नेहा धूपिया के पति कर चुके हैं 75 महिलाओं को डेट

बौलिवुड एक्ट्रेस नेहा धूपिया ने अंगद बेदी से शादी की. इनकी शादी साल की सबसे चर्चित शादियों में से रही. हालांकि दोनों ने चुपके से शादी की और फिर अचानक सोशल मीडिया के जरिए इसका ऐलान कर दिया.

रिपोर्ट के मुताबिक अंगद ने बताया कि नेहा के साथ 7 फेरे लेने से पहले अंगद ने तकरीबन 75 महिलाओं को डेट किया है. अंगद ने ये भी बताया कि वो अपने से ज्यादा उम्र की लड़कियों को भी डेट कर चुके हैं. अंगद ने बताया कि वह किसी भी लड़की के साथ बहुत लंबे वक्त तक रिलेशनशिप में नहीं रहे.

neha dhupiya

उन्होंने बताया क्योंकि वह काफी अनुशासित माहौल में पले-बड़े हुए इसलिए वह किसी भी लड़की के साथ बहुत वक्त तक रिश्ते में नहीं रह सके. अंगद ने कहा कि वह बहुत ही शर्मीले थे और आज भी हैं. धीरे-धीरे वह बाहर निकले और मुंबई आ गए, यहां उन्होंने कुछ दोस्त बनाए. चीजें बदलने लगीं और उन्होंने इन चीजों को काफी हद तक एन्जौय भी किया.

अंगद ने कहा,  मैं खुद की ही खोज में निकला था. भिखारी पसंद के मुताबिक चीजें नहीं लेते. एक मामला ऐसा था जब मेरे और एक लड़की में 10 साल का फर्क था. एक अन्य थी जिसमें और मेरी उम्र में 3.5 साल का फर्क था.

कटआउट होने का दुख

चुनाव का एक और दौर खत्म हो गया. शांति से चुनाव हो गए थे. हम ने एक बार फिर अखबारों में छपे बुद्धिजीवियों के लेखों और टैलीविजन चैनलों की बहस के मुताबिक कमजोर होते लोकतंत्र को वोट का ताकत से भरपूर कैप्सूल खिला दिया था. सब के अंदाजे, ऐक्जिट पोल और चुनाव से पहले होने वाली भविष्यवाणियां गलत साबित हो गई थीं. तमाम खबरिया चैनलों के मुताबिक हमारा यानी जनता का फैसला ही हमेशा की तरह सही साबित हुआ था. आगे चल कर भले ही सब उलटापुलटा हो जाए, आज तो लोकतंत्र की जीत हो गई.

इस जीत के असली हकदार हमारी यानी जनता की जयजयकार हो रही थी. जीते हुए उम्मीदवारों ने बड़े अदब से सिर झुका कर स्वीकारा और मन ही मन कहा, ‘5 साल बाद फिर मिलेंगे, अगर बीच में कोई गड़बड़ न हुई तो.’

और हारे हुए उम्मीदवारों ने ‘सब को देख लूंगा’ वाली भावना से छाती पर पत्थर रख लिया यानी सबकुछ अच्छा था. अमनचैन का माहौल हर जगह फैला हुआ था.

एक दिन की बात है. सुबह का समय था. मंदमंद प्रदूषित हवा चल रही थी. भौंरों की गुंजार की तरह आतीजाती गाडि़यों का शोर तेज होने लगा था. ऐसे खुशनुमा माहौल के बीच एक आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘भाई, जरा सुनना.’’

अभी मेरी सामाजिक हालत इतनी मजबूत नहीं हुई थी कि कोई भी इज्जत से ‘भाई’ कह कर पुकारे, इसलिए मैं ने अनसुना करते हुए कदम आगे बढ़ा दिए.

इतने में फिर से आवाज आई, ‘‘कब तक आम आदमी की तरह नजरें नीची कर के चलोगे, कभी ऊपर भी देख लिया करो.’’

नजर उठा कर देखा तो नैशनल लैवल के नेता का फ्लैक्स पर बनाया हुआ कटआउट खड़ा था.

मैं ने हैरानी से उस की तरफ देखते हुए पूछा, ‘‘अब क्या परेशानी है? चुनाव हो गए हैं. तुम्हारा काम भी पूरा हो गया है. जो हमारे पास था वह कीमती वोट बटन दबा कर दे दिया है, फिर अभी तक हमारे सिर पर क्यों खड़े हो?’’

‘‘यही तकलीफ है हमारी भाईजी कि चुनाव हो चुके हैं. जीतने वाले प्रजातंत्र के मंदिर में घुस गए, हारने वाले घर में घुस गए, अब हम क्या करें?

‘‘इस देश के प्रजातंत्र के असली मालिक तो आप ही हो. आप के ही वोट से सरकार बनती और बिगड़ती है. आप तो यहां के राजा हैं इसलिए मैं आप से गुजारिश कर रहा हूं.’’

