हकीकत- भाग 3: क्या रश्मि की मां ने शादी की मंजूरी दी?

राइटर- सोनाली करमरकर

“ठीक है, मैं आज ही तुम्हारे पापा से बात करूंगी,” मम्मी ने उसे दिलासा दिया.

अगला दिना हमेशा से ज्यादा खूबसूरत था. पापा ने रश्मि से गोविंद के बारे में बात की, उस की सारी जानकारी ली. मम्मी ने भी प्यार से नाश्ता कराया. रश्मि मानो बादलों पर सवार हो कर औफिस पहुंची. तभी उसे गोविंद का एसएमएस मिला कि वह 2-3 दिन बाद आएगा.

इस तरह 5 दिन गुजर गए. रश्मि के मन में अब बुरे खयाल आने लगे. जब रश्मि गोविंद को फोन करती, तो वह बड़े रूखेपन से पेश आता और कहता कि अभी वह बिजी है.

उस दिन जब रश्मि औफिस पहुंची तो उसे गोविंद अपने के‍बिन में नजर आया. मारे खुशी के वह उस की तरफ गई, पर बिजी होने का बहाना बना कर गोविंद फोन उठा कर किसी और से बात करने लगा. जैसे रश्मि के लिए यह वहां से जाने का इशारा हो.

किसी अनजाने डर से रश्मि का मन कांप उठा, फिर भी उस ने अपने मन को समझाया कि हो सकता है वाकई गोविंद बिजी हो, आखिर मैनेजर है वह कंपनी का. वह भी काम में अपना ध्यान लगाने की कोशिश करने लगी.

शाम को 5 बजे जब रश्मि गोविंद के के‍बिन में गई, तो पता चला कि वह तो कब का जा चुका है. रश्मि ने जल्दी से गोविंद को फोन मिलाया तो उस का मोबाइल स्विच औफ आने लगा.

‘आखिर क्या बात हो सकती है, जो गोविंद मुझे ऐसे टाल रहा है…’ सोच कर रश्मि बेचैन होने लगी. अगले 2 दिनों तक गोविंद यों ही उस से लुकाछुपी खेलता रहा.

एक दिन तंग आ कर रश्मि जब गोविंद के घर पहुंची तो दरवाजे पर ताला झूल रहा था. वह वहीं गोविंद का इंतजार करती रही. जब साढ़े 8 बजे के आसपास गोविंद घर लौटा तो रश्मि को वहां देख कर वह दंग रह गया. ताला खोल कर गोविंद ज्यों ही अंदर गया, पीछेपीछे रश्मि भी आ गई.

ये भी पढ़ें- मजाक: प्यार का एहसास

“तुम्हे क्या लगा था गोविंद कि अगर तुम टालते रहोगे तो हम मिल नहीं सकते? इतना रूखा बरताव क्यों है तुम्हारा? इस तरह क्यों कतरा रहे हो मुझ से?” अंदर आते ही रश्मि बिफर पड़ी.

“रश्मि, मैं ज्यादा कुछ नहीं कह सकता. बस, यह समझ लो कि हमारी शादी अब नहीं हो सकती,” गोविंद ने बात खत्म करते हुए कहा.

“अरे, यह क्या बात हुई? शादी का फैसला तो हम दोनों का था. अब इस तरह तुम कैसे बदल सकते हो? और तुम्हारी मां ने भी तो हां कहा था, फिर अब क्या मुसीबत आ गई?” रश्मि गुस्से से बोली.

“देखो रश्मि, मां ने अब इनकार कर दिया है. और वजह तुम न ही जानो तो अच्छा है. बस, इतना कह सकता हूं कि आज के बाद हम दोनों न ही मिलें तो बेहतर है.”

“वजह तो तुम्हें बतानी पड़ेगी. आखिर खुशियां बड़ी मुश्किल से मेरे दरवाजे पर आई हैं. मैं उन को तुम्हारे साथ जीना चाहती हूं,” रश्मि की आंखों की बेबसी गोविंद को तड़पा रही थी. वह नहीं चाहता था कि रश्मि वजह जाने.

“ठीक है, बताता हूं. लेकिन यह भी सुन लो कि जो मैं तुम्हे बताना चाहता हूं उस से मैं सहमत तो नहीं हूं, पर मैं कुछ नहीं कर सकता.

“मैं जब यहां से टूर पर गया था, वहीं से मां को लेने अपने गांव चला गया था. मां तुम्हारे बारे में जान कर बहुत खुश थीं. तुम्हें देने के लिए उन्हें कुछ खरीदारी करनी थी, तो उन्होंने मुझे 2 दिन और रुकने को कहा.

“जिस रात को हम निकलने वाले थे उस दिन दोपहर की डाक से हमें एक लिफाफा मिला, जिस में तुम्हारे बारे में काफी गलतसलत लिखा गया था…”

“क्या लिखा था,” रश्मि ने बड़ी हैरानी से पूछा.

“उस में लिखा था कि चिट्ठी लिखने वाला तुम्हें अच्छी तरह जानता है. तुम्हारा चरित्र अच्छा नहीं है, इसी वजह से तुम्हारी शादी 2-3 बार टूट चुकी है, वरना 30 साल की उम्र तक तुम कुंआरी क्यों रहती? वह भी अच्छाखासा कमाने वाली हो तब भी?

“बस, मां ने चिट्ठी पढ़ कर इस शादी से मना कर दिया. वे नहीं चाहती हैं कि उन की बहू चरित्रहीन हो. मैं ने समझाने की बहुत कोशिश की, मगर वे मानने को तैयार नहीं हैं और मैं उन्हें इस उम्र में अकेला नहीं छोड़ सकता.

ये भी पढ़ें- मजाक: अच्छन मियां की अकड़

“तुम्हारे ‍बिना मेरी जिंदगी मुश्किल होगी, पर मुझे मां के लिए यह सहना ही होगा. मुझे माफ कर दो…” सब बता कर गोविंद ने उस के सामने वह लिफाफा रख दिया.

रश्मि ने लिफाफा खोल कर देखा तो उस की आंखें फटी रह गईं. उस ने उस लिखावट को पहचान लिया. आखिर कैसे भूल सकती थी वह उस लिखावट को जो उस के लिए आदर्श थी… बचपन में उस में संस्कार भरने वाले यही तो अक्षर थे.

3 बार अपनी शादी टूटने का सबब रश्मि की समझ में आ गया. भावनाओं के बवंडर में उलझी वह अनायास बोल पड़ी, “आप ने यह क्या कर दिया पापा..” और फिर उस के सब्र का बांध टूट गया.

“रश्मि, क्या यह खत तुम्हारे पापा ने भेजा है?” गोविंद ने हैरान हो कर पूछा.

रश्मि कुछ न कह सकी. वह अपने पापा को गोविंद की नजरों में गिराना नहीं चाहती थी. लेकिन गोविंद अब जानने को मचल रहा था. रश्मि ने कड़े मन से अपने अतीत की सारी बातें उस के सामने रख दीं.

“मैं तो अपने हिस्से का फर्ज निभा चुकी हूं गोविंद. अब पापा की बारी है न? आखिर कब तक फर्ज के नाम पर मैं तनहाई के ‍बियाबान रास्ते पर चलती रहूंगी? कब तक रोऊंगी? कब तक कमजोर रहूंगी? खोखले रिश्ते के मकड़जाल में कब तक उलझी रहूंगी?

“तुम कहो तो मैं अपने पापा का घर हमेशा के लिए छोड़ दूंगी…” पता नहीं रश्मि की संजीदा आवाज में कैसी कसक थी, जो गोविंद को भीतर तक झकझोर गई.

“नहीं पगली. ऐसा नहीं कहते. तुम्हारे पापा को डर है कि तुम्हारी शादी हो गई तो उन का क्या होगा, क्योंकि बेटे ने तो पहले से ही पल्ला झाड़ लिया है. उन की भावनाओं को मैं समझ सकता हूं रश्मि. ये बातें तुम्हें पहले बतानी चाहिए थीं. हम कुछ हल जरूर निकाल लेते..”

“क्या अब कुछ नहीं हो सकता है? मुझे यों अकेला छोड़ कर मत जाओ गोविंद. मैं तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊंगी,” रश्मि ने उसे कस कर पकड़ लिया.

“हां, हम जरूर कोशिश करेंगे…” गोविंद उसे सहला कर शांत करता रहा, “रश्मि, मेरे खयाल से तुम्हारे पापा अपनी और तुम्हारी मम्मी की बची हुई जिंदगी के लिए परेशान हैं, तुम्हारी शादी से नहीं. अगर तुम्हारी शादी होती है तो उन्हें दामाद के घर में रहना शायद पसंद न आए.

“देखो, हम दोनों की नौकरी इसी शहर में है, तो शादी के बाद हम दोनों उम्रभर उन के साथ रह लेंगे. कभीकभी मां भी हमारे साथ रहने आ जाया करेंगी. मैं तुम्हारे मम्मीपापा का बेटा बन कर उन का खयाल रखूंगा. फिर तो उन्हें हमारी शादी से कोई एतराज नहीं होगा न?”

ये भी पढ़ें- आया: लक्ष्मी नौकरानी नहीं घर की सदस्य थी

गोविंद की बातों से रश्मि के मन में उम्मीद के चिराग टिमटिमा उठे, “क्या यह मुमकिन है गोविंद?” उस ने भरी आंखों से पूछा.

“हां, थोड़ा मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं है. मेरी मां को राजी करवाना पड़ेगा. और मैं तुम्हारे लिए इतना तो करूंगा ही रश्मि.”

“अपने रिश्ते को समेट लो गोविंद… इस से पहले कि कुछ और बिखर जाए…”  रश्मि ने बड़े विश्वास से अपना सिर गोविंद के कंधे पर रख दिया. गोविंद ने उसे अपनी मजबूत बांहों में कस लिया.

Satyakatha: चरित्रहीन कंचन

सौजन्य: सत्यकथा

रामकुमार की जानकारी में अपनी पत्नी कंचन की कुछ ऐसी बातें आई थीं, जिस के बाद कंचन उस के लिए अविश्वसनीय हो गई थी. बताने वाले ने रामकुमार को यह तक कह दिया, ‘‘कैसे पति हो तुम, घर वाली पर तुम्हारा जरा भी अकुंश नहीं. इधर तुम काम पर निकले, उधर कंचन सजधज कर घर से निकल जाती है. दिन भर अपने यार के साथ ऐश करती है और शाम को तुम्हारे आने से पहले घर पहुंच जाती है.’’

रामकुमार कंचन पर अगाध भरोसा करता था. पति अगर पत्नी पर भरोसा न करे तो किस पर करे. यही कारण था कि रामकुमार को उस व्यक्ति की बात पर विश्वास नहीं हुआ. वह बोला, ‘‘हमारी तुम्हारी कोई नाराजगी या आपसी रंजिश नहीं है, मैं ने कभी तुम्हारा बुरा नहीं किया. इस के बावजूद तुम मेरी पत्नी को किसलिए बदनाम कर रहे हो, मैं नहीं जानता. हां, इतना जरूर जानता हूं कि कंचन मेकअपबाज नहीं है. शाम को जब मैं घर पहुंचता हूं तो वह सजीधजी कतई नहीं मिलती.’’

‘‘कंचन जैसी औरतें पति की आंखों में धूल झोंकने का हुनर बहुत अच्छी तरह जानती हैं.’’ उस व्यक्ति ने बताया, ‘‘तुम्हें शक न हो, इसलिए वह मेकअप धो कर घर के कपड़े पहन लेती होगी.’’

रामकुमार को तब भी उस व्यक्ति की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. वह उस का करीबी था, इसलिए उस ने उसे थोड़ा डांट दिया.

