भारत के प्रतिभाशाली युवा

कहने को हम दुनिया की सब से तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, कहने को जगद्गुरु हैं, कहने को यहीं ज्ञान का उदय हुआ था, कहने को यहीं संस्कार, संस्कृति, स्थिरता, सभ्यता है और कहने को यहीं दुनिया का नेतृत्व करने वाला. बस, आज के शासकों को 30-40 साल और राज करने दो. पर असल में, हम दुनिया के मजदूर सप्लायरों में अव्वल हैं. हमारे मजदूर खाड़ी देशों में बड़ा काम कर रहे हैं. जब भी वहां विवाद होता है, हमें वहां से अपने लोगों को लाने के लिए जहाज के जहाज भेजने पड़ते हैं.

कम पढ़ेलिखे भारतीय मजदूर ही नहीं, पढ़ेलिखे एमबीए, इंजीनियर, डाक्टर भी दुनियाभर में नौकरी की भीख मांगतेफिरते हैं. अमेरिका ने अब अपने दरवाजे थोड़े बंद करने शुरू किए हैं तो हमारे युवा आस्ट्रेलिया व कनाडा का रुख कर रहे हैं.

अमेरिका के आंकड़े कहते हैं कि वहां टैक कंपनियों में काम करने वालों में सस्ते भारतीयों की बहुत मांग है. अमेरिका की इमीग्रेशन सर्विस के अनुसार, एच-1बी वीजा लिए विदेशियों की संख्या 5 अक्तूबर, 2018 को वहां 4,19,637 थी. उस में से 3,09,986 तो भारतीय ही थे. ये वे भारतीय युवा हैं जो भारत की महानता को छोड़ कर अमेरिकी कंपनियों में काम करने को तैयार हैं ताकि भारत की गंदगी, गंदी राजनीति, अंधविश्वासभरे नियमकानूनों, सरकारी लापरवाही, अव्यवस्था से छुटकारा पा सकें. अपने मातापिता, भाईबहनों, दोस्तों, संस्कृति, समाज को छोड़ कर ये युवा दूर अमेरिका में जा बसे हैं. वे कभी वहां के नागरिक बन पाएंगे, अब पक्का नहीं है पर चूंकि नौकरी जब तक रहेगी, अच्छा पैसा मिलेगा, तब तक तो ये वहां रहेंगे ही. ये प्रतिभाशाली युवा भारत के विकास में योगदान देने के बजाय अमेरिका चले गए हैं. भारत के मौजूदा शासक का ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा इन को भाया नहीं.

अमेरिका में जहां भारतीय कुल विदेशियों के 74 फीसदी हैं, वहीं हम से ज्यादा आबादी वाले चीन के कुल

11 फीसदी नागरिक ही इस वीजा पर वहां हैं. यह तब है जब 19वीं व 20वीं सदी में हजारों की संख्या में चीनी अमेरिका गए थे और हर बड़े शहर में चाइना टाउन मौजूद हैं जहां चीनी मूल के अमेरिकी बराबरी की हैसियत से रह रहे हैं.

यह हमारी तथाकथित प्रगति की पोल खोलता है जिस में हमारे युवाओं का न योगदान है और न उस में वे अपना भविष्य देखते हैं. हमारी प्रगति आज भी कृषि की प्रगति पर निर्भर है, जिस में अधपढ़े लोग, सरकारी जुल्मों के बावजूद, ज्यादा मेहनत कर भारत को थोड़ाबहुत नाम दिला रहे हैं. हमारे शिक्षा संस्थान या तो बेरोजगार युवा पैदा कर रहे हैं या फिर विदेशों की ओर टकटकी लगाए ऐसे होशियार व समझदार पैदा कर रहे हैं जिन्हें अपने देश पर भरोसा ही नहीं है.

सुशांत की स्वीटहार्ट बनीं सारा अली खान

बौलिवुड के छोटे नवाब सैफ अली खान और अभिनेत्री अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान फिल्‍म ‘केदारनाथ’ से बौलीवुड में डेब्‍यू करने जा रही हैं. इस फिल्‍म के ट्रेलर को पहले ही काफी पसंद किया जा चुका है.

अब इस फिल्‍म का नया गाना रिलीज हुआ है, जिसमें सुशांत और सारा का रोमांस साफ नजर आ रहा है. शादी के बैकग्राउंड में बना यह गाना काफी मस्‍तीभरा है, जिसमें सारा को देख सुशांत खुश होकर नाचते  दिख रहे हैं.

फिल्‍म में सारा के किरदार का नाम मक्‍कू और सुशांत के किरदार का नाम मंसूर है. गाने की शुरुआत में मंसूर शादी के कामों में लगा नजर आता है, तभी उसकी नजर अंदर आती मक्‍कू पर पड़ती है और वह उसे देख कर बेहद खुश हो जाते हैं. ‘वहीं तो मेरी स्‍वीटहार्ट है.’इस गाने को गायक देव नेगी ने गाया है और संगीत अमित त्रिवेदी ने दिया है. गाने के बोल अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं.

पूनम का गंदा खेल

गुना के कैंट इलाके के उस घर को शहर का हर बाशिंदा जानता था कि वह पूनम दुबे उर्फ पक्का का है. पूनम उर्फ पक्का अधेड़ावस्था में दाखिल होने के बाद भी निहायत  खूबसूरत और सैक्सी महिला थी. वह सभ्य समाज की एक ऐसी महिला थी, जो किन्हीं वर्जनाओं में नहीं जीती थी, बल्कि अपनी शर्तों और मरजी से काम करते हुए खुद अपने उसूल गढ़ती थी.

एक मामूली खातेपीते अग्रवाल परिवार में जन्मी पूनम उर्फ पक्का के कदम जवानी की दहलीज पर रखते ही बहकने लगे थे. परिवार और सामाजिक संस्कारों की बेडि़यां उन्हें बांध नहीं पाईं. वह एक ऐसी बहती नदी की तरह थी, जिस का बहाव अपने साथ बहुत कुछ बहा ले जाता है. उसे अपनी खूबसूरती का अहसास अच्छी तरह था. जब भी वह शहर की गलियों और चौराहों से गुजरती, लोगों की निगाहें उस के हसीन और गठीले बदन से चिपक जाती थीं.

पूनम का रहने का अपना अलग स्टाइल था. कभी वह जींसटौप में नजर आती तो कभी सलवारसूट में और कभीकभार वह साड़ी भी पहन लेती थी. होठों पर गहरी सुर्ख लिपस्टिक  उस का ट्रेड मार्क थी. इस हालत में वह दूसरी लड़कियों की तरह शरमातीझिझकती नहीं थी. शायद यही वजह थी कि हर कोई उसे हासिल कर लेना चाहता था, लेकिन 2-4 घंटे के लिए, हमेशा के लिए उस के साथ शादी के बंधन में बंधने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था.

पूनम एक बदनाम लड़की थी. बहुत कम उम्र में बगैर कोई तपजप किए उसे बाजार में प्रचलित यह ज्ञान मुफ्त में मिल गया था कि दुनिया नश्वर है और शरीर एक साधन, साध्य नहीं. लिहाजा अपने हुस्न का इस्तेमाल करने में उस ने कंजूसी नहीं बरती. इस का मतलब यह भी नहीं था कि उसे उस ने यूं ही हर किसी पर लुटा दिया. पूनम का शरीर सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए था, जिन की जेब में उस की कीमत देने लायक पैसा होता था.

शुरू में पूनम खुलेआम यह सब नहीं करती थी. गुना मध्य प्रदेश का छोटा सा शहर है, जहां के लोग एकदूसरे के बारे में आमतौर पर सब कुछ जानते हैं. संबंध न बिगड़े, इस डर या लिहाज से कुछ लोग भले ही न बोलें, पर चौराहों पर दिलचस्प विषयों पर चर्चा करने का मौका कोई नहीं छोड़ता. पूनम के मामले में भी ऐसा ही था.

पूनम चौराहों की चर्चा का एक अहम किरदार बन चुकी थी, जिस के बारे में खुलेआम पहली बार तब कुछ कहा गया था, जब सालों पहले उस ने अपने मुंहबोले भाई अजय दुबे से शादी कर ली थी. अजय उस के भाई का दोस्त था, जिसे वह राखी बांधती थी. यही वजह थी कि अजय से शादी की बात जिस ने भी सुनी, कलयुगी रिश्तों को कोसते हुए यही कहा कि ‘क्या जमाना आ गया है, जिसे भैया मानती थी, उसी को सैंया बना लिया, लानत है.’

पूनम को इन बातों से कोई लेनादेना नहीं था. मुंहबोले अंतरजातीय भाई से प्यार हो गया तो उस ने दुनियाजमाने को धता बताते हुए उस से शादी करने का भी दुस्साहस कर डाला, जो एक लिहाज से बहुत ज्यादा गलत बात नहीं थी.

society

गोलगप्पे बेच कर घर चलाने वाले अपने पिता का घर छोड़ कर वह पति के घर आ गई. मांबाप और भाईबहन का सिर समाज के सामने झुका कर पूनम को बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ. जिसे वह प्यार मान बैठी थी, वह दरअसल एक उम्र का आकर्षण भर था. पानी के बुलबुले और बियर के झाग जैसा, जो जल्दी ही बिखर गया. लेकिन वह रही पति के घर में ही, जिस से उस के एक बेटा भी हुआ, जिस का नाम उस ने किशोर रखा.

महत्त्वाकांक्षी पूनम और उस की आदतों से अजय ने समझदार, पर विवश पुरुष की तरह समझौता सा कर लिया था. कहने को तो वह नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड में ठेकेदारी करता था, पर उस की शानोशौकत की एक बड़ी वजह पत्नी की कमाई थी. पैसों के बाबत पूनम कोई मेहनतमजदूरी वाला काम या नौकरी नहीं करती थी. फिर भी पैसा उस पर बरसता था.

शहर के रसूखदारों, नेताओं, व्यापारियों और पुलिस वालों का पूनम के घर आनाजाना आम बात थी. उस के घर में किसी को किसी बात की मनाही नहीं थी. सफेदपोश लोगों से गुलजार पूनम के घर में महफिलें जमती थीं. जाम छलकते थे और वह सब कुछ होता था, जिस की समाज और कानून के लिहाज से मनाही है.

