयी

खुद गौरी को भी समझ नहीं आया ये सब कैसे और अब हो गया ,एक गांव की लड़की अब इतने बड़े घर में रहेगी.

शहर में दोमंजिला मकान था , और गौरी नयी बहू , छम छम करती कभी इस कमरे तो कभी उस कमरे में पतंग सी लहराती फिरती

बडी भाभी मौका मिलते ही उझसे चुहलबाज़ी करने में पीछे न हटतीं,रात में क्या -क्या हुआ जैसी बातें पूछती और फिर गौरी के गाल पर एक प्यारी सी चपत लगाकर हँसती हुयी चली चली जातीं.

ये सच था कि गौरी के अंदर भी एक स्त्री के सारे गुण थे,एक लड़की का संसार जिसमे गुड्डे गुड़ियों के खेल होते है ,परियां होती हैं और हाँ एक सुंदर सजीला राजकुमार भी तो होता है जो अपनी राजकुमारी को घोड़े पर बिठा अपने देश को उड़ जाता है.

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जहाँ परियाँ होतीं हैं ,राजकुमार होता है वहां पर एक दानव भी तो होता है ना…..

वो दानव जो राजकुमारी को सोने के पिंजरे में बंद कर लेता है और तरह तरह के आघात करता है.

बचपन में ही दानव के हाथों इस राजकुमारी को भी मसल दिया गया था,कोमल मन और तन पर पड़े इस आघात से हमारी राजकुमारी गौरी ने भी अपने ह्रदय को सिर्फ जीवन चलाने भर का ही अधिकार दे रखा था अब ह्रदय में कोई भाव ,अनवरत हँसी ,मुस्कराहट ,प्रेम आदि के लिए कोई स्थान न था.

गौरी तो बस एक नदी की तरह बही जा रही थी ,एक ऐसी नदी जिसे अपना गंतव्य भी नहीं पता था ,उसे तो बस बहने के लिए ही बहना था

और ऐसे में रात की बातों को लेकर भी गौरी के मन में कोई उत्साह नहीं बचा था बल्कि जब भी विराम रात को उससे प्रेम करते ,उसे सहलाते ,चूमते तब अपने में ही सिमट जाती गौरी, कमल की तरह अपनी पंखुड़ियों को समेट लेती गौरी और  उसके अंग प्रत्यंग पत्थर की तरह सख्त हो जाते ,बंद आँखों में चाचा के गंदे स्पर्श की पुनरावृत्ति सी गुज़र जाती और उसके बाद वो सब असहय हो जाता गौरी के लिए और फिर विराम के साथ यात्रा में एक भी कदम आगे न बढ़ाया जाता उससे.

शुरुआत में जब ऐसा हुआ तो विराम ने सोचा कि गांव की सीधी सादी लड़की है ,शायद मन की झिझक के कारण मुझे रोक देती है और यह सोच अपने मन को मार लिया .

पर यह एक कुंवारी लड़की द्वारा किया जाने वाला अभिनय नहीं था बल्कि यह तो एक सच्चाई थी ,कली को खिलने से पहले ही मसला जा चुका था ,तितली के रंगीन परों पर तेज़ाब छिड़का जा चुका था. प्रेम में जब निरंतर पत्नी का सहयोग ना मिला तो वह बिफर पड़ा.

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“ये तुम इतना सती सावित्री बनने की कोशिश क्यों करती हो ,जो मैं कर रहा हूँ ये कोई गलत काम नहीं ,बल्कि प्रेम का एक मार्ग है और ये सब भी परिवार को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी है और फिर मैं तुम्हे भगाकर तो लाया नहीं जो तुम इतना शर्माती हो, शादी करी है मैंने तुमसे”

Women’s Day Special- पथरीली मुस्कान: भाग 4

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

गौरी चुपचाप सब सुन लेती ,बहस करने उसने सीखा नहीं था और सच बताने का मतलब था उसकी अपनी ही दुनिया में आग लगाना.

अपनी इस परेशानी को दोस्तों से भी विराम ने शेयर किया था , दोस्तों ने हसते हुए यही बताया कि तू उसकी शर्म को खत्म कर ,थोड़ा मोबाइल पर सेक्स वेक्स दिखाया कर ,कुछ दिन बाद सब नॉर्मल हो जायेगा.

रात को बिस्तर में विराम ने मोबाइल ऑन किया और  गौरी के बालों को सहलाते हुए मोबाइल पर एक पोर्न फिल्म चला दी ,विराम को लगा कि इससे गौरी की सोयी इच्छाएं जाग जाएंगी .

इच्छाएं अगर सोयी हो तो वे जाग सकती हैं पर उन इच्छाओं का क्या जो मर ही चुकी हों.

पति की खुशी के लिए मोबाइल पर आँखे गड़ाई रही गौरी पर उसके शरीर में कोई हरकत नहीं हुई .

मन ही मन झुंझुला पड़े थे विराम ,मोबाइल बंद करके रख दिया  और करवट बदल कर लेट गए.

गौरी के मन पर जो कुठाराघात हुआ था उससे उसकी सम्वेदनाएँ ही तो मरी थी, बाकी तो वह एक सम्पूर्ण स्त्री थी और जब गौरी के स्त्रीत्व को  उसके जीवन पुरुष विराम का साथ मिला तो वह माँ बन गयी.

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एक माँ “माँ बनकर ही एक स्त्री पूर्ण होती है ” यही तो उसकी दादी अक्सर कहा करती थी

आब गौरी की समझ में आ गया था,नन्ही बिटिया की देखभाल में कब दिन पंख लगाकर उड़ने लगे उसे पता ही न चला.

विराम के घरवालों ने भी गौरी का खूब ध्यान रखा ,उनकी बहू ने लक्ष्मी को जन्म जो दिया था.

संवर की देखभाल के बाद शरीर की आभा देखते ही बनती थी गौरी की ,अपने आपको आईने में देखा ,पता नहीं कितने दिनों के बाद उसे कुछ अच्छा सा लगा ,मुस्कुराने की कोशिश भी करी पर असफल ही रही वो ,किसी ने मानो उसके होठों पर सिहरन आने से पहले ही उन्हें सी दिया हो और कह दिया हो कि नहीं गौरी नहीं तुझे तो हँसने का अधिकार ही नहीं है.

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बेटी रिया के जनम के आठ महीने हो चुके थे और अब तो विराम ने भी महीनो से गौरी से शारीरिक मिलन की कोई इच्छा नहीं ज़ाहिर करी थी बल्कि वे तो और भी शांत हो गए थे ,शायद काम ज्यादा था ,रोज़ ही देर रात गए आते और चुपचाप सो जाते.

सभी घर वालों का प्यार देख गौरी बहुत खुश थी ,एक अच्छा पति ,एक नन्ही बिटिया ,और जीने को क्या चाहिए था.