‘मालिक’, ‘सरकार’, ‘राजा’ जैसे संबोधनों को सुन कर मेरी रीढ़ की हड्डी सीधी हो गई, गरदन अकड़ कर तन गई, छाती एकदम से चौड़ी हो कर बाहर निकल आई.

‘‘हांहां, बेहिचक कहो कि क्या प्रौब्लम है?’’ मैं ने भी अकड़ते हुए चंद अंगरेजी शब्दों का इस्तेमाल किया.

‘‘बात ऐसी है भाईजी कि मौसम आजकल ठीक नहीं चल रहा है. अभी तो हमारे चेहरे पर रौनक है. धूप, हवा, पानी लगते ही हमारी चमक फीकी पड़ जाएगी और हम ऐसे बदरंग हो जाएंगे जैसे कि असलियत में वे होते हैं जिन के कि हम कटआउट हैं. सचाई सब के सामने आ जाएगी. कम से कम उस जनादेश की लाज तो रख लें जो आप ने उन्हें दिया है. इस तरह हमें कट कर के आउट करना अच्छा नहीं है. और कुछ नहीं तो हमें उतरवा कर किसी गोदाम में रखवा दें, क्या मालूम हमारी कब जरूरत पड़ जाए,’’ कटआउट से आवाज आई.

‘‘हां यार, बात तो तुम्हारी ठीक है. इस चुनावी लड़ाई में तुम्हारा भी बड़ा योगदान है.’’

‘‘कैसा मजाक है हम कटआउट का. जीतने और हारने वाले दोनों तरह के चुनावी योद्धा चुनाव से पहले हमारी बहुत पूछपरख करते हैं, सब से बिजी चौराहों पर टांगने के लिए दोनों कोशिश करते हैं और चुनाव के बाद पार्टी के गोदाम में पोस्टरों और बैनरों के बीच हम पड़े धूल खाते रहते हैं. हम से अच्छे तो वे हैं जिन के हम कटआउट हैं. जिंदा रहते हैं तो कटआउट और मर गए तो स्टैच्यू बन जाते हैं.’’

‘‘सब जगह एक ही रोना है भैया. आजकल काम निकलने के बाद कोई किसी को नहीं पूछता है,’’ मैं ने उसे आज की हकीकत समझाते हुए कहा.

उस ने मेरी बातों पर ध्यान न देते हुए अपना बोलना जारी रखा, ‘‘उन का क्या है भाईजी, उन्होंने तो अपने हाथ की स्टाइल बदल दी है. पहले हाथों को वाइपर की तरह हिलाते थे, आजकल 2 उंगलियां उठा कर ‘वी’ का निशान बनाया और सब को उंगलियों पर नचाने का काम शुरू.’’

‘‘कटआउट भाई, तुम में और हम में ज्यादा फर्क नहीं है. तुम कटआउट हो और हम काठ के उल्लू हैं. तुम्हारी मजबूरी है हर चुनाव में मुसकराते हुए चौकचौराहों पर लटक जाना और हमारी मजबूरी है कुएं और खाई में से एक में गिरने के लिए लाइन में लग जाना.’’

हमारा दर्द सुन कर वह भी हमदर्दी से कहने लगा, ‘‘भाईजी, मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारी हालत मुझ से भी ज्यादा बदतर होगी. मैं तो तुम को ही असली मालिक समझता था. चुनाव में मैं ने अच्छेअच्छों को तुम्हारे सामने हाथ जोड़ते हुए देखा है क्योंकि इस देश के प्रजातंत्र के असली मालिक जो ठहरे. खैर, कोई बात नहीं, अगर कहो तो मैं कुछ मदद करूं?’’

एक मामूली कटआउट से जो कुछ देर पहले तक मुझे ‘मालिक’, ‘सरकार’, ‘राजा’ और न जाने क्याक्या कह रहा था ‘तुम’ का संबोधन और झूठी हमदर्दी देख कर मुझे भी गुस्सा आ गया, एक नेता का कटआउट जो ठहरा, उस ने अपनी औकात आखिर दिखा ही दी थी.

‘‘कटआउट कहीं के, तू हमारी क्या मदद करेगा, तू तो खुद लाचार हो कर हम से मदद मांग रहा था,’’ मैं भी अब तूतड़ाक पर उतर आया.

‘‘नाराज मत होइए भाईजी, नेताजी से कह कर आप का काम तो करवा ही सकता हूं. कटआउट हुआ तो क्या हुआ, भूल से कहीं स्टैच्यू बन गया तो तुम्हारे किसी काम का नहीं रहूंगा और तुम्हीं को मुझ पर माला चढ़ानी पड़ेगी.’’

फ्लैक्स से बने रंगीन कटआउट की बातें सुन कर मेरी आम आदमी वाली सोच ने पूरा जोर मार दिया जिस में मजबूत के सामने सिर झुकाना समझदारी और मजबूर को लतियाना बहादुरी समझा जाता है.

