भ्रष्टाचार की बीमारी सरकारी योजनाओं में सेंधमारी

मसला

अमला है सरकारी जिस को एक धुन है,

लूटना, खाना ही जिस का खास गुन है.

आम जनता की कमाई भरी जिस में,

इस सड़े गोदाम में चूहे और घुन हैं.

ये लाइनें टैक्स देने वालों के पैसे के बल पर चल रही सरकारी स्कीमों में मची सेंधमारी पर मोजूं लगती हैं. आजादी के बाद से गरीबों, नौजवानों, औरतों व किसानों के नाम पर केंद्र व राज्यों की सरकारों ने बहुत सी योजनाएं चलाईं. पैसे की नहरें बहाईं, लेकिन पानी आखिरी छोर तक नहीं पहुंचा. लिहाजा, नतीजा वही ढाक के तीन पात. देश में करोड़ों लोग आज भी गरीबी की चपेट में हैं. साथ ही, बहुत सी समस्याएं बरकरार व भयंकर हैं.

कारण हैं खास

तालीम की कमी, नशा, अंधविश्वास व निकम्मापन गरीबी की सब से खास वजहें हैं, लेकिन गरीबों के लिए चल रही सरकारी योजनाओं का बेजा इस्तेमाल भी इस की एक बड़ी वजह है. नतीजतन, सरकारी अमले में गले तक रचाबसा भ्रष्टाचार का दलदल है, इसलिए ज्यादातर सरकारी स्कीमें गरीबी दूर करने में बेअसर, नाकाम व बिचौलियों के लिए चारागाह साबित हुई हैं. इन की बदौलत भ्रष्ट नेताओं, अफसरों व मुलाजिमों ने अकूत दौलत इकट्ठी की है.

जिन के कंधों पर जरूरतमंदों के लिए चल रही योजनाओं के तहत राहत पहुंचाने की जिम्मेदारी है, वे अपना फर्ज व जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा कर अपनी जेबें भरने में लगे रहते हैं. वे किसी को कानोंकान खबर नहीं देते, इसलिए बहुत कम लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी हो पाती है. सरकारी महकमे अपने दफ्तरों के बाहर चल रही योजनाओं में जनता के लिए दी जा रही छूट, कर्ज व सहूलियतों वगैरह का ब्योरा नहीं लिखवाते.

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सरकारी मुलाजिम कहीं किसी जरूरतमंद का फार्म भरवाने में मदद नहीं करते, उलटे उन्हें जराजरा से काम के लिए बारबार दफ्तरों के चक्कर कटवाते हैं. नतीजतन, बहुत से लोग या तो दलालों की शरण में जा कर अपनी जेब कटवाते हैं या थकहार कर घर बैठ जाते हैं.

ज्यादातर गरीब भोले, नावाकिफ व कम पढ़ेलिखे हैं. उन्हें अपने हकों व सरकारी स्कीमों की जानकारी नहीं है. वे सरकारी राहत व इमदाद पाने की खानापूरी भी नहीं कर पाते और उन में से ज्यादातर लोग सरकारी सहूलियतों से बेदखल रह जाते हैं. उन की जगह दूसरे लोग सांठगांठ कर के उन का हिस्सा हड़पने में कामयाब हो जाते हैं.

बिगड़ैल अमला

सरकारें हर साल अरबों रुपए बहुत सी योजनाओं में खर्च करती हैं, लेकिन उन का एक बड़ा हिस्सा वे गटक जाते हैं, जो चील, गिद्ध, कौवों की तरह ताक में लगे रहते हैं. मसलन, बहुत से लोग आज भी बेघर हैं. वे किसी तरह अपना सिर छिपाने के लिए फूंस के छप्पर, खपरैल व मिट्टी से बने कच्चे घरों में रहते हैं. ऐसे गरीब लोगों को पक्का घर मुहैया कराने की गरज से साल 2016-17 में प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की गई थी, लेकिन चालाक, मक्कार व दलाल लोग मुलाजिमों की मदद से इस में भी गड़बड़ी करने में कामयाब हो गए.

इस योजना से फायदा उठाने वालों के लिए तयशुदा शर्तें रखी गई थीं, लेकिन योजनाओं को लागू करने का जिम्मा तो सब से नीचे के मुलाजिमों पर होता है और वे अपना घर भरने के लिए मनमानी बंदरबांट करने लगते हैं. उन की नकेल कसने वाले भी अपने हिस्से के लालच में उन से मिल जाते हैं, इसलिए वे भी उन्हें चैक करने के बजाय अपनी आंखें मूंद लेते हैं.

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कुलमिला कर भ्रष्ट व निकम्मे सरकारी मुलाजिमों की मिलीभगत व मनमानी की वजह से अकसर गरीबों की जगह उन अमीरों को भी लिस्ट में शामिल कर लिया जाता है, जो असल में राहत या इमदाद पाने के हकदार नहीं होते. बाद में जब कहीं कोई शिकायत होती है, तो पोल खुलती है और जांचपड़ताल में गड़बड़ी पाई जाती है.

यही उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी हुआ. वहां प्रधानमंत्री आवास योजना में जिले के 1,884 लोगों में 534 लोग अपात्र यानी गलत पाए गए. सिर्फ किसी एक इलाके या किसी एक योजना में ही पलीता लगाया जा रहा है, ऐसा नहीं है. अपवाद छोड़ कर सरकार की ज्यादातर योजनाओं में लूटखसोट व बंदरबांट चल रही है, इसलिए हांड़ी का एक चावल देख कर ही बाकी सब का पता लग जाता है.

घपले और घोटाले

किसान सम्मान निधि योजना में  10 करोड़ किसानों के बैंक खातों में  6-6 हजार रुपए भेजने का दावा किया जा रहा है, लेकिन इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश में 1-2 नहीं, पूरे 14,000 लोग अपात्र पाए गए हैं. इन में से 1,200 किसान अकेले गोंडा जिले के हैं. राज्य सरकार ने इस पर कड़ा कदम उठाया है.

गरीब किसानों के लिए चली इस स्कीम में जिन्होंने बेजा तरीकों से सेंधमारी कर के सरकारी पैसा हड़पा ,वे अब उस रकम को सरकारी खजाने में वापस जमा करेंगे.

खेती महकमे ने चेताया है कि जिन लोगों ने गलत तरीके से किसान सम्मान निधि का पैसा लिया है, वे फौरन उसे वापस जमा कर दें, वरना उन से जुर्माने समेत वसूली की जाएगी.

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब व उत्तर प्रदेश में गरीब छात्रों को दिए जाने वाले वजीफे में हुए करोड़ों रुपयों की गड़बड़ी की जांच चल रही है.

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5 साल पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पिछले दिनों फर्जी छात्र व फर्जी कालेज दिखा कर सरकारी वजीफे के  6 करोड़ रुपए हड़पे गए थे. यह मामला बरसों तक माली जरायम केसों की जांच करने वाली पुलिस के पास रहा. अब कुसूरवार अफसरों पर मुकदमा कायम करने के लिए मंजूरी मांगी गई है.

इस के बाद साल 2018 में इटावा और मेरठ जिलों में स्कौलरशिप हड़पने के 109 मामले पकड़े गए थे, जिन पर एफआईआर दर्ज कराई गई थी. कमोबेश यही हाल विधवा पैंशन व बुढ़ावा पैंशन स्कीमों का है.

सरकारी योजनाओं में मिली रकम अब सीधे गरीबों के बैंक खातों में जाती है, लेकिन गड़बड़घोटाले करने वाले तरकीब व तरीके का तोड़ निकाल ही लेते हैं. इन का पूरा गिरोह मिलीभगत से काम करता है. कंप्यूटर में लाभार्थी की डिटेल फीड करते वक्त जानबूझ कर बैंक खातों का नंबर बदल दिया जाता है, इसलिए जो सरकारी सहूलियतें पाने के हकदार हैं, वे पीछे छूट जाते हैं और जो असरदार, चालबाज या छुटभैए नेता या उन के चमचे, चेलेचपाटे बेजा फायदा उठाने में कामयाब हो जाते हैं.

सरकारी योजनाओं में सारे असल गरीबों को इमदाद नहीं मिलती. यह बात यहीं खत्म नहीं होती. एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा यह कि उन के साथ चौतरफा बेजा बरताव भी होता है. सहूलियतें देने का लौलीपौप दिखा कर काम कराने के नाम पर उन से मोटी रकम वसूली जाती है और बाद में उन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता है, इसलिए ज्यादातर गरीब बेचारे ठगे से देखते हुए रह जाते हैं.

ठगी पहले कदम से

सरकारी योजनाओं में गरीबों को लूटने का सिलसिला फार्म भरने के पहले पायदान से ही शुरू हो जाता है. कर्ज व छूट का फार्म भरवाने व बाद में मिलने वाली रकम का लालच दे कर दलाल पहले ही अपना हिस्सा झटक लेते हैं. बीते लौकडाउन के दौरान ऐसे बहुत से लोगों के कामधंधे बंद हो गए थे, जो रोज कमा कर खाते थे, इसलिए वे बेहद परेशान थे.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना के इश्तिहार अखबारों में छपे थे. इस में ठेलेखोमचे आदि लगाने वालों को 10,000 रुपए का कर्ज मिलने का दावा किया गया था. सरकार ने मेरठ में 65,000 लोगों को इस स्कीम का फायदा देने का मकसद तय किया था. इस के उलट नगरनिगम के मुलाजिमों ने बीते 4 महीने में सिर्फ 18,745 लोगों का ही रजिस्ट्रेशन किया.

गौरतलब है कि उस में से केवल 6,815 फार्म ही बैंकों को भेजे गए. जब लीड बैंक से इस बाबत जानकारी की गई, तो पता लगा कि उन को 5,606 फार्म मिले. 209 फार्म बीच में कहां गायब हो गए, यह कोई नहीं जानता. और सुनिए, इन में से सिर्फ 1,036 फार्म ही कर्ज मंजूरी की सिफारिश करने लायक पाए गए, लेकिन कितनों को पैसा मिला, यह किसी को भी पता नहीं है.

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कड़वा सच

मेरठ में फलों की रेहड़ी लगा रहे किशनपुरा के दिनेश से जब इस लेखक ने बात की, तो उस ने बताया कि एक आदमी खुद को सरकारी मुलाजिम बता कर फार्म भरने के नाम पर उस से 200 रुपए ले गया. फिर उस के बाद क्या हुआ, यह आज तक पता नहीं चला.

इस ठगी का शिकार दिनेश अकेला नहीं है. आइसक्रीम बेच रहे मंशा, फूल बेचने वाले नंदू व जूस निकालने वाले फुरमान ने बताया कि उन्हें आज भी इंतजार है कि शायद कुछ इमदाद जरूर मिलेगी. हालांकि उन के पास कोई रसीद या फार्म भरने वाले का नामपता नहीं है. तालीम व जानकारी की कमी से बहुत

से गरीब लोग आएदिन ठगी के शिकार होते हैं.

यह है हल

सरकारी योजनाओं में पसरी लूटखसोट बंद करने के लिए जरूरी है कि योजनाओं का प्रचारप्रसार कारगर तरीकों से किया जाए. असली हकदार लोगों को छांट कर उन की पहचान लिस्ट बनाते वक्त पूरी जांचपड़ताल सही तरीके से की जाए. साथ ही, उन्हें जागरूक किया जाए. अपनी जेब भरने के लालच में गड़बड़ी करने वाले मुलाजिमों की जवाबदेही तय की जाए. घपलेघोटालों की जांच जल्दी पूरी की जाए. दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी जाए, साथ ही, उन से ब्याज व जुर्माने समेत सरकारी पैसों की वसूली की जाए.

गरीबों की स्कीमों में घुसपैठ करने वाले अमीरों पर भी तगड़ा जुर्माना लगे और उन के नाम व फोटो इश्तिहारों में सार्वजनिक किए जाएं. हर योजना का पब्लिक औडिट हो, ताकि गड़बड़ी करने वालों पर कारगर नकेल कसी जा सके, वरना सरकारी स्कीमों में गरीबों के हक पर अमीरों की सेंधमारी आगे भी इसी तरह जारी रहेगी.

बिहार : सरकारी नौकरियों की चाहत ने बढ़ाई बेरोजगारी

धीरज कुमार

प्रदेश की राजधानी पटना में तकरीबन सभी जिलों के लड़केलड़कियां अलगअलग शहर के कोचिंग सैंटरों में अपना भविष्य बेहतर करने की उम्मीद में भागदौड़ करते देखे जा सकते हैं. उन की एक ही ख्वाहिश होती है कि किसी तरह से प्रतियोगिता परीक्षा में पास कर सरकारी नौकरी हासिल करना.

बहुत से लड़केलड़कियां अपना भविष्य बनाने की चाह में पटना जैसे शहरों में कई सालों से टिके होते हैं, फिर भले ही उन के मातापिता किसान हैं, रेहड़ी चलाने वाले हैं, छोटेमोटे धंधा करने वाले हैं. उन की थोड़ी आमदनी भी होगी, लेकिन वे अपने बच्चे के उज्ज्वल भविष्य के लिए पैसा खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, चाहे इस के लिए खेत बेच कर, कर्ज ले कर, गहने गिरवी रख कर कोचिंग सैंटरों में लाखों रुपए क्यों न बरबाद करना पड़े.

कोचिंग सैंटर वाले भी इस का भरपूर फायदा उठा रहे हैं. ज्यादातर कोचिंग सैंटर सौ फीसदी कामयाबी का दावा कर लाखों का कारोबार करते हैं, भले ही उन की कामयाबी की फीसदी जीरो के बराबर हो.

अब सवाल यह कि किसी सरकार के पास इतने इंतजाम हैं, जो सभी नौजवानों को नौकरी मुहैया करा देगी? इस सवाल के जवाब के लिए पिछले तकरीबन 10 सालों की  प्रमुख रिक्तियों और बहालियों का विश्लेषण किया गया. राज्य सरकार ने साल 2010 में बिहार में पहली बार शिक्षक पात्रता परीक्षा (टेट) का आयोजन किया था. इस परीक्षा में 26.79 लाख लोगों ने आवेदन किया था, जिन में से मात्र 1.47 लाख अभ्यर्थियों को पास किया गया. इस में कामयाबी का फीसदी मात्र साढ़े 5 फीसदी था. राज्य सरकार ने उन सफल अभ्यर्थियों में से तकरीबन एक से सवा लाख लोगों को नियोजन किया.

उस समय शिक्षकों को सरकार ने  जो बहाली की, उन्हें नियोजन यानी आउटसोर्सिंग पर रखा गया, जिन को सरकार नियत वेतन देती है. नियमित शिक्षकों की तरह वेतन व अन्य सुविधाएं नहीं देती है. हां, चुनाव के समय कुछ पैसे बढ़ा कर वोट बैंक के लिए खुश करने की कोशिश की जाती है.

आज उन्हीं शिक्षकों ने कानून का दरवाजा खटखटा कर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ी, ताकि उन्हें पुराने शिक्षकों की तरह दूसरी सुविधाएं मिलें. लेकिन वे सरकार और अदालत के चक्रव्यूह में फंस कर हार गए.

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी दलील पेश की है कि स्थायी बहाली नहीं होंगी. पहले की हुई स्थायी बहाली को वर्तमान सरकार डाइंग कैडर यानी मृतप्राय मान चुकी है.

इस का मतलब यह है कि अब जो भी बहाली होगी, वह सिर्फ नियत वेतन पर रखा जाएगा. अब पुरानी बहाली की तरह ईपीएफ, बीमा, पैंशन, ग्रेच्युटी, स्थानांतरण, अनुकंपा पर नौकरी देने का प्रावधान आदि की सुविधाएं खत्म कर दी गई हैं.

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जबकि गैरसरकारी संस्थाओं में आज भी ऐसी सुविधाओं में से कुछ ही दी जाती हैं. यही वजह है कि मेहनत करने वाले लोग प्राइवेट संस्थाओं को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, लेकिन इस के बावजूद भी कुछ  लोग अभी तक यह नहीं समझ पाए हैं कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागना फायदेमंद है या नुकसानदायक.

बिहार सरकार स्टाफ सिलैक्शन कमीशन (एलडीसी) 2014 में  तकरीबन 13,000 पदों की बहाली के लिए परीक्षा का आयोजन किया गया. इन पदों पर बहाली के लिए तकरीबन  13 लाख  अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था. कई बार यह परीक्षा रद्द की गई. इस परीक्षा को टालते हुए लगभग  5-6 साल बीत जाने के बाद भी अभी उस की बहाली पूरी नहीं की गई है. अगर रिक्तियों के अनुपात में बहाली की संख्या को देखा जाए तो इस परीक्षा में महज  1 फीसदी अभ्यर्थियों का चयन किया जाना है.

बिहार सरकार जानबूझ कर कोई भी बहाली को कम समय में पूरा नहीं करती है, बल्कि उसी बहाली को कई सालों में चरणबद्ध तरीके से पूरा करने की कोशिश करती है, ताकि समय लंबा खिंचे. इस से अभ्यर्थी धीरेधीरे कम होंगे और सरकार के एजेंडे का प्रचारप्रसार ज्यादा होगा. इस तरह सरकार को ज्यादा फायदा मिलेगा. ऐसी प्रक्रिया में कुछ अभ्यर्थियों की तो उम्र भी निकल जाती है, जिस के कारण वे बहाली से पहले ही छंट जाते हैं.

साल 2019 में बिहार पुलिस में कांस्टेबल के 11,880 पदों पर बहाली होनी थी, जिस में तकरीबन 13 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन दिए थे. अभ्यर्थियों के अनुपात में यह महज एक फीसदी से भी कम बहाली की गई. इस के साथ ही कई अन्य छोटीमोटी बहालियां हुईं जैसे दारोगा की बहाली, नर्स की बहाली, पशुपालन विभाग में बहाली वगैरह. इन सभी पदों की बहाली में सीटें कम थीं. इन 10 सालों की बहाली में तकरीबन छोटीबड़ी सभी बहालियां मिला कर तकरीबन डेढ़ से 2 लाख अभ्यर्थियों की बहाली हुई होगी.

ऊपर मोटेतौर पर 2-3 परीक्षाओं का जिक्र किया गया. गौर करने की बात  यह है कि तीनों परीक्षाओं  में तकरीबन 50 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया, जिन में से तकरीबन 2 लाख लोगों को नौकरी मिल गई.

बिहार के नौजवानों की यह खासीयत है कि एकसाथ कई परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. अगर मान लिया जाए कि तीनों परीक्षा में कुछ लोग समान रूप से सम्मिलित हुए हों, तो तकरीबन 30 से 35 लाख नौजवान 10 सालों में बेरोजगार रह गए यानी उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल पाई.

राज्य और केंद्र सरकार द्वारा युवाओं में स्किल पैदा करने के लिए ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के तहत कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. लेकिन इन प्रशिक्षण केंद्रों पर प्लेसमैंट की योजना नहीं होने के चलते ये सभी कार्यक्रम कागजों पर ही रह गए हैं. इसी तरह नौकरी से वंचित लोगों की वजह से बेरोजगारों की तादाद काफी बड़ी हो जाती है. उन में से ज्यादातर लोग घर छोड़ कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं. स्किल की कमी में कम तनख्वाह पर बाहरी राज्यों में काम करना पड़ता हैं.

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नीतीश सरकार अपने शुरू के कार्यकाल में बेरोजगारी दूर करने और रोजगार बढ़ाने के लिए बाहरी राज्यों के गैरसरकारी संस्थाओं को बिहार में आमंत्रित कर नियोजन मेला का आयोजन करती थी, जिस का मीडिया में काफी प्रचारप्रसार भी किया जाता था. इस में दूसरे राज्यों के धागा मिल, कपड़ा मिल, बीमा कंपनियां, सिक्योरिटी कंपनी, साइकिल कंपनी, मोटर कंपनी वगैरह छोटीबड़ी तकरीबन 20-22 कंपनियां हर जिले में आ रही थीं. उस में 18 से 25 साल की उम्र के लड़के और लड़कियों को रोजगार देने का काम किया जाता था. लेकिन लोगों ने गैरसरकारी कंपनी होने के चलते रोजगार हासिल करने में जोश नहीं दिखाया, इसलिए सरकार को वह कार्यक्रम बंद करना पड़ा.

केंद्र सरकार की ओर से की जाने वाली बहाली जैसे रेलवे, बैंक वगैरह में कम कर दी गई हैं या तकरीबन रोक दी गई हैं. फिर भी बिहार के छोटेबड़े शहरों में तैयारी करने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है, बल्कि इजाफा ही हुआ है.

साल 2001 से साल 2005 के बीच बिहार सरकार ने 11 महीने के लिए राज्य में शिक्षामित्रों की बहाली की थी. यह बहाली मुखिया द्वारा की गई थी, जिन का मासिक वेतन मात्र 1,500 रुपए था. बाद में आई सरकार ने उन के मासिक वेतन में बढ़ोतरी 3,000 रुपए कर दी. साल 2015 में  वर्तमान सरकार शिक्षकों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए वेतनमान तो लागू कर दिया, पर आज भी पुराने शिक्षकों की तरह सुविधाओं से वंचित रखा गया है.

आज सरकार हजार डेढ़ हजार रुपए पर किसी भी तरह की बहाली निकालती है, तो लोगों की भीड़ लग जाती है. लोगों का मानना है कि पहले सरकारी दफ्तर में किसी तरह से घुस जाओ. आने वाले समय में सरकार अच्छस वेतन दे ही देगी. इसी का नतीजा है कि बिहार में तकरीबन ढाई लाख रसोइया विद्यालयों में इस उम्मीद में काम कर रही हैं कि आने वाले दिनों में सरकार अच्छा वेतन देगी.

सरकारी नौकरियों के पीछे भागने की खास वजह यह रही है कि इस में मेहनत कम करनी पड़ती है. इस के उलट गैरसरकारी दफ्तरों में काम ज्यादा करना पड़ता है.

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बिहार में खेती लायक जमीन होते हुए भी लोगों का खेतीबारी के प्रति मोहभंग होता जा रहा है. इस के पीछे बाढ़, सुखाड़ और नवीनतम कृषि उपकरणों की कमी होना भी है, जिस के कारण लोगों के पास एकमात्र विकल्प सरकारी तंत्र में नौकरियों की तलाश करना रह जाता है.

नौजवानों को चाहिए कि सरकारी नौकरियों के पीछे भागने के बजाय वे अपने अंदर हुनर पैदा करें. इस पर अपने पौजिटिव नजरिए को विकसित करने की जरूरत है. कोई भी नया हुनर सीख कर अपने कामधंधे में लगा जा सकता है और अपने परिवार के लिए सहारा बना जा सकता है.

सोशल मीडिया की दोस्ती से आप हो सकते हैं तबाह, पढ़ें पूरी खबर

संपूर्ण देश दुनिया सहित छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया के माध्यम से सेक्स संबंध बनाए जाने और बाद में धोखा देने की घटनाएं हो रही है. आए दिन ऐसी घटनाएं हमारे आसपास घटित हो रही है कि फेसबुक, व्हाट्सएप आदि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म के माध्यम से युवक-युवतियों में बातचीत शुरु होती है, संबंध बनते हैं, मुलाकातें होती हैं, और धीरे धीरे स्थिति सेक्स संबंध स्थापित करने तक पहुंच जाती है. और फिर शुरू होता है लड़की का यह आग्रह की मुझे अपना लो, विवाह कर लो. मगर युवक अब आनाकानी करने लगते हैं. और लड़की को अहसास होता है कि मैं छलावे में आ गई, धोखा खा गयी और मेरा जीवन बर्बाद हो गया.

आज हम इस रिपोर्ट में इस प्रकार की कुछ घटनाओं को संकेतिक रूप से यहां प्रस्तुत करते हुए यह बताने का अथक प्रयास कर रहे हैं कि युवक हो या युवतियां फेसबुक की दोस्ती, संबंधों को लेकर एक सीमा के आगे चले जाएंगे तो यह आग से खेलना होगा. सोशल मीडिया की दोस्ती, सेक्स संबंध एक ऐसी चिंगारी है जो जीवन तबाह कर देती है.

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला जशपुर जिले के बगीचा इलाके का रहने वाले एक युवक अमन तिवारी पीएससी की तैयारी करने के लिए बिलासपुर शहर आया था. यहां उसने फेसबुक के जरिए एक युवती को अपने जाल में फंसा लिया. इसके बाद करीब दो साल तक युवती से दुष्कर्म करता रहा.
युवती ने जब जब शादी के लिए कहा तो युवक ने इंकार कर दिया.

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युवती के मुताबिक युवक ने उससे कहा था -” वह उससे प्यार करता है और शादी भी उसी से करेगा.” इसी का भ्रम जाल बुनकर आरोपी युवक उससे शारीरिक संबंध बनाता रहा. इस दौरान युवती ने जब युवक से शादी करने की बात कही, तो युवक ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया.

युवक से मिले इस धोखे से आहत युवती ने आरोपी के खिलाफ बिलासपुर के कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. युवती की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी युवक अमन तिवारी को मौके पर दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया.

दोस्ती और प्रेम जाल

एक आदिवासी किशोरी की फेसबुक पर एक साल पहले पाली गांव निवासी रमन शर्मा (28) से दोस्ती हुई . बातचीत करते हुए युवक ने उसे प्रेमजाल में फंसा लिया. युवक उसे राजधानी रायपुर घूमने के बहाने घर से भगाकर अपने साथ ले गया. फिर अपने दोस्त पवन की मदद से किराए के मकान में रंजन ने किशोरी को रखा. वहां वह शादी करने का झांसा देते हुए किशोरी से दुष्कर्म करता रहा. बाद में उसे वापस शहर लाकर छोड़ दिया.किशोरी के परिजनों की रिपोर्ट पर पुलिस ने मामले में आरोपी के खिलाफ अपहरण समेत दुष्कर्म, पाक्सो एक्ट व एट्रोसिटी एक्ट का अपराध दर्ज कर लिया .

आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम संभावित स्थानों पर गई लेकिन वह हर बार भाग निकलता. आखिर साइबर सेल की मदद से पुलिस द्वारा उसके मोबाइल का लोकेशन खंगाला गया. जिसके बाद उसके बिलासपुर में होने की जानकारी मिली. पुलिस की एक टीम दिल्ली भेजी गई। टीम ने वहां जानकारी जुटाते हुए आरोपी रमन शर्मा को पकड़ लिया.

और झांसा देकर बंधक बना लिया

एक प्राइवेट हास्पिटल में नर्सिंग का काम करने वाली युवती की सोशल मीडिया पर जिस युवक से पहचान हुई थी उसी युवक ने धोखे में उसे गांव ले जाकर बंधक बना लिया. इसके बाद युवक व उसके दोस्तों ने कई दिनों तक युवती के साथ रेप किया. युवती करीब हफ्तेभर बाद किसी तरह भागकर रविवार को जशपुर के लुडेर गांव से अंबिकापुर पहुंची तो मामला सामने आया. युवती के साथ आरोपियों ने मारपीट भी की है. पुलिस ने मामले में जशपुर जिले के ग्राम लुडेर निवासी कुलदीप लकड़ा नामक युवक व उसके तीन अन्य साथियों के खिलाफ केस दर्ज कर उनकी तलाश शुरू कर दी.

युवती मूलत: बलरामपुर जिले के राजपुर इलाके की रहने वाली है. वह अंबिकापुर के मिशन चौक इलाके में किराए के मकान में रहकर एक प्राइवेट हास्पिटल में काम कर रही थी. इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी कुलदीप लकड़ा, अजय और राजकुमार को गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. वहीं फरार आरोपी की पुलिस तलाश कर रही है.

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पुलिस ने बताया कि युवती और आरोपी का परिचय फेसबुक पर हुई थी.पहले दोनों ने चैटिंग से बातचीत होती थी. इसके बाद मोबाइल पर बातचीत करने लगे और एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाने लगे. युवक के झांसे में आकर युवती उसके ऊपर विश्वास करने लगी. युवक ने अंबिकापुर में आकर मुलाकात करने की बात की तो वह तैयार हो गई.

आरोपी युवक बाइक से अंबिकापुर आया था.यहां गांव गुदरी में युवती को मिलने के लिए बुलाया. इसके बाद घूमने की बात कहकर युवती को बाइक से प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट ले गया. यहां से फिर परिजनों से मिलाने की बात कहकर उसे अपने घर ग्राम लुडेर ले गया. युवक के गांव में दो घर हैं. एक में घर में कोई नहीं रहता है. इसी घर में युवती को बंधक बनाकर रखा.

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एक कुत्ते की मौत: युवती के फांसी लगाने का मनोविज्ञान

जी हां! यह एक सच्ची घटना है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला रायगढ़ में घटित घटना सौ फीसदी सच है. मामला पुलिस जांच में है इसलिए जो तथ्य सामने आए हैं उनकी बिनाह पर कहा जा सकता है कि एक युवती ने सचमुच अपने कुत्ते, जिसे वह “बाबू” कह कर पुकारती थी,की मौत के बाद अवसाद ग्रस्त होकर फांसी लगा आत्महत्या कर ली.

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला के गोरखा गांव निवासी दिलीप सिंह ने लगभग चार वर्ष पहले घर में एक कुत्ता लाया था. विगत दिनों कुछ दिनों की बीमारी के पश्चात कुत्ते की मृत्यु हो गई . इधर पालतू कुत्ते बाबू की मौत से दु:खी होकर युवती फांसी पर चढ़ गई. इस घटनाक्रम के पश्चात लोगों में यह जन चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग चकित हैं. रायगढ़ जिले के पुलिस कप्तान संतोष सिंह ने बताया कि जिले के कोतरा रोड थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोरखा गांव में पालतू कुत्ते की मौत से दुखी 21 वर्षीय प्रियांशु सिंह ने फांसी लगाकर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. प्रियांशु स्थानीय महाविद्यालय में एम कॉम की छात्रा थी.

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पुलिस को युवती की आत्महत्या की जानकारी मिली तब गोरखा गांव के लिए पुलिस दल रवाना किया गया तथा शव बरामद किया गया. ग्राम गोरखा गांव निवासी दिलीप सिंह के द्वारा करीब चार वर्ष पहले एक कुत्ता पाला गया था. इस दौरान युवा होती युवा होती प्रियांशु सिंह का अपने घरेलू पालतू कुत्ते से स्नेह बढ़ता चला गया और जब वह बिमार हुआ तब भी प्रियांशु बहुत दुखी रहा करती थी मगर किसी ने यह नहीं सोचा था कि कुत्ते की मौत के बाद प्रियांशु ऐसा सख्त कदम भी उठा सकती है. दरअसल, अक्सर इस तरह की घटनाएं घटती हैं मगर यह घटनाएं दुर्लभ होती हैं. ऐसे में आज हमारे इस लेख का विषय यह है कि इस घटनाक्रम के पीछे आखिर मनोविज्ञान क्या होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है.

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रायगढ़ जिला के पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह ने हमारे संवाददाता को जानकारी दी कि दिलीप सिंह की बेटी प्रियांशु कुत्ते बाबू की खुद देखभाल करती थी और कुत्ता अक्सर प्रियांशु के साथ ही रहता था. उन्होंने बताया कि लगभग 12 दिनों तक बीमार रहने के बाद विगत दिनों कुत्ते की मृत्यु हो गई . पालतू कुत्ते की अप्रत्याशित मौत का सदमा संभवतः प्रियांशु सिंह बर्दाश्त नहीं कर पाई अपने पालतू कुत्ते की मौत से प्रियांशु दु:खी थी. घटना दिवस सुबह सात बजे जब घर के सदस्य कुत्ते के शव को दफनाने की तैयारी कर रहे थे तब उन्होंने प्रियांशु को वहां नहीं देखा. बाद में जब परिजन प्रियांशु के कमरे में पहुंचे तब उन्होंने उसके शव को एक गंमछे से फांसी पर लटकते हुए पाया.

आत्महत्या की पालतू कुत्ते बाबू के साथ थ्योरी इसलिए पुलिस और लोग सच मान रहे हैं क्योंकि
घटनास्थल से एक पत्र बरामद किया है जिसमें प्रियांशु ने कहा है- वह बाबू( कुत्ते) की मौत से दु:खी है और उसने अपने शव को कुत्ते के साथ दफनाने का अनुरोध किया है.

इस संपूर्ण घटनाक्रम के पश्चात स्पष्ट हो जाता है कि प्रियांशु सिंह अपने पालतू कुत्ते बाबू के साथ कितना घुल मिल चुकी थी.

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आत्महत्या का मनोविज्ञान

पुलिस ने युवती के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया है तथा मर्ग कायम कर लिया गया है. प्रियांशु के परिजन बताते हैं बाबू (कुत्ते) के शव को प्रियांशु की अंतिम इच्छा के अनुसार दफनाया गया है. वहीं डॉक्टर जी. आर. पंजवानी ऐसी “आत्महत्याओं” के मनोविज्ञान के बारे में बताते हुए कहते हैं- दरअसल यह किशोर अवस्था की एक ग्रंथि है जिसमें कोमल मन के साथ किशोर मन अपने आसपास के पशुओं आदि के साथ इतना आत्मीय हो जाता है कि उन्हें अगर कुछ हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है ऐसे संक्रमण समय में परिजनों को चाहिए कि उन्हें ढाढस बंधाते हुए उन पर निगाह रखें. प्रियांशु सिंह मामले में भी अगर परिजन होश मंदी के साथ काम लेते तो शायद यह बड़ी घटना घटित होने से रह जाती. वहीं डॉक्टर आशीष अग्रवाल के मुताबिक ऐसी घटना दुर्लभ ही घटित होती है मगर यह सच है कि जब घर के पालतू पशु से अत्यधिक आत्मीयता लगा हो जाता है तो भावुक मन के लोग आत्महत्या का कदम उठा लेते हैं. ऐसे में यही सलाह दी जा सकती है कि घर की बड़े बुजुर्गों को विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को समझाइश देते रहना चाहिए.

सोशल मीडिया से भड़कती “सेक्स की चिंगारी”

संपूर्ण देश दुनिया सहित छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया के माध्यम से सेक्स संबंध बनाए जाने और बाद में धोखा देने की घटनाएं हो रही है. आए दिन ऐसी घटनाएं हमारे आसपास घटित हो रही है कि फेसबुक, व्हाट्सएप आदि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म के माध्यम से युवक-युवतियों में बातचीत शुरु होती है, संबंध बनते हैं, मुलाकातें होती हैं, और धीरे धीरे स्थिति सेक्स संबंध स्थापित करने तक पहुंच जाती है. और फिर शुरू होता है लड़की का यह आग्रह की मुझे अपना लो, विवाह कर लो. मगर युवक अब आनाकानी करने लगते हैं. और लड़की को अहसास होता है कि मैं छलावे में आ गई, धोखा खा गयी और मेरा जीवन बर्बाद हो गया.

आज हम इस रिपोर्ट में इस प्रकार की कुछ घटनाओं को संकेतिक रूप से यहां प्रस्तुत करते हुए यह बताने का अथक प्रयास कर रहे हैं कि युवक हो या युवतियां फेसबुक की दोस्ती, संबंधों को लेकर एक सीमा के आगे चले जाएंगे तो यह आग से खेलना होगा. सोशल मीडिया की दोस्ती, सेक्स संबंध एक ऐसी चिंगारी है जो जीवन तबाह कर देती है.

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला जशपुर जिले के बगीचा इलाके का रहने वाले एक युवक अमन तिवारी पीएससी की तैयारी करने के लिए बिलासपुर शहर आया था. यहां उसने फेसबुक के जरिए एक युवती को अपने जाल में फंसा लिया. इसके बाद करीब दो साल तक युवती से दुष्कर्म करता रहा.
युवती ने जब जब शादी के लिए कहा तो युवक ने इंकार कर दिया.

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युवती के मुताबिक युवक ने उससे कहा था -” वह उससे प्यार करता है और शादी भी उसी से करेगा.” इसी का भ्रम जाल बुनकर आरोपी युवक उससे शारीरिक संबंध बनाता रहा. इस दौरान युवती ने जब युवक से शादी करने की बात कही, तो युवक ने उसे अपनाने से इंकार कर दिया.

युवक से मिले इस धोखे से आहत युवती ने आरोपी के खिलाफ बिलासपुर के कोतवाली थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. युवती की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी युवक अमन तिवारी को मौके पर दबिश देकर गिरफ्तार कर लिया.

दोस्ती और प्रेम जाल

एक आदिवासी किशोरी की फेसबुक पर एक साल पहले पाली गांव निवासी रमन शर्मा (28) से दोस्ती हुई . बातचीत करते हुए युवक ने उसे प्रेमजाल में फंसा लिया. युवक उसे राजधानी रायपुर घूमने के बहाने घर से भगाकर अपने साथ ले गया. फिर अपने दोस्त पवन की मदद से किराए के मकान में रंजन ने किशोरी को रखा. वहां वह शादी करने का झांसा देते हुए किशोरी से दुष्कर्म करता रहा. बाद में उसे वापस शहर लाकर छोड़ दिया.किशोरी के परिजनों की रिपोर्ट पर पुलिस ने मामले में आरोपी के खिलाफ अपहरण समेत दुष्कर्म, पाक्सो एक्ट व एट्रोसिटी एक्ट का अपराध दर्ज कर लिया.आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम संभावित स्थानों पर गई लेकिन वह हर बार भाग निकलता. आखिर साइबर सेल की मदद से पुलिस द्वारा उसके मोबाइल का लोकेशन खंगाला गया. जिसके बाद उसके बिलासपुर में होने की जानकारी मिली. पुलिस की एक टीम दिल्ली भेजी गई। टीम ने वहां जानकारी जुटाते हुए आरोपी रमन शर्मा को पकड़ लिया.

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और झांसा देकर बंधक बना लिया

एक प्राइवेट हास्पिटल में नर्सिंग का काम करने वाली युवती की सोशल मीडिया पर जिस युवक से पहचान हुई थी उसी युवक ने धोखे में उसे गांव ले जाकर बंधक बना लिया. इसके बाद युवक व उसके दोस्तों ने कई दिनों तक युवती के साथ रेप किया. युवती करीब हफ्तेभर बाद किसी तरह भागकर रविवार को जशपुर के लुडेर गांव से अंबिकापुर पहुंची तो मामला सामने आया. युवती के साथ आरोपियों ने मारपीट भी की है. पुलिस ने मामले में जशपुर जिले के ग्राम लुडेर निवासी कुलदीप लकड़ा नामक युवक व उसके तीन अन्य साथियों के खिलाफ केस दर्ज कर उनकी तलाश शुरू कर दी.
युवती मूलत: बलरामपुर जिले के राजपुर इलाके की रहने वाली है. वह अंबिकापुर के मिशन चौक इलाके में किराए के मकान में रहकर एक प्राइवेट हास्पिटल में काम कर रही थी. इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपी कुलदीप लकड़ा, अजय और राजकुमार को गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. वहीं फरार आरोपी की पुलिस तलाश कर रही है.

पुलिस ने बताया कि युवती और आरोपी का परिचय फेसबुक पर हुई थी.पहले दोनों ने चैटिंग से बातचीत होती थी. इसके बाद मोबाइल पर बातचीत करने लगे और एक दूसरे के लिए जीने मरने की कसमें खाने लगे. युवक के झांसे में आकर युवती उसके ऊपर विश्वास करने लगी. युवक ने अंबिकापुर में आकर मुलाकात करने की बात की तो वह तैयार हो गई.

आरोपी युवक बाइक से अंबिकापुर आया था.यहां गांव गुदरी में युवती को मिलने के लिए बुलाया. इसके बाद घूमने की बात कहकर युवती को बाइक से प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट ले गया. यहां से फिर परिजनों से मिलाने की बात कहकर उसे अपने घर ग्राम लुडेर ले गया. युवक के गांव में दो घर हैं. एक में घर में कोई नहीं रहता है. इसी घर में युवती को बंधक बनाकर रखा.

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जहरीली कच्ची शराब का कहर

पूरा उत्तर भारत प्रदूषण के अटैक से बेहाल है. दमघोंटू धुआं दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के इनसानी फेफड़ों को कमजोर कर रहा है. दिल्ली के डाक्टरों का कहना है कि जिस लैवल पर इस समय प्रदूषण है, उस में अगर कोई सांस लेता है तो वह 30 सिगरेट जितना धुआं बिना सिगरेट पिए ले रहा है.

इतने बुरे हालात के बावजूद बहुत से लोग सोशल मीडिया पर चुटकी लेना नहीं भूलते. किसी ने मैसेज डाल दिया कि अब अगर चखना और शराब का भी इंतजाम हो जाए तो मजा आ जाए. सिगरेट के मजे मुफ्त में मिल रहे हैं, तो शराब की डिमांड करने में क्या हर्ज है?

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पर शराब की यह डिमांड कइयों पर भारी पड़ जाती है. इतनी ज्यादा कि वे फिर कभी ऐसी डिमांड नहीं कर पाते हैं. हरियाणा में पानीपत का ही किस्सा ले लो. वहां के सनौली इलाके के एक गांव धनसौली में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से एक बुजुर्ग समेत 4 लोगों की मौत हो गई. वे सभी लोग तामशाबाद की एक औरत से 80 से 100 रुपए की देशी शराब खरीद कर लाए थे.

इसी तरह हरियाणा के ही बल्लभगढ़ इलाके के छायंसा गांव में चरण सिंह की भी जहरीली शराब पीने से मौत हो गई, जबकि उस के साथी जसवीर की हालत गंभीर थी.

आरोप है कि चरण सिंह ने जिस संजीव से शराब खरीदी थी, वह गैरकानूनी शराब बेचने का धंधा करता है. यह भी सुनने में आया है कि कोरोना काल में इस इलाके के यमुना नदी किनारे बसे गांवों में कच्ची शराब बेचने का धंधा जोरों पर है.

इसी साल अप्रैल महीने में पुलिस ने एक मुखबिर की सूचना पर छायंसा गांव के रहने वाले देवन उर्फ देवेंद्र को उस के घर के सामने से गिरफ्तार किया था. वह घर के बाहर ही कच्ची शराब से भरी थैलियां बेच रहा था. उस के कब्जे से कच्ची शराब से भरी 12 थैलियां बरामद की गई थीं.

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इतना ही नहीं, जब हरियाणा के सारे नेता बरोदा उपचुनाव में अपनी ताकत झोंक रहे थे तब उन्हीं दिनों सोनीपत जिले में कच्ची या जहरीली शराब पीने से कुल 31 लोगों की जान जा चुकी थी. फरीदाबाद में एक आदमी और पानीपत में भी 6 लोगों की माैत हो गई थी.

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि हरियाणा में लौकडाउन में शराब घोटाले और जहरीली शराब पीने से तथाकथित 40 लोगों की हुई मौत के मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार को घेरा और कहा कि प्रदेश में शराब माफिया सक्रिय है और इसे सरकारी सरपरस्ती हासिल है, जबकि हरियाणा के गृह मंत्री ने सदन में दावा किया कि जहरीली शराब पीने से 40 लोगों की नहीं, बल्कि 9 लोगों की मौत हुई है.

नेताओं की यह नूराकुश्ती चलती रहेगी और लोग सस्ती के चक्कर में कच्ची और जहरीली शराब गटक कर यों ही अपनी जान देते रहेंगे और अपने परिवार को दुख के पहाड़ के नीचे दबा देंगे.

कच्ची शराब जानलेवा क्यों बन जाती है? दरअसल, माहिर डाक्टरों की मानें तो बीयर और व्हिस्की में इथेनौल होता है, लेकिन देशी और कच्ची शराब में मिथेनौल मिला दिया जाता है. इस की मात्रा कम हो ज्यादा, दोनों ही रूप में यह खतरनाक है. 500 मिलीग्राम से ज्यादा इथेनौल की मात्रा होने पर शराब जानलेवा बन जाती है.

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शराब में आमतौर पर तय मात्रा में इथेनौल का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन कच्ची और देशी शराब को  ज्यादा नशे के लिए उस में मिथेनौल मिला दिया जाता है. कई बार अंगूर या संतरा ज्यादा सड़ जाने से भी इथेनौल बढ़ जाता है.

गन्ने की खोई और लकड़ी से मिथेनौल एल्कोहल बनने की संभावनाएं ज्यादा होती है. अगर 80 मिलीग्राम मिथेनौल एल्कोहल शरीर के अंदर चला जाए तो शराब जानलेवा होती है. यह कैमिकल सीधा नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है और पीने वाले की मौत हो जाती है.

बहुत सी जगह कच्ची शराब को बनाने के लिए औक्सीटोसिन, नौसादर और यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है. जहरीली शराब मिथाइल अल्कोहल कहलाती है. कोई भी अल्कोहल शरीर के अंदर जाने पर लिवर के जरीए एल्डिहाइड में बदल जाती है, लेकिन मिथाइल अल्कोहल फौर्मेल्डाइड नामक के जहर में बदल जाता है. यह जहर सब से पहले आंखों पर असर डालता है. इस के बाद लिवर को प्रभावित करता है. अगर शराब में मिथाइल की मात्रा ज्यादा है तो लिवर काम करना बंद कर देता है और पीने वाले की मौत हो जाती है.

जब लोगों को पता होता है कि कच्ची शराब उन के लिए जानलेवा होती है तो वे क्यों पीते हैं? इस की एक ही वजह है शराब पीने के लत होना. लोग लाख कहें के वे अपना तनाव दूर करने या खुशियों का मजा लेने के लिए शराब पीते हैं, लेकिन सच तो यह है वे इस के आदी हो चुके होते हैं.

पहले वे, ज्यादातर गरीब लोग, कानूनी तौर पर बिकने वाली शराब पीते हैं, फिर जब लती हो जाते हैं तो जो शराब मिल जाए, उसी से काम चलाते हैं. अपराधी किस्म के लोग उन की इस लत का फायदा उठाते हुए और ज्यादा मुनाफे के चक्कर में गैरकानूनी तौर पर बनाई गई कच्ची शराब उन्हें परोस देते हैं, जो उन्हें मौत के मुंह तक ले जाती है.

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समाजसेवी और रोहतक कोर्ट में वकील नीरज वशिष्ठ का कहना है, “यह खेल सिर्फ कच्ची शराब का नहीं है, बल्कि नकली शराब का भी है. बहुत से शराब ठेकेदार ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में कैप्सूल मिला कर नकली शराब बना देते हैं. यह और भी ज्यादा खतरनाक है.

“सब से पहले सरकार को शराब की बिक्री बंद करनी चाहिए, क्योंकि शराब तो होती ही है जानलेवा, चाहे जहरीली हो या नकली आया फिर कोई और.

“आज कम उम्र के बच्चों से ले कर बुजुर्गों तक को शराब ने बरबाद किया है. जब देश का भविष्य ही नशेड़ी होगा तो हम सोच सकते हैं कि आने वाला समय कैसा होगा. किसी भी देश की तरक्की में नौजवानों का बहुत अहम रोल होता है, पर यहां तो सरकार ही अपने भविष्य से खिलवाड़ कर रही है.

“एक तरफ सरकार कहती है कि शराब बुरी चीज है, दूसरी तरफ इस बुरी चीज को बेचने के लिए हर गलीमहल्ले में दुकान खोल रही है.”

यह देशभर का हाल है. लौकडाउन में जब शराब की दुकानें खुली थीं, तब ठेकों के बाहर लगी शराबियों की लाइनों पर बहुत मीम बनाए गए थे, लोगों ने खूब मखौल उड़ाया था, पर जरा उन परिवारों से पूछो, जिन के घर का कोई शराब के चलते इस दुनिया से ही रुखसत हो चुका है. याद रखिए, शराब जानलेवा है और रहेगी, जिस ने इस सामाजिक बुराई से पीछा छुड़ा लिया, वह बच गया.

हरियाणा में खोखले महिला सुरक्षा के दावे

सोमवार, 26 अक्तूबर को राजधानी नई दिल्ली से सटे राज्य हरियाणा के बल्लभगढ़ (फरीदाबाद) इलाके से एक दिल दहला देने वाली हत्या की वारदात सामने आई है. अग्रवाल कालेज से बीकौम फाइनल ईयर की 21 साल की छात्रा निकिता तोमर को 2 नौजवानों तौसीफ और रेहान ने दिनदहाड़े पिस्तौल से शूट कर के जान से मार डाला.

यह कालेज बल्लभगढ़ के नाहर सिंह मैट्रो स्टेशन से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है. यह वारदात तब हुई जब निकिता अपना बीकौम फाइनल ईयर का एग्जाम दे कर घर लौट रही थी. आरोपियों ने उसे कालेज के बाहर ही घेर लिया. कुछ देर चली जोरजबरदस्ती और किडनैप करने की नाकाम कोशिश के बाद आरोपी ने देशी तमंचे से 2 फुट की दूरी से निकिता के माथे पर गोली मार दी.

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गोली लगने के तुरंत बाद घायल निकिता को बल्लभगढ़ के ‘मानवता अस्पताल’ में ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ बता दिया.

इस घटना के बाद सिर्फ बल्लभगढ़ में ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में सन्नाटा पसर चुका है और यह मामला एक बार फिर पूरे देश में लचर होती महिला सिक्योरिटी पर सवालिया निशान लगा गया है.

आरोपी और पीड़िता की जानपहचान

हत्या का मुख्य आरोपी तौसीफ खानपुर इलाके से संबंध रखता है. यह इलाका मेवात जिले की नूह तहसील में पड़ता है. मेवात जिला भारत के कुल 739 जिलों में से सब से ज्यादा पिछड़े जिलों में आता है. यहां की बहुसंख्यक आबादी अल्संख्यक समुदाय से है व यहां के वर्तमान विधायक आफताब अहमद हैं जो खुद आरोपी के खास रिश्ते में लगते हैं. कहा जाता है कि आरोपी परिवार के लोगों का राजनीतिक और सामाजिक तौर पर खासा दबदबा है. वहीं, इस हत्याकांड में मारी गई निकिता तोमर का घर ‘अपना घर सोसाइटी’ में था. यह सोसाइटी बल्लभगढ़ के सैक्टर 52 के पास सोहना रोड़ बनी है. इस इलाके के भीतर कई निजी अपार्टमैंट्स हैं, जो पूरी तरह से लोगों के रहने के लिए बनाए गए हैं.

इस वारदात के सामने आने के बाद कुछ लोगों से बात कर के पता चला कि आरोपी और पीड़िता एकदूसरे को पहले से जानते थे. दोनों ने एक ही स्कूल में पढ़ाई की थी. तौसीफ स्कूल समय से ही कथिततौर पर पीड़िता को परेशान करता रहा था. निकिता और आरोपी तौसीफ दोनों की स्कूली पढ़ाई बल्लभगढ़ में सोहना रोड पर बने एक प्राइवेट ‘रावल स्कूल’ से हुई थी. स्कूल के समय में साल 2018 में एक दफा तौसीफ पर निकिता के अपहरण और परेशान करने का मामला भी दर्ज हुआ था, जिसे बाद में दोनों पक्षों की आपसी रजामंदी के बाद मामला पंचायत में ही निबटा दिया गया. हालांकि इस मामले को ले कर पीड़ित पक्ष का कहना है कि उस दौरान आरोपी के राजनीतिक रसूख और इलाकाई दबदबे के दबाव में उन्हें यह फैसला लेना पड़ा.

गिरफ्त में आरोपी

यह पूरी वारदात सीसीटीवी में कैद हुई है, जो काफी तेजी से वायरल भी हो रही है. वीडियो के बाहर आने के बाद स्थानीय जनाक्रोश भड़कता दिखाई दे रहा है. इसी का नतीजा यह रहा कि मंगलवार, 27 अक्तूबर को पीड़ित परिजन और स्थानीय लोगों ने सैकड़ों की तादाद में जमा हो कर मथुरा नैशनल हाईवे पर फ्लाईओवर के नजदीक चक्का जाम किया. उसी दिन देर शाम अधिकारियों द्वारा मिले आश्वासन के बाद ही लोग वहां से हटे और हाईवे का रास्ता खोला गया. निकिता के पार्थिव शरीर का देर शाम बल्लभगढ़ के सैक्टर 55 के श्मशान घाट पर किया गया.

वारदात के बाद ही उसी दिन देर रात तक पुलिस द्वारा मुख्य आरोपी 21 साला तौसीफ को गिरफ्तार कर लिया गया था. उस के सहयोगी आरोपी रेहान को 24 घंटों के भीतर गिरफ्तार किया गया. इन हुई गिरफ्तारियों को पुलिस और राज्य सरकार अपनी मुस्तैदी से जोड़ कर बता रही हैं.

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पुलिस द्वारा बताई जानकारी के मुताबिक आरोपी तौसीफ गुरुग्राम के सोहना रोड का रहने वाला है, जबकि रेहान हरियाणा के नूह जिले का रहने वाला है. गिरफ्तारी के बाद तौसीफ ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है, जिस के बाद आगे की जांच जारी रखी गई है. हालांकि राज्य सरकार द्वारा यह मामला एसआईटी को सौंपा जा चुका है और इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी भेजा जा चुका है, जिस के चलते दोनों आरोपियों को फिलहाल हाईकोर्ट ने 2 दिन की पुलिस रिमांड पर रखने को कहा है.

इलाके में दहशत व गुस्सा

इस वारदात के बाद से इलाके में दहशत और गुस्से दोनों तरह का माहौल बना हुआ है. मैट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही लोगों के बीच दबी जबान में इस मामले को ले कर बातें होने लगीं. उसी कालेज से बीएससी सैकंड ईयर की पढ़ाई कर रहे हिमांशु बताते हैं, ‘अग्रवाल कॉलेज की 2 ब्रांच हैं. यह वारदात कालेज के मेन गेट से थोड़ी सी दूरी पर हुई थी. मुझे इस वारदात के बारे में रात को तब पता चला, जब मेरे फोन पर यह वायरल वीडियो आया था. मैं पूरी तरह घबरा गया था, क्योंकि यह मेरे कालेज का मामला था. अब उस एरिया के आसपास जाने में अजीब सी कसमसाहट होने लगी है. मेरे मातापिता को जब इस बारे में पता चला तो वे भी घबरा गए. दिनदहाड़े इस तरह की वारदात होना किसी भी छात्र के लिए डरने वाली बात है.’

हिमांशु के साथ आई उन की दोस्त अनु (बदला नाम) का कहना है, ‘इस तरह की वारदात अगर घटेगी तो कोई लड़की कैसे पढ़ पाएगी. वैसे ही लड़कियां बहुत कम बाहर निकल कर पढ़ाई या काम कर पाती हैं, ऊपर से अगर इस तरह की वारदातें सामने आती हैं तो हम तो उन परिवारों में से हैं जहां मांबाप सीधे पढ़ाई छुड़वा देते हैं.’

जहां एक तरफ इस वारदात से दहशत का माहौल पनपा है, वहीं दूसरी तरफ लोगों में इसे ले कर गुस्सा भी देखने को मिला. काफी तादाद में लोगों ने बल्लभगढ़ नैशनल हाईवे को पूरे दिन जाम कर के रखा था. कांग्रेस व भाजपा के कई स्थानीय नेता इस में शामिल हुए थे. मौजूदा हरियाणा के कैबिनेट मंत्री मूल चंद शर्मा भी थे, पर उन्हें भी नाराज प्रदर्शनकारियों ने वहां से जाने को कह दिया. इन्हीं के बीच पीड़ित परिजन दोषियों को तुरंत फांसी दिए जाने या एनकाउंटर की बात कर रहे थे.

लव जिहाद का आरोप

धरने पर बैठी निकिता की मां से जब पूछा गया कि उन की सरकार से क्या मांग हैं, तो उन का साफ कहना है, ‘जो मेरी बेटी के साथ हुआ है उन का (आरोपियों) भी पुलिस वाले एनकाउंटर करें मेरे सामने. मैं बेटी को अग्नि तब दूंगी जब उस का एनकाउंटर हो जाएगा.’

निकिता के भाई ने कहा, ‘2018 में पहले भी आरोपी तौसीफ के खिलाफ हम ने शिकायत दर्ज करवाई थी. उस समय मामला निकिता के अपहरण का था. पुलिस ने उस समय आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन उस के बाद हमारा (दोनों पक्षों का) बैठ कर पंचायत में समझौता हो गया था. हम ने केस वापस ले लिया था.’

2 अगस्त, 2018 को पीड़ित परिजन (पिता) द्वारा आरोपी के खिलाफ पुलिस में पहले भी शिकायत दर्ज की गई थी, जिस में निकिता को आरोपी द्वारा लगातार परेशान किए जाने और लड़की के लापता होने की बात आई थी. कुछ ही समय में पुलिस ने लड़की को छुड़वा लिया था.

हालांकि अब निकिता की हत्या के बाद पीड़ित परिजन ने आरोपियों पर यह आरोप भी लगाया है कि निकिता की हत्या लव जिहाद और धर्मांतरण को नकारने के चलते की गई है.

निकिता के मामा अदल सिंह ने इस मामले पर हम से बात करते हुए कहा, ‘यह लव जिहाद है. वह लड़की से जबरदस्ती शादी कर रहा था, तो क्या इस का मतलब है, बताइए आप? इन का (मुसलिमों) यह है कि हिंदुओं की लड़की को खत्म करो, हिंदुओं की लड़कियों को भगाओ, फिर बाहर विदेशों में बेच देते हैं.’

जारी राजनीतिक उठापटक

मामले के चर्चा में आने के बाद दक्षिणपंथी संगठन इस मामले पर सक्रिय हो गए हैं. इसे ले कर वहां शामिल धार्मिक संगठन, देव सेना, के कथित राष्ट्रीय अध्यक्ष बृजभूषण सैनी, जिन के कंधे पर सवा फुट की कृपाण टंगी थी, का कहना है, “यह कोई पहला मामला नहीं है इस देश में, बल्कि हर राज्य और है जिले में हिंदुओं को टारगेट किया जा रहा है. बेटी हिंदुओं की अपहरण करने वाले, लव जिहाद करने वाले सारे जिहादी हैं. पूरे देश में साजिश के तहत इन की लौबी काम कर रही है, जिस में हिंदुओं को अपहरण कर के ले जाने की कोशिश थी मेवात में’

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‘सरकार चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की, तुष्टिकरण की नीति हर कोई अपनाता है. वोट इन्हें हिंदुओं के चाहिए, लेकिन काम इन्हें मुसलमानों के करने हैं.’

इस मसले पर फरीदाबाद पुलिस कमिश्नर ओपी सिंह ने अधिकारिक तौर पर जो बयान दिया, उस में उन्होंने कहा, ‘इस मामले को ले कर हम काफी संजीदा हैं. एक युवती के साथ घिनौना अपराध हुआ है, जिस कारण इसे क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर कर दिया गया है. इस के ऊपर एक एसआईटी बनाया है और एक राज्यपद अधिकारी इस की जांच करेंगे, जिस में तमाम सुबूतों को जमा कर जिस में वीडियो फुटेज, चश्मदीद गवाह, डिजिटल व फोरैंसिक सुबूतों को जमा कर के केस बनाया जाएगा.’

फिलहाल इस मामले को ले कर आरोपी पक्ष की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक जो बात सामने आई है वह यह कि उस ने निकिता तोमर की हत्या बदला लेने के मकसद से की था, जिस में पुलिस जांच के दौरान आरोपी ने बताया कि उस ने बदला इसलिए लिया, क्योंकि 2018 की घटना के बाद वह अपनी पढ़ाई नहीं कर पाया था और निकिता किसी और से शादी करने जा रही थी.

आरोपियों के खिलाफ फिलहाल सैक्शन 302 (हत्या), 34 (क्रिमिनल ऐक्ट डन बाई सैवेरल पर्सन) आईपीसी और सैक्शन 25 (गैरकानूनी हथियार रखने) के तहत मामला दर्ज किया गया है. हालांकि पीड़ित परिजन एफआईआर में कुछ बातें शामिल करने की बात कर रहे हैं, जिन में लव जिहाद का पहलू जुड़वाना शामिल है.

राजनीति गरमाने लगी

इस हत्याकांड के आरोपी तौसीफ के दादा कबीर अहमद 2 बार  विधायक रह चुके हैं. दादा के भाई खुर्शीद अहमद हरियाणा से गृह मंत्री भी रह चुके हैं. वहीं चचेरा भाई भी विधायक रहे हैं, साथ ही हुड्डा सरकार में परिवहन मंत्री भी रहे हैं. चाचा जावेद अहमद ने इस साल बसपा से चुनाव लड़ा था, पर वे हार गए थे.

जहां एक तरफ कांग्रेस पार्टी के आरोपी के परिवार से राजनीतिक संबंध के चलते वह रडार पर है, वहीं भाजपा राज में बढ़ते गुंडाराज और खराब होती कानून व्यवस्था से भी लोग खासा नाराज हैं.

मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने इस मसले पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाने का आश्वासन दिया. उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा, ‘अपराधी को पूरी सजा दी जाएगी. अपराध होने के बाद पुलिस ने 24 घंटे में ही आरोपी को पकड़ लिया.’

कांग्रेस के हरियाणा के मुख्य नेता व प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला इस मसले पर मुख्यमंत्री पर जम कर बरसे. उन्होंने हरियाणा में महिलाओं की सुरक्षा को ले कर सवाल किए, ‘क्या बेटियां इसी प्रकार से सुरक्षित रहेंगी खट्टर साहब? हरियाणा में पिछले 2 साल में महिला अपराधों में 45 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. हरियाणा गैंगरेप में नंबर 1 पर है.’

इस के अलावा उन्होंने दोषियों को 30 दिन के सीमित समय में सजा दिए जाने की बात कही.

फिलहाल इस मामले में एसीपी अनिल कुमार की अगुआई में एसआईटी का गठन किया गया है, जो पीड़ित परिवार से मिलने उन के घर पहुंचा. फरीदाबाद के सांसद और मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर भी पीड़ित परिवार से मिले थे.

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पुलिस ने अपराध के दौरान इस्तेमाल की गई कार का भी पता लगा लिया है जिस का लिंक दिल्ली से बताया जा रहा है. अपराध के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियार को भी बरामद कर लिया गया है.

चिंता की बात

खैर, अब यह देखना है कि पीड़ित परिजन को इस मामले में कितने दिन में इंसाफ मिलता है. भले सरकार में बैठे पदाधिकारी अपनी पीठ यह कह कर ठपथपा रहे हों कि उन्होंने आरोपियों को जल्द से जल्द पकड़ने की कोशिश की है, पर सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? आखिर क्यों जब पुलिस के संज्ञान में यह मामला 2018 से आ चुका था, तो निकिता को सुरक्षा मुहैया करने में कोताही क्यों की गई?

2018 की एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा में क्राइम रेट पहले से 45 फीसदी बढ़ा है. पहले जो आंकड़े 9,839 थे वे बढ़ कर औसतन 15,336 हो गए हैं. हरियाणा उन 4 टौप राज्यों में है जहां रैप के बाद मर्डर की अधिकाधिक वारदातें हुई हैं. ‘हरियाणा स्टेट कमीशन फौर वीमेन’ की इस साल की रिपोर्ट अनुसार लौकडाउन में हरियाणा के अंदर रिकौर्ड 78 फीसदी महिला विरोधी अपराधों में वृद्धि हुई है.फिर सवाल यह कि महिला सुरक्षा के नाम पर सरकारें बेदम क्यों हैं? जगह बदल जाती है, पर अपराध वही रहता है और शिकार भी औरत समाज ही बनता है. यह देश के रहनुमाओं लिए शर्मनाक बात है.

प्यार की त्रासदी : फिर तेरी कहानी याद आई..!

प्यार की पींगे भरकर  एक व्यक्ति ने एक युवती को ऐसा धोखा दिया कि वह युवती ने घर की रही न घाट की. जैसा कि अक्सर होता है एक बार फिर वही सब कुछ घटित हो गया. जी हां! प्रेम के अगले पायदान में युवक ने विवाह का प्रस्ताव रखा और चालाकी से शारीरिक संबंध स्थापित कर लिया . आगे बड़ी नाटकीयता के साथ नोटरी के शपथपत्र के माध्यम से विवाह रचाकर धोखा देता रहा और अंत में पल्ला झाड़ लिया. युवती को जब एहसास हुआ कि वह तो बर्बाद हो चुकी है, तब प्रेमी युवक के खिलाफ प्रेमिका की शिकायत पर पुलिस द्वारा अपराध दर्ज कर आरोपी को  जेल भेज दिया गया .जी हां! मगर थोड़ा रूकिए पीड़ित लड़की की आपबीती अभी खत्म नहीं हुई है.आगे कहानी में एक बार फिर ट्विस्ट है.

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जमानत पर जेल से छूटने के बाद आरोपी पुनः युवती को मीठी चुपड़ी बातें करके अपनी हवस का शिकार बनाता है. वह अपनी गलतियां स्वीकार करता है और आश्वस्त करता है कि मैं विवाह तो तुम्हीं से करूंगा, युवती उसके प्रेम जाल के भुलावे में फंस जाती है. मगर जब सच्चाई खुलती जाती है तो वह अपने को पुनः लूटा हुआ पाती है.पीड़िता की दोबारा शिकायत पर पुलिस “बलात्कार” का अपराध दर्ज करती है. अब आज की हकीकत यह है कि युवक फरार हो गया है और युवती को फोन पर लगातार जान से मारने की धमकी दे रहा है.पीडिता अपनी आपबीती पुलिस को बताती है थाने के लगातार चक्कर लगा रही है लेकिन पुलिस आरोपी की खोजबीन कर गिरफ्तार करने की कागजी कोशिश कर रही है.भयभीत व परेशान युवती का  कहना है कि यदि पुलिस एक सप्ताह के भीतर आरोपी को गिरफ्तार नही करती है तो वह आत्महत्या करने को मजबूर रहेगी.जिसकी सारी जवाबदारी पुलिस प्रशासन की होगी.

युवती ने “वीडियो” जारी किया

अक्सर इस तरह की घटनाएं सुर्खियों में रहती हैं. युवा वर्ग प्रेम प्यार और शारीरिक आकर्षण में फंस कर एक ऐसे भंवर जाल में फंसते चले जाते हैं कि आगे जीवन में सिर्फ अंधकार होता है. और ताजिंदगी अवसाद के अलावा कुछ नहीं मिलता. अक्सर फिल्मों में कहानियों में यही तथ्य और कथ्य रहता है जिसमें विस्तार से बताया जाता है कि किस तरह कोई युवक ठाट बाट और पैसों की झलक दिखा कर युवतियो को अपने जाल में फांस लेता है और  धोखा देकर शारीरिक संबंध बनाता है. और फिर गायब हो जाता हैं. “हरि अनंत हरि कथा अनंता” की तरह यह बानगी वर्षों वर्षों से चली आ रही है. मगर अब समय आ गया है कि इस आधुनिक 21 वी शताब्दी के समय में जब ज्ञान के अनेक स्रोत हमारे पास हैं पुस्तकें हैं, नेट है अगर आज भी स्त्री और पुरुष का यह छलावा चल रहा है तो ठहर कर सोचने की बात है कि आखिर चूक कहां है?

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भ्रम और मानसिक यंत्रणा की कहानी

ऊपर वर्णित घटनाक्रम छत्तीसगढ़ जिला के कोरबा के कटघोरा थानांतर्गत ग्राम कसनिया का है. जहाँ निवासरत युवती रजनी (बदला हुआ नाम) को  कटघोरा पुरानी बस्ती निवासी आसीम खान पिता अकरम सेठ अपने प्रेमजाल में फंसा लेता है और शादी करने का झांसा देते हुए लगातार लंबे समय तक शारीरिक संबंध स्थापित करता है.इस बीच रजनी द्वारा शादी का दबाव बनाए जाने पर तीन दिसंबर 2019 को आरोपी द्वारा शपथपत्र करके विवाह का भ्रमजाल फैलाया गया. लेकिन शादी के तीन दिन पश्चात छः दिसंबर 2019 को शारीरिक एवं मानसिक यातना देते हुए नाटकीय ढंग से पुनः शपथपत्र के माध्यम से दबावपूर्वक संबंध विच्छेद कर लेता है. पीड़िता इस मामले की शिकायत कटघोरा थाना में करती है. शिकायत के आधार पर पुलिस आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करती है जहां से आरोपी को जेल चला जाता है.

आरोपी जमानत पर जेल से छूटने पश्चात पीड़िता को बार-बार फोन करके अश्लील गाली-गलौज व मारने- पीटने की धमकी देने लगता है और एक रात  आरोपी प्रेमी, युवती के घर आ धमकता है तथा अकेलेपन का फायदा उठाकर जेल भेजे जाने की बात कहते हुए गाली-गलौज के अलावा मारपीट करते हुए बलपूर्वक शारीरिक संबंध स्थापित करता है.पीड़िता द्वारा  कटघोरा थाना पहुँचकर इस बाबत लिखित शिकायत दी जाती है.लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नही करती. आगे एक जुलाई 2020 को पीड़िता पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुँचकर अपनी शिकायत पत्र सौंप उचित कार्यवाही एवं न्याय की मांग करती है.जिसके बाद आरोपी युवक के विरुद्ध  कटघोरा पुलिस द्वारा  धारा 376, 506 के तहत अपराध दर्ज किया गया है.

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लेकिन अपराध दर्ज होने के बाद आरोपी फरार हो जाता है.जिसे पुलिस अभी तलक फरार बता रही है.जबकि पीड़िता का कथन है कि आरोपी आए दिन फोन पर जान से मारने की धमकी दे रहा है.धमकी से भयभीत हो इस बीच कई बार वह कटघोरा थाना पहुँचकर पुलिस को अपनी आपबीती सुनाते हुए आरोपी की जल्द गिरफ्तारी की मांग भी कर चुकी है.लेकिन फरार आरोपी की खोजबीन कर उसे गिरफ्तार करने की प्रक्रिया को लेकर पुलिस सुस्त बनी  है.मामले में पुलिस के सुस्ती भरे रवैये को लेकर भय के माहौल में जीवन व्यतीत कर रही पीड़िता ने  अब एक वीडियो क्लिप  जारी कर‌ सनसनी  पैदा कर कहा है कि फरार आरोपी कभी भी उसके साथ गंभीर घटना को अंजाम दे सकता है.यदि पुलिस एक सप्ताह के भीतर आरोपी की तलाश कर गिरफ्तार नही करती है तो वह “आत्महत्या” के लिए मजबूर  होगी, जिसकी सारी जवाबदारी  पुलिस प्रशासन की रहेगी.

गहरी पैठ

कोरोना को तमाशा मानने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कोविड 19 के शिकार हो गए और अक्तूबर में उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा, जब राष्ट्रपति पद का चुनाव महज 30 दिन दूर रह गया है. डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू से ही उसे साधारण फ्लू कहा और चाहा कि अमेरिका काम पर चले चाहे लोगों को बीमारी हो. उन्होंने तब भारत आने का न्योता लिया जब चीन का वुहान शहर बिलकुल बंद था और बाकी शहरों में लौकडाउन था. लाखों की भीड़ को देख कर ट्रंप खूब खुश हुए थे.

अमेरिका में चुनावों में ट्रंप वही कर रहे थे जो उन्होंने मार्च में गुजरात में किया था. हजारों के सामने बिना मास्क के भाषण देना, खुले में घूमना, कोरोना पर जीत की डींग मारना. शायद नरेंद्र मोदी ने उन से सीखा था, जब 24 मार्च को कहा था कि 21 दिनों में कोरोना की लड़ाई जीत ली जाएगी. आज अमेरिका में सब से ज्यादा बीमार हैं, सब से ज्यादा मौतें हुई?हैं और फिर भी भारत के महान नेताओं की तरह वे यही कहते थे कि इस फ्लू को तो किसी भी कीटनाशक दवा से मारा जा सकता है.

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गोरों की वोटों पर जीत कर आए ट्रंप असल में ठस दिमाग के कट्टर नेता हैं. अमेरिका में बसे ऊंची जातियों के भारतीय भी उन्हें और नरेंद्र मोदी को बराबर सा चाहते हैं. अमेरिका में दलितोंपिछड़ों की तरह कालों और लैटिनों से बुरी तरह व्यवहार किया जाता है. उन्हें जो थोड़ाबहुत मिल जाए वह भी गोरों को सहन नहीं होता. वहां तो गोरे 40-45 फीसदी हैं, पर वे जानते हैं कि भारत की तरह 10 फीसदी खास लोग चतुराई से राज कर सकते हैं. भला हो कोरोना का, जो न जाति देखता है, न धर्म, न रंग, न पैसा और पद. अमित शाह भी बीमार पड़े, दिल्ली के सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया भी और अब डोनाल्ड ट्रंप व उन की बीवी.

आम लोगों में यह बीमारी कितनी फैली है यह सिर्फ नंबरों से पता चलता है, पर यह पक्का है कि मेहनतकश इस बीमारी को आसानी से सह लेते हैं क्योंकि उन्हें पहले से तरहतरह के रोगों से लड़ने की आदत होती है. भारत और अमेरिका दोनों के समाजों में यह महामारी आग की तरह नहीं फैली जैसे पहले हैजा या प्लेग फैलता था. इस वायरस को तो असल में हवाईजहाजों में चलने की आदत है. चीन से यह इटली, ईरान, स्पेन, भारत, अमेरिका हवाईजहाजों से गया जब कोरोना बीमार इधर से उधर जा रहे थे.

डोनाल्ड ट्रंप को भी होप हिक्स से लगा जो उन के साथ हवाई यात्राओं में चुनावी सभाओं में जाने के लिए घूम रही थी. होप कहां से लाई पता नहीं. ट्रंप की पत्नी ने भारतीय नेताओं की तरह विदेशी नागरिकों को देश की मुसीबतों की जड़ बताया था. ट्रंप ने लाखों बच्चों को अपने मातापिता से अलग कर रखा है क्योंकि बच्चे अमेरिकी नागरिक हैं और माईग्रैट यानी घुसपैठिए अवैध हैं. हमारे नेताओं ने तबलीगी जमात वालों को कोरोना का दोषी ठहराया था जबकि बाद में सारी अदालतों ने माना कि कोरोना फैलाने में उन का कोई खास योग नहीं है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी और भाजपा एकजैसी नीतियों वाली हैं. देखें अब क्या कोरोना रिपब्लिकनों से सत्ता छीनता है. 10 नवंबर तक पता चल जाएगा.

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हाथरस में एक दलित लड़की का रेप और फिर बुरी तरह जख्मी कर मार देना दलितों को सबक सिखाने के लिए जरूरी है. उन की हिम्मत क्यों हुई कि वे ऊंची जाति वालों के खिलाफ मुकदमे करें, एससी ऐक्ट का इस्तेमाल करें. सदियों से सनातन धर्म कह रहा है कि दलित और औरतें, सवर्ण औरतें भी, पाप योनि की देन हैं और उन्हें सजा चाहे भगवान दें या भगवान के बैठाए दूत दें, एक ही बात है.

जिन लोगों ने दलित लड़की का रेप किया वे सामाजिक कानून लागू कर रहे थे. वे मोदी और योगी की तरह के कानून के रखवाले हैं. गलत कानून अगर संविधान ने दिए हैं तो उन्हें ठीक करना तो जरूरी है. यदि दिखावे के लिए कानून को सही नहीं किया जा सकता तो सही कानून के खुद भरती किए सिपाही इस काम को करेंगे.

देश के गांवगांव, गलीगली में यह बात रातदिन फैलाई जा रही है कि हर जने को अपनी ‘औकात’ में रहना चाहिए जो जन्म से तय है, संविधान कुछ भी कहता रहे. कुछ उदारवादी कहते हैं कि सब एक हैं, पर असल यही है कि हिंदू व्यवस्था साफ कहती है कि सब अलग हैं. पिछले जन्मों के कर्मों से बंधे हैं. जब तक पापों के भागियों को अपनी जगह पर नहीं रखा जाएगा देश चल नहीं सकता.

इस बात के हामी सिर्फ ऊंची जाति के लोग ही नहीं हैं. मायावती, उदित राज, रामदास अठावले जैसे सैकड़ों दलित नेता हैं जो पहले दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों पर उबलते थे पर अब उन्हें ज्ञान हो गया है कि दलित तो भगवान के बनाए हुए हैं और जिन थोड़े से दलितों ने अपने जपतप से भगवानों के दूतों को खुश कर दिया है, उन का काम है कि विभीषणी करते हुए अपने ही लोगों की मौत, रेप, पिटाई, बेगारी होते देखें और समाज के गुन गाएं. तभी तो योगी सरकार की पुलिस को यह बल मिला. 19 साल की लड़की की मौत को तमाशा बनने से रोकने के लिए आधी रात को उस का दाह संस्कार कर दिया गया. अब उस की राख के बदले कुछ रुपए उस के घर वालों के मुंह पर मारे जाएंगे और बात खत्म.

यह न समझें कि दलितों पर अत्याचार की छूट का असर नहीं पड़ता. देश की 2000 साल की गुलामी के पीछे यही भेदभाव है. करोड़ों लोग अगर मुसलमान बने तो इसलिए कि उन को हिंदू समाज में सांस लेना दूभर हो रहा था. आज दलितों को खरीदना आसान हो रहा है इसलिए उन की बोलती बंद है पर यह खरीदफरोख्त अब ऊंचों के साथ भी हो रही है. सारे देश में आपाधापी मची हुई है. नोटबंदी और जीएसटी उसी का एक रूप हैं. गिरती अर्थव्यवस्था इसी कानून के प्रति अविश्वास की निशानी है.

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अब गांवों, कसबों, शहरों में समाज और ज्यादा टुकड़ेटुकड़े होगा. हिंदूमुसलिम भेदभाव तो था ही, दलितठाकुर, ठाकुरजाट, जाटकुर्मी न जाने कितने टुकड़े एकदूसरे के खून के प्यासे बनते जाएंगे, कितनों के घरों में सामाजिक विवाद की सजा मासूम बेटियों को मिलेगी. हां, धर्म की जय होगी. मसजिद ढहाने पर भी जयजय. दलित हत्या पर भी जयजय.

पुलिस वालों की दबंगई

हिंदी फिल्म ‘दबंग’ में हीरो सलमान खान को इतना बेखौफ दिखाया गया है कि वह हर बुरा काम करने वाले के लिए शामत बन कर उस के होश ठिकाने लगा देता है. इस सब के बावजूद उस में रत्तीभर भी घमंड नहीं होता है और न ही वह अपनी खाकी वरदी का गलत इस्तेमाल करता है.

पर क्या असली जिंदगी में भी ऐसा होता है? शायद नहीं, तभी तो मीडिया में तमाम ऐसी खबरें आती रहती हैं, जिन में पुलिस वाले ही आम जनता का खून चूसने वाले बन जाते हैं. कभीकभार तो इतने जालिम हो जाते हैं कि वे खूनखराबे पर उतर आते हैं.

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देश का दिल दिल्ली को ही ले लीजिए. यहां के अलीपुर इलाके में रविवार, 27 सितंबर ?की शाम को दिल्ली पुलिस के एक सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया ने अपनी एक महिला दोस्त को गोली मार दी.

यह कांड सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया की सर्विस रिवाल्वर से चलती कार में हुआ. उस महिला को 3 गोलियां मारी गईं. इस वारदात को अंजाम देने के बाद संदीप दहिया अपनी कार से फरार हो गया, जबकि बाद में गंभीर रूप से घायल उस महिला को लोकल लोगों ने अस्पताल पहुंचाया.

इस के बाद भी सबइंस्पैक्टर संदीप दहिया का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. रविवार, 27 सितंबर को उस ने दिल्लीहरियाणा बौर्डर पर एक राह चलते आदमी सतबीर के पैर में गोली मार दी और फिर सोमवार, 28 सितंबर की सुबह रोहतक जिले के गांव बैंसी में अपने ससुर रणबीर सिंह के माथे पर गोली मार कर उन की जान ले ली. संदीप दहिया का काफी समय से अपनी पत्नी से विवाद चल रहा है.

एक और मामले में दिल्ली पुलिस के एक इंस्पैक्टर के खिलाफ देश के प्रधानमंत्री से गुहार लगाई गई. हुआ यों कि भलस्वा डेरी थाने के एसएचओ रहे इंस्पैक्टर के खिलाफ करोड़ों रुपए की जमीन कब्जाने का मुकदमा इसी थाने में दर्ज हुआ.

उस इंस्पैक्टर पर आरोप लगाया गया कि उस ने जबरन उगाही और करोड़ों रुपए के प्लाट और दूसरी जमीन पर कब्जा कर के अपने रिश्तेदारों के नाम करा ली. जिस पीडि़त सुजीत कुमार की एफआईआर पर यह मामला उछला, उस का आरोप है कि वह इंस्पैक्टर पीडि़त का 100 गज का प्लाट कब्जाने की कोशिश कर रहा है.

पीडि़त सुजीत कुमार ने पुलिस महकमे के ऊंचे अफसरों तक यह मामला पहुंचाया, पर कोई सुनवाई नहीं हुई. बाद में थकहार कर सुजीत कुमार ने प्रधानमंत्री को संबंधित दस्तावेज के साथ अपनी लिखित शिकायत भेजी, जिस में लिखा था, ‘मैं शिकायतें देदे कर थक चुका हूं और मजबूरन मुझे आप के पास शिकायत करनी पड़ रही है. आप के दफ्तर पर मुझे भरोसा है कि इंसाफ मिलेगा और आरोपी को कानून के शिकंजे में ले कर सख्त कार्यवाही की जाएगी, जिस से बाकी भ्रष्ट अफसरों को सबक मिल सके.’

उस पुलिस इंस्पैक्टर पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उस ने दिल्ली के स्वरूप नगर में 300 गज का डेढ़ करोड़ रुपए का एक गोदाम बना लिया है और गलीप्लाट वगैरह पर कब्जा करने की कोशिश करते हुए तकरीबन 1,500 गज जमीन में बिना पार्किंग के एक मैरिज होम बना लिया है, जिस की बाजार कीमत तकरीबन 10 करोड़ रुपए है.

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पीडि़त का यह भी आरोप है कि मुकुंदर में उस इंस्पैक्टर के रिश्तेदारों के नाम 40 बीघा जमीन में कई बड़े प्लाट हैं. इतना ही नहीं, बुराड़ी थाने के सामने 100 फुटा रोड पर ग्राम सभा की जमीन पर 350 गज और उसी से लगती हुई जमीन पर 300 गज जगह भी कब्जा ली है. इन की कीमत भी 12 करोड़ रुपए के आसपास बताई जा रही है.

मुंबई में ड्रग्स और फिल्मी सितारों के रिश्तों को ले कर हड़कंप मचा हुआ है, पर दिल्ली के जहांगीरपुरी पुलिस स्टेशन के 4 पुलिस वालों के खिलाफ पकड़े गए गांजे को खुद ही बेच देने का आरोप लगा. उन के खिलाफ भ्रष्टाचार के तहत मामला दर्ज करने के साथ एसएचओ को निलंबित कर दिया गया.

दरअसल, कुछ दिनों पहले जहांगीरपुरी थाना पुलिस ने 160 किलो गांजा बरामद किया था, लेकिन सरकारी रिकौर्ड में पुलिस ने गांजे की बड़ी खेप की एक किलो से भी कम 920 ग्राम की बरामदगी दिखाई और बाकी खेप खुद ही ब्लैक में बेच दी.

जब इस गोलमाल की जानकारी पुलिस के बड़े अफसरों तक पहुंची, तो शुरुआती जांच में 2 सबइंस्पैक्टर और 2 हैडकांस्टेबल पर गाज गिरी थी, पर इस के बाद एसएचओ को भी निलंबित कर दिया गया.

ड्रग पैडलर अनिल को छोड़ने के बाद आरोपी पुलिस वालों ने गांजा बेचने से आई रकम आपस में बांट ली थी.

ये तो चंद किस्से हैं पुलिस की करतूतों के, फेहरिस्त तो बहुत लंबी है. पर ऐसा होता क्यों है? क्यों जनता की हिफाजत करने वाले उसी को सताने लग जाते हैं, अपराध कर के खाकी वरदी को दागदार करते हैं?

यह सब इसलिए होता है, क्योंकि पुलिस के पास बहुत ज्यादा ताकत होती है. वह कानून के बारे में जानती है तो उस से खिलवाड़ करने के दांवपेंच भी बखूबी समझती है. आम आदमी तभी तो थाने में दाखिल होने से डरता है, क्योंकि उसे पता होता है कि वहां किसी न किसी बहाने से उस की खाल उतारी जाएगी.

वरदी की यही गरमी और जनता का डर पुलिस को तानाशाह बना देता है, तभी तो कोई पुलिस वाला अपनी महिला साथी से नाराज होने पर उसे सरेआम गोलियों से भून कर फरार हो जाता है या फिर कोई दूसरा पुलिस वाला अपने इलाके में इतना आतंक मचा देता है कि गैरकानूनी तौर पर जमीन हथियाने लगता है. रहीसही कसर पुलिस की वे धांधलियां पूरी कर देती हैं, जहां वह नशीली चीजों की बरामदगी में ही घपला कर देती है.

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इस तरह की घटनाओं से एक बात और उभरती है, इस से पुलिस और जनता के बीच दूरियां बढ़ जाती हैं. कोई भी शरीफ आदमी पुलिस और थाने से बचने लगता है. यह सभ्य समाज के लिए बेहद खतरनाक है.

दुख तो इस बात से होता है कि ऐसे अपराधी पुलिस वालों के खिलाफ उन के ही बड़े अफसर भी कोई कार्यवाही नहीं करते हैं. अगर ऐसा होता तो पीडि़त सुजीत कुमार को प्रधानमंत्री के पास जा कर गुहार नहीं लगानी पड़ती.

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