मेरा बौयफ्रेंड कैंसर बताकर मुझसे आजकल बात नहीं कर रहा है, कैसे पता करूं ये झूठ है या सच?

सवाल

मैं अपने बौयफ्रैंड से बहुत प्यार करती हूं. मेरी उम्र 20 साल है. हम दोनों 3 साल से साथ हैं लेकिन अब 10 दिनों से हमारे बीच कोई बात नहीं हो रही है. वह कहता है कि कुछ दिनों बाद बात करेगा क्योंकि उसे डाक्टर ने कैंसर बताया है. कहता है, वह मुझे बहुत प्यार करता है लेकिन अभी ज्यादा कुछ बताने की स्थिति में नहीं है. उस की इन बातों पर मुझे यकीन नहीं हो रहा. मुझे लग रहा है कि वह झूठ बोल रहा है. आप ही बताएं कि मैं उस की इन सब बातों का क्या मतलब निकालूं?

जवाब

जब आप का लव रिलेशन 3 सालों से चल रहा है तो अब तक आप दोनों के बीच बौंडिंग स्ट्रौंग हो जानी चाहिए थी, लेकिन आप की बातों से ऐसा लग रहा है कि आप का पार्टनर पहले से ही आप से झूठ बोलता रहा है, तभी आप के मन में यह बात बैठ गई है कि इस बार वह आप से अपनी बीमारी का झूठा नाटक कर के आप को धोखा दे रहा है.

आप संयम रखें और इस बीच उस से कोई बात न करें व खुद को भी स्ट्रौंग बनाएं ताकि अगर वह आप को धोखा भी दे रहा हो तो आप को खुद को संभालने का मौका मिल पाए. वक्त आने पर उस से बात कर के अपनी शंकाओं को दूर करें ताकि आप अंधकार में न रह कर सही समय पर सही निर्णय ले पाएं.

जुनून में हो रहे खून

महाराष्ट्र के पुणे शहर में 21 जनवरी, 2024 को एक सिरफिरे आशिक ने प्यार का विरोध करने पर अपनी प्रेमिका की मां की गला घोंट कर हत्या कर दी. कत्ल के लिए उस ने कुत्ते की बैल्ट का इस्तेमाल किया. प्रेमिका की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज कर के आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.

यह वारदात पुणे के पाषाण सुस रोड पर बनी एक सोसाइटी में हुई. वहां 58 साल की वर्षा अपनी 22 साल की बेटी मृण्मयी के साथ रहती थीं. जनवरी महीने की पहली तारीख को वर्षा के पति की मौत हो गई थी. उन की बेटी एक कंप्यूटर इंजीनियर है, लेकिन 1 जनवरी को पिता की मौत के बाद उस ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी.

मृण्मयी की तकरीबन 7 महीने पहले एक डेटिंग एप पर शिवांशु के साथ मुलाकात हुई थी. फिर वे दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे थे, लेकिन कुछ महीने बाद ही मृण्मयी को पता चला कि उस का प्रेमी डिलीवरी बौय है.

मृण्मयी की मां वर्षा उन दोनों के रिश्ते के खिलाफ थीं. वे लड़के की नौकरी और माली हालत को अपनी हैसियत के बराबर नहीं समझाती थीं, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी मृण्मयी से इस रिश्ते से बाहर निकलने के लिए कहा.

पिता को खो चुकी मृण्मयी ने अपनी मां की बात मान ली. उस ने शिवांशु से ब्रेकअप कर लिया और उस से मिलनाजुलना भी बंद कर दिया. इस बात से नाराज शिवांशु एक रात मृण्मयी के घर पहुंच गया.

मृण्मयी की मां वर्षा शिवांशु को पहले से जानती थीं, इसलिए उन्होंने दरवाजा खोल कर उसे अंदर बुला लिया. घर में घुसने के बाद शिवांशु ने पहले तो मां को शादी के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन जब वे नहीं मानीं, तो उस ने कुत्ते की बैल्ट से गला घोंट कर उन की हत्या कर दी.

इसी तरह दिल्ली के रोहिणी इलाके में एक 24 साल के लड़के ने अपनी 19 साल की प्रेमिका की गला रेत कर हत्या करने की कोशिश की. बाद में खुद की भी जान ले ली.

दरअसल, अमित नाम का यह सिरफिरा आशिक उसी दफ्तर में काम करता था, जिस में लड़की काम करती थी. उसे लड़की से एकतरफा प्यार हो गया था. परेशान हो कर लड़की ने अमित से बात करना बंद कर दिया.

अमित यह बेरुखी सह नहीं सका. उस ने चाकू से लड़की पर हमला किया और उस का गला रेतने की कोशिश की. लेकिन औफिस के दूसरे लोगों ने उसे बचा लिया. फिर अमित ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

इस तरह के अपराध होने की वजह क्या है? दरअसल, आजकल हमारे पास अच्छी सोच विकसित करने के लिए कोई जरीया नहीं है. न हमारे पास वैसे लेखक हैं, जो समाज को सुधारने की बातें कहते हों या जिन के लेखन में कोई पैनापन झलकता हो. न हमारे पास पढ़ने के लिए वैसी किताबें हैं, जो हमें अच्छा नागरिक बनाएं.

हम बस विश्वास या कहें कि अंधविश्वास के सहारे चल रहे हैं. तभी हम कहते हैं कि धर्म ने ऐसा कहा, इसलिए यही सही है या प्यार ऐसे ही होता है और हम ऐसे ही प्यार करेंगे. इसी पर हमारा विश्वास है.

आज हमारे पास देखने के लिए जो फिल्म या सीरियल की कहानियां हैं, उन में तिकड़मबाजी, लालच और जबरदस्ती दिखाई जाती है. कुछ गिनीचुनी किताबें जो हम पढ़ते हैं, उन की कहानियों में भी आज इसी तरह के ही किरदार दिखाई देते हैं.

आज हमारे पास पढ़ने को बचा क्या है? लेदे कर एक मोबाइल है, जो सब के हाथों में होता है. हम उस में आंखें गड़ाए रखते हैं. उस में जो भी बेसिरपैर की बातें पढ़ने को मिलती हैं, वही हमारे मन में बैठती जाती हैं.

मोबाइल में ऐसी बेहूदा चीजें भी होती हैं, जिन का हमारी जिंदगी पर नैगेटिव असर पड़ता है. मगर हम उसे ही फौरवर्ड किए जाते हैं. इस में केवल विश्वास को बढ़ावा दिया जाता है. बस, इसी विश्वास के आधार पर हमारी सोच विकसित होती है. हम वैसा ही करने लग जाते हैं, जैसा हमें समझाया जा रहा है.

गलती हमारी नहीं, बल्कि गलती है हमारे माहौल की. गलती है समाज के बदलते हुए नजरिए की जिस ने हमें तिकड़मबाजी, लालच, बेईमानी जैसी बुराइयां सिखाई हैं.

आज कुछ पत्रिकाएं हैं, जो अच्छी सोच को समाज सुधारने का आधार मानती हैं. दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं ऐसी ही हैं, मगर समस्या यह है कि हम पढ़ने के लिए समय ही नहीं निकालते हैं. हम मोबाइल में लगे रहते हैं.

जब तक हम मोबाइल के जंजाल से पीछा नहीं छुड़ाएंगे, तब तक कुछ भी सही होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

गूगल वौइस एक आवाज पर सारी जानकारी सामने

गूगल वौइस गूगल की एक ऐसी टैलिकम्यूनिकेशन सेवा है, जिस की हैल्प से यूजर महज अपनी आवाज के माध्यम से इंटरनैट सर्चिंग कर सकता है और सारी जानकारी सामने आ जाती है. ‘बो लने से सब होता है’ इस टाइटल के नाम से गूगल ने अपने गूगल वौइस एप्लीकेशन का एक एड बनाया था, जो अच्छा खासा पौपुलर हुआ था. इस एड में यह दिखाया गया है कि गूगल वौइस एप्लीकेशन एक ऐसी एप्लीकेशन है जिस के जरिये देश, दुनिया किसी प्रौडक्ट या किसी जगह की जानकारी आप के बोलनेभर से आप के मोबाइल फोन पर आसानी से मिल जाती है.

जिस समय यह एड आया था उस समय लोग गूगल वौइस के बारे में जानते नहीं थे लेकिन इस एड के बाद लोगों में गूगल वौइस के प्रति जागरूकता फैली और वे इस एप्लीकेशन का इस्तेमाल अपने कामों के लिए करने लगे. इस में रोजमर्रा के काम भी शामिल थे. बात करें अगर एड की तो इन एड में समाज की रूढि़वादी सोच से लड़ती हुई महिलाओं की स्थिति को दिखाया गया था.

जिस में किरण डेंबला, जिन्होंने हाउसवाइफ होते हुए वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियनशिप में छठा स्थान प्राप्त किया था. किरण इस वक्त तक 2 बच्चों की मां थी. अब किरण एक सफल सैलिब्रिटी फिटनैस एक्सपर्ट बन चुकी हैं. दूसरे एड में निखत जरीन के संघर्ष को दिखाया है. जिन्होंने वर्ल्ड बौक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता.

यह खिताब पाने वाली वह इंडिया की पांचवीं महिला है. जरीन वर्ल्ड चैंपियन मैरीकोम से भी मिल चुकी है. साथ ही तीसरे एड में ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दों को उठाती और ‘कूल द ग्लोब’ ऐप की संस्थापक प्राची शेवगांवकर के संघर्ष को दर्शाया गया है. इन तीनों ही एड में इन महिलाओं की कहानी को दर्शाते हुए यह दिखाया गया है कि इन्होंने गूगल वौइस ऐप्लिकेशन की हैल्प से अपनी मंजिल पाई है.

आप भी इन की तरह गूगल वौइस ऐप्लिकेशन की हैल्प से अपने जरूरत की जानकारी पा सकते हैं और फिर अपनी मंजिल तक पहुंच सकते हैं. क्या है गूगल वौइस गूगल वौइस टैक्नोलौजी की एक नायाब देन है. गूगल वौइस एक ऐसी टैलिकम्यूनिकेशन सेवा है, जो गूगल से प्रदान की जाती है.

जिस की हैल्प से यूजर इंटरनैट सर्चिग, कौल, मौसम की जानकारी, ताजा समाचार, वौइसमेल भेजना और सुनना अपने बिस्तर पर लेटेलेटे कर सकते हैं. इतना ही नहीं आप गूगल वौइस से किसी भी सवाल का जवाब पा सकते हैं. गूगल वौइस को कमांड दे कर आप गाने भी सुन सकते हैं. यहीं नहीं अगर आप ने गूगल वौइस को बताया है कि आप ने अपने घर की चाबी कहां रखी है तो गूगल वौइस आप के भूलने पर भी आप को इस की जानकारी दे देगा.

आप गूगल वौइस का इस्तेमाल मैप के लिए भी कर सकते हैं, जैसे आप को किसी ऐसी जगह जाना है जहां की जानकारी आप को नहीं है तो आप गूगल मैप पर जा कर उस जगह का नाम कहिए. फिर डायरैक्शन में जाएं, उस के बाद अपनी करैंट लोकेशन कहिए या औन कीजिए. इस के बाद गूगल आप को उस जगह की जानकारी दे देगा.