रामकुमार ने उस शख्स को डांट जरूर दिया था, लेकिन उस के मन में यह भी खयाल आया कि कोई इतनी बड़ी बात कह रहा है तो वह हवा में तो कह नहीं रहा होगा. उस ने खुद देखा होगा या उस के पास कोई ठोस सबूत या गवाह होगा. वैसे भी धुंआ वहीं उठता है, जहां आग लगी होती है. लिहाजा वह बेचैन हो गया. उस ने सोचा कि अपनी तसल्ली के लिए वह इस बारे में कंचन से बात जरूर करेगा.

घर पहुंचतेपहुंचते रामकुमार ने कंचन से उक्त संदर्भ में बात करने का इरादा बदल दिया. इस के पीछे कारण यह था कि कोई भी औरत अपनी बदचलनी स्वीकार नहीं करती तो कंचन कैसे कर लेगी. इसीलिए उस ने स्वयं मामले की असलियत का पता लगाने का फैसला कर लिया.

पत्नी के चरित्र को ले कर रामकुमार तनाव में था. उस का वह तनाव चेहरे और आंखों से साफ झलक रहा था. एक दिन कंचन ने उस से पूछा भी, लेकिन रामकुमार ने टाल दिया, बोला, ‘‘मन ठीक नहीं है.’’

‘‘तुम्हारी दवा घर में रखी तो है, पी लो. जी भी ठीक हो जाएगा और चैन की नींद भी सो जाओगे.’’ वह बोली.

तनाव की अधिकता से रामकुमार का सिर फट रहा था. सिर हलका करने और चैन से सोने के लिए उसे स्वयं भी शराब की तलब महसूस हो रही थी. इसलिए वह कंचन से बोला, ‘‘ले आओ.’’

ये भी पढ़ें- Satyakatha: अधेड़ औरत के रंगीन सपने

कंचन ने शराब की बोतल, पानी, नमकीन और एक गिलास ला कर पति के सामने रख दिया. रामकुमार ने एक बड़ा पैग बना कर हलक में उड़ेला और सोचने लगा कि कल उसे क्या करना चाहिए.

उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर के गांव गोहानी में रहता था शंभू सिंह. शंभू सिंह के परिवार में पत्नी पार्वती के अलावा एक बेटा कुलदीप और एक बेटी कंचन थी. कुलदीप पंजाब में रह कर काम करता था. उस की पत्नी गांव में रहती थी.

शंभू सिंह खेतिहर मजदूर था. कमाई कम थी, इसलिए घरपरिवार में किसी न किसी चीज का सदैव अभाव बना रहता था. सुंदर व चुलबुली कंचन मामूली चीजों तक को तरसती रहती थी.

पिता की कमाई कम थी और खर्च अधिक, इसलिए निजी जरूरतें और शौक पूरा करने के लिए कंचन को घर से वांछित रुपए मिल नहीं  सकते थे. इसीलिए वह कभी कोई चीज खाने को तरसती, कभी किसी को अच्छे कपड़े पहने देख ललचाती तो कभी सोचती कि सजनेसंवरने का सामान कैसे खरीदे.

किशोर उम्र की लड़कियों की मानसिकता समझने और उन से लाभ उठाने वालों की दुनिया में कोई कमी नहीं है. गोहानी गांव में भी कुछ ऐसे ठरकी थे. उन्होंने कंचन का लालच समझा तो वह उसे रिझाने लगे. खिलानेपिलाने या कुछ सामान दिलाने के नाम पर वह कंचन के साथ अश्लील हरकत करते.

कुछ समय में ही कंचन समझ गई कि कोई यूं मेहरबान नहीं होता. जो पैसा खर्च करता है, उस के एवज में कुछ चाहता भी है. वह अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लोगों की इच्छाएं पूरी करने लगी. परिणाम यह हुआ कि कंचन कुछ ही दिनों में पूरे गांव में बदनाम हो गई.

बात पिता शंभू सिंह और मां पार्वती तक पहुंची तो उन्होंने अपना सिर पीट लिया कि बेटी है या आफत की परकाला. छोटी सी उम्र में इतने बड़े गुल खिला रही है. दोनों ने कंचन को खूब मारापीटा, मगर कंचन ने अपनी राह नहीं बदली.

शंभू सिंह और पार्वती जब सारी कोशिश कर के हार गए तब उन्होंने सोचा कि कंचन की जल्द शादी कर के उसे ससुराल भेज दिया जाए, तभी थोड़ीबहुत इज्जत बची रह सकती है.

इस फैसले के बाद शंभू सिंह ने कंचन के लिए वर की तलाश शुरू कर दी. जल्द ही एक अच्छा रिश्ता मिल गया. प्रतापगढ़ जनपद के गांव धर्मपुर निवासी राजेश पटेल से कंचन का रिश्ता तय हो गया. 12 वर्ष पूर्व कंचन का विवाह राजेश पटेल से हो गया.

कंचन को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अब किसी और की जरूरत नहीं थी. पति राजेश उस की हर जरूरत पूरी करता था. कालांतर में कंचन ने 2 बेटियों को जन्म दिया.

धीरेधीरे कंचन और राजेश में मतभेद रहने लगे, जिस वजह से उन के बीच वादविवाद होता था. यह वादविवाद कभीकभी विकराल रूप धारण कर लेता था. कंचन को अब अपनी ससुराल काटने को दौड़ती थी. उस का वहां मन नहीं लगता था.

ये भी पढ़ें- MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार- भाग 1

इसी बीच कंचन की मुलाकात रामकुमार दुबे से हो गई. रामकुमार दुबे कन्नौज के गुरसहायगंज का रहने वाला था. 10 सालों से वह हरदोई जिले में रहने वाली अपनी बहन मिथलेश की ससुराल में रहता था. काम की तलाश में वह प्रतापगढ़ आ गया. यहीं पर उसे कंचन मिल गई.

पहली मुलाकात हुई तो उन के बीच बातें हुईं. दोनों की यह मुलाकात काफी अच्छी रही. दोनों ने एकदूसरे को अपना नंबर दे दिया. इस के बाद तो उन की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. फोन पर भी बातें होने लगीं. कुछ ही दिनों में दोनों इतने करीब आ गए कि शादी कर के साथ रहने की सोचने लगे.

दोनों ने साथ रहने का फैसला लिया तो कंचन अपनी ससुराल छोड़ कर उस के पास आ गई. रामकुमार ने साथ रहने के लिए कंचन के कहने पर पहले ही जौनपुर के भुईधरा गांव में जमीन ले कर 2 कमरों का मकान बनवा लिया था. दोनों शादी कर के यहीं रहने लगे. यह 8 साल पहले की बात है. 4 साल पहले कंचन ने एक बेटे को जन्म दिया.

लेकिन अभावों ने कंचन का यहां भी पीछा न छोड़ा. रामकुमार की भी कमाई अधिक नहीं थी. घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था. कंचन की मुश्किलें बढ़ने लगीं तो उस ने इधरउधर देखना शुरू कर दिया. उसे ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो उस की जरूरतों पर पैसा खर्च कर सके. इस खेल की तो वह पुरानी खिलाड़ी थी.

उस की तलाश रामाश्रय पटेल पर जा कर खत्म हुई. रामाश्रय जौनपुर के मुगरा बादशाहपुर थाना क्षेत्र के बेरमाव गांव का निवासी था. बेरमाव पंवारा थाना क्षेत्र की सीमा से सटा गांव था. रामाश्रय दिल्ली में रह कर किसी फैक्ट्री में काम करता था. कुछ दिनों बाद वह घर आता रहता था. रामाश्रय विवाहित था और उस के 3 बच्चे भी थे. लेकिन उस की अपनी पत्नी से नहीं बनती थी.

रामाश्रय भुईधरा गांव आता रहता था. इसी आनेजाने में उस की मुलाकात कंचन से हो गई थी. कंचन जान गई थी कि रामाश्रय आर्थिक रूप से काफी मजबूत है. कंचन और रामाश्रय की मुलाकातें होने लगीं. इन मुलाकातों में कंचन ने रामाश्रय के बारे में काफी कुछ जान लिया.

वह यह भी जान गई कि रामाश्रय की अपनी पत्नी से नहीं बनती. यह जान कर वह काफी खुश हुई, उस का काम आसान जो हो गया था. पत्नी से परेशान मर्द को बहला कर अपने पहलू में लाना आसान होता है, यह कंचन बखूबी जानती थी.

कंचन ने अब रामाश्रय को अपने लटकेझटके दिखाने शुरू कर दिए. रामाश्रय भी कंचन के नजदीक आ कर उसे पाने की चाहत रखता था. कंचन के लटकेझटके देख कर वह भी समझ गया कि मछली खुद शिकार होने को आतुर है. वह भी कंचन पर अपना प्रभाव जमाने के लिए खुल कर उस पर अपना पैसा लुटाने लगा.

कंचन की रामाश्रय से नजदीकी क्या हुई, कंचन के अंदर की अभिलाषा जाग गई. कंचन ने अपनी कामकलाओं का ऐसा जादू बिखेरा कि रामाश्रय सौसौ जान से उस पर न्यौछावर हो गया.

रामकुमार के काम पर जाते ही कंचन सजधज कर घर से निकल जाती और रामाश्रय के साथ घूमती और मटरगश्ती करती. रामाश्रय पर कंचन के रूप का जबरदस्त नशा चढ़ा हुआ था. रामकुमार के घर आने से पहले कंचन घर आ जाती थी. घर आने के बाद अपना मेकअप धो कर साफ कर लेती. घर के कपड़े पहन कर घर का काम करने लगती.

कंचन समझती थी कि किसी को उस की रंगरलियों की खबर नहीं है. जबकि वास्तविकता सब जान रहे थे. एक दिन किसी शुभचिंतक ने रामकुमार को उस की पत्नी की रंगरलियों की दास्तान बयां कर दी.

रामकुमार ने इस बाबत कंचन से कोई सवाल नहीं किया. बल्कि उस ने अपने सारे पैग पीतेपीते सोच लिया कि हकीकत का पता करने के लिए उसे क्या करना है.

दूसरे दिन रामकुमार काम पर जाने के लिए घर से तो निकला, पर गया नहीं. कुछ दूरी पर एक जगह छिप कर बैठ गया. उस की नजर घर की ओर से आने वाले रास्ते पर जमी थी.

मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा कि कंचन आती दिखाई दी. अच्छे कपड़े, आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक, कलाइयों में खनकती चूडि़यां उस की खूबसूरती बढ़ा रही थी.

कंचन जैसे ही नजदीक आई. रामकुमार एकदम से छिपे हुए स्थान से निकल कर उस के सामने आ खड़ा हुआ. पति को अचानक सामने देख कर कंचन भौचक्की रह गई. वह रामकुमार से पूछना चाहती थी कि वह यहां कैसे, काम पर गए नहीं या लौट आए. मगर मानो वह गूंगी हो गई. चाह कर भी आवाज उस के गले से नहीं निकली.

रामकुमार ने कंचन की आंखों में देख कर भौंहें उचकाईं, ‘‘छमिया बन कर कहां चलीं… यार से मिलने? अपना मुंह काला करने और मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ाने.’’

कंचन घबराई, लेकिन जल्दी ही खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘नहाधो कर घर से निकलना भी अब जुल्म हो गया. दुखी हो गई हूं मैं तुम से.’’

‘‘घर चल, तब मैं बताता हूं कि कौन किस से दुखी है.’’

दोनों घर आए तो उन के बीच जम कर झगड़ा हुआ. कंचन अपनी गलती मानने को तैयार नहीं थी. उस का कहना था कि वह रामाश्रय से मिलने नहीं, अपनी सहेली से मिलने जा रही थी.

रामकुमार ने कंचन पर अंकुश लगाने का हरसंभव प्रयास किया, मगर वह नाकाम रहा.