‘‘अच्छा, माला पहनेगा… यह ले माला, तुझे मैं अभी पहना देता हूं, तू समझता क्या है हजार 2 हजार रुपए में बनने वाले कटआउट…’’

मैं ने अपना जूता उठाया और उस मामूली कटआउट को बेखौफ मारने लगा. लेकिन वह भी पक्का बेशर्म था. उस ने मुसकराना नहीं छोड़ा.

मारतेमारते मैं पसीनापसीना हो गया. वह भी गिर गया था और जगहजगह से फट गया था, फिर भी वह मुसकरा रहा था. मेरे मन में भी शांति आने लगी थी.

मुझे लगा कि प्रजातंत्र के असली मालिक होने के नाते उस बदतमीज कटआउट को सजा दे कर मैं ने अपना फर्ज निभा दिया था. लेकिन एक सवाल फिर भी मेरे सामने था कि इस प्रजातंत्र के असली मालिक क्या हम ही हैं?

क्या हम ही वे कटआउट तो नहीं हैं जो प्रजातंत्र की सलीब पर मुसकराते हुए लटके खड़े हैं?

रैस्तरां पर नियमों का बोझ

हमारे देश में सरकारी संस्थाओं के नियमों, कानूनों पर सब का बहुत विश्वास होता है. कुछ लोग किसी तरह की बेईमानी करें, सरकारी संस्थाएं तुरंत सभी पर नियमकानून लाद कर कह देंगी कि हम ने तो सुधार ला दिए. रैस्तरांओं में खराब खाना परोसे जाने की शिकायतों पर फूड सिक्योरिटी ऐंड स्टैंडर्ड्स अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसआई) ने सुरक्षा कानून के नियमों में खासा बदलाव का काम किया है कि हर रैस्तरां को बोर्ड लगाना होगा कि खाने में कौन सा तेलमसाला इस्तेमाल हो रहा है.

यह कोरी मूर्खता है. लोग कहीं भी खाना दुकान के नाम से जा कर खाते हैं, बोर्ड पढ़ कर जाने वालों की संख्या कम ही होती है. महंगे रैस्तरांओं में सामान ठीकठाक ही होता है पर सस्तों में तो घटिया होगा ही. नए नियम के सहारे इंस्पैक्टरों को एक और बंदूक मिल जाएगी जिसे मालिक की कनपटी पर रख कर कुछ और वसूली करेंगे.

भोपाल जैसे शहर में 1,500 रजिस्टर्ड रैस्तरां हैं. अब नियम कहते हैं कि हर सप्ताह बदले नियमों से जांच होगी यानी कि रिश्वत के भरपूर मौके. ग्राहकों को निबटाने की जगह मालिक का ध्यान इंस्पैक्टरों को खुश करने में लगा रहेगा जो दलबल सहित रैस्तरां आएंगे.

जिस देश में सीबीआई पर भरोसा न हो, प्रधानमंत्री पर भरोसा न हो, वित्त मंत्री पर भरोसा न हो, वहां फूड इंस्पैक्टर पर भरोसा करना तो असंभव सा है. वैसे भी, खाना ऐसी चीज है जो जरा सा ध्यान बंटे, जरा सा मौसम खराब हो, जरा सा कारीगर का हाथ कमजोर हो, कच्चा सामान जरा सा ढीला हो, तो वह खराब हो सकता है. फूड इंस्पैक्टर खाना सुधारेगा नहीं, वह तो फाइन चार्ज करने, जेल भेजने की धमकी देगा.

सरकार को अगर ग्राहकों की बहुत चिंता है तो क्यों नहीं वह अपने रैस्तरांओं की लंबी चेन खोल देती? रेलों का खाना कैसा है, हम सब देख चुके हैं. सरकारी होटल बंद हो चुके हैं. वहां तो इंस्पैक्टर फटक भी नहीं सकते और पैसा बचाने की जल्दबाजी भी नहीं होती. तो फिर, खाना खराब क्यों? हर राज्य के भवन दूसरे राज्यों में बने हैं जहां कैंटीनें चलती हैं पर कहीं भी सरकार कैंटीन नहीं चलाती. फूड डिपार्टमैंट जांच करने की जगह खुद फूड सप्लाई कर के देखे, नानीदादी याद आ जाएंगी.

फूड एक बड़े व्यवसाय की तरह उभर रहा है, क्योंकि कामकाजी औरतों को सुविधा और छुआछूत की बंदिशों के हटने से बाहर खाने में ज्यादा आनंद आता है. सो, इन्हें सरकारी नियमों में न बांधें. मोटेतौर पर स्टार रेटिंग दे दो. जनता को बाकी काम खुद करने दो. हां, अगर हो सके तो शिकायतों के लिए दफ्तर खोल दो जहां कोई भी शिकायत दर्ज करा सके और दूसरों द्वारा की गई शिकायतों को देख सके. धंधे को काबू करने के लिए यही काफी होगा.