आप चाहें तो इसे सुन भी सकते हैं. इसे आसान भाषा में इस तरह समझा जा सकता है कि आप को जो भी जानकारी चाहिए उसे बस कहिए. आप के द्वारा मांगी गई जानकारी आप को तुरंत मिल जाएगी. यह समझिए कि गूगल वौइस आप का वह साथी है जो आप की एक आवाज पर दौड़ा चला आएगा. गूगल वौइस मोबाइल और टैबलेट दोनों में आसानी से यूज किया जा सकता है.

एंड्रौइड मोबाइल में गूगल वौइस पहले से ही इंस्टौल आता है, लेकिन अगर आप के मोबाइल में यह नहीं है तो आप इसे गूगल प्ले स्टोर से आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं. यह एकदम फ्री है.

आइए जानते हैं कि अपने मोबाइल फोन में गूगल वौइस की सेटिंग कैसे करें :

स्टेप 1: सब से पहले गूगल में साइन इन करें.

स्टेप 2: साइन इन करने के बाद राइट साइड में सब से ऊपर बनी अपनी प्रोफाइल में जाएं.

स्टेप 3: अब प्रोफाइल को ओपन करें.

स्टेप 4: इस के बाद सेटिंग पर क्लिक करें.

स्टेप 5: अब गूगल असिस्टेंड पर क्लिक करें.

स्टेप 6: इस के बाद ‘हे गूगल वौइस मैच’ पर क्लिक करें.

स्टेप 7: अब ‘हे गूगल’ को औन करें.

स्टेप 8: इस के बाद दो औपशन आएंगे. जिस में से आप ‘वौइस मौडल’ पर क्लिक करें.

स्टेप 9: अब रिट्राई ‘वौइस मौडल’ पर क्लिक करें.

स्टेप 10: इस के बाद 2 बार ‘ओके गूगल’ और 2 बार ‘हे गूगल’ बोल कर फिनिश पर क्लिक करें.

आप का गूगल वौइस स्टार्ट हो गया. शोर्टकट में इस तरह करें मोबाइल में गूगल वौइस की सैंटिग:

स्टेप 1: मोबाइल में गूगल वौइस सर्च यूज करने के लिए हैंडसेट के होम में जाएं.

स्टेप 2: अब होम बटन पर प्रैस करें और कहें ‘ओके गूगल’. अब एक नया पेज ओपन होगा.

स्टेप 3: नए ओपन हुए पेज में ऊपर की ओर सैटिंग के औप्शन पर क्लिक करें.

स्टेप 4: अब आप के सामने डिवाइस का औप्शन आएगा. उस पर क्लिक करें.

स्टेप 5: अब गूगल एसिस्टैंट को औन करें.

स्टेप 6: इस के बाद ‘ओके गूगल’ कह कर गूगल वौइस को औन कर लें.

अब गूगल आप की हैल्प करने के लिए तैयार है. इस तरह से आप वौइस से कमांड दे कर किसी भी तरह की जानकारी अपने डैस्क पर पा सकते हैं. गूगल वौइस से जानकारी कैसे लें गूगल में जा कर माइक पर क्लिक कर के आप को जो भी जानकारी चाहिए उस के बारे में कहें, जैसे आप को जानना है कि ताजमहल कहां है, किस ने बनवाया था? गूगल वौइस आप की आवाज सुन कर आप को उस संबंध में जानकारी देगा.

इस जानकरी को आप पढ़ और सुन दोनों सकते हैं. किस के लिए फायदेमंद बढ़ते कंपीटीशन के बीच वे बच्चे पीछे रह जाते हैं जिन्हें कम जानकारी होती है. ऐसे में कुछ लोगों के पास समय की कमी भी होती है. लेकिन मोबाइल एक ऐसी चीज है जो लगभग हर किसी के पास होता है. ऐसे में वे स्टूडैंट जो कोई जौब करते हैं वे स्टूडैंट अपने वर्क प्लेस पर या आते जाते गूगल वौइस का इस्तेमाल कर के अपनी नौलेज बढ़ा सकते हैं. इसी तरह यह बाहर काम कर रही या कालेज में पढ़ रही लड़कियों के लिए फायदेमंद है. हाउसवाइफ के लिए भी फायदेमंद साबित होता है.

ऐसे में वर्किंग गर्ल अपना समय बचाने के लिए गूगल वौइस का इस्तेमाल कर सकती है. हाउसवाइफ किचन में काम करते हुए कोई भी जानकारी सिर्फ बोल कर गूगल वौइस से पा सकती है. फिर चाहे वह क्लाउड किचन ही क्यों न स्टार्ट करना चाहती हो. इसी तरह अनपढ़ लोग भी गूगल वौइस का इस्तेमाल कर के इस से पढ़ेलिखे समाज से जुड़ सकते हैं. देखा जाए तो गूगल वौइस हर किसी के लिए फायदेमंद है. फिर चाहे वह स्टूडैंट हो, हाउसवाइफ हो या घरेलू नौकरानी ही क्यों न हो.

मेहमान : कर्ज में डूबा मुकेश

बड़ी कड़की के दिन थे. महीने की 20 तारीख आतेआते मुकेश की पगार के रुपए उड़नछू हो गए थे और मुसीबत यह कि पिछले महीने की उधारी भी नहीं निबटी थी. हिसाब साफ होता तो आटा, दाल, चावल, तेल तो उधार मिल ही जाता, सब्जी वगैरह की देखी जाती. बालों में कड़वा तेल ही लगा लिया जाता, चाय काली ही चल जाती, दूध वाला पिछले महीने से ही मुंह फुलाए बैठा है. मुसीबत पर मुसीबत.

मुकेश तो सब बातों से बेखबर लेनदारों के मारे जो सवेरे 8 बजे घर से निकलता तो रात के 11 बजे से पहले आने का नाम ही न लेता. झेलना तो सब शुभा को पड़ता था. कभी टैलीविजन की किस्त, तो कभी लाला के तकाजे.

दूध वाला तो जैसे धरने पर ही बैठ गया था. बड़ी मुश्किल से अगले दिन पर टाला था. वह जातेजाते बड़बड़ा रहा था, ‘‘बड़े रईसजादे बनते हैं. फोकट

का दूध बड़ा अच्छा लगता है. पराया पैसा बाप का पैसा समझते हैं. मुफ्तखोर कहीं के…’’

शुभा आगे न सुन सकी थी. सुबह से ही सोचने लगी थी कि आज दूध वाला जरूर ही आएगा. क्या बहाना बनाया जाएगा? यह सोच कर उस ने बड़ी बेटी सुधा को तैयार किया कि कह देना घर में मेहमान आए हैं, मेहमानों की नजर में तो हमें न गिराइए.’’

यह कह कर सुधा को मुसकराने की हिदायत भी शुभा ने दे दी थी. उस के मोती जैसे दांतों की मुसकान कुछ न कुछ रियायत करवा देगी, शुभा को ऐसा यकीन था. लाला के आने के बारे में उस ने खुद को तसल्ली दी कि उसे तो वह खुद ही टरका देगी.

यह सोचने के साथ ही शुभा ने आईना ले कर अपना चेहरा देखा. बालों की सफेद हो आई लटों को बड़ी होशियारी से काली लटों में दबाया और होंठों पर मुसकान लाने की कोशिश करने लगी. उसे लगा जैसे अभी इस उम्र में भी वह काफी खूबसूरत है और बूढ़े रंडुए लाला के दिल की डोर आसानी से पहली तारीख तक नचा सकती है.

पर दूसरे ही पल शुभा को अपने इस नीच खयाल पर शर्मिंदगी महसूस हुई. देहात के चौधरी, जिन की भैंसें 10-10 लिटर दूध देती हैं, जहां अन्न के भंडार भरे रहते हैं, जिन की बात पर लोग जान देने को तैयार रहते हैं, क्या उन की बेटी को अपनी मुसकान का सौदा कर के रसद का जुगाड़ करना होगा?

शुभा उस घड़ी को कोसने लगी, जब नौकरीपेशा मुकेश के साथ भारी दानदहेज दे कर उस का ब्याह कर बापू ने अपनी समझ में जंग जीत ली थी. शुरू के कुछ सालों तक वह भी खुश रही, पर जब एक के बाद एक 3 बेटियां हो गईं और पगार कम पड़ने लगी, तो उसे बड़ा अटपटा लगा. जिन चीजों को गांव में गैरजरूरी समझा जाता था, यहां उन्हें लेना मजबूरी बन गया.

शुभा एकदम चौंकी. वह कहां बेकार के खयालों में फंस गई थी. जमाना इतना आगे निकल चुका है और वह मुसकरा कर किसी को देख लेने में भी गलती समझती है. अगर किसी की ओर मुसकरा कर देख लेने से तकलीफ दूर होती हो तो इस में क्या हर्ज है? फिर इस के अलावा उस के पास चारा भी क्या है?

मुकेश को तो इन पचड़ों में पड़ना ही नहीं है. वह पड़े भी तो कैसे? सारी तनख्वाह पत्नी को दे कर जो उसी के दिए पैसों से अपना काम चलाए, उस से शुभा शिकवा भी कैसे करे? कोई उपजाऊ नौकरी पर तो वह है नहीं. शुभा के कहने से ही जाने कितनी बार दफ्तर से कर्ज ले चुका है. सब काटछांट के बाद जो पगार बचती है, वह गुजरबसर लायक नहीं रह जाती. अब उसी को कोई रास्ता ढूंढ़ना होगा.

शुभा ने बड़े प्यार से बेटी सुधा को पुचकार कर उस की कंघी कर दी और याद दिलाया कि वह दूधिए के आने पर क्या कहेगी. उस ने यह भी कहा, ‘‘क्या मातमी सूरत बना रखी है. जब देखो, मुंह लटकाए रहती हो? मुसकराते चेहरे का अपना असर होता है. कई बार जो काम सिफारिशें नहीं कर पाती हैं, वह एक मुसकान से हो जाता है.’’

सुधा की समझ में नहीं आ रहा था कि मां क्या कह रही हैं. रोज तो तनिक हंसी पर नाक चढ़ा लेती थीं, आज उसे हंसने की याद दिला रही हैं. वह सोच ही रही थी कि तभी नीचे से दूधिए की आवाज आई, ‘‘है कोई घर में कि सब बाहर गए हैं? जब देखो बाहर… मर्द बाहर जाता है, तो क्या सारा घर उठा कर साथ ले जाता है?’’

दूधिए का भाषण चालू हुआ ही था कि सुधा होंठों पर उंगली रखे अपनी मां को खामोश रहने का इशारा करते हुए आंखों में ही मुसकराती अंदर से आ गई. दूधिए को दरवाजे के अंदर से टका सा जवाब पाने की उम्मीद थी. इस तरह सुधा के आ जाने पर वह कुछ नरम पड़ गया.

दूधिया कुछ कहना चाहता था कि सुधा बोली, ‘‘चाचा, आज मेहमान आए हुए हैं. आप भी चलिए न ऊपर चाय पी लीजिए. खैर यह हुई कि मेहमान सो रहे हैं, नहीं तो हमारी गरदन ही कट जाती शर्म से,’’ उस के चेहरे पर एक शोख मुसकराहट थी.