पर अपने पति का सेक्स में साथ न दे पाने और उन्हें संतुष्ट न कर पाने का मलाल गौरी को अब भी था,पर वो अपने स्वभाव से विवश थी वो स्वभाव जो उसने नही बनाया था बल्कि इस समाज ने उसे दिया.

गौरी को नींद नहीं आ रही थी,उसने हाथ लगाकर रिया को छुआ  तो पाया कि रिया ने बिस्तर गीला कर रखा था, उसका डायपर बदलना था सो गौरी उठने लगी ,बिजली नहीं थी ,विराम का मोबाइल उठाकर ,मोबाइल की टॉर्च जलाई और रिया का डायपर बदलकर जैसे ही मोबाइल की टॉर्च बंद करी तो मोबाइल पर एक वीडियो ,गौरी की उंगली के स्पर्श से प्ले होने लगा जिसे शायद विराम रात में देखते देखते ही सोये थे और उसका बैक बटन दबाना भूल गए थे और इसलिए टॉर्च जलने के बाद बंद करने के उपक्रम में वह वीडीयो चलने लगा था.

क्या ये विराम हैं ……..हाँ विराम ही तो हैं…

गौरी की आँखें हैरत से फैल गयी थी. विराम इस वीडियो मे एक महिला के साथ संभोगरत थे और वह महिला पूरा साथ दे दे रही थी, और विराम द्वारा अपना ही वीडीयो बनाये जाने पर बनावटी नाराज़गी भी  ज़ाहिर कर रही थी ,और अब तो विराम के कहने पर उसने उत्तेजनात्मक सिसकियाँ भी भरना शुरू कर दी थी.

गौरी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली, वीडीयो की आवाजों से विराम हड़बड़ाकर जाग गए ,और लपककर मोबाइल गौरी के हाथों से छीन लिया.

शायद विराम शर्मिंदा थे पर एक पुरुष के अहंकार ने उनकी शर्म को क्रोध का जामा पहनाने मे देर न करी.

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“अरे…ऐसे क्या देख रही हो ….मैं एक जवान मर्द हूँ,मेरी भी कुछ इच्छाएं हैं ,जब घर में खाना नहीं मिलेगा तो आदमी बाहर का ही खाना तो खायेगा न”.

हाँ पुरुष प्रधान इस दुनिया में  बाहर का खाना खाने का अधिकार पुरुष को ही ससम्मान दिया गया है ,महिला नज़र भी उठा ले तो वह पापी है

और इस दुनिया में चाचा जैसे  पुरुष भी हैं

विराम जैसे भी और पारस जैसे  भी

आँगन में बाप बेटी के ठहाको की आवाज़ें फिर से आने लागी थी ,गौरी भी  चाय लेकर वहां जा पहुंची,रिया माँ को देखकर फिर बोल पडी

“अरे…आओ माँ ….पर रोनी सूरत क्यों बना रखी है….

कभी मुस्करा भी दिया करो माँ….”

गौरी चाय कपों में डाल रही थी ,उसने एक नज़र विराम की तरफ देखा उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था ,गौरी ने मुस्करा दिया .

गुड़िया और गुड्डे ,दानव ,सजीला राजकुमार ,सोने का पिंजरा सभी को चीनी के साथ घोलती जा रही थी गौरी.

कोई स्त्री हँसने का अपना सहज स्वभाव यूँ ही नहीं भूलती, कोई स्त्री बात बात में यूँ ही नहीं ड़ो पड़ती जिस स्त्री ने बचपन में ही यौन उत्पीड़न को महसूस किया हो… वो अपने आप में ही सिमटकर रह जाती है और कभी खिल नहीं पाती, खुल नहीं पाती, बोल नहीं पाती हमारी गौरी की तरह.

Crime: छत्तीसगढ़ में उड़ते नकली नोट!

छत्तीसगढ़ में नकली नोटों के कई प्रकरण सामने आ रहे हैं. खास बात यह कि इस में युवाओं की भागीदारी ज्यादा दिख रही है जो एक चिंता का सबब हो सकती है. और यह संकेत भी कि किस तरह देश में बेरोजगारी का भयावह समय आ गया है कि नवजवान युवक किस तरह जीवन यापन के लिए नकली नोटों के गैरकानूनी धंधे में लग गए हैं.

शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि नकली नोट का यह धंधा कितना अहितकारी हो सकता है.

इस रिपोर्ट में नकली नोट में संलिप्त पाए गए लोगों के सच को आपके सामने प्रस्तुत करने का एक प्रयास इस रिपोर्ट में करते हैं.

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पहला घटनाक्रम-

औद्योगिक नगर कोरबा के एक बाजार में दो युवक पहुंचे और सौ का नोट देकर 10 रूपए की सब्जी खरीदने का प्रयास किया. दरअसल, नोट नकली था और 10 रुपये की सब्जी खरीदने पर 90 रुपये हासिल करने की नीयत से आए थे. नकली नोट खपाने में सफल नहीं हुए और देखते ही देखते सब्जी विक्रेताओं ने उन्हें घेर लिया. माहौल विपरीत देख युवक वहां से नौ दो ग्यारह हो गया. मगर उसका एक साथी पकड़ा गया उसके पास से 100 के दो नकली नोट मिले.

द्वितीय घटनाक्रम-

छत्तीसगढ़ के आदिवासी जिला पेंड्रा मरवाही में कुछ आदिवासी युवक जोकि कंप्यूटर फोटोकॉपी की दुकान चलाया करते थे. इन लोगों ने एक दिन फोटोकॉपी मशीन से सौ रूपए के नकली नोट प्रिंट निकाल लिए और उन्हें बाजार में चलाने लगे और आखिरकार पकड़े गए.

तृतीय घटनाक्रम-

जिला चांपा जांजगीर में युवकों ने कलर फोटोकॉपी मशीन से 500 के नकली नोट छापे और बाजार में सामानों की खरीदी शुरू की एक दिन पकड़े गए और आज जेल की हवा खा रहे हैं.

कुछ घटनाक्रमों के बिनाह पर कहा जा सकता है कि कुछ तो अज्ञान लापरवाही और कुछ पैसों की जरूरत के कारण आज का युवा भारतीय मुद्रा का गैर कानूनी रूप से प्रिंट करके सीधे-सीधे अपने जीवन को दुश्वारियों में डाल रहा है.

महिलाओं में पैसे बांटे!

कुछ चतुर सुजान ऐसे भी होते हैं. जो शहर से ग्रामीण अंचल में पहुंचकर नकली नोटों का धंधा अलग-अलग ढंग से करने लगते हैं. छत्तीसगढ़ के कोरबा जिला के पसान थाना अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में “महिला समूहों” को लोन देने के प्रोसेसिंग फीस के बहाने 96 हजार लेकर एक युवक 8 लाख के नकली नोट थमा गया था. शिकायत की सच्चाई सामने आने के बाद पसान पुलिस की टीम ने उसे पेंड्रा के बचरवार गांव से गिरफ्तार किया.