14 मई को गांव रामपुर हरगिर के पास शारदा नहर के किनारे लोगों ने एक लाश देखी. देखते ही देखते वहां काफी संख्या में लोग जमा हो गए. लाश को ले कर लोग तरहतरह की चर्चाएं करने लगे. इसी बीच रामपुर हरगिर गांव के अजय कुमार नाम के व्यक्ति ने संबंधित थाना पंवारा को लाश मिलने की सूचना दे दी.

सूचना पा कर थानाप्रभारी सेतांशु शेखर पंकज अपनी टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. वहां पहुंच कर उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र लगभग 35-36 वर्ष रही होगी. मृतक के शरीर की खाल पानी में रहने से गल गई थी. लाश देखने में 2-3 दिन पुरानी लग रही थी. मृतक के दाएं हाथ पर रामकुमार पटेल और कंचन गुदा हुआ था.

थानाप्रभारी सेतांशु शेखर ने लाश के कई कोणों से फोटो खींचने के साथ नाम का जो टैटू था, उस की भी फोटो खींच ली. घटनास्थल का निरीक्षण किया गया तो पास से चाकू, रस्सी और कपड़े बरामद हुए.

वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की गई, लेकिन कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. थानाप्रभारी सेतांशु शेखर ने लाश पोस्टमार्टम हेतु भेज दी. फिर अजय कुमार को साथ ले कर थाने आ गए.

अजय कुमार की लिखित तहरीर पर थानाप्रभारी ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया. थाने के सिपाहियों को लाश पर मिले टैटू की फोटो दे कर अपने थाना क्षेत्र और आसपास के थाना क्षेत्र में भेजा, जिस से मृतक के बारे में कोई जानकारी मिल सके. उन का यह प्रयास सफल भी हुआ.

गोहानी गांव में टैटू देख कर लोगों ने पहचाना कि कंचन तो उसी गांव की बेटी है, रामकुमार उस का पति है. वह टैटू देख कर यह लगा कि वह लाश रामकुमार की थी.

जानकारी मिली तो थानाप्रभारी सेतांशु शेखर गोहानी गांव पहुंच गए. रामकुमार की ससुराल गोहानी में थी. वहां रामकुमार की पत्नी कंचन मौजूद थी. उस के साथ में रामाश्रय था. रामाश्रय का पता पूछा तो उस का गांव बेरमाव था जोकि घटनास्थल से काफी करीब था.

रामकुमार की हत्या होना, उस समय उस की पत्नी कंचन का मायके में होना और उस के साथ जो व्यक्ति रामाश्रय मिला उस के गांव के नजदीक रामकुमार की लाश मिलना, यह सब इत्तिफाक नहीं था. सुनियोजित साजिश के तहत घटना को अंजाम देने की ओर इशारा कर रहा था.

इस बात को थानाप्रभारी बखूबी समझ गए थे. इसलिए उन्होंने शक के आधार पर पूछताछ हेतु दोनों को हिरासत में ले लिया और थाने वापस आ गए.

थाने ला कर उन दोनों से पहले अलगअलग फिर आमनेसामने बैठा कर कड़ाई से पूछताछ की गई तो वे दोनों टूट गए और हत्या के पीछे की वजह बयान कर दी.

कंचन और रामाश्रय दोनों के संबंधों को ले कर हर रोज घर में रामकुमार झगड़ा करने लगा. वह उन के मिलने में अड़चनें पैदा करने लगा तो कंचन ने रामाश्रय से रामकुमार को हमेशा के लिए अपने रास्ते से हटाने के लिए कह दिया. यह घटना से करीब एक हफ्ते पहले की बात है. दोनों ने पूरी योजना बना ली.

योजनानुसार कंचन अपने मायके गोहानी चली गई. 11/12 मई की रात रामाश्रय रामकुमार के पास गया. उस से कंचन से संबंध खत्म करने की बात कही. फिर एक नई शुरुआत करने के बहाने उसे अपने साथ ले गया. रामकुमार को उस ने जम कर शराब पिलाई. देर रात एक बजे रामाश्रय रामकुमार को रामपुर हरगिर गांव के पास ले गया. उस समय रामकुमार नशे में धुत था.

ये भी पढ़ें- दिल्ली में ऑनर किलिंग, घर में घुसकर बेरहमी से ली शादीशुदा जोड़े की जान

रामाश्रय ने साथ लाए चाकू से गला काट कर रामकुमार की हत्या कर दी. उस के बाद उस के हाथपैर रस्सी और कपड़े से बांध कर लाश नहर में डाल दी लेकिन लाश नदी में स्थित बिजली के आरसीसी के बने खंभों में फंस कर रह गई. नदी के बहाव में वह नहीं बह सकी. रामाश्रय यह नहीं देख पाया.

वह तो चाकू वहीं फेंक कर घर चला गया. अगले दिन वह कंचन के पास उस के मायके पहुंच गया. वहां वह कंचन के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ गया.

मुकदमे में भादंवि की धारा 201/120बी/34 और जोड़ दी गईं. कानूनी लिखापढ़ी करने के बाद दोनों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Manohar Kahaniya : पावर बैंक ऐप के जरिए धोखाधड़ी- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

शेख रौबिन, पेमा वांगमो, सीए अविक केडिया और रौनक बंसल ने जब ठगी का पूरा जाल तैयार कर लिया तो चीनी नागरिकों ने चीन से अपने तीनों ऐप्स को प्रमोट करने के लिए इन्हें गूगल प्लेस्टोर के मेलवेयर स्पैम में डाल कर प्रमोट करना शुरू कर दिया.

इन ऐप्स को वाट्सऐप, टेलीग्राम के जरिए भी प्रमोट करना शुरू कर दिया. कई तरह की गेम एप्लीकेशन और सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर इन एप्लीकेशन के विज्ञापन इतनी तेजी से वायरल होने लगे कि एक महीने के भीतर ही पावर बैंक ऐप गूगल प्लेस्टोर पर डाउनलोड होने वाले ऐप में चौथे नंबर पर ट्रेंड करने लगा.

दोगुना करने के लालच में फंसते गए लोग

इन एप्लीकेशन को इतने आकर्षक ढंग से प्रमोट किया जा रहा था कि पूरे भारत में जो भी लोग इन लिंक को देखते जल्दी पैसा कमाने के लालच में तुरंत इसे डाउनलोड कर लेते.

दरअसल मल्टीलेवल मार्केटिंग की तर्ज पर बनी एप्लीकेशन में लोगों को बहुत मामूली सी रकम इनवैस्ट करने पर इस के 25 से 35 दिनों में दोगुना होने का औफर था. सब से छोटी रकम के रूप में 300 रुपए निवेश करने थे, उस के बाद कोई चाहे तो इस रकम को लाखों तक निवेश कर सकता था. यानी सब से छोटी रकम की लिमिट 300 रुपए और अधिकतम की सीमा कोई नहीं थी.

दिलचस्प बात यह थी कि जिन लोगों के पास किसी भी ऐप के माध्यम से प्रमोट हो कर ये क्विक मनी अर्निंग ऐप का लिंक पहुंचता था वह क्लिक करते ही लोगों के मोबाइल फोन में खुदबखुद इंस्टाल हो जाता था.

जिस में सब से पहले इनवैस्ट करने वाले को रकम के कुछ ही दिनों में दोगुना होने का औफर होता. उस के बाद एक प्रोफार्मा होता, जिस में निवेशक को अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर, आधार व बैंक खाते की जानकारी भरनी होती. साथ ही कुछ शर्तें लिखी होतीं, जिन्हें स्वीकार करना होता था.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: चाची का आशिक

इस के बाद जितनी भी रकम किसी को इनवैस्ट करनी हो उस का भुगतान करने के लिए पेटीएम, गूगल पे, भारत पे और यूपीआई के पेमेंट गेटवे के बार कोड व डिटेल दी गई थी. जिन के जरिए लोग अपनी इनवैस्ट की जाने वाली रकम का भुगतान कर देते थे.

सब से अच्छी बात यह थी कि शुरुआत के कुछ दिनों में छोटी रकम इनवैस्ट करने वाले करीब 20 फीसदी लोगों को तय समय सीमा में वादे के अनुसार उन की इनवैस्ट रकम का दोगुना भुगतान मिल गया. इस से उत्साहित ऐसे लोगों ने अगले इनवैस्टमेंट के रूप में हजारों और लाखों रुपए की बड़ी रकम का इनवैस्टमेंट करना शुरू कर दिया.

बाद में पैसा आना हो गया बंद

जिन लोगों को एक बार लाभ मिल चुका था, उन्होेंने अपने मित्रों, रिश्तेदारों और जानपहचान वालों को भी इन ऐप्स के बारे में और अपने लाभ के बारे में बताया तो अचानक एक महीने बाद तेजी से पावर बैंक और ईजी मनी ऐप लोगों के आकर्षण का केंद्रबिंदु बन गया.

पिछले डेढ़ साल से कोरोना और ज्यादातर समय रहे लौकडाउन के कारण लोगों के कामधंधे चौपट हो चुके थे, काफी लोग बेरोजगार हो गए थे. ऐसे में आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों के लिए मल्टीलेवल मार्केटिंग के ये ऐप्स लोगों को देवदूत लगने लगे, जो रातोंरात उन की दरिद्रता दूर कर सकते थे.

बस ये ऐप धड़ाधड़ डाउनलोड होने लगे. देखते ही देखते देश भर में लाखों लोगों ने इन में पैसा इनवैस्ट करना शुरू कर दिया. दरअसल, गूगल प्लेस्टोर व दूसरे सोशल मीडिया तथा यूट्यूब के बहुत सारे वीडियो में जिस तरह से इन एप्लीकेशंस का प्रचार हो रहा था और पेमेंट गेटवे के जरिए रकम जमा कराई जा रही थी, उस से किसी को भी यह शक ही नहीं था कि ये धोखाधड़ी का एक ऐसा लालच भरा जाल है, जिस में एक बार कोई फंस गया तो निकलना बेहद मुश्किल होगा.

वैसे भी भारत सरकार ने बैंक खातों में खुले एकाउंट और पेमेंट गेटवे पर खाता बनाने के लिए इतनी औपचारिकताएं और दस्तावेज जमा कराने की बाध्यता कर दी है कि लोग यही समझते हैं कि अगर उन के साथ कोई धोखाधड़ी हो भी गई तो वे पुलिस में शिकायत कर कानूनी काररवाई कर देंगे.

यही कारण रहा कि लोग तेजी के साथ इन ऐप्स के जरिए इनवैस्टमेंट करते चले गए. लेकिन 2 महीने बाद ही धोखाधड़ी करने वाले संचालक अपनी असलियत पर आ गए. बड़ी रकम जमा कराने वाले लोगों का पैसा वापस लौटाने का नंबर आया तो उन के मोबाइल पर ये ऐप्स ब्लौकहोने लगे, लिहाजा जल्द ही लोगों को समझ में आने लगा कि यह धोखाधड़ी का एक जाल है.

लोगों ने पुलिस में शिकायतें करनी शुरू कर दीं और सोशल मीडिया पर अपने इन कड़वे अनुभव और धोखाधड़ी की कहानी लिखनी शुरू कर दी.

इसी के बाद दिल्ली पुलिस और देश के दूसरे राज्यों की पुलिस ने इस धोखाधड़ी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए छानबीन कर ऐक्शन लेने का काम शुरू कर दिया.

ये भी पढ़ें- Crime: फ्री का लॉलीपॉप, बड़ा लुभावना!

पुलिस ने बैंक खाते कराए सीज

पुलिस ने शेख रौबिन, सीए अविक केडिया, रौनक बंसल और पेमा के अलावा दिल्ली के रहने वाले उमाकांत अक्श जौय, वेद चंद्रा , हरिओम और अभिषेक मंसारमाणी नाम के 4 लोगों को गिरफ्तार किया. ये सभी घोटाले में इस्तेमाल की जा रही मुखौटा कंपनियों के निदेशक थे और इन कंपनियों के खातों में ठगी की रकम ट्रांसफर हुई थी.