फिर भी किसी की हिम्मत या मजाल नहीं थी कि पूनम को कुछ कहे, क्योंकि कानून के रखवालों, सत्ता के दलालों और नामी गुंडेमवालियों के पांव पूनम की चौखट पर अपनी छाप छोड़ते रहते थे. कभी जिस जिंदगी के ख्वाब अजय ने कमसिन पूनम के साथ जीने के देखे थे, वे पूनम की मरजी की बलि चढ़ गए थे, इसलिए उस ने खुद को पूनम के अनुसार ढाल लिया था. वह देखता सब कुछ था, पर बोलता कुछ नहीं था.

इधर कुछ दिनों से पूनम महसूस करने लगी थी कि उस में शायद अब पहले सा आकर्षण नहीं रहा. इस की वजह उस की ढलती उम्र है, यह भी उस की समझ में आने लगा था. पहले के मुकाबले आमदनी कम हो चली थी. चहेतों की तादाद भी घट रही थी. उसे पहली बार भविष्य की चिंता हुई. एक दिन वह बूढ़ी हो जाएगी, तब क्या होगा? अब तक मर्दों की यह फितरत उस की समझ में आ चुकी थी कि मर्द जवान रहने तक ही पैसा लुटाते हैं, उस के बाद कन्नी काटने लगते हैं.

पूनम का युवा हो चला बेटा किशोर भी मां के नक्शेकदम पर चलने लगा था, जिस की कोई खास चिंता उसे नहीं थी. किशोर नौवीं क्लास से ज्यादा नहीं पढ़ सका था और 17 साल की उम्र में ही जाम छलकाने लगा था. वह अय्याशी भी करने लगा था, जिस पर ऐतराज जताने वाला कोई नहीं था. घर में क्या होता है, यह किशोर को मालूम ही नहीं था, बल्कि वह खुद भी उस माहौल का हिस्सा बन चुका था.

जिस आजादी और अय्याशी के सपने इस उम्र में लड़के देखा करते हैं, वह किशोर को तोहफे के रूप में मिली थी. पढ़ाई का दबाव नहीं, कोई रोकटोक नहीं, उलटे हर वह सहूलियत उसे मिल रही थी, जो आमतौर पर इस उम्र में नहीं मिलनी चाहिए. पूनम की जिंदगी एक आम गृहस्थ औरत की जिंदगी नहीं थी. ठीक उसी तरह किशोर की जिंदगी आम किशोरों जैसी नहीं थी, जो इस उम्र में कुछ बन जाने के सपने देखते हैं, संघर्ष करते हैं और अनुशासन में रहते हैं.

जिंदगी से लापरवाह और आवारा किशोर को इस बात का अंदाजा हो चला था कि मां इन दिनों पैसों और भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगी है. यह उस के लिए भी चिंता की बात थी कि बगैर कुछ किएधरे पैसे आने बंद हो गए तो उस की आजादी और अय्याशी दोनों खत्म हो जाएंगे.

कहने वाले गलत नहीं कहते कि एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुदबखुद खुल जाता है. यही पूनम के साथ हुआ. अभी उस की आमदनी कम हुई थी, बंद नहीं हुई थी. इसलिए वह एक झटके में इतना कमा लेना चाहती थी कि बुढ़ापे तक आराम से खा सके. उस पर न्यौछावर होने वाले हमउम्रों की तादाद कम होने लगी तो एक दिन उस के खुराफाती दिमाग में करामाती आइडिया आया. इस आइडिया या शिकार का नाम था हेमंत मीणा.

किशोर के जो इनेगिने दोस्त बेधड़क उस के घर आया करते थे, हेमंत उन में से एक था. 2 साल पहले ही हेमंत की किशोर से दोस्ती हुई थी, जो देखते ही देखते ऐसी परवान चढ़ी कि हेमंत किशोर के घर का एक हिस्सा बन गया. यहां उसे हर तरह की छूट थी. पूनम को वह आंटी कहता था और मां की तरह उस का सम्मान करता था.

17 साल के हेमंत के पिता अंतर सिंह मीणा गुना के सिंचाई विभाग में कार्यालय अधीक्षक जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं. हेमंत उन का एकलौता बेटा होने के कारण जान से भी ज्यादा प्यारा था. उन की 2 संतानें सांप के काटने से मर चुकी थीं, इसलिए वह और उन की पत्नी, दोनों हेमंत पर जान छिड़कते थे. उस की महंगी से महंगी फरमाइश पलक झपकते पूरी करते थे.

अंतर सिंह जानते थे कि पूनम की छवि अच्छी नहीं है, इस के बावजूद पुत्रमोह के चलते वह हेमंत की किशोर से दोस्ती के बारे में कभी कुछ कह नहीं पाए. हेमंत में कोई गलत आदत या ऐब नहीं था, इसलिए उसे ले कर वह बेफिक्र थे.

वह जानते थे कि घर के अलावा अगर वह कहीं जाता है तो अपने दोस्त किशोर के यहां ही जाता है. लेकिन कोई गलत आदत उस ने नहीं पाली है.

यहीं अंतर सिंह मात खा गए. खेलीखाई पूनम को अपने भविष्य की चिंता का निराकरण हेमंत में नजर आया. उसे पता था कि अंतर सिंह के पास पैसों की कमी नहीं है और वह अपने एकलौते बेटे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. उसे लगा कि यही मौका है, जब वह एक लंबी छलांग लगा कर इस नन्हे से खरगोश का शिकार कर के जिंदगी आराम से गुजार सकती है.

कुछ ही दिनों में जाने क्या हुआ कि हेमंत किशोर की गैरमौजूदगी में भी उस के घर आने लगा. मौका देख कर एक दिन पूनम ने नौसिखिए हेमंत को जब आदम और हौवा वाले सेब का फल चखाया तो वह उस का दीवाना हो गया. इस उम्र में सैक्स की लत अगर पेशेवर और तजुर्बेकार हाथों से लगे तो अंजाम क्या होता है, यह हर कोई जानता है.

बहुत जल्द हेमंत पूनम के जिस्म के समंदर में गोते लगाने लगा. यह उस के लिए एक नया और सुखद अहसास था. आंटी बेतकल्लुफ हो कर तरहतरह से उसे एक ऐसा सुख दे रही थी, जिस के बारे में वह सुनता भर आया था.

हेमंत के अलावा किशोर के जो दोस्त नियमित उस के घर आते थे, उन में लोकेश लोधा, ऋतिक नामदेव और नदीम (बदला हुआ नाम) प्रमुख थे. ये सभी पूनम की मौजूदगी में ही महफिल जमा कर बीयर पीते, सिगरेट फूंकते. पूनम इन के लिए स्नैक्स वगैरह का इंतजाम करती थी.

इन दोस्तों की अपनी अलगअलग दुखद कहानियां थीं. लोकेश के पिता नीरज सिंह कैंसर से पीडि़त थे तो ऋतिक के पिता शिवराज पेशे से इलैक्ट्रिशियन थे, जिन का अपनी पत्नी से अलगाव हो चुका था. ऋतिक की मां इंदौर जा कर रहने लगी थी. इन का साथी नदीम जो किशोर की संगति में पड़ कर राह भटक चुका था, उस के मातापिता शिक्षक हैं, इसलिए पढ़ाईलिखाई में वह काफी होशियार था. हाईस्कूल की परीक्षा में 90 प्रतिशत अंकों के साथ उस ने स्कूल में टौप किया था.

नई उम्र के इन लड़कों की महफिल के बारे में कैंट तो कैंट, पूरे गुना के लोग जानते थे, पर मामला और घर चूंकि पूनम का था, इसलिए सभी खामोश रहते थे. महफिल के दौरान ही हेमंत की निगाहें पूनम के गदराए बदन और नाजुक अंगों को छूने लगीं तो वह मुसकरा कर उस की आग को और हवा देने लगी थी, जिस से वक्त पर बकरा हलाल करने में आसानी रहे.

हेमंत अब तक सोचनेसमझने की ताकत खो बैठा था. चूंकि नया खून था, इसलिए रोजरोज उबलता था और रोजरोज उस उबाल को पूनम कुछ इस तरह ठंडा करती थी कि हेमंत को सिवाय उस के कुछ सूझता ही नहीं था.

शिकार को जाल में पूरी तरह फंसा देख पूनम ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. वह हेमंत के आगे पैसों का रोना रोती तो हेमंत तुरंत अपनी जेब खाली कर देता. धीरेधीरे वह घर से भी पैसे चुरा कर लाने लगा. इस पर भी पूनम पैसों का रोना रोती तो वह अपनी इस अधेड़ प्रेमिका के लिए अपनी मां के जेवरात चुरा कर लाने लगा. उस ने मंगलसूत्र जैसी सुहाग की निशानी भी घर से चुरा कर पूनम के हवाले कर दी थी.

मुमकिन है, अंतर सिंह और उन की पत्नी को इस बात का अंदाजा रहा हो, पर वे चुप रहे हों कि घर से पैसे गायब हो रहे हैं, लेकिन हेमंत की इच्छाएं पूरी करने में वह हिचकिचाए कभी नहीं, न ही उस से कभी पूछताछ की.

बीती 17 मई को हेमंत ने मांबाप से मोटरसाइकिल खरीदने के लिए 40 हजार रुपए मांगे तो उन्होंने झट से उस के हाथ में पैसे थमा दिए. बेटे के चेहरे पर पसरी खुशी ही उन का मकसद रह गई थी, इसलिए उन्होंने उस की यह इच्छा भी पूरी कर दी.

हेमंत रुपए ले कर घर से निकला तो लौट कर नहीं आया. जब काफी रात हो गई तो अंतर सिंह को चिंता हुई. पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से पहले उन्होंने पूनम के घर जाना ठीक समझा, क्योंकि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि हेमंत किशोर के साथ होगा. जब किशोर ने अनभिज्ञता जाहिर की तो उन की पेशानी पर बल पड़ गए और उन का मन शंका से भर उठा. तुरंत वह थाना कैंट गए और हेमंत की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

किसी पर शक, पुलिस के इस चलताऊ और रूटीन सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि हेमंत का पूनम के यहां काफी आनाजाना था. अभी तक किसी ने फिरौती नहीं मांगी थी, इसलिए उन की चिंता बढ़ती जा रही थी. मामला चूंकि पूनम का था, इसलिए पुलिस वाले अंजान बन कर खामोश रहे.

