मेरा बौयफ्रेंड फ्लर्टी टाइप का है, क्या उससे शादी करना ठीक रहेगा?

सवाल

मैं 21 साल की होने वाली हूं. मेरा बौयफ्रैंड जिस की उम्र 25 साल है, मुझे बहुत प्यार करता है. वह मुझ से शादी के लिए भी तैयार है पर वह बहुत फ्लर्टी किस्म का है. हर लड़की को इंप्रैस करता है और हर बात मुझे बताता भी है. एक तरह से मुझे यह जताता है कि उस पर कई लड़कियां मरती हैं. लेकिन वह किसी को भाव नहीं देता, सिर्फ और सिर्फ मैं ही उस की जिंदगी में हूं. मेरे अलावा वह किसी और से प्यार नहीं करता. शादी के बाद भी उस का रवैया ऐसा ही रहा तो क्या मेरा उस से शादी करना ठीक रहेगा. आप ही मुझे रास्ता सुझाएं?

जवाब

एक तरफ वह आप से प्रेम व शादी की बात करता है जबकि दूसरी लड़कियों को इंप्रैस करता फिरता है. उस की ऐसी हरकत कई बातों की ओर इशारा करती है. एक, हो सकता है वह आप के साथ टाइम पास कर रहा हो. दूसरी, वह आप को यह जताना चाहता है कि आप उस के लिए इंपौर्टेंट हैं, कई लड़कियों के होते हुए भी वह सिर्फ आप को चाहता है, शादी करना चाहता है.

तीसरी बात, यह हो सकती है कि वह अपनी वैल्यू आप की नजर में बढ़ाना चाहता है ताकि आप उसे ज्यादा से ज्यादा तवज्जुह दें, उस के ऊपर ज्यादा फोकस करें क्योंकि वह आप को दिखाता है कि उस के पास तो लड़कियों की कमी नहीं है.

रही बात आप से सभी बातें शेयर करने की, तो वह सिर्फ आप को विश्वास में लेने के लिए ऐसा करता है. आप को तो हम यही सलाह देते हैं कि शादी के बारे में अभी मत सोचिए. अपने ब्रौयफ्रैंड को जरा और देखिएपरखिए. उस की फितरत के बारे में पहले पूरी तरह से श्योर हो जाएं, तभी शादी की सोचिए. वैसे भी आप की उम्र अभी ज्यादा नहीं है. बौयफ्रैंड 25 साल का है, उसे अपना कैरियर सैट करने दीजिए तब शादी का फैसला करना उचित रहेगा.

लवर औन मोबाइल औफ

एक तरफ सोशल मीडिया पर रिलेशनशिप आसानी से बनने लगे हैं वहीं दूसरी तरफ इसी के चलते टूट भी रहे हैं. हद से ज्यादा सोशल मीडिया में घुसे रहना रिश्तों में खटास लाता है. जरूरी है कि पार्टनर के साथ रहते सोशल मीडिया को म्यूट कर दिया जाए.

ब्लैक शौर्ट ड्रैस पहनी 20 साल की सारा आधे घंटे से अपने मोबाइल फोन में लगी हुई है. कभी वह टेबल पर सजी डिश की फोटो खींच रही है तो कभी वैन्यू का बूमरैंग बना रही है, कभी सैल्फी क्लिक कर रही है. इस के साथ वह तुरंत ही इन्हें अपनी इंस्टा स्टोरी, व्हाट्सऐप और स्नैपचैट पर लगा रही है. यह हाल उस का तब है जब वह पहले से ही विशेष से इस वैन्यू पर अपनी कई रील बनवा चुकी है.

विशेष काफी देर से यह सब देख रहा है. लेकिन कुछ बोल नहीं रहा. वह बस इंतजार कर रहा है कि कब सारा अपना फोन साइड में रखे और उस से बातें करे. लेकिन सारा को तो फुरसत ही नहीं है सोशल मीडिया से.

हद तो तब हो गई जब सारा इंस्ट्राग्राम पर लाइव चली गई. वह भी तब जब वह अपने पार्टनर के साथ डेट पर आई है. कौफी, पिज्जा, पास्ता सब ठंडा हो गया लेकिन सारा के हाथ से फोन नहीं छूटा. यह बात विशेष को बिलकुल भी अच्छी नहीं लगी. उस का पेशेंस अब जवाब दे चुका है.

विशेष सारा से भौंहें चढ़ाते हुए कहता है, ‘‘यह हमारी डेट है, तुम्हारा कोई व्लौग वीडियो नहीं, जो तुम फोन में ही लगी रहो. मैं भी चाहूं तो फोन में लग सकता हूं, बूमरैंग बना सकता हूं पर मुझे तुम्हारे साथ वक्त बिताना है. तुम्हारी वाइब एंजौय करनी है. तुम से बातें करनी हैं. तुम्हारा हाथ पकड़ कर बैठना है. लेकिन तुम अपना मोबाइल छोड़ो तो न. मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुम मेरे साथ डेट पर नहीं आईं बल्कि अपने फोन के साथ आई हो.’’

यह सब सुन कर सारा ने कहा, ‘‘वेट न विशेष, अभी मैं इंस्टा पर लाइव हूं. तुम थोड़ा वेट नहीं कर सकते.’’

यह सुन कर विशेष ने थोड़ी देर इंतजार किया, फिर वहां से उठ कर चल दिया. इस के बावजूद सारा ने अपना इंस्टा लाइव बंद नहीं किया. 5 मिनट बाद जब वह असल दुनिया में आई तो देखा विशेष सामने नहीं था. उस ने उसे कौल किया.

गुस्से में विशेष ने उस की कौल नहीं उठाई. सारा ने कई बार कौल किया लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ.

कई दिन हो गए विशेष और सारा के बीच में कोई बात नहीं हुई. न सारा ने अपने बिहेवियर के लिए सौरी कहा, न ही विशेष ने पैचअप करने की कोशिश की. फिर एक दिन विशेष को अपने म्यूचुअल फ्रैंड से पता चला कि सारा किसी और को डेट कर रही है और उसे वह लड़का सोशल मीडिया में ही मिला था.

सारा का विशेष से दूसरा ब्रेकअप था. उस के दोनों ब्रेकअप होने की वजह सोशल मीडिया पर हद से ज्यादा समय बिताना था. रील्स की लत उसे ऐसी लगी है कि बातें करतेकरते वह रील भी देखती रहती है. वह हर वक्त सोशल मीडिया में ही घुसी रहती थी, फिर चाहे वह किसी रोमांटिक डेट पर आई हो या गोवा के बीच पर सनराइज का मजा ले रही हो. 24 घंटे उस के हाथ में मोबाइल ही होता था.

सोशल मीडिया की यह लत हर दूसरे यंगस्टर को है. मैट्रो सिटी में रहने वालों के रिश्ते भी सोशल मीडिया पर बन कर टूट रहे हैं. सारा और विशेष का उदाहरण ही है, जहां उन के रिलेशनशिप टूटने या उस में मनमुटाव आने का कारण सोशल मीडिया व उन का मोबाइल फोन का ज्यादा यूज करना है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन करने वाली 19 साल की ईशा कहती है, ‘‘यह जो दौर चल रहा है वह दिखावट का दौर है. यंगस्टर्स पर्सनल लाइफ सोशल मीडिया पर परोसना पसंद करते हैं. असल में इन्हें लाइक, शेयर और सब्सक्राइब की लत लगी है और इसे पाने के लिए ये हौस्पिटल में बीमार पड़ी अपने परिवार की सदस्या की रील बनाने से भी नहीं हिचकिचाते.

यंगस्टर्स सोशल मीडिया का इतना दीवाना है कि वह अपने हर मूमैंट को कैप्चर करना चाहता है, चाहे वह पार्टनर के साथ प्राइवेट मूमैंट ही क्यों न हो. वह जल्दी से इन्हें इंस्टाग्राम फेसबुक, स्नैपचैट, व्हाट्सऐप जैसे सोशल साइट्स पर अपलोड करना चाहता है.

इन में ऐसे भी कुछ लोग हैं जो रियल लाइफ से ज्यादा रील लाइफ में जीते हैं. दिन में 10 बार अपना स्टेटस अपडेट करते हैं. इतने से भी मन नहीं भरता तो दूसरे के व्हाट्सऐप स्टेटस देखते रहते हैं. कभी उन की इंस्टाग्राम स्टोरी तो कभी रील देखने लगते हैं. यही है अब यंगस्टर्स की लाइफ. क्या पर्सनल क्या प्राइवेट, सब सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है.

सोशल मीडिया पर ऐक्टिव

लोग कितना वक्त सोशल मीडिया पर बिताते हैं, वर्ल्ड स्टेटिक्स नाम के एक ट्विटर अकाउंट पर इस की जानकारी दी गई. इस रिपोर्ट के मुताबिक, नाइजीरिया सब से ऊपर है, जहां लोग करीब साढ़े 4 घंटे सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर सब से कम जापान के लोग ऐक्टिव रहते हैं. जापान के लोग सिर्फ 49 मिनट ही सोशल मीडिया पर बिताते हैं. यही कारण है कि वे टैक्नोलौजी में सब से आगे हैं. अगर जापान टैक्नोलौजी से अपना हाथ खींच ले तो दुनिया से 16 फीसदी टैक्नोलौजी गायब हो जाए. वहीं स्वीडन में यूजर्स करीब 1 घंटे 11 मिनट हर दिन सोशल मीडिया पर बिताते हैं.

अगर भारत की बात करें तो करीब 30 देशों की इस लिस्ट में भारत का 14वां स्थान है. यहां एक यूजर एक दिन में करीब 2 घंटे 44 मिनट सोशल मीडिया पर खर्च करता है. भारत में 3 में से 1 व्यक्ति सोशल मीडिया का इस्तेमाल करता है. अमेरिका में यह 2 घंटे 11 मिनट है. चीन में 2 घंटे 1 मिनट है. इस के अलावा कनाडा, आस्ट्रेलिया, स्पेन, डेनमार्क और यूके में लोग करीब 2 घंटे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं.

पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया हमारी लाइफ, वर्क और रिलेशन पर इफैक्ट कर रही है. जहां एक ओर सोशल मीडिया से रिलेशनशिप बनते हैं तो बहुत से टूटते भी हैं.

सोशल मीडिया से रिलेशनशिप पर असर

सोशल मीडिया का ज्यादा यूज एक रिलेशनशिप को कितना इफैक्ट करता है, यह एक सर्वे में बताया गया. इस सर्वे में 2 हजार लोगों की प्राइवेट लाइफ, कम्युनिकेशन और ट्रस्ट का आंकलन किया गया और यह जाना गया कि वे एक कपल्स के तौर पर औनलाइन कितनी सामग्री साझा करते हैं.

सर्वे में 52 फीसदी कपल ने बताया कि वे वीक में 3 से ज्यादा बार अपने रिलेशनशिप की फोटोज, वीडियोज औनलाइन पोस्ट करते हैं. इस में हैरान करने वाली बात यह थी कि इन में से सिर्फ 10 फीसदी लोगों ने बताया कि वे अपने रिश्ते से ‘बहुत खुश’ हैं.

हर कोई सोशल मीडिया पर अपने रोमांटिक मूमैंट को दिखाना पसंद करता है, खासकर अपने वैकेशन को. लेकिन सर्वे से यह पता चला कि जो कपल यह दिखाने के लिए सोशल मीडिया पर बारबार पोस्ट करते हैं कि वे अपने पार्टनर की कितनी सराहना करते हैं.

सोशल मीडिया के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से रिलेशनशिप पर बुरा असर पड़ता है. जो कपल्स सोशल मीडिया पर अपनी प्राइवेट लाइफ ज्यादा शेयर करते हैं, उन के रिलेशन पर इस का नैगेटिव इफैक्ट पड़ता है. इस से कपल के बीच ट्रस्ट की कमी होती है. इस से शाई पार्टनर भी अनकंफर्टेबल फील करता है.

सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने के कारण आप अपने पार्टनर को समय नहीं दे पाते, जिस से आपस में कम्युनिकेशन गैप हो जाता है. अपने रिलेशन को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे से बातचीत करते रहना बहुत जरूरी है. जो कपल अपने पार्टनर को औनलाइन दिखाना पसंद करते हैं, वे अपने रिलेशन में ज्यादा खुश नहीं होते हैं. इस के कई कारण होते हैं.