दिल्ली के ही रहने वाले एक आरोपी अरविंद को भी गिरफ्तार किया गया, जिस ने 3 व्यक्तियों को एकमुश्त भुगतान ले कर शैल कंपनियों को निदेशक बनने के लिए तैयार किया था.

शशि बंसल और मिथलेश शर्मा नाम की दिल्ली की 2 महिलाओं को चीनी जालसाजों को अपनी शैल कंपनियां और अपने नाम से खोले गए बैंक खाते ठगी के रकम को ट्रांसफर करने के लिए उपलब्ध कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.

पुलिस ने अभी तक की जांच में 29 बैंक खातों का पता लगाया है, जिन में ठगी की रकम एक खाते से दूसरे खातों में भूलभुलैया पैदा करने के लिए ट्रांसफर की गई थी. इन बैंक खातों में पड़ी करीब 12 करोड़ की रकम को पुलिस ने सीज करवा दिया है. इस के अलावा सभी आरोपियों से करीब 30 सक्रिय मोबाइल फोन बरामद किए गए थे. इन में से अधिकांश का इस्तेमाल बैंक खातों के संचालन और पेमेंट गेटवे के खातों के औपरेशन में हो रहा था.

दोनों सीए अविक केडिया व रौनक बंसल से पता चला कि शेख रौबिन के अलावा वे चीनी जालसाजों के सीधे संपर्क में भी थे और उन से टेलीग्राम, डिंगटौक, वीचैट आदि के माध्यम से संपर्क में रहते थे.

अगले भाग में पढ़ें- रोचक खुलासों से चौंकी पुलिस

Manohar Kahaniya- पाक का नया पैंतरा: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इशारा मिलते ही बौर्डर के दूसरी तरफ से करीब 10 फुट लंबा एक पीवीसी पाइप तारों के बीच से निकाला गया. इस पाइप में डाल कर कपड़े की माला के रूप में हेरोइन के पैकेट दूसरी तरफ से धकेले गए, जो भारतीय सीमा में निकल आए. हरमेश और रूपा इन पैकेटों को निकाल रहे थे, तभी बीएसएफ ने फायरिंग कर दी. इस पर वे तीनों हेरोइन के पैकेटों को छोड़ कर अंधेरे में अपनी जान बचाते हुए कच्चे रास्तों पर भाग निकले.

भागते हुए उन्होंने बौस को वाट्सऐप काल भी की, लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की. इस के बाद वे सुरक्षा एजेंसियों से बचते हुए इधरउधर भागते हुए खेतों में छिपते रहे, लेकिन सुरक्षा बलों की नजरों से बच नहीं सके और वे दोनों पकड़े गए.

काला सिंह के नहीं मिलने पर यह माना गया कि पूरे इलाके से वाकिफ होने के कारण वह फायरिंग होने पर भाग कर बौस तक पहुंच गया और दोनों गाड़ी से वहां से फरार हो गए.

दोनों तसकरों से पूछताछ के बाद बीएसएफ ने जांचपड़ताल की, तो पता चला कि 2-3 जून की रात करीब डेढ़-दो बजे बौर्डर पर पाकिस्तानी रेंजर्स ने सरकारी गाड़ी से तसकरों को बंदली पोस्ट के सामने जीरो लाइन तक पहुंचाया था. इस गाड़ी से तसकरों के साथ हेरोइन और पीवीसी पाइप लाया गया था. बाद में यह गाड़ी पाकिस्तान के वाच टावर की तरफ चली गई.

पाकिस्तानी तसकरों ने पाइप में तारबंदी के पास घनी झाडि़यों और रेत के टीलों की ओट में हेरोइन के पैकेट डाले और भारतीय सीमा से पत्थर फेंके जाने का इंतजार किया. पत्थर फेंकने पर इशारा मिलते ही पाक तसकरों ने वह पीवीसी पाइप तारबंदी के बीच से भारतीय सीमा में सरका दिया.

ये भी पढ़ें- धोखाधड़ी: न्यूड वीडियो कालिंग से लुटते लोग

बीएसएफ को मिली थी गुप्त सूचना

बीएसएफ को जांच में बंदली सीमा चौकी के सामने पाक के वाच टावर की ओर जाती गाड़ी के निशान मिले और एक गाड़ी भी टावर के पीछे खड़ी नजर आई. इस से पाकिस्तान के नापाक इरादे के सारे शक पुख्ता हो गए.

दरअसल, बीएसएफ की गुप्तचर शाखा को कई दिनों से यह सूचनाएं मिल रही थीं कि पाकिस्तानी तसकर जम्मूकश्मीर और पंजाब बौर्डर के रास्तों पर ज्यादा सख्ती होने के बाद से राजस्थान से लगी सीमाओं पर हेरोइन की तसकरी के सुरक्षित रास्ते तलाश रहे हैं. हेरोइन की तसकरी के जरिए पाकिस्तान भारत में नारको टेरेरिज्म फैलाने की साजिश रच रहा है.

इन्हीं सूचनाओं के बीच पाकिस्तान के कुख्यात तसकर मलिक चौधरी को 9 मई, 2021 के आसपास बौर्डर पर देखा गया था. माना जा रहा है कि वह अपने विश्वस्त सहयोगियों के साथ भारत में हेरोइन तसकरी के लिए सुरक्षित पौइंट की जगह तलाश कर रहा था.

बीएसएफ इंटेलिजेंस को मलिक की आवाजाही की भनक लग गई थी. इस के बाद बीएसएफ ने बौर्डर पर खाजूवाला की 114 बटालियन और सतराना की 127 बटालियन के इलाके में चौकसी कड़ी कर दी थी.

इसी के साथ फ्रंटियर के आईजी पंकज गूमर और डीआईजी (इंटेलिजेंस) मधुकर से सूचनाएं साझा की गईं. डीआईजी पुष्पेंद्र सिंह और बटालियन कमांडेंट अमिताभ पंवार ने सर्च औपरेशन प्लान किया. जी ब्रांच के डिप्टी कमांडेंट दीपेंद्र सिंह शेखावत के नेतृत्व में टीम बनाई गई. इस टीम ने खाजूवाला से सतराना तक सर्च औपरेशन कर दिया.

इसी दौरान सूचनाएं मिलती रहीं कि तसकर खराब मौसम का फायदा उठा कर हेरोइन डिलीवर कर सकते हैं. राजस्थान के सीमाई इलाकों में जून का महीना खराब मौसम में गिना जाता है. इस दौरान लू और आंधी चलती है. आंधी चलने से हवा में बहुतायत से रेत उड़ती है.

इस से पहले भी फरवरी 2021 में बीकानेर के खाजूवाला की संग्रामपुरा और कोडेवाला सीमा चौकी के बीच हेरोइन तसकरी की कोशिश की गई थी. इस मामले में खाजूवाला थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी, लेकिन पुलिस किसी को नहीं पकड़ सकी.

तसकरों से की गई गहन पूछताछ

इस मामले में तब तारबंदी के दोनों तरफ 2-2 तसकरों के पैरों के निशान (फुट प्रिंट) मिले थे. जांच में सामने आया था कि भारतीय सीमा में 2 तसकर सड़क पर बाइक छोड़ कर पैदल ही तारबंदी तक गए थे. 2 अन्य तसकर सड़क पर ही रहे थे. मौके पर 2 बाइकों के टायरों के निशान, चाकू, कपड़ा, पानी की बोतल आदि चीजें मिली थीं.

3 जून, 2021 की रात पकड़ी गई 283 करोड़ रुपए की हेरोइन के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए 2 तसकर रूपा और हरमेश से पूछताछ में पता चला कि अफगानिस्तान की यह हेरोइन पंजाब पहुंचाई जानी थी. लौकडाउन और तसकरी के दूसरे रास्ते बंद होने के कारण वहां सब से ज्यादा डिमांड हो रही थी.

राजस्थान फ्रंटियर पर अब तक की सब से बड़ी हेरोइन तसकरी पकड़े जाने और दोनों गिरफ्तार तसकरों से कुछ सुराग मिलने के बाद सुरक्षा एजेंसियां हरकत में आ गईं. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर 7 दिनों के रिमांड पर लिया.

बाद में उन्हें बीएसएफ के 127 बटालियन हैडक्वार्टर पर ले जा कर पूछताछ की गई. एनसीबी के डीडीजी ज्ञानेश्वर सिंह ने भी वहां पहुंच कर दोनों तसकरों से पूछताछ की.

इन से पता चला कि पंजाब का कुख्यात तसकर काला सिंह इस इलाके से पूरी तरह वाकिफ था. वह कई बार इस इलाके में आ कर रैकी कर चुका था.

बौर्डर पर सभी सीमा चौकियों तक पक्की सड़कें बनी हुई हैं. इसलिए वहां तक वाहनों की आवाजाही आसान है. काला सिंह ही उन्हें कैंपर गाड़ी से बौर्डर पर ले कर आया था.

खास बात यह पता चली कि पंजाब का रहने वाला काला सिंह उर्फ हरमेश केवल 20 साल का है. उस के खिलाफ कई संगीन मुकदमे दर्ज हैं. वह करीब 4 साल से हेरोइन की तसकरी में लिप्त है. यानी वह बालिग होने से पहले से ही 15-16 साल की उम्र में इस धंधे में उतर आया था.

वह 2019 में अमृतसर में हेरोइन और अवैध हथियार के साथ पकड़ा गया था. जमानत पर छूटने के बाद उस ने पंजाब के फिरोजपुर में एक मर्डर कर दिया था, जिस का मुकदमा फिरोजपुर सिटी थाने में दर्ज है. पंजाब पुलिस इस मामले में उस की तलाश कर रही थी.

अगले भाग में पढ़ें- कैसे नारको टेरेरिज्म फैलाने की साजिश की गई?

साहब- भाग 3: आखिर शादी के बाद दिपाली अपने पति को साहब जी क्यों कहती थी

यह सुन कर दीपाली शरमा गई, पर कुछ नहीं बोली. फिर ज्यादा जोर देने पर वह साथ खाने बैठ गई.

‘‘दवा पूरी खाना,’’ रमेश ने खाना खाते हुए कहा.

‘‘जी.’’

‘‘कौन सी क्लास में पढ़ती हो?’’

‘‘12वीं क्लास में.’’

‘‘पढ़ाई कैसी चल रही है?’’

‘‘जी, ठीक चल रही है.’’

‘‘क्या बनने का इरादा है?’’

‘‘साहब, आगे तो अभी कालेज की पढ़ाई है. आगे क्या पता? मां पढ़ा पाएंगी या नहीं… हो सकता है, मां मेरी शादी करा दें.’’

ये भी पढ़िए- अब पछताए होत क्या

‘‘हां, यह भी हो सकता है.’’

दीपाली ने रमेश से कहा, ‘‘साहब, मैं आप से कुछ पूछ सकती हूं… बुरा तो नहीं मानेंगे आप?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना चाहती हो?’’

‘‘आप ने शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘सब वक्त की बात है. किसी को मैं पसंद नहीं आया, कोई मुझे पसंद नहीं आई. फिर शादी के लिए मैं किसे आगे करता. न मातापिता, न भाईबहन. लोग अकेले लड़के को अपनी लड़की देने में कतराते हैं.’’

‘‘आप बहुत अच्छे हैं साहब.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘कल रात मुझे आप में अपनी मां और पिता दोनों दिखाई दिए.’’

‘‘क्या मेरी उम्र भी है मातापिता की उम्र जैसी?’’

‘‘उम्र नहीं, गुण हैं आप में ऐसे. पहले मैं आप को केवल साहब की नजर से देखती थी…’’

‘‘और अब?’’

‘‘अब मैं आप को आदर की नजर से देखती हूं.’’