अगले दिन 18 मई को अंतर सिंह सीधे एसपी औफिस जा पहुंचे और एसपी अविनाश सिंह को सारी बात बताई. हेमंत का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. अविनाश सिंह ने थाना कैंट के थानाप्रभारी आशीष सप्रे को निर्देश दिया तो अंतर सिंह द्वारा जताए शक के आधार पर उन्होंने किशोर को थाने बुलवा लिया.

किशोर से पूछताछ की गई तो बड़ी मासूमियत से उस ने यह तो स्वीकार कर लिया कि हेमंत उस के घर काफी आताजाता था, पर वह कहां गया, यह उसे नहीं मालूम. इस पर पुलिस वालों ने यह धारणा कायम कर ली कि कहीं हेमंत खुद ही तो नहीं गायब हो गया? इस थ्यौरी में कोई खास दम नहीं था, लेकिन काफी खोजबीन के बाद भी हेमंत का कोई सुराग न मिलना दुश्चिंताएं बढ़ा रहा था. अगर उस का अपहरण हुआ था तो फिरौती मांगी जानी चाहिए थी, जो अब तक नहीं मांगी गई थी.

48 घंटे तक अंतर सिंह और उन की पत्नी की जान हेमंत को ले कर हलक में अटकी रही. 19 मई को अंतर सिंह के मोबाइल पर हेमंत का नंबर डिसप्ले हुआ तो एकबारगी वह खुशी से झूम उठे कि बेटे का फोन है. उन्होंने तुरंत फोन रिसीव किया, पर दूसरी ओर से अंजान सी आवाज आई कि हेमंत उस के कब्जे में है और अगर वह उसे सहीसलामत वापस चाहते हैं तो 50 लाख रुपए का इंतजाम कर लें.

फोन करने वाले ने इतना कह कर तुरंत फोन काट दिया तो अंतर सिंह ने एसएमएस के जरिए रुपए देने के लिए हामी भर दी. इस के बाद उन्होंने न जाने कितनी बार हेमंत के फोन पर फोन किए, पर वह पहले की तरह स्विच औफ बताता रहा. अब तक गुना में हेमंत की गुमशुदगी को ले कर खासा हल्ला मच चुका था और हर कोई पूनम और किशोर को संदेह की नजरों से देख रहा था.

लेकिन फिरौती वाले इस फोन ने सब के दिमाग के फ्यूज उड़ा दिए, क्योंकि वे दोनों अपने घर पर थे. अंतर सिंह ने तुरंत इस फोन के बारे में पुलिस को बताया. अंधेरे में हाथपांव मार रही पुलिस को एक दिशा मिल गई. पुलिस ने जब हेमंत का नंबर ट्रैकिंग पर रखा तो उस की लोकेशन इंदौर की मिली. इस से अंदाजा लग गया कि हेमंत का अपहरण कर के उसे इंदौर में रखा गया है. पुलिस की एक टीम तुरंत इंदौर रवाना हो गई.

इस दौरान थानाप्रभारी आशीष सप्रे इस खोजबीन में लगे रहे कि शायद किसी की अंतर सिंह से कोई दुश्मनी रही हो और उस ने बदला लेने के लिए हेमंत का अपहरण कर लिया हो. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. इस के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान इंदौर पर फोकस कर लिया. अब तक पुलिस की यह थ्यौरी भी दम तोड़ चुकी थी कि हेमंत खुद कहीं गायब हो गया होगा.

उम्मीद थी कि अपहर्त्ता दोबारा फोन करेंगे कि पैसे कब, कहां और कैसे देने है? परंतु हफ्ते भर तक कोई फोन नहीं आया तो फिर से मामला उलझ गया. इंदौर गई पुलिस टीम के हाथ भी कुछ नहीं लगा. वह खाली हाथ लौट आई. चूंकि फोन हेमंत का ही इस्तेमाल किया गया था, इसलिए गुत्थी और उलझ गई थी कि अपहर्त्ता कौन हो सकते हैं?

जब हफ्ते भर कोई फोन नहीं आया तो अंतर सिंह के साथसाथ पुलिस वालों की चिंताएं और परेशानियां बढ़ गईं. अंतर सिंह के दिमाग में तरहतरह के खयाल आ रहे थे, जिन में एक यह भी था कि कहीं उन के पुलिस में जाने की बात अपहर्त्ताओं को पता न चल गई हो, जिस से डर कर उन्होंने फोन न किया हो?

कहीं ऐसा न हो कि हेमंत को… इस से आगे और ज्यादा सोच कर वह कांप उठते थे. 50 लाख की रकम उन के लिए बड़ी जरूर थी, लेकिन रकम दे कर भी क्या गारंटी थी कि बदमाश हेमंत को छोड़ ही देंगे? अब पतिपत्नी और रिश्तेदारों सहित परिचित भी हेमंत के सहीसलामत वापस आने की दुआ मांगने लगे थे. सभी उसे अपनेअपने स्तर से ढूंढ रहे थे और अपहर्त्ताओं के अगले कदम या फोन का इंतजार कर रहे थे, जोकि फिर कभी नहीं आया.

इस मामले में अब करने को कुछ नहीं रह गया था, सिवाय इंतजार के. 26 मई को थाना कैंट पुलिस को पटेलनगर इलाके की रेलवे क्रौसिंग के पास एक किशोर की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी. लाश अधजली थी. जलने के निशान ताजा थे, इसलिए अंदाजा लगाया गया कि बीती रात ही उस की हत्या कर के लाश को जलाने की कोशिश की गई थी.

थाने आ कर पुलिस अपनी खानापूर्ति कर रही थी कि तभी बदहवास सा एक आदमी अपने बेटे के लापता होने की रिपोर्ट लिखाने आया. पुलिस को शक हुआ कि कहीं मृतक ही तो उस का बेटा नहीं है, लिहाजा वह उस आदमी को ले कर घटनास्थल पर पहुंची. लाश देखते ही वह आदमी सकते में आ गया. रोते हुए उस ने बताया कि यह लाश उस के बेटे ऋतिक की है.

पूछताछ में चौंकाने वाली यह बात सामने आई कि ऋतिक पिछली रात अपने जिगरी दोस्त किशोर दुबे के साथ गया था. किशोर दुबे यानी गुना की रसूखदार महिला पूनम का बेटा. इस से पुलिस वालों के कान खड़े हो गए, क्योंकि हेमंत की गुमशुदगी के बारे में उस के पिता अंतर सिंह ने पूनम और उस के बेटे पर शक जताया था.

पुलिस वालों ने बिना समय गंवाए पूनम के घर छापा मारा तो किशोर घर पर ही मिल गया. उस से ऋतिक के बारे में पूछताछ की गई तो शुरू में तो वह गुमराह करने वाली कहानियां सुनाता रहा. टीआई आशीष सप्रे सख्ती से भी पेश आए, पर वह अपनी ‘मैं कुछ नहीं जानता’ वाली रट से टस से मस नहीं हुआ.

अब तक काफी कुछ उगते सूरज की तरह नजर आने लगा था, जो किसी बड़े हादसे की तरफ इशारा कर रहा था. हादसा क्या था, इस बाबत जरूरी था कि किशोर अपना मुंह खोले, जो उस ने मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ने पर खोला. और जब उस ने मुंह खोला तो पुलिस वालों की बोलती बंद हो गई.

किशोर ने जो बताया, वह दिल दहला देने वाला था. उस ने न केवल ऋतिक की, बल्कि हेमंत और लोकेश लोधा की भी हत्या की थी. उस ने माना कि चूंकि हेमंत के उस की मां से नाजायज संबंध थे, इसलिए वह उस से नाराज था. बेटा कैसा भी हो, जाने क्यों अपनी मां के प्रेमी को बरदाश्त नहीं कर पता. फिर यहां तो मां का महबूब उस का पक्का दोस्त था. किशोर ने अपना अपराध स्वीकार कर के पुलिस को जो बताया, वह इस प्रकार था—

उस ने अपने दोस्तों ऋतिक, लोकेश और नदीम के साथ मिल कर हेमंत के अपहरण की योजना बनाई. चारों को पता था कि हेमंत के पिता के पास काफी पैसा है, इसलिए वह उसे छुड़ाने के लिए मुंहमांगी रकम दे देंगे, जिसे वे चारों आपस में बांट कर ऐश की जिंदगी जिएंगे.

हेमंत का अपहरण कर के लोकेश को उस का फोन दे कर इंदौर भेजा गया, जहां से उस ने फिरौती के लिए फोन किया. लोकेश अपना काम कर के गुना वापस आ गया, इसलिए पुलिस इंदौर में हाथपांव मार कर वापस आ गई.

हेमंत को अपने दोस्तों की हरकतों पर शक हुआ तो वह घर जाने की जिद करने लगा. जबकि वह रोकने पर अकसर किशोर के घर रुक जाया करता था. लेकिन अपने सिर पर मंडराते खतरे को भांप कर वह रोकने पर भी नहीं रुक रहा था. इस के बाद किशोर और उस के दोस्तों की मजबूरी यह हो गई कि हेमंत की जिद का कोई इलाज किया जाए.

हेमंत को उलझाए रखने के लिए किशोर और नदीम उसे बीयर पिलाने खेजरा रोड ले गए. नशा चढ़ने के बाद किशोर ने हेमंत से उस के और मां के संबंधों के बारे में पूछा तो वह भड़क उठा. इस पर नाराज हो कर किशोर ने पूरी ताकत से उस के सिर पर बीयर की बोतल दे मारी. वार इतना तेज था कि उसी एक वार में हेमंत का सिर फट गया और उस की मौत हो गई.

अब समस्या लाश को ठिकाने लगाने की थी. किशोर और नदीम शहर के पैट्रोल पंप से पैट्रोल खरीद कर लाए और हेमंत की लाश जला दी. दूसरी ओर लोकेश और ऋतिक इंदौर से लौटे तो हेमंत की हत्या की बात सुन कर वे घबरा गए, क्योंकि हत्या उन की योजना में शामिल नहीं थी. किशोर और नदीम के सामने दोनों ने हेमंत की हत्या पर ऐतराज जताया और सब कुछ पुलिस को बताने की बात कही.