सोशल मीडिया पर बारबार पोस्ट करना, स्पैशली कपल सैल्फी, दरअसल दूसरों का अटैंशन पाने का एक तरीका होता है. जो कपल अपने रिलेशनशिप में खुश नहीं हैं, वे अपने रिलेशन में महसूस होने वाली कमी की भरपाई के लिए ज्यादा से ज्यादा कपल पोस्ट का सहारा लेते हैं.

सोशल मीडिया पर लगातार दूसरे कपल्स के खुशी के पलों को देखने से कई कपल्स में जलन और अपने रिश्ते में स्पार्क की कमी की भावना पैदा होती है. लगातार हैप्पी मूमैंट्स और रोमांटिक मूमैंट्स को पोस्ट करने से कपल्स पर एक आइडियल इमेज पेश करने का प्रैशर आ जाता है, जो स्ट्रैसफुल और नकली हो सकता है. यह आइडियल कपल दिखने का प्रैशर सोशल मीडिया पर ज्यादा ऐक्टिव रहने का एक कारण है.

जो कपल अपने रिश्तों में कम सिक्योर फील करते हैं, वे सोशल मीडिया पर ‘हैप्पी रिलेशनशिप’ की इमेज पेश करने की कोशिश करते रहते हैं. इन पोस्ट के जरिए वे खुद को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि सबकुछ ठीक है. सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल करने से रिश्ते के भीतर मीनिंगफुल कम्युनिकेशन और किसी बहस को सौल्व कर के तरीके तक पहुंचने पर लगने वाला समय काफी ज्यादा हो सकता है.

अगर कोई अपने पार्टनर के साथ बात करने के बजाय इंस्टाग्राम फीड को स्क्रौल करने में ज्यादा इंटरैस्ट दिखाता है तो इस से आप के रिलेशन पर नैगेटिव इफैक्ट पड़ता है. जितना ज्यादा टाइम आप अपने फोन पर बिताएंगे, उतना ही ज्यादा आप अपने पार्टनर के साथ बिताए गए हैप्पी मूमैंट और मौजमस्ती के छोटेछोटे मूमैंट्स को मिस कर देंगे.

सोशल मीडिया पर कई लोग अपने इमोशंस, अपनी पर्सनल लाइफ में चल रही प्रौब्लम्स को शेयर करते हैं. अपने रिलेशनशिप की छोटीछोटी बातें शेयर करना सही नहीं है. इस से पार्टनर हर्ट हो सकता है. बेहतर यह है कि सोशल मीडिया को बहस की जगह न बनाएं बल्कि आपस में बात कर मुद्दों को सुलझाएं.

चैटिंग से सैक्सटिंग तक काम आएंगे ये इमोजी

सैक्ंिस्टग का अपना मजा होता है. ऊपर से इमोजी इसे दोगुना कर देते हैं पर तभी जब अपने इमोशन के लिए सही इमोजी का यूज करना आता हो. जानें ऐसे ही इमोजी के बारे में. कहते हैं परफैक्ट पिक्चर वही है जो आप के हजारों शब्दों को बयां कर दे.

सोशल मीडिया ने कम्युनिकेशन के तमाम रास्ते खोले हैं. अब गलीमहल्ले के दायरों से दूर सोशल मीडिया पर प्यार के कई रास्ते खुल गए हैं. इन्हीं पर चलते हुए लव रिलेशनशिप बने हैं, पके हैं और कुछ तनातनी के बाद टूट भी गए हैं. रिलेशनशिप के बनने और टूटने के बीच एक समय ऐसा भी होता है जब प्यार सातवें आसमान पर रहता है.

चांद सा मुखड़ा, सोलहसत्रह सितारे तोड़ने के वादे के बाद जिस्म की खुशबू और गरमी के एहसास की इच्छा करती है, यानी इंटिमेसी हाई रहती है.  हर बात डबल मीनिंग सी महसूस होती है, बात पैरों की पायल और हाथ के कंगन से ऊपर बढ़ जाने की होती है. इन बातों में जिस्म के उतारचढ़ाव का जिक्र होने लगता है, एक हद पार कर जाने का मन करने लगता है, यानी सैक्ंिस्टग करने का मन करता है. सैक्ंिस्टग यानी ऐसी चैटिंग जिस में सैक्स टौक हो.  पर समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर चैट करते हुए अपनी बातों को कैसे सामने रखा जाए कि वल्गर भी न लगे और बात इजिली कन्वे हो जाए, वह भी बिना लागलपेट के.

अच्छी बात यह है कि आज चैटिंग करते हुए तमाम सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स ऐसे ‘इमोजी’ के औप्शंस साथ में देते हैं जिस से आप अपने इमोशन को दिखा सकते हैं. गूगल वैब के अनुसार, ‘इमोजी’ का मतलब एक छोटी डिजिटल छवि या आइकन, जिस का यूज किसी इमोशन को व्यक्त करने के लिए किया जाता है. ‘इमोजी’ शब्द जापानी भाषा से आया है. जैपनीज में ‘इ’ का अर्थ होता है ‘चित्र’ और ‘मोजी’ का अर्थ होता है वर्ड. व्हाट्सऐप में देखेंगे तो चैट करते हुए यह बाईं तरफ होता है.

आजकल इसे अपडेट कर लिया गया है तो साथ में जीआईएफ इमेज का भी औप्शन दिखाई देता है. वहीं, अगर इंस्टाग्राम की बात करें तो यह मैसेज करते हुए दाईं तरफ स्पीकर व पिक्चर की साइड में होता है. यहां इमोजी पहले से एडवांस हो गए हैं. अब स्टीकर इमोजी भी देखने को मिल जाते हैं. पर खास बात यह है कि हर बात को एक्सप्रैस करने का एक तरीका होता है.

आप अगर अपने पार्टनर से सैक्सटिंग कर रहे हैं तो सही इमोजी भेजना जरूरी है वरना हीट एंड हौट कन्वर्सेशन में इमोशन दबे रह जाते हैं. मस्क्ल्युलिन इमोजी सैक्सटिंग कपल के बीच प्राइवेट कन्वर्सेशन होती है. बहुत बार चैट करते हुए इमोजीबौक्स में दिखाए गए इमोजी समझ से बाहर हो सकते हैं कि इन का काम क्या है. लेकिन यदि कपल अच्छे मूड में हैं तो कुछ इमोजी हैं जिन का इस्तेमाल वे अपने कन्वर्सेशन में कर सकते हैं.

मेल पेनिस के रिप्रेजेंटेशन करने के लिए किसी भी लंबे, फौलिक साइज वाले इमोजी का यूज किया जा सकता है. इस के लिए वे चीजें भी यूज की जा सकती हैं जो खाने की होती हैं. जैसे, बैगन, हौट डौग, केला, ब्रैड का लंबा टुकड़ा, गाजर, मक्का, सांप, मुरगा. फिमाइन इमोजी चैट करते हुए ऐसी कई इमोजी हैं जो इनडायरैक्ट फीमेल जेनेटल को रिप्रेजेंट करती हैं. इन सब का इस्तेमाल वैसे तो किसी भी तरह से किया जा सकता है पर बात जब सैक्ंिस्टग की आती है तो ये इमोशन को सीधे कन्वे कर देते हैं. जैसे ट्यूलिप, पीस सिंबल, टाको, शहद का पौट, सुशी, कुकीज, बिल्ली.

अन्य हिस्सों को ले कर शरीर के दूसरे हिस्सों के लिए अधिकांश ऐसी ढेर सारी इमोजी हैं जो होती तो अलग हैं लेकिन उन्हें सैक्ंिस्टग करते हुए बराबर यूज किया जा सकता है. जो कपल के रोमांच को बढ़ाने का ही काम करते हैं, जैसे आड़ू से ले कर नाशपाती और सेब तक के आकारों का यूज किया जा सकता है. जैसे पीच, सेब, नाशपाती, चेरी, ओके सिंबल, डोनट. प्ले बौल एमोजी बहुत सारी बातें ऐसी होती हैं जिन पर शुरुआत करते हैं तो हिचकिचाहट हो सकती है.

ऐसे में सिंबल का यूज किया जा सकता है जिस से बात कन्वे भी हो जाए और सामने पार्टनर को आक्वर्ड भी न लगे. जैसे, ब्रैस्ट के बारे में बात करते हुए ऐसे सिंबल के बारे जिक्र किया जा सकता है जिस से इमोशन समझ आ जाए. जैसे चेरीज, 2 तरबूजों का जोड़ा, शौकर बौल, बास्केट बौल. एक्सप्लोसिव इमोजी, दे सेम फील जब क्लाइमैक्स की बात आती है तो हिंदी में ऐसे वर्ड नहीं हैं जो सही हों और कहते हुए ठीक लगें.

इस के लिए ऐसे इमोजी का यूज किया जा सकता है जो चैट में भेजते हुए आप के इमोशन को बयां कर सकें, जैसे, फायरवर्क्स, एक्सप्लोजन, बौम्ब, रौकेट शिप, पोपिंग शैंपेन बौटल, माइंड ब्लोइंग फेस, पानी की बूंदें. अन्य इमोजी कुछ ऐसी इमोजी हैं जो सैक्ंिस्टग करते हुए जरूर काम का सकती हैं. इन के मीनिंग तभी सटीक बैठेंगे जब सही जगह इस्तेमाल किए जाएं. जैसे जीभ, लौलीपौप, स्पैकिंग, शौवर सैक्स, रैसिप्रोकल ओरल सैक्स.

डिजिटल ऐरा में डेटिंग ऐप्स एंड रिलेशनशिप

भारतीय युवाओं के लिए डेटिंग ऐप्स किसी डेटिंग क्रांति से कम नहीं हैं. यहां अपने लिए पार्टनर आसानी से ढूंढ़े जा सकते हैं. ये ऐप्स युवाओं के लिए कन्वीनिएंट हैं पर तभी जब सिर्फ पार्टनर ढूंढ़ने का माध्यम समझा जाए, सही पार्टनर ढूंढ़ना आप की अंडरस्टैंडिंग पर निर्भर करेगा. वक्त बदल रहा है, दुनिया बदल रही है और उस के साथ बदल रहे हैं प्यार ढूढ़ने के तरीके. इंटरनैट और सोशल मीडिया के इस दौर में यंगस्टर्स अपने सराउंडिंग से कटते जा रहे हैं.

घर की चारदीवारी से बाहर निकलना बड़ा एक्सपैंसिव हो गया है. ऐसे में उन के लिए गर्लफ्रैंड और बौयफ्रैंड ढूंढ़ना मुश्किल होता जा रहा है. रिश्तों की तलाश के दायरे बढ़ते जा रहे हैं. गलीमहल्ले से निकल कर यंगस्टर्स दुनियाभर में अपने कुछ वक्त या लाइफटाइम के लिए पार्टनर की तलाश कर रहे हैं.

यही वजह है कि यंगस्टर्स अब सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स का सहारा ले रहे हैं. यह एक अच्छा माध्यम है दुनियाभर के लोगों से जुड़ने का. टिंडर, बंबल, मिंगल और हिंगे जैसे डेटिंग ऐप्स प्यार और रोमांस के पारंपरिक तरीके से हट कर नए मौके दे रहे हैं. भारत में डेटिंग ऐप्स पिछले कुछ सालों से ज्यादा ऐक्टिव हुए हैं, खासकर कोरोना के वक्त से जब लोगों का घर से बाहर निकलना नामुमकिन था.

उस वक्त यंगस्टर्स अपनी बोरियत दूर करने के लिए लोगों को औनलाइन तलाश कर रहे थे. कोरोना महामारी ने यंगस्टर्स की आदतों को भी हमेशा के लिए बदल दिया है. अधिक से अधिक भारतीय युवा, यहां तक कि छोटे शहरोंकसबों के भी, प्यार और साथ पाने के लिए डेटिंग ऐप्स पर भरोसा कर रहे हैं. एकदूसरे को जानने के लिए पर्सनली मिलने के बजाय वीडियो कौल को चूज कर रहे हैं और फिर लोगों से मिल रहे हैं.

जैसेजैसे भारत में डेटिंग कल्चर बढ़ा, वैसेवैसे ही डेटिंग ऐप्स की लोकप्रियता भी बढ़ी. लोग नए मौके तलाश रहे हैं. वे स्कूलकालेजों से निकल कर नैशनल और इंटरनैशनली डेटिंग के अनुभव तलाश रहे हैं. सोशल ऐक्सेप्टेंस से बदलता नजरिया डेटिंग ऐप्स अब भारतीय सोसाइटी का एक हिस्सा बन गए हैं.

यंगस्टर्स, एडल्ट, नौकरीपेशा भी कैजुअल डेटिंग या लाइफपार्टनर ढूंढ़ने के लिए इन प्लेटफौर्मों का इस्तेमाल कर रहे हैं और वे कामयाब भी हो रहे हैं. अपने मनपसंद पार्टनर, जिन से उन के विचार मिलते हों, पाने के लिए वे इन प्लेटफौर्मों का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. एक वक्त था जब आप के मम्मीपापा जिद पर अड़ जाते थे कि आप का लाइफपार्टनर वे ही ढूंढ़ेंगे.

बदलते वक्त के साथ अब मांबाप इस की जिम्मेदारी बच्चों पर छोड़ने लगे हैं, इस के लिए वे खुद यंगस्टर्स को डायरैक्टइनडायरैक्ट डेटिंग ऐप्स का हिंट कर देते हैं. इस से यह दिखता है कि सोसाइटी भी इसे ऐक्सैप्ट करने लगी है. टिंडर ने जिस तरह डेटिंग ऐप्स की एक नकारात्मक छवि सोसाइटी में तैयार की थी, अब वह बदल गई है. टिंडर वैस्टर्न डेटिंग तौरतरीकों के लिए ज्यादातर फेमस था.

विदेश में इस ने खूब कामयाबी पाई. हालांकि इस का इस्तेमाल करने वाले भारत में भी रहे. इस में ओवरएक्सपोजर और वल्गैरिटी भी थी. लेकिन भारत में आने वाले बंबल, हिंगे, ट्रूली मैडली और मिंगल जैसे ऐप्स लगातार इस छवि को सुधारने में लगे हैं और डेटिंग ऐप्स को एक मींटिगरूम बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिस में ये कामयाब भी रहे हैं.

क्यों इस्तेमाल करें डेटिंग ऐप्स अब बात आती है कि क्यो करें डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल? भारत में कितने ही लोग अब औनलाइन डेटिंग ऐप्स की दुनिया में कदम रख रहे हैं. 27 साल की सुधा मिंगल पर ऐक्टिव है, वह कहती है कि असल जिंदगी में आप के पास औप्शन कम होते हैं. आजकल सब की अपनीअपनी प्रायोरिटी होती है. अपनीअपनी पार्टनर प्रेफरैंस होती है जिसे ढूंढ़ पाना आसान नहीं होता. इसलिए डेटिंग ऐप्स का सहारा लेना कन्वीनिएंट लगता है.

औनलाइन डेटिंग ऐप्स आप को कामयाबी मिलने की गारंटी नहीं देता क्योंकि ऐप्स सिर्फ एक मुलाकात का जरिया है. इस के अलावा कुछ नहीं. वैसे भी, यह पूरी तरह आप पर ही निर्भर करता है. भारत में इस का विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है. उन के अनुसार डेटिंग का मतलब सैक्स या शादी. अकसर इसीलिए इस का विरोध होता आया है लेकिन वक्त के साथसाथ ये धारणाएं भी बदल रही हैं और भारत में डेटिंग ऐप्स के यूजर्स लगातार बढ़ रहे हैं.

भारत में डेटिंग ऐप यूजर भारत दुनिया का 5वां सब से तेजी से बढ़ने वाला डेटिंग ऐप बाजार है. यहां इसे इस्तेमाल करने वाले हर साल लाखों खर्च करते हैं, जो कि वैश्विक औसत 12 फीसदी की सालदरसाल वृद्धि से कहीं अधिक है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंजूमर ने डेटिंग और फ्रैंडशिप ऐप्स पर दिसंबर 2022 तक 9.9 मिलियन डौलर खर्च किए.

यह 2021 की तुलना में दोगुने से भी अधिक था. यंगस्टर्स ज्यादा स्वाइप या परफैक्ट मैच पाने के लिए और अपनी प्रोफाइल की रीच बढ़ाने के लिए इन ऐप्स की सर्विस खरीदने के लिए पैसे खर्च करते हैं. यह नंबर लगातार बढ़ता जा रहा है और भविष्य में इस के और बढ़ने की पौसिबिलिटी है. इस्टेटिस्टा डौट कौम ने भारत में औनलाइन डेटिंग का कारोबार 2021 में 454 मिलियन डौलर से बढ़ कर 2024 तक 783 मिलियन डौलर तक पहुंचने की उम्मीद जताई थी.

फिलहाल डेटिंग ऐप्स भारत की कुल आबादी के 2.2 फीसदी तक पहुंचते हैं, जिस के 2024 तक 3.6 फीसदी होने का अनुमान है. 5 वर्षों पहले तक लगभग 20 मिलियन भारतीय डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल करते थे और अब यह आंकड़ा 293 फीसदी की भारी वृद्धि के साथ 2023 में 82.4 मिलियन तक पहुंच गया. डेटिंग ऐप्स के इस्तेमाल में वृद्धि विशेष रूप से मैट्रो शहरों के बाहर काफी ज्यादा हो रही है जहां अब टिंडर, बंबल और ट्रूली मैडली जैसे डेटिंग ऐप्स के 70 फीसदी उपयोगकर्ता हैं और यह नंबर लगातार बढ़ रहा है. सावधानी भी जरूरी आज देश में डेटिंग को ले कर माहौल बदल रहा है.

डेटिंग का डिजिटलाइजेशन होने की वजह से उस में धोखाधड़ी भी उतनी ही व्यापक है जितनी कि सामान्य दुनिया में. इसलिए सावधानी के साथ इस का इस्तेमाल करते हुए बदलती दुनिया के साथ तालमेल बैठाना चाहिए. भारतीय युवाओं के लिए डेटिंग ऐप्स किसी डेटिंग क्रांति से कम नहीं हैं जहां लड़केलड़कियों को एकसाथ दिख भर जाने से सवाल खड़े होते हैं. ऐसे में इन ऐप्स का इस्तेमाल युवा पीढ़ी को बड़ा कन्वीनिएंट लगता है, लेकिन हां. सावधान रहने की जरूरत है.

मोहरा: क्या चाहती थी सुहानिका?

सुहानिका आज कुछ ज्यादा ही खुश थी. अभी 2 महीने पहले ही तो उस ने एक असिस्टैंट के रूप में यह औफिस जौइन किया था. शुरुआत में उस की तनख्वाह 20 हजार रुपए महीना थी और इन 2 महीने में ही उस की तनख्वाह 40 हजार रुपए महीना हो गई.

सुहानिका को बखूबी मालूम है कि उस के औफिस की बहनजी टाइप लड़कियां उस के बारे में उलटीसीधी बातें करती हैं, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है.

एक दिन रुचिका सुहानिका को देखते हुए बोली, ‘‘तुम कब तक खूबसूरती की बैसाखी के सहारे नौकरी करोगी. तुम से तो एक पावर पौइंट भी ठीक से नहीं बन पाता है.’’

सुहानिका अपनी आंखों को और बड़ा कर के बोली, ‘‘रुचिका, मेरे पास जो है, मैं उस के सहारे ही तो आगे बढ़ूंगी न.’’

रुचिका ने मुंह बिचका कर कहा, ‘‘बेशर्म हो तुम.’’

सुहानिका ने जवाब दिया, ‘‘हां, पर सच्ची हूं.’’

23 साल की सुहानिका का बचपन गरीबी में गुजरा था. उस की मम्मी कैसी थीं, उसे नहीं मालूम, बस तसवीरों में ही उन की यादें उस के साथ थीं.

सुहानिका के पापा बिजली महकमे में क्लर्क थे. वे अपनी छोटी सी तनख्वाह से ही घर चलाते थे. सुहानिका की दादी हर समय उसे ताने मारती रहती थीं, ‘‘तेरे चलते मेरे बेटे ने दूसरी शादी नहीं की. अगर दूसरी मां आ जाती न, तो तेरी जो कैंची की तरह जबान चल रही है न, उसे काट देती.’’

सुहानिका भी कहां चुप रहने वालों में से थी. वह खटाक से जवाब देती, ‘‘दादी, तुम अपने मन को बहला रही हो. कर दो न दूसरी शादी तुम पापा की. दरअसल, सचाई यह है एक बुढ़ाते क्लर्क, जिस के साथ उस की बूढ़ी मां और जवान बेटी रहती हो, का शादी के बाजार में कोई मोल नहीं है.’’

ऐसे ही लड़तेझगड़ते सुहानिका ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा था. खुलता गेहुआं, भूरी आंखें, सुतवा नाक, लाल सुर्ख होंठ, घने घुंघराले बाल, जो उस के चेहरे के चारों ओर बिखरे रहते थे.

दादी गुस्से में सुहानिका के बालों को मधुमक्खी का छत्ता बोलती थीं, पर वही दादी हर शनिवार की रात सरसों और नारियल का तेल उस के बालों में बड़े प्यार से मलती थीं.

सुहानिका के पिता सतीश तोमर अदना से इनसान थे. मझोला कद, मझोली कदकाठी. उन की जिंदगी में सबकुछ ही मझोला था. वे दब्बू किस्म के इनसान थे.

सुहानिका ने कितनी बार अपने पापा को चिंतित देखा था. वे हर समय दफ्तर के काम में बिजी रहते थे, पर फिर भी कभी कोई तरक्की नहीं कर पाए. इस बात ने उन्हें अंदर ही अंदर चिड़चिड़ा कर दिया था.

उधर अपने बेटे की चिड़चिड़ाहट का असर सुहानिका की दादी पर भी होता था और कुलमिला कर यह नतीजा था कि सुहानिका का अपने ही घर में दम घुटता था.

सुहानिका की जिंदगी में हर चीज की कमी थी, जैसे प्यार, पैसा, विश्वास और आजादी. वह बस रूपरंग के मामले में अच्छी थी.

जब सुहानिका 15 साल की थी, तब उस के स्कूल के एक सीनियर लड़के ने उस के सामने दोस्ती का प्रस्ताव रखा था. सुहानिका ने बिना सोचे हां कर दी थी. वह सिलसिला आज तक जारी है. सुहानिका को सबकुछ मिल रहा था. पैसा, उपहार और वह सबकुछ, जो एक आरामदायक जिंदगी के लिए चाहिए.

पापा और दादी की नेक सलाह सुहानिका के कानों से टकरा कर वापस चली जाती थी. उस की क्या गलती है. उसे भी तो खुश रहने का हक है.

कालेज में भी सुहानिका हर हफ्ते किसी नए लड़के के साथ देखी जाती थी. उस के बारे में यह बात मशहूर थी कि 2 डेट के बाद सुहानिका का मन भर जाता है.

सुहानिका को शतरंज के शह और मात के इस खेल में अब एक अलग सा रोमांच होने लगा था. यह उस के चरित्र का एक हिस्सा बन चुका था.

अपनी खूबसूरती व नखरों के बल पर ही सुहानिका ने इस टूर ऐंड ट्रैवल कंपनी में असिस्टैंट की नौकरी हासिल की थी. उस का बौस अजय रावत अव्वल दर्जे का घटिया इनसान था. उसे खूबसूरत लड़कियों का साथ बेहद पसंद था. वह उन पर जीभर कर पैसे लुटाता था और बदले में लड़कियां उस के अहम को सहलाती थीं और उस की मर्दाना कमजोरी को वे बड़े आराम से ढक लेती थीं.

ऐसे ही सुहानिका ने भी किया, पर एक दिन जब वह अजय के साथ दफ्तर में ही रासलीला खेल रही थी, तभी उस कंपनी के मालिक का बेटा रोहित शर्मा वहां आ गया. सुहानिका और अजय के अस्तव्यस्त कपड़े देख रोहित को कुछ पूछने की जरूरत नहीं लगी.

अजय को तुरंत इस्तीफा लिखने के लिए कह दिया गया, पर सुहानिका को रोहित ने अंदर बुलाया. सुहानिका ने भी मौके का पूरा फायदा उठाया और सारी बात अजय के सिर पर डाल दी.

सुहानिका रोतेरोते बोल रही थी, ‘‘सर, मुझे एक मौका और दीजिए. यह मेरी मजबूरी थी.’’