घटनाक्रम के अनुसार लैंगा गांव में 3 हफ्ते पहले बाइक पर पहुंचे दो युवकों ने स्वयं को लोन बांटने वाली एक कंपनी का कर्मचारी बताते हुए महिला समूह को बिना ब्याज के लोन देने का झांसा दिया था. इसके बाद 22 महिलाएं 5 समूह बनाकर लोन लेने को तैयार हो गईं. बाद में उनमें से एक युवक ने गांव पहुंचकर महिलाओं से कंपनी में स्वीकृत लोन के बदले 10 प्रतिशत रकम प्रोसेसिंग फीस जमा करने के बहाने उनसे 96 हजार लिए. वहीं सभी समूह को 2-2 हजार के नकली नोट से भरा लिफाफा थमाया. महिलाओं ने जब लिफाफा खोला तो उसमें 2 हजार के सभी नोट नकली थे. इस तरह 5 समूह को 8 लाख के नकली नोट थमाकर युवक 96 हजार के असली नोट ले भाग गया. पसान पुलिस ने धोखाधड़ी व नकली नोट चलाने का मामला दर्ज किया. जांच के दौरान टीम बिलासपुर जिले के पेंड्रा थाना अंतर्गत बचरवार गांव पहुंची, जहां घेराबंदी करके रवि गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया. जो कहानी सामने आई है उसके अनुसार आरोपी अपने साथी के साथ मिलकर कंप्यूटर से स्केनिंग करके नकली नोट तैयार करता था. आरोपी ने आश्चर्यजनक तरीके से 1 करोड़ रुपए का नकली नोट खपाना स्वीकार किया है.

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युवा नकली नोटों के अपराध में क्यों है संलिप्त ?

दरअसल, जितने भी प्रकरण नकली नोट के संचार के संदर्भ में सामने आ रहे हैं, उन में युवाओं की भागीदारी अत्यधिक है. यह संकेत देती है कि युवा आज किस तरह भ्रमित है और रूपए के कारण कानून को अपने हाथ में लेकर अपना भविष्य अंधकार मय बना रह है.

कोरबा जिला में नकली नोट खपाने का प्रयास करते युवकों को सब्जी व्यवसायियों ने पकड़ा था. इस नकली नोटों के कारोबार में पुलिस ने रमेशर अमलेश पिता स्वर्गीय नोहर सिंह एवं गुलाब अहिरेश पिता अंतराम दोनों निवासी ग्राम रटगा थाना मरवाही जिला गौरेला पेंड्रा मरवाही के कब्जे से 17500 के नकली नोट बरामद किया था. आरोपितों ने पूछताछ में जानकारी दी थी कि पेंड्रा मरवाही में राठ गांव गांव में रहने वाला राय बहादुर पिता मथुरा प्रसाद कलर प्रिंटर से नोट छाप पर उन्हे खपाने देता था पुलिस ने मामला पंजीबद्ध कर आरोपितों को न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया . फरार मास्टरमाइंड आरोपी राय बहादुर को पुलिस तलाश रही थी. वह लुक छिप कर यहां वहां भाग रहा था, इस बीच आरोपित के संबंध में जानकारी साइबर सेल ने हासिल की.इसमें आरोपित का वर्तमान लोकेशन जिला त्रिशूर केरल में होना पाया गया. और जैसा कि बार-बार यह सत्य सामने आता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं पुलिस ने आरोपी को अंकिता धर दबोचा.

नकली नोटों के इस खेल में युवाओं की भागीदारी के संदर्भ में पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा के मुताबिक दरअसल युवा जहां कानून की जानकारी के अभाव में नकली नोटों का कारोबार करने लगते हैं वहीं उन्हें यह भी अति एहसास रहता है कि वह कभी पकड़े नहीं जाएंगे. मगर उन्हें कोई बताने वाला नहीं होता कि कानून के हाथ कितने लंबे होते हैं और अपराध का सबक आखिरकार मिलता ही है.

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ऐसे में घर के बड़े बुजुर्गों को सदैव सचेत रहना चाहिए और युवा होते बच्चों को कानून का ज्ञान कराना चाहिए. ताकि उम्र की इस युवा दहलीज पर उनके पांव अपराध की ओर ना बढ़ जाए.

Serial Story- कितने झूठ: भाग 2

‘‘हांहां, इतवार है न, कोई आ न जाए?’’ कह कर उस ने अलमारी से धुले व इस्तिरी किए हुए परदे निकाल कर महरी को दे दिए और वह दरवाजेखिड़कियों के परदे बदलने लगी.

अकसर इतवार के दिन उस की दृष्टि परदों पर चली जाती और वह सुधा से कह कर परदे बदलवा देता. वह कहता, ‘कोई आ न जाए?’

‘लेकिन हम घर पर रहेंगे ही कहां?’

‘मां के घर दोपहर का भोजन कर के हम सीधे यहां आ रहे हैं.’

‘आज तुम नाटक देखने नहीं चलोगे?’

‘नहीं, आज तो भीड़भाड़ होगी और टिकट भी नहीं मिलेगा.’

‘यह नाटक सिर्फ आज भर होगा.’

‘हफ्ते में एक दिन ही तो मिलता है. उस दिन भी तुम भागमभाग करने के लिए कहती हो.’

‘तुम ने पहले ही बता दिया होता तो मैं कल ही हो आती.’

‘आइंदा तुम शनिवार के दिन ड्रामा देख लिया करो.’

‘और इतवार के दिन?’

‘पूरा आराम.’

इतवार के दिन वह या तो मेहमानों या सुधा के साथ हंसबतिया लेता या फिर सारा दिन लेटा रहता. सुधा कोई न कोई नाटक पढ़ने लगती.

एक दिन उस ने सुधा से कह दिया, ‘तुम किसी नाटक में अभिनय क्यों नहीं कर लेतीं?’

‘कोई अच्छा नाटक मंचित होता है तो उसे दिखाने तो चलते नहीं, अभिनय करने दोगे तुम?’

‘सच, तुम अगर स्टेज पर काम करो तो मैं तुम्हारा नाटक देखने जरूर आऊंगा.’

‘लेकिन मुझे नाटक खेलना नहीं, देखना अच्छा लगता है. कालेज के दिनों में भी मैं हर नाटक देखने के लिए सब से आगे की सीट पर बैठती थी. लेकिन समय के चक्कर में सबकुछ छूटता चला गया.’’

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‘अब भी मैं तुम्हें जाने से तो मना नहीं करता.’

‘लेकिन तुम साथ तो चलना पसंद नहीं करते.’