उत्तर प्रदेश में क्या अखिलेश आजमाएंगे योगी फौर्मूला

2019 के मद्देनजर पूरे देश की नजर जिस एक गठबंधन की ओर लगी है, वह है यूपी में एसपी-बीएसपी के बीच प्रस्तावित गठबंधन क्योंकि इस गठबंधन के जरिए सिर्फ यूपी में ही नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति की तस्वीर बदल सकती है. गोरखपुर और फूलपुर के चुनाव के मौके पर एक-दूसरे के नजदीक आकर दोनों दलों ने भविष्य में गठबंधन किए जाने का संकेत दिया था लेकिन तबसे बात आगे नहीं बढ़ी. कहा जा रहा है कि जिस एक ठोस फॉर्म्युले की बुनियाद पर दोनों दलों के बीच गठबंधन होना है, वह अभी तक तलाशा नहीं जा सका है.

कई मौकों पर बीएसपी चीफ मायावती ने यह जरूर कहा कि किसी भी गठबंधन में अगर उन्हें सम्मानजनक हिस्सा नहीं मिला तो वह अकेले ही चुनाव मैदान में उतरना बेहतर समझेंगी. 2014 के चुनाव में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में बीएसपी को एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी, जबकि समाजवादी पार्टी पांच सीटें जीतने में कामयाब हो गई थी.

2017 के विधानसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने भले ही सत्ता गंवा दी हो लेकिन वह बीएसपी से आगे ही रही थी. इस लिहाज से पार्टी यूपी में खुद को बीएसपी से मजबूत मानती है और किसी भी गठबंधन में उसका दावा बीएसपी के मुकाबले ज्यादा सीटों का बनता है लेकिन बीएसपी की मांग किस हद तक जाती है, इस बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता.

क्या है योगी फौर्मूला

मायावती ने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी के साथ विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया है. जोगी की तरफ से जो बयान आया, वह यह है कि विधानसभा के चुनाव में मुख्यमंत्री पद पर दावा मेरी पार्टी का रहेगा, बीएसपी उसे समर्थन करेगी लेकिन लोकसभा के चुनाव में हमारी पार्टी बीएसपी चीफ मायावती को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में समर्थन करेगी. इसका मतलब हुआ कि इस गठबंधन ने समझौते के तहत अपना-अपना हिस्सा तय कर लिया है.

जोगी के इस फॉर्म्युले के बाद ही सियासी गलियारों में इस सवाल का जवाब तलाशा जाने लगा कि क्या यूपी में भी ऐसा ही रास्ता निकल सकता है. कई मौकों पर अखिलेश यादव साफ कर चुके हैं कि फिलहाल वह पीएम पद की रेस में नहीं हैं और उनकी दिलचस्पी अभी यूपी की राजनीति करने में है लेकिन मायावती को राष्ट्रीय स्तर पर गैर एनडीए दलों के बीच प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार माना जा रहा है. इसी वजह से कहा जा रहा है कि यूपी में भी जोगी फॉर्म्युला लागू हो सकता है. एसपी अपनी ओर से माया को पीएम के रूप में पेश कर दे और माया 2022 के लिए राज्य में अखिलेश को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लें.

अखिलेश को मंजूर होगा

समाजवादी पार्टी के कुछ सीनियर नेताओं ने कहा कि ‘अगर बीएसपी अखिलेश को 2022 में सीएम के रूप में स्वीकार करने की बात करती है तो एसपी को भी 2019 के चुनाव में मायावती को पीएम के रूप में स्वीकार करने में ऐतराज नहीं होगा. इसके तहत लोकसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा 60 (बीएसपी) : 40 (एसपी) के अनुपात में हो सकता है और विधानसभा के चुनाव में यह अनुपात पलट जाएगा. 60 प्रतिशत हिस्सा एसपी का होगा और 40 बीएसपी का.

ये नेता अखिलेश के उस बयान की तरफ भी ध्यान दिलाते हैं कि समाजवादी जब किसी से दोस्ती करते हैं तो बड़े दिल के साथ करते हैं. दोस्ती में अगर कुछ ज्यादा देना भी पड़ जाए तो भी उन्हें कोई शिकवा नहीं रहती.’ इस तरह की बातें यह संकेत देती हैं कि एसपी को इस फॉर्म्युले पर बहुत ज्यादा ऐतराज नहीं है.

बेशक यह फॉर्म्युला उनकी पसंद के नजदीक दिखता हो लेकिन छत्तीसगढ़ और यूपी की स्थितियों में फर्क को भी समझना होगा. छत्तीसगढ़ में बीएसपी का कहीं कुछ दांव पर नहीं है लेकिन उसकी सारी राजनीतिक पूंजी यूपी ही है. इस वजह से क्या मायावती यूपी अखिलेश के हवाले करने का जोखिम लेना चाहेंगी, जबकि यह भी तय न हो कि प्रधानमंत्री बन ही जाएंगी.

दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ के चुनाव के कुछ महीनों के अंदर ही लोकसभा का भी चुनाव हो जाना है पर यूपी में लोकसभा चुनाव के तीन साल बाद चुनाव होने हैं. इतने लंबे वक्त तक क्या राजनीति में गठबंधन बना रह सकता है? चूंकि राजनीति संभावनाओं का खेल है इसलिए सारे विकल्प खुले माने जा रहे हैं.

गौरंग दोषी के खिलाफ कोर्ट सख्त, लुकआउट नोटिस का आदेश

गौरंग दोषी सदैव गलत हरकतों की वजह से विवादों में रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों से वो अपनी निर्माणाधीन फिल्म ‘आंखे 2’ को लेकर विवादों में हैं. फिल्म ‘आंखे 2’ में अमिताभ बच्चन सहित कई दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया हैं. इस फिल्म के शुरू होते ही विवाद पैदा हुआ. और फिल्म की शूटिंग 25 प्रतिशत होने के बाद बंद हो गयी. इस बीच गौरंग दोषी पर कई तरह के आरोप लगें.

बहरहाल, गौरंग दोषी उस वक्त बुरी तरह से फंस गए, जब फिल्म ‘आंखे 2’ के निर्माण के लिए  धन मुहैय्या करने वाली कंपनी ‘स्कोर्ग इंटरनेशनल कंसल्टिंग प्रा.लिमिटेड’ ने अप्रैल 2017 में उनके खिलाफ मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. अदालत ने बीच बचाव करने का प्रयास किया. पर हर बार गौरंग दोषी अदालती आदेश को धता बताते रहे. अंत में अदालत ने गौरंग दोषी को आदेश दिया कि वह अदालत को अपनी संपत्ति का विवरण दें. पर गौरंग दोषी ने अदालत के इस आदेश की अवहेलना की. उसके बाद अदालत ने 20 जून 2017 को गौरंग दोषी को अदालत में एक करोड़ 25 लाख रूपए जमा करने का आदेश दिया. गौरंग दोषी ने यह भी नहीं किया. उसके बाद अदालत ने गौरंग दोषी और उनकी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के सारे बैंक एकाउंट सील करने के आदेश दिए. पर गौरंग दोषी की सेहत पर असर नहीं हुआ. गौरंग दोषी अदालत में भी हाजिर नहीं हुए. तब अदालत ने उनके खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया. पर पुलिस गौरंग दोषी को गिरफ्तार कर अदालत नहीं ला पायी.

अब जब पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि गौरंग दोषी नही मिले और शायद वह युनाइटेड किंगडम यानी कि इंगलैंड में है तो अदालत ने गौरंग दोषी के नाम ‘लुक आउट’ नोटिस जारी करने और इसकी सूचना सभी एयरपोर्ट पर देने का आदेश दिया है.

मुंबई उच्च न्यायलय के न्यायाधीश गौतम पटेल ने पुलिस को निर्देश दिया है कि वह गौरंग दोषी के नाम ‘लुकआउट’ नोटिस जारी कर सभी एयरपोर्ट को सूचना दे.

जल्द ही भोजपुरी फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ होगी रिलीज

14 नवंबर को निरहुआ दिनेशलाल यादव की फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ रिलीज होगी. पटना में आयोजित प्रेस कौन्फ्रेंस के दौरान दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ ने इस फिल्म के बारे में बताते हुए कहा कि निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ भोजपुरी दर्शकों के लिए  निरहुआ इंटरटेंमेंट की ओर से एक बेहतरीन तोहफा है.

भोजपुरिया एक्टर ने कहा,  ‘फिल्‍म की कहानी से लेकर मेकिंग तक सब कुछ बेहद खास है. ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’  इस सीरीज की अब तक बनी दोनों फिल्‍मों से भी बड़ी फिल्‍म है. इसलिए दर्शकों से मेरी अपील होगी कि अपनी माटी की इस खूबसूरत सिनेमा को जरूर देखें और दूसरों को भी यह फिल्‍म देखने के लिए प्रोत्साहित करें.’

फिल्‍म 14 नवंबर को  आपके मनोरंजन के लिए सिनेमाघरों में रिलीज होगी. अश्‍लीलता के सवाल पर निरहुआ ने साफ कहा कि, ‘निरहुआ इंटरटेंमेंट फिल्‍मों में किसी भी तरह की असहज या अश्‍लील चीजों के खिलाफ है. यह आपको इस बैनर की सभी फिल्‍मों में देखने को मिलेगा.’

आप ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’ सीरीज की ही तीनों फिल्‍मों को देख लीजिए. अभी हाल ही ‘बौर्डर’ रिलीज हुई थी. इन सभी फिल्‍मों में फिल्‍म की मूल आत्‍मा को लेकर मेकिंग की गई,  न कि दर्शकों को ठगने के लिए कुछ भी परोसा गया. आज पूरी इंडस्‍ट्री क्‍वालिटी सिनेमा बनाने में लगी है. क्‍योंकि सबको समझ में आ गया है कि फिल्म के नाम पर नंगापन नहीं चलेगा.