यह किशोर के लिए नया सिरदर्द था, इसलिए उस ने सारी बात पूनम को बताई. शायद उसे सब कुछ पहले से ही पता था. एक तरह से यह अपरहण उस की सलाह पर ही किया गया था. उस ने लोकेश और ऋतिक की जिद से छुटकारा पाने के लिए एक और खतरनाक साजिश रच डाली. इसी योजना के तहत उस ने उन दोनों को हेमंत की तरह लोकेश को भी ठिकाने लगाने को कहा.

26 मई को किशोर और नदीम लोकेश को ऊमरी रोड जंगल में ले गए और वहां उस की हत्या कर लाश को जला दिया. अब बारी ऋतिक की थी. उसे भी दोनों अगले दिन 27 मई को गुलाबगंज की रेलवे क्रौसिंग पर ले गए और गला घोंट कर कत्ल कर दिया.

पिछली 2 हत्याओं की तरह उन्होंने ऋतिक की लाश पर भी पैट्रोल छिड़क कर उसे भी जला दिया. लोकेश की लाश की तरह ऋतिक की भी लाश पूरी तरह नहीं जल पाई थी. किशोर शाम को ऋतिक को उस के घर से बुला कर लाया था. जब वह घर नहीं लौटा तो उस के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. अगर तुरंत उस की शिनाख्त न हुई होती तो गुना का यह ट्रिपल मर्डर केस शायद इतनी जल्दी नहीं सुलझ पाता.

किशोर और नदीम के साथ पूनम को भी गिरफ्तार कर लिया गया था, जिस ने शुरू में तो रसूखदारों से अपने संबंधों की धौंस दे कर बचने की कोशिश की. यही नहीं, अपने हुस्न का जाल भी टीआई आशीष सप्रे पर फेंका.

गुना में एक के बाद एक कर के 3 किशोरों की लाशें मिलने से शहर में सनसनी मच गई थी. पूनम का असली चेहरा भी उजागर हो चुका था, लेकिन वे चेहरे जरूर पुलिस वालों की ढील या मेहरबानी से, कुछ भी कह लें, ढके रहेंगे, जिन्हें फोन कर के पूनम ने खुद को बचाने की गुहार लगाई थी.

अब तीनों जेल में हैं. पुलिस ने पुख्ता सबूत जुटा कर मामला अदालत को सौंप दिया है. जो गहने हेमंत ने घर से चुरा कर पूनम को दिए थे, वे उस ने एक सुनार के यहां 25 हजार रुपए में गिरवी रख दिए थे. पुलिस ने गहने बरामद कर लिए हैं. इस के अलावा बीयर और पैट्रोल की बोतलें भी बरामद कर ली गई हैं.

पुलिस ने जब पूनम को रिमांड पर लिया तो उस का कोई चाहने वाला तो दूर, घर वाले भी मिलने नहीं आए. पुलिस ने अजय दुबे पर दबाव डाला तो वह कतई घबराया हुआ नहीं था. उलटे उस ने बड़ी बीतरागी भाव से बताया कि उस ने हमेशा पत्नी और बेटे को गलत राह पर चलने से रोकने की कोशिश की, पर मांबेटे ने उस की एक नहीं सुनी. पूनम के लालच और वासना ने 3 घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझा दिए और खुद के बेटे की भी जिंदगी बरबाद कर दी.

पीहू : देखने योग्य बेहतरीन रोमांचक फिल्म

दो साल की बच्ची पूरे दिन घर के अंदर अकेले हो, तो क्या क्या हो सकता है, इसकी कल्पना से ही दिल कांप उठता है. जब आप फिल्म ‘‘पीहू’’ में परदे पर दो साल की नन्ही सी बच्ची की हरकतों को देखते हैं, तो आप टकटकी लगाए दिल थामकर देखते रह जाते हैं. कई बार सांसे थम सी जाती हैं. कई बार हंसाती है, तो कई बार रूलाती भी है. जी हां! ‘‘मिस टनकपुर हाजिर हो’’ के बाद अब फिल्मकार विनोद कापड़ी एक दो साल के बच्ची के इर्द गिर्द घूमती बिना गीत संगीत वाली फिल्म ‘‘पीहू’’ लेकर आए हैं.

फिल्म की कहानी दो वर्ष की उम्र की लड़की पीहू (मायरा विश्वकर्मा) की है जो कि अपने घर में कैद होकर रह गयी है, घर से बाहर निकलने का उसके पास कोई रास्ता नहीं है. पीहू को लगता है कि उसकी मां उसके बगल में ही सो रही है. वह अपनी मां को जगाने की कोशिश करती है. कुछ देर बाद उसकी मां पूजा (प्रेरणा शर्मा) के हाथ से जहर की गोलियों की खुली शीशी के गिरने के साथ कुछ गोलियां बिखर जाती हैं, तब दर्शकों अहसास होता है कि पीहू की मां पूजा ने जहर की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली है.

पीहू के पिता गौरव सुबह ही कलकत्ता गए हैं और वह प्रेस का बटन बंद करना भूल गए हैं. वह बार बार बाहर से फोन करते रहते हैं. हर बार उनकी पत्नी पूजा की बजाय बेटी पीहू ही फोन उठाती है. गौरव  फोन पर अपनी पत्नी पूजा को सुनाते हुए जो कुछ कहते हैं, उससे यह पता चलता है कि रात में पीहू के जन्मदिन की पार्टी संपन्न हुई, जिसमें गौरव देर से पहुंचे. पूरी रात गौरव व पूजा में झगड़ा होता रहा. झगडे़ के केंद्र में पूजा की सहेली मीरा थी. पूजा को लगता है कि मीरा व गौरव के बीच अवैध संबंध हैं.

सच से अनजान पीहू मां को सोते हुए समझकर जगाती रहती है. सुबह से रात तक वह संडास करने से लेकर दूध पीने, भूख लगने पर मायक्रोवेव ओवन के अंदर पराठा को गरम करने, गैस स्टोव जलाकर पराठे को सेंकने, खेलने सहित हर काम करती है और तमाम घटनाक्रम ऐसे घटित होते रहते हैं, जिनसे दर्शकों की सांसे थम सी जाती हैं,यह सोचकर कि पीहू को कुछ हो न जाए.

Pihu Movie Review strar cast rating

मसलन – प्रेस चालू है, धीरे धीरे धुंआ उठने लगा है, मायक्रोवेव ओवन में पराठा जलकर राख हो गया. गैस चूल्हे को जलाया, पर उसे बंद करने की बजाय जलते गैस पर रखी रोटी उठाने जा रही है, खुद को फ्रिज के अंदर बंद कर लेती है, बालकनी से गुड़िया के नीचे गिर जाने पर वह बालकनी से नीचे झांकती है और लगता है कि अब गिरी तब गिरी. तो वहीं बाथरूम में लगा गीजर अचानक फट जाता है. इलेक्ट्रिसिटी आ जा रही है. टीवी चल रहा है..वगैरह वगैरह..

लेखक व निर्देशक विनोद कापड़ी ने एक बेहतरीन विषय उठाया, मगर वह इसे सही ढंग से परदे पर पेश नहीं कर पाए. यदि वह थोड़ा सा कहानी पर ध्यान देते,सामाजिक स्थितियों व रिश्तों पर ध्यान देते तो यह फिल्म और अधिक बेहतर बन सकती थी. पति पत्नी के बनते बिगड़ते रिश्ते व पति पत्नी के बीच अहंकार की लड़ाई का छोटे बच्चों पर क्या असर होता है, इसे पूरी तरह से उकेरने में यह फिल्म विफल रहती है. फिल्मकार का सारा ध्यान सिर्फ दो साल की बच्ची की हरकतों व मकान के अंदर मौजूद फ्रिज, फिनायल, इलेकिट्रक, वायर, प्रेस, गैस चूल्हा, बहुमंजली इमारत आदि उपकरणों के साथ घटनाक्रमों को बुनते हुए रोमांचक स्थित पैदा करने तक सीमित रही, जिससे दर्शक टकटकी लगाकर देखता रहे. फिल्म में कुछ सीन अविश्वसनीय लगते हैं. फिर भी फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ती है.

 

पूरी फिल्म सिर्फ दो साल की बाल कलाकार मायरा विश्वर्मा के ही कंधों पर है. मां के किरदार  में  प्रेरणा शर्मा तो सिर्फ बिस्तर पर बेहोश सी लेटी ही नजर आती हैं. बाकी कोई किरदार परदे पर नजर नहीं आता. मगर मायरा अपनी मासूमियत से सब का न सिर्फ दिल जीत लेती है, बल्कि लोगों को डेढ़ घंटे तक बांधकर रखती है. उसका असाधारण अभिनय काबिले तारीफ है.

कैमरामैन योगेश जैनी की सराहना करनी ही पड़ेगी. एक घंटे 32 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पीहू’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला, सिद्धार्थ राय कपूर और शिल्पा जिंदल ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक विनोद कापड़ी, कैमरामैन योगेश जैनी, संगीतकार विशाल खुराना, कलाकार हैं – मायरा  विश्वकर्मा और प्रेरणा शर्मा.

बेटा ही निकला परिवार का कातिल

‘वे 2 लोग थे… उन्होंने मेरे मम्मीपापा और बहन पर हमला किया… उन्हें मार डाला… मुझ पर भी वार किया… मगर मैं मरने की ऐक्टिंग कर के बच गया… फिर वे दोनों बालकनी से कूद कर भाग गए…’ 19 साला सूरज ने रोते हुए अपने पड़ोसियों को यह दहशतअंगेज कहानी सुनाई.

घर के भीतर खून में सनी हुई 3 लाशें पड़ी थीं. उन में एक थे परिवार के मुखिया 44 साला मिथिलेश वर्मा, दूसरी 38 साला उन की पत्नी सिया वर्मा और तीसरी उन की नाबालिग बेटी नेहा.

तीनों के शरीर चाकू से बुरी तरह गोद दिए गए थे. मिथिलेश और सिया के सीने और पेट पर चाकू के कई घाव थे, वहीं बच्ची के पेट पर चाकू से वार करने के साथसाथ गला भी रेता गया था.