‘जाने क्यों नाटक मुझे पसंद ही नहीं आते. हां, फिल्म कहो तो…’

‘चलो, फिल्म ही सही.’

‘मतलब, आज फिल्म देखे बगैर नहीं रहोगी?’

‘नहीं, अगर तुम नहीं चाहते तो…’

‘नहीं, हम चल रहे हैं.’

‘कपड़े बदल लूं.’

‘हांहां.’

झट उस ने वार्डरोब खोला. ‘कौन सी साड़ी पहनूं?’

‘कोई भी.’

‘नहीं. तुम बताओ न.’

‘वह फालसई रंग की साड़ी पहन लो.’

‘तुम्हें हल्के शेड्स पसंद हैं न?’

‘हां.’

वह झट हाथमुंह धो आई और कंघी उठा कर बाल संवारने लगी. उस ने उस के बालों की एकाध लट उस के गाल पर बिखेर दी औैर उस की छवि निहारने लगा.

सुधा प्रसन्न हो कर बोली, ‘जानते हो, जब भी तुम मुझे इस तरह सजानेसंवारने लगते हो तब मुझे बेहद खुशी होती है. तुम्हारी इच्छाएं पूरी होती रहीं तो मैं अपनी जिंदगी सार्थक समझ लूंगी.’

‘‘मैं जाऊं?’’ महरी की आवाज सुन कर उस की विचार तंद्रा टूटी. बोला, ‘‘तुम्हारा काम खत्म हो गया?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो जाओ.’’

‘‘एक बात कहूं, साहब?’’

‘‘कहो.’’

‘‘जब तक बीबीजी नहीं लौटतीं तब तक आप अपनी मां के पास क्यों नहीं चले जाते? यहां तो आप को खानेपीने की भी दिक्कत होती होगी.’’

‘‘मां के पास?’’ अरे, हां, मां के पास रसोई के वक्त चले जाओ तो मां नाराज होती हैं, ‘हफ्ते में एक दिन तो आते हो और तब भी दोचार घड़ी चैन से बैठ कर बातचीत भी नहीं करते.’

कभीकभी सुधा खाने के तुरंत बाद फिल्म के लिए निकल आती तो मां खीझ उठतीं.

वह झट नहा कर और फिर कपड़े बदल कर घर से निकलना ही चाहता था कि फिर आवाज आई, ‘‘बीबीजी, कपडे़.’’

उस ने दरवाजा खोला. सामने एक औरत एक छोकरे के साथ खड़ी थी, जिस के सिर पर एक टोकरा रखा था. उस में स्टील के बरतन आदि और कपड़ों की एक गठरी रखी थी.

वह बोली, ‘‘बीबीजी नहीं हैं?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘कहा था, कुछेक पुराने कपड़े निकाल कर रखूंगी.’’

‘‘वह तो नहीं है.’’

‘‘कहीं गई हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘कब आएंगी?’’

उस ने चीख कर कहना चाहा, ‘अब वह यहां नहीं आएगी. हां सिर्फ वह रहता है वह. कोई सुधा नहीं रहती.’ लेकिन वह बोला नहीं. चुप रहा. पुराने कपड़े वाली अपने छोकरे के साथ चली गई. उस ने सोचा, ‘अब और वह घर पर बैठा रहा तो कोई न कोई सुधा को पूछता हुआ चला आएगा और उस के अचानक चले जाने का एहसास दिलाता रहेगा. कितना बड़ा झूठ छोड़ गई है सुधा अपने पीछे. यहां न लौटने का निश्चय कर के भी वह इन सब लोगों को अपने लौटने का यकीन दिला गई है. यहां न होते हुए भी यहां होने का एक एहसास छोड़ गई है.’

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जब वह मां के यहां पहुंचा तब बूंदाबांदी होने लगी थी और बरामदे में बैठी मां तेजतर्रार आवाज में पिताजी को जलीकटी सुना रही थीं.

‘‘अब बस भी करो, मां,’’ आदर्श मां को समझा रही थी.

‘‘नहीं, मैं ने बहुत झेला है, अब और नहीं झेल सकती,’’ कह कर मां अपना पुराना राग अलापने लगीं जो वे कईर् बार सुना चुकी हैं.

पापा अब तक चुप थे. लेकिन अब भड़क उठे और किसी गरजतेबरसते बादल की तरह मां के इर्दगिर्द मंडराते हुए ऊंचनीच सुनाने लगे.

‘‘पापा, आज भैया के सामने तो चुप रहिए,’’ आदर्श गिड़डि़ाई.

‘‘अरे, तेरा भैया पराया थोड़े ही है. तू उसे डबल रोटी का उपमा खिला दे. आज मुझे इन से निबट लेने दे.’’

वह आदर्श के साथ दूसरे कमरे में चला गया. मां और पापा दोनों एकदूसरे से ऐसे झगड़ने लगते हैं जैसे अब वे एकदूसरे के साथ नहीं रह पाएंगे. लेकिन थोड़ी देर बाद वे फिर हंसनेबतियाने लगते हैं. अपने मांपापा का यह धूपछांही रंग उस की समझ में नहीं आता.

‘‘बात क्या हुई थी?’’

‘‘मां को एक लड़का पसंद आ गया और वे मेरे हाथ पीले करना चाहती हैं. लेकिन पापा चाहते हैं कि मैं कम से कम डिगरी तो ले लूं. लेकिन मां को डर है कि कहीं मैं भी तुम्हारी तरह प्रेमविवाह न कर लूं,’’ कहतेकहते आदर्श का चेहरा तमतमा आया.

उस ने आहत भाव से आदर्श को देखा.

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‘‘कभीकभी लगता है, भैया, तुम ने अच्छा ही किया. तुम इस लड़ाईझगड़े से दूर रहे हो. ऐसा दिन नहीं बीतता जिस दिन खटपट न होती हो.’’

उस ने कोई जवाब नहीं दिया. सिर्फ मूकभाव से खिड़की से आसमान को देखने लगा. बाहर 2 बडे़बडे़ बादल आपस में टकराए. जोरों की गड़गड़ाहट हुई और मामूली सी झड़ी ने मूसलाधार बारिश का रूप ले लिया.

‘‘भैया, इस बार भी सुधा को नहीं लाए?’’उस ने अचकचा कर आदर्श की ओर देखा.

‘‘क्या बात है, भैया, तुम आज कुछ उदासउदास से हो?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘अरे, मैं तो भूल ही गई. मां ने तुम्हें उपमा देने के लिए कहा था,’’ कह कर आदर्र्श चली गई.

जहां वह बैठा था, खिड़की से वहां तक बौछार आने लगी थी और वह उस हलकी सी फुहार से भीग कर एक सुखद झुरझुरी सी लेने लगा. सुधा से मुलाकात के प्रथम महीनों से भी वह ऐसी ही सुखद झुरझुरी से भर उठा था.

खंजन सी आंखें, चौड़ा चेहरा, दरमियाना कद, गोरीचिट्टी, हंसे तो हरसिंगार के फूल झड़ जाएं. किसी पार्टी में उस की एक झलक पा कर वह उसे पाने के लिए उन्मत्त सा हो उठा था. किसी तरह परिचय कर के उस ने उस से पहले दोस्ती की और फिर शादी करने का प्रस्ताव रख दिया था. लेकिन मां बौखला उठी थीं. जहर खा कर मरने की धमकी देने लगी थीं.

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पर वह अपने निर्णय से डिगा नहीं और पापा ने कह दिया था कि उस से संबंध जोड़ने से पहले तुम्हें हमारे साथ संबंध तोड़ना पड़ेगा.

विवश हो उस ने कोर्टमैरिज कर ली थी. उस शादी में सिर्फ सुधा के मांबाप और रिश्तेदार शामिल हुए थे. उस के घर वालों की तरफ से कोई नहीं आया था. एक साल तक वह उन से अपनेआप को बेहद कटाकटा सा महसूस करता रहा था. फिर जब उसे निमोनिया हो गया था तो मां दौड़ीदौड़ी आईर् थीं और उस की तीमारदारी में लग गई थीं. उस के बाद हर इतवार को यहां आ कर दोपहर का भोजन करने का सिलसिला चालू हुआ था.

‘‘यह लो उपमा, मां ने तुम्हारे लिए ही बनाया है,’’ आदर्श ने उसे एक प्लेट देते हुए कहा.

उपमा खातेखाते उस ने पूछा, ‘‘हर्ष कहां गई है?’’

‘‘ट्यूशन पढ़ने.’’

‘‘और नवीन?’’

‘‘क्रिकेट मैच खेलने. मैं ने तो बहुत कहा कि बारिश के आसार हैं, मत जाओ. मगर वह माना ही नहीं.’’

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वह धीरेधीरे उपमा खाने लगा. लेकिन लग रहा था जैसे वह दूर कहीं खोया हुआ है.

‘‘तुम खुश तो हो न, भैया?’’

‘‘हूं, क्यों, क्या बात है?’’

‘‘नहीं, यों ही पूछा.’’

उस ने अर्थभरी दृष्टि से देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें सुधा तो नहीं मिली थी?’’

‘‘मिली तो थीं.’’

वह उठ कर व्यग्रभाव से टहलने लगा और बारबार आदर्श को जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से देखने लगा.

‘भैया, मैं ने तुम्हें परेशान कर दिया?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ कह रही थी वह?’’

‘‘पहले तुम यह बताओ कि उस दिन क्या हुआ था?’’

‘‘किस दिन?’’ तपाक से उस ने पूछा.

‘‘जिस दिन तुम दोनों नवीनचंद्र के बेटे की शादी में गए थे.’’

‘‘यह तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘फिर तो सुधा ने तुम्हें सबकुछ बता दिया होगा?’’

‘‘सुधा ने जो कुछ बताया वह बाद में बताऊंगी. पहले तुम यह बताओ कि उस दिन क्या हुआ था?’’

‘‘उस दिन, हम दोनों सजधज कर नवीनचंद्र के बेटे की पार्टी में गए थे और हमें जिस युवक ने आइसक्रीम ला कर दी, सुधा उसी को एकटक देखने लगी. वैसे, वह युवक था भी स्मार्ट और गोराचिट्टा. उस की कालीकाली आंखें बेहद चमक रही थीं और उस के घने काले बाल देख कर ऐसा लगता था जैसे उस ने कनटोप पहन लिया हो,’’ कहतेकहते वह अचानक रुक गया. एक क्षण के बाद फिर बोला, ‘‘वह आइसक्रीम दे कर चला गया और हाल में दूसरों को आइसक्रीम देने लगा. लेकिन मैं ने गौर किया कि सुधा की नजरें बारबार उसी को ढूंढ़ रही हैं. जब वह दोबारा हमारे पास आइसक्रीम ले कर आया तो हम ने उसे मना कर दिया. लेकिन सुधा उस से एक और मांग बैठी. वह लेने चला गया.

‘‘मैं ने सुधा से पूछ लिया, ‘तुम इसे जानती हो?’’’

‘‘वह जैसे घबरा गई. ‘नहीं, नहीं तो.’

‘‘मैं ने सोचा, वाकई शायद नहीं जानती होगी और मैं अपने मित्र के साथ बातचीत करने लगा. वह भी अपनी सहेली के साथ गपें मारने लगी. इतने में वही युवक आइसक्रीम ले आया और सुधा की सहेली उसे देख कर जैसे चहक उठी, अरे, यह तो तेरा जीवन है.

‘‘युवक शायद परेशान हुआ. ‘आप कुछ लेंगी?’ उस ने सुधा की सहेली से पूछा. ‘मेरे लिए भी एक आइसक्रीम ला दीजिए.’ वह युवक चला गया.

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‘‘‘सुधा, तू तो कहती थी कि…यह जीवन कहां से आ गया?’

‘‘मैं ने उन की बातचीत के यही टुकड़े सुने. मेरे अंदर कुछ दरक सा उठा. मैं सोचने लगा, न जाने आज तक सुधा कितने झूठ बोलती रही है मुझ से. मुझे कुछ भरभरा कर बहता हुआ सा महसूस हुआ. फिर भी मैं ने उस से कुछ नहीं कहा. सोचा, घर चल कर उस से पूछूंगा कि यह जीवन कौन है? कब से जानती है वह उसे? लेकिन घर पहुंचते ही मेरा विचार बदल गया और मैं ने सोचा कि देखें कब तक वह इस झूठ पर परदा डाले रखती है.

‘‘मेरे मन में एक ज्वालामुखी सा धधक रहा था और मैं उस के फटने की आशंका से चुप रह गया. अंदर ही अंदर घुटता रहा. लेकिन मैं ने कुछ नहीं कहा. 2 दिन संवादहीन स्थिति को जीते हुए बीत गए और ऐसा लगा जैसे हम दोनों के बीच शीशे की दीवार बन गईर् है. आखिर तीसरे दिन सुधा ने वह शीशे की दीवार तोड़ दी और मुझे ऐसा लगा जैसे कांच के अनगिनत टुकड़े मेरे सारे बदन में चुभ गए हैं.

‘‘सुधा ने मुझ से कहा, ‘तुम अंदर ही अंदर क्यों घुट रहे हो, यह मैं जानती हूं. चाहा था जिस बात पर परदा पड़ता आया है वह तुम्हें बताऊं ही नहीं, लेकिन अब बगैर बताए रह नहीं सकती. एक छोटे झूठ की वजह से हमारे बीच जो यह दरार सी पड़ गई है वह शायद मेरे सच बताने से पट जाए. वैसे, उम्मीद कम है. लेकिन फिर भी मैं आज सारी हकीकत बता देती हूं.

