कोलकाता के जरमन कौन्सुलेट से दुर्गा और बेटे शलभ को वीजा भी मिल गया. वह जरमनी के हीडेलबर्ग यूनिवर्सिटी गई.
जरमनी पहुंच कर दुर्गा को बिलकुल अलग माहौल मिला. जरमनी के लगभग एक दर्जन से ज्यादा शीर्ष विश्वविद्यालयों हीडेलबर्ग, एलएम यूनिवर्सिटी म्यूनिक, वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी, टुएबिनजेन यूनिवर्सिटी आदि में संस्कृत की पढ़ाई होती है. उसे देख कर खुशी हुई कि जरमनी के अतिरिक्त अन्य यूरोपियन देश और अमेरिका के विद्यार्थी भी संस्कृत पढ़ते हैं. वे जानना चाहते हैं कि भारत के प्राचीन इतिहास व विचार किस तरह इन ग्रंथों में छिपे हैं. भारत में संस्कृत की डिगरी तो नौकरी के लिए बटोरी जाती है लेकिन जरमनी में लोग अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए संस्कृत पढ़ने आते हैं. इन विद्यार्थियों में हर उम्र के बच्चे, किशोर, युवा और प्रौढ़ होते हैं. दुर्गा ने देखा कि इन में कुछ नौकरीपेशा यहां तक कि डाक्टर भी हैं. दुर्गा को पता चला कि अमेरिका और ब्रिटेन में जरमन टीचर संस्कृत पढ़ाते हैं. हम अपनी प्राचीन संस्कृति और भाषा की समृद्ध विरासत को सहेजने में सफल नहीं रहे हैं. यहां का माहौल देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि जरमन लोग ही शायद भविष्य में संस्कृत के संरक्षक हों. वे दूसरी लेटिन व रोमन भाषाओं को भी संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.
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दुर्गा का बेटा शलभ भी अब बड़ा हो रहा था. वह जरमन के अतिरिक्त हिंदी, इंगलिश और संस्कृत भी सीख रहा था. दुर्गा ने कुछ प्राचीन पुस्तकों, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम, गीता और वेद के जरमन अनुवाद भी देखे और कुछ पढ़े भी. जरमन विद्वानों का कहना है कि भारत के वेदों में बहुतकुछ छिपा है जिन से वे काफी सीख सकते हैं. सामान्य बातें और सामान्य ज्ञान से ले कर विज्ञान के बारे में भी वेद से सीखा जा सकता है.
जरमनी आने पर भी दुर्गा हमेशा अपनी सहेली माधुरी के संपर्क में रही थी. उस ने माधुरी को कुछ पैसे भी लौटा दिए थे जिस के चलते माधुरी थोड़ा नाराज भी हुई थी. माधुरी से ही दुर्गा को मालूम हुआ कि उस की दीदी अमोलिका और पापा दीनानाथ अब नहीं रहे. अमोलिका का बेटा बंटी कुछ साल नानी के साथ रहा था, बाद में वह अपने पापा जतिन के पास चला गया. उस की नानी भी उसी के साथ रहती थी. बंटी 16 साल का हो चुका था और कालेज में पढ़ रहा था. इधर, दुर्गा का बेटा शलभ 15 साल का हो गया था. वह भी अगले साल कालेज में चला जाएगा. दुर्गा के निमंत्रण पर माधुरी जरमनी आई थी. वह करीब एक महीने यहां रही. दुर्गा ने उसे बर्लिन, बोन, म्युनिक, फ्रैंकफर्ट, कौंलोन आदि जगहें घुमाईं. माधुरी इंडिया लौट गई.
दुर्गा से यूनिवर्सिटी की ओर से वेद पढ़ाने को कहा गया. उस से वेद के कुछ अध्यायों व श्लोकों का समुचित विश्लेषण करने को कहा गया. दुर्गा ने वेदों का अध्ययन किया था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस के पढ़ाने के तरीके की विद्यार्थियों और शिक्षकों ने खूब प्रशंसा की. दुर्गा अब यूनिवर्सिटी में प्रतिष्ठित हो चुकी थी, बल्कि उसे अन्य पश्चिमी देशों में भी कभीकभी पढ़ाने जाना होता था.
5 वर्षों बाद शलभ फिजिक्स से ग्रेजुएशन कर चुका था. उसे न्यूक्लिअर फिजिक्स में आगे की पढ़ाई करनी थी. पीजी में ऐडमिशन से पहले उस ने मां से इंडिया जाने की पेशकश की तो दुर्गा ने उस की बात मान ली. दुर्गा ने उस के जन्म की सचाई अब उसे बता दी थी. सच जान कर उसे अपनी मां पर गर्व हुआ. अकेले ही काफी दुख झेल कर, अपने साहस के बलबूते पर मां खुद को और मुझे सम्मानजनक स्थिति में लाई थी. शलभ को अपनी मां पर गर्व हो रहा था. हालांकि वह किसी संबंधी के यहां नहीं जाना चाहता था लेकिन दुर्गा ने उसे अपने पिता जतिन और नानी से मिलने को कहा. माधुरी ने दुर्गा को जतिन का ठिकाना बता दिया था. जतिन आजकल नागपुर के पास वैस्टर्न कोलफील्ड में कार्यरत था.
इंडिया आ कर शलभ ने पहले देश के विभिन्न ऐतिहासिक व प्राचीन नगरों का भ्रमण किया. बाद में वह पिता से मिलने नागपुर गया. उस दिन रविवार था, जतिन और नानी दोनों घर पर ही थे. डोरबैल बजाने पर जतिन ने दरवाजा खोला. शलभ ने उस के पैर छुए. जतिन बोला, ‘‘मैं ने तुम को पहचाना नहीं.’’ शलभ बोला, ‘‘मैं एक जरमन नागरिक हूं. भारत घूमने आया हूं. मैं अंदर आ सकता हूं. मेरी मां ने मुझे आप से मिलने के लिए कहा है.’’
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शलभ का चेहरा एकदम अपनी मां से मिलता था. तब तक उस की नानी भी आई तो उस ने नानी के भी पैर छू कर प्रणाम किया. जतिन और नानी दोनों शलभ को बड़े गौर से देख रहे थे. शलभ ने देखा कि शोकेस पर उस की मौसी और मां दोनों की फोटो पर माला पड़ी हुई है. शलभ ने दोनों तसवीरों की ओर संकेत करते हुए पूछा, ‘‘ये महिलाएं कौन हैं?’’
जतिन ने बताया, ‘‘एक मेरी पत्नी अमोलिका, दूसरी उन की छोटी बहन दुर्गा है, अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं.’’
‘‘एस तुत मिर लाइट,’’ शलभ बोला. ‘‘मैं समझा नहीं,’’ जतिन ने कहा.
‘‘आई एम सौरी, यही पहले मैं ने जरमन भाषा में कहा था,’’ शलभ बोला. ‘‘अरे वाह, कितनी भाषाएं जानते हो,’’ जतिन ने हैरानी जताई.
‘‘सब मेरी मां की देन है,’’ शलभ ने कहा. फिर दुर्गा की फोटो को दिखाते हुए शलभ बोला, ‘‘तो ये आप की केलिकुंचिका हैं.’’
‘‘व्हाट?’’ ‘‘केलिकुंचिका यानी साली, सिस्टर इन लौ.’’
‘‘यह कौन सी भाषा है…जरमन?’’ ‘‘जी नहीं, संस्कृत.’’
‘‘तो तुम संस्कृत भी जानते हो?’’ ‘‘जी, आप की केलिकुंचिका संस्कृत की विदुषी हैं, उन्हीं ने मुझे संस्कृत भी सिखाई है.’’
‘‘वह तो बहुत पहले मर चुकी है.’’ ‘‘आप के लिए मृत होंगी.’’
‘‘व्हाट? हम लोगों ने उसे ढूढ़ने की बहुत कोशिश की थी, पर वह नहीं मिली. आखिर में हम ने उसे मृत मान लिया.’’ ‘‘अच्छा, तो अब चलता हूं, कल दिल्ली से मेरी फ्लाइट है.’’
शलभ ने उठ कर दोनों के पैर छुए और बाहर निकल गया. ‘‘अरे, जरा रुको तो सही, हमारी बात तो सुनते जाओ, शलभ…’’
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वे दोनों उसे पुकारते रहे, पर उस ने एक बार भी मुड़ कर उन की तरफ नहीं देखा.
अभी तक दुर्गा और जतिन दोनों अस्पताल से घर भी नहीं लौटे थे. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाले भीषण तूफान से कैसे निबटा जाए. कुछ पलों का आनंद इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगा, उन्होंने इस की कल्पना भी नहीं की थी. दोनों सोच रहे थे कि आज नहीं तो कल अमोलिका को यह बात तो पता चलेगी ही, तब उस के सामने कैसे मुंह दिखाएंगे.
घर पहुंच कर दुर्गा बंटी के लिए दूध बना कर ले गई. उस ने दूध की बोतल अमोलिका को दी. वह बहुत गंभीर थी. दुर्गा वापस जाने को मुड़ी ही थी कि अमोलिका ने उसे हाथ पकड़ कर रोक लिया. पहले तो वह सोच रही थी कि सारा गुस्सा अभी के अभी उतार दे, पर उस ने बात बदलते हुए पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारा एमए भी पूरा हो गया है. अगले महीने तुम्हारा कौन्वोकेशन भी है.’’ दुर्गा बोली, ‘‘हां.’’
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‘‘आगे के लिए क्या सोचा है? और तुम ने संस्कृत ही क्यों चुनी? इनफैक्ट संस्कृत की तो यहां कोई कद्र नहीं है.’’ ‘‘आजकल जरमनी में लोग संस्कृत में रुचि ले रहे हैं. बीए करने के बाद मैं एक साल स्कूल में पार्टटाइम संस्कृत टीचर थी. मैं ने जरमनी की एक यूनिवर्सिटी में संस्कृत ट्यूटर के लिए आवेदन दिया था. मैं ने जरमन भाषा का भी एक शौर्टटर्म कोर्स किया है. मुझे उम्मीद है कि जरमनी से जल्दी ही बुलावा आएगा.’’
‘‘कब तक जाने की संभावना है?’’ ‘‘कुछ पक्का नहीं कह सकती हूं, पर 6 महीने या सालभर लग सकता है. उन्होंने कहा है कि अभी तुरंत वैकेंसी नहीं है, होने पर सूचित करेंगे.’’
‘‘तब तक तुम्हारा ये बच्चा…’’ अमोलिका के मुंह से अचानक यह सुनना दुर्गा के लिए अनपेक्षित था. इस अप्रत्याशित प्रश्न के लिए वह तैयार नहीं थी. उसे चुप देख कर अमोलिका ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तुम्हें शर्म नहीं आई दीदी के यहां आ कर यह सब गुल खिलाने में. वैसे तो मैं समझ सकती हूं तेरे पेट में किस का अंश है, फिर भी मैं तेरे मुंह से सुनना चाहती हूं.’’
दुर्गा सिर नीचे किए रो रही थी, कुछ बोल नहीं पा रही थी. अमोलिका ने ही फिर कड़क कर कहा, ‘‘यह किस का काम है? बंटी के सिर पर हाथ रख कर कसम खा तू, किस का काम है यह?’’ दुर्गा फिर चुप रही. तब अमोलिका ने ही कहा, ‘‘जतिन का ही दुष्कर्म है न यह? सच बता तुझे बंटी की कसम.’’
‘‘तुम्हारी खामोशी को मैं तुम्हारी स्वीकृति समझ रही हूं. बाकी मैं जतिन से समझ लूंगी.’’ दुर्गा वहां से चली गई. अमोलिका ने अपनी मां को फोन कर कहा, ‘‘मां, मैं कुछ दिनों के लिए वहां आ कर तुम लोगों के साथ रहना चाहती हूं.’’
मां ने कहा, ‘‘बेटा, यह तेरा घर है. जब चाहे आओ और जितने दिन चाहो आराम से रहो.’’ उस रात अमोलिका और जतिन में काफी कहासुनी हुई. उस ने जतिन से कहा, ‘‘तुम्हारे दुष्कर्म के बाद मुझे तुम से घिन हो रही है. मुझे नहीं लगता, मैं यहां और रह पाऊंगी.’’
जतिन के माफी मांगने और मना करने के बावजूद दूसरे दिन अमोलिका दुर्गा के साथ पीहर आ गई. उस ने मेघाताबुरू की कहानी मां को बताई. उस की मां भी बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने दुर्गा से कहा, ‘‘अरे, तू अपनी सगी बहन के घर में आग लगा बैठी.’’ दुर्गा के पास कोई जवाब न था. वह चुप रही. मां ने कहा, ‘‘मैं तेरी जैसी कुलटा को अपने घर में नहीं रख सकती. तू निकल जा मेरे घर से. हम लोग तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहते.’’
उस रात दुर्गा को नींद नहीं आ रही थी. वह रात में एक बैग ले कर दरवाजा खोल कर घर से निकलना ही चाहती थी कि अमोलिका जग उठी. उस ने कहा, ‘‘कहां जा रही हो?’’ दुर्गा बोली, ‘‘कुछ सोचा नहीं है, या तो आत्महत्या करूंगी या फिर सब से दूर कहीं चली जाऊंगी.’’
‘‘एक पाप तो तूने पहले ही किया, दूसरा पाप आत्महत्या करने का होगा.’’ ‘‘तो मैं क्या करूं?’’
‘‘तू एबौर्शन करा ले, उस के बाद आगे की जिंदगी का रास्ता साफ हो जाएगा.’’
‘‘एबौर्शन कराना भी तो एक पाप ही होगा.’’ ‘‘तू अभी चुपचाप घर में बैठ. कुछ दिनों में हम सब लोग मिलजुल कर बात कर कोई समाधान ढूंढ़ लेंगे.’’
दुर्गा ने महसूस किया कि उस के मातापिता दोनों ने ही उस से बोलचाल बंद कर दी है. वह तो अमोलिका की गुनाहगार थी, फिर भी दीदी कभीकभी उस से बात कर लेती थीं. उस को अंदर से ग्लानि थी कि उस की एक छोटी सी भूल की सजा दीदी और बंटी को भी मिल रही है. 2 दिनों बाद ही दुर्गा अचानक घर छोड़ कर कहीं चली गई. उस ने अपना कोई अतापता किसी को नहीं बताया. दुर्गा अपने साथ पढ़ी एक सहेली माधुरी के यहां कोलकाता आ गई. दोनों ने 12वीं तक साथ पढ़ाई की थी. उस ने उसे अपनी कहानी बताई और कहा, ‘‘प्लीज, मेरा पता किसी को मत बताना. मुझे कुछ दिनों के लिए पनाह दे, फिर मैं कहीं दूरदराज चली जाऊंगी.’’
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माधुरी अविवाहित थी और नौकरी करती थी. वह बोली, ‘‘तू कहीं नहीं जाएगी. तू जब तक चाहे यहां रह सकती है. तू तो जानती ही है कि इस दुनिया में मेरा अपना निकटसंबंधी कोई नहीं है. तू यहीं रह, तू मां बनेगी और मैं मौसी.’’
वहीं दुर्गा ने एक बालक को जन्म दिया. उस ने वहीं रह कर इग्नू से 2 साल का मास्टर इन वैदिक स्टडीज का कोर्स किया. इसी बीच, उस ने झारखंड में धनबाद के निकट काको मठ और महाराष्ट्र में नासिक के निकट वेद पाठशालाओं में वहां के संतों व गुरुजनों से भी वेद पर विशेष चर्चा कर वेद के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाया. माधुरी ने उस से कहा, ‘‘तुम वेदों को इतना महत्त्व क्यों दे रही हो? मैं ने तो सुना है कि वेद स्त्रियों के लिए
नहीं हैं.’’ दुर्गा बोली, ‘‘तू उस की छोड़, क्लासिकल भाषाओं के अच्छे जानकारों की जरूरत हमेशा रहेगी. हर युग
में उन्हें नए ढंग से पढ़ा और समझा जाता है.’’ जब तक दुर्गा माधुरी के साथ रही, उस ने दुर्गा की आर्थिक सहायता भी की. कुछ पैसे दुर्गा ट्यूशन पढ़ा कर भी कमा लेती थी. इस बीच, दुर्गा का बेटा शलभ 2 साल का हो चुका था. तभी जरमनी से संस्कृत टीचर के लिए उस का बुलावा आ गया.
दीनानाथजी बालकनी में बैठे चाय पी रहे थे. वे 5वीं मंजिल के अपने अपार्टमैंट में रोज शाम को इसी समय चाय पीते और नीचे बच्चों को खेलते देखा करते थे. उन की पत्नी भी अकसर उन के साथ बैठ कर चाय पिया करती थीं. पर अभी वे किचन में महरी से कुछ काम करा रही थीं. तभी बगल में स्टूल पर रखा उन का मोबाइल फोन बजा. उन्होंने देखा कि उन की बड़ी बेटी अमोलिका का फोन था. दीनानाथ बोले, ‘‘हां बेटा, बोलो, क्या हाल है?’’
अमोलिका बोली, ‘‘ठीक हूं पापा. आप कैसे हैं? मम्मी से बात करनी है.’’ ‘‘मैं ठीक हूं बेटा. एक मिनट होल्ड करना, मम्मी को बुलाता हूं,’’ कह कर उन्होंने पत्नी को बुलाया.
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उन की पत्नी बोलीं, ‘‘अमोल बेटा, कैसी तबीयत है तेरी? अभी तो डिलीवरी में एक महीना बाकी है न?’’ ‘‘वह तो है, पर डाक्टर ने कहा है कि कुछ कौंप्लिकेशन है, बैडरैस्ट करना है. तुम तो जानती हो जतिन ने लवमैरिज की है मुझ से अपने मातापिता की मरजी के खिलाफ. ससुराल से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलने वाली है. तुम 2-3 महीने के लिए यहां आ जातीं, तो बड़ा सहारा मिलता.’’
‘‘मैं समझ सकती हूं बेटा, पर तेरे पापा दिल के मरीज हैं. एक हार्टअटैक झेल चुके हैं. ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा.’’ ‘‘तो तुम दुर्गा को भेज सकती हो न? उस के फाइनल एग्जाम्स भी हो चुके हैं.’’
‘‘ठीक है. मैं उस से पूछ कर तुम्हें फोन करती हूं. अभी वह घर पर नहीं है.’’
दुर्गा अमोलिका की छोटी बहन थी. वह संस्कृत में एमए कर रही थी. अमोलिका की शादी एक माइनिंग इंजीनियर जतिन से हुई थी. उस की पोस्ंिटग झारखंड और ओडिशा के बौर्डर पर मेघाताबुरू में एक लोहे की खदान में थी. वह खदान जंगल और पहाड़ों के बीच में थी, हालांकि वहां सारी सुविधाएं थीं. बड़ा सा बंगला, नौकरचाकर, जीप आदि. कंपनी का एक अस्पताल भी था जहां सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध थीं. फिर भी अमोलिका को बैडरैस्ट के चलते कोई अपना, जो चौबीसों घंटे उस के साथ रहे, चाहिए था. अमोलिका के मातापिता ने छोटी बेटी दुर्गा से इस बारे में बात की. दुर्गा बोली कि ऐसे में दीदी का अकेले रहना ठीक नहीं है. वह अमोलिका के यहां जाने को तैयार हो गई. उस के जीजा जतिन खुद आ कर उसे मेघाताबुरू ले गए.
दुर्गा के वहां पहुंचने के 2 हफ्ते बाद ही अमोलिका को पेट दर्द हुआ. उसे अस्पताल ले जाया गया. डाक्टर ने उसे भरती होने की सलाह दी और कहा कि किसी भी समय डिलीवरी हो सकती है. अमोलिका ने भरती होने के तीसरे दिन एक बेटे को जन्म दिया. पर बेटे को जौंडिस हो गया था, डाक्टर ने बच्चे को एक सप्ताह तक अस्पताल में रखने की सलाह दी. जतिन और दुर्गा प्रतिदिन विजिटिंग आवर्स में अस्पताल आते और खानेपीने का सामान दे जाते थे. एक दिन जतिन ने जीप को कुछ जरूरी सामान, दवा आदि लेने के लिए शहर भेज दिया था. दुर्गा मोटरसाइकिल पर ही उस के साथ अस्पताल आई थी. उस दिन मौसम खराब था. अस्पताल से लौटते समय बारिश होने लगी. दोनों बुरी तरह भीग गए थे. दुर्गा मोटरसाइकिल से उतर कर गेट का ताला खोल रही थी. उस के गीले कपड़े उस के बदन से चिपके हुए थे जिस के चलते उस के अंगों की रेखाएं स्पष्ट झलक रही थीं. जतिन के मन में तरंगें उठने लगी थीं.
ताला खुलने पर दोनों अंदर गए. बिजली गुल थी. दुर्गा सीधे बाथरूम में गीले कपड़े बदलने चली गई. इस बात से अनजान जतिन तौलिया लेने के लिए बाथरूम में गया. वह रैक पर से तौलिया उठाना चाहता था. दुर्गा साड़ी खोल कर पेटीकोट व ब्लाउज में थी. उस ने नहाने की सोच कर हैंडशावर हाथ में ले रखा था. उस ने दरवाजा थोड़ा खुला छोड़ दिया था ताकि कुछ रोशनी अंदर आ सके. अचानक किसी की उपस्थिति महसूस होने पर उस ने पूछा, ‘‘अरे आप, जीजू, अभी क्यों आए? निकलिए, मैं बंद कर लेती हूं.’’ इतना कह कर उस ने खेलखेल में हैंडशावर से जतिन को गीला कर दिया. जतिन बोलता रहा, ‘‘यह क्या कर रही हो? मुझे पता नहीं था कि तुम अंदर हो़’’
‘‘मुझे भी पता नहीं, अंधेरे में पानी किधर जा रहा है,’’ और वह हंसने लगी. ‘‘रुको, मैं बताता हूं पानी किधर छोड़ा है तुम ने. यह रहा मैं और यह रही तुम,’’ इतना बोल कर जतिन ने उसे बांहों में भर लिया. दुर्गा को भी लगा कि उस का गीला बदन तप रहा है.
‘‘क्या कर रहे हैं आप? छोडि़ए मुझे.’’ ‘‘अभी कहां कुछ किया है मैं ने?’’
दुर्गा को अपने भुजबंधन में लिए हुए ही एक चुंबन उस के होंठों पर जड़ दिया जतिन ने. इस के बाद तपिश खत्म होने पर ही अलग हुए वे दोनों. दुर्गा बोली, ‘‘जो भी हुआ, वह हरगिज नहीं होना चाहिए था. क्षणिक आवेश में आ कर हम दोनों ने अपनी सीमाएं तोड़ डालीं. जरा सोचिए, दीदी को जब कभी यह बात मालूम होगी तो उस पर क्या गुजरेगी.’’
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जतिन बोला, ‘‘अब जाने दो, जो हुआ सो हुआ. उसे बदला तो नहीं जा सकता. ठीक तो मैं भी नहीं समझता हूं, पर बेहतर होगा अमोलिका को इस बारे में कुछ भी पता न चले.’’
इस घटना के एक सप्ताह बाद अमोलिका भी अस्पताल से घर आई. उस का बेटा बंटी ठीक हो गया था. घर में सभी खुश थे. दुर्गा भी मौसी बन कर प्रसन्न थी. वह अपनी दीदी और भतीजे की देखभाल अच्छी तरह कर रही थी. जतिन ने शानदार पार्टी दी थी. अमोलिका के मातापिता भी आए थे. एक सप्ताह रह कर वे लौट गए. लगभग 2 महीने तक सबकुछ सामान्य रहा. दुर्गा की तबीयत ठीक नहीं रह रही थी. अमोलिका ने जतिन से कहा, ‘‘इसे थोड़ा डाक्टर को दिखा लाओ.’’
दुर्गा को अपने अंदर कुछ बदलाव महसूस होने लगा था. पीरियड मिस होने से वह अंदर से डरी हुई थी. जतिन दुर्गा को ले कर अस्पताल गया. वहां लेडी डाक्टर ने चैक कर कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, सबकुछ नौर्मल है. दुर्गा मां बनने वाली है. जतिन और दुर्गा एकदूसरे को आश्चर्य से देख रहे थे. पर डाक्टर के सामने बनावटी मुसकराहट दिखाते रहे ताकि डाक्टर को सबकुछ नौर्मल लगे.
छोटे से माइनिंग वाले शहर में सभी अफसर एकदूसरे को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. थोड़ी ही देर में डाक्टर ने अमोलिका को फोन कर कहा, ‘‘मुबारक हो, शाम को मैं आ रही हूं, मिठाई खिलाना.’’ ‘‘श्योर, दरअसल हम लोगों ने जिस दिन पार्टी दी थी आप छुट्टी ले कर बाहर गई थीं.’’
‘‘वह तो ठीक है, मैं तुम्हारी मौसी बनने की खुशी में मिठाई मांग रही हूं. ठीक है, शाम को डबल मिठाई खा लूंगी.’’ डाक्टर से बात करने के बाद अमोलिका के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस के मन में संदेह हुआ क्योंकि दुर्गा और जतिन के अलावा घर में तीसरा और कोई नहीं था, कहीं यह बच्चा जतिन का न हो. उसे अपनी बहन पर क्रोध आ रहा था. साथ ही, उसे नफरत भी हो रही थी.
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छत्तीसगढ़ में आजकल आईएएस और आईपीएस अफसरों की फर्जी “फेसबुक” आईडी बनाकर ठगी की जा रही है और इस जाल में आसपास के परिचित फंसकर लूट जा रहे हैं. ठग कितने शातिर होते हैं और दूर की सोचते हैं यह आज आपको यह रिपोर्ट पढ़कर जानकारी मिलेगी की जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक जैसे वरिष्ठ एवं प्रशासनिक पदों पर बैठे अधिकारियों के नाम पर किस तरह फर्जी फेसबुक आईडी बन जाती है और उनके चिर परिचित समर्थकों को ठग किस तरह ठग रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस जाल में फंसने वाले लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा. वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी ठगों को पकड़वा पाने में अभी तक असफल ही सिद्ध हुए हैं. छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर कोरबा, रायगढ़ व अन्य नगरों के शीर्ष अधिकारी यह बात जगजाहिर कर चुके हैं कि उनके फोटो व आईडी का फर्जी इस्तेमाल किया जा रहा है सावधान..!
रायगढ़ जिलाधीश भीम सिंह ने हाल ही में स्वयं फेसबुक में अपने चिर परिचित सभी को आगाह किया कि उनके नाम से एक फर्जी आईडी अस्तित्व में है! और लोगों को फोन करके 20 20 हजार रुपए मांगे गए हैं उन्होंने लिखा कि सभी सावधान रहें और ठगों के जाल में न फंसे.
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मामले में रायगढ़ के नायब तहसीलदार ने कोतवाली पुलिस से लिखित शिकायत की है. पुलिस ने “अज्ञात ठग” के खिलाफ 419 व आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. कलेक्टर भीम सिंह ने भी फेसबुक में पोस्ट कर फर्जी आईडी से पैसे मांगने की जानकारी देते हुए सावधान रहने को कहा मगर जानकार बताते हैं कि कब ऊपर हाथ डालना अथवा उन्हें पकड़ पाना पुलिस के लिए बेहद टेढ़ी खीर है.
इस संदर्भ में पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह का कहना है कि इसमें यूपी, बिहार गैंग के सक्रिय होने की आशंका है. सारा माजरा अंतर प्रांतीय ठगों का है.
पुलिस अधीक्षक बन गया शिकार!
कोरबा जिला में पदस्थ पुलिस अधीक्षक आईपीएस अभिषेक मीणा की फेसबुक आईडी से हूबहू फर्जी आईडी बनाकर उनकी फ्रेंड लिस्ट में जुड़े लोगों से जरूरत बताकर रुपए की मांग की जाने लगी. ठगों की हिमाकत देखिए!इसके लिए 10-20 हजार रुपए एकाउंट में ट्रांजेक्शन करवाया जा रहा था. फ्रेंड लिस्ट में शामिल लोगों को जब पुलिस अधीक्षक मीणा द्वारा इस तरह फेसबुक के जरिए पैसे मांगने का पोस्ट देखकर कई लोगों ने इसकी सत्यता जानने के लिए संपर्क किया. तब मीणा को इसकी जानकारी हुई और उन्होंने फेसबुक पर फर्जी आईडी की स्क्रीन शॉट के साथ इस संबंध में अपनी ओर से सार्वजनिक सूचना दी.उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा -” किसी ने प्रोफाइल पिक लगातार मेरे नाम पर फेक आईडी बनाई है धोखाधड़ी से सावधान रहना हम कार्रवाई करेंगे.”
दरअसल, छत्तीसगढ़ में ठगों की हिमाकत इस हद तक पहुंच गई है कि गणमान्य लोगों को छोड़कर सीधे आईएएस-आईपीएस की फर्जी आईडी से धोखाधड़ी की जा रही है. फेसबुक की प्रोफाइल से पिक्चर व नाम का इस्तेमाल करके फर्जी आईडी बनाने और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले सामने आ रहे हैं. शुरुआत में ठगों ने आमजन व व्यापारी वर्ग के फर्जी आईडी बनाकर धोखाधड़ी करते थे लेकिन अब आईएएस-आईपीएस की फर्जी आईडी बना रहे हैं.प्रदेश में इससे पहले कई आईएएस-आईपीएस के फेसबुक पर फर्जी आईडी बनने का मामला सामने आ चुका है. कोरबा जिले में इससे पहले पाली जनपद सीईओ की फेसबुक पर फर्जी आईडी बनाने का मामला भी सामने आ चुका है.
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हमारे संवाददाता ने जब अभिषेक मीणा से बात की तो उन्होंने कहा जांच कर आरोपियों को पकड़ा जाएगा पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा ने बताया उन्हें काफी लोगों ने मैसेज करके बताया कि आपके नाम से फेसबुक आईडी पर पैसा मांगा जा रहा है, सच है या फेक यह पूछा. तब मुझे इसका पता चला. उन्होंने कहा इसकी जांच की जाएगी. आरोपियों को पकड़ा जाएगा. इस तरह के ऑनलाइन ठगी से बचने के लिए लोगों को सतर्क रहना होगा.
कमिश्नर भी बने, ठगों के शिकार!
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के संभाग आयुक्त डॉ संजय अलंग विगत समय जब जिलाधीश बिलासपुर हुआ करते थे उनके नाम पर भी ठगों ने एक फर्जी आईडी बना ली थी. जानकार सूत्रों के अनुसार कलेक्टर रहे डॉ. संजय अलंग का फर्जी फेसबुक अकाउंट फेसबुक अकाउंट बनाकर लोगों से हजारों रूपए उगाही करने का मामला सामने आया. जालसाज ने कलेक्टर के नाम का फर्जी फेसबुक अकाउंट बना बिलासपुर के दो युवकों को पहले तो अपना दोस्त बना लिया.
फिर उनसे रकम वसूल करने का प्रयास करने लगे. अज्ञात आरोपी ने अपना बैंक अकाउंट नंबर भी लोगों को दिया .शिकायत पहुंचने पर संजय अलग ने साइबर सेल के माध्यम से आईडी ब्लॉक करने व जांच प्रारंभ करवाई. मगर बताया जा रहा है कि अभी तक ठग पुलिस के कानून के जद से बाहर है.
इस संदर्भ में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि दरअसल ठगों का मनोविज्ञान यह है कि बड़े नेता और आईएएस आईपीएस अधिकारियों के नाम पर फर्जी फेसबुक आईडी बनाकर इसलिए ठगी की जाती है की बहुत सारे लोग इन नामों और पदों को देखकर पैसे दे देते हैं. जबकि होना यह चाहिए कि उन्हें यह समझ होनी चाहिए इतने बड़े अधिकारी भला दस बीस हजार, रूपए किसी से क्यों मांगेंगे? लोग बड़े अधिकारियों से संपर्क बनाने मित्रता साधने के नाम पर फेसबुक की मित्रता आसानी से स्वीकार कर लेते हैं फर्जी आईडी बनाने वाले लोगों से रकम की भी मांग कर ठगी का जाल फैलाया गया. है शहर के दो युवकों से आरोपी ठग ने यह कहते हुए 20-20 हजार रुपए की मांग की है कि उन्हें यह पैसा दूसरे दिन वापस कर दिया जाएगा. मगर उनकी सतर्कता काम आई और वे बच गए आपसे भी यही आग्रह है कि किसी भी तरह के पैसे की मांग पर आप 10 बार सोचे.
रूपए पैसे ऐसी आकर्षक चीज है जिस के खातिर इंसान की नियत डोल जाती है. जाने कितने किस्से और हकीकत हमारी आंखों के आगे गुजरते जाते हैं. मगर हम उन्हें उन्हें भूल बिसार कर अपने दैनंदिन कार्यों में लग जाते हैं… अक्सर धोखा खा जाते हैं.क्योंकि रूपए की सार संभाल के संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि इस मामले में कभी भी किसी दूसरे पर पूरी तरह विश्वास नहीं किया जा सकता. थोड़ी भी चूक हुई या फिर नियत बद हुई की रूपया गायब!
आइए.. आज आपको ऐसे ही कुछ घटनाओं से रूबरू कराएं. जिन्हें पढ़ समझ कर आप शायद जीवन में आगे कभी धोखा ना खाएं.
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पहली घटना-
राजधानी रायपुर में एक बड़े शोरूम के विश्वस्त कर्मचारी सदैव बैंक जाकर पैसे जमा करता था. एक दिन मिलीभगत कर लूट की घटना अंजाम दी गई और पुलिस विवेचना में अंतत: शख्स को जेल जाना पड़ा.
दूसरी घटना-
न्यायधानी बिलासपुर में एक वकील का कंप्यूटर ऑपरेटर जो कि पैसों की भी देख रेख, लेनदेन किया करता था. एक दिन लूट की बात कह कर लाखों रुपए के लूट जाने की कहानी गढ़ी और अंततः जेल गया.
तीसरी घटना-
कोरबा जिला के कटघोरा में जनपद पंचायत के एक बाबू ने अधिकारी का लाखों रुपया ठगने के बहाने लूट की घटना की रिपोर्ट लिखाई. विवेचना के पश्चात अंततः वही दोषी सिद्ध हुआ और जेल गया.
15 घंटे में हो गया खुलासा
छत्तीसगढ़ के कोरबा में प्राइवेट कोल कंपनी में हुई लूट को पुलिस ने 15 घंटे में खुलासा कर पुलिस ने बताया यह एक मनगढ़ंत घटना थी. 4 अक्टूबर को देर रात पुलिस ने कंपनी के ही असिस्टेंट कैशियर को गिरफ्तार कर उसके घर से 10.5 लाख रुपए बरामद कर लिए. पुलिस इस मामले में अन्य दो आरोपियों की तलाश कर रही है. वस्तुत: असिस्टेंट कैशियर ने ही लूट की झूठी साजिश रची थी.
सैनिक कोल कंपनी द्वारा कर्मचारियों को वेतन बांटने के लिए सदेव के भांति रुपए रखे थे जिस पर नियत खराब हो गई थी.
दरअसल, कोरबा के दीपका के एसईसीएल गेवरा परियोजना क्षेत्र स्थित सैनिक माइनिंग कोल ट्रांसपोर्ट कंपनी के दफ्तर में कर्मचारियों को वेतन बांटने के लिए रुपए रखे थे. 3 अक्टूबर 2020 शनिवार रात नकाबपोश बदमाश ऑफिस में चोरी करने घुसे. गार्ड ने देख लिया तो उसे और ड्राइवर को मारपीट कर बंधक बनाया.इसके बाद कथित रूप से 31 लाख रुपए की लूटकर फरार हो गए.
पुलिस को पहले से ही कर्मचारियों पर संदेह हो गया था.
ऐसे में रुपयों की जानकारी रखने वाले कर्मचारियों से पूछताछ शुरू की गई. इसमें असिस्टेंट कैशियर जे एल प्रसाद भी शामिल था. संदेह होने पर पुलिस ने सख्ती से उससे पूछताछ की तो वैश्य समाज उसने मनगढ़ंत लूट की सच्चाई कबूल कर ली.आरोपी कैशियर ने बताया कि उसने पहले ही 10.5 लाख रुपए गायब कर लिए थे.

परिचितों से लूट कराने के लिए उन्हें रकम 31 लाख बताई थी.
पूछताछ में आरोपी असिस्टेंट कैशियर ने बताया कि उसने अपने परिचितों को लूट की साजिश में शामिल किया. इसके लिए कंपनी में रखी रकम 31 लाख रुपए ही बताई. आरोपी जेएल प्रसाद कंपनी में बीस सालों से काम कर रहा था.
कुछ सच भी, कुछ मिथ्या भी!
लूट की ऐसी मनगढ़ंत घटनाओं में यह भी देखा गया है कि लोग बीस पच्चीस वर्षों से सेवा अनवरत रूप से देते आ रहे थे. मगर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि उन्होंने अमानत में खयानत कर डाली और अपने वर्षों की साख की पूंजी को दांव पर लगा दिया. वहीं यह भी देखा गया है कि अक्सर कुछ परिस्थितियां ऐसी बन जाती है जिनमें कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार कर्मचारियों को झूठे मामलों में फंसाया भी जाता है. मगर अंततः कोर्ट कचहरी और पुलिस विवेचना में सच्चाई सामने आ जाती है.
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उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.के. शुक्ला बताते हैं कि ऐसे मामलों में अक्सर आरोपी पुलिस विवेचना के समय ही पकड़ लिया जाता है. क्योंकि वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं होता, पैसों की लालच में अथवा आवश्यकता के कारण वह यह भूल करता है.और अपनी साख तो गंवाता ही है जेल जाकर अपना जीवन भी बर्बाद कर लेता है.
पुलिस अधिकारी शशि भूषण सिंह ने बताया कि दरअसल, ऐसे मामलों में देखा गया है कि कर्मचारी के सामने जब रूपए पैसे की किल्लत आती है तो वह जहां काम करता है उस संस्थान के रूपयों पर उसकी नियत खराब हो जाती है.
सब से बड़ी चूक शिवनारायण शर्मा जैसे पकी उम्र के सयाने लोग यह करते हैं कि कौशल प्रसाद शर्मा जैसे बिचौलियों पर आंख बंद कर भरोसा कर लेते हैं, क्योंकि वह हर इलाके के 1-2 नामी लोगों को जानता-पहचानता है और ऐसे बात करता है मानो हजारों शादियां करा चुका हो.
दूसरी गलती लड़की वालों के बारे में पूरी और पुख्ता जानकारियां हासिल न करने की मानी जाएगी. चूंकि मकान है,
इसलिए वे लोग भी हमारे जैसे होंगे जैसी सोच की कीमत उस वक्त चुकानी पड़ती है, जब लड़की वाले अच्छाखासा मालमत्ता समेट कर रफूचक्कर हो चुके होते हैं.
यह बात सच है कि लड़की वालों से बतौर सुबूत उन के मकान की रजिस्ट्री तो नहीं मांगी जा सकती, लेकिन कभी चुपचाप आ कर पड़ोस में पूछताछ की होती तो यह तो पता चल ही जाता कि ये लोग नएनए आए हैं और जिस मकान को अपना बता रहे हैं, वह किराए का है तो शक बढ़ता है.
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एक और गलती लाखों रुपए के लेनदेन की ऐसे मामलों में अकसर होती है. लड़की वालों की लच्छेदार बातों में फंस कर लड़के वाले गहने और पैसे लड़की वालों को दे देते हैं, जो उन का असल मकसद भी होता है. इस के पूरे होने के बाद वे मिलेेंगे तो यह सोचना ही बेमानी है.
ये भी कम नहीं
हर समाज और जाति की एक बड़ी परेशानी इन दिनों मनपसंद लड़की का न मिल पाना है, क्योंकि रिश्तेदारियों में अब दूरियां बढ़ रही हैं और बिचौलियों ने शादीब्याह तय कराने को एक बड़ा धंधा बना लिया है, जो हर्ज की एकलौती बात इस लिहाज से है कि धंधे में कोई किसी की गारंटी नहीं लेता. हर किसी को अपने हिस्से की रकम और कमीशन से मतलब रहता है.
कौशल प्रसाद शर्मा जैसे लोग तो अकेले ही इस धंधे को करते हैं, इसलिए 2-4 को ठग पाते हैं, लेकिन इन दिनों शादी कराने वालों की बाढ़ सी आई हुई है. जब से मोबाइल फोन लोगों के हाथ में आया है, तब से ठगी का यह धंधा औनलाइन भी फलनेफूलने लगा है. शादी कराने वाली कई एजेंसियां, मैरिज ब्यूरो और मैट्रीमोनियल साइटें अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं, जबकि खुद इन के भरोसेमंद होने की कोई गारंटी नहीं होती.
13 नवंबर, 2019 को ही मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में साइबर पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था, जो कई राज्यों में कुंआरे नौजवानों को मनपसंद शादी का लालच दे कर उन्हें चूना लगा रहा था.
जबलपुर के ही संजय सिंह नाम के नौजवान की रिपोर्ट पर जब पुलिस ने इस गिरोह के सरगना बिहार के मनोहरलाल यादव को गिरफ्तार किया तो कई चाैंका देने वाली बातें सामने आईं.
मनोहरलाल यादव ने अपनी एक चेली के साथ मिल कर कई मैट्रीमोनियल वैबसाइट बना रखी थीं, जिन के नाम बड़े ही लुभावने होते थे. मसलन, जीवन जोड़ी, मैट्रीमोनी आल, बैस्ट मैट्रीमोनियल वगैरह. ये दोनों पहले कुंआरे लड़कों से बातचीत करते थे, फिर अच्छी लड़की दिलाने के नाम पर 5,000 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस जमा कराते थे.
असली खेल इस के बाद शुरू होता था, जब कुंआरों को कई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें और बायोडाटा दिखा कर उन्हें फांसा जाता था. इस गिरोह में कुछ लड़कियां भी शामिल थीं. फोटो पसंद आ जाने के बाद लड़कियों के फोन नंबर लड़कों को दे दिए जाते थे और वे इन लड़कियों से सीधे बात करने लगते थे.
बातचीत में ये लड़कियां अपने घरपरिवार की माली हालत और गरीबी का रोना रोती थीं. कई लड़के झांसे में आ कर उन के बताए गए बैंक खाते में पैसा जमा करा देते थे, जिस से लड़की शादी करने के लिए तैयार हो जाए.
ऐसा ही संजय के साथ हुआ था. गिरोह की एक लड़की ने कोई 7 लाख रुपए उस से ऐंठ लिए और फिर जब उस का फोन बंद आने लगा तो संजय का माथा ठनका और उस ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी.
चूंकि ऐसी कई शिकायतें लगातार मिल रही थीं, इसलिए पुलिस ने फुरती से कार्यवाही की और मनोहरलाल यादव को धर दबोचा, तो उस ने जुर्म कबूल कर लिया. कई नौजवान तो ऐसे भी थे, जिन्होंने ठगे जाने के बाद भी मारे शर्म और जगहंसाई के डर से रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई थी.
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इन से ऐसे बचें
क्या लुटेरी दुलहनों से बचा जा सकता है? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ना जरूरी है कि पहले ऐसी कुछ वारदात पर एक नजर डाली जाए, जिस से सम झ आए कि कैसेकैसे लोग इन के चंगुल में फंस कर पैसा और इज्जत गंवा बैठते हैं.
केस नंबर 1 : 18 दिसंबर, 2019 को हरिद्वार के रुड़की में हरियाणा के पानीपत के एक विधुर ने अपनी मौसी की बताई जरूरतमंद लड़की से शादी की थी. मंदिर में शादी के बाद पतिपत्नी हरिद्वार के एक होटल में ठहरे.
रात के तकरीबन 2 बजे पति के सो जाने के बाद दुलहन 5 लाख रुपए के गहने और 50 हजार रुपए नकद ले कर फरार हो गई.
सुबह उठने के बाद दूल्हे को इस बात का पता चला तो उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई.
केस नंबर 2 : एक लुटेरी दुलहन 23 दिसंबर, 2019 को उत्तर प्रदेश के बरेली से गिरफ्तार की गई. इस मामले में 30 साला दुलहन ममता उर्फ अंजलि उर्फ सीमा की शादी त्रिलोक सिंह यादव से हरियाणा के फरीदाबाद के गांव हथेली में 13 नवंबर, 2019 को हुई थी.
शादी के कुछ दिन बाद ही यह ठगिनी ससुराल वालों को नशीली चीज खिला कर लाखों के जेवरात और नकदी ले कर फरार हो गई थी.
पकड़े जाने के बाद सीमा ने बताया कि वह बिहार के खगडि़या की रहने वाली है और इसी तरह पहले भी शादियां कर लोगों को लूट चुकी है.
इस काम को एक पूरा गिरोह अंजाम देता था. सीमा के बयान की बिना पर उस औरत को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जो हर शादी में उस की भाभी का रोल अदा करती थी.
केस नंबर 3 : एक और मामला उत्तर प्रदेश के बदायूं का है. प्रवीण नाम के नौजवान की शादी आजमगढ़ की रहने वाली एक लड़की से हुई थी. दुलहन ससुराल आई और पहली ही रात सब को खाना खिलाया.
इस खाने में उस ने नशीली चीज मिला दी थी, जिस से घर के सारे लोग बेहोश हो गए और रात को वह नकदी और जेवर ले कर चंपत हो गई.
केस नंबर 4 : 10 अक्तूबर, 2019 को इंदौर पुलिस ने एक ऐसे गिरोह का परदाफाश किया था, जिस के निशाने पर जैन समाज के नौजवान रहते थे.
इस गिरोह में 4 मर्द और 2 लड़कियां थीं. इन्होंने तकरीबन 2 दर्जन शादियां की थीं और हर बार ससुराल से नकदी व जेवरात ले कर फरार हो गए थे. बाद में यह पैसा गिरोह के सदस्य बांट लेते थे.
गिरोह का मुखिया अनिल वाटकीय नाम का शख्स था, जो जैन लड़कों को फंसाता था.
गौरतलब है कि जैन समाज में शादी लायक लड़कों को लड़कियां नहीं मिल रही हैं, इसलिए इस गिरोह ने 2 लड़कियों रितु राठौर और सपना को ट्रेनिंग दी थी. शादी के बाद तयशुदा प्लान के मुताबिक ये दोनों मौका मिलते ही ससुराल से माल ले कर फरार हो जाती थीं.