Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी. गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.

पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.

सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं. सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी.

बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे ?ांकने लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.

सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे ?ाट से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.

सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने ?ाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.

पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’ बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.

बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.

गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था.

उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे. ‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’

सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.

बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’ सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी.

उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें. एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.

मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.

बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी.

बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें. ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया.

किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई. सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए. मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा.

सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ. सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं.

तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया. मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है. दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं.

‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया. रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था.

बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.
बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.

बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे. ‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था,

‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.
बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी.

शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे. मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे. खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.

वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.

सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.

बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है.

बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है. विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story.

Hindi Kahani: आंखों से एक्सरे 

Hindi Kahani: जवानी की दहलीज पर खड़े दिवाकर की एक अजीब आदत थी कि जहां भी कोई लड़की दिख जाती, उस की आंखें उसी पर टिक जातीं. राह चलती, बाजार जाती, मंदिर या कालेज जाती, कोई भी लड़की दिवाकर की पारखी निगाहों से बच नहीं पाती. वह हर लड़की को ऊपर से नीचे तक ऐसे ताड़ता, जैसे उस की आंखों में सचमुच एक्सरे मशीन लगी हो.


एक दिन बाजार जाते समय की बात है. इसी हरकत को देख कर दिवाकर के एक दोस्त सोमेश ने पूछ ही लिया, ‘‘यार, इस तरह लड़कियों को घूरने से तुम्हें क्या मिलता है?’’ दिवाकर तुरंत उछल पड़ा और बोला,‘‘नयनसुख, पार्टनर नयनसुख. देखना तो मेरा शौक है , कोई गुस्ताखी थोड़े ही कर रहा हूं.’’ सोमेश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘लेकिन यह गलत बात है. किसी को यों घूरना भी एक तरह की बदतमीजी है, पता है ?’’


दिवाकर ने हंसते हुए हाथ ?ाटका, ‘‘अरे यार, मैं कौन सा लड़की छेड़ रहा हूं या भद्दे कमैंट्स पास कर रहा हूं? बस, खामोशी से आंखें ही तो सेंकता हूं. मेरी आंखें एक्सरे हैं, जो देखना होता है, देख लेती हैं. हाहाहा.’’ दिवाकर की बेशर्मी देख कर सोमेश ने सब्र रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अंदाजा है कि तुम्हारी इसटकटकीसे लड़कियां कितना अनकंफर्टेबल महसूस करती हैं?’’ दिवाकर ने जैसे कुछ सुना ही हो और बोला, ‘‘अरे यार, अब तू मत शुरू हो जा किसी सत्संगी बाबा की तरह प्रवचन ले कर. इस उम्र में यह सब करूं तो क्या बुढ़ापे में करूंगा?’’


सोमेश ने बात बढ़ाना बेकार समझ पर दोस्ती के नाते सम?ाता हुआ साथ चलता गया. इसी दौरान वे दोनों कालेज की ओर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए. अचानक दिवाकर की नजर सड़क किनारे खड़ी एक लड़की पर गई. वह उस की छोटी बहन दिव्या थी, जो बुरी तरह परेशान हो कर स्कूटी स्टार्ट करने की कोशिश कर रही थी. दिवाकर फौरन दौड़ पड़ा और बोला, ‘‘क्या हुआ दिव्या?’’ दिवाकर को देख कर दिव्या ने राहत की सांस ली और बोली, ‘‘अच्छा हुआ भैया कि आप गए. मेरी स्कूटी बंद हो गई है. आज कालेज में मेरा इंटरनल टैस्ट है, अगर इसे घर रख कर जाती हूं, तो पेपर छूट जाएगा. अच्छा हुआ कि आप मिल गए.’’


दिवाकर एकदम से बोला, ‘‘तुम टैंशन मत लो.’’फिर सोमेश को स्कूटी थमाते हुए दिवाकर बोला, ‘‘यार, इसे गैराज पहुंचा देना. मैं दिव्या को कालेज छोड़ कर आता हूं.’’ कालेज 7 किलोमीटर की दूरी पर था. मोड़ पर शहर जाने वाली बस कर रुकी, जिस में वे दोनों चढ़ गए. बस खचाखच भरी थी. समय की मजबूरी में उन्हें उसी बस में चढ़ना पड़ा. बस चल पड़ी. कुछ ही देर में दिवाकर ने देखा कि कई लड़के दिव्या को घूर रहे थे, बिलकुल उसी ढिठाई से, जैसा वह किया करता था.


कुछ लड़के अपने दोस्तों के साथ कानाफूसी कर रहे थे. कोई टेढ़ी मुसकान फेंक रहा था, तो कोई दिव्या को ऊपरनीचे ताड़ रहा था. दिव्या बारबार दुपट्टा ठीक कर रही थी. वह कभी नजरें ?ाका कर फर्श की ओर देखने लगती, कभी पीछे हटने की नाकाम कोशिश करती. दिवाकर यह सब देख रहा था. पहली बार उसे लगा कि बस में कईदिवाकरबैठे हुए हैं और उस की बहन का जिस्म उन की आंखों से एक्सरे की तरह भेद रहा है. उस का खून खौल रहा था, पर भीड़ भरी बस में वह उतना ही बेबस था, जितनी दिव्या.


उस पल दिवाकर को कुछ एहसास हुआ, वही एहसास जिसे सोमेश उस की सम? में सालों से डालने की कोशिश कर रहा था. हर लड़की, जिसे वह नयनसुख की चीज सम? कर ताड़ता था, शायद यही शर्मिंदगी महसूस करती होगी. दिवाकर ने बस में खड़ेखड़े पहली बार आंखें ?ाका लीं और शायद पहली बार उसे सम? आया किनयनसुखकह कर की गई उस की हर हरकत, किसी की जिंदगी में कितना बड़ादुखबन सकती है. Hindi Kahani  

लेखक –   विनोद कुमार विक्की

Film: होमबाउंड- 2 वंचित लड़के पहुंचे औस्कर में

Film: सा 2025 मेंहोमबाउंडनाम की एक फिल्म आई थी, जिसे नीरज घेवान ने बनाया था. इस फिल्म का नाम भले ही अंगरेजीदां है, पर यह खालिस हिंदी फिल्म है.
चलो, पहलेहोमबाउंडका हिंदी में मतलब समझते हैं. कोई इनसान, जो चलने के लिए छड़ी या वाकर का इस्तेमाल करता है और बिना सहारे के घर से बाहर नहीं निकल सकता,वहहोमबाउंडहो सकता है.

लेकिन2 हट्टेकट्टे लड़के, जो सपनों से भरे हैं, पुलिस की नौकरी की तैयारी में मशगूल हैं, क्या वेहोमबाउंडहो सकते हैं? हिंदी फिल्महोमबाउंडमें ऐसा ही कुछ दिखाया गया है, जिस में 2 ऐसे लड़कों की कहानी बताई गई है, जो समाज के उस गरीब और अल्पसंख्यक तबके से आते हैं, जहां उन की तरक्की में जाति और धर्म की दीवार जाती है. ये 2 किरदार हैं चंदन कुमार और मोहम्मद शोएब के, जिन्हें निभाया है विशाल जेठवा और ईशान खट्टर ने. चंदन कुमार दलित है और सरकारी नौकरी के फार्म में अपनी जाति छिपाता है, जबकि मोहम्मद शोएब भारत में रह कर भी मुसलिम होने के चलते गद्दार होने का तमगा छाती पर लिए फिरता है.


दोनों दोस्त पुलिस में भरती होने का सपना देखते हैं, पर समाज की दकियानूसी सोच को हर रोज झेलते हैं और इतने ज्यादा तनाव में रहते हैं कि अपनी भड़ास निकालने के लिए एकदूसरे के कंधे का सहारा ढूंढ़ते हैं. तभी कहानी ऐसा मोड़ लेती है कि चंदन कुमार का परिवार गरीबी और जातिगत जुल्म से लगातार टूटता चला जाता है. दूसरी तरफ मजबूरी में मोहम्मद शोएब को एक दफ्तर में औफिस बौय की नौकरी करनी पड़ती है, मगर यहां भी उस के धर्म की वजह से उसे बेइज्जती झेलनी पड़ती है.