फिल्‍म के निर्माता प्रवेश लाल यादव ने बताया कि ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ का इंतजार दर्शकों को बेसब्री से है. जिस तरह से फिल्म के ट्रेलर और पोस्टर पर लोगों का रिस्पौन्स आया है, उससे फिल्म की पूरी कास्ट एंड क्रू उत्साहित है. यह फिल्म भोजपुरी के दर्शकों के लिए एक बेहतरीन उपहार होगा. उम्मीद है फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी 3’ अपनी पहले दो फिल्मों की अपेक्षा काफी बेहतर कारोबार करेगी.

बता दें कि इस फिल्म में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अदाकारा आम्रपाली दुबे और शुभी शर्मा के साथ किरण यादव, आशीष शेन्द्रे, संजय पांडे, समर्थ चतुर्वेदी, संजय निषाद, राजवीर सिंह, हेमलाल कौशल मुख्य भूमिका में हैं. रजनीश मिश्रा फिल्म के संगीतकार हैं. जबकि प्यारे लाल कवि, आजाद सिंह और श्याम देहाती गीतकार हैं. फिल्म के स्टाइलिश कविता सुनीता क्रिएशन हैं.

सेंसरशिप का रेटिंग की तरफ जाना प्रगति होगी : अजीत अंधारे

बौलीवुड में ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ (सेंसर बोर्ड) के प्रति हर फिल्मकार सदैव नाराजगी जाहिर करता रहता है. हर फिल्म निर्माता का आरोप होता है कि उनकी फिल्म पर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ ने बेवजह कैंची चला दी या गलत प्रमाणपत्र दिया. कुछ फिल्म निर्माता शिकायत करते रहते हैं कि उनकी फिल्म को ‘यू’ प्रमाणपत्र मिलना चाहिए था, मगर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ ने ‘ए’ प्रमाणपत्र दे दिया. ‘उड़ता पंजाब’, ‘लिपस्टिक अंडर बुर्का’ सहित कई फिल्मों के निर्माताओं को अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद ही प्रमाणपत्र मिल सका. हालात यह हैं कि इन दिनों ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ चेयरमैन पहलाज निहलानी भी अपनी फिल्म ‘रंगीला राजा’ के प्रति ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के रवैए से नाराज हैं. और वह भी 12 नवंबर को ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है. कहने का अर्थ यह कि ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ का चेयरमैन बदलते रहते हैं, फिल्म निर्माता की शिकायतें वही रहती हैं.

फिल्मकार अक्सर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ पर आरोप लगाते हुए अमरीका की तरह रेटिंग सिस्टम की वकालत करते रहते हैं. इतना ही नहीं फिल्मकारों की मांग पर सरकार ने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ को लेकर सुझाव मांगे थे. इस कमेटी ने दो साल पहले ही सुझाव दे दिए थे, पर सरकार ने उस पर अमल नहीं किया. सूत्रों की माने तो उस वक्त तत्कालीन चेयरमैन पहलाज निहलानी ने स्वयं श्याम बेनेगल कमेटी की सिफारिशों का विरोध किया था.

अब जबकि पहलाज निहलानी ने ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के वर्तमान चेयरमैन तथा फिल्म पटकथा लेखक व गीतकार प्रसून जोशी पर बड़े बड़े स्टूडियो के साथ सहानुभूति रखने का आरोप लगाया है. तो हमने VIACOM18 से बात कर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के प्रति उनकी राय को जानें. इस मकसद से हमने VIACOM18 के सीओओ अजीत अंधारे से एक्सक्लूसिव मुलाकात की. इस मुलाकात में उन्होंने ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ को लेकर अपनी बेबाक राय देने के साथ ही कुछ सुझाव भी दिए.

अजीत अंधारे से मुलाकात होने पर हमने उनसे सीधा सवाल किया कि ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ को लेकर उनकी क्या सोच है? मेरे इस सवाल पर अजीत अंधारे ने बड़ी बेबाकी से कहा, ‘मेरी नजर में सेंसर बोर्ड एक महत्वपूर्ण औथारिटी है, जिसकी हमारे देश को बहुत जरूरत भी है. हमारे देश में कई धर्म, कई तरह के समुदाय, कई तरह की धारणाओं के लोग रहते हैं. तो ऐसे में सेंसर की भूमिका बहुत अहम हो जाती है. वह एक अम्पायर की तरह हैं. यदि आपका खेल सुचारू रूप से चलना है, तो अम्पायर का होना जरूरी है. और हमारा देश जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां तो सेंसर बोर्ड की बहुत ज्यादा जरूरत है. मुझे लगता है वह अपनी जिम्मेदारी को बहुत सुचारू रूप से निभा रहे हैं. क्योंकि यहां रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ साथ दूसरे पहलुओं को बहुत बैलेंस करना पड़ता है. यह कठिन काम है. हम फिल्मकार सेंसर बोर्ड के काम को बहुत अंडरस्टीमेट करके आंकते हैं. पर मुझे लगता है कि सेंसर से हटकर हमें रेटिंग के सिस्टम की तरफ जाना चाहिए. जिस तरह से अमरीका या दूसरे देशों में रेटिंग सिस्टम है,उसे अपनाया जाए और दर्शकों पर छोड़ दिया जाए कि वह किस फिल्म को देखना चाहेंगे, तो यह एक प्रगतिशील तरीका है.’

हमने अजीत अंधारे की बात को बीच में ही काटते हुए कहा कि, ‘यहां पर मैं आपकी बात से सहमत नही हूं. हमारे देश में जिस तरह की कानून व्यवस्था है, जो हालात है, जहां सिनेमा घरों में नियमों का कड़ाई से पालन नहीं होता. बच्चे भी सिनेमा घरों में एडल्ट फिल्में देखते हुए मिल जाते हैं, वहां रेटिंग सिस्टम से ज्यादा गड़बड़ियां पैदा होंगी?’

मेरी बात को गंभीरता से सुनने के बाद अजीत अंधारे ने कहा, ‘मैं भी आपकी इस बात से सहमत हूं. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुरंत रेटिंग सिस्टम लागू कर दिया जाए. मेरा मानना है कि सेंसरशिप का रेटिंग की तरफ जाना एक प्रगति है.पर उससे पहले आपको अपने देश में कंटेंट, कानून व्यवस्था व जो प्रेशर ग्रुप हैं, उनको भी समझना पड़ेगा. मैं तो यह कहता हूं कि हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि जितनी फिल्में सेंसर हो जाती है, वह सब बिना किसी अवरोध के सही ढंग से प्रदर्षित हो सकें. सेंसर बोर्ड से सेंसर होने के बाद भी फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लग जाती है, यह गलत बात है. मुझे सेंसर बोर्ड की गाइड लाइन में समस्या नजर नहीं आती. पर जब आप रचनात्मक चीज से डील करते हैं, ऐसे में गाइड लाइन का जो इंटरप्रिटेशन है, वहां समस आती है. चुनौती तो इंटरप्रिटेशन में आती हैं. कई बार सेंसर बोर्ड के सदस्यों का गाइड लाइन को लेकर इंटरप्रिटेशन निर्माता के हक में नहीं होता है. निर्देशक को लगता है कि उसे क्रिएटिव फ्रीडम नहीं मिला. तो यह इंटरप्रिटेशन हमेशा कायम रहेगी. इसे खत्म नहीं किया जा सकता. समाजिक परिपक्वता और लोगों की मानसिक सोच कैसी है, उस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है.

सेंसर बोर्ड के खिलाफ फिर से अदालत में जाएंगे पहलाज निहलानी

सारा खेल कुर्सी का है. कल तक ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के चेयरमैन पद पर आसीन होकर पहलाज निहलानी हर फिल्म को दिए जाने वाले ‘कट’ को जायज ठहरा रहे थे. उस वक्त फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को दिए गए कट को लेकर वह काफी विवादो में थे. यहां तक कि बाद में मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश पर ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ ने ‘उड़ता पंजाब’ को प्रमाणपत्र जारी किया था. अब जबकि उनसे यह कुर्सी छिन चुकी है और अब इस कुर्सी पर प्रसून जोशी आसीन हैं. तो अब एक फिल्म निर्माता की हैसियत से पहलाज निहलानी को ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ और इसके चेयरमैन प्रसून जोशी से शिकायत है. पहलाज निहलानी की नाराजगी इतनी बढ़ गयी है कि उन्होंने ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. पर मंगलवार, छह नवंबर को मुंबई उच्च न्यायालय की वोकेशन बेंच ने पहलाज निहलानी की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से इंकार कर उन्हे एक झटका दे दिया है. पर पहलाज निहलानी हार नहीं मानना चाहते. अब वह मुंबई उच्च न्यायालय की छुट्टियां खत्म होने पर 12 नवंबर को फिर से कोर्ट में पहुंचे.

असल में पहलाज निहलानी ने गोविंदा, मिषिका चैरसिया, अनुमा अग्निहोत्री व दिगंगना सूर्यवंशी को लेकर फिल्म ‘‘रंगीला राजा’’ का निर्माण किया है, जिसे वह 16 नवंबर को सिनेमाघरों में प्रदर्षित करना चाहते हैं. पहले ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ उनकी फिल्म को देख नहीं रहा था, तो चालिस दिन बाद पहलाज निहलानी ने मीडिया में ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ तथा आमीर खान व प्रसून जोषी के रिश्ते को रेखांकित करते हुए कई आरोप लगाए थे. उसके बाद ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ की परीक्षण समिति ने ‘‘रंगीला राजा’’ देखा और फिल्म में बीस कट लगा दिए. इससे पहलाज निहलानी नाराज होकर ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के खिलाफ मुंबई उच्च न्यायालय पहुंच गए हैं.

मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से पहले पहलाज निहलानी से मीडिया से कहा-‘‘मैं ऐसी फिल्में नहीं करता हूं, जिन पर सेंसर को आपत्ति हो.’’

‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ ने फिल्म ‘‘रंगीला राजा’’ के जिन संवादों पर कैंची चलाई है उनमें से कुछ संवाद इस प्रकार हैं.

  1. मेरा ध्यान पूजा में था -इस संवाद के साथ हाथों का जो एक्शन है, उसे हटाएं.
  2. घेवर कितना रस भरा है, आहिस्ता आहिस्ता खोलना.
  3. तलवार म्यान से बाहर निकलेगी तो तुम्हे लेने के देने पड़ जाएंगे.
  4. जब जब रावण सीता का अपहरण करेगा, तब तब हनुमान राम का साथ देने आएगा… इस संवाद से राम शब्द हटाएं.
  5. रात को आप अर्जुन की तरह तीर निकाल के बाहर जाते हो.
  6. खाना स्वादिस्ट है.

पहलाज निहालनी ने मीडिया से कहा- ‘‘वर्तमान समय में सेंसर ने तमाम ऐसी फिल्में पारित की हैं, जिनमें काफी गंदे संवाद हैं. जबकि मेरे उपरोक्त साफ सुथरे संवादों को द्विअर्थी संवाद बताकर कैंची चला दी गयी. मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है. मैं हार मानने वाला नहीं हूं. न्याय की लड़ाई लड़ता रहूंगा.

इतना ही नही पहलाज निहलानी ने ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के क्षेत्रीय अधिकारी तुषार करमरकर की क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा- ‘‘तुषार करमरकर महज 35 साल के हैं. उन्हें सिनेमा का कोई अनुभव नहीं है. क्या प्रसून जोशी ने नियमों के तहत उन्हे पद देने से पहले उनका इंटरव्यू लिया था?’’ ज्ञातब्य है कि तुषार करमरकर का सिनेमा से कभी कोई संबंध नहीं रहा. ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के मुंबई आफिस में क्षेत्रीय अधिकारी के रूप में नियुक्त होने से पहले वह दो साल तक रायपुर, छत्तीसगढ़ में दूरदर्शन में समाचार विभाग में नौकरी कर चुके हैं.

पहलाज ने प्रसून जोशी को कटघरे में खड़े करते हुए आगे कहा- ‘‘प्रसून ने फिल्म परीक्षण समिति के नियमों की भी अनदेखी कर रहे हैं. नियम के तहत फिल्म परीक्षण समिति में दो पुरूष और दो महिलाएं होनी चाहिए. मगर मेरी फिल्म देखने के लिए प्रसून जोशी ने जो परीक्षण समिति गठित की, उसमे तीन महिलाएं व एक पुरूष था. मेरी फिल्म को गलत रेटिंग दी गयी. मेरी फिल्म सेक्स दृश्य, चुंबन और अहिंसा के दृश्य नही हैं. यह पूरी तरह से संगीत व हास्य प्रधान मनोरंजक फिल्म है. मेरी फिल्म को जो कट दिए गए हैं, वह भी सेंसर की गाइड लाइन्स के खिलाफ हैं. अनुराग कष्यप की फिल्म ‘मनमर्जियां’ में चुंबन दृश्यों के अलावा तमाम अश्लील दृश्य थे, पर इस फिल्म को ‘यूए’ प्रमाणपत्र दिया गया था. मुझे आज भी जानना है कि मेरी फिल्म के 20 दिनों बाद जमा की गयी फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’ को मेरी फिल्म से पहले देखकर कैसे पारित किया गया.’’

उसके बाद सोमवार को 5 नवम्बर शाम तक पहलाज निहलानी मुंबई उच्च न्यायालय की वोकेषनल बेंच के सामने ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’के खिलाफ याचिका लेकर पहुंच गए. पहलाज ने आरोप लगाया कि उनके साथ निजी दुश्मनी निकाली जा रही है. मगर मंगलवार ,छह नवंबर को मुंबई उच्च न्यायालय की वेकेशन बेंच ने पहलाज निहलानी की याचिका पर तुरंत सुनवाई करने से इंकार कर उन्हे एक झटका दे दिया है. पर पहलाज निहलानी हार नही मानना चाहते. अब वह मुंबई उच्च न्यायालय की छुट्टियां खत्म होने पर 12 नवंबर को पुनः मुंबई उच्च न्यायालय में दस्तक दिया.

पहलाज निहलानी ने एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए कहा- ‘‘मैं अगस्त 2017 तक ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ का चेयरमैन था. तब फिल्म उद्योग के कई लोग मुझसे नाराज थे. अब मेरी फिल्म के साथ वह सभी अपना फ्रस्टेशन निकाल रहे हैं.’’

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