Hindi Story: वो हो गया नाचने वाली का दीवाना

Hindi Story: ‘‘कितना ही कीमती हो… कितना भी खूबसूरत हो… बाजार के सामान से घर सजाया जाता है, घर नहीं बसाया जाता. मौजमस्ती करो… बड़े बाप की औलाद हो… पैसा खर्च करो, मनोरंजन करो और घर आ जाओ.

‘‘मैं ने भी जवानी देखी है, इसलिए नहीं पूछता कि इतनी रात गए घर क्यों आते हो? लेकिन बाजार को घर में लाने की भूल मत करना. धर्म, समाज, जाति, अपने खानदान की इज्जत का ध्यान रखना,’’ ये शब्द एक अरबपति पिता के थे… अपने जवान बेटे के लिए. नसीहत थी. चेतावनी थी.

लेकिन पिछले एक हफ्ते से वह लगातार बाजार की उस नचनिया का नाच देखतेदेखते उस का दीवाना हो चुका था.

वह जानता था कि उस के नाच पर लोग सीटियां बजाते थे, गंदे इशारे करते थे. वह अपनी अदाओं से महफिल की रौनक बढ़ा देती थी. लोग दिल खोल कर पैसे लुटाते थे उस के नाच पर. उस के हावभाव में वह कसक थी, वह लचक थी कि लोग ‘हायहाय’ करते उस के आसपास मंडराते, नाचतेगाते और पैसे फेंकते थे.

वह अच्छी तरह से जानता था कि जवानी से भरपूर उस नचनिया का नाचनागाना पेशा था. लोग मौजमस्ती करते और लौट जाते. लौटा वह भी, लेकिन उस के दिलोदिमाग पर उस नचनिया का जादू चढ़ चुका था. वह लौटा, लेकिन अपने मन में उसे साथ ले कर. उफ, बला की खूबसूरती उस की गजब की अदाएं. लहराती जुल्फें, मस्ती भरी आंखें. गुलाब जैसे होंठ.वह बलखाती कमर, वह बाली उमर. वह दूधिया गोरापन, वह मचलती कमर. हंसती तो लगता चांद निकल आया हो.

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वह नशीला, कातिलाना संगमरमर सा तराशा जिस्म. वह चाल, वह ढाल, वह बनावट. खरा सोना भी लगे फीका. मोतियों से दांत, हीरे सी नाक, कमल से कान, वे उभार और गहराइयां. जैसे अंगूठी में नगीने जड़े हों.

अगले दिन उस ने पूछा, ‘‘कीमत क्या है तुम्हारी?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘कीमत मेरे नाच की है. जिस्म की है. तुम महंगे खरीदार लगते हो. खरीद सकते हो मेरी रातें, मेरी जवानी. लेकिन प्यार करने लायक तुम्हारे पास दिल नहीं. और मेरे प्यार के लायक तुम नहीं. जिस्म की कीमत है, मेरे मन की नहीं. कहो, कितने समय के लिए? कितनी रातों के लिए? जब तक मन न भर जाए, रुपए फेंकते रहो और खरीदते रहो.’’

उस ने कहा, ‘‘अकेले तन का मैं क्या करूंगा? मन बेच सकती हो? चंद रातों के लिए नहीं, हमेशा के लिए?’’

नचनिया जोर से हंसते हुए बोली, ‘‘दीवाने लगते हो. घर जाओ. नशा उतर जाए, तो कल फिर आ जाना महफिल सजने पर. ज्यादा पागलपन ठीक नहीं. समाज को, धर्म के ठेकेदारों को मत उकसाओ कि हमारी रोजीरोटी बंद हो जाए. यह महफिल उजाड़ दी जाए. जाओ यहां से मजनू, मैं लैला नहीं नचनिया हूं.’’

पिता को बेटे के पागलपन का पता लगा, तो उन्होंने फिर कहा, ‘‘बेटे, मेले में सैकड़ों दुकानें हैं. वहां एक से बढ़ कर एक खूबसूरत परियां हैं. तुम तो एक ही दुकान में उलझ गए. आगे बढ़ो. और भी रंगीनियां हैं. बहारें ही बहारें हैं. बाजार जाओ. जो पसंद आए खरीदो. लेकिन बाजार में लुटना बेवकूफों का काम है.

‘‘अभी तो तुम ने दुनिया देखनी शुरू की है मेरे बेटे. एक दिल होता है हर आदमी के पास. इसे संभाल कर रखो किसी ऊंचे घराने की लड़की के लिए.’’

लेकिन बेटा क्या करे. नाम ही प्रेम था. प्रेम कर बैठा. वह नचनिया की कातिल निगाहों का शिकार हो चुका था. उस की आंखों की गहराई में प्रेम का दिल डूब चुका था. अगर दिल एक है, तो जान भी तो एक ही है और उसकी जान नचनिया के दिल में कैद हो चुकी थी.

पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘जाओ, उस नचनिया की कुछ रातें खरीद कर उसे मेरे बेटे को सौंप दो. जिस्म की गरमी उतरते ही खिंचाव खत्म हो जाएगा. दीवानगी का काला साया उतर जाएगा.’’

नचनिया सेठ के फार्महाउस पर थी और प्रेम के सामने थी. तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. प्रेम ने उसे सिर से पैर तक देखा.

नचनिया उस के सीने से लग कर बोली, ‘‘रईसजादे, बुझा लो अपनी प्यास. जब तक मन न भर जाए इस खिलौने से, खेलते रहो.’’

प्रेम के जिस्म की गरमी उफान न मार सकी. नचनिया को देख कर उस की रगों का खून ठंडा पड़ चुका था.

उस ने कहा, ‘‘हे नाचने वाली, तुम ने तन को बेपरदा कर दिया है, अब रूह का भी परदा हटा दो. यह जिस्म तो रूह ने ओढ़ा हुआ है… इस जिस्म को हटा दो, ताकि उस रूह को देख सकूं.’’

नचनिया बोली, ‘‘यह पागलपन… यह दीवानगी है. तन का सौदा था, लेकिन तुम्हारा प्यार देख कर मन ही मन, मन से मन को सौसौ सलाम.

‘‘पर खता माफ सरकार, दासी अपनी औकात जानती है. आप भी हद में रहें, तो अच्छा है.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘एक रात के लिए जिस्म पाने का नहीं है जुनून. तुम सदासदा के लिए हो सको मेरी ऐसा कोई मोल हो तो कहो?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘मेरे शहजादे, यह इश्क मौत है. आग का दरिया पार भी कर जाते, जल कर मर जाते या बच भी जाते. पर मेरे मातापिता, जाति के लोग, सब का खाना खराब होगा. तुम्हारी दीवानगी से जीना हराम होगा.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘क्या बाधा है प्रेम में, तुम को पाने में? तुम में खो जाने में? मैं सबकुछ छोड़ने को राजी हूं. अपनी जाति, अपना धर्म, अपना खानदान और दौलत. तुम हां तो कहो. दुनिया बहुत बड़ी है. कहीं भी बसर कर लेंगे.’’

नचनिया ने अपने कपड़े पहनते हुए कहा, ‘‘ये दौलत वाले कहीं भी तलाश कर लेंगे. मैं तन से, मन से तुम्हारी हूं, लेकिन कोई रिश्ता, कोई संबंध हम पर भारी है. मैं लैला तुम मजनू, लेकिन शादी ही क्यों? क्या लाचारी है? यह बगावत होगी. इस की शिकायत होगी. और सजा बेरहम हमारी होगी. क्यों चैनसुकून खोते हो अपना. हकीकत नहीं होता हर सपना. यह कैसी तुम्हारी खुमारी है. भूल जाओ तुम्हें कसम हमारी है.’’

अरबपति पिता को पता चला, तो उन्होंने एकांत में नचनिया को बुलवा कर कहा, ‘‘वह नादान है. नासमझ है. पर तुम तो बाजारू हो. उसे धिक्कारो. समझाओ. न माने तो बेवफाईबेहयाई दिखाओ. कीमत बोलो और अपना बाजार किसी अनजान शहर में लगाओ. अभी दाम दे रहा हूं. मान जाओ.

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‘‘दौलत और ताकत से उलझने की कोशिश करोगी, तो न तुम्हारा बाजार सजेगा, न तुम्हारा घर बचेगा… क्या तुम्हें अपने मातापिता, भाईबहन और अपने समुदाय के लोगों की जिंदगी प्यारी नहीं? क्या तुम्हें उस की जान प्यारी नहीं? कोई कानून की जंजीरों में जकड़ा होगा. कैद में रहेगा जिंदगीभर. कोई पुलिस की मुठभेड़ में मारा जाएगा. कोई गुंडेबदमाशों के कहर का शिकार होगा. क्यों बरबादी की ओर कदम बढ़ा रही हो? तुम्हारा प्रेम सत्ता और दौलत की ताकत से बड़ा तो नहीं है.

‘‘मेरा एक ही बेटा है. उस की एक खता उस की जिंदगी पर कलंक लगा देगी. अगर तुम्हें सच में उस से प्रेम

है, तो उस की जिंदगी की कसम… तुम ही कोई उपाय करो. उसे अपनेआप से दूर हटाओ. मैं जिंदगीभर तुम्हारा कर्जदार रहूंगा.’’

नचनिया ने उदास लहजे में कहा, ‘‘एकांत में यौवन से भरे जिस्म को जिस के कदमों में डाला, उस ने न पीया शबाब का प्याला. उसे तन नहीं मन चाहिए. उसे बाजार नहीं घर चाहिए.

उसे हसीन जिस्म के अंदर छिपा मन का मंदिर चाहिए. उपाय आप करें. मैं खुद रोगी हूं. मैं आप के साथ हूं प्रेम को संवारने के लिए,’’ यह कह कर नचनिया वहां से चली गई.

दौलतमंद पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘बताओ कुछ ऐसा उपाय, जिस का कोई तोड़ न हो. उफनती नदी पर बांध बनाना है. एक ही झटके में दिल की डोर टूट जाए. कोई और रास्ता न बचे उस नचनिया तक पहुंचने का. उसे बेवफा, दौलत की दीवानी समझ कर वह भूल जाए प्रेमराग और नफरत के बीज उग आए प्रेम की जमीन पर.’’

दीवान ने कहा, ‘‘नौकर हूं आप का. बाकी सारे उपाय नाकाम हो सकते हैं, प्रेम की धार बहुत कंटीली होती है. सब से बड़ा पाप कर रहा हूं बता कर. नमक का हक अदा कर रहा हूं. आप उसे अपनी दासी बना लें. आप की दौलत से आप की रखैल बन कर ही प्रेम उस से मुंह मोड़ सकता है.

‘‘फिर अमीरों का रखैल रखना तो शौक रहा है. कहां किस को पता चलना है. जो चल भी जाए पता, तो आप की अमीरी में चार चांद ही लगेंगे.’’

नचनिया को बुला कर बताया गया. प्रस्ताव सुन कर उसे दौलत भरे दिमाग की नीचता पर गुस्सा भी आया. लेकिन यदि प्रेम को बचाने की यही एक शर्त है, तो उसे सब के हित के लिए स्वीकारना था. उस ने रोरो कर खुद को बारबार चुप कराया. तो वह बन गई अपने दीवाने की नाजायज मां.

प्रेम तक यह खबर पहुंची कि बाजारू थी बिक गई दौलत के लालच में. जिसे तुम्हारी प्रेमिका से पत्नी बनना था, वह रुपए की हवस में तुम्हारे पिता की रखैल बन गई.

प्रेम ने सुना, तो पहली चोट से रो पड़ा वह. पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाया, लड़खड़ाया, लड़खड़ा कर गिरा और ऐसा गिरा कि संभल न सका.

वह किस से क्या कहता? क्या पिता से कहता कि मेरी प्रेमिका तुम्हारी हो गई? क्या जमाने से कहता कि पिता

ने मेरे प्रेम को अपना प्रेम बना लिया? क्या समझाता खुद को कि अब वह मेरी प्रेमिका नहीं मेरी नाजायज सौतेली मां है.

वह बोल न सका, तो बोलना बंद कर दिया उस ने. हमेशाहमेशा के लिए खुद को गूंगा बना लिया उस ने.

पिता यह सोच कर हैरान था कि जिंदगीभर पैसा कमाया औलाद की खुशी के लिए. उसी औलाद की जान छीन ली दौलत की धमक से. क्या पता दीवानगी. क्या जाने दिल की दुनिया. प्यार की अहमियत. वह दौलत को ही सबकुछ समझता रहा.

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अब दौलत की कैद में वह अरबपति पिता भटक रहा है अपने पापों का प्रायश्चित्त करते हुए हर रोज. Hindi Story

News Story: एसआईआर चेतावनी और जानकारी

News Story: देशभर में चल रहा एसआईआर यानी स्पैशल इंटैसिव रिविजन अभियान हर नागरिक के लोकतांत्रिक वजूद से जुड़ा सवाल बन चुका है. इस प्रोसैस को हलके में लेना यादेखा जाएगासोच कर टाल देना आने वाले सालों में भारी पड़ सकता है.
 इस कदम का असली इरादा तो सिर्फ सरकार समर्थक लोगों का नाम लिस्ट में रखने का था, पर विरोधी दलों और खासकर राहुल गांधी ने जोरदार बहस छेड़ दी, जिस से चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी की मनचाही लिस्टें नहीं बनवा पाया. अब लगता है कि भाजपा ने लिस्टों के जरीए चुनाव जीतने का इरादा छोड़ दिया है, क्योंकि बिहार में वोटर लिस्टों में बड़ी गड़बड़ी नहीं कर पाने के बावजूद वह भारी बहुमत से जीत गई.
देश के दूसरे राज्यों में एसआईआर में किस का नाम बना रहे या नहीं रहे, इस से भारतीय जनता पार्टी को फर्क नहीं पड़ता. सब से पहले यह साफ सम? लें कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब क्या है?
अगर आप का नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो इस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आप वोट नहीं डाल पाएंगे, बल्कि इस के असर बहुत दूरगामी होंगे.
नाम कटने के बाद
होने वाली मुश्किलें
* आप किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं कर पाएंगे.
* दोबारा नाम जुड़वाने का प्रोसैस लंबा और थकाऊ होगा.
* कई बार महीनों या 1-2 साल तक नाम नहीं जुड़ता.
* सरकारी योजनाओं में पहचान कमजोर पड़ती है.
* राजनीतिक या प्रशासनिक लैवल पर आप कीआवाजजीरो हो जाती है.
* कई जगह वोटर आइडैंटिटी कार्ड पहचान दस्तावेज के रूप में मांगा जाता है.
* स्थानीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव सब से बाहर हो सकते हैं.
* यही नहीं, यह भी मुमकिन है कि कल को नौकरी, जमीन खरीदने, किसी चीज का लाइसैंस लेने, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए लिस्ट की कौपी सरकार मांगने लगे.
* सरकारी अफसर रिश्वत लेने का इसे बढि़या तरीका बना सकते हैं.
* भाजपा लिस्ट से बाहर कट्टर हिंदुओं के अलावा सब को विदेशी मान ले. आधारकार्ड के मामले में सरकार ऐसा कर चुकी है.


एसआईआर में सब से खतरनाक गलतफहमी बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि मेरा आधारकार्ड है, कुछ नहीं होगा. यह सब से बड़ी भूल है, क्योंकि आधारकार्ड नागरिकता या वोटर होने का सुबूत नहीं है. एसआईआर में आधारकार्ड केवल सहायक दस्तावेज है, निर्णायक नहीं. अगर बीएलओ या सत्यापन अधिकारी पूछे, तो आप को क्या बताना है :
* सब से पहले यह कहें (साफ और शांत शब्दों में), ‘‘मैं इस पते पर नियमित रूप से रह रहा हूं या रह रही
हूं और मेरा नाम वोटिंग लिस्ट में बना रहना चाहिए.’’
अगर पूछा जाए कि क्या आप का नाम साल 2003 की लिस्ट में शामिल है? तो घबराएं नहीं, यह जवाब दें, ‘‘मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन मैं एसआईआर फार्म भर रहा हूं या भर रही हूं और जरूरी दस्तावेज दे रहा हूं या दे रही हूं.’’ याद रखें कि साल 2003 की लिस्ट में नाम होना या होना अकेला आधार नहीं है, लेकिन फार्म भरना सब से बड़ा जोखिम है.


आप को क्याक्या करना जरूरी है
* एसआईआर फार्म भरना ही सब से जरूरी कदम है, चाहे :
* आप का नाम पहले से वोटर लिस्ट में हो.
* आप सालों से वोट डालते रहे हों.
* आप के मातापिता वोटर रहे हों.
* अगर फार्म नहीं भरा, तो नाम कटने का खतरा बना रहता है.
दस्तावेज के बारे में साफ सम?
अगर अधिकारी दस्तावेज मांगे, तो इन में से जो उपलब्ध है, दें :
* जन्म प्रमाणपत्र.
* स्कूल/शैक्षिक प्रमाणपत्र.
* परिवार रजिस्टर की नकल.
* निवास प्रमाणपत्र.
* पासपोर्ट (अगर हो).
* जाति प्रमाणपत्र
* पुराना वोटर आईडी
एकसाथ सब जरूरी नहीं, लेकिन कम से कम एक मजबूत दस्तावेज
जरूर दें.
अगर अधिकारी आप से सवाल करे, तो कैसे बात करें :
* बहस करें.
* ऊंची आवाज में बात करें.
आप मेरा नाम काट रहे होजैसे आरोप लगाएं.
* शांत, तथ्य से भरपूर और लिखित प्रोसैस पर जोर दें.
याद रखें कि आप का बरताव आप की फाइल पर असर डाल सकता है.
सब से खतरनाक गलती जो लोग कर रहे हैं कि अभी नहीं मिला बीएलओ, बाद में देखेंगे. यहबाद मेंही नाम कटने की वजह बनता है.
अगर घर बंद मिला, आप बाहर थे, फार्म वापस नहीं दिया तो रिकौर्ड में लिखा जा सकता है कि नौट ट्रेसेबल (पता नहीं चल रहा) या फिर इनएक्टिव वोटर (निष्क्रिय मतदाता). और यही शब्द नाम कटने का आधार बन जाता है.


अगर नाम कट गया है तो क्या तुरंत ठीक हो जाएगा? नहीं. वजह :
* दावा या एतराज का प्रोसैस लंबा होता है.
* कई बार अधिकारी उपलब्ध नहीं होते.
* बारबार दफ्तर के चक्कर लग सकते हैं.
* अगला चुनाव निकल सकता है, इसलिए इलाज से बेहतर बचाव ही सम?ादारी है.
एक सीधा और कड़वा सच


लोकतंत्र में आप का वजूद तब तक है जब तक आप का नाम वोटिंग लिस्ट में है. अगर नाम कटा तो आप नागरिक तो रहेंगे, लेकिन फैसला लेने के प्रोसैस से बाहर हो जाएंगे. यह सिर्फ फार्म नहीं, बल्कि आप का अधिकार है.
एसआईआर अभियान को हलके में लेना आत्मघाती है, लोकतांत्रिक माने में. सरकार, आयोग, प्रशासन सब अपनी जगह हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में आप का नाम होने की जिम्मेदारी आखिरकार आप की है.
आज फार्म भरना, दस्तावेज देना और सही जानकारी देना कल की लंबी लड़ाई से आप को बचा सकता है.
वोटर लिस्ट में आप का नाम होना जरूरी है

News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है ? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनियाजय राम जीबोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल करजी राम जीकरने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस काविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘ हिंदूअखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अबवीबीजी राम जीबिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा? कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम कोविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्डविकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैकनाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरहडिमांड ड्रिवननहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो? उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली.  तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसेजी राम जीक्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जीबोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत मेंजी राम जीही बोला जाएगा ?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु? सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भीरामका नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु? नाम बदलने की यह सनक सम? नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु? सम? नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तोजी राम जीजैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभीराम भक्ततो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू? कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था किजी राम जीसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम? में आती, पर यहां तोजी राम जीका खेल चल रहा है. कहीं ऐसा हो कि इस योजना का हीराम नाम सत्यहो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु? पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा ?’’ अनामिका ने ताना कसा. और नहीं तो क्याजब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु? पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

Feature Story: “ज़िंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा में जीने वाले रवि किशन की फर्श से अर्श तक की कहानी

Feature Story: भोजपुरी सिनेमा को आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाने और खुद माटी से जुड़े रहने वाले, भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री का अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन का जीवन सोने की तरह आग में तपकर चमका है. चंद रुपए अपनी जेब में लेकर सपनों की नगरी में पहुंचे रवि किशन अपनी मेहनत के बलबूते आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जन्मे रवि किशन को बचपन से ही अभिनय में दिलचस्पी थी. उनका असली नाम रविंद्र नाथ शुक्ला है. गांव में होने वाली रामलीलाओं में वे सीता का किरदार निभाया करते थे. उनके पिता एक पुजारी थे. रवि किशन का एक्टिंग की तरफ झुकाव उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन मां ने हमेशा उन का साथ दिया और उनका हौसला बढ़ाया.

रवि किशन की मां ही थीं जिन्होंने उनके सपनों को पंख दिए. अभिनय के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने रवि किशन को अपनी जमा पूंजी देकर मुंबई भेजा. लेकिन वहां काम ढूंढ़ना बिलकुल आसान नहीं था. संघर्ष के दिनों में वे एक छोटे से 10×12 के कमरे में 12 लोगों के साथ रहते थे और अक्सर एक ही थाली में पानी वाली खिचड़ी खाकर दिन गुजारते थे. अभिनय के मौके तलाशने के साथसाथ अपना खर्च चलाने के लिए कई छोटेमोटे काम भी किए.

‘जिंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा, डायलॉग को असल मायनों में जीने वाले रवि किशन ने फिल्म ‘लापता लेडीज’ में भी जबरदस्त एक्टिंग से फिल्म में चार चांद लगाए थे. अपने दमदार अभिनय के दम पर उन्होंने केवल हिंदी और भोजपुरी ही नहीं, बल्कि तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में भी अपना लोहा मनवाया.

रवि किशन ने 600 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा वे रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ और ‘झलक दिखला जा’ में भी हिस्सा ले चुके हैं, जिनकी बदौलत उन्हें छोटे पर्द पर जबरदस्त लोकप्रियता मिली.

रवि किशन आज न केवल फिल्मों में, बल्कि राजनीति में भी अपनी भूमिका दमदार तरीके से निभा रहे हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जिले जौनपुर (उत्तर प्रदेश) से की थी. हालांकि, उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2017 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के साथ उनकी खट्टीमीठी नोकझोंक अकसर सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती है. भाजपा के साथ उनका तालमेल सफल रहा और आज वे गोरखपुर से एक प्रभावशाली सांसद हैं.Feature Story

Hindi Story: सच्चे प्यार की पहचान

Hindi Story: बनसारी नदी उफान पर थी. परसेहरा गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. ऊंची जाति की विधवा सरिता ने अपना सामान बांध लिया था. पर वह बाढ़ में फंस गई. इतने में जोखू मछुआरा नाव ले कर आया. क्या वह सरिता को बचा पाया?

पूरे इलाके में हल्ला मचा हुआ था कि बनसारी नदी बढ़ी चली रही है. ननका बांध से और भी ज्यादा पानी छोड़ दिया गया है. इस के बाद अभी और भी पानी छोड़ा जाने वाला है. परसेहरा गांव के लोगों में एक अजीब सी बेचैनी और दहशत फैल रही थी, क्योंकि बाढ़ का पानी तो कर चला जाता है, पर अपने पीछे तबाही और भुखमरी के निशान छोड़ जाता है, जिस का असर महीनों तक देखने को मिलता रहता है और बाढ़ में जाने कितनों की जानें भी चली जाती हैं.
इस गांव के लोगों को आज भी याद है कि 3 साल पहले भी बाढ़ आई थी और अपने साथ सबकुछ बहा ले गई थी.

तब लोगों के घरों और फसलों का नामोनिशान तक नहीं मिला था.
सरकार द्वारा मुआवजा देने का ऐलान तो कर दिया गया था, पर सरकारी काम में घालमेल के चलते वह मुआवजा किस को मिला, यह आज तक कोई नहीं जान सका. गांव में बाढ़ के आने पर लोग अगर समय रहते ऊंची जगह पर पहुच जाते तो जान बच सकती थी, पर इस गांव में एक ही ऊंची जगह थी, जहां पर बाढ़ का पानी नहीं जा सकता था और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की तीमंजिला हवेली, पर पिछली बार बाढ़ आने पर जब गांव के लोगों ने नाथ सिंह से शरण मांगी थी, तो ठाकुर ने अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोला था.


ठाकुर गांव के गरीब और छोटी जाति के लोगों को अपनी हवेली में घुसने नहीं देना चाहता था, क्योंकि छोटी जाति के लोगों के अंदर जाने से उस की हवेली गंदी हो जाती और वैसे भी नीची जाति के लोगों का हवेली में आना ठाकुर नाथ सिंह की शान के खिलाफ था. गांव के बहुत से लोग हवेली के ऊंचे दरवाजे को बड़ी उम्मीद के साथ पकड़े रहे थे और फिर अचानक से आई पानी की तेज धार उन्हें अपने साथ बहा ले
गई थी.


3 साल पहले के जख्म अभी भर भी नहीं पाए थे कि अब फिर से गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. सभी लोग खौफजदा थे और अपने घरों का सामान बांध कर उसे ऊंची दीवारों पर या किसी और महफूज जगह रखने की कोशिश कर रहे थे. इस अफरातफरी में सरिता नाम की एक औरत भी थी, जो बिलकुल भी नहीं घबरा रही थी. ‘‘मैं ने इतने उतारचढ़ाव और दुख देख लिए हैं कि अब किसी बाढ़ या तूफान से मुझे डर नहीं लगता,’’ अपनेआप में ही बुदबुदा रही थी सरिता, जो 35 साल की एक विधवा थी और गांव के स्कूल में टीचर थी. उस का पति भी इसी गांव में ठाकुर के यहां काम करता था, पर एक सड़क हादसे में उस की जान चली गई थी.


सरिता अकेली रह गई थी, पर उस ने साहस नहीं छोड़ा था और खुद नौकरी कर के अपनी गुजरबसर शुरू कर दी थी. भले ही सरिता ने अपनेआप को बिजी कर लिया था, पर उस का शरीर तो अभी भरपूर जवान ही था और जवानी की अपनी कुछ मांगें होती हैं. सरिता का शरीर भी ऐसी ही मांग करता था. सरिता जब रात में बिस्तर पर लेटती थी तो उस का मन करता था कि कोई उसे अपनी बांहों में भींच ले और उस के पूरे शरीर को तब तक सहलाए जब तक कि वह मदहोश हो जाए. पर एक विधवा होने के नाते वह लोकलाज के डर से ऐसे खयाल आते ही अपने विचारों को  देती थी और ठंडे पानी से हाथमुंह धो कर सोने की कोशिश करती थी.


ऐसा नहीं था कि विधवा सरिता से कोई शादी करने को तैयार नहीं था, कई रिश्ते भी आए पर सरिता इन आए रिश्तों के पीछे लोगों की मंशा और कमाऊ पत्नी के पैसे पर मजे करने की नीयत को सम? गई थी और हर आए रिश्ते को वह ठुकरा देती थी. गांव में ही जोखू नाम का गरीब मछुआरा था, जो सरिता को दूर से खूब घूरघूर कर देखता था. ‘‘क्या जोखू, काहे मास्टरनी को इतना घूरे जाते हो…’’ सत्तू ने पूछा तो सकुचाते हुए जोखू ने बताया था कि सरिता उसे बहुत अच्छी लगती है. ‘‘पर वह तो एक विधवा है,’’ सत्तू
ने कहा.


‘‘तो क्या हुआ, विधवा भी औरत ही होती है. उस के भी जी होता है,’’ जोखू ने कहा पर साथ ही साथ वह अच्छी तरह से जानता था कि गोरे रंग की सरिता कभी भी एक मछली पकड़ने वाले और शक्ल से काले से दिखने वाले आदमी से शादी नहीं करेगी. वैसे भी सरिता एक ऊंची जाति की औरत थी और जोखू एक मछुआरा, इसीलिए तो जोखू ने कभी सरिता से अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वह तो सरिता को दूर से ही आतेजाते देखता और खुश हो लेता था.


गांव में स्थानीय नेता राजेश कुमार के गुरगे जीप दौड़ा कर ऐलान कर रहे थे कि लोग घबराए नहीं, नेताजी की तरफ से आप लोगों को महफूज रखने की पूरी कोशिश की जाएगी और आप लोगों को इस बार बाढ़ आने पर बिलकुल भी परेशानी नहीं होगी. इस के लिए गांव के स्कूल की छत पर ही एक राहत शिविर लगाया जा रहा है, जहां पर आप लोगों को जरूरत की सारी चीजें मिलेंगी. राजेश कुमार बाढ़ जैसी आपदा के समय इस तरह के हथकंडों से अपना वोटबैंक पक्का करना चाहता था.


सरिता ने अपना कुछ सामान 2 बक्सों में समेट कर चारपाई पर रख दिया और फिर पाए के नीचे 4-4 ईंटें लगा कर चारपाई को ऊंचा कर दिया. हालांकि, इतने से वह सामान महफूज नहीं रहने वाला था, क्योंकि बाढ़ के पानी का लैवल काफी ऊंचा रहता था. फिर भी सरिता ने राहत की सांस ली थी. पानी अभी गांव में नहीं घुसा था और रात हो चली थी. सरिता ने दाल और चावल  बनाए और खा लिए. बाकी का खाना एक बरतन में रख दिया, फिर चारपाई के किनारे बैठ गई.


सभी को डर था कि बाढ़ का पानी रातबिरात गांव में घुस सकता है, इसलिए सब लोग सावधान रहे.
दिनभर के काम से थकीहारी सरिता की आंख लग जाती थी. वह बारबार आंख खोल कर देख लेती थी कि पानी गांव में तो नहीं गया, पर देर रात तक तो पानी गांव की सरहद के बाहर ही था. सरिता अचानक से हड़बड़ा कर जागी थी. उस ने देखा कि पानी उस के कमरे के अंदर गया था. चारपाई के पाए के निचले हिस्सों को पानी छूने लगा था. गांव में अलग तरह का शोर फैला हुआ था. लोगों के पानी में निकलने की आवाजें रही थीं और जानवर रंभा रहे थे. सरिता समझ गई थी कि उस ने देर कर दी है.

समय रहते उसे राहत शिविर में चले जाना चाहिए था, पर मन में यकीन था कि हो सकता है इस बार बाढ़ गांव के अंदर कर बाहर से ही चली जाए, तभी तो वह अपनी चारपाई पर ही बैठी रही थी, लेकिन अब तो खतरा सामने ही गया था. अब उसे इसी गंदे पानी में से निकल कर राहत शिविर या और किसी महफूज जगह जाना होगा. सरिता ने अपनी साड़ी को घुटनों तक किया और पानी में पहला कदम रखा, फिर धीरेधीरे कमरे के बाहर तक आई. बाहर का सीन डरावना था. चारों ओर पानी ही पानी था. सरिता का मन पानी देख कर घबरा उठा था. इतने पानी में वह कैसे चल पाएगी? पर हौसला कर के वह तकरीबन 500 मीटर ही चल पाई थी कि उस की हिम्मत जवाब दे गई थी.


पानी के हलके वेग की लहरों से सरिता के पैर टक्कर नहीं ले पा रहे थे और सरिता को लगा कि अब वह गिर जाएगी, पर ठीक तभी जोखू एक नाव ले कर गया. उस नाव पर गांव के छोटे बच्चे, 2-4 औरतें और कुछ बुजुर्ग पहले से ही बैठे हुए थे. जोखू ने सरिता को इशारे से नाव में बैठ जाने को कहा. सरिता जैसेतैसे कर के नाव में बैठ गई थी. जोखू ने नाव को स्कूल की तरफ मोड़ दिया, जहां पर राहत शिविर लगाया गया था. स्कूल पहुंच कर जोखू ने नेता राजेश कुमार के गुरगों और सरकार के लोगों से उन्हें शरण देने की बात कही, पर उन में से एक आदमी ने जोखू को धक्का देते हुए कहा, ‘‘यह राहत शिविर गांव के ऊंची जाति के लोगों के लिए है, छोटी जाति के लोग कहीं दूसरी जगह जा कर अपना जुगाड़ करें.’’ जोखू को बहुत गुस्सा आया, पर वह कुछ  नहीं कर सका.


जोखू ने सरिता से कहा, ‘‘मास्टरनीजी, आप यहां उतर जाओ, क्योंकि आप ऊंची जाति की हो. आप
को ये लोग रख लेंगे. हम लोग देखते हैं कि हमें क्या करना है.’’ सरिता ने भी सरकारी लोगों का बरताव देखा था और उसे भी अच्छा नहीं लगा था. उस ने जोखू की आंखों में देखा और कुछ सोच कर नाव से उतरने से मना कर दिया. सरिता नाव से नहीं उतरी तो जोखू को भी अच्छा महसूस हुआ और उस का जोश दोगुना हो गया. वह तेजी से नाव खेने लगा. नाव गांव में भरे पानी में इधरउधर जा रही थी, पर उन लोगों को अब एक ऐसी जगह की तलाश थी, जहां पर वे खानापीना बना कर खा सकें और आने वाले कुछ दिन वहां पर रह भी सकें.


नाव पर बैठे लोग अपनीअपनी राय दे रहे थे, पर जोखू को पता था कि ऐसी जगह तो पूरे गांव में एक ही है और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की हवेली. जोखू ने बिना कुछ कहे हवेली की तरफ नाव मोड़ दी थी और हवेली के गेट के बाहर पहुंच कर ही दम लिया था. नाव पर बैठे लोगों की आंखों में कोई चमक नहीं उभरी थी, क्योंकि वे सब जानते थे कि ठाकुर नाथ सिंह अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोलेगा और ही किसी तरह की कोई मदद करेगा. ‘‘यह हिम्मत और एकता दिखाने का समय है. जैसा हम कहते हैं वैसा ही करना, नहीं तो बाढ़ में हम सब मारे जाएंगे,’’ यह कहने के साथ ही जोखू ने अपनी योजना सब को बता दी थी.


नाव पर बैठे लोग पानी में उतर कर हवेली के गेट तक गए और फिर उसे खटखटाने लगे. शोर सुन कर हवेली के गार्ड गांव वालों को डांटने लगे. इसी बीच ठाकुर नाथ सिंह भी अपनी छत पर पानी का जायजा लेने पहुंच गया था. इधर, जोखू अपना मछली पकड़ने का जाल ले कर पानी में तैरते हुए हवेली के पीछे छोटे गेट के पास पहुंच गया. उस ने मछली पकड़ने के जाल को दीवार पर फंसाया और उस के सहारे दीवार पर चढ़ गया, फिर आसानी से हवेली के अंदर उतर गया. जोखू एक योजना के तहत काम कर रहा था. हवेली के एक कमरे में उस ने देखा कि ठाकुर की 14 साल की बेटी मोबाइल चला रही है.


कालेकलूटे जोखू को देख कर वह घबरा उठी थी, पर जोखू ने उसे चुप रहने का इशारा किया और उस के मुंह पर हाथ रख कर उस के कान में कहा कि वह उन लोगों की मदद करे, नहीं तो गांव के सारे लोग मारे जाएंगे. लड़की को कुछ सम? नहीं आया. जोखू तकरीबन धकेलते हुए उस लड़की को ले कर छत पर ठाकुर के सामने पहुंच गया और ठाकुर से हवेली का गेट खोल कर गांव वालों को हवेली के अंदर पनाह देने की बात कही और ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को भी कहा. ठाकुर नाथ सिंह अपनी बेटी की हिफाजत के प्रति संजीदा था.

वह जानता था कि मछुआरा जोखू आज पूरी तैयारी कर के आया है. हो सकता है कि उस के पास कुछ हथियार भी हो और वह आज कुछ भी कर सकता है. नाथ सिंह ने मौके की नजाकत  समझकर फैसला कर लिया था. ठाकुर इस इस समय निहत्था और लाचार था, इसलिए उस ने हवेली का गेट खोल कर सिर्फ 15-20 गांव वालों को अंदर आने की छूट दे दी, पर साथ में यह शर्त भी रख दी कि ये लोग हवेली की छत के एक कोने में रहेंगे और शोरशराबा भी नही करेंगे. जोखू ने तुरंत ही ठाकुर की हर बात मान ली थी.
लोग हवेली के अंदर रहे थे. बुजुर्गों को तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने ठाकुर की हवेली के अंदर पैर रखा है. वे डरेसहमे हुए से बढ़े चले जा रहे थे.


बुजुर्गों और औरतों को छत पर छोड़ने के बाद जोखू फिर से बाहर की ओर जाने लगा, तो सरिता अनायास ही बोल पड़ी, ‘‘अरे जोखू, अब कहां जा रहे हो. थोड़ा दम तो ले लो, पानी तो पीते जाओ.’’ जोखू से पहली बार किसी औरत ने इतने प्यार से कुछ पूछा था. उसके मन में सरिता के प्रति दबा हुआ प्यार दस गुना हो चला था. जोखू कुछ देर तक सरिता द्वारा खुद का नाम पुकारे जाने के रस में डूबा रहा, फिर कुछ देर बाद जोखू ने उसे बताया कि वह नाव ले कर गांव के और लोगों की मदद और उन्हें महफूज जगह पर ले कर जाने के लिए जा रहा है. जाखू की यह बात सुन कर सरिता भी जबरन उस के साथ हो ली.


सरिता के कपड़े भीगे हुए थे. वह नाव पर जोखू के पास ही सिमट कर बैठ गई थी. सरिता ने देखा कि कैसे जोखू लोगों के घरघर जा कर उन की मदद करने में लगा हुआ था. 3 साल पहले आई बाढ़ के बाद गांव वालों ने बालू और मिट्टी से कुछ टीले बना लिए थे, ताकि फिर से कभी बाढ़ के आने पर काम सकें. आज वही समय गया था. कुछ लोगों को जोखू ने उन ऊंचे टीलों पर पहुंचाया, तो कुछ को पंचायत भवन की छत पर. शाम तक जोखू भले ही थक कर चूर हो गया था, पर उसे संतोष था कि कम से कम गांव के लोग बाढ़ के पानी से महफूज तो हैं.


शाम ढली तो हवेली की छत पर बैठे गांव के लोगों ने छत पर ही अलगअलग हिस्सों में खाना बनाना शुरू कर दिया. आज किसी का हिस्सा बंटा नहीं था. कोई किसी से तेल मांग रहा था, तो कोई किसी से नमक और लोग एकदूसरे के पास जाजा कर खाने का मजा भी ले रहे थे. आज हवेली की छत पर बैठे गांव के अलगअलग घरों के लोग एक परिवार जैसे बन गए थे. सरिता ने भी खाना बना कर जोखू को खिलाया और खुद उस के बाद खाया. सरिता और जोखू के लिए छत पर लेटने के लिए जगह नहीं थी, तो सरिता नीचे के बरामदे के एक कोने में चादर डाल कर लेट गई, जबकि जोखू पास में ही बैठ गया. शायद उसे लेटने में ?ि?ाक लग रही थी. बाढ़ के चलते बिजली तो पहले ही जा चुकी थी और अब ठाकुर की हवेली भी अंधेरे में नहा रही थी.


सरिता को रात में ठंड लगने लगी, तो उस की आंख खुली और उस ने घोर अंधेरे में कोशिश कर के देखा कि जोखू भी नंगी फर्श पर सिकुड़ा हुआ लेटा है. सरिता को जोखू पर दया भी आई और प्यार भी उमड़ पड़ा. वह रात के अंधेरे में भूल गई थी कि वह एक विधवा है. इस समय वह केवल एक औरत थी. उसे जाने क्या सू? कि वह भी जोखू के पास लेट गई और अपना एक हाथ जोखू के मजबूत सीने पर रख दिया. इस समय भी जोखू के बदन से मछलियों जैसी महक रही थी, पर जोखू के प्यार में पगी हुई सरिता को आज यह सब अच्छा लग रहा था.


अचानक जोखू ने करवट ली और सरिता को अपनी मजबूत बांहों में कस  लिया था. सरिता ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह भी हर एक छुअन से और भी मचल जाती थी. वे दोनों एकदूसरे के बदन को सहलाते और चूमते रहे थे. जब जोखू को लगा कि सरिता ने पूरी तरह समर्पण कर दिया है, तो वह उस के शरीर में प्रवेश कर गया और सरिता के मुलायम अंगों पर अपनी हथेली घुमाता रहा. तपती धरती पर जाने कितने सालों के बाद आज पानी बरसा था और यह बरसात पूरी रात में कई बार होती रही थी.
सुबह हो चुकी थी. सरिता और जोखू एकदूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. ‘‘हम तुम से ब्याह करना चाहते हैं. क्या तुम भी हम से ब्याह करोगी?’’ जोखू ने सकुचाते हुए पूछा, तो सरिता कुछ नहीं बोल सकी. उस की चुप्पी में ही उस की हां छिपी हुई थी.


गांव से पानी उतर कर निकल जाने में पूरे 2 दिन लग गए थे. बाढ़ का पानी अपने साथ सबकुछ बहा ले गया था. बाढ़ के जाने के बाद फसल का काफी नुकसान तो हुआ ही था, पर इस बार की बाढ़ ने ठाकुर की अकड़ खत्म कर दी थी. बाढ़ ने ठाकुर नाथ सिंह को यह संदेश भी दिया था कि ऊंट चाहे जितना भी ऊंचा क्यों हो एक दिन तो पहाड़ के नीचे आता ही है. अगर गांव के लोगों ने एकता नहीं दिखाई होती, तो इस बार भी लोग बाढ़ में बह गए होते. हालांकि, इस बाढ़ ने भी लोगों से फिर से काफीकुछ छीन लिया था, पर बाढ़ खत्म होने के बाद सरिता और जोखू ने शादी कर ली थी और दोनों खुशी से रहने लगे थे. सच्चे प्यार की यही तो पहचान होती है. Hindi Story

Film: ओ रोमियो – क्या गुस्सैल ‘कबीर सिंह’ को भी मात देगा शाहिद कपूर का नया किरदार ‘हुसैन उस्तरा’

Film: शाहिद कपूर एक बार फिर अपने इंटेंस अवतार में नजर आने वाले हैं. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ओ रोमियो’ का पहला लुक टीजर रिलीज होते ही चर्चा में आ गया है. टीजर में शाहिद का उग्र और रॉ अंदाज दर्शकों को उनके किरदार ‘कबीर सिंह’ की याद दिला रहा है. इस दमदार टीजर ने फिल्म को लेकर फैंस की उत्सुकता और भी बढ़ा दी है.

फिल्म मेकर्स का कहना है कि यह फिल्म ‘वास्तविक घटनाओं पर आधारित है. इस दावे के सामने आते ही इंटरनेट मीडिया पर अटकलें शुरू हो गई हैं. दर्शक कयास लगा रहे हैं कि फिल्म की कहानी मुंबई के गैंगस्टर हुसैन उस्तरा, बदले की आग में जलती सपना दीदी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की असल गैंगवार से जुड़ी हो सकती है. टीजर देखने के बाद से ही लोग हुसैन उस्तरा की असली कहानी जानने को बेताब हैं.

हुसैन उस्तरा (फिल्म में शाहिद कपूर) : यह मुंबई का कुख्यात गैंगस्टर था जो अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम गैंग से जुड़ा था. वह कॉन्ट्रैक्ट किलर था. कई हत्याओं में उसका नाम भी आया था. हुसैन बेहद बेरहम और हिंसक अपराधी था. अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसका नाम डर का पर्याय बन गया था.

मशहूर क्राइम जर्नलिस्ट एस. हुसैन जैदी की किताबों ‘डोंगरी टू दुबई’ और ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ में बताया गया है कि हुसैन उस्तरा पहले दाऊद गैंग के लिए काम करता था, बाद में मतभेद और सत्ता की लड़ाई के चलते अलग हो गया.

हुसैन उस्तरा की हत्या दाऊद के गुर्गों द्वारा ही की गई थी. वे दाऊद को सीधी चुनौती दे रहे थे और सपना दीदी की मदद कर रहे थे, इसलिए दाऊद की डी कंपनी ने उन्हें रास्ते से हटा दिया. हुसैन उस्तरा की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड इतिहास का चर्चित अध्याय मानी जाती है.

सपना दीदी (फिल्म में तृप्ति डिमरी) : अशरफ खान उर्फ ‘सपना दीदी’ के पति, महमूद कालिया, की हत्या दाऊद इब्राहिम ने मुंबई एयरपोर्ट पर पुलिस एनकाउंटर (कथिततौर पर सेटअप) के जरिए करवाई थी. पति की मौत का बदला लेने के लिए अशरफ खान ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और ‘सपना दीदी’ बनीं.

‘उस्तरा’ नाम की वजह : हिंसक लड़ाई करने और अपने दुश्मन के शरीर पर उस्तरे से एक लंबा घाव करने की वजह से उसे ‘उस्तरा’ नाम दिया गया था.

रिलीज और बॉक्स ऑफिस क्लैश

विशाल भारद्वाज की यह रोमांटिकथ्रिलर फिल्म 13 फरवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. बॉक्स ऑफिस पर इसकी सीधी टक्कर शनाया कपूर और आदर्श गौरव की रोमांटिक और एडवेंचर मूवी ‘तू या मैं’ से होगी. Film

Politics: तेजप्रताप यादव की ‘घर वापसी’ की अटकलें तेज

Politics:  राजद ने हाल ही बिहार विधानसभा चुनाव में मुंह की खाई है. इस की एक बड़ी वजह लालू  यादव के परिवार में टूट होना भी थी. पर अब उन के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने पार्टी और परिवार से निकाले जाने के 8 महीने बाद  दिल्ली में अपने पिता लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की. यह मुलाकात तेजप्रताप यादव की बड़ी बहन और सांसद मीसा भारती के आवास पर हुई. उन्होंने अपने पिता और बहन को भोज में आने का निमंत्रण भी दिया था.

इस दौरान तेजप्रताप यादव का सामना अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव से भी हुआ था. दरअसल, तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव दोनों रेलवे में नौकरी के बदले जमीन घोटाले मामले में हो रही सुनवाई के दौरान दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई.

आप को बता दें कि तेजप्रताप यादव ने 1 जनवरी, 2026 को अपनी माता राबड़ी देवी के 67वें जन्मदिन पर 10, सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी निवास पहुंच कर सब को चौंका दिया था.

तेजप्रताप यादव ने अपने सोशल मीडिया पर 2 तसवीरें शेयर की थीं. पहली पोस्ट में वे अपनी मां के साथ केक काटते दिखे और दूसरी तस् वीर पुरानी है जिस में पूरा परिवार एकसाथ दिख रहा है. उन्होंने इस के साथ एक बहुत ही भावुक करने वाला पोस्ट लिखा था.

तेजप्रताप यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ‘मां, आप मेरी सब से बड़ी प्रेरणा हैं. जन्मदिन की बधाई. मां, आप हमारे परिवार की आत्मा हैं. हर हंसी, हर प्रार्थना, हर उस पल के पीछे आप ही हैं जो घर जैसा लगता है. यह जिंदगी जो हम जीते हैं – गर्मजोशी भरी, अधूरी, प्यार से भरी हुई, यह सब आप की वजह से है. आप ने इसे तब संभाला जब हमें पता भी नहीं था कि संभालना क्या होता है. आप मेरी सब से बड़ी प्रेरणा हैं. आप ने बिना कुछ गिने दिया, बिना किसी शर्त के प्यार किया, और तब भी मजबूत बनी रहीं जब किसी ने नहीं देखा कि यह कितना मुश्किल था…’

इन तमाम घटनाक्रमों से राजनीतिक गलियारों में तेजप्रताप यादव की ‘घर वापसी’ की सरगर्मियां तेज हो गई हैं. बता दें कि पिछले साल से ही तेजप्रताप यादव का परिवार से अलगाव जगजाहिर है. 2025 में कथित प्रेमिका अनुष्का यादव के साथ की तसवीर वायरल हुई तो लालू प्रसाद यादव ने उन्हें पार्टी और परिवार से बेदखल कर दिया था. लालू प्रसाद यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को कथिततौर पर पार्टी और परिवार का मुखिया चुन लिया है. इस से राजनीतिक मतभेद बढ़े और व्यक्तिगत मुद्दों ने परिवार को बांट दिया. सियासी विरासत की लड़ाई भी सार्वजनिक तौर पर दिखी, मगर अब इन नई तसवीरों ने फिर से नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या लालू परिवार एक होने जा रहा है.Politics

Geo Politics: गहरी पैठ

Geo Politics. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार की गैरकानूनी घुसपैठियों की धरपकड़ और कानूनी ढंग से आए छोटे से गुनाहगारों को वापस भेजने की पौलिसी ने अब देश के बेरोजगार युवाओं का अमेरिकी ड्रीम खत्म कर दिया है. खेत और मकान बेच कर लाखों रुपए लगा कर असलीनकली वीजा ले कर अमेरिका या कई देशों में घूमनेघामने के लिए घुसना अब बेकार है. हालांकि अभी भी लाखों भारतीय लड़के वहां हैं और कम से कम भारत से ज्यादा कमा रहे हैं.


अमेरिका में कमाई इसलिए हो रही है क्योंकि गोरे अमेरिका ने अपना कुछ खास सामान जैम मोबाइल की तकनीक, इंटरनैट, यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप, एक्स दुनियाभर को खरीदने की लत डाल दी है. कुछ अमेरिकी युवाओं की देन जिस पर बाहर के अक्लमंद लोगों ने दिमाग लगाया, ने अमेरिका को मालामाल कर दिया है और वहां के गोरे समझ रहे हैं कि उन के पास दुनिया की चाबी है.


अमेरिकी ड्रीम अभी फिलहाल ठंडा हुआ है पर बंद नहीं हुआ है क्योंकि अब गोरे अमेरिकी उसी तरह मौजमस्ती के आदी हो गए हैं जैसे हमारे यहां के पंडेपुजारी और उन के पौलिटिकल सरकारी नौकर बिजनैसमैन भक्त. अमेरिकियों से अब काम नहीं हो पाएगा. अमेरिका में सैकड़ों पंजाबी युवा बड़ेबड़े ट्रक चला रहे हैं क्योंकि गोरे हट्टेकट्टे भी उस तरह की मुसीबत वाला मेहनती काम नहीं करना चाहते. खेतों में ट्रैक्टरों, थ्रैशरों को चलाना, लोडिंगअनलोडिंग करना, टैक्सियां चलाना, सफाई करना जैसा काम या तो वहां के कालों के हाथों में है या भारत जैसे देशों से गए लोगों के हाथों में.

पंजाब से गए लड़कों को  कर के भी इतनी अंगरेजी जाती है कि वे दूसरे देशों के भगोड़ों से ज्यादा अच्छा काम पा लेते हैं. इस के बावजूद डंकी रूट अब ठंडा तो रहेगा. दूसरे देशों में भाषा की दिक्कत रहेगी. यूरोप के देशों में अब भारतीय मूल के लोग दिख जाएंगे पर उन्हें यूरोप में सैटल होने में वक्त लगता है. यूरोप के देश छोटेछोटे हैं, लोग छोटेसंकरे मकानों में रहते हैं, जहां छिपने की जगहें कम हैं. यूरोपीय दूसरे लोगों को आसानी से मिलाते भी नहीं हैं.


जरमनी, नार्वे, स्वीडन, फ्रांस सब देशों में अब बाहरी लोगों को आने से रोकने की मांग बढ़ने लगी है. जब से मुसलिम कट्टरपंथी गोलियों की बरसात करने लगे हैं और हिंदू कट्टरपंथी हर गोल पत्थर को पूजने लगे हैं हर पेड़ की जड़ को पानदान समझने लगे हैं, साफसुधरा, डिसिप्लिन वाले यूरोपीयन बाहरी लोगों को सिरदर्द समझने लगे हैं.


भारत के युवा वर्ग के पास अब एक ही काम है, किसी मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे से चिपक जाओ और मुफ्त की खाओ. जब तक इस देश में बेवकूफ भक्त हैं, बहुत से अपनी मेहनत का एकचौथाई तक निठल्लों के खिला देंगे. डोनाल्ड ट्रंप की पुलिस के डर में रहने से यहां रहो और दूसरों को डरा कर रहो. हाथ में एक लाठी और अपने जैसे 6-7 का साथ होना वसूली के लिए काफी है.

कांग्रेस को केरल में कौर्पोरेशनों, नगर निकायों, जिला पंचायतों के चुनावों में अपनी ही तरह के भाजपा विरोधी लैफ्ट फ्रंट के मुकाबले अच्छी बढ़त मिली है. हालांकि भाजपा को भी कुछ फायदा हुआ है पर यदि भाजपा की अलगाववादी हिंदूमुसलिम पौलिसियां चलती रहीं और वहां भी हर चर्च और मसजिद के नीचे हिंदू मंदिर निकलने लगे तो वह लैफ्ट और कांग्रेस दोनों को हरा देगी.


भाजपा की खासीयत है कि उस की पुरोहितों की जमात पिछले 50 सालों से रातदिन एक कर के लोगों को पौराणिक हिंदू धर्म का पाठ बड़ी तेजी से पढ़ा रही है. चूंकि पौराणिक हिंदू धर्म के शिकार के लोगों के पास लिखने की कलम है, पढ़ने की समझने वे बहकावे में कर अपनी रोजीरोटी की जगह राम, शिव और किसी और देवीदेवता को बचाने में जुट जाते हैं.


अगर एक को सिर्फ 5 लोग 500 लोगों  को हर रोज बारबार सुनाते रहें तो कुछ दिनों में 500 में से
200-250 उस को सच मानने लगते हैं. भाजपा ने ऐसे लोगों की फौज तैयार कर ली है जो ?ाठ को फैलाने की ही नौकरी करते हैं. उन्हें पैसे भी मिलते हैं, साधन भी मिलते हैं और चूंकि उन के पास केंद्र सरकार है, वे सैकड़ों के फंसे काम भी करवा सकते हैं.


जब अपना काम निकलवाना होता है तो  सच मानने में हर्ज नहीं होता. हर राज्य हमेशा यही करता रहा है. आखिर यह देश यों ही 2,000 साल उन लोगों का गुलाम नहीं बना जो यहां सिर्फ व्यापार करने या इसे लूट कर लौट जाना चाहते थे. इन लुटेरों और व्यापारियों को जल्दी ही पता चल गया था कि यहां के लोग आसानी से ?ाठ का शिकार बन जाते हैं. उन्होंने पहले यहीं के  बोलने को साथ मिला लिया, उन को उन का हिस्सा दिया पर खुद बड़ा हिस्सा खाने लगे, यहीं रह कर.


1947 में हम आजाद हुए पर नाकाम करने वाले  से छुटकारा मिला. वे अलगअलग शक्ल में आते रहे हैं. कभी एक पार्टी और ?ांडे के नाम पर तो कभी दूसरी के नाम पर. जो सुधार दिखता है वह साइंस की बदौलत है. यह सुधार अफ्रीका में भी हुआ, तिब्बत में भी हुआ, सहारा के रेगिस्तान में भी हुआ. आज देश में फिर मंदिर ज्यादा बन रहे हैं, फैक्टरियां कम. धर्म की दुकानें ज्यादा बन रही हैं, स्कूलकालेज कम.
लोगों को बहकाने और बरगलाने की कीमत देश ने पहले भी दी है, आज भी दे रहा है और आगे भी देगा. केरल एक कोना बचा था जहां लोग समझदार, पढ़ेलिखे थे. अब वह भी अनपढ़ों का राज्य बनता जा रहा है, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की तरह का. Geo Politics                                  

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