न जाने क्या ऐसा जादू किया था कि सबकुछ जानते हुए भी रोहित ने सुहानिका को न सिर्फ मौका दिया, बल्कि कुछ महीने में अपने लिए भी वहीं इंदौर में एक फ्लैट किराए पर ले लिया.

सुहानिका को अच्छी तरह पता था कि रोहित ने ऐसा क्यों किया है. अब सुहानिका उस कंपनी की ब्रांच हैड बन गई थी.

रोहित के हफ्ते में 3 दिन अब इंदौर में ही बीतते थे. उस ने अपने परिवार को बताया था कि उस को रात में भी काम करना पड़ता है, क्योंकि ब्रांच बहुत ज्यादा नुकसान में चल रही है.

रोहित के पिता सुरेंद्र शर्मा बहुत खुश थे कि आखिरकार बेटे को अक्ल आ ही गई. पर जब सालाना रिपोर्ट आई तो सुरेंद्र का माथा ठनका, क्योंकि इंदौर की ब्रांच बिलकुल गड्ढे में चली गई थी.

उधर हफ्ते में 3 दिन रोहित का हवाई यात्रा से इंदौर जाना वैसे सुरेंद्र शर्मा की जेब पर भारी पड़ रहा था. जब उन्होंने रोहित से इस बारे में बात की तो वह गुस्से में बोला, ‘‘पापा, मैं रातदिन मेहनत कर रहा हूं, आप थोड़ा सब्र तो कीजिए.’’

सुरेंद्र ज्यादा दिनों तक सब्र नहीं रख पाए. एक दिन जब रोहित इंदौर गया हुआ था, तो वे भी पीछेपीछे पहुंच गए. वहां जा कर उन्हें सारा माजरा समझ आ गया था कि क्यों रोहित इंदौर के इतने चक्कर काट रहा है. उन्होंने फौरन इंदौर की ब्रांच बंद करने का फैसला ले लिया.

सुरेंद्र शर्मा जब इंदौर की ब्रांच बंद कर के लौटे तो सुहानिका भी उन के साथ थी. सुहानिका ने उन्हें बड़े आराम से इस बात का विश्वास दिला दिया था कि उसे रोहित ने यह सब करने पर मजबूर किया था.

दिल्ली पहुंच कर सुरेंद्र ने सुहानिका के लिए एक नौकरी के इंतजाम के साथसाथ एक छोटे फ्लैट का बंदोबस्त भी कर दिया.

सुहानिका का बहुत पहले ही अपने घर वालों से नाममात्र का मतलब रह गया था. वैसे, सुरेंद्र जब सुहानिका को दिल्ली लाए, तो उन के मन में सुहानिका के प्रति कोई बुरा भाव नहीं था.

पर सुहानिका को अपनी जिंदगी बहुत रूखी लग रही थी. सुरेंद्र ने जो नौकरी लगवाई थी, उस में उसे मेहनत करनी पड़ रही थी, जिस की उसे आदत नहीं थी.

फिर सुहानिका ने सुरेंद्र शर्मा को मोहरा बनाने की सोची. अब वह किसी न किसी बहाने से उन्हें फोन करने लगी और उन से मिलने भी लगी. ऐसी ही एक मुलाकात में उस ने अपनेआप को सुरेंद्र को सौंप दिया. सुरेंद्र शर्मा जानते थे कि यह ठीक नहीं है, क्योंकि सुहानिका महज 25 साल की थी और वे 55 साल के थे.

एक तो सुरेंद्र शर्मा अपनी पत्नी की मौत के बाद पिछले 10 साल से अकेलेपन का दर्द झेल रहे थे और दूसरे कौन ऐसा मर्द होगा, जो किसी खूबसूरत और जवान लड़की का मोह छोड़ सके.

सुरेंद्र शर्मा पर सुहानिका के रूप का ऐसा सिक्का चला कि वे समाज और परिवार की परवाह करे बिना सुहानिका के साथ शादी के बंधन में बंध गए. सब नातेरिश्तेदारों ने जम कर शिकायत की, पर दोनों ने किसी की नहीं सुनी.

धीरे-धीरे एक साल और बीत गया. सुहानिका को धनदौलत, ऐशोआराम की कमी नहीं थी, पर अब उसे एक साथी की कमी महसूस होने लगी थी. सुरेंद्र से सुहानिका को प्यार तो नहीं था, पर एक लगाव सा हो गया था. लेकिन वह फिर से बोर हो गई थी.

तभी सुहानिका की जिंदगी में पवन नामक लड़का आया, जो रिश्ते में सुरेंद्र शर्मा का भतीजा लगता था और दिल्ली में नौकरी करने के लिए आया हुआ था.

सुहानिका अपनेआप को रोक नहीं पाई और उस ने फिर से एक नया मोहरा ढूंढ़ लिया.

उधर पवन को सुहानिका के लिए बहुत हमदर्दी हो रही थी. उसे लग रहा था, बेचारी सुहानिका को कितने मर्दों ने अपने फायदे के लिए मोहरा बनाया होगा और फिर भी उस का दिल कितना बड़ा है कि वह सुरेंद्र चाचा के प्रति पत्नी के सारे फर्ज निभा रही है. उन की उम्र के चलते सुहानिका ने अपनी मां बनने की इच्छा का भी बहुत पहले गला घोंट दिया था. ऐसी लड़की का अगर मैं दोस्त बन जाऊं तो इस में क्या खराबी है

उधर चांदनी रात में सुहानिका सुरेंद्र के साथ शतरंज के खेल में मोहरे चल रही थी और उस का दिमाग बहुत तेजी के साथ इस बात पर विचार कर रहा था कि वह कब और कैसे इस नए मोहरे को मात देगी. आखिर उस की गलती क्या है? उसे भी तो खुश रहने का हक है?

यह सोचते हुए सुहानिका के होंठों पर एक कुटिल मुसकान थिरक उठी और उस ने एक झटके से अपनी एक बहुत ही बोल्ड सैल्फी पवन को पोस्ट कर दी. वह खुला निमंत्रण था, अगले शिकार का.

अपना कौन: मधुलिका आंटी का अपनापन

मम्मीपापा अचानक ही देहरादून छोड़ कर दिल्ली आ बसे. यहां का स्कूल और सहेलियां कशिश को बहुत पसंद आईं. देहरादून पिछली कक्षा की किताबों की तरह पीछे छूट गया. बस, मधुलिका आंटी की याद गाहेबगाहे आ जाती थी.

‘‘देहरादून से सभी लोग आप से मिलने आते हैं. बस, मधुलिका आंटी नहीं आतीं,’’ कशिश ने एक रोज हसरत से कहा.

‘‘मधुलिका आंटी डाक्टर हैं और देवेन अंकल वकील. दोनों ही अपनी प्रैक्टिस छोड़़ कर कैसे आ सकते हैं?’’ मां ने बताया.

मां और भी कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन उस से पहले ही पापा ने कशिश को पानी पिलाने को कहा. वह पानी ले कर आई तो सुना कि पापा कह रहे थे, ‘कशिश की यह बात तुम मधु को कभी मत बताना.’

कशिश को समझ में नहीं आया कि इस में न बताने वाली क्या बात थी.

जल्दी ही उम्र का वह दौर शुरू हो गया जिस में किसी को खुद की ही खबर नहीं रहती तो मधु आंटी को कौन याद करता.

मम्मीपापा न जाने कैसे उस के मन की बात समझ लेते थे और उस के कुछ कहने से पहले ही उस की मनपसंद चीज उसे मिल जाती थी. उस की सहेलियां उस की तकदीर से रश्क किया करतीं. कशिश का मेडिकल कालिज में अंतिम वर्ष था. मम्मीपापा दोनों चाहते थे कि वह अच्छे नंबरों से पास हो. वह भी जीजान से पढ़ाई में जुटी हुई थी कि दादी के मरने की खबर मिली. दादादादी अपने सब से छोटे बेटे सुहास और बहू दीपा के साथ चंडीगढ़ में रहते थे. पापा के अन्य भाईबहन भी वहां पहुंच चुके थे. घर में काफी भीड़ थी. दादी के अंतिम संस्कार के बाद दादाजी ने कहा, ‘‘शांति बेटी, तुम्हारी मां के जो जेवर हैं, मैं चाहता हूं कि वह तुम सब आपस में बांट लो. तू सब से बड़ी है इसलिए सब के जाने से पहले तू बराबर का बंटवारा कर दे.’’

रात को जब कशिश दादाजी के लिए दूध ले कर गई तो दरवाजे के बाहर ही अपना नाम सुन कर ठिठक गई. दादाजी शांति बूआ से पूछ रहे थे, ‘‘तुझे कशिश से चिढ़ क्यों है. वह तो बहुत सलीके वाली और प्यारी बच्ची है.’’

‘‘मैं कशिश में कोई कमी नहीं निकाल रही पिताजी. मैं तो बस, यही कह रही हूं कि मां के गहने हमारी पुश्तैनी धरोहर हैं जो सिर्फ  मां के अपने बच्चों को मिलने चाहिए, किसी दूसरे की औलाद को नहीं. मां के जो भी जेवर अभी विभा भाभी को मिलेंगे वह देरसवेर देंगी तो कशिश को ही, यह नहीं होना चाहिए.’’ शांति बूआ समझाने के स्वर में बोलीं.

कशिश इस के आगे कुछ नहीं सुन सकी. ‘दूसरे की औलाद’ शब्द हथौड़े की तरह उस के दिलोदिमाग पर प्रहार कर रहा था. उस ने चुपचाप लौट कर दूध का गिलास नौकर के हाथ दादाजी को भिजवा दिया और सोचने लगी कि वह किसी दूसरे यानी किस की औलाद है.

दूसरी जगह और इतने लोगों के बीच मम्मीपापा से कुछ पूछना तो मुनासिब नहीं था. तभी दीपा चाची उसे ढूंढ़ती हुई आईं और बरामदे में पड़ी कुरसी पर निढाल सी लेटी कशिश को देख कर बोलीं, ‘‘थक गई न. जा, सो जा अब.’’

तभी कशिश के दिमाग में बिजली सी कौंधी. क्यों न दीपा चाची से पूछा जाए. दोनों की उम्र में ज्यादा फर्क न होने के कारण उस की दीपा चाची से बहुत बनती थी और पिछले 3-4 रोज से एकसाथ काम करते हुए दोनों में दोस्ती सी हो गई थी.

‘‘आप से कुछ पूछना है चाची, बताएंगी ?’’ उस ने निवेदन करने के अंदाज में कहा.

‘‘जरूर,’’ दीपा ने प्यार से उस का सिर सहलाया.

‘‘मैं कौन हूं?’’

कशिश के इस प्रश्न से दीपा चौंक पड़ी फिर संभल कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी भतीजी, कशिश.’’

‘‘मगर मैं आप की असली भतीजी तो नहीं हूं न, क्योंकि मैं डा. विकास और डा. विभा की नहीं किसी दूसरे की औलाद…’’

‘‘यह तू क्या कह रही है?’’ दीपा ने बात काटी.

‘‘जो भी कह रही हूं  चाची, सही कह रही हूं’’ और कशिश ने शांति बूआ और दादाजी के बीच हुई बातचीत दोहरा दी.

दीपा झल्ला कर बोली, ‘‘तुम्हारी शांति बूआ को भी बगैर बवाल मचाए खाना नहीं पचता…’’

‘‘उन्होंने कोई बवाल नहीं मचाया, चाची, सिर्फ सचाई बताई है पर अगर आप मुझे यह नहीं बताएंगी कि मैं किस की औलाद हूं तो बवाल मच सकता है.’’

‘‘मैं जो बताऊंगी उस पर तू यकीन करेगी?’’

अगर यकीन नहीं करना होता तो आप से पूछती ही क्यों? असलियत जानने के बाद मैं मम्मीपापा से कुछ नहीं पूछूंगी और कम से कम यहां तो कतई नहीं.

‘‘कभी भी और कहीं भी नहीं पूछना बेटे, वरना वे बहुत दुखी होंगे कि शायद उन की परवरिश में ही कोई कमी रह गई. तुम डा. मधुलिका और देंवेंद्र नाथ वर्मा की बेटी हो. विभा भाभी और मधुलिका बचपन की सहेलियां हैं. यह स्पष्ट होने पर कि बचपन में हुई किसी दुर्घटना के चलते विभा भाभी कभी मां नहीं बन सकतीं, मधुलिका ने उन की गोद में तुम्हें डाल दिया था. विभा भाभी और विकास भाई साहब ने तुम्हें शायद ही कभी शिकायत का मौका दिया हो.’’

कशिश ने सहमति में सिर हिलाया.

‘‘मम्मीपापा से मुझे कोई शिकायत नहीं है लेकिन मधु आंटी ने मुझे क्यों और कैसे दे दिया?’’

‘‘दोस्ती की खातिर.’’

‘‘दोस्ती ममता से ज्यादा…’’

तभी अंदर से बहुत उत्तेजित स्वर सुनाई देने लगे. सब से ऊंचा स्वर विकास का था.

‘‘मेरे लिए मेरे जीवन की सब से अमूल्य निधि मेरी बेटी है, जिस के लिए मैं देहरादून से सरकारी नौकरी छोड़ कर चला आया. उस के लिए क्या चंद गहने नहीं छोड़ सकता? मैं कल सवेरे यानी आप के बंटवारे से पहले ही यहां से चला जाऊंगा’’

‘‘लेकिन मां की उठावनी?’’ शांति बूआ ने पूछा.

‘‘उस के लिए आप सब हैं न. मां की अंत समय में सेवा कर ली, मेरे लिए यही बहुत है,’’ विकास ने कड़वे स्वर में कहा, ‘‘जो लोग मेरी बेटी को पराया समझते हों उन के साथ रहना मुझे गवारा नहीं है.’’

दीपा ने कशिश की ओर देखा और उस ने चुपचाप सिर झुका लिया.

‘‘यह अब नहीं रुकेगा. रोक कर शांति तुम बात मत बढ़ाओ,’’ दादाजी का स्वर उभरा. उसी समय विकास कशिश को पुकारता हुआ वहां आया और उसे इस तरह बांहों में भर कर अपने कमरे में ले गया जैसे कोई कशिश को उस से छीन न ले, ‘‘कल हम दिल्ली लौट रहे हैं कशिश, सो अब तुम सो जाओ. सुबह जल्दी उठना होगा,’’ विकास ने कहा.

‘‘जी, पापा,’’ कशिश ने कहा और चुपचाप बिस्तर पर लेट गई. विकास ने बत्ती बुझा दी.

‘‘विकास,’’ कुछ देर के बाद विभा का स्वर उभरा, ‘‘मुझे लगता है इस तरह लौट कर तुम सब की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हो.’’

‘‘शांति बहनजी ने जिस बेदर्दी से मेरी भावनाओं को कुचला है न उस के मुकाबले में मेरी ठेस तो बहुत मामूली है,’’ विकास ने तल्खी से कहा, ‘‘जो भी मेरी बेटी को नकारेगा उसे मैं कदापि स्वीकार नहीं करूंगा… चाहे वह कोई भी हो… यहां तक कि तुम भी.’’

अगली सुबह उन्हें विदा करने को केवल दादाजी, सुहास और दीपा ही थे और सब शायद अप्रिय स्थिति से बचने के लिए नींद का बहाना कर के उठे ही नहीं.

घर आ कर विभा और विकास अपने काम में व्यस्त हो गए और कशिश पढ़ाईर् में. हालांकि कशिश को लग रहा था कि चंडीगढ़ से लौटने के बाद पापा उसे ले कर कुछ ज्यादा ही पजेसिव हो गए हैं लेकिन वह अपने असली मातापिता से मिलने और यह जानने को बेचैन थी कि उन्होंने उसे अपनी गोद से उठा कर दूसरे की गोद में क्यों डाल दिया? उस ने मम्मी की डायरी में से मधुलिका मौसी का फोन नंबर और पता तो नोट कर लिया था मगर वह खत या फोन के जरिए नहीं, स्वयं मिल कर यह बात पूछना चाहती थी.

परीक्षा सिर पर थी और पढ़ाई में दिल नहीं लग रहा था. कशिश यही सोचती रहती थी कि क्या बहाना बना कर देहरादून जाए. समीरा उस की खास सहेली थी. उस से कशिश की बेचैनी छिप नहीं सकी. उस के पूछने पर कशिश को बताना ही पड़ा.

‘‘समझ में नहीं आ रहा कि देहरादून किस बहाने से जाऊं.’’

‘‘तू भी अजब भुलक्कड़ है. कई बार तो बता चुकी हूं कि सालाना परीक्षा खत्म होते ही मेरे बड़े भाई की शादी है और बरात देहरादून जाएगी. मैं तुझे बरात में ले चलती हूं. वहां जा कर तू जहां कहेगी तुझे पहुंचवाने का इंतजाम करवा दूंगी. सो अब सारी चिंता छोड़ कर पढ़ाई कर.’’

समीरा की बात से कशिश को कुछ राहत मिली. और फिर शाम को समीरा उस के मम्मीपापा से मिल कर बरात में चलने की स्वीकृति लेने उस के घर आ गई.

‘‘बरात में जाने के बारे में सोचने के बजाय फिलहाल तो तुम दोनों पढ़ाई में ध्यान लगाओ,’’ पापा ने समीरा की बात सुन कर बड़े प्यार से दोनों का सिर सहलाया.

‘‘अंतिम साल की परीक्षा है. इस के नतीजे पर तुम्हारा पूरा भविष्य निर्भर करता है. कशिश को तो मैं कार्डियोलोजी में महारत हासिल करने के लिए अमेरिका भेज रहा हूं. तुम्हारा क्या इरादा है, समीरा?’’

‘‘अगर मैं भी कार्डियोलोजिस्ट बन गई अंकल, तो मुझ में और कशिश में दोस्ती के  बजाय स्पर्धा हो जाएगी और हमारी दोस्ती खत्म हो ऐसा रिस्क मुझे नहीं लेना है. सो कुछ और सोचना पडे़गा मगर सोचने को फिलहाल आप ने मना कर दिया है,’’ समीरा हंसी.

समीरा को विदा कर के कशिश जब अंदर आई तो उस ने अपने पापा को यह कहते सुना, ‘‘मैं नहीं चाहता विभा कि कशिश देहरादून जाए और मधुदेवेन से मिले. इसलिए समीरा के भाई की शादी से पहले ही कशिश को ले कर कहीं और घूमने चलते हैं.’’

‘‘कैसे जाओगे विकास? इस बार आई.एम.ए. का वार्षिक अधिवेशन तुम्हारी अध्यक्षता में होगा और वह उन्हीं दिनों में है.’’

कशिश लपक कर कमरे में आई और कहने लगी, ‘‘मेरी एक बात मानेंगी, मम्मा? आप प्लीज, मधु मौसी को मेरे देहरादून आने के बारे में कुछ मत बताना क्योंकि मैं शादी की रौनक छोड़ कर उन से मिलने नहीं जाने वाली.’’

पापा के चेहरे पर यह सुन कर राहत के भाव उभरे थे.

‘‘ठीक कहती हो. अपनी सहेलियों को छोड़ कर मां की सहेली के साथ बोर होने की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘थैंक यू, पापा,’’ कह कर कशिश बाहर आ कर दरवाजे के पास खड़ी हो गई.

पापा, मम्मी से कह रहे थे कि अच्छा है, कशिश उन दिनों शादी में जा रही है क्योंकि हम दोनों तो अधिवेशन की तैयारी में व्यस्त हो जाएंगे और यह घर पर बोर होती रहने से बच जाएगी. इस तरह समस्या हल होते ही कशिश जीजान से पढ़ाई में जुट गई.

देहरादून स्टेशन पर बरात का स्वागत करने वालों में कई महिलाएं भी थीं. लड़की के पिता सब का एकदूसरे से परिचय करवा रहे थे. एक अत्यंत चुस्तदुरुस्त, सौम्य महिला का परिचय करवाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यह डा. मधुलिका हैं. कहने को तो हमारी फैमिली डाक्टर और पड़ोसिन हैं लेकिन हमारे परिवार की ही एक सदस्य हैं. हमारे से ज्यादा शादी की धूमधाम इन की कोठी में है क्योंकि सभी मेहमान वहीं ठहरे हुए हैं.’’

कशिश को यकीन नहीं हो रहा था कि उस का काम इतनी आसानी से हो जाएगा. उस ने आगे बढ़ कर मधुलिका को अपना परिचय दिया. मधुलिका ने उसे खुशी से गले से लगाया और पूछा कि विभा क्यों नहीं आई?

‘‘आंटी, मम्मीपापा आजकल एक अधिवेशन में भाग ले रहे हैं. मैं भी इस बरात में महज आप से मिलने आई हूं,’’ कशिश ने बिना किसी हिचक के कहा, ‘‘मुझे आप से अकेले में बात करनी है.’’

मधुलिका चौंक पड़ी फिर संभल कर बोली, ‘‘अभी तो एकांत मिलना मुश्किल है. रात को बरात की खातिरदारी से समय निकाल कर तुम्हें अपने घर ले चलूंगी.’’

‘‘उस में तो बहुत देर है, उस से पहले ही घर ले चलिए न,’’ कशिश ने मनुहार की.

‘‘अच्छा, दोपहर को क्लिनिक से लौटते हुए ले जाऊंगी.’’

दोपहर को मधुलिका ने खुद आने के बजाय उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी भेज दी. वह अपने क्लिनिक में उस का इंतजार कर रही थी.

‘‘तुम अकेले में मुझ से बात करना चाहती हो, जो फिलहाल घर पर मुमकिन नहीं  है. बताओ क्या बात है?’’ मधुलिका मुसकराई.

‘‘मैं यह जानना चाहती हूं कि आप ने मुझे क्यों नकारा, क्यों मुझे दूसरों को पालने के लिए दे दिया? मां, मुझे मालूम हो चुका है कि मैं आप की बेटी हूं,’’ और कशिश ने चंडीगढ़ वाला किस्सा उन्हें सुना दिया.

‘‘विभा और विकास ने तुम्हें क्या वजह बताई?’’ मधुलिका ने पूछा.

‘‘उन्हें मैं ने बताया ही नहीं कि मुझे सचाई पता चल गई है. वह दोनों मुझे इतना ज्यादा प्यार करते हैं कि  मैं कभी सपने में भी उन से कोई अप्रिय बात पूछ कर उन्हें दुखी नहीं कंरूगी.’’

‘‘यानी कि तुम्हें विभा और विकास से कोई शिकायत नहीं है?’’

‘‘कतई नहीं. लेकिन आप से है. आप ने क्यों मुझे अपने से अलग किया?’’

‘‘कमाल है, बजाय मेरा शुक्रिया अदा करने के कि तुम्हें इतने अच्छे मम्मीपापा दिए, तुम शिकायत कर रही हो?’’

‘‘सवाल अच्छेबुरे का नहीं बल्कि उन्हें दिया क्यों, यह है?’’

‘‘मान गए भई, पली चाहे कहीं भी हो, रहीं वकील की बेटी,’’ मधुलिका ने बात हंसी में टालनी चाही.

‘‘मगर वकील की बेटी को डाक्टर की बेटी कहलवाने की क्या मजबूरी थी?’’

‘‘मजबूरी कुछ नहीं थी बस, दोस्ती थी. विभा मां नहीं बन सकती थी और अनाथालय से किसी अनजान बच्चे को अपनाने में दोनों हिचक रहे थे. बेटे और बेटी के जन्म के बाद मेरा परिवार तो पूरा हो चुका था. सो जब तुम होने वाली थीं तो हम लोगों ने फैसला किया कि चाहे लड़का हो या लड़की यह बच्चा हम विभा और विकास को दे देंगे. ऐसा कर के मैं नहीं सोचती कि मैं ने तुम्हारे साथ कोई अन्याय किया है.’’

‘‘अन्याय तो खैर किया ही है. पहले तो सब ठीक था मगर असलियत जानने के बाद मुझे अपने असली मातापिता का प्यार चाहिए…’’

तभी कुछ खटका हुआ और एक प्रौढ़ पुरुष ने कमरे में प्रवेश किया. मधुलिका चौंक ०पड़ी.

‘‘आप इस समय यहां?’’

‘‘कोर्ट से लौट रहा था तो बाहर तुम्हारी गाड़ी देख कर देखने चला आया कि खैरियत तो है.’’

‘‘ऋचा की बरात में कशिश भी आई है. मुझ से अकेले में बात करना चाह रही थी, सो यहां बुलवा लिया,’’ मधुलिका ने कहा और कशिश की ओर मुड़ी,‘‘यह तुम्हारे देवेन अंकल हैं.’’

‘‘अंकल क्यों, पापा कहिए न?’’ कशिश नमस्ते कर के देवेन की ओर बढ़ी लेकिन देवेन उस की अवहेलना कर के मधुलिका के जांच कक्ष में

जाते हुए कड़े स्वर में बोले, ‘‘इधर आओ, मधु.’’

मधुलिका सहमे स्वर में कशिश को रुकने को कह कर परदे के पीछे चली गई.

‘‘यह सब क्या है, मधु? मैं ने तुम्हें कितना समझाया था कि अपने बेटेबेटी का प्यार और हक बांटने के लिए मुझे तीसरी औलाद नहीं चाहिए, तुम गर्भपात करवाओ. मगर तुम नहीं मानीं और इसे अपनी सहेली के लिए पैदा किया. खैर, उन के दिल्ली जाने के बाद मैं ने चैन की सांस ली थी मगर यह फिर टपक पड़ी मुझे पापा कहने, हमारे सुखी परिवार में सेंध लगाने के लिए. साफ कहे दे रहा हूं मधु, मेरे लिए यह अनचाही औलाद है. न मैं स्वयं इस का अस्तित्व स्वीकार करूंगा न अपने बच्चों…’’

कशिश आगे और नहीं सुन सकी. उस ने फौरन बाहर आ कर एक रिकशा रोका. अब उसे दिल्ली जाने का इंतजार था, जहां उस के मम्मीपापा व्यस्तता के बावजूद उस के बगैर बेहाल होंगे. प्यार जन्म से नहीं होता है. प्यार तो प्यार करने वालों से होता है और जो प्यार उसे अपने दिल्ली वाले मातापिता से मिला, उस का तो कोई मुकाबला ही नहीं.

 

पेड़ : कैसी लड़की थी सुलभा

चीनू की नन्हीनन्ही हथेलियां दूर होती चली गईं और धीरेधीरे एकदम से ओझल हो गईं.

पूरे 30 दिन से उन का घर गुलजार था. बच्चों के होहल्ले से भरा था. साल भर में उन के घर में 2 ही तो खुशी के मौके आते थे. एक गरमी की लंबी छुट्टियों में और दूसरा, दशहरे की छुट्टियों के समय.

उन दिनों नीरेंद्र की उजाड़ जिंदगी में हुलस कर बहार आ जाती थी. उस का जी करता था कि इस आए वक्त को रोक कर अपने घर में कैद कर ले. खूब नाचेगाए और जश्न मनाए, पर ऐसा हो कहां सकता था.

छोटी बहन के साथ 2 बच्चे, छोटे भाई के 2 बच्चे और बड़ी दीदी के दोनों बच्चे, पूरे 6 नटखट ऊधमी सदस्यों के आने से ऐसा लगता जैसे घर छोटा पड़ गया हो. बच्चे उस कमरे से इस कमरे में और इस कमरे से उस कमरे में भागे फिरते, चिल्लाते और चीजें बिखेरते रहते.

बच्चों के मुंह से ‘चाचीजी’, ‘मामीजी’ सुनसुन कर वे अघाते न थे. दिनरात उन की फरमाइशें पूरी करने में लगे रहते. किसी को कंचा चाहिए तो किसी को गुल्लीडंडा. किसी को गुडि़या तो किसी को लट्टू.

4 माह में जितना पैसा वे बैंक से निकाल कर अपने ऊपर खर्च करते थे, उस से भी ज्यादा बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में उन दिनों खर्च कर देते. फिर भी लगता कि कुछ खर्च ही नहीं किया है. वे तो नईनई चीजें खरीदने के लिए बच्चों को खुद ही उकसाते रहते.

कभीकभी भाईबहनों को गुस्सा आने लगता तो वे उन्हें झिड़कते, ‘‘क्या करते हो भैया. सुबह से इन मामूली चीजों के पीछे लगभग 100 रुपए फूंक चुके हो. बच्चों की मांग का भी कहीं अंत है?’’

नीरेंद्र हंस देते, ‘‘अरे, रहने दो, यह इन्हीं का तो हिस्सा है. बस, साल में 10 दिन ही तो इन के चाव के होते हैं. देता हूं तो बदले में इन से प्यार भी तो पाता हूं.’’

सिर्फ 30 दिन का ही तो यह मेला होता है. बाद में बच्चों की बातें, उन की गालियां याद आतीं. उन की छोड़ी हुई कुछ चीजें, कुछ खिलौने संभाल कर वे उन निर्जीव वस्तुओं से बातें करते रहते और मन को बहलाते. उन की एक बड़ी अलमारी तो बच्चों के खिलौनों से भरी पड़ी थी.

इस तरह नीरेंद्र अपने अकेलेपन को काटते. हर बार उन का जी करता कि बच्चों को रोक लें, पर रोक नहीं पाते. न बच्चे रुकना चाहते हैं न माताएं उन्हें यहां रहने देना पसंद करती हैं. पहले तो उन के छोटे होने का बहाना था. बड़े हुए तो छात्रावास में डाल दिए गए. इसी से नीरेंद्र उन्हीं बच्चों में से एक को गोद लेना चाहते थे. मगर हर घर में 2 बच्चे देख खुद ही तालू से जबान लग जाती थी.

किसीकिसी साल तो ऐसा भी होता है कि 30 दिनों में भी कटौती हो जाती. कभीकभी बच्चे यहां आने के बजाय कश्मीर, मसूरी घूमने की ठान लेते. फिर तो ऐसा लगने लगता जैसे जीने का बहाना ही खत्म हो जाएगा. पिछले साल यही तो हुआ था. बच्चे रानीखेत घूमने की जिद कर बैठे थे और यहां आना टल गया था. किसी तरह छुट्टियों के 7-8 दिन बचा कर वे यहां आए थे तो उन का मन रो कर रह गया था.

कभीकभी नीरेंद्र को अपनेआप पर ही कोफ्त होने लगती कि क्यों वे अकेले रह गए? आखिर क्या कारण था इस का? पिता की असमय मृत्यु ने उन के घर को अनाथ कर दिया था. घर में वे सब से बड़े थे, इसलिए जिम्मेदारी निभाना उन्हीं का कर्तव्य था. घर में सभी को पढ़ाया- लिखाया. पूरी तरह से हिम्मत बांध कर उन के शादीब्याह किए तब कहीं जा कर अपने लिए विचार किया था.

नीरेंद्र सीधीसादी लड़की चाहते थे. मां ने उन के लिए सुलभा को पसंद किया था. सुलभा में कोई दोष न था. नीरेंद्र खुश थे कि उम्र उन के विवाह में बाधक नहीं बनी. इस से पहले जब वे भाईबहनों का घर बसा रहे थे तब सदा उन्हें एक ही ताना मिला था, ‘‘क्यों नीरेंद्र, ब्याह करोगे भी या नहीं? बूढ़े हो जाओगे, तब कोई लड़की भी न देगा. बाल पक रहे हैं, आंखों पर चश्मा चढ़ गया है और क्या कसर बाकी है?’’

सुन कर नीरेंद्र हंस देते थे, ‘‘चश्मा और पके बाल तो परिपक्वता और बुद्धिमत्ता की निशानी हैं. मेरी जिम्मेदारी को जो लड़की समझेगी वही मेरी पत्नी बनेगी.’’

सुलभा उन्हें ऐसी ही लड़की लगी थी. सगाई के बाद तो वे दिनरात सुलभा के सपने भी देखने लगे थे. उन्हें ऐसा लगता जैसे सुलभा उन की जिंदगी में एक बहार बन कर आएगी.

विवाह की तिथि को अभी काफी दिन थे. एक दिन इसी बीच वे सुलभा के साथ रात को फिल्म देख कर लौट रहे थे. अचानक कुछ बदमाशों ने सुलभा के साथ छेड़छाड़ की थी. नीरेंद्र को बुढ़ऊ कह कर ताना मार दिया था.

सुन कर नीरेंद्र को सहन न हुआ था और वे बदमाशों से उलझ पड़े थे, पर उन से वे कितना निबट सकते थे. अपनेआप से वे पहली बार हारे थे. गुस्सा आया था उन्हें अपनी कमजोरी पर. वे स्वयं को अत्यंत अपमानित महसूस कर रहे थे. हतप्रभ रह गए थे अपने लिए बुढ़ऊ शब्द सुन कर. उस शाम किसी तरह वे और सुलभा बच कर लौट तो आए थे मगर सुलभा ने दूसरे ही दिन सगाई की अंगूठी वापस भेज दी थी. शायद उसे भी यकीन हो गया था कि वे बूढ़े हो गए हैं.

‘अच्छा ही किया सुलभा ने.’ एक बार नीरेंद्र ने सोचा था. परंतु मन में अपनी हीनता और कमजोरी का एक दाग सा रह गया. विवाह से मन उचट गया, कोई इस विषय पर बात चलाए भी तो उस से उलझ बैठते. मां जब तक रहीं नीरेंद्र को शादी के लिए मनाती रहीं, समझाती रहीं.

मां की मृत्यु के बाद वह जिद और मनुहार भी खत्म हो गई. कुछ यह भी जिद थी कि अब इसी तरह जीना है. पहले भाईबहनों पर भरोसा था, पर वे अपनी- अपनी जिंदगी में लग गए तो उन्होंने उन्हें छेड़ना भी उचित न समझा.

हां, भाईबहनों के बच्चों ने अवश्य ही नीरेंद्र के अंदर एक बार गृहस्थी का लालच जगा दिया था. अंदर ही अंदर वे आकांक्षा से भर उठे कि उन्हें भी कोई पिता कहता. वे भी किसी के भविष्य को ले कर चिंता करते. वे भी कोई सपना पालते कि उन का बेटा बड़ा हो कर डाक्टर बनेगा या कोई उन का भी दुखसुख सुनता. सोतेजागते वे यही सोचा करते.

तब कभीकभी मन में मनाते कि कोई उन्हें क्यों नहीं कहता कि ब्याह कर लो. अकेले ही वे रसोईचूल्हे से उलझे हुए हैं कोई पसीजता क्यों नहीं, कोई अजूबा तो नहीं इस उम्र में ब्याह करना. बहुत से लोग कर रहे हैं.

नीरेंद्र अपनी जिंदगी की तुलना भाई की जिंदगी से करते. सोचते कि उन की और धीरेंद्र की सुबह में कितना अंतर है. वे 4 बजे का अलार्म लगा कर सोते. सोचते हुए देर रात गए उन्हें नींद आती. परंतु सुबह तड़के घड़ी की तेज घनघनाहट के साथ ही उन की नींद टूट जाती जबकि वे जागना नहीं चाहते. लेकिन जानते हैं कि सुबह के नाश्ते की तैयारी, कमरों की सफाई, कपड़ों की धुलाई आदि सब उन्हीं को ही करनी है.

मगर धीरेंद्र की सुबह भले ही झल्लाहट से शुरू हो लेकिन उत्सुकता से भरी जरूर होती है. 4 बजे का अलार्म बज जाए तो भी उसे कोई परवाह नहीं. नींद ही नहीं टूटती है. न जाने उसे कैसी गहरी नींद आती है.

घड़ी का कांटा जब 4 से 5 तक पहुंचता है तब उस की पत्नी चिल्लाती है, ‘‘उठो, दफ्तर जाने में देर हो जाएगी.’’

‘‘हूं,’’ धीरेंद्र उसी खर्राटे के साथ कहेगा, ‘‘क्या 5 बज गए?’’

‘‘तैयार होतेहोते 10 बज जाएंगे. फिर मुझे न कहना कि देर हो गई.’’

शायद फिर बच्चों को इशारा किया जाता होगा. पप्पू धीरेंद्र के बिछौने पर टूट पड़ता, ‘‘उठिए पिताजी, वरना पानी डाल दूंगा.’’

फिर वह बच्चों के अगलबगल बैठ कर कहता, ‘‘अरे, नहीं बाबा, मां से कहो कि चाय ले आए.’’

स्नानघर में जा कर भी धीरेंद्र बीवी से उलझता रहता, ‘‘मेरे कुरते में 2 बटन नहीं हैं और जूते के फीते बदले या नहीं? जाने मोजों की धुलाई हुई है या नहीं?’’

पत्नी तमक कर कहती, ‘‘केवल तुम्हें ही तो नौकरी पर नहीं जाना है, मुझे भी दफ्तर के लिए निकलना है.’’

‘‘ओह, तो क्या तुम्हारे ब्लाउज के बटन मुझे टांकने होंगे,’’ धीरेंद्र चुहल करता तो पत्नी उसे धप से उलटा हाथ लगाती.

इसे कोई कुछ भी कहे, पर नीरेंद्र का लोभी मन गृहस्थी के ऐसे छोटेमोटे सुखों की कान लगा कर आहट लेता रहता.

नीरेंद्र बेसन के खुशबूदार हलवे के बहुत शौकीन हैं. जी करता है नाश्ते में कोई सुबहसुबह हलवा परोस दे और वे जी भर कर खाएं. अम्मां थीं तो उन का यह पसंदीदा व्यंजन हफ्ते में 3-4 बार अवश्य मिला करता था. पर उन की मृत्यु के बाद सारे स्वाद समाप्त हो गए.

धीरेंद्र की पत्नी बेसन का हलवा देखते ही मुंह बनाती थी. खुद नीरेंद्र अम्मां की भांति कभी हलवा बना नहीं सके. अब तो बस हलवे की खुशबू मन में ही दबी रहती है.

धीरेंद्र को बेसन के पकौड़ों के एवज में कई बार बीवी के हाथ बिक जाना पड़ता है. बीवी का मन न हो तो कोई न कोई बात पक्की करवा कर ही वह पकौड़े बनाती है. नीरेंद्र भी अपने पसंद के हलवे पर नीलाम हो जाना चाहते हैं, पर वह नीलामी का चाव मन में ही दबा रह गया. अब तो रोज सुबह थोड़ा सा चिवड़ा फांक कर दफ्तर की ओर चल देते हैं.

दफ्तर में नए और पुराने सहयोगियों का रेला नीरेंद्र को देखदेख कर दबी मुसकराहट से अभिवादन करता. कम से कम इतनी तसल्ली तो जरूर रहती कि हर कोई उन से काम निकलवाने के कारण मीठीमीठी बातें तो जरूर करता है. उस के साहब, अपनीअपनी फाइल तैयार करवाने के चक्कर में उसे मसका लगाते रहते. किसी को पार्टी में जाना हो, पत्नी को ले कर बाजार जाना हो, बच्चे को अस्पताल पहुंचाना हो, तुरंत उन्हें पकड़ते. ‘‘नीरेंद्र, थोड़ा सा यह काम कर दो.’’

इतना ही नहीं दफ्तर के क्लर्क, चपरासी, माली, जमादार आदि अपने तरीके से इस अकेले व्यक्ति से नजराना वसूलते रहते. अगर देने में थोड़ी सी आनाकानी की तो वे लोग कह देते, ‘‘किस के लिए बचा रहे हो, बाबू साहब. आप की बीवी होती तो कहते, साड़ी की फरमाइश पूरी करनी है. बेटा होता तो कहते कि उस की पढ़ाई का खर्च है. अगर बेटी होती तो हम कभी धेला भी न मांगते…मगर कुंआरे व्यक्ति को भला कैसी चिंता?’’

पर धीरेंद्र को न तो दफ्तर में रुकने की जरूरत पड़ती और न ही अपने मातहतों के हाथ में चार पैसे धरने की नौबत आती. घर जल्दी लौटने के बहाने भी उसे नहीं बनाने पड़ते. खुद ही लोग समझ जाते हैं कि घर में देरी की तो जनाब की खैर नहीं.

पर नीरेंद्र किस के लिए जल्दी घर लौटें. बालकनी में टहलते ठीक नहीं लगता. अपनीअपनी छतों पर टहलते जोड़ों का आपस में हंसीमजाक सुनना अब उन से सहन नहीं होता. बारबार  लगता है जैसे हर बात उन्हें ही सुनाई जा रही है. खनकती, ठुनकती हंसी वे पचा नहीं पाते. घर के अंदर भाग कर आएं तो मच्छरों की भूखी फौज उन की दुबली देह पर टूट पड़ती है. तब एक ही उपाय नजर आता है कि मच्छरदानी गिरा कर अंदर घुस जाएं और घड़ी के भागते कांटों को देखते हुए समय निकालते रहें.

इसीलिए नीरेंद्र कभीकभी वैवाहिक विज्ञापनों में स्वयं ही अपने लिए उपयुक्त पात्र तलाशने लगते हैं. पर ऐसा कभी न हो सका. कई बार समझौतों के सहारे लगा कि बात बनेगी परंतु विवाह के लिए समझौता करना उन्हें उचित नहीं लगा. अकेलेपन के कारण झिझकते हुए उन्होंने छोटे भाई की लड़की नीलू को अपने पास रख लेने का प्रस्ताव किया तो वह बचने लगा था, ‘‘पता नहीं, बच्ची की मां राजी होगी या नहीं?’’

पर नीरेंद्र बजाय बच्ची की मां से पूछने के छोटी बहन के सामने ही गिड़गिड़ा उठे थे, ‘‘कामिनी, मैं चाहता हूं, क्यों न आशू यहीं मेरे साथ रहे. उस का जिम्मा मैं उठाऊंगा.’’

‘‘आशू?’’ बहन की आंखें झुक गईं, ‘‘बाप रे, इस की दादी तो मुझे काट कर रख देंगी.’’

जवाब सुन कर नीरेंद्र चकित रह गए थे, ‘अरे यह क्या? अपनी लगभग सारी कमाई इन के बच्चों पर उड़ाता हूं. कितने दुलार से यहां उन्हें रखता हूं. हर वर्ष राखी पर मुंहमांगी चीज बहन के हाथ में रखता हूं. इतना ही नहीं, किसी भी बच्चे को कुछ भी चाहिए तो साधिकार माएं चालाकी से उन की फरमाइश लिख भेजती हैं, लेकिन क्या कोई भी अपने एक बच्चे को मेरे पास नहीं छोड़ सकती. कल को वह बच्चा मेरी पूरी संपत्ति का वारिस होगा, लेकिन सब ने मेरी मांग ठुकरा दी.’

‘‘अच्छा, आशू से ही पूछती हूं,’’ बहन ने आशू को आवाज दी थी.

नीरेंद्र उस की बातों से बेजार छत ताकने लगे थे, लेकिन आशू को सिर्फ उन की चीजें ही अच्छी लगती थीं.

कुंआरे रह कर नीरेंद्र लोगों के लिए सिर्फ एक पेड़ बन कर रह गए थे, जिसे जिस का जी चाहे, नोचे, फलफूल, लकड़ी आदि प्रत्येक रूप में उस का उपयोग करे. अपने लिए भी वे एक पेड़ की भांति थे. जैसे बसंत के मौसम में पेड़ों के नए फूलपत्ते आते हैं उसी प्रकार वे भी किसी पेड़ की तरह हरेभरे हो जाते. क्या उन्हें वर्ष भर मुसकराने का हक नहीं है? स्वयं के नोचे जाने के विरोध का भी कोई अधिकार नहीं है?

ननकू का रेडियो और फूलमती

“दादू, क्या आप किसी अमीन सयानी को जानते हैं?” 62 साल के ननकू से जब उस की पोती राधा ने सवाल किया, तो उस की आंखों में चमक आ गई.

“क्यों… क्या हुआ?” ननकू ने राधा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

“पहले आप यह बताओ कि उन के नाम से आप को सब से पहले क्या याद आता है?”

“मुझे तो अपना बीता हुआ वह जमाना याद आ गया है, जब किसी घर में रेडियो का होना शान की बात समझा जाता था. खेत में थकाहारा किसान और सरहद पर दुश्मन से रखवाली करता जवान रेडियो को ही अपना पसंदीदा टाइमपास मानता था. हर खास और आम घरों में रेडियो बजता सुनाई दे जाता था…”

“उसी जमाने में एक आवाज ने रेडियो सुनने वालों को अपना दीवाना बना लिया था. वह कोई गायक नहीं था, कोई फिल्म हीरो भी नहीं था, पर उस की आवाज में गजब की खनक और मिठास थी.

“उस भलेमानस का नाम नाम था अमीन सयानी. ‘रेडियो सीलोन’ और फिर ‘विविध भारती’ पर‌ तकरीबन 42 सालों तक चलने वाला हिंदी गीतों का उन का कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ इतना ज्यादा मशहूर हो गया था कि लोग हर हफ्ते उन्हें सुनने के लिए बेकरार रहा करते थे. अरे, बाद में उसी ‘बिनाका गीतमाला’ का नाम बदल कर ‘सिबाका गीतमाला’ कर दिया गया था.”

“दादू, अब वही मखमली आवाज चुप हो गई है. 91 साल की उम्र में अमीन सयानी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है. मंगलवार, 20 फरवरी, 2024 की शाम को हार्ट अटैक से उन की मौत हो गई. उन के बेटे राजिल सयानी ने यह दुखद खबर दी थी,” राधा ने बुझे मन से बताया.

“अरे, बाप रे. यह तो बहुत बुरा हुआ. हुआ क्या था उन्हें?” ननकू ने उदास हो कर पूछा.

“राजिल सयानी ने बताया कि अमीन‌ सयानी को मंगलवार को उन के दक्षिण मुंबई में बने घर पर शाम के 6 बजे हार्ट अटैक आया था. इस के बाद उन्हें दक्षिण मुंबई के एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में ले जाया गया, जहां पर इलाज करने के कुछ देर बाद ही डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.”

राधा की इस खबर ने ननकू को तोड़ कर रख दिया. वह बिस्तर से उठा और अलमारी में रखे एक छोटे से संदूक को बाहर निकाल लाया. वह संदूक था ननकू की मीठी यादों का पिटारा. उस ने टूटेफूटे उस संदूक को खोला और अपनी पोती राधा को पास बुलाया.

राधा हैरान थी कि अमीन सयानी की इस दुखद खबर के बाद दादू ने यह संदूक इतने साल बाद क्यों खोला? उस संदूक में बरसों पुराना सामान रखा था और साथ में था धूल में सना एक रेडियो, जो अब चलने की हालत में नहीं दिख रहा था.

ननकू ने वह रेडियो बाहर निकाला, कांपते हाथों से उस की धूल झाड़ी और खो गया उस जमाने में, जब वह महज 12 साल का था.

आज भले ही ननकू अपने परिवार के साथ लखनऊ शहर में रहता है, पर तब वह बांदा से सटे एक गांव में रहता था. 1974 का साल था. ननकू गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ता था और अपने घर से थोड़ी दूर रहने वाली फूलमती के साथ स्कूल आताजाता था.

फूलमती भी ननकू की हमउम्र थी और पढ़ाई में तेज. पर उन दोनों को रेडियो सुनने का शौक था. हर बुधवार को रात के 8 बजे से रात के 9 बजे तक. यह एक घंटा उन दोनों के लिए अकेले मिलने का जरीया था.

दिन में स्कूल की पढ़ाई, फिर घर के काम निबटाने, थोड़ाबहुत खेतीबारी में हाथ बंटाना और फिर रात को रेडियो पर प्यारभरे नगमे सुनना.

ननकू हर रात चोरीछिपे अपना रेडियो उठाए पहुंच जाता था फूलमती के घर के पिछले हिस्से में, जहां वह अपनी खिड़की से बाहर खड़े ननकू के रेडियो पर ‘सिबाका गीतमाला’ सुनती थी.

एक रात की बात है. साल था 1974. ननकू और फूलमती में शर्त लगी थी कि इस साल ‘सिबाका गीतमाला’ में साल का टौप का गाना कौन सा रहेगा?

फूलमती ने कहा, “तुम मुझ से शर्त मत लगाया करो. पिछले साल भी हार गए थे. तब फिल्म ‘जंजीर’ का गाना ‘यारी है ईमान मेरा…’ बाजी मार गया था.”

इस पर ननकू ने कहा, “हर बार तुक्का नहीं लगता. अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. इस बार तो गाना ‘मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया…’ ही सरताज बनेगा.”

इस बार वाकई ननकू का कहा सही साबित हुआ. वही गाना सरताज बना था. ननकू ने फूलमती को देख कर आंख दबा दी. वह शरमा कर खिड़की बंद करते हुए वहां से भाग गई…

“क्या हुआ दादू, आप कहां खो गए?” राधा की आवाज ने ननकू को यादों से बाहर निकाला.

“कुछ नहीं बेटी. अच्छा, यह तो बता खबर में अमीन सयानी के बारे में और क्याक्या छपा है?” झिलमिलाती आंखों से ननकू ने पूछा.

“यही कि अमीन सयानी के नाम पर 54,000 से ज्यादा रेडियो कार्यक्रम प्रोड्यूस, कंपेयर, वौइसओवर करने का रिकौर्ड दर्ज है. तकरीबन 19,000 जिंगल्स के लिए आवाज देने‌ के लिए भी उन का नाम ‘लिम्का बुक्स औफ रिकौर्ड्स’ में दर्ज है.

“अमीन सयानी ने ‘भूत बंगला’, ‘तीन देवियां’, ‘कत्ल’ जैसी फिल्मों में अनाउंसर के तौर पर भी काम किया था. रेडियो पर फिल्मी सितारों पर बना उन का शो ‘एस. कुमार का फिल्मी मुकदमा’ भी काफी मशहूर हुआ था.

“बाद में अमीन सयानी ने कई शो होस्ट किए थे, जिन में ‘फिल्मी मुलाकात’, ‘सैरिडौन के साथी’, ‘बौर्नविटा क्विज कौंटैस्ट’, ‘शालीमार सुपरलैक जोड़ी’, ‘सितारों की पसंद’, ‘चमकते सितारे’, ‘महकती बातें’ और ‘संगीत के सितारों की महफिल’ शामिल रहे थे.

“21 दिसंबर, 1932 को जनमे अमीन सयानी अपने जमाने में रेडियो की दुनिया के सुपरस्टार थे. उन का कार्यक्रम की शुरुआत में ही ‘बहनो और भाइयो’ के साथ रेडियो सुनने वालों को संबोधित करने का तरीका बड़ा फेमस हुआ था. साल 2009 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से भी नवाजा गया था…” राधा बोले जा रही थी, पर ननकू तो फिर से अपनी फूलमती और रेडियो के पास जा पहुंचा था.

रेडियो ने ननकू और फूलमती की दोस्ती गहरी कर दी थी. एक शाम को ननकू खेत से लौट रहा था. रेडियो पर उस का पसंदीदा गाना ‘हायहाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी…’ बज रहा था. इतने में उसे फूलमती दिखाई दी. ननकू ने गाने की आवाज तेज कर दी. फूलमती भी चारा काटते हुए वह गाना गुनगुनाने लगी.

“आज रात को तैयार रहना 8 बजे. बुधवार है न,” ननकू ने कहा.

“ठीक है,” फूलमती बोली. पर वे दोनों नहीं जानते थे कि उन की बातें पास ही पेड़ की आड़ में खड़ी फूलमती की मां सुन रही थीं.

मां ने घर में जाते ही फूलमती के बापू को पूरी बात बता दी. पहले तो बापू को लगा कि यह उन दोनों का बचपना है, क्योंकि वे एकसाथ जो रहते हैं, पर रात को ननकू का घर के पिछवाड़े में आ कर मिलना अखर गया.

रात के 8 बजे ननकू और फूलमती ‘सिबाका गीतमाला’ पर प्यार भरे नगमे सुन रहे थे कि अचानक फूलमती के बापू ने ननकू को दबोच लिया. बस, फिर क्या था. बापू ने ननकू की धुनाई कर दी. इधर, फूलमती की मां ने उसे ताबड़तोड़ थप्पड़ बरसाने शुरू कर दिए.

“अगर तू आज के बाद फूलमती के आसपास भी दिखा तो अच्छा नहीं होगा. गांव का लड़का है, इसलिए पहली गलती मान कर तुझे छोड़ रहा हूं,” फूलमती के बापू ने ननकू को धमकाते हुए कहा.

ननकू ने अपने कपड़े झाड़े, पास रखा रेडियो उठाया और भारी मन से वहां से चला गया. फूलमती की खिड़की बंद हो चुकी थी.

इस के बाद फूलमती का स्कूल जाना बंद हो गया. ननकू की जिंदगी दर्दभरे नगमे सी हो गई थी. उसे पहली बार अहसास हुआ था कि वह फूलमती को पसंद करता है. यही हाल फूलमती का भी था. उन दोनों को जोड़ने वाला रेडियो भी अब शांत रहने लगा था.

इस बात को 3 साल गुजर गए थे. 15 साल की होते ही फूलमती के हाथ पीले कर दिए गए. 1977 का साल था. फिल्म ‘लैला मजनू’ का गाना ‘हुस्न हाजिर है मोहब्बत की सजा पाने को…’ ‘सिबाका गीतमाला’ पर खूब बज रहा था, जो ननकू की नाकाम मोहब्बत पर फिट बैठ रहा था.

उस बुधवार की रात ननकू खूब रोया था. रात जैसेतैसे कटी थी. अगले ही दिन वह अपना रेडियो ले कर फूलमती की ससुराल जा पहुंचा और उस के घर से थोड़ी दूर बैठ कर तेज आवाज में रेडियो पर गाने सुनने लगा.

गाने की आवाज सुन कर फूलमती के दिल की धड़कनें तेज हो गईं. उस ने मन ही मन कहा, ‘बस, ननकू यहां न आया हो.’

फूलमती डरतीडरती खिड़की पर आई और सामने ननकू को देख कर उस की आह निकल गई. चूंकि घर के आसपास कुछ दुकानें थीं, तो किसी को शक नहीं हुआ कि ये गाने क्यों बज रहे हैं.

यह सिलसिला कई साल चला. ननकू रोज वहां आता और एक चाय की दुकान पर बैठ कर गाने सुनता. फूलमती खिड़की से सब देखती और इशारे से ननकू को वहां से जाने की गुजारिश करती, पर ननकू तो जैसे फूलमती की एक झलक पाने के लिए यह सब कर रहा था…

“दादू, खाना खा लो. आज आप की पसंद की कटहल की सब्जी बनी है,” राधा की आवाज ने ननकू का ध्यान भंग किया.

“मन नहीं है,” ननकू ने इतना ही कहा और अपने रेडियो को ताकने लगा और फिर यादों में खो गया.

ननकू और फूलमती को दूर हुए अब 25 साल बीत चुके थे. एक दिन ननकू को पता चला कि फूलमती को कोई बड़ी बीमारी हो गई है और वह अस्पताल में आखिरी सांसें ले रही है. वह तुरंत अपना वही रेडियो ले कर अस्पताल पहुंचा.

उस समय फूलमती के कमरे में कोई नहीं था. वह आंखें बंद किए लेटी हुई थी. ननकू ने धीरे से रेडियो चला दिया. भूलेबिसरे गानों का प्रोग्राम चल रहा था. शम्मी कपूर की फिल्म ‘पगला कहीं का’ का गाना ‘तुम मुझे यूं भुला न पाओगे…’ बज रहा था.

फूलमती ने आंखें खोल दीं और अपने सामने ननकू को देख कर उस की आंखें गीली हो गईं. ननकू ने उस का हाथ पकड़ लिया. फूलमती की हथेली पर ननकू की आंख से आंसू गिरने लगे.

यह वह आखिरी गाना था, जो उन दोनों ने साथ सुना था. फूलमती अब इस दुनिया में नहीं थी.

वह दिन है और आज का दिन, ननकू ने वह रेडियो कभी नहीं चलाया. आज बुधवार को अमीन सयानी की मौत की खबर ने ननकू और फूलमती के अधूरे प्यार को जिंदा कर दिया था.

ननकू ने वह रेडियो चलाया, पर उस में से ‘खरखर’ की आवाज ही आ रही थी, जैसे अमीन सयानी की मौत के बाद उस का गला बैठ गया हो.

बुलेट पर सवार लॉन्ग ड्राइव पर निकली आम्रपाली दुबे, निरहुआ बनें ड्राइवर

भोजपुरी की जानीमानी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे हमेशा ही अपनी सफलता को लेकर सोशल मीडिया पर छाई रहती है. आए दिन एक्ट्रेस मीडिया की लाइमलाइट में बनीं रहती है. फैंस एक्ट्रेस की वीडियो और फोटोज को बेसब्री से इंतजार करते रहते है. एक्ट्रेस के हर पोस्ट पर लोग जमकर प्यार बरसाते है. इसी बीच भोजपुरी की क्वीन आम्रापाली दुबे का एक रील वीडियो सामने आया है, जो कि इंटरनेट वर्ल्ड में आग की तरह फैल रहा है. सामने आए इस क्लिप को देख उनके फैंस गदगद हो गए हैं. इस वीडियो में खास बात ये है कि वे एक्टर निरहुआ के साथ नजर आ रही है.


आपको बता दें, कि भोजपुरी की क्वीन आम्रपाली दुबे ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए एक रील वीडियो शेयर किया है, जो कि इंटरनेट पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. सामने आए इस वीडियो में आम्रपाली दुबे कभी निरहुआ के साथ रोमांस कर रही हैं तो कभी वो निरहुआ संग लॉन्ग ड्राइव पर जा रही हैं. फैंस को आम्रपाली दुबे और निरहुआ का ये अंदाज काफी रोमांटिक लग रहा है. इन दोनों की केमिस्ट्री पर लोग अपनी जान छिड़क रहे हैं. कई लोग इस क्लिप पर रिेएक्ट कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘मस्त जोड़ी’.


37 साल की आम्रपाली दुबे वैसे तो कई फिल्मों में दुल्हन बन चुकी हैं लेकिन रियल लाइफ में अभी तक उन्होंने शादी नहीं की है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो आम्रपाली दुबे शादीशुदा दिनेश लाल यादव को डेट कर रही हैं. लोगों का भी ये मानना है कि दोनों एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं. हालांकि आम्रपाली और निरहुआ ने कई बार मीडिया के सामने ये कहा है कि वे बस बेस्ट फ्रेंड हैं.

अली फजल के साथ शख्स ने की अजीब हरकत, भड़के फैंस

बौलीवुड के फेमस एक्टर अली फजल बेशक सुर्खियों में कम रहते हो, लेकिन उनके चाहने वाले उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते है. उनकी एक्टिंग और स्टाइल सभी को अपना दीवाना बना लेता है. अली फजल कभी मिर्जापुर में गुड्डू पंडित का रोल निभाते है तो कभी फुकरे फिल्म में नजर आते है. अली फजल की जबरदस्त फैन फॉलोइंग है. उनके फैंस उनके साथ सेल्फी लेने के लिए बेताब रहते है. ऐसा ही कुछ एक शख्स ने किया लेकिन उसकी सेल्फी लेने के साथ ऐसी हरकत देख उनके फैंस भड़क उठे है.

 

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आपको बता दें, कि अली फजल हाल ही में एक शोरूम के बाहर स्पॉट हुए और पैपराजी को पोज दिए. अली फजल जब पोज दे रहे थे तभी एक शख्स ने उनके साथ सेल्फी लेने के लिए ऐसी हरकत कर दी कि फैंस भड़क गए हैं. अली फजल का लेटेस्ट वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिस पर फैंस रिएक्शन दे रहे हैं.

जी हां, अली फजल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे लेकर अली सुर्खियों में है. इस वीडियो में अली फजल पैपराजी को पोज को देते नजर आ रहे हैं और तभी कुछ ऐसा होता कि वह हैरान हो जाते हैं. दरअसल, अली फजल एक शोरूम से हाथ में कॉफी लेकर निकलते नजर आए और पैपराजी को देखकर उन्हें पोज देने लगे. इसी दौरान एक शख्स तेजी से आया और अली फजल के साथ सेल्फी लेने लगा और जिस कारण से उनके ऊपर कॉफी गिर गई. अली फजल का ये वीडियो वायरल होने के बाद उनके तमाम चाहने वाले भड़क रहे हैं. एक फैन न लिखा है, ‘गुड्डू पंडित से पंगा.’ एक फैन ने लिखा है, ‘गुड्डू भइया.’

 

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बता दें कि अली अली फजल के वीडियो पर तमाम यूजर्स कयासबाजी कर रहे हैं कि ये एड का हिस्सा है और जल्द ही इसका अगला पार्ट आएगा. अली फजल के करियर की बात करें तो बीते 15 साल से अधिक समय से एक्टिंग में एक्टिव हैं. अली फजल ने कई फिल्मों और वेब सीरीज में अपनी एक्टींग से ध्यान खींचा है. अली फजल को पॉपुलर वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ में अपने रोल गुड्डू पंडित से काफी चर्चित हुए हैं. अली फजल ने बॉलीवुड के अलावा हॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया है. अली फजल की अच्छी फैन फॉलोइंग है और फैंस उनके प्रोजेक्ट के बेसब्री से इंतजार करते हैं.

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