हालांकि मां ने मुसकराने भर को ही कहा था, दूधिए को ऊपर लाने को नहीं. पर वह हड़बड़ी में कह गई. दूधिया भी मुसकान बिखेरती छरहरी सुधा के साथ ही ऊपर चढ़ आया. जो पड़ोसी झगड़ा सुनने के लिए दरवाजों के बाहर निकल आए थे, वे बड़े निराश हुए.

पंखे की हवा में दूधिया सपनों की दुनिया में तैरने लगा. सुधा और शुभा अपनी कामयाबी पर खुश थीं.

शुभा को आज सुधा पर बहुत दुलार आ रहा था. दूधिए के सामने वाली कुरसी पर बैठ कर वह बोली, ‘‘देख ले बेटी, दूध भी है या चाचा को काली चाय ही पिलाएगी? न हो तो गणेशी की दुकान से दूध ले आ.’’

‘‘नहींनहीं, इस की कोई जरूरत नहीं है. पतीला दे दीजिए, मैं दूध लिए आता हूं,’’ दूधिया, जो कुछ पल पहले तमतमा रहा था, पालतू जानवर की तरह इशारा समझने लगा था.

नीचे जा कर दूधिया एक खालिस दूध ले आया. शुद्ध दूध वाले डब्बे से. ऐसा दूध तो शुभा को उस ने कभी दिया ही नहीं था.

ज्यादा खालिस दूध की चाय पीते समय शुभा स्वाद से चटखारे ले रही थी. तो सुधा अपनी मां की नजर बचा कर दूधिए की तरफ देख कर मुसकरा देती थी.

दूसरी बच्चियां भी पास ही बैठीं चाय का स्वाद ले रही थीं. अचानक शुभा बोली, ‘‘क्या कहें भैया, आप का पिछला रुपया तो दे नहीं पाए, एक लिटर और चढ़ गया. अब की पगार मिलेगी तो जल्दी निबटा देंगे.

‘‘इस बार तंगी में काली चाय पीतेपीते परेशान हो गए हैं,’’ कहतेकहते वह हंस पड़ी, जैसे काली चाय पीना भी खुशी की बात हो.

‘‘यह लो, आप काली चाय पी रही थीं? हमें क्यों नहीं बताया? हम कोई गैर हैं क्या? रुपयों की आप फिक्र न कीजिए, कल से मैं दूध देने खुद ही आ जाया करूंगा,’’ दूधिया का दिल बीन पर नाचने वाले सांप की तरह झूम रहा था.

दूधिया जाने को उठा तो शुभा ने कहा, ‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है? हां, याद आया, तुम्हारा दूध बांटने का समय बीत रहा होगा. जा बेटी, चाचा को नीचे तक छोड़ आ,’’ शुभा ने सुधा की ओर देख कर हौले से मुसकरा कर कहा.

सुधा ने जाते समय दूधिए की तरफ मुसकरा कर देखा और कहा, ‘‘चाचा, कल थोड़ा फुरसत से आना.’’

दूधिया साइकिल पर बैठा तो उसे लगा जैसे उस के पैरों में पंख लग चुके हैं. उस ने 2 बार पीछे मुड़ कर देखा, दरवाजे पर खड़ी सुधा हाथ हिला कर उसे विदा कर रही थी. सुधा के चेहरे पर मुसकान थी, दूधिए के चेहरे पर वहां से जाने का दर्द.

बच्चियां चाय पी कर बहुत खुश थीं. 2-3 दिन में ही बिना दूध की चाय ने जीभ का स्वाद ही छीन लिया था. दूधिए के जाने के बाद उन्होंने रूखी रोटियां भी चाय के साथ शामिल कर लीं. इस से अच्छा रोटी निगलने का साधन घर में था ही नहीं और अब तो रोटियों का जुगाड़ भी बंद होने को था.

शाम का अंधेरा गली में फैलने लगा था और सामने के खंभे में लगा बल्ब फ्यूज हो गया था. शुभा इस अंधेरे में खुश ही थी, क्योंकि लाला अकसर रात 9 बजे के आसपास दुकान बंद कर के ही उस का दरवाजा खटखटाता था.

लाला हैरान रहता था कि 9 बजे भी मुकेश कभी घर पर नहीं मिला. अब वह बिला नागा वसूली के लिए आने लगा था. सोचता, कितने दिन भागोगे बच्चू, दुकानदारी इसलिए तो नहीं है कि सौदा लुटाया जाए.

शुभा उस से कई बार कह चुकी थी कि वे लोग कहीं भागे नहीं जा रहे हैं. वह नया सौदा देता जाए, पुराना और नया हिसाब एकदम चुकता कर दिया जाएगा. लेकिन लाला ने एक नहीं सुनी थी. वह दहाड़ा था, ‘‘जब पुराना हिसाब नहीं चुका सकते, तो नया क्या खाक चुकाओगे?’’

शुभा जानती थी कि लाला अपनी तोंद पर धोती की फेंट सही करता हुआ कुछ देर के बाद आने ही वाला है. पर वह 7 बजे ही आ कर दरवाजा खटखटाने लगा. उस ने सोचा था कि मुकेश 9 बजे तक खापी कर टहलने निकल जाता होगा, इसलिए उस के पहले ही पहुंचना ठीक रहेगा. रुपए न दिए तो ऐसी खरीखरी सुनाऊंगा कि कान बंद कर लेगा बच्चू. ऐसे मौकों पर दरवाजा ही बंद रहता था और ऊपर से कोई बच्ची कह देती थी, ‘‘पिताजी घर में नहीं हैं.’’

तब लाला चीख उठता था, ‘‘पिताजी जाएं जहन्नुम में, मेरा पैसा मुझे अभी चाहिए.’’

पर इस के आगे लाला बेबस हो जाता था, क्योंकि ऊपर से झांकने वाली बच्ची तब तक गायब हो चुकी होती. लिहाजा, वह भुनभुनाता हुआ लौट जाता. लेकिन अब वह इन्हें इतने सस्ते में छोड़ने को तैयार नहीं था.

उधर अब की बार कमान सुधा के बजाय उस की मां ने संभाली. मुसकराने की कोशिश करते हुए वह दरवाजे तक गई, फिर लाला को गुस्से में देख कर बोली, ‘‘सेठजी, मेहमान आए हुए हैं. मेहरबानी कर के कुछ कहिएगा नहीं, इज्जत का सवाल है.’’

मीठी मुसकान के साथ मीठी बोली सुन कर सेठ कुछ नरम पड़ गया.

धोती की फेंट से वह मुंह का पसीना पोंछने लगा. अपनी कंजी आंखों से वह शुभा को घूरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, फिर कब आऊं यही बता दो?’’

‘‘चाहे जब आइए, घर आप का है और अभी जाने की इतनी जल्दी भी क्या है. दुकान के काम से दिनभर के थकेमांदे होंगे. एक प्याला चाय पी लीजिए, फिर जाइएगा,’’ शुभा मुसकराई. उस की आंखों में भी बुलावा था. सेठ में इतनी हिम्मत नहीं थी कि ऐसे प्यार भरे बुलावे को ठुकरा सकता.

सेठ पंखे के नीचे बैठ गया. जीना चढ़ने से हांफ गया था. उस की तोंद ऊपरनीचे हो रही थी, जिस को काबू में करने की कोशिश में वह दम साध रहा था कि सुधा ने मुसकरा कर पानी का गिलास सामने रख दिया.

एक घूंट में गिलास का पानी गटक कर सेठ कमरे की सजावट देखने लगा. 5 मिनट में चाय हाजिर थी. इस बार शुभा ने सामने की कुरसी पर बैठतेहुए चाय पीना शुरू किया तो पढ़ने का वास्ता दे कर लड़कियां कमरे से बाहर हो गईं.

चाय के साथसाथ शुभा के गुदाज जिस्म पर नजर गड़ा कर बैठे सेठ को लगा कि वह एक अरसे से ऐसे प्यार भरे माहौल के लिए तरस गया है. दिनरात बैल की तरह खटो, फिर भी बहुएं रोटी के साथ जलीकटी बातें परोसने से बाज नहीं आतीं. एक यह है जो कुछ भी नहीं लगती, लेकिन अपनेपन का झरना बहा रही है.

बातों ही बातों में समय की रफ्तार का उसे तब पता चला, जब एक घंटा बीत गया. न चाहते हुए भी सेठ उठ कर बोला, ‘‘अच्छा शुभाजी… अब चलूंगा. तनख्वाह तक रुपए मिल सकें तो ठीक है, न मिल सकें तो ज्यादा परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. फिर देखा जाएगा.’’

‘‘मैं तो चाहती थी कि आप खाना खा कर जाते. देख सुधा, आटे के कनस्तर में कुछ है? न हो तो बाजार से दौड़ कर आटा ले आ. चाचा पहली दफा यहां आए हैं, क्या भूखा भेजेगी?’’ शुभा मुसकरा कर अंगड़ाई लेते हुए बोली.

‘‘क्या आटा तक घर में नहीं है? मैं कोई पराया हूं, जो मुझे नहीं बताया. मैं जानता हूं, महीने के आखिरी दिन ऐसे ही कड़की के होते हैं. खैर, आज तो मैं नहीं खाऊंगा. हां, थोड़ी देर में मेरा नौकर सामान दे जाएगा. जब जरूरत हो, बता दिया करना,’’ कहते हुए लाला उठ खड़ा हुआ.

इस बार सुधा बोली, ‘‘हाय मां, चाचाजी जा रहे हैं. कम से कम दरवाजे तक इन्हें छोड़ तो आइए.’’

शुभा लाला को दरवाजे तक छोड़ने गई. उस ने हंस कर लाला से कहा, ‘‘फिर आइएगा कभी, आज तो आप की कोई सेवा न कर सकी.’’

लाला जातेजाते मुड़ कर देखता गया. शुभा दरवाजे पर खड़ी उसे देख रही थी. लाला की धोती कई बार पैरों में फंसने को हुई.

थोड़ी ही देर में लाला का नौकर आटा, दाल, चावल के साथ रिफांइड तेल और सब्जी भी दे गया था.

मुकेश के आने में अभी देर थी. रसोई में पकवानों की खुशबू बच्चियों के पेट की भूख और बढ़ा रही थी. यह सारा महाभोज उन की नजर में नकारा बाप को और भी नकारा कर गया था, मां का वजन उस की निगाहों में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था.

सब से छोटी बेटी तो हैरानी से पूछ ही बैठी, ‘‘मां, कहां आज रोटी का जुगाड़ भी नहीं था और कहां इतनी सारी अच्छीअच्छी खाने की चीजें तैयार हो गईं. यह सब कैसे हो गया?’’

‘‘बेटी, सब वक्त की मेहरबानी है. जिस घर में मेहमान आते रहते हैं, उस घर में बरकत रहती है. बड़े अच्छे लोग होते हैं, जिन के घर मेहमान आते हैं,’’ शुभा ने मासूम बच्चियों को समझाया.

दूसरी बच्ची बोली, ‘‘मां, चाय और खानेपीने का सामान देने वाले मेहमानों के अलावा नोट देने वाले, कपड़े देने वाले और सुंदरसुंदर खिलौने देने वाले मेहमान क्या हमारे घर कभी नहीं आएंगे?’’

