Manohar Kahaniya: सुपरस्टार के बेटे आर्यन खान पर ड्रग्स का डंक- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां 

लंबीचौड़ी मारधाड़ और गोलीबारी के बाद प्रेमनाथ, अजीत और अमजद खान जैसे ड्रग स्मगलर हेलीकाप्टर में चढ़ने से पहले ही धर लिए जाते थे. उन के साथ टाम अल्टर या बौब क्रिस्टो, जो मूलत: अंगरेज हैं, को भी दिखा दिया जाता था जिस से सिद्ध हो जाता था कि ड्रग्स तसकरी बगैर विदेशी स्मगलरों के मुमकिन नहीं.

ड्रग्स की तिलिस्मी दुनिया का शिकार बन रहे हैं युवा

पिछले 2 दशक में नशे और खासतौर से ड्रग्स पर जो फिल्में बनीं वे कोई समाधान नहीं देतीं, बल्कि यह बताती हैं कि युवा नशा क्यों करते हैं और नशा होने के बाद कैसा लगता है.

आर्यन खान संभव है यही अनुभव लेने गया हो कि भविष्य में कभी ड्रग एडिक्ट युवा का रोल करना पड़ा तो उस में बिना नशे को समझे वास्तविकता कैसे आएगी.

गोवा नशेडि़यों की जन्नत है, इस हकीकत को साल 2013 में प्रदर्शित फिल्म ‘गो गोवा गान’ में दिखाया गया था. 3 दोस्त एक रेव पार्टी में गोवा जाते हैं और गलत ड्रग्स लेने पर जांबी बन जाते हैं. हालांकि फिल्म का उत्तरार्द्ध पौराणिक किस्से कहानियों और कौमिक्स जैसा था, लेकिन पूर्वार्द्ध में मुद्दे की बात आ गई थी.

प्रियंका चोपड़ा और कंगना रनौत अभिनीत मधुर भंडारकर निर्देशित ‘फैशन’ फिल्म साल 2008 में आई थी, जिस में कस्बाई युवतियों की मानसिकता को खूबी से उकेरा गया था कि वे मुंबई आ कर कैसे ड्रग्स की मायावी और तिलिस्मी दुनिया का शिकार हो जाती हैं.

ये युवतियां कामयाब तो अपनी प्रतिभा के दम पर होती हैं लेकिन ड्रग्स सेवन को फैशन मानते बरबाद हो जाती हैं और फिर कभी मीना कुमारी, नरगिस, हेमामालिनी, श्रीदेवी, रेखा या माधुरी दीक्षित नहीं बन पातीं यानी ड्रग्स का कारोबार कस्बाई प्रतिभाओं को कामयाब होने से रोकने की भी एक साजिश के तौर पर देखा जा सकता है.

यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि कभी बड़े नामी सितारे ड्रग्स लेते नहीं पकड़े जाते. अपवाद स्वरूप ही संजय दत्त रोशनी में आए थे, वह भी इसलिए कि वह नशे के इतने आदी हो चुके थे कि सुबह उठ कर ब्रश बाद में करते थे, ड्रग्स पहले लेते थे.

2009 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘देव डी’ भी ड्रग्स प्रधान थी, लेकिन यह भी मकसद से भटकी हुई फिल्म थी. धर्मेंद्र के एक बड़े भाई हैं अजीत सिंह देओल, जो फिल्म निर्माता और निर्देशक हैं. इन्हीं के बेटे हैं अभय देओल. अभय देओल ने ही इस फिल्म में कामचलाऊ एक्टिंग की थी जो नशे में डूबे नाकाम आशिक के किरदार में थे.

फिर इस के 2 साल बाद आई अभिषेक बच्चन अभिनीत ‘दम मारो दम’ फिल्म, जिस में एक भूमिका राजबब्बर और स्मिता पाटिल के अभिनेता बेटे प्रतीक बब्बर की भी थी.

प्रतीक बब्बर रियल लाइफ में भी आला दरजे के नशेड़ी रह चुके हैं, जिन्हें इलाज के लिए कई बार नशा मुक्ति केंद्र में भरती होना पड़ा था. हालांकि एक्टिंग के मामले में वह संजय दत्त पर बनी बायोपिक ‘संजू’ में संजय दत्त का रोल अदा कर रहे रणबीर कपूर के सामने उन्नीस ही रहे थे.

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‘दम मारो दम’ में निर्देशक रोहन सिप्पी ने कोशिश जरूर की थी कि ड्रग्स स्मगलिंग और रैकेट्स का खुलासा करें लेकिन वह भी सिमट कर रह गए थे.

इस फिल्म की शूटिंग भी ड्रग्स का स्वर्ग कहे जाने वाले शहर गोवा में हुई थी. इस से कुछकुछ हकीकत का एहसास तो हुआ था पर यह सब पुरानी हिंदी फिल्मों की कौपी थी, जिन में पुलिस और तस्कर ढाई घंटे तक चोर पुलिस का खेल खेला करते हैं.

इस फिल्म की इकलौती खूबी यह बताना थी कि हरेक किरदार के तार ड्रग माफियाओं से जुड़े हुए दिखाए गए हैं. लेकिन वे ठीक वैसे ही हैं जैसे आर्यन खान के हैं जिस से यह उम्मीद करना बेवकूफी की बात है कि वह सीधा इस धंधे के बौस से ड्रग ले कर आया हो.

2016 में आई ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म अपने शीर्षक के चलते काफी चर्चित रही थी, क्योंकि पंजाब में ड्रग्स की दखल तब तक अहम बहस का विषय बन चुकी थी. ड्रग्स पर बनी यह इकलौती फिल्म थी, जिस में यह बताया गया था कि फैक्ट्रियों में ड्रग्स कैसे बनती हैं.

निर्देशक अभिषेक चौबे यह बताने में भी कामयाब रहे थे कि इस में राजनेता भी लिप्त रहते हैं. शाहिद कपूर, करीना कपूर और आलिया भट्ट जैसे सितारों से सजी यह फिल्म विवादों से भी घिरी थी.

ड्रग्स कितनी आसानी से उपलब्ध हो जाती है और इस के दुष्प्रभाव कैसे होते हैं, यह असरदार तरीके से दिखाना भी फिल्म की खूबी थी.

आर्यन कोई नादान बच्चा नहीं

ड्रग्स अकेले पंजाब या मुंबई में ही नहीं बल्कि पूरे देश में सहजता से मिल जाती हैं जिस के लिए इकलौती खूबी या जरूरत तलब लगना है.

यह तलब जब लगती है तो लोग मल खाने तक को भी तैयार हो जाते हैं, लड़कियां देह व्यापार करने को मजबूर हो जाती हैं, युवा अपनी गैरत और करिअर भूल जाते हैं. इस से ज्यादा ड्रग्स की लत के बारे में ज्यादा कुछ और कहा भी नहीं जा सकता.

इस में भी कोई शक नहीं कि फिल्म इंडस्ट्री के कई कलाकार इस लत के शिकार हैं, जिन के नाम वक्तवक्त पर उजागर होते भी रहे हैं. लेकिन न पकड़े गए फिल्मकारों की लिस्ट उन से कई गुना ज्यादा लंबी है.

आर्यन के बहाने एक बार फिर यह सच उजागर हुआ कि कुछ भी मुमकिन है, क्योंकि एक 24 साल के नौजवान को इतना भोला भी नहीं कहा और माना जा सकता कि वह यह न जानता हो कि ड्रग्स सेहत के लिए तो नुकसानदायक हैं ही, साथ ही इन का सेवन व खरीदफरोख्त यहां तक कि इन्हें अपने पास रखना भी गैरकानूनी है.

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आर्यन से पहले जो फिल्मकार ड्रग्स के मामले में पकड़े गए हैं, उन में छोटे परदे की टुनटुन कही जाने वाली कामेडियन भारती सिंह, सुशांत सिंह की प्रेमिका रही रिया चक्रवर्ती, आज की कामयाब अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और बी ग्रेड की ऐक्ट्रेस रकुलप्रीत सिंह के नाम प्रमुखता से शामिल हैं. फरदीन खान और ममता कुलकर्णी भी इस लिस्ट की शोभा बढ़ा चुके हैं.

आर्यन का क्या होगा, इस पर हर किसी की निगाह है क्योंकि वह कोई आम लड़का नहीं बल्कि शाहरुख खान का बेटा है. अगर उस पर आरोप साबित हुए तो उसे कम से कम एक साल की सजा होनी तय है.

हालफिलहाल तो वह आर्थर रोड नाम की जेल में है जिस में संजय दत्त सहित जुर्म की दुनिया के कई दिग्गजों ने अपने दुर्दिन गुजारे थे.

सच यह भी है कि आर्यन को इतनी शोहरत फिल्मों में काम करने से पहले ही मिल चुकी है कि कोई भी निर्माता उस पर अरबों का दांव खेलने का जोखिम उठा सकता है. एक बहस पेरेंट्स की भूमिका की भी हुई कि क्यों न उन्हें भी बच्चों की ड्रग की लत का जिम्मेदार ठहराया जाए.

आर्यन के गिरफ्तार होते ही शाहरुख खान का एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ था, जिस में अभिनेत्री सिम्मी ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में वह यह कहते नजर आ रहे थे कि वह चाहते हैं कि उन का बेटा भी ड्रग्स ट्राई करे और जब आर्यन ने उन की बात मान ही ली तो एक आम पिता की तरह रोतेझींकते और बेटे के लिए तड़पते नजर आए.

यह सोचना भी बेमानी है कि आर्यन के पकड़े जाने से ड्रग्स की समस्या खत्म हो गई है. उलटे यह गिरफ्तारी और उस के बाद का ड्रामा यह सोचने को जरूर मजबूर करता है कि यह समस्या कितनी विकराल हो गई है.

Manohar Kahaniya: खोखले निकले मोहब्बत के वादे- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

गीता जब उस की फरमाइश पर ऐसी बात बोलती तो मनोरंजन के तनबदन में जैसे आग लग जाती. वैसे भी दुनिया का कोई मर्द सबकुछ बरदाश्त कर सकता है लेकिन अगर कोई उस की मर्दानगी को ले कर सवाल उठाए तो भले ही उस में सच्चाई हो लेकिन इस बात से उस के अहम को चोट लगती है. जब ऐसा होता तो वह भी गीता से कह देता, ‘‘खोट मेरी मर्दानगी में नहीं बल्कि तुम्हारी जमीन ही बंजर है, जिस में फसल पैदा करने की ताकत नहीं है.’’

औरत की कोख पर कोई अंगुली उठाए तो यह बात एक औरत को भी कभी बरदाश्त नहीं होती.

अब अकसर ऐसा होने लगा कि बच्चे की चाहत में मनोरंजन और गीता एकदूसरे में कमियां गिनाने लगे. लेकिन जब बात आती कि चलो किसी डाक्टर को दिखा लें तो दोनों ही एकदूसरे पर तोहमत लगाने लगते कि उस में कोई कमी नहीं है. तुम अपना इलाज कराओ.

हकीकत यह थी कि दोनों ही अहं की लड़ाई लड़ते थे. पता किसी को नहीं था कि बच्चा पैदा न होने की कमी किस में है.

मनोरंजन ने जब बच्चा नहीं होने की बात अपने मातापिता को बताई तो उन्होंने कहा कि वह गीता को ले कर ओडिशा आ जाए. वहां वह इलाज करा कर सब ठीक कर देंगे.

जब मनोरंजन ने गीता से सब कुछ छोड़ कर उस के साथ ओडिशा चलने की बात कही तो गीता ने साफ इंकार कर दिया कि वह गाजियाबाद को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. इस बात से मनोरंजन गीता से और भी ज्यादा नाराज हो गया. कुछ दिन और बीते तो बच्चे को ले कर बात इतनी बढ़ने लगी कि मुंह बहस के बाद दोनों में मारपीट तक की नौबत आने लगी. इसी परेशानी में मनोरंजन ने शराब भी पीनी शुरू कर दी.

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गीता जब इस पर ऐतराज जताती तो मनोरंजन इस का जिम्मेदार भी उसी को ठहरा देता. इस के बाद फिर दोनों के बीच मारपीट होती. अब ऐसा होने लगा कि शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता कि जब पतिपत्नी के बीच कोई कलह या मारपीट न होती हो.

गीता को अब मनोरंजन से शादी करने का अफसोस होने लगा. कई बार तो उस का मन चाहता कि वह घर छोड़ कर चली जाए.

उधर, मनोरंजन को भी अब गीता से शादी करने का मलाल होने लगा. दोनों ही लड़ाई झगड़े के दौरान अपने इस पछतावे की बात एकदूसरे पर जाहिर भी कर देते. ऐसे में मनोरंजन गीता को ताना देते हुए कह देता कि मैं ही था जो तुझ पर मर मिटा और शादी कर ली, वरना तुझे कोई रखैल बना कर भी नहीं रखेगा.

यह बात गीता को इस तरह चुभ जाती, जिस से उस के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता.

आखिर पानी सर से ऊपर गुजर गया. एक दिन दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा इस कदर बढ़ा कि उस दिन गीता ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया.  मनोरंजन ने भी उस के इस फैसले का विरोध नहीं किया. अप्रैल, 2011 में गीता ने मनोरंजन का घर छोड़ दिया. चूंकि मनोरंजन से शादी करने का फैसला उस का अपना था और परिवार की हैसियत भी ऐसी नहीं थी कि गीता पति को छोड़ कर फिर से परिवार पर बोझ बन कर उन के साथ रहे.

गीता के पास बैंक में थोडे़बहुत पैसे थे. उस ने प्रह्लादगढ़ी में किराए का एक कमरा ले लिया. रहनेखाने के लिए थोड़ा सामान भी जुटा लिया और एकांत जीवन बसर करने लगी.

थोड़े ही दिन में प्रयास करने पर उसे वसुंधरा में एक नर्सिंगहोम में मेड का काम भी मिल गया, जिस से भरणपोषण की समस्या भी खत्म हो गई. लेकिन एकाएक टूट कर प्यार करने वाले पति से अलग होने की कमी को भुलाए नहीं भूल रही थी.

29 सितंबर, 2012 शनिवार की रात के करीब साढे़ 9 बजे का वक्त था. तत्कालीन इंदिरापुरम थानाप्रभारी गोरखनाथ यादव को सूचना मिली कि एक महिला को सेक्टर 16 में मोटरसाइकिल सवार किसी बदमाश ने सड़क पर जाते हुए गोली मार दी है.

इंदिरापुरम थानाप्रभारी टीम के साथ मौके पर पहुंचे. गोली महिला की पीठ में लगी थी. तत्कालीन एसपी (सिटी) शिवशंकर भी फोरैंसिक टीम को ले कर घटनास्थल पर पहुंचे.

घटनास्थल के निरीक्षण के बाद गोली लगने से घायल महिला को तत्काल अस्पताल भिजवाया गया. लेकिन पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. बाद में छानबीन करने पर पता चला कि मृतक महिला का नाम गीता यादव (26) है.

जानकारी यह भी मिली कि गीता यादव प्रह्लाद गढ़ी में किराए का कमरा ले कर अपने पति से अलग रहती थी.

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गीता के मायके वालों के बारे में जानकारी मिली तो उस का भाई राजेश और मां शांति देवी इंदिरापुरम थाने पहुंचे. उन्होंने अपनी बेटी की हत्या के पीछे अपने दामाद मनोरंजन का हाथ होने का शक जताया.

पति मनोरंजन के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

इंदिरापुरम पुलिस ने उसी दिन हत्या की धारा 302 में मुकदमा पंजीकृत कर लिया. थानाप्रभारी गोरखनाथ यादव ने एसआई धर्मवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. पुलिस टीम ने परिजनों के शक की बुनियाद पर जब सेक्टर 15 में मनोरंजन तिवारी के फ्लैट पर छापा मारा तो पता चला कि वह घर पर नहीं है.

पता चला कि वह 2 दिन से अपना सामान कमरे से निकाल कर कहीं ले जा रहा था. पुलिस टीम जब अगले दिन मनोरंजन तिवारी की दुकान पर पहुंची तो पता चला कि उस ने किसी को अपनी दुकान सामान समेत बेच दी है.

अगले भाग में पढ़ें-  किसने गीता की हत्या की

फूल सी दोस्ती- भाग 3: क्यों विराट की गर्लफ्रैंड उसका मजाक बनाती थी

‘‘ओके बाबा… लो…अभी व्हाट्सऐप पर तुम्हारे लिए स्टेटस डालती हूं.’’ और रिया ने तभी सुंदर सी रेशमी डोर की इमेज वाला स्टेटस डाला, जिस पर एक गीत की पंक्ति लिखी थी, ‘‘ये मोहमोह के धागे, तेरी उंगलियों से जा उलझे…’’

स्टेटस पढ़ते ही विराट की खुशी का ठिकाना न रहा और उस ने रिया का हाथ पकड़ कर चूम लिया. मन ही मन वह मंजरी का धन्यवाद करना भी नहीं भूला. अगला दिन उस ने लोधी गार्डेन में सैलिब्रेशन डे के रूप में मंजरी के साथ मनाने का निश्चय किया. घर पहुंच कर विराट के कई बार काल करने पर भी जब मंजरी ने फोन नहीं उठाया तो एक छोटा सा मैसेज भेज कर वह सो गया. सुबह होते ही वह फिर मंजरी को फोन करने लगा, पर कोई उत्तर न मिला. व्हाट्सऐप पर भी उस का लास्ट सीन रात का ही था. शिशिर लंदन गए हुए थे, इसलिए मंजरी कहीं दूर भी नहीं गई होगी. विराट बेहद चिंतित था. इसी तरह काफी समय बीत गया. इधर रिया से मिलने का टाइम हो रहा था, उधर मंजरी को ले कर चिंता.

इसी बीच दोपहर के 2 बज गए. कुछ सोचते हुए वह अपनी कार की चाबी ले कर घर से निकला ही था कि मंजरी का फोन आ गया. उस ने बताया कि रात से उसे तेज बुखार है, सुबह से चक्कर भी आ रहे हैं. बिस्तर से उठने की हिम्मत ही नहीं हो रही उस की. ‘‘मैं अभी आता हूं,’’ कह विराट मंजरी के घर की ओर निकल पड़ा. रिया को फोन कर उस ने बता दिया कि आज वह नहीं आ पाएगा क्योंकि एक फ्रैंड की तबीयत ठीक नहीं है, वह उस के घर जा रहा है.

मंजरी के घर पहुंचते ही विराट उसे ले कर हौस्पिटल गया. वहां मंजरी को दवा दी गई. घर वापस आ कर भी विराट तब तक मंजरी के पास बैठा रहा जब तक उस का बुखार कम नहीं हो गया. घर लौटते ही उस ने रिया को फोन कर मंजरी के बारे में बताना शुरू किया. सुन कर रिया बोली, ‘‘तुम ने तो कहा था कि एक फ्रैंड की तबीयत खराब है.’’

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‘‘हां, मंजरीजी फ्रैंड हैं मेरी.’’ ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब तुम भी यही सोचती हो कि एक मेल और फीमेल कभी फ्रैंड नहीं हो सकते?’’ ‘‘मैं क्या उस जमाने की लगती हूं तुम्हें? पर 50 की उम्र के पार की आंटी से फ्रैंडशिप? हाहाहा… आई कांट बिलीव इट.’’

‘‘तुम हंस क्यों रही हो?’’ विराट गुस्से से बोला. जवाब में रिया ने फोन काट दिया.

रात होतेहोते मंजरी की तबीयत में काफी सुधार आ गया. विराट को थैंक्स बोलने के लिए जब उस ने फोन किया तो ‘हैलो’ के साथ ही विराट की निराशा और गुस्से में भरी आवाज सुनाई दी, ‘‘आई हेट रिया.’’

‘‘क्यों क्या हुआ?’’ चिंतित सी मंजरी इतना ही बोल पाई. और विराट ने पूरी घटना उसे सुना दी.

‘‘विराट, इस में रिया की कोई गलती नहीं. हमें संस्कार ही ऐसे दिए जाते हैं कि हम भावनाओं को जीना जानते ही नहीं. अपनी संकीर्ण सोच से कुछ लोगों द्वारा बनाए गए नियमों के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है हमारी पूरी जिंदगी. रिया को बस थोड़ा समझाने की जरूरत है. तुम परेशान मत होना, प्लीज…मैं देखती हूं अब क्या करना है.’’ मंजरी के कहने से विराट आश्वस्त हुआ और दोनों की बात वहीं समाप्त हो गई.

अगले दिन मंजरी ने बहुत सी चौकलेट्स खरीदीं और नेत्रहीन बच्चों के छात्रावास की ओर चल दी. वहां जा कर उस ने वे चौकलेट्स बच्चों में बांटने की इच्छा व्यक्त की. जैसा कि वह उम्मीद कर रही थी, उसे वहां की इंचार्ज यानी रिया के पास भेज दिया गया. गोरे रंग की लंबी, स्लिम बौडी की खूबसूरत रिया का फोटो भी विराट ने उसे अभी तक नहीं दिखाया था, क्योंकि वह दोनों को आमनेसामने मिलवाना चाहता था. मंजरी ने रिया को अपना नाम नहीं बताया. वह जानती थी कि चेहरे से रिया उसे नहीं पहचानती होगी.

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रिया के साथ वह ग्राउंड में खेल रहे बच्चों के पास पहुंच गई. उन सब की उम्र लगभग 5-10 वर्ष के बीच थी. रिया ने बताया कि उसे इन बच्चों से बहुत लगाव है. यहां इन के पढ़ने, रहने, खानेपीने और कपड़ों आदि का प्रबंध एक एनजीओ की मदद से होता है. ‘‘इन बच्चों का साथ मुझे हिम्मत, हौसला और जीने की नई ताकत देता है,’’ कह कर रिया मुसकराने लगी.

बच्चों के प्रति रिया का समर्पण मंजरी को बहुत अच्छा लगा. दोनों की बातचीत चल ही रही थी एक मासूम सा बच्चा मंजरी द्वारा दी गई चौकलेट रिया के पास ले कर आया और बोला, ‘‘आधी आप खाओ न मैम.’’ रिया ने थोड़ी सी चौकलेट तोड़ी और उस के गाल चूम कर उसे खेलने भेज दिया.

‘‘यह साहिल है. इस के मातापिता एक बम विस्फोट में मारे गए थे. साहिल भी उसी दुर्घटना के कारण अपनी आंखें गंवा बैठा. मुझे बहुत अच्छा लगता है साहिल. मैं इसे दुखी नहीं देख सकती और यह भी मुझे छू कर ही मेरा दुख समझ लेता है. जब कभी मैं उदास होती हूं तो मुझे खुश करने की कोशिश करता है.’’ ‘‘ओहो… बहुत दुखभरी है साहिल की कहानी. पर अच्छा हुआ कि उसे तुम्हारे जैसी दोस्त मिल गई.’’ मंजरी ने कहा.

‘‘आप इन भावनाओं को कितना समझती हैं… साहिल और मैं सचमुच एकदूसरे को बहुत प्यार करते हैं. वह मेरा प्यारा सा दोस्त है और मैं उस की,’’ मंजरी से सहमति जताती हुई रिया चहक उठी. ‘‘तो क्या तुम नहीं चाहोगी कि ये दोस्ती आज से 20-25 साल बाद भी ऐसी ही रहे? क्या तब तुम इसे इसलिए दोस्त नहीं कहोगी कि तुम 50 के पार हो जाओगी? क्या एक उम्र के बाद भावनाओं को दबा देना चाहिए? अगर उस समय साहिल आज की तरह ही तुम से लगाव महसूस करे तो क्या तब उम्र के अंतर को ध्यान में रखते हुए उसे तुम्हारे प्रति अपने प्यार को कम कर लेना होगा? या फिर तब रिश्ते का नाम दोस्ती से बदल कर कुछ और रखोगी? क्या नाम होगा उस रिश्ते का? शायद कोई नाम नहीं. तब क्या होगा रिया, बता सकती हो तुम?’’ रिया की ओर देख कर मंजरी लगातार मुसकराने की कोशिश कर रही थी.

‘‘प्यार तो ऐसा ही होगा शायद दोनों में. और नाम… नाम तो दोस्ती ही होगा रिश्ते का. अब भी. और तब भी…’’ सोचती हुई सी रिया बोली. ‘‘अगर साहिल और तुम्हारे रिश्ते को दोस्ती का नाम दिया जा सकता है, तो विराट और मंजरी के रिश्ते को क्यों नहीं…?’’ मंजरी के सब्र का बांध टूट गया और आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

रिया जैसे सोते से जागी हो, ‘‘आप मंजरीजी हैं न?’’ कह कर वह मंजरी से लिपट गई. उस की आंखों से भी आंसू निकल पड़े. कुछ देर तक दोनों चुपचाप बैठी रहीं. फिर चुप्पी तोड़ते हुए मंजरी बोली, ‘‘अब मैं चलती हूं रिया. कल तुम मेरे घर आना. विराट को भी वहीं बुला लूंगी. खूब बातें करनी हैं मुझे तुम दोनों से.’’

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रिया हामी में सिर हिला कर मुसकरा दी. आज रिश्तों का नया पाठ पढ़ा था रिया ने. सच ही तो है कि लगाव, परवाह, त्याग और प्यार जैसे शब्द मन की कोमल भावनाओं के नाम हैं और जब ये एकसाथ मिल जाएं तो बन जाती है दोस्ती. तो फिर दोस्ती का रिश्ता पूरी तरह मन का हुआ. और मन तो सदा एक सा ही रहता है… तो फिर दोस्ती क्यों हो उम्र की मुहताज?

अपने मन की बात विराट तक पहुंचाने के लिए रिया ने उसे व्हाट्सऐप पर मैसेज किया ‘‘विराट… रिश्तों की गहराई को मैं समझ नहीं पाई थीं. अपनेपन की सुगंध से भरे किसी भी रिश्ते को उम्र के अंतिम पड़ाव तक भी मुरझाना नहीं चाहिए. मेरी ख्वाहिश है कि तुम्हारी और मंजरीजी की दोस्ती हमेशा महकती रहे. सचमुच बहुत सुंदर है ये फूल सी दोस्ती.’’

Manohar Kahaniya: डिंपल का मायावी प्रेमजाल- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इस बात से मेहताजी को पूरी तरह समझ में आ गया कि डिंपल का पूरा गैंग है, जो उस के माध्यम से लोगों को फांस कर रुपए ऐंठता है. सब कुछ जान कर भी वह कुछ कर नहीं पा रहे थे. वह पछता भी बहुत रहे थे. पर अब पछताने से क्या हो सकता था.

पुलिस से की शिकायत

इतने रुपए देने के बावजूद भी वह डर रहे थे कि फिर किसी बहाने से डिंपल उन से रुपए न मांग बैठे. आखिर उन का डर सच निकला. 15 दिन भी नहीं बीते थे कि मेहताजी के पास सूरत के थाना वारछा से फोन कर के धमकी दी गई कि अगर उन्होंने डिंपल को 15 लाख रुपए नहीं दिए तो उन पर डिंपल का जबरदस्ती गर्भपात कराने का मुकदमा दर्ज कर के जेल भेज दिया जाएगा.

जेल जाने और बदनामी के डर से मेहताजी ने जैसेतैसे कर के डिंपल को 15 लाख रुपए फिर दिए. इस के बाद फिर उन्हें धमका कर 50 हजार रुपए ले लिए गए.

इतने रुपए लेने के बाद भी मेहताजी को और रुपए देने के लिए धमकाया जाता रहा. जब मेहताजी को लगा कि डिंपल और उस के साथी उस का पीछा नहीं छोड़ने वाले तो वह थाना कोतवाली ऊंझा जा कर थानाप्रभारी एस.जे. वाघेला से मिले.

उन्हें पूरी आपबीती सुना कर कहा, ‘‘सर, किसी तरह मुझे इन लोगों के चंगुल से मुक्त कराइए. इन लोगों ने मुझे कंगाल तो कर ही दिया है, अब मेरी जान लेने पर तुले हैं.’’

इंसपेक्टर एस.जे. वाघेला ने मेहताजी से एक प्रार्थनापत्र ले कर डिंपल पटेल और उस के साथियों, मौलिक कुमार पटेल, एनसीपी नेता नटवर उर्फ नटुभाई ठाकोर निवासी महादेव उर्फ दिनेश चौधरी, अंकित कुमार पटेल और सनी कुमार पटेल के खिलाफ सामाजिक बदनामी और झूठी शिकायत कर फंसा देने सहित सोचीसमझी साजिश रच कर साढ़े 58 लाख रुपए ठगने का मुकदमा दर्ज करा दिया. सभी आरोपी ऊंझा के रहने वाले थे.

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मुकदमा दर्ज होते ही कोतवाली प्रभारी ने सभी अभियुक्तों की गिरफ्तारी की तैयारी शुरू कर दी. काररवाई करते हुए उन्होंने सभी के फोन सर्विलांस पर लगवा देने के साथ अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए ऊंझा एसओजी से भी मदद मांगी.

जांच के बाद पुलिस को आरोपियों के फोन नंबर मिल चुके थे, जिन्हें सर्विलांस पर लगा दिया गया था.

सर्विलांस के आधार पर कुछ ही घंटों में ऊंझा की एसओजी टीम ने 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर सभी को कोतवाली पुलिस को सौंप दिया. उन से पूछताछ के बाद अगले दिन यानी 7 अगस्त की सुबह कोतवाली पुलिस ने उनावा के पास से डिंपल को भी गिरफ्तार कर लिया.

ठग मंडली चढ़ गई पुलिस के हत्थे

गिरफ्तार लोगों से की गई पूछताछ में पता चला कि मौलिक पटेल और महादेव चौधरी के खिलाफ इस के पहले कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है. जबकि ऊंझा के एनसीपी नेता नटवरभाई उर्फ नटुभाई ठाकोर के खिलाफ मारपीट, जुआ खेलने तथा आर्म्स एक्ट के तहत कई मुकदमे दर्ज थे.

सुजीत कुमार के खिलाफ 3 आपराधिक मुकदमे दर्ज थे तो अंकित और सनी के खिलाफ मारपीट और हत्या की कोशिश के मुकदमे दर्ज थे.

यही नहीं, जांच में यह भी पता चला है कि मेहताजी को हनीट्रैप में फंसा कर साढ़े 58 लाख रुपए ठगने वाले इस गैंग ने इस के पहले डिंपल के साथ मिल कर जिले के ही 3 अन्य लोगों को ठगा था. इन में 7 महीने पहले इसी तरह उनावा के रहने वाले एक मारवाड़ी को उस ने प्रेमजाल में फांस कर 2 लाख रुपए ऐंठ लिए थे.

इस के बाद ऊंझा के ही एक बुजुर्ग की एक लड़की से बात करा कर वड़नगर के एक गेस्टहाउस में बुला कर उस से 3 लाख रुपए वसूले थे. इसी तरह एक युवक की एक लड़की से बात करा कर विसनगर के एक गेस्टहाउस में बुला कर 15 लाख रुपए वसूले थे.

इस के बाद भी पुलिस को आशंका है कि इस गैंग ने और लोगों को भी ठगा है. इसीलिए पुलिस ने इस गैंग के बारे में अखबारों में छपवा कर लोगों से आग्रह किया है कि जो लोग भी इस गैंग का शिकार हुए हैं, वे थाने आ कर अपनी शिकायत दर्ज कराएं. पुलिस उन की पहचान उजागर नहीं होने देगी.

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7 अगस्त को ही गिरफ्तार सभी अभियुक्तों का कोरोना टेस्ट कराया गया. रिपोर्ट निगेटिव आने पर सभी को अदालत में पेश किया गया, जहां से सभी को 6 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया.

पुलिस रिमांड के दौरान उन लोगों से संपर्क करने की कोशिश की जो इस गैंग द्वारा ठगे गए थे. पुलिस के लाख निवेदन पर भी लोग सामने नहीं आए. शायद बदनामी के डर से वे सामने नहीं आए. बदनामी के डर से ही तो उन लोगों ने इस गैंग को लाखों रुपए सौंप दिए थे.

रिमांड के दौरान पुलिस ने इस गैंग से 15 लाख 30 हजार रुपए बरामद किए थे. रिमांड खत्म होने पर पुलिस ने गिरफ्तार अभियुक्तों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

(मेहताजी की पहचान छिपाने के लिए नाम नहीं दिया गया है. गुजरात में मुनीम यानी एकाउंटेंट को मेहता कहते हैं.)

वेटिंग रूम- भाग 6: सिद्धार्थ और जानकी की छोटी सी मुलाकात के बाद क्या नया मोड़ आया?

Writer- जागृति भागवत 

सिद्धार्थ जानकी को होटल छोड़ कर घर चला गया. मन काफी भारी था और उदास भी. घर पहुंचा तो मां ने पूछा, लेकिन सिद्धार्थ ने बताया कि उस ने एक दोस्त के साथ बाहर खाना खा लिया है. सिद्धार्थ के चेहरे की उदासी उस के मन की जबान बन रही थी. मां ने उस से पूछा, ‘‘कौन दोस्त था तेरा?’’ सिद्धार्थ ने इस प्रश्न की कल्पना नहीं की थी. वह बस बोल गया, ‘‘मौम, आप नहीं जानतीं उसे,’’ और सिद्धार्थ अपने कमरे में चला गया. मां का शक पक्का हो गया कि सिद्धार्थ कुछ छिपा रहा है उस से. वे सिद्धार्थ के कमरे में गईं और पूछा, ‘‘आज तू पापा के साथ औफिस क्यों नहीं गया, इसी दोस्त के लिए?’’

सिद्धार्थ समझ नहीं पा रहा था कि मां इतना खोद कर क्यों पूछ रही हैं. वह बोला, ‘‘हां मौम, वह बाहर से आया है न, इसलिए उस का थोड़ा अरेंजमैंट देखना था.’’ 

‘‘तो क्या हो गया अरेंजमैंट?’’

‘‘अभी नहीं, मौम,’’ सिद्धार्थ बात को खत्म करने के लहजे में बोला. लेकिन मां तो आज ठान कर बैठी थीं कि सिद्धार्थ से आज सब जान कर रहेंगी.

‘‘फिर तू उसे घर क्यों नहीं ले आया? जब तक उस का कोई और इंतजाम नहीं हो जाता, वह हमारे साथ रह लेता,’’ मां ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा.

‘‘मौम, उसे हैजिटेशन हो रहा था, इसलिए नहीं आया,’’ सिद्धार्थ बात को जितना समेटने की कोशिश कर रहा था, मां उसे और ज्यादा खींच रही थीं.

‘‘अच्छा यह बता, पिछले 10-12 दिन से तो तू बहुत खुशखुश लग रहा था, आज सुबह दोस्त से मिलने गया तब भी बड़ा खुश था, अब अचानक इतना गुमसुम क्यों हो गया है. सच बताना, मैं मां हूं तेरी मुझ से कुछ मत छिपा, कोई समस्या हो तोबता, शायद मैं मदद कर सकूं,’’ कह कर अब तो मां ने जैसे मोरचा ही खोल दिया था. अब सिद्धार्थ के लिए बात को छिपाना मुश्किल लग रहा था. इतने कम समय में उस ने जानकी को बहुत अच्छी तरह से पहचान लिया था लेकिन इतना बड़ा फैसला लेने में घबरा रहा था. इस बारे में मां और पिताजी को समझाना उसे काफी मुश्किल लग रहा था. सब से बड़ी बात है कि जानकी अनाथालय में पलीबढ़ी थी. जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए लेकिन ऐसे समय सभी खानदान और कुल जैसे भंवर में फंस जाते हैं. वह उच्च और रईस घराने से था, ऐसे में एक ऐसी लड़की जिस के न मातापिता का पता है न खानदान का. अनाथालय में पलीबढ़ी एक लड़की के चरित्र पर भी लोग संदेह करते हैं. ऐसे में वह क्या करे क्या न करे, फैसला नहीं ले पा रहा था.

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दूसरी तरफ उसे जानकी की चिंता सता रही थी. जब तक उस के रहने की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक उसे होटल में ही रुकना पड़ेगा जो उस के लिए बहुत खर्चीला होगा. वह कहां से लाएगी इतना पैसा? आखिर उस ने मां को सबकुछ बताने का फैसला किया. ‘‘मौम, आप बैठिए प्लीज, मुझे आप से कुछ बातें करनी हैं,’’ और उस ने मनमाड़ रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय से ले कर आज तक की सारी बातें मां को बता दीं. सबकुछ सुनने के बाद मां कुछ देर चुप रहीं फिर बोलीं, ‘‘देखते हैं बेटा, कुछ करते हैं,’’ और उठ कर चली गईं.

अब सिद्धार्थ पहले से अधिक बेचैन हो गया. बारबार सोचता कि उस ने सही किया या गलत? फिर रात को पापा आए. सब ने साथ खाना खाया. खाने की टेबल पर पापा और सिद्धार्थ की थोड़ीबहुत बातें हुईं. पापा ने भी अनजाने में उस से पूछ लिया, ‘‘बेटा, तेरा वह दोस्त आया कि नहीं?’’

‘‘आया न पापा,’’ सिद्धार्थ ने मां की ओर देखते हुए कहा.

‘‘फिर उसे ले कर घर क्यों नहीं आया,’’ वही मां वाले सवाल पापा दुहराए जा रहे थे.

‘‘पापा, बाद में आएगा,’’ कह कर सिद्धार्थ ने बड़ी मुश्किल से जान छुड़ाई. खाना खा कर तीनों सोने चले गए. अगले दिन शाम को लगभग 4:30 बजे पिताजी ने औफिस में सिद्धार्थ को अपने कक्ष में बुला कर कहा, ‘‘तुम्हारी मौम का फोन था, वह आ रही हैं अभी, तुम्हारे साथ कहीं जाना है उन्हें. तुम अपना काम वाइंडअप कर लो.’’

कई वर्षों बाद ऐसा होगा जब सिद्धार्थ अपनी मौम के साथ कहीं जा रहा हो, वरना अब तक तो मां के साथ पिताजी ही जाते थे और सिद्धार्थ अपने दोस्तों के साथ. अचानक मां को उस के साथ कहां जाना है, वह समझ नहीं पा रहा था.

‘‘जी पापा,’’ इतना कह कर वह अपने कक्ष में आ गया. मां के आने तक सिद्धार्थ बेचैनी से घिरा जा रहा था. मां आईं और सिद्धार्थ उन के साथ गाड़ी में जा बैठा और पूछा, ‘‘मौम, कहां जाना है?’’

मां ने गंभीरता से पूछा, ‘‘जानकी किस होटल में रुकी है?’’ सिद्धार्थ अवाक् रह गया. बस, इतना ही मुंह से निकल पाया, ‘‘होटल शिवाजी पैलेस.’’

‘‘तो चलो,’’ मां बोलीं.

होटल पहुंच कर सिद्धार्थ ने सिर्फ इतना कहा, ‘‘मौम, वह मेरी भावनाओं से अनजान है.’’

‘‘मैं जानती हूं.’’

रिसैप्शन पर कमरा नंबर पता कर के दोनों उस के कमरे के बाहर पहुंचे. दरवाजे पर सिद्धार्थ आगे खड़ा था. दरवाजा खुलते ही जानकी बोली, ‘‘आप? अचानक?’’ ‘‘अंदर आने के लिए नहीं कहेंगी?’’ सिद्धार्थ ने स्वयं ही पहल की. लेकिन जानकी थोड़ा असमंजस में पड़ गई कि उसे अंदर आने के लिए कहे या नहीं. तभी सिद्धार्थ की मां सामने आईं और बोलीं, ‘‘मुझे तो अंदर आने दोगी?’’

‘‘मेरी मौम,’’ सिद्धार्थ ने मां से जानकी का परिचय करवाया.

जानकी ने दोनों को अंदर बुलाया. सिद्धार्थ और जानकी खामोश थे. खामोशी को तोड़ते हुए मां ने वार्त्तालाप शुरू की, ‘‘जानकी बेटा, मुझे सिद्धार्थ ने तुम्हारे बारे में बताया, लेकिन हमारे रहते तुम यहां होटल में रहो, यह हमें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. तुम सिद्धार्थ के कहने पर नहीं आईं, मैं समझ सकती हूं, अब मैं तुम्हें लेने आई हूं, अब तो तुम्हें चलना ही पड़ेगा.’’ सिद्धार्थ की मां ने इतने स्नेह और अधिकार के साथ यह सब कहा कि जानकी के लिए मना करना मुश्किल हो गया. फिर भी वह संकोचवश मना करती रही. लेकिन मां के आग्रह को टाल नहीं सकी. मां ने सिद्धार्थ से कहा, ‘‘सिद्धार्थ, नीचे रिसैप्शन पर जा कर बता दे कि जानकी होटल छोड़ रही हैं और बिल सैटल कर के आना.’’ जानकी को यह सब काफी अजीब लग रहा था. उस ने बिल के पैसे देने चाहे लेकिन सिद्धार्थ की मां बोलीं, ‘‘यह हिसाब करने का समय नहीं है, तुम अपना सामान पैक करो, बाकी सब सिद्धार्थ कर लेगा.’’

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सामान बांध कर जानकी सिद्धार्थ के घर चली गई. सिद्धार्थ की मां ने आउटहाउस को दिन में साफ करवा दिया था. जानकी रात को पिताजी से भी मिली. पहली बार उस ने मातापिता के स्नेह से सराबोर घर को देखा था. जानकी बहुत भावुक हो गई. अगले दिन से उस ने कालेज जाना शुरू कर दिया. साथ ही साथ रहने की व्यवस्था पर गंभीरता से खोज करने लगी. एक हफ्ते में सिद्धार्थ ने ही एक वर्किंग वूमन होस्टल ढूंढ़ा. जानकी को भी पसंद आया. सिद्धार्थ के पिताजी की पहचान से जानकी की अच्छी व्यवस्था हो गई. रविवार के दिन वह होस्टल जाने वाली थी. इस एक हफ्ते में सिद्धार्थ के मातापिता को जानकी को समझनेपरखने का अच्छा मौका मिल गया. अपने बेटे के लिए इतनी शालीन और सभ्य लड़की तो वे खुद भी नहीं खोज पाते. शनिवार की रात सब लोग एक पांचसितारा होटल में खाना खाने गए. पहले से तय किए अनुसार सिद्धार्थ के पिताजी सिद्धार्थ के साथ बिलियर्ड खेलने चले गए. अब टेबल पर सिर्फ सिद्धार्थ की मां और जानकी ही थे. अब तक जानकी उन से काफी घुलमिल गई थी. इधरउधर की बातें करतेकरते अचानक मां ने जानकी से पूछा, ‘‘जानकी, तुम्हें सिद्धार्थ कैसा लगता है?’’

अब तक जानकी के मन में सिद्धार्थ की तरफ आकर्षण जाग चुका था लेकिन सिद्धार्थ की मां से ऐसे प्रश्न की उसे अपेक्षा नहीं थी. सकुचाते हुए जानकी ने पूछा, ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘इस के 2 मतलब थोड़े ही हैं, मैं ने पूछा तुम्हें सिद्धार्थ कैसा लगता है? अच्छा या बुरा?’’ मां शरारतभरी मुसकान बिखेरते हुए बोलीं.

अब जानकी को कोई कूटनीतिक उत्तर सोचना था, वह चालाकी से बोली, ‘‘आप जैसे मातापिता का बेटा है, बुरा कैसे हो सकता है आंटी.’’

‘‘फिर शादी करना चाहोगी उस से?’’ मां ने बेधड़क पूछ लिया. आमतौर पर लड़की के सामने शादी का प्रस्ताव लड़का रखता है लेकिन यहां मां रख रही थी.

जवाब में जानकी खामोश रही. सिद्धार्थ की मां ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटा, मैं जानती हूं कि तुम क्या सोच रही हो. रुपया, पैसा, दौलत, शोहरत एक बार चली जाए तो दोबारा आ सकती है लेकिन, रिश्ते एक बार टूट जाएं तो फिर नहीं जुड़ते, प्यार एक बार बिखर जाए तो फिर समेटा नहीं जाता और मूल्यों से एक बार इंसान भटक जाए तो फिर वापस नहीं आता. लेकिन तुम्हारी वजह से यह सब संभव हुआ है. यों कहो कि तुम ने यह सब मुमकिन किया है.‘‘सिद्धार्थ हमारा इकलौता बेटा है. पता नहीं हमारे लाड़प्यार की वजह से या कोई और कारण था, हम अपने बेटे को लगभग खो चुके थे. सिद्धार्थ के पिताजी को दिनरात यही चिंता रहती थी कि उन के जमेजमाए बिजनैस का क्या होगा? उस रात तुम से मिलने के बाद सिद्धार्थ में ऐसा बदलाव आया जिस की हम ने उम्मीद ही नहीं की थी. तुम ने चमत्कार कर दिया. तुम्हारी वजह से ही हमें हमारा बेटा वापस मिल गया. हम मातापिता हो कर अपने बच्चे को अच्छे संस्कार और मूल्य नहीं दे सके लेकिन तुम ने अनाथालय में पल कर भी वह सब गुण पा लिए. ‘‘जानकी बेटा, तुम्हारे दिल में सिद्धार्थ के लिए क्या है, मैं नहीं जानती, लेकिन वह तुम को बहुत पसंद करता है, साथ ही, मैं और सिद्धार्थ के पिताजी भी. अब बस एक ही इच्छा है कि तुम हमारे घर में बहू बन कर आओ. बोलो आओगी न?’’

जानकी झेंप गई और बस इतना ही बोल पाई, ‘‘आंटी, आप मानसी चाची से बात कर लें,’’ और जानकी का चेहरा शर्म से लाल हो गया. सिद्धार्थ के मातापिता की तय योजना के अनुसार, जिस में अब जानकी भी शामिल हो गई थी, उस के पिताजी उसे ले कर वापस आए. अब चारों साथ बैठे थे. अब चौंकने की बारी सिद्धार्थ की थी. मां ने वही सवाल अब सिद्धार्थ से पूछा, ‘‘बेटा, क्या तुम जानकी के साथ शादी करना चाहोगे?’’ सिद्धार्थ कुछ क्षणों के लिए तो सब की शक्लें देखता रहा, फिर शरमा कर उठ कर चला गया. सिद्धार्थ का यह एक नया रूप उस के मातापिता ने पहली बार देखा था.

पिताजी जानकी से बोले, ‘‘जाओ बेटा, उसे बुला कर ले आओ.’’ जानकी सिद्धार्थ के पास जा कर खड़ी हुई, दोनों ने एकदूसरे को देखा और मुसकरा दिए. 2 माह बाद अनाथालय को दुलहन की तरह सजाया गया और जानकी वहां से विदा हो गई.

ये घर बहुत हसीन है- भाग 1: उस फोन कॉल ने आन्या के मन को क्यों अशांत कर दिया

लेखक- मधु शर्मा कटिहा

‘‘वान्या,आज से तुम ही संभालना घर और मेरे इस अनाड़ी से भाई को. अगर फ्लाइट्स बंद नहीं हो रही होतीं तो मैं कुछ दिन तुम लोगों के साथ बिता कर जाती. वैसे ठीक ही है हमारा जल्दी जाना. बच्चे दादादादी को खूब तंग कर रहे होंगे कोलकाता में. बहुत चाह रहे थे बच्चे अपनी दुल्हन मामी से मिलना. जल्दबाजी में सब कुछ नहीं करना पड़ता तो सब को ले कर आती.’’ सुरभि अपनी नईनवेली भाभी वान्या को टैक्सी में पीछे की सीट पर बैठे हुए बता रही थी. वान्या मुसकराते हुए सिर हिला कर कभी सुरभि को देखती तो कभी पास ही बैठे अपने पति आर्यन को. सुरभि का बोलना जारी था, ‘‘शादी चाहे जल्दबाजी में हुई, लेकिन सही फैसला है. अब मुझे आर्यन की फिक्र तो नहीं रहेगी. कोविड-19 ने तो ऐसा आतंक मचाया है कि डर लगने लगा है. तुम लोग भी ध्यान रखना अपना. हो सके तो अभी घर पर ही रहना, घूमने के लिए तो उम्र पड़ी है…’’

‘‘बसबस… रहने दो. टीचर है भाभी तुम्हारी और हमारे साले साहब आर्यन भी बेवकूफ थोड़े ही हैं कि जब इंडिया में भी कोरोना अपने पैर फैला रहा है तब बिना सोचेसमझे चल देंगे कहीं घूमने. क्यों साले साहब?’’ ड्राईवर के साथ आगे की सीट पर बैठे सुरभि के पति विशाल ने सिर पीछे घुमा कर आर्यन पर मुसकराती दृष्टि डालते हुए कहा.

वान्या और आर्यन का विवाह दो दिन पहले ही हुआ था. जुलाई में डेट थी शादी की, लेकिन कोरोना के कारण आर्यन ने ही फैसला किया था कि सादे समारोह में केवल पारिवारिक सदस्यों के बीच विवाह जल्दी से जल्दी हो जाए. वान्या का घर दिल्ली में था, इसलिए विवाह का आयोजन वहीं हुआ था. आर्यन हिमाचल प्रदेश के बड़ोग शहर का रहने वाला था. परिवार के नाम पर आर्यन की एक बड़ी बहन सुरभि थी, जो कोलकाता में अपने परिवार के साथ रहती थी. पति के साथ विवाह में सम्मिलित होने सुरभि वहां से सीधा दिल्ली पहुंच गई थी. आज वे दोनों वापस जा रहे थे, वान्या को ले कर आर्यन भी अपने घर आ रहा था. दीदीजीजू को एअरपोर्ट छोड़ने के बाद उन को रेलवे स्टेशन जाना था. दिल्ली से कालका तक वे ट्रेन से जाने वाले थे, जो रात 11 बजे चल कर सुबह 4 बजे कालका पहुंचती. वहां से टैक्सी द्वारा उन्हें आगे का सफर तय करना था.

‘‘लो बातोंबातों में पता ही नहीं लगा और एअरपोर्ट आ भी गया.’’ सुरभि के कहते ही टैक्सी रुक गई. आर्यन सामान उतारने लगा और विशाल दौड़ कर ट्रौली ले आया. सुरभि विशाल हाथ हिला कर एअरपोर्ट के गेट की और चल दिए.

आर्यन और वान्या को ले कर टैक्सी रेलवे स्टेशन की ओर रवाना हो गई.

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ट्रेन अपने निर्धारित समय पर चली. रात सोते हुए कब बीत गई पता ही नहीं लगा. सुबह वे ट्रेन से उतर कर बाहर आए तो वान्या को ठंडी हवा के झोंके स्वागत करते प्रतीत हुए. ‘‘मार्च में भी इतना ठंडा मौसम?’’ वान्या पूछ बैठी.

‘‘यह कोई ठंड है? अभी तो पहाड़ पर चढ़ना है मैडम. ठंड से आप की मुलाकात तो होनी बाकी है अभी.’’ आर्यन ठहाका लगा कर हंसते हुए बोला, ‘‘अरे, डर गईं? बड़ोग में इस समय सिर्फ रातें ठंडी होंगी, दिन में तो मौसम सुहाना ही होगा. तुम कभी हिली एरियाज में नहीं गईं इसलिए पता नहीं होगा.’’

टैक्सी आई तो दोनों की बातचीत का सिलसिला टूट गया. चलती टैक्सी में

वान्या उनींदी आंखों से बाहर झांक रही थी. भोर के नीरव अंधेरे में जलते बल्लों की मध्यम रोशनी से पेड़ भी ऊंघते हुए लग रहे थे. कुछ देर बाद सूर्य उदय हुआ तो खिलती धूप से ऊर्जा पा कर वातावरण में नवजीवन संचरित हो उठा.

परवाणु आने तक वान्या प्रकृति की सुंदरता को मन में कैद करती रही, आगे का रास्ता तन में झुरझुरी बढ़ाने लगा था. एक ओर खाई तो दूसरी ओर ऊंचेऊंचे पहाड़ों पर घने दरख्त.

धरमपुर आ कर ड्राईवर ने चाय पीने के लिए टैक्सी रोकी. हवा की ताजगी वान्या भीतर तक महसूस कर रही थी. सड़क किनारे बने ढाबे में जा कर आर्यन चाय ले आया. वान्या की निगाहें चारों ओर के मनोरम दृश्य को अपनी आंखों में समेट लेना चाहती थीं. मौसम की खनक और आर्यन का साथ… वान्या के दिल में बरसों से छुप कर बैठे अरमान अंगड़ाई लेने लगे.

धरमपुर से बड़ोग अधिक दूर नहीं था. पाइनवुड होटल आया तो टैक्सी चौड़ी सड़क से निकल कर संकरे रास्ते पर चलती हुई एक घर के सामने रुक गई. बंगलेनुमा मकान देख वान्या ठगी सी रह गई. सफेद मार्बल से जड़ा उजला, धवल महल सा तन कर खड़ा मकान जैसे याद दिला रहा था कि वान्या अब हिमाचल प्रदेश में है. हिम का उज्जवल रंग आर्यन की तरह ही अब उस के जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगा.

सामान निकाल कर आर्यन टैक्सी वाले का बिल चुका 2 सूटकेसों पर बैग्स रख पहियों के सहारे खींचता हुआ ला रहा था. वान्या भी अपना पर्स थामे कदम बढ़ाने लगी. पहाड़ में बनी चारपांच सीढि़यां चढ़ने पर वे गेट के सामने थे, जिसे किले का फाटक कहना उचित होगा. गेट के भीतर दोनों ओर मखमली घास कालीन सी बिछी थी. बंगले की ऊंची दीवारों के साथसाथ लगे लंबे पाइन के पेड़ सुंदरता में चारचांद लगा रहे थे.

आर्यन ने चाबी निकाल कर लकड़ी का नक्काशीदार भारीभरकम दरवाजा खोला और दोनों कमरे के भीतर दाखिल हो गए. कमरा क्या एक विशाल हौल था. लकड़ी के फर्श पर मोटा रंगबिरंगी आकृतियों के काम वाला तिब्बती कालीन बिछा था. बैठने के लिए सोफे के 3 सैट रखे थे. उन की लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई राजसी शोभा लिए थी. सोफों से कुछ दूरी पर एक दीवान बिछा हुआ था. उसे देख कर वान्या को म्यूजियम में रखे शाही तख्त की याद आ गई. तख्त के एक ओर हाथीदांत की नक्काशी वाली लकड़ी की तिपाही पर नीली लंबी सुराही रखी थी. नीचे जमीन पर पीतल के गमले में सेब का बोनसाई किया पौधा लगा था, जिस में लाललाल नन्हें सेब ऐसे लग रहे थे जैसे क्रिसमस ट्री पर बौल्स सजाई गई हों.

‘‘सामान अंदर के कमरे में रख देते हैं… फिर मैं चाय बना लेती हूं, किचन कहां है?’’ वान्या समझ नहीं पा रही थी कि ऐसे बंगले में रसाई किस ओर होगी? उसे तो लग रहा था जैसे वह किसी महल में खड़ी है.

‘‘आउटहाउस से नरेंद्र आता ही होगा. वह लगा देगा सामान… उस की वाइफ प्रेमा किचन संभालती है, तुम फ्रैश हो जाओ बस.’’ कहते हुए आर्यन ने खिड़कियां खोल मोटे परदे हटा दिए. जाली से छन कर कमरे में आ रही धूप ठंडे मौसम में सुकून दे रही थी.

‘‘यहां घर अधिकतर ऐसे बने होते हैं कि ठंड का असर कम से कम हो. यह मकान मेरे परदादा ने बनवाया था, मोटीमोटी दीवारें हैं और फर्श लकड़ी से बने हैं. छत ढलुआं है ताकि बरसात और बर्फ बिलकुल न ठहरे.’’ आर्यन बता रहा था कि डोरबैल बज गई. नरेंद्र और प्रेमा आए थे. दोनों ने घर का काम शुरू कर दिया.

‘‘अच्छा अब मैं नहा लेता हूं.’’ कह कर आर्यन चल दिया, वान्या भी उस के पीछेपीछे हो ली. कमरे से बाहर निकल लंबी गैलरी में नीले रंग के कारपेट पर चलते हुए पैरों की पदचाप खो गई थी. गैलरी के दोनों ओर कमरे दिख रहे थे. घर के बाकी कमरे भी बड़ेबड़े होंगे इस की वान्या ने कल्पना भी नहीं कि थी. एक कमरे में दाखिल हो आर्यन ने 10 फुट ऊंची महागनी की गोलाकार फ्रैंच स्टाइल में बनी अलमारी खोल कपड़े निकाले और बाथरूम में चला गया.

वान्या की आंखें कमरे का मुआयना करने लगीं. चौड़ी सिंहासन नुमा कुरसी को देख वान्या का दिल चाह रहा था कि उस पर बैठ आंखें मूंद रास्ते की सारी थकान भूल जाए, लेकिन पहले नहाना जरूरी है सोचते हुए वापस ड्राइंगरूम में जा अपना सूटकेस खोल कपड़े देखने लगी.

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अचानक तिपाही पर रखा आर्यन का मोबाइल बज उठा. ‘वंशिका कौलिंग’ देखा तो याद आया यह सुरभि दीदी की बेटी का नाम है. वान्या ने फोन उठा लिया. उस के हैलो कहते ही किसी बच्चे की आवाज सुनाई दी, ‘‘पापा कहां हैं?’’ दीदी के बच्चे तो बड़े हैं. यह तो किसी छोटे बच्चे की आवाज है, सोचते हुए वान्या बोली, ‘‘किस से बात करनी है आप को? यह नंबर तो आप के पापा का नहीं है. दोबारा मिला कर देखो, बच्चे.

‘‘आर्यन पापा का नाम देख कर मिलाया था मैं ने… आप कौन हो?’’ बच्चा रुआंसा हो रहा था.

Crime: करोड़ों की है यह ‘गंदी बात’

टिन की छत के बने तंबूनुमा बदबूदार देशी थिएटर के बाहर कुछ लोगों की भीड़ जमा थी. उन में अधेड़ उम्र के ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा थी, जो बस्ती के पास के बड़े शहर में मजदूर थे या फिर रिकशा वगैरह चला कर अपना पेट पालते थे. कुछ ने तो दिन में ही शराब पी रखी थी.

उस वीडियो थिएटर में सीडी से बड़े टैलीविजन पर फिल्म दिखाई जाती थी. बाहर एक हिंदी फिल्म ‘बदले की आग’ का पोस्टर लगा था. बस्ती के बाहर की तरफ बने इस थिएटर में स्कूल से गुठली मार कर कुछ बच्चे भी फिल्म देखने चले आए थे.

जब थोड़ी भीड़ बढ़ी तो सब से पैसे ले कर उन्हें भीतर तंबू में बिठा दिया गया. फिल्म के शुरू होते ही वहां थोड़ी रोशनी हुई. पर यह क्या, फिल्म ‘बदले की आग’ न जाने कैसे ‘जिस्म की आग’ में बदल गई. हिंदी के बदले कोई इंगलिश फिल्म चालू हो गई और देखने वालों की बांछें खिल गईं.

चंद मिनट बाद ही फिल्म में एक गोरी विलायती औरत किसी अफ्रीकन मर्द के साथ बिस्तर पर थी. इस के बाद उन के बीच सैक्स का ऐसा खुला खेल चला कि देखने वालों का जिस्म भी  खुल गया.

सवा घंटे की उस फिल्म में मर्दऔरत के जिस्मानी रिश्तों का पलंगतोड़ मजा था कि वह थिएटर ही गरमा गया. मतलब, लोगों ने ब्लू फिल्म यानी पोर्न फिल्म का मजा लिया था और अपने पूरे पैसे वसूल किए थे.

दुनियाभर में इन पोर्न फिल्मों का बहुत बड़ा बाजार है. इन के कलाकार भी बहुत मशहूर हैं. हालिया चर्चा में रही मिया खलीफा और हिंदी फिल्मों में ऐंट्री कर चुकी सनी लियोनी ऐसी ही पोर्न स्टार रह चुकी हैं.

सवाल उठता है कि ये फिल्में बनती कैसे हैं? इस का जवाब है कि विदेश में इन्हें बनाने के लिए तगड़ा पैसा खर्च होता है. पोर्न कलाकारों के जिस्म और उन की अदाओं के मुताबिक पैसा मिलता है. इन की सेहत और शरीर की साफसफाई पर बड़ा ध्यान दिया जाता है.

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एक पोर्न फिल्म बनाने पर कई दिन भी लग जाते हैं. इन में भी आम फिल्मों की तरह पैसा लगाने वाले, डायरैक्टर, कैमरामैन, स्क्रिप्ट लिखने वाले के साथसाथ कलाकारों की टीम होती है. सीन को एकदम रीयल दिखाने के लिए कलाकारों को सीन सम?ाए जाते हैं. ऐसे में कुछ मुश्किलें भी सामने आती हैं, जैसे पूरी शूटिंग के दौरान कई घंटों तक पोर्न फिल्म के मर्द कलाकार का जोश में रहना जरूरी होता है.

लड़कियां भी काफी मेहनत करती हैं. शूटिंग के पहले उन्हें खाना खाने की मनाही होती है, ताकि शूटिंग के समय उन का पेट सपाट और सुडौल दिखे. पर चूंकि उन्हें पैसा अच्छा मिलता है, तो यह सब उन्हें करना पड़ता है.

आज जबकि ऐसी पोर्न फिल्मों का भारत भी एक बड़ा बाजार है और जब से वैब सीरीज के नाम पर यहां भी सैक्स सीन और गालियां दिखानेसुनाने की छूट मिली है, तब से इन की आड़ में देशी पोर्न फिल्में भी बनने लगी हैं, जो चोरीछिपे बनाई जाती हैं. जो काम चोरीछिपे होता है, वहां अपराध होने में कितनी देर लगती है.

इसी अपराध की दुनिया बड़ी भयावह है और जल्दी से जल्दी पैसा कमाने के चक्कर में लोग ऐसे काले काम कर देते हैं, जिन के बारे में सोच कर भी रोंगटे खड़े हो जाएं.

ऐसा ही एक मामला तब दुनिया के सामने आया, जब मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच की प्रौपर्टी सैल ने 5 फरवरी, 2021 को पोर्न फिल्म बनाने वाली एक प्रोडक्शन कंपनी का परदाफाश किया. यह कंपनी फिल्मों में काम करने की चाहत रखने वाले लोगों से शौर्ट फिल्म में काम करने का एग्रीमैंट कराती थी, फिर शूटिंग के दौरान अगर कोई न्यूड शूट के लिए मना करता था तो करार तोड़ने पर जुर्माने की धमकी दे कर उसे ऐसे सीन करने के लिए मजबूर किया जाता था.

पुलिस ने इस सिलसिले में मालाड (पश्चिम) में मढ़ के ग्रीन पार्क बंगले  पर छापा मार कर 5 लोगों को गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार आरोपियों में 40  साल की फोटोग्राफर यासमीन खान और ग्राफिक डिजाइनर प्रतिभा नलावडे भी शामिल थीं. प्रतिभा नलावडे पोर्न फिल्म की प्रोडक्शन इंचार्ज भी थीं.

पकड़े गए बाकी 3 लोगों में से मोनू जोशी कैमरामैन और लाइटमैन का काम करता था, जबकि भानु ठाकुर और मोहम्मद नासिर ऐक्टर थे.

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मुबंई पुलिस क्राइम ब्रांच की प्रौपर्टी सैल के मुताबिक, इस गिरोह की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ने ‘हौटहिट मूवीज’ नाम का एक एप भी बना रखा है, जिस में वे लोग अपनी पोर्न फिल्मों को अपलोड करते थे. इस एप के लिए वे देखने वाले से सबस्क्रिप्शन फीस लेते थे.

पुलिस ने इस गिरोह के पास से स्क्रिप्ट के साथ 6 मोबाइल फोन, एक लैपटौप, लाइट स्टैंड, नामी कंपनी के कैमरे समेत तकरीबन 5,68,000 रुपए का सामान जब्त किया. इस के अलावा पोर्न फिल्म के धंधे से कमाए गए 36,60,000 रुपए भी बरामद किए.

मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की प्रौपर्टी सैल ने एक मिडिलमैन उमेश कामत को भी गिरफ्तार किया, जिस का काम मुंबई में शूट की गई पोर्न फिल्मों को विदेशों से कब और कैसे अपलोड कराना है, यह सब देखना था.

मोटा है मुनाफा

प्रौपर्टी सैल के एक बड़े अफसर केदारी पवार ने बताया कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली थी कि एक गिरोह मुंबई में इस धंधे से करोड़ों रुपए का मुनाफा कमा रहा है. जानकारी मिलने के बाद क्राइम ब्रांच ने एक टीम बना कर मालवणी मढ़ इलाके में बने ग्रीन विला नाम के बंगले पर दबिश दी और पोर्न मूवी की शूटिंग के दौरान 5 लोगों को गिरफ्तार किया और एक 23 साल की लड़की को उन के चंगुल से छुड़ाया.

केदारी पवार ने आगे बताया कि ये लोग ऐसे नौजवानों को टारगेट करते थे जो काफी स्ट्रगल कर रहे हैं. ये आरोपी उन लोगों को बौलीवुड, टैलीविजन सीरियल या फिर किसी बड़ी वैब सीरीज में अच्छा रोल दिलाने का सपना दिखाते थे और फिर उन्हें अपने साथ काम करने के लिए मना लेते थे.

आधी फिल्म तक ये लोग अच्छी कहानी बता कर शूट करते थे और उस के बाद सैकंड हाफ में बोल्ड सीन शूट के नाम पर पोर्न सीन शूट करने लगते थे.

पुलिस की मानें, तो पकड़ी गई  40 साल की फोटोग्राफर यासमीन खान खुद पहले फिल्मों और टैलीविजन सीरियल में छोटेमोटे रोल कर चुकी है. यही वजह है कि उस के पास ऐसी लड़कियों की लिस्ट है, जो लोग बौलीवुड या फिर टैलीविजन सीरियल में एक चांस मिलने को ले कर सालों से जद्दोजेहद कर रही हैं.

यासमीन खान इन लड़कियों को शौर्ट फिल्म के नाम पर औफर देती थी. इस के बाद वह इन स्ट्रगलर को  20 मिनट की फिल्म बनाने के हिसाब से एक स्क्रिप्ट सुनाती थी, लेकिन किसी भी न्यूड सीन की जानकारी नहीं देती थी. इस के बाद वह इस छोटी फिल्म की शूटिंग के लिए कलाकारों को 25,000 से 30,000 रुपए देने का वादा करती थी.

इस के बाद यासमीन खान इन कलाकारों से एक एग्रीमैंट पर दस्तखत कराती थी, जिसे उन्हें पूरा पढ़ने भी नहीं दिया जाता था. इस एग्रीमैंट पर दस्तखत मिलने के बाद उन कलाकारों को शूटिंग के लिए मालवणी मढ़ इलाके में बने किसी बंगले पर बुलाया जाता था, फिर जैसेजैसे शूटिंग आगे बढ़ती थी, वैसेवैसे उन कलाकारों को कपड़े निकालने को कहा जाता था.

अगर कोई कलाकार ऐसा करने से मना करता, तो उसे एग्रीमैंट दिखा कर और बात न मानने पर उस पर कानूनी कार्यवाही करने की धमकी दी जाती थी.

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एक और खुलासा

इस सनसनीखेज मामले में ?ारखंड की एक लड़की ने मुंबई पुलिस को बताया कि जब उस ने पोर्न फिल्म की शूटिंग करने से इनकार कर दिया, तो आरोपियों ने उसे धमकाया कि उस ने जो एग्रीमैंट किया है, उस में साफ लिखा हुआ है कि अगर वह ऐसा नहीं करेगी, तो उसे बतौर जुर्माना 10 लाख रुपए देने पड़ेंगे और साथ ही उस के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज की जाएगी.

वह लड़की झारखंड और कुछ दूसरे शहरों में मौडलिंग के कई कंपीटिशन में हिस्सा ले चुकी थी. 29 दिसंबर, 2020 को उस के पास संतोष नाम के एक आदमी का फोन आया था और उसे बताया गया कि उन लोगों ने उसे एक वैब सीरीज के लिए चुन लिया है, जिस की शूटिंग लोनावाला में है. एक दिन की शूटिंग के लिए उस लड़की को बतौर मेहनताना 25,000 से 30,000 रुपए  दिए जाएंगे.

संतोष से हुई बातचीत के बाद उस लड़की के पास अलीशा का फोन आया. उस ने बताया कि इस वैब सीरीज का प्रसारण ‘हौटहिट मूवीज’ पर होगा, जो एक पेड ओटीटी एप है.

झारखंड की उस मौडल लड़की ने बताया कि अगले दिन उस के पास फोन आया कि किसी वजह से लोनावाला की शूटिंग कैंसिल हो गई है, जो अब मालाड के मड आईलैंड में होगी. उसे वहां बुलाया गया और इंगलिश भाषा में लिखे हुए एक एग्रीमैंट पर उस से दस्तखत करवाए गए और हिंदी भाषा में मतलब भी सम?ाया गया.

लड़की ने बताया कि वैब सीरीज की शूटिंग शुरू होने के कुछ मिनट बाद उस पर गलत सीन करने का दबाव डाला गया. उस ने मना किया, तो उसे धमकाया गया. लड़की ने फिर वैसे ही सीन किए, जैसे उसे बताए गए थे.

उस लड़की ने बताया कि  31 दिसंबर, 2021 को अलीशा का फोन आया कि तुम्हारे अकाउंट में रकम ट्रांसफर नहीं हो रही है. लड़की ने फिर किसी परिचित का बैंक औफ बड़ौदा, लखनऊ ब्रांच का अकाउंट नंबर दिया. उस अकाउंट में रकम भेजी गई.

कहां है चूक

वैब सीरीज में जिस तरह एडल्ट सीन करने की छूट मिली हुई है, उसी के चलते पोर्न फिल्म या वीडियो बनाने वालों को हिम्मत मिलती है. नए कलाकार भी जब तक पकड़े नहीं जाते हैं, तब तक ऐसी फिल्मों में काम करते रहते हैं, क्योंकि उन्हें एकमुश्त अच्छा पैसा जो मिलता रहता है, जो उन्हें मुंबई में टिके रहने के लिए बहुत जरूरी है.

बहुत से नए कलाकार तो अपने खर्चे निकालने के लिए देह धंधे के बाजार में उतर जाते हैं. पोर्न फिल्मों में चूंकि लोग उन्हें स्क्रीन पर ऐसे सीन करते देखते हैं, तो बनाने वालों को भी मोटा मुनाफा मिल जाता है. इस लालच में वे ऐसे गंदे काम करते हैं. पुलिस की एक दबिश से या कुछ लोगों के पकड़े जाने से यह गोलमाल खत्म हो जाएगा, ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी.

गहना वशिष्ठ भी धरी गई. इस कांड में तब और ज्यादा दिलचस्प मोड़ आया, जब टैलीविजन हीरोइन और मौडल गहना वशिष्ठ को मुंबई क्राइम ब्रांच की प्रौपर्टी सैल ने 6 जनवरी, 2021 की शाम को गिरफ्तार किया. आरोप था कि वैब सीरीज ‘गंदी बात’ में भी काम कर चुकी गहना वशिष्ठ नए कलाकारों को अच्छा रोल दिलाने का ?ांसा दे कर उन्हें पोर्न वीडियो में काम करने को कहती थी और फिर उस वीडियो को 2 अलगअलग वैबसाइटों पर अपलोड कर लाखों रुपए कमाती थी.

पुलिस के एक बड़े अफसर ने बताया कि गहना वशिष्ठ का ‘जीवी स्टूडियो’ नाम का एक प्रोडक्शन हाउस है, जिस के तहत वह ऐसे गंदे वीडियो शूट करती थी. पुलिस की मानें, तो साल 2019 से गहना वशिष्ठ इस तरह के वीडियो बनवा रही है. पुलिस को अब तक ऐसे तकरीबन 90 पोर्न वीडियो मिले हैं, जिसे गहना ने शूट कराया है.

क्राइम ब्रांच के एक अफसर ने बताया कि 3 फरवरी, 2021 को गहना वशिष्ठ के घर पर दबिश दी गई थी, जिस के बाद उस के घर से 3 मोबाइल फोन, एक लैपटौप और बैंक से संबंधित कुछ दस्तावेजों को जब्त किया गया.

पुलिस ने गहना वशिष्ठ से की गई जांच के दौरान पाया कि उस के पास 2 वैबसाइट हैं, जिन पर वह इस तरह के वीडियो अपलोड करती थी. उस के बनाए गए पोर्न वीडियो को देखने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना पड़ता है, जिस के लिए 2,000 रुपए लगते हैं.

छोटी छोटी खुशियां- भाग 5: शादी के बाद प्रताप की स्थिति क्यों बदल गई?

Writer- वीरेंद्र सिंह

सभी अपनेअपने काम में लग गए. प्रताप अपनी सीट पर अकेला रह गया तो विचारों में खो गया. उस के दिमाग में सुधा से कहासुनी से ले कर मैनेजर साहब को खरीखोटी सुनाने तक की एकएक घटना चलचित्र की तरह घूम गई. पैन निकालने के लिए उस ने जेब में हाथ डाला तो पुलिस द्वारा दी गई रसीद भी पैन के साथ बाहर आ गई. रसीद देख कर उस का दिमाग भन्ना उठा. मेज पर रखे पानी के गिलास को खाली कर के वह आहिस्ता से उठा. पैर में दर्द होने के बावजूद वह धीरेधीरे आगे बढ़ा. टैलीफोन मैनेजर साहब की ही मेज पर था. प्रताप उसी ओर बढ़ रहा था. प्रताप के गंभीर चेहरे को देख कर मैनेजर घबराए. उन की हालत देख कर प्रताप के होंठों पर कुटिल मुसकान तैर गई. मैनेजर साहब की ओर देखे बगैर ही वह उन के सामने पड़ी कुरसी पर बैठ गया. टैलीफोन अपनी ओर खींच कर पुलिस की ट्रैफिक शाखा का नंबर मिला दिया. दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘नमस्कारजी, मैं ट्रैफिक शाखा से हैडकौंस्टेबल ईश्वर सिंह बोल रहा हूं.’’

‘‘नमस्कार ईश्वर सिंहजी, आप ब्लूलाइन बसों के खिलाफ मेरी एक शिकायत लिखिए.’’

‘‘आप की जो शिकायत हो, लिख कर भेज दीजिए.’’

‘‘लिख कर भेजूंगा तो तुम्हें अपनी औकात का पता चल जाएगा…’’ प्रताप थोड़ा रोष में बोला, ‘‘फोन किसी जिम्मेदार अधिकारी को दीजिए.’’

‘‘औफिस में इस समय और कोई नहीं है. इंस्पैक्टर साहब और एसीपी साहब राउंड पर हैं.’’

‘‘एसीपी साहब के पास तो मोबाइल फोन होगा, उन का नंबर दो.’’

कौंस्टेबल ईश्वर सिंह ने जो नंबर दिया था, उसे मिलाते हुए प्रताप खुन्नस में था. उधर से स्विच औन होते ही वह बोला, ‘‘सर, मैं प्रताप सिंह बोल रहा हूं. मेरी एक शिकायत है.’’

‘‘बोलो.’’

‘‘आप के टै्रफिक के नियम सिर्फ स्कूटर वालों के लिए ही हैं क्या? सड़क पर जिस तरह अंधेरगर्दी के साथ ब्लूलाइन बसें दौड़ रही हैं, आप के स्टाफ वालों को दिखाई नहीं देतीं?’’ प्रताप की आवाज क्रोध में कांप रही थी.

‘‘देखिए साहब, जो पकड़ी जाती हैं, उन के खिलाफ कार्यवाही की जाती है.’’

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‘‘क्या कार्यवाही करते हैं आप लोग, वह सब मैं जानता हूं,’’ प्रताप काफी गुस्से में था इसलिए उस के स्वर में थोड़ा तल्खी थी. उसी तल्ख आवाज में वह बोला, ‘‘यहां आश्रम रोड पर आ कर थोड़ी देर खड़े रहिए. ड्राइवर बसें किस तरह बीच सड़क पर खड़ी कर के सवारियां भरते हैं, देख लेंगे. उस व्यस्त सड़क पर भी ओवरटेक करने में उन्हें जरा हिचक नहीं होती. आप के पुलिस वाले खड़े यह सब देखते रहते हैं.’’

‘‘देखिए प्रतापजी, डिपार्टमैंट अपनी तरह से काम करता है.’’

‘‘कुछ नहीं करता, साहब, आप का पूरा का पूरा डिपार्टमैंट बेकार है. आप के पुलिसकर्मी घूस लेने में लगे रहते हैं. बस वालों से हफ्ता लेते हैं, ऐसे में उन के खिलाफ कैसे कार्यवाही करेंगे?’’

‘‘माइंड योर लैंग्वेज. आप अपनी शिकायत लिख कर भेज दीजिए. दैट्स आल,’’ दूसरी ओर से फोन काट दिया गया.

‘लिखित शिकायत करूंगा…जरूर करूंगा?’ बड़बड़ाता हुआ प्रताप अपनी सीट पर आ कर बैठ गया. पैन उठाया और जिस तरह तोप में गोला भरा जाता है, उसी तरह ठूंसठूंस कर पूरे पेज में एकएक बात लिखी. होंठ भींचे वह लिखता रहा. उस का आक्रोश अक्षर के रूप में कागज पर उतरता रहा. शिकायत का पत्र पूरा हुआ तो उस ने संतोष की सांस ली. पूरे कागज पर एक नजर डाल कर उसे मोड़ा और डायरी में रख लिया. डायरी हाथ में ले कर वह उठ खड़ा हुआ. घुटने में अभी भी दर्द हो रहा था. मगर उस की परवा किए बगैर वह बैंक से बाहर आया. बैंक के सामने ही पीसीओ में फैक्स की सुविधा भी थी. वह सीधे पीसीओ पर पहुंचा. सामने बैठे पीसीओ के मालिक लालबाबू के हाथ में कागज और एक चिट पकड़ाते हुए कहा, ‘‘चिट में लिखे नंबरों पर इसे फैक्स करना है.’’

लालबाबू उन सभी नंबरों के बगल में लिखे नामों को देख कर प्रताप को ताकने लगा. मुख्यमंत्री, राज्यपाल, गृहमंत्री से ले कर पुलिस कमिश्नर तक के नंबर थे वे. उस चिट में शहर के प्रमुख अखबारों के भी फैक्स नंबर थे. अपनी ओर एकटक देख रहे लालबाबू से उस ने कहा, ‘‘सभी नंबरों पर इसे फैक्स कर दीजिए.’’

‘‘जी,’’ उस ने प्रताप द्वारा दिए कागज को फैक्स मशीन में इंसर्ट किया. फिर एकएक नंबर डायल करता रहा. फैक्स मशीन में कागज एक तरफ से घुस कर, दूसरी ओर से निकलने लगा. प्रताप खड़ा इस प्रक्रिया को ध्यान से देख रहा था. सारे फैक्स ठीक से हो गए हैं, इस के कन्फर्मेशन की रिपोर्ट की कौपी लालबाबू ने प्रताप के हाथ में पकड़ाने के साथ ही बिल भी थमा दिया. पैसे दे कर सभी कन्फर्मेशन रिपोर्ट्स प्रताप ने डायरी में संभाल कर रखी और पीसीओ से बाहर निकल आया. अब प्रताप के दिमाग की तनी नसें थोड़ी ढीली हुईं. जिस से उस ने स्वयं को काफी हलका महसूस किया. कितने दिनों से वह इस काम के बारे में सोच रहा था. आखिर आज पूरा हो ही गया.

फैक्स सभी को मिल ही गया होगा. अब मजा आएगा. फैक्स जैसे ही मिलेगा, मुख्यमंत्री गृहमंत्री से कहेंगे. उन्हें भी फैक्स की कौपी मिल गई होगी. राज्यपाल के यहां से भी सूचना आएगी. सब की नाराजगी पुलिस कमिश्नर को झेलनी पड़ेगी. फिर वे एसीपी ट्रैफिक को गरम करेंगे. उस के बाद नंबर आएगा कौंस्टेबलों का. एसीपी एकएक कौंस्टेबल का तेल निकालेगा. बैंक में आ कर वह अपनी सीट पर बैठ गया. अब उसे बड़े भाई की याद आ गई. पिछली रात वे पैसे के लिए उस से किस तरह गिड़गिड़ा रहे थे. उसी क्षण उस की आंखों के सामने सुधा का तमतमाया चेहरा नाच गया. मन ही मन उसे एक साथ 4-5 गालियां दे कर वह कुरसी से उठ खड़ा हुआ. बैंक के कर्मचारियों की के्रडिट सोसायटी बहुत ही व्यवस्थित ढंग से चल रही थी. सोसायटी के सैके्रटरी नरेंद्र नीचे के फ्लोर पर बैठते थे. वह लिफ्ट से नीचे उतरा. नरेंद्र अपनी केबिन में बैठे थे. उन की मेज के सामने पड़ी कुरसी खींच कर वह बैठ गया. लोन के लिए फौर्म ले कर उस ने भरा और नरेंद्र की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘नरेंद्र साहब, बड़े भाई थोड़े गरीब हैं. उन्हें मकान की मरम्मत करानी है. यदि मरम्मत नहीं हुई तो बरसात में दिक्कत हो सकती है. इसलिए मैं आग्रह करता हूं कि मेरी अर्जी पर विशेष ध्यान दीजिएगा.’’

‘‘नरेंद्र साहब ने अत्यंत मधुर स्वर में कहा, ‘‘इस महीने खास दबाव नहीं है, इसलिए आप का काम आराम से हो जाएगा. आप को 80 हजार रुपए चाहिए न?’’

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प्रताप ने स्वीकृति में सिर हिलाया. नरेंद्र साहब ने फौर्म में लगी रसीद फाड़ कर प्रताप की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अपने भाईसाहब से कहना कि वे

सारी व्यवस्था करें. 3 तारीख को पैसा मिल जाएगा.’’

‘‘थैंक्स,’’ प्रताप ने सैक्रेटरी साहब का हाथ थाम कर कहा, ‘‘थैंक्यू वैरी मच.’’

नरेंद्र द्वारा दी गई रसीद जेब में रख कर प्रताप खड़ा हुआ. उस की एक बहुत बड़ी टैंशन खत्म हो गई थी. पैसा पा कर बेचारा बड़ा भाई खुश हो जाएगा. यदि भैया हर महीने आ कर अपनी किस्त दे जाएंगे तो कोई परेशानी नहीं होगी. सुधा को इस बात का पता ही नहीं चलेगा. सुधा की याद आते ही उस की मुट्ठियां भिंच गईं.

उस की विचारयात्रा आगे बढ़ी. यदि उसे पता चल भी जाएगा तो क्या कर लेगी? ज्यादा से ज्यादा झगड़ा करेगी. जब तक कान सहन करेंगे, सहता रहूंगा. उस के बाद अपने हाथों का उपयोग करूंगा. एक बार उलटा जवाब मिल जाएगा तो उस का दिमाग अपनेआप ही ठिकाने पर आ जाएगा.

सुधा के विचारों से मुक्त होना प्रताप के लिए आसान नहीं था. फिर भी उस ने औफिस की फाइलों में मन लगाने का प्रयास किया. बैंक की बिल्ंिडग के गेट के पास जो मैकेनिक था, प्रताप ने स्कूटर की चाबी दे कर उसे लाने के लिए भेज दिया था. साथ ही, यह भी कह दिया था कि शाम तक वह स्कूटर बना कर तैयार कर देगा.

शाम को प्रताप बैंक से निकला तो मैकेनिक ने स्कूटर बना कर तैयार कर दिया था. वह स्कूटर स्टार्ट कर ही रहा था कि उस के कंधे पर किसी ने हाथ रखा. उस ने पलट कर देखा, दीपेश बैग टांगे खड़ा था. उस के साथ आकाश और दीपक भी थे. दीपेश ने कहा, ‘‘यार, मैं तुझ से मिलने तेरे बैंक आया हूं और तू घर भागने की तैयारी कर रहा है? लगता है, भाभी से बहुत डरता है?’’

‘‘यार, सुबहसुबह ऐक्सिडैंट हो गया था, जिस में यह देखो घुटना छिल गया है,’’ प्रताप ने पैर उठा कर फटे पैंट के नीचे घुटना दिखाते हुए कहा, ‘‘परंतु अब जब तुम तीनों मिल गए हो तो

सारी तकलीफ दूर हो गई है. हम

चारों अंतिम बार कब मिले थे? मेरे खयाल से साल, डेढ़ साल तो हो ही गए होंगे?’’

‘‘नहीं, भाई, पूरे 2 साल हो गए हैं,’’ दीपक ने कहा, ‘‘यहीं मिले थे. फिर सामने वाले होटल में सब ने रात का डिनर किया था. अरे हां यार प्रताप, वह तेरा साथी पान सिंह नहीं दिखाई दे रहा है.’’

‘‘दिखाई कहां से देगा, आजकल कभी उस की सब्जी नहीं पकती तो कभी बेचारे को बासी रोटी मिलती है.’’

‘‘क्या मतलब? तेरी मजाक करने

की आदत अभी भी नहीं गई,’’ आकाश ने कहा.

‘‘सच कह रहा हं. जानते हो, एक दिन मैं बिग बाजार गया. एक किलोग्राम जीरा और कुछ सामान खरीदा. वहां मुझे एक कूपन मिला, जिस से मेरा समान फ्री हो गया. जब से इस बात का पता पान सिंह की बीवी को चला है, वह रोज सुबह उसे लंच में बासी रोटी बांध देती है.’’

‘‘चल, बहुत हो गया. अब उस का ज्यादा मजाक मत उड़ा,’’ दीपेश ने टोका.

दीपेश तो उस के साथ ही देहरादून में बोर्डिंग में रहता था. आकाश और दीपक भी उस के क्लास में साथ ही थे. पान सिंह उस के गांव का ही रहने वाला था, जिस की अनुपस्थिति में वह उस का मजाक उड़ा रहा था. कालेज लाइफ में पांचों की मित्रता सगे भाइयों जैसी थी. 2 साल बाद चारों इकट्ठा हुए थे. फिर चारों बैठ कर बातें करने लगे. बातें करते रात के 9 बज गए. तब दीपेश ने कहा, ‘‘यार, अब तो भूख लगी है, खाने के लिए कुछ करो.’’

‘‘सामने अभी हाल ही एक नया रैस्टोरैंट खुला है, वहां वाजिब दाम में बढि़या खाना मिलता है,’’ प्रताप ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा.

वह अपने तीनों मित्रों के साथ रैस्टोरैंट की ओर बढ़ रहा था, तब भी उस के दिमाग में विचार चल रहे थे. हर बुधवार को मूंग की दाल बनाने का भूत सुधा के दिमाग से निकालना ही पड़ेगा. आने वाले बुधवार को वह मूंग की दाल खाने से साफ मना कर देगा और यहां आसपास तमाम होटल हैं, जा कर खा लेगा. उस ने पक्का निर्णय कर लिया कि कुछ भी हो, इस बार बुधवार को वह मूंग की दाल बिलकुल नहीं खाएगा.

चारों रैस्टोरैंट में जा कर एक मेज पर बैठ गए. इधरउधर निगाहें डाल कर आकाश ने कहा, ‘‘यार प्रताप, रैस्टोरैंट तो अच्छा है. आज की पार्टी मेरी ओर से. पिछले महीने पुत्ररत्न प्राप्त हुआ है, उसी की खुशी में.’’

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फिर तो सभी ने उसे बधाई दी. पुरानी यादों को ताजा करते हुए हंसतेखिलखिलाते उन्होंने खाना खाया. खाना अच्छा था. खाना खाने के बाद उठते हुए प्रताप

ने कहा, ‘‘आज तुम लोग मिले, बहुत अच्छा लगा. रोजाना तो बैंक से सीधे घर.’’

‘‘औफिस से सीधे घर, यही लगभग सभी पुरुषों की कहानी होती है,’’ दीपक ने कहा, ‘‘कालेज लाइफ के भी क्या मजे थे, यार.’’

‘‘अब वे दिन कहानी बन गए हैं. जरा भी देर हो जाती है तो पत्नी हिसाब मांगने लगती है,’’ दीपेश बोला.

खापी कर डकार लेते हुए चारों रैस्टोरैंट से बाहर निकले. प्रताप के तीनों मित्र विदा हो गए तो उस ने भी अपना स्कूटर स्टार्ट किया. 10 बजने में मात्र 20 मिनट बाकी थे. घर पहुंचतेपहुंचते साढ़े 10 तो बज ही जाएंगे. सुधा लालपीली हो रही होगी. दरवाजे पर ही कुरसी डाले बैठी होगी. वर्षों बाद आज पुराने दोस्त मिले थे, उन के साथ भी तो बैठना जरूरी था. स्कूटर की गति के साथसाथ उस के विचारों की गति भी बढ़ती जा रही थी. देर होने पर सुधा अवश्य बवाल करेगी. वह लड़ने को भी तैयार होगी. इस बात का उसे पूरा आभास था. वह होंठों ही होंठों में मुसकराते हुए बड़बड़ाया, ‘मुझे पता है वह झगड़ा करेगी. लेकिन यदि आज उस ने झगड़ा किया तो मैं उस का वह हश्र करूंगा जिस की उस ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी.’

प्रताप घर पहुंचा. उस के घर में घुसते ही सुधा ने जलती नजरों से पहले प्रताप की ओर, फिर घड़ी की ओर देखा. उस के बाद कर्कश स्वर में बोली, ‘‘अब तक कहां थे? किस के साथ घूम रहे थे?’’

‘‘तुम्हारी बहन के साथ घूम रहा था,’’ दांत भींच कर प्रताप ने कहा.

प्रताप ऐसा जवाब देगा, सुधा को उम्मीद नहीं थी. उस ने आंखें फाड़ कर प्रताप की ओर देखा. फिर आगे बढ़ कर प्रताप की आंखों में आंखें डाल कर चीखते हुए बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने?’’

‘‘जो तुम ने सुना,’’ प्रताप ने दृढ़ता और आत्मविश्वास के साथ कहा.

‘‘बेशर्म, कुछ लाजशर्म है या नहीं?’’ सुधा ने प्रताप का कौलर पकड़ कर झकझोरते हुए कहा, ‘‘नीच कहीं के, इस तरह की बात कहते शर्म नहीं आती?’’

‘‘पहले तुम अपने बारे में सोचो,’’ प्रताप ने सुधा से कौलर छुड़ाते हुए शांति से कहा, ‘‘घर से बाहर निकलने पर रास्ते में बीस तरह की परेशानियां आती हैं. पति को घर आने से जरा सी देर हो जाए तो शांति से पूछना चाहिए. वह जो कहे उसे सुनना चाहिए. ऐसा करने के बजाय तुम रणचंडी बन जाती हो. मेरी समझ में यह नहीं आता कि हमेशा तुम उलटा ही क्यों सोचती हो?’’

‘‘तुम्हारे उपदेश मुझे नहीं सुनने,’’ सुधा की आंखों से आग बरस रही थी. वह तेज स्वर में बोली, ‘‘तुम ने जो कहा है वह मैं मम्मीपापा को फोन कर के बताऊंगी.’’

‘‘तुम्हें जिस से भी कहना हो, कह देना,’’ प्रताप ने कंधे उचका कर कहा, ‘‘साथ ही तुम ने जो पूछा है वह भी बता देना. और हां, देर क्यों हुई, यह जरूर बता देना,’’ कह कर प्रताप ने अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाया. घुटने पर फटी पैंट और खून के दाग स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. उस ने पैंट उठा कर घुटने पर बंधी पट्टी दिखाते हुए कहा, ‘‘लहूलुहान हो कर भी घर पहुंचो, तब भी तुम्हारे दिमाग में उलटीसीधी बातें ही आती हैं.’’

प्रताप के पैर में लगी चोट देख कर सुधा चुप रह गई. वह गरदन झुका कर कुछ सोचने लगी तो उंगली से इशारा कर के प्रताप थोड़ा ऊंचे स्वर में बोला, ‘‘तुम्हारे पास बुद्धि है. कभी उस का भी उपयोग कर लिया करो. हमेशा तुम्हारा व्यवहार एक जैसा ही रहता है. आदमी के साथ कभी भी, कुछ भी हो सकता है.’’

प्रताप के पैर में लगी चोट देख कर सुधा सहम सी गई थी. एक तो प्रताप को चोट लग गई थी. फिर 4 साल में पहली बार प्रताप ने इस तरह सुधा को जवाब दिया था. वह आश्चर्य से आंखें फाड़े प्रताप को ही ताक रही थी. प्रताप ने उसे हिकारतभरी नजरों से देखा. आज वह अपने मन की भड़ास निकाल रहा था, ‘‘तुम अपने व्यवहार को सुधारो, स्वभाव को बदलो और इंसान की तरह रहना सीखो. नहीं सीखा तो फिर मैं सिखा दूंगा.’’

सुधा आंखें फैलाए, होंठ भींचे प्रताप की बातें सुनती रही. प्रताप का आज जो मन हो रहा था, बके जा रहा था. सुधा से सहन नहीं हुआ तो वह मारे गुस्से के पैर पटकते हुए रसोई में चली गई.

प्रताप ने बैडरूम में जा कर कपड़े बदले और लेट गया.

सवेरे उठ कर वह बहुत खुश था. शरीर की थकान एक ही रात में उतर गई थी. फटाफट फ्रैश हो कर वह अखबार ले कर पढ़ने बैठ गया. एक जागरूक नागरिक ने टै्रफिक पुलिस को नींद से जगाया, हैडिंग के साथ उस का समाचार छपा था. उस के द्वारा फैक्स किए गए पत्र का मुख्य अंश भी छपा था. वह खुशी से झूम उठा. होंठों को गोल कर के सीटी बजाते हुए बाथरूम में घुसा.

सुधा आश्चर्य से प्रताप की प्रत्येक अदा को ध्यान से देख रही थी. प्रताप खाने के लिए बैठा तो सुधा उस की बगल में आ कर खड़ी हो गई. पिछली रात प्रताप ने उस के साथ जो व्यवहार किया था उस की नाखुशी अभी भी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह भी कोई कच्ची मिट्टी की नहीं बनी थी. क्रैडिट सोसायटी से रुपए ले कर बड़े भाई को देने वाली बात अभी भी उस के दिमाग में घूम रही थी. प्रताप के चेहरे पर नजरें जमा कर आहिस्ता से बोली, ‘‘भैया को फोन कर दिया था न?’’ सुधा ने यह बात आज जिस तरह कही थी, उस में कल जैसी उग्रता नहीं थी. सुधा को शांति से बात करते देख प्रताप को आश्चर्य हुआ था.

मुंह में निवाला डाल कर प्रताप ने सिर हिला दिया. सुधा का चेहरा खिल उठा था. सुधा के चेहरे पर एक निगाह डाल कर प्रताप मन ही मन बड़बड़ाया, ‘उन्हें तो मैं इस तरह पैसा दूंगा कि तुझे पता ही नहीं चलेगा.’

जूते पहन कर प्रताप ने स्कूटर की  चाबी ली और दरवाजा बंद कर  के बाहर आ गया. सीढि़यों से उतर कर स्कूटर के पास पहुंचा तो देखा तंबाकू और गुटखे के पाउच स्कूटर पर पड़े थे. सब्जी का कुछ कचरा स्कूटर की सीट पर तो कुछ फुटरैस्ट पर पड़ा था. यह देख कर प्रताप की सांस तेज हो गई. उस ने ऊपर की ओर देखा. संयोग से तीसरी मंजिल पर रहने वाले दंपती बालकनी में खड़े थे. प्रताप ने चीख कर कहा, ‘‘अरे ओ जंगलियो,’’ प्रताप इतने जोर से चीखा था कि अगलबगल फ्लैटों में रहने वाले लोग बाहर आ गए थे. सभी की आंखों में आश्चर्य था. मारे गुस्से के प्रताप कांप रहा था.

प्रताप ने अपने दाहिने हाथ की उंगलियां बालकनी की ओर उठा कर कहा, ‘‘मैं तुम से ही कह रहा हूं. कोई कुछ कहता नहीं है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि गंदगी करने का ठेका तुम्हें मिल गया है. नीचे भी आदमी रहते हैं, जानवर नहीं. इस तरह कचरा फेंकने में आप लोगों को शर्म भी नहीं आती?’’

प्रताप जिस तरह चीखचीख कर अपनी बात कह रहा था, उस से सभी पड़ोसी स्तब्ध रह गए थे. दरवाजे पर खड़ी सुधा की आंखों में भी आश्चर्य था. प्रताप दांत पीस कर बोला, ‘‘सुन लो, आज के बाद यदि कचरा नीचे आया तो सारा कचरा समेट कर मैं तुम्हारे घर में फेंक दूंगा.’’

सभी की नजरें तीसरी मंजिल की बालकनी पर खड़े दंपती पर जम गई थीं. जबकि पतिपत्नी नीचे खड़े प्रताप को एकटक ताक रहे थे. प्रताप ने जो कहा था, उस का असर झांक रहे लोगों पर क्या पड़ा, यह देखने के लिए प्रताप ने चारों ओर नजरें दौड़ाईं. सभी लोग तीसरी मंजिल पर खड़े पतिपत्नी को हिकारत भरी निगाह से देख रहे थे. फिर उस ने विजेता की तरह गर्व के साथ स्कूटर में किक मारी. स्कूटर स्टार्ट हुआ तो सवार हो कर सड़क पर आ गया. आज सड़क पर बसें कायदे से खड़ी थीं. ट्रैफिक पुलिस भी चौराहे पर मुस्तैदी से खड़ा था. इस का मतलब उस की कार्यवाही का असर हुआ था. परंतु यह सब कितने दिन चलने वाला था.

उस ने बैंक में जैसे ही प्रवेश किया, सामने बैठे मैनेजर साहब ने पूछा, ‘‘भई प्रताप, तुम्हारा पैर कैसा है?’’

‘‘ठीक है, बैटर दैन यस्टरडे,’’ खुश होते हुए प्रताप ने कहा. उस ने अपनी सीट की ओर बढ़ते हुए सोचा, बेटा लाइन पर आ गया. सिधाई का जमाना नहीं रहा. एक बार आंखें लाल कर दो, सभी लाइन पर आ जाते हैं. उस दिन उस ने बैंक में काफी हलकापन महसूस किया. मैनेजर साहब का चमचा दिनेश 2 बार उस की मेज पर आ कर हालचाल पूछ गया था. उस ने चाय भी पिलाई थी. शाम को बैंक से घर जाते हुए वह काफी खुश था. स्कूटर खड़ा करते हुए उस ने देखा, आज पूरा मैदान साफ था. वह स्कूटर खड़ा कर रहा था, तभी सामने वाले फ्लैट में रहने वाले सुधीर ने उस के पास आ कर शाबाशी देते हुए कहा, ‘‘सुबह आप ने बहुत अच्छा किया. ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही करना चाहिए. यदि आदमी होंगे तो अब ऐसा कुछ नहीं करेंगे.’’

व्यंग्य: मेरा उधार लौटा दो

लेखक-  अशोक गौतम 

मैं थोड़ाबहुत लिखलाख लेता हूं, इधरउधर से मारमूर कर. इसी के बूते आज अपने देश का मूर्धन्य हो धन्य हो गया हूं. मुझे लिखना आता हो या न पर चुराने की कला में मैं सिद्धहस्त हूं. दो लाइनें इस की उठाईं तो दो उस की और हो गई धांसू रचना तैयार. नहृदयी उसे सुनते हैं तो आहआह कर उठते हैं. उन की इसी आहआह का परिणाम है कि न चाहते हुए भी मेरे हाथ औरों के संग्रह को खंगालने के लिए अपनेआप ही उठ जाते हैं.

लाइनें चुराने की कला में निपुण हूं भी क्यों न? इत्ते साल जो हो गए हैं यह काम करतेकरते. अब तो इस काम में लगे सिर के बाल भी सफेद होने लग गए हैं. कई बार सोचता हूं कि यह चोरीचकारी का काम छोड़ दूं और जिंदगी में कम से कम तो दोचार लाइनें अपनेआप लिखूं. पर जब सामने ढेर सारा मित्रों का लिखा हुआ आता है तो मेरी सृजनात्मकता जवाब दे जाती है.

पीने वाला जैसे पिए बिना नहीं रह सकता, नेता जैसे अंटशंट कहे बिना नहीं रह सकता, हमारी गली का लाला जैसे किलो के बदले 900 ग्राम दिए बिना नहीं रह सकता, वैसे ही मैं किसी के भी साहित्य पर हाथ साफ किए बिना नहीं रह सकता. अब तो यह चोरनेचुराने की लत ऐसी लग गई है कि बिन कुछ चुरा कर लिखे बिना रोटी ही नहीं पचती. लाख गोलियां हाजमोला खा लूं तो खा लूं, पर क्या मजाल जो खट्टे डकार रुक जाएं.

मुझ में दूसरी अच्छी आदत है मैं किसी से उधार ले कर लौटाता नहीं. मैं किसी से उधार ले कर वैसे ही भूल जाता हूं जैसे नेता चुनाव के वक्त जनता से वादे  कर चुनाव जीतने के बाद भूल जाते हैं. वैसे भी उधार लेने की चीज है, ले कर देने की नहीं. जो लोग इस सत्य को जान लेते हैं वे सात जनम तक लिया उधार नहीं लौटाते.

उन के लिए बेचारे उधार देने वाले उन के साथ न चाहते हुए भी जन्म लेते रहते हैं कि हो सकता है वे इस जन्म में उन से लिया उधार लौटा दें. सब में शर्म हो सकती है पर मैं ने जो नोट किया है कि उधार ले कर देने के मामले में बहुत कम लोगों में शर्म होती है. और जो उधार ले कर देने के मामले में शर्म फील करें, ऐसी आत्माएं नीच होती हैं. गधे हैं वे जो उधार ले कर लौटाते हैं.

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वे आज फिर अपना दिया उधार मांगने आए थोबड़ा लटकाए, ठिठकते हुए. जैसे उन्होंने मुझे उधार दे कर मुझ पर बड़ा भारी एहसान किया हो. असल में आज की डेट में उधार लेने वाला उधार देने वाले का एहसानमंद नहीं होता. उधार लेने वाला उधार देने वाले पर एहसान करता है. उधार देने वाला उधार लेने वाले की नजरों में भले ही गधा हो, पर वह किसी को उधार देते हुए अपनी नजरों में खुद को गोल्डन जुबली फिल्म के हीरो से कम नहीं समझता. उधार दे कर दिए उधार के वापस आने की चिंता उधार देने वाले की व्यक्तिगत होती है, लेने वाले की नहीं. एक आदर्श कर्जदार वही है जो लिए उधार को देने की रंच भर भी चिंता नहीं करता. मित्रो, उधार ले कर फिर देने की चिंता में घुलते रहे तो उधार ले कर भी जिए तो क्या जिए? मेरी तरह के उधार लेने वालों की इसी प्रवृत्ति का मैं कायल हूं.

सच कहूं, उधार लेने वाले को जितना उधार दिया उस को वापस लेने की उतनी चिंता नहीं होती है जितनी देने वाले को होती है. उधार ले कर भी चिंता में जिए तो क्या जिए? उधार देने वालों की इसी प्रवृत्ति का मैं कायल हूं. उधार देने वाले अभी फिर आते ही मेरे आगे दोनों हाथ जोड़े गिड़गिड़ाते बोले, ‘यार, अब की मेरा दिया लौटा दे. बड़े साल हो गए. सोच रहा था तुम मेरा दिया लौटा देते तो अब के दीवाली पर कमरे में सफेदी ही करवा लेता. कैसे कमीने साहित्यकार हो तुम भी. देखो उन को जिन्होंने सामाजिक असहिष्णुता के विरोध में अपने सम्मान तक लौटा दिए और एक तुम हो मेरा उधार तक नहीं लौटा रहे?

‘हे मेरी आस्तीन के साहित्यकार दोस्त, जानता हूं, सम्मान के नाम पर तुम्हारे पास भूजी भांग भी नहीं पर कम से कम इस परंपरा का निर्वाह करते मेरा उधार ही लौटा देते तो मुझे भी लगता कि…’

‘हद है यार, जब भी मिलते हो बस उधार लिए को देने की ही परोक्षअपरोक्ष अपील करते हो. दोस्तों को उधार देने के बाद क्या ऐसे पेश आते हैं? तुम मरे जा रहे हो क्या? हम मरे जा रहे हैं क्या?

‘जब कोई नहीं मर रहा तो चिंता काहे की? सच कहूं, ऐसा उधार दे कर मांगने वाला बेशर्म मैं ने आज तक नहीं देखा. रही बात लौटाने की, तो यह व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है. वे सम्मान लौटा रहे हैं, उन की मरजी.

‘मैं तुम से उधार लिया लौटाऊं या न, यह मेरी मरजी,’ इतना कहने के बाद कोई गधा ही आगे कहने की हिम्मत करेगा. वे भी नहीं कर पाए. उधार देने वाले की यही तो एक सब से बड़ी खासियत होती है भाई साहब कि वह उधार देने के बाद गुर्राता नहीं, गिड़गिड़ाता है.  द्य

जीवन की मुसकान

मातापिता उंगली थाम अपने बच्चों को कदम उठाना सिखाते हैं, पर वृद्धावस्था में वे अपना कदम उठाने के लिए बच्चों की ओर ताकते रह जाते हैं. धुंधलाई दृष्टि, बच्चों का सहारा ढूंढ़ती है और सहारा न मिलने पर निराश हो उठती है, एक ऐसा ही अनुभव मैं ने महसूस किया.

रिश्ते की 85 वर्षीय बूआजी अपने इकलौते पोते आशीष की शादी का बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थीं. उन का कहना था कि दुनिया से जाने से पहले अपने आशीष की दुलहन देख जाऊं. बस अब और कोई इच्छा नहीं है. फूफाजी को गुजरे 4 वर्ष हो गए थे. अब बूआजी पिछले 2 वर्षों से बिस्तर पर ही थीं, पर वे एक ही रट लगाए थीं कि मैं भी शादी में जाऊंगी, फेरे देखूंगी. कहते हैं न मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है. पोता उन का बचपन से लाडला रहा. बस उस की शादी देखने की और पोता और उस की नईनवेली दुलहन को अपने हाथों से आशीष देने की अपनी इच्छा पूरी करना चाहती थीं.

बूआजी की बहू यानी मेरी भाभी इस बात पर चिढ़ रही थीं कि भला इन को कौन ले जाए और कैसे, कहतीं, ‘मोहमाया ही नहीं छूटती इन की.’ तब मैं ने बूआ की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. भाभी को आश्वस्त कर दिया कि वे बेफिक्री से शादी संभालें. बूआ की इतनी इच्छा है तो उसे मैं पूरा करने की पूरीपूरी कोशिश करूंगी. मेरी बूआ हैं मेरा भी तो इन के प्रति कुछ करने का फर्ज बनता है.

एडल्ट डाइपर पहना कर बूआजी को अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर लिटा दिया और ह्वीलचेयर फोल्ड कर के साथ रख ली. उन्होंने मजे से फेरे देखे, अपने कांपते हाथों से दूल्हादुलहन को आशीष दिया.

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शादी की जब सारी रस्में पूरी हो गईं तो मेरे दोनों हाथ थामे और स्नेह से चूम लिया. उस समय उन की आंखें खुशी से बरस रही थीं. आसपास के सभी लोगों ने मेरी तारीफ की और तालियां भी बजाईं.

सही बात तो यह है कि जितनी बूआजी को खुशी हुई उस से ज्यादा मुझे हुई कि मैं उन को एक मनचाही संतुष्टि दे सकी. ऐसा लगा मानो जिंदगी की बहुत बड़ी खुशी पा ली है. विवाह के एक हफ्ते बाद ही बूआ जो  रात को सोईं तो फिर उठी ही नहीं. उन के चेहरे पर शांति की आभा थी.

वृद्धजनों को थोड़ी सी तरकीब से खुशी दे पाना, अधिक कठिन नहीं होता. बस, थोड़ा धैर्य और इच्छा का साथ चाहिए होता है.

Crime Story: प्यार ही बना प्यार की राह का कांटा

घंटी बजते ही फराह ने मोबाइल उठा कर स्क्रीन पर नजर डाली तो अनायास ही उस के मुंह से निकल गया, ‘अम्मी का फोन.’ फोन रिसीव करते हुए उस ने उत्साह से कहा, ‘‘अम्मी सलाम.’’

‘‘वालेकुम सलाम, कैसी हो फराह?’’ अम्मी ने पूछा.

‘‘ठीक हूं अम्मीजान, आप कैसी हैं?’’

‘‘सब ठीक है बेटी, आप के शौहर हैं घर पर?’’

‘‘वह तो दुकान पर गए हैं. क्यों, क्या बात है?’’ फराह ने पूछा.

‘‘कोई खास बात नहीं है. आज सलीम मामू के बेटे शोएब की बर्थडे पार्टी है, आप दोनों को भी आना है. शोएब खासतौर पर तुम दोनों के लिए कह कर गया है.’’

‘‘हम उन से पूछ लेंगे, अगर इजाजत दे दी तो जरूर आएंगे.’’ कह कर फराह ने फोन काट दिया. इस के बाद उस ने अपने शौहर पुष्पेंद्र को फोन कर के घर बुला लिया. पुष्पेंद्र ने इस तरह बुलाने की वजह पूछी तो फराह ने कहा, ‘‘अम्मी का फोन आया था, कह रही थीं कि हम दोनों को मामू के यहां बर्थडे पार्टी में आना है.’’

‘‘तुम ने क्या कहा?’’ पुष्पेंद्र ने पूछा.

‘‘मैं क्या कहती, कह दिया कि इजाजत मिली तो जरूर आ जाएंगे.’’ फराह बोली.

‘‘तुम चली जाओ. बेटी को भी साथ ले जाओ. मैं तुम दोनों को छोड़ आऊंगा. तुम तैयारी करो, जब तैयार हो जाओ तो मुझे फोन कर देना, मैं दुकान से आ जाऊंगा.’’ पुष्पेंद्र ने कहा.

जवाब में फराह बोली, ‘‘आप बिना वजह परेशान होंगे. हम दोनों रिक्शे से चले जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, पर रात गहराती दिखे तो फोन कर देना. मैं छोड़ आऊंगा.’’ कह कर पुष्पेंद्र दुकान पर चला गया.

फराह बेटी स्नेहा को तैयार कर के खुद तैयार होने लगी. तैयार होने के बाद फराह बेटी को ले कर रिक्शे से मायके पहुंचीं तो वहां उस के बड़े भाई तारिक और अम्मी तैयार थे, उन्हें ले कर फराह शोएब की बर्थडे पार्टी में शामिल होने मामू के घर पहुंच गईं.

चांद सी सुंदर फराह को आया देख शोएब ने पलकें बिछा दीं. जब तक फराह वहां रही, वह उसी के इर्दगिर्द घूमता रहा, उस की खातिरदारी में लगा रहा. घर जाने से पहले फराह ने शोएब से हंसते हुए कहा, ‘‘शोएब, अब मैं आप के निकाह की दावत खाने वलीमा में ही आऊंगी.’’

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‘‘आप मुझे बददुआ मत दीजिए. मैं निकाह की बात ख्वाब में भी नहीं सोच सकता.’’ शोएब ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘क्यों, कहीं प्यार में चोट खाई है क्या आप ने?’’ चंचल स्वभाव की फराह ने यूं ही पूछ लिया.

‘‘कुछ लोगों को तो मन की मुरादें मिल जाती हैं, जबकि कुछ लोग मेरी तरह रह जाते हैं.’’

‘‘क्यों नहीं हो पाई मुराद पूरी?’’ फराह ने यूं ही पूछ लिया.

‘‘मेरी ही गलती थी फराह, जिसे मैं चाहता था, उस से कभी कह नहीं पाया कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं.’’

‘‘कौन थी वह और अब कहां है? आप मुझे बताएं. मैं बात करती हूं उस से.’’ फराह ने अफसोस जताते हुए शोएब से मदद की पेशकश की.

‘‘क्या करेंगी जान कर आप?’’ कह कर शोएब ने पल्ला झाड़ना चाहा, पर फराह अपनी आदत से मजबूर थी.

वह उस के पीछे पड़ने वाले अंदाज में बोली, ‘‘शोएब, अगर तुम उसे दिल से चाहते हो तो मैं वादा करती हूं, वह तुम्हारे कदमों में होगी. मुझे पूरा यकीन है, वह तुम्हें जरूर मिल जाएगी.’’

‘‘अगर हम आप से कहें कि वह लड़की आप ही थीं तो..?’’ शोएब ने मन की बात कह दी.

‘‘शोएब, लगता है आप की दीवानगी से आप का दिमाग घूम गया है.’’ चेहरे पर हलका सा गुस्सा लाते हुए फराह ने कहा, ‘‘आप मेरे मुंह पर ही मेरी मोहब्बत को गाली दे रहे हैं. यह जानते हुए भी कि मैं किसी की बीवी हूं और एक बच्ची की मां भी.’’

‘‘आप खामख्वाह ताव में आ गईं. आप पूछती रहीं और मैं टालने की कोशिश करता रहा. लेकिन आप ने मुझे मजबूर कर दिया तो मैं अपने जज्बात को छिपा नहीं पाया.’’ कह कर शोएब वहां से चला गया.

फराह अपनी 7 साल की बेटी स्नेहा के साथ घर लौट आई. दुकान पर दोस्तों के साथ गप्पें मारता पुष्पेंद्र उसी के फोन का इंतजार कर रहा था. रात साढ़े 10 बजे फराह ने फोन कर के कहा, ‘‘आज घर नहीं आना क्या?’’

‘‘तुम अकेली ही आ गईं? मैं तो तुम्हारे फोन का इंतजार कर रहा था, बता देतीं तो मैं आ जाता लेने.’’

‘‘बड़े भाई छोड़ गए थे. आप घर आ जाइए.’’ कह कर फराह ने पूछा, ‘‘सब्जी क्या बनाऊं?’’

‘‘खाना बनाने की जरूरत नहीं है. मैं ने होटल से मंगा कर खा लिया है. मैं घर आ रहा हूं.’’ कह कर पुष्पेंद्र ने दुकान का शटर गिरा कर ताले लगाए और मोटरसाइकिल से घर के लिए चल पड़ा.

फराह और पुष्पेंद्र एकदूसरे पर जान न्यौछावर करते थे. दोनों की मुलाकात सन 2006 में अलीगढ़ शहर के एक सिनेमाघर में हुई थी. पुष्पेंद्र शहर के थाना सासनीगेट के मोहल्ला खिरनीगेट (हाथरस अड्डा) निवासी हेमेंद्र अग्रवाल का बड़ा बेटा था. वह अपने पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाता था.

जबकि फराह शहर के थाना सिविललाइंस की पौश कालोनी मैरिस रोड निवासी मोहम्मद शमीम की बेटी थी. उन की 2 संतानों में बड़ा बेटा था तारिक और छोटी बेटी थी फराह. मांबाप के लाड़प्यार ने खूबसूरत फराह को बंदिशों से आजाद कर रखा था.

पुष्पेंद्र से हुई मुलाकात में न जाने ऐसी क्या कशिश थी कि फराह के दिल में अजीब सी हलचल मच गई थी. यही वजह थी कि सिनेमाहाल में बैठेबैठे दोनों ने एकदूसरे के नाम तक जान लिए थे. इतना ही नहीं, दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर भी दे दिए थे.

इस के बाद दोनों के बीच मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं. इस का नतीजा यह निकला कि फराह और पुष्पेंद्र ने जल्दी ही एकदूसरे के दिलों में ऐसी जगह बना ली, जहां से पीछे लौटना संभव नहीं था. दोनों ने प्यार में साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाते हुए वादा कर लिया कि जल्दी ही शादी के बंधन में बंध कर अपनी अलग दुनिया बसा लेंगे.

आखिर पुष्पेंद्र ने फराह की जिद पर कोर्ट मैरिज कर ली. जब वह फराह को दुलहन के रूप में ले कर घर पहुंचा तो उसे उलटे पांव लौटना पड़ा. घर वालों ने मुसलिम लड़की को बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया और साफ कह दिया कि वह उसे ले कर कहीं दूसरी जगह जा कर रहे.

पुष्पेंद्र ने जरा भी हिम्मत नहीं हारी. फराह को ले कर वह कभी कहीं तो कभी कहीं रहता रहा. दूसरी ओर कट्टरपंथियों ने फराह द्वारा एक हिंदू युवक से शादी करने की बात को तूल दे कर अलीगढ़ में तनाव की स्थिति पैदा करने की कोशिश की.

लेकिन फराह की दृढ इच्छाशक्ति के सामने कट्टरपंथियों को घुटने टेकने पड़े. धीरेधीरे माहौल शांत हो गया. कुछ समय बाद पुष्पेंद्र ने फराह के नाम शहर की पौश कालोनी मैरिस रोड पर नंदनी अपार्टमेंट में 55 लाख रुपए में एक शानदार फ्लैट खरीदा और उसी में रहने लगा. पुष्पेंद्र थोक दवाओं की बाजार फफाला मार्केट में दवाइयों की थोक की दुकान थी. वह अपनी उसी दुकान पर बैठता था. चूंकि आमदनी अच्छी थी, इसलिए उसे परिवार द्वारा अलग कर दिए जाने के बाद भी कोई परेशानी नहीं हुई.

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डेढ़ साल बाद फराह और पुष्पेंद्र एक बेटी के मातापिता बन गए. उन्होंने बेटी का नाम रखा स्नेहा. धीरेधीरे 4 साल गुजर गए. गुजरते वक्त के साथ फराह के मायके वालों की उस के प्रति कटुता खत्म होती गई. जब फराह की मां का दिल नहीं माना तो उन्होंने एक दिन बेटी से फोन पर बात कर के घर आने का न्यौता दे दिया.

पुष्पेंद्र से पूछ कर फराह बेटी स्नेहा को ले कर मायके चली गई. जब मायके वालों को पता चला कि पुष्पेंद्र ने जो फ्लैट खरीदा है, वह फराह के नाम है तो उन्हें खुशी हुई. इस के बाद फराह मायके आनेजाना शुरू हो गया. धीरेधीरे मायके के अलावा दूसरी करीबी रिश्तेदारियों में भी उस का आनाजाना शुरू हो गया.

इसी के चलते फराह शोएब की बर्थडे पार्टी में गई थी, जहां शोएब से उस की जो बातें हुईं, उन्हें सुन कर उस के दिल को चोट सी लगी.

29 अक्तूबर, 2016 की रात फराह को जो खबर मिली, उसे सुन कर वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. छोटी दिवाली की रात 9 बजे से पहले फराह ने पुष्पेंद्र को फोन कर के कहा था, ‘‘आप कह कर गए थे कि तैयार रहना बाजार चलेंगे. मैं तैयार हूं, आप आ जाइए.’’

पुष्पेंद्र ने 15 मिनट में आने को कह कर फोन काट दिया. वह दुकान बंद कर के केलानगर के पास पहुंचा ही था कि पीछा कर रहे बदमाशों ने उसे घेर लिया. उन्होंने पहले उस के साथ लूटपाट की, उस के बाद उसे गोली मार कर हत्या कर दी. लूटा हुआ माल ले कर वे फरार हो गए.

यह सूचना थाना क्वारसी पुलिस को मिली तो वह तुरंत घटनास्थल पर पहुंची. इंसपेक्टर श्रीप्रकाश चंद्र यादव ने आननफानन में घायल पुष्पेंद्र को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

श्रीप्रकाश चंद्र यादव को पता चल गया था कि मृतक थोक दवा विक्रेता पुष्पेंद्र अग्रवाल है. उन्होंने उस की पत्नी फराह के साथसाथ उस के घर वालों को भी घटना की सूचना दे दी थी. हत्या की सूचना पा कर फराह का रोरो कर बुरा हाल था. वह बदहवास हालत में अस्पताल पहुंची तो पति की लाश देख कर बेहोश हो गई.

पुष्पेंद्र की विधवा मां राजरानी और घर के अन्य लोग भी रोतेबिलखते अस्पताल पहुंचे. इस घटना से क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी. पुष्पेंद्र की हत्या की खबर पा कर जिला कैमिस्ट ऐंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह टिल्लू, महामंत्री आलोक गुप्ता भी अन्य पदाधिकारियों के साथ अस्पताल आ गए थे. उन्होंने पुलिस के प्रति आक्रोश जताते हुए हत्यारों को तुरंत पकड़ने की मांग की.

दवाई व्यापारी की हत्या की सूचना पर एसएसपी राजेश पांडेय, एसपी (सिटी) अतुल श्रीवास्तव, सीओ तृतीय राजीव सिंह भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल का निरीक्षण कर के सभी लोग अस्पताल गए, जहां अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह टिल्लू सहित तमाम दवा विक्रेताओं की पुलिस से नोकझोंक भी हुई. काफी मशक्कत के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा सका.

लूट और हत्या का यह मामला थाना क्वारसी में अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया. एसपी (सिटी) के निर्देशन में थाना क्वारसी के थानाप्रभारी श्रीप्रकाश चंद्र यादव की टीम हत्यारों की टोह में लग गई. दवा विक्रेताओं की एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह टिल्लू ने पुलिस को अल्टीमेटम दिया कि अगर 7 दिनों में हत्याकांड का खुलासा नहीं हुआ तो सभी दवा व्यापारी हड़ताल करने को बाध्य हो जाएंगे.

30 अक्तूबर, 2016 दिवाली के दिन पोस्टमार्टम के बाद पुष्पेंद्र के शव को उस के पैतृक निवास हाथरस अड्डा, खिरनीगेट लाया गया, जहां नारेबाजी के साथ पुलिस को अल्टीमेटम दे कर अंतिम संस्कार किया गया. दवा व्यापारियों ने फफाला मार्केट बंद करने का ऐलान कर दिया. अगले दिन थोक दवा व्यापारियों ने एकजुटता का परिचय देते हुए सभी दुकानें बंद रखीं.

श्रीप्रकाश चंद्र यादव को घटना के तीसरे दिन इस बात का अहसास हो गया था कि पुष्पेंद्र की हत्या में अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं उस की पत्नी फराह का हाथ है. लेकिन शोकग्रस्त पत्नी की हालत देखते हुए वे उस पर हाथ डालने में घबरा रहे थे. वैसे भी जब तक ठोस सबूत हाथ में न आ जाएं, तब तक पुलिस चुप ही रहना चाहती है. बहरहाल श्रीप्रकाश चंद्र रातदिन लग कर इस केस की कडि़यां जोड़ने में लगे थे.

पुलिस जब 7 दिनों में हत्याकांड का खुलासा करने के आश्वासन को पूरा नहीं कर सकी तो अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह टिल्लू ने शहर भर की दवा की दुकानों को बंद करने का ऐलान कर दिया. शहर भर की दवा की दुकानें यहां तक कि निजी नर्सिंग होम के अंदर की दुकानों पर भी ताले जड़ दिए गए. 2 दिन तक दुकानों के बंद होने से मरीज इधरउधर भटकते रहे.

तीसरे दिन शहर के साथ ब्लौक और देहातों की दवाई की दुकानें भी बंद रखने का ऐलान कर दिया गया. पूरे अलीगढ़ जिले के दवाई व्यापारी दुकानें बंद कर के आंदोलन में शामिल हो गए. मरीजों की परेशानी के साथ पुलिस की कार्यशैली की चारों ओर भर्त्सना होने से एसएसपी राजेश पांडेय ने एसोसिएशन के सभी पदाधिकारियों के साथ मीटिंग कर कहा कि पुलिस हत्याकांड के खुलासे के एकदम करीब पहुंच चुकी है, इसलिए उन्हें 72 घंटे की मोहलत और दी जाए.

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अध्यक्ष शैलेंद्र सिंह टिल्लू और अन्य उपस्थित पदाधिकारियों ने 72 घंटे की मोहलत दे कर दुकान खोलना स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस के काम में तेजी आ गई. एसपी सिटी के निर्देशन में लगी सर्विलांस टीम प्रभारी के साथ तेजतर्रार एसओजी प्रभारी छोटेलाल के अलावा कई अन्य तेजतर्रार पुलिस वालों को भी इस में लगा दिया गया.

2 दिनों तक यह टीम श्रीप्रकाश चंद्र यादव के साथ पुष्पेंद्र की हत्या व लूट के खुलासे में लगी रही, तब कहीं जा कर श्रीप्रकाश चंद्र को उम्मीद की किरण दिखाई दी. उन का अनुमान सही साबित हुआ. सीसीटीवी कैमरे और सर्विलांस की मदद से पता चला कि पुष्पेंद्र की हत्या में उस की पत्नी फराह और उस के प्रेमी शोएब, निवासी 179 नई आबादी, केलानगर, मैरिस रोड का हाथ था.

श्रीप्रकाश चंद यादव ने महिला पुलिस की मदद से मृतक की पत्नी फराह और उस के प्रेमी शोएब को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस पूछताछ में फराह ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी और अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

हत्या किस उद्देश्य से की गई, उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया. शोएब ने भी हत्या और लूट की कहानी बयान करते हुए अपने साथियों के नामपते बता दिए. पुलिस ने समय गंवाए बिना अरहम, निवासी मोहल्ला रंगरेजान मामूभांजा, थाना गांधीपार्क, अलीगढ़, दीपक चौधरी निवासी गांव आमरी, शिकोहाबाद, जिला फिरोजाबाद को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस उस के एक अन्य साथी आशू को गिरफ्तार नहीं कर पाई.

पुलिस ने गिरफ्तार किए गए शोएब, अरहम और दीपक से लूटे गए 1 लाख 53 हजार रुपयों में से 42 हजार रुपए के अलावा एक 32 बोर की पिस्टल, 2 तमंचे, कारतूस, करिज्मा बाइक नंबर यूपी81ए के5766, बैग और चाबियां बरामद कर लीं.

पूछताछ में फराह ने हत्या के बारे में विस्तार से जो कुछ बताया, उस से पुष्पेंद्र की हत्या की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

फराह जब शोएब की बर्थडे पार्टी में गई थी, वहां शोएब से हुई बातों के बाद उस का खिंचाव शोएब की ओर होने लगा था. फोन पर दोनों के बीच घंटों बातें होने लगी थीं. इस के बाद दोनों की घर के बाहर मुलाकातें भी होने लगीं. इन मुलाकातों ने जब जिस्मानी संबंध का रूप ले लिया तो फराह पूरी तरह शोएब की होने की योजना बनाने लगी.

अब वह पुष्पेंद्र के प्यार को भूल जाना चाहती थी. लेकिन शोएब की वह तभी बन सकती थी, जब पुष्पेंद्र रास्ते से हट जाता. इस के लिए वह शोएब के साथ मिल कर पुष्पेंद्र को रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगी.

पुष्पेंद्र पत्नी में आए बदलाव का जरा भी अंदाजा नहीं लगा सका. फराह की बेरुखी को उस ने बेटी के साथ व्यस्तता माना. उस ने फराह के सामने बेटी की देखरेख के लिए किसी आया को रखने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन उस ने मना कर दिया.

पुष्पेंद्र सुबह दुकान पर जाता था तो रात 9-10 बजे तक लौटता था. इस लंबे वक्त में फराह किस से मिलती है, कहां आतीजाती है? पुष्पेंद्र को भनक तक नहीं थी. जबकि खुद को वफा की देवी बताने वाली फराह अपने प्रेमी के साथ रंगरलियां ही नहीं मनाती थी, बल्कि उस की हत्या की योजना भी बना रही थी.

शोएब भी कम घाघ नहीं था. उस की नीयत पुष्पेंद्र के फ्लैट, बैंकों में जमा धन और फराह व उस की बेटी की लाखों की एफडी पर थी, जो सब मिला कर करोड़ों की रकम थी. फ्लैट फराह के ही नाम था, जिस पर वह गिद्धदृष्टि जमाए बैठा था. इसी के लिए उस ने फराह को अपने जाल में फंसाया था.

फराह के प्यार में अंधे पुष्पेंद्र को फराह की साजिश का आभास तक नहीं हुआ. जबकि वह अपने यार के साथ मिल कर उस की हत्या की योजना बना चुकी थी. पहले इन लोगों की योजना पुष्पेंद्र को दुर्घटना में मरवाने की थी. लेकिन इस में उस के बच जाने का डर था, इसलिए उसे गोली मारने का फैसला लिया गया.

शोएब ने अपने साथियों को एकत्र कर के लूट की योजना बना डाली. किसे लूटना है, उस ने अपने साथियों को यह भी बता दिया. दोस्तों को इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि लूट के पीछे शोएब का असल मकसद क्या है.

लूट की तारीख तय हुई 27 अक्तूबर, 2016. लेकिन उस दिन ये लोग कामयाब नहीं हुए. इस के बाद 29 अक्तूबर को पांचों लोग केलानगर तक पुष्पेंद्र के पीछे लगे रहे. मौका मिलते ही उन्होंने उस की स्कूटी रुकवा ली और गन पौइंट पर उस से एक लाख 53 हजार रुपए का बैग छीन लिया.

पुष्पेंद्र ने कोई विरोध नहीं किया. करिज्मा मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे शोएब ने पिस्तौल से 3 गोलियां पुष्पेंद्र के शरीर में उतार कर उसे हमेशाहमेशा के लिए शांत कर दिया. गाड़ी चला रहे आशू ने उस से तुरंत कहा कि जब उस ने चुपचाप रकम हमारे हवाले कर दी थी, तो तूने उस की हत्या क्यों की? शोएब चुप बैठा रहा. काम हो जाने के बाद शोएब ने इस की सूचना फराह को दे दी.

पकड़े जाने के बाद शोएब के साथियों को पता चला कि उस का असल मकसद हत्या करना था. पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के इस पूरी घटना का खुलासा किया. 23 नवंबर, 2016 को फराह, शोएब, अरहम व दीपक चौधरी को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

थाना क्वारसी इंसपेक्टर श्रीप्रकाश चंद्र यादव की भूमिका प्रशंसनीय रही, जिन्होंने लूट और हत्या के दूसरे ही दिन इस गहरी साजिश बताते हुए मृतक की पत्नी को अपने राडार पर ले लिया था. लेकिन ठोस सबूत न मिल पाने की वजह से उन्होंने फराह पर हाथ नहीं डाला था.

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