मोहम्मद शोएब में अपनी कंपनी का बनाया प्रोडक्ट बेचने का गुण होता है, पर उसे वह काम नहीं करने दिया जाता. वहीं, चंदन कुमार हर जगह अपनी दलित पहचान छिपाने को मजबूर है, ताकि कोई उस की बेइज्जती कर सके. परिवार की गरीबी और हर जगह से दुत्कार मिलने पर हालात ऐसे बनते हैं कि दोनों दोस्तो को घर छोड़ कर सूरत की एक मिल में काम करने जाना पड़ता है, तभी दुनियाभर में कोरोना महामारी का कहर जाता है और कहानी में नया एंगल शुरू होता है, जो दोनों दोस्तों की जिंदगी का सब से बड़ा इम्तिहान लेता है.


यही वजह है कि यह फिल्म केवल कई इंटरनैशनल मंचों पर तारीफ पा चुकी है, बल्कि भारत से औस्कर 2026 के लिए आधिकारिक एंट्री पा चुकी है. इसेबैस्ट इंटरनैशनल फीचर फिल्मकैटेगरी में दूसरे देशों की फिल्मों से मुकाबला करना है.इन में अर्जेंटीना, ब्राजील, फ्रांस, जरमनी, इराक, जापान, जौर्डन, नार्वे, फिलिस्तीन, दक्षिण कोरिया, स्पेन, स्विट्जरलैंड, ताइवान और ट्यूनीशिया की फिल्में शामिल हैं.

याद रहे कि 15 मार्च, 2026 को लौस एंजिल्स में एक भव्य समारोह में औस्कर अवार्ड 2026 दिए जाएंगे.
यह 98 साल के औस्कर अवार्ड के इतिहास में भारतीय सिनेमा की 5वीं फिल्म है, जोबैस्ट इंटरनैशनल फीचर फिल्मकैटेगरी के लिए शौर्टलिस्ट हुई है और अगर जीत गई तो कमाल कर देगी. Film

 

Hindi Story: चिंता

Hindi Story: रवि अपने कुछ दोस्तों के बहकावे में कर मौजमस्ती करने चकलाघर पहुंच गया. 1,000 रुपए में उस के लिए एक कमरा और एक लड़की तय की गई. उस के बाकी दोस्त भी अलगअलग कमरों में अपनीअपनीमस्तीतलाशने में बिजी हो गए.


कमरे में पहुंच कर रवि पलंग पर बैठ गया. दीवारें सैक्सी तसवीरों से पटी पड़ी थीं. थोड़ी ही देर में कोई 31-32 साल की नेपाली औरत उस के पास कर बैठ गई. अजीब सी हिचक के बीच रवि ने जैसे ही उस का हाथ छुआ, उस का तपता हुआ शरीर उसे चौंकाने लगा. ‘‘अरे, आप को तो तेज बुखार है,’’ रवि बरबस बोल उठा. ‘‘यह सब रोज का धंधा है साहब, आप जल्दी कीजिए. उस के बाद अगले कस्टमर के पास भी जाना है,’’ दर्द को मुसकान में बदलती हुई वह बोली. रवि गंभीर हो गया और बोला, ‘‘बीमार होने पर भी यह सब करती हो. छोड़ क्यों नहीं देती हो यह सब? आखिर क्यों कर रही हो?’’ वह औरत अपने आंसू रोक पाई और बोली, ‘‘बेटी के लिए साहब.’’


‘‘मतलब?’’ रवि ने पूछा. वह औरत कुछ पल चुप रही, फिर टूटी आवाज में बोली, ‘‘नेपाल में मैं एक इज्जतदार परिवार से हूं. मेरे पति का कारोबार था. घरकार, सबकुछ था. मेरी एक 10 साल की बेटी भी है. लेकिन साल 2015 में आए भूकंप ने सब छीन लिया. मेरे पति मलबे में दब कर मर गए. आंखें खोल कर देखा तो बचा था सिर्फ भूकंप का मलबा, भूख, बेबसी और मेरी 8 महीने की बच्ची. ‘‘फिर रोजगार के लिए मैं दरदर भटकी, पर बिना मर्द की औरत खुले खेत जैसी होती है, जिसे कोई भी जानवर बेहिचक चर जाता है. हर जगह मेरे शरीर का शोषण हुआ. फिर भारत में काम दिलाने के नाम पर एक दलाल मु झे यहां बेच गया.’’


उस औरत की कहानी सुन कर रवि का रोमरोम सिहर उठा. वह जिस्म की आग बु झाने आया था, पर सामने किसी मां की तपती मजबूरियां खड़ी थीं. ‘‘लेकिन इस हालत में भी यह सब क्यों?’’ रवि की बात पूरी होने से पहले ही वह औरत बोली, ‘‘बताया तो है कि बेटी के लिए. इसी तपते हुए जिस्म से कमाए पैसों से उस की बोर्डिंग स्कूल की फीस भरती हूं, ताकि पढ़लिख कर वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके और उसे मेरी तरह इस जिस्म के बाजार में कभी बिकना पड़े.’’ रवि के भीतर उस औरत के लिए इज्जत उमड़ आई. वह फौरन कमरे से बाहर निकला और गुस्से में चकलाघर चलाने वाली रेशमाबाई के पास पहुंचा.
‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें…’’ रवि फट पड़ा, ‘‘एक औरत हो कर दूसरी औरत की मजबूरी का फायदा उठाती हो. इन्हें जिल्लत की जिंदगी में धकेलती हो.’’


रेशमाबाई ने पान की पीक को पीकदान में फेंकते हुए ठहाका लगाया, ‘‘क्या बात है लल्लालगता है पहली बार आए होयहां चमड़ी का धंधा चलता है, चोंचलेबाजी नहीं. मूड नहीं बना क्या? कुछ कड़क चाहिए तो बोलो पहली बार हो, डिस्काउंट भी दे दूंगी…’’ ‘‘कैसी घटिया औरत हो तुमकोई अपनी मरजी से यह काम करे तो बात और है, पर जबरदस्तीरवि का गुस्सा फूट पड़ा. रेशमाबाई फिर मुसकराई और बोली, ‘‘यह सब यहां चलता रहता है. ज्यादा अक्ल मत लगाओ.’’ रवि जोर से बोला, ‘‘अगर यही मजबूरी तुम्हारी बेटी पर आती तो?’’ रेशमाबाई ठहाका मारते हुए बोली, ‘‘बेटी? अरे चिकने, मैं भी तो अपनी बेटी के लिए ही कर रही हूं यह सब. मेरे बाद यही तो संभालेगी धंधा. क्यों बेटी हसीना?’’


पास  झूले पर बैठी रेशमाबाई की बेटी हसीना ने बालों में उंगली घुमाते हुए मुसकरा कर कहा, ‘‘मैं भी तो इसी इंतजार में हूं अम्मी.’’ उन मांबेटी की बातें सुन रवि हैरान रह गया. वह सम नहीं पा रहा था कि बेटी के भविष्य के लिए कौन ज्यादा चिंतित हैवह नेपाली औरत या फिर रेशमाबाई?  Hindi Story

Hindi Story: दुकान चाय की धंधा जहर का

Hindi Story: चा की दुकान, जो आम आदमी के लिए थकान मिटाने, गपशप करने और जिंदगी की हलचल से कुछ पल सुकून पाने की जगह होती है, जब उसी दुकान की आड़ में जहर का कारोबार चलने लगे, तो यह केवल एक अपराध नहीं रह जाता. पिछले 5 साल में चाय की दुकान की आड़ ले कर नशे का ऐसा नैटवर्क खड़ा किया गया कि 20 करोड़ रुपए की जायदाद खड़ी हो गई.