बच्ची को तसल्ली देते हुए शुभा बोली, ‘‘आएंगे बेटी, नोटों वाले मेहमान भी आएंगे. तुम अपने पिता से कहना कि अपने दोस्तों को भी कभीकभी घर लाया करें. क्या पता, उन्हीं के आने से रुपएपैसे भी मिलने लगें.’’

वैसे, बच्ची के मासूम सवाल पर शुभा का गला भर आया था. फिर आंसू छिपाने के लिए वह खिड़की की तरफ चली गई.

मुकेश के आने में अभी देर थी. दरवाजे के पास एक शराबी मदहोशी में लड़खड़ा रहा था. उस की जेब में नोटों की गड्डी झांक रही थी.

शुभा को लगा, अब बच्ची की चाह पूरी होने को है. उस ने झांक कर गली के दोनों छोरों की ओर देखा. अंधेरे में दूरदूर तक किसी आदमी की परछाईं भी नहीं थी. उस के चेहरे पर दिनभर की कामयाबी को याद कर एक मुसकान छा गई. अब वह जीना उतर कर नीचे जाने को तैयार थी.

दगाबाज सहेली : चंदा और कोमल की दोस्ती क्या रंग लाई

चंदा सचमुच आसमान के चंदा जैसी खूबसूरत थी. वह सुशील, भोलीभाली, सरल स्वभाव की लड़की थी. 17 साला चंदा की एक झलक पाने को मंझावन गांव के नौजवान उस के घर के आसपास चक्कर काटते थे. उस के घर के पास ही पानकी एक गुमटी थी और वहां अकसर चहलपहल रहती थी.

चंदा अपने मातापिता की तरह सीधीसादी थी. वह रोज सुबह से ही काम पर लग जाती थी और शाम को मां के साथ खाना बनाती थी.

गांव में चंदा की एक ही सहेली थी, जिस का नाम कोमल था. उन दोनों की दोस्ती बचपन से थी. कोमल गुणरूप में चंदा के ठीक उलट मनचली और सांवले रंग की थी. पर उस के बदन में गजब का कसाव था. जब वह चलती थी, तब उस की जवानी अंगअंग से छलकती थी.

यही वजह थी कि कोमल के कई लड़कों से प्रेमसंबंध चल रहे थे, लेकिन चंदा को कोमल की इन हरकतों की कभी भनक नहीं लगी, क्योंकि वह उस पर आंख मूंद कर भरोसा करती थी.

जबजब कोमल के प्रेमी उसे लहंगाचोली, पायल, चूड़ी या झुमकी देते, तो वह उन चीजों को जरूर दिखाती थी. चंदा भी बहुत खुश होती थी. उस के पूछने पर कोमल झूठ बोल जाती थी. कभी वह कहती कि बाजार से खरीदे हैं या गंगा मेले से लाई है, तो कभी कहती कि उस की मौसी, मामी या बूआ ने दिए हैं.

वे दोनों सहेलियां अकसर कुएं पर पानी भरने जाती थीं, रसोई के लिए सूखी लकडि़यां बीनती थीं और खेतों से चारे का गट्ठर सिर पर ढो कर लाती थीं. रास्ते में अगर कोई मनचला चंदा का रास्ता रोकता या हाथ पकड़ने की कोशिश करता, तो वह गुस्से से उसे चेतावनी देती थी.

कोमल को लड़कों द्वारा की गई इस तरह की छेड़छाड़ बहुत सुहाती थी, लेकिन चंदा की खूबसूरती के आगे कोई भी लड़का उस वक्त उसे भाव नहीं देता था, जिस से कोमल को बहुत झुंझलाहट होती थी.

दरअसल, गांव की दूसरी कई लड़कियों की तरह कोमल भी चंदा की खूबसूरती से जलती थी. जहां एक तरफ गांव के ज्यादातर लड़के चंदा को पाने के लिए बेताब रहते थे, वहीं दूसरी तरफ कोमल के सिर्फ 4-5 लड़के ही आशिक थे.

चंदा का लड़कों के प्रति अक्खड़ रवैया कोमल को नागवार गुजरता था. वह चंदा से कह बैठती, ‘‘अरे यार चंदा, यही जवानी के दिन हैं. मौज कर ले, वरना कहीं उम्र बीत गई तो हालचाल पूछना छोड़, तेरी ओर कोई लड़का मुड़ कर देखेगा भी नहीं.’’

कोमल की ऐसी बातों से चंदा नाराज होती और उसे समझाती, ‘‘ब्याह से पहले यह सब सोचना भी गलत है. जब सही समय आएगा, तो हमारे मातापिता एक अच्छा सा लड़का ढूंढ़ कर ब्याह करा देंगे.’’

लेकिन चंदा के नेक विचारों का मनचली कोमल पर कहां फर्क पड़ना था. वह तो ‘आज’ में जीने वाली लड़की थी. चंदा तो कोमल को एक आंख न भाती थी.

कोमल की मां यही मानती थीं कि उन की बेटी भी चंदा की तरह अच्छी गुणों वाली है. बस, इसी बात का फायदा उठा कर कोमल चोरीछिपे लड़कों के साथ मौजमस्ती कर लेती थी.

एक दिन की बात है. गांव के नए चुने गए मुखिया का दौरा हुआ. साथ में उन का लड़का राजकुंवर उर्फ राजा भी था. 22 साल के फिल्मी हीरो जैसे बांके जवान राजा को देख ज्यादातर लड़कियों के दिल मचल उठे थे.

रंगीला राजा अपनी हीरो वाली खूबी जानता था. उस ने इस बात का भरपूर फायदा भी उठाया. कुछ ही महीनों में उस ने दर्जनभर लड़कियों से खूब मजे लूटे, फिर धीरेधीरे उसे ये सब फूल बासी लगने लगे, क्योंकि भौंरे को अब नए फूल की तलाश जो थी.

एक बार राजा पान की गुमटी पर बीड़ा चबा रहा था कि तभी उस की नजर गाय और बछड़े को चारा खिला रही चंदा पर पड़ी. उस की खूबसूरती देख वह अपनी सुधबुध खो बैठा.

पनवाड़ी से चंदा के बारे में जान कर राजा वहां से चला तो गया, लेकिन मन उसी पर ही अटका रहा. उस की याद में सारी रात करवटें बदलने में बीती.

अगली सुबह राजा को चंदा के सिवा कुछ न सूझा और फिर उस बेचैन भौंरे ने इस नए फूल को चखने की ठान ली. अब रोजाना बीड़ा खाने के बहाने वह चंदा के घर का रास्ता नापने लगा.

एक दिन मस्ती में गुनगुनाता हुआ राजा खेतों के रास्ते कहीं जा रहा था कि अचानक उसे सिर पर हरा चारा लिए हुए चंदा आती दिखी. साथ में कोमल को देखा, तो उस की कुटिल मुसकान खिल उठी और फिर बुलंद हौसले से भर कर राजा ने चंदा का रास्ता रोक कर उस की कलाई थाम ली.

राजा की इस हरकत पर चंदा ने हाथ झटक कर उसे कड़ी फटकार लगाई. जिस राजा पर लड़कियां मरती हैं, उस के साथ हमबिस्तरी के लिए तैयार रहती हैं, उस के अहम को एक साधारण सी लड़की ने ही चोट पहुंचाई थी.

राजा से यह बेइज्जती बरदाश्त न हुई और उस ने चंदा से बदला लेने का भी एक प्लान बनाया. चूंकि कोमल पहले से ही राजा के प्रेमजाल में फंसी हुई मैना थी, इसलिए उस से अपनी बात मनवाना बाएं हाथ का खेल था. अपना तनमन राजा कोसौंप चुकी कोमल आखिरकार प्रेमी के खतरनाक प्लान में शामिल हो गई. वैसे भी उसे चंदा से कोई खास लगाव नहीं था.

कुछ दिन बाद एक दोपहर को मौका पा कर कोमल चंदा को बातों में लगाए घर से दूर मुखियाजी के ट्यूबवैल वाले खेत पर ले गई. वहीं फसलों के साथ टिन से घिरे बाड़े में राजा की ऐयाशी का अड्डा था, जहां सिगरेट, शराब, परफ्यूम और जोश बढ़ाने का स्प्रे रखा था. वहां राजा कई लड़कियों के साथ रंगरलियां मना चुका था.

कोमल का इशारा पाते ही बाड़े में छिपे राजा ने पीछे से आ कर बेखबर चंदा को दबोच लिया, फिर बाड़े में बिछे गद्दे पर उसे गिरा कर वहशीपन करने लगा. चंदा के कपड़े फट गए. वह चीखी, बचाने के लिए कोमल से कई बार गुहार लगाई, लेकिन वह तो बड़ी बेशर्मी से मुसकराते हुए तमाशा देखती रही.

आखिरकार भेडि़ए राजा ने अपने शिकार मेमने को पूरी तरह खा कर ही छोड़ा.

बाड़े में अब रोती हुई चंदा और उसे झूठी दिलासा देती हुई कोमल ही रह गई थी. चंदा अपनी इस हालत का जिम्मेदार दगाबाज सहेली कोमल को मानती थी. उस ने गुस्से में कोमल को एक जोर का थप्पड़ जड़ दिया, फिर किसी तरह चुनरी से खुद को ढक कर घर चली गई.

अगली सुबह कोमल को उस की मां ने एक खबर दी, तो वह सहम गई. चंदा ने नदी में कूद कर खुदकुशी कर ली थी.

अब कोमल को यह डर सताने लगा कि कहीं चंदा ने मरने से पहले अपने घर में उस की असलियत न बता दी हो, इसलिए वह काफी दिनों तक चंदा के घर नहीं गई.

जब चंदा को मरे 3 महीने बीत गए और कोई पुलिस कार्यवाही भी नहीं हुई, तब कहीं कोमल को पूरी तरह तसल्ली मिली. अब बदनामी और कोर्टकचहरी का कोई खतरा नहीं रह गया था, लेकिन इस बीच राजा से उस के संबंध बने रहे.

कुछ महीने और मजे करने के बाद एक दिन कोमल को एहसास हुआ कि वह पेट से है, तो उस के चेहरे की रंगत उड़ गई.

अगले दिन कोमल ने ट्यूबवैल वाले अड्डे पर पहुंच कर राजा को यह बात बताई और उसे बदनामी से बचाने के लिए शादी करने को कहा.

इतना सुनते ही राजा भड़क उठा. वह कोमल को गरियाते हुए बोला, ‘‘चल भाग यहां से… न जाने किस का बच्चा लिए यहांवहां फिरती है. मुझे इस का बाप बता कर शादी का दबाव डालती है. भाग जा यहां से… दोबारा मेरे पास आई, तो तुझे मार कर नदी में फिंकवा दूंगा.’’

कोमल अपना सब ‘खजाना’ लुटा चुकी थी. अब कुछ न बचा था उस के पास. ऐयाश राजा की जानमाल की धमकी से वह सकपका गई और फिर रोते हुए घर लौट आई.

खतरनाक हो चुके राजा से मुकाबला करने की हिम्मत और हैसियत कोमल के पास नहीं थी. अब रहरह कर उसे मासूम चंदा की नेक नसीहतें याद आ रही थीं. लेकिन अब क्या फायदा… काफी देर हो चुकी थी.

वैसे भी चंदा की मौत की जिम्मेदार खुद कोमल की ही दगाबाजी थी. वह चंदा की हत्यारिन है. उस ने ही चंदा को मारा है. जब सब को उस की बदचलनी पता चलेगी, तो लोगों को क्या जवाब देगी?

यही सब सोचसोच कर कोमल गहरे तनाव में डूब गई और फिर एक रात उस ने कीटनाशक पी कर खुदकुशी कर ली.

चोट: शिवेंद्र अपनी टीस को झेलते हुए कैसे कामयाबी की सीढि़यां चढ़ता गया

दिल्ली से सटे तकरीबन 40 किलोमीटर दूर रावतपुर नाम के एक छोटे से कसबे में अमरनाथ नाम का एक किसान रहता था. उस के पास तकरीबन डेढ़ एकड़ जमीन थी, जिस में फसल उगा कर वह अपने परिवार को पाल रहा था. पत्नी, एक बेटा और एक बेटी यही छोटा सा परिवार था उस का, इसलिए आराम से गुजारा हो रहा था.

अमरनाथ का बड़ा बेटा शिवेंद्र पढ़नेलिखने में बहुत तेज तो नहीं था, पर इंटरमीडिएट तक सभी इम्तिहान ठीकठाक अंकों से पास करता गया था.

अमरनाथ को उम्मीद थी कि ग्रेजुएशन करने के बाद उसे कहीं अच्छी सी नौकरी मिल ही जाएगी और वह खेतीकिसानी के मुश्किल काम से छुटकारा पा जाएगा.

रावतपुर कसबे में कोई डिगरी कालेज न होने के चलते अमरनाथ के सामने शिवेंद्र को आगे पढ़ाने की समस्या खड़ी हो गई. उस ने काफी सोचविचार कर बच्चों को ऊंची तालीम दिलाने के लिए दिल्ली में टैंपरेरी ठिकाना बनाने का फैसला लिया और रावतपुर में अपने खेत बंटाई पर दे कर सपरिवार दिल्ली के सोनपुरा महल्ले में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगा.

अमरनाथ ने शिवेंद्र को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए ज्ञान कोचिंग सैंटर में दाखिला करा दिया और बेटी सुमन को पास के ही महात्मा गांधी बालिका विद्यालय में दाखिला दिला दिया. उस ने अपना ड्राइविंग लाइसैंस बनवाया और आटोरिकशा किराए पर ले कर चलाना शुरू कर दिया.

आटोरिकशा के मालिक को रोजाना 400 रुपए किराया देने के बाद भी शाम तक अमरनाथ की जेब में 3-4 सौ रुपए बच जाते थे जिस से उस का घरखर्च चल जाता था.

अमरनाथ सुबह 8 बजे आटोरिकशा ले कर निकालता और शिवेंद्र को कोचिंग सैंटर छोड़ता हुआ अपने काम पर निकल जाता. शिवेंद्र की छुट्टी शाम को 4 बजे होती थी.

अमरनाथ इस से पहले ही कोचिंग सैंटर के पास के चौराहे पर आटोरिकशा ले कर पहुंच जाता और शिवेंद्र को घर छोड़ कर दोबारा सवारियां ढोने के काम में लग जाता.

अमरनाथ सुबहशाम बड़ी चालाकी से उसी रूट पर सवारियां ढोता जिस रूट पर शिवेंद्र का कोचिंग सैंटर था और जब शिवेंद्र को लाते और ले जाते समय कोई सवारी उसी रूट की मिल जाती तो अमरनाथ की खुशी का ठिकाना न रहता.

एक दिन शाम को साढ़े 4 बजे के आसपास अमरनाथ चौराहे पर शिवेंद्र का इंतजार कर रहा था कि तभी ट्रैफिक पुलिस का दारोगा डंडा फटकारता हुआ वहां आ गया और उस से तुरंत अमरनाथ को वहां से आटोरिकशा ले जाने को कहा.

अमरनाथ ने दारोगा को बताया कि उस का बेटा कोचिंग पढ़ कर आने वाला है. वह उसी के इंतजार में चौराहे पर खड़ा है. बेटे के आते ही वह चला जाएगा.

‘‘अच्छा, मुझे कानून बताता है. भाग यहां से वरना मारमार कर हड्डीपसली एक कर दूंगा.’’ दारोगा गुर्राया.

‘‘साहब, अगर मैं यहां से चला गया तो मेरा बेटा…’’

अमरनाथ अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि दारोगा ने ताबड़तोड़ उस पर डंडा बरसाना शुरू कर दिया. उसी समय शिवेंद्र वहां पहुंच गया. अपने पिता को लहूलुहान देख उस की आंखों में खून उतर आया. उस ने लपक कर दारोगा का डंडा पकड़ लिया.

शिवेंद्र को देख अमरनाथ कराहते हुए बोला, ‘‘साहब, मैं इसी का इंतजार कर रहा था. अब मैं जा रहा हूं.’’

अमरनाथ ने शिवेंद्र की ओर हाथ बढ़ाते हुए उठने की कोशिश की तो शिवेंद्र ने दारोगा का डंडा छोड़ अपने पिता को उठा लिया और आटोरिकशा में बिठा कर आटो स्टार्ट कर दिया.

शिवेंद्र ने दारोगा को घूरते हुए आटोरिकशा चलाना शुरू किया तो दारोगा ने एक भद्दी सी गाली दे कर आटोरिकशा पर अपना डंडा पटक दिया.

इस घटना के 3-4 दिन बाद तक शिवेंद्र कोचिंग पढ़ने नहीं गया. हथेली जख्मी हो जाने के चलते अमरनाथ आटोरिकशा चलाने में नाकाम था, इसलिए वह घर पर ही पड़ा रहा और घरेलू उपचार करता रहा.

घरखर्च के लिए शिवेंद्र ने बैटरी से चलने वाला आटोरिकशा किराए पर उसी आटो मालिक से ले लिया जिस से उस के पिता किराए पर आटोरिकशा लेते थे, ताकि ड्राइविंग लाइसैंस का झंझट न पड़े. वह पूरे दिल से आटोरिकशा चलाता और फिर देर रात तक पढ़ाई करता.

एक दिन रात को शिवेंद्र पढ़तेपढ़ते सो गया. उस की मां की नींद जब खुली तो उस ने शिवेंद्र की किताब उठा कर रख दी. तभी उस की निगाह तकिए के पास रखे बड़े से चाकू पर गई.

सुबह उठ कर शिवेंद्र की मां ने उस से पूछा, ‘‘तू यह चाकू क्यों लाया है और इसे तकिए के नीचे रख कर क्यों सोता है?’’

अपनी मां का सवाल सुन कर शिवेंद्र सकपका गया. उस ने कोई जवाब देने के बजाय चुप रहना ही ठीक समझा. उस की मां ने जब बारबार यही सवाल दोहराया तो वह दांत पीसते हुए बोला, ‘‘उस दारोगा के बच्चे का पेट फाड़ने के लिए लाया हूं जिस ने मेरे पापा की बेरहमी से पिटाई की है.’’

शिवेंद्र का जवाब सुन कर उस की मां सन्न रह गई.

शिवेंद्र के जाने के बाद मां ने यह बात अमरनाथ को बताई. अमरनाथ ने जब यह सुना तो उस के होश उड़ गए. कुछ पलों तक वह बेचैनी से शून्य में देखता रहा, फिर अपनी पत्नी से कहा, ‘‘तू ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? उसे घर के बाहर क्यों जाने दिया? अगर वह कुछ ऐसावैसा कर बैठा तो…?’’

रात को 8 बजे जब आटोरिकशा वापस जमा कर के शिवेंद्र घर लौटा और दिनभर की कमाई पिता को दी तो अमरनाथ ने उसे अपने पास बैठा कर बहुत प्यार से समझाया, ‘‘बेटा, दारोगा ने सही किया या गलत, यह अलग बात है, मगर जो तू कर रहा है, उस से न केवल तेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी, बल्कि पूरा परिवार ही तबाह हो जाएगा.

‘‘हम सब के सपनों का आधार तू ही है बेटा, इसलिए दारोगा से बदला लेने की बात तू अपने दिमाग से बिलकुल निकाल ही दे, इसी में हम सब की भलाई है.’’

शिवेंद्र चुपचाप सिर झुकाए अपने पिता की बातें सुनता रहा. दुख और मजबूरी से उस की आंखें डबडबा आईं. बहुत समझाने पर उस ने अपनी कमर में खुंसा चाकू निकाल कर अमरनाथ के सामने फेंक दिया और उस के पास से हट गया.

अमरनाथ ने चुपचाप चाकू उठा कर अपने बौक्स में रख कर ताला लगा दिया.

अगले दिन अमरनाथ ने चोट के बावजूद खुद आटोरिकशा संभाल लिया और शिवेंद्र को ले कर कोचिंग सैंटर गया.

शिवेंद्र जब आटो से उतर कर कोचिंग सैंटर चला गया तो कुछ देर तक अमरनाथ बाहर ही खड़ा रहा. फिर कोचिंग सैंटर के हैड टीचर जिन्हें सब अमित सर कहते थे, के पास गया और उन्हें दारोगा वाली पूरी बात बताई.

अमित सर ने अमरनाथ की पूरी बात सुनी और उसे भरोसा दिलाया कि वे शिवेंद्र की काउंसलिंग कर के जल्दी ही उसे सही रास्ते पर ले आएंगे.

अमरनाथ के जाने के बाद अमित सर ने शिवेंद्र को अपने कमरे में बुलाया और उस से पुलिस द्वारा की गई ज्यादती के बारे में पूछा, तो शिवेंद्र फफक कर रो पड़ा.

जब शिवेंद्र 5-7 मिनट तक रो चुका तो अमित सर ने उसे चुप कराते हुए सवाल किया, ‘‘क्या तुम जानते हो कि पुलिस वाले ने तुम्हारे पिता पर हाथ क्यों उठाया?’’

‘‘सर, उन की कोई गलती नहीं थी. वे चौराहे पर मेरा इंतजार कर रहे थे. यह बात उन्होंने उस पुलिस वाले को बताई भी थी.’’

‘‘मतलब, उन की कोई गलती नहीं थी. अब यह बताओ कि अगर तुम्हारे पिता की जगह पर कोई अमीर आदमी बड़ी सी महंगी कार लिए अपने बेटे का वहां इंतजार कर रहा होता तो क्या पुलिस वाला उस आदमी पर हाथ उठाता?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘इस का मतलब यह है कि गरीब होने के चलते तुम्हारे पिता के ऊपर हाथ उठाने की हिम्मत उस दारोगा ने की.’’

‘‘जी सर.’’

‘‘तो बेटा, तुम्हें उस दारोगा से बदला लेने के बजाय उस गरीबी से लड़ना चाहिए जिस के चलते तुम्हारे पिता की बेइज्जती हुई. होशियारी इनसान से लड़ने में नहीं, हालात से लड़ने में है.

‘‘अगर तुम लड़ना ही चाहते हो तो गरीबी से लड़ो और इस का एक ही उपाय है ऊंची तालीम. अपनी गरीबी से संघर्ष करते हुए खुद को इस काबिल बनाओ कि उस जैसे पुलिस वाले को अपने घर में गार्ड रख सको.

‘‘तुम मेहनत कर के आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में कामयाबी पाओ. फिर इंजीनियरिंग की डिगरी हासिल कर के कोई बड़ी नौकरी हासिल करो. फिर तुम देखना कि वह दारोगा ही क्या, उस के जैसे कितने ही लोग तुम्हारे सामने हाथ जोड़ेंगे और आईएएस बन गए तो यही दारोगा तुम्हें सैल्यूट मारेगा.

‘‘तुम्हारे इस संघर्ष में मैं तुम्हारा साथ दूंगा. बोलो, मंजूर है तुम्हें यह संघर्ष?’’

अमित सर की बात सुन कर शिवेंद्र का चेहरा सख्त होता चला गया, मानो उस की चोट फूट कर बह जाने के लिए उसे बेताब कर रही हो.

शिवेंद्र ने दोनों हाथ उठा कर कहा, ‘‘हां सर, मैं लडूंगा. पूरी ताकत से लड़ूंगा और इस लड़ाई को जीतने के लिए जमीनआसमान एक कर दूंगा.’’

दारोगा के गलत बरताव से शिवेंद्र के मन पर जो चोट लगी थी उस की टीस को झेलते हुए वह कामयाबी की सीढि़यां चढ़ता गया और आईआईटी मुंबई से जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर के लौटा तो 35 लाख रुपए सालाना तनख्वाह का प्रस्ताव भी जेब में ले कर आया. शिवेंद्र ने अपनी तनख्वाह के बारे में जब अमरनाथ को बताया तो उस का मुंह खुला का खुला रह गया, फिर वह तकरीबन चीखते हुए बोला, ‘‘अरे शिवेंद्र की मां, इधर आ. देख तो अपना शिवेंद्र कितना बड़ा आदमी हो गया है.’’

पूरे परिवार के लिए वह दिन त्योहार की तरह बीता. शाम को काजू की बरफी ले कर शिवेंद्र अमित सर के घर पहुंचा तो उन्होंने उसे गले लगा कर उस की पीठ थपथपाई और बोले, ‘‘मुझे खुशी है कि वक्त ने तुम्हारे दिल को जो चोट दी, उसे तुम ने सहेज कर रखा और उस का इस्तेमाल सीढ़ी के रूप में कर के तरक्की की चोटी तक पहुंचे.

‘‘अब तुम्हें पीछे मुड़ कर देखने की जरूरत नहीं है. बस, यह ध्यान रखना कि किसी को तुम्हारे चलते बेइज्जत न होना पड़े, किसी गरीब को तुम से चोट न पहुंचे, यही तुम्हारा असली बदला होगा.’’

परिचय: कौन पराया, कौन अपना

मैं अपने केबिन में बैठी मुंशीजी से पेपर्स टाइप करवा रही थी. मन काम में नहीं लग रहा था. पिछले 1 घंटे से मैं कई बार घड़ी देख चुकी थी, जो लंच होने की सूचना शीघ्र ही देने वाली थी. दरअसल, मुझे वंदना का इंतजार था. पूरी वकील बिरादरी में एक वही तो थी, जिस से मैं हर बात कर सकती थी. इधर घड़ी ने 1 बजाया,

उधर वंदना अपना काला कोट कंधे पर टांगे और अपने चेहरे को रूमाल से पोंछती हुई अंदर दाखिल हुई. मेरे चेहरे पर मुसकान दौड़ गई. ‘‘बहुत गरमी है आज,’’ कहती हुई वंदना कुरसी खींच कर बैठ गई. मुंशीजी खाना खाने चले गए. मेरा चेहरा फिर गंभीर हो गया. वंदना एक अच्छी वकील होने के साथ ही मन की थाह पा लेने वाली कुशाग्रबुद्धि महिला भी है.

‘‘आज फिर किसी केस में उलझ गई हैं श्रीमती सुनंदिता सिन्हा,’’ उस ने प्रश्नसूचक दृष्टि मेरे चेहरे पर टिका दी.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘इस ‘नहीं तो’ में कोई दम नहीं है. तुम कोई बात छिपाते वक्त शायद यह भूल जाती हो कि हम पिछले 3 साल से साथ हैं और अच्छी दोस्त भी हैं.’’

मैं उत्तर में केवल मुसकरा दी.

‘‘चलो, चल कर लंच करें, मुझे बहुत भूख लगी है,’’ वंदना बोली.

‘‘नहीं वंदना, यहीं बैठ जाओ. एक दिलचस्प केस पर काम कर रही हूं मैं.’’

‘‘किस केस पर काम चल रहा है भई?’’ वह उतावली हो कर बोली.

मैं उसे नम्रता के बारे में बताने लगी.

‘‘आज नम्रता मेरे पास आई थी. वह सुंदर, मासूम, भोलीभाली, बुद्धिमान युवती है. 4 साल पहले उस की शादी मुकुल दवे के साथ हुई थी. दोनों खुश भी थे. किंतु शादी के तकरीबन 2 साल बाद उस का परिचय एक अन्य लड़की के साथ हुआ. उन दोनों के बारे में नम्रता को कुछ ही दिन पहले पता चला है. मुकुल, जो एक 3 साल के बेटे का पिता है, उस ने गुपचुप ढंग से उस लड़की से 2 साल पहले विवाह कर रखा है. लड़की उसी के महल्ले में रहती थी. अजीब बात है.’’

‘‘ऐसा तो हर रोज कहीं न कहीं होता रहता है. तुम और मैं, वर्षों से देख रहे हैं. इस में अजीब बात क्या है?’’ वंदना बोली.

‘‘अजीब यह है कि लड़की उसी महल्ले में रहती थी, जिस में नम्रता. बल्कि नम्रता उस लड़की को जानती थी. हैरानी तो इस बात की है कि उन दोनों के पास रहते हुए भी वह यह कैसे नहीं जान पाई कि उस के पति के इस औरत के साथ संबंध हैं.’’

वंदना मेरी इस बात पर ठहाका लगा कर हंस पड़ी, ‘‘भई, मुकुल क्या नम्रता को यह बता कर जाता था कि वह फलां लड़की से मिलने जा रहा है और वह उसे रंगे हाथों आ कर पकड़ ले. वैसे नम्रता को उस के बारे में पता कैसे चला?’’

‘‘उस बेचारी को खुद मुकुल ने बताया कि वह उसे तलाक देना चाहता है. नम्रता उसे तलाक देना नहीं चाहती. उस का उस के पति के सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है. कोई प्रोफेशनल टे्रनिंग भी नहीं है उस के पास कि वह आत्मनिर्भर हो सके,’’ मैं ने लंबी सांस छोड़ी.

‘‘क्या वह दूसरी औरत छोड़ने के लिए तैयार  होगा? तुम तो जानती हो ऐसे संबंधों को साबित करना कितना कठिन होता है,’’ वंदना घड़ी देख उठती हुई बोली.

‘‘मुश्किल तो है, लेकिन लड़ना तो होगा. साहस से लड़ेंगे तो जरूर जीतेंगे,’’ मेरे चेहरे पर आत्मविश्वास था.

‘‘अच्छा चलती हूं,’’ कह कर वंदना चली गई.

मैं दिन भर कचहरी के कामों में उलझी रही. शाम 5 बजे के लगभग घर लौटी तो शांतनु लौन में मेघा के साथ खेल रहे थे. मेरी गाड़ी घर में दाखिल होते ही मेघा मम्मीमम्मी कह कर मेरी तरफ दौड़ी. मैं मेघा को गोद में उठाने को लपकी. शांतनु हमें देख मंदमंद मुसकरा रहे थे. उन्होंने झट से एक खूबसूरत गुलाब तोड़ कर मेरे बालों में लगा दिया.

‘‘कब आए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘आधा घंटा हो गया जनाब,’’ कह कर शांतनु मेरे लिए चाय कप में उड़ेलने लगे.

‘‘अरे अरे, मैं बना लेती हूं.’’

‘‘नहीं, तुम थक कर लौटी हो, तुम्हारे लिए चाय मैं बनाता हूं,’’ वह मुसकरा कर बोले. तभी फोन की घंटी बजी और अंदर चले गए. मैं आंखें मूंदे वहीं कुरसी पर आराम करने लगी.

शांतनु का यही स्नेह, यही प्यार तो मेरे जीवन का सहारा रहा है. घर आते ही शांतनु और मेघा के अथाह प्रेम से दिन भर की थकान सुकून में बदल जाती है. अगर शांतनु का साथ न होता तो शायद मैं कभी भी इतनी कामयाब वकील न होती कि लोग मुझे देख कर रश्क कर सकें.

दिन बीतते गए. यही दिनचर्या, यही क्रम. पता नहीं क्यों मैं नम्रता के केस में अधिक ही दिलचस्पी लेने लगी थी और हर कीमत पर उस के पति को सबक सिखाना चाहती थी, जो अपनी  पत्नी को छोड़ किसी अन्य पर रीझ गया था.

मुझे नम्रता के केस में उलझे हुए लगभग 1 साल बीत गया. दिन भर की व्यस्तता में वंदना की मुसकराहट मानसिक तनाव को कम कर देती थी. उस दिन भी कोर्ट में नम्रता के केस की तारीख थी. मैं जीजान से जुटी थी. आखिर फैसला हो ही गया.

मुकुल दवे सिर झुकाए कोर्ट में खड़ा था. उस ने जज साहब के सामने नम्रता से माफी मांगी और जिंदगी भर उस लड़की से न मिलने का वादा किया. नम्रता की आंखों में खुशी के आंसू थे. मैं भी बहुत खुश थी. घर लौट कर यही खुशखबरी मैं शांतनु को सुनाना चाहती थी.

उस दिन शांतनु पहली बार लौन में नहीं बल्कि अपने कमरे में मेरा इंतजार कर रहे थे. इस से पहले कि मैं कुछ कह पाती वह बोले, ‘‘बैठो सुनंदिता, मुझे तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं.’’

उन की मुखमुद्रा गंभीर थी. मैं कुरसी खींच कर पास बैठ गई. मैं ने आज तक उन्हें इतना गंभीर नहीं देखा था.

वह बोले, ‘‘हमारी शादी को 6 साल हो गए हैं सुनंदिता और इन 6 सालों में मैं ने यह महसूस किया है कि तुम एक संपूर्ण स्त्री नहीं हो, जो मुझे पूर्णता प्रदान कर सके. तुम में कुछ अधूरा है, जो मुझे पूर्ण होने नहीं देता.’’

मैं अवाक् रह गई. मेरा चेहरा आंसुओं से भीग गया.

वह आगे बोले, ‘‘मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है सुनंदिता. तुम एक चरित्रवान पत्नी, अच्छी मां और अच्छी महिला भी हो. मगर कहीं कुछ है जो नहीं है.’’

शब्द मेरे गले में घुटते चले गए, ‘‘तो इतना बता दो शांतनु, वह कौन  है, जिस के तुम्हारे जीवन में आने से मैं अधूरी लगने लगी हूं?’’

‘‘तुम चाहो तो मेघा को साथ रख सकती हो. उसे मां की जरूरत है.’’

‘‘मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दो, शांतनु, कौन है वह?’’

वह खिड़की के पास जा कर खड़े हो गए और अचानक बोले, ‘‘वंदना.’’

मुझ पर वज्रपात हुआ.

‘‘हां, एडवोकेट वंदना प्रधान.’’

मैं बेजान हो गई. यहां तक कि एक सिसकी भी नहीं ले सकी. जी चाह रहा था कि पूछूं, कब मिलते थे वंदना से और कहां? सारा दिन तो वह कोर्ट में मेरे साथ रहा करती थी. तभी वंदना के वे शब्द मेरे कानों में गूंज उठे, ‘क्या मुकुल नम्रता को बता कर जाता होगा कि कब मिलता है उस पराई स्त्री से. ऐसा तो रोज ही होता है.’

‘मैं नम्रता से कहा करती थी कि कैसी बेवकूफ स्त्री हो तुम नम्रता, पति के हावभाव, उठनेबैठने, बोलनेचालने से तुम इतना भी अंदाजा नहीं लगा सकीं कि उस के दिल में क्या है.’ मैं खुद भी तो ऐसा नहीं कर पाई.

मैं ने कस कर अपने कानों पर हाथ टिका लिए. जल्दीजल्दी सामान अपने सूटकेस में भरने लगी. शांतनु जड़वत खड़े रहे. मैं मेघा की उंगली थामे गेट से बाहर निकल आई.

अगले दिन मैं कोर्ट नहीं गई. दिमाग पर बारबार अपने ही शब्द प्रहार कर रहे थे, ‘एक महल्ले में रह कर भी नम्रता कुछ न जान पाई’ और मैं दिन में वंदना और शाम को शांतनु इन दोनों के बीच में ही झूलती रही थी फिर भी…गिला करती तो किस से. पराया ही कौन था और अपना ही कौन निकला. एक पल को मन चाहा कि मुकुल की तरह शांतनु भी हाथ जोड़ कर माफी मांग ले. लेकिन दूसरे ही पल शांतनु का चेहरा खयालों में उभर आया. मन वितृष्णा से भर उठा. मैं शायद उसे कभी माफ न कर सकूं?

मैं नम्रता नहीं हूं. अगले दिन मुंशी जी टाइपराइटर ले कर बैठे और बोले, ‘‘जी, मैडम, लिखवाइए.’’

‘‘लिखिए मुंशीजी, डिस्साल्यूशन आफ मैरिज बाई डिक्री ओफ डिवोर्स सुनंदिता सिन्हा वर्सिज शांतनु सिन्हा,’’ टाइपराइटर की टिकटिक का स्वर लगातार ऊंचा हो रहा था.

मुनव्वर फारूकी डैमेज पर्सन या प्लेबौय?

मुनव्वर फारूकी ने अपने अतीत में बहुतकुछ बोला, पर अब वह सोशल मीडिया की विवादित पर्सनैलिटी बन चुका है. स्टैंडअप कौमेडी से चर्चाओं में आने के बाद मुनव्वर ‘लौकअप’ और ‘बिग बौस’ जैसे बड़े रिऐलिटी शोज जीतने में कामयाब रहा. शायर व सिंगर के रूप में पहचान बनाने वाला मुनव्वर अब प्लेबौय की इमेज भी बना चुका है. ये ‘‘वो था तूफान, जो दस्तक दे कर आया था, अकेला था, लगा था लश्कर ले कर आया था. वो पूछेंगे किस की है ये लोहे जैसी लेगैसी, कहना वो डोंगरी वाला आग ले कर आया था.’’

लाइनें हैं फेमस रिऐलिटी शो ‘बिग बौस 17’ के विनर मुनव्वर फारूकी की. वही मुनव्वर जिस ने कंगना रनौत के रिऐलिटी शो ‘लौकअप रूम’ की ट्रौफी भी जीती थी. मुनव्वर स्टैंडअप कौमेडियन है, सिंगर है, शायर है, रैपर है. अब जबकि मुनव्वर ने बिग बौस 17 की ट्रौफी जीत ली है तो उसे किसी पहचान की जरूरत नहीं है.

जीतने के बाद जब वह डोंगरी गया तो हजारों की भीड़ ने ऐसा उस का स्वागत किया जैसे वह कोई बड़ा नेता या ऐक्टर हो. किस ने सोचा था कि गुजरात के जूनागढ़ का एक लड़का इतना बड़ा खिताब जीत जाएगा. शायद किसी ने भी नहीं. लेकिन कहते हैं, ‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिन के सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है.’

दंगों की आंच भी झोली मुनव्वर फारूकी ने अपने इन्हीं हौसलों की बदौलत वह मुकाम पा लिया जिस का सपना सभी ने कभी न कभी देखा होता है. मुनव्वर का यह सफर आसान नहीं था. यहां तक पहुंचने के लिए उस ने कई मुश्किलों का सामना किया. 2002 के गुजरात दंगों में जलने वाले घरों में एक घर मुनव्वर का भी था. वही दंगा जिस की चपेट में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई.

मुन्नवर ने ऐसा भी वक्त देखा जब घर के बरतनों को बेच कर दो वक्त के खाने का जुगाड़ किया गया. आज मुनव्वर मुंबई में रहता लेकिन वह हमेशा से यहां नहीं रहता था. 28 जनवरी, 1992 को गुजरात के जूनागढ़ में पैदा हुआ मुन्नवर 3 बहनों का भाई है. जब मुनव्वर 16 साल का था तब उस की मां ने 3,500 रुपए कर्ज न चुका पाने के चलते सुसाइड कर लिया था. 2008 में मुनव्वर के पिता उसे और अपनी तीनों बेटियों को ले कर मुंबई आ गए थे.

वे मुंबई के डोंगरी में रहने लगे. मुंबई आने के बाद उस के पिता की बीमारी के चलते मौत हो गई. 17 साल की उम्र में मुनव्वर के ऊपर पूरे परिवार की जिम्मेदारियां आ गईं. मुनव्वर दिन में बरतन की शौप में सेल्समैन की जौब करता तो रात में कंप्यूटर क्लासेस लेता. मुनव्वर ने ग्राफिक डिजाइनर का कोर्स भी किया. एक दिन उस की नजर पोस्टर पर लिखे वन लाइनर पर गई.

उस ने सोचा कि यह तो मैं भी लिख सकता हूं. इस के बाद उस ने लिखना शुरू किया और लिखता गया. यहां से उस की लाइफ में 180 डिग्री का बदलाव आया. एक दिन उसे पता चला कि स्टैंडअप कौमेडी नाम की भी कोई चीज होती है. फिर क्या था, वह स्टैंडअप की दुनिया में आ गया और महज कुछ ही सालों में स्टैंडअप कौमेडी की दुनिया में छा गया. विवाद से भी जुड़ाव सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था. घर में हालात भी ठीक हो गए थे. लेकिन साल 2021 में वह मध्य प्रदेश के एक कैफे में स्टैंडअप कर रहा था. वहां उस पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगा.

आरोप लगाने वाले भगवाधारी थे. उसे स्टेज पर पीटा भी गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया. 35 दिन जेल में रहने के बाद उसे सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई. पूरा मामला यह था कि उस ने हिंदू देवता राम और उन की पत्नी सीता का संदर्भ दे कर एक चुटकुला सुनाया था. मुनव्वर ने एक बौलीवुड गाने के लिरिक्स के साथ शुरुआत की, जिस में एक महिला अपने प्रेमी की वापसी का जश्न मनाती है और गाना गाती है, ‘‘मेरा पिया घर आया, ओ रामजी.’’ फिर पंचलाइन आती है, ‘‘रामजी कहते हैं अपने प्रिय के बारे में बकवास मत करो. मैं खुद 14 साल से घर नहीं लौटा हूं.’’

इस पर भगवा गैंग भड़क गया और गैंग ने मुनव्वर फारूकी के खिलाफ मोरचा खोल दिया और उन्हें सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस दौरान फारूकी के समर्थन में सामने आए लोकप्रिय स्टैंडअप कौमेडियन और पटकथा लेखक वरुण ग्रोवर ने कहा, ‘‘सिस्टम में अब इतनी शक्ति है कि वह बिना किसी सुबूत के आप को दबा सकता है. इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुनव्वर ने पहले से मौजूद किसी भी रेड लाइन को पार नहीं किया है.

सिस्टम यानी व्यवस्था जमीन पर नई मनमानी लाल रेखाएं बना सकता है और आप को आप के विचारों के लिए गिरफ्तार कर सकता है.’’ जेल से बाहर आने के बाद मुनव्वर और भी ज्यादा सुर्खियों में आ गया. उस वक्त उसे जान से मारने की धमकी भी मिली. उस के शो कैंसिल करवा दिए गए. उस के कई शहरों में आने पर पाबंदी लगा दी गई पर ह्यूमर की समझ और बोलने की आजादी का समर्थन करने वाले युवाओं ने उसे सपोर्ट किया.

वह भले स्टैंडअप से दूर रहा पर लोगों के मन में उस ने जगह बना ली. इसी के चलते 2022 में एकता कपूर के बैनर तले ‘लौकअप रूम’ सीजन 1 आया. इसी शो में लोगों ने यह जाना कि मुनव्वर एक इमोशनल और डैमेज पर्सन है. शो में वह यह बोलते हुए रो गया कि उस की मां ने महज 3,500 रुपए के कर्ज के बो?ा तले सुसाइड कर लिया. इस का गम उसे हमेशा रहेगा.

चाहे वह कितना भी बड़ा आदमी बन जाए, चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न हो वह कभी यह नहीं भूलेगा कि उस की मां की मौत गरीबी की वजह से हुई है. इस वजह से उसे जनता से सहानुभूति भी मिली और अंत में वह शो भी जीत गया. इस के बाद वह बिग बौस 17 में गया और शो की ट्रौफी अपने नाम की. शो में जहां वह अपने शायराने अंदाज और कौमेडी से सब का दिल जीत रहा था, वहीं बिग बौस के घर में उस की एक और इमेज बन कर सामने आई. वह थी प्लेबौय की इमेज.

उस की प्लेबौय इमेज का खुलासा बिग बौस में वाइल्ड कार्ड एंट्री करने वाली आयशा खान ने किया. उस ने बताया कि मुनव्वर टू टाइमिंग कर रहा था और वह उस की एक्स बौयफ्रैंड है. इस से पहले मुनव्वर का नाम ‘लौकअप रूम’ शो के दौरान कच्चा बादाम फेम गर्ल अंजली अरोड़ा के साथ भी जुड़ा था. अंजली अरोड़ा सोशल मीडिया पर काफी वायरल रहती है.

सभी ने ये कयास लगाए थे कि जल्द ही अंजली अरोड़ा और मुनव्वर साथ होंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ‘लौकअप रूम’ शो में एक टास्क के दौरान कंगना रनौत ने यह खुलासा किया था कि मुनव्वर फारूकी शादीशुदा है और उस का 5 साल का एक बच्चा भी है. लेकिन यह बात मुनव्वर ने किसी को नहीं बताई थी, अंजली को भी नहीं. मुनव्वर फारूकी ने आयशा के दावे का जवाब दिया कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नाजिला सिताशी उस की गर्लफ्रैंड हैं, लेकिन आयशा खान ने दावा किया कि नाजिला सिताशी से तो उस का कब का ब्रेकअप हो चुका है और मुनव्वर 2 महीने से दूसरी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आयशा के साथ है. वह ‘आई लव यू’ भी बोल चुका है.

आयशा ने मुनव्वर फारूकी पर कई लड़कियों की लाइफ बरबाद करने का भी आरोप लगाया था. आयशा ने आरोप लगाया कि मुनव्वर फारूकी ने सिर्फ 2 महीने में करीब 50 लड़कियों से रिलेशन बनाए. उस ने यह भी कहा कि उस ने न सिर्फ नाजिला सिताशी और उसे चीट किया, बल्कि वह अपनी एक्स वाइफ को भी धोखा दे चुका है. मुनव्वर ने आयशा से माफी मांगने के बाद नाजिला को ले कर दावा किया कि उस ने चीट किया था. मुनव्वर ने कहा कि नाजिला ने पहले उसे धोखा दिया था.

इस की वजह से उस ने किसी और के साथ रह कर फिर नाजिला को चीट किया. मुनव्वर ने यह भी कहा कि नाजिला धमकी देती थी कि अगर वह उसे छोड़ कर गया तो वह उसे बरबाद कर देगी. इधर ‘लौकअप’ रिऐलिटी शो में मुनव्वर फारूकी के साथ दोस्ती को ले कर चर्चा बटोर चुकीं अंजली अरोड़ा ने भी कुछ ऐसा बयान दिया जो उस दौरान चर्चा का विषय बना था.

एक इंटरव्यू के दौरान अंजलि अरोड़ा ने कहा था, ‘मुनव्वर फारूकी अपने शब्दों से इंसान को पलटना और घुमाना भी जानते हैं.’ उस ने कहा कि मुनव्वर फारूकी की लाइफ में कई लड़कियां हैं, जिन के नाम अभी सामने आने बाकी हैं. वह उतना ही बताता है जितना कि उसे बताना होता है. मुनव्वर प्लेबौय है या डैमेज पर्सन यह तो सब सामने आ चुका है. लेकिन यह जरूर है कि सोशल मीडिया की चमकधमक में वह ऐसा खोया कि वह कभी रिश्तों को सही अंजाम नहीं दे पाया.

जब कोई नीचे से उठ कर एकाएक बड़े मुकाम पर पहुंचता है तो वह अपने बढ़ते फेम को संभाल पाने में नाकाम रहता है, यही मुन्नवर के साथ हुआ है. वह बढ़ते फेम के साथ रिश्ते भी बदलता गया. जो ठहराव उसे चाहिए था वह उसे मिल नहीं पाया. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की यही हकीकत भी है, जहां 3-6 महीने में पार्टनर बदलते रहते हैं.

ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जहां सोशल मीडिया से थोड़ा फेम पाते ही लोग अपने पार्टनर बदल लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस से अच्छी उसे कोई और मिल ही जाएगी. ज्यादा औप्शन दिखने लगते हैं, फिर वह सोचता है कि अब वह अपने कम्पैटिबिलिटी का पार्टनर ढूंढ़े. मुन्नवर फारूकी एक ग्रे शेड कैरेक्टर है. उस ने बहुतकुछ अचीव जरूर किया है पर उस की कीमत भी उसे ही चुकानी है.

जब भीड़ में फंसी प्रेग्नेंट दीपिका पादुकोण, रणवीर से सिंह ने यूं किया सेफ

बौलीवुड स्टार दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह अक्सर ही अपनी फिल्मों और अपनी मैरीड लाइफ को लेकर सुर्खियों में रहते है. इन दिनों दोनों खूब चर्चा में चल रहे है लेकिन इसी वजह उनकी फिल्म नहीं बल्कि एक नन्हा मेहमान आने की खुशी में हो रही है. और इसी को देखते हुए रणवीर सिंह दीपिका को लेकर ज्यादा प्रोटेक्टिव दिख रहे है.


जी हां, दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने हाल ही में फैंस को गुड न्यूज दी है. कपल के घर सितंबर 2024 में किलकारियां गूंजने वाली है. इस गुडन्यूज के बाद कपल, मुंबई के एयरपोर्ट पर स्पॉट हुए थे. यहां दोनों साथ में धासू लुक में नजर आए है. अब इन सब के बाद दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का नया वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में रणवीर सिंह अपनी पत्नी दीपिका पादुकोण को भीड़ से बचाते हुए नजर आए. रणवीर सिंह का ये वीडियो आते ही सोशल मीडिया पर छा गया.

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की जोड़ी इन दिनों सोशल मीडिया पर हमेशा की तरह छाई हुई है. कपल की एक वीडियो खूब वायरल होती दिख रही है. अभी हाल ही में कपल मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी के प्री-वेडिंग सेलिब्रेशन्स में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे थे. जैसे ही कपल जामनगर पहुंचा पैप्स ने उन्हें घेर लिया. इस दौरान रणवीर सिंह अपनी पत्नी दीपिका पादुकोण को भीड़ से बचाते हुए नजर आए. दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का ये वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. रणवीर सिंह के इस वीडियो को उनके फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.साथ ही साथ ट्रोल्स भी रणवीर सिंह की तारीफ करते दिखाई दिए.

 

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दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह का ये वायरल वीडियो आते ही सोशल मीडिया पर छा गया है. रणवीर सिंह और दपिका पादुकोण के इस वीडियो को फैंस जमकर शेयर कर रहे हैं. साथ ही साथ यूजर्स इस वीडियो पर कमेंट भी करते नजर आए. एक यूजर ने कमेंट करते हुए रणवीर सिंह को बेस्ट पति का टैग दे दिया. तो साथ ही साथ ट्रोल्स भी रणवीर सिंह के इस अंदाज के फैन हो गए. रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण के इस वीडियो को लेकर आपकी क्या राय है, कमेंट कर के हमें जरूर बताएं.

40 की उम्र के बाद पुरुष रहना चाहते हैं फिट, तो अपनी डाइट का ऐसे रखें ख्याल

आज के समय में खुद को फिट रखने के लिए लोगों के पास समय नहीं है, खासतौर पर पुरुषों के पास. वो अपनी हेल्थ पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं, लेकिन ये ज़रुरी है कि एक उम्र में आते आते आपको अपनी सेहत का काफी ध्यान रखना चाहिए. ऐसे में ये ज़रूरी है कि 40 की उम्र में पुरुष कैसे फिट रहें. इसके लिए ज़रुरी है कि वो अपनी डाइट में क्या शामिल करें और क्या न करें. क्योकि इस उम्र के बाद आदमी के शरीर में न जाने कितनी बीमारियां घर बना लेती हैं. डायबिटीज, मोटापा, मेटाबॉलिज्म का धीमा होना साथ ही इम्यूनिटी का कमजोर होना. इस तरह की बीमारियां इस उम्र में ज्यादा पकड़ लेती हैं. इसके अलावा हृदय से जुड़ी बीमारियां भी दस्तक देने लगती हैं. ऐसे में अगर आप अपनी जीवन शैली और अपनी थाली को कुछ हेल्दी चीजों से भरेंगे तो आप पूरी तरह फिट रहेंगे. तो आइए जानते हैं कि क्या बदलाव 40 की उम्र में करना जरूरी है. जो आपके शरीर को फिट बनाएं.

बौड़ी को करें हाइड्रेटेड

सबसे पहले ज़रुरी है कि आप अपने शरीर को हाइड्रेट करें. जिससे आपका शरीर फीट बनेंगा, साथ ही किडनी भी सही रुप से कार्य करेंगी. इसके लिए ज़रुरी है, कि एक दिन में कम से कम 2.5 लीटर से लेकर 3 लीटर पानी पिया जाएं. वहीं अगर आप नॉर्मल पानी पीकर बोर हो गए हैं तो आप नारियल पानी, जूस, और हर्बल टी का सेवन शुरू कर सकते हैं. इससे आपकी सेहत को बहुत ज्यादा फायदा होगा और आप 40 की उम्र में भी 20 की तरह फिट रहेंगे.

​फाइबर क्यों जरूरी और कहां से ले

फाइबर हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी होता है. यह आपको न केवल कब्ज जैसी समस्या से बचाता है. बल्कि इससे आपका वजन भी संतुलित बना रहता है. ऐसे में आपको अपनी डाइट में ऐसी सब्जी और फलों को शामिल करना होगा जिनमें प्रचुर मात्रा में फाइबर से भरपूर है. फाइबर के जरिए ही आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल और ब्लड प्रेशर संतुलित रहता है. आप फाइबर के लिए ब्रोकली, कैबेज, अखरोट, स्प्राउट, ग्रीन टी, बैरीज आदि का खा सकते हैं. इन सभी तत्वों में ओमेगा 3 भी होता है जो आपको कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से बचाता है.

​गुड फैट जरूरी

हमेशा याद रखें की खाने वो खाएं जिसमें गुड फैट हो. क्योकि रोजाना जो हम खाना खाते है उनमे बैड फैट ज्यादा होता है. इसलिए अपनी डाइट में गुड फैट शामिल करना बेहद जरुरी है. इसके लिए आप एवोकाडो, ओलिव्स, नट्स, सीड्स, और कोल्ड प्रेस्ड ऑयल जैसी चीजे ज्यादा खाएं. इन सभी खाद्य सामग्रियों में गुड फैट पाया जाता है. यह आपको सेहतमंद बनाए रखने में मदद करता है.

साबुत अनाज को दें जगह

साबुत अनाज आपकी सेहत के लिए काफी फायदेमंद है. इसमें आप ओट्स, दलिया, लाल चावल आदि का सेवन कर सकते हैं. इस तरह का भोजन आपको दिनभर ऊर्जात्मक रखेगा. इसके अलावा इन फूड आइटम्स में आपको विटामिन बी भी मिलती है जो आपको सेहत के लिए जरुरी है.

​प्रोटीन है जरुरी

प्रोटीन भी आपकी डाइट में बेहद जरुरी है. आपकी पहली प्राथमिकता प्लांट बेस्ड प्रोटीन की होनी चाहिए, जैसे सोया मिल्क, टोफू, आदि. इसके अलावा आप मीट, चिकन, अंडे, फिश और सूखे मेवे का सेवन भी कर सकते हैं. ध्यान रहे कि आपका वजन जितना है आपको कम से कम उतना ग्राम प्रोटीन जरूर खाना चाहिए.

​इन चीजों से रहे दूर

ऐसा हो सकता है कि आप फ्राइड या पैकेज्ड फूड का सेवन करना बेहद पसंद करते हों। लेकिन अब आपको इनसे दूरी बनाकर रखनी होगी। फ्राइड और पैकेज्ड फूड आपके कोलेस्ट्रॉल और बीपी को बढ़ाता है इसके अलावा अगर आप धूम्रपान या शराब पीते हैं तो इसका सेवन भी पूरी तरह बंद कर दें इससे आप कैंसर और लिवर से जुड़ी हुई समस्याओं से बच पाएंगे.

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