रमेश ने दीपाली से कहा तो नहीं, लेकिन मन ही मन सोचा, ‘प्यार की नजर से तो कोई नहीं देखता. प्यार भी कहा होता तो अच्छा लगता. दिल को तसल्ली मिलती.’

अब दीपाली रोज काम करने आती.

एक दिन रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हारी मां अभी तक नहीं आई?’’

‘‘वे तो कब की आ चुकी हैं, लेकिन बीमार हैं.’’

रमेश ने कई बार सोचा कि महरू को देखने जाएं, लेकिन वे कभी भूल जाते, तो कभी कोई और काम आ जाता.

एक दिन घबराई हुई दीपाली रमेश के पास आई और बोली, ‘‘साहब, मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है. वे आप को बुला रही हैं.’’

दीपाली की घबराहट से रमेश समझ गए कि बात गंभीर है. उन्होंने तुरंत तैयार हो कर उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाया और जैसे वह बताती गई, वे उसी रास्ते पर मोटरसाइकिल घुमा देते.

रमेश ने दीपाली के कहने पर एक छोटी सी गंदी बस्ती में एक कच्चे मकान के सामने मोटरसाइकिल रोकी.

दीपाली ने उतरते हुए कहा, ‘‘अंदर आइए साहब.’’

रमेश ने अंदर जा कर देखा. महरू का शरीर बिलकुल सूख चुका था. रमेश को देख कर उस के चेहरे पर खुशी तैर गई. उस ने उठने की कोशिश की, लेकिन उठ न सकी.

‘‘लेटी रहो,’’ रमेश ने कहा. दीपाली अपनी मां के पास बैठ गई.

‘‘क्या हो गया है तुम को? तुम तो मायके गई थीं?’’

‘‘साहब…’’ महरू ने उखड़ती सांसों के साथ कहा, ‘‘डाक्टर ने मुझे 1-2 दिन का मेहमान बताया है. मुझे अपनी बेटी की चिंता है. मेरे अलावा इस का कोई नहीं है. न कोई सगेसंबंधी, न रिश्तेदार. इस घर में इस का अकेले रहने का मतलब है कि कभी भी…’’ आगे वह चुप रही, फिर थोड़ी देर बाद बोली, ‘‘साहब, आप से एक गुजारिश है. आप भले आदमी हैं. आप मेरी बेटी को अपना लीजिए. चाहे नौकरानी समझ कर, चाहे…’’ फिर वह रुक गई, ‘‘आप भी अकेले हैं. यह आप का घर संभाल लेगी. अपनी औकात से बड़ी बात कर रही हूं, लेकिन मैं किसी और पर भरोसा भी नहीं कर सकती.

ये भी पढ़िए- दोस्ती: क्या एक हो पाए अनचाहे रिश्ते में बंधे

‘‘आप को इस के भविष्य के लिए जो अच्छा लगे, करना. मैं इसे आप के सहारे छोड़ कर जा रही हूं…’’ और एक हिचकी के साथ महरू ने दम तोड़ दिया.

दीपाली जोरजोर से रोने लगी. बस्ती के बहुत से लोग जमा हो गए. रमेश ने दीपाली को हौसला दिया. महरू का अंतिम संस्कार कराने के बाद वे उसे अपने साथ ले आए.

महरू रमेश पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर चली गई थी. इस लड़की से वे क्या रिश्ता बनाएं? उम्र का भी इतना बड़ा फासला है. कैसे इस से शादी कर लें. बिना शादी किए किस रिश्ते से रखें? लोग क्या कहेंगे? कामवाली बाई की इतनी कम उम्र की लड़की की गरीबी का फायदा उठा कर शादी कर ली. फिर कानूनन वह नाबालिग थी.

बहुत सोचविचार के बाद रमेश ने दीपाली को गर्ल्स होस्टल में दाखिला दिला दिया. वह न केवल उन पर आश्रित थी, बल्कि उसे उन से लगाव भी था. मना करने के बाद भी वह खाना बनाने आ जाती थी. उन के और दीपाली के बीच बहुत सी बातें होतीं. एक तरह से रमेश उस के गार्जियन बन चुके थे.

दीपाली अब 18 साल से ऊपर की हो चुकी थी. अपनी पढ़ाई में बिजी होने के चलते वह आ नहीं पाती थी. अब तो  छुट्टी के दिन भी वह नहीं आ पाती थी.

रमेश को लगा कि दीपाली अब उन से कतराने लगी है.

एक दिन एक अनजान नंबर से फोन आया, ‘साहब, आप कैसे हैं?’

‘‘अरे, कौन…? दीपाली? मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो?’’ रमेश ने पूछा.

‘साहब, मैं ठीक हूं. क्या आप को मैं पसंद नहीं?’

‘‘ऐसा क्यों पूछ रही हो तुम?’’

‘तो फिर आप ने शादी के लिए क्यों नहीं कहा?’

‘‘देखो दीपाली, मैं तुम से प्यार करता हूं. शादी जिंदगीभर का बंधन होता है और मैं तुम से उम्र में भी बहुत बड़ा हूं. तुम्हें बाद में परेशानी होगी. फिर क्या करोगी?’’

‘मैं मैनेज कर लूंगी. आप के साथ मैं हमेशा खुश रहूंगी. एक लड़की को इस से ज्यादा क्या चाहिए. जो समस्या होगी, वह हम दोनों की होगी.

‘साहब, आप मन से सारे संकोच निकाल कर मुझे अपना लीजिए.’

‘‘तुम बालिग हो गई हो दीपाली. मेरी जिंदगी में तुम्हारा स्वागत है.’’

रमेश की मुरझाती जिंदगी में फिर से बहार आ गई. शादी के इतने साल बाद भी दीपाली रमेश को साहब ही कहती है.

अटूट प्यार- भाग 3: यामिनी से क्यों दूर हो गया था रोहित

यामिनी की जिंदगी अजीब हो गई थी. रोहित पर उसे बहुत गुस्सा आता. लेकिन वह उस की यादों से दूर जाता ही नहीं था. उस की आंखों से जबतब आंसू छलक पड़ते. किसी काम में जी नहीं लगता. वह कभी मोबाइल चैक करती, कभी टीवी का चैनल बदलती तो कभी बालकनी में जा कर बाहर का नजारा देखती.

हर पल वह रोहितरोहित कह कर पुकारती. पता नहीं रोहित तक उस की आवाज पहुंचती भी थी या नहीं? वह यामिनी को लेने लौट कर आएगा भी या नहीं? कहीं वह अपनी नई दुनिया न बसा ले. यामिनी के दिल में डर बैठने लगता. फिर वह खुद ही अपने दिल को समझाती कि रोहित ऐसा नहीं है. एक दिन जरूर लौट कर आएगा और उसे अपना बना कर ले जाएगा.

लेकिन जैसेजैसे समय बीत रहा था यामिनी का मन डूबता जा रहा था. उस की उंगलियां रोहित का मोबाइल नंबर डायल करतेकरते शिथिल हो गईं. हर दिन वह उस की कौल आने का इंतजार करती. लेकिन न तो रोहित का कौल आया, न ही वह खुद आया. 2 महीने तक फोन लगालगा कर यामिनी हार गई तो उस ने मोबाइल फोन को छूना भी बंद कर दिया. उसे नफरत सी हो गई मोबाइल फोन से. एक दिन गुस्से में उस ने रोहित का मोबाइल नंबर ही अपने मोबाइल फोन से डिलीट कर दिया.

ये भी पढ़ें- Romantic Story: चलो एक बार फिर से

दिन बीतते रहे. एक दिन यामिनी के पापा के तबादले की खबर आई. वह उत्तर प्रदेश पुलिस में कौंस्टेबल थे. तबादले की वजह से पूरा परिवार आगरा आ गया.

यामिनी के मन से रोहित की उम्मीद अब लगभग खत्म सी हो गई थी.

आगरा में आ कर यामिनी को लगा कि शायद अपनी बीती जिंदगी को भूलने में अब आसानी हो. वह अकसर सोचती, ‘आगरा में ताजमहल है. कहते हैं वह मोहब्बत का प्रतीक है. लेकिन सचाई तो सारी दुनिया जानती है कि वह एक कब्र है. सही माने में वह मोहब्बत की कब्र है. ऊपर से रौनक है जबकि भीतर में एक दर्द दफन है. तो क्या उस के प्यार का भी यही हश्र होगा?’

घर में यामिनी की शादी की बात जब कभी होती तो उस का मन खिन्न हो जाता. शादी और प्यार दोनों से नफरत होने लगी थी उसे. जो चाहा वह मिला नहीं तो अनचाहे से भला क्या उम्मीद हो? उस ने सब को मना कर दिया कि कोई उस की शादी की बात न करे.

यामिनी को आगरा आए हुए 1 साल बीत चुका था. रोहित 3 साल से जाने किस दुनिया में गुम था. वह सोचती, ‘क्या रोहित को कभी मेरी याद नहीं आती होगी? अगर उस का प्यार छलावा था तो मुझे भुलावे में रखने की क्या जरूरत थी? एक बार अपने दिल की बात कह तो देता. मैं दिल में चाहे जितना भी रोती पर उसे माफ कर देती. कम से कम मेरा भ्रम तो टूट जाता कि प्यार सच्चा भी होता है?’

जब से यामिनी आगरा आई थी वह कहीं आतीजाती नहीं थी. नई जगह, नए लोग और अपने अधूरे प्यार में जलती रहती. कहीं भी उस का मन नहीं लगता. लेकिन एक दिन मां की जिद पर उसे पड़ोस में जाना पड़ा, क्योंकि पड़ोस की संध्या आंटी की बेटी नीला को लड़के देखने वाले आ रहे थे.

मां को लगा कि शायद शादीविवाह का माहौल देख कर यामिनी का मन कुछ बहल जाए. नीला का शृंगार करने की जिम्मेदारी यामिनी को सौंपी गई. अपना साजशृंगार भूल चुकी यामिनी नीला को सजाने में इतनी मसरूफ हुई कि नीला भी उस के कुशल हाथों की मुरीद हो गई. उस की सुंदरता से यामिनी को रश्क सा हो गया. शायद उस में ही कमी थी जो रोहित उस की दुनिया से दूर हो गया.

लड़के वाले आ चुके थे. नीला का शृंगार भी पूरा हो चुका था. नीला की मां चाहती थीं कि वही नीला को ले कर लड़के के पास जाए. यामिनी का जी नहीं कर रहा था. लेकिन संध्या आंटी का जी दुखाने का उस का इरादा न हुआ. वह बेमन से नीला के कंधे पर हाथ रख कर हाल की ओर चल पड़ी.

ये भी पढ़ें- Short Story: एक कमरे में बंद दो एटम बम  

सामने सोफे पर बैठे लड़के को देख कर यामिनी गश खा कर गिर पड़ी. जिस का उस ने पलपल इंतजार किया, जिस के लिए आंसू बहाए, अपना सुखचैन छोड़ा और जो जाने क्यों चुपके से उस की जिंदगी से दूर चला गया था, वह बेवफा रोहित उस के सामने बैठा था, नीला के लिए किसी राजकुमार की तरह सज कर.

‘यामिनी… यामिनी…’ आंखें खोलो, तभी कोई मधुर आवाज यामिनी के कानों से टकराई. उस के मुंह पर पानी के छीटे मारे जा रहे थे. उस ने आंखें खोली. चिरपरिचित बांहों में उसे खुद के होने का एहसास हुआ.

‘‘आंखें खोलो यामिनी…’’ फिर वही मधुर आवाज हाल में गूंजी.

यामिनी के होंठ से कुछ शब्द फिसले, ‘‘तुम रोहित हो न?’’

‘‘हां यामिनी…मैं रोहित हूं.’’