दिल दहला देने वाली यह वारदात 10 अक्तूबर, 2018 को दिल्ली के वसंत कुंज इलाके के किशनगढ़ गांव में बनी एक इमारत के फ्लैट में हुई थी.

पुलिस और फोरैंसिक टीम मौके पर पहुंच चुकी थी. जांच शुरू हुई. सूरज का कहना था कि हत्यारे 2 थे, जो उस के मातापिता और बहन की हत्या कर के बालकनी से कूद कर भाग गए थे. मगर उस की यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी क्योंकि जिस कमरे में वारदात हुई थी वहां चारों तरफ खून फैला हुआ था, जबकि बालकनी में खून की एक बूंद भी नहीं थी.

दूसरी बात यह कि जब लूटपाट के इरादे से हत्या हुई तो घर का कीमती सामान हत्यारे अपने साथ क्यों नहीं ले गए? घर का सामान सिर्फ इधरउधर बिखरा था, चोरी नहीं हुआ था.

जांच अफसर की नजरें बारबार सूरज उर्फ सर्वनाम वर्मा के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं, जहां परिवार को खोने का वैसा दुख नहीं दिख रहा था, जो आमतौर पर पीडि़तों के चेहरे पर पुलिस को नजर आता है.

सूरज घबराया हुआ जरूर था, मगर लोगों से नजरें चुरा रहा था और उस का यही हावभाव शक पैदा कर रहा था.

पुलिस को यकीन था कि हत्या किसी बाहरी ने नहीं बल्कि घर के ही किसी सदस्य ने की है.

पुलिस की सख्ती के आगे सूरज का हठ ज्यादा देर तक टिक नहीं सका और उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. हत्या में इस्तेमाल हथियार भी उस ने बरामद करा दिया और हत्या की वजह भी बता दी.

एकलौते बेटे ने बड़ी दरिंदगी से अपने माता, पिता और बहन को चाकू और कैंची से गोदगोद कर मौत की नींद सुला दिया था, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें उस के भविष्य की चिंता थी, क्योंकि वे उसे गलत कामों से रोकते थे.

हर मांबाप का यह सपना होता है कि उन की औलाद पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पाए. बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए ही वे सुबह से शाम तक जीतोड़ मेहनत करते हैं. मिथिलेश और सिया भी अपने दोनों बच्चों की अच्छी तालीम के लिए मेहनत कर रहे थे.

सूरज गुड़गांव के एक कालेज में सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा के फर्स्ट ईयर का छात्र था. मिथिलेश वर्मा को यकीन था कि उन का बेटा एक दिन इंजीनियर बन कर उन का नाम रोशन करेगा, मगर यकीन की यह दीवार अब ढह चुकी थी. सूरज एक हत्यारा बन चुका था.

हैरानी की बात यह थी कि अपने परिवार को मौत की नींद सुलाने के बाद सूरज को अपने कांड पर जरा भी मलाल नहीं था.

गिरफ्तारी के बाद जब उसे हवालात में बंद किया गया तो वह बड़े आराम से बैठा रहा. जो खाने को दिया गया, आराम से खा लिया.

पुलिस को दिए बयान में सूरज ने कहा कि पहले वह सिर्फ अपने पिता को मारना चाहता था, क्योंकि वे उस की आजादी में दीवार बन रहे थे. वे उस को पढ़ाई करने के लिए डांटतेमारते थे. मां को इसलिए मारा क्योंकि वे पिता को सपोर्ट करती थीं और बहन इसलिए मारी गई क्योंकि हमले की रात वह मां को बचाने आई थी.

सूरज का दिल पढ़ाई से ज्यादा खेल में लगता था. 12वीं में फेल होने के बाद उस के पिता ने उस का एडमिशन सिविल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा कोर्स में करवा दिया ताकि आगे चल कर वह उन के कारोबार में मदद कर सके, मगर सूरज का दिल तो दिनभर दोस्तों के साथ घूमने, पतंग उड़ाने, वीडियो गेम खेलने में लगा  रहता था. इस में किसी तरह की रोकटोक उसे पसंद नहीं थी.

आजाद जिंदगी जीने की इच्छा में उस ने अपने दोस्तों के संग मिल कर महरौली में एक कमरा भी किराए पर ले रखा था. ग्रुप स्टडी के नाम पर यह कमरा उस की ऐयाशी का अड्डा बना हुआ था, जहां वह कालेज से छुट्टी मार कर सुबह ही पहुंच जाता था और शाम 5 बजे तक वहीं रहता था. शराब पीने की लत भी उसे लग चुकी थी.

पिता मिथिलेश वर्मा को ये बातें पता चल गई थीं. बेटे को गलत राह पर जाने से रोकने के लिए ही वे डांटफटकार करते थे. 15 अगस्त को सारा दिन गली में पतंग उड़ाने पर उन्होंने उस की पिटाई भी कर दी थी.

यह बात सूरज को नागवार लगी कि पिता ने सब के सामने उस की पिटाई की. वह उसी दिन से पिता को रास्ते से हटाने की साजिश रचने लगा था.

सूरज बड़े ही ध्यान से टैलीविजन सीरियल ‘क्राइम पैट्रोल’ और ‘सावधान इंडिया’ देखा करता था. हत्या के मनसूबे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए उस ने महरौली से चाकू और कैंची भी खरीद ली थी. अब उसे मौके की तलाश थी और मौका मिला 10 अक्तूबर, 2018 की रात 3 बजे, जब पूरा परिवार गहरी नींद में सो रहा था.

रात 3 बजे सूरज अपने बिस्तर से उठा और पिता के पास पहुंच कर उस ने चाकू के कई वार उन के सीने और पेट पर किए. ताबड़तोड़ वार ने मिथिलेश वर्मा को बचाव का कोई मौका नहीं दिया और उन की मौत हो गई.

मां की आंख खुली तो बेटे का रौद्र रूप देख कर वे दहशत में चीखीं. मगर सूरज ने उन्हें भी बचने का मौका नहीं दिया और चाकू के कई वार उन के पेट पर कर डाले.

मां की आवाज सुन कर बहन नेहा कमरे में आई तो सूरज ने उस के गले पर भी वार कर दिया. नेहा एक ओर गिर कर तड़पने लगी. अधमरी मां बेटी को बचाने के लिए लपकीं, मगर तभी सूरज ने पलट कर मां के पेट पर चाकू के ताबड़तोड़ वार किए. वे एक ओर लुढ़क गईं. उधर गला कटने से बहन नेहा जमीन पर पड़ी मछली की तरह छटपटा रही थी.

सूरज ने कहा कि वह अपनी बहन को नहीं मारना चाहता था, मगर उस का तड़पना उस से नहीं देखा गया, इसलिए उस ने उस के पेट पर कई बार चाकू से वार किए ताकि उस का तड़पना बंद हो जाए.

पुलिस के मुताबिक, सूरज ने तीनों पर कोई 30 बार चाकू से वार किए थे. इस के अलावा लाशों पर कैंची के वार भी पाए गए हैं.

अपने ही परिवार की बेरहमी से हत्या करने वाले सूरज ने खुद को बचाने के लिए हत्याकांड को लूट का रूप दिया. उस ने अलमारी खोल कर सारी चीजें यहांवहां बिखेर दीं और थोड़ी तोड़फोड़ भी की. इस के लिए उस ने टैलीविजन पर आने वाले सीरियल ‘क्राइम पैट्रोल’ का सहारा लिया.

पुलिस ने जब सूरज के मोबाइल फोन की जांच की तो फोन में ‘क्राइम पैट्रोल’ के कई एपिसोड सेव मिले. ये एपिसोड मुख्य रूप से इसी तरह की हत्या और उस के बाद हत्या को लूट का रंग दिए जाने को ले कर बने थे. इस के बाद जब पूछताछ की गई तो उस ने इस बात को मान लिया.

हत्या के बाद सूरज तकरीबन 2 घंटे तक मांबाप और बहन की लाशों के पास ही बैठा रहा. इस दौरान उस ने अपने मोबाइल पर बच निकलने के रास्ते भी तलाश किए.

तकरीबन सुबह साढ़े 5 बजे सूरज बदहवास सा फ्लैट के बाहर आया और पड़ोसियों को मनगढ़ंत कहानी सुनाई, मगर उस की कहानी पुलिस के सामने नहीं चली और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

पटियाला हाउस अदालत की महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह के सामने दिल्ली पुलिस ने अर्जी दायर कर कहा कि सूरज ने अपने मातापिता व?छोटी बहन की हत्या का अपराध कबूल कर लिया है और हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद करा दिया है. उस ने मातापिता की टोकाटाकी व पिटाई व अपनी बहन के किसी लड़के से बात करने से नाराज हो कर इस वारदात को अंजाम दिया है, लिहाजा उसे जेल भेजा जाए.

साउथवैस्ट जिले के डीसीपी देवेंद्र आर्य कहते हैं कि सूरज और उस के 8-10 दोस्तों, जिन में कुछ लड़कियां भी शामिल हैं, ने मिल कर महरौली में जो फ्लैट किराए पर लिया था, वहां वे सभी आजाद जिंदगी जीते थे. वहां सूरज अपने दोस्तों के साथ ड्रग्स लेता था.

दोहरी शख्सीयत का सूरज अपने पड़ोसियों से जहां बहुत नरमी से बात करता था, वहीं दोस्तों के बीच उस की इमेत बिंदास लड़के की थी.

महरौली के इस कमरे से पुलिस को बीयर की खाली बोतलें और हुक्का बरामद हुआ है, जिस से अंदाजा लगता है कि वह किस तरह की आजाद जिंदगी जी रहा था.

देवेंद्र आर्य कहते हैं कि सूरज के पिता रोजरोज उस के देर से घर आने पर उसे डांटा करते थे, जिस से वह चिढ़ने लगा था. आजाद जिंदगी जीने की बात पर पिता से उस का कई बार ?ागड़ा भी हुआ था. मां से भी वह लड़ पड़ता था.