बिहार के मनेर क्षेत्र में रहने वाला एक शख्स, जो बाहर से एक साधारण दुकानदार दिखता था, असल में नशा तस्करी के जाल का अहम किरदार निकला. पुलिस की कार्रवाई में उस के साथ उस की बहन समेत 6 सहयोगियों की गिरफ्तारी हुई. जांच में जो बातें सामने आईं, वे चौंकाने वाली थीं. घर से 35 लाख रुपए की चरस, 25 लाख रुपए की स्मैक, 12 लाख, 20,000 रुपए नकद, हथियार, वाहन और कीमती सामान बरामद हुआ.


इस पूरे नैटवर्क की बनावट पर नजर डालें, तो यह साफ होता है कि अपराध अब अकेले शख्स का नहीं रहा, बल्कि यह एक संगठित तंत्र है, जिस में परिवार तक शामिल हो जाता है. आरोपी की बहन का रोल इस धंधे में काफी अहम बताया जा रहा है. ड्रग्स की सप्लाई नेपाल से कराई जाती थी, ताकि पुलिस की निगाहों से बचा जा सके. नेपाल भेजे गए लोग ड्रग्स ले कर लौटते थे और फिर बिहार के अलगअलग इलाकों जैसे आरा, सारण, गया वगैरह में इस की सप्लाई होती थी.


यह भी सामने आया कि आरोपी पहले भी ड्रग्स के साथ पकड़ा जा चुका था. 2 साल पहले भी उस के पास से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई थीं, लेकिन इस के बावजूद वह फिर उसी धंधे से जुड़ गया.
नशे का यह कारोबार नौजवानों को ध्यान में रख कर फैलाया जा रहा था. चाय की दुकान, जहां नौजवान अकसर इकट्ठा होते हैं, उसे ही सप्लाई का अड्डा बनाया गया. बताया जाता है कि आरोपी ने इसी काले धंधे से करोड़ों की जमीन, मकान और वाहन खड़े कर लिए थे.


साल 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू हुई थी. इस का मकसद साफ था, अपराध रोकना, घरेलू हिंसा कम करना और समाज को सुधारना. शुरुआती महीनों में शराबबंदी ने असर भी दिखाया था, लेकिन धीरेधीरे तस्करों ने नई राह निकाल ली. नतीजतन, देशीविदेशी शराब की जगह अब ड्रग्स और नशे के दूसरे साधनों ने बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है.


शराबबंदी के बाद ड्रग्स का नैटवर्क कई गुना बढ़ गया है. पहले जो नशा केवल शहरों तक सीमित था, अब गांवगांव तक पहुंच गया है. गरीब तबका महुआ, स्प्रिट, खैनी, गुटका तक सीमित रहा, तो मिडिल क्लास गांजा, देशी शराब और अमीर तबका ब्राउन शुगर, चरस, प्रीमियम शराब तक अपनी पैठ बना चुका है.
पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर नशे के हब बन चुके हैं, वहीं गया, नालंदा, सीतामढ़ी, मधुबनी, भभुआ, रोहतास जैसे जिले भी पीछे नहीं हैं.


16 साल के आकाश ने बताया, ‘‘मैं ने पहली बार ब्राउन शुगर स्कूल के दोस्तों के साथ ली थी. शुरू में लगा कि मजा आएगा. 500 रुपए में दोस्तों के साथ  लाते थे. धीरेधीरे आदत बढ़ी. अब दिनभर बेचैनी रहती है. मिले तो शरीर में खुजली मचना और दर्द बनना शुरू हो जाता है.’’ आकाश के पिता मजदूरी करते हैं. इस ने घर के गहने और मोबाइल तक बेच दिए थे. कुछ समय पहले ही आकाश को नशा मुक्ति केंद्र ले जाया गया था, लेकिन एक एक महीने बाद फिर वह वापस उसी ढर्रे पर लौट आया.

इन पर सब से ज्यादा असर12 से किशोरों से ले कर 25 साल के नौजवान सब से ज्यादा ब्राउन शुगर का सेवन कर रहे हैं. ब्राउन शुगर भी लोग 4-5 के समूह में सेवन करते हैं. यह नशा शहर से चल कर गांव तक पहुंच गया है.औरंगाबाद जिले के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया, ‘‘हमारे स्कूल के तकरीबन 50 बच्चे ब्राउन शुगर का सेवन करते हैं. हम लोग सम? कर थक गए हैं, पर इन लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है. कई बच्चों ने तो स्कूल आना भी छोड़ दिया है.’’


नशा मुक्ति केंद्र, पटना के डाक्टर अजय कुमार बताते हैं, ‘‘ब्राउन शुगर और ड्रग्स का असर इतना खतरनाक है कि 3-4 महीने में ही नौजवान इस की गिरफ्त में जाते हैं. 70 फीसदी से ज्यादा मरीज इलाज के बाद भी दोबारा नशे की ओर लौट जाते हैं.’’ शराबबंदी के बाद गांवदेहात में देशी शराब बनाने का प्रचलन काफी बढ़ गया है. जहरीली शराब पीने की वजह से साल 2016 से अभी तक सरकारी रिकौर्ड के मुताबिक 190 मौतें हुई हैं. साल 2022 में सारण मशरक में सब से बड़ी घटना हुई थी, जिस में 73 लोगों की मौत हो गई थी.


जहरीली शराब की वजह से जब मौतें होने लगती हैं, तो प्रशासन और सरकार इसे छिपाने के लिए दूसरी वजह से मौत को दिखाने लगते हैं. सरकार द्वारा शराबबंदी को कामयाब बनाने के लिए बहुत कोशिश की गई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. शराब हर जगह मिल रही है. गैरकानूनी तौर पर शराब बेचने वाले होम डिलीवरी की सहूलियत भी दे रहे हैं. अपराध और नशे का रिश्ता पुलिस रिकौर्ड बताते हैं कि शराबबंदी के बाद चोरी, डकैती और हत्या जैसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई है. नशे की लत पूरी करने के लिए नौजवान चोरी और अपराध का रास्ता अपना रहे हैं.


सरकार ने 50 से ज्यादा नशा मुक्ति केंद्र चलाए हैं. विशेष अभियान में हजारों गिरफ्तारियां भी हुई हैं, लेकिन तस्करों का नैटवर्क इतना मजबूत है कि पकड़ में आते ही नए लोग उन की जगह ले लेते हैं.
नशा अब केवल निजी आदत नहीं, बल्कि सामाजिक संकट बन चुका है. सरकार, समाज और परिवार को मिल कर काम करना होगा, वरना आने वाली पीढ़ी नशे के अंधेरे में खो जाएगी. Hindi Story

Political Story: राजभवन में एक दिन

Political story: अपने बचपन में खूब बाल पत्रिकाएं जैसेनंदन’, ‘पराग’, ‘चंदामामा’, ‘बाल भारती’, ‘चंपकवगैरह पढ़ी थीं, जिन में राजारानियों, राजकुमारों, जानवरों से जुड़े मजेदार किरदारों की कहानियां हुआ करती थींअब राजारानी हैं, तो राजमहल भी होंगे ही. तो उस जमाने में हमारे जैसे बच्चे कल्पनालोक में डूब जाते थे कि राजमहल कैसा होता होगा. जाहिर सी बात है कि वे भव्य तो होंगे ही. होना भी चाहिए. वह समय राजतंत्र का भी था.


मगर वह राजतंत्र अब लोकतंत्र में बदल गया है, तो राजारानी तो हैं नहीं, मगर राजमहल मौजूद हैं, जो म्यूजियमों में या होटलों में बदल गए हैं. पुराने जमाने में इन राजमहलों की शानशौकत का कहना ही क्या था. फिर बाल कहानियों में तो वे अपनी पूरी शान से मौजूद रहते थे, जिस में रहने का हम सपना भी नहीं देख सकते थे. मगर एक इच्छा तो रहती ही है मन में कि वहां जा कर उन की भव्यता देखते कि राजपरिवार के लोग कैसे रत्नजटित राजमुकुट लगाए राजमहलों में रहते होंगे. राजा सोने के एक भव्य, बड़े सिंहासन पर सलमेसितारों से सजा मखमली छत्र लगा कर बैठा होगा.