यामिनी की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे. वह बोल पड़ी, ‘‘तुम ने मुझ से बेवफाई क्यों की रोहित? कहां चले गए थे तुम मुझे बिना बताए. मैं आज तक तुम्हें ढूंढ़ रही हूं. तुम्हारे दूर जाने के बाद मैं कितना रोई हूं, कितना तड़पी हूं, तुम क्या जानो. अगर तुम मुझ से दूर होना चाहते थे तो मुझे बता देना चाहिए था न. मैं ही पागल थी जो तुम्हारे प्यार में घुलती रही आज तक.’’

‘‘मैं भी बहुत रोया हूं…बहुत तड़पा हूं,’’ रोहित बोला. उस ने कहा, ‘‘क्या वह दिन तुम्हें याद है जब तुम अंतिम बार मुझ से मिली थीं?’’

‘‘हां,’’ यामिनी बोली.

‘‘उस दिन तुम्हारे जाने के ठीक बाद तुम्हारे पापा आए थे 4-5 लोगों के साथ. सभी पुलिस की वरदी में थे.’’

‘‘क्या…’’ हैरानी से यामिनी की आंखें फटी की फटी रह गई.

रोहित ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारे पापा ने कहा कि मैं तुम से कभी न मिलूं और तुम्हारी दुनिया से दूर हो जाऊं, नहीं तो अंजाम बुरा होगा. उन के एक सहकर्मी ने हम दोनों को एकसाथ पार्क में देख लिया था और तुम्हारे पापा को बता दिया था. इसीलिए तुम्हारे पापा बेहद नाराज थे. वे मुझे तुम से दूर कर तुम्हारी जल्द शादी कर देना चाहते थे. अब तुम्हीं बताओ यामिनी, मैं क्या करता? पुलिस वालों से मैं कैसे लड़ता वह भी तुम्हारे पापा से. तुम्हारी जिंदगी में कोई तूफान नहीं आए, इसीलिए तुम से दूर जाने के सिवा मेरे पास कोई उपाय नहीं था.’’

‘‘और इसीलिए मैं ने अपना सिम कार्ड तोड़ कर फेंक दिया और दिल पर पत्थर रख कर दिल्ली आ गया. दिल्ली में मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा. 1 साल के बाद मुझे बैंक में पीओ के पद के लिए चुन लिया गया. लेकिन मेरी जिंदगी में तुम नहीं थीं. इसीलिए खुशियां भी मुझ से रूठ गई थीं. हर पल मेरी आंखें तुम्हें ढूंढ़ती रहती थीं. लेकिन फिर खयाल आता कि तुम्हारी शादी हो गई होगी अब तक. यादों के सहारे ही जिंदगी गुजारनी होगी मुझे. पर न जाने क्यों, मेरा दिल यह मानता ही न था. लगता था कि तुम मेरे सिवा किसी और की हो ही नहीं सकती.’’

ये भी पढ़ें- Romantic Story: प्रेम की सूरत

‘‘कहीं तुम अब भी मेरा इंतजार न कर रही हो, इसीलिए हिम्मत कर तुम से मिलने इलाहाबाद गया ताकि सचाई का पता चल सके. पर तुम सपरिवार कहीं और जा चुकी थीं. तुम्हें ढूंढ़ने की हर मुमकिन कोशिश के बाद भी जब तुम नहीं मिलीं तो अपने चाचाचाची की जिद पर खुद को हालात के हवाले कर दिया. इसीलिए आज मैं यहां हूं. लेकिन अब तुम मुझे मिल गई. अब कोई मुझे तुम से जुदा नहीं कर सकता.’’

रोहित के मुंह से इन शब्दों को सुन कर यामिनी के दिल को एक सुकून सा  मिला. यामिनी को महसूस होने लगा कि सच में सच्चा प्यार अटूट होता है. लेकिन उस के पापा रोहित को धमकाने गए थे, यह जान यामिनी हैरत में थी. उसे अब रोहित पर गर्व हो रहा था, क्योंकि वह बेवफा नहीं था. वह चाहता तो यामिनी को ढूंढ़ने के बजाए पहले ही कहीं और शादी कर लेता.

मेरा कुसूर क्या है: भाग 2

लेखक- एस भाग्यम शर्मा

‘20 साल की लड़की 12 लोगों का खाना बनाती है और उस से उम्मीद की जाती है कि पूरे घर की साफसफाई,  झाड़ूपोंछा वही लगाए, पूरे घर वालों के कपड़े धोए, देवरों को पढ़ाए.’

ससुर अफसर थे, साथ में, पत्नी के नाम से इंश्योरैंस का काम भी करते थे. पत्नी तो पढ़ीलिखी नहीं थी, सो उस का काम भी मुझ से कराना चाहते हैं. इस के अलावा मुझे कालेज भी जाना पड़ता था अपनी पढ़ाई पूरी करने.’

मेरी मम्मी मेरी हालत जान कर परेशान होतीं और पापा से कहतीं, ‘मैं बात करूं?’

पापा कहते, ‘ऐसे तो संबंध बिगड़ जाएगा. हर बात की तुम्हें जल्दी पड़ी रहती है. शादी की भी जल्दी थी, अब बात करने की भी जल्दी है.’

और लोगों ने भी मम्मी को सम झाया कि जल्दबाजी मत करो. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

सब से बड़ी बात तो सासससुर को छोड़ो, मेरे पति ने सरकारी नौकरी को छोड़ कर निजी कंपनी में नौकरी कर ली.

इतने में मैं प्रैग्नैंट हो गई. मेरी तबीयत खराब रहने लगी. ऊपर से पढ़ाई और काम करना बहुत मुश्किल हो गया. पीहर वालों की प्रेरणा से किसी प्रकार से मैं ने परीक्षा की तैयारी की. गर्भ को पूरा समय था जब मैं ने एग्जाम दिया.

बहुत मुश्किल से गरमी के दिनों में भी एग्जाम देने जाती थी.

खैर, परीक्षा खत्म होने के हफ्तेभर बाद बेटा पैदा हुआ. उस के पहले मेरी सास ही नहीं, पति और देवर भी कहते थे कि हमारे घर में लड़की होने का रिवाज नहीं है. हमारे घर तो लड़के ही होते हैं. लड़कियां चाहिए भी नहीं.

इन बातों को सुन कर मु झे बहुत घबराहट होती थी.

ये भी पढ़ें- Romantic Story- पिया बावरा

मैं मम्मी से कहती, ‘मम्मी, यदि लड़की हो जाए तो ये लोग लड़ाई करेंगे?’ मम्मी परेशान हो जातीं.

वे लोग मु झे पीहर आने नहीं दे रहे थे पर मैं जिद कर के आ गई थी.

बेटा हुआ तो ससुराल वालों को सूचित किया गया. 5 मिनट के लिए सासुमां आईं.

इस के पहले मम्मी ने मेरी जन्मपत्री पंडितजी को दिखाई. उन्होंने बहुत सारे उपचार बताए. मम्मी ने सब पर खर्चा किया. पर उस से कुछ नहीं हुआ.

कोई और आया नहीं. न कोई खर्चा किया, न कोई फंक्शन. मम्मीपापा ने ही सारे खर्चे उठाए. मु झे विदा करते समय भी मम्मी ने बहुतकुछ दिया.

मम्मी नौकरी करती थीं, बावजूद छुट्टी ले कर सबकुछ करना पड़ा, जिस का मु झे बहुत दुख हुआ. ससुराल वाले आ कर मु झे ले गए.

बच्चा रोता तो उस को ले कर पति मुझे खड़े रहने को बोलते. ठंड में मैं बिना कपड़े के ही खड़ी रहती. इन परिस्थितियों में राजीव का ट्रांसफर छोटे गांव में हो गया. वे मु झे वहां ले कर गए.

यह ट्रांसफर राजीव ने जानबू झ कर कराया था ताकि मैं दूरदर्शन और आकाशवाणी में न जा सकूं.

वहां रोज मु झ से लड़ाई करते. सुबह ठंड के दिनों में 4 बजे उठ कर नहाने को कहते. ‘आज चौथ का व्रत है’, ‘आज पूर्णमासी है’, ‘आज एकादशी है…’ रोज कुछ न कुछ होता और मु झे व्रत रखने को मजबूर करते.

मु झे बहुत एसिडिटी होती थी. डाक्टर ने मु झे खाली पेट रहने को मना किया. पर मैं क्या कर सकती थी.

‘हमारे यहां तो सारी औरतें रखती हैं. तुम कोई अनोखी हो क्या? तुम्हें अपनी पढ़ाई का घमंड है.’

मैं जब भी अपनी मम्मी को चिट्ठी लिखती, तो राजीव कहते कि मैं पोस्ट कर दूंगा. मु झे लगता वे कर देंगे, मगर मम्मी ने मु झे बताया कि उन के पास कोई चिट्ठी ही नहीं आई.

मम्मी कोई चिट्ठी भेजतीं तो औफिस के पते पर पोस्ट करने को कहा जाता. मैं ने कहा कि घर के पते पर मंगाओ तो राजीव कहते कि यहां पर ठीक से पोस्टमैन नहीं आता.

मम्मी के पत्रों को भी मु झे नहीं दिया जाता. मेरे पत्रों को संदूक में बंद कर के ताला लगा जाते. इस का तो मु झे पता ही नहीं था.

एक दिन राजीव ताला लगाना भूल गए. मैं ने जो उसे खोल कर देखा तो सारे पत्र उस में थे. मु झे बहुत तेज गुस्सा आया. मैं ने राजीव से औफिस से आते ही कहा तो मु झे गालियां देने लगे और बुरी तरह से पिटाई भी की और बाहर से ताला लगा कर कहीं चले गए.

फिर मैं ने पड़ोसियों को आवाज दी और बोली, ‘‘मेरे पति मेरे सोते समय ताला लगा चले गए. अब उन के आने में देर हो रही है बच्चा रो रहा है. अब प्लीज आप ताला तोड़ दो.’’

कोई सज्जन पुरुष थे. उन्होंने ताला तोड़ दिया तो मैं उन्हें शुक्रिया कह कर जयपुर आ गई.

मम्मीपापा मु झे देख कर दंग रह गए. मेरी मम्मी को तो बहुत गुस्सा आया और वे खूब चिल्लाने लगीं. पापा मेरे सहनशील व्यक्ति थे.

ये भी पढ़ें- Social Story: यह कैसा बदला

उन्होंने कहा, ‘आकांक्षा की ससुराल में सूचित कर देता हूं. ऐसे मामले में जल्दबाजी ठीक नहीं.’

ससुराल वालों ने अपने बेटे की गलती को मानने के बदले मेरी सहनशीलता को दोष दिया. खैर, हम ने कुछ नहीं किया.

पापा बोले, ‘ऐसी स्थिति में बेटी को हम बीएड करा कर पैरों पर खड़ा कर देते हैं.’

मैं बीएड की तैयारी में लग गई.

राजीव का पत्र आया कि तुम आ जाओ, सब ठीक हो जाएगा. जब उन्हें पता चला कि मैं बीएड की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही हूं तो ससुराल वालों ने राजीव को हमारे घर पर भेजा.

‘अब मैं ठीक रहूंगा, तुम्हें कोई शिकायत का मौका नहीं दूंगा. तुम मेरे साथ आ जाओ. मैं तुम्हें नौकरी भी करने दूंगा,’ राजीव कहने लगे.

मैं ने उन से कहा, ‘बगैर बीएड किए मैं यहां से नहीं जाऊंगी.’

राजीव उस समय तो यहां से चले गए. फिर जहां नौकरी करते थे वहां के जिले में कोर्ट केस कर दिया, ‘मेरी पत्नी को मेरे साथ आ कर रहना चाहिए. मैं चाहता हूं वह मेरे साथ रहे.’

सब लोग कहने लगे, ‘वह इतना खराब तो नहीं है. उस ने कोई लांछन नहीं लगाया तुम्हारे ऊपर.’