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‘‘ ‘जिस ने मुझे आइसक्रीम दी थी वह जीवन नहीं, उस का भाई है. वह युवक भी हूबहू जीवन जैसा लगता है, वैसा ही स्मार्ट, गोराचिट्टा, चमकती आंखें और कनटोप जैसे घने काले बाल. जीवन मेरे साथ कालेज में पढ़ता था. उसे स्टेज का बहुत शौक था. कालेज के हर ड्रामे में वह जरूर हिस्सा लेता था और मैं उस की थर्राती आवाज के जादू से सम्मोहित थी. जब भी उस का नाटक होता तब मैं सब से आगे जा कर बैठ जाती थी और नाटक खत्म होने के बाद सब से पहले उसे फूल भेंट कर उस के अभिनय व उस की थर्राती आवाज की प्रशंसा  कि या करती थी.’

‘‘मुझे कुछ चुभ सा गया. मैं ने तड़प कर कहा, ‘ऐसा ही था तो उस से तुम ने शादी क्यों नहीं कर ली?’

‘‘उस ने बेलाग शब्दों में कहा, ‘शायद कर भी लेती, अगर डिगरी लेने जाते वक्त मोटरसाइकिल दुर्घटना में उस की मृत्यु न हो गई होती.’

‘जीवन जिंदा नहीं है?’

‘नहीं.’

‘यह बात तुम ने मुझे पहले क्यों नही बताई?’

‘‘उस ने कोई जवाब नहीं दिया. वह होंठ भींच कर दबे स्वर में सुबकने लगी. उस के पास जा कर न तो मैं ने उस की पीठ सहला कर उस के आंसू ही पोंछे और न सांत्वना के दो शब्द ही कहे. वह बैठी सुबकती रही और मैं बैठा सोचता रहा, ‘पिछले 8 सालों से यह औरत अपने पहले प्रेमी की थर्राती आवाज से सम्मोहित हो कर उस की स्मृतियां संजोए मेरे साथ जीने का नाटक करती रही है. यह मक्कार है. यह झूठी है. अब इस झूठ के साथ और मैं नहीं रह सकता.’’’

‘‘फिर?’’ आदर्श ने पूछा.

‘‘अगले दिन शनिवार था और हर शनिवार को वह मायके जाती थी. उस ने सवेरे ही पूछा ‘आज मैं मायके जाऊं?’

‘‘ ‘हां, हां,’ मैं ने कहा.

‘‘ ‘सिकंदराबाद से 2 दिनों के लिए आज मेरी बहन आ रही है. मैं 2 दिन मायके रह आऊं?’

‘‘ ‘जैसा तुम चाहो.’’’

‘‘और उस के बाद न वह आई और न तुम ने उसे बुलाया?’’ आदर्श ने पूछा.

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उस ने जवाब नहीं दिया. परदा सरसराया. किसी की परछाई सी देख कर वह पूछ बैठा, ‘‘अंदर कोई है क्या?’’

‘‘कोई नहीं, हवा से परदा हिल गया होगा.’’उस ने समझा शायद भ्रम हुआ होगा.

‘‘सुधा ने तुम्हें क्या बताया?’’

‘‘यह रक्षा कौन है?’’

‘‘रक्षा?’’ उस ने अचकचा कर पूछा और चकित भाव से आदर्श को देखा, ‘‘तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘फिर क्यों पूछती हो?’’

‘‘क्या यह सच है कि रक्षा की आंखें खंजन जैसी और चेहरा चौड़ा है. वह गोरीचिट्टी है और उस का कद दरमियाना है और वह जब हंसती थी तो हरसिंगार के फूल झड़ते थे.’’

‘‘हां.’’

‘‘और वह तुम्हारे साथ कालेज में पढ़ती थी और तुम उस से बेहद प्यार करते थे.’’

‘‘हांहां,’’ उस ने खीझ कर कहा.

‘‘और वह अपने मांबाप के साथ इंगलैंड चली गई?

‘‘यहां उन की दुकान नहीं चल रही थी, और उन की आर्थिक स्थिति बेहद बिगड़ी हुई थी. वे लोग चुपचाप अपनी दुकान बेच कर इंगलैंड चले जाना चाहते थे, ताकि रक्षा के पिता को यहां किसी के यहां ताबेदारी न करनी पड़े.

‘‘और रक्षा तुम्हें यह आश्वासन दे कर चली गई थी कि वह तुम्हें इंगलैंड बुला लेगी और उस ने तुम्हें इंगलैंड बुला लेने के बजाय वहीं किसी यूरोपियन से ब्याह कर लिया और तुम बेहद टूट गए. तुम अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सके और नौकरी कर ली. फिर एक पार्टी में अचानक सुधा की एक झलक पा कर तुम बेचैन हो उठे. उस का परिचय पा कर तुम ने उस से मेलजोल बढ़ा लिया और उस से शादी करने के लिए तुम तैयार हो गए. महज इसलिए कि सुधा की शक्ल कुछकुछ रक्षा से मिलती है. खंजन जैसी आंखें…’’

उस ने आदर्श की बात बीच में ही काट दी और बोला, ‘‘यह सब तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘सुधा ने.’’

‘‘लेकिन मैं ने तो उसे कभी कुछ नहीं बताया. उसे यह सब कैसे मालूम हुआ?’’ यह कहने के साथ वह उठ कर चहलकदमी करने लगा.

‘‘एक दिन घर की सफाई करते वक्त उसे तुम्हारे सारे खतोकिताबत, फोटो, डायरियां आदि मिल गई थीं.’’

‘‘फिर भी उस ने मुझ से कुछ नहीं पूछा?’’

लेकिन आदर्श अपनी ही रौ में कहती गई, ‘‘क्या यह सच नहीं है कि तुम ने सुधा को सुधा के रूप में नहीं, रक्षा के रूप में स्वीकारा था. उसे रक्षा के सांचे में ढालते रहे. रक्षा की तरह हलके शेड्स के कपड़ों में सजनेसंवरने के लिए उसे बाध्य करते रहे. पहले तो वह सोचती रही कि वह तुम्हारी अपेक्षाएं पूरी कर रही है और उस का जीवन सार्थक हो गया है लेकिन तुम अतीत के एक कालखंड को फिर जीने के लिए लालायित थे. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह मर रही है और उस में कोई दूसरा जी उठा है.’’

वह बैठ गया और आंखें नीची किए सिर्फ उंगलियां चटकाने लगा.

‘‘उस ने अंगरेजी में एक कहानी पढ़ी थी, जिस में एक पति, जो कलंदर था, अपनी पत्नी को रीछ की खाल ओढ़ा कर उस का खेल दिखा कर अपनी जीविका जुटाता है. उसे भी ऐसा ही लगा जैसे वह किसी दूसरे की खाल ओढ़ कर तुम्हारी पत्नी होने का अभिनय कर रही है.’’

आदर्श की बातें सुन कर वह अजीब सी झेंप से भर उठा. वह उठ कर खिड़की के पास चला गया. बारिश थम गई थी और बादल छंट चुके थे. आसमान धुले कपड़े की तरह साफ चमक रहा था. इतने में कोई आवाज सुन कर वह मुड़ा. आदर्श वहीं बैठी थी, ‘‘वह उलटी कौन कर रहा है?’’

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‘‘शायद सुधा भाभी होंगी.’’

‘‘क्या, सुधा यहां आई हुई है, तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’ वह बाथरूम की तरफ दौड़ा. बाथरूम के बाहर झुकी सुधा उलटी कर रही थी और मां उस की पीठ सहला रही थीं.इतने में हड़बड़ाए हुए पापा आए, ‘‘अरे भई, क्या हुआ इसे? बेटा, डाक्टर को तो फोन करो.’’

मां बोली, ‘‘न बेटा, फोन मत करना. विकास के पापा, अब तुम दादा बनने वाले हो. मुंह मीठा करो…’’

लवली मामी: प्यार ने बनाया कातिल- भाग 1

सौजन्य-  सत्यकथा

मंगलवार, 5 जनवरी 2021 का सूरज उदय ही हुआ था कि मूंडवा थाने में फोन द्वारा सूचना मिलीलके मूंडवा गांव के सरोवर के पास मंदिर से सटे घर में चारपाई पर सुरेश की लाश पड़ी है. सुरेश की रात में अज्ञात हत्यारों ने सोते समय धारदार हथियार से हत्या कर दी है.

सूचना मिलते ही मूंडवा थानाप्रभारी बलदेवराम पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. घटनास्थल पास में ही था, इसलिए वह वहां 10 मिनट में ही पहुंच गए. वहां आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. उन्हें हटा कर पुलिस मकान के अंदर पहुंची, जहां चारपाई पर मृतक सुरेश साद (35 वर्ष) की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. मृतक पुजारी परिवार से था.

खून के छींटे फर्श और दीवारों पर भी लगे थे. थानाप्रभारी बलदेवराम ने जांचपड़ताल और मौकामुआयना किया. घर की दीवारें काफी ऊंची थीं, इस कारण प्रथमदृष्टया ऐसा लग रहा था कि जिस ने भी हत्या की थी, वह दीवार फांद कर घर में नहीं आया था.

तो क्या हत्या में घर के किसी सदस्य का हाथ है? अगर हाथ है तो वह कौन है और उस ने हत्या क्यों की? ये तमाम सवाल थानाप्रभारी के जेहन में आजा रहे थे. थानाप्रभारी बलदेवराम ने सुरेश साद हत्याकांड की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दी.

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मामला मंदिर के पुजारी से जुड़ा था. ऐसे मामले में राजनीति बहुत जल्द शुरू हो जाती है. इस कारण घटना की खबर मिलते ही एएसपी राजेश मीणा, सीओ विजय कुमार सांखला और एसपी (नागौर) श्वेता धनखड़ घटनास्थल पर आ पहुंचे.

घटनास्थल पर पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना किया और नागौर से एफएसएल की टीम और एमओबी टीम को मौके पर बुला कर साक्ष्य इकट्ठा किए. पुलिस टीम ने मृतक के घर वालों से पूछताछ की.

पूछताछ में घर वालों ने बताया कि सुरेश रात में पशुओं को चारा खिलाने गया था. रात में वह चारा खिलाने के बाद बरामदे में चारपाई पर आ कर सो गया. अगली सुबह 5 जनवरी को जब मृतक सुरेश की पत्नी किरण ने आ कर पति को आवाज दी तो कोई जवाब नहीं मिला.

फिर वह किरण बरामदे में आई और जैसे ही चारपाई पर खून से लथपथ पति की लाश देखी तो वह रोनेचिल्लाने लगी. तब घर के अन्य सदस्य दौड़ कर आए. उन्होंने देखा कि सुरेश की खून से लथपथ लाश बिस्तर पर पड़ी थी. तब उन्होंने थाना मूंडवा में फोन कर खबर दी.

इस के बाद मूंडवा थाना पुलिस घटनास्थल पर आई और जांच शुरू की. मृतक मंदिर में बने घर में रहता था. सुरेश के परिवार में उस की पत्नी किरण (30 साल) के अलावा 4 बच्चे थे.

घटना वाली रात किरण कमरे में बच्चों के साथ सो रही थी जबकि सुरेश बाहर बरामदे में ही सोता था.

एसपी श्वेता धनखड़ ने मृतक की पत्नी किरण से पूछा, ‘‘आप ने रात में क्या कोई चीख सुनी थी?’’

‘‘नहीं, मैं ने कुछ भी नहीं सुना.’’ किरण बोली.

मृतक के अन्य परिजनों से भी पूछताछ की गई. मगर सभी ने यही कहा कि उन्होंने कोई आवाज या खटका वगैरह नहीं सुना था. तब एसपी श्वेता धनखड़ ने पूछा, ‘‘किसी से कोई दुश्मनी थी क्या सुरेश की? किसी से कोई लड़ाईझगड़ा हुआ हो या किसी पर शक हो तो बताएं.’’

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मृतक के परिजनों ने कहा कि मृतक शांत स्वभाव का था. उस की किसी से दुश्मनी नहीं थी. न ही किसी से उस का लड़ाईझगड़ा हुआ था. मृतक के परिजनों का कहना था कि उन्हें किसी पर शक नहीं है.

कोई घर में आ कर सोते व्यक्ति को धारदार हथियार से मार कर चला गया और मृतक के बीवीबच्चे और भाई तथा अन्य सदस्यों को भनक तक नहीं लगी. घर की दीवार इतनी ऊंची थी कि उस पर चढ़ कर अंदर आना संभव नहीं था. न ही घर के चारों ओर की दीवारों के पास किसी के पैरों के निशान थे. अगर कोई दीवार पर चढ़ता तो उस के पदचिह्न जरूर होते. मगर पैरों के निशान नहीं थे.

ऐसे में पुलिस अधिकारियों को मृतक के परिवार के लोगों पर शक हुआ कि हो न हो इस हत्याकांड में परिवार का कोई व्यक्ति शामिल है.

पुलिस टीम ने शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. एफएसएल टीम ने साक्ष्य एकत्र किए. शव पर धारदार हथियार के 3-4 गहरे जख्म थे. हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक का इंतजार करना था.

पुलिस टीम ने मृतक के परिजनों सहित ग्रामीणों से भी पूछताछ की. हालांकि उस समय तक इस मामले में कोई सुराग हाथ नहीं लगा था. फिर भी पुलिस अधिकारी हत्याकांड के परदाफाश के लिए जीजान से जुटे थे.

अगले भाग में पढ़ें- क्या सुरेश साद हत्याकांड का परदाफाश हुआ

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सौजन्य-  सत्यकथा

एसपी श्वेता धनखड़ ने एएसपी राजेश मीणा, डिप्टी विजय कुमार सांखला और मूंडवा थानाप्रभारी बलदेवराम को दिशानिर्देश दे कर कहा कि जल्द से जल्द हत्याकांड का परदाफाश कर हत्यारों को गिरफ्तार किया जाए.

एसपी श्वेता धनखड़ दिशानिर्देश दे कर नागौर लौट गईं. पुलिस अधिकारियों का शक मृतक की पत्नी किरण पर था. इस का कारण था कि बरामदे के पास के कमरे में वह अपने चारों बच्चों के साथ सोई थी. सुरेश का मकान सुनसान इलाके में था, जहां शोरशराबा नहीं था. ऐसे में कोई आ कर हत्या कर दे और बरामदे से सटे कमरे में पता नहीं चले, यह असंभव था.

इस कारण एकबार किरण पुलिस की निगाहों में आई तो उस की कुंडली खंगाली जाने लगी. सुरेश का शव पोस्टमार्टम के बाद उस के परिजनों को सौंप दिया गया. परिजनों ने उस का अंतिम संस्कार कर दिया. एसपी के निर्देश पर सुरेश साद हत्याकांड का परदाफाश करने के लिए एएसपी राजेश मीणा, सीओ विजय कुमार सांखला के नेतृत्व में थानाप्रभारी बलदेवराम सहित अन्य पुलिसकर्मियों ने जांच शुरू की.

मृतक की पत्नी किरण साद के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. साथ ही पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. काल डिटेल्स से पता चला कि जोधपुर जिले के बनाड़ थाने के गांव दईकड़ा निवासी शंभूदास साद से किरण की दिन में कईकई बार घंटों तक बातें होती थीं. शंभूदास मृतक का भांजा था.

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पुलिस अधिकारियों को मुखबिर से भी सूचना मिल चुकी थी कि शंभूदास और किरण के अवैध संबंध हैं. बस फिर क्या था, पुलिस ने मृतक सुरेश के 21 साल के भांजे शंभूदास को पूछताछ के लिए दबोच लिया.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो पहले तो वह टालमटोल करता रहा मगर पुलिस ने सख्ती की तो वह टूट गया और अपना जुर्म कबूल कर लिया कि मामी किरण से उस के अवैध संबंध हैं. मामा सुरेश को उन के संबंधों पर शक हो गया था. इस कारण वह मामीभांजे के संबंधों के बीच रोड़ा बनने लगा था. इस कारण उन दोनों ने योजनानुसार उस की हत्या कर दी.

जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने किरण को भी हिरासत में ले लिया और पूछताछ की. किरण पहले तो मना करती रही मगर जब उसे बताया गया कि शंभूदास ने सब कुछ बता दिया है तो वह टूट गई और उस ने भी अपना जुर्म कबूल लिया कि नाणदे (भांजे) के साथ उस के अवैध संबंध थे.

तब पुलिस ने मृतक सुरेश साद के भाई की रिपोर्ट पर सुरेश की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और हत्यारोपी शंभूदास और किरण को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस टीम ने शंभूदास और किरण को 8 जनवरी, 2020 को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया और कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई वह इस प्रकार से है—

राजस्थान के नागौर जिले के अंतर्गत एक कस्बा मूंडवा आता है. मूंडवा के छोर पर तालाब है, जहां मंदिर बना है. इस मंदिर के पुजारी साद परिवार के लोग हैं. इस साद परिवार में सुरेश साद थे.

सुरेश साद की शादी करीब 12 साल पहले किरण से हुई थी. सुरेश मंदिर में पुजारी का काम करने के अलावा पशुधन भी रखता था. पशुधन के अलावा वह गांव में यजमानों के घर से अनाज व आटा भी लाता था. इस से उस के परिवार की गुजरबसर आराम से होती थी.

सुरेश साद सीधासादा व सरल स्वभाव का व्यक्ति था. वह अपनी पूजापाठ व गृहस्थी में मस्त था. समय के साथ सुरेश की पत्नी किरण 4 बच्चों की मां बन गई थी. 4 बच्चे पैदा करने के बाद भी 30 साल की किरण की आकांक्षाएं अब भी जवान थीं.

सुरेश की उम्र 35 साल के आसपास थी. वह दिन भर पूजापाठ के अलावा पशुओं में खटता था और थकामांदा रात को आ कर बिस्तर पर सो जाता और खर्राटे भरने लगता. जबकि किरण शारीरिक सुख के लिए तड़प कर रह जाती थी.

ऐसे में करीब ढाईतीन साल पहले जब शंभूदास अपनी ननिहाल मूंडवा आया तो वह मामी किरण की आंखों को भा गया. शंभूदास भी 18 साल का था. वह इंटरनेट पर अश्लील फिल्में देख कर औरत का सामीप्य पाने को आतुर था. ऐसे में जब उस की निगाह सांवलीसलोनी मामी किरण पर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. वह मामी पर लार टपकाने लगा.

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मामी भी कोई नादान नहीं थी कि नाणदा (भांजे) के व्यवहार को न समझती. शंभूदास मामी के शरीर को छूने की कोशिश करता. सुरेश एक रोज बाहर गया था. उस रोज रात में एक ही कमरे में सो रहे शंभूदास और किरण मामी के बीच शारीरिक संबंधों की नींव पड़ गई. उस रात शंभूदास और किरण ने जी भर कर हसरतें पूरी कीं.

किरण को कई साल बाद उस रात शारीरिक सुख की तृप्ति मिली थी. वह शंभूदास के पौरुष की कायल हो गई. वे दोनों अपना मामीभांजे का पवित्र रिश्ता शर्मसार कर बैठे थे.

एक बार वासना के गर्त में डूबे तो उस में वक्त के साथ डूबते ही चले गए. शंभूदास अकसर ननिहाल के चक्कर काटने लगा. ननिहाल आने का मकसद सिर्फ मामी किरण थी. दोनों मौका मिलते ही हसरतें पूरी कर लेते.

शंभूदास का ननिहाल था. मगर जब वह महीने में 3-4 बार आने लगा तो सुरेश को थोड़ा अजीब लगा. एक दिन उस ने कहा, ‘‘शंभू, कुछ कामधंधा करो. अब तुम बच्चे नहीं हो, जो गाहेबगाहे यहां चले आते हो. बहन और बहनोई सा को कुछ कमा कर दो. वे कितने दिन तक तुम सब का पेट भरेंगे.’’

अगले भाग में पढ़ें- सुरेश साद ने किरण और भांजे शंभूदास को रंगरलियां मनाते देख लिया

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