सूरज के मोबाइल फोन की जांच बताती है कि उस ने अपने मोबाइल पर यूट्यूब और गूगल पर जा कर ऐसे तरीके खोजे, जिस से किसी को आसानी से मौत की नींद सुलाया जा सके.

अपराध पर आधारित टीवी सीरियल देख कर उस को पता चला कि वारदात के बाद पुलिस मोबाइल फोन से अपराधी का सुराग लगाती है, इसलिए सूरज ने अपने मोबाइल की तमाम सैटिंग बदलने की भी कोशिश की, लेकिन पुलिस ने साइबर ऐक्सपर्ट की मदद से मोबाइल का बैकअप रिकवर कर लिया.

पता चला कि सूरज ने करीबी दोस्तों का ह्वाट्सऐप ग्रुप बनाया हुआ था, जहां वह पर्सनल बातें शेयर करता था और सलाह भी लेता था. बेटे के इस फ्रैंड सर्किल का मांबाप विरोध करते थे.

दोस्तों के बीच हुई चैटिंग से पता चलता है कि सूरज अपने मातापिता को छोड़ने के लिए तैयार था, लेकिन दोस्तों को नहीं.

हैरत की बात है कि सूरज ने बिना किसी की मदद लिए पूरे कांड को बड़े ठंडे दिमाग से अकेले ही अंजाम दिया. वारदात की रात उस ने सब के साथ सामान्य ढंग से बैठ कर डिनर किया था. इस के बाद वह अपने मांबाप और बहन के सोने का इंतजार करता रहा.

पुलिसिया पूछताछ में 4 साल पहले हुए सूरज के अपहरण के मामले से भी परदा उठ गया है. पुलिस के मुताबिक, सूरज आपराधिक सोच का लड़का है.

4 साल पहले पिता की रोकटोक से ऊब कर परिवार को परेशान करने के लिए उस ने अपने अपहरण की कहानी भी रची थी और घर से 200 रुपए ले कर मेरठ भाग गया था. बाद में उसे गाजियाबाद के मोदी नगर रेलवे स्टेशन पर देखा गया.

वापस आने पर सूरज ने अपने पिता को अपहरण की मनगढ़ंत कहानी सुनाई थी. इस मामले में हालांकि कोई पुलिस रिपोर्ट नहीं हुई थी.

पड़ोसियों और सूरज के चचेरे भाइयों का कहना है कि सूरज अकसर पैसों को ले कर अपने पिता से ?ागड़ा करता था. द्य

मिर्चपुर का इंसाफ

24 अगस्त, 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने हरियाणा के मिर्चपुर हत्याकांड के अपराधियों को सजा सुनाई. 12 अपराधियों को उम्रकैद की सजा दी गई.

तकरीबन 10 साल पहले एक रात इस गांव के जमींदारों के कुछ शराबी नौजवान वाल्मीकि महल्ले की एक गली से गुजर रहे थे. नशे में मदमस्त वे काफी हुड़दंग मचाए जा रहे थे, मगर गांव में उन का खौफ इतना ज्यादा था कि किसी की क्या मजाल जो उन की खिलाफत कर सके.

कुदरत का नियम है कि जानवर किसी इनसानी कानून को नहीं मानते, लिहाजा कुछ कुत्ते उन नौजवानों पर भूंक पड़े. बस, फिर क्या था, उन नौजवानों ने उन घरों पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए जिस तरफ से कुत्ते भूंक रहे थे. खिलाफत करने पर बात बढ़ गई. जमींदारों के बदतमीज नौजवानों ने पूरी वाल्मीकि बस्ती में आग लगा दी.

भारत के ज्यादातर गांवों में आज भी जमीन मालिकों में कानून का डर नहीं है. दारोगा को रिश्वत दे कर वे लोग भारत के किसी भी कानून का मजाक उड़ा सकते हैं.

कानून हमारा क्या बिगाड़ लेगा. गांव में जो हम कहेंगे वही कानून है. छोटी जातियों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों की हमारे सामने क्या औकात है? उन्हें गांव में रहना है तो गुलाम बन कर रहना होगा. हम जब चाहें, उन्हें पीट दें. उन का काम बंद करा दें. उन की बहूबेटी को बेइज्जत कर दें. उन को मजदूरी न दें. उन के घरों में आग लगा दें. उन के कुओं में गंदगी डाल दें, कोई क्या बिगाड़ लेगा हमारा?

पंचायत हमारी, सरपंच हमारा, दारोगा हमारा, विधायक हमारा, सांसद हमारा. फिर ये दलित, भूमिहीन मजदूर, गरीब मुसलिम हमारा क्या बिगाड़ लेंगे. यही सोच गांव के जमींदार तबके पर हावी है.

यही है वह कड़वी सचाई, जो एयरकंडीशंड कमरों में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को नजर नहीं आती. इसी सोच के तहत जोरजुल्म की ज्यादातर वारदातें गांवों में ही होती हैं और पुलिस व न्यायपालिका कभी भी गरीब तबके को सिक्योरिटी या इंसाफ नहीं दिला पाती हैं.

बात चल रही थी मिर्चपुर की. वाल्मीकि बस्ती में आग लगाने के बाद उन दरिंदों ने पूरी बस्ती में मारपीट की. एक बुजुर्ग और एक 10-12 साल की अपंग लड़की घर में लगी आग की भेंट चढ़ गए. बाकी लोग जान बचा कर भागे. पूरे गांव में खौफ छा गया.

पुलिस ने कुछ कार्यवाही की, लेकिन पीडि़त पक्ष इतना डरा हुआ था कि उसे यह यकीन नहीं था कि हरियाणा प्रशासन उस को इंसाफ दिलवा पाएगा. लिहाजा, केस को दिल्ली की अदालत में ट्रांसफर किया गया. सैशन कोर्ट ने कम सजा दी. दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की गई और उस अपील पर फैसला 24 अगस्त, 2018 को आया.

इस वारदात में कई अहम बिंदु हैं:

* हरियाणा में जब भी अनुसूचित जातियों की किसी एक खास जाति पर जोरजुल्म होता है तो दूसरी अनुसूचित जातियां किसी भी आंदोलन में उस का साथ नहीं देतीं.

* शायद यह सच पूरे भारत में लागू होता है. मिर्चपुर हत्याकांड या अग्निकांड की खिलाफत में कोई ऐसा सामाजिक आंदोलन नहीं उठा, जिस में हरियाणा की सभी अनुसूचित जातियों ने हिस्सा लिया हो. ऐसे जोरजुल्म के खिलाफ संगठित आवाज उठाने की जरूरत है.

* दबदबे वाली जातियों को प्रशासन और पुलिस की सरपरस्ती मिलती है. समाज के सभी तबकों की न्यायिक समझ गरीब तबकों की मदद नहीं करती. जो बात सही है, उसे भी सही तरीके से नहीं उठाया जाता. जातिवादी राजनीति सच का गला घोंट देती है.

* भूमिहीन गरीब जातियों को यह यकीन ही नहीं होता कि ऊंची जाति का कोई भी आदमी उन की मदद कर सकता है. यहां तक कि पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका को भी वे शक की नजरों से ही देखते हैं. यही वजह थी कि मिर्चपुर केस को दिल्ली में लड़े जाने की मांग की गई.

* अपराधियों को हर तरह की सुविधा व सहयोग मिलता है. अच्छे से अच्छा वकील उन की पैरवी करता है. राजनीतिक नेता भी उन की हिम्मत बढ़ाते हैं और पूरा समाज या तो उन का साथ देता है या अपराधिक लैवल तक अलग हो जाता है. सीनियर वकील यहां तक कह देता है कि अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि वाल्मीकि अनुसूचित जाति हैं भी या नहीं. वाह रे कानून के जानकार.

न्यायपालिका ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी है. पर ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इस के लिए भारतीय समाज, पुलिस व प्रशासन को जातिवादी सोच से उबर कर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.

फाल के बाद (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

स्कूल बस से उतरते हुए नेहल सोचती है कि सौतेली मां, पापा और स्नेहा के होने के बाद भी घर कितना सूना लगता है. मां के मरने के बाद जूलियन मौम ने घर में आते ही स्नेहा की जिम्मेदारी उसे सौंप दी. जूलियन मौम बार में नौकरी करती थी. पापा के कहने पर नौकरी तो छोड़ दी लेकिन दिन भर दोस्तों के साथ मौजमस्ती करती. घर का सारा काम नेहल को करना पड़ता.

घर में घुसते ही उसे अपनी मम्मी की याद आने लगती है. जब वह 4 साल की थी तब वे विदेश आए थे. वे सब कितना मजे करते थे. पापामम्मी उन्हें घुमाने के लिए डिजनीलैंड भी ले कर गए थे. लेकिन पापा के प्रमोशन के बाद से उन की व्यस्तता बढ़ गई थी. एक दिन आधी रात को नेहल अपने मम्मीपापा के लड़ने की आवाजों में ‘जूलियन’  का नाम सुनती है. नेहल अपनी मम्मी से जूलियन के बारे में पूछती है.

इस झगड़े के बाद से मम्मी बीमार रहने लगी थीं. बीमार मम्मी और बेटियों की देखभाल के लिए जरीना नानी घर में आ गई थीं. जरीना नानी को उन के बेटेबहू ने घर से निकाल दिया था. एक रात मम्मी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो पापा उन्हें अस्पताल ले जाते हैं और साथ में स्नेहा और नेहल को भी.

और अब आगे…

‘क्या हुआ मम्मी को?’ अचानक नींद से जगाई गई नेहल भौचक थी.

एम्बुलेंस में मम्मी को अस्पताल ले जाया गया था. मम्मी की आंखें बंद थीं. चेहरे पर तकलीफ साफ झलक रही थी. नेहल अनजाने डर से कांप रही थी. अगर मम्मी को कुछ हो गया तो कहां जाएगी नेहल? अस्पताल पहुंचने के पहले ही मम्मी उसे अकेला छोड़ कर हमेशा के लिए जा चुकी थीं. डाक्टर ने बताया था कि मम्मी को मैसिव हार्ट अटैक पड़ा था.

रोतेरोते नेहल बेहाल थी. नेहल से चिपकी स्नेहा, बहन के आंसू पोंछने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उसी रात नेहल ने जूलियन नाम की औरत को देखा था. दोनों बेटियों को जूलियन के हवाले कर पापा अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे. जूलियन ने दोनों बच्चियों को समझाया था :

‘जो इस दुनिया में आता है उसे एक दिन जाना ही होता है. मम्मी के लिए रोने से उन्हें तकलीफ होगी. रोना बंद करो और सो जाओ.’

मम्मी को तकलीफ न पहुंचे इसलिए नेहल ने जबरन आंसू पोेंछ डाले, पर मन में आंधी चल रही थी, अब उन का क्या होगा? मम्मी ने शायद इसी दिन के लिए कहा था कि नाना के पास चली जाना. कहां हैं उस के नाना?

जरीना नानी के आंसू नहीं रुक रहे थे. उन की तो बेटी ही चली गई. दोनों  बच्चियों  को  सीने  से  चिपटा  तसल्ली दी थी, ‘रोते नहीं, तेरी नानी अभी जिंदा है.’

पापा की मदद के लिए जूलियन उन की नई मौम बन कर आ गई. पापा ने उन्हें समझाया था, ‘यह तुम्हारी जूलियन मौम हैं. तुम्हें इन से बहुत कुछ सीखना है. इन की गाइडेंस में तुम होशियार और वेल मैनर्ड लड़कियां बन सकोगी.’

जूलियन मौम ने आते ही घर की फुजूलखर्ची पर पाबंदी लगा दी. जरीना नानी की अब कोई जरूरत नहीं रह गई थी. रोती बच्चियों को चिपका कर नानी खूब रोई थीं. पापा से विनती की थी, ‘हमें कुछ नहीं चाहिए. बस, इन बच्चियों से अलग मत कीजिए.’

‘अब ये बच्चियां नहीं हैं. कुछ ही महीनों में नेहल 10 बरस की हो जाएगी. अमेरिका में इस उम्र की लड़कियां इंडिपेंडेंट हो जाती हैं. आप परेशान न होें. उन की देखरेख के लिए मैं हूं,’ रुखाई से अपनी बात कह कर, जूलियन मौम ने नानी के लिए दरवाजे बंद कर दिए.

नेहल ने अपने साथियों से दूसरी मां के बारे में सुना था. वह खराब नहीं होती, पर जूलियन मौम उन से अलग थी. नेहल की टे्रनिंग कड़ाई से शुरू की गई. स्नेहा की पूरी जिम्मेदारी अब नेहल पर थी. उसे बस स्टैंड पहुंचाने, लाने के अलावा अपने दोनों के लिए लंच बनाना और पैक करना, नेहल का दायित्व था. अपनी भारी बेड शीट्स बदलना, कपड़े वाशर में धोना और सुखाना भी नेहल का ही काम था. स्नेहा से मदद संभव नहीं थी. स्कूल में पहले नंबर पर आने वाली नेहल को इतने काम निबटाने के बाद होमवर्क के लिए टाइम नहीं बचता था.

जूलियन मौम कहती, ‘अमेरिका में रहना है तो यहां के तौरतरीके अपनाने होंगे. तुम्हारी मां ने तुम्हें बच्ची बना कर रखा है. चलो, आज से डिशेज लगाओ.’

एक दिन नेहल ने पापा से डरतेडरते कहा, ‘पापा, हम नाना के पास जाएंगे.’

‘यह नाना कहां से आ गए?’ पापा दहाड़े.

‘मम्मी ने कहा था, हम उन के पास जा सकते हैं.’

‘अच्छा, जातेजाते यह सीख दे गई है. तुम्हारे नाना मर चुके हैं. खबरदार जो फिर कभी नाना का नाम भी लिया. यहां तुम्हें क्या तकलीफ है. अच्छा खाती हो, अच्छे स्कूल में पढ़ती हो. जूलियन तुम्हारी जितनी केयर करती है, तुम्हारी मां भी नहीं कर पाई.’

‘नहीं, हमारी मम्मी बहुत अच्छी थीं,’ अपनी बात कह कर नेहल पापा के सामने से हट गई.

स्कूल में जौन नेहल का साथी था. उस से डेढ़ साल बड़ा जौन, नेहल का दोस्त था. पहले की खिलीखिली नेहल का मुरझाया चेहरा जौन से छिपा नहीं रहा. बहुत प्यार से बारबार पूछने पर नेहल फूट पड़ी थी. जौन को नेहल से बहुत हमदर्दी थी.

‘तुम 911 को फोन क्यों नहीं करतीं,’ जौन ने कहा था, ‘घर के इतने सारे काम करने के लिए तुम्हें पैसे नहीं दिए जाते. तुम्हें मेंटल टार्चर किया जाता है. ऐसे मांबाप के साथ रहने से तो स्टेट कस्टडी में रहना ज्यादा अच्छा होगा.’

‘नहीं, जौन. हम ऐसा नहीं कर सकते. स्नेहा अभी बहुत छोटी है. उसे छोड़ कर हम कहीं नहीं जा सकते,’ नेहल ने अपनी विवशता स्पष्ट कर दी.

उस दिन डिशेज लगाते वक्त नेहल के हाथ से एक कीमती कांच का डोंगा टूट गया. डोंगा टूटने की आवाज सुन कहीं बाहर से लौटी जूलियन मौम चीख पड़ी, ‘यू ईडियट, क्या पैसा मुफ्त का आता है? इतना कीमती डोंगा तोड़ डाला. इस का हर्जाना तुम्हें भरना होगा.’

हर्जाना भरने की बात ने नेहल को डरा दिया. उस के पास उतने पैसे कहां से आएंगे? पापा से बात करना तो बेकार ही था. बच्चों की ओर से मुंह मोड़ कर, वह जूलियन के साथ मौजमस्ती मना रहे थे. घर में नई मौम और पराए हो गए पापा के असहनीय व्यवहार के बावजूद, नेहल घर छोड़ने का साहस नहीं कर पाती.

पिछले कुछ माह से हर वीकेंड पर पार्टी के शोरगुल से घर में देर रात तक चहलपहल रहती. शराब के दौर चलते. जूलियन मौम के ढेर सारे फें्रड्स आते. सब मिल कर डांस करते. नेहल और स्नेहा अपने कमरे में बैठी आवाजें सुनतीं. उन्हें बाहर न आने की सख्त हिदायत दी जाती. उस तेज म्यूजिक के शोर में नींद आना भी मुश्किल होता.

एक रात जूलियन मौम का फ्रेंड एड्रियन शराब में धुत उन के कमरे में आ गया. पलंग पर लेटी नेहल को एड्रियन ने अपने से सटा कर उस पर चुंबनों की बौछार कर दी. डर से जड़ नेहल, किसी तरह अपने को छुड़ा कर कमरे से बाहर भाग आई. थरथर कांपती नेहल पापा के सामने जा खड़ी हुई.

‘पापा…’ आगे कुछ न कह, नेहल रो पड़ी.

‘क्या हुआ? तुम यहां क्यों आईं?’ पापा नाराज थे.

‘शायद कोई डरावना सपना देखा होगा,’ पीछे से आए एड्रियन ने पुचकारा.

‘सिली गर्ल. इतनी बड़ी हो गई. अब भी डरती है. नाउ गो टु योर रूम,’ जूलियन ने डांट लगाई.

झिड़की सुन कर नेहल कमरे में चली गई. पलंग पर सो रही स्नेहा को कस कर चिपटा लिया. अब वही तो उस की एकमात्र अवलंब थी.

दूसरी सुबह आफिस जाने को तैयार हो रहे पापा से डरतेडरते कहा, ‘पापा, वह एड्रियन अंकल रात में हमारे कमरे में आए थे. हमें किस कर रहे थे.’

‘क्या? जूलियन, एक बात अच्छी तरह से समझ लो. एड्रियन की यह गंदी हरकत मुझे बरदाश्त नहीं. आगे से उसे घर में आने की इजाजत नहीं होगी.’

‘शटअप. इस घर पर मेरा भी उतना ही हक है जितना तुम्हारा है. इस लड़की का दिमाग गंदा है. छोटी बच्ची समझ कर अगर किस कर लिया तो कौन सा तूफान आ गया. एड्रियन जरूर आएगा. वह मेरा बेस्ट फ्रेंड है.’

खैर, किसी तरह मामला तूल पकड़तेपकड़ते रह गया. पापा आफिस चले गए और ?जूलियन अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई.नेहल अपने स्कूल पहुंची. आज वह उदास थी. उसे उदास, गुमसुम देख जौन ने पूछा, ‘नेहल, क्या बात है जो आज तुम इतनी उदास हो?’

नेहल ने उसे बीती रात की घटना कह सुनाई.

पूरी बात सुन कर जौन ने नेहल को समझाया.

‘अब तुम उस घर में सेफ नहीं हो. जल्दी से जल्दी घर छोड़ने में ही तुम्हारी भलाई है, वरना पछताओगी.’

‘हम क्या करें, जौन? कहां जाएं?’

‘मेरे एक अंकल हैं. वह तुम्हारे जैसे बेसहारा बच्चों की हेल्प करते हैं. अगर तुम चाहो तो स्नेहा को भी अपने साथ ले जा सकती हो.’

‘क्या वह हमें प्यार से रखेंगे, जौन? तुम वहां हम से मिलने तो आते रहोगे?’

‘जरूर, नेहल, मैं अंकल से बात कर के सब तय कर लूंगा. सब तय हो जाने पर तुम्हें उन के पास ले चलूंगा. बस, कुछ दिन इंतजार करना होगा. अंकल 3 सप्ताह के लिए यूरोप गए हुए हैं.’

जौन की बात सुन कर नेहल ने जैसे आश्वस्ति की सांस ली. वैसे भी पिछले कुछ दिनों से घर में तनाव चल रहा था. जूलियन मौम पिछले 2 वीकेंड्स पर एड्रियन के साथ बाहर रही थीं. पता नहीं उन्होंने पापा से क्या कहा, पर पापा उन की एबसेंस में खूब शराब पीते रहे. नेहल और स्नेहा सहमीसहमी रहीं. पापा से तो अब बातचीत शायद ही कभी हो पाती. उन दोनों की पूरी जिम्मेदारी जूलियन पर छोड़, पापा निश्चिंत थे. नेहल सोचती, जब मम्मी थीं तब पापा को घर में शराब पीते उस ने कभी नहीं देखा था. पता नहीं जूलियन मौम को कौन से काम आ जाते हैं, वह पापा को छोड़ कर शहर से बाहर चली जाती हैं.

तभी एक दिन पापा और जूलियन मौम की तेज आवाजों से नेहल की नींद खुल गई. पापा चिल्ला रहे थे, ‘जानता हूं, कौन से जरूरी काम से एड्रियन के साथ तुम गई थीं. उस के साथ रातें बितानी थीं तो मुझ से शादी क्यों की? मेरे साथ यह सब नहीं चलेगा, समझी.’

‘बकवास बंद करो. मुझे अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने की पूरी आजादी है. अच्छी तरह से सुन लो, मैं तुम्हारी इंडियन वाइफ की तरह गुलामी नहीं सहूंगी,’ जूलियन मौम चीखी.

‘खबरदार, जो मेरी पत्नी का नाम लिया. तुम उस की क्या बराबरी करोगी. तुम जैसी बाजारू औरत तो किसी की भी पत्नी बनने लायक नहीं है. आज एड्रियन, कल जेम्स…’

‘तुम ने मुझे बाजारू औरत कहा. मैं अभी तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं. रहो अपनी इन 2 बच्चियों के साथ. आई कांट स्टैंड देम.’

तड़ाक से पापा के चांटे की आवाज सुनाई पड़ी थी. साथ ही जूलियन मौम ने फोन डायल किया था. नेहल जान गई, 911 काल कर के मौम कौप को बुला रही थीं.

‘पुलिस स्टेशन?’

‘यस,’ दूसरी ओर से जवाब मिला.

‘प्लीज कम टु 1560, मेवल स्ट्रीट इमीडिएटली.’

‘यह क्या कर रही हो? आई एम सौरी, जूलियन. प्लीज,’ पापा की डरी हुई आवाज सुनाई दी थी.

‘मुझ पर हाथ उठाने की तुम ने हिम्मत कैसे की? अब सड़ना जेल में.’

डोर बेल बजते ही नेहल पलंग से उठ गई. अगर पापा जेल चले गए तो? कौप (पुलिस मैन) के भारी बूटों की आवाज सुनते ही नेहल डर से कांपने लगी.

लियन मौम ने कौप से पापा की शिकायत कर दी. पत्नी पर हाथ उठाना भारी अपराध था. पापा गिड़गिड़ा रहे थे. कौप उन की बात सुन कर नेहल के कमरे में आए थे.

‘सौरी, तुम्हारे पापा को पुलिस कस्टडी में ले जाना है.’

‘नहीं…नहीं, पापा को छोड़ दीजिए, प्लीज. हम किस के साथ रहेंगे?’ नेहल रो पड़ी.

‘डरो मत. तुम्हारे पास तुम्हारी मौम तो हैं.’

‘यह हमारी मौम नहीं हैं, सर. यह तो हमें टार्चर करती हैं. हमें प्यार नहीं करतीं. हमें ‘बिच’ कहती हैं,’ हिम्मत कर के नेहल ने अपनी बात कह दी.

‘शटअप, क्या बक रही है. अपने पापा को सेव करने के लिए झूठ बोल रही है,’ जूलियन ने आंखें तरेरीं.

‘नहीं, हम सच कह रहे हैं. यह हमारे साथ बुरा बरताव करती हैं. हमें घर का बहुत काम करना होता है. हम होमवर्क भी नहीं कर पाते,’ बड़ेबड़े आंसू नेहल की आंखों से गिर रहे थे. जौन की सीख ने हिम्मत दे डाली.

‘प्लीज, सर, मेरी बच्चियों पर दया कीजिए. अब कभी ऐसी गलती नहीं होगी,’ पापा दयनीय हो आए थे.

‘अगर आप पापा को ले जाएं तो हमें जौन के अंकल के पास पहुंचा दीजिए. वह हमें प्यार से रखेंगे.’

‘यह जौन कौन है?’ कौप ने गंभीरता से पूछा.

‘होगा कोई इस का ब्वाय फ्रेंड,’ कड़वाहट से जूलियन ने कहा.

‘जौन मेरे साथ पढ़ता है. उस के साथ मैं अपनी तकलीफें शेयर करती हूं. उस ने ही अंकल के बारे में मुझे बताया है.’

‘हूं. जौन के अंकल के बारे में जानकारी लेनी होगी,’ कौप गंभीर थे.

कुछ देर सोचने के बाद कौप ने जूलियन से कहा, ‘मैडम, इस लड़की ने आप की भी शिकायत की है. इस की शिकायत पर आप भी मुश्किल में आ जाएंगी. आज आप दोनों को वार्निंग दे कर छोड़ रहा हूं, पर अगर दूसरी बार कुछ ऐसा हुआ तो आप दोनों में से एक को जेल जाना होगा. हां, नेहल हमें अपने फें्रड जौन से मिलाओगी?’

‘यस, सर. थैंक्यू वेरी मच,’ नेहल की आंखों में खुशी जगमगा उठी.

सुबह होते ही जूलियन अपना सामान पैक कर के हमेशा के लिए घर छोड़ गई. बहुत दिनों बाद पापा ने प्यार से कहा, ‘आई एम सौरी. मेरी गलती की वजह से तुम दोनों को बहुत सफर करना पड़ा. अब मैं पूरी केयर करूंगा.’’

‘पापा…’ कहती नेहल और स्नेहा अपने पिता से चिपट गईं.

कुछ दिनों बाद पुलिस इंस्पेक्टर आए थे. पापा से बोले, ‘मिस्टर नाथ, आप का समय अच्छा था सो आप की बेटी बच गई.’

‘क्यों, क्या हुआ, इंस्पेक्टर?’ पापा घबरा गए.

‘जौन का मुंहबोला अंकल एक क्रिमिनल है. वह लड़कियों को अवैध कामों में लगाता है. नेहल की वजह से हम एक क्रिमिनल को पकड़ सके. नेहल ने जब जौन के अंकल के पास जाने की बात कही तभी मुझे शक हो गया था. अगर आप की बेटियां उस के हाथ पड़ जातीं तो न जाने क्या हाल होता. अब केयरफुल रहिएगा.’

‘थैंक्स, इंस्पेक्टर. मेरी भूल की वजह से मेरी बच्चियां न जाने किस नरक में पहुंच जातीं. मैं जूलियन के झूठ में अंधा हो गया था.’

आज स्कूल से लौटी नेहल को पापा ने रिसीव किया था.

‘‘पापा, आप घर में हैं?’’

‘‘हां, बेटी, आज मैं ने छुट्टी ली है. तुम्हें सरप्राइज जो देना है.’’

‘‘सच, पापा. आप हमें सरप्राइज देंगे?’’ नेहल को याद आया, जब मम्मी थीं तो पापा और मम्मी उन्हें अकसर सरप्राइज गिफ्ट्स दिया करते थे. आज बहुत दिनों बाद पापा उसे सरप्राइज देने वाले थे.

घर में प्रवेश करते ही सामने सोफे पर बैठी जरीना नानी पर नजर पड़ी. स्नेहा उन की गोद में बैठी कुछ खा रही थी.

‘‘जरीना, नानी…’’ कहती नेहल उन से लिपट गई. आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. जरीना नानी भी रो रही थीं.

‘‘जरीना नानी, रोइए नहीं,’’ नन्ही स्नेहा बोली.

‘‘ये तो खुशी के आंसू हैं मेरी बच्ची.’’

‘‘अब आप हमें छोड़ कर तो नहीं जाएंगी?’’

‘‘नहीं, नेहल. अब तुम्हारी नानी तुम्हें छोड़ कर कभी नहीं जाएंगी. जरीना आंटी, आज से इन दोनों बच्चियों की पूरी जिम्मेदारी आप की है,’’ पूरे अधिकार से पापा ने कहा.

‘‘यह तो मेरी खुशकिस्मती होगी,’’ दुपट्टे के छोर से अपने आंसू पोंछती नानी बोलीं, ‘‘मुझे मेरी बेटियां वापस मिल गईं.’’

महीनों बाद नेहल बालकनी में खड़ी देख रही थी, पेड़ों पर हरीहरी पत्तियां झूम रही थीं. अब फाल सीजन खत्म हो चुका था. खयालों से वापस निकली तो दौड़ कर नीचे गई और जरीना नानी से चिपट कर हंस पड़ी.

#MeToo: आलोक नाथ के खिलाफ CINTAA ने लिया ये एक्शन

#MeToo कैंपेन की चपेट में आए अभिनेता आलोक नाथ के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया गया है. सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (CINTAA) ने आलोक नाथ के खिलाफ एक्शन लेते हुए उन्हें संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. आपको बता दें कि मीटू कैंपेन के तहत कई दिग्गजों में आलोक नाथ पर भी यौन शोषण का आरोप लगा था.

अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से जानकारी देते हुए सींटा ने कहा कि कि ‘मिस्टर आलोक नाथ पर यौन शोषण और दुर्व्यवहार के कई आरोप लगे. जिसे ध्यान में रखते हुए सिंटा उन्हें संगठन से निष्कासित करती है.’

गौरतलब है कि #MeToo मूवमेंट की शुरुआत के बाद डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विनता नंदा ने आलोक नाथ पर रेप का आरोप लगाया था. इस बात की जानकारी उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट लिखकर दी थी. विनता ने बताया कि ‘एक पार्टी में शामिल होने के लिए वो आलोक नाथ के घर गईं. उस दौरान उन्होंने ड्रिंक में कुछ मिला दिया और फिर घर छोड़ने की पेशकश की. इसके बाद मेरे मुंह में और ज्यादा शराब डाली गई और मेरे साथ काफी हिंसा की गई.’

विनता ने यह भी कहा कि इस घटना के बारे में उन्होंने आलोक नाथ की पत्नी आशु को इस बारे में बताया था लेकिन उन्होंने उनकी कोई मदद नहीं की थी. विनता नंदा के आरोपों के बाद संध्या मृदुल और हिमानी शिवपुरी जैसे कई बड़े नाम आलोक नाथ के खिलाफ सामने आए और बताया कि सेट पर किस तरह वो बदतमीजी करते हैं.

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