उन की देह पर आभूषणों का भंडार जो सजा रहता था. गले में बड़ेबड़े हार, कानों में बड़ेबड़े  झुमके या बड़ीबड़ी बालियां, बांह पर बाजूबंद, कलाई में कंगन और कमर में करधनी. ये सब खासे सच्चे सोने के होते थे, जिन की तसवीरें पत्रिकाओं में छपी होती थींआखिरचंदामामा’, ‘नंदन’, ‘परागवगैरह में बताए गए किरदार तेनालीराम, बीरबल, गोपाल भांड़ वगैरह तो सामान्य लोग ही थे, जो अपनी चतुराई और बुद्धिमानी से वहां पहुंच गए थे. मगर हम लोगों के पास चतुराई थी और ही बुद्धिमानी, सो वहीं के वहीं रह गए. और एक छोटी सी नौकरी तक पहुंच कर वोटर भर बन कर रह गए.


पुराने जमाने में इन राजमहलों में एक राजदरबार भी हुआ करता था. क्या भव्यता रहती थी उस की. राजा या तो आमोदप्रमोद में बिजी या हंसतेमुसकराते इनामइकराम बांट रहा होगा. अकबर के राजदरबार से प्रेरणा ले कर इस राजदरबार की पहली परिकल्पना तुलसीदास ने रामदरबार के लिए की थी. वह हर रामलीला के बाद बतौर  झांकी अंत में दिखाई जाती है. सो, उस की चकाचौंध आंखों में बसी थी. बाद में राजा रवि वर्मा ने इसे अपनी कल्पना से चित्रों में उतार दिया, तो उस की कौपियां अब देशभर में दिखाई देती हैं.


मगर लोकतंत्र की आंधी ने यह सबकुछ खत्म कर दिया. कुछेक देशों में यह राजतंत्र अब भी है. जैसे कि पहले आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले इंगलैंड में राजा होता है. लेकिन वह नाममात्र का ही राजा है. वैधानिक ताकत तो संसद के पास है. इसी तरह के राजतंत्र अभी भी वजूद में हैं, जिन के प्रति प्रजा पूरी श्रद्धा रखती है. भगवान के समान पूजती नहीं, मगर विश्वास तो रखती ही है. इस से क्या हुआ? राजतंत्र तो है . 1857 में बहादुर शाह जफर को जब अंगरेजों ने कैद किया था, तब उस का असली राज दिल्ली और उस के आसपास (एनसीआर) में ही था. मगर वह हिंदुस्तान का बादशाह कहलाता था. हिंदुस्तान मतलब सम रहे हैं . इस हिंदुस्तान में दक्षेस, यानी दक्षिण एशिया के सभी देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका वगैरह समाहित थे.


इस के बाद जहांजहां राजतंत्र खत्म हुआ, उसे या तो मिटा दिया गया या फिर सजावटी रूप में सजा कर राजमहलों तक सीमित कर दिया गया. अंगरेजों ने भारत में यही किया था. वे एकएक कर राजतंत्रों को हड़पते जाते और उसे अपने ब्रिटिश लोकतंत्र में रखते जाते थे. वह तो 1857 में कुछ की चेतना जगी, तो लोग सजग हुए और विद्रोह कर दिया. बड़ी मुश्किल से वह बगावत रुकी. अंगरेजों को डर हुआ कि यहां तो लोकतंत्र आएगा नहीं, उन की दुकानदारी भी जाती रहेगी. सो, उन्होंने साफ कह दिया कि तुम अपने राज में राजा बने रागरंग करते रहो. बस, विद्रोह करना और हमें धंधा करते देना. और इस तरह भारत में तकरीबन 600 रजवाड़े बच रहे थे.


1947 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें और समेट दिया और प्रिवी पर्स का एक नन्हा टुकड़ा उन के मुंह पर मार दिया था. वे फिर भी खुश थे कि राजा कहला रहे हैं . और क्या चाहिए. लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी ने वह भी उन से छीन लिया कि अब भारत में लोकतंत्र रहेगा. वैसे यहां लोकतंत्र है, तो क्या हुआ, राजमहल तो हैं ही. बस, उन का नामकरण बदल गया है. आजादी से पहले इसे गवर्नमैंट हाउस बोलते थे. अब वह राजभवन हो गया है. और इन राजभवनों में राज्यपाल रहते हैं. लेकिन नाम बदलने से क्या होता है. चीजें तो वैसे ही रह सकती हैं. असली मुखिया भले ही मुख्यमंत्री हो, राज्य का काम तो राज्यपाल के नाम से ही चलता है. सो, उन की अपनी अहमियत है ही. लिहाजा, एक हसरत थी कि हम भी राजभवन देखते, जो कभी राजमहल कहलाता था.


बिहार विधानसभा से जो सीधी सड़क आगे जाती है, उस के दूसरे छोर पर है राजभवन. इस के बाईं ओर मुख्यमंत्री का आवास है. मतलब एक तरफ राजप्रतिनिधि, तो दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि, लेकिन हमें उधर क्या जाना? हमें तो राजप्रतिनिधि के पास जाना है. चारों तरफ सुरक्षा की जबरदस्त घेराबंदी और चौकसी.
सो, हम दाईं ओर एक सिपाहीश्री के कथनानुसार मुड़ लिए. सड़क के उस पार एक बड़ा सा प्रवेश द्वार. उस की बगल में सिक्योरिटी औफिस में आमंत्रणपत्र दिखाया. आरक्षी निरीक्षकश्री ने अपनी बड़ीबड़ी मूंछों के पीछे मुसकराहट को छिपाते और कमर में बंधी गन को सहलाते हुए आगे का रास्ता दिखा दिया.

जनताजनार्दन वैसे ही डरी रहती है. राजमहल जाने से पहले उसे कुछ और ज्यादा डरना चाहिए शायद.
खैर, दोबारा एक सड़क आगे राजभवन की ओर. सड़क के दोनों तरफ के सघन पेड़पौधे जंगल का भरम पैदा कर रहे थे. बिहार के बनने के बाद जो यहां के पहले राज्यपाल सर एडवर्ड गेट थे, वे पूर्वोत्तर के भयानक जंगलों में खूब भागदौड़ कर चुके थे. शायद इसलिए उन्होंने इस परिसर में ही नहीं, इस इलाके में भी वृक्षारोपण कराया होगा, ताकि यह इलाका जंगलों की तरह दिखे और वे पूर्वोत्तर के पुराने दिनों को भूल जाएं.


एडवर्ड गेट ने पूर्वोत्तर पर ही एक इतिहास पुस्तकहिस्ट्री औफ असमतैयार किया था. वह पूर्वोत्तर के इतिहास को जानने का एक प्रमुख, प्रामाणिक स्रोत माना जाता है. बाद में पता चला कि राजभवन परिसर में कुल 27 बाग हैं. एक बाग तो आमों का है, जिस में आमों के 25 प्रजातियों के तकरीबन 35 पेड़ हैं. इसी तरह दूसरी तरह के फलों के पेड़ हैं. फूलों की असंख्य प्रजातियां वहां खिलतेमुर झाते रहते हैं. एक मनोरम सरोवर है, तो भव्य गौशाला भी है.  सफेद रंग का एक तिमंजिला सादे ढंग का भवन है, जिसे राजभवन कहा जाता है. हर तल आजकल के भवनों से अलग बीसेक फुट ऊंचा होगा. अब राजभवन के दरबार में जा रहा हूं, तो एक सोच बनी थी.

मगर वहां दर्शक दीर्घा में कुछ काठ की कुरसियां पड़ी थीं. सामने मंच पर पुखराजी कलर वाले मखमली आवरण से ढकी, आबनूसी रंग वाली नक्काशीदार बड़ी सी गद्दीदार कुरसी थी, जिसे पारंपरिक सफेद वेशभूषा में एक भृत्य तकरीबन पकड़ कर खड़ा था. गोया अगर उस ने उस कुरसी की देखभाल नहीं की, तो कोई उसे उठा कर भाग जाए. खैर, यह राजभवन का प्रोटोकौल है. इस कुरसी के अगलबगल 2-2 सामान्य कुरसियां थीं. मंच के दोनों छोरों पर काले कपड़ों और चश्मों में 2 कमांडो अटैंशन की मुद्रा में खड़े थे. राज्यपाल महोदय का आगमन हुआ. कोई छत्र और चंवर भी नहीं. सिर पर राजमुकुट क्या, कोई पगड़ी तक नहीं. यह सामान्य सादे वेशभूषा में कमांडों और कुछ लोगों के साथ राज्यपाल दरबार में चले रहे हैं. दरबार के ठीक मध्य में पुराने जमाने का कोई पीतल का बड़ा सा  झाड़फानूस टंगा है.

इस से बड़ेबड़े और बढि़या, चमचम चमकते  झाड़फानूस तो औसत दर्जे के होटलों में  झूलते रहते हैं. हां, यहां मौडर्न अंदाज के सिलिंग फैन जरूर  झूम रहे थे, जो बदलाव की बात बताता सा लग रहा था. प्रोटोकौल के मुताबिक महामहिम राज्यपाल के सम्मान में सभी खड़े हो गए. मंचासीन होने के बाद वे दोबारा खड़े हुए, क्योंकि राष्ट्रगान होने वाला था. ठीक तय समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ. पत्रिका का लोकार्पण होना था, जो उन्होंने किया. फिर कहा, ‘मु झे इस बात की खुशी है कि मैं उस पत्रिका का लोकार्पण कर रहा हूं, जिस में सनसनी नहीं, संवेदनशीलता है.’


दूसरे लोगों ने भी अपनी बातें कहीं. कार्यक्रम के बाद दोबारा राष्ट्रगान हुआ. दर्शक दीर्घा के एक कोने में चायजलपान का इंतजाम था. राज्यपाल ने खुद मेजबानी करते हुए सभी को जलपान कराया. फिर हम सभी वहां से विदा हो लिए.        Political Story

Crime Story: देवर के चक्कर में पति की हत्या

Crime Story: हरियाणा के सोनीपत जिले के थाना गन्नौर क्षेत्र के गांव झरगढ़ी के रहने वाले शाहनवाज की शादी 9 साल पहले साल 2016 में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के थाना कांधला क्षेत्र के गांव गढ़ी दौलत की रहने वाली महफरीन से हुई थी.


शादी के बाद शाहनवाज और महफरीन की जिंदगी मजे से चल रही थी. शाहनवाज दिनभर काम कर के जब शाम को घर वापस लौटता, को महफरीन उस पर अपना भरपूर प्यार लुटाती थी. दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से गुजर रही थी. इस दौरान महफरीन ने 2 बच्चों को जन्म दिया. पहला लड़का तकरीबन
8 साल का है, जबकि दूसरा लड़का तकरीबन 4 साल का है. जैसा कि सभी परिवारों में होता है, रिश्तेदार आतेजाते रहते हैं. शाहनवाज के मामा का लड़का तसव्वुर का भी वहां आनाजाना था. जब कभी तसव्वुर और महफरीन मिलते तो देवरभाभी होने के नाते एकदूसरे से हंसीमजाक भी करलेते थे.

शाहनवाज इसे यह सोच कर नजरअंदाज कर देता था कि देवरभाभी में मजाक तो चलता ही रहता है.
पिछले तकरीबन 6 महीने से महफरीन और तसव्वुर में अचानक से नजदीकियां ज्यादा बढ़ गई थीं. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर भी शेयर कर लिया था.
‘‘भाभी, आप मु? बहुत अच्छी लगती हो,’’ एक दिन तसव्वुर ने महफरीन से कहा.
इस पर महफरीन ने जवाब दिया, ‘‘रहने दो.’’ ‘‘रब करे आप को किसी की नजर लगे…’’ तसव्वुर ने कहा, ‘‘मैं आप को दिल से कह रहा हूं कि आप बहुत खूबसूरत हो.’’ हिम्मत कर के तसव्वुर ने अपने दिल की बात भी कह दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम्हारे बगैर रह नहीं सकता.’’


तसव्वुर के मुंह से यह बात सुन कर महफरीन को थोड़ी देर के लिए अजीब सा लगा, लेकिन जब दोनों में काफी देर तक बात हुई, तो महफरीन भी तसव्वुर को अपना दिल दे बैठी.
इस के बाद तो उन दोनों में घंटों बात होने लगी, फिर दोनों चोरीछिपे मिलने भी लगे. दोनों ने प्यार की तमाम हदों को पार कर दिया.


पर जब देखो तब और घंटों तसव्वुर से बात करने पर शाहनवाज को महफरीन पर शक हो गया. उस ने 1-2 बार महफरीन को समझाया भी, लेकिन वह नहीं मानी और लगातार तसव्वुर से संबंध जारी रखे.
3 अगस्त की रात को शाहनवाज ने महफरीन को मोबाइल पर किसी से बात करते रंगे हाथ पकड़ लिया, ‘‘किस से बात कर रही थी? क्या चल रहा है?’’ महफरीन बोली, ‘‘कुछ भी नहीं, मैं तो बस…’’शाहनवाज ने गुस्से में उस का फोन छीना और देखा कि कौल लौग में बारबार तसव्वुर का नाम था. वह भड़क उठा और महफरीन की पिटाई कर दी.


उस रात महफरीन की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे, नफरत और बदले की आग भी थी. महफरीन ने उसी रात तसव्वुर को  फोन कर कहा, ‘‘अब बहुत हो गया, उसे रास्ते से हटाना होगा.’’रात में ही महफरीन और तसव्वुर ने एक ऐसी योजना बनाई, जिस का किसी को अंदाजा भी नहीं था. इस के बाद महफरीन ने शाहनवाज से ऐसा बरताव किया जैसे पिटाई के बाद वह शाहनवाज की बात मान गई हो.

उस ने शाहनवाज को इस का जरा भी अहसास नहीं होने दिया कि उस के दिमाग में क्या चल रहा है.
7 अगस्त, 2025 को शामली जनपद के गांव खुरगान के बाशिंदे और शाहनवाज के ममेरे साले इमलाक की शादी थी. महफरीन और शाहनवाज ने मिल कर शादी में जाने का प्रोग्राम बनाया.


महफरीन बोली, ‘‘हम बाइक पर जाएंगे, ताकि जल्दी पहुंच सके, क्योंकि हरियाणा की बसों में बहुत भीड़ चल रही है. फिर गांव तक पहुंचने के लिए साधन भी नहीं मिलता है. बसअड्डे पर खड़े होकर घंटों इंतजार करना पड़ता है. अपनी बाइक होगी तो आसानी से घर तक पहुंच जाएंगे.’’


‘‘हां, यह सही रहेगा गरमी भी बहुत ज्यादा है. अपना साधन होगा तो पहुंचने में आसानी रहेगी,’’ शाहनवाज ने जवाब दिया, फिर थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘एक दिन पहले चलेंगे. काफी दिन हो गए, तुम्हारे परिवार वालों से भी नहीं मिला हूं मैं. वे भी कहते रहते हैं…’’‘‘रात को तुम्हारे मायके गांव गढ़ी दौलत चलेंगे अगले दिन वहीं से खुगरान चलेंगे,’’ शाहनवाज ने अपना प्लान बताया.


जैसा कि महफरीन और शाहनवाज ने शादी के लिए प्रोग्राम बनाया था, उसी के मुताबिक 6 अगस्त, 2025 को दोनों बाइक पर सवार हो कर गांव गढ़ी दौलत पहुंच गए.शाहनवाज को देख कर महफरीन के मायके वाले भी बहुत खुश हुए. सभी ने घर और परिवार का हालचाल पूछा. दामादजी घर पर आए थे, तो शाहनवाज की खातिरदारी भी अच्छी तरह से हुई.


7 अगस्त की सुबह शाहनवाज अपनी बीवी महफरीन को बाइक पर बैठा कर गांव खुरगान के लिए निकल पड़ा. गांव में पहुंचने से पहले कसबा कैराना में उस ने कुछ सामान भी खरीदा और फिर से चल पड़ा.
बाइक पर पीछे बैठी महफरीन फोन पर बारबार किसी से बात कर रही थी. बाइक की स्पीड तेज होने के चलते वह समझ नहीं पा रहा था. उसे केवल इतना ही समझ आया कि शायद शादी वाले घर से फोन रहे होंगे कि कितनी देर में पहुंचोगे.


लेकिन महफरीन किसी से कोडवर्ड में बात कर रही थी. उस ने बोला, ‘मंजिल आने वाली है…’ थोड़ा आगे चलने पर उस ने फिर से कोडवर्ड में बात की, ‘पुल पार करोऔर इस के बाद फोन पर फिर से कहाबस थोड़ा इंतजार करो.’ महफरीन के इन कोडवर्ड से खून और धोखे की गंध रही थी. सुबह के 10 बज रहे थे. शाहनवाज और महफरीन की बाइक नैशनल हाईवे पर दौड़ी जा रही थी.

जब वे पानीपतहरिद्वार नैशनल हाईवे पर बने एक फ्लाईओवर से थोड़ा आगे बेरी के बाग के निकट पहुंचे, तो पीछे से 2 बाइकों पर सवार 4 लड़कों ने ओवरटेक कर शाहनवाज की बाइक में टक्कर मार दी और शाहनवाज को डंडा मार कर बाइक रुकवा ली. उन्होंने चाकू से शाहनवाज पर ताबड़तोड़ कई वार किए. एक लड़के ने उस पर तमंचे से गोली चलाई. गंभीर रूप से घायल शाहनवाज सड़क पर नीचे गिर गया. वारदात को अंजाम देने के बाद वे सभी हमलावर फरार हो गए.


शाहनवाज की आंखों में दर्द और धोखे कीलक थीशायद आखिरी बार उस ने महफरीन को देखा, जो चुपचाप खड़ी थी. महफरीन ने डायल 112 को फोन किया और पुलिस को सूचना दी, ‘‘हम पर हमला हुआ है. बदमाशों ने मेरे पति को मार डाला.’’ पुलिस मौके पर पहुंची और सड़क पर घायल पड़े शाहनवाज को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मरा हुआ घोषित कर दिया. जानकारी पा कर सोनीपत से शाहनवाज के परिवार वाले भी कैराना पहुंच गए. उन्होंने पुलिस को डेढ़ लाख रुपए की दूल्हे के लिए ले जाई जा रही नोटों की माला और बाइक लूटने की सूचना दी.


एसपी रामसेवक गौतम, एएसपी संतोष कुमार सिंह और सीओ कैराना श्याम सिंह मौके पर पहुंचे. इस दौरान पुलिस ने मौके से शाहनवाज की बाइक भी बरामद की. फोरैंसिक टीम ने पहुंच कर सुबूत जुटाए.
वहीं, अस्पताल में महफरीन जमीन पर गिर कर बारबार बेहोशी का नाटक करने लगी, रोती रही. महफरीन की तरफ से कैराना कोतवाली में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई गई.

2 डाक्टरों की टीम द्वारा शाहनवाज की लाश का पोस्टमार्टम कराया गया
तो उस के शरीर में गोली लगना भी पाया गया, चाकुओं से वार किए गए थे, सो अलग.कैराना पुलिस के मुताबिक, महफरीन के बयान लिए तो उस ने पुलिस को चाकुओं से हमला करना ही बताया. पुलिस को महफरीन की बातों में दम नहीं लगा. उस की आंखों में पति की मौत के आंसू जरूर थे, लेकिन पकड़े जाने का डर भी साफ दिख रहा था.


पुलिस ने महफरीन को दोबारा से बयान लेने के लिए बुलाया, तो उस ने बयान देने से मना कर दिया. इस पर पुलिस को शक हुआ तो पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए उठा लिया. इसी दौरान केस के खुलासे के लिए लगाई गई टीमों ने जब महफरीन की कौल डिटेल खंगाली तो सारे राज खुलते चले गए.
तसव्वुर से महफरीन की लगातार बातचीत और लोकेशन शेयरिंग से पूरा राज खुला. पुलिस की कड़ी पूछताछ में महफरीन टूट गई.


‘‘हांमैं ने करवाया मर्डरतसव्वुर से प्यार करती हूं. शाहनवाज ने मारा था  पिटाई सह नहीं पाई.’’
महफरीन ने आगे बताया कि शाहनवाज ने उसे तसव्वुर से मोबाइलपर बात करते हुए रंगे हाथ पकड़ा था. इस के बाद दोनों के बीच  झगड़ा हुआ. शाहनवाज ने उस की पिटाई भी की थी. इसी के बाद उस ने प्रेमी तसव्वुर के साथ मिल कर शाहनवाज की हत्या की योजना बनाई. उस का काम सिर्फ लोकेशन देना था.

हत्या की प्लानिंग के तहत उसे शाहनवाज को सही समय पर सही जगह तक ले जाना था.
कैराना और आसपास लगे 10 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरों में 2 बाइकों पर सवार 4 हमलावर नजर आए.फुटेज से उन की बाइक का नंबर मिला. इस के कुछ ही घंटों में हत्या के आरोपी तसव्वुर और शोएब को पकड़ लिया गया. पुलिस की जांच में सामने आया है कि हत्या में इस्तेमाल तमंचा और चाकू गढ़ी दौलत गांव के एक नौजवान ने मुहैया कराए थे.   

लेखक     महेश कांत शिवा

Film: परदे की दुनिया

Film: तारा सुतारिया और वीर पहाडि़या हुए अलग


एक सिंगर हैं एपी ढिल्लों. उन के एक कौन्सर्ट में एक ब्रेकअप हुआ. दरअसल, इस कौन्सर्ट में फिल्म हीरोइन तारा सुतारिया जब स्टेज पर गईं तो वहां कुछ ऐसा हुआ, जो तारा के बौयफ्रैंड वीर पहाडि़या को पसंद नहीं आया. वहां हजारों लोगों की भीड़ में एपी ढिल्लों और तारा सुतारिया कुछ इस तरह से मिले मानो उन के बीच कोई इश्क का चक्कर है. खबरों के मुताबिक, जब वीर पहाडि़या ने यह सब देखा तो वे इतने नाराज हुए कि अपनी एक साल की रिलेशनशिप को तोड़ दिया.
तारा सुतारिया अब यश की फिल्मटौक्सिकमें दिखाई देंगी और वीर पहाडि़या हिंदी फिल्मस्काई फोर्समें नजर आए थे, जिस में अक्षय कुमार भी थे.





दिशा, तमन्ना, तृप्ति का रोमियो

विशाल भारद्वाज अतरंगी फिल्में भी बड़े स्टाइल से बनाते हैं. अब वे ले कर रहे रहे हैं रोमियो’, जिस में शाहिद कपूर अपनी जूलियट ढूंढ़ रहे हैं. इस फिल्म में दिशा पाटनी, तमन्ना भाटिया और तृप्ति डिमरी बतौर हीरोइन दिखाई देंगी, पर कौन इस रोमियो की जूलियट बनेगी, इस का राज फिल्म रिलीज होने के बाद ही पता चलेगा.
इस फिल्म में नाना पाटेकर, विक्रांत मैसी और फरीदा जलाल जैसे नामचीन कलाकार भी अपनी अदाकारी के जलवे दिखाएंगे.


इमरान हाशमी नेअपनोंको लताड़ा

तकरीबन 4 घंटे की फिल्मधुरंधरकाफी बड़ी हिट हो गई है. लोग सिनेमाघरों में जा कर यह फिल्म देख रहे हैं. इसी बीच हीरो इमरान हाशमी ने ऐसी बात कह दी है, जिस पर बवाल हो गया है. उन्होंने कहा, ‘‘जब भी कोई फिल्म अच्छा बिजनैस करती है, तो सब से पहले तो खुशी होती है. लेकिन हमारी इंडस्ट्री में एक घटिया सोच फैली हुई है. लोग फिल्मों की बुराई करना पसंद करते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर कोई फिल्म अच्छा करती है, तो
उस का जश्न मनाना चाहिए. क्योंकि जितनी ज्यादा फिल्में अच्छा करेंगी, उतना ही इंडस्ट्री को फायदा होगा और कमाई बढ़ेगी. इस से सभी को फायदा होता है, इसलिए यह घटिया सोच नहीं होनी चाहिए.’’


कौन है कार्तिक आर्यन की मिस्ट्री गल


र्कार्तिक आर्यन की नई फिल्मतू मेरी मैं तेरा, मैं तेरा तू मेरीज्यादा नहीं चल पाई. पर कार्तिक आर्यन जरूर सुर्खियां बटोर रहे हैं. इस बार उन के गोवा ट्रिप पर बवाल मचा हुआ है. दरअसल, कार्तिक आर्यन का नाम बीते दिनों
एक लड़की से जोड़ा गया था, जिस का नाम करीना कुबिलिउते है और उम्र
18 साल है.
एक बड़े अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के सैंट रेजिस होटल में कार्तिक और करीना एक ही वक्त पर रुके थे, हालांकि इन के कमरे अलगअलग थे. इस के बाद सोशल मीडिया
पर अफवाहें उड़ने
लगीं कि वे दोनों डेट कर रहे हैं.
पर इस सिलसिले में करीना कुबिलिउते ने इंस्टाग्राम पर सफाई दी और कहा कि वे एक्टर (कार्तिक आर्यन) को जानती ही नहीं हैं और ही वे उन की गर्लफ्रैंड हैं. वे अपने परिवार के साथ वहां छुट्टियां मनाने गई थीं. Film

Crime Story: ऐंजल चकमा – हेट क्राइम की भेंट चढ़ा मासूम

Crime Story: महज 10,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का त्रिपुरा पूर्वोत्तर भारत में बसा एक खूबसूरत राज्य है और उस से भी खूबसूरत हैं वहां के रहवासी. यहीं के उनाकोटी जिले के नंदानगर इलाके का रहने वाला एक नौजवान लड़का ऐंजल चकमा अपने सपने पूरे करने दूसरे पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की राजधानी देहरादून गया था, जहां वह पढ़ाई कर रहा था.


पर 9 दिसंबर, 2025 का दिन ऐंजल चकमा पर कहर बन कर टूटा. एक छोटी सी कहासुनी मारपीट में बदली और फिर ऐसा खूनी खेल हुआ कि ऐंजल चकमा अपनी जिंदगी से ही हाथ धो बैठा. इस वारदात को ऐंजल चकमा के छोटे भाई माइकल चकमा के कहे मुताबिक सम?ाते हैं. 9 दिसंबर की शाम के तकरीबन 6 से 7 बजे माइकल अपने भाई ऐंजल के साथ कुछ सामान लेने घर से निकला था. वे दोनों सेलाकुई में ही रहते थे. ऐंजल देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में एमबीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहा था, जबकि माइकल उत्तरांचल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था.


जब वे दोनों मार्केट में पहुंचे तो बाइक और स्कूटी पर आए कुछ लड़के उन के पास आए. उन सभी लड़कों ने दोनों भाइयों पर कमैंट करना शुरू कर दिया. माइकल चकमा ने बताया, ‘‘हमें वे लोग लगातारचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोकह कर चिढ़ा रहे थे. पहले हम ने इग्नोर किया, लेकिन वे माने नहीं. जब मैं ने उन से पूछा कि क्या दिक्कत है? क्यों यह सब बोल रहे हो? तो उन्होंने पीटना शुरू कर दिया.
‘‘एक लड़के ने कड़े से मारा. मारपीट होती देख कर तुरंत ऐंजल बीचबचाव करने पहुंचा, फिर उन्होंने  छोड़ कर ऐंजल को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया. मैं ने काफी कोशिश की उन्हें रोकने की, लेकिन हम दोनों ही घिर चुके थे. वे लगातार हम दोनों को ही मार रहे थे.’’


इस बारे में ऐंजल चकमा के मामा ने बताया, ‘‘जब शुरुआत में वे लड़के कमैंट कर रहे थे, तो माइकल ने बाइक से उतर कर उन से कहा था किहम भी इंडियन हैंहमें चाइनीज क्यों बोल रहे हो?’ लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी. ‘‘उस रात उन लड़कों ने दोनों को सिर्फ कड़ों से ही नहीं मारा, बल्कि चाकू से भी ऐंजल के पेट में वार किया गया. वे लोग ऐंजल की गरदन पर कड़े से तब तक मारते रहे, जब तक उस की पूरी गरदन फट नहीं गई. खून भी निकलता रहा, लेकिन वे उसे बस पीटते ही रहे. गरदन पर किए गए घातक वार के चलते ही ऐंजल के सिर में खून जमा हो गया था.’’


हमले के बाद ऐंजल और माइकल दोनों गंभीर हालत में ग्राफिक एरा अस्पताल पहुंचे. माइकल के सिर में हलकी चोट थी, लेकिन ऐंजल को आईसीयू में भर्ती कर दिया गया. वह अस्पताल में जिंदगी और मौत से रहा और 26 दिसंबर, 2025 की सुबह तकरीबन 4 बजे उस ने दम तोड़ दिया. इस के बाद पूरे देश में एक बहस सी गई कि ऐंजल चकमा हेट क्राइम का शिकार हुआ है, जबकि देहरादून एसएसपी अजय सिंह ने इस हत्याकांड को हेट क्राइम मानने से साफ इनकार किया. उन के मुताबिक, यह 2 गुटों के बीच अचानक हुई कहासुनी का नतीजा था.


देहरादून पुलिस की ओर से अब तक हुई जांच में सामने आया है कि ऐंजल चकमा और उस के भाई माइकल चकमा पर हमला करने वाले आरोपी भी पूर्वोत्तर में मणिपुर और पड़ोसी देश नेपाल जैसे पर्वतीय इलाके के हैं. पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 6 में से 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया. उन में 2 नाबालिग शामिल थे, जबकि एक आरोपी को फरार बताया गया. उस पर पुलिस ने 25,000 रुपए का इनाम भी घोषित किया था.


भारत में हेट क्राइम की वजह
सितंबर, 2015 और दिसंबर, 2019 के बीच भारत में दर्ज हेट क्राइम की ज्यादातर वारदात एससी तबके पर टारगेट ले कर की गई थीं, इस के बाद मुसलिमों का नंबर रहा. कथिततौर पर नफरत के चलते जाति, धर्म से ले कर औनर किलिंग और लव जिहाद तक कुल 902 अपराध दर्ज किए गए. अगर वजह की बात करें तो हमारे देश में रूढि़वाद परिवार, धर्म और तालीम में गहराई से घुसा हुआ है. इतना ज्यादा कि ऊंची जाति के बच्चे कुछ समुदायों या जातियों को अपने से नीचा मानते हुए उन्हें नफरत से देखते हैं, जानवर से बदतर  हैं.


यही वजह है कि जब लोग राजनीति में अपनी पहचान बनाते हैं तो वोटबैंक जुटाने के चक्कर में अकसर हेट क्राइम का सहारा लेते हैं. जाति और धर्म को देश से ऊपर मनाने वाले बहुत से नेता कभीकभी अपने समर्थकों को एकजुट करने के लिए नफरती भाषा का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उन के समाज के लोग उन्हें ही वोट दें. इस के अलावा भारत का कमजोर कानूनी ढांचा भी नफरती अपराधों से निबटने में बेबस सा दिखता है और ज्यादातर मामले भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं के तहत दर्ज किए जाते हैं, जिन में मारपीट, हत्या या दंगे की बात कही गई है, जबकि हेट क्राइम की मूल जड़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.


जब से भारत में सोशल मीडिया हावी हुआ है, बहुत से प्लेटफार्म अकसर हेट क्राइम को बढ़ाने वाली सामग्री को बढ़ावा देते हैं. सियासी माहौल गरमाया पर चूंकि यह मामला हेट क्राइम जैसा था तो इस पर सियासी उबाल आना लाजिमी था. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के कद्दावर नेता राहुल गांधी ने इस मामले में कहा कि हमें एक ऐसा मरा हुआ समाज नहीं बनना चाहिए जो देशवासियों को निशाना बनाए
जाने पर आंखें मूंद ले.

ऐसी घटनाएं उस नफरत का नतीजा हैं, जो नौजवानों के बीच परोसी जा रही हैं. इस मामले में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यह नफरती सोच का बुरा नतीजा है. विघटनकारी सोच रोज किसी की जान ले रही है और सरकारी अभयदान हासिल ये लोग विषबेल की तरह फलफूल रहे हैं. दूसरी तरफ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने त्रिपुरा के मारे गए छात्र ऐंजल चकमा की पिता तरुण प्रसाद चकमा से फोन पर बात की और कहा कि सरकार पूरी तरह से पीडि़त परिवार के साथ खड़ी है.


लोगों का फूटा गुस्सा किसी पहाड़ी राज्य में एक पहाड़ी लड़के कोचाइनीज’, ‘चिंकीयामोमोकह कर उस पर जानलेवा वार करना हमारे देश की एकता पर एक सवालिया निशान है. हम किसी को उस के रूपरंग, चेहरेमोहरे और बोलने के अंदाज से कैसे जज कर के उस का मजाक बना सकते हैं? यही वजह है कि इस हत्याकांड के बाद उत्तराखंड से ले कर त्रिपुरा तक विरोधप्रदर्शन हुए और लोगों ने अपनी नाराजगी जाहिर की.


यही वजह थी कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पूर्वोत्तर के लोगों की सुरक्षा और संरक्षण तय करने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि भारतीय समाज में नस्लवाद और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है.
किसी भी जाति, नस्ल या धर्म के लोगों का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए. केवल पूर्वोत्तर के लोग ही नहीं, बल्कि सभी को इस तरह की घटनाओं से दुखी होना चाहिए, क्योंकि यह किसी के साथ भी हो सकता है. पर केंद्रीय मंत्री के इतना कह देने भर से पीडि़त परिवार के जख्मों पर मरहम नहीं लग सकती और कभी कभी तो लगता है कि एक समाज के तौर पर हम वहशीपन के दौर में पहुंच गए हैं. अब यहां लोगों के कपड़े और उस कपड़े के रंग से पहचान दी जा रही है.


इतना ही नहीं, लोगों के खानपान, नाम, नैननक्श से भी यह निशानदेही की जा रही है कि कौन हमारे हक में है और कौन नहीं. देश भगवा, हरे और नीले रंग की दरारों से पटता जा रहा है और देश के बड़े से बड़े नेता के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो लगता है कि हर सियासी नेता चाहता है कि देश उन्मादी नदी में गोते लगाए. और यही उन्मादी नदी अब धर्म के नाम पर तांडव करने लगी है. कहीं गौमाता के नाम पर मौब लिंचिंग हो रही है तो कहीं सिर तन से जुदा होगा के जहरीले नारे लग रहे हैं.


वैलेंटाइन डे पर नौजवानों को सरेआम धर्म की आड़ ले कर पीटा जा रहा है. कोई घुसपैठिया है तो कोई देश का गद्दार. फिल्म सितारे शाहरुख खान की देशभक्ति भी अब सवालों के घेरे में गई है. इस सब में हम यह भूल जाते हैं कि इस तरह के हत्याकांड एक परिवार को उम्रभर के लिए तोड़ देते हैं. ऐंजल का छोटा भाई माइकल क्या अपने भाई की इस दर्दनाक मौत को भूल पाएगा? कभी नहीं. उस के दिल परचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोजैसे शब्द परमानैंट टैटू की तरह गोद दिए गए हैं.


ऐंजल के मामा मोमेन चकमा ने बताया कि ऐंजल के पिता ने भारी कर्ज ले कर अगरतला के बाहरी इलाके नंदननगर में एक नया घर खरीदा था. इस के अलावा ऐंजल ने देहरादून से एमबीए करने के लिए एजूकेशन लोन लिया था और हम सभी जानते हैं कि देहरादून में ऐसा कोर्स करना महंगा होता है. अब सबकुछ बरबाद हो गया है. ऐंजल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि जो उन के बच्चे के साथ हुआ वह किसी और के साथ हो. वे बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स में हैं और इस वक्त मणिपुर में तैनात हैं.


जिन पर ऐंजल चकमा की जान लेने का आरोप लगा है उन में 25 साल के अविनाश नेगी, 25 साल के सुमित, 18 साल के सूरज खवास और 22 साल के यज्ञराज अवस्थी का नाम सामने आया है. बाकी 2 लड़के नाबालिग हैं. देखा जाए तो जिंदगी इन की और इन के परिवार की भी बरबाद हुई है. ये सारे 25 साल या उस से कम उम्र के हैं. वैसे, इस मामले में अनूप प्रकाश ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है, जिस में हेट क्राइम से निबटने में हुई संवैधानिक नाकामी की न्यायिक जांच की मांग की गई है. जब ऊना और खैरलांजी में शर्मसार हुआ था देश


11 जुलाई, 2016 की बात है. गांधी के गुजरात के ऊना में खुद कोगौरक्षककहलाने वाले लोगों ने सामाजिकतौर पर निचले कहे जाने वाले समुदाय के 7 सदस्यों की बेरहमी से पिटाई से पिटाई की थी, जिस के बाद देशभर में बवाल मच गया था. दरअसल, गिर सोमनाथ जिले के मोटा समाधियाला गांव में वशराम सरवैया और उन के भाइयों को तथाकथितगौरक्षकोंने अधनंगा कर के पीटा था और उन पर पर गौहत्या में लिप्त होने का आरोप लगाया था.


हमलावरों के दावे के उलट बाद में हुई जांच में पता चला कि एससी परिवार एक मरी गाय की खाल उतार रहा था, जिसे वे बेदिया गांव से लाए थे. अब महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव की बात करते हैं, जहां रहने वाली महार जाति की सुरेखा भोतमांगे और उन का परिवार नफरती हिंसा की भेंट चढ़ गया था.
दरअसल, सुरेखा भोतमांगे एक पढ़ीलिखी औरत थीं और उन्होंने अपनी मेहनत से अपने परिवार को गरीबी से उबारा और एक पक्का मकान बनवाया. उन के परिवार में उन के पति भैयालाल, 2 बेटे सुधीर रोशन और बेटी प्रियंका शामिल थे. प्रियंका 12वीं की टौपर थी.


खैरलांजी के कुनबी मराठा समुदाय को सुरेखा भोतमांगे की यह तरक्की बरदाश्त नहीं हो रही थी. लिहाजा, सुरेखा और उन के परिवार को तरहतरह से दबाने की कोशिश की गई. सुरेखा डरी नहीं और स्थानीय पुलिस हवलदार सिद्धार्थ गजभिये, जो भोतमांगे परिवार के रिश्तेदार थे, ने उन्हें समर्थन दिया और एससीएसटी कानून के तहत कार्रवाई की धमकी दी, जिस से कुनबियों में गुस्सा और बढ़ गया. नतीजतन, 29 सितंबर, 2006 की शाम को तकरीबन 70 कुनबियों ने सुरेखा के घर पर हमला कर दिया. उस समय घर पर सिर्फ सुरेखा और उन के बच्चे थे, जबकि उन के पति खेतों में काम कर रहे थे.

इन हमलावरों ने सुरेखा और उन की बेटी प्रियंका को नंगा कर पूरे गांव में घुमाया. इस के बाद उन के साथ गैंगरेप किया गया. सुरेखा के दोनों बेटों सुधीर और रोशन को भी नंगा कर के उन की बेरहमी से हत्या कर दी गई. बाद में सुरेखा और प्रियंका की भी हत्या कर उन की लाशों को सूखी नदी में फेंक दिया गया. Crime Story

    

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