मेरे घर वालों ने भी कहा कि हम भी ठीकठाक ही जवाब दे देते हैं. ऐसे रिश्ते को तोड़ना ठीक नहीं है. एक बच्चा भी  हो गया.’ मैं कोर्ट में गई. आमनेसामने देख कर सम झौते की बात करने लगा. वकील भी बोले, यही ठीक रहेगा. उस समय राजीव ने सारी बातें मान लीं.

तब सारे रिश्तेदारों ने मु झे सम झाया.

मेरी मम्मी तो ज्योतिष के चक्कर में पड़ गईं. बड़ेबड़े ज्योतिषाचार्य के पास गईं. सब ने कहा कि इस का यह उपचार करो, वह यज्ञ करो. यह दान दो वह दान दो. उस मंदिर में पूजा करो, वहां अर्चना करो…

ये भी पढ़ें- Family Story: चौराहे की काली 

Manohar Kahaniya: चित्रकूट जेल साजिश- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

चूंकि वारदात के समय कोरोना बीमारी के कारण 2 डिप्टी जेलर छुट्टी पर थे और जेलर व जेल अधीक्षक जेल के बाहर अपने आवास में थे, जबकि नियमत: उन में से किसी एक को जेल के भीतर होना चाहिए था.

इस से साफ हो गया कि कहीं न कहीं जानबूझ कर या अनजाने में लापरवाही हुई है. इसीलिए डीआईजी (जेल) संजीव त्रिपाठी की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने चित्रकूट जेल हत्याकांड मामले में चित्रकूट जेल के जेलर महेंद्र पाल व और जेल अधीक्षक श्रीप्रकाश त्रिपाठी को निलंबित कर दिया और उन के खिलाफ विभागीय काररवाई के भी आदेश दिए गए. साथ ही 3 अन्य जेल कर्मचारी संजय खरे, हरिशंकर राम और अमित कुमार को भी सस्पेंड किया गया.

उन की जगह अशोक कुमार सागर को चित्रकूट का नया जेल अधीक्षक बनाया गया. वहीं सी.पी. त्रिपाठी चित्रकूट जेल के नए जेलर बनाए गए.

लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था कि आखिर अंशुल ने मेराज व मुकीम काला की हत्या क्यों की? जेल के भीतर यह शूटआउट जिस तरह से हुआ था, उस से एक बात तो साफ थी कि किसी ने साजिश रच कर मेराज व मुकीम काला को जेल के भीतर मरवाया है और अंशुल को शूटर के तौर पर इस्तेमाल किया गया था.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: दो नावों की सवारी- भाग 1

मारे गए तीनों थे कुख्यात अपराधी

जिस तरह वारदात के समय अंशुल मुख्तार अंसारी का नाम बारबार ले कर उस के गैंग को खत्म करने की बात कर रहा था, उस से भी स्पष्ट था कि मुख्तार अंसारी के किसी दुश्मन ने उसे कमजोर करने के लिए इस काम को अंजाम दिया या फिर मुख्तार गैंग ने ही इस शूटआउट को अंजाम दिलवाया है.

शासन के आदेश पर डीआईजी (जेल) संजीव त्रिपाठी के अलावा चित्रकूट जिला पुलिस की जांच टीम के सीओ (सिटी) शीतला प्रसाद पांडेय, कोतवाल वीरेंद्र त्रिपाठी, एसआई रामाश्रय सिंह को मिला कर एक जांच दल गठित किया, जिस ने धीरेधीरे इन सवालों के जवाब तलाशने शुरू कर दिए.

इन तमाम सवालों के जवाब जानने से पहले हमें चित्रकूट जेल के शूटआउट में मारे गए तीनों अपराधियों के जुर्म का इतिहास खंगालना होगा.

अंशुल सीतापुर जिले के मानकपुर कुड़रा बनी का मूल निवासी था. पुलिस कस्टडी के दौरान अंशुल अपराध की दुनिया के सफर में अपने शामिल होने की जो कहानी सुनाता था, उस के मुताबिक सीतापुर में एक राजनैतिक पार्टी के नेता का बेटा उस की बहन से छेड़छाड़ करता था. ऐसी हरकत से मना करने पर उस नेता के बेटे ने गुंडई की. सरेआम पिटाई करने के बाद अंशुल पर गोली दाग दी.

नेता के बेटे द्वारा किए गए हमले में अंशुल के पैर में गोली लगी. जब वह शिकायत ले कर थाने गया तो थानाप्रभारी ने काररवाई करने से मना कर दिया. इस दौरान उस के पूरे परिवार का उत्पीड़न किया गया. इस उत्पीड़न की वजह से उस की भाभी को काफी तकलीफ उठानी पड़ी. इस दौरान भाभी का गर्भपात भी हो गया.

उस के बाद से अंशुल ने ठान लिया कि वह अब बदला ले कर ही रहेगा. अंशुल को फैजाबाद के एक नेता का वरदहस्त मिला, तब उस ने स्थानीय नेता के बेटे की हत्या कर इंतकाम की आग शांत की.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: सपना का ‘अधूरा सपना’

कालेज में हुआ था अपराधियों से संपर्क

अंशुल दीक्षित ने तब तक लखनऊ विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया था, जहां वह कई अपराधियों के संपर्क में आया और उसी की बदौलत उस ने अपना बदला भी लिया. लखनऊ यूनिवर्सिटी के पूर्व महामंत्री विनोद त्रिपाठी से उन दिनों उस की सब से गहरी दोस्ती थी. उसी की बदौलत अंशुल का अपराधियों के साथ नेटवर्क बना था.

लेकिन बाद में किसी विवाद में अंशुल ने ही 11 दिसंबर, 2008 को गोमतीनगर के नेहरू इनक्लेव में विनोद त्रिपाठी और उस के साथी गौरव की हत्या कर दी थी.

विनोद त्रिपाठी की हत्या के केस में छात्र नेता हेमंत सिंह, विपिन सिंह और अश्वनी उपाध्याय गवाह थे. हालांकि अंशुल के खौफ से विपिन और अश्वनी ने आधी गवाही के बाद ही पैर पीछे खींच लिए.

लेकिन हेमंत, अंशुल को सजा दिलाने पर अड़ा था. इसलिए अंशुल हेमंत को गवाही से पीछे हटाने के लिए जान से मारने की धमकी दे रहा था. इसी दौरान वह मुख्तार अंसारी के भी संपर्क में आया और उस के लिए छिटपुट काम भी किए.

सन 2008 में वह गोपालगंज (बिहार) के भोरे में अवैध असलहों के साथ पहली बार पकड़ा गया था. लेकिन 6 साल बाद 17 अक्तूबर, 2013 को पेशी से लौटते समय वह सीतापुर रेलवे स्टेशन पर सिपाहियों को जहरीला पदार्थ खिला कर फायर करते हुए फरार हो गया था. बाद में उस पर 50 हजार का ईनाम घोषित हुआ.

पुलिस कस्टडी से फरार होने के बाद 27 सितंबर, 2014 को अंशुल की भोपाल में मौजूदगी की सूचना पर एसटीएफ लखनऊ के दारोगा संदीप मिश्र उसे भोपाल क्राइम ब्रांच के साथ गिरफ्तार करने गए थे. लेकिन यहां भी अंशुल दीक्षित पुलिस पर फायरिंग करते हुए भाग निकला.

उस की गोली से दरोगा संदीप मिश्र तथा क्राइम ब्रांच (भोपाल) के सिपाही राघवेंद्र घायल हो गए थे.

बन गया मुख्तार अंसारी का शार्प शूटर

लेकिन पुलिस पर हमला करने के बाद एसटीएफ हाथ धो कर अंशुल के पीछे पड़ गई और 4 दिसंबर, 2014 को गोरखपुर की स्पैशल टास्क फोर्स ने अंशुल दीक्षित को गिरफ्तार कर लिया था.

पुलिस की गिरफ्त में आया अंशुल तब तक कई बड़ी वारदातों को अंजाम दे चुका था. तब तक उस की पहचान अपराध जगत में माफिया सरगना मुख्तार अंसारी का खास व उस के शार्प शूटर के रूप में बन चुकी थी.

गिरफ्तारी के बाद लखनऊ जेल से अंशुल को 30 सितंबर, 2018 को रायबरेली जेल लाया गया. अंशुल दीक्षित रायबरेली कारागार में करीब 50 दिन रहा. इतने दिनों में ही उस ने अपने साथियों के साथ मिल कर जेल के भीतर अनुशासन की धज्जियां उड़ा दी थीं.

यहां उस ने शातिर बदमाश दलशृंगार सिंह और सोहराब के साथ मिल कर कई वीडियो बनाए. इन वीडियो के बल पर वह जेल के अफसरों को ब्लैकमेल करने लगा. बात जब सिर के ऊपर से गुजरी तो उसे व उस के साथियों को 20 नवंबर, 2018 को प्रतापगढ़ जेल शिफ्ट कर दिया गया.

अंशुल ने यहां भी अपने कारनामे जारी रखे. और एक के बाद एक 6 वीडियो वायरल किए. इस के बाद उसे 9 दिसंबर 2019 को उत्तर प्रदेश की नई हाईटेक चित्रकूट जेल भेजा गया.

तब से वह इसी जेल में बंद था. अंशुल जल्द ही चित्रकूट जेल में रम गया और ठाठ से रहने लगा. बताया जाता है कि जेल में उस से मुलाकात करने वाले उसे बड़ी रकम दे कर जाते थे. जेल के सभी वार्डनों, डिप्टी  जेलर तथा उच्चाधिकारियों से उस की गहरी सांठगांठ हो गई थी.

ये भी पढ़ें- Crime- लव वर्सेज क्राइम: प्रेमिका के लिए

कुख्यात गैंगस्टर था मुकीम काला

अंशुल की तरह मुकीम काला भी कुख्यात अपराधी था. मुकीम काला शामली जिले के कैराना थाना क्षेत्र के जहानपुरा गांव का रहने वाला था. उस पर शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर के अलावा दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और हरियाणा में 61 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज थे.

इन में लूट, रंगदारी, अपहरण, फिरौती के 35 से ज्यादा मुकदमे थे. मुकीम काला के दूसरे भाई वसीम काला को सन 2017 में एसटीएफ ने मेरठ में मुठभेड़ में मार गिराया था.

अपराध की दुनिया में आने से पहले मुकीम काला करीब 12 साल पहले राजमिस्त्री का काम करता था. लेकिन बाद में अपराधियों के संपर्क में आ कर मुकीम काला पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कुख्यात गैंगस्टर बन गया. उस पर एक लाख रुपए का ईनाम भी रखा जा चुका था.

सपा सरकार में मुकीम काला का वेस्ट यूपी में जबरदस्त आतंक था. यूपी ही नहीं, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में भी उस के खिलाफ कई मामले दर्ज थे.

मुकीम काला ने हरियाणा के पानीपत में एक मकान में डकैती डाल कर पहली वारदात को अंजाम दिया. इस मामले में जेल गया. जेल में ही उस की मुलाकात सहारनपुर जिले के थाना गंगोह के मुस्तफा उर्फ कग्गा से हुई थी, जिस के बाद मुस्तफा उर्फ कग्गा ने उसे अपने गैंग में शामिल कर लिया. मुकीम के आने के बाद कग्गा का गैंग और मजबूत हो गया. पुलिस पर हमले करने के बाद यह गैंग रडार पर आया.

दिसबंर 2011 में पुलिस एनकाउंटर में मुस्तफा उर्फ कग्गा मारा गया. मुस्तफा की मौत के बाद मुकीम काला ने कग्गा के गैंग की बागडोर संभाल कर सरगना बन गया. काला के गैंग में 20 से अधिक बदमाश शामिल रहे.

इसी दौरान मुकीम काला भी मुख्तार के संपर्क में आया जो उस के धर्म से जुड़ा बड़ा माफिया होने के साथ एक सियासी रसूख वाला व्यक्ति भी था. मुख्तार के कहने पर काला ने कई वारदातों को अंजाम दिया.

ये भी पढ़ें- Crime: करीबी रिश्तो में बढ़ते अपराध

मुकीम काला जेल में बंद रहे या बाहर रहे, लेकिन अपने क्षेत्र कैराना में उस के नाम का इतना आतंक व्याप्त हो चुका था कि वहां रहने वाले हिंदू कारोबारियों से वह खुल कर रंगदारी वसूलने लगा. जो रंगदारी नहीं देता उसे मुकीम का गिरोह मौत के घाट उतार देता था.

उस की दहशत इतनी फैल गई कि कैराना में रहने वाले हिंदू परिवार वहां से डर के कारण पलायन करने लगे, जिसे 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बड़ा मुद्दा तक बनाया.

अगले भाग में पढ़ें2 जेलर आए शक के दायरे में

Satyakatha- डॉक्टर दंपति केस: भरतपुर बना बदलापुर- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

बात 28 मई की है. शाम के करीब पौने 5 बजे का वक्त रहा होगा. राजस्थान के भरतपुर शहर में डा. सुदीप गुप्ता अपनी पत्नी डा. सीमा गुप्ता के साथ कार से कुम्हेर गेट पर जाहरवीर मंदिर में दर्शन करने जा रहे थे. रोजाना शाम को मंदिर में जा कर दर्शन करना उन की दिनचर्या में शुमार था.

गुप्ता दंपति का शहर में काली की बगीची पर श्रीराम गुप्ता मेमोरियल हौस्पिटल है. इसी हौस्पिटल के ऊपरी हिस्से में वह अपने परिवार के साथ रहते थे. परिवार में डा. सुदीप की मां सुरेखा, पत्नी डा. सीमा और 18 साल का बेटा तथा 15 साल की बेटी थी.

डाक्टर दंपति 5 मिनट पहले ही अपने हौस्पिटल से मंदिर के लिए रवाना हुए थे. कार डा. सुदीप चला रहे थे. डा. सीमा उन के साथ आगे की सीट पर बैठी हुई थी. वह घर से करीब 750 मीटर दूर ही पहुंचे थे कि सरकुलर रोड पर नीम दा गेट के पास पीछे से आए एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों ने साइड से ओवरटेक कर अपनी बाइक उन की कार के आगे लगा दी.

सड़क के बीच बाइक रुकने से डा. सुदीप ने फुरती से कार के ब्रेक लगाए. सुदीप कुछ समझ पाते, इस से पहले ही बाइक से उतर कर दोनों युवक कार की ड्राइविंग साइड में डा. सुदीप की तरफ आए. इन में एक युवक ने लाल कपड़े से अपना मुंह ढक रखा था और दूसरे युवक ने न तो मास्क लगाया हुआ था और न ही हेलमेट पहना हुआ था.

ये भी पढ़ें- MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार

इन दोनों युवकों को डा. सुदीप पहचान नहीं सके. कार के सामने बाइक लगाने की वजह जानने के लिए डा. सुदीप ने अपनी कार के गेट का शीशा नीचे किया.

डा. सुदीप उन युवकों से सवाल पूछते, इस से पहले ही मुंह पर कपड़ा बांधे युवक ने अपनी पैंट में छिपी पिस्तौल निकाली. उस ने बिना कुछ कहेसुने डा. सुदीप की कनपटी के पास 2-3 गोलियां मार दीं. डा. सुदीप के पास आगे की सीट पर ही बैठी डा. सीमा कुछ समझती, इस से पहले ही उस युवक ने उसे भी गोलियों से भून दिया.

डाक्टर दंपति पर गोलियां चलाने के बाद उस युवक ने कुछ पल रुक कर यह तसल्ली की कि दोनों की मौत हुई या नहीं. इस के बाद डा. सुदीप को एक गोली और मारी. फिर सड़क के दोनों ओर से गुजर रहे लोगों को डराने के लिए पिस्तौल से हवा में गोलियां चलाईं.

दोनों युवक बाइक पर सवार हो कर भागने लगे, लेकिन बाइक स्टार्ट नहीं हुई. इस पर गोलियां चलाने वाले युवक ने धक्का दिया. बाइक स्टार्ट होने पर दोनों उस पर सवार हो कर यूटर्न ले कर भाग गए. भागते हुए भी उन्होंने पिस्तौल से हवा में गोलियां चलाईं.

गोलियां लगने से डा. सुदीप और सीमा अपनी कार में ही लुढ़क गए. शहर के सब से प्रमुख रोड पर दिनदहाड़े हुई इस वारदात के समय सड़क के दोनों ओर वाहन लगातार आजा रहे थे, लेकिन किसी ने भी न तो बदमाशों को रोकने की हिम्मत की और न ही उन का पीछा किया. इसीलिए दोनों युवक जिस तरफ से आए थे, बाइक से उसी तरफ भाग गए. यह वारदात वहां आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद जरूर हो गई.

खास बात यह हुई कि डाक्टर दंपति को सरेआम गोलियां मारने की वारदात लौकडाउन के दौरान हुई. कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए पूरे राजस्थान में अप्रैल महीने के तीसरे सप्ताह से ही लौकडाउन लगा हुआ था. लौकडाउन में हालांकि आम लोगों के घर से निकलने पर रोक लगी हुई थी, लेकिन फिर भी लोग किसी न किसी बहाने घर से बाहर निकलते ही थे. हरेक चौराहों के अलावा जगहजगह पुलिस तैनात रहती थी. इतनी सख्ती होने के बावजूद दोनों युवक पिस्तौल से गोलियां चलाते हुए भाग गए और पुलिस को पता भी नहीं चला.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: चाची का आशिक- भाग 1

दोनों युवकों के भागने के बाद आसपास के लोग मौके पर एकत्र हो गए. उन्होंने कार में लुढ़के पड़े डा. सुदीप और उस की पत्नी सीमा को पहचान लिया और पुलिस को सूचना दी. कुछ ही देर में पुलिस पहुंच गई. मौके पर एकत्र लोगों ने बताया कि ये डा. सुदीप और उस की पत्नी है. पुलिस ने लोगों की मदद से दोनों को कार से निकाला और तुरंत अस्पताल ले गए. अस्पताल में डाक्टर दंपति को मृत घोषित कर दिया.

दिनदहाड़े डाक्टर दंपति की हत्या की घटना से शहर में दहशत फैल गई. पुलिस के अफसर मौके पर पहुंच गए. शुरुआती जांचपड़ताल में ही साफ हो गया कि डाक्टर दंपति की हत्या बदला लेने के लिए की गई थी.

डाक्टर दंपति के खौफनाक अंत के पीछे की कहानी इस से भी ज्यादा खौफनाक है. उस कहानी तक ले चलने से पहले आप को बता दें कि डा. सुदीप की एक प्रेमिका थी. उस का नाम था दीपा गुर्जर. दीपा के 6 साल का बेटा शौर्य था.

अगले भाग में पढ़ें- क्या दीपा का भाई  फायरिंग की घटना में शामिल था?

मजाक: आज ‘चड्डी दिवस’, कल ‘बनियान दिवस’

लेखक- रामविलास जांगिड़

एक दिन का ‘फादर डे’ भी निबट गया और एक दिन का ‘योगा डे’ भी. फादर नाम के जीव को फिर से वृद्ध आश्रम में जमा करा दें और योगा को भोगा में बदलने का रोगा पाल लें. दोनों का इस्तेमाल कर लिया, फेसबुक पर डाल दिया, ह्वाट्सएप पर सरका दिया, सैल्फीफैल्फी भी ले ली, अब आगे और भी दिन आने वाले हैं, उन की तैयारी में लगना है.

तत्काल इन ‘डेजों’ को लात मार कर ऐसे ही भगाते रहना है. कब तक इन के पीछे पड़े रहेंगे. हमें और भी तो कई दिन मनाने हैं. ‘फादर डे’ पर सैल्फी ले ली है, अब कोई प्राण थोड़े ही देने हैं?

एक दिन का ‘योगा डे’ भी मना लिया बस. रोज योगा करते रहेंगे तो फेसबुक ह्वाट्सएप कौन चलाएगा? सब से ज्यादा जरूरी फेसबुक, ह्वाट्सएप ही हैं. इन के साथ ही हर दिन मनाने के अलगअलग रंगढंग. इन के अलावा संसार में कुछ भी नहीं है. सामने दीवार पर टंगी फादर की तसवीर से नजरें हरगिज न मिलाएं. इन की नसीहतें कौन झेलेगा?

सुबह जल्दी से 10 बजे उठ जाएं. अब बिस्तर के सामने दिखाई देने वाले शौचालय तक पैदल ही जाएं. पैदल चलने के बड़े फायदे होते हैं. नंगे पैर जाएं. इस से आप को उत्तम लाभ होगा.

ये भी पढ़ें- Romantic Story: सच्चा प्रेम

शौचालय में अपना मोबाइल फोन ले जाएं. वहीं पर जरूरी चैटिंग साधना पूरी करें. जरूरी ज्ञानबाजी मोबाइल पर फौरवर्ड करें. इस के बाद धीरेधीरे कमरे से बाहर निकलें और उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोहा, फाफड़ा, जलेबी वगैरह के साथ बड़ा वाला कप चायकौफी का नाश्ता डकारें.

इस के बाद पेट वाली डकार हरगिज न लें. कचौरी, समोसा वगैरह ले लें. इतना कर लेंगे तो थकना लाजिमी होगा. इसी समय तुरंत ही पलंग पकड़ लें और दोनों हाथों में अपना वही मोबाइल कस लें.

मोबाइल में योग और ध्यान करने के बहुत सारे मैसेजों को इधरउधर फेंकना शुरू करें. ह्वाट्सएप यूनिवर्सिटी में ज्ञान की बातों को समूहों में सप्लाई कर दें. ऐसा करते हुए आप बुरी तरह थक जाएंगे. अब फादर की तसवीर अपने पीछे रखते हुए सीधे लंच पर टूट पड़ें. दाल, चावल, रोटी, दही, सलाद, रायता, पपड़ी, चटनी, अचार, गुलाब जामुन, रसगुल्ला जोजो भी याद आए, वह सब अपने शरीर में जमा कर लें.

शास्त्रों में कहा गया है कि खायापिया ही अंग लगता है, बिना खाए जंग लगता है, इसलिए खाइए उठिए, उठिए खाइए. उठउठ कर खा जाइए, खा कर फिर खाने के लिए उठ जाइए. अभी पोस्ट लंच, प्री डिनर, डिनर और पोस्ट डिनर में आइसक्रीम, लस्सी, कौफी, दाल मखानी, कड़ाही पनीर, परांठा, पनीर टिक्का वगैरह से मन बहलाएं.

ये भी पढ़ें- Short Story: भटका हुआ आदमी

अब समय रात हो गई है और रात में टहलना बहुत जरूरी होता है. बिस्तर से सोफा और सोफे से टीवी तक चल पड़िए. टीवी से किचन तक टहल लीजिए. रात में नंगे पैर न घूमें. चप्पल पहन लें. हाथों में मोबाइल कस कर पकड़े रहिए. कानों पर हैडफोन चढ़ा लीजिए. चैट, सैट, मैट का आखेट कीजिए.

आज ‘बरमूडा दिवस’ है, उस की सैल्फी खींचखांच कर फेसबुक पर टांगते रहिए. दिन, महीने, साल ऐसे ही गुजारते रहिए. आज ‘चड्डी दिवस’, कल ‘बनियान दिवस’. सैल्फियाते रहिए. जब चादर ओढ़ कर सो जाएं तो मोबाइल को फिर कस कर पकड़ लीजिए. ऐसे ही धरती पर बोझ बनते हुए देर रात स्पैशल चैटिंगें करते रहिए. आज रात 2 बजे जल्दी सो गए? अच्छी आदत है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें