मुझे लगा कि मुझे देखते ही वह गुस्से से भर कर उलाहना देगी, लेकिन उलाहना तो दूर शिकायत करना भी उस की फितरत में नहीं था. मैं उसे तब से जानता हूं, जब वह फ्रौक पहन कर पीठ पर बस्ता टांगे उछलतीकूदती स्कूल जाती थी.

इस दुनिया में नहीं रहे मेरे दोस्त की एकलौती बहन रिया पोस्ट ग्रेजुएट होते ही शादी के रेशमी धागे में बांध दी गई.

रिया नई दुनिया के मीठे सपनों को पलकों पर सजा भी नहीं पाई थी कि एक राज खुला. उस का पति मैट्रिक फेल ही नहीं था, बल्कि शराबी और सट्टेबाज भी था.

रिया 6 साल से तंग गली के झोंपड़ेनुमा मकान में आंसुओं से भीगती रही और अपने गरम गोश्त को नुचते हुए देख कर भी अपनी जबान पर सौ ताले लगा लेती.

जुल्म के मुंह में लंबी जबान होती है न, पति का मुंह खुलता तो रिया के मरहूम भाई और मांबाप के लिए गालियों का भभका फूटता.

2 बच्चे, भूख का जमघट और चुभते शब्दों का जहर उस समय कहर बन कर टूटा, जब तलाक का भयानक धमाका गोली की तरह रिया के कानों में धंस गया. वह किरचियों में बिखर गई.

रिया की सिसकियां सुन कर मैं यादों से बाहर लौट आया.

‘‘क्या बात है? आज तुम बहुत परेशान लग रही हो रिया?’’ मैं ने हमारे बीच खिंची खामोशी की लंबी लकीर को चीरते हुए पूछा.

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कुछ देर तक तो वह अपनी बड़ीबड़ी आंखों की पलकों में आंसुओं की लडि़यां समेटे मुझे बड़ी बेबसी से देखती रही, फिर इतना ही बोल पाई, ‘‘कैलाश भाई, जिया साहब का इंतकाल हो गया.’’

यह सुन कर मैं सन्न रह गया.

‘‘कब?’’

‘‘8 दिन पहले.’’

‘‘तुम्हें कब और कैसे पता चला?’’ मैं ने बौखला कर पूछा.

‘‘आज ही मुमताज भाभी का फोन आया था,’’ कहते ही रिया की सिसकियां बंध गईं.

‘‘कैलाश भैया, मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है. मैं क्या करूं?’’ रिया छाती को कस के दबा कर फर्श पर बैठ गई.

‘‘खबर देर से मिली, मगर मिली तो सही… रिया, तुम्हें हिम्मत रखनी होगी, बरदाश्त करना होगा.’’

‘‘कैसे करूं बरदाश्त भैया…’’ रिया दर्द से बिलबिला पड़ी.

‘‘रिया, तुम्हें जिया साहब के घर जरूर जाना चाहिए,’’ मैं ने उस का ध्यान बांटने के लिए कहा.

‘‘कैसे जाऊं वहां, रजिया आपा तो मुझे ही जिया साहब की मौत का जिम्मेदार ठहराएंगी न. यह भी तो हो सकता है कि वे मुझे अपने घर में घुसने ही न दें. तब मैं तमाशा बन कर रह जाऊंगी.

‘‘मैं ने जिया साहब के सहारे रजिया आपा की नफरत को झेला है… उन के बिना… रजिया आपा का गुस्सा…?’’

‘‘रिया, मैं जानता हूं कि कि इस वक्त तुम्हारे सीने में मजबूरी के भंवर उठ रहे हैं. लेकिन बहन, जिया साहब की मौत पर भी उन के घर न जाना तुम्हें निहायत खुदगर्ज साबित कर देगा.

‘‘मैं जानता हूं कि दर्द को चुपचाप सहना तुम्हारी फितरत में है. लोगों की हमदर्दी हासिल करना तुम्हारे मिजाज में नहीं, लेकिन कभीकभी एहसास का इजहार भी लोगों की संतुष्टि के लिए बहुत जरूरी होता है. रस्में निभाने के लिए ही जाओ रिया.

‘‘अगर तुम वहां अभी नहीं गईं, तो पूरी जिंदगी तुम्हारा दिल तुम्हें कोसता रहेगा. तुम्हारे बहनोई जिया साहब के साथ तुम्हारे बेगरज रिश्तों पर लगाई गई तोहमतों की मुहर तुम्हारी सचाई को रुसवा कर देगी. वक्त हाथ से निकल जाएगा और जिंदगीभर तुम पछतावे की आग में झुलसती रहोगी.

‘‘चलो, चलो, उठो. वहां चलने की तैयारी कर लो. मैं ले चलता हूं तुम्हें जबलपुर. रजिया आपा की हर बात चुपचाप सुन लेना. बहन, इस नाजुक दौर में तुम्हारी चुप्पी ही किला बन कर तुम्हारी हिफाजत करेगी,’’ मैं ने रिया को समझाया.

उसी शाम रिया मेरे साथ जबलपुर के लिए रवाना हो गई. वह रास्तेभर यादों की खोहों में भटकती, भविष्य की पलपल टूटती तसवीर को अपने आंसुओं भरी आंखों में समेटने की कोशिश करती रही.

वहां पहुंच कर मैं ने कहा, ‘‘रिया, तुम वहां चली जाओ. मैं तुम्हारा वेटिंग रूम में इंतजार करता हूं.’’

आटोरिकशा वाले को जिया साहब का पता समझा कर रिया को उसे रजिया आपा के पास भेज तो दिया, मगर उस के जाने और आने के बीच मेरी सांस गले में ही अटकी रही.

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कहीं रजिया आपा की 2 बेटियां… दामाद, 2 बेटे… बहुएं कोई बदतमीजी न कर बैठें रिया के साथ. कमजोर तो वह है ही, कहीं सदमे से बेहोश या कुछ… तब कौन संभालेगा उसे?

मुझे अपनेआप पर गुस्सा आने लगा. क्या जरूरत थी रिया को उस दहकती भट्ठी में झोंकने की? क्या जरूरत थी टूटे रिश्तों की लाश को कब्र से बाहर निकाल कर हमदर्दी जतलाने की? क्या इतना जरूरी है रस्मेदुनिया निभाना?

3 घंटे बाद रिया वेटिंग रूम में लौट आई. चेहरा बुझा हुआ, जैसे किसी ने खून चूस लिया हो. रोरो कर उस की आंखें सूज गई थीं और नीले पड़े होंठों पर जमी चुप्पी की पपड़ी.

मैं ने पानी की बोतल उस की तरफ बढ़ा दी. पानी का घूंट गटकने में भी उसे जबरदस्त तकलीफ हो रही थी. वह निढाल सी पड़ गई. आधे घंटे बाद अपनी आदत के मुताबिक वह धीमी आवाज में बतलाने लगी कि फ्लैट की घंटी बजते ही रजिया आपा की अम्मी यानी रिया की सगी फूफी से सामना हो गया. पूरे 20 साल बाद फूफी ने रिया को देखा था. चश्मा साफ कर उसे पहचानने की कोशिश की, फिर भी पहचान नहीं सकीं.

‘‘जी, मैं रिया हूं,’’ याददाश्त पर जोर दे कर पहचानते हुए गर्मजोशी से रिया बोली, ‘‘आदाब फूफीजान.’’

‘‘जीती रहो…’’ ममता से भरा बूढ़ा हाथ रिया के सिर पर आ टिका.

‘‘रजिया देख तो सही, रिया आई है. मुन्नू, नन्हू, पप्पू देखो तो तुम्हारी खाला आई हैं…’’ लहक कर बोलीं फूफी. कमरे के परदे के पीछे रिया को हिलतीडुलती परछाइयां दिख रही थीं, मगर अंदर घुटन भरा सन्नाटा तैर रहा था.

‘‘आ बैठ बेटी इधर मेरे पास…’’ और रिया के दोनों हाथों को छाती से भींच कर फूफी हिचकियों से रो पड़ीं, ‘‘दामाद चला गया रिया… यह सदमा बरदाश्त करने के लिए खुदा ने मुझे क्यों जिंदा रखा है आज तक?

‘‘3 साल पहले ही तो तुम्हारे फूफा का इंतकाल हुआ था और अब तुम्हारे बहनोई का सदमा… सहा नहीं जाता मेरी बच्ची… सहा नहीं जाता…’’ सब्र का बांध टूट गया और आंसुओं का सैलाब बह निकला.

रिया फूफी से लिपट कर दहाड़ मार कर रो पड़ी.

रजिया आपा ने रिया को देख तो लिया, मगर वे मुखातिब नहीं हुईं. अंदर वाले कमरे में वे सोफे पर मूर्ति की तरह बैठी रहीं.

रिया को याद आ गई मरने से पहले जिया साहब के साथ हुई आखिरी मुलाकात… तना हुआ चेहरा… हाथ का निवाला हाथ में, मुंह का निवाला भी जस का तस.

‘कुछ परेशान से नजर आ रहे हैं आप… क्या बात है दूल्हा भाई?’ हमेशा मुसकराती रहने वाली जिंदगी से भरी उन की आंखों में आंसू छलछला गए, ‘जब से हम आप के पास आने लगे हैं, आप की बहन हम से बोलती नहीं हैं. न तो वे हमारे कमरे में आती हैं और न ही कोई रिश्ता…’ शब्द उन के गले में अटकने लगे.

‘लेकिन क्यों…?’ हैरत से रिया की आंखें फैल गईं.

‘हमें आप की और बच्चों की फिक्र करते देख वे समझती हैं कि हम ने आप से…’

‘ओह, इतनी बड़ी गलतफहमी. आप ने समझाया क्यों नहीं?’ रिया ने कहा.

‘अगर उन्होंने सिर्फ हम से कहा होता तो हम बरदाश्त कर लेते, मगर उन्होंने तो पूरे खानदान को यही बतला रखा है. हम जिस से भी मिलते हैं, वह पहले तुम्हारी खैरियत पूछ कर हमें तंज कसता है.’

‘तो आप ने सफाई क्यों नहीं दी? सच क्यों नहीं बतलाया?’ रिया बेचैन हो गई.

‘रिया, हम सफाई दें? हम सच बतलाएं? रजिया ने इतना ही समझा है हमें… 30 साल की हर सांस हम ने उन के नाम कर दी, फिर भी उन्हें अपने शौहर पर एतबार नहीं…

‘उन्होंने ऐसा सोच भी कैसे लिया… बस, यही दर्द घुन बन कर हमें खाए जा रहा है,’ दूल्हा भाई की टूटन ने रिया को भीतर तक आहत कर दिया.

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‘आप कहें, तो मैं बात करूं रजिया आपा से…’

‘कोई फायदा नहीं… मैं ने उन्हें हर तरह से समझाया, तुम्हारी और बच्चों की मजबूरी का हवाला दे कर बड़ी बहन के फर्ज की भी याद दिलाई, मगर… वह पत्थरदिल औरत जरा भी नहीं पसीजी. शक… और सिर्फ शक…

‘शायद जीतेजी तो अब कभी यह खाई नहीं भरेगी… हम ने भी सोच लिया है, जिस दिन उन्हें हम पर एतबार हो जाएगा… वे खुद पछतावा करेंगी… और खुद हमारे पास…’ सिसक पड़े दूल्हा भाई.

‘मैं खुद उन से मिल कर… सारी बात साफ करूं,’ रिया का आत्मसम्मान सिर उठाने लगा.

‘रिया, आप की जिद्दी बहन आप की शक्ल तो क्या, नाम तक सुनना नहीं चाहतीं… छोड़ो… सचाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी… मेरा और आप का दिल साफ है न…’

घर वापस लौटने के बाद पहला दिल का दौरा पड़ा था जिया साहब को.

बेटेबहुओं, बच्चों से भरापूरा घर, मगर कोई भी रिया से मिलने बाहर नहीं आया.

रिया ने सागर में रजिया आपा के घर रह कर ही पोस्ट ग्रेजुएशन किया था. ये वही बच्चे थे, जो बचपन में रिया के साथ ही सोने, उस के ही हाथ से नहाने और खाने की जिद किया करते थे. जरा सा बुखार हो या सर्दी, खांसी हो जाती, तो रिया कालेज की छुट्टी ले कर दिनरात उन्हें छाती से लगाए रहती थी. रजिया आपा बेफिक्री से जिया साहब के चौड़े सीने पर सिर रख कर चैन की नींद सोती थीं.

एक बार 5 साल के नन्हू ने घूमने न ले जाने पर रिया के कंधे पर इतनी जोर से दांत गड़ा दिए थे कि छलछला गया. बरसों गुजर गए, जख्म भर गया, मगर हाथ ऊपर उठाने पर दर्द की टीस आज भी महसूस होती है. उन्हीं जान से ज्यादा अजीज बच्चों के लिए रिया आज अजनबी बन गई. गलतफहमी के फूस पर लालच की चिनगारी ने आग लगा दी. रिश्ते धूधू कर जलने लगे…

लेकिन, वक्त की बेरहम आंधी के थपेड़ों से दूर फूफी जान के चेहरे पर रिया से शिकायत की हलकी सी लकीर भी न थी. प्यार और ममता को आंचल में समेटे बरसों बाद भी फूफी अम्मां पुरइन के पत्तों पर ठहरी शबनम की तरह रिया की हथेलियां अपने हाथों में लिए मुहब्बतों और दुआ के खजाने लुटा रही थीं.

‘‘चल उठ रिया… हाथमुंह धो ले… कब चली थी… अकेली क्यों आई है…? बच्चों को साथ क्यों नहीं लाई…? चल, कुछ खापी ले…’’ एकसाथ कई सवालों के जवाबों का इंतजार किए बिना ही फूफी ने आवाज लगाई… ‘‘अरे नूरजहां, रिया खाला के लिए चायनाश्ता ले कर आ बेटी,’’ मगर अंदर का सन्नाटा पहले जैसा बना रहा.

फूफी का हाथ आंखों से लगा कर सिसक पड़ी रिया, ‘‘फूफी, यह सब कैसे हुआ? कब हुआ फूफी?’’

‘‘जाने कौन सा गम खाए जा रहा था जिया साहब को. चुप रहने लगे थे,

2 बार तो दिल का दौरा पड़ चुका था. इलाज चल रहा था कि 8 दिन पहले सो कर उठ ही रहे थे कि सीने से दबाए चीख मार कर ऐसे गिरे कि फिर उठ न सके,’’ कह कर फूफी सिसकने लगीं.

रिया का जी चाहा कि भीतर जा कर रजिया आपा के कंधे को झकझोर कर पूछे, ‘दूल्हा भाई की मौत की खबर मुझे क्यों नहीं दी गई? क्या मेरा उन से कोई रिश्ता नहीं था…? क्या उन के आखिरी दीदार का हक मुझे नहीं था?’ लेकिन सीमा न लांघने और हर बरताव झेलने का कौल कैसे तोड़ सकती थी भला? सब्र की हद छूती मुंह में आंचल ठूंसे रोती रही रिया.

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‘‘तुम्हें इस हादसे की खबर कब और कैसे मिली?’’ फूफी का सवाल चाबुक की तरह सीने पर पड़ा. नजरें फूफी के भाव टटोलने लगीं, मगर उन के झुर्रियों भरे चेहरे पर किसी मक्कारी भरी साजिश की झलक तक न थी.

‘‘कल मुमताज भाभी ने फोन पर बतलाया,’’ यह सुन कर फूफी ठंडी सांस भर कर रह गईं.

फूफी ने ही तो बचपन में गोद में खिलाया था रिया को. अम्मी की तबीयत अकसर खराब रहती थी.

फूफी उसे चम्मच से दूध पिलातीं, दिनरात उस की देखभाल में लगी रहतीं. घर में सभी मजाक करते, ‘दूसरी बेटी कब हुई… कहीं दावत न देनी पड़े, इसलिए बतलाया नहीं.’

‘भाई की बेटी मेरी ही तो बेटी हुई न,’ फूफी चुटकी का जवाब मुस्कुरा कर देतीं.

अम्मी के इंतकाल के बाद फूफी ने रिया और उस के बड़े भाई को पालपोस कर पढ़ायालिखाया.

फूफी के बरताव में कोई कड़वाहट नहीं… कोई छलकपट नहीं… फरेब नहीं, आखिर किस रिश्ते से… फूफीभतीजी… या मांबेटी… या फिर इनसानी रिश्ता… कहना मुश्किल था.

रिया परदा उठा कर भीतर के कमरे में पहुंच गई, जहां जिया साहब का पूरा कुनबा मूर्ति सा खड़ा उसे जहरीली नजरों से घूर रहा था.

रजिया आपा पत्थर की तरह खामोश बैठी थीं. कौन कहता है औरत कमजोर है. डरपोक है. अपने हक छीनने वाली औरत को और खुद के शौहर को उन्होंने सिरे से नकार दिया था. कोई बहस नहीं, कोई जिरह नहीं, कोई लड़ाईझगड़ा नहीं. अपना अहम, अपनी खुद्दारी की सीढि़यां चढ़ कर अपना मुकाम खुद बनाने का हौसला पालती रहीं. अपनी बेइज्जती की सजा देती रही उस शख्स को, जो एक लमहा भी उन के खयाल से कभी दूर न रहा… गलतफहमी… एक… पूरा परिवार उजाड़ देगी… रिया कांपने लगी…

‘‘रजिया आपा, मैं जा रही हूं,’’ रिया की आवाज तैर कर उसी के कानों से टकराने लगी.

‘‘पता नहीं, अब कभी मुलाकात हो या न हो… इसलिए जाने से पहले बतलाना चाहती हूं कि दूल्हा भाई मेरे लिए फरिश्ता थे. मेरे और बच्चों की फिक्र कर उन्होंने रिश्ते को इनसानियत की बुलंदी तक पहुंचाया. आप ने उन के साथ बहुत ज्यादती की. अपनी बहन पर कभी यकीन नहीं किया. यही दर्द उन्हें ले डूबा.

‘‘रजिया आपा, यह पूरी कायनात गवाह है कि उन्होंने मुझ से निकाह नहीं किया था. आप ने मुझ से मेरा मसीहा छीन कर मेरे बच्चों को फिर से यतीम बना दिया.’’

रजिया आपा ने पहली बार नजर उठा कर रिया की तरफ देखा. बेनूर आंखों में सैकड़ों रेगिस्तानों की वीरानी और होंठों पर अनगिनत बयाबानों की जानलेवा खामोशी.

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रिया के फ्लैट से बाहर निकलते ही रजिया आपा धड़ाम से कुरसी से गिर कर फर्श पर बिखर गईं, ‘‘जिया साहब, मुझे माफ कीजिए… माफ कर दीजिए मुझे…’’ एक चीख उभरी और फिर गहरी चुप्पी